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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

भाषाटीकासमेत । (२७७) मसूरिकाके उपद्रव । मसूरिकान्ते शोथः स्यात्कूर्परे मणिबन्धके । तथांसफलके वापि दुश्चिकित्स्यः सुदारुणः ॥ ३० ॥ मसूरिका (शीतला) के अन्तमें कूर्पर (कोहनी), पहुंचा तथा कन्धा इनमें सूजन होय, (इसको व्यवहारमें गुरु ऐसे कहते हैं) यह चिकित्सा करनेमें कठिन है॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां मसूरिकानिदानं समाप्तम् ॥ अथ क्षुद्ररोगनिदानम् । अजगल्लिकाके लक्षण । स्निग्धा सवर्णा ग्रथिता नीरुजा मुद्गसन्निभा । कफवातोत्थिता ज्ञेया बालानामजगल्लिका ॥ १ ॥ बालकको कफवातसे चिकनी, त्वचाके वर्णके समान वर्ण होय, गांठसी बन्धी रुजा (पीडा) रहित तथा मूंगके सदृश जो पिडिका होय उसको अजगल्लिका कहते हैं ॥ यवप्रख्याके लक्षण । यवाकारा सुकठिना ग्रथिता मांससंश्रिता । पिडिका श्लेष्मवाताभ्यां यवप्रख्येति चोच्यते ॥ २ ॥ कफवातसे प्रगट, जौके समान कठिन, गांठके सदृश मांसमिश्रित जो पीडिका होय उसको यवप्रख्या कहते हैं भोजके मतसे इसीको अन्त्रालजी कहते हैं ॥ अन्त्रालजीके लक्षण । घनामवक्त्रां पिडिकामुन्नतां परिमंडलाम् । अन्त्रालजीमल्पपूयां तां विद्यात्कफवातजाम् ॥ ३ ॥ कफवातसे प्रगट, कठिन, जिसमें मुख न हो, तथा ऊंची ऐसी पिडिका होय तथा जिसके चारोंओर मण्डलाकार हो और जिसमें राध थोडी होय, उसको अन्त्रालजी कहते हैं ॥ १ अन्त्रालजी स्नायुगता भोजादवगन्तव्या । यदुक्तम्- "श्लेष्मानिलौ श्रितौ स्नायुं पिडिकां पित्तमण्डलाम् । दुष्टौ जनयतोऽवक्त्रामल्पपूयामकण्डुराम् ॥ आमोदुम्बरसंकाशां विद्यादन्त्रा- लर्जीं तु ताम् ॥" CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( २७८ ) . माधवनिदान ।

( २७८ ) . माधवनिदान । विवृतापिडिकाके लक्षण । विवृतास्यां महादाहां पक्वोदुम्बरसन्निभाम् । परिमंडलां पित्तकृतां विवृतां नाम तां विदुः ॥ ४ ॥ पित्तके योगसे फटे मुखकी, अत्यन्त दाहयुक्त, पके गूलरके समान, चारों ओर वल पडी हुई जो पिडिका होय उसको विवृता कहते हैं ॥ कच्छपिकाके लक्षण । ग्रथिता पञ्च वा षड् वा दारुणाः कच्छपोन्नताः । कफानिलाभ्यां पिडिका ज्ञेया कच्छपिका बुधैः ॥ ५ ॥ कफ वायुसे प्रगट गांठ बन्धी, पांच अथवा छः, कठिन कछुओके पीठके समान ऊंची जो पिडिका होयँ उनको कच्छपिका कहते हैं ॥ वल्मीकपिडिकाके लक्षण । ग्रीवांसकक्षकरपाददेशे संधौ गले वा त्रिभिरेव दोषैः । ग्रन्थिः सवल्मीकवदक्रियाणां जातः क्रमेणैव गतः प्रवृद्धिम् ॥ ६ ॥ मुखैरनेकैः स्रुतितोदवद्भिर्विसर्पवत्स्र्पति चोन्नताग्रैः । वल्मीकमाहुर्भिषजो विकारं निष्प्रत्यनीकं चिरजं विशेषात् ॥७॥ नाड, कन्धा, कूंख, हाथ, पैर, सन्धि, गला इन ठिकाने तीनों दोषोंसे सर्पकी बांबीके समान गांठ होय, उसका उपाय न करे तब वह धीरे धीरे बढे, उसमें अनेक मुख हो जायँ, उसमेंसे स्राव होय, नोचनेकीसी पीडा होय तथा वह मुखक ऊपर कुछ ऊंची होकर विसर्पके समान फैल जाय, इस रोगको वैद्य वल्मीक कहते हैं । इसके ऊपर औषध उपचार नहीं चले और पुराने होनेसे विशेष असाध्य जाननी ॥ इन्द्रवृद्धाके लक्षण । पद्मकर्णिकवन्मध्ये पिडिकाभिः समाचिताम् । इन्द्रवृद्धां तु तां विद्याद्वातपित्तोत्थितां भिषक् ॥ ८ ॥ कमलकार्णिकाके समान बीचमें एक पिडिका होय, उसके चारोंओर छोटी छोटी फुन्सी होयँ, उसको इन्द्रवृद्धा कहते हैं, यह वात पित्तसे उत्पन्न होय है ॥ गर्दभिकाके लक्षण । मंडलं वृत्तमुत्सन्नं सरक्तं पिडिकाचितम् । रुजाकरीं गर्दभिकां तां विद्याद्वातपित्तजाम् ॥ ९ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( २७९ ) वातपित्तसे प्रगट एक गोल ऊंचा तथा लाल और फोडोंसे व्याप्त ऐसा मंडल होय वह बहुत दूखे उसको गर्दभिका कहते हैं ॥ पाषाणगर्दभके लक्षण । वातश्लेष्मसमुद्भूतः श्वयथुर्हनुसंधिजः । स्थिरो मन्दरुजः स्निग्धो ज्ञेयः पाषाणगर्दभः ॥ १० ॥ वातकफसे ठोडीकी सन्धिमें कठिन, मन्द पीडा करनेवाली चिकनी ऐसा सूजन होथ उसको पाषाणगर्दभ कहते हैं ॥ पनसिके लक्षण । कर्णस्याभ्यन्तरे जातां पिडिकामग्रवेदनाम् । स्थिरां पनसिकां तां तु विद्याद्वातकफोत्थिताम् ॥ ११ ॥ कानके भीतर वात पित्त कफसे जो फुन्सी उग्रवेदना सहित प्रगट होय और वह स्थिर होय, उसको पैनसिका कहते हैं ॥ जालगर्दभके लक्षण । विसर्पवत्सर्पति यः शोथस्तनुरपाकवान् । दाहज्वरकरः पित्तोत्स ज्ञेयो जालगर्दभः ॥ १२ ॥ पित्तसे विसर्पके समान इधर उधरको फैलनेवाली पतली तथा कुछ पकनेवाली ऐसी सूजन होय, उसमें दाह होय और ज्वर होय, इसको जालगर्दभ कहते हैं, कोई आचार्य कहते हैं कि, इसमें पकना नहीं होय ॥ इरिबेल्लिकाके लक्षण । पिडिकामुत्तमांगस्थां वृत्तामुग्ररुजाज्वराम् । सर्वात्मिकां सर्वलिंगां जानीयादिरिवेल्लिकां ॥ १३ ॥ त्रिदोषसे प्रगट मस्तकमें गोल अत्यन्त पीडा और ज्वर करनेवाली त्रिदोषके लक्षण संयुक्त ऐसी पिडिका होय उसको इरिबेल्लिका कहते हैं ॥ कक्षा (कखलाई) के लक्षण । बाहुकक्षांसपार्श्वे तु कृष्णस्फोटां सवेदनाम् । पित्तकोपसमुद्भूतां कक्षामित्यभिनिर्दिशेत् ॥ १४ ॥ १ कफवातौ प्रकुपितौ मांसमाश्रित्य कर्णयोः । समन्ततः परिस्तब्धां कुरुतः पिडिकां स्थिराम् ॥ विषमां दाहसंयुक्तां विद्यात्पनसिकां तु ताम् ॥ २ पित्तोत्कटास्त्रयो दोषा जन- यंति त्वगाश्रिताः । श्यावं रक्तं तनुं शोथमपाकं बहुवेदनम् ॥ विसर्पिणं सदाहं च तृष्णाज्वर- समन्वितम् । विसर्पमाहुस्तं व्याधिमपरे जालगर्दभम् ॥

( २८० ) माधवनिदान ।

( २८० ) माधवनिदान । बाहु ( भुजा ) की जड़, कंधा और पसवाडे इन ठिकाने पित्त कुपित होकर काले फोडोंसे व्याप्त तथा वेदनायुक्त जो पिडिका होय उसको कक्षा वा कखलाई कहते हैं॥ गन्धमालाके लक्षण । एकामेतादृशीं दृष्ट्वा पिडिकां स्फोटसन्निभाम् । त्वग्गतां पित्तकोपेन गन्धमालां प्रचक्षते ॥ १५ ॥ पित्तके कोपसे जो कक्षामें कही हुई काले फोडेके समान एक पिडिका त्वचाके भीतर होय उसको गन्धमाला कहते हैं ॥ अग्निरोहिणी ( काली फुन्सी ) । कक्षाभागेषु ये स्फोटा जायन्ते मांसदारुणाः । अन्तर्दाहज्वरकरा दीप्तपावकसन्निभाः ॥ १६ ॥ सप्ताहाद् द्वादशाहाद्वा पक्षाद्वा हंति मानवम् । तामग्निरोहिणीं विद्यादसाध्यां सान्निपातिकीम् ॥ १७ ॥ कांखके आसपास मांसके विदारण करनेवाले जो फोडे होते हैं तिसकरके अन्त- र्दाह होय तथा ज्वर होय वे फोडे प्रदीप्त अग्निके समान लाल होयँ, इन फोडोंमें वायु अधिक होनेसे सात दिन, पित्ताधिक्यसे बारह दिन और कफाधिक्यसे १५ दिनमें रोगी मरे, यह अग्निरोहिणी नामक त्रिदोषजा पिडिका असाध्य है ॥ चिप्पके लक्षण । नखमांसमधिष्ठाय वातः पित्तं च देहिनाम् । कुर्वाते दाहपाकौ च तं व्याधिं चिप्पमादिशेत् ॥ १८ ॥ वायु और पित्त नखोंके मांसमें स्थित होकर दाह और पाकको करे, इस रोगको चिप्प ऐसे कहते हैं, यह अल्प दोषोंसे होय तो इसको कुनख कहते हैं ॥ अनुशयीके लक्षण । गभीरामल्पसंरम्भां सवर्णामुपरि स्थिताम् । पादस्यानुशयीं तां तु विद्यादन्तः प्रपाकिनीम् ॥ १९ ॥ पैरोंमें त्वचाके समान वर्ण यत्किंचित् सूजनयुक्त भीतरसे पकी जो पिडिका होय उसको अनुशयी कहते हैं ॥ विदारिकाके लक्षण । विदारिकन्दवद् वृत्ता कक्षावंक्षणसन्धिषु । विदारिका भवेद्रक्ता सर्वजा सर्वलक्षणा ॥ २० ॥

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भाषाटीकासमेत । ( २८१ ) विदारीकंदके समान गोल, कांखमें अथवा वंक्षणस्थानमें जो गांठ तांबेके रंगकीसी होय उसको विदारिका कहते हैं, यह सन्निपातसे होय है, इसमें तीनों दोषोंके लक्षण होते हैं ॥ शर्करा । प्राप्य मांसशिरास्नायु श्लेष्मा मेदस्तथाऽनिलः । ग्रंथिं करोत्यसौ भिन्नो मधुसर्पिर्वसानिभम् ॥ २१ ॥ स्रवत्यास्रावमनिलस्तत्र वृद्धिं गतः पुनः । मांसं विशोष्य ग्रथितां शर्करां जनयेत्ततः ॥ २२ ॥ कफ मेद वायु ये मांस शिरा और स्नायु इनमें प्राप्त हों गांठ बांधते हैं, जब वह फूटे तब उसमेंसे शहद, घृत, चर्बी इनके समान स्राव हो तिसकरके वायु पुनः बढ़- कर मांसको सुखाय उसकी बारीक खिंचीसी गांठ करे, उसको शर्करा कहते हैं ॥ शर्करार्वुदके लक्षण । दुर्गन्धि क्लिन्नमत्यर्थं नानावर्णं ततः शिराः । सृजंति रक्तं सहसा तद्विद्याच्छर्करार्वुदम् ॥ २३ ॥ शर्करा होनेके अनन्तर नाडियोंसे दुर्गन्ध क्लेदयुक्त अनेक प्रकारके घृत, मेद और वसा इनके वर्णका रुधिर स्रवै, उसको शर्करार्वुद कहते हैं परन्तु भोजने शर्करार्वुदको शर्करा रोगके अंतर्गत कहा है ॥ पाददारीके लक्षण । परिक्रमणशीलस्य वायुरत्यर्थरूक्षयोः । पादयोः कुरुते दारीं पाददारीं तमादिशेत् ॥ २४ ॥ जिस पुरुषको बहुत चलना पडे है उसके पैर वायुके योगसे अत्यन्त रूक्ष होकर विदीर्ण हों ( फाटें ) उसको पाददारी कहते हैं अर्थात् विवाई कहते हैं । विपादिका कुष्ठ फटे नहीं है, यह फूट निकले है, यह इनमें भेद जानना ॥ कदर ( ठेक ) के लक्षण । शर्करोन्मथिते पादे क्षते वा कंटकादिभिः । ग्रंथिः कोलवदुत्सन्नो जायते कदरं तु तत् ॥ २५ ॥ १ तमेव भिन्नदुर्गन्धं घृतमेदोगिभं शिराः । स्रवंति स्रावमनिशं तदा स्याच्छर्करार्वुदम् ॥१॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( २८१ ) माधवनिदान ।

( २८१ ) माधवनिदान । पैरोंमें कंकर छिदनेसे अथवा कांटे लगनेसे बेरके समान ऊंची गांठ प्रगट होय उसको कदर अर्थात् ठेक कहते हैं अथवा ' ग्रंथिः कोलवदुत्सन्नो' इस जगह ' ग्रंथिः कीलवदुत्सन्नो ' ऐसा भी पाठ है अर्थात् कीलके समान जो गांठ होय, उसको कदर कहते हैं । यह कदररोग हाथोंमें भी होय है सो भोजने लिखा भी है ॥ अलस ( खारुआ ) के लक्षण । क्लिन्नांगुल्यंतरौ पादौ कण्डूदाहरुजान्वितौ । दुष्टकर्दमसंस्पर्शादलसं तं विभावयेत् ॥ २६ ॥ दुष्ट कीचमें डोलनेसे ( वर्षा आदिका पानी और सडी कीचमें डोलनेसे ) पैरोंकी उंगली गीली रहनेसे उंगलियोंके बीचमें सफेद चकत्ते हो जायँ, उनमें खुजली, दाह और गीलापन होय, तथा पीडा होय उसको अलस अर्थात् खारुआ कहते हैं, यह कफरक्तके दोषसे होता है ॥ इन्द्रलुप्त ( चाईं ) के लक्षण । रोमकूपानुगं पित्तं वातेन सह मूच्छितम् । प्रच्यावयति रोमाणि ततः श्लेष्मा सशोणितः ॥ २७ ॥ रुणद्धि रोमकूपांस्तु ततोऽन्येषामसंभवः । तदिंद्रलुप्ते खालित्यं रुह्येति च विभावयेत् ॥ २८ ॥ पित्त वादीके साथ कुपित होकर रोमकूपोंमें अर्थात् बालोंके छिद्रोंमें प्राप्त हो तब मस्तक अथवा अन्य स्थानके बाल झडने लगें, पीछे कफ और रुधिर रोमकूप कहिये बालोंके प्रगट होनेके स्थानको रोकदे उससे फिर बाल नहीं ऊगें, इस रोगको इन्द्रलुप्त खालित्य चाचा ( चाईं ) कहते हैं, यह रोग स्त्रियोंके नहीं होय, कारण इसका यह है कि उनका रुधिर महीनेके महीने शुद्ध होता रहे है और निकलता रहे है इससे वह रोमकूपोंको नहीं रोके है, सो विदेहाचार्यने भी लिखा है और इसी रोगको खालित्य और रुह्या कहते हैं सो भोजने लिखा है परन्तु कार्तिकाचार्य कहते हैं कि इन्द्रलुप्तं रोग कुछ दाढीमें होय है और खालित्यरोग शिरमें होय है और रुह्या- रोग पीडासहित होय है ॥ १ ' हस्तयोः पादयोश्चापि गम्भीरानुमतं स्थिरम् । मांसकीलं जनयतः कुपितौ कफ मारुतौ । सशल्यमिव तं देशं मन्यते तेन पीडितम् । शर्कराकदरं केचिन्मन्यन्ते वातकंटकम् ॥ २ अत्यन्तसुकुमाराङ्ग्यो रजो दुष्टं स्रवंति च । अव्यायामरता यस्मात्तस्मान्न स्खलतिः- स्त्रियाः ॥ इति । ३ “ इन्द्रलुप्तं श्मश्रुणि भवति खालित्यं शिरस्येव रुह्या सर्वदेहे ।”

भाषाटीकासमेत । ( २८३ ) दारुणकके लक्षण । दारुणा कण्डुरा रूक्षा केशभूमिः प्रपच्यते । कफमारुतकोपेन विद्याद्दारुणकं तु तम् ॥ २९ ॥ कफवायुके कोपसे केशोंकी जमीन अतिकठिन होकर खुजावे, खरदरी होय तथा बारीक फुन्सी होकर पके उसको दारुणक कहते हैं, कफवातके कोपसे यह रोग होय है. इसका कारण यह है कि बिना पित्तके पाक नहीं होय सो विदेहने कहा भी है ॥ अरूंषिकाके लक्षण । अरूंषि बहुवक्त्राणि बहुक्लेदीनि मूर्धनि । कफासृक्कृमिकोपेन नृणां विद्यादरूंषिकाम् ॥ ३० ॥ रुधिर कफ और कृमि इनके कोपसे माथेमें बहुत फुन्सी हो जायँ, उनमेंसे चोप विशेष निकले और क्लेदयुक्त होयँ इन फुन्सियोंको अथवा व्रणोंको अरूंषिका कहते हैं ॥ पलित ( सफेद बाल ) के लक्षण । क्रोधशोकश्रमकृतः शरीरोष्मा शिरोगतः । पित्तं च केशान्पचति पलितं तेन जायते ॥ ३१ ॥ क्रोध शोक और श्रमके करनेसे उत्पन्न भई जो शरीरमें ऊष्मा ( गरमी ) और पित्त सो मस्तकमें जाकर बालोंको पकाय दे अर्थात् सफेद करदे उस करके यह पलितरोग होय है । पलित रोगपर मधुकोशटीकाकारने तथा भावप्रकाशने शास्त्रार्थ लिखा है ॥ मुखदूषिकाके लक्षण । शाल्मलीकण्टकप्रख्याः कफमारुतकोपजाः । जायन्ते पिडिकायूनां विज्ञेया मुखदूषिकाः ॥ ३२ ॥ कफवायुके कोपसे सेमरके कांटेके समान तरुण ( जवान ) पुरुषके मुखके ऊपर जो फुन्सी होयँ उनको मुखदूषिका अर्थात् मुहासे कहते हैं । इनके होनेसे मुख बुरा हो जाता है ॥ १ यद्वन्न पाटलाभासं सरजस्कं शिरस्त्वचि । परुषं जायते जन्तोस्तस्य रूपं विशेषतः ॥ बोदैः समन्वितं वातात्सकण्डूगौरवं कफात् । सपिपासं सदाहार्तिरोगं पित्तासृजं तथा ॥

( २४४ ) माधवनिदान ।

( २४४ ) माधवनिदान । पद्मिनीकण्टकके लक्षण । कण्टकैराचितं वृत्तं मंडलं पाण्डु कण्डुरम् । पद्मिनीकण्टकप्रख्यैस्तदाख्यं कफवातजम् ॥ ३३ ॥ कमलके कांटेके समान कांटे चारोंओर युक्त हों, गोल, पीले रंगका, खुजली जिसमें चलती होय ऐसा एक मण्डल होय उसको पद्मिनीकण्टक कहते हैं, यह कफवायुसे होय है ॥ जतुमणि ( लहसन ) के लक्षण । सममुत्सन्नमरुजं मण्डलं कफरक्तजम् । सहजं लक्ष्म चैकेषां लक्ष्यो जतुमणिः स्मृतः ॥ ३४ ॥ कफरक्तसे जन्मसे ही चिकना तथा कुछ ऊंचा, जिसमें पीडा होय नहीं ऐसे गोल मण्डलके समान देहमें चिह्न होय उसको लक्ष्म तथा कोई कोई लक्ष्य जतु- मणि कहते हैं । यह स्त्रीपुरुषोंके अंगभेद करके शुभाशुभ फलदायक है, इसको लोकमें ( लहसन ) कहते हैं ॥ माष ( मस्सा ) के लक्षण । अवेदनं स्थिरं चैव यस्मिन् गात्रे प्रदृश्यते । माषवत्कृष्णमुत्सन्नमनिलान्मषकं तु तत् ॥ ३५ ॥ बादीसे शरीरके ऊपर उडदके समान काला, पीडारहित, स्थिर, कठिन, कुछ ऊंची गांठसी प्रगट होय, उसको माष ( मस्सा ) ऐसे कहते हैं । इस श्लोकमें जो चकार है उससे कफमेदसे भी मस्से होते हैं यह दिखाया, सो भोजने कहा भी है ॥ तिलकालक ( तिल ) के लक्षण । कृष्णानि तिलमात्राणि नीरुजानि समानि च । वातपित्तकफोन्सेकात्तान्विद्यात्तिलकालकान् ॥ ३६ ॥ वात पित्त कफके कोपसे काले तिलके समान पीडारहित त्वचासे मिले, ऐसे अंगमें दाग होयँ उनको तिलकालक (तिल) कहते हैं । “ वातपित्तकफोन्सेकात् ” इस पाठमें वात पित्त हेतु करके कफका शोष होय है उसीसे तिल होते हैं परन्तु चरकके मतसे पित्त रुधिरके शोष होनेसे तिल होते हैं । “ यस्य पित्तं प्रकुपितं शोणितं प्राप्य शुष्यति । तिलको विप्लवा व्यंगा नीलिका चास्य जायते ॥ ” इस वचनसे वात भी रुधिरको शोषण करे है । अन्य ग्रन्थमें वात पित्त कफ ये तीनों रुधिरको १ वातोत्तरैस्ते त्वचि यदा दूष्येते कफमेदसी । श्लक्ष्ण मृदु सवर्णं च कुरुते मषकं वदेत् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( २८५ ) शोषण करते हैं। यथा-" मारुतः पित्तमादाय कफरक्तसमाश्रितः । चिनोति तिल- मात्राणि त्वचि ते तिलकालकाः ॥ " न्यच्छके लक्षण । महद्वा यदि वाऽत्यल्पं श्यावं वा यदि वा सितम् । नीरुजं मण्डलं गात्रे न्यच्छमित्यभीधीयते ॥ ३७ ॥ मुखके विना अन्य स्थानमें शरीरके ऊपर बडा अथवा छोटा, काला अथवा सफेद और पीडा रहित दाग होय, उसको न्यच्छ कहते हैं, यह भी व्यंगका भेद है ॥ व्यंग ( झांई ) के लक्षण । क्रोधायासप्रकुपितो वायुः पित्तेन संयुतः। मुखमागत्य सहसा मण्डलं विसृजत्यतः ॥ ३८ ॥ नीरुजं तनुकं श्यावं मुखे व्यङ्गं तमादिशेत् । क्रोध और श्रम इनसे कुपित भया वायु पित्तसंयुक्त होकर मुखमें प्राप्त होकर एक मण्डल उत्पन्न करे, वह दुखे नहीं, पतला तथा श्यामवर्ण होय, उसको व्यंग कहते हैं॥ नीलिकाके लक्षण । कृष्णमेवंगुणं गात्रे मुखे वा नीलिकां विदुः ॥ ३९ ॥ पूर्वोक्त व्यंगके लक्षण सदृश जो काला मण्डल अंगमें होय अथवा मुखर होय उसको नीलिका कहते हैं। भोजने इस जगह नीलिकागात्र ऐसा कहा है अर्थात् सर्व देह नीली होय है ॥ परिवर्त्तिकाके लक्षण । मर्दनात्पीडनाद्वापि तथैवाप्यभिघाततः । मेढ्रचर्म यदा वायुर्भजते सर्वतश्चरन् ॥ ४० ॥ तदा वातोपसृष्टत्वात्तच्चर्म परिवर्त्तते । मणेरधस्तात्कोशस्तु ग्रंथिरूपेण लंबते ॥ ४१ ॥ सवेदनं सदाहं च पाकं च व्रजति क्वचित् । परिवर्त्तिकेति तां विद्यात्सरुजां वातसंभवाम् ॥ सकंडूः कठिना वापि सैव श्लेष्मसमुत्थिता ॥ ४२ ॥ १ मारुतः क्रोधहर्षाभ्यामूर्ध्वगो मुखमाश्रितः । पित्तेन सह संयुक्तः करोति वदनं त्वचि ॥ नीरुजं तनुकं श्यावं व्यंगं तमिति निर्दिशेत् । कृष्णामेव त्वचं गात्रे नीलिकां तां विनिर्दिशेत्॥

( २८६ ) | माधवनिदान ।

( २८६ ) | माधवनिदान । लिंगको मर्दन करनेसे अथवा रगडनेसे, उसी प्रकार लिंगमें किसी प्रकारकी चोट लगनेसे व्यानवायु कुषित होकर उसके चर्ममें प्रवेश कर सर्वत्र विचरे उस समय वातसंस्पर्श हेतु करके लिंगकी चर्म पृथक् होजाय और शिश्नका कोश सूजकर मणिके नीचे गांठके समान होकर लटके, उसमें पीडा होय, दाह होय और कभी कभी वह पकजाय, इस पीडाको परिवर्त्तिका कहते हैं, यह वातसे होय है और जो कफसे होय तौ उसमें खुजली तथा कठिनता होती हैं ॥ अवपाटिकाके लक्षण । अल्पीयःखां यदा हर्षाद्बलाद्गच्छेत्स्त्रियं नरः । हस्ताभिघातादथवा चर्मण्युद्वर्त्तिते बलात् ॥ ४३ ॥ मर्दनात्पीडनाद्वापि शुक्रवेगविघाततः । यस्यावपाट्यते चर्म तां विद्यादवपाटिकाम् ॥ ४४ ॥ जिसकी योनिका छिद्र बारीक होय ऐसी स्त्रीसे बलपूर्वक मैथुन करनेसे अथवा हाथके अभिघात ( चोट ) से बलसे लिंगके चामको उलटनेसे अथवा मीडनेसे अथवा जोरपूर्वक दाबनेसे अथवा शुक्रके वेगको धारण करनेसे उस पुरुषके लिंगकी चाम फट जाय, इस पीडाको अवपाटिका कहते हैं । इस अवपाटिका रोगमें तीनों दोषोंके लक्षण पृथक् २ होते हैं यह मत भोजकाँ है ॥ निरुद्धप्रकाशके लक्षण । वातोपसृष्टे मेढ्रे तु चर्म संश्रयते मणिम् ॥ ४५ ॥ मणिश्चर्मोपनद्धस्तु मूत्रस्रोतो रुणद्धि च । निरुद्धप्रकशे तस्मिन्मंदधारमवेदनम् ॥ ४६ ॥ मूत्रं प्रवर्त्तते जंतोर्मणिर्निव्रियते न च । निरुद्धप्रकाशं विद्यात्सरुजं वातसंभवम् ॥ ४७ ॥ वायुके योगसे लिंग पीडित होनेसे चामडी सूजकर मणिभागमें प्राप्त होय वह मणि चर्मके संकोच होनेसे मूत्रके मार्गको रोके तब मूत्रका रोध होय, तब उस पुरुषका मूत्र ठहर ठहरकर निकले, परन्तु पीडा नहीं होय और मणि बाहर नहीं निकले, इस रोगयुक्त वातजन्य पीडाको निरुद्धप्रकाश कहते हैं, चर्मके संकोच होनेको निरुद्ध कहते हैं, और मूत्रकी धार मन्द निकलनेको प्रकाश कहते हैं। १ मर्दनादभिघाताद्वा कन्यायोनिप्रपीडनात् । लक्ष्यते यदि मेढ्रस्य चर्म दभारिव क्षतम् ॥ अवपातिकेति तां विद्यात्पृथग्दोषैः समन्विताम् । वातात्सा परुषा रूक्षा शूलनिस्तोदकारिणी ॥ पित्तात्सदाहा रक्ताद्वा दाहतृष्णासमन्विता । श्लैष्मिकी कठिना स्निग्धा कण्डूमत्यल्पवेदना ॥

भाषाटीकासमेत । ( २८७ ) ‘ अवेदनम्’ यह जो मूलमें पाठ है इस जगह कोई ‘ सवेदनम्’ ऐसा कहते हैं। भोज- आचार्यका मत भोजसंहितामें लिखा भी है ॥ सन्निरुद्धगुदके लक्षण । वेगसंधारणाद्वायुर्विहतो गुदसंस्थितः । निरुणद्धि महास्रोतः सूक्ष्मद्वारं करोति च ॥ ४८ ॥ मार्गस्य सौक्ष्म्यात्कृच्छ्रेण पुरीषं तस्य गच्छति । सन्निरुद्धगुदं व्याधिमेनं विद्यात्सुदारुणम् ॥ ४९ ॥ मलमूत्रादिकोंके वेग रोकनेसे गुदाश्रित अपानवायु कुपित होकर महास्रोत ( गुदा ) का अवरोध करे और वह द्वारको छोटा करे, पीछे मार्ग छोटा होनेसे उस पुरुषका मल बडे कष्टसे बाहर निकले, इस भयंकर रोगको सन्निरुद्धगुद कहते हैं । इस रोगमें भी निरुद्धप्रकाशके समान चर्मका संकोच होनेसे सन्निरुद्धगुद होय है अर्थात् अपानवायुके रुकनेसे पुरीष ( मल ) का अनिर्गम होय है ॥ अहिपूतनके लक्षण । शकृन्मूत्रसमायुक्तेऽधौतेऽपाने शिशोर्भवेत् । स्विन्ने वा स्नाप्यमाने वा कण्डूरक्तकफोद्भवा ॥ ५० ॥ ततः कण्डूयनात्क्षिप्रं स्फोटाः स्रावश्च जायते । एकीभूतं व्रणैर्घोरं तं विद्यादहिपूतनम् ॥ ५१ ॥ बालकके मलमूत्र करनेके अनन्तर गुदाके न धोनेसे अथवा पसीना आनेसे तथा धोनेके अनन्तर रुधिर कफसे खुजली उत्पन्न होय, तदनन्तर खुजानेसे शीघ्र फोडा उत्पन्न होय और उनसे स्राव होय; पीछे ये सब मिलकर इस भयंकर व्याधिको प्रगट करें । इसे अहिपूतन कहते हैं । यह रोग बहुधा बाल लोम ( छोटे २ रोम ) में होय है । भोज कहता है कि, यह रोग दुष्टस्तन्यपान अर्थात् माताके दुष्ट दूधके पीनेसे बालकके होय हैं ॥ वृषणकच्छूके लक्षण । स्नानोत्सादनहीनस्य मलो वृषणसंस्थितः । यदा प्रक्लिद्यते स्वेदात्कण्डूः सञ्जायते तदा ॥ ५२ ॥ १ मेढ्रान्ते चर्मणि यदा मारुतः कुपितो भशम् । द्वारं निरुणद्धि शनैः प्रकाशं च मुहुर्भवेत् ॥ मूत्रं मूत्रयते कृच्छ्रात्प्रकाशं तु यदा भवत् । वातोपसृष्टमेढ्रं च मणिनं च विदीर्यते । निरुद्धं च प्रकाशं च व्याधिं विद्यात्सुदारुणम् ॥ २-दुष्टस्तन्यस्य पानेन मलस्याच्छादनेन च । कण्डूदाह- रुजावद्भिः पिडितैश्च समाचिता ॥ अहिपूतना सम्भवति यथादोषं च दारुणा ॥ इति ।

( २८८ ) माधवनिदान ।

( २८८ ) माधवनिदान । कण्डूयनात्ततः क्षिप्रं स्फोटाः स्रावश्च जायते । प्राहुर्वृषणकच्छूं तां श्लेष्मरक्तप्रकोपजाम् ॥ ५३ ॥ जो मनुष्य स्नान करते समय लगेहुए मलको नहीं धोवे, उस पुरुषका मल अण्डकोशोंमें सञ्चित होय पीछे वह पसीना आनेसे गीला होय तब अण्डकोशोंमें घोर पीडा होय और खुजानेसे तत्काल फोडा होय, पीछे वह फोडा स्रवकर आप- समें मिलजाते हैं, कफरक्तसे होनेवाली इस व्याधिको वृषणकच्छू कहते हैं ॥ गुदभ्रंशके लक्षण । प्रवाहणातिसाराभ्यां निर्गच्छति गुदं बहिः । रूक्षदुर्बलदेहस्य गुदभ्रंशं तमादिशेत् ॥ ५४ ॥ जिस पुरुषका देह रूक्ष और अशक्त होय, उस पुरुषके प्रवाहण (कुन्थन) तथा अतीसार हेतुकरके गुदा बाहर निकल आवे, अर्थात् कांच बाहर निकल आवे उस रोगको गुदभ्रंश रोग कहते हैं, इस रोगमें धातुक्षय होनेसे वात कुपित होय है ॥ सूकरदंष्ट्रके लक्षण । सदाहो रक्तपर्यन्तस्त्वक्पाकी तीव्रवेदनः । कण्डूमाञ्ज्वरकारी च स स्याच्छूकरदंष्ट्रकः ॥ ५५ ॥ दाहयुक्त चारों ओर लाल होय, जिसकी त्वचा पकनेवाली होय, तीव्र पीडायुक्त, खुजली संयुक्त तथा ज्वर करनेवाली ऐसी सूजन अथवा व्रण होय उसको सूकरदंष्ट्र अर्थात् वराहदाढ कहते हैं ॥ इति श्रीपंडितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां क्षुद्ररोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ मुखरोगनिदानम् । संख्या । दन्तेष्वष्टावोष्ठयोश्च मूलेषु दश पंच च । नव तालुनि जिह्वायां पंच सप्तदशामयाः ॥ कंठे त्रयः सर्वसरा एकषष्टिचतुःपरे ॥ १ ॥ दन्तरोग ८, होठके रोग ८, दन्तमूलके रोग १५, तालूके रोग ९, जिह्वाके ५, कण्ठके रोग १७, और सर्वसर ३ ऐसे सब मिलकर पैंसठ ६५ मुखरोग हैं, “ये श्लोक माधवके नहीं हैं भोजसंहिताके हैं” ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( २८९ ) तिनमें ८ होठके रोगोंकी संप्राप्ति । अनूपपिशितक्षीरदधिमाषादिसेवनात् । मुखमध्ये गदान्कुर्युः क्रुद्धा दोषाः कफोत्तराः ॥ २ ॥ जलसंचारी प्राणियोंके मांस, दूध, दही, उड़द् आदि पदार्थोंके सेवन करनेसे कुपित भये कफादिक दोष मुखमें रोग उत्पन्न करते हैं ॥ वातिक ओष्ठरोगके लक्षण । कर्कशौ परुषौ स्तब्धौ कृष्णौ तीव्ररुजान्वितौ । दाल्येते परिपाट्येते ओष्ठौ मारुतकोपत: ॥ ३ ॥ वादीके कोपसे होठ कर्कश, खरदरे, कठोर और काले होते हैं उनमें तीव्र पीडा होय व दो टुकडोंके समान होजाय तथा होठकी त्वचा किंचित् फटजाय ॥ पैत्तिकके लक्षण । चीयते पिडिकाभिस्तु सरुजाभिः समन्ततः । सदाहपाकपिडिकौ पीतभासौ च पित्ततः ॥ ४ ॥ पित्तसे होठ चारों ओर फुन्सियोंसे व्याप्त हों, उनमें पीडा होय तथा पकजावे और पीलेसे दीखें इसमें जो दाह और पाक कहे हैं सो विशेषताके सूचक हैं ॥ श्लैष्मिकके लक्षण । सवर्णाभिस्तु चीयेते पिडिकाभिरवेदनौ । भवतस्तु कफादोष्ठौ पिच्छिलौ शीतलौ गुरु ॥ ५ ॥ कफसे होठ त्वचाके समान वर्णवाली फुन्सियोंसे व्याप्त हों, कुछ दूखें, तथा मलाईके समान और शीतल तथा भारी हों ॥ सान्निपातिकके लक्षण । सकृत्कृष्णौ सकृत्पीतौ सकृच्छ्वेतौ तथैव च । सन्निपातेन विज्ञेयावनेकापिडिकान्वितौ ॥ ६ ॥ सन्निपातसे होठ कभी काले, कभी पीले, उसी प्रकार कभी सफेद तथा अनेक प्रकारकी फुन्सियोंसे व्याप्त होयें ॥ रक्तजके लक्षण । खर्जूरफलवर्णाभिः पिडिकाभिर्निपीडितौ । रक्तोपसृष्टौ रुधिरं स्रवतः शोणितप्रभौ ॥ ७ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( २५० ) माधवनिदान ।

( २५० ) माधवनिदान । रुधिरसे होठ खर्जूरफलके वर्णके समान फुन्सियोंसे पीडित होयँ, रक्तसे दोनों होठ दूषित हों, उनमेंसे रुधिर गिरे तथा वे होठ रुधिरके समान लाल होयँ ॥ मांसजके लक्षण । मांसदुष्टौ गुरू स्थूलौ मांसपिण्डवदुद्गतौ । जन्तवश्चात्र मूर्च्छन्ति नरस्योभयतो मुखात् ॥ ८ ॥ मांस दुष्ट होनेसे होठ भारी मोटे होते हैं, मांसपिंडके समान ऊंचे उठे हुए होयँ । इस रोगवाले मनुष्यके मुखको छोडकर दोनों होठोंके प्रांतभागमें कीडे पड जावें ॥ मेदोजके लक्षण । सर्पिर्मण्डप्रतीकाशौ मेदसा कण्डूरौ गुरू । स्वच्छं स्फटिकसंकाशमास्रावं स्रवतो भृशम् ॥ तयोर्व्रणो न संरोहेन्मृदुत्वं च न गच्छति ॥ ९ ॥ मेदसे होठ घृतके ऊपरकें स्वच्छ भागके सदृश खुजली संयुक्त तथा भारी होयँ तथा उनमेंसे स्फटिकके समान निर्मल स्राव बहुत होयँ इसमें भया व्रण भरे नहीं है तथा उसमें मृदुता नहीं होती है ॥ अभिघातजके लक्षण । ओष्ठौ पर्यवदीर्येते पीड्येते चाभिघाततः । ग्रथितौ च तदा स्यातां कण्डूक्लेदसमान्वितौ ॥ १० ॥ अभिघातसे ( चोट लगनेसे ) होठ सर्वत्र चिरजायँ, पीडा होय, उसमें गांठ होजाय तथा उसमें खुजली चलते समय पीब बहै । कोई कहते हैं कि, अभिघातके ओष्ठरोगमें केवल ऊपरका होठ फटता है, इसरोगमें भी कफ पित्त सहायक जानने, सो भोजने कहा भी है ॥ दन्तमूलगत १५ रोग । शीतादके लक्षण । शोणितं दन्तवेष्टेभ्यो यस्याकस्मात्प्रवर्त्तते । दुर्गन्धीनि सकृष्णानि प्रक्लेदीनि मृदूनि च ॥ ११ ॥ दन्तमांसानि शीर्यन्ते पचंत्ति च परस्परम् । शीतादो नाम स व्याधिः कफशोणितसंभवः ॥ १२ ॥ १ क्षतावभिहतौ चापि रक्तावोष्ठा सवेदनौ । भवतः सपरिस्रावौ कफरक्तप्रदूषिताविति ॥ वातजः केवलः स्वकारणकुपितः अत्र तु वायुः अभिघाताल्लभ्यते ।

भाषाटीकासमेत । ( २९१ ) जिसके मसूढोंमेंसे अकस्मात् रुधिर बहैं और दांतोंका मांस दुर्गन्धियुक्त काला पीवसहित तथा नरम होकर गिरे और एक दांतका मसूढा पकनेसे वह दूसरे मसू- ढेको पकावे, यह कफ रुधिरसे प्रगट व्याधिको शीतादनाम कहते हैं ॥ दन्तपुप्पुट के लक्षण । दन्तयोस्त्रिषु वा यस्य श्वयथुर्जायते महान् । दन्तपुप्पुटको नाम स व्याधिः कफरक्तजः ॥ १३ ॥ जिसके दो अथवा तीनों दांतोंकी जडमें महान् सूजन होय, उसको दंतपुप्पुट नाम कहते हैं, यह व्याधि कफरक्तसे होती है, परन्तु आगे जो शौषिर रोग कहेंगे उससे यह भिन्न है क्योंकि इसमें पीडा और लारका टपकना नहीं होता है ॥ दन्तवेष्टके लक्षण । स्रवन्ति पूयं रुधिरं चला दन्ता भवन्ति च । दन्तवेष्टः स विज्ञेयो दुष्टशोणितसंभवः ॥ १४ ॥ रुधिर दुष्ट होनेसे दांतोंमेंसे रुधिर तथा राध बहे, तथा दांत हिलने लगे उसको दन्तवेष्टरोग कहते हैं ॥ शौषिरके लक्षण । श्वयथुर्दन्तमूलेषु रुजावान्कफरक्तजः । लालास्रावी स विज्ञेयः शौषिरो नाम नामतः ॥ १५ ॥ कफ रुधिरसे दांतोंकी जडमें सूजन होय, उसमें पीडा होय और स्राव होय उसको शौषिर रोग कहते हैं। पूर्वोक्त दन्तपुप्पुटमें पीडा और स्राव नहीं होय है इसीसे यह पृथक् है ॥ महाशौषिरके लक्षण । दन्ताश्चलन्ति वेष्टेभ्यस्तालु चाप्यवदीर्यते । यस्मिन्स सर्वतो व्याधिर्महाशौषिरसंज्ञकः ॥ १६ ॥ इस त्रिदोष व्याधिसे मसूढेके समीप दांत हालैं, तालुएमैं छिद्र पडे, चकारसे दांत और होंठ भी फटजायँ उसको महाशौषिररोग कहते हैं। यह रोग मनुष्यको सात दिनमें मारता है. सो भोजने कहाभी है परन्तु गदाधर कहते हैं कि, शौषिरमें जो भोजने लक्षण कहे हैं सो होयँ तो उसीको महाशौषिर कहते हैं ॥ १ सदाहो दंतमूलेषु शोथः पित्तकफानिलात् । जातः कफं क्षपयति क्षीणे तस्मिन्सशोणि- तम् ॥ विवृद्धमनिशं दंतास्ताल्वोष्ठमपि दारयेत् । महाशौषिरमित्येतत्सप्तरात्रान्निहंत्यसून ॥

( २९२ ) माधवनिदान ।

( २९२ ) माधवनिदान । परिदरके लक्षण । दन्तमांसानि शीर्यन्ते यस्मिन्ष्ठीव्यति चात्यसृक् । पित्तासृक्कफजो व्याधिर्ज्ञेयः परिदरो हि सः ॥ १७ ॥ इस रोगकरके दांतोंका मांस बिखर जाय और थूकनेसे रुधिर गिरे, इस व्याधिको परिदर कहते हैं यह रोग पित्तरुधिरकफसे होय है ॥ उपकुशके लक्षण । वेष्टेषु दाहः पाकश्च ताभ्यां दन्ताश्चलन्ति च । अवाक्कृताः प्रस्रवन्ति शोणितं मन्दवेदनाः ॥ १८ ॥ आध्मायन्ते स्रुते रक्ते मुखे पूतिश्च जायते । यस्मिन्नुपकुशोनाम पित्तरक्तकृतो गदः ॥ १९ ॥ जिसके मसूढोंमें दाह होकर पाक और दांत हलने लगें, मसूढोंके घिसनेसे रुधिर मन्द पीडाके साथ निकले, रुधिर निकलनेके पिछाडी फिर मसूढे फूल आवें और मुखमें वास आवे इस पित्तरक्तकृत विकारको उपकुश कहते हैं ॥ वैदर्भके लक्षण । घृष्टेषु दन्तमूलेषु संरम्भो जायते महान् । भवन्ति चपला दन्ताः स वैदर्भोऽभिघातजः ॥ २० ॥ मसूढे रगड़नेसे सूजन बहुत होय और दांत हलने लगें, उसको वैदर्भरोग कहते हैं। यह रोग चोटके लगनेसे होय है ॥ खलीवर्धनके लक्षण । मारुतेनाधिको दन्तो जायते तीव्रवेदनः । खल्लीवर्द्धनसंज्ञो वै जाते रुक्च प्रशाम्यति ॥ २१ ॥ वादीके योगसे दांतके ऊपर दूसरा दांत उगे, उस समय पीडाहोय, जब वह दांत उग आवे तब पीडा शांत होय उसको खल्लीवर्धन कहते हैं ॥ करालके लक्षण । शनैः शनैः प्रकुरुते वायुर्दन्तसमाश्रितः । करालान्विकटान्दन्तान् करालो न च सिध्यति ॥ २२ ॥ वादी धीरे धीरे मसूढेका आश्रय लेकर दांतोंको टेढे तिरछे करे उसको कराल रोग कहते हैं। यह रोग साध्य नहीं होय ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( २९३ ) अधिमांसकके लक्षण । हन्वोः पश्चिमे दन्ते महाञ्शोथो महारुजः । लालास्रावी कफकृतो विज्ञेयो ह्यधिमांसकः ॥ २३ ॥ जिसके पीछेके दाढके नीचे अर्थात् मसूढेंमें बहुत सूजन होय और घोर पीडा होय तथा लार बहुत बहे, उसको अधिमांसक कहते हैं । यह कफके कोपसे होय है ॥ नाडीव्रणके लक्षण । दन्तमूलगता नाड्यः पञ्च ज्ञेया यथेरिताः ॥ २४ ॥ नाडीव्रणनिदानमें वात, पित्त, कफ, सन्निपात और आगन्तुज ऐसे पांच प्रकारके जो नाडी व्रण कहे हैं वे दन्तमूल (मसूढे) में होते हैं। पहिले ११ और ५ नाडीव्रण ऐसे मिलकर १६ दन्तमूल (मसूढे) के रोग होते हैं परन्तु कराल- रोग सुश्रुतके मतसे अधिक है तथापि संग्रहकारने अपने ग्रन्थमें लिखा है, इसीसे हमने भी यहां लिखदिया है, ये पांच नाडीव्रण शालाक्य सिद्धान्तके मतसे संख्या पूरणार्थ माधवाचार्यने लिखे हैं ॥ दन्तगत ८ रोग । दालनके लक्षण । दीर्यमाणेष्विव रुजा यस्य दन्तेषु जायते । दालनो नाम स व्याधिः सदागतिनिमित्तजः ॥ २५ ॥ जिसके दांतोंमें फोडनेकीसी पीडा होय, उसको दालनरोग कहते हैं, यह रोग वादीसे होय है ॥ कृमिदन्तकके लक्षण । कृष्णाच्छिद्रश्चलस्रावी ससंरम्भो महारुजः । अनिमित्तरुजो वातात्स ज्ञेयः कृमिदन्तकः ॥ २६ ॥ वादीके योगसे दांतोंमें काले छिद्र पड जायें, हलने लगे, उनमेंसे स्राव होय, शोथयुक्त पीडा होनेवाला और कारण बिना दूखनेवाला ऐसा होय उसको कृमि- दन्तरोग कहते हैं । यहां काले छिद्र पडनेका यह कारण है कि, दुष्ट रुधिरसे कृमि ( कीडे ) पैदा होकर दांतोंमें छिद्र करते हैं ॥ भञ्जनकके लक्षण । वक्त्रं वक्रं भवेद्यस्य दन्तभङ्गश्च जायते । कफवातकृतो व्याधिः स भंजनकसंज्ञितः ॥ २७ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( २९४ ) माधवनिदान ।

( २९४ ) माधवनिदान । जिस व्याधिकरके मुख टेढा होकर दांत फूटने लगे वह भञ्जक व्याधि कफ- वातकरके होय, दांत भंगकारी दोषके प्रभावसे मुख भी टेढा होय है ॥ दन्तहर्षके लक्षण । शीतरूक्षप्रवाताम्लस्पर्शानामसहा द्विजाः । पित्तमारुतकोपेन दन्तहर्षः स नामतः ॥ २८ ॥ दांत शीतल, रूक्ष, खटाई इत्यादि पदार्थ और पवन इनके लगनेको जो नहीं सहिसके, उसको दन्तहर्ष कहते हैं, वह रोग पित्तवायुके कोपसे होय है । इस रोगको वातज होनेपर भी उष्ण ( गरमी ) को नहीं सहिसके, यह व्याधिका स्वभाव है । इस जगह दूसरा जो पाठ है वह नीचे लिखा है ॥ दन्तशर्कराके लक्षण । मलो दन्तगतो यस्तु पित्तमारुतशोषितः । शर्करेव खरस्पर्शा सा ज्ञेया दन्तशर्करा ॥ २९ ॥ दांतोंका मल पित्तवायुके प्रभावसे सूखकर रेतके समान खरदरा स्पर्श मालूम होय, उस रोगको दन्तशर्करा कहते हैं । इस श्लोकमें "सा दंतानागुणहरा" ऐसा भी पाठ है, इसका यह अर्थ हुआ कि, दांतोंके गुण शुक्ल और दृढादि उनको दूर करे॥ कपालिकाके लक्षण । कपालेष्विव दीर्णेषु दन्तानां सैव शर्करा । कपालिकेति सा ज्ञेया सदा दन्तविनाशिनी ॥ ३० ॥ कपाल कहिये मिट्टीके घडा आदिके जैसे टूक होय हैं ऐसे दांत मल करके सहित हो जायें तो उसे पूर्वोक्त दन्तशर्कराको कपालिका ऐसे कहते हैं। यह रोग दांतोंका सदा नाश करता है,॥ श्यावदन्तके लक्षण । योऽसृङ्मिश्रेण पित्तेन दग्धो दन्तस्त्वशेषतः । श्यावतां नीलतां वापि गतः स श्यावदन्तकः ॥ ३१ ॥ जो दांत रुधिरसे मिले, पित्तसे जलेके समान सब काले हो जायँ उनको श्यावदन्त कहते हैं ॥ १ शीतमुष्णं च दशनाः सहन्ते. स्पर्शनं न च । यस्य दन्तं च हर्षे तु विद्यात्पित्तसमीरणात्॥

भाषाटीकासमेत । (२९५) हनुमोक्षके लक्षण । वातेन तैस्तैर्भावैस्तु हनुसंधिर्विसंहतः । हनुमोक्ष इति ज्ञेयो व्याधिरर्दितलक्षणः ॥ ३२ ॥ बादीके योगसे तिस तिस अभिघातादिक करके हनुसन्धि (ठोडी) में चोट लगनेसे दांत चलायमान हो जायँ उसको हनुमोक्ष कहते हैं, इसके लक्षण अर्दित- रोग जो वातव्याधिमें कहि आये हैं उस प्रकारके होयँ । सुश्रुतने इस रोगको दाँतोंके समीप होनेसे दन्तरोग कहा है, परन्तु संग्रहकारने मुख्य दन्तरोग न होनेसे नहीं लिखा । इसको संग्रहकारने भोजके कहे अनुसार वातव्याधिमें लिखा है इसीसे हनुमोक्ष रोगका पाठ किसी पुस्तकमैं लिखा है और किसीमें नहीं लिखा ॥ जिह्वागत ५ रोग । वातजके लक्षण । जिह्वाऽनिलेन स्फुटिता प्रसुप्ता भवेच्च शाकच्छदनप्रकाशा । बादीसे जीभ फटीसी, प्रसुप्त (रसका ज्ञान जाता रहै) और शाकवान् वृक्षके पत्र समान कांटेयुक्त खरदरी हो ॥ पित्तजके लक्षण । पित्तेन पीता परिदह्यते च दीर्घैः सरक्तैरपि कण्टकैश्च ॥ ३३ ॥ पित्तसे जीभ पीली हो, उसमें दाह हो उसमें लम्बे तांबेके समान कांटे होयँ इस रोगको लौकिकमें जाली कहते हैं अथवा जोडी कहते हैं ॥ कफजके लक्षण । कफेन गुर्वी बहुलाचिता च मांसोच्छ्रयैः शाल्मलिकण्टकाभैः॥३४॥ कफसे जीभ मोटी भारी होय है और उसमें सेमरके कांटेके समान मांसके अंकुर होयँ ॥ अलासके लक्षण । जिह्वातले यः श्वयथुः प्रगाढः सोऽलाससंज्ञः कफरक्तमूर्तिः । जिह्वां स तु स्तंभयति प्रवृद्धो मूले च जिह्वा भृशमेति पाकम्॥३५॥ जीभके नीचे कफ रुधिरसे प्रगट ऐसी भयंकर सूजन होय उसको अलास कहते हैं, उसके बढनेसे स्तंभ होय तथा जीभके मूलमें अत्यन्त पाक होता है, यह रोग असाध्य है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

(२९६) माधवनिदान ।

(२९६) माधवनिदान । उपजिह्वाके लक्षण । जिह्वाग्ररूपः श्वयथुर्हि जिह्वामुन्नम्य जातः कफरक्तमूर्तिः । लालाकरः कण्डुयुतः सचोषः सा तूपजिह्वा कथिता भिषग्भिः ३६ कफरुधिरसे जिह्वाग्रके समान (जैसा जीभका आगेका भाग होय है) ऐसी सूजन जीभको नीची दबाकर उत्पन्न होय, उसके योगसे लार बहुत बहे और उसमें खुजली चले, तथा दाह होय (दाह इसमें रक्तमें स्थान पित्तका है उसके होय है) इस रोगको वैद्य उपजिह्वा रोग कहते हैं ॥ तालुगत ९ रोग । कण्ठशुण्डीके लक्षण । श्लेष्मासृग्भ्यां तालुमूलात्प्रवृद्धो दीर्घः शोथो ध्मातबस्तिप्रकाशः । तृष्णाकासश्वासकृत्तं वदन्ति व्याधिं वैद्याः कण्ठशुण्डीति नाम्ना ३७ कफरुधिरसे तालुके मूलमें फूली वस्तिके समान भारी सूजन होय, इसके प्रभा- वसे प्यास, खांसी, श्वास ये होते हैं। इस रोगको वैद्य कण्ठशुंडी कहते हैं ॥ तुण्डिकेरीके लक्षण । शोथः शूलस्तोददाहप्रपाकी प्रागुक्ताभ्यां तुण्डिकेरी मता तु । कफरक्तसे तालुएमैं बनकपासके फलके समान सूजन होय और उसमें पीडा सुईके छेदनेकासा दुःख और दाह होकर पके उसको तुंडिकेरी कहते हैं ॥ अधुषके लक्षण । शोथः स्तब्धो लोहितस्तालुदेशे रक्तो ज्ञेयः सोऽधुषो रुग्ज्वरश्च॥३८ रुधिरसे तालुएमैं लाल स्तब्ध (लठर) ऐसी सूजन होय, उसमें पीडा और ज्वर होय, उसको अधुष कहते हैं ॥ कच्छपके लक्षण । कूर्म्मोत्सन्नोऽवेदनोऽशीघ्रजन्मा रोगो ज्ञेयः कच्छपः श्लेष्मणा वा । कफसे तालुएमैं कछुएकी पीठके समान ऊंची सूजन होय, उसमें पीडा थोडी होय, देरसे प्रगट होनेवाला, वह शीघ्र बढे नहीं, उसको कच्छपरोग कहते हैं ॥ अर्बुदके लक्षण । पद्माकारं तालुमध्ये तु शोथं विद्याद्रक्तादर्बुदं प्रोक्तलिङ्गम्॥ ३९ ॥ रुधिरसे तालुएम कमलकी कर्णिकाके समान सूजन होय, इसके लक्षण अर्बुद निदानमें जो रक्तार्बुदके कहे हैं उसके प्रमाण जानने ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA