महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
एवं दुहितरं विद्धि मम विप्र शकुन्तलाम् । शकुन्तला च पितरं मन्यते मामनिन्दिता ॥ १७ ॥ ब्रह्मन्! इस प्रकार शकुन्तला मेरी बेटी हुई, आप यह जान लें। प्रशंसनीय शील-स्वभाववाली शकुन्तला भी मुझे अपना पिता मानती है ॥ १७ ॥
शकुन्तलोवाच
एतदाचष्ट पृष्टः सन् मम जन्म महर्षये । सुतां कण्वस्य मामेवं विद्धि त्वं मनुजाधिप ॥ १८ ॥ कण्वं हि पितरं मन्ये पितरं स्वमजानती । इति ते कथितं राजन् यथावृत्तं श्रुतं मया ॥ १९ ॥ शकुन्तला कहती है—राजन्! उन महर्षिके पूछनेपर पिता कण्वने मेरे जन्मका यह वृत्तान्त उन्हें बताया था। इस तरह आप मुझे कण्वकी ही पुत्री समझिये। मैं अपने जन्मदाता पिताको तो जानती नहीं, कण्वको ही पिता मानती हूँ। महाराज! इस प्रकार जो वृत्तान्त मैंने सुन रखा था, वह सब आपको बता दिया ॥ १८-१९ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २४ १/३ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 526)
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः
शकुन्तला और दुष्यन्तका गान्धर्व विवाह और महर्षि कण्वके द्वारा उसका अनुमोदन
दुष्यन्त उवाच
सुव्यक्तं राजपुत्री त्वं यथा कल्याणि भाषसे ।
भार्या मे भव सुश्रोणि ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ १ ॥
**दुष्यन्त बोले—**कल्याणि! तुम जैसी बातें कह चुकी हो, उनसे भलीभाँति स्पष्ट हो गया कि तुम क्षत्रिय-कन्या हो (क्योंकि विश्वामित्र मुनि जन्मसे तो क्षत्रिय ही हैं)। सुश्रोणि! मेरी पत्नी बन जाओ। बोलो, मैं तुम्हारी प्रसन्नताके लिये क्या करूँ ॥ १ ॥
सुवर्णमालां वासांसि कुण्डले परिहाटके ।
नानापत्तनजे शुभ्रे मणिरत्ने च शोभने ॥ २ ॥
आहरामि तवाद्याहं निष्कादीन्यजिनानि च ।
सर्वं राज्यं तवाद्यास्तु भार्या मे भव शोभने ॥ ३ ॥
सोनेके हार, सुन्दर वस्त्र, तपाये हुए सुवर्णके दो कुण्डल, विभिन्न नगरोंके बने हुए सुन्दर और चमकीले मणिरत्ननिर्मित आभूषण, स्वर्णपदक और कोमल मृगचर्म आदि वस्तुएँ तुम्हारे लिये मैं अभी लाये देता हूँ। शोभने! अधिक क्या कहूँ, मेरा सारा राज्य आजसे तुम्हारा हो जाय, तुम मेरी महारानी बन जाओ ॥ २-३ ॥
गान्धर्वेण च मां भीरु विवाहेनैहि सुन्दरि ।
विवाहानां हि रम्भोरु गान्धर्वः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ४ ॥
भीरु! सुन्दरि! गान्धर्व विवाहके द्वारा मुझे अंगीकार करो। रम्भोरु! विवाहोंमें गान्धर्व विवाह श्रेष्ठ कहलाता है ॥ ४ ॥
शकुन्तलोवाच
फलाहारो गतो राजन् पिता मे इत आश्रमात् ।
मुहूर्तं सम्प्रतीक्षस्व स मां तुभ्यं प्रदास्यति ॥ ५ ॥
**शकुन्तलाने कहा—**राजन्! मेरे पिता कण्व फल लानेके लिये इस आश्रमसे बाहर गये हैं। दो घड़ी प्रतीक्षा कीजिये। वे ही मुझे आपकी सेवामें समर्पित करेंगे ॥ ५ ॥
(पिता हि मे प्रभुर्नित्यं दैवतं परमं मतम् ।
यस्य वा दास्यति पिता स मे भर्ता भविष्यति ॥
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
पुत्रस्तु स्थविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥
अमन्यमाना राजेन्द्र पितरं मे तपस्विनम् ।
अधर्मेण हि धर्मिष्ठ कथं वरमुपास्महे ॥
महाराज! पिता ही मेरे प्रभु हैं। उन्हें ही मैं सदा अपना सर्वोत्कृष्ट देवता मानती हूँ। पिताजी मुझे जिसको सौंप देंगे, वही मेरा पति होगा। कुमारावस्थामें पिता, जवानीमें पति और बुढ़ापेमें पुत्र रक्षा करता है। अतः स्त्रीको कभी स्वतन्त्र नहीं रहना चाहिये। धर्मिष्ठ राजेन्द्र! मैं अपने तपस्वी पिताकी अवहेलना करके अधर्मपूर्वक पतिका वरण कैसे कर सकती हूँ?
दुष्यन्त उवाच
मा मैवं वद सुश्रोणि तपोराशिं दयात्मकम् ।
**दुष्यन्त बोले—**सुन्दरी! ऐसा न कहो। तपोराशि महात्मा कण्व बड़े ही दयालु हैं।
शकुन्तलोवाच
मन्युप्रहरणा विप्रा न विप्राः शस्त्रपाणयः ॥
अग्निर्दहति तेजोभिः सूर्यो दहति रश्मिभिः ।
राजा दहति दण्डेन ब्राह्मणो मन्युना दहेत् ॥
क्रोधितो मन्युना हन्ति वज्रपाणिरिवासुरान् ।)
**शकुन्तलाने कहा—**राजन्! ब्राह्मण क्रोधके द्वारा ही प्रहार करते हैं। वे हाथमें लोहेका हथियार नहीं धारण करते। अग्नि अपने तेजसे, सूर्य अपनी किरणोंसे, राजा दण्डसे और ब्राह्मण क्रोधसे दग्ध करते हैं। कुपित ब्राह्मण अपने क्रोधसे अपराधीको वैसे ही नष्ट कर देता है, जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरोंको।
दुष्यन्त उवाच
इच्छामि त्वां वरारोहे भजमानामनिन्दिते ।
त्वदर्थं मां स्थितं विद्धि त्वद्गतं हि मनो मम ॥ ६ ॥
**दुष्यन्त बोले—**वरारोहे! तुम्हारा शील और स्वभाव प्रशंसाके योग्य है। मैं चाहता हूँ, तुम मुझे स्वेच्छासे स्वीकार करो। मैं तुम्हारे लिये ही यहाँ ठहरा हूँ। मेरा मन तुममें ही लगा हुआ है ॥ ६ ॥
आत्मनो बन्धुरात्मैव गतिरात्मैव चात्मनः ।
आत्मनो मित्रमात्मैव तथाऽऽत्मा चात्मनः पिता ।
आत्मनैवात्मनो दानं कर्तुमर्हसि धर्मतः ॥ ७ ॥
आत्मा ही अपना बन्धु है। आत्मा ही अपना आश्रय है। आत्मा ही अपना मित्र है और वही अपना पिता है, अतः तुम स्वयं ही धर्मपूर्वक आत्मसमर्पण करनेयोग्य हो ॥ ७ ॥
अष्टावेव समासेन विवाहा धर्मतः स्मृताः ।
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः ।। ८ ।।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमः स्मृतः ।
तेषां धर्म्यान् यथापूर्वं मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।। ९ ।।
धर्मशास्त्रकी दृष्टिसे संक्षेपसे आठ प्रकारके ही विवाह माने गये हैं—ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस तथा आठवाँ पैशाच।* स्वायम्भुव मनुका कथन है कि इनमें बादवालोंकी अपेक्षा पहलेवाले विवाह धर्मानुकूल हैं ।। ८-९ ।।
प्रशस्तांश्चतुरः पूर्वान् ब्राह्मणस्योपधारय ।
षडानुपूर्व्या क्षत्रस्य विद्धि धर्म्याननिन्दिते ।। १० ।।
पूर्वकथित जो चार विवाह—ब्राह्म, दैव, आर्ष तथा प्राजापत्य हैं, उन्हें ब्राह्मणके लिये उत्तम समझो। अनिन्दिते! ब्राह्मसे लेकर गान्धर्वतक क्रमशः छह विवाह क्षत्रियके लिये धर्मानुकूल जानो ।। १० ।।
राज्ञां तु राक्षसोऽप्युक्तो विट्शूद्रेष्वासुरः स्मृतः ।
पञ्चानां तु त्रयो धर्म्या अधर्म्यौ द्वौ स्मृताविह ।। ११ ।।
राजाओंके लिये तो राक्षस विवाहका भी विधान है। वैश्यों और शूद्रोंमें आसुर विवाह ग्राह्य माना गया है। अन्तिम पाँच विवाहोंमें तीन तो धर्मसम्मत हैं और दो अधर्मरूप माने गये हैं ।। ११ ।।
पैशाच आसुरश्चैव न कर्तव्यौ कदाचन ।
अनेन विधिना कार्यो धर्मस्यैषा गतिः स्मृता ।। १२ ।।
पैशाच और आसुर विवाह कदापि करनेयोग्य नहीं हैं। इस विधिके अनुसार विवाह करना चाहिये। यह धर्मका मार्ग बताया गया है ।। १२ ।।
गान्धर्वराक्षसौ क्षत्रे धर्म्यौ तौ मा विशङ्किथाः ।
पृथग् वा यदि वा मिश्रौ कर्तव्यौ नात्र संशयः ।। १३ ।।
गान्धर्व और राक्षस—दोनों विवाह क्षत्रियजातिके लिये धर्मानुकूल ही हैं। अतः उनके विषयमें तुम्हें संदेह नहीं करना चाहिये। वे दोनों विवाह परस्पर मिले हों या पृथक्-पृथक् हों, क्षत्रियके लिये करनेयोग्य ही हैं, इसमें संशय नहीं है ।। १३ ।।
सा त्वं मम सकामस्य सकामा वरवर्णिनि ।
गान्धर्वेण विवाहेन भार्या भवितुमर्हसि ।। १४ ।।
अतः सुन्दरी! मैं तुम्हें पानेके लिये इच्छुक हूँ। तुम भी मुझे पानेकी इच्छा रखकर गान्धर्व विवाहके द्वारा मेरी पत्नी बन जाओ ।। १४ ।।
शकुन्तलोवाच
यदि धर्मपथस्त्वेष यदि चात्मा प्रभुर्मम ।
प्रदाने पौरवश्रेष्ठ शृणु मे समयं प्रभो ।। १५ ।।
**शकुन्तलाने कहा—**पौरवश्रेष्ठ! यदि यह गान्धर्व विवाह धर्मका मार्ग है, यदि आत्मा स्वयं ही अपना दान करनेमें समर्थ है तो इसके लिये मैं तैयार हूँ; किंतु प्रभो! मेरी एक शर्त है, उसे सुन लीजिये ॥ १५ ॥ सत्यं मे प्रतिजानीहि यथा वक्ष्याम्यहं रहः । मयि जायेत यः पुत्रः स भवेत् त्वदनन्तरः ॥ १६ ॥ युवराजो महाराज सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । यद्येतदेवं दुष्यन्त अस्तु मे सङ्गमस्त्वया ॥ १७ ॥ और उसका पालन करनेके लिये मुझसे सच्ची प्रतिज्ञा कीजिये। वह शर्त क्या है, यह मैं एकान्तमें आपसे कह रही हूँ—महाराज दुष्यन्त! मेरे गर्भसे आपके द्वारा जो पुत्र उत्पन्न हो, वही आपके बाद युवराज हो, ऐसी मेरी इच्छा है। यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ। यदि यह शर्त इसी रूपमें आपको स्वीकार हो तो आपके साथ मेरा समागम हो सकता है ॥ १६-१७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमस्त्विति तां राजा प्रत्युवाचाविचारयन् । अपि च त्वां हि नेष्यामि नगरं स्वं शुचिस्मिते ॥ १८ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! शकुन्तलाकी यह बात सुनकर राजा दुष्यन्तने बिना कुछ सोचे-विचारे यह उत्तर दे दिया कि ‘ऐसा ही होगा।’ वे शकुन्तलासे बोले—‘शुचिस्मिते! मैं शीघ्र तुम्हें अपने नगरमें ले चलूँगा ॥ १८ ॥ यथा त्वमर्हा सुश्रोणि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । एवमुक्त्वा स राजर्षिस्तामनिन्दितगामिनीम् ॥ १९ ॥ जग्राह विधिवत् पाणावुवास च तया सह । विश्वास्य चैनां स प्रायादब्रवीच्च पुनः पुनः ॥ २० ॥ प्रेषयिष्ये तवार्थाय वाहिनीं चतुरङ्गिणीम् । तया त्वानाययिष्यामि निवासं स्वं शुचिस्मिते ॥ २१ ॥ ‘सुश्रोणि! तुम राजभवनमें ही रहनेयोग्य हो। मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ।’ ऐसा कहकर राजर्षि दुष्यन्तने अनिन्द्यगामिनी शकुन्तलाका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया और उसके साथ एकान्तवास किया। फिर उसे विश्वास दिलाकर वहाँसे विदा हुए। जाते समय उन्होंने बार-बार कहा—‘पवित्र मुसकानवाली सुन्दरी! मैं तुम्हारे लिये चतुरंगिणी सेना भेजूँगा और उसीके साथ अपने राजभवनमें बुलवाऊँगा’ ॥ १९—२१ ॥ (एवमुक्त्वा स राजर्षिस्तामनिन्दितगामिनीम् । सम्परिष्वज्य बाहुभ्यां स्मितपूर्वमुदैक्षत ॥ प्रदक्षिणीकृतां देवीं राजा सम्परिषस्वजे ।
शकुन्तला ह्यश्रुमुखी पपात नृपपादयोः ॥ तां देवीं पुनरुत्थाप्य मा शुचेति पुनः पुनः । शपेयं सुकृतेनैव प्रापयिष्ये नृपात्मजे ॥) अनिन्द्यगामिनी शकुन्तलासे ऐसा कहकर राजर्षि दुष्यन्तने उसे अपनी भुजाओंमें भर लिया और उसकी ओर मुसकराते हुए देखा। देवी शकुन्तला राजाकी परिक्रमा करके खड़ी थी। उस समय उन्होंने उसे हृदयसे लगा लिया। शकुन्तलाके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली और वह नरेशके चरणोंमें गिर पड़ी। राजाने देवी शकुन्तलाको फिर उठाकर बार-बार कहा—'राजकुमारी! चिन्ता न करो। मैं अपने पुण्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, तुम्हें अवश्य बुला लूँगा।'
वैशम्पायन उवाच
इति तस्याः प्रतिश्रुत्य स नृपो जनमेजय । मनसा चिन्तयन् प्रायात् काश्यपं प्रति पार्थिवः ॥ २२ ॥ भगवांस्तपसा युक्तः श्रुत्वा किं नु करिष्यति । एवं स चिन्तयन्नेव प्रविवेश स्वकं पुरम् ॥ २३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार शकुन्तलासे प्रतिज्ञा करके नरेश्वर राजा दुष्यन्त आश्रमसे चल दिये। उनके मनमें महर्षि कण्वकी ओरसे बड़ी चिन्ता थी कि तपस्वी भगवान् कण्व यह सब सुनकर न जाने क्या कर बैठेंगे? इस तरह चिन्ता करते हुए ही राजाने अपने नगरमें प्रवेश किया ॥ २२-२३ ॥
मुहूर्तयाते तस्मिंस्तु कण्वोऽप्याश्रममागमत् । शकुन्तला च पितरं ह्रिया नोपजगाम तम् ॥ २४ ॥ उनके गये दो ही घड़ी बीती थी कि महर्षि कण्व भी आश्रमपर आ गये; परंतु शकुन्तला लज्जावश पहलेके समान पिताके समीप नहीं गयी ॥ २४ ॥
(शङ्कितैव च विप्रर्षिमुपचक्राम सा शनैः । ततोऽस्य राजञ्जग्राह आसनं चाप्यकल्पयत् ॥ शकुन्तला च सव्रीडा तमृषिं नाभ्यभाषत । तस्मात् स्वधर्मात् स्खलिता भीता सा भरतर्षभ ॥ अभवद् दोषदर्शित्वाद् ब्रह्मचारिण्ययन्त्रिता । स तदा व्रीडितां दृष्ट्वा ऋषिस्तां प्रत्यभाषत ॥ तत्पश्चात् वह डरती हुई ब्रह्मर्षिके निकट धीरे-धीरे गयी। फिर उसने उनके लिये आसन लेकर बिछाया। शकुन्तला इतनी लज्जित हो गयी थी कि महर्षिसे कोई बाततक न कर सकी। भरतश्रेष्ठ! वह अपने धर्मसे गिर जानेके कारण भयभीत हो रही थी। जो कुछ समय
पहलेतक स्वाधीन ब्रह्मचारिणी थी, वही उस समय अपना दोष देखनेके कारण घबरा गयी थी। शकुन्तलाको लज्जामें डूबी हुई देख महर्षि कण्वने उससे कहा।
कण्व उवाच
सव्रीडैव च दीर्घायुः पुरेव भविता न च ।
वृत्तं कथय रम्भोरु मा त्रासं च प्रकल्पय ॥
**कण्व बोले—**बेटी! तू सलज्ज रहकर ही दीर्घायु होगी। अब पहले जैसी चपल न रह सकेगी। शुभे! सारी बातें स्पष्ट बता; भय न कर।
वैशम्पायन उवाच
ततः कृच्छ्रादतिशुभा सव्रीडा श्रीमती तदा ।
सगद्गदमुवाचेदं काश्यपं सा शुचिस्मिता ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! पवित्र मुसकान-वाली वह सुन्दरी अत्यन्त सदाचारिणी थी; तो भी अपने व्यवहारसे लज्जाका अनुभव करती हुई महर्षि कण्वसे बड़ी कठिनाईके साथ गद्गदकण्ठ होकर बोली।
शकुन्तलोवाच
राजा ताताजगामेह दुष्यन्त इलिलात्मजः ।
मया पतिर्वृतो योऽसौ दैवयोगादिहागतः ॥
तस्य तात प्रसीदस्व भर्ता मे सुमहायशाः ।
अतः सर्वं तु यद् वृत्तं दिव्यज्ञानेन पश्यसि ।
अभयं क्षत्रियकुले प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥)
**शकुन्तला बोली—**तात! इलिलकुमार महाराज दुष्यन्त इस वनमें आये थे। दैवयोगसे इस आश्रमपर भी उनका आगमन हुआ और मैंने उन्हें अपना पति स्वीकार कर लिया। पिताजी! आप उनपर प्रसन्न हों। वे महायशस्वी नरेश अब मेरे स्वामी हैं। इसके बादका सारा वृत्तान्त आप दिव्य ज्ञानदृष्टिसे देख सकते हैं। क्षत्रियकुलको अभयदान देकर उनपर कृपादृष्टि करें।
विज्ञायाथ च तां कण्वो दिव्यज्ञानो महातपाः ।
उवाच भगवान् प्रीतः पश्यन् दिव्येन चक्षुषा ॥ २५ ॥
महातपस्वी भगवान् कण्व दिव्यज्ञानसे सम्पन्न थे। वे दिव्य दृष्टिसे देखकर शकुन्तलाकी तात्कालिक अवस्थाको जान गये; अतः प्रसन्न होकर बोले— ।। २५ ।।
त्वयाद्य भद्रे रहसि मामनादृत्य यः कृतः ।
पुंसा सह समायोगो न स धर्मोपघातकः ॥ २६ ॥
‘भद्रे! आज तुमने मेरी अवहेलना करके जो एकान्तमें किसी पुरुषके साथ सम्बन्ध स्थापित किया है, वह तुम्हारे धर्मका नाशक नहीं है ।। २६ ।।
क्षत्रियस्य हि गान्धर्वो विवाहः श्रेष्ठ उच्यते ।
सकायामाः सकामेन निर्मन्त्रो रहसि स्मृतः ।। २७ ।।
‘क्षत्रियके लिये गान्धर्व विवाह श्रेष्ठ कहा गया है। स्त्री और पुरुष दोनों एक दूसरेको चाहते हों, उस दशामें उन दोनोंका एकान्तमें जो मन्त्रहीन सम्बन्ध स्थापित होता है, उसे गान्धर्व विवाह कहा गया है ।। २७ ।।
धर्मात्मा च महात्मा च दुष्यन्तः पुरुषोत्तमः ।
अध्यगच्छः पतिं यत् त्वं भजमानं शकुन्तले ।। २८ ।।
महात्मा जनिता लोके पुत्रस्तव महाबलः ।
य इमां सागरापाङ्गीं कृत्स्नां भोक्ष्यति मेदिनीम् ।। २९ ।।
‘शकुन्तले! महामना दुष्यन्त धर्मात्मा और श्रेष्ठ पुरुष हैं। वे तुम्हें चाहते थे। तुमने योग्य पतिके साथ सम्बन्ध स्थापित किया है; इसलिये लोकमें तुम्हारे गर्भसे एक महाबली और महात्मा पुत्र उत्पन्न होगा, जो समुद्रसे घिरी हुई इस समूची पृथ्वीका उपभोग करेगा ।। २८-२९ ।।
परं चाभिप्रयातस्य चक्रं तस्य महात्मनः ।
भविष्यत्यप्रतिहतं सततं चक्रवर्तिनः ।। ३० ।।
‘शत्रुओंपर आक्रमण करनेवाले उस महामना चक्रवर्ती नरेशकी सेना सदा अप्रतिहत होगी। उसकी गतिको कोई रोक नहीं सकेगा’ ।। ३० ।।
ततः प्रक्षाल्य पादौ सा विश्रान्तं मुनिमब्रवीत् ।
विनिधाय ततो भारं संनिधाय फलानि च ।। ३१ ।।
तदनन्तर शकुन्तलाने उनके लाये हुए फलके भारको लेकर यथास्थान रख दिया। फिर उनके दोनों पैर धोये तथा जब वे भोजन और विश्राम कर चुके, तब वह मुनिसे इस प्रकार बोली ।। ३१ ।।
शकुन्तलोवाच
मया पतिर्वृतो राजा दुष्यन्तः पुरुषोत्तमः ।
तस्मै ससचिवाय त्वं प्रसादं कर्तुमर्हसि ।। ३२ ।।
शकुन्तलाने कहा— भगवन्! मैंने पुरुषोंमें श्रेष्ठ राजा दुष्यन्तका पतिरूपमें वरण किया है। अतः मन्त्रियोंसहित उन नरेशपर आपको कृपा करनी चाहिये ।। ३२ ।।
कण्व उवाच
प्रसन्न एव तस्याहं त्वत्कृते वरवर्णिनि ।
(ऋतवो बहवस्ते वै गता व्यर्थाः शुचिस्मिते ।
सार्थकं साम्प्रतं ह्येतन्न च पापोऽस्ति तेऽनघे ॥ गृहाण च वरं मत्तस्त्वं शुभे यदभीप्सितम् ॥ ३३ ॥ कण्व बोले— उत्तम वर्णवाली पुत्री! मैं तुम्हारे भलेके लिये राजा दुष्यन्तपर भी प्रसन्न ही हूँ। शुचिस्मिते! अबतक तेरे बहुत-से ऋतु व्यर्थ बीत गये हैं। इस बार यह सार्थक हुआ है। अनघे! तुम्हें पाप नहीं लगेगा। शुभे! तुम्हारी जो इच्छा हो, वह वर मुझसे माँग लो ॥ ३३ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो धर्मिष्ठतां वव्रे राज्याच्चास्खलनं तथा । शकुन्तला पौरवाणां दुष्यन्तहितकाम्यया ॥ ३४ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब शकुन्तलाने दुष्यन्तके हितकी इच्छासे यह वर माँगा कि पुरुवंशी नरेश सदा धर्ममें स्थिर रहें और वे कभी राज्यसे भ्रष्ट न हों ॥ ३४ ॥ (एवमस्त्विति तां प्राह कण्वो धर्मभृतां वरः । पस्पर्श चापि पाणिभ्यां सुतां श्रीमिव रूपिणीम् ॥ उस समय धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ कण्वने उससे कहा—'एवमस्तु' (ऐसा ही हो)। यह कहकर उन्होंने मूर्तिमती लक्ष्मी-सी पुत्री शकुन्तलाका दोनों हाथोंसे स्पर्श किया और कहा।
कण्व उवाच
अद्यप्रभृति देवी त्वं दुष्यन्तस्य महात्मनः । पतिव्रतानां या वृत्तिस्तां वृत्तिमनुपालय ॥) कण्व बोले— बेटी! आजसे तू महात्मा राजा दुष्यन्तकी महारानी है। अतः पतिव्रता स्त्रियोंका जो बर्ताव तथा सदाचार है, उसका निरन्तर पालन कर।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७३ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १९ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५३ १/३ श्लोक हैं)
* कन्याको वस्त्र और आभूषणोंसे अलंकृत करके सजातीय योग्य वरके हाथमें देना 'ब्राह्म' विवाह कहलाता है। अपने घरपर देवयज्ञ करके यज्ञान्तमें ऋत्विज्को अपनी कन्याका दान करना 'दैव' विवाह कहा गया है। वरसे एक गाय और एक बैल शुल्कके रूपमें लेकर कन्यादान करना 'आर्ष' विवाह बताया गया है। वर और कन्या दोनों साथ रहकर धर्माचरण करें, इस बुद्धिसे कन्यादान करना 'प्राजापत्य' विवाह माना गया है। वरसे मूल्यके रूपमें बहुत-सा धन लेकर कन्या देना 'आसुर' विवाह माना गया है। वर और वधू दोनों एक-दूसरेको स्वेच्छासे स्वीकार कर लें, यह 'गान्धर्व' विवाह है। युद्ध
करके मार-काट मचाकर रोती हुई कन्याको उसके रोते हुए भाई-बन्धुओंसे छीन लाना ‘राक्षस’ विवाह माना गया है। जब घरके लोग सोये हों अथवा असावधान हों, उस दशामें कन्याको चुरा लेना ‘पैशाच’ विवाह है।
शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः
शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक
वैशम्पायन उवाच
प्रतिज्ञाय तु दुष्यन्ते प्रतियाते शकुन्तलाम् ।
(गर्भश्च ववृधे तस्यां राजपुत्र्यां महात्मनः ।
शकुन्तला चिन्तयन्ती राजानं कार्यगौरवात् ।।
दिवारात्रमनिद्रैव स्नानभोजनवर्जिता ।।
राजप्रेषणिका विप्रांश्चतुरङ्गबलैः सह ।
अद्य श्वो वा परश्वो वा समायान्तीति निश्चिता ।।
दिवसान् पक्षानृतून् मासानयनानि च सर्वशः ।
गण्यमानेषु सर्वेषु व्यतीयुस्त्रीणि भारत ।।)
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जब शकुन्तलासे पूर्वोक्त प्रतिज्ञा करके राजा दुष्यन्त चले गये, तब क्षत्रियकन्या शकुन्तलाके उदरमें उन महात्मा दुष्यन्तके द्वारा स्थापित किया हुआ गर्भ धीरे-धीरे बढ़ने और पुष्ट होने लगा। शकुन्तला कार्यकी गुरुतापर दृष्टि रखकर निरन्तर राजा दुष्यन्तका ही चिन्तन करती रहती थी। उसे न तो दिनमें नींद आती थी और न रातमें ही। उसका स्नान और भोजन छूट गया था। उसे यह दृढ़ विश्वास था कि राजाके भेजे हुए ब्राह्मण चतुरंगिणी सेनाके साथ आज, कल या परसोंतक मुझे लेनेके लिये अवश्य आ जायँगे। भरतनन्दन! शकुन्तलाको दिन, पक्ष, मास, ऋतु, अयन तथा वर्ष—इन सबकी गणना करते-करते तीन वर्ष बीत गये।
गर्भं सुषाव वामोरूः कुमारममितौजसम् ।। १ ।।
त्रिषु वर्षेषु पूर्णेषु दीप्तानलसमद्युतिम् ।
रूपौदार्यगुणोपेतं दौष्यन्तिं जनमेजय ।। २ ।।
जनमेजय! तदनन्तर पूरे तीन वर्ष व्यतीत होनेके बाद सुन्दर जाँघोंवाली शकुन्तलाने अपने गर्भसे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न, अमित पराक्रमी कुमारको जन्म दिया, जो दुष्यन्तके वीर्यसे उत्पन्न हुआ था ।। १-२ ।।
(तस्मै तदान्तरिक्षात् तु पुष्पवृष्टिः पपात ह ।
देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।।
गायन्त्यो मधुरं तत्र देवैः शक्रोऽभ्युवाच ह ।
उस समय आकाशसे उस बालकके लिये फूलोंकी वर्षा हुई, देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और अप्सराएँ मधुर स्वरमें गाती हुई नृत्य करने लगीं। उस अवसरपर वहाँ देवताओंसहित इन्द्रने आकर कहा।
शक्र उवाच
शकुन्तले तव सुतश्चक्रवर्ती भविष्यति ॥
बलं तेजश्च रूपं च न समं भुवि केनचित् ।
आहर्ता वाजिमेधस्य शतसंख्यस्य पौरवः ॥
अनेकानि सहस्राणि राजसूयादिभिर्मखैः ।
स्वार्थं ब्राह्मणसात् कृत्वा दक्षिणाममितां ददात् ॥
**इन्द्र बोले—**शकुन्तले! तुम्हारा यह पुत्र चक्रवर्ती सम्राट् होगा। पृथ्वीपर कोई भी इसके बल, तेज तथा रूपकी समानता नहीं कर सकता। यह पूरुवंशका रत्न सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करेगा। राजसूय आदि यज्ञोंद्वारा सहस्रों बार अपना सारा धन ब्राह्मणोंके अधीन करके उन्हें अपरिमित दक्षिणा देगा।
वैशम्पायन उवाच
देवतानां वचः श्रुत्वा कण्वाश्रमनिवासिनः ।
सभाजयन्त कण्वस्य सुतां सर्वे महर्षयः ॥
शकुन्तला च तच्छ्रुत्वा परं हर्षमवाप सा ।
द्विजानाहूय मुनिभिः सत्कृत्य च महायशाः ॥)
जातकर्मादिसंस्कारं कण्वः पुण्यकृतां वरः ।
विधिवत् कारयामास वर्धमानस्य धीमतः ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**इन्द्रादि देवताओंका यह वचन सुनकर कण्वके आश्रममें रहनेवाले सभी महर्षि कण्वकन्या शकुन्तलाके सौभाग्यकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। यह सब सुनकर शकुन्तलाको भी बड़ा हर्ष हुआ। पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ महायशस्वी कण्वने मुनियोंसे ब्राह्मणोंको बुलाकर उनका पूर्ण सत्कार करके बालकका विधिपूर्वक जातकर्म आदि संस्कार कराया। वह बुद्धिमान् बालक प्रतिदिन बढ़ने लगा ॥ ३ ॥
दन्तैः शुक्लैः शिखरिभिः सिंहसंहननो महान् ।
चक्राङ्कितकरः श्रीमान् महामूर्धा महाबलः ॥ ४ ॥
वह सफेद और नुकीले दाँतोंसे शोभा पा रहा था। उसके शरीरका गठन सिंहके समान था। वह ऊँचे कदका था। उसके हाथोंमें चक्रके चिह्न थे। वह अद्भुत शोभासे सम्पन्न, विशाल मस्तकवाला और महान् बलवान् था ॥ ४ ॥
कुमारो देवगर्भाभः स तत्राशु व्यवर्धत ।
षड्वर्ष एव बालः स कण्वाश्रमपदं प्रति ॥ ५ ॥ सिंहव्याघ्रान् वराहांश्च महिषांश्च गजांस्तथा । बबन्ध वृक्षे बलवानाश्रमस्य समीपतः ॥ ६ ॥ देवताओंके बालक-सा प्रतीत होनेवाला वह तेजस्वी कुमार वहाँ शीघ्रतापूर्वक बढ़ने लगा। छः वर्षकी अवस्थामें ही वह बलवान् बालक कण्वके आश्रममें सिंहों, व्याघ्रों, वराहों, भैंसों और हाथियोंको पकड़कर खींच लाता और आश्रमके समीपवर्ती वृक्षोंमें बाँध देता था॥ ५-६॥ आरोहन् दमयंश्चैव क्रीडंश्च परिधावति । (ततश्च राक्षसान् सर्वान् पिशाचांश्च रिपून् रणे । मुष्टियुद्धेन ताञ्जित्वा ऋषीणाराधयत् तदा ॥ कश्चिद् दितिसुतस्तं तु हन्तुकामो महाबलः । वध्यमानांस्तु दैतेयानमर्षी तं समभ्ययात् ॥ तमागतं प्रहस्यैव बाहुभ्यां परिगृह्य च । दृढं चाबध्य बाहुभ्यां पीडयामास तं तदा ॥ मर्दितो न शशाकास्य मोचितुं बलवत्तया । प्राक्रोशद् भैरवं तत्र द्वारेभ्यो निःसृतं त्वसृक् ॥ तेन शब्देन वित्रस्ता मृगाः सिंहादयो गणाः । सुस्रुवुश्च शकृन्मूत्रमाश्रमस्थाश्च सुस्रुवुः ॥ निरसुं जानुभिः कृत्वा विससर्ज च सोऽपतत् । तं दृष्ट्वा विस्मयं चक्रुः कुमारस्य विचेष्टितम् ॥ नित्यकालं वध्यमाना दैतेया राक्षसैः सह । कुमारस्य भयादेव नैव जग्मुस्तदाश्रमम् ॥) ततोऽस्य नाम चक्रुस्ते कण्वाश्रमनिवासिनः ॥ ७ ॥ फिर वह सबका दमन करते हुए उनकी पीठपर चढ़ जाता और क्रीड़ा करते हुए उन्हें सब ओर दौड़ाता हुआ दौड़ता था। वहाँ सब राक्षस और पिशाच आदि शत्रुओंको युद्धमें मुष्टिप्रहारके द्वारा परास्त करके वह राजकुमार ऋषि-मुनियोंकी आराधनामें लगा रहता था। एक दिन कोई महाबली दैत्य उसे मार डालनेकी इच्छासे उस वनमें आया। वह उसके द्वारा प्रतिदिन सताये जाते हुए दूसरे दैत्योंकी दशा देखकर अमर्षमें भरा हुआ था। उसके आते ही राजकुमारने हँसकर उसे दोनों हाथोंसे पकड़ लिया और अपनी बाँहोंमें दृढ़तापूर्वक कसकर दबाया। वह बहुत जोर लगानेपर भी अपनेको उस बालकके चंगुलसे छुड़ा न सका, अतः भयंकर स्वरसे चीत्कार करने लगा। उस समय दबावके कारण उसकी इन्द्रियोंसे रक्त बह चला। उसकी चीत्कारसे भयभीत हो मृग और सिंह आदि जंगली जीव मल-मूत्र करने लगे तथा आश्रमपर रहनेवाले प्राणियोंकी भी यही दशा हुई। दुष्यन्तकुमारने घुटनोंसे मार-
मारकर उस दैत्यके प्राण ले लिये; तत्पश्चात् उसे छोड़ दिया। उसके हाथसे छूटते ही वह दैत्य गिर पड़ा। उस बालकका यह पराक्रम देखकर सब लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ। कितने ही दैत्य और राक्षस प्रतिदिन उस दुष्यन्तकुमारके हाथों मारे जाते थे। कुमारके भयसे ही उन्होंने कण्वके आश्रमपर जाना छोड़ दिया। यह देख कण्वके आश्रममें रहनेवाले ऋषियोंने उसका नया नामकरण किया— ।। ७ ।। अस्त्वयं सर्वदमनः सर्वं हि दमयत्यसौ । स सर्वदमनो नाम कुमारः समपद्यत ।। ८ ।। विक्रमेणौजसा चैव बलेन च समन्वितः । ‘यह सब जीवोंका दमन करता है, इसलिये ‘सर्वदमन’ नामसे प्रसिद्ध हो।’ तबसे उस कुमारका नाम सर्वदमन हो गया। वह पराक्रम, तेज और बलसे सम्पन्न था ।। ८ १/२ ।। (अप्रेषयति दुष्यन्ते महिष्यास्तनयस्य च । पाण्डुभावपरीताङ्गीं चिन्तया समभिप्लुताम् ।। लम्बालकां कृशां दीनां तथा मलिनवाससम् । शकुन्तलां च सम्प्रेक्ष्य प्रदध्यौ स मुनिस्तदा ।। शास्त्राणि सर्ववेदांश्च द्वादशाब्दस्य चाभवन् ।।) राजा दुष्यन्तने अपनी रानी और पुत्रको बुलानेके लिये जब किसी भी मनुष्यको नहीं भेजा, तब शकुन्तला चिन्तामग्न हो गयी। उसके सारे अंग सफेद पड़ने लगे। उसके खुले हुए लंबे केश लटक रहे थे, वस्त्र मैले हो गये थे, वह अत्यन्त दुर्बल और दीन दिखायी देती थी। शकुन्तलाको इस दयनीय दशामें देखकर कण्व मुनिने कुमार सर्वदमनके लिये विद्याका चिन्तन किया। इससे उस बारह वर्षके ही बालकके हृदयमें समस्त शास्त्रों और सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्रकाशित हो गया। तं कुमारमृषिर्दृष्ट्वा कर्म चास्यातिमानुषम् ।। ९ ।। समयो यौवराज्यायैत्यब्रवीच्च शकुन्तलाम् । महर्षि कण्वने उस कुमार और उसके लोकोत्तर कर्मको देखकर शकुन्तलासे कहा—‘अब इसके युवराज-पदपर अभिषिक्त होनेका समय आया है ।। ९ १/२ ।। (शृणु भद्रे मम सुते मम वाक्यं शुचिस्मिते । पतिव्रतानां नारीणां विशिष्टमिति चोच्यते ।। ‘मेरी कल्याणमयी पुत्री! मेरा यह वचन सुनो। पवित्र मुसकानवाली शकुन्तले! पतिव्रता स्त्रियोंके लिये यह विशेष ध्यान देनेयोग्य बात है; इसलिये बता रहा हूँ। पतिशुश्रूषणं पूर्वं मनोवाक्कायचेष्टितैः । अनुज्ञाता मया पूर्वं पूजयैतद् व्रतं तव ।। एतेनैव च वृत्तेन विशिष्टां लप्स्यसे श्रियम् ।
'सती स्त्रियोंके लिये सर्वप्रथम कर्तव्य यह है कि वे मन, वाणी, शरीर और चेष्टाओंद्वारा निरन्तर पतिकी सेवा करती रहें। मैंने पहले भी तुम्हें इसके लिये आदेश दिया है। तुम अपने इस व्रतका पालन करो। इस पतिव्रतोचित आचार-व्यवहारसे ही विशिष्ट शोभा प्राप्त कर सकोगी।
तस्माद् भद्रे प्रयातव्यं समीपं पौरवस्य ह ।।
स्वयं नायाति मत्वा ते गतं कालं शुचिस्मिते ।
गत्वाऽऽराध्य राजानं दुष्मन्तं हितकाम्यया ।।
'भद्रे! तुम्हें पूरुनन्दन दुष्मन्तके पास जाना चाहिये। वे स्वयं नहीं आ रहे हैं, ऐसा सोचकर तुमने बहुत-सा समय उनकी सेवासे दूर रहकर बिता दिया। शुचिस्मिते! अब तुम अपने हितकी इच्छासे स्वयं जाकर राजा दुष्मन्तकी आराधना करो।
दौष्यन्तिं यौवराज्यस्थं दृष्ट्वा प्रीतिमवाप्स्यसि ।
देवतानां गुरूणां च क्षत्रियाणां च भामिनि ।
भर्तॄणां च विशेषेण हितं संगमनं सताम् ।।
तस्मात् पुत्रि कुमारेण गन्तव्यं मत्प्रियेप्सया ।
प्रतिवाक्यं न दद्यास्त्वं शापिता मम पादयोः ।।
'वहाँ दुष्मन्तकुमार सर्वदमनको युवराज-पदपर प्रतिष्ठित देख तुम्हें बड़ी प्रसन्नता होगी। देवता, गुरु, क्षत्रिय, स्वामी तथा साधु पुरुष—इनका संग विशेष हितकर है। अतः बेटी! तुम्हें मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे कुमारके साथ अवश्य अपने पतिके यहाँ जाना चाहिये। मैं अपने चरणोंकी शपथ दिलाकर कहता हूँ कि तुम मुझे मेरी इस आज्ञाके विपरीत कोई उत्तर न देना'।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा सुतां तत्र पौत्रं कण्वोऽभ्यभाषत ।
परिष्वज्य च बाहुभ्यां मूर्ध्युपाघ्राय पौरवम् ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**पुत्रीसे ऐसा कहकर महर्षि कण्वने उसके पुत्र भरतको दोनों बाँहोंसे पकड़कर अंकमें भर लिया और उसका मस्तक सूँघकर कहा।
कण्व उवाच
सोमवंशोद्भवो राजा दुष्मन्तो नाम विश्रुतः ।
तस्याग्रमहिषी चैषा तव माता शुचिव्रता ।।
गन्तुकामा भर्तृवशं त्वया सह सुमध्यमा ।
गत्वाभिवाद्य राजानं यौवराज्यमवाप्स्यसि ।।
स पिता तव राजेन्द्रस्तस्य त्वं वशगो भव ।
पितृपैतामहं राज्यमनुतिष्ठस्व भावतः ।।
**कण्व बोले—**वत्स! चन्द्रवंशमें दुष्यन्त नामसे प्रसिद्ध एक राजा हैं। पवित्र व्रतका पालन करनेवाली यह तुम्हारी माता उन्हींकी महारानी है। यह सुन्दरी तुम्हें साथ लेकर अब पतिकी सेवामें जाना चाहती है। तुम वहाँ जाकर राजाको प्रणाम करके युवराज-पद प्राप्त करोगे। वे महाराज दुष्यन्त ही तुम्हारे पिता हैं। तुम सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहना और बाप-दादेके राज्यका प्रेमपूर्वक पालन करना।
शकुन्तले शृणुष्वेदं हितं पथ्यं च भामिनि । पतिव्रताभावगुणान् हित्वा साध्यं न किञ्चन ॥ पतिव्रतानां देवा वै तुष्टाः सर्ववरप्रदाः । प्रसादं च करिष्यन्ति ह्यापदर्थे च भामिनि ॥ पतिप्रसादात् पुण्यगतिं प्राप्नुवन्ति न चाशुभम् । तस्माद् गत्वा तु राजानमाराधय शुचिस्मिते ॥) (फिर कण्व शकुन्तलासे बोले—) 'भामिनि! शकुन्तले! यह मेरी हितकर एवं लाभप्रद बात सुनो। पतिव्रताभाव-सम्बन्धी गुणोंको छोड़कर तुम्हारे लिये और कोई वस्तु साध्य नहीं है। पतिव्रताओंपर सम्पूर्ण वरोंको देनेवाले देवतालोग भी संतुष्ट रहते हैं। भामिनि! वे आपत्तिके निवारणके लिये अपने कृपा-प्रसादका भी परिचय देंगे। शुचिस्मिते! पतिव्रता देवियाँ पतिके प्रसादसे पुण्यगतिको ही प्राप्त होती हैं; अशुभ गतिको नहीं। अतः तुम जाकर राजाकी आराधना करो'।
तस्य तद् बलमाज्ञाय कण्वः शिष्यानुवाच ह ॥ १० ॥ शकुन्तलामिमां शीघ्रं सहपुत्रामितो गृहात् । भर्तुः प्रापयतागारं सर्वलक्षणपूजिताम् ॥ ११ ॥ फिर उस बालकके बलको समझकर कण्वने अपने शिष्योंसे कहा—'तुमलोग समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्मानित मेरी पुत्री शकुन्तला और इसके पुत्रको शीघ्र ही इस घरसे ले जाकर पतिके घरमें पहुँचा दो ।। १०-११ ।।
नारीणां चिरवासो हि बान्धवेषु न रोचते । कीर्तिचारित्रधर्मघ्नस्तस्मान्नयत मा चिरम् ॥ १२ ॥ 'स्त्रियोंका अपने भाई-बन्धुओंके यहाँ अधिक दिनोंतक रहना अच्छा नहीं होता। वह उनकी कीर्ति, शील तथा पातिव्रत्य धर्मका नाश करनेवाला होता है। अतः इसे अविलम्ब पतिके घरमें पहुँचा दो' ।। १२ ।।
(वैशम्पायन उवाच
धर्माभिपूजितं पुत्रं काश्यपेन निशाम्य तु । काश्यपात् प्राप्य चानुज्ञां मुमुदे च शकुन्तला ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कश्यपनन्दन कण्वने धर्मानुसार मेरे पुत्रका बड़ा आदर किया है, यह देखकर तथा उनकी ओरसे पतिके घर जानेकी आज्ञा पाकर शकुन्तला मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई।
कण्वस्य वचनं श्रुत्वा प्रतिगच्छेति चासकृत् ।
तथेत्युक्त्वा तु कण्वं च मातरं पौरवोऽब्रवीत् ॥
किं चिरायसि मातस्त्वं गमिष्यामो नृपालयम् ।
कण्वके मुखसे बारंबार ‘जाओ-जाओ’ यह आदेश सुनकर पूरूनन्दन सर्वदमनने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और मातासे कहा—‘माँ! तुम क्यों विलम्ब करती हो, चलो राजमहल चलें’।
एवमुक्त्वा तु तां देवीं दुष्पन्तस्य महात्मनः ॥
अभिवाद्य मुनेः पादौ गन्तुमैच्छत् स पौरवः ।
देवी शकुन्तलासे ऐसा कहकर पौरवराजकुमारने मुनिके चरणोंमें मस्तक झुकाकर महात्मा राजा दुष्पन्तके यहाँ जानेका विचार किया।
शकुन्तला च पितरमभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥
प्रदक्षिणीकृत्य तदा पितरं वाक्यमब्रवीत् ।
अज्ञानान्मे पिता चेति दुरुक्तं वापि चानृतम् ॥
अकार्यं वाप्यनिष्टं वा क्षन्तुमर्हसि काश्यप ।
शकुन्तलाने भी हाथ जोड़कर पिताको प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करके उस समय यह बात कही—‘भगवन्! काश्यप! आप मेरे पिता हैं, यह समझकर मैंने अज्ञानवश यदि कोई कठोर या असत्य बात कह दी हो अथवा न करनेयोग्य या अप्रिय कार्य कर डाला हो, तो उसे आप क्षमा कर देंगे’।
एवमुक्तो नतशिरा मुनिर्नोवाच किञ्चन ॥
मनुष्यभावात् कण्वोऽपि मुनिरश्रूण्यवर्तयत् ।
शकुन्तलाके ऐसा कहनेपर सिर झुकाकर बैठे हुए कण्व मुनि कुछ बोल न सके; मानव-स्वभावके अनुसार करुणाका उदय हो जानेसे नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे।
अब्भक्षान् वायुभक्षांश्च शीर्णपर्णाशनान् मुनीन् ॥
फलमूलाशनो दान्तान् कृशान् धमनिसंततान् ।
व्रतिनो जटिलान् मुण्डान् वल्कलाजिनसंवृतान् ॥
उनके आश्रममें बहुत-से ऐसे मुनि रहते थे, जो जल पीकर, वायु पीकर अथवा सूखे पत्ते खाकर तपस्या करते थे। फल-मूल खाकर रहनेवाले भी बहुत थे। वे सब-के-सब जितेन्द्रिय एवं दुर्बल शरीरवाले थे। उनके शरीरकी नस-नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं। उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले उन महर्षियोंमेंसे कितने ही सिरपर जटा धारण करते थे
और कितने ही सिर मुड़ाये रहते थे। कोई वल्कल धारण करते थे और कोई मृगचर्म लपेटे रहते थे।
समाहूय मुनीन् कण्वः कारुण्यादिदमब्रवीत् ॥
मया तु लालिता नित्यं मम पुत्री यशस्विनी ।
वने जाता विवृद्धा च न च जानाति किञ्चन ॥
अश्रमेण पथा सर्वैर्नीयतां क्षत्रियालयम् ।)
महर्षि कण्वने उन मुनियोंको बुलाकर करुण भावसे कहा—'महर्षियो! यह मेरी यशस्विनी पुत्री वनमें उत्पन्न हुई और यहीं पलकर इतनी बड़ी हुई है। मैंने सदा इसे लाड़-प्यार किया है। यह कुछ नहीं जानती है। विप्रगण! तुम सब लोग इसे ऐसे मार्गसे राजा दुष्यन्तके घर ले जाओ जिसमें अधिक श्रम न हो'।
तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे प्रतिष्ठन्त महौजसः ।
शकुन्तलां पुरस्कृत्य दुष्यन्तस्य पुरं प्रति ॥ १३ ॥
'बहुत अच्छा' कहकर वे सभी महातेजस्वी शिष्य (पुत्रसहित) शकुन्तलाको आगे करके दुष्यन्तके नगरकी ओर चले ॥ १३ ॥
गृहीत्वामरगर्भाभं पुत्रं कमललोचनम् ।
आजगाम ततः सुभूर्दुष्यन्तं विदिताद् वनात् ॥ १४ ॥
तदनन्तर सुन्दर भौंहोंवाली शकुन्तला कमलके समान नेत्रोंवाले देवबालकके सदृश तेजस्वी पुत्रको साथ ले अपने परिचित तपोवनसे चलकर महाराज दुष्यन्तके यहाँ आयी ॥ १४ ॥
अभिसृत्य च राजानं विदिता च प्रवेशिता ।
सह तेनैव पुत्रेण बालार्कसमतेजसा ॥ १५ ॥
राजाके यहाँ पहुँचकर अपने आगमनकी सूचना दे अनुमति लेकर वह उसी बालसूर्यके समान तेजस्वी पुत्रके साथ राजसभामें प्रविष्ट हुई ॥ १५ ॥
निवेदयित्वा ते सर्वे आश्रमं पुनरागताः ।
पूजयित्वा यथान्यायम्ब्रवीच्च शकुन्तला ॥ १६ ॥
सब शिष्यगण राजाको महर्षिका संदेश सुनाकर पुनः आश्रमको लौट आये और शकुन्तला न्यायपूर्वक महाराजके प्रति सम्मानका भाव प्रकट करती हुई पुत्रसे बोली— ॥ १६ ॥
(अभिवादय राजानं पितरं ते दृढव्रतम् ।
एवमुक्त्वा तु पुत्रं सा लज्जानतमुखी स्थिता ॥
स्तम्भमालिङ्ग्य राजानं प्रसीदस्वेत्युवाच सा ।
शाकुन्तलोऽपि राजानमभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥
हर्षेणोत्फुल्लनयनो राजानं चान्ववैक्षत ।
दुष्यन्तो धर्मबुद्ध्या तु चिन्तयन्नेव सोऽब्रवीत् ।।
'बेटा! दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ये महाराज तुम्हारे पिता हैं; इन्हें प्रणाम करो।' पुत्रसे ऐसा कहकर शकुन्तला लज्जासे मुख नीचा किये एक खंभेका सहारा लेकर खड़ी हो गयी और महाराजसे बोली—'देव! प्रसन्न हों।' शकुन्तलाका पुत्र भी हाथ जोड़कर राजाको प्रणाम करके उन्हींकी ओर देखने लगा। उसके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे। राजा दुष्यन्तने उस समय धर्मबुद्धिसे कुछ विचार करते हुए ही कहा।
दुष्यन्त उवाच
किमागमनकार्यं ते ब्रूहि त्वं वरवर्णिनि ।
करिष्यामि न संदेहः सपुत्राया विशेषतः ।।
**दुष्यन्त बोले—**सुन्दरि! यहाँ तुम्हारे आगमनका क्या उद्देश्य है? बताओ। विशेषतः उस दशामें, जबकि तुम पुत्रके साथ आयी हो, मैं तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध करूँगा; इसमें संदेह नहीं।
शकुन्तलोवाच
प्रसीदस्व महाराज वक्ष्यामि पुरुषोत्तम ।।)
**शकुन्तलाने कहा—**महाराज! आप प्रसन्न हों। पुरुषोत्तम! मैं अपने आगमनका उद्देश्य बताती हूँ, सुनिये।
अयं पुत्रस्त्वया राजन् यौवराज्येऽभिषिच्यताम् ।
त्वया ह्ययं सुतो राजन् मय्युत्पन्नः सुरोपमः ।
यथासमयमेतस्मिन् वर्तस्व पुरुषोत्तम ।। १७ ।।
राजन्! यह आपका पुत्र है। इसे आप युवराज-पदपर अभिषिक्त कीजिये। महाराज! यह देवोपम कुमार आपके द्वारा मेरे गर्भसे उत्पन्न हुआ है। पुरुषोत्तम! इसके लिये आपने मेरे साथ जो शर्त कर रखी है, उसका पालन कीजिये ।। १७ ।।
यथा मत्सङ्गमे पूर्वं यः कृतः समयस्त्वया ।
तं स्मरस्व महाभाग कण्वाश्रमपदं प्रति ।। १८ ।।
महाभाग! आपने कण्वके आश्रमपर मेरे साथ समागमके समय पहले जो प्रतिज्ञा की थी, उसका इस समय स्मरण कीजिये ।। १८ ।।
सोऽथ श्रुत्वैव तद् वाक्यं तस्या राजा स्मरन्नपि ।
अब्रवीन्न स्मरामीति कस्य त्वं दुष्टतापसि ।। १९ ।।
राजा दुष्यन्तने शकुन्तलाका यह वचन सुनकर सब बातोंको याद रखते हुए भी उससे इस प्रकार कहा—'दुष्ट तपस्विनि! मुझे कुछ भी याद नहीं है। तुम किसकी स्त्री हो? ।। १९ ।।
धर्मकामार्थसम्बन्धं न स्मरामि त्वया सह ।
गच्छ वा तिष्ठ वा कामं यद् वापीच्छसि तत् कुरु ॥ २० ॥ 'तुम्हारे साथ मेरा धर्म, काम अथवा अर्थको लेकर वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हुआ है, इस बातका मुझे तनिक भी स्मरण नहीं है। तुम इच्छानुसार जाओ या रहो अथवा जैसी तुम्हारी रुचि हो, वैसा करो' ॥ २० ॥
सैवमुक्ता वरारोहा व्रीडितेव तपस्विनी ।
निःसंज्ञेव च दुःखेन तस्थौ स्थूणेव निश्चला ॥ २१ ॥
सुन्दर अंगवाली तपस्विनी शकुन्तला दुष्यन्तके ऐसा कहनेपर लज्जित हो दुःखसे बेहोश-सी हो गयी और खंभेकी तरह निश्चलभावसे खड़ी रह गयी ॥ २१ ॥
संरम्भामर्षताम्राक्षी स्फुरमाणौष्ठसम्पुटा ।
कटाक्षैर्निर्दहन्तीव तिर्यग् राजानमैक्षत ॥ २२ ॥
क्रोध और अमर्षसे उसकी आँखें लाल हो गयीं, ओठ फड़कने लगे और मानो जला देगी, इस भावसे टेढ़ी चितवनद्वारा राजाकी ओर देखने लगी ॥ २२ ॥
आकारं गूहमाना च मन्युना च समीरिता ।
तपसा सम्भृतं तेजो धारयामास वै तदा ॥ २३ ॥
क्रोध उसे उत्तेजित कर रहा था, फिर भी उसने अपने आकारको छिपाये रखा और तपस्याद्वारा संचित किये हुए अपने तेजको वह अपने भीतर ही धारण किये रही ॥ २३ ॥
सा मुहूर्तमिव ध्यात्वा दुःखामर्षसमन्विता ।
भर्तारमभिसम्प्रेक्ष्य क्रुद्धा वचनमब्रवीत् ॥ २४ ॥
जानन्नपि महाराज कस्मादेवं प्रभाषसे ।
न जानामीति निःशङ्कं यथान्यः प्राकृतो जनः ॥ २५ ॥
वह दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार-सा करती रही, फिर दुःख और अमर्षमें भरकर पतिकी ओर देखती हुई क्रोधपूर्वक बोली—'महाराज! आप जान-बूझकर भी दूसरे-दूसरे निम्न कोटिके मनुष्योंकी भाँति निःशंक होकर ऐसी बात क्यों कहते हैं कि 'मैं नहीं जानता' ॥ २४-२५ ॥
अत्र ते हृदयं वेद सत्यस्यैवानृतस्य च ।
कल्याणं वद साक्ष्येण माऽऽत्मानमवमन्यथाः ॥ २६ ॥
'इस विषयमें यहाँ क्या झूठ है और क्या सच, इस बातको आपका हृदय ही जानता होगा। उसीको साक्षी बनाकर—हृदयपर हाथ रखकर सही-सही बात कहिये, जिससे आपका कल्याण हो। आप अपने आत्माकी अवहेलना न कीजिये ॥ २६ ॥
योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते ।
किं तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणा ॥ २७ ॥
'(आपका स्वरूप तो कुछ और है' परंतु आप बन कुछ और रहे हैं।) जो अपने असली स्वरूपको छिपाकर अपनेको कुछ-का-कुछ दिखाता है, अपने आत्माका अपहरण