महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पुरुषार्थोंका सेवन इस प्रकार करना चाहिये कि तीनों एक-दूसरेके बाधक न हों अर्थात् जीवनमें तीनोंका सामंजस्य ही सुखदायक है।) ।। ६९ ।। धर्मं विचरतः पीडा सापि द्वाभ्यां नियच्छति । अर्थं चाप्यर्थलुब्धस्य कामं चातिप्रवर्तिनः ।। ७० ।। धर्मका अनुष्ठान करनेवाले धर्मात्मा पुरुषके धर्ममें काम और अर्थ—इन दोनोंके द्वारा प्राप्त होनेवाली पीड़ा बाधा पहुँचाती है। इसी प्रकार अर्थलोभीके अर्थमें और अत्यन्त भोगासक्तके काममें भी शेष दो वर्गोंद्वारा प्राप्त होनेवाली पीड़ा बाधा उपस्थित करती है ।। ७० ।। अगर्वितात्मा युक्तश्च सान्त्वयुक्तोऽनसूयिता । अवेक्षितार्थः शुद्धात्मा मन्त्रयीत द्विजैः सह ।। ७१ ।। राजा अपने हृदयसे अहंकारको निकाल दे। चित्तको एकाग्र रखे। सबसे मधुर बोले। दूसरोंके दोष प्रकाशित न करे। सब विषयोंपर दृष्टि रखे और शुद्धचित्त हो द्विजोंके साथ बैठकर मन्त्रणा करे ।। ७१ ।। कर्मणा येन केनैव मृदुना दारुणेन च । उद्धरेद् दीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ।। ७२ ।। राजा यदि संकटमें हो तो कोमल या भयंकर—जिस किसी भी कर्मके द्वारा उस दुरवस्थासे अपना उद्धार करे; फिर समर्थ होनेपर धर्मका आचरण करे ।। ७२ ।। न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति । संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यति ।। ७३ ।। कष्ट सहे बिना मनुष्य कल्याणका दर्शन नहीं करता। प्राण-संकटमें पड़कर यदि वह पुनः जीवित रह जाता है तो अपना भला देखता है ।। ७३ ।। यस्य बुद्धिः परिभवेत् तमतीतेन सान्त्वयेत् । अनागतेन दुर्बुद्धिं प्रत्युत्पन्नेन पण्डितम् ।। ७४ ।। जिसकी बुद्धि संकटमें पड़कर शोकाभिभूत हो जाय, उसे भूतकालकी बातें (राजा नल तथा श्रीरामचन्द्रजी आदिके जीवनका वृत्तान्त) सुनाकर सान्त्वना दे। जिसकी बुद्धि अच्छी नहीं है, उसे भविष्यमें लाभकी आशा दिलाकर तथा विद्वान् पुरुषको तत्काल ही धन आदि देकर शान्त करे ।। ७४ ।। योऽरिणा सह संधाय शयीत कृतकृत्यवत् । स वृक्षाग्रे यथा सुप्तः पतितः प्रतिबुध्यते ।। ७५ ।। जैसे वृक्षके ऊपरकी शाखापर सोया हुआ पुरुष जब गिरता है, तब होशमें आता है उसी प्रकार जो अपने शत्रुके साथ संधि करके कृतकृत्यकी भाँति सोता (निश्चिन्त हो जाता) है, वह शत्रुसे धोखा खानेपर सचेत होता है ।। ७५ ।। मन्त्रसंवरणे यत्नः सदा कार्योऽनसूयता ।
आकारमभिरक्षेत चारेणाप्यनुपालितः ॥ ७६ ॥
राजाको चाहिये कि वह दूसरोंके दोष प्रकाशित न करके अपनी गुप्त मन्त्रणाको सदा छिपाये रखनेकी चेष्टा करे। दूसरोंके गुप्तचरोंसे तो अपने आकारतकको (क्रोध और हर्ष आदिको सूचित करनेवाली चेष्टातकको) गुप्त रखे; परंतु अपने गुप्तचरसे भी सदा अपनी गुप्त मन्त्रणाकी रक्षा करे ॥ ७६ ॥
नाच्छित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दारुणम् ।
नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम् ॥ ७७ ॥
राजा मछलीमारोंकी भाँति दूसरोंके मर्म विदीर्ण किये बिना, अत्यन्त क्रूर कर्म किये बिना तथा बहुतोंके प्राण लिये बिना बड़ी भारी सम्पत्ति नहीं पाता ॥ ७७ ॥
कर्शितं व्याधितं क्लिन्नमपानीयमघासकम् ।
परिविश्वस्तमन्दं च प्रहर्तव्यमरेर्बलम् ॥ ७८ ॥
जब शत्रु्की सेना दुर्बल, रोगग्रस्त, जल या कीचड़में फँसी, भूख-प्याससे पीड़ित और सब ओरसे विश्वस्त होकर निश्चेष्ट पड़ी हो, उस समय उसपर प्रहार करना चाहिये ॥ ७८ ॥
नार्थिकोऽर्थिनमभ्येति कृतार्थे नास्ति संगतम् ।
तस्मात् सर्वाणि साध्यानि सावशेषाणि कारयेत् ॥ ७९ ॥
धनवान् मनुष्य किसी धनीके पास नहीं जाता। जिसके सब काम पूरे हो चुके हैं, वह किसीके साथ मैत्री निभानेकी चेष्टा नहीं करता; अतः अपनेद्वारा सिद्ध होनेवाले दूसरोंके कार्य ही अधूरे रख दे (जिससे अपने कार्यके लिये उनका आना-जाना बना रहे) ॥ ७९ ॥
संग्रहे विग्रहे चैव यत्नः कार्योंऽनसूयता ।
उत्साहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता ॥ ८० ॥
ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले राजाको दूसरोंके दोष न बताकर सदा आवश्यक सामग्रीके संग्रह और शत्रुओंके साथ विग्रह (युद्ध) करनेका प्रयत्न करते रहना चाहिये; साथ ही यत्नपूर्वक अपने उत्साहको बनाये रखना चाहिये ॥ ८० ॥
नास्य कृत्यानि बुध्येरन् मित्राणि रिपवस्तथा ।
आरब्धान्येव पश्येरन् सुपर्यवसितान्यपि ॥ ८१ ॥
मित्र और शत्रु—किसीको भी यह पता न चले कि राजा कब क्या करना चाहता है। कार्यके आरम्भ अथवा समाप्त हो जानेपर ही (सब) लोग उसे देखें ॥ ८१ ॥
भीतवत् संविधातव्यं यावद् भयमानागतम् ।
आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमभीतवत् ॥ ८२ ॥
जबतक अपने ऊपर भय आया न हो, तबतक डरे हुएकी भाँति उसको टालनेका प्रयत्न करना चाहिये; परंतु जब भयको सामने आया देखे, तब निडर होकर शत्रुपर प्रहार करना चाहिये ॥ ८२ ॥
दण्डेनोपनतं शत्रुमनुगृह्णाति यो नरः ।
स मृत्युमुपगृह्णीयाद् गर्भमश्वतरी यथा ॥ ८३ ॥
जो मनुष्य दण्डके द्वारा वशमें किये हुए शत्रुपर दया करता है, वह मौतको ही अपनाता है—ठीक उसी तरह जैसे खच्चरी गर्भके रूपमें अपनी मृत्युको ही उदरमें धारण करती है ॥ ८३ ॥
अनागतं हि बुध्येत यच्च कार्यं पुरः स्थितम् ।
न तु बुद्धिक्षयात् किंचिदतिक्रामेत् प्रयोजनम् ॥ ८४ ॥
जो कार्य भविष्यमें करना हो, उसपर बुद्धिसे विचार करे और विचारनेके पश्चात् तदनुकूल व्यवस्था करे। इसी प्रकार जो कार्य सामने उपस्थित हो, उसे भी बुद्धिसे विचारकर ही करे। बुद्धिसे निश्चय किये बिना किसी भी कार्य या उद्देश्यका परित्याग न करे ॥ ८४ ॥
उत्साहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता ।
विभज्य देशकालौ च दैवं धर्मादयस्त्रयः ।
नैःश्रेयसौ तु तौ ज्ञेयौ देशकालाविति स्थितिः ॥ ८५ ॥
ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले राजाको देश और कालका विभाग करके ही यत्नपूर्वक उत्साह एवं उद्यम करना चाहिये। इसी प्रकार देश-कालके विभाग-पूर्वक ही प्रारब्धकर्म तथा धर्म, अर्थ और कामका सेवन करना चाहिये। देश और कालको ही मंगलके प्रधान हेतु समझना चाहिये। यही नीतिशास्त्रका सिद्धान्त है ॥ ८५ ॥
तालवत् कुरुते मूलं बालः शत्रुरुपेक्षितः ।
गहनेऽग्निरिवोत्सृष्टः क्षिप्रं संजायते महान् ॥ ८६ ॥
छोटे शत्रुborder... छोटे शत्रु की भी उपेक्षा कर दी जाय, तो वह ताड़के वृक्षकी भाँति जड़ जमा लेता है और घने वनमें छोड़ी हुई आगकी भाँति शीघ्र ही महान् विनाशकारी बन जाता है ॥ ८६ ॥
अग्निं स्तोकमिवात्मानं संधुक्षयति यो नरः ।
स वर्धमानो ग्रसते महान्तमपि संचयम् ॥ ८७ ॥
जो मनुष्य थोड़ी-सी अग्निकी भाँति अपने-आपको (सहायक सामग्रियोंद्वारा धीरे-धीरे) प्रज्वलित या समृद्ध करता रहता है, वह एक दिन बहुत बड़ा होकर शत्रुरूपी ईंधनकी बहुत बड़ी राशिको भी अपना ग्रास बना लेता है ॥ ८७ ॥
आशां कालवतीं कुर्यात् कालं विघ्नेन योजयेत् ।
विघ्नं निमित्ततो ब्रूयान्निमित्तं वापि हेतुतः ॥ ८८ ॥
यदि किसीको किसी बातकी आशा दे तो उसे शीघ्र पूरी न करके दीर्घकालतक लटकाये रखे। जब उसे पूर्ण करनेका समय आये, तब उसमें कोई विघ्न डाल दे और इस प्रकार समयकी अवधिको बढ़ा दे। उस विघ्नके पड़नेमें कोई उपयुक्त कारण बता दे और उस कारणको भी युक्तियोंसे सिद्ध कर दे ॥ ८८ ॥
क्षुरो भूत्वा हरेत् प्राणान् निशितः कालसाधनः ।
प्रतिच्छन्नो लोमहारी द्विषतां परिकर्तनः ॥ ८९ ॥
लोहेका बना हुआ छूरा शानपर चढ़ाकर तेज किया जाता है और चमड़ेके सम्पुटमें छिपाकर रखा जाता है तो वह समय आनेपर (सिर आदि अंगोंके समस्त) बालोंको काट देता है। उसी प्रकार राजा अनुकूल अवसरकी अपेक्षा रखकर अपने मनोभावको छिपाये हुए अनुकूल साधनोंका संग्रह करता रहे और छूरेकी तरह तीक्ष्ण या निर्दय होकर शत्रुओंके प्राण ले ले—उनका मूलोच्छेद कर डाले ॥ ८९ ॥
पाण्डवेषु यथान्यायमन्येषु च कुरूद्वह ।
वर्तमानो न मज्जेस्त्वं तथा कृत्यं समाचर ॥ ९० ॥
सर्वकल्याणसम्पन्नो विशिष्ट इति निश्चयः ।
तस्मात् त्वं पाण्डुपुत्रेभ्यो रक्षात्मानं नराधिप ॥ ९१ ॥
कुरुश्रेष्ठ! आप भी इसी नीतिका अनुसरण करके पाण्डवों तथा दूसरे लोगोंके साथ यथोचित बर्ताव करते रहें। परंतु ऐसा कार्य करें, जिससे स्वयं संकटके समुद्रमें डूब न जायें। आप समस्त कल्याणकारी साधनोंसे सम्पन्न और सबसे श्रेष्ठ हैं, यही सबका निश्चय है; अतः नरेश्वर! आप पाण्डुके पुत्रोंसे अपनी रक्षा कीजिये ॥ ९०-९१ ॥
भ्रातृव्या बलिनो यस्मात् पाण्डुपुत्रा नराधिप ।
पश्चात्तापो यथा न स्यात् तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ ९२ ॥
राजन्! आपके भतीजे पाण्डव बहुत बलवान् हैं; अतः ऐसी नीति काममें लाइये, जिससे आगे चलकर आपको पछताना न पड़े ॥ ९२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा सम्प्रतस्थे कणिकः स्वगृहं ततः ।
धृतराष्ट्रोऽपि कौरव्यः शोकार्तः समपद्यत ॥ ९३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! यों कहकर कणिक अपने घरको चले गये। इधर कुरुवंशी धृतराष्ट्र शोकसे व्याकुल हो गये ॥ ९३ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कणिकवाक्ये
एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें कणिकवाक्यविषयक एक सौ उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३९ ॥
१. तीन प्रकारकी शक्तियाँ ही यहाँ त्रिवर्ग कही गयी हैं। उनके नाम ये हैं—प्रभुशक्ति (ऐश्वर्यशक्ति), उत्साहशक्ति और मन्त्रशक्ति। दुर्ग आदिपर आक्रमण करके शत्रुंकी ऐश्वर्यशक्तिका नाश करे। विश्वसनीय व्यक्तियोंद्वारा अपने उत्कर्षका वर्णन कराकर शत्रुको तेजोहीन बनाना, उसके उत्साह एवं साहसको घटा देना ही उत्साहशक्तिका नाश करना है। गुप्तचरोंद्वारा उनकी गुप्त मन्त्रणाको प्रकट कर देना ही मन्त्रशक्तिका नाश करना है।
२. अमात्य, राष्ट्र, दुर्ग, कोष और सेना—ये पाँच प्रकृतियाँ ही पंचवर्ग हैं।
३. साम, दान, भेद, दण्ड, उद्बन्धन, विषप्रयोग और आग लगाना—शत्रुको वशमें करने या दबानेके ये सात साधन ही सप्तवर्ग हैं।
* इन बाधाओंको श्लोक ७० में स्पष्ट किया गया है।
(जतुगृहपर्व)
(जतुगृहपर्व)
चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंके प्रति पुरवासियोंका अनुराग देखकर दुर्योधनकी चिन्ता
वैशम्पायन उवाच
ततः सुबलपुत्रस्तु राजा दुर्योधनश्च ह ।
दुःशासनश्च कर्णश्च दुष्टं मन्त्रममन्त्रयन् ॥ १ ॥
ते कौरव्यमनुज्ञाप्य धृतराष्ट्रं नराधिपम् ।
दहने तु सपुत्रायाः कुन्त्या बुद्धिमकारयन् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर सुबलपुत्र शकुनि, राजा दुर्योधन, दुःशासन और कर्णने (आपसमें) एक दुष्टतापूर्ण गुप्त सलाह की। उन्होंने कुरुनन्दन महाराज धृतराष्ट्रसे आज्ञा लेकर पुत्रोंसहित कुन्तीको आगमें जला डालनेका विचार किया ॥ १-२ ॥
तेषामिङ्गितभावज्ञो विदुरस्तत्त्वदर्शिवान् ।
आकारेण च तं मन्त्रं बुबुधे दुष्टचेतसाम् ॥ ३ ॥
तत्त्वज्ञानी विदुर उनकी चेष्टाओंसे उनके मनका भाव समझ गये और उनकी आकृतिसे ही उन दुष्टोंकी गुप्त मन्त्रणाका भी उन्होंने पता लगा लिया ॥ ३ ॥
ततो विदितवेद्यात्मा पाण्डवानां हिते रतः ।
पलायने मतिं चक्रे कुन्त्याः पुत्रैः सहानघः ॥ ४ ॥
विदुरजीने मन-ही-मन जाननेयोग्य सभी बातें जान लीं। वे सदा पाण्डवोंके हितमें संलग्न रहते थे, अतः निष्पाप विदुरने यही निश्चय किया कि कुन्ती अपने पुत्रोंके साथ यहाँसे भाग जाय ॥ ४ ॥
ततो वातसहां नावं यन्त्रयुक्तां पताकिनीम् ।
ऊर्मिक्षमां दृढां कृत्वा कुन्तीमिदमुवाच ह ॥ ५ ॥
उन्होंने एक सुदृढ़ नाव बनवायी, जिसे चलानेके लिये उसमें यन्त्र* लगाया गया था। वह वायुके वेग और लहरोंके थपेड़ोंका सामना करनेमें समर्थ थी। उसमें झंडियाँ और पताकाएँ फहरा रही थीं। उस नावको तैयार कराके विदुरजीने कुन्तीसे कहा— ॥ ५ ॥
एष जातः कुलस्यास्य कीर्तिवंशप्रणाशनः । धृतराष्ट्रः परीतात्मा धर्मं त्यजति शाश्वतम् ॥ ६ ॥ इयं वारिपथे युक्ता तरङ्गपवनक्षमा । नौरया मृत्युपाशात् त्वं सपुत्रा मोक्ष्यसे शुभे ॥ ७ ॥ ‘देवि! राजा धृतराष्ट्र इस कुरुकुलकी कीर्ति एवं वंशपरम्पराका नाश करनेवाले पैदा हुए हैं। इनका चित्त पुत्रोंके प्रति ममतासे व्याप्त हुआ है, इसलिये ये सनातन धर्मका त्याग कर रहे हैं। शुभे! जलके मार्गमें यह नाव तैयार है, जो हवा और लहरोंके वेगको भलीभाँति सह सकती है। इसीके द्वारा (कहीं अन्यत्र जाकर) तुम पुत्रोंसहित मौतकी फाँसीसे छूट सकोगी’ ॥ ६-७ ॥
तच्छ्रुत्वा व्यथिता कुन्ती पुत्रैः सह यशस्विनी । नावमारुह्य गङ्गायां प्रययौ भरतर्षभ ॥ ८ ॥ भरतश्रेष्ठ! यह बात सुनकर यशस्विनी कुन्तीको बड़ी व्यथा हुई। वे पुत्रोंसहित (वारणावतके लाक्षागृहसे बचकर) नावपर जा चढ़ीं और गङ्गाजीकी धारापर यात्रा करने लगीं ॥ ८ ॥
ततो विदुरवाक्येन नावं विक्षिप्य पाण्डवाः । धनं चादाय तैर्दत्तमरिष्टं प्राविशन् वनम् ॥ ९ ॥ तदनन्तर विदुरजीके कहनेसे पाण्डवोंने नावको वहीं डुबा दिया और उन कौरवोंके दिये हुए धनको लेकर विघ्न-बाधाओंसे रहित वनमें प्रवेश किया ॥ ९ ॥
निषादी पञ्चपुत्रा तु जातुषे तत्र वेश्मनि । कारणाभ्यागता दग्धा सह पुत्रैरनागसा ॥ १० ॥ वारणावतके उस लाक्षागृहमें निषाद जातिकी एक स्त्री किसी कारणवश अपने पाँच पुत्रोंके साथ आकर ठहर गयी थी। वह बेचारी निरपराध होनेपर भी उसमें पुत्रोंसहित जलकर भस्म हो गयी ॥ १० ॥
स च म्लेच्छाधमः पापो दग्धस्तत्र पुरोचनः । वञ्चिताश्च दुरात्मानो धार्तराष्ट्राः सहानुगाः ॥ ११ ॥ म्लेच्छोंमें (भी) नीच पापी पुरोचन भी उसी घरमें जल मरा और धृतराष्ट्रके दुरात्मा पुत्र अपने सेवकोंसहित धोखा खा गये ॥ ११ ॥
अविज्ञाता महात्मानो जनानामक्षतास्तथा । जनन्या सह कौन्तेया मुक्ता विदुरमन्त्रिताः ॥ १२ ॥ विदुरकी सलाहके अनुसार काम करनेवाले महात्मा कुन्तीपुत्र अपनी माताके साथ मृत्युसे बच गये। उन्हें किसी प्रकारकी क्षति नहीं पहुँची। साधारण लोगोंको उनके जीवित रहनेकी बात ज्ञात न हो सकी ॥ १२ ॥
ततस्तस्मिन् पुरे लोका नगरे वारणावते ।
दृष्ट्वा जतुगृहं दग्धमन्वशोचन्त दुःखिताः ॥ १३ ॥
तदनन्तर वारणावत नगरमें वहाँके लोगोंने लाक्षागृहको दग्ध हुआ देख (अत्यन्त) दुःखी हो पाण्डवोंके लिये (बड़ा) शोक किया ॥ १३ ॥
राज्ञे च प्रेषयामासुर्यथावृत्तं निवेदितुम् ।
संवृत्तस्ते महान् कामः पाण्डवान् दग्धवानसि ॥ १४ ॥
सकामो भव कौरव्य भुङ्क्ष्व राज्यं सपुत्रकः ।
तच्छ्रुत्वा धृतराष्ट्रस्तु सह पुत्रेण शोचयन् ॥ १५ ॥
तथा राजा धृतराष्ट्रके पास यथावत् समाचार कहनेके लिये किसीको भेजकर कहलाया—‘कुरुनन्दन! तुम्हारा महान् मनोरथ पूरा हो गया। पाण्डवोंको तुमने जला दिया। अब तुम कृतार्थ हो जाओ और पुत्रोंके साथ राज्य भोगो।’ यह सुनकर पुत्रसहित धृतराष्ट्र शोकमग्न हो गये ॥ १४-१५ ॥
प्रेतकार्याणि च तथा चकार सह बान्धवैः ।
पाण्डवानां तथा क्षत्ता भीष्मश्च कुरुसत्तमः ॥ १६ ॥
उन्होंने, विदुरजीने तथा कुरुकुलशिरोमणि भीष्मजीने भी भाई-बन्धुओंके साथ (पुत्तल-विधिसे) पाण्डवोंके प्रेतकार्य (दाह और श्राद्ध आदि) सम्पन्न किये ॥ १६ ॥
जनमेजय उवाच
पुनर्विस्तरशः श्रोतुमिच्छामि द्विजसत्तम ।
दाहं जतुगृहस्यैव पाण्डवानां च मोक्षणम् ॥ १७ ॥
**जनमेजय बोले—**विप्रवर! मैं लाक्षागृहके जलने और पाण्डवोंके उससे बच जानेका वृत्तान्त पुनः विस्तारसे सुनना चाहता हूँ ॥ १७ ॥
सुनृशंसमिदं कर्म तेषां क्रूरोपसंहितम् ।
कीर्तयस्व यथावृत्तं परं कौतूहलं मम ॥ १८ ॥
क्रूर कणिकके उपदेशसे किया हुआ कौरवोंका यह कर्म अत्यन्त निर्दयतापूर्ण था। आप उसका ठीक-ठीक वर्णन कीजिये। मुझे यह सब सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु विस्तरशो राजन् वदतो मे परंतप ।
दाहं जतुगृहस्यैतत् पाण्डवानां च मोक्षणम् ॥ १९ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! मैं लाक्षागृहके जलने और पाण्डवोंके उससे बच जानेका वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कहता हूँ, सुनो ॥ १९ ॥
प्राणाधिकं भीमसेनं कृतविद्यं धनंजयम् ।
दुर्योधनो लक्षयित्वा पर्यतप्यत दुर्मनाः ॥ २० ॥
भीमसेनको सबसे अधिक बलवान् और अर्जुनको अस्त्र-विद्यामें सबसे श्रेष्ठ देखकर दुर्योधन सदा संतप्त होता रहता था। उसके मनमें बड़ा दुःख था ।। २० ।। ततो वैकर्तनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः । अनेकैरभ्युपायैस्ते जिघांसन्ति स्म पाण्डवान् ।। २१ ।। तब सूर्यपुत्र कर्ण और सुबलकुमार शकुनि आदि अनेक उपायोंसे पाण्डवोंको मार डालनेकी इच्छा करने लगे ।। २१ ।। पाण्डवा अपि तत् सर्वं प्रतिचक्रुर्यथागतम् । उद्भावनमकुर्वन्तो विदुरस्य मते स्थिताः ।। २२ ।। पाण्डवोंने भी जब जैसा संकट आया, सबका निवारण किया और विदुरकी सलाह मानकर वे कौरवोंके षड्यन्त्रका कभी भंडाफोड़ नहीं करते थे ।। २२ ।। गुणैः समुदितान् दृष्ट्वा पौराः पाण्डुसुतांस्तदा । कथयांचक्रिरे तेषां गुणान् संसत्सु भारत ।। २३ ।। भारत! उन दिनों पाण्डवोंको सर्वगुणसम्पन्न देख नगरके निवासी भरी सभाओंमें उनके सद्गुणोंकी प्रशंसा करते थे ।। २३ ।। राज्यप्राप्तिं च सम्प्राप्तं ज्येष्ठं पाण्डुसुतं तदा । कथयन्ति स्म सम्भूय चत्वरेषु सभासु च ।। २४ ।। वे जहाँ कहीं चौराहोंपर और सभाओंमें इकट्ठे होते वहीं पाण्डुके ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिरको राज्यप्राप्तिके योग्य बताते थे ।। २४ ।। प्रज्ञाचक्षुरचक्षुष्ट्वाद धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । राज्यं न प्राप्तवान् पूर्वं स कथं नृपतिर्भवेत् ।। २५ ।। वे कहते, 'प्रज्ञाचक्षु महाराज धृतराष्ट्र नेत्रहीन होनेके कारण जब पहले ही राज्य न पा सके, तब (अब) वे कैसे राजा हो सकते हैं ।। २५ ।। तथा शांतनवो भीष्मः सत्यसंधो महाव्रतः । प्रत्याख्याय पुरा राज्यं न स जातु ग्रहीष्यति ।। २६ ।। 'महान् व्रतका पालन करनेवाले शांतनुनन्दन भीष्म तो सत्यप्रतिज्ञ हैं। वे पहले ही राज्य ठुकरा चुके हैं, अतः अब उसे कदापि ग्रहण न करेंगे ।। २६ ।। ते वयं पाण्डवज्येष्ठं तरुणं वृद्धशीलिनम् । अभिषिञ्चाम साध्वद्य सत्यकारुण्यवेदिनम् ।। २७ ।। 'पाण्डवोंके बड़े भाई युधिष्ठिर यद्यपि अभी तरुण हैं, तो भी उनका शील-स्वभाव वृद्धोंके समान है। वे सत्यवादी, दयालु और वेदवेत्ता हैं; अतः अब हमलोग उन्हींका विधिपूर्वक राज्याभिषेक करें ।। २७ ।। स हि भीष्मं शांतनवं धृतराष्ट्रं च धर्मवित् । सपुत्रं विविधैर्भोगैर्योजयिष्यति पूजयन् ।। २८ ।।
‘महाराज युधिष्ठिर बड़े धर्मज्ञ हैं। वे शांतनुनन्दन भीष्म तथा पुत्रोंसहित धृतराष्ट्रका आदर करते हुए उन्हें नाना प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न रखेंगे’ ॥ २८ ॥
तेषां दुर्योधनः श्रुत्वा तानि वाक्यानि जल्पताम् ।
युधिष्ठिरानुरक्तानां पर्यतप्यत दुर्मतिः ॥ २९ ॥
युधिष्ठिरमें अनुरक्त हो उपर्युक्त उद्गार प्रकट करनेवाले लोगोंकी बातें सुनकर खोटी बुद्धिवाला दुर्योधन भीतर-ही-भीतर जलने लगा ॥ २९ ॥
स तप्यमानो दुष्टात्मा तेषां वाचो न चक्षमे ।
ईर्ष्या चापि संतप्तो धृतराष्ट्रमुपागमत् ॥ ३० ॥
इस प्रकार संतप्त हुआ वह दुष्टात्मा लोगोंकी बातोंको सहन न कर सका। वह ईर्ष्याकी आगसे जलता हुआ धृतराष्ट्रके पास आया ॥ ३० ॥
ततो विरहितं दृष्ट्वा पितरं प्रतिपूज्य सः ।
पौरानुरागसंतप्तः पश्चादिदमभाषत ॥ ३१ ॥
वहाँ अपने पिताको अकेला पाकर पुरवासियोंके युधिष्ठिरविषयक अनुरागसे दुःखी हुए दुर्योधनने पहले पिताके प्रति आदर प्रदर्शित किया। तत्पश्चात् इस प्रकार कहा ॥ ३१ ॥
दुर्योधन उवाच
श्रुता मे जल्पतां तात पौराणामशिवा गिरः ।
त्वामनादृत्य भीष्मं च पतिमिच्छन्ति पाण्डवम् ॥ ३२ ॥
दुर्योधन बोला—‘पिताजी! मैंने परस्पर वार्तालाप करते हुए पुरवासियोंके मुखसे (बड़ी) अशुभ बातें सुनी हैं। वे आपका और भीष्मजीका अनादर करके पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको राजा बनाना चाहते हैं ॥ ३२ ॥
मतमेतच्च भीष्मस्य न स राज्यं बुभुक्षति ।
अस्माकं तु परां पीडां चिकीर्षन्ति पुरे जनाः ॥ ३३ ॥
भीष्मजी तो इस बातको मान लेंगे; क्योंकि वे स्वयं राज्य भोगना नहीं चाहते। परंतु नगरके लोग हमारे लिये बहुत बड़े कष्टका आयोजन करना चाहते हैं ॥ ३३ ॥
पितृतः प्राप्तवान् राज्यं पाण्डुरात्मगुणैः पुरा ।
त्वमन्धगुणसंयोगात् प्राप्तं राज्यं न लब्धवान् ॥ ३४ ॥
पाण्डुने अपने सद्गुणोंके कारण पितासे राज्य प्राप्त कर लिया और आप अंधे होनेके कारण अधिकारप्राप्त राज्यको भी नहीं पा सके ॥ ३४ ॥
स एष पाण्डोर्दायाद्यं यदि प्राप्नोति पाण्डवः ।
तस्य पुत्रो ध्रुवं प्राप्तस्तस्य तस्यापि चापरः ॥ ३५ ॥
यदि ये पाण्डुकुमार युधिष्ठिर पाण्डुके राज्यको, जिसका उत्तराधिकारी पुत्र ही होता है, प्राप्त कर लेते हैं तो निश्चय ही उनके बाद उनका पुत्र ही इस राज्यका अधिकारी होगा और
उसके बाद पुनः उसीकी पुत्रपरम्परामें दूसरे-दूसरे लोग इसके अधिकारी होते जायँगे ॥ ३५ ॥
ते वयं राजवंशेन हीनाः सह सुतैरपि । अवज्ञाता भविष्यामो लोकस्य जगतीपते ॥ ३६ ॥ महाराज! ऐसी दशामें हमलोग अपने पुत्रोंसहित राजपरम्परासे वंचित होनेके कारण सब लोगोंकी अव-हेलनाके पात्र बन जायँगे ॥ ३६ ॥ सततं निरयं प्राप्ताः परपिण्डोपजीविनः । न भवेम यथा राजंस्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ ३७ ॥ राजन्! आप कोई ऐसी नीति काममें लाइये, जिससे हमें दूसरोंके दिये हुए अन्नसे गुजारा करके सदा नरकतुल्य कष्ट न भोगना पड़े ॥ ३७ ॥ यदि त्वं हि पुरा राजन्निदं राज्यमवाप्तवान् । ध्रुवं प्राप्स्याम च वयं राज्यमप्यवशे जने ॥ ३८ ॥ राजन्! यदि पहले ही आपने यह राज्य पा लिया होता तो आज हम अवश्य ही इसे प्राप्त कर लेते; फिर तो लोगोंका कोई वश नहीं चलता ॥ ३८ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि दुर्योधनेर्ष्यायां चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें दुर्योधनकी ईर्ष्याविषयक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४० ॥
* इससे महाभारतकालमें यन्त्रयुक्त नौकाओं (जहाजों)-का निर्माण सूचित होता है।
१४१-
एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे पाण्डवोंको वारणावत भेज देनेका प्रस्ताव
वैशम्पायन उवाच
एवं श्रुत्वा तु पुत्रस्य प्रज्ञाचक्षुर्नराधिपः ।
कणिकस्य च वाक्यानि तानि श्रुत्वा स सर्वशः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रो द्विधाचित्तः शोकार्तः समपद्यत ।
दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिः सौबलस्तथा ॥ २ ॥
दुःशासनचतुर्थास्ते मन्त्रयामासुरेकतः ।
ततो दुर्योधनो राजा धृतराष्ट्रमभाषत ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! अपने पुत्रकी यह बात सुनकर तथा कणिकके उन वचनोंका स्मरण करके प्रज्ञाचक्षु महाराज धृतराष्ट्रका चित्त सब प्रकारसे दुविधामें पड़ गया। वे शोकसे आतुर हो गये। दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि तथा चौथे दुःशासन इन सबने एक जगह बैठकर सलाह की; फिर राजा दुर्योधनने धृतराष्ट्रसे कहा— ॥ १—३ ॥
पाण्डवेभ्यो भयं न स्यात् तान् विवासयतां भवान् ।
निपुणेनाभ्युपायेन नगरं वारणावतम् ॥ ४ ॥
‘पिताजी! हमें पाण्डवोंसे भय न हो, इसलिये आप किसी उत्तम उपायसे उन्हें यहाँसे हटाकर वारणावत नगरमें भेज दीजिये’ ॥ ४ ॥
धृतराष्ट्रस्तु पुत्रेण श्रुत्वा वचनमीरितम् ।
मुहूर्तमिव संचिन्त्य दुर्योधनमथाब्रवीत् ॥ ५ ॥
अपने पुत्रकी कही हुई यह बात सुनकर धृतराष्ट्र दो घड़ीतक भारी चिन्तामें पड़े रहे; फिर दुर्योधनसे बोले ॥ ५ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मनित्यः सदा पाण्डुस्तथा धर्मपरायणः ।
सर्वेषु ज्ञातिषु तथा मयि त्वासीद् विशेषतः ॥ ६ ॥
धृतराष्ट्रने कहा— बेटा! पाण्डु अपने जीवनभर धर्मको ही नित्य मानकर सम्पूर्ण ज्ञातिजनोंके साथ धर्मानुकूल व्यवहार ही करते थे; मेरे प्रति तो विशेषरूपसे ॥ ६ ॥
नासौ किंचिद् विजानाति भोजनादि चिकीर्षितम् ।
निवेदयति नित्यं हि मम राज्यं धृतव्रतः ॥ ७ ॥
वे इतने भोले-भाले थे कि अपने स्नान-भोजन आदि अभीष्ट कर्तव्योंके सम्बन्धमें भी कुछ नहीं जानते थे। वे उत्तम व्रतका पालन करते हुए प्रतिदिन मुझसे यही कहते थे कि 'यह राज्य तो आपका ही है' ॥ ७ ॥ तस्य पुत्रो यथा पाण्डुस्तथा धर्मपरायणः । गुणवाँल्लोकविख्यातः पौरवाणां सुसम्मतः ॥ ८ ॥ उनके पुत्र युधिष्ठिर भी वैसे ही धर्मपरायण हैं, जैसे स्वयं पाण्डु थे। वे उत्तम गुणोंसे सम्पन्न, सम्पूर्ण जगत्में विख्यात तथा पूरुवंशियोंके अत्यन्त प्रिय हैं ॥ ८ ॥ स कथं शक्यतेऽस्माभिरपाकर्तुं बलादितः । पितृपैतामहाद् राज्यात् ससहायो विशेषतः ॥ ९ ॥ फिर उन्हें उनके बाप-दादोंके राज्यसे बलपूर्वक कैसे हटाया जा सकता है? विशेषतः ऐसे समयमें, जब कि उनके सहायक अधिक हैं ॥ ९ ॥ भृता हि पाण्डुनामात्या बलं च सततं भृतम् । भृताः पुत्राश्च पौत्राश्च तेषामपि विशेषतः ॥ १० ॥ पाण्डुने सभी मन्त्रियों तथा सैनिकोंका सदा पालन-पोषण किया था। उनका ही नहीं, उनके पुत्र-पौत्रोंके भी भरण-पोषणका विशेष ध्यान रखा था ॥ १० ॥ ते पुरा सत्कृतास्तात पाण्डुना नागरा जनाः । कथं युधिष्ठिरस्यार्थे न नो हन्युः सबान्धवान् ॥ ११ ॥ तात! पाण्डुने पहले नागरिकोंके साथ बड़ा ही सद्भावपूर्ण व्यवहार किया है। अब वे विद्रोही होकर युधिष्ठिरके हितके लिये भाई-बन्धुओंके साथ हम सब लोगोंकी हत्या क्यों न कर डालेंगे? ॥ ११ ॥
दुर्योधन उवाच
एवमेतन्मया तात भावितं दोषमात्मनि । दृष्ट्वा प्रकृतयः सर्वा अर्थमानेन पूजिताः ॥ १२ ॥ **दुर्योधन बोला—**पिताजी! मैंने भी अपने हृदयमें इस दोष (प्रजाके विरोधी होने)-की सम्भावना की थी और इसीपर दृष्टि रखकर पहले ही अर्थ और सम्मानके द्वारा समस्त प्रजाका आदर-सत्कार किया है ॥ १२ ॥ ध्रुवमस्मत्सहायास्ते भविष्यन्ति प्रधानतः । अर्थवर्गः सहामात्यो मत्संस्थोऽद्य महीपते ॥ १३ ॥ अब निश्चय ही वे लोग मुख्यतासे हमारे सहायक होंगे। राजन्! इस समय खजाना और मन्त्रिमण्डल हमारे ही अधीन हैं ॥ १३ ॥ स भवान् पाण्डवानाशु विवासयितुमर्हति । मृदुनैवाभ्युपायेन नगरं वारणावतम् ॥ १४ ॥
अतः आप किसी मृदुल उपायसे ही जितना शीघ्र सम्भव हो, पाण्डवोंको वारणावत नगरमें भेज दें ।। १४ ।।
यदा प्रतिष्ठितं राज्यं मयि राजन् भविष्यति ।
तदा कुन्ती सहापत्या पुनरेष्यति भारत ।। १५ ।।
भरतवंशके महाराज! जब यह राज्य पूरी तरहसे मेरे अधिकारमें आ जायगा, उस समय कुन्तीदेवी अपने पुत्रोंके साथ पुनः यहाँ आकर रह सकती हैं ।। १५ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
दुर्योधन ममाप्येतद् हृदि सम्परिवर्तते ।
अभिप्रायस्य पापत्वान्नैनं तु विवृणोम्यहम् ।। १६ ।।
**धृतराष्ट्र बोले—**दुर्योधन! मेरे हृदयमें भी यही बात घूम रही है; किंतु हमलोगोंका यह अभिप्राय पापपूर्ण है, इसलिये मैं इसे खोलकर कह नहीं पाता ।। १६ ।।
न च भीष्मो न च द्रोणो न च क्षत्ता न गौतमः ।
विवास्यमानान् कौन्तेयाननुमंस्यन्ति कर्हिचित् ।। १७ ।।
मुझे यह भी विश्वास है कि भीष्म, द्रोण, विदुर और कृपाचार्य—इनमेंसे कोई भी कुन्तीपुत्रोंको यहाँसे अन्यत्र भेजे जानेकी कदापि अनुमति नहीं देंगे ।। १७ ।।
समा हि कौरवेयाणां वयं ते चैव पुत्रक ।
नैते विषममिच्छेयुर्धर्मयुक्ता मनस्विनः ।। १८ ।।
बेटा! इन सभी कुरुवंशियोंके लिये हमलोग और पाण्डव समान हैं। ये धर्मपरायण मनस्वी महापुरुष उनके प्रति विषम व्यवहार करना नहीं चाहेंगे ।। १८ ।।
ते वयं कौरवेयाणामेतेषां च महात्मनाम् ।
कथं न वध्यतां तात गच्छाम जगतस्तथा ।। १९ ।।
दुर्योधन! यदि हम पाण्डवोंके साथ विषम व्यवहार करेंगे तो सम्पूर्ण कुरुवंशी और ये (भीष्म, द्रोण आदि) महात्मा एवं सम्पूर्ण जगत्के लोग हमें वध करनेयोग्य क्यों न समझेंगे ।। १९ ।।
दुर्योधन उवाच
मध्यस्थः सततं भीष्मो द्रोणपुत्रो मयि स्थितः ।
यतः पुत्रस्ततो द्रोणो भविता नात्र संशयः ।। २० ।।
**दुर्योधन बोला—**पिताजी! भीष्म तो सदा ही मध्यस्थ हैं, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा मेरे पक्षमें हैं, द्रोणाचार्य भी उधर ही रहेंगे, जिधर उनका पुत्र होगा—इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।। २० ।।
कृपः शारद्वतश्चैव यत एतौ ततो भवेत् ।
द्रोणं च भागिनेयं च न स त्यक्ष्यति कर्हिचित् ।। २१ ।।
जिस पक्षमें ये दोनों होंगे, उसी ओर शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य भी रहेंगे। वे अपने बहनोई द्रोण और भानजे अश्वत्थामाको कभी छोड़ न सकेंगे ॥ २१ ॥
क्षत्तार्थबद्धस्त्वस्माकं प्रच्छन्नं संयतः परैः ।
न चैकः स समर्थोऽस्मान् पाण्डवार्थेऽधिबाधितुम् ॥ २२ ॥
विदुर भी हमारे आर्थिक बन्धनमें हैं, यद्यपि वे छिपे-छिपे हमारे शत्रुओंके स्नेहपाशमें बँधे हैं। परंतु वे अकेले पाण्डवोंके हितके लिये हमें बाधा पहुँचानेमें समर्थ न हो सकेंगे ॥ २२ ॥
स विस्रब्धः पाण्डुपुत्रान् सह मात्रा प्रवासय ।
वारणावतमद्यैव यथा यान्ति तथा कुरु ॥ २३ ॥
इसलिये आप पूर्ण निश्चिन्त होकर पाण्डवोंको उनकी माताके साथ वारणावत भेज दीजिये और ऐसी व्यवस्था कीजिये, जिससे वे आज ही चले जायँ ॥ २३ ॥
विनिद्रकरणं घोरं हृदि शल्यमिवार्पितम् ।
शोकपावकमुद्भूतं कर्मणैतेन नाशय ॥ २४ ॥
मेरे हृदयमें भयंकर काँटा-सा चुभ रहा है, जो मुझे नींद नहीं लेने देता। शोककी आग प्रज्वलित हो उठी है, आप (मेरे द्वारा प्रस्तावित) इस कार्यको पूरा करके मेरे हृदयकी शोकाग्निको बुझा दीजिये ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि दुर्योधनपरामर्शे
एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें दुर्योधनपरामर्शविषयक एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४१ ॥
१४२-
द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रके आदेशसे पाण्डवोंकी वारणावत-यात्रा
वैशम्पायन उवाच
ततो दुर्योधनो राजा सर्वाः प्रकृतयः शनैः ।
अर्थमानप्रदानाभ्यां संजहार सहानुजः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रप्रयुक्तास्ते केचित् कुशलमन्त्रिणः ।
कथयांचक्रिरे रम्यं नगरं वारणावतम् ॥ २ ॥
अयं समाजः सुमहान् रमणीयतमो भुवि ।
उपस्थितः पशुपतेर्नगरे वारणावते ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर राजा दुर्योधन और उसके छोटे भाइयोंने धन देकर तथा आदर-सत्कार करके सम्पूर्ण अमात्य आदि प्रकृतियोंको धीरे-धीरे अपने वशमें कर लिया। कुछ चतुर मन्त्री धृतराष्ट्रकी आज्ञासे (चारों ओर) इस बातकी चर्चा करने लगे कि ‘वारणावत नगर बहुत सुन्दर है। उस नगरमें इस समय भगवान् शिवकी पूजाके लिये जो बहुत बड़ा मेला लग रहा है, वह तो इस पृथ्वीपर सबसे अधिक मनोहर है’ ॥ १—३ ॥
सर्वरत्नसमाकीर्णे पुंसां देशे मनोरमे ।
इत्येवं धृतराष्ट्रस्य वचनाच्चक्रिरे कथाः ॥ ४ ॥
‘वह पवित्र नगर समस्त रत्नोंसे भरा-पूरा तथा मनुष्योंके मनको मोह लेनेवाला स्थान है।’ धृतराष्ट्रके कहनेसे वह इस प्रकारकी बातें करने लगे ॥ ४ ॥
कथ्यमाने तथा रम्ये नगरे वारणावते ।
गमने पाण्डुपुत्राणां जज्ञे तत्र मतिर्नृप ॥ ५ ॥
राजन्! वारणावत नगरकी रमणीयताका जब इस प्रकार (यत्र-तत्र) वर्णन होने लगा, तब पाण्डवोंके मनमें वहाँ जानेका विचार उत्पन्न हुआ ॥ ५ ॥
यदा त्वमन्यत नृपो जातकौतूहला इति ।
उवाचैतानेत्य तदा पाण्डवानम्बिकासुतः ॥ ६ ॥
जब अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रको यह विश्वास हो गया कि पाण्डव वहाँ जानेके लिये उत्सुक हैं, तब वे उनके पास जाकर इस प्रकार बोले— ॥ ६ ॥
(अधीतानि च शास्त्राणि युष्माभिरिह कृत्स्नशः ।
अस्त्राणि च तथा द्रोणाद् गौतमाच्च विशेषतः ॥
इदमेवंगते ताताश्चिन्तयामि समन्ततः ।
रक्षणे व्यवहारे च राज्यस्य सततं हिते ॥)
ममैते पुरुषा नित्यं कथयन्ति पुनः पुनः । रमणीयतमं लोके नगरं वारणावतम् ॥ ७ ॥ ‘बेटो! तुमलोगोंने सम्पूर्ण शास्त्र पढ़ लिये। आचार्य द्रोण और कृपसे अस्त्र-शस्त्रोंकी भी विशेष-रूपसे शिक्षा प्राप्त कर ली। प्रिय पाण्डवो! ऐसी दशामें मैं एक बात सोच रहा हूँ। सब ओरसे राज्यकी रक्षा, राजकीय व्यवहारोंकी रक्षा तथा राज्यके निरन्तर हित-साधनमें लगे रहनेवाले मेरे ये मन्त्रीलोग प्रतिदिन बारंबार कहते हैं कि वारणावत नगर संसारमें सबसे अधिक सुन्दर है ॥ ७ ॥ ते ताता यदि मन्यध्वमुत्सवं वारणावते । सगणाः सान्वयाश्चैव विहरध्वं यथामराः ॥ ८ ॥ ‘पुत्रो! यदि तुमलोग वारणावत नगरमें उत्सव देखने जाना चाहो तो अपने कुटुम्बियों और सेवकवर्गके साथ वहाँ जाकर देवताओंकी भाँति विहार करो ॥ ८ ॥ ब्राह्मणेभ्यश्च रत्नानि गायकेभ्यश्च सर्वशः । प्रयच्छध्वं यथाकामं देवा इव सुवर्चसः ॥ ९ ॥ कंचित् कालं विहृत्यैवमनुभूय परां मुदम् । इदं वै हास्तिनपुरं सुखिनः पुनरेष्यथ ॥ १० ॥ ‘ब्राह्मणों और गायकोंको विशेषरूपसे रत्न एवं धन दो तथा अत्यन्त तेजस्वी देवताओंके समान कुछ कालतक वहाँ इच्छानुसार विहार करते हुए परम सुख प्राप्त करो। तत्पश्चात् पुनः सुखपूर्वक इस हस्तिनापुर नगरमें ही चले आना’ ॥ ९-१० ॥
वैशम्पायन उवाच
धृतराष्ट्रस्य तं काममनुबुध्य युधिष्ठिरः । आत्मनश्चासहायत्वं तथेति प्रत्युवाच तम् ॥ ११ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! युधिष्ठिर धृतराष्ट्रकी उस इच्छाका रहस्य समझ गये, परंतु अपनेको असहाय जानकर उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनकी बात मान ली ॥ ११ ॥ ततो भीष्मं शांतनवं विदुरं च महामतिम् । द्रोणं च बाह्निकं चैव सोमदत्तं च कौरवम् ॥ १२ ॥ कृपमाचार्यपुत्रं च भूरिश्रवसमेव च । मान्यानन्यान्मात्यांश्च ब्राह्मणांश्च तपोधनान् ॥ १३ ॥ पुरोहितांश्च पौरांश्च गान्धारीं च यशस्विनीम् । युधिष्ठिरः शनैर्दीन उवाचेदं वचस्तदा ॥ १४ ॥ तदनन्तर युधिष्ठिरने शांतनुनन्दन भीष्म, परम बुद्धिमान् विदुर, द्रोण, बाह्निक, कुरुवंशी सोमदत्त, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, भूरिश्रवा, अन्यान्य माननीय मन्त्रियों, तपस्वी ब्राह्मणों,
पुरोहितों, पुरवासियों तथा यशस्विनी गान्धारीदेवीसे मिलकर धीरे-धीरे दीनभावसे इस प्रकार कहा— ।। १२—१४ ।। रमणीये जनाकीर्णे नगरे वारणावते । सगणास्तत्र यास्यामो धृतराष्ट्रस्य शासनात् ।। १५ ।। 'हम महाराज धृतराष्ट्रकी आज्ञासे रमणीय वारणावत नगरमें, जहाँ बड़ा भारी मेला लग रहा है, परिवारसहित जानेवाले हैं ।। १५ ।। प्रसन्नमनसः सर्वे पुण्या वाचो विमुञ्चत । आशीर्भिर्बृंहितानस्मान् न पापं प्रसहिष्यते ।। १६ ।। 'आप सब लोग प्रसन्नचित्त होकर हमें अपने पुण्यमय आशीर्वाद दीजिये। आपके आशीर्वादसे हमारी वृद्धि होगी और पापका हमपर वश नहीं चल सकेगा' ।। १६ ।। एवमुक्तास्तु ते सर्वे पाण्डुपुत्रेण कौरवाः । प्रसन्नवदना भूत्वा तेऽन्ववर्तन्त पाण्डवान् ।। १७ ।। स्वस्त्यस्तु वः पथि सदा भूतेभ्यश्चैव सर्वशः । मा च वोऽस्त्वशुभं किंचित् सर्वशः पाण्डुनन्दनाः ।। १८ ।। पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके इस प्रकार कहनेपर वे समस्त कुरुवंशी प्रसन्नवदन होकर पाण्डवोंके अनुकूल हो कहने लगे—'पाण्डुकुमारो! मार्गमें सर्वदा सब प्राणियोंसे तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हें कहींसे किसी प्रकारका अशुभ न प्राप्त हो' ।। १७-१८ ।। ततः कृतस्वस्त्ययना राज्यलम्भाय पार्थिवाः । कृत्वा सर्वाणि कार्याणि प्रययुर्वारणावतम् ।। १९ ।। तब राज्य-लाभके लिये स्वस्तिवाचन करा समस्त आवश्यक कार्य पूर्ण करके राजकुमार पाण्डव वारणावत नगरको गये ।। १९ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि वारणावतयात्रायां द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें वारणावतयात्राविषयक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४२ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २१ श्लोक हैं)
१४३-
त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
दुर्योधनके आदेशसे पुरोचनका वारणावत नगरमें लाक्षागृह बनाना
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तेषु राज्ञा तु पाण्डुपुत्रेषु भारत ।
दुर्योधनः परं हर्षमगच्छत् स दुरात्मवान् ॥ १ ॥
स पुरोचनमेकान्तमानीय भरतर्षभ ।
गृहीत्वा दक्षिणे पाणौ सचिवं वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥
ममेयं वसुसम्पूर्णा पुरोचन वसुंधरा ।
यथेयं मम तद्वत् ते स तां रक्षितुमर्हसि ॥ ३ ॥
न हि मे कश्चिदन्योऽस्ति विश्वासिकतरस्त्वया ।
सहायो येन संधाय मन्त्रयेयं यथा त्वया ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जब राजा धृतराष्ट्रने पाण्डवोंको इस प्रकार वारणावत जानेकी आज्ञा दे दी, तब दुरात्मा दुर्योधनको बड़ी प्रसन्नता हुई। भरतश्रेष्ठ! उसने अपने मन्त्री पुरोचनको एकान्तमें बुलाया और उसका दाहिना हाथ पकड़कर कहा, 'पुरोचन! यह धन-धान्यसे सम्पन्न पृथ्वी जैसे मेरी है, वैसे ही तुम्हारी भी है; अतः तुम्हें इसकी रक्षा करनी चाहिये। मेरा तुमसे बढ़कर दूसरा कोई ऐसा विश्वासपात्र सहायक नहीं है, जिससे मिलकर इतनी गुप्त सलाह कर सकूँ, जैसे तुम्हारे साथ करता हूँ ॥ १—४ ॥
संरक्ष तात मन्त्रं च सपत्नांश्च ममोद्धर ।
निपुणेनाभ्युपायेन यद् ब्रवीमि तथा कुरु ॥ ५ ॥
'तात! तुम मेरी इस गुप्त मन्त्रणाकी रक्षा करो—इसे दूसरोंपर प्रकट न होने दो और अच्छे उपायद्वारा मेरे शत्रुओंको उखाड़ फेंको। मैं तुमसे जो कहता हूँ, वही करो ॥ ५ ॥