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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

कृष्णागतैस्ते हृदयैनरिन्द्राः । रङ्गावतीर्णा द्रुपदात्मजार्थं द्वेषं प्रचक्रुः सुहृदोऽपि तत्र ॥ ५ ॥ कामदेवके बाणोंकी चोटसे उनके सभी अंगोंमें निरन्तर पीड़ा हो रही थी। उनका मन द्रौपदीमें ही लगा हुआ था। द्रुपदकुमारीको पानेके लिये रंगभूमिमें उतरे हुए वे सभी नरेश वहाँ अपने सुहृद् राजाओंसे भी ईर्ष्या करने लगे ॥ ५ ॥

अथायुर्देवगणा विमानै रुद्रादित्या वसवोऽथाश्विनौ च । साध्याश्च सर्वे मरुतस्तथैव यमं पुरस्कृत्य धनेश्वरं च ॥ ६ ॥ इसी समय रुद्र, आदित्य, वसु, अश्विनीकुमार, समस्त साध्यगण तथा मरुद्गण यमराज और कुबेरको आगे करके अपने-अपने विमानोंपर बैठकर वहाँ आये ॥ ६ ॥

दैत्याः सुपर्णाश्च महोरगाश्च देवर्षयो गुह्यकाश्चारणाश्च । विश्वावसुर्नारदपर्वतौ च गन्धर्वमुख्याः सहसाप्सरोभिः ॥ ७ ॥ दैत्य, सुपर्ण, नाग, देवर्षि, गुह्यक, चारण तथा विश्वावसु, नारद और पर्वत आदि प्रधान-प्रधान गन्धर्व भी अप्सराओंको साथ लिये सहसा आकाशमें उपस्थित हो गये ॥ ७ ॥

हलायुधस्तत्र जनार्दनश्च वृष्ण्यन्धकाश्चैव यथाप्रधानम् । प्रेक्षां स्म चक्रुर्यदुपुङ्गवास्ते स्थिताश्च कृष्णस्य मते महान्तः ॥ ८ ॥ (अन्य राजालोग द्रौपदीकी प्राप्तिके लिये लक्ष्य बेधनेके विचारमें पड़े थे, किंतु) भगवान् श्रीकृष्णकी सम्मतिके अनुसार चलनेवाले महान् यदुश्रेष्ठ, जिनमें बलराम और श्रीकृष्ण आदि वृष्णि और अन्धक वंशके प्रमुख व्यक्ति वहाँ उपस्थित थे, चुपचाप अपनी जगहपर बैठे-बैठे देख रहे थे ॥ ८ ॥

दृष्ट्वा तु तान् मत्तगजेन्द्ररूपान् पञ्चाभिपद्मानिव वारेणेन्द्रान् । भस्मावृताङ्गानिव हव्यवाहान् कृष्णः प्रदध्यौ यदुवीरमुख्यः ॥ ९ ॥ यदुवंशी वीरोंके प्रधान नेता श्रीकृष्णने लक्ष्मीके सम्मुख विराजमान गजराजों तथा राखमें छिपी हुई आगके समान मतवाले हाथीकी-सी आकृतिवाले पाण्डवोंको, जो अपने सब अंगोंमें भस्म लपेटे हुए थे, देखकर (तुरंत) पहचान लिया ॥ ९ ॥

शशंस रामाय युधिष्ठिरं स भीमं सजिष्णुं च यमौ च वीरौ । शनैः शनैस्तान् प्रसमीक्ष्य रामो जनार्दनं प्रीतमना ददर्श ह ॥ १० ॥ और बलरामजीसे धीरे-धीरे कहा—‘भैया! वह देखिये, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन और दोनों जुड़वे वीर नकुल-सहदेव उधर बैठे हैं।' बलरामजीने उन्हें देखकर अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो भगवान् श्रीकृष्णकी ओर दृष्टिपात किया ॥ १० ॥

अन्ये तु वीरा नृपपुत्रपौत्राः कृष्णागतैर्नेत्रमनःस्वभावैः । व्यायच्छमाना ददृशुर्न तान् वै संदष्टदन्तच्छदताम्रनेत्राः ॥ ११ ॥ दूसरे-दूसरे वीर राजा, राजकुमार एवं राजाओंके पौत्र अपने नेत्रों, मन और स्वभावको द्रौपदीकी ओर लगाकर उसीको देख रहे थे, अतः पाण्डवोंकी ओर उनकी दृष्टि नहीं गयी। वे जोशमें आकर दाँतोंसे ओठ चबा रहे थे और रोषसे उनकी आँखें लाल हो रही थीं ॥ ११ ॥

तथैव पार्थाः पृथुबाहवस्ते वीरौ यमौ चैव महानुभावौ । तां द्रौपदीं प्रेक्ष्य तदा स्म सर्वे कन्दर्पबाणाभिहता बभूवुः ॥ १२ ॥ इसी प्रकार वे महाबाहु कुन्तीपुत्र तथा दोनों महानुभाव वीर नकुल-सहदेव सब-के-सब द्रौपदीको देखकर तुरंत कामदेवके बाणोंसे घायल हो गये ॥ १२ ॥

देवर्षिगन्धर्वसमाकुलं तत् सुपर्णनागासुरसिद्धजुष्टम् । दिव्येन गन्धेन समाकुलं च दिव्यैश्च पुष्पैरवकीर्यमाणम् ॥ १३ ॥ राजन्! उस समय वहाँका आकाश देवर्षियों तथा गन्धर्वोंसे खचाखच भरा था। सुपर्ण, नाग, असुर और सिद्धोंका समुदाय वहाँ जुट गया था। सब ओर दिव्य सुगन्ध व्याप्त हो रही थी और दिव्य पुष्पोंकी वर्षा की जा रही थी ॥ १३ ॥

महास्वनैर्दुन्दुभिनादितैश्च बभूव तत् संकुलमन्तरिक्षम् । विमानसम्बाधमभूत् समन्तात् सवेणुवीणापणवानुनादम् ॥ १४ ॥ बृहत् शब्द करनेवाली दुन्दुभियोंके नादसे सारा अन्तरिक्ष गूँज उठा था। चारों ओरका आकाश विमानोंसे ठसाठस भरा था और वहाँ बाँसुरी, वीणा तथा ढोलकी मधुर ध्वनि हो

रही थी ॥ १४ ॥ ततस्तु ते राजगणाः क्रमेण कृष्णानिमित्तं कृतविक्रमाश्च । सकर्णदुर्योधनशाल्वशल्य- द्रौणायनिक्राथसुनीथवक्राः ॥ १५ ॥ कलिङ्गवङ्गाधिपपाण्ड्यपौण्ड्रा विदेहराजो यवनाधिपश्च । अन्ये च नानान्नृपपुत्रपौत्रा राष्ट्राधिपाः पङ्कजपत्रनेत्राः ॥ १६ ॥ किरीटहाराङ्गदचक्रवालै- र्विभूषिताङ्गाः पृथुबाहवस्ते । अनुक्रमं विक्रमसत्त्वयुक्ता बलेन वीर्येण च नर्दमानाः ॥ १७ ॥ तदनन्तर वे नृपतिगण द्रौपदीके लिये क्रमशः अपना पराक्रम प्रकट करने लगे। कर्ण, दुर्योधन, शाल्व, शल्य, अश्वत्थामा, क्राथ, सुनीथ, वक्र, कलिंगराज, वंगनरेश, पाण्ड्यनरेश, पौण्ड्र देशके अधिपति, विदेहके राजा, यवनदेशके अधिपति तथा अन्यान्य अनेक राष्ट्रोंके स्वामी, बहुतेरे राजा, राजपुत्र तथा राजपौत्र, जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमलपत्रके समान शोभा पा रहे थे, जिनके विभिन्न अंगोंमें किरीट, हार, अंगद (बाजूबंद) तथा कड़े आदि आभूषण शोभा दे रहे थे तथा जिनकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं, वे सब-के-सब पराक्रमी और धैर्यसे युक्त हो अपने बल और शक्तिपर गर्जते हुए क्रमशः उस धनुषपर अपना बल दिखाने लगे ॥ १५—१७ ॥

तत् कार्मुकं संहननोपपन्नं सज्यं न शेकुर्मनसापि कर्तुम् । ते विक्रमन्तः स्फुरता दृढेन विक्षिप्यमाणा धनुषा नरेन्द्राः ॥ १८ ॥ विचेष्टमाना धरणीतलस्था यथाबलं शैक्ष्यगुणक्रमाश्च । गतौजसः स्रस्तकिरीटहारा विनिःश्वसन्तः शमयाम्बभूवुः ॥ १९ ॥ परंतु वे उस सुदृढ़ धनुषपर हाथसे कौन कहे, मनसे भी प्रत्यंचा न चढ़ा सके। अपने बल, शिक्षा और गुणके अनुसार उसपर जोर लगाते समय वे सभी नरेन्द्र उस सुदृढ़ एवं चमचमाते हुए धनुषके झटकेसे दूर फेंक दिये जाते और लड़खड़ाकर धरतीपर जा गिरते

थे। फिर तो उनका उत्साह समाप्त हो जाता, किरीट और हार खिसककर गिर जाते और वे लंबी साँसें खींचते हुए शान्त होकर बैठ जाते थे॥ १८-१९॥
हाहाकृतं तद् धनुषा दृढेन
विस्रस्तहाराङ्गदचक्रवालम् ।
कृष्णानिमित्तं विनिवृत्तकामं
राज्ञां तदा मण्डलमार्तमासीत् ॥ २० ॥
उस सुदृढ़ धनुषके झटकेसे जिनके हार, बाजूबंद और कड़े आदि आभूषण दूर जा गिरे थे, वे नरेश उस समय द्रौपदीको पानेकी आशा छोड़कर अत्यन्त व्यथित हो हाहाकार कर उठे॥ २०॥
सर्वान् नृपांस्तान् प्रसमीक्ष्य कर्णो
धनुर्धराणां प्रवरो जगाम ।
उद्धृत्य तूर्णं धनुरुद्यतं तत्
सज्यं चकाराशु युयोज बाणान् ॥ २१ ॥
उन सब राजाओंकी यह अवस्था देख धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ कर्ण उस धनुषके पास गया और तुरंत ही उसे उठाकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ा दी तथा शीघ्र ही उस धनुषपर वे पाँचों बाण जोड़ दिये*॥ २१॥
दृष्ट्वा सूतं मेनिरे पाण्डुपुत्रा
भित्त्वा नीतं लक्ष्यवरं धरायाम् ।
धनुर्धरा रागकृतप्रतिज्ञ-
मत्यग्निसोमार्कमथार्कपुत्रम् ॥ २२ ॥
अग्नि, चन्द्रमा और सूर्यसे भी अधिक तेजस्वी सूर्यपुत्र कर्ण द्रौपदीके प्रति आसक्त होनेके कारण जब लक्ष्य भेदनेकी प्रतिज्ञा करके उठा, तब उसे देखकर महाधनुर्धर पाण्डवोंने यह विश्वास कर लिया कि अब यह इस उत्तम लक्ष्यको भेदकर पृथ्वीपर गिरा देगा॥ २२॥
दृष्ट्वा तु तं द्रौपदी वाक्यमुच्चै-
र्जगाद नाहं वरयामि सूतम् ।
सामर्षहासं प्रसमीक्ष्य सूर्यं
तत्याज कर्णः स्फुरितं धनुस्तत् ॥ २३ ॥
कर्णको देखकर द्रौपदीने उच्च स्वरसे यह बात कही—'मैं सूत जातिके पुरुषका वरण नहीं करूँगी।' यह सुनकर कर्णने अमर्षयुक्त हँसीके साथ भगवान् सूर्यकी ओर देखा और उस प्रकाशमान धनुषको डाल दिया॥ २३॥
एवं तेषु निवृत्तेषु क्षत्रियेषु समन्ततः ।
चेदीनामधिपो वीरो बलवानन्तकोपमः ॥ २४ ॥

दमघोषसुतो धीरः शिशुपालो महामतिः ।

धनुरादायमानस्तु जानुभ्यामगमन्महीम् ॥ २५ ॥

इस प्रकार जब वे सभी क्षत्रिय सब ओरसे हट गये, तब यमराजके समान बलवान्,

धीर, वीर, चेदिराज दमघोषपुत्र महाबुद्धिमान् शिशुपाल धनुष उठानेके लिये चला। परंतु

उसपर हाथ लगाते ही घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २४-२५ ॥

ततो राजा महावीर्यो जरासंधो महाबलः ।

धनुषोऽभ्याशमागत्य तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ २६ ॥

तदनन्तर महापराक्रमी एवं महाबली राजा जरासंध धनुषके निकट आकर पर्वतकी

भाँति अविचलभावसे खड़ा हो गया ॥ २६ ॥

धनुषा पीड्यमानस्तु जानुभ्यामगमन्महीम् ।

तत उत्थाय राजा स स्वराष्ट्राण्यभिजग्मिवान् ॥ २७ ॥

परंतु उठाते समय धनुषका झटका खाकर वह भी घुटनेके बल गिर पड़ा। तब वहाँसे

उठकर राजा जरासंध अपने राज्यको चला गया ॥ २७ ॥

ततः शल्यो महावीरो मद्रराजो महाबलः ।

तदप्यारोप्यमाणस्तु जानुभ्यामगमन्महीम् ॥ २८ ॥

तत्पश्चात् महावीर एवं महाबली मद्रराज शल्य आये। पर उन्होंने भी उस धनुषको

चढ़ाते समय धरतीपर घुटने टेक दिये ॥ २८ ॥

(ततो दुर्योधनो राजा धार्तराष्ट्रः परंतपः ।

मानी दृढास्त्रसम्पन्नः सर्वैश्च नृपलक्षणैः ॥

उत्थितः सहसा तत्र भ्रातृमध्ये महाबलः ।

विलोक्य द्रौपदीं हृष्टो धनुषोऽभ्याशमागमत् ॥

स बभौ धनुरादाय शक्रश्चापधरो यथा ।

आरोपयंस्तु तद् राजा धनुषा बलिना तदा ॥

उत्तानशय्यमपतदङ्गुल्यन्तरताडितः ।

स ययौ ताडितस्तेन व्रीडन्निव नराधिपः ॥)

तदनन्तर शत्रुओंको संताप देनेवाला धृतराष्ट्रपुत्र महाबली राजा दुर्योधन सहसा अपने

भाइयोंके बीचसे उठकर खड़ा हो गया। उसके अस्त्र-शस्त्र बड़े मजबूत थे। वह स्वाभिमानी

होनेके साथ ही समस्त राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न था। द्रौपदीको देखकर उसका हृदय

हर्षसे खिल उठा और वह शीघ्रतापूर्वक धनुषके पास आया। उस धनुषको हाथमें लेकर वह

चापधारी इन्द्रके समान शोभा पाने लगा। राजा दुर्योधन उस मजबूत धनुषपर जब प्रत्यंचा

चढ़ाने लगा, उस समय उसके अँगुलियोंके बीचमें झटकेसे ऐसी चोट लगी कि वह चित्त

लोट गया। धनुषकी चोट खाकर राजा दुर्योधन अत्यन्त लज्जित होता हुआ-सा अपने

स्थानपर लौट गया।

तस्मिंस्तु सम्भ्रान्तजने समाजे निष्क्षिप्तवादेषु जनाधिपेषु । कुन्तीसुतो जिष्णुरियेष कर्तुं सज्यं धनुस्तत् सशरं प्रवीरः ॥ २९ ॥ (जब इस प्रकार बड़े-बड़े प्रभावशाली राजा लक्ष्यवेध न कर सके, तब) सारा समाज सम्भ्रम (घबराहट)-में पड़ गया और लक्ष्यवेधकी बातचीततक बंद हो गयी, उसी समय प्रमुख वीर कुन्तीनन्दन अर्जुनने उस धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसपर बाण-संधान करनेकी अभिलाषा की ॥ २९ ॥ (ततो वरिष्ठः सुरदानवाना- मुदारधीर्वृष्णिकुलप्रवीरः । जहर्ष रामेण स पीड्य हस्तं हस्तं गतां पाण्डुसुतस्य मत्वा ॥ न जज्ञुरन्ये नृपवीरमुख्याः संछन्नरूपानथ पाण्डुपुत्रान् ।) यह देख देवता और दानवोंके आदरणीय, वृष्णि-वंशके प्रमुख वीर उदारबुद्धि भगवान् श्रीकृष्ण बल-रामजीके साथ उनका हाथ दबाते हुए बड़े प्रसन्न हुए। उन्हें यह विश्वास हो गया कि द्रौपदी अब पाण्डुनन्दन अर्जुनके हाथमें आ गयी। पाण्डवोंने अपना रूप छिपा रखा था, अतः दूसरे कोई राजा या प्रमुख वीर उन्हें पहचान न सके।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि राजपराङ्मुखीभवने षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें सम्पूर्ण राजाओंके विमुख होनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८६ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३४ १/३ श्लोक हैं)


* कर्णके द्वारा प्रत्यंचा और बाण चढ़ानेकी बात दाक्षिणात्य पाठमें कहीं नहीं है। भण्डारकरकी प्रतिमें भी मुख्य पाठमें यह वर्णन नहीं है। नीलकण्ठी पाठमें भी इससे पूर्व श्लोक १५में तथा उत्तर अ० १८७ श्लोक ४ एवं १९में भी ऐसा ही उल्लेख है कि कर्ण धनुषपर प्रत्यंचा और बाण नहीं चढ़ा सका था; इससे यही सिद्ध होता है कि कर्णने बाण नहीं चढ़ाया था।

१८७-

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुनका लक्ष्यवेध करके द्रौपदीको प्राप्त करना

वैशम्पायन उवाच

यदा निवृत्ता राजानो धनुषः सज्यकर्मणः ।
अथोदतिष्ठद् विप्राणां मध्याज्जिष्णुरुदारधीः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब सब राजाओंने उस धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ानेके कार्यसे मुँह मोड़ लिया, तब उदारबुद्धि अर्जुन ब्राह्मणमण्डलीके बीचसे उठकर खड़े हुए ॥ १ ॥

उदक्रोशन् विप्रमुख्या विधुन्वन्तोऽजिनानि च ।
दृष्ट्वा सम्प्रस्थितं पार्थमिन्द्रकेतुसमप्रभम् ॥ २ ॥
इन्द्रकी ध्वजाके समान (लंबे) अर्जुनको उठकर धनुषकी ओर जाते देख बड़े-बड़े ब्राह्मण अपने-अपने मृगचर्म हिलाते हुए जोर-जोरसे कोलाहल करने लगे ॥ २ ॥

केचिदासन् विमनसः केचिदासन् मुदान्विताः ।
आहुः परस्परं केचित्त्रिपुणा बुद्धिजीविनः ॥ ३ ॥
कुछ ब्राह्मण उदास हो गये और कुछ प्रसन्नताके मारे फूल उठे तथा कुछ चतुर एवं बुद्धिजीवी ब्राह्मण आपसमें इस प्रकार कहने लगे— ॥ ३ ॥

यत् कर्णशल्यप्रमुखैः क्षत्रियैर्लोकविश्रुतैः ।
नानतं बलवद्भिर्हि धनुर्वेदपरायणैः ॥ ४ ॥
तत् कथं त्वकृतास्त्रेण प्राणतो दुर्बलीयसा ।
वटुमात्रेण शक्यं हि सज्यं कर्तुं धनुर्द्विजाः ॥ ५ ॥
‘ब्राह्मणो! कर्ण और शल्य आदि बलवान्, धनुर्वेदपरायण तथा लोकविख्यात क्षत्रिय जिसे झुका (-तक) न सके, उसी धनुषपर अस्त्र-ज्ञानसे शून्य और शारीरिक बलकी दृष्टिसे अत्यन्त दुर्बल यह निरा ब्राह्मण-बालक कैसे प्रत्यंचा चढ़ा सकेगा ॥ ४-५ ॥

अवहास्या भविष्यन्ति ब्राह्मणाः सर्वराजसु ।
कर्मण्यस्मिन्नसंसिद्धे चापलादपरीक्षिते ॥ ६ ॥
‘इसने बालोचित चपलताके कारण इस कार्यकी कठिनाईपर विचार नहीं किया है। यदि इसमें यह सफल न हुआ तो समस्त राजाओंमें ब्राह्मणोंकी बड़ी हँसी होगी ॥ ६ ॥

यद्येष दर्पाद्धर्षाद् वाप्यथ ब्राह्मणचापलात् ।
प्रस्थितो धनुरानन्तुं वार्यतां साधु मा गमत् ॥ ७ ॥
‘यदि यह अभिमान, हर्ष अथवा ब्राह्मणसुलभ चंचलताके कारण धनुषपर डोरी चढ़ानेके लिये आगे बढ़ा है तो इसे रोक देना चाहिये; अच्छा तो यही होगा कि यह जाय ही

नहीं' ॥ ७ ॥

ब्राह्मणा ऊचुः नावहास्या भविष्यामो न च लाघवमास्थिताः । न च विद्विष्टतां लोके गमिष्यामो महीक्षिताम् ॥ ८ ॥ ब्राह्मण बोले—(भाइयो!) हमारी हँसी नहीं होगी। न हमें किसीके सामने छोटा ही बनना पड़ेगा और लोकमें हमलोग राजाओंके द्वेषपात्र भी नहीं होंगे। (अतः इन बातोंकी चिन्ता छोड़ दो) ॥ ८ ॥

केचिदाहुर्युवा श्रीमान् नागराजकरोपमः । पीनस्कन्धोरुबाहुश्च धैर्येण हिमवानिव ॥ ९ ॥ कुछ ब्राह्मणोंने कहा—'यह सुन्दर युवक नागराज ऐरावतके शुण्ड-दण्डके समान हृष्ट-पुष्ट दिखायी देता है। इसके कंधे सुपुष्ट और भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं। यह धैर्यमें हिमालयके समान जान पड़ता है ॥ ९ ॥

सिंहखेलगतिः श्रीमान् मत्तनागेन्द्रविक्रमः । सम्भाव्यमस्मिन् कर्मेदमुत्साहाच्चानुमीयते ॥ १० ॥ 'इसकी सिंहके समान मस्तानी चाल है। यह शोभाशाली तरुण मतवाले गजराजके समान पराक्रमी प्रतीत होता है। इस वीरके लिये यह कार्य करना सम्भव है। इसका उत्साह देखकर भी ऐसा ही अनुमान होता है ॥ १० ॥

शक्तिरस्य महोत्साहा न ह्यशक्तः स्वयं व्रजेत् । न च तद् विद्यते किंचित् कर्म लोकेषु यद् भवेत् ॥ ११ ॥ ब्राह्मणानामसाध्यं च नृषु संस्थानचारिषु । अब्भक्षा वायुभक्षाश्च फलाहारा दृढव्रताः ॥ १२ ॥ दुर्बला अपि विप्रा हि बलीयांसः स्वतेजसा । ब्राह्मणो नावमन्तव्यः सदसद् वा समाचरन् ॥ १३ ॥ सुखं दुःखं महद् ह्रस्वं कर्म यत् समुपागतम् । (धनुर्वेदे च वेदे च योगेषु विविधेषु च । न तं पश्यामि मेदिन्यां ब्राह्मणाभ्यधिको भवेत् ॥ मन्त्रयोगबलेनापि महताऽऽत्मबलेन वा । जृम्भयेयुरमुं लोकमथवा द्विजसत्तमाः ॥) जामदग्न्येन रामेण निर्जिताः क्षत्रिया युधि ॥ १४ ॥

इसमें शक्ति और महान् उत्साह है। यदि यह असमर्थ होता तो स्वयं ही धनुषके पास जानेका साहस नहीं करता। सम्पूर्ण लोकोंमें देवता, असुर आदिके रूपमें विचरनेवाले पुरुषोंका ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो ब्राह्मणोंके लिये असाध्य हो। ब्राह्मणलोग जल पीकर,

हवा खाकर अथवा फलाहार करके (भी) दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हैं। अतः वे शरीरसे दुबले होनेपर भी अपने तेजके कारण अत्यन्त बलवान् होते हैं। ब्राह्मण भला-बुरा, सुखद-दुःखद और छोटा-बड़ा जो भी कर्म प्राप्त होता है, कर लेता है; अतः किसी भी कर्मको करते समय उस ब्राह्मणका अपमान नहीं करना चाहिये। मैं भूमण्डलमें ऐसे किसी पुरुषको नहीं देखता जो धनुर्वेद, वेद तथा नाना प्रकारके योगोंमें ब्राह्मणसे बढ़-चढ़कर हो। श्रेष्ठ ब्राह्मण मन्त्रबल, योगबल अथवा महान् आत्मबलसे इस सम्पूर्ण जगत्‌को स्तब्ध कर सकते हैं। (अतः उनके प्रति तुच्छ बुद्धि नहीं रखनी चाहिये।) देखो, जमदग्निनन्दन परशुरामजीने अकेले ही (सम्पूर्ण) क्षत्रियोंको युद्धमें जीत लिया था ॥ ११—१४ ॥

पीतः समुद्रोऽगस्त्येन ह्यगाधो ब्रह्मतेजसा ।
तस्माद् ब्रुवन्तु सर्वेऽत्र बटुरेष धनुर्महान् ॥ १५ ॥
आरोपयतु शीघ्रं वै तथेत्यूचुर्द्विजर्षभाः ।
‘महर्षि अगस्त्यने अपने ब्रह्मतेजके प्रभावसे अगाध समुद्रको पी डाला। इसलिये आप सब लोग यहाँ आशीर्वाद दें कि यह महान् ब्रह्मचारी शीघ्र ही इस धनुषको चढ़ा दे (और लक्ष्य-वेध करनेमें सफल हो)। यह सुनकर वे श्रेष्ठ ब्राह्मण उसी प्रकार आशीर्वादकी वर्षा करने लगे ॥ १५१/२ ॥

एवं तेषां विलपतां विप्राणां विविधा गिरः ॥ १६ ॥
अर्जुनो धनुषोऽभ्याशे तस्थौ गिरिरिवाचलः ।
स तद् धनुः परिक्रम्य प्रदक्षिणमथाकरोत् ॥ १७ ॥
इस प्रकार जब ब्राह्मणलोग भाँति-भाँतिकी बातें कर रहे थे, उसी समय अर्जुन धनुषके पास जाकर पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े हो गये। फिर उन्होंने धनुषके चारों ओर घूमकर उसकी परिक्रमा की ॥ १६-१७ ॥

प्रणम्य शिरसा देवमीशानं वरदं प्रभुम् ।
कृष्णं च मनसा कृत्वा जगृहे चार्जुनो धनुः ॥ १८ ॥
इसके बाद वरदायक भगवान् शंकरको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और मन-ही-मन भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करके अर्जुनने वह धनुष उठा लिया ॥ १८ ॥

यत् पार्थिवै रुक्मसुनीथवक्रैः
राधेयदुर्योधनशल्यशाल्वैः ।
तदा धनुर्वेदपरैर्नृसिंहैः
कृतं न सज्यं महतोऽपि यत्नात् ॥ १९ ॥
तदर्जुनो वीर्यवतां सदर्प-
स्तदैन्द्रिरिन्द्रावरजप्रभावः ।
सज्यं च चक्रे निमिषान्तरेण
शरांश्च जग्राह दशार्धसंख्यान् ॥ २० ॥

रुक्म, सुनीथ, वक्र, कर्ण, दुर्योधन, शल्य तथा शाल्व आदि धनुर्वेदके पारंगत विद्वान् पुरुषसिंह राजालोग महान् प्रयत्न करके भी जिस धनुषपर डोरी न चढ़ा सके, उसी धनुषपर विष्णुके समान प्रभावशाली एवं पराक्रमी वीरोंमें श्रेष्ठताका अभिमान रखनेवाले इन्द्रकुमार अर्जुनने पलक मारते-मारते प्रत्यंचा चढ़ा दी। इसके बाद उन्होंने वे पाँच बाण भी अपने हाथमें ले लिये ।। १९-२० ।।

विव्याध लक्ष्यं निपपात तच्च छिद्रेण भूमौ सहसातिविद्धम् । ततोऽन्तरिक्षे च बभूव नादः समाजमध्ये च महान् निनादः ॥ २१ ॥

और उन्हें चलाकर बात-की-बातमें (लक्ष्य) वेध दिया। वह बिंधा हुआ लक्ष्य अत्यन्त छिन्न-भिन्न हो यन्त्रके छेदसे सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय आकाशमें बड़े जोरका हर्षनाद हुआ और सभामण्डपमें तो उससे भी महान् आनन्द-कोलाहल छा गया ।। २१ ।।

पुष्पाणि दिव्यानि ववर्ष देवः पार्थस्य मूर्ध्नि द्विषतां निहन्तुः ॥ २२ ॥

देवतालोग शत्रुहन्ता अर्जुनके मस्तकपर दिव्य फूलोंकी वर्षा करने लगे ।। २२ ।।

चैलानि विव्यधुस्तत्र ब्राह्मणाश्च सहस्रशः । विलक्षितास्ततश्चक्रुर्हाहाकारांश्च सर्वशः । न्यपतंश्चात्र नभसः समन्तात् पुष्पवृष्टयः ॥ २३ ॥ शताङ्गानि च तूर्याणि वादकाः समवादयन् । सूतमागधसङ्घाश्चाप्यस्तुवंस्तत्र सुस्वराः ॥ २४ ॥

सहस्रों ब्राह्मण (हर्षमें भरकर) वहाँ अपने दुपट्टे हिलाने लगे (मानो अर्जुनकी विजय-ध्वजा फहरा रहे हों), फिर तो जो लोग (लक्ष्यवेध करनेमें असमर्थ हो, हार मान चुके थे) वे राजा लोग सब ओरसे हाहाकार करने लगे। उस रंगभूमिमें आकाशसे सब ओर फूलोंकी वर्षा हो रही थी। बाजा बजानेवाले लोग सैकड़ों अंगोंवाली तुरही आदि बजाने लगे। सूत और मागधगण वहाँ मीठे स्वरसे यशोगान करने लगे ।। २३-२४ ।।

तं दृष्ट्वा द्रुपदः प्रीतो बभूव रिपुसूदनः । सह सैन्यैश्च पार्थस्य साहाय्यार्थमियेष सः ॥ २५ ॥

अर्जुनको देखकर शत्रुसूदन द्रुपदके हर्षकी सीमा न रही। उन्होंने अपनी सेनाके साथ उनकी सहायता करनेका निश्चय किया ।। २५ ।।

तस्मिंस्तु शब्दे महति प्रवृद्धे युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः । आवासमेवोपजगाम शीघ्रं सार्धं यमाभ्यां पुरुषोत्तमाभ्याम् ॥ २६ ॥

उस समय जब महान् कोलाहल बढ़ने लगा, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर पुरुषोत्तम नकुल और सहदेवको साथ लेकर डेरेपर ही चले गये ।। २६ ।।
विद्धं तु लक्ष्यं प्रसमीक्ष्य कृष्णा
पार्थं च शक्रप्रतिमं निरीक्ष्य ।
आदाय शुक्लं वरमाल्यदाम
जगाम कुन्तीसुतमुत्स्मयन्ती ।। २७ ।।
(स्वभ्यस्तरूपापि नवेव नित्यं
विनापि हासं हसतीव कन्या ।
मदादृतेऽपि स्खलतीव भावै-
र्वाचा विना व्याहरतीव दृष्ट्या ।।
समेत्य तस्योपरि सोत्ससर्ज
समागतानां पुरतो नृपाणाम् ।
विन्यस्य मालां विनयेन तस्थौ
विहाय राज्ञः सहसा नृपात्मजा ।।
शचीव देवेन्द्रमथाग्निदेवं
स्वाहेव लक्ष्मीश्च यथा मुकुन्दम् ।
उषेव सूर्यं मदनं रतिश्च
महेश्वरं पर्वतराजपुत्री ।
रामं यथा मैथिलराजपुत्री
भैमी यथा राजवरं नलं हि ।।)

लक्ष्यको बिंधकर धरतीपर गिरा देख इन्द्रके तुल्य पराक्रमी अर्जुनपर दृष्टि डालकर हाथमें सुन्दर श्वेत फूलोंकी जयमाला लिये द्रौपदी मन्द-मन्द मुसकराती हुई कुन्तीकुमारके समीप गयी। उसका रूप जिन्होंने बार-बार देखा था, उनके लिये भी वह नित्य नयी-सी जान पड़ती थी। वह द्रुपदकुमारी बिना हँसीके भी हँसती-सी प्रतीत होती थी। मदसेवनके बिना भी (आन्तरिक अनुराग-सूचक) भावोंके द्वारा लड़खड़ाती-सी चलती थी और बिना बोले भी केवल दृष्टिसे ही बातचीत करती-सी जान पड़ती थी। निकट जाकर राजकुमारी द्रौपदीने वहाँ जुटे हुए समस्त राजाओंके समक्ष उन सबकी उपेक्षा करके सहसा वह माला अर्जुनके गलेमें डाल दी और विनयपूर्वक खड़ी हो गयी। जैसे शचीने देवराज इन्द्रका, स्वाहाने अग्निदेवका, लक्ष्मीने भगवान् विष्णुका, उषाने सूर्यदेवका, रतिने कामदेवका, गिरिराजकुमारी उमाने महेश्वरका, विदेहराजनन्दिनी सीताने श्रीरामका तथा भीमकुमारी दमयन्तीने नृपश्रेष्ठ नलका वरण किया था, उसी प्रकार द्रौपदीने पाण्डुपुत्र अर्जुनका वरण कर लिया ।। २७ ।।
स तामुपादाय विजित्य रङ्गे

द्विजातिभिस्तैरभिपूज्यमानः ।
रङ्गाान्निचक्रामदचिन्त्यकर्मा
पत्न्या तया चाप्यनुगम्यमानः ॥ २८ ॥

अद्भुत कर्म करनेवाले अर्जुन इस प्रकार उस स्वयंवरसभामें (स्त्रीरत्न द्रौपदीको जीतकर) उसे अपने साथ ले रंगभूमिसे बाहर निकले। पत्नी द्रौपदी उनके पीछे-पीछे चल रही थी। उस समय उपस्थित ब्राह्मणोंने उनका बड़ा सत्कार किया ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि लक्ष्यच्छेदने
सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें लक्ष्यछेदनविषयक एक सौ सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८७ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३३ १/३ श्लोक हैं)

१८८-

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अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

द्रुपदको मारनेके लिये उद्यत हुए राजाओंका सामना करनेके लिये भीम और अर्जुनका उद्यत होना और उनके विषयमें भगवान् श्रीकृष्णका बलरामजीसे वार्तालाप

वैशम्पायन उवाच

तस्मै दित्सति कन्यां तु ब्राह्मणाय तदा नृपे ।
कोप आसीन्महीपानामालोक्यान्न्योन्यमन्तिकात् ।। १ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा द्रुपद उस ब्राह्मणको कन्या देना चाहते हैं, यह जानकर उस समय राजाओंको बड़ा क्रोध हुआ और वे एक-दूसरेको देखकर तथा समीप आकर इस प्रकार कहने लगे— ।। १ ।।

अस्मानयमतिक्रम्य तृणीकृत्य च संगतान् ।
दातुमिच्छति विप्राय द्रौपदीं योषितां वराम् ।। २ ।।

‘(अहो! देखो तो सही,) यह राजा द्रुपद (यहाँ) एकत्र हुए हमलोगोंको तिनकेकी तरह तुच्छ समझकर और हमारा उल्लंघन करके युवतियोंमें श्रेष्ठ अपनी कन्याका विवाह एक ब्राह्मणके साथ करना चाहता है ।। २ ।।

अवरोप्येह वृक्षं तु फलकाले निपात्यते ।
निहन्मैनं दुरात्मानं योऽयमस्मान् न मन्यते ।। ३ ।।

‘यह वृक्ष लगाकर अब फल लगनेके समय उसे काटकर गिरा रहा है। अतः हमलोग इस दुरात्माको मार डालें; क्योंकि यह हमें कुछ नहीं समझ रहा है ।। ३ ।।

न ह्यर्हत्येष सम्मानं नापि वृद्धक्रमं गुणैः ।
हन्मैनं सह पुत्रेण दुराचारं नृपद्विषम् ।। ४ ।।

‘यह राजा द्रुपद गुणोंके कारण हमसे वृद्धोचित सम्मान पानेका अधिकारी भी नहीं है; राजाओंसे द्वेष करनेवाले इस दुराचारीको पुत्रसहित हमलोग मार डालें ।। ४ ।।

अयं हि सर्वानाहूय सत्कृत्य च नराधिपान् ।
गुणवद् भोजयित्वान्नं ततः पश्चान्न मन्यते ।। ५ ।।

‘पहले तो इसने हम सब राजाओंको बुलाकर सत्कार किया, उत्तम गुणयुक्त भोजन कराया और ऐसा करनेके बाद यह हमारा अपमान कर रहा है ।। ५ ।।

अस्मिन् राजसमावाये देवानामिव संनये ।
किमयं सदृशं कञ्चिन्नृपतिं नैव दृष्टवान् ।। ६ ।।

'देवताओंके समूहकी भाँति उत्तम नीतिसे सुशोभित राजाओंके इस समुदायमें क्या इसने किसी भी नरेशको अपनी पुत्रीके योग्य नहीं देखा? ।। ६ ।।
न च विप्रेष्वधिकारो विद्यते वरणं प्रति ।
स्वयंवरः क्षत्रियाणामितीयं प्रथिता श्रुतिः ॥ ७ ॥
'स्वयंवरमें कन्याद्वारा वरण प्राप्त करनेका अधिकार ही ब्राह्मणोंको नहीं है। (लोगोंमें) यह बात प्रसिद्ध है कि स्वयंवर क्षत्रियोंका ही होता है ।। ७ ।।
अथवा यदि कन्येयं न च कञ्चिद् बुभूषति ।
अग्नावेनां परिक्षिप्य याम राष्ट्राणि पार्थिवाः ॥ ८ ॥
'अथवा राजाओ! यदि यह कन्या हमलोगोंमेंसे किसीको अपना पति बनाना न चाहे तो हम इसे जलती हुई आगमें झोंककर अपने-अपने राज्यको चल दें ।। ८ ।।
ब्राह्मणो यदि चापल्याल्लोभाद् वा कृतवानिदम् ।
विप्रियं पार्थिवेन्द्राणां नैष वध्यः कथंचन ॥ ९ ॥
'यद्यपि इस ब्राह्मणने चपलताके कारण अथवा राजकन्याके प्रति लोभ होनेसे हम राजाओंका अप्रिय किया है, तथापि ब्राह्मण होनेके कारण हमें किसी प्रकार इसका वध नहीं करना चाहिये ।। ९ ।।
ब्राह्मणार्थं हि नो राज्यं जीवितं हि वसूनि च ।
पुत्रपौत्रं च यच्चान्यदस्माकं विद्यते धनम् ॥ १० ॥
'क्योंकि हमारा राज्य, जीवन, रत्न, पुत्र-पौत्र तथा और भी जो धन-वैभव है, वह सब ब्राह्मणोंके लिये ही है। (ब्राह्मणोंके लिये हम इन सब चीजोंका त्याग कर सकते हैं) ।। १० ।।
अवमानभयाच्चैव स्वधर्मस्य च रक्षणात् ।
स्वयंवराणामन्येषां मा भूदेवंविधा गतिः ॥ ११ ॥
'द्रुपदको तो हम इसलिये दण्ड देना चाहते हैं कि (हमारा) अपमान न हो, हमारे धर्मकी रक्षा हो और दूसरे स्वयंवरोंकी भी ऐसी दुर्गति न हो' ।। ११ ।।
इत्युक्त्वा राजशार्दूला हृष्टाः परिघबाहवः ।
द्रुपदं तु जिघांसन्तः सायुधाः समुपाद्रवन् ॥ १२ ॥
यों कहकर परिघ-जैसी मोटी बाँहोंवाले वे श्रेष्ठ भूपाल हर्ष (और उत्साह)-में भरकर हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये द्रुपदको मारनेकी इच्छासे उनकी ओर वेगसे दौड़े ।। १२ ।।
तान् गृहीतशरावापान् क्रुद्धानापततो बहून् ।
द्रुपदो वीक्ष्य संत्रासाद् ब्राह्मणाञ्छरणं गतः ॥ १३ ॥
उन बहुत-से राजाओंको क्रोधमें भरकर धनुष लिये आते देख द्रुपद अत्यन्त भयभीत हो ब्राह्मणोंकी शरणमें गये ।। १३ ।।
वेगेनापततस्तांस्तु प्रभिन्नानिव वारणान् ।

पाण्डुपुत्रौ महेष्वासौ प्रतियातावरिंदमौ ॥ १४ ॥ मदकी धारा बहानेवाले मदोन्मत्त गजराजोंकी भाँति उन नरेशोंको वेगसे आते देख शत्रुदमन महाधनुर्धर पाण्डुनन्दन भीम और अर्जुन उनका सामना करनेके लिये आ गये ॥ १४ ॥

ततः समुत्पेतुरुदायुधास्ते महीक्षितो बद्धगोधाङ्गुलित्राः । जिघांसमानाः कुरुराजपुत्रा- वमर्षयन्तोऽर्जुनभीमसेनौ ॥ १५ ॥ तब हाथोंमें गोहके चमड़ेके दस्ताने पहने और आयुधोंको ऊपर उठाये अमर्षमें भरे हुए वे (सभी) नरेश कुरुराजकुमार अर्जुन और भीमसेनको मारनेके लिये उनपर टूट पड़े ॥ १५ ॥

ततस्तु भीमोऽद्भुतभीमकर्मा महाबलो वज्रसमानसारः । उत्पाट्य दोर्भ्यां द्रुममेकवीरो निष्पत्रयामास यथा गजेन्द्रः ॥ १६ ॥ तब तो वज्रके समान शक्तिशाली तथा अद्भुत एवं भयानक कर्म करनेवाले अद्वितीय वीर महाबली भीमसेनने गजराजकी भाँति अपने दोनों हाथोंसे एक वृक्षको उखाड़ लिया और उसके पत्ते झाड़ दिये ॥ १६ ॥

तं वृक्षमादाय रिपुप्रमाथी दण्डीव दण्डं पितृराज उग्रम् । तस्थौ समीपे पुरुषर्षभस्य पार्थस्य पार्थः पृथुदीर्घबाहुः ॥ १७ ॥ फिर मोटी और विशाल भुजाओंवाले शत्रुनाशन कुन्तीकुमार भीमसेन उसी वृक्षको हाथमें लेकर भयंकर दण्ड उठाये हुए दण्डधारी यमराजकी भाँति पुरुषोत्तम अर्जुनके समीप खड़े हो गये ॥ १७ ॥

तत् प्रेक्ष्य कर्मातिमनुष्यबुद्धि- र्जिष्णुः स हि भ्रातुरचिन्त्यकर्मा । विसिष्मिये चापि भयं विहाय तस्थौ धनुर्गृह्य महेन्द्रकर्मा ॥ १८ ॥ असाधारण बुद्धिवाले तथा देवराज इन्द्रके समान महापराक्रमी, अचिन्त्यकर्मा अर्जुन अपने भाई भीमसेनके (अद्भुत) कार्यको देखकर चकित हो उठे और छोड़कर धनुष हाथमें लिये हुए युद्धके लिये गये ॥ १८ ॥

तत् प्रेक्ष्य कर्मातिमनुष्यबुद्धि- र्जिष्णोः सहभ्रातुरचिन्त्यकर्मा । दामोदरो भ्रातरमुग्रवीर्यं हलायुधं वाक्यमिदं बभाषे ॥ १९ ॥ जिनकी बुद्धि लोकोत्तर और कर्म अचिन्त्य हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुन तथा उनके भाई भीमसेनका वह (साहसपूर्ण) कार्य देखकर भयंकर पराक्रमी एवं हलको ही आयुधके रूपमें धारण करनेवाले अपने भ्राता बलरामजीसे यह बात कही— ॥ १९ ॥

य एष सिंहर्षभखेलगामी महद्धनुः कर्षति तालमात्रम् । एषोऽर्जुनो नात्र विचार्यमस्ति यद्यस्मि संकर्षण वासुदेवः ॥ २० ॥

यस्त्वेष वृक्षं तरसावभज्य राज्ञां निकारे सहसा प्रवृत्तः । वृकोदरान्नान्य इहैतदद्य कर्तुं समर्थः समरे पृथिव्याम् ॥ २१ ॥ 'भैया संकर्षण! ये जो श्रेष्ठ सिंहके समान चालसे लीलापूर्वक चल रहे हैं और तालके* बराबर विशाल धनुषको खींच रहे हैं, ये अर्जुन ही हैं; इसमें विचार करनेकी कोई बात नहीं है। यदि मैं वासुदेव हूँ तो मेरी यह बात झूठी नहीं है और ये जो बड़े वेगसे वृक्ष उखाड़कर

सहसा समस्त राजाओंका सामना करनेके लिये उद्यत हुए हैं, भीमसेन हैं; क्योंकि इस समय पृथ्वीपर भीमसेनके सिवा दूसरा कोई ऐसा वीर नहीं है, जो युद्ध-भूमिमें यह अद्भुत पराक्रम कर सके ॥ २०-२१ ॥

योऽसौ पुरस्तात् कमलायताक्ष- स्तनुर्महासिंहगतिर्विनीतः । गौरः प्रलम्बोज्ज्वलचारुघोणो विनिःसृतः सोऽच्युत धर्मपुत्रः ॥ २२ ॥

'अच्युत! जो विकसित कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाले, दुबले-पतले, विनयशील, गोरे, महान् सिंहकी-सी चालसे चलनेवाले तथा लंबी, सुन्दर एवं मनोहर नाकवाले पुरुष (अभी यहाँसे) निकले हैं, वे धर्मपुत्र युधिष्ठिर हैं ॥ २२ ॥

यौ तौ कुमाराविव कार्तिकेयौ द्वावश्विनेयाविति मे वितर्कः । मुक्ता हि तस्माज्जतुवेश्मदाहा- न्मया श्रुताः पाण्डुसुताः पृथा च ॥ २३ ॥

'उनके साथ युगल कार्तिकेय-जैसे जो दो कुमार थे, वे अश्विनीकुमारोंके पुत्र नकुल और सहदेव रहे हैं—ऐसा मेरा अनुमान है; क्योंकि मैंने सुन रखा है कि उस लाक्षागृहके दाहसे पाण्डव और कुन्तीदेवी—सभी बचकर निकल गये थे ॥ २३ ॥

(यथा नृपाः पाण्डवमाजिमध्ये तं प्राब्रवीच्चक्रधरो हलायुधम् । बलं विजानन् पुरुषोत्तमस्तदा न कार्यमार्येण च सम्भ्रमस्त्वया ॥ भीमानुजो योधयितुं समर्थ एको हि पार्थः ससुरासुरान् बहून् । अलं विजेतुं किमु मानुषान् नृपान् साहाय्यमस्मान् यदि सव्यसाची । स वाञ्छति स्म प्रयताम वीर पराभवः पाण्डुसुते न चास्ति ॥)

राजालोग रणभूमिमें पाण्डुपुत्र अर्जुनके प्रति अपना क्रोध जैसे प्रकट कर रहे थे, उसे सुनकर अर्जुनके बलको जानते हुए चक्रधारी पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजीसे कहा—'भैया! आपको घबराना नहीं चाहिये। यदि बहुत-से देवता और असुर एकत्र हो जायँ, तो भी भीमके छोटे भाई कुन्तीकुमार अर्जुन उन सबके साथ अकेले ही युद्ध करनेमें समर्थ हैं। फिर इन मानव-भूपालोंपर विजय पाना कौन बड़ी बात है। यदि सव्यसाची अर्जुन

हमारी सहायता लेना चाहेंगे तो हम इसके लिये प्रयत्न करेंगे। वीरवर! मेरा विश्वास है कि पाण्डुपुत्र अर्जुनकी पराजय नहीं हो सकती।' तमब्रवीन्निर्जलतोयदाभो हलायुधोऽनन्तरजं प्रतीतः। प्रीतोऽस्मि दृष्ट्वा हि पितृष्वसारं पृथां विमुक्तां सह कौरवाग्र्यैः॥ २४॥ जलहीन मेघके समान गौरवर्णवाले हलधर (बलरामजी)-ने अपने छोटे भाई श्रीकृष्णकी बातपर विश्वास करके उनसे कहा—'भैया! कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर पाण्डवोंसहित अपनी बुआ कुन्तीको लाक्षागृहसे बची हुई देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है'॥ २४॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि कृष्णवाक्ये अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८८॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक एक सौ अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८८॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २६ १/३ श्लोक हैं।)


* ऊर्ध्वविस्तृतदोर्मानि तालमित्यभिधीयते। इस वचनके अनुसार एक मनुष्य अपनी बाँहको ऊपर उठाकर खड़ा हो तो उस हाथसे लेकर पैरतककी लम्बाईको 'ताल' कहते हैं।

१८९-

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एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुन और भीमसेनके द्वारा कर्ण तथा शल्यकी पराजय और द्रौपदीसहित भीम-अर्जुनका अपने डेरेपर जाना

वैशम्पायन उवाच

अजिनानि विधुन्वन्तः करकांश्च द्विजर्षभाः ।
ऊचुस्ते भीर्न कर्तव्या वयं योत्स्यामहे परान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस समय अपने मृगचर्म और कमण्डलुओंको हिलाते और उछालते हुए वे श्रेष्ठ ब्राह्मण अर्जुनसे कहने लगे—'तुम डरना नहीं, हम (सब)-लोग (तुम्हारी ओरसे) शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे' ॥ १ ॥

तानेवं वदतो विप्रानर्जुनः प्रहसन्निव ।
उवाच प्रेक्षका भूत्वा यूयं तिष्ठथ पार्श्वतः ॥ २ ॥
इस प्रकारकी बातें करनेवाले उन ब्राह्मणोंसे अर्जुनने हँसते हुए-से कहा—'आपलोग दर्शक होकर बगलमें चुपचाप खड़े रहें' ॥ २ ॥

अहमेनानजिह्मागैः शतशो विकिरञ्छरैः ।
वारयिष्यामि संक्रुद्धान् मन्त्रैराशीविषानिव ॥ ३ ॥
'मैं (अकेला ही) सीधी नोकवाले सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करके क्रोधमें भरे हुए इन शत्रुओंको उसी प्रकार रोक दूँगा, जैसे मन्त्रज्ञ लोग अपने मन्त्रों (के बल)-से विषैले सर्पोंको कुण्ठित कर देते हैं' ॥ ३ ॥

इति तद् धनुरानम्य शुल्कावाप्तं महाबलः ।
भ्रात्रा भीमेन सहितस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ ४ ॥
यों कहकर महाबली अर्जुनने उसी स्वयंवरमें लक्ष्यवेधके लिये प्राप्त हुए धनुषको झुकाकर (उसपर प्रत्यंचा चढ़ा दी और उसे हाथमें लेकर) भाई भीमसेनके साथ वे पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े हो गये ॥ ४ ॥

ततः कर्णमुखान् दृष्ट्वा क्षत्रियान् युद्धदुर्मदान् ।
सम्पेततुरभीतौ तौ गजौ प्रतिगजानिव ॥ ५ ॥
तदनन्तर कर्ण आदि रणोन्मत्त क्षत्रियोंको आते देख वे दोनों भाई निर्भय हो उनपर उसी तरह टूट पड़े, जैसे दो (मतवाले) हाथी अपने विपक्षी हाथियोंकी ओर बढ़े जा रहे हों ॥ ५ ॥

ऊचुश्च वाचः परुषास्ते राजानो युयुत्सवः ।
आहवे हि द्विजस्यापि वधो दृष्टो युयुत्सतः ॥ ६ ॥

तब युद्धके लिये उत्सुक उन राजाओंने कठोर स्वरमें ये बातें कहीं—'युद्धकी इच्छावाले ब्राह्मणका भी रणभूमिमें वध शास्त्रानुकूल देखा गया है' ।। ६ ।।

इत्येवमुक्त्वा राजानः सहसा दुद्रुवुर्द्विजान् । ततः कर्णो महातेजा जिष्णुं प्रति ययौ रणे ।। ७ ।। यों कहकर वे राजालोग सहसा ब्राह्मणोंकी ओर दौड़े। महातेजस्वी कर्ण अर्जुनकी ओर युद्धके लिये बढ़ा ।। ७ ।।

युद्धार्थी वासिताहेतोर्गजः प्रतिगजं यथा । भीमसेनं ययौ शल्यो मद्राणामीश्वरो बली ।। ८ ।। ठीक उसी तरह, जैसे हथिनीके लिये लड़नेकी इच्छा रखकर एक हाथी अपने प्रतिद्वन्द्वी दूसरे हाथीसे भिड़नेके लिये जा रहा हो, महाबली मद्रराज शल्य भीमसेनसे जा भिड़े ।। ८ ।।

दुर्योधनादयः सर्वे ब्राह्मणैः सह संगताः । मृदुपूर्वमयत्नेन प्रत्ययुध्यंस्तदाहवे ।। ९ ।। दुर्योधन आदि सभी (भूपाल) एक साथ अन्यान्य ब्राह्मणोंके साथ उस युद्धभूमिमें बिना किसी प्रयासके (खेल-सा करते हुए) कोमलतापूर्वक (शीत) युद्ध करने लगे ।। ९ ।।

ततोऽर्जुनः प्रत्यविध्यदापतन्तं शितैः शरैः । कर्णं वैकर्तनं श्रीमान् विकृष्य बलवद् धनुः ।। १० ।। तब तेजस्वी अर्जुनने अपने धनुषको जोरसे खींचकर अपनी ओर वेगसे आते हुए सूर्यपुत्र कर्णको कई तीक्ष्ण बाण मारे ।। १० ।।

तेषां शराणां वेगेन शितानां तिग्मतेजसाम् । विमुह्यमानो राधेयो यत्नात् तमनुधावति ।। ११ ।। उन दुःसह तेजवाले तीखे बाणोंके वेगपूर्वक आघातसे राधानन्दन कर्णको मूर्च्छा आने लगी। वह बड़ी कठिनाईसे अर्जुनकी ओर बढ़ा ।। ११ ।।

तावुभावप्यनिर्देश्यौ लाघवाज्जयतां वरौ । अयुध्येतां सुसंरब्धावन्योन्यविजिगीषिणौ ।। १२ ।। विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ वे दोनों योद्धा हाथोंकी फुर्ती दिखानेमें बेजोड़ थे, उनमें कौन बड़ा है और कौन छोटा—यह बताना असम्भव था। दोनों ही एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा रखकर बड़े क्रोधसे लड़ रहे थे ।। १२ ।।

कृते प्रतिकृतं पश्य पश्य बाहुबलं च मे । इति शूरार्थवचनैरभाषेतां परस्परम् ।। १३ ।। 'देखो, तुमने जिस अस्त्रका प्रयोग किया था, उसे रोकनेके लिये मैंने यह अस्त्र चलाया है। देख लो, मेरी भुजाओंका बल!' इस प्रकार शौर्यसूचक वचनोंद्वारा वे आपसमें बातें भी करते जाते थे ।। १३ ।।