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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

वे उठकर बैठे हुए महाराजसे कल्याणमयी मधुर वाणीमें बोले—'नरश्रेष्ठ! आप डरें नहीं। अनघ! आपका कल्याण हो' ॥ ७ ॥

क्षुत्पिपासापरिश्रान्तं तर्कयामास वै नृपम् ।
पतितं पातनं संख्ये शात्रवाणां महीतले ॥ ८ ॥
युद्धमें शत्रुदलको पृथ्वीपर गिरा देनेवाले नरेशको भूमिपर गिरा देख मन्त्रीने यह अनुमान लगाया कि ये भूख-प्याससे पीड़ित एवं थके-माँदे हैं ॥ ८ ॥

वारिणा च सुशीतेन शिरस्तस्याभ्यषेचयत् ।
अस्फुटन्मुकुटं राज्ञः पुण्डरीकसुगन्धिना ॥ ९ ॥
गिरनेपर राजाका मुकुट छिन्न-भिन्न नहीं हुआ था (इससे अनुमान होता था कि राजा युद्धमें घायल नहीं हुए हैं)। मन्त्रीने राजाके मस्तकको कमलकी सुगन्धसे युक्त ठंडे जलसे सींचा ॥ ९ ॥

ततः प्रत्यागतप्राणस्तद् बलं बलवान् नृपः ।
सर्वं विसर्जयामास तमेकं सचिवं विना ॥ १० ॥
उससे राजाको चेत हो आया। बलवान् नरेशने एकमात्र अपने मन्त्रीके सिवा सारी सेनाको लौटा दिया ॥ १० ॥

ततस्तस्याज्ञया राज्ञो विप्रतस्थे महत् बलम् ।
स तु राजा गिरिप्रस्थे तस्मिन् पुनरुपाविशत् ॥ ११ ॥
महाराजकी आज्ञासे तुरंत वह विशाल सेना राजधानीकी ओर चल दी; परंतु वे राजा संवरण फिर उसी पर्वत-शिखरपर जा बैठे ॥ ११ ॥

ततस्तस्मिन् गिरिवरे शुचिर्भूत्वा कृताञ्जलिः ।
आरिराधयिषुः सूर्य तस्थावूर्ध्वमुखः क्षितौ ॥ १२ ॥
तदनन्तर उस श्रेष्ठ पर्वतपर स्नानादिसे पवित्र हो भगवान् सूर्यकी आराधना करनेके लिये हाथ जोड़ ऊपरकी ओर मुँह किये वे भूमिपर खड़े हो गये ॥ १२ ॥

जगाम मनसा चैव वसिष्ठमृषिसत्तमम् ।
पुरोहितममित्रघ्नस्तदा संवरणो नृपः ॥ १३ ॥
उस समय शत्रुओंका नाश करनेवाले राजा संवरणने अपने पुरोहित मुनिवर वसिष्ठका मन-ही-मन स्मरण किया ॥ १३ ॥

नक्तं दिनमथैकत्र स्थिते तस्मिञ्जनाधिपे ।
अथाजगाम विप्रर्षिस्तदा द्वादशमेऽहनि ॥ १४ ॥
वे रात-दिन एक ही जगह खड़े होकर तपस्यामें लगे रहे। तब बारहवें दिन महर्षि वसिष्ठका (वहाँ) शुभागमन हुआ ॥ १४ ॥

स विदित्वैव नृपतिं तपत्या हृतमानसम् ।
दिव्येन विधिना ज्ञात्वा भावितात्मा महार्नृषिः ॥ १५ ॥

विशुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि वसिष्ठ दिव्यज्ञानसे पहले ही जान गये कि सूर्यकन्या तपतीने राजाका चित्त चुरा लिया है ॥ १५ ॥ तथा तु नियतात्मानं तं नृपं मुनिसत्तमः । आबभाषे स धर्मात्मा तस्यैवार्थचिकीर्षया ॥ १६ ॥ इस प्रकार मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर तपस्यामें लगे हुए उक्त नरेशसे धर्मात्मा मुनिवर वसिष्ठने उन्हींकी कार्यसिद्धिके लिये कुछ बातचीत की ॥ १६ ॥ स तस्य मनुजेन्द्रस्य पश्यतो भगवानृषिः । ऊर्ध्वमाचक्रमे द्रष्टुं भास्करं भास्करद्युतिः ॥ १७ ॥ उक्त महाराजके देखते-देखते सूर्यके समान तेजस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनि सूर्यदेवसे मिलनेके लिये ऊपरको गये ॥ १७ ॥ सहस्रांशुं ततो विप्रः कृताञ्जलिरुपस्थितः । वसिष्ठोऽहमिति प्रीत्या स चात्मानं न्यवेदयत् ॥ १८ ॥ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ दोनों हाथ जोड़कर सहस्रों किरणोंसे सुशोभित भगवान् सूर्यदेवके समीप गये और 'मैं वसिष्ठ हूँ' यों कहकर उन्होंने बड़ी प्रसन्नतासे अपना समाचार निवेदित किया ॥ १८ ॥

(वसिष्ठ उवाच

अजाय लोकत्रयपावनाय भूतात्मने गोपतये वृषाय । सूर्याय सर्गप्रलयालयाय नमो महाकारुणिकोत्तमाय ॥ विवस्वते ज्ञानभृदन्तरात्मने जगत्प्रदीपाय जगद्धितैषिणे । स्वयम्भुवे दीप्तसहस्रचक्षुषे सुरोत्तमायामिततेजसे नमः ॥ नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसूतिस्थितिनाशहेतवे । त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरिञ्चिनारायणशङ्करात्मने ॥) **फिर वसिष्ठजी बोले—**जो अजन्मा, तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाले, समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी, किरणोंके अधिपति, धर्मस्वरूप, सृष्टि और प्रलयके अधिष्ठान तथा परम दयालु देवताओंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, उन भगवान् सूर्यको नमस्कार है। जो ज्ञानियोंके अन्तरात्मा, जगत्‌को प्रकाशित करनेवाले, संसारके हितैषी, स्वयम्भू तथा सहस्रों उद्दीप्त

नेत्रोंसे सुशोभित हैं, उन अमिततेजस्वी सुरश्रेष्ठ भगवान् सूर्यको नमस्कार है। जो जगत्के एकमात्र नेत्र हैं, संसारकी सृष्टि, पालन और संहारके हेतु हैं, तीनों वेद जिनके स्वरूप हैं, जो त्रिगुणात्मक स्वरूप धारण करके ब्रह्मा, विष्णु और शिव नामसे प्रसिद्ध हैं, उन भगवान् सविताको नमस्कार है।

तमुवाच महातेजा विवस्वान् मुनिसत्तमम् ।
महर्षे स्वागतं तेऽस्तु कथयस्व यथेप्सितम् ॥ १९ ॥
तब महातेजस्वी भगवान् सूर्यने मुनिवर वसिष्ठसे कहा—‘महर्षे! तुम्हारा स्वागत है! तुम्हारी जो अभिलाषा हो, उसे कहो ॥ १९ ॥

यदिच्छसि महाभाग मत्तः प्रवदतां वर ।
तत् ते दद्यामभिप्रेतं यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् ॥ २० ॥
‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाभाग! तुम मुझसे जो कुछ चाहते हो, तुम्हारी वह अभीष्ट वस्तु कितनी ही दुर्लभ क्यों न हो, तुम्हें अवश्य दूँगा ॥ २० ॥

(स्तुतोऽस्मि वरदस्तेऽहं वरं वरय सुव्रत ।
स्तुतिस्त्वयोक्ता भक्तानां जप्येयं वरदोऽस्म्यहम् ॥)
‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! तुमने जो मेरा स्तवन किया है, इसके लिये मैं तुम्हें वर देनेको उद्यत हूँ, कोई वर माँगो। तुम्हारे द्वारा कही हुई वह स्तुति भक्तोंके लिये निरन्तर जप करनेयोग्य है। मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ’।

एवमुक्तः स तेनर्षिर्वसिष्ठः प्रत्यभाषत ।
प्रणिपत्य विवस्वन्तं भानुमन्तं महातपाः ॥ २१ ॥
उनके यों कहनेपर महातपस्वी मुनिवर वसिष्ठ मरीचि-माली भगवान् भास्करको प्रणाम करके इस प्रकार बोले ॥ २१ ॥

वसिष्ठ उवाच

यैषा ते तपती नाम सावित्र्यवरजा सुता ।
तां त्वां संवरणस्यार्थे वरयामि विभावसो ॥ २२ ॥
**वसिष्ठजीने कहा—**विभावसो! यह जो आपकी तपती नामकी पुत्री एवं सावित्रीकी छोटी बहिन है, इसे मैं आपसे राजा संवरणके लिये माँगता हूँ ॥ २२ ॥

स हि राजा बृहत्कीर्तिर्धर्मार्थविदुदारधीः ।
युक्तः संवरणो भर्ता दुहितुस्ते विहंगम ॥ २३ ॥
उस राजाकी कीर्ति बहुत दूरतक फैली हुई है। वे धर्म और अर्थके ज्ञाता तथा उदार बुद्धिवाले हैं; अतः आकाशचारी सूर्यदेव! महाराज संवरण आपकी पुत्रीके लिये सुयोग्य पति होंगे ॥ २३ ॥

इत्युक्तः स तदा तेन ददानीत्येव निश्चितः ।

प्रत्यभाषत तं विप्रं प्रतिनन्द्य दिवाकरः ॥ २४ ॥
वसिष्ठजीके यों कहनेपर अपनी कन्या देनेका निश्चय करके भगवान् सूर्यने ब्रह्मर्षिका अभिनन्दन किया और इस प्रकार कहा— ॥ २४ ॥
वरः संवरणो राज्ञां त्वमृषीणां वरो मुने ।
तपती योषितां श्रेष्ठा किमन्यदपवर्जनात् ॥ २५ ॥
‘मुने! संवरण राजाओंमें श्रेष्ठ हैं, आप महर्षियोंमें उत्तम हैं और तपती युवतियोंमें सर्वश्रेष्ठ है; अतः उसके दानसे श्रेष्ठ और क्या हो सकता है’ ॥ २५ ॥
ततः सर्वानवद्याङ्गीं तपतीं तपनः स्वयम् ।
ददौ संवरणस्यार्थे वसिष्ठाय महात्मने ॥ २६ ॥
तदनन्तर साक्षात् भगवान् सूर्यने अनिन्द्यसुन्दरी तपतीको राजा संवरणकी पत्नी होनेके लिये महात्मा वसिष्ठको अर्पित कर दिया ॥ २६ ॥
प्रतिजग्राह तां कन्यां महर्षिस्तपतीं तदा ।
वसिष्ठोऽथ विसृष्टस्तु पुनरेवाजगाम ह ॥ २७ ॥
यत्र विख्यातकीर्तिः स कुरूणामृषभोऽभवत् ।
स राजा मन्मथाविष्टस्तद्गतेनान्तरात्मना ॥ २८ ॥
ब्रह्मर्षि वसिष्ठने उस कन्याको ग्रहण किया और वहाँसे विदा होकर वे तपतीके साथ पुनः उस स्थानपर आये, जहाँ विख्यातकीर्ति, कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ राजा संवरण कामके वशीभूत हो मन-ही-मन तपतीका चिन्तन करते हुए बैठे थे ॥ २७-२८ ॥
दृष्ट्वा च देवकन्यां तां तपतीं चारुहासिनीम् ।
वसिष्ठेन सहायान्तीं संहृष्टोऽभ्यधिकं बभौ ॥ २९ ॥
मनोहर मुसकानवाली देवकन्या तपतीको वसिष्ठजीके साथ आती देख राजा संवरण अत्यन्त हर्षोल्लाससे युक्त हो अधिक शोभा पाने लगे ॥ २९ ॥

रुरुचे साधिकं सुभ्रूरापतन्ती नभस्तलात् । सौदामिनीव विभ्रष्टा द्योतयन्ती दिशस्त्विषा ।। ३० ।। सुन्दर भौंहोंवाली तपती आकाशसे पृथ्वीपर आते समय गिरी हुई बिजलीके समान सम्पूर्ण दिशाओंको अपनी प्रभासे प्रकाशित करती हुई अधिक सुशोभित हो रही थी ।। ३० ।।

कृच्छ्राद् द्वादशरात्रे तु तस्य राज्ञः समाहिते । आजगाम विशुद्धात्मा वसिष्ठो भगवानृषिः ।। ३१ ।। राजाने क्लेश सहन करते हुए बारह राततक एकाग्रचित्त होकर ध्यान लगाया था। तब विशुद्ध अन्तःकरणवाले भगवान् वसिष्ठ मुनि राजाके पास आये थे ।। ३१ ।।

तपसाऽऽराध्य वरदं देवं गोपतिमीश्वरम् । लेभे संवरणो भार्यां वसिष्ठस्यैव तेजसा ।। ३२ ।। सबके अधीश्वर वरदायक देवशिरोमणि भगवान् सूर्यको तपस्याद्वारा प्रसन्न करके महाराज संवरणने वसिष्ठजीके ही तेजसे तपतीको पत्नीरूपमें प्राप्त किया ।। ३२ ।।

ततस्तस्मिन् गिरिश्रेष्ठे देवगन्धर्वसेविते । जग्राह विधिवत् पाणिं तपत्याः स नरर्षभः ।। ३३ ।। तदनन्तर उन नरश्रेष्ठने देवताओं और गन्धर्वोंसे सेवित उस उत्तम पर्वतपर विधिपूर्वक तपतीका पाणिग्रहण किया ।। ३३ ।।

वसिष्ठेनाभ्यनुज्ञातस्तस्मिन्नेव धराधरे । सोऽकामयत राजर्षिर्विहर्तुं सह भार्यया ॥ ३४ ॥ उसके बाद वसिष्ठजीकी आज्ञा लेकर राजर्षि संवरणने उसी पर्वतपर अपनी पत्नीके साथ विहार करनेकी इच्छा की ॥ ३४ ॥

ततः पुरे च राष्ट्रे च वनेषूपवनेषु च । आदिदेश महीपालस्तमेव सचिवं तदा ॥ ३५ ॥ उन दिनों भूपालने नगर, राष्ट्र, वन तथा उपवनोंकी देखभाल एवं रक्षाके लिये मन्त्रीको ही आदेश देकर विदा किया ॥ ३५ ॥

नृपतिं त्वभ्यनुज्ञाप्य वसिष्ठोऽथापचक्रमे । सोऽथ राजा गिरौ तस्मिन् विजहारामरो यथा ॥ ३६ ॥ वसिष्ठजी भी राजासे विदा ले अपने स्थानको चले गये। तदनन्तर राजा संवरण उस पर्वतपर देवताकी भाँति विहार करने लगे ॥ ३६ ॥

ततो द्वादश वर्षाणि काननेषु वनेषु च । रेमे तस्मिन् गिरौ राजा तथैव सह भार्यया ॥ ३७ ॥ वे उसी पर्वतके वनों और काननोंमें अपनी पत्नीके साथ उसी प्रकार बारह वर्षोंतक रमण करते रहे ॥ ३७ ॥

तस्य राज्ञः पुरे तस्मिन् समा द्वादश सत्तम । न ववर्ष सहस्राक्षो राष्ट्रे चैवास्य भारत ॥ ३८ ॥ अर्जुन! उन दिनों महाराज संवरणके राज्य और नगरमें इन्द्रने बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं की ॥ ३८ ॥

ततस्तस्यामनावृष्ट्यां प्रवृत्तायामरिंदम । प्रजाः क्षयमुपाजग्मुः सर्वाः सस्थाणुजङ्गमाः ॥ ३९ ॥ शत्रुसूदन! उस अनावृष्टिके समय प्रायः स्थावर एवं जंगम सभी प्रकारकी प्रजाका क्षय होने लगा ॥ ३९ ॥

तस्मिंस्तथाविधे काले वर्तमाने सुदारुणे । नावश्यायः पपातोर्व्यां ततः सस्यानि नारुहन् ॥ ४० ॥ ऐसे भयंकर समयमें पृथ्वीपर ओसकी एक बूँदतक न गिरी। परिणाम यह हुआ कि खेती उगती ही नहीं थी ॥ ४० ॥

ततो विभ्रान्तमनसो जनाः क्षुद्भयपीडिताः । गृहाणि सम्परित्यज्य बभ्रमुः प्रदिशो दिशः ॥ ४१ ॥ तब सभी लोगोंका चित्त व्याकुल हो उठा। मनुष्य भूखके भयसे पीड़ित हो घरोंको छोड़कर दिशा-विदिशाओंमें मारे-मारे फिरने लगे ॥ ४१ ॥

ततस्तस्मिन् पुरे राष्ट्रे त्यक्तदारपरिग्रहाः ।

परस्परममर्यादाः क्षुधार्ता जघ्निरे जनाः ॥ ४२ ॥
तत् क्षुधार्तैर्निरासहारैः शवभूतैस्तथा नरैः ।
अभवत् प्रेतराजस्य पुरं प्रेतैरिवावृतम् ॥ ४३ ॥
फिर तो उस नगर और राष्ट्रके लोग क्षुधासे पीड़ित हो सनातन मर्यादाको छोड़कर स्त्री, पुत्र एवं परिवार आदिका त्याग करके परस्पर एक-दूसरेको मारने और लूटने-खसोटने लगे। राजाका नगर ऐसे लोगोंसे भर गया, जो भूखसे आतुर हो उपवास करते-करते मुर्दोंके समान हो रहे थे। उन नर-कंकालोंसे परिपूर्ण वह नगर प्रेतोंसे घिरे हुए यमराजके निवासस्थान-सा जान पड़ता था ॥ ४२-४३ ॥

ततस्तत् तादृशं दृष्ट्वा स एव भगवानृषिः ।
अभ्यवर्षत धर्मात्मा वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥ ४४ ॥
प्रजाकी ऐसी दुरवस्था देख धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठने ही (अपने तपोबलसे) उस राज्यमें वर्षा की ॥ ४४ ॥

तं च पार्थिवशार्दूलमानयामास तत् पुरम् ।
तपत्या सहितं राजन् व्युषितं शाश्वतीः समाः ।
ततः प्रवृष्टस्तत्रासीद् यथापूर्वं सुरारिहा ॥ ४५ ॥
साथ ही वे नृपश्रेष्ठ संवरणको, जो बहुत वर्षोंसे प्रवासी हो रहे थे, तपतीके साथ नगरमें ले आये। उनके आनेपर दैत्यहन्ता देवराज इन्द्र वहाँ पूर्ववत् वर्षा करने लगे ॥ ४५ ॥

तस्मिन् नृपतिशार्दूले प्रविष्टे नगरं पुनः ।
प्रववर्ष सहस्राक्षः सस्यानि जनयन् प्रभुः ॥ ४६ ॥
उन श्रेष्ठ राजाके नगरमें प्रवेश करनेपर भगवान् इन्द्रने वहाँ अन्नका उत्पादन बढ़ानेके लिये पुनः अच्छी वर्षा की ॥ ४६ ॥

ततः सराष्ट्रं मुमुदे तत् पुरं परया मुदा ।
तेन पार्थिवमुख्येन भावितं भावितात्मना ॥ ४७ ॥
तबसे शुद्ध अन्तःकरणवाले नृपश्रेष्ठ संवरणके द्वारा पालित सब लोग प्रसन्न रहने लगे। उस राज्य और नगरमें बड़ा आनन्द छा गया ॥ ४७ ॥

ततो द्वादश वर्षाणि पुनरीजे नराधिपः ।
तपत्या सहितः पत्न्या यथा शच्या मरुत्पतिः ॥ ४८ ॥
तदनन्तर तपतीके सहित महाराज संवरणने शचीके साथ इन्द्रके समान सुशोभित होते हुए बारह वर्षोंतक यज्ञ किया ॥ ४८ ॥

गन्धर्व उवाच

एवमासीन्महाभागा तपती नाम पौर्विकी ।
तव वैवस्वती पार्थ ताप्त्यस्त्वं यया मतः ॥ ४९ ॥

गन्धर्व कहता है— कुन्तीनन्दन! इस प्रकार भगवान् सूर्यकी पुत्री महाभागा तपती आपके पूर्वपुरुष संवरणकी पत्नी हुई थी, जिससे मैंने आपको तपतीनन्दन माना है॥ ४९॥
तस्यां संजनयामास कुरुं संवरणो नृपः।
तपत्यां तपतां श्रेष्ठ तापत्यस्त्वं ततोऽर्जुन ॥ ५० ॥
तपस्वीजनोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! महाराज संवरणने तपतीके गर्भसे कुरुको उत्पन्न किया था; अतः उसी वंशमें जन्म लेनेके कारण आपलोग तापत्य हुए॥ ५०॥
(कुरूद्गवा यतो यूयं कौरवाः कुरवस्तथा।
पौरवा आजमीढाश्च भारता भरतर्षभ ॥
तापत्यमखिलं प्रोक्तं वृत्तान्तं तव पूर्वकम् ।
पुरोहितमुखा यूयं भुङ्ग्ध्वं वै पृथिवीमिमाम् ॥)
भरतश्रेष्ठ उन्हीं कुरुसे उत्पन्न होनेके कारण आप सब लोग ‘कौरव’ तथा ‘कुरुवंशी’ कहलाते हैं। इसी प्रकार पुरुसे उत्पन्न होनेके कारण ‘पौरव’, अजमीढकुलमें जन्म लेनेसे ‘आजमीढ’ तथा भरतकुलमें उत्पन्न होनेसे ‘भारत’ कहलाते हैं। इस प्रकार आपलोगोंकी वंशजननी तपतीका सारा पुरातन वृत्तान्त मैंने बता दिया। अब आपलोग पुरोहितको आगे रखकर इस पृथ्वीका पालन एवं उपभोग करें।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि तपत्युपाख्यानसमाप्तौ
द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें तपती-उपाख्यानकी समाप्तिसे
सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७२ ॥

१७३-

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त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

गन्धर्वका वसिष्ठजीकी महत्ता बताते हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको पुरोहित बनानेके लिये आग्रह करना

वैशम्पायन उवाच

स गन्धर्ववचः श्रुत्वा तत् तदा भरतर्षभ ।
अर्जुनः परया भक्त्या पूर्णचन्द्र इवाबभौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ जनमेजय! गन्धर्वका यह कथन सुनकर अर्जुन अत्यन्त भक्तिभावके कारण पूर्ण चन्द्रमाके समान शोभा पाने लगे ॥ १ ॥

उवाच च महेष्वासो गन्धर्वं कुरुसत्तमः ।
जातकौतूहलोऽतीव वसिष्ठस्य तपोबलात् ॥ २ ॥
फिर महाधनुर्धर कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने गन्धर्वसे कहा—'सखे! वसिष्ठके तपोबलकी बात सुनकर मेरे हृदयमें बड़ी उत्कण्ठा पैदा हो गयी है ॥ २ ॥

वसिष्ठ इति तस्यैतदृषेर्नाम त्वयेरितम् ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं यथावत् तद् वदस्व मे ॥ ३ ॥
‘तुमने उन महर्षिका नाम वसिष्ठ बताया था। उनका यह नाम क्यों पड़ा? इसे मैं सुनना चाहता हूँ। तुम यथार्थ रूपसे मुझे बताओ ॥ ३ ॥

य एष गन्धर्वपते पूर्वेषां नः पुरोहितः ।
आसीदेतन्ममाचक्ष्व क एष भगवानृषिः ॥ ४ ॥
‘गन्धर्वराज! ये जो हमारे पूर्वजोंके पुरोहित थे, वे भगवान् वसिष्ठ मुनि कौन हैं? यह मुझसे कहो' ॥ ४ ॥

गन्धर्व उवाच

ब्रह्मणो मानसः पुत्रो वसिष्ठोऽरुन्धतीपतिः ।
तपसा निर्जितौ शश्वदजेयावमरैरपि ॥ ५ ॥
कामक्रोधावुभौ यस्य चरणौ संववाहतुः ।
इन्द्रियाणां वशकरो वसिष्ठ इति चोच्यते ॥ ६ ॥
गन्धर्वने कहा— वसिष्ठजी ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं। उनकी पत्नीका नाम अरुन्धती है। जिन्हें देवता भी कभी जीत नहीं सके, वे काम और क्रोध नामक दोनों शत्रु वसिष्ठजीकी तपस्यासे सदाके लिये पराभूत होकर उनके चरण दबाते रहे हैं। इन्द्रियोंको वशमें करनेके कारण वे वसिष्ठ कहलाते हैं ॥ ५-६ ॥

यस्तु नोच्छेदनं चक्रे कुशिकानामुदारधीः ।

विश्वामित्रापराधेन धारयन् मन्युमुत्तमम् ॥ ७ ॥ विश्वामित्रके अपराधसे मनमें पवित्र क्रोध धारण करते हुए भी उन उदारबुद्धि महर्षिने कुशिकवंशका समूलोच्छेद नहीं किया ॥ ७ ॥

पुत्रव्यसनसंतप्तः शक्तिमानप्यशक्तवत् । विश्वामित्रविनाशाय न चक्रे कर्म दारुणम् ॥ ८ ॥ विश्वामित्रके द्वारा अपने सौ पुत्रोंके मारे जानेसे वे संतप्त थे, उनमें बदला लेनेकी शक्ति भी थी, तो भी उन्होंने असमर्थकी भाँति सब कुछ सह लिया एवं विश्वामित्रका विनाश करनेके लिये कोई दारुण कर्म नहीं किया ॥ ८ ॥

मृतांश्च पुनराहर्तुं शक्तः पुत्रान् यमक्षयात् । कृतान्तं नातिचक्राम वेलामिव महोदधिः ॥ ९ ॥ वे अपने मरे हुए पुत्रोंको यमलोकसे वापस ला सकते थे; परंतु जैसे महासागर अपने तटका उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार वे यमराजकी मर्यादाको लाँघनेके लिये उद्यत नहीं हुए ॥ ९ ॥

यं प्राप्य विजितात्मानं महात्मानं नराधिपाः । इक्ष्वाकवो महीपाला लेभिरे पृथिवीमिमाम् ॥ १० ॥ उन्हीं जितात्मा महात्मा वसिष्ठ मुनिको (पुरोहितरूपमें) पाकर इक्ष्वाकुवंशी भूपालोंने (दीर्घ-कालतक) इस (समूची) पृथ्वीपर अधिकार प्राप्त किया था ॥ १० ॥

पुरोहितमिमं प्राप्य वसिष्ठमृषिसत्तमम् । ईजिरे क्रतुभिश्चैव नृपास्ते कुरुनन्दन ॥ ११ ॥ कुरुनन्दन! इन्हीं मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको पुरोहित-रूपमें पाकर उन नरपतियोंने बहुत-से यज्ञ भी किये थे ॥ ११ ॥

स हि तान् याजयामास सर्वान् नृपतिसत्तमान् । ब्रह्मर्षिः पाण्डवश्रेष्ठ बृहस्पतिरिवामरान् ॥ १२ ॥ पाण्डवश्रेष्ठ! जैसे बृहस्पतिजी सम्पूर्ण देवताओंका यज्ञ कराते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मर्षि वसिष्ठने उन सम्पूर्ण श्रेष्ठ राजाओंका यज्ञ कराया था ॥ १२ ॥

तस्माद् धर्मप्रधानात्मा वेदधर्मविदीप्सितः । ब्राह्मणो गुणवान् कश्चित् पुरोधाः प्रतिदृश्यताम् ॥ १३ ॥ इसलिये जिसके मनमें धर्मकी प्रधानता हो, जो वेदोक्त धर्मका ज्ञाता और मनके अनुकूल हो; ऐसे किसी गुणवान् ब्राह्मणको आपलोग भी पुरोहित बनानेका निश्चय करें ॥ १३ ॥

क्षत्रियेणाभिजातेन पृथिवीं जेतुमिच्छता । पूर्वं पुरोहितः कार्यः पार्थ राज्याभिवृद्धये ॥ १४ ॥

पार्थ! पृथ्वीको जीतनेकी इच्छा रखनेवाले कुलीन क्षत्रियको अपने राज्यकी वृद्धिके लिये पहले (किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको) पुरोहित नियुक्त कर लेना चाहिये ॥ १४ ॥ महीं जिगीषता राज्ञा ब्रह्मकार्यं पुरस्सरम् । तस्मात् पुरोहितः कश्चिद् गुणवान् विजितेन्द्रियः । विद्वान् भवतु वो विप्रो धर्मकामार्थतत्त्ववित् ॥ १५ ॥ पृथ्वीको जीतनेकी इच्छावाले राजाको उचित है कि वह ब्राह्मणको अपने आगे रखे; अतः कोई गुणवान्, जितेन्द्रिय, वेदाभ्यासी, विद्वान् तथा धर्म, काम और अर्थका तत्त्वज्ञ ब्राह्मण आपका पुरोहित हो ॥ १५ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि पुरोहितकरणकथने त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें पुरोहित बनानेके लिये कथनसम्बन्धी एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७३ ॥

१७४-

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चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

वसिष्ठजीके अद्भुत क्षमा-बलके आगे विश्वामित्रजीका पराभव

अर्जुन उवाच

किंनिमित्तमभूद् वैरं विश्वामित्रवसिष्ठयोः ।
वसतोराश्रमे दिव्ये शंस नः सर्वमेव तत् ॥ १ ॥

अर्जुनने पूछा—गन्धर्वराज! विश्वामित्र और वसिष्ठ मुनि तो अपने-अपने दिव्य आश्रममें निवास करते हैं, फिर उनमें वैर किस कारण हुआ? ये सब बातें मुझसे कहो ॥ १ ॥

गन्धर्व उवाच

इदं वासिष्ठमाख्यानं पुराणं परिचक्षते ।
पार्थ सर्वेषु लोकेषु यथावत् तन्निबोध मे ॥ २ ॥

गन्धर्वने कहा—पार्थ! वसिष्ठजीके इस उपाख्यानको सब लोकोंमें बहुत पुराना बतलाते हैं। उसे यथार्थरूपसे कहता हूँ, सुनिये ॥ २ ॥

कान्यकुब्जे महानासीत् पार्थिवो भरतर्षभ ।
गाधीति विश्रुतो लोके कुशिकस्यात्मसम्भवः ॥ ३ ॥

भरतवंशशिरोमणे! कान्यकुब्ज देशमें एक बहुत बड़े राजा थे, जो इस लोकमें गाधिके नामसे विख्यात थे। वे कुशिकके औरस पुत्र बताये जाते हैं ॥ ३ ॥

तस्य धर्मात्मनः पुत्रः समृद्धबलवाहनः ।
विश्वामित्र इति ख्यातो बभूव रिपुमर्दनः ॥ ४ ॥

उन्हीं धर्मात्मा नरेशके पुत्र विश्वामित्रके नामसे प्रसिद्ध हैं, जो सेना और वाहनोंसे सम्पन्न होकर शत्रुओंका मानमर्दन किया करते थे ॥ ४ ॥

स चचार सहामात्यो मृगयां गहने वने ।
मृगान् विध्यन् वराहांश्च रम्येषु मरुधन्वसु ॥ ५ ॥
व्यायामकर्शितः सोऽथ मृगलिप्सुः पिपासितः ।
आजगाम नरश्रेष्ठ वसिष्ठस्याश्रमं प्रति ॥ ६ ॥
तमागतमभिप्रेक्ष्य वसिष्ठः श्रेष्ठभागृषिः ।
विश्वामित्रं नरश्रेष्ठं प्रतिजग्राह पूजया ॥ ७ ॥

एक दिन वे अपने मन्त्रियोंके साथ गहन वनमें आखेटके लिये गये। मरुप्रदेशके सुरम्य वनोंमें उन्होंने वराहों और अन्य हिंसक पशुओंको मारते हुए एक हिंसक पशुको पकड़नेके

लिये उसका पीछा किया। अधिक परिश्रमके कारण उन्हें बड़ा कष्ट सहना पड़ा। नरश्रेष्ठ! वे प्याससे पीड़ित हो महर्षि वसिष्ठके आश्रममें आये। मनुष्योंमें श्रेष्ठ महाराज विश्वामित्रको आया देख पूजनीय पुरुषोंकी पूजा करनेवाले महर्षि वसिष्ठने उनका सत्कार करते हुए आतिथ्य ग्रहण करनेके लिये आमन्त्रित किया।। ५—७।।

पाद्यार्घ्याचमनीयैस्तं स्वागतेन च भारत।
तथैव परिजग्राह वन्येन हविषा तदा।। ८।।
भारत! पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्वागत-भाषण तथा वन्य हविष्य आदिसे उन्होंने विश्वामित्रजीका सत्कार किया।। ८।।

तस्याथ कामधुग् धेनुर्वसिष्ठस्य महात्मनः।
उक्ता कामान् प्रयच्छेति सा कामान् दुह्यते सदा।। ९।।
महात्मा वसिष्ठजीके यहाँ एक कामधेनु थी, जो 'अमुक-अमुक मनोरथोंको पूर्ण करो' यह कहने-पर सदा उन-उन कामनाओंको पूर्ण कर दिया करती थी।। ९।।

ग्राम्यारण्यांश्चौषधींश्च दुदुहे पय एव च।
षड्रसं चामृतनिभं रसायनमनुत्तमम्।। १०।।
भोजनीयानि पेयानि भक्ष्याणि विविधानि च।
लेह्यान्यमृतकल्पानि चोष्याणि च तथार्जुन।। ११।।
रत्नानि च महार्हाणि वासांसि विविधानि च।
तैः कामैः सर्वसम्पूर्णैः पूजितश्च महीपतिः।। १२।।
ग्रामीण तथा जंगली अन्न, फल-मूल, दूध, षड्रस भोजन, अमृतके समान मधुर परम उत्तम रसायन, खाने, पीने और चबानेयोग्य भाँति-भाँतिके पदार्थ, अमृतके समान स्वादिष्ट चटनी आदि तथा चूसनेयोग्य ईख आदि वस्तुएँ तथा भाँति-भाँतिके बहुमूल्य रत्न एवं वस्त्र आदि सब सामग्रियोंको उस कामधेनुने प्रस्तुत कर दिया। सब प्रकारसे उन सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुओंके द्वारा हे अर्जुन! राजा विश्वामित्र भलीभाँति पूजित हुए।। १०—१२।।

सामात्यः सबलश्चैव तुतोष स भृशं तदा।
षडुन्नतां सुपाश्र्वोरुं पृथुपञ्चसमावृताम्।। १३।।
उस समय वे अपनी सेना और मन्त्रियोंके साथ बहुत संतुष्ट हुए। महर्षिकी धेनुका मस्तक, ग्रीवा, जाँघें, गलकम्बल, पूँछ और थन—ये छः अंग बड़े एवं विस्तृत थे।<sup>३.</sup> उसके पार्श्वभाग तथा ऊरु बड़े सुन्दर थे। वह पाँच पृथुल अंगोंसे सुशोभित थी<sup></sup>।। १३।।

मण्डूकनेत्रां स्वाकारां पीनोधसमनिन्दिताम्।
सुवालधिं शङ्कुकर्णां चारुशृङ्गां मनोरमाम्।। १४।।

उसकी आँखें मेढक-जैसी थीं। आकृति बड़ी सुन्दर थी। चारों थन मोटे और फैले हुए थे। वह सर्वथा प्रशंसाके योग्य थी। सुन्दर पूँछ, नुकीले कान और मनोहर सींगोंके कारण वह बड़ी मनोरम जान पड़ती थी ॥ १४ ॥

पुष्टायतशिरोग्रीवां विस्मितः सोऽभिवीक्ष्य ताम् । अभिनन्द्य स तां राजा नन्दिनीं गाधिनन्दनः ॥ १५ ॥

उसके सिर और गर्दन विस्तृत एवं पुष्ट थे। उसका नाम नन्दिनी था। उसे देखकर विस्मित हुए गाधिनन्दन विश्वामित्रने उसका अभिनन्दन किया ॥ १५ ॥

अब्रवीच्च भृशं तुष्टः स राजा तमृषिं तदा । अर्बुदेन गवां ब्रह्मन् मम राज्येन वा पुनः ॥ १६ ॥ नन्दिनीं सम्प्रयच्छस्व भुङ्क्ष्व राज्यं महामुने ।

और अत्यन्त संतुष्ट होकर राजा विश्वामित्रने उस समय उन महर्षिसे कहा—‘ब्रह्मन्! आप दस करोड़ गायें अथवा मेरा सारा राज्य लेकर इस नन्दिनी-को मुझे दे दें। महामुने! इसे देकर आप राज्य भोग करें’ ॥ १६ १/२ ॥

वसिष्ठ उवाच

देवतातिथिपित्रर्थं याज्यार्थं च पयस्विनी ॥ १७ ॥ अदेया नन्दिनीयं वै राज्येनापि तवानघ ।

वसिष्ठजीने कहा—अनघ! देवता, अतिथि और पितरोंकी पूजा एवं यज्ञके हविष्य आदिके लिये यह दुधारू गाय नन्दिनी अपने यहाँ रहती है, इसे तुम्हारा राज्य लेकर भी नहीं दिया जा सकता ॥ १७ १/२ ॥

विश्वामित्र उवाच

क्षत्रियोऽहं भवान् विप्रस्तपस्स्वाध्यायसाधनः ॥ १८ ॥

विश्वामित्रजी बोले—मैं क्षत्रिय राजा हूँ और आप तपस्या तथा स्वाध्यायका साधन करनेवाले ब्राह्मण हैं ॥ १८ ॥

ब्राह्मणेषु कुतो वीर्यं प्रशान्तेषु धृतात्मसु । अर्बुदेन गवां यस्त्वं न ददासि ममेप्सितम् ॥ १९ ॥ स्वधर्मं न प्रहास्यामि नेष्यामि च बलेन गाम् । (क्षत्रियोऽस्मि न विप्रोऽहं बाहुवीर्योऽस्मि धर्मतः । तस्माद् भुजबलेनेमां हरिष्यामीह पश्यतः ॥) ब्राह्मण अत्यधिक शान्त और जितात्मा होते हैं। उनमें बल और पराक्रम कहाँसे आ सकता है; फिर क्या बात है जो आप मेरी अभीष्ट वस्तुको एक अर्बुद गाय लेकर भी नहीं दे रहे हैं। मैं अपना धर्म नहीं छोड़ूँगा, इस गायको बलपूर्वक ले जाऊँगा। मैं क्षत्रिय हूँ, ब्राह्मण नहीं हूँ। मुझे धर्मतः अपना बाहुबल प्रकट करनेका अधिकार है; अतः बाहुबलसे ही आपके देखते-देखते इस गायको हर ले जाऊँगा ।। १९ १/२ ।।

वसिष्ठ उवाच

बलस्थश्चासि राजा च बाहुवीर्यश्च क्षत्रियः ॥ २० ॥ यथेच्छसि तथा क्षिप्रं कुरु मा त्वं विचारय । **वसिष्ठजीने कहा—**तुम सेनाके साथ हो, राजा हो और अपने बाहुबलका भरोसा रखनेवाले क्षत्रिय हो। जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा शीघ्र कर डालो, विचार न करो ।। २० १/२ ।।

गन्धर्व उवाच

एवमुक्तस्तथा पार्थ विश्वामित्रो बलादिव ॥ २१ ॥ हंसचन्द्रप्रतीकाशां नन्दिनीं तां जहार गाम् । कशादण्डप्रणुदितां काल्यमानामितस्ततः ॥ २२ ॥ **गन्धर्व कहता है—**अर्जुन! वसिष्ठजीके यों कहनेपर विश्वामित्रने मानो बलपूर्वक ही हंस और चन्द्रमाके समान श्वेत रंगवाली उस नन्दिनी गायका अपहरण कर लिया। उसे कोड़ों और डंडोंसे मार-मारकर इधर-उधर हाँका जा रहा था ॥ २१-२२ ॥ हम्भायमाना कल्याणी वसिष्ठस्याथ नन्दिनी । आगम्याभिमुखी पार्थ तस्थौ भगवदुन्मुखी ॥ २३ ॥ भृशं च ताड्यमाना वै न जगामाश्रमात् ततः । अर्जुन! उस समय कल्याणमयी नन्दिनी डकराती हुई महर्षि वसिष्ठके सामने आकर खड़ी हो गयी और उन्हींकी ओर मुँह करके देखने लगी। उसके ऊपर जोर-जोरसे मार पड़ रही थी, तो भी वह आश्रमसे अन्यत्र नहीं गयी ॥ २३ ½ ॥

वसिष्ठ उवाच

शृणोमि ते रवं भद्रे विनदन्त्याः पुनः पुनः ॥ २४ ॥ ह्रियसे त्वं बलाद् भद्रे विश्वामित्रेण नन्दिनि । किं कर्तव्यं मया तत्र क्षमावान् ब्राह्मणो ह्यहम् ॥ २५ ॥ **वसिष्ठजी बोले—**भद्रे! तुम बार-बार क्रन्दन कर रही हो। मैं तुम्हारा आर्तनाद सुनता हूँ, परंतु क्या करूँ? कल्याणमयी नन्दिनि! विश्वामित्र तुम्हें बलपूर्वक हर ले जा रहे हैं। इसमें मैं क्या कर सकता हूँ। मैं एक क्षमाशील ब्राह्मण हूँ ॥ २४-२५ ॥

गन्धर्व उवाच

सा भयान्नन्दिनी तेषां बलानां भरतर्षभ । विश्वामित्रभयोद्विग्ना वसिष्ठं समुपागमत् ॥ २६ ॥ **गन्धर्व कहता है—**भरतवंशशिरोमणे! नन्दिनी विश्वामित्रके भयसे उद्विग्न हो उठी थी। वह उनके सैनिकोंके भयसे मुनिवर वसिष्ठकी शरणमें गयी ॥ २६ ॥

गौरुवाच

कशाग्रदण्डाभिहतां क्रोशन्तीं मामनाथवत् । विश्वामित्रबलैर्घोरैर्भगवन् किमुपेक्षसे ॥ २७ ॥ **गौने कहा—**भगवन्! विश्वामित्रके निर्दय सैनिक मुझे कोड़ों और डंडोंसे पीट रहे हैं। मैं अनाथकी भाँति क्रन्दन कर रही हूँ। आप क्यों मेरी उपेक्षा कर रहे हैं? ॥ २७ ॥

गन्धर्व उवाच

नन्दिन्यामेवं क्रन्दन्त्यां धर्षितायां महामुनिः ।

न चुक्षुभे तदा धैर्यान्न चचाल धृतव्रतः ॥ २८ ॥
**गन्धर्व कहता है—**अर्जुन! नन्दिनी इस प्रकार अपमानित होकर करुण क्रन्दन कर रही थी, तो भी दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले महामुनि वसिष्ठ न तो क्षुब्ध हुए और न धैर्यसे ही विचलित हुए ॥ २८ ॥

वसिष्ठ उवाच
क्षत्रियाणां बलं तेजो ब्राह्मणानां क्षमा बलम् ।
क्षमा मां भजते यस्माद् गम्यतां यदि रोचते ॥ २९ ॥
**वसिष्ठजी बोले—**भद्रे! क्षत्रियोंका बल उनका तेज है और ब्राह्मणोंका बल उनकी क्षमा है। चूँकि मुझे क्षमा अपनाये हुए है, अतः तुम्हारी रुचि हो, तो जा सकती हो ॥ २९ ॥

नन्दिन्युवाच
किं नु त्यक्तास्मि भगवन् यदेवं त्वं प्रभाषसे ।
अत्यक्ताहं त्वया ब्रह्मन् नेतुं शक्या न वै बलात् ॥ ३० ॥
**नन्दिनीने कहा—**भगवन्! क्या आपने मुझे त्याग दिया, जो ऐसी बात कहते हैं? ब्रह्मन्! आपने त्याग न दिया हो, तो कोई मुझे बलपूर्वक नहीं ले जा सकता ॥ ३० ॥

वसिष्ठ उवाच
न त्वां त्यजामि कल्याणि स्थीयतां यदि शक्यते ।
दृढेन दाम्ना बद्ध्वैष वत्सस्ते ह्रियते बलात् ॥ ३१ ॥
**वसिष्ठजी बोले—**कल्याणि! मैं तुम्हारा त्याग नहीं करता। तुम यदि रह सको तो यहीं रहो। यह तुम्हारा बछड़ा मजबूत रस्सीसे बाँधकर बलपूर्वक ले जाया जा रहा है ॥ ३१ ॥

गन्धर्व उवाच
स्थीयतामिति तच्छ्रुत्वा वसिष्ठस्य पयस्विनी ।
ऊर्ध्वाञ्चितशिरोग्रीवा प्रबभौ रौद्रदर्शना ॥ ३२ ॥
**गन्धर्व कहता है—**अर्जुन! 'यहीं रहो' वसिष्ठजीका यह वचन सुनकर नन्दिनीने अपने सिर और गर्दनको ऊपरकी ओर उठाया। उस समय वह देखनेमें बड़ी भयानक जान पड़ती थी ॥ ३२ ॥

क्रोधरक्तेक्षणा सा गौर्हम्भारवघनस्वना ।
विश्वामित्रस्य तत् सैन्यं व्यद्रावयत सर्वशः ॥ ३३ ॥
क्रोधसे उसकी आँखें लाल हो गयी थीं। उसके डकरानेकी आवाज जोर-जोरसे सुनायी देने लगी। उसने विश्वामित्रकी उस सेनाको चारों ओर खदेड़ना शुरू किया ॥ ३३ ॥

कशाग्रदण्डाभिहता काल्यमाना ततस्ततः ।
क्रोधरक्तेक्षणा क्रोधं भूय एव समाददे ॥ ३४ ॥

कोड़ोंके अग्रभाग और डंडोंसे मार-मारकर इधर-उधर हाँके जानेके कारण उसके नेत्र पहलेसे ही क्रोधके कारण रक्तवर्णके हो गये थे। फिर उसने और भी क्रोध धारण किया ।। ३४ ।।

आदित्य इव मध्याह्ने क्रोधदीप्तवपुर्बभौ ।
अङ्गारवर्षं मुञ्चन्ती मुहुर्वालधितो महत् ।। ३५ ।।
असृजत् पह्लवान् पुच्छात् प्रस्रवाद् द्रविडाञ्छकान् ।
योनिदेशाच्च यवनान् शकृतः शबरान् बहून् ।। ३६ ।।
क्रोधके कारण उसके शरीरसे अपूर्व दीप्ति प्रकट हो रही थी। वह दोपहरके सूर्यकी भाँति उद्भासित हो उठी। उसने अपनी पूँछसे बारंबार अंगारकी भारी वर्षा करते हुए पूँछसे स पह्लवोंकी सृष्टि की, थनोंसे द्रविड़ों और शकोंको उत्पन्न किया, योनिदेशसे यवनों और गोबरसे बहुतेरे शबरोंको जन्म दिया ।। ३५-३६ ।।
मूत्रतश्चासृजत् कांश्चिच्छबरांश्चैव पार्श्वतः ।
पौण्ड्रान् किरातान् यवनान् सिंहलान् बर्बरान् खसान् ।। ३७ ।।
कितने ही शबर उसके मूत्रसे प्रकट हुए। उसके पार्श्वभागसे पौण्ड्र, किरात, यवन, सिंहल, बर्बर और खसोंकी सृष्टि हुई ।। ३७ ।।
चिबुकांश्च पुलिन्दांश्च चीनान् हूणान् सकेरलान् ।

ससर्ज फेनतः सा गौर्म्लेच्छान् बहुविधानपि ॥ ३८ ॥
इसी प्रकार उस गौने फेनसे चिबुक, पुलिन्द, चीन, हूण, केरल आदि बहुत प्रकारके म्लेच्छोंकी सृष्टि की ॥ ३८ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1244)

विश्वामित्रकी सेनापर नन्दिनीका कोप