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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

गुँजाते जा रहे थे। सूत, मागध और बन्दीजन नाना प्रकारकी स्तुतियोंद्वारा उनके गुण गाते थे। उस समय विशाल सेनासे घिरे हुए राजा युधिष्ठिर अपनी किरणोंसे आवृत हुए सूर्यदेवकी भाँति शोभा पा रहे थे।

पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ।
बभौ युधिष्ठिरो राजा पौर्णमास्यामिवोडुराट् ॥
उनके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिससे राजा युधिष्ठिर पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाते थे।

चामरैर्हेमदण्डैश्च धूयमानः समन्ततः ।
जयाशिषः प्रहृष्टाणां नराणां पथि पाण्डवः ॥
प्रत्यगृह्णाद् यथान्यायं यथावद् भरतर्षभ ।
उनके चारों ओर स्वर्णदण्डविभूषित चँवर डुलाये जाते थे। भरतश्रेष्ठ! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको मार्गमें बहुतेरे मनुष्य हर्षोल्लासमें भरकर ‘महाराजकी जय हो’ कहते हुए शुभाशीर्वाद देते थे और वे यथोचितरूपसे सिर झुकाकर उन सबको स्वीकार करते थे।

अपरे कुरुराजानं पथि यान्तं समाहिताः ॥
स्तुवन्ति सततं सौख्यान्मृगपक्षिश्वनैर्नराः ।
उस मार्गमें दूसरे बहुत-से मनुष्य एकाग्रचित्त हो मृगों और पक्षियोंकी-सी आवाजमें निरन्तर सुखपूर्वक कुरुराज युधिष्ठिरकी स्तुति करते थे।

तथैव सैनिका राजन् राजानमनुयान्ति ये ॥
तेषां हलहलाशब्दो दिवं स्तब्ध्वा प्रतिष्ठितः ।
जनमेजय! इसी प्रकार जो सैनिक राजा युधिष्ठिरके पीछे-पीछे जा रहे थे, उनका कोलाहल भी समूचे आकाशमण्डलको स्तब्ध करके गूँज रहा था।

नृपस्याग्रे ययौ भीमो गजस्कन्धगतो बली ॥
उभौ पार्श्वगतौ राज्ञः सदश्वौ वै सुकल्पितौ ।
अधिरूढौ यमौ चापि जग्मतुर्भरतर्षभ ॥
शोभयन्तौ महासैन्यं तावुभौ रूपशालिनौ ।
हाथीकी पीठपर बैठे हुए बलवान् भीमसेन राजाके आगे-आगे जा रहे थे। उनके दोनों ओर सजे-सजाये दो श्रेष्ठ अश्व थे, जिनपर नकुल और सहदेव बैठे थे। भरतश्रेष्ठ! वे दोनों भाई स्वयं तो अपने रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित थे ही, उस विशाल सेनाकी भी शोभा बढ़ा रहे थे।

पृष्ठतोऽनुययौ धीमान् पार्थः शस्त्रभृतां वरः ॥
श्वेताश्वो गाण्डिवं गृह्य अग्निदत्तं रथं गतः ।
शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परम बुद्धिमान् श्वेतवाहन अर्जुन अग्निदेवके दिये हुए रथपर बैठकर गाण्डीव धनुष धारण किये महाराजके पीछे-पीछे जा रहे थे।

सैन्यमध्ये ययौ राजन् कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ द्रौपदीप्रमुखा नार्यः सानुगाः सपरिच्छदाः । आरुह्य ता विचित्राणि शिबिकानां शतानि च ॥ महत्या सेनया राजन्नग्रे राज्ञो ययुस्तदा । राजन्! कुरुराज युधिष्ठिर सेनाके बीचमें चल रहे थे। द्रौपदी आदि स्त्रियाँ अपनी सेविकाओं तथा आवश्यक सामग्रियोंके साथ सैकड़ों विचित्र शिबिकाओं (पालकियों)-पर आरूढ़ हो बड़ी भारी सेनाके साथ महाराजके आगे-आगे जा रही थीं। समृद्धनरनागाश्वं सपताकरथध्वजम् ॥ समृद्धरथनिस्त्रिंशं पत्तिभिर्घोषितस्वनम् । पाण्डवोंकी वह सेना हाथी-घोड़ों तथा पैदल सैनिकोंसे भरी-पूरी थी। उसमें बहुत-से रथ भी थे, जिनकी ध्वजाओंपर पताकाएँ फहरा रही थीं। उन सभी रथोंमें खड्ग आदि अस्त्र-शस्त्र संगृहीत थे। पैदल सैनिकोंका कोलाहल सब ओर फैल रहा था। शङ्खदुन्दुभितालानां वेणुवीणानुनादितम् ॥ शुशुभे पाण्डवं सैन्यं प्रयातं तत् तदा नृप । राजन्! शंख, दुन्दुभि, ताल, वेणु और वीणा आदि वाद्योंकी तुमुल ध्वनि वहाँ गूँज रही थी। उस समय हस्तिनापुरकी ओर जाती हुई पाण्डवोंकी उस सेनाकी बड़ी शोभा हो रही थी। स सरांसि नदींश्चैव वनान्युपवनानि च ॥ अत्यक्रामन्महाराज पुरीं चाभ्यवपद्यत । हस्तीपुरसमीपे तु कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ जनमेजय! कुरुराज युधिष्ठिर अनेक सरोवर, नदी, वन और उपवनोंको लाँघते हुए हस्तिनापुरके समीप जा पहुँचे। चक्रे निवेशनं तत्र ततः स सहसैनिकः । शिवे देशे समे चैव न्यवसत् पाण्डवस्तदा ॥ वहाँ उन्होंने एक सुखद एवं समतल प्रदेशमें सैनिकोंसहित पड़ाव डाल दिया। उसी छावनीमें पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर स्वयं भी ठहर गये। ततो राजन् समाहूय शोकविह्वलया गिरा । एतद् वाक्यं च सर्वस्वं धृतराष्ट्रचिकीर्षितम् । आचचक्षे यथावृत्तं विदुरोऽथ तपस्य ह ॥) राजन्! तदनन्तर विदुरजीने शोकाकुल वाणीमें महाराज युधिष्ठिरको वहाँका सारा वृत्तान्त ठीक-ठीक बता दिया कि धृतराष्ट्र क्या करना चाहते हैं और इस द्यूतक्रीड़ाके पीछे क्या रहस्य है? धृतराष्ट्रेण चाहूतः कालस्य समयेन च ॥ २१ ॥

स हास्तिनपुरं गत्वा धृतराष्ट्रगृहं ययौ । समियाय च धर्मात्मा धृतराष्ट्रेण पाण्डवः ॥ २२ ॥ तब धृतराष्ट्रके द्वारा बुलाये हुए कालके समयानुसार धर्मात्मा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर हस्तिनापुरमें पहुँचकर धृतराष्ट्रके भवनमें गये और उनसे मिले ॥ २१-२२ ॥

तथा भीष्मेण द्रोणेन कर्णेन च कृपेण च । समियाय यथान्यायं द्रौणिना च विभुः सह ॥ २३ ॥ इसी प्रकार महाराज युधिष्ठिर, भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य और अश्वत्थामाके साथ भी यथायोग्य मिले ॥ २३ ॥

समेत्य च महाबाहुः सोमदत्तेन चैव ह । दुर्योधनेन शल्येन सौबलेन च वीर्यवान् ॥ २४ ॥ ये चान्ये तत्र राजानः पूर्वमेव समागताः । दुःशासनेन वीरेण सर्वैर्भ्रातृभिरेव च ॥ २५ ॥ जयद्रथेन च तथा कुरुभिश्चापि सर्वशः । ततः सर्वैर्महाबाहुर्भ्रातृभिः परिवारितः ॥ २६ ॥ प्रविवेश गृहं राज्ञो धृतराष्ट्रस्य धीमतः । ददर्श तत्र गान्धारीं देवीं पतिमनुव्रताम् ॥ २७ ॥ स्नुषाभिः संवृतां शश्वत् ताराभिरिव रोहिणीम् । अभिवाद्य स गान्धारीं तया च प्रतिनन्दितः ॥ २८ ॥ तत्पश्चात् पराक्रमी महाबाहु युधिष्ठिर सोमदत्तसे मिलकर दुर्योधन, शल्य, शकुनि तथा जो राजा वहाँ पहलेसे ही आये हुए थे, उन सबसे मिले। फिर वीर दुःशासन, उसके समस्त भाई, राजा जयद्रथ तथा सम्पूर्ण कौरवोंसे मिल करके भाइयोंसहित महाबाहु युधिष्ठिरने बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रके भवनमें प्रवेश किया और वहाँ सदा ताराओंसे घिरी रहनेवाली रोहिणीदेवीके समान पुत्रवधुओंके साथ बैठी हुई पतिव्रता गान्धारीदेवीको देखा। युधिष्ठिरने गान्धारीको प्रणाम किया और गान्धारीने भी उन्हें आशीर्वाद देकर प्रसन्न किया ॥ २४—२८ ॥

ददर्श पितरं वृद्धं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् ॥ २९ ॥ तत्पश्चात् उन्होंने अपने बूढ़े चाचा प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रका पुनः दर्शन किया ॥ २९ ॥

राज्ञा मूर्ध्न्युपाघ्रातास्ते च कौरवनन्दनाः । चत्वारः पाण्डवा राजन् भीमसेनपुरोगमाः ॥ ३० ॥ राजा धृतराष्ट्रने कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले युधिष्ठिर तथा भीमसेन आदि अन्य चारों पाण्डवोंका मस्तक सूँघा ॥

ततो हर्षः समभवत् कौरवाणां विशाम्पते ।

तान् दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रान् पाण्डवान् प्रियदर्शनान् ॥ ३१ ॥ जनमेजय! उन पुरुषश्रेष्ठ प्रियदर्शन पाण्डवोंको आये देख कौरवोंको बड़ा हर्ष हुआ ॥ ३१ ॥ विविशुस्तेऽभ्यनुज्ञाता रत्नवन्ति गृहाणि च । ददृशुश्चोपयातांस्तान् दुःशलाप्रमुखाः स्त्रियः ॥ ३२ ॥ याज्ञसेन्याः परामृद्धिं दृष्ट्वा प्रज्वलितामिव । स्नुषास्ता धृतराष्ट्रस्य नातिप्रमनसोऽभवन् ॥ ३३ ॥ तत्पश्चात् धृतराष्ट्रकी आज्ञा ले पाण्डवोंने रत्नमय गृहोंमें प्रवेश किया। दुःशला आदि स्त्रियोंने वहाँ आये हुए उन सबको देखा। द्रुपदकुमारीकी प्रज्वलित अग्निके समान उत्तम समृद्धि देखकर धृतराष्ट्रकी पुत्रवधुएँ अधिक प्रसन्न नहीं हुईं ॥ ३२-३३ ॥ ततस्ते पुरुषव्याघ्रा गत्वा स्त्रीभिस्तु संविदम् । कृत्वा व्यायामपूर्वाणि कृत्यानि प्रतिकर्म च ॥ ३४ ॥ ततः कृताह्निकाः सर्वे दिव्यचन्दनभूषिताः । कल्याणमनसश्चैव ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च ॥ ३५ ॥ मनोज्ञमशनं भुक्त्वा विविशुः शरणान्यथ । तदनन्तर वे नरश्रेष्ठ पाण्डव द्रौपदी आदि अपनी स्त्रियोंसे बातचीत करके पहले व्यायाम एवं केश-प्रसाधन आदि कार्य किया। तदनन्तर नित्यकर्म करके सबने अपनेको दिव्य चन्दन आदिसे विभूषित किया। तत्पश्चात् मनमें कल्याणकी भावना रखनेवाले पाण्डव ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर मनोऽनुकूल भोजन करनेके पश्चात् शयनगृहमें गये ॥ ३४-३५ १/२ ॥ उपगीयमाना नारीभिरस्वपन् कुरुपुङ्गवाः ॥ ३६ ॥ वहाँ स्त्रियोंद्वारा अपने सुयशका गान सुनते हुए वे कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुष सो गये ॥ ३६ ॥ जगाम तेषां सा रात्रिः पुण्या रतिविहारिणाम् । स्तूयमानाश्च विश्रान्ताः काले निद्रामथात्यजन् ॥ ३७ ॥ उनकी वह पुण्यमयी रात्रि रति-विलासपूर्वक समाप्त हुई। प्रातःकाल बन्दीजनोंके द्वारा स्तुति सुनते हुए पूर्ण विश्रामके पश्चात् उन्होंने निद्राका त्याग किया ॥ ३७ ॥ सुखोषितास्ते रजनीं प्रातः सर्वे कृताह्निकाः । सभां रम्यां प्रविविशुः कितवैरभिनन्दिताः ॥ ३८ ॥ इस प्रकार सुखपूर्वक रात बिताकर वे प्रातःकाल उठे और संध्योपासनादि नित्यकर्म करनेके अनन्तर उस रमणीय सभामें गये। वहाँ जुआरियोंने उनका अभिनन्दन किया ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरसभागमनेऽष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें युधिष्ठिरसभागमनविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ६१ १/३ श्लोक हैं)

जूएके अनौचित्यके सम्बन्धमें युधिष्ठिर और शकुनिका संवाद

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एकोनषष्टितमोऽध्यायः

जूएके अनौचित्यके सम्बन्धमें युधिष्ठिर और शकुनिका संवाद

वैशम्पायन उवाच

प्रविश्य तां सभां पार्था युधिष्ठिरपुरोगमाः ।
समेत्य पार्थिवान् सर्वान् पूजार्हानभिपूज्य च ॥ १ ॥
यथावयः समेयाना उपविष्टा यथार्हतः ।
आसनेषु विचित्रेषु स्पर्ध्यास्तरणवत्सु च ॥ २ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! युधिष्ठिर आदि कुन्तीकुमार उस सभामें पहुँचकर सब राजाओंसे मिले। अवस्थाक्रमके अनुसार समस्त पूजनीय राजाओंका बारी-बारीसे सम्मान करके सबसे मिलने-जुलनेके पश्चात् वे यथायोग्य सुन्दर रमणीय गलीचोंसे युक्त विचित्र आसनोंपर बैठे ॥ १-२ ॥

तेषु तत्रोपविष्टेषु सर्वेष्वथ नृपेषु च ।
शकुनिः सौबलस्तत्र युधिष्ठिरमभाषत ॥ ३ ॥

उनके एवं सब नरेशोंके बैठ जानेपर वहाँ सुबलकुमार शकुनिने युधिष्ठिरसे कहा ॥ ३ ॥

शकुनिरुवाच

उपस्तीर्णा सभा राजन् सर्वे त्वयि कृतक्षणाः ।
अक्षानुप्त्वा देवनस्य समयोऽस्तु युधिष्ठिर ॥ ४ ॥

**शकुनि बोला—**महाराज युधिष्ठिर! सभामें पासे फेंकनेवाला वस्त्र बिछा दिया गया है, सब आपकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं। अब पासे फेंककर जूआ खेलनेका अवसर मिलना चाहिये ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

निकृतिर्देवनं पापं न क्षात्रोऽत्र पराक्रमः ।
न च नीतिर्ध्रुवा राजन् किं त्वं द्यूतं प्रशंससि ॥ ५ ॥

**युधिष्ठिरने कहा—**राजन्! जूआ तो एक प्रकारका छल है तथा पापका कारण है! इसमें न तो क्षत्रियोचित पराक्रम दिखाया जा सकता है और न इसकी कोई निश्चित नीति ही है। फिर तुम द्यूतकी प्रशंसा क्यों करते हो? ॥ ५ ॥

न हि मानं प्रशंसन्ति निकृतौ कितवस्य हि ।
शकुने मैव नो जैषीर्मार्गेण नृशंसवत् ॥ ६ ॥

शकुने! जुआरियोंका छल-कपटमें ही सम्मान होता है; सज्जन पुरुष वैसे सम्मानकी प्रशंसा नहीं करते। अतः तुम क्रूर मनुष्यकी भाँति अनुचित मार्गसे हमें जीतनेकी चेष्टा न करो ॥ ६ ॥

शकुनिरुवाच

यो वेत्ति संख्यां निकृतौ विधिज्ञ- श्चेष्टास्वखिन्नः कितवोऽक्षजासु । महामतिर्यश्च जानाति द्यूतं स वै सर्वं सहते प्रक्रियासु ॥ ७ ॥

**शकुनि बोला—**जिस अंकपर पासा पड़ता है, उसे जो पहले ही समझ लेता है, जो शठताका प्रतीकार करना जानता है एवं पासे फेंकने आदि समस्त व्यापारोंमें उत्साहपूर्वक लगा रहता है तथा जो परम बुद्धिमान् पुरुष द्यूतक्रीड़ाविषयक सब बातोंकी जानकारी रखता है, वही जूएका असली खिलाड़ी है; वह द्यूतक्रीड़ामें दूसरोंकी सारी शठतापूर्ण चेष्टाओंको सह लेता है ॥ ७ ॥

अक्षग्लहः सोऽभिभवेत् परं न- स्तेनैव दोषो भवतीह पार्थ । दीव्यामहे पार्थिव मा विशङ्कां कुरुष्व पाणं च चिरं च मा कृथाः ॥ ८ ॥

कुन्तीनन्दन! यदि पासा विपरीत पड़ जाय तो हम खिलाड़ियोंमेंसे एक पक्षको पराजित कर सकता है; अतः जय-पराजय दैवाधीन पासोंके ही आश्रित है। उसीसे पराजयरूप दोषकी प्राप्ति होती है। हारनेकी शंका तो हमें भी है, फिर भी हम खेलते हैं। अतः भूमिपाल! आप शंका न कीजिये, दाँव लगाइये, अब विलम्ब न कीजिये ॥

युधिष्ठिर उवाच

एवमाहायमसितो देवलो मुनिसत्तमः । इमानि लोकद्वाराणि यो वै भ्राम्यति सर्वदा ॥ ९ ॥ इदं वै देवनं पापं निकृत्या कितवैः सह । धर्मेण तु जयो युद्धे तत्परं न तु देवनम् ॥ १० ॥

**युधिष्ठिरने कहा—**मुनिश्रेष्ठ असित-देवलने, जो सदा इन लोकद्वारोंमें भ्रमण करते रहते हैं, ऐसा कहा है कि जुआरियोंके साथ शठतापूर्वक जो जूआ खेला जाता है, पाप है। धर्मानुकूल विजय तो युद्धमें ही प्राप्त होती है; अतः क्षत्रियोंके लिये युद्ध ही उत्तम है, जूआ खेलना नहीं ॥ ९-१० ॥

नार्या म्लेच्छन्ति भाषाभिर्मायया न चरन्त्युत । अजिह्यमशठं युद्धमेतत् सत्पुरुषव्रतम् ॥ ११ ॥

श्रेष्ठ पुरुष वाणीद्वारा किसीके प्रति अनुचित शब्द नहीं निकालते तथा कपटपूर्ण बर्ताव नहीं करते। कुटिलता और शठतासे रहित युद्ध ही सत्पुरुषोंका व्रत है ॥ ११ ॥ शक्तितो ब्राह्मणान् नूनं रक्षितुं प्रयतामहे । तद् वै वित्तं मातिदेवीर्मा जैषीः शकुने परान् ॥ १२ ॥ शकुने! हमलोग जिस धनसे अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंकी रक्षा करनेका ही प्रयत्न करते हैं, उसको तुम जूआ खेलकर हमलोगोंसे हड़पनेकी चेष्टा न करो ॥ निकृत्या कामये नाहं सुखान्युत धनानि वा । कितवस्येह कृतिनो वृत्तमेतन्न पूज्यते ॥ १३ ॥ मैं धूर्ततापूर्ण बर्तावके द्वारा सुख अथवा धन पानेकी इच्छा नहीं करता; क्योंकि जुआरीके कार्यको विद्वान् पुरुष अच्छा नहीं समझते ॥ १३ ॥

शकुनिरुवाच

श्रोत्रियः श्रोत्रियानेति निकृत्यैव युधिष्ठिर । विद्वानविदुषोऽभ्येति नाहुस्तां निकृतिं जनाः ॥ १४ ॥ शकुनि बोला—युधिष्ठिर! श्रोत्रिय विद्वान् दूसरे श्रोत्रिय विद्वानोंके पास जब उन्हें जीतनेके लिये जाता है, तब शठतासे ही काम लेता है। विद्वान् अविद्वानोंको शठतासे ही पराजित करता है; परंतु इसे जनसाधारण शठता नहीं कहते ॥ १४ ॥ अक्षैर्हि शिक्षितोऽभ्येति निकृत्यैव युधिष्ठिर । विद्वानविदुषोऽभ्येति नाहुस्तां निकृतिं जनाः ॥ १५ ॥ धर्मराज! जो द्यूतविद्यामें पूर्ण शिक्षित है, वह अशिक्षितोंपर शठतासे ही विजय पाता है। विद्वान् पुरुष अविद्वानोंको जो परास्त करता है, वह भी शठता ही है; किंतु लोग उसे शठता नहीं कहते ॥ १५ ॥ अकृतास्त्रं कृतास्त्रश्च दुर्बलं बलवत्तरः । एवं कर्मसु सर्वेषु निकृत्यैव युधिष्ठिर । विद्वानविदुषोऽभ्येति नाहुस्तां निकृतिं जनाः ॥ १६ ॥ धर्मराज युधिष्ठिर! अस्त्रविद्यामें निपुण योद्धा अनाड़ीको एवं बलिष्ठ पुरुष दुर्बलको शठतासे ही जीतना चाहता है। इस प्रकार सब कार्योंमें विद्वान् पुरुष अविद्वानोंको शठतासे ही जीतते हैं; किंतु लोग उसे शठता नहीं कहते ॥ १६ ॥ एवं त्वं मामिहाभ्येत्य निकृतिं यदि मन्यसे । देवनाद् विनिवर्तस्व यदि ते विद्यते भयम् ॥ १७ ॥ इसी प्रकार आप यदि मेरे पास आकर यह मानते हैं कि आपके साथ शठता की जायगी एवं यदि आपको भय मालूम होता है तो इस जूएके खेलसे निवृत्त हो जाइये ॥

युधिष्ठिर उवाच

आहूतो न निवर्तेयमिति मे व्रतमाहितम् ।
विधिश्च बलवान् राजन् दिष्ट्यास्मि वशे स्थितः ॥ १८ ॥
युधिष्ठिरने कहा— राजन्! मैं बुलानेपर पीछे नहीं हटता, यह मेरा निश्चित व्रत है। दैव बलवान् है। मैं दैवके वशमें हूँ ॥ १८ ॥
अस्मिन् समागमे केन देवनं मे भविष्यति ।
प्रतिपाणश्च कोऽन्योऽस्ति ततो द्यूतं प्रवर्तताम् ॥ १९ ॥
अच्छा तो यहाँ जिन लोगोंका जमाव हुआ है, उनमें किसके साथ मुझे जूआ खेलना होगा? मेरे मुकाबलेमें बैठकर दूसरा कौन पुरुष दाँव लगायेगा? इसका निश्चय हो जाय, तो जूएका खेल प्रारम्भ हो ॥ १९ ॥

दुर्योधन उवाच
अहं दातास्मि रत्नानां धनानां च विशाम्पते ॥ २० ॥
मदर्थे देविता चायं शकुनिर्मातुलो मम ।
दुर्योधन बोला— महाराज! दाँवपर लगानेके लिये धन और रत्न तो मैं दूँगा; परंतु मेरी ओरसे खेलेंगे ये मेरे मामा शकुनि ॥ २० १/२ ॥

युधिष्ठिर उवाच
अन्येनान्यस्य वै द्यूतं विषमं प्रतिभाति मे ।
एतद् विद्वन्नुपादत्स्व काममेवं प्रवर्तताम् ॥ २१ ॥
युधिष्ठिरने कहा— दूसरेके लिये दूसरेका जूआ खेलना मुझे तो अनुचित ही प्रतीत होता है। विद्वन्! इस बातको समझ लो, फिर इच्छानुसार जूएका खेल प्रारम्भ हो ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरशकुनिसंवादे
एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें युधिष्ठिरशकुनिसंवादविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2103)

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षष्टितमोऽध्यायः

द्यूतक्रीड़ाका आरम्भ

वैशम्पायन उवाच

उपोह्यमाने द्यूते तु राजानः सर्व एव ते ।
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य विविशुस्तां सभां ततः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! जब जूएका खेल आरम्भ होने लगा, उस समय सब राजालोग धृतराष्ट्रको आगे करके उस सभामें आये ॥ १ ॥

भीष्मो द्रोणः कृपश्चैव विदुरश्च महामतिः ।
नातिप्रीतेन मनसा तेऽन्ववर्तन्त भारत ॥ २ ॥
भारत! भीष्म, द्रोण, कृप और परम बुद्धिमान् विदुर—ये सब लोग असंतुष्ट चित्तसे ही धृतराष्ट्रके पीछे-पीछे वहाँ आये ॥ २ ॥

ते द्वन्द्वशः पृथक् चैव सिंहग्रीवा महौजसः ।
सिंहासनानि भूरीणि विचित्राणि च भेजिरे ॥ ३ ॥
सिंहके समान ग्रीवावाले वे महातेजस्वी राजालोग कहीं एक-एक आसनपर दो-दो तथा कहीं पृथक्-पृथक् एक-एक आसनपर एक ही व्यक्ति बैठे। इस प्रकार उन्होंने वहाँ रखे हुए बहुसंख्यक विचित्र सिंहासनोंको ग्रहण किया ॥

शुशुभे सा सभा राजन् राजभिस्तैः समागतैः ।
देवैरिव महाभागैः समवेतैस्त्रिविष्टपम् ॥ ४ ॥
राजन्! जैसे महाभाग देवताओंके एकत्र होनेसे स्वर्गलोक सुशोभित होता है, उसी प्रकार उन आगन्तुक नरेशोंसे उस सभाकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ४ ॥

सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे भास्वरमूर्तयः ।
प्रावर्तत महाराज सुहृद् द्यूतमनन्तरम् ॥ ५ ॥
महाराज! वे सब-के-सब वेदवेत्ता एवं शूरवीर थे तथा उनके शरीर तेजोयुक्त थे। उनके बैठ जानेके अनन्तर वहाँ सुहृदोंकी द्यूतक्रीड़ा आरम्भ हुई ॥ ५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अयं बहुधनो राजन् सागरावर्तसम्भवः ।
मणिर्हारोत्तरः श्रीमान् कनकोत्तमभूषणः ॥ ६ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**राजन्! यह समुद्रके आवर्तमें उत्पन्न हुआ कान्तिमान् मणिरत्न बहुत बड़े मूल्यका है। मेरे हारोंमें यह सर्वोत्तम है तथा इसपर उत्तम सुवर्ण जड़ा गया है ॥ ६ ॥

एतद् राजन् मम धनं प्रतिपाणोऽस्ति कस्तव । येन मां त्वं महाराज धनेन प्रतिदीव्यसे ॥ ७ ॥

राजन्! मेरी ओरसे यही धन दाँवपर रखा गया है। इसके बदलेमें तुम्हारी ओरसे कौन-सा धन दाँवपर रखा जाता है, जिस धनके द्वारा तुम मेरे साथ खेलना चाहते हो ॥

दुर्योधन उवाच

सन्ति मे मणयश्चैव धनानि सुबहूनि च । मत्सरश्च न मेऽर्थेषु जयस्वैनं दुरोदरम् ॥ ८ ॥ **दुर्योधन बोला—**मेरे पास भी मणियाँ और बहुत-सा धन है, मुझे अपने धनपर अहंकार नहीं है। आप इस जूएको जीतिये ॥ ८ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो जग्राह शकुनिस्तानक्षानक्षतत्त्ववित् । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ ९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर पासे फेंकनेकी कलामें अत्यन्त निपुण शकुनिने उन पासोंको हाथमें लिया और उन्हें फेंककर युधिष्ठिरसे कहा—'लो, यह दाँव मैंने जीता' ॥ ९ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि द्यूतारम्भे षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें द्यूतारम्भविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥

अध्याय (पृष्ठ 2106)

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एकषष्टितमोऽध्यायः

जूएमं शकुनिके छलसे प्रत्येक दाँवपर युधिष्ठिरकी हार

युधिष्ठिर उवाच

मत्तः कैतवकेनैव यज्जितोऽस्मि दुरोदरे ।
शकुने हन्त दीव्यामो ग्लहमानाः परस्परम् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**शकुने! तुमने छलसे इस दाँवमें मुझे हरा दिया, इसीपर तुम गर्वित हो उठे हो; आओ, हमलोग पुनः परस्पर पासे फेंककर जूआ खेलें ॥ १ ॥

सन्ति निष्कसहस्रस्य भाण्डिन्यो भरिताः शुभाः ।
कोशो हिरण्यमक्षय्यं जातरूपमनेकंशः ।
एतद् राजन् मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ २ ॥
मेरे पास हजारों निष्कोंसे* भरी हुई बहुत-सी सुन्दर पेटियाँ रखी हैं। इसके सिवा खजाना है, अक्षय धन है और अनेक प्रकारके सुवर्ण हैं। राजन्! मेरा यह सब धन दाँवपर लगा दिया गया। मैं इसीके द्वारा तुम्हारे साथ खेलता हूँ ॥

वैशम्पायन उवाच

कौरवाणां कुलकरं ज्येष्ठं पाण्डवमच्युतम् ।
इत्युक्तः शकुनिः प्राह जितमित्येव तं नृपम् ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले कौरवोंके वंशधर एवं पाण्डुके ज्येष्ठ पुत्र राजा युधिष्ठिरसे शकुनिने फिर कहा—'लो, यह दाँव भी मैंने ही जीता' ॥ ३ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अयं सहस्रसमितो वैयाघ्रः सुप्रतिष्ठितः ।
सुचक्रोपस्करः श्रीमान् किङ्किणीजालमण्डितः ॥ ४ ॥
संह्रादनो राजरथो य इहास्मानुपावहत् ।
जैत्रो रथवरः पुण्यो मेघसागरनिःस्वनः ॥
अष्टौ यं कुररच्छायाः सदश्वा राष्ट्रसम्मताः ॥ ५ ॥
वहन्ति नैषां मुच्येत पदाद् भूमिमुपस्पृशन् ।
एतद् राजन् धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ ६ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**यह जो परमानन्ददायक राजरथ है, जो हमलोगोंको यहाँतक ले आया है, रथोंमें श्रेष्ठ जैत्र नामक पुण्यमय श्रेष्ठ रथ है। चलते समय इससे मेघ और समुद्रकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि होती रहती है। यह अकेला ही एक हजार रथोंके समान है।

इसके ऊपर बाघका चमड़ा लगा हुआ है। यह अत्यन्त सुदृढ़ है। इसके पहिये तथा अन्य आवश्यक सामग्री बहुत सुन्दर है। यह परम शोभायमान रथ क्षुद्र घण्टिकाओंसे सजाया गया है। कुरर पक्षीकी-सी कान्तिवाले आठ अच्छे घोड़े, जो समूचे राष्ट्रमें सम्मानित हैं, इस रथको वहन करते हैं। भूमिका स्पर्श करनेवाला कोई भी प्राणी इन घोड़ोंके सामने पड़ जानेपर बच नहीं सकता। राजन्! इन घोड़ोंसहित यह रथ मेरा धन है, जिसे दाँवपर रखकर मैं तुम्हारे साथ जूआ खेलता हूँ।।

वैशम्पायन उवाच

एवं श्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ।। ७ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! यह सुनकर छलका आश्रय लेनेवाले शकुनिने पुनः पासे फेंके और जीतका निश्चय करके युधिष्ठिरसे कहा—'लो, यह भी जीत लिया' ।। ७ ।।

युधिष्ठिर उवाच

शतं दासीसहस्राणि तरुण्यो हेमभद्रिकाः । कम्बुकेयूरधारिण्यो निष्ककण्ठ्यः स्वलंकृताः ।। ८ ।। महार्हमाल्याभरणाः सुवस्त्राश्चन्दनोक्षिताः । मणीन् हेम च बिभ्रत्यश्चतुःषष्टिविशारदाः ।। ९ ।। अनुसेवां चरन्तीमाः कुशला नृत्यसामसु । स्नातकानाममात्यानां राज्ञां च मम शासनात् । एतद् राजन् मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ।। १० ।। युधिष्ठिरने कहा—मेरे पास एक लाख तरुणी दासियाँ हैं, जो सुवर्णमय मांगलिक आभूषण धारण करती हैं। जिनके हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ, बाँहोंमें भुजबंद, कण्ठमें निष्कोंका हार तथा अन्य अंगोंमें भी सुन्दर आभूषण हैं। बहुमूल्य हार उनकी शोभा बढ़ाते हैं। उनके वस्त्र बहुत ही सुन्दर हैं। वे अपने शरीरमें चन्दनका लेप लगाती हैं, मणि और सुवर्ण धारण करती हैं तथा चौसठ कलाओंमें निपुण हैं। नृत्य और गानमें भी वे कुशल हैं। ये सब-की-सब मेरे आदेशसे स्नातकों, मन्त्रियों तथा राजाओंकी सेवा-परिचर्या करती हैं। राजन्! यह मेरा धन है, जिसे दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ ।। ८—१० ।।

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ।। ११ ।।

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर कपटी शकुनिने पुनः जीतका निश्चय करके पासे फेंके और युधिष्ठिरसे कहा—'यह दाँव भी मैंने ही जीता' ।। ११ ।।

युधिष्ठिर उवाच

एतावन्ति च दासानां सहस्राण्युत सन्ति मे ।
प्रदक्षिणानुलोमाश्च प्रावारवसनाः सदा ।। १२ ।।
**युधिष्ठिरने कहा—**दासियोंकी तरह ही मेरे यहाँ एक लाख दास हैं। वे कार्यकुशल तथा अनुकूल रहनेवाले हैं। उनके शरीरपर सदा सुन्दर उत्तरीय वस्त्र सुशोभित होते हैं ।। १२ ।।
प्राज्ञा मेधाविनो दान्ता युवानो मृष्टकुण्डलाः ।
पात्रीहस्ता दिवारात्रमतिथीन् भोजयन्त्युत ।
एतद् राजन् मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ।। १३ ।।
वे चतुर, बुद्धिमान्, संयमी और तरुण अवस्थावाले हैं। उनके कानोंमें कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं। वे हाथोंमें भोजनपात्र लिये दिन-रात अतिथियोंको भोजन परोसते रहते हैं। राजन्! यह मेरा धन है, जिसे दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ ।। १३ ।।

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः ।
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ।। १४ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर पुनः शठताका आश्रय लेनेवाले शकुनिने अपनी ही जीतका निश्चय करके युधिष्ठिरसे कहा—'लो, यह दाँव भी मैंने जीत लिया' ।। १४ ।।

युधिष्ठिर उवाच

सहस्रसंख्या नागा मे मत्तास्तिष्ठन्ति सौबल ।
हेमकक्षाः कृतापीड़ाः पद्मिनो हेममालिनः ।। १५ ।।
**युधिष्ठिरने कहा—**सुबलकुमार! मेरे यहाँ एक हजार मतवाले हाथी हैं, जिनके बाँधनेके रस्से सुवर्णमय हैं। वे सदा आभूषणोंसे विभूषित रहते हैं। उनके कपोल और मस्तक आदि अंगोंपर कमलके चिह्न बने हुए हैं। उनके गलेमें सोनेके हार सुशोभित होते हैं ।। १५ ।।
सुदान्ता राजवहनाः सर्वशब्दक्षमा युधि ।
ईषादन्ता महाकायाः सर्वे चाष्टकरेणवः ।। १६ ।।
वे अच्छी तरह वशमें किये हुए हैं और राजाओंकी सवारीके काममें आते हैं। युद्धमें वे सब प्रकारके शब्द सहन करनेवाले हैं। उनके दाँत हलदण्डके समान लंबे हैं और शरीर विशाल है। उनमेंसे प्रत्येकके आठ-आठ हथिनियाँ हैं ।। १६ ।।

सर्वे च पुरभेत्तारो नवमेघनिभा गजाः ।
एतद् राजन् मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ १७ ॥
उनकी कान्ति नूतन मेघोंकी घटाके समान है। वे सब-के-सब बड़े-बड़े नगरोंको भी नाश कर देनेकी शक्ति रखते हैं। राजन्! यह मेरा धन है, जिसे दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ ।। १७ ।।

वैशम्पायन उवाच

इत्येवंवादिनं पार्थं प्रहसन्निव सौबलः ।
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ १८ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसी बातें कहते हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरसे शकुनिने हँसकर कहा—'इस दाँवको भी मैंने ही जीता' ।। १८ ।।

युधिष्ठिर उवाच

रथास्तावन्त एवेमे हेमदण्डाः पताकिनः ।
हयैर्विनीतैः सम्पन्ना रथिभिश्चित्रयोधिभिः ॥ १९ ॥
एकैको ह्यत्र लभते सहस्रपरमां भृतिम् ।
युध्यतोऽयुध्यतो वापि वेतनं मासकालिकम् ।
एतद् राजन् मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ २० ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**मेरे पास उतने ही अर्थात् एक हजार रथ हैं, जिनकी ध्वजाओंमें सोनेके डंडे लगे हैं। उन रथोंपर पताकाएँ फहराती रहती हैं। उनमें सधे हुए घोड़े जोते जाते हैं और विचित्र युद्ध करनेवाले रथी उनमें बैठते हैं। उन रथियोंमेंसे प्रत्येकको अधिक-से-अधिक एक सहस्र स्वर्णमुद्राएँतक वेतनमें मिलती हैं। वे युद्ध कर रहे हों या न कर रहे हों, प्रत्येक मासमें उन्हें यह वेतन प्राप्त होता रहता है। राजन्! यह मेरा धन है, इसे दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ ।। १९-२० ।।

वैशम्पायन उवाच

इत्येवमुक्ते वचने कृतवैरो दुरात्मवान् ।
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ २१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उनके ऐसा कहनेपर वैरी दुरात्मा शकुनिने युधिष्ठिरसे कहा—'लो, यह भी जीत लिया' ।। २१ ।।

युधिष्ठिर उवाच

अश्वांस्तित्तिरिकल्माषान् गान्धर्वान् हेममालिनः ।
ददौ चित्ररथस्तुष्टो यांस्तान् गाण्डीवधन्वने ॥ २२ ॥
युद्धे जितः पराभूतः प्रीतिपूर्वमरिंदमः ।

एतद् राजन् मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ २३ ॥ **युधिष्ठिरने कहा—**मेरे यहाँ तीतर पक्षीके समान विचित्र वर्णवाले गन्धर्वदेशके घोड़े हैं, जो सोनेके हारसे विभूषित हैं। शत्रुदमन चित्ररथ गन्धर्वने युद्धमें पराजित एवं तिरस्कृत होनेके पश्चात् संतुष्ट हो गाण्डीवधारी अर्जुनको प्रेमपूर्वक वे घोड़े भेंट किये थे। राजन्! यह मेरा धन है जिसे दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ २४ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर छलका आश्रय लेनेवाले शकुनिने पुनः अपनी ही जीतका निश्चय करके युधिष्ठिरसे कहा—'यह दाँव भी मैंने ही जीता है' ॥

युधिष्ठिर उवाच

रथानां शकटानां च श्रेष्ठानां चायुतानि मे । युक्तान्येव हि तिष्ठन्ति वाहैरुच्चावचैस्तथा ॥ २५ ॥ **युधिष्ठिरने कहा—**मेरे पास दस हजार श्रेष्ठ रथ और छकड़े हैं। जिनमें छोटे-बड़े वाहन सदा जुटे ही रहते हैं ॥

एवं वर्णस्य वर्णस्य समुच्चीय सहस्रशः । यथा समुदिता वीराः सर्वे वीरपराक्रमाः ॥ २६ ॥ इसी प्रकार प्रत्येक वर्णके हजारों चुने हुए योद्धा मेरे यहाँ एक साथ रहते हैं। वे सब-के-सब वीरोचित पराक्रमसे सम्पन्न एवं शूरवीर हैं ॥ २६ ॥

क्षीरं पिबन्तस्तिष्ठन्ति भुञ्जानाः शालितण्डुलान् । षष्टिस्तानि सहस्राणि सर्वे विपुलवक्षसः । एतद् राजन् मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ २७ ॥ उनकी संख्या साठ हजार है। वे दूध पीते और शालिके चावलका भात खाकर रहते हैं। उन सबकी छाती बहुत चौड़ी है। राजन्! यह मेरा धन है, जिसे दाँवपर रखकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ ॥ २७ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ २८ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर शठताके उपासक शकुनिने पुनः युधिष्ठिरसे पूर्ण निश्चयके साथ कहा—'यह दाँव भी मैंने ही जीता है' ॥ २८ ॥

युधिष्ठिर उवाच

ताम्रलोहैः परिवृता निधयो ये चतुःशताः ।
पञ्चद्रौणिक एकैकः सुवर्णस्याहतस्य वै ॥ २९ ॥
जातरूपस्य मुख्यस्य अनर्घ्यस्य भारत ।
एतद् राजन् मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ ३० ॥
युधिष्ठिरने कहा—मेरे पास ताँबे और लोहेकी चार सौ निधियाँ यानी खजानेसे भरी हुई पेटियाँ हैं। प्रत्येकमें पाँच-पाँच द्रोण विशुद्ध सोना भरा हुआ है, वह सारा सोना तपाकर शुद्ध किया हुआ है, उसकी कीमत आँकी नहीं जा सकती। भारत! यह मेरा धन है, जिसे दाँवपर रखकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ ॥ २९-३० ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः ।
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ ३१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ऐसा सुनकर छलका आश्रय लेनेवाले शकुनिने पूर्ववत् पूर्ण निश्चयके साथ युधिष्ठिरसे कहा—‘यह दाँव भी मैंने ही जीता’ ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि देवने एकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें द्यूतक्रीड़ाविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥


* प्राचीनकालमें प्रचलित एक सिक्का, जो एक कर्ष अथवा सोलह मासे सोनेका बना होता था।

अध्याय (पृष्ठ 2112)

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द्विषष्टितमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रको विदुरकी चेतावनी

वैशम्पायन उवाच

एवं प्रवर्तिते द्यूते घोरे सर्वापहारिणि ।
सर्वसंशयनिर्मोक्ता विदुरो वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार जब सर्वस्वका अपहरण करनेवाली वह भयानक द्यूतक्रीड़ा चल रही थी, उसी समय समस्त संशयोंका निवारण करनेवाले विदुरजी बोल उठे ॥ १ ॥

विदुर उवाच

महाराज विजानीहि यत् त्वां वक्ष्यामि भारत ।
मुमूर्षोरौषधमिव न रोचेतापि ते श्रुतम् ॥ २ ॥
विदुरजीने कहा— भरतकुलतिलक महाराज धृतराष्ट्र! मरणासन्न रोगीको जैसे ओषधि अच्छी नहीं लगती, उसी प्रकार आपलोगोंको मेरी शास्त्रसम्मत बात भी अच्छी नहीं लगेगी। फिर भी मैं आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे अच्छी तरह सुनिये और समझिये ॥ २ ॥

यद् वै पुरा जातमात्रो रुराव
गोमायुवद् विस्वरं पापचेताः ।
दुर्योधनो भरतानां कुलघ्नः
सोऽयं युक्तो भवतां कालहेतुः ॥ ३ ॥
यह भरतवंशका विनाश करनेवाला पापी दुर्योधन पहले जब गर्भसे बाहर निकला था, गीदड़के समान जोर-जोरसे चिल्लाने लगा था; अतः यह निश्चय ही आप सब लोगोंके विनाशका कारण बनेगा ॥ ३ ॥

गृहे वसन्तं गोमायुं त्वं वै मोहान्न बुध्यसे ।
दुर्योधनस्य रूपेण शृणु काव्यां गिरं मम ॥ ४ ॥
राजन्! दुर्योधनके रूपमें आपके घरके भीतर एक गीदड़ निवास कर रहा है; परंतु आप मोहवश इस बातको समझ नहीं पाते। सुनिये, मैं आपको शुक्राचार्यकी कही हुई नीतिकी बात बतलाता हूँ ॥ ४ ॥

मधु वै माध्विको लब्ध्वा प्रपातं नैव बुध्यते ।
आरुह्य तं मज्जति वा पतनं चाधिगच्छति ॥ ५ ॥
मधु बेचनेवाला मनुष्य जब कहीं ऊँचे वृक्ष आदिपर मधुका छत्ता देख लेता है, तब वहाँसे गिरनेकी सम्भावनाकी ओर ध्यान नहीं देता। वह ऊँचे स्थानपर चढ़कर या तो मधु

पाकर मग्न हो जाता है अथवा उस स्थानसे नीचे गिर जाता है ।। ५ ।। सोऽयं मत्तोऽक्षद्यूतेन मधुवन्न परीक्षते । प्रपातं बुध्यते नैव वैरं कृत्वा महारथैः ।। ६ ।। वैसे ही यह दुर्योधन जूएके नशेमें इतना उन्मत्त हो गया है कि मधुमत्त पुरुषकी भाँति अपने ऊपर आनेवाले संकटको नहीं देखता। महारथी पाण्डवोंके साथ वैर करके हमें पतनके गर्तमें गिरकर मरना पड़ेगा, इस बातको समझ नहीं पा रहा है ।। ६ ।। विदितं मे महाप्राज्ञ भोजेष्वेवासमञ्जसम् । पुत्रं संत्यक्तवान् पूर्वं पौराणां हितकाम्यया ।। ७ ।। महाप्राज्ञ! मुझे मालूम है कि भोजवंशके एक नरेशने पूर्वकालमें पुरवासियोंके हितकी इच्छासे अपने कुमार्गगामी पुत्रका परित्याग कर दिया था ।। ७ ।। अन्धका यादवा भोजाः समेताः कंसमत्यजन् । नियोगात् तु हते तस्मिन् कृष्णेनामित्रघातिना ।। ८ ।। अन्धकों, यादवों और भोजोंने मिलकर कंसको त्याग दिया तथा उन्हींके आदेशसे शत्रुघाती श्रीकृष्णने उसको मार डाला ।। ८ ।। एवं ते ज्ञातयः सर्वे मोदमानाः शतं समाः । त्वन्नियुक्तः सव्यसाची निगृह्णातु सुयोधनम् ।। ९ ।। इस प्रकार उसके मारे जानेसे समस्त बन्धु-बान्धव सदाके लिये सुखी हो गये हैं। आप भी आज्ञा दें तो ये सव्यसाची अर्जुन इस दुर्योधनको बंदी बना ले सकते हैं ।। निग्रहादस्य पापस्य मोदन्तां कुरवः सुखम् । काकेनेमांश्चित्रबर्हान् शार्दूलान् क्रोष्टुकेन च । क्रीणीष्व पाण्डवान् राजन् मा मज्जीः शोकसागरे ।। १० ।। इसी पापीके कैद हो जानेसे समस्त कौरव सुख और आनन्दसे रह सकते हैं। राजन्! दुर्योधन कौवा है और पाण्डव मोर। इस कौवेको देकर आप विचित्र पंखोंवाले मयूरोंको खरीद लीजिये। इस गीदड़के द्वारा इन पाण्डवरूपी शेरोंको अपनाइये। शोकके समुद्रमें डूबकर प्राण न दीजिये ।। १० ।। त्यजेत् कुलार्थे पुरुषं ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ।। ११ ।। समूचे कुलकी भलाईके लिये एक मनुष्यको त्याग दे, गाँवके हितके लिये एक कुलको छोड़ दे, देशकी भलाईके लिये एक गाँवको त्याग दे और आत्माके उद्धारके लिये सारी पृथ्वीका ही परित्याग कर दे ।। ११ ।। सर्वज्ञः सर्वभावज्ञः सर्वशत्रुभयंकरः । इति स्म भाषते काव्यो जम्भत्यागे महासुरान् ।। १२ ।।