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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

दूसरेके मित्र थे, इस भावको हृदयसे निकाल दो' ।। ६८ ।। आसीत् सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिबन्धनम् । न ह्यानाढ्यः सखाढ्यस्य नाविद्वान् विदुषः सखा ।। ६९ ।। न शूरस्य सखा क्लीबः सखिपूर्वं किमीष्यते । न हि राज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैनरैः क्वचित् ।। ७० ।। सख्यं भवति मन्दात्मन् श्रियाहीनैरधनच्युतैः । नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा ।। ७१ ।। नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमीष्यते । अहं त्वया न जानामि राज्यार्थे संविदं कृतम् ।। ७२ ।। 'द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्‌का, मूर्ख विद्वान्‌का और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है ।। ६९—७२ ।।

एकरात्रं तु ते ब्रह्मन् कामं दास्यामि भोजनम् । एवमुक्तस्त्वहं तेन सदारः प्रस्थितस्तदा ।। ७३ ।। 'ब्रह्मन्! तुम्हारी इच्छा हो तो मैं तुम्हें एक रातके लिये अच्छी तरह भोजन दे सकता हूँ।' राजा द्रुपदके यों कहनेपर मैं पत्नी और पुत्रके साथ वहाँसे चल दिया ।। ७३ ।।

तां प्रतिज्ञां प्रतिज्ञाय यां कर्तास्म्यचिरादिव । द्रुपदेनैवमुक्तोऽहं मन्युनाभिपरिप्लुतः ।। ७४ ।। चलते समय मैंने एक प्रतिज्ञा की थी, जिसे शीघ्र पूर्ण करूँगा। द्रुपदके द्वारा जो इस प्रकार तिरस्कारपूर्ण वचन मेरे प्रति कहा गया है, उसके कारण मैं क्षोभसे अत्यन्त व्याकुल हो रहा हूँ ।। ७४ ।।

अभ्यागच्छं कुरून् भीष्म शिष्यैरर्थी गुणान्वितैः । ततोऽहं भवतः कामं संवर्धयितुमागतः ।। ७५ ।। इदं नागपुरं रम्यं ब्रूहि किं करवाणि ते । भीष्मजी! मैं गुणवान् शिष्योंके द्वारा अपने अभीष्टकी सिद्धि चाहता हुआ आपके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये पांचालदेशसे कुरुराज्यके भीतर इस रमणीय हस्तिनापुर नगरमें आया हूँ। बताइये, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? ।। ७५ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तदा भीष्मो भारद्वाजमभाषत ॥ ७६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**द्रोणाचार्यके यों कहनेपर भीष्मने उनसे कहा ॥ ७६ ॥

भीष्म उवाच

अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय । भुङ्क्ष्व भोगान् भृशं प्रीतः पूज्यमानः कुरुक्षये ॥ ७७ ॥ **भीष्मजी बोले—**विप्रवर! अब आप अपने धनुषकी डोरी उतार दीजिये और यहाँ रहकर राजकुमारोंको धनुर्वेद एवं अस्त्र-शस्त्रोंकी अच्छी शिक्षा दीजिये। कौरवोंके घरमें सदा सम्मानित रहकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ मनोवांछित भोगोंका उपभोग कीजिये ॥ ७७ ॥

कुरूणामस्ति यद् वित्तं राज्यं चेदं सराष्ट्रकम् । त्वमेव परमो राजा सर्वे च कुरवस्तव ॥ ७८ ॥ कौरवोंके पास जो धन, राज्य-वैभव तथा राष्ट्र है, उसके आप ही सबसे बड़े राजा हैं। समस्त कौरव आपके अधीन हैं ॥ ७८ ॥

यच्च ते प्रार्थितं ब्रह्मन् कृतं तदिति चिन्त्यताम् । दिष्ट्या प्राप्तोऽसि विप्रर्षे महान् मेऽनुग्रहः कृतः ॥ ७९ ॥ ब्रह्मन्! आपने जो माँग की है, उसे पूर्ण हुई समझिये। ब्रह्मर्षे! आप आये, यह हमारे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है। आपने यहाँ पधारकर मुझपर महान् अनुग्रह किया है ॥ ७९ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मद्रोणसमागमे त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीष्म-द्रोण-समागमविषयक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३० ॥


* जौके आकारकी बनी हुई काठकी मोटी गुल्लीको ‘बीटा’ कहते हैं।

१३१-

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

द्रोणाचार्यद्वारा राजकुमारोंकी शिक्षा, एकलव्यकी गुरुभक्ति तथा आचार्यद्वारा शिष्योंकी परीक्षा

वैशम्पायन उवाच

ततः सम्पूजितो द्रोणो भीष्मेण द्विपदां वरः ।
विशश्राम महातेजाः पूजितः कुरुवेश्मनि ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर मनुष्योंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी द्रोणाचार्यने भीष्मजीके द्वारा पूजित हो कौरवोंके घरमें विश्राम किया। वहाँ उनका बड़ा सम्मान किया गया ॥ १ ॥

विश्रान्तेऽथ गुरौ तस्मिन् पौत्रानादाय कौरवान् ।
शिष्यत्वेन ददौ भीष्मो वसूनि विविधानि च ॥ २ ॥
गृहं च सुपरिच्छन्नं धनधान्यसमाकुलम् ।
भारद्वाजाय सुप्रीतः प्रत्यपादयत प्रभुः ॥ ३ ॥
गुरु द्रोणाचार्य जब विश्राम कर चुके, तब सामर्थ्यशाली भीष्मजीने अपने कुरुवंशी पौत्रोंको लेकर उन्हें शिष्यरूपमें समर्पित किया। साथ ही अत्यन्त प्रसन्न होकर भरद्वाजनन्दन द्रोणको नाना प्रकारके धन-रत्न और सुन्दर सामग्रियोंसे सुसज्जित तथा धन- धान्यसे सम्पन्न भवन प्रदान किया ॥ २-३ ॥

स ताञ्छिष्यान् महेष्वासः प्रतिजग्राह कौरवान् ।
पाण्डवान् धार्तराष्ट्रांश्च द्रोणो मुदितमानसः ॥ ४ ॥
महाधनुर्धर आचार्य द्रोणने प्रसन्नचित्त होकर उन धृतराष्ट्र-पुत्रों तथा पाण्डवोंको शिष्यरूपमें ग्रहण किया ॥ ४ ॥

प्रतिगृह्य च तान् सर्वान् द्रोणो वचनमब्रवीत् ।
रहस्येकः प्रतीतात्मा कृतोपसदनांस्तथा ॥ ५ ॥
उन सबको ग्रहण कर लेनेपर एक दिन एकान्तमें जब द्रोणाचार्य पूर्ण विश्वासयुक्त मनसे अकेले बैठे थे, तब उन्होंने अपने पास बैठे हुए सब शिष्योंसे यह बात कही ॥ ५ ॥

द्रोण उवाच

कार्यं मे काङ्क्षितं किंचिद्धृदि सम्परिवर्तते ।
कृतास्त्रैस्तत् प्रदेयं मे तदेतद् वदतानघाः ॥ ६ ॥
**द्रोण बोले—**निष्पाप राजकुमारो! मेरे मनमें एक कार्य करनेकी इच्छा है। अस्त्रशिक्षा प्राप्त कर लेनेके पश्चात् तुमलोगोंको मेरी वह इच्छा पूर्ण करनी होगी। इस विषयमें तुम्हारे

क्या विचार हैं, बतलाओ ।। ६ ।।

वैशम्पायन उवाच

तच्छ्रुत्वा कौरवेयास्ते तूष्णीमासन् विशाम्पते । अर्जुनस्तु ततः सर्वं प्रतिजज्ञे परंतप ।। ७ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा जनमेजय! आचार्यकी वह बात सुनकर सब कौरव चुप रह गये; परंतु अर्जुनने वह सब कार्य पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली ।। ७ ।।

ततोऽर्जुनं तदा मूर्ध्नि समाघ्राय पुनः पुनः । प्रीतिपूर्वं परिष्वज्य प्ररुरोद मुदा तदा ।। ८ ।। तब आचार्यने बारंबार अर्जुनका मस्तक सूँघा और उन्हें प्रेमपूर्वक हृदयसे लगाकर वे हर्षके आवेशमें रो पड़े ।। ८ ।।

ततो द्रोणः पाण्डुपुत्रानस्त्राणि विविधानि च । ग्राहयामास दिव्यानि मानुषाणि च वीर्यवान् ।। ९ ।। तब पराक्रमी द्रोणाचार्य पाण्डवों (तथा अन्य शिष्यों)-को नाना प्रकारके दिव्य एवं मानव अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा देने लगे ।। ९ ।।

राजपुत्रास्तथा चान्ये समेत्य भरतर्षभ । अभिजग्मुस्ततो द्रोणमस्त्रार्थे द्विजसत्तमम् ।। १० ।। भरतश्रेष्ठ! उस समय दूसरे-दूसरे राजकुमार भी अस्त्रविद्याकी शिक्षा लेनेके लिये द्विजश्रेष्ठ द्रोणके पास आने लगे ।। १० ।।

वृष्णयश्चान्धकाश्चैव नानादेश्याश्च पार्थिवाः । सूतपुत्रश्च राधेयो गुरुं द्रोणमियात् तदा ।। ११ ।। वृष्णिवंशी तथा अन्धकवंशी क्षत्रिय, नाना देशोंके राजकुमार तथा राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण—ये सभी आचार्य द्रोणके पास (अस्त्र-शिक्षा लेनेके लिये) आये ।। ११ ।।

स्पर्धमानस्तु पार्थेन सूतपुत्रोऽत्यमर्षणः । दुर्योधनं समाश्रित्य सोऽवमन्यत पाण्डवान् ।। १२ ।। सूतपुत्र कर्ण सदा अर्जुनसे लाग-डाँट रखता और अत्यन्त अमर्षमें भरकर दुर्योधनका सहारा ले पाण्डवोंका अपमान किया करता था ।। १२ ।।

अभ्ययात् स ततो द्रोणं धनुर्वेदचिकीर्षया । शिक्षाभुजबलोद्योगैस्तेषु सर्वेषु पाण्डवः । अस्त्रविद्यानुरागाच्च विशिष्टोऽभवदर्जुनः ।। १३ ।। तुल्येष्वस्त्रप्रयोगेषु लाघवे सौष्ठवेषु च । सर्वेषामेव शिष्याणां बभूवाभ्यधिकोऽर्जुनः ।। १४ ।।

पाण्डुनन्दन अर्जुन (सदा अभ्यासमें लगे रहनेसे) धनुर्वेदकी जिज्ञासा, शिक्षा, बाहुबल और उद्योगकी दृष्टिसे उन सभी शिष्योंमें श्रेष्ठ एवं आचार्य द्रोणकी समानता करनेयोग्य हो गये। उनका अस्त्र-विद्यामें बड़ा अनुराग था, इसलिये वे तुल्य अस्त्रोंके प्रयोग, फुर्ती और सफाईमें भी सबसे बढ़-चढ़कर निकले ॥ १३-१४ ॥ ऐन्द्रिमप्रतिमं द्रोण उपदेशेष्वमन्यत । एवं सर्वकुमाराणामिष्वस्त्रं प्रत्यपादयत् ॥ १५ ॥ आचार्य द्रोण उपदेश ग्रहण करनेमें अर्जुनको अनुपम प्रतिभाशाली मानते थे। इस प्रकार आचार्य सब कुमारोंको अस्त्र-विद्याकी शिक्षा देते रहे ॥ १५ ॥ कमण्डलुं च सर्वेषां प्रायच्छच्चिरकारणात् । पुत्राय च ददौ कुम्भमविलम्बनकारणात् ॥ १६ ॥ यावत् ते नोपगच्छन्ति तावदस्मै परां क्रियाम् । द्रोण आचष्ट पुत्राय तत् कर्म जिष्णुरौहत ॥ १७ ॥ वे अन्य सब शिष्योंको तो पानी लानेके लिये कमण्डलु देते, जिससे उन्हें लौटनेमें कुछ विलम्ब हो जाय; परंतु अपने पुत्र अश्वत्थामाको बड़े मुँहका घड़ा देते, जिससे उसके लौटनेमें विलम्ब न हो (अतः अश्वत्थामा सबसे पहले पानी भरकर उनके पास लौट आता था)। जबतक दूसरे शिष्य लौट नहीं आते, तबतक वे अपने पुत्र अश्वत्थामाको अस्त्र-संचालनकी कोई उत्तम विधि बतलाते थे। अर्जुनने उनके इस कार्यको जान लिया ॥ १६-१७ ॥ ततः स वारुणास्त्रेण पूरयित्वा कमण्डलुम् । सममाचार्यपुत्रेण गुरुमभ्येति फाल्गुनः ॥ १८ ॥ आचार्यपुत्रात् तस्मात् तु विशेषोपचयेऽपृथक् । न व्यहीयत मेधावी पार्थोऽप्यस्त्रविदां वरः ॥ १९ ॥ अर्जुनः परमं यत्नमातिष्ठद् गुरुपूजने । अस्त्रे च परमं योगं प्रियो द्रोणस्य चाभवत् ॥ २० ॥ अतः वे वारुणास्त्रसे तुरंत ही अपना कमण्डलु भरकर आचार्यपुत्रके साथ ही गुरुके समीप आ जाते थे, इसलिये आचार्यपुत्रसे किसी भी गुणकी वृद्धिमें वे अलग या पीछे न रहे। यही कारण था कि मेधावी अर्जुन अश्वत्थामासे किसी बातमें कम न रहे। वे अस्त्रवेत्ताओंमें सबसे श्रेष्ठ थे। अर्जुन अपने गुरुदेवकी सेवा-पूजाके लिये भी उत्तम यत्न करते थे। अस्त्रोंके अभ्यासमें भी उनकी अच्छी लगन थी। इसीलिये वे द्रोणाचार्यके बड़े प्रिय हो गये ॥ १८–२० ॥ तं दृष्ट्वा नित्यमुद्युक्तमिष्वस्त्रं प्रति फाल्गुनम् । आहूय वचनं द्रोणो रहः सूदमभाषत ॥ २१ ॥ अन्धकारेऽर्जुनायान्नं न देयं ते कदाचन ।

न चाख्येयमिदं चापि मद्वाक्यं विजये त्वया ॥ २२ ॥ अर्जुनको धनुष-बाणके अभ्यासमें निरन्तर लगा हुआ देख द्रोणाचार्यने रसोइयेको एकान्तमें बुलाकर कहा—‘तुम अर्जुनको कभी अँधेरेमें भोजन न परोसना और मेरी यह बात भी अर्जुनसे कभी न कहना’ ॥ २१-२२ ॥ ततः कदाचिद् भुञ्जाने प्रववौ वायुरर्जुने । तेन तत्र प्रदीपः स दीप्यमानो विलोपितः ॥ २३ ॥ तदनन्तर एक दिन जब अर्जुन भोजन कर रहे थे, बड़े जोरसे हवा चलने लगी; उससे वहाँका जलता हुआ दीपक बुझ गया ॥ २३ ॥ भुङ्क्त एव तु कौन्तेयो नास्यादन्यत्र वर्तते । हस्तस्तेजस्विनस्तस्य अनुग्रहणकारणात् ॥ २४ ॥ उस समय भी कुन्तीनन्दन अर्जुन भोजन करते ही रहे। उन तेजस्वी अर्जुनका हाथ अभ्यासवश अँधेरेमें भी मुखसे अन्यत्र नहीं जाता था ॥ २४ ॥ तदभ्यासकृतं मत्वा रात्रावपि स पाण्डवः । योग्यां चक्रे महाबाहुर्धनुषा पाण्डुनन्दनः ॥ २५ ॥ उसे अभ्यासका ही चमत्कार मानकर महाबाहु पाण्डुनन्दन अर्जुन रातमें भी धनुर्विद्याका अभ्यास करने लगे ॥ २५ ॥ तस्य ज्यातलनिर्घोषं द्रोणः शुश्राव भारत । उपेत्य चैनमुत्थाय परिष्वज्येदमब्रवीत् ॥ २६ ॥ भारत! उनके धनुषकी प्रत्यंचाका टंकार द्रोणने सोते समय सुना। तब वे उठकर उनके पास गये और उन्हें हृदयसे लगाकर बोले ॥ २६ ॥

द्रोण उवाच

प्रयतिष्ये तथा कर्तुं यथा नान्यो धनुर्धरः । त्वत्समो भविता लोके सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २७ ॥ द्रोणने कहा—अर्जुन! मैं ऐसा करनेका प्रयत्न करूँगा, जिससे इस संसारमें दूसरा कोई धनुर्धर तुम्हारे समान न हो। मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ ॥ २७ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो द्रोणोऽर्जुनं भूयो हयेषु च गजेषु च । रथेषु भूमावपि च रणशिक्षामशिक्षयत् ॥ २८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर द्रोणाचार्य अर्जुनको पुनः घोड़ों, हाथियों, रथों तथा भूमिपर रहकर युद्ध करनेकी शिक्षा देने लगे ॥ २८ ॥ गदायुद्धेऽसिचर्यायां तोमरप्रासशक्तिषु । द्रोणः संकीर्णयुद्धे च शिक्षयामास कौरवान् ॥ २९ ॥

उन्होंने कौरवोंको गदायुद्ध, खड्ग चलाने तथा तोमर, प्रास और शक्तियोंके प्रयोगकी कला एवं एक ही साथ अनेक शस्त्रोंके प्रयोग अथवा अकेले ही अनेक शत्रुओंसे युद्ध करनेकी शिक्षा दी ॥ २९ ॥

तस्य तत् कौशलं श्रुत्वा धनुर्वेदजिघृक्षवः ।
राजानो राजपुत्राश्च समाजग्मुः सहस्रशः ॥ ३० ॥
द्रोणाचार्यका वह अस्त्रकौशल सुनकर सहस्रों राजा और राजकुमार धनुर्वेदकी शिक्षा लेनेके लिये वहाँ एकत्रित हो गये ॥ ३० ॥

ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः ।
एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह ॥ ३१ ॥
महाराज! तदनन्तर निषादराज हिरण्यधनुका पुत्र एकलव्य द्रोणके पास आया ॥ ३१ ॥

न स तं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन् ।
शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया ॥ ३२ ॥
परंतु उसे निषादपुत्र समझकर धर्मज्ञ आचार्यने धनुर्विद्याविषयक शिष्य नहीं बनाया। कौरवोंकी ओर दृष्टि रखकर ही उन्होंने ऐसा किया ॥ ३२ ॥

स तु द्रोणस्य शिरसा पादौ गृह्य परंतपः ।
अरण्यमनुसम्प्राप्य कृत्वा द्रोणं महीमयम् ॥ ३३ ॥
तस्मिन्नाचार्यवृत्तिं च परमामास्थितस्तदा ।
इष्वस्त्रे योगमातस्थे परं नियममास्थितः ॥ ३४ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले एकलव्यने द्रोणाचार्यके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और वनमें लौटकर उनकी मिट्टीकी मूर्ति बनायी तथा उसीमें आचार्यकी परमोच्च भावना रखकर उसने धनुर्विद्याका अभ्यास प्रारम्भ किया। वह बड़े नियमके साथ रहता था ॥ ३३-३४ ॥

परया श्रद्धयोपेतो योगेन परमेण च ।
विमोक्षादानसंधाने लघुत्वं परमाप सः ॥ ३५ ॥
आचार्यमें उत्तम श्रद्धा रखकर उत्तम और भारी अभ्यासके बलसे उसने बाणोंके छोड़ने, लौटाने और संधान करनेमें बड़ी अच्छी फुर्ती प्राप्त कर ली ॥ ३५ ॥

अथ द्रोणाभ्यनुज्ञाताः कदाचित् कुरुपाण्डवाः ।
रथैर्विनिर्ययुः सर्वे मृगयामरिर्मदन ॥ ३६ ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले जनमेजय! तदनन्तर एक दिन समस्त कौरव और पाण्डव आचार्य द्रोणकी अनुमतिसे रथोंपर बैठकर (हिंसक पशुओंका) शिकार खेलनेके लिये निकले ॥ ३६ ॥

तत्रोपकरणं गृह्य नरः कश्चिद् यदृच्छया ।

राजन्ननुजगामैकः श्वानमादाय पाण्डवान् ।। ३७ ।।
इस कार्यके लिये आवश्यक सामग्री लेकर कोई मनुष्य स्वेच्छानुसार अकेला ही उन पाण्डवोंके पीछे-पीछे चला। उसने साथमें एक कुत्ता भी ले रखा था ।। ३७ ।।
तेषां विचरतां तत्र तत्तत्कर्मचिकीर्षया ।
श्वा चरन् स वने मूढो नैषादिं प्रति जग्मिवान् ।। ३८ ।।
वे सब अपना-अपना काम पूरा करनेकी इच्छासे वनमें इधर-उधर विचर रहे थे। उनका वह मूढ़ कुत्ता वनमें घूमता-घामता निषादपुत्र एकलव्यके पास जा पहुँचा ।। ३८ ।।
स कृष्णं मलदिग्धाङ्गं कृष्णाजिनजटाधरम् ।
नैषादिं श्वा समालक्ष्य भषंस्तस्थौ तदन्तिके ।। ३९ ।।
एकलव्यके शरीरका रंग काला था। उसके अंगोंमें मैल जम गया था और उसने काला मृगचर्म एवं जटा धारण कर रखी थी। निषादपुत्रको इस रूपमें देखकर वह कुत्ता भौं-भौं करके भूँकता हुआ उसके पास खड़ा हो गया ।। ३९ ।।
तदा तस्याथ भषतः शुनः सप्त शरान् मुखे ।
लाघवं दर्शयन्नस्त्रे मुमोच युगपद् यथा ।। ४० ।।
यह देख भीलने अपने अस्त्रलाघवका परिचय देते हुए उस भूँकनेवाले कुत्तेके मुखमें मानो एक ही साथ सात बाण मारे ।। ४० ।।
स तु श्वा शरपूर्णास्यः पाण्डवानाजगाम ह ।
तं दृष्ट्वा पाण्डवा वीराः परं विस्मयमागताः ।। ४१ ।।
उसका मुँह बाणोंसे भर गया और वह उसी अवस्थामें पाण्डवोंके पास आया। उसे देखकर पाण्डव वीर बड़े विस्मयमें पड़े ।। ४१ ।।

लाघवं शब्दवेधित्वं दृष्ट्वा तत् परमं तदा । प्रेक्ष्य तं व्रीडिताश्चासन् प्रशशंसुश्च सर्वशः ॥ ४२ ॥ वह हाथकी फुर्ती और शब्दके अनुसार लक्ष्य बेधनेकी उत्तम शक्ति देखकर उस समय सब राजकुमार उस कुत्तेकी ओर दृष्टि डालकर लज्जित हो गये और सब प्रकारसे बाण मारनेवालेकी प्रशंसा करने लगे ॥ ४२ ॥ तं ततोऽन्वेषमाणास्ते वने वननिवासिनम् । ददृशुः पाण्डवा राजन्नस्यन्तमनिशं शरान् ॥ ४३ ॥ राजन्! तत्पश्चात् पाण्डवोंने उस वनवासी वीरकी वनमें खोज करते हुए उसे निरन्तर बाण चलाते हुए देखा ॥ ४३ ॥ न चैनमभ्यजानंस्ते तदा विकृतदर्शनम् । अथैनं परिपप्रच्छुः को भवान् कस्य वेत्युत ॥ ४४ ॥ उस समय उसका रूप बदल गया था। पाण्डव उसे पहचान न सके; अतः पूछने लगे—‘तुम कौन हो, किसके पुत्र हो?’ ॥ ४४ ॥

एकलव्य उवाच

निषादाधिपतेर्वीरा हिरण्यधनुषः सुतम् ।

द्रोणशिष्यं च मां वित्त धनुर्वेदकृतश्रमम् ॥ ४५ ॥
एकलव्यने कहा— वीरो! आपलोग मुझे निषादराज हिरण्यधनुका पुत्र तथा द्रोणाचार्यका शिष्य जानें। मैंने धनुर्वेदमें विशेष परिश्रम किया है ॥ ४५ ॥

वैशम्पायन उवाच

ते तमाज्ञाय तत्त्वेन पुनरागम्य पाण्डवाः ।
यथावृत्तं वने सर्वं द्रोणायाचख्युरद्भुतम् ॥ ४६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! वे पाण्डवलोग उस निषादका यथार्थ परिचय पाकर लौट आये और वनमें जो अद्भुत घटना घटी थी, वह सब उन्होंने द्रोणाचार्यसे कह सुनायी ॥ ४६ ॥

कौन्तेयस्त्वर्जुनो राजन्नेकलव्यमनुस्मरन् ।
रहो द्रोणं समासाद्य प्रणयादिदमब्रवीत् ॥ ४७ ॥
जनमेजय! कुन्तीनन्दन अर्जुन बार-बार एकलव्यका स्मरण करते हुए एकान्तमें द्रोणसे मिलकर प्रेमपूर्वक यों बोले ॥ ४७ ॥

अर्जुन उवाच

तदाहं परिरभ्यैकः प्रीतिपूर्वमिदं वचः ।
भवतोक्तो न मे शिष्यस्त्वद्विशिष्टो भविष्यति ॥ ४८ ॥
अर्जुनने कहा— आचार्य! उस दिन तो आपने मुझ अकेलेको हृदयसे लगाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ यह बात कही थी कि मेरा कोई भी शिष्य तुमसे बढ़कर नहीं होगा ॥ ४८ ॥

अथ कस्मान्मद्विशिष्टो लोकादपि च वीर्यवान् ।
अन्योऽस्ति भवतः शिष्यो निषादाधिपतेः सुतः ॥ ४९ ॥
फिर आपका यह अन्य शिष्य निषादराजका पुत्र अस्त्र-विद्यामें मुझसे बढ़कर कुशल और सम्पूर्ण लोकसे भी अधिक पराक्रमी कैसे हुआ? ॥ ४९ ॥

वैशम्पायन उवाच

मुहूर्तमिव तं द्रोणश्चिन्तयित्वा विनिश्चयम् ।
सव्यसाचिनमादाय नैषादिं प्रति जग्मिवान् ॥ ५० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! आचार्य द्रोण उस निषादपुत्रके विषयमें दो घड़ीतक मानो कुछ सोचते-विचारते रहे; फिर कुछ निश्चय करके वे सव्यसाची अर्जुनको साथ ले उसके पास गये ॥ ५० ॥

ददर्श मलदिग्धाङ्गं जटिलं चीरवाससम् ।
एकलव्यं धनुष्पाणिमस्यन्तमनिशं शरान् ॥ ५१ ॥

वहाँ पहुँचकर उन्होंने एकलव्यको देखा, जो हाथमें धनुष ले निरन्तर बाणोंकी वर्षा कर रहा था। उसके शरीरपर मैल जम गया था। उसने सिरपर जटा धारण कर रखी थी और वस्त्रके स्थानपर चिथड़े लपेट रखे थे ।। ५१ ।।

एकलव्यस्तु तं दृष्ट्वा द्रोणमायान्तमन्तिकात् ।
अभिगम्योपसंगृह्य जगाम शिरसा महीम् ॥ ५२ ॥
इधर एकलव्यने आचार्य द्रोणको समीप आते देख आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और उनके दोनों चरण पकड़कर पृथ्वीपर माथा टेक दिया ।। ५२ ।।

पूजयित्वा ततो द्रोणं विधिवत् स निषादजः ।
निवेद्य शिष्यमात्मानं तस्थौ प्राञ्जलिग्रतः ॥ ५३ ॥
फिर उस निषादकुमारने अपनेको शिष्यरूपसे उनके चरणोंमें समर्पित करके गुरु द्रोणकी विधिपूर्वक पूजा की और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ा हो गया ।। ५३ ।।

ततो द्रोणोऽब्रवीद् राजन्नेकलव्यमिदं वचः ।
यदि शिष्योऽसि मे वीर वेतनं दीयतां मम ॥ ५४ ॥
एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा प्रीयमाणोऽब्रवीदिदम् ।
राजन्! तब द्रोणाचार्यने एकलव्यसे यह बात कही—‘वीर! यदि तुम मेरे शिष्य हो तो मुझे गुरुदक्षिणा दो’।
यह सुनकर एकलव्य बहुत प्रसन्न हुआ और इस प्रकार बोला ।। ५४ १/२ ।।

एकलव्य उवाच

किं प्रयच्छामि भगवन्नाज्ञापयतु मां गुरुः ॥ ५५ ॥
न हि किंचिददेयं मे गुरवे ब्रह्मवित्तम ।
एकलव्यने कहा— भगवन्! मैं आपको क्या दूँ? स्वयं गुरुदेव ही मुझे इसके लिये आज्ञा दें। ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आचार्य! मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो गुरुके लिये अदेय हो ।। ५५ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

तमब्रवीत् त्वयाङ्गुष्ठो दक्षिणो दीयतामिति ॥ ५६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब द्रोणाचार्यने उससे कहा—‘तुम मुझे दाहिने हाथका अँगूठा दे दो’ ।। ५६ ।।

एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा वचो द्रोणस्य दारुणम् ।
प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन् सत्ये च नियतः सदा ॥ ५७ ॥
तथैव हृष्टवदनस्तथैवादीनमानसः ।
छित्त्वाविचार्य तं प्रादाद् द्रोणायाङ्गुष्ठमात्मनः ॥ ५८ ॥

द्रोणाचार्यका यह दारुण वचन सुनकर सदा सत्यपर अटल रहनेवाले एकलव्यने अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए पहलेकी ही भाँति प्रसन्नमुख और उदारचित्त रहकर बिना कुछ सोच-विचार किये अपना दाहिना अँगूठा काटकर द्रोणाचार्यको दे दिया ।। ५७-५८ ।।

(स सत्यसंधं नैषादिं दृष्ट्वा प्रीतोऽब्रवीदिदम् । एवं कर्तव्यमिति वा एकलव्यमभाषत ।।) ततः शरं तु नैषादिरङ्गुलीभिर्व्यकर्षत । न तथा च स शीघ्रोऽभूद् यथा पूर्वं नराधिप ।। ५९ ।। द्रोणाचार्य निषादनन्दन एकलव्यको सत्यप्रतिज्ञ देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने संकेतसे उसे यह बता दिया कि तर्जनी और मध्यमाके संयोगसे बाण पकड़कर किस प्रकार धनुषकी डोरी खींचनी चाहिये। तबसे वह निषादकुमार अपनी अँगुलीयोंद्वारा ही बाणोंका संधान करने लगा। राजन्! उस अवस्थामें वह उतनी शीघ्रतासे बाण नहीं चला पाता था, जैसे पहले चलाया करता था ।। ५९ ।। ततोऽर्जुनः प्रीतमना बभूव विगतज्वरः । द्रोणश्च सत्यवागासीन्नान्योऽभिभवितार्जुनम् ।। ६० ।।

इस घटनासे अर्जुनके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उनकी भारी चिन्ता दूर हो गयी। द्रोणाचार्यका भी वह कथन सत्य हो गया कि अर्जुनको दूसरा कोई पराजित नहीं कर सकता ॥ ६० ॥

द्रोणस्य तु तदा शिष्यौ गदायोग्यौ बभूवतुः ।
दुर्योधनश्च भीमश्च सदा संरब्धमानसौ ॥ ६१ ॥
उस समय द्रोणके दो शिष्य गदायुद्धमें सुयोग्य निकले—दुर्योधन और भीमसेन। ये दोनों सदा एक-दूसरेके प्रति मनमें क्रोध (स्पर्द्धा)-से भरे रहते थे ॥ ६१ ॥

अश्वत्थामा रहस्येषु सर्वेष्वभ्यधिकोऽभवत् ।
तथाति पुरुषानन्यान् त्सारुकौ यमजावुभौ ॥ ६२ ॥
अश्वत्थामा धनुर्वेदके रहस्योंकी जानकारीमें सबसे बढ़-चढ़कर हुआ। नकुल और सहदेव दोनों भाई तलवारकी मूठ पकड़कर युद्ध करनेमें अत्यन्त कुशल हुए। वे इस कलामें अन्य सब पुरुषोंसे बढ़-चढ़कर थे ॥ ६२ ॥

युधिष्ठिरो रथश्रेष्ठः सर्वत्र तु धनंजयः ।
प्रथितः सागरान्तायां रथयूथपयूथपः ॥ ६३ ॥
युधिष्ठिर रथपर बैठकर युद्ध करनेमें श्रेष्ठ थे। परंतु अर्जुन सब प्रकारकी युद्ध-कलाओंमें सबसे बढ़कर थे। वे समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीमें रथयूथपतियोंके भी यूथपतिके रूपमें प्रसिद्ध थे ॥ ६३ ॥

बुद्धियोगबलोत्साहैः सर्वास्त्रेषु च निष्ठितः ।
अस्त्रे गुर्वनुरागे च विशिष्टोऽभवदर्जुनः ॥ ६४ ॥
बुद्धि, मनकी एकाग्रता, बल और उत्साहके कारण वे सम्पूर्ण अस्त्र-विद्याओंमें प्रवीण हुए। अस्त्रोंके अभ्यास तथा गुरुके प्रति अनुरागमें भी अर्जुनका स्थान सबसे ऊँचा था ॥ ६४ ॥

तुल्येष्वस्त्रोपदेशेषु सौष्ठवेन च वीर्यवान् ।
एकः सर्वकुमाराणां बभूवातिरथोऽर्जुनः ॥ ६५ ॥
यद्यपि सबको समानरूपसे अस्त्र-विद्याका उपदेश प्राप्त होता था तो भी पराक्रमी अर्जुन अपनी विशिष्ट प्रतिभाके कारण अकेले ही समस्त कुमारोंमें अतिरथी हुए ॥ ६५ ॥

प्राणाधिकं भीमसेनं कृतविद्यं धनंजयम् ।
धार्तराष्ट्रा दुरात्मानो नामृष्यन्त परस्परम् ॥ ६६ ॥
धृतराष्ट्रके पुत्र बड़े दुरात्मा थे। वे भीमसेनको बलमें अधिक और अर्जुनको अस्त्रविद्यामें प्रवीण देखकर परस्पर सहन नहीं कर पाते थे ॥ ६६ ॥

तांस्तु सर्वान् समानीय सर्वविद्यास्त्रशिक्षितान् ।
द्रोणः प्रहरणज्ञाने जिज्ञासुः पुरुषर्षभः ॥ ६७ ॥

जब सम्पूर्ण धनुर्विद्या तथा अस्त्र-संचालनकी कलामें वे सभी कुमार सुशिक्षित हो गये, तब नरश्रेष्ठ द्रोणने उन सबको एकत्र करके उनके अस्त्रज्ञानकी परीक्षा लेनेका विचार किया ॥ ६७ ॥

कृत्रिमं भासमारोप्य वृक्षाग्रे शिल्पिभिः कृतम् ।
अविज्ञातं कुमाराणां लक्ष्यभूतमुपादिशत् ॥ ६८ ॥
उन्होंने कारीगरोंसे एक नकली गीध बनवाकर वृक्षके अग्रभागपर रखवा दिया। राजकुमारोंको इसका पता नहीं था। आचार्यने उसी गीधको बींधनेयोग्य लक्ष्य बताया ॥ ६८ ॥

द्रोण उवाच

शीघ्रं भवन्तः सर्वेऽपि धनूंष्यादाय सर्वशः ।
भासमेतं समुद्दिश्य तिष्ठध्वं संहितेषवः ॥ ६९ ॥
द्रोण बोले— तुम सब लोग इस गीधको बींधनेके लिये शीघ्र ही धनुष लेकर उसपर बाण चढ़ाकर खड़े हो जाओ ॥ ६९ ॥

मद्वाक्यसमकालं तु शिरोऽस्य विनिपात्यताम् ।
एकैकशो नियोक्ष्यामि तथा कुरुत पुत्रकाः ॥ ७० ॥
फिर मेरी आज्ञा मिलनेके साथ ही इसका सिर काट गिराओ। पुत्रो! मैं एक-एकको बारी-बारीसे इस कार्यमें नियुक्त करूँगा; तुमलोग मेरे बताये अनुसार कार्य करो ॥ ७० ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो युधिष्ठिरं पूर्वमुवाचाङ्गिरसां वरः ।
संधत्स्व बाणं दुर्धर्ष मद्वाक्यान्ते विमुञ्च तम् ॥ ७१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर अंगिरागोत्रवाले ब्राह्मणोंमें सर्वश्रेष्ठ आचार्य द्रोणने सबसे पहले युधिष्ठिरसे कहा—'दुर्धर्ष वीर! तुम धनुषपर बाण चढ़ाओ और मेरी आज्ञा मिलते ही उसे छोड़ दो' ॥ ७१ ॥

ततो युधिष्ठिरः पूर्वं धनुर्गृह्य परंतपः ।
तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रचोदितः ॥ ७२ ॥
तब शत्रुओंको संताप देनेवाले युधिष्ठिर गुरुकी आज्ञासे प्रेरित हो सबसे पहले धनुष लेकर गीधको बींधनेके लिये लक्ष्य बनाकर खड़े हो गये ॥ ७२ ॥

ततो विततधन्वानं द्रोणस्तं कुरुनन्दनम् ।
स मुहूर्तादुवाचेदं वचनं भरतर्षभ ॥ ७३ ॥
भरतश्रेष्ठ! तब धनुष तानकर खड़े हुए कुरुनन्दन युधिष्ठिरसे दो घड़ी बाद आचार्य द्रोणने इस प्रकार कहा— ॥ ७३ ॥

पश्यैनं तं द्रुमाग्रस्थं भासं नरवरात्मज ।

पश्यामीत्येवमाचार्य प्रत्युवाच युधिष्ठिरः ॥ ७४ ॥
'राजकुमार! वृक्षकी शिखापर बैठे हुए इस गीधको देखो।' तब युधिष्ठिरने आचार्यको उत्तर दिया—'भगवन्! मैं देख रहा हूँ' ॥ ७४ ॥
स मुहूर्तादिव पुनर्द्रोणस्तं प्रत्यभाषत ।
मानो दो घड़ी और बिताकर द्रोणाचार्य फिर उनसे बोले ॥ ७४ १/२ ॥

द्रोण उवाच
अथ वृक्षमिमं मां वा भ्रातॄन् वापि प्रपश्यसि ॥ ७५ ॥
द्रोणने कहा—क्या तुम इस वृक्षको, मुझको अथवा अपने भाइयोंको भी देखते हो? ॥ ७५ ॥
तमुवाच स कौन्तेयः पश्याम्येनं वनस्पतिम् ।
भवन्तं च तथा भ्रातॄन् भासं चेति पुनः पुनः ॥ ७६ ॥
यह सुनकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर उनसे इस प्रकार बोले—'हाँ, मैं इस वृक्षको, आपको, अपने भाइयोंको तथा गीधको भी बारंबार देख रहा हूँ' ॥ ७६ ॥
तमुवाचापसर्पेति द्रोणोऽप्रीतमना इव ।
नैतच्छक्यं त्वया वेद्धुं लक्ष्यमित्येव कुत्सयन् ॥ ७७ ॥
उनका उत्तर सुनकर द्रोणाचार्य मन-ही-मन अप्रसन्न-से हो गये और उन्हें झिड़कते हुए बोले, 'हट जाओ यहाँसे, तुम इस लक्ष्यको नहीं बींध सकते' ॥ ७७ ॥
ततो दुर्योधनादींस्तान् धार्तराष्ट्रान् महायशाः ।
तेनैव क्रमयोगेन जिज्ञासुः पर्यपृच्छत ॥ ७८ ॥
तदनन्तर महायशस्वी आचार्यने उसी क्रमसे दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रपुत्रोंको भी उनकी परीक्षा लेनेके लिये बुलाया और उन सबसे उपर्युक्त बातें पूछीं ॥ ७८ ॥
अन्यांश्च शिष्यान् भीमादीन् राज्ञश्चैवान्यदेशजान् ।
तथा च सर्वे तत् सर्वं पश्याम इति कुत्सिताः ॥ ७९ ॥
उन्होंने भीम आदि अन्य शिष्यों तथा दूसरे देशके राजाओंसे भी, जो वहाँ शिक्षा पा रहे थे, वैसा ही प्रश्न किया। प्रश्नके उत्तरमें सभीने (युधिष्ठिरकी भाँति ही) कहा—'हम सब कुछ देख रहे हैं।' यह सुनकर आचार्यने उन सबको झिड़ककर हटा दिया ॥ ७९ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि
द्रोणशिष्यपरीक्षायामेकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें आचार्य द्रोणके द्वारा शिष्योंकी परीक्षासे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ८० श्लोक हैं।)

१३२-

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द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुनके द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोणका ग्राहसे छुटकारा और अर्जुनको ब्रह्मशिर नामक अस्त्रकी प्राप्ति

वैशम्पायन उवाच

ततो धनंजयं द्रोणः स्मयमानोऽभ्यभाषत ।
त्वयेदानीं प्रहर्तव्यमेतल्लक्ष्यं विलोक्यताम् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर द्रोणाचार्यने अर्जुनसे मुसकराते हुए कहा—'अब तुम्हें इस लक्ष्यका वेध करना है। इसे अच्छी तरह देख लो' ।। १ ।।

मद्वाक्यसमकालं ते मोक्तव्योऽत्र भवेच्छरः ।
वितत्य कार्मुकं पुत्र तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम् ।। २ ।।
‘मेरी आज्ञा मिलनेके साथ ही तुम्हें इसपर बाण छोड़ना होगा। बेटा! धनुष तानकर खड़े हो जाओ और दो घड़ी मेरे आदेशकी प्रतीक्षा करो' ।। २ ।।

एवमुक्तः सव्यसाची मण्डलीकृतकार्मुकः ।
तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रचोदितः ।। ३ ।।
उनके ऐसा कहनेपर अर्जुनने धनुषको इस प्रकार खींचा कि वह मण्डलाकार (गोल) प्रतीत होने लगा। फिर वे गुरुकी आज्ञासे प्रेरित हो गीधकी ओर लक्ष्य करके खड़े हो गये ।। ३ ।।

मुहूर्तादिव तं द्रोणस्तथैव समभाषत ।
पश्यस्येनं स्थितं भासं द्रुमं मामपि चार्जुन ॥ ४ ॥
मानो दो घड़ी बाद द्रोणाचार्यने उनसे भी उसी प्रकार प्रश्न किया—'अर्जुन! क्या तुम उस वृक्षपर बैठे हुए गीधको, वृक्षको और मुझे भी देखते हो?' ॥ ४ ॥

पश्याम्येकं भासमिति द्रोणं पार्थोऽभ्यभाषत ।
न तु वृक्षं भवन्तं वा पश्यामीति च भारत ॥ ५ ॥
जनमेजय! यह प्रश्न सुनकर अर्जुनने द्रोणाचार्यसे कहा—'मैं केवल गीधको देखता हूँ। वृक्षको अथवा आपको नहीं देखता' ॥ ५ ॥

ततः प्रीतमना द्रोणो मुहूर्तादिव तं पुनः ।
प्रत्यभाषत दुर्धर्षः पाण्डवानां महारथम् ॥ ६ ॥
इस उत्तरसे द्रोणका मन प्रसन्न हो गया। मानो दो घड़ी बाद दुर्धर्ष द्रोणाचार्यने पाण्डव-महारथी अर्जुनसे फिर पूछा— ॥ ६ ॥

भासं पश्यसि यद्येनं तथा ब्रूहि पुनर्वचः ।
शिरः पश्यामि भासस्य न गात्रमिति सोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥
'वत्स! यदि तुम इस गीधको देखते हो तो फिर बताओ, उसके अंग कैसे हैं?' अर्जुन बोले—'मैं गीधका मस्तकभर देख रहा हूँ, उसके सम्पूर्ण शरीरको नहीं' ॥ ७ ॥

अर्जुनेनैवमुक्तस्तु द्रोणो हृष्टतनूरुहः । मुञ्चस्वेत्यब्रवीत् पार्थं स मुमोचाविचारयन् ॥ ८ ॥ अर्जुनके यों कहनेपर द्रोणाचार्यके शरीरमें (हर्षातिरेकसे) रोमांच हो आया और वे अर्जुनसे बोले, 'चलाओ बाण'! अर्जुनने बिना सोचे-विचारे बाण छोड़ दिया ॥ ८ ॥

ततस्तस्य नगस्थस्य क्षुरेण निशितेन च । शिर उत्कृत्य तरसा पातयामास पाण्डवः ॥ ९ ॥ फिर तो पाण्डुनन्दन अर्जुनने अपने चलाये हुए तीखे क्षुर नामक बाणसे वृक्षपर बैठे हुए उस गीधका मस्तक वेगपूर्वक काट गिराया ॥ ९ ॥

तस्मिन् कर्मणि संसिद्धे पर्यष्वजत पाण्डवम् । मेने च द्रुपदं संख्ये सानुबन्धं पराजितम् ॥ १० ॥ इस कार्यमें सफलता प्राप्त होनेपर आचार्यने अर्जुनको हृदयसे लगा लिया और उन्हें यह विश्वास हो गया कि राजा द्रुपद युद्धमें अर्जुनद्वारा अपने भाई-बन्धुओंसहित अवश्य पराजित हो जायँगे ॥ १० ॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य सशिष्योऽङ्गिरसां वरः । जगाम गङ्गामभितो मज्जितुं भरतर्षभ ॥ ११ ॥ भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर किसी समय आंगिरसवंशियोंमें उत्तम आचार्य द्रोण अपने शिष्योंके साथ गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये ॥ ११ ॥

अवगाढमथो द्रोणं सलिले सलिलेचरः । ग्राहो जग्राह बलवाञ्जङ्घान्ते कालचोदितः ॥ १२ ॥ वहाँ जलमें गोता लगाते समय कालसे प्रेरित हो एक बलवान् जलजन्तु ग्राहने द्रोणाचार्यकी पिंडली पकड़ ली ॥ १२ ॥

स समर्थोऽपि मोक्षाय शिष्यान् सर्वानचोदयत् । ग्राहं हत्वा मोक्षयध्वं मामिति त्वरयन्निव ॥ १३ ॥ वे अपनेको छुड़ानेमें समर्थ होते हुए भी मानो हड़बड़ाये हुए अपने सभी शिष्योंसे बोले—'इस ग्राहको मारकर मुझे बचाओ' ॥ १३ ॥

तद्वाक्यसमकालं तु बीभत्सुर्निशितैः शरैः । अवार्यैः पञ्चभिर्ग्राहं मग्नमम्भस्यताडयत् ॥ १४ ॥ उनके इस आदेशके साथ ही बीभत्सु (अर्जुन)-ने पाँच अमोघ एवं तीखे बाणोंद्वारा पानीमें डूबे हुए उस ग्राहपर प्रहार किया ॥ १४ ॥

इतरे त्वथ सम्मूढास्तत्र तत्र प्रपेदिरे । तं तु दृष्ट्वा क्रियोपेतं द्रोणोऽमन्यत पाण्डवम् ॥ १५ ॥ विशिष्टं सर्वशिष्येभ्यः प्रीतिमांश्चाभवत् तदा । स पार्थबाणैर्बहुधा खण्डशः परिकल्पितः ॥ १६ ॥

ग्राहः पञ्चत्वमापेदे जङ्घां त्यक्त्वा महात्मनः ।
अथाब्रवीन्महात्मानं भारद्वाजो महारथम् ।। १७ ।।
परंतु दूसरे राजकुमार हक्के-बक्के-से होकर अपने-अपने स्थानपर ही खड़े रह गये। अर्जुनको तत्काल कार्यमें तत्पर देख द्रोणाचार्यने उन्हें अपने सब शिष्योंसे बढ़कर माना और उस समय वे उनपर बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुनके बाणोंसे ग्राहके टुकड़े-टुकड़े हो गये और वह महात्मा द्रोणकी पिंडली छोड़कर मर गया। तब द्रोणाचार्यने महारथी महात्मा अर्जुनसे कहा— ।। १५—१७ ।।
गृहाणेदं महाबाहो विशिष्टमतिदुर्धरम् ।
अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम सप्रयोगनिवर्तनम् ।। १८ ।।
‘महाबाहो! यह ब्रह्मशिर नामक अस्त्र मैं तुम्हें प्रयोग और उपसंहारके साथ बता रहा हूँ। यह सब अस्त्रोंसे बढ़कर है तथा इसे धारण करना भी अत्यन्त कठिन है। तुम इसे ग्रहण करो’ ।। १८ ।।
न च ते मानुषेष्वेतत् प्रयोक्तव्यं कथंचन ।
जगद् विनिर्दहेदेतदल्पतेजसि पातितम् ।। १९ ।।
‘मनुष्योंपर तुम्हें इस अस्त्रका प्रयोग किसी भी दशामें नहीं करना चाहिये। यदि किसी अल्प तेजवाले पुरुषपर इसे चलाया गया तो यह उसके साथ ही समस्त संसारको भस्म कर सकता है ।। १९ ।।
असामान्यमिदं तात लोकेष्वस्त्रं निगद्यते ।
तद् धारयेथाः प्रयतः शृणु चेदं वचो मम ।। २० ।।
‘तात! यह अस्त्र तीनों लोकोंमें असाधारण बताया गया है। तुम मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर इस अस्त्रको धारण करो और मेरी यह बात सुनो ।। २० ।।
बाधेतामानुषः शत्रुर्यदि त्वां वीर कश्चन ।
तद्वधाय प्रयुञ्जीथास्तदस्त्रमिदमाहवे ।। २१ ।।
‘वीर! यदि कोई अमानव शत्रु तुम्हें युद्धमें पीड़ा देने लगे तो तुम उसका वध करनेके लिये इस अस्त्रका प्रयोग कर सकते हो’ ।। २१ ।।
तथेति सम्प्रतिश्रुत्य बीभत्सुः स कृताञ्जलिः ।
जग्राह परमास्त्रं तदाह चैनं पुनर्गुरुः ।
भविता त्वत्समो नान्यः पुमाँल्लोके धनुर्धरः ।। २२ ।।
तब अर्जुनने ‘तथास्तु’ कहकर वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की और हाथ जोड़कर उस उत्तम अस्त्रको ग्रहण किया। उस समय गुरु द्रोणने अर्जुनसे पुनः यह बात कही—‘संसारमें दूसरा कोई पुरुष तुम्हारे समान धनुर्धर न होगा’ ।। २२ ।।