महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
स्वागतं ते महाबाहो दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मानद ।
अहं च कुरुराज्यं च यथेष्टमुपभुज्यताम् ॥ १४ ॥
दुर्योधन बोला— महाबाहो! तुम्हारा स्वागत है। मानद! तुम यहाँ पधारे, यह हमारे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है। मैं तथा कौरवोंका यह राज्य सब तुम्हारे हैं। तुम इनका यथेष्ट उपभोग करो ॥ १४ ॥
कृतं सर्वमहं मन्ये सखित्वं च त्वया वृणे ।
द्वन्द्वयुद्धं च पार्थेन कर्तुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ १५ ॥
कर्णने कहा— प्रभो! आपने जो कुछ कहा है, वह सब पूरा कर दिया, ऐसा मेरा विश्वास है। मैं आपके साथ मित्रता चाहता हूँ और अर्जुनके साथ मेरी द्वन्द्व-युद्ध करनेकी इच्छा है ॥ १५ ॥
भुङ्क्ष्व भोगान् मया सार्धं बन्धूनां प्रियकृद् भव ।
दुर्हृदां कुरु सर्वेषां मूर्ध्नि पादमरिंदम ॥ १६ ॥
दुर्योधन बोला— शत्रुदमन! तुम मेरे साथ उत्तम भोग भोगो। अपने भाई-बन्धुओंका प्रिय करो और समस्त शत्रुओंके मस्तकपर पैर रखो ॥ १६ ॥
ततः क्षिप्तमिवात्मानं मत्वा पार्थोऽभ्यभाषत ।
कर्ण भ्रातृसमूहस्य मध्येऽचलमिव स्थितम् ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! उस समय अर्जुनने अपने-आपको कर्णद्वारा तिरस्कृत-सा मानकर दुर्योधन आदि सौ भाइयोंके बीचमें अविचल-से खड़े हुए कर्णको सम्बोधित करके कहा ॥ १७ ॥
अनाहूतोपसृष्टाना मनाहूतोपजल्पिनाम् ।
ये लोकास्तान् हतः कर्ण मया त्वं प्रतिपत्स्यसे ॥ १८ ॥
अर्जुन बोले— कर्ण! बिना बुलाये आनेवालों और बिना बुलाये बोलनेवालोंको जो (निन्दनीय) लोक प्राप्त होते हैं, मेरे द्वारा मारे जानेपर तुम उन्हीं लोकोंमें जाओगे ॥ १८ ॥
रङ्गोऽयं सर्वसामान्यः किमत्र तव फाल्गुन ।
वीर्यश्रेष्ठाश्च राजानो बलं धर्मोऽनुवर्तते ॥ १९ ॥
**कर्णने कहा—**अर्जुन! यह रंगमण्डप तो सबके लिये साधारण है, इसमें तुम्हारा क्या लगा है? जो बल और पराक्रममें श्रेष्ठ होते हैं, वे ही राजा कहलानेयोग्य हैं। धर्म भी बलका ही अनुसरण करता है ॥ १९ ॥ किं क्षेपैर्दुर्बलायासैः शरैः कथय भारत । गुरोः समक्षं यावत् ते हराम्यद्य शिरः शरैः ॥ २० ॥ भारत! आक्षेप करना तो दुर्बलोंका प्रयास है। इससे क्या लाभ है? साहस हो तो बाणोंसे बातचीत करो। मैं आज तुम्हारे गुरुके सामने ही बाणोंद्वारा तुम्हारा सिर धड़से अलग किये देता हूँ ॥ २० ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः पार्थः परपुरंजयः । भ्रातृभिस्त्वरयाऽऽश्लिष्टो रणायोपजगाम तम् ॥ २१ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर शत्रुओंके नगरको जीतनेवाले कुन्तीनन्दन अर्जुन आचार्य द्रोणकी आज्ञा ले तुरंत अपने भाइयोंसे गले मिलकर युद्धके लिये कर्णकी ओर बढ़े ॥ २१ ॥ ततो दुर्योधनेनापि सभ्रात्रा समरोद्यतः । परिष्वक्तः स्थितः कर्णः प्रगृह्य सशरं धनुः ॥ २२ ॥ तब भाइयोंसहित दुर्योधनने भी धनुष-बाण ले युद्धके लिये तैयार खड़े हुए कर्णका आलिंगन किया ॥ २२ ॥ ततः सविद्युत्स्तनितैः सेन्द्रायुधपुरोगमैः । आवृतं गगनं मेघैर्बलाकापङ्क्तिहासिभिः ॥ २३ ॥ उस समय बकपंक्तियोंके व्याजसे हास्यकी छटा बिखेरनेवाले बादलोंने बिजलीकी चमक, गड़गड़ाहट और इन्द्रधनुषके साथ समूचे आकाशको ढक लिया ॥ २३ ॥ ततः स्नेहाद्धरिर्हयं दृष्ट्वा रङ्गावलोकिनम् । भास्करोऽप्यनयन्नाशं समीपोपगतान् घनान् ॥ २४ ॥ तत्पश्चात् अर्जुनके प्रति स्नेह होनेके कारण इन्द्रको रंगभूमिका अवलोकन करते देख भगवान् सूर्यने भी अपने समीपके बादलोंको छिन्न-भिन्न कर दिया ॥ २४ ॥ मेघच्छायोपगूढस्तु ततोऽदृश्यत फाल्गुनः । सूर्यातपपरिक्षिप्तः कर्णोऽपि समदृश्यत ॥ २५ ॥ तब अर्जुन मेघकी छायामें छिपे हुए दिखायी देने लगे और कर्ण भी सूर्यकी प्रभासे प्रकाशित दीखने लगा ॥ २५ ॥ धार्तराष्ट्रा यतः कर्णस्तस्मिन् देशे व्यवस्थिताः । भारद्वाजः कृपो भीष्मो यतः पार्थस्ततोऽभवन् ॥ २६ ॥
धृतराष्ट्रके पुत्र जिस ओर कर्ण था, उसी ओर खड़े हुए तथा द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और भीष्म जिधर अर्जुन थे, उस ओर खड़े थे ।। २६ ।।
द्विधा रंगः समभवत् स्त्रीणां द्वैधमजायत ।
कुन्तिभोजसुता मोहं विज्ञातार्था जगाम ह ॥ २७ ॥
रंगभूमिके पुरुषों और स्त्रियोंमें भी कर्ण और अर्जुनको लेकर दो दल हो गये। कुन्तिभोजकुमारी कुन्तीदेवी वास्तविक रहस्यको जानती थीं (कि ये दोनों मेरे ही पुत्र हैं), अतः चिन्ताके कारण उन्हें मूर्च्छा आ गयी ।। २७ ।।
तां तथा मोहमापन्नां विदुरः सर्वधर्मवित् ।
कुन्तीमाश्वासयामास प्रेष्याभिश्चन्दनोदकैः ॥ २८ ॥
उन्हें इस प्रकार मूर्च्छामें पड़ी हुई देख सब धर्मोंके ज्ञाता विदुरजीने दासियोंद्वारा चन्दनमिश्रित जल छिड़कवाकर होशमें लानेकी चेष्टा की ।। २८ ।।
ततः प्रत्यागतप्राणा तावुभौ परिदंशितौ ।
पुत्रौ दृष्ट्वा सुसम्भ्रान्ता नान्कपद्यत किंचन ॥ २९ ॥
इससे कुन्तीको होश तो आ गया; किंतु अपने दोनों पुत्रोंको युद्धके लिये कवच धारण किये देख वे बहुत घबरा गयीं। उन्हें रोकनेका कोई उपाय उनके ध्यानमें नहीं आया ।। २९ ।।
तावुद्यतमहाचापौ कृपः शारद्वतोऽब्रवीत् ।
द्वन्द्वयुद्धसमाचारे कुशलः सर्वधर्मवित् ॥ ३० ॥
उन दोनोंको विशाल धनुष उठाये देख द्वन्द्व-युद्धकी नीति-रीतिमें कुशल और समस्त धर्मोंके ज्ञाता शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने इस प्रकार कहा— ।। ३० ।।
अयं पृथायास्तनयः कनीयान् पाण्डुनन्दनः ।
कौरवो भवता सार्धं द्वन्द्वयुद्धं करिष्यति ॥ ३१ ॥
त्वमप्येवं महाबाहो मातरं पितरं कुलम् ।
कथयस्व नरेन्द्राणां येषां त्वं कुलभूषणम् ॥ ३२ ॥
'कर्ण! ये कुन्तीदेवीके सबसे छोटे पुत्र पाण्डु-नन्दन अर्जुन कुरुवंशके रत्न हैं, जो तुम्हारे साथ इन्द्र-युद्ध करेंगे। महाबाहो! इसी प्रकार तुम भी अपने माता-पिता तथा कुलका परिचय दो और उन नरेशके नाम बताओ, जिनका वंश तुमसे विभूषित हुआ है ।। ३१-३२ ।।
ततो विदित्वा पार्थस्त्वां प्रतियोत्स्यति वा न वा ।
वृथाकुलसमाचारैर्न युध्यन्ते नृपात्मजाः ॥ ३३ ॥
'इसे जान लेनेके बाद यह निश्चय होगा कि अर्जुन तुम्हारे साथ युद्ध करेंगे या नहीं; क्योंकि राजकुमार नीच कुल और हीन आचार-विचारवाले लोगोंके साथ युद्ध नहीं करते' ॥ ३३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्य कर्णस्य व्रीडावनतमाननम् ।
बभौ वर्षाम्बुविक्क्लिन्नं पद्ममागलितं यथा ॥ ३४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कृपाचार्यके यों कहनेपर कर्णका मुख लज्जासे नीचेको झुक गया। जैसे वर्षाके पानीसे भींगकर कमल मुरझा जाता है, उसी प्रकार कर्णका मुँह म्लान हो गया ॥ ३४ ॥
दुर्योधन उवाच
आचार्य त्रिविधा योनी राज्ञां शास्त्रविनिश्चये ।
सत्कुलीनश्च शूरश्च यश्च सेनां प्रकर्षति ॥ ३५ ॥
**तब दुर्योधनने कहा—**आचार्य! शास्त्रीय सिद्धान्तके अनुसार राजाओंकी तीन योनियाँ हैं—उत्तम कुलमें उत्पन्न पुरुष, शूरवीर तथा सेनापति (अतः शूरवीर होनेके कारण कर्ण भी राजा ही हैं) ॥ ३५ ॥
यद्ययं फाल्गुनो युद्धे नाराज्ञा योद्धुमिच्छति ।
तस्मादेषोऽङ्गविषये मया राज्येऽभिषिच्यते ॥ ३६ ॥
यदि ये अर्जुन राजासे भिन्न पुरुषके साथ रणभूमिमें लड़ना नहीं चाहते तो मैं कर्णको इसी समय अंगदेशके राज्यपर अभिषिक्त करता हूँ ॥ ३६ ॥
वैशम्पायन उवाच
(ततो राजानमामन्त्र्य गाङ्गेयं च पितामहम् ।
अभिषेकस्य सम्भारान् समानीय द्विजातिभिः ॥)
ततस्तस्मिन् क्षणे कर्णः सलाजकुसुमैर्घटैः ।
काञ्चनैः काञ्चने पीठे मन्त्रविद्भिर्महारथः ॥ ३७ ॥
अभिषिक्तोऽङ्गराज्ये स श्रिया युक्तो महाबलः ।
(समौलिहारकेयूरैः सहस्ताभरणाङ्गदैः ।
राजलिङ्गैस्तथान्यैश्च भूषितो भूषणैः शुभैः ॥)
सच्छत्रवालव्यजनो जयशब्दोत्तरेण च ॥ ३८ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर दुर्योधनने राजा धृतराष्ट्र और गंगानन्दन भीष्मकी आज्ञा ले ब्राह्मणोंद्वारा अभिषेकका सामान मँगवाया। फिर उसी समय महाबली एवं महारथी कर्णको सोनेके सिंहासनपर बिठाकर मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंने लावा और फूलोंसे युक्त सुवर्णमय कलशोंके जलसे अंगदेशके राज्यपर अभिषिक्त किया। तब मुकुट, हार, केयूर, कंगन, अंगद, राजोचित चिह्न तथा अन्य शुभ आभूषणोंसे विभूषित हो वह छत्र, चँवर तथा जय-जयकारके साथ राज्यश्रीसे सुशोभित होने लगा ॥ ३७-३८ ॥
(सभाज्यमानो विप्रैश्च प्रदत्त्वा ह्यमितं वसु ।)
उवाच कौरवं राजन् वचनं स वृषस्तदा ।
अस्य राज्यप्रदानस्य सदृशं किं ददानि ते ॥ ३९ ॥
प्रब्रूहि राजशार्दूल कर्ता ह्यस्मि तथा नृप ।
अत्यन्तं सख्यमिच्छामीत्याह तं स सुयोधनः ॥ ४० ॥
फिर ब्राह्मणोंसे समादृत हो राजा कर्णने उन्हें असीम धन प्रदान किया। राजन्! उस समय उसने कुरुश्रेष्ठ दुर्योधनसे कहा—'नृपतिशिरोमणे! आपने मुझे जो यह राज्य प्रदान किया है, इसके अनुरूप मैं आपको क्या भेंट दूँ? बताइये, आप जैसा कहेंगे वैसा ही करूँगा।' यह सुनकर दुर्योधनने कहा—'अंगराज! मैं तुम्हारे साथ ऐसी मित्रता चाहता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो' ॥ ३९-४० ॥
एवमुक्तस्ततः कर्णस्तथेति प्रत्युवाच तम् ।
हर्षाच्चोभौ समाश्लिष्य परां मुदमवापतुः ॥ ४१ ॥
उसके यों कहनेपर कर्णने 'तथास्तु' कहकर उसके साथ मैत्री कर ली। फिर वे दोनों बड़े हर्षसे एक-दूसरेको हृदयसे लगाकर आनन्दमग्न हो गये ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कर्णाभिषेके
पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें कर्णके राज्याभिषेकसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३५ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४३ १/३ श्लोक हैं)
१३६-
षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
भीमसेनके द्वारा कर्णका तिरस्कार और दुर्योधनद्वारा उसका सम्मान
वैशम्पायन उवाच
ततः स्रस्तोत्तरपटः सप्रस्वेदः सवेपथुः । विवेशाधिरथो रङ्गं यष्टिप्राणो ह्ययन्निव ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर लाठी ही जिसका सहारा था, वह अधिरथ कर्णको पुकारता हुआ-सा काँपता-काँपता रंगभूमिमें आया। उसकी चादर खिसककर गिर पड़ी थी और वह पसीनेसे लथपथ हो रहा था ॥ १ ॥
तमालोक्य धनुस्त्यक्त्वा पितृगौरवयन्त्रितः । कर्णोऽभिषेकार्द्रशिराः शिरसा समवन्दत ॥ २ ॥ पिताके गौरवसे बँधा हुआ कर्ण अधिरथको देखते ही धनुष त्यागकर सिंहासनसे नीचे उतर आया। उसका मस्तक अभिषेकके जलसे भीगा हुआ था। उसी दशामें उसने अधिरथके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया ॥ २ ॥
ततः पादाववच्छाद्य पटान्तेन ससम्भ्रमः । पुत्रेति परिपूर्णार्थमब्रवीद् रथसारथिः ॥ ३ ॥ अधिरथने अपने दोनों पैरोंको कपड़ेके छोरसे छिपा लिया और ‘बेटा! बेटा!’ पुकारते हुए अपनेको कृतार्थ समझा ॥ ३ ॥
परिष्वज्य च तस्याथ मूर्धानं स्नेहविक्लवः । अंगराज्याभिषेकार्द्रमश्रुभिः सिषिचे पुनः ॥ ४ ॥ उसने स्नेहसे विह्वल होकर कर्णको हृदयसे लगा लिया और अंगदेशके राज्यपर अभिषेक होनेसे भीगे हुए उसके मस्तकको आँसुओंसे पुनः अभिषिक्त कर दिया ॥ ४ ॥
तं दृष्ट्वा सूतपुत्रोऽयमिति संचिन्त्य पाण्डवः । भीमसेनस्तदा वाक्यमब्रवीत् प्रहसन्निव ॥ ५ ॥ अधिरथको देखकर पाण्डुकुमार भीमसेन यह समझ गये कि कर्ण सूतपुत्र है; फिर तो वे हँसते हुए-से बोले— ॥ ५ ॥
न त्वमर्हसि पार्थेन सूतपुत्र रणे वधम् । कुलस्य सदृशस्तूर्णं प्रतोदो गृह्यतां त्वया ॥ ६ ॥ ‘अरे ओ सूतपुत्र! तू तो अर्जुनके हाथसे मरने-योग्य भी नहीं है। तुझे तो शीघ्र ही चाबुक हाथमें लेना चाहिये; क्योंकि यही तेरे कुलके अनुरूप है ॥ ६ ॥
अङ्गराज्यं च नार्हस्त्वमुपभोक्तुं नराधम । श्वा हुताशसमीपस्थं पुरोडाशमिवाध्वरे ॥ ७ ॥ 'नराधम! जैसे यज्ञमें अग्निके समीप रखे हुए पुरोडाशको कुत्ता नहीं पा सकता, उसी प्रकार तू भी अंगदेशका राज्य भोगनेयोग्य नहीं है' ॥ ७ ॥
एवमुक्तस्ततः कर्णः किंचित्प्रस्फुरिताधरः । गगनस्थं विनिःश्वस्य दिवाकरमुदैक्षत ॥ ८ ॥ भीमसेनके यों कहनेपर क्रोधके मारे कर्णका होठ कुछ काँपने लगा और उसने लंबी साँस लेकर आकाशमण्डलमें स्थित भगवान् सूर्यकी ओर देखा ॥ ८ ॥
ततो दुर्योधनः कोपादुत्पपात महाबलः । भ्रातृपद्मवनात् तस्मान्मदोत्कट इव द्विपः ॥ ९ ॥ इसी समय महाबली दुर्योधन कुपित हो मदोन्मत्त गजराजकी भाँति भ्रातृसमूहरूपी कमलवनसे उछलकर बाहर निकल आया ॥ ९ ॥
सोऽब्रवीद् भीमकर्माणं भीमसेनमवस्थितम् । वृकोदर न युक्तं ते वचनं वक्तुमीदृशम् ॥ १० ॥ उसने वहाँ खड़े हुए भयंकर कर्म करनेवाले भीमसेनसे कहा—'वृकोदर! तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये' ॥ १० ॥
क्षत्रियाणां बलं ज्येष्ठं योद्धव्यं क्षत्रबन्धुना । शूराणां च नदीनां च दुर्विदाः प्रभवाः किल ॥ ११ ॥ 'क्षत्रियोंमें बलकी ही प्रधानता है। बलवान् होनेपर क्षत्रबन्धु (हीन क्षत्रिय)-से भी युद्ध करना चाहिये (अथवा मुझ क्षत्रियका मित्र होनेके कारण कर्णके साथ तुम्हें युद्ध करना चाहिये)। शूरवीरों और नदियोंकी उत्पत्तिके वास्तविक कारणको जान लेना बहुत कठिन है ॥ ११ ॥
सलिलादुत्थितो वह्निर्यैन व्याप्तं चराचरम् । दधीचस्यास्थितो वज्रं कृतं दानवसूदनम् ॥ १२ ॥ 'जिसने सम्पूर्ण चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है, वह तेजस्वी अग्नि जलसे प्रकट हुआ है। दानवोंका संहार करनेवाला वज्र महर्षि दधीचिकी हड्डियोंसे निर्मित हुआ है ॥ १२ ॥
आग्नेयः कृत्तिकापुत्रो रौद्रो गाङ्गेय इत्यपि । श्रूयते भगवान् देवः सर्वगुह्यमयो गुहः ॥ १३ ॥ 'सुना जाता है, सर्वगुह्यस्वरूप भगवान् स्कन्ददेव अग्नि, कृत्तिका, रुद्र तथा गंगा—इन सबके पुत्र हैं ॥ १३ ॥
क्षत्रियेभ्यश्च ये जाता ब्राह्मणास्ते च ते श्रुताः । विश्वामित्रप्रभृतयः प्राप्ता ब्रह्मत्वमव्ययम् ॥ १४ ॥
‘कितने ही ब्राह्मण क्षत्रियोंसे उत्पन्न हुए हैं, उनका नाम तुमने भी सुना ही होगा तथा विश्वामित्र आदि क्षत्रिय भी अक्षय ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो चुके हैं॥ १४॥
आचार्यः कलशाज्जातो द्रोणः शस्त्रभृतां वरः।
गौतमस्यान्ववाये च शरस्तम्बाच्च गौतमः॥ १५॥
‘समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हमारे आचार्य द्रोणका जन्म कलशसे हुआ है। महर्षि गौतमके कुलमें कृपाचार्यकी उत्पत्ति भी सरकंडोंके समूहसे हुई है॥ १५॥
भवतां च यथा जन्म तदप्यागमितं मया।
सकुण्डलं सकवचं सर्वलक्षणलक्षितम्।
कथमादित्यसदृशं मृगी व्याघ्रं जनिष्यति॥ १६॥
‘तुम सब भाइयोंका जन्म जिस प्रकार हुआ है, वह भी मुझे अच्छी तरह मालूम है। समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित तथा कुण्डल और कवचके साथ उत्पन्न हुआ सूर्यके समान तेजस्वी कर्ण किसी सूत जातिकी स्त्रीका पुत्र कैसे हो सकता है। क्या कोई हरिणी अपने पेटसे बाघ पैदा कर सकती है?॥ १६॥
(कथमादित्यसंकाशं सूतोऽमुं जनयिष्यति।
एवं क्षत्रगुणैर्युक्तं शूरं समितिशोभनम्॥)
पृथिवीराज्यमर्होऽयं नाङ्गराज्यं नरेश्वरः।
अनेन बाहुवीर्येण मया चाज्ञानुवर्तिना॥ १७॥
‘इस सूर्य-सदृश तेजस्वी वीरको, जो इस प्रकार क्षत्रियोचित गुणोंसे सम्पन्न तथा समरांगणको सुशोभित करनेवाला है, कोई सूत जातिका मनुष्य कैसे उत्पन्न कर सकता है? राजा कर्ण अपने इस बाहुबलसे तथा मुझ-जैसे आज्ञापालक मित्रकी सहायतासे अंग-देशका ही नहीं, समूची पृथ्वीका राज्य पानेका अधिकारी है॥ १७॥
यस्य वा मनुजस्येदं न क्षान्तं मद्विचेष्टितम्।
रथमारुह्य पद्भ्यां स विनामयतु कार्मुकम्॥ १८॥
‘जिस मनुष्यसे मेरा यह बर्ताव नहीं सहा जाता हो, वह रथपर चढ़कर पैरोंसे अपने धनुषको नवावे—हमारे साथ युद्धके लिये तैयार हो जाय’॥ १८॥
ततः सर्वस्य रङ्गस्य हाहाकारो महानभूत्।
साधुवादानुसम्बद्धः सूर्यश्चास्तमुपागमत्॥ १९॥
यह सुनकर समूचे रंगमण्डपमें दुर्योधनको मिलने-वाले साधुवादके साथ ही (युद्धकी सम्भावनासे) महान् हाहाकार मच गया। इतनेमें ही सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये॥ १९॥
ततो दुर्योधनः कर्णमालम्ब्याग्रकरे नृपः।
दीपिकाग्निकृतालोकस्तस्माद् रङ्गाद् विनिर्ययौ॥ २०॥
तब दुर्योधन कर्णके हाथकी अँगुलियाँ पकड़कर मशालकी रोशनी करा उस रंगभूमिसे बाहर निकल गया॥ २०॥
पाण्डवाश्च सहद्रोणाः सकृपाश्च विशाम्पते ।
भीष्मेण सहिताः सर्वे ययुः स्वं स्वं निवेशनम् ॥ २१ ॥
राजन्! समस्त पाण्डव भी द्रोण, कृपाचार्य और भीष्मजीके साथ अपने-अपने निवासस्थानको चल दिये ॥ २१ ॥
अर्जुनेति जनः कश्चित् कश्चित् कर्णेति भारत ।
कश्चिद् दुर्योधनेत्येवं ब्रुवन्तः प्रस्थितास्तदा ॥ २२ ॥
भारत! उस समय दर्शकोंमेंसे कोई अर्जुनकी, कोई कर्णकी और कोई दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए चले गये ॥ २२ ॥
कुन्त्याश्च प्रत्यभिज्ञाय दिव्यलक्षणसूचितम् ।
पुत्रमङ्गेश्वरं स्नेहाच्छन्ना प्रीतिरजायत ॥ २३ ॥
दिव्य लक्षणोंसे लक्षित अपने पुत्र अंगराज कर्णको पहचानकर कुन्तीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; किंतु वह दूसरोंपर प्रकट न हुई ॥ २३ ॥
दुर्योधनस्यापि तदा कर्णमासाद्य पार्थिव ।
भयमर्जुनसंजातं क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ २४ ॥
जनमेजय! उस समय कर्णको मित्रके रूपमें पाकर दुर्योधनका भी अर्जुनसे होनेवाला भय शीघ्र दूर हो गया ॥ २४ ॥
स चापि वीरः कृतशस्त्रनिश्रमः
परेण साम्नाभ्यवदत् सुयोधनम् ।
युधिष्ठिरस्याप्यभवत् तदा मति-
र्न कर्णतुल्योऽस्ति धनुर्धरः क्षितौ ॥ २५ ॥
वीरवर कर्णने शस्त्रोंके अभ्यासमें बड़ा परिश्रम किया था, वह भी दुर्योधनके साथ परम स्नेह और सान्त्वनापूर्ण बातें करने लगा। उस समय युधिष्ठिरको भी यह विश्वास हो गया कि इस पृथ्वीपर कर्णके समान धनुर्धर कोई नहीं है ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अस्त्रदर्शने
षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अस्त्र-कौशलदर्शनविषयक एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं)
१३७-
सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
द्रोणका शिष्योंद्वारा द्रुपदपर आक्रमण करवाना, अर्जुनका द्रुपदको बंदी बनाकर लाना और द्रोणद्वारा द्रुपदको आधा राज्य देकर मुक्त कर देना
वैशम्पायन उवाच
पाण्डवान् धार्तराष्ट्रांश्च कृतास्त्रान् प्रसमीक्ष्य सः ।
गुर्वर्थं दक्षिणाकाले प्राप्तेऽमन्यत वै गुरुः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रके पुत्रोंको अस्त्र-विद्यामें निपुण देख द्रोणाचार्यने गुरु-दक्षिणा लेनेका समय आया जान मन-ही-मन कुछ निश्चय किया ॥ १ ॥
ततः शिष्यान् समानीय आचार्योऽर्थमचोदयत् ।
द्रोणः सर्वानशेषेण दक्षिणार्थं महीपते ॥ २ ॥
जनमेजय! तदनन्तर आचार्यने अपने शिष्योंको बुलाकर उन सबसे गुरुदक्षिणाके लिये इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
पञ्चालराजं द्रुपदं गृहीत्वा रणमूर्धनि ।
पर्यानयत भद्रं वः सा स्यात् परमदक्षिणा ॥ ३ ॥
‘शिष्यो! पांचालराज द्रुपदको युद्धमें कैद करके मेरे पास ले आओ। तुम्हारा कल्याण हो। यही मेरे लिये सर्वोत्तम गुरुदक्षिणा होगी’ ॥ ३ ॥
तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे रथैस्तूर्ण प्रहारिणः ।
आचार्यधनदानार्थं द्रोणेन सहिता ययुः ॥ ४ ॥
तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर शीघ्रतापूर्वक प्रहार करनेवाले वे सब राजकुमार (युद्धके लिये उद्यत हो) रथोंमें बैठकर गुरुदक्षिणा चुकानेके लिये आचार्य द्रोणके साथ ही वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ ४ ॥
ततोऽभिजग्मुः पञ्चालान् निघ्नन्तस्ते नरर्षभाः ।
ममृदुस्तस्य नगरं द्रुपदस्य महौजसः ॥ ५ ॥
दुर्योधनश्च कर्णश्च युयुत्सुश्च महाबलः ।
दुःशासनो विकर्णश्च जलसंधः सुलोचनः ॥ ६ ॥
एते चान्ये च बहवः कुमारा बहुविक्रमाः ।
अहं पूर्वमहं पूर्वमित्येवं क्षत्रियर्षभाः ॥ ७ ॥
तदनन्तर दुर्योधन, कर्ण, महाबली युयुत्सु, दुःशासन, विकर्ण, जलसंध तथा सुलोचन—ये और दूसरे भी बहुत-से महापराक्रमी नरश्रेष्ठ क्षत्रियशिरोमणि राजकुमार 'पहले मैं युद्ध करूँगा, पहले मैं युद्ध करूँगा' इस प्रकार कहते हुए पांचालदेशमें जा पहुँचे और वहाँके निवासियोंको मारते-पीटते हुए महाबली राजा द्रुपदकी राजधानीको भी रौंदने लगे ॥ ५—७ ॥
ततो वररथारूढाः कुमाराः सादिभिः सह ।
प्रविश्य नगरं सर्वे राजमार्गमुपाययुः ॥ ८ ॥
उत्तम रथोंपर बैठे हुए वे सभी राजकुमार घुड़सवारोंके साथ नगरमें घुसकर वहाँके राजपथपर चलने लगे ॥ ८ ॥
तस्मिन् काले तु पाञ्चालः श्रुत्वा दृष्ट्वा महद् बलम् ।
भ्रातृभिः सहितो राजंस्त्वरया निर्ययौ गृहात् ॥ ९ ॥
जनमेजय! उस समय पांचालराज द्रुपद कौरवोंका आक्रमण सुनकर और उनकी विशाल सेनाको अपनी आँखों देखकर बड़ी उतावलीके साथ भाइयोंसहित राजभवनसे बाहर निकले ॥ ९ ॥
ततस्तु कृतसंनाहा यज्ञसेनसहोदराः ।
शरवर्षाणि मुञ्चन्तः प्रणेदुः सर्व एव ते ॥ १० ॥
महाराज यज्ञसेन (द्रुपद) और उनके सब भाइयोंंने कवच धारण किये। फिर वे सभी लोग बाणोंकी बौछार करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ १० ॥
ततो रथेन शुभ्रेण समासाद्य तु कौरवान् ।
यज्ञसेनः शरान् घोरान् ववर्ष युधि दुर्जयः ॥ ११ ॥
राजा द्रुपदको युद्धमें जीतना बहुत कठिन था। वे चमकीले रथपर सवार हो कौरवोंके सामने जा पहुँचे और भयानक बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ११ ॥
वैशम्पायन उवाच
पूर्वमेव तु सम्मन्त्र्य पार्थो द्रोणमथाब्रवीत् ।
दर्पोद्रेकात् कुमाराणामाचार्यं द्विजसत्तमम् ॥ १२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कौरवों तथा अन्य राजकुमारोंको अपने बल और पराक्रमका बड़ा घमंड था; इसलिये अर्जुनने पहले ही अच्छी तरह सलाह करके विप्रवर द्रोणाचार्यसे कहा— ॥ १२ ॥
एषां पराक्रमस्यान्ते वयं कुर्याम साहसम् ।
एतैरशक्यः पाञ्चालो ग्रहीतुं रणमूर्धनि ॥ १३ ॥
'गुरुदेव! इनके पराक्रम दिखानेके पश्चात् हमलोग युद्ध करेंगे। हमारा विश्वास है, ये लोग युद्धमें पांचालराजको बंदी नहीं बना सकते' ॥ १३ ॥
एवमुक्त्वा तु कौन्तेयो भ्रातृभिः सहितोऽनघः ।
अर्धक्रोशे तु नगरादतिष्ठद् बहिरैव सः ॥ १४ ॥
यों कहकर पापरहित कुन्तीनन्दन अर्जुन अपने भाइयोंके साथ नगरसे बाहर ही आधे कोसकी दूरीपर ठहर गये थे ॥ १४ ॥
द्रुपदः कौरवान् दृष्ट्वा प्राधावत समन्ततः ।
शरजालेन महता मोहयन् कौरवीं चमूम् ॥ १५ ॥
तमुद्यतं रथेनैकमाशुकारिणमाहवे ।
अनेकमिव संत्रासान्मेनिरे तत्र कौरवाः ॥ १६ ॥
राजा द्रुपदने कौरवोंको देखकर उनपर सब ओरसे धावा बोल दिया और बाणोंका बड़ा भारी जाल-सा बिछाकर कौरव-सेनाको मूर्च्छित कर दिया। युद्धमें फुर्ती दिखानेवाले राजा द्रुपद रथपर बैठकर यद्यपि अकेले ही बाण-वर्षा कर रहे थे, तो भी अत्यन्त भयके कारण कौरव उन्हें अनेक-सा मानने लगे ॥ १५-१६ ॥
द्रुपदस्य शरा घोरा विचेरुः सर्वतो दिशम् ।
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च मृदङ्गाश्च सहस्रशः ॥ १७ ॥
प्रावाद्यन्त महाराज पाञ्चालानां निवेशने ।
सिंहनादश्च संजज्ञे पाञ्चालानां महात्मनाम् ॥ १८ ॥
धनुर्ज्यातालशब्दश्च संस्पृश्य गगनं महान् ।
द्रुपदके भयंकर बाण सब दिशाओंमें विचरने लगे। महाराज! उनकी विजय होती देख पांचालोंके घरोंमें शंख, भेरी और मृदंग आदि सहस्रों बाजे एक साथ बज उठे। महान् आत्मबलसे सम्पन्न पांचाल-सैनिकोंका सिंहनाद बड़े जोरोंसे होने लगा। साथ ही उनके धनुषोंकी प्रत्यंचाओंका महान् टंकार आकाशमें फैलकर गूँजने लगा ॥ १७-१८ १/२ ॥
दुर्योधनो विकर्णश्च सुबाहुर्दीर्घलोचनः ॥ १९ ॥
दुःशासनश्च संक्रुद्धः शरवर्षैरवाकिरन् ।
सोऽतिविद्धो महेष्वासः पार्षतो युधि दुर्जयः ॥ २० ॥
व्यधमत् तान्यनीकानि तत्क्षणादेव भारत ।
दुर्योधनं विकर्णं च कर्णं चापि महाबलम् ॥ २१ ॥
नानानृपसुतान् वीरान् सैन्यानि विविधानि च ।
अलातचक्रवत् सर्वं चरन् बाणैरतर्पयत् ॥ २२ ॥
उस समय दुर्योधन, विकर्ण, सुबाहु, दीर्घलोचन और दुःशासन बड़े क्रोधमें भरकर बाणोंकी वर्षा करने लगे। भारत! युद्धमें परास्त न होनेवाले महान् धनुर्धर द्रुपदने अत्यन्त घायल होकर तत्काल ही उन सबकी सेनाओंको अत्यन्त पीड़ित कर दिया। वे अलातचक्रकी भाँति सब ओर घूमकर दुर्योधन, विकर्ण, महाबली कर्ण, अनेक वीर राजकुमार तथा उनकी विविध सेनाओंको बाणोंसे तृप्त करने लगे ॥ १९—२२ ॥
(दुःशासनं च दशभिर्विकर्णं विंशकैः शरैः । शकुनिं विंशकैस्तीक्ष्णैर्दशभिर्मर्मभेदिभिः ॥ कर्णदुर्योधनौ चोभौ शरैः सर्वाङ्गसंधिषु । अष्टाविंशतिभिः सर्वैः पृथक् पृथगरिन्दमः ॥ सुबाहुं पञ्चभिर्विद्ध्वा तथान्यान् विविधैः शरैः । विव्याध सहसा भूयो ननाद बलवत्तरम् ॥ विनद्य कोपात् पाञ्चालः सर्वशस्त्रभृतां वरः । धनूंषि रथयन्त्रं च हयांश्चित्रध्वजानपि । चकर्त सर्वपाञ्चालाः प्रणेदुः सिंहसङ्घवत् ॥) ततस्तु नागराः सर्वे मुसलैर्यष्टिभिस्तदा । अभ्यवर्षन्त कौरव्यान् वर्षमाणा घना इव ॥ २३ ॥ उन्होंने दुःशासनको दस, विकर्णको बीस तथा शकुनिको अत्यन्त तीखे तीस मर्मभेदी बाण मारकर घायल कर दिया। तत्पश्चात् शत्रुदमन द्रुपदने कर्ण और दुर्योधनके सम्पूर्ण अंगोंकी संधियोंमें पृथक्-पृथक् अट्ठाईस बाण मारे। सुबाहुको पाँच बाणोंसे घायल करके अन्य योद्धाओंको भी अनेक प्रकारके सायकोंद्वारा सहसा बींध डाला और तब बड़े जोरसे सिंहनाद किया। इस प्रकार क्रोधपूर्वक गर्जना करके सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ पंचालराज द्रुपदने शत्रुओंके धनुष, रथ, घोड़े तथा रंग-बिरंगी ध्वजाओंको भी काट दिया। तत्पश्चात् सारे पांचाल सैनिक सिंह-समूहके समान गर्जना करने लगे। फिर तो उस नगरके सभी निवासी कौरवोंपर टूट पड़े और बरसनेवाले बादलोंकी भाँति उनपर मूसल एवं डंडोंकी वर्षा करने लगे ॥ २३ ॥ सबालवृद्धास्ते पौराः कौरवानभ्यायुस्तदा । श्रुत्वा सुतुमुलं युद्धं कौरवानेव भारत ॥ २४ ॥ द्रवन्ति स्म नदन्ति स्म क्रोशन्तः पाण्डवान् प्रति । (पाञ्चालशरभिन्नाङ्गो भयमासाद्य वै वृषः । कर्णो रथादवप्लुत्य पलायनपरोऽभवत् ॥) पाण्डवास्तु स्वनं श्रुत्वा आर्तानां लोमहर्षणम् ॥ २५ ॥ अभिवाद्य ततो द्रोणं रथानारुरुहुस्तदा । युधिष्ठिरं निवार्याशु मा युध्यस्वेति पाण्डवम् ॥ २६ ॥ उस समय बालकसे लेकर बूढ़ेतक सभी पुरवासी कौरवोंका सामना कर रहे थे। जनमेजय! गुप्तचरोंके मुखसे यह समाचार सुनकर कि वहाँ तुमुल युद्ध हो रहा है, कौरव वहाँ नहींके बराबर हो गये हैं, पंचालराज द्रुपदके बाणोंसे कर्णके सम्पूर्ण अंग क्षत-विक्षत हो गये, वह भयभीत हो रथसे कूदकर भाग चला है तथा कौरव-सैनिक चीखते-चिल्लाते और कराहते हुए हम पाण्डवोंकी ओर भागते आ रहे हैं; पाण्डवलोग पीड़ित सैनिकोंका
रोमांचकारी आर्तनाद कानमें पड़ते ही आचार्य द्रोणको प्रणाम करके रथोंपर जा बैठे और शीघ्र वहाँसे चल दिये। अर्जुनने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको यह कहकर रोक दिया कि 'आप युद्ध न कीजिये' ।। २४—२६ ।।
माद्रेयौ चक्ररक्षौ तु फाल्गुनश्च तदाकरोत् ।
सेनाग्रगो भीमसेनः सदाभूद् गदया सह ।। २७ ।।
उस समय अर्जुनने माद्रीकुमार नकुल और सहदेवको अपने रथके पहियोंका रक्षक बनाया, भीमसेन सदा गदा हाथमें लेकर सेनाके आगे-आगे चलते थे ।। २७ ।।
तदा शत्रुस्वनं श्रुत्वा भ्रातृभिः सहितोऽनघः ।
अयाज्जवेन कौन्तेयो रथेनानादयन् दिशः ।। २८ ।।
तब शत्रुओंका सिंहनाद सुनकर भाइयोंसहित निष्पाप अर्जुन रथकी घरघराहटसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए बड़े वेगसे आगे बढ़े ।। २८ ।।
पाञ्चालानां ततः सेनामुद्धूतार्णवनिःस्वनाम् ।
भीमसेनो महाबाहुर्दण्डपाणिरिवान्तकः ।। २९ ।।
प्रविवेश महासेनां मकरः सागरं यथा ।
स्वयमभ्यद्रवद् भीमो नागानीकं गदाधरः ।। ३० ।।
पांचालोंकी सेना उत्ताल तरंगोंवाले विक्षुब्ध महासागरकी भाँति गर्जना कर रही थी। महाबाहु भीमसेन दण्डपाणि यमराजकी भाँति उस विशाल सेनामें घुस गये, ठीक उसी तरह जैसे समुद्रमें मगर प्रवेश करता है। गदाधारी भीम स्वयं हाथियोंकी सेनापर टूट पड़े ।। २९-३० ।।
स युद्धकुशलः पार्थो बाहुवीर्येण चातुलः ।
अहनत् कुञ्जरानीकं गदया कालरूपधृत् ।। ३१ ।।
कुन्तीकुमार भीम युद्धमें कुशल तो थे ही, बाहुबलमें भी उनकी समानता करनेवाला कोई नहीं था। उन्होंने कालरूप धारणकर गदाकी मारसे उस गजसेनाका संहार आरम्भ किया ।। ३१ ।।
ते गजा गिरिसं print text: काशाः क्षरन्तो रुधिरं बहु ।
भीमसेनस्य गदया भिन्नमस्तकपिण्डकाः ।। ३२ ।।
पतन्ति द्विरदा भूमौ वज्रघातादिवाचलाः ।
गजानश्वान् रथांश्चैव पातयामास पाण्डवः ।। ३३ ।।
पदातींश्च रथांश्चैव न्यवधीदर्जुनाग्रजः ।
गोपाल इव दण्डेन यथा पशुगणान् वने ।। ३४ ।।
चालयन् रथनागांश्च संचचाल वृकोदरः ।
भीमसेनकी गदासे मस्तक फट जानेके कारण वे पर्वतोंके समान विशालकाय गजराज लोहूके झरने बहाते हुए वज्रके आघातसे (पंख कटे हुए) पहाड़ोंकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ते थे। अर्जुनके बड़े भाई पाण्डुनन्दन भीमने हाथियों, घोड़ों एवं रथोंको धराशायी कर दिया। पैदलों तथा रथियोंका संहार कर डाला। जैसे ग्वाला वनमें डंडेसे पशुओंको हाँकता है, उसी प्रकार भीमसेन रथियों और हाथियोंको खदेड़ते हुए उनका पीछा करने लगे ।। ३२ —३४ १/२ ।।
वैशम्पायन उवाच
भारद्वाजप्रियं कर्तुमुद्यतः फाल्गुनस्तदा ।। ३५ ।।
पार्षतं शरजालेन क्षिपन्नागात् स पाण्डवः ।
हयौघांश्च रथौघांश्च गजौघांश्च समन्ततः ।। ३६ ।।
पातयन् समरे राजन् युगान्ताग्निरिव ज्वलन् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! उस समय द्रोणाचार्यका प्रिय करनेके लिये उद्यत हुए पाण्डुनन्दन अर्जुन द्रुपदपर बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए उनपर चढ़ आये। वे रणभूमिमें घोड़ों, रथों और हाथियोंके झुंडोंका सब ओरसे संहार करते हुए प्रलयकालीन अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ।। ३५-३६ १/२ ।।
ततस्ते हन्यमाना वै पाञ्चालाः सृञ्जयास्तथा ।। ३७ ।।
शरैर्नानाविधैस्तूर्णं पार्थं संछाद्य सर्वशः ।
सिंहनादं मुखैः कृत्वा समयुध्यन्त पाण्डवम् ।। ३८ ।।
उनके बाणोंसे घायल हुए पांचाल और सृंजय वीरोंने तुरंत ही नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करके अर्जुनको सब ओरसे ढक दिया और मुखसे सिंहनाद करते हुए उनसे लोहा लेना आरम्भ किया ।। ३७-३८ ।।
तद् युद्धमभवद् घोरं सुमहाद्भुतदर्शनम् ।
सिंहनादस्वनं श्रुत्वा नामृष्यत् पाकशासनिः ।। ३९ ।।
वह युद्ध अत्यन्त भयानक और देखनेमें बड़ा ही अद्भुत था। शत्रुओंका सिंहनाद सुनकर इन्द्रकुमार अर्जुन उसे सहन न कर सके ।। ३९ ।।
ततः किरीटी सहसा पाञ्चालान् समरेऽद्रवत् ।
छादयन्निषुजालेन महता मोहयन्निव ।। ४० ।।
उस युद्धमें किरीटधारी पार्थने बाणोंका बड़ा भारी जाल-सा बिछाकर पांचालोंको आच्छादित और मोहित-सा करते हुए उनपर सहसा आक्रमण किया ।। ४० ।।
शीघ्रमभ्यस्यतो बाणान् संदधानस्य चानिशम् ।
नान्तरं ददृशे किंचित् कौन्तेयस्य यशस्विनः ।। ४१ ।।
यशस्वी अर्जुन बड़ी फुर्तीसे बाण छोड़ते और निरन्तर नये-नये बाणोंका संधान करते थे। उनके धनुषपर बाण रखने और छोड़नेमें थोड़ा-सा भी अन्तर नहीं दिखायी पड़ता था ।। ४१ ।।
(न दिशो नान्तरिक्षं च तदा नैव च मेदिनी ।
अदृश्यत महाराज तत्र किंचन संयुगे ।।
बाणान्धकारे बलिना कृते गाण्डीवधन्वना ।)
महाराज! उस युद्धमें न तो दिशाओंका पता चलता था न आकाशका और न पृथ्वी अथवा और कुछ भी ही दिखायी देता था। बलवान् वीर गाण्डीवधारी अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा घोर अन्धकार फैला दिया था।
सिंहनादश्च संजज्ञे साधुशब्देन मिश्रितः ।
ततः पाञ्चालराजस्तु तथा सत्यजिता सह ।। ४२ ।।
त्वरमाणोऽभिदुद्राव महेन्द्रं शम्बरो यथा ।
महता शरवर्षेण पार्थः पाञ्चालमावृणोत् ।। ४३ ।।
उस समय पाण्डव-दलमें साधुवादके साथ-साथ सिंहनाद हो रहा था। उधर पंचालराज द्रुपदने अपने भाई सत्यजित्को साथ लेकर तीव्र गतिसे अर्जुनपर धावा किया, ठीक उसी तरह जैसे शम्बरासुरने देवराज इन्द्रपर आक्रमण किया था। परंतु कुन्तीनन्दन अर्जुनने बाणोंकी भारी बौछार करके पंचालनरेशको ढक दिया ।। ४२-४३ ।।
ततो हलहलाशब्द आसीत् पाञ्चालके बले ।
जिघृक्षति महासिंहो गजानामिव यूथपम् ।। ४४ ।।
और जैसे महासिंह हाथियोंके यूथपतिको पकड़नेकी चेष्टा करता है, उसी प्रकार अर्जुन द्रुपदको पकड़ना ही चाहते थे कि पांचालोंकी सेनामें हाहाकार मच गया ।। ४४ ।।
दृष्ट्वा पार्थं तदाऽऽयान्तं सत्यजित् सत्यविक्रमः ।
पाञ्चालं वै परित्रेप्सुर्धनंजयमुपाद्रवत् ।। ४५ ।।
ततस्त्वर्जुनपाञ्चालौ युद्धाय समुपागतौ ।
व्यक्षोभयेतां तौ सैन्यमिन्द्रवैरोचनाविव ।। ४६ ।।
सत्यपराक्रमी सत्यजित्ने देखा कि कुन्तीपुत्र धनंजय पंचालनरेशको पकड़नेके लिये निकट बढ़े आ रहे हैं, तो वे उनकी रक्षाके लिये अर्जुनपर चढ़ आये; फिर तो इन्द्र और बलिकी भाँति अर्जुन और पांचाल सत्यजित्ने युद्धके लिये आमने-सामने आकर सारी सेनाओंको क्षोभमें डाल दिया ।। ४५-४६ ।।
ततः सत्यजितं पार्थो दशभिर्मर्मभेदिभिः ।
विव्याध बलवद् गाढं तदद्भुतमिवाभवत् ।। ४७ ।।
तब अर्जुनने दस मर्मभेदी बाणोंद्वारा सत्यजित्पर बलपूर्वक गहरा आघात करके उन्हें घायल कर दिया। यह अद्भुत-सी बात हुई ।। ४७ ।।
ततः शरशतैः पार्थं पाञ्चालः शीघ्रमार्दयत् । पार्थस्तु शरवर्षेण छाद्यमानो महारथः ॥ ४८ ॥ वेगं चक्रे महावेगो धनुर्ज्यामवमृज्य च । ततः सत्यजितश्चापं छित्त्वा राजानमभ्ययात् ॥ ४९ ॥ फिर पांचाल वीर सत्यजित्ने भी शीघ्र ही सौ बाण मारकर अर्जुनको पीड़ित कर दिया। उनके बाणोंकी वर्षासे आच्छादित होकर महान् वेगशाली महारथी अर्जुनने धनुषकी प्रत्यंचाको झाड़-पोंछकर बड़े वेगसे बाण छोड़ना आरम्भ किया और सत्यजित्के धनुषको काटकर वे राजा द्रुपदपर चढ़ आये ॥ ४८-४९ ॥
अथान्यद् धनुरादाय सत्यजिद् वेगवत्तरम् । साश्वं ससूतं सरथं पार्थं विव्याध सत्वरः ॥ ५० ॥ तब सत्यजित्ने दूसरा अत्यन्त वेगशाली धनुष लेकर तुरंत ही घोड़े, सारथि एवं रथसहित अर्जुनको बींध डाला ॥ ५० ॥
स तं न ममृषे पार्थः पाञ्चालेनार्दितो युधि । ततस्तस्य विनाशार्थं सत्वरं व्यसृजच्छरान् ॥ ५१ ॥ युद्धमें पांचाल वीर सत्यजित्से पीड़ित हो अर्जुन उनके पराक्रमको न सह सके और उनके विनाशके लिये उन्होंने शीघ्र ही बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ ५१ ॥
हयान् ध्वजं धनुर्मुष्टिमुभौ तौ पार्ष्णिसारथी । स तथा भिद्यमानेषु कार्मुकेषु पुनः पुनः ॥ ५२ ॥ हयेषु विनियुक्तेषु विमुखोऽभवदाहवे । स सत्यजितमालोक्य तथा विमुखमाहवे ॥ ५३ ॥ वेगेन महता राजन्नभ्यवर्षत पाण्डवम् । तदा चक्रे महद् युद्धमर्जुनो जयतां वरः ॥ ५४ ॥ सत्यजित्के घोड़े, ध्वजा, धनुष, मुट्ठी तथा पार्श्वरक्षक एवं सारथि दोनोंको अर्जुनने क्षत-विक्षत कर दिया। इस प्रकार बार-बार धनुषके छिन्न-भिन्न होने और घोड़ोंके मारे जानेपर सत्यजित् समर-भूमिसे भाग गये। राजन्! उन्हें इस तरह युद्धसे विमुख हुआ देख पांचालनरेश द्रुपदने पाण्डुनन्दन अर्जुनपर बड़े वेगसे बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ की। तब विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुनने उनसे बड़ा भारी युद्ध प्रारम्भ किया ॥ ५२—५४ ॥
तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा ध्वजं चोर्व्यामपातयत् । पञ्चभिस्तस्य विव्याध हयान् सूतं च सायकैः ॥ ५५ ॥ उन्होंने पंचालराजका धनुष काटकर उनकी ध्वजाको भी धरतीपर काट गिराया। फिर पाँच बाणोंसे उनके घोड़ों और सारथिको घायल कर दिया ॥ ५५ ॥
तत उत्सृज्य तच्चापमाददानं शरावरम् । खड्गमुद्धृत्य कौन्तेयः सिंहनादमथाकरोत् ॥ ५६ ॥
तत्पश्चात् उस कटे हुए धनुषको त्यागकर जब वे दूसरा धनुष और तूणीर लेने लगे, उस समय अर्जुनने म्यानसे तलवार निकालकर सिंहके समान गर्जना की ॥ ५६ ॥ पाञ्चालस्य रथस्येषामान्लुत्य सहसापतत् । पाञ्चालरथमास्थाय अवित्रस्तो धनंजयः ॥ ५७ ॥ विक्षोभ्याम्भोनिधिं पार्थस्तं नागमिव सोऽग्रहीत् । ततस्तु सर्वपाञ्चाला विद्रवन्ति दिशो दश ॥ ५८ ॥ और सहसा पांचालनरेशके रथके डंडेपर कूद पड़े। इस प्रकार द्रुपदके रथपर चढ़कर निर्भीक अर्जुनने जैसे गरुड़ समुद्रको क्षुब्ध करके सर्पको पकड़ लेता है, उसी प्रकार उन्हें अपने काबूमें कर लिया। तब समस्त पांचाल सैनिक (भयभीत हो) दसों दिशाओंमें भागने लगे ॥ ५७-५८ ॥ दर्शयन् सर्वसैन्यानां स बाह्वोर्बलमात्मनः । सिंहनादस्वनं कृत्वा निर्जगाम धनंजयः ॥ ५९ ॥ समस्त सैनिकोंको अपना बाहुबल दिखाते हुए अर्जुन सिंहनाद करके वहाँसे लौटे ॥ ५९ ॥ आयान्तमर्जुनं दृष्ट्वा कुमाराः सहितास्तदा । ममृदुस्तस्य नगरं द्रुपदस्य महात्मनः ॥ ६० ॥ अर्जुनको आते देख सब राजकुमार एकत्र हो महात्मा द्रुपदके नगरका विध्वंस करने लगे ॥ ६० ॥
अर्जुन उवाच सम्बन्धी कुरुवीराणां द्रुपदो राजसत्तमः । मा वधीस्तद्बलं भीम गुरुदानं प्रदीयताम् ॥ ६१ ॥ **तब अर्जुनने कहा—**भैया भीमसेन! राजाओंमें श्रेष्ठ द्रुपद कौरववीरोंके सम्बन्धी हैं, अतः इनकी सेनाका संहार न करो; केवल गुरुदक्षिणाके रूपमें द्रोणके प्रति महाराज द्रुपदको ही दे दो ॥ ६१ ॥
वैशम्पायन उवाच भीमसेनस्तदा राजन्नर्जुनेन निवारितः । अतृप्तो युद्धधर्मेषु न्यवर्तत महाबलः ॥ ६२ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय अर्जुनके मना करनेपर महाबली भीमसेन युद्धधर्मसे तृप्त न होनेपर भी उससे निवृत्त हो गये ॥ ६२ ॥ ते यज्ञसेनं द्रुपदं गृहीत्वा रणमूर्धनि । उपाजहुः सहामात्यं द्रोणाय भरतर्षभ ॥ ६३ ॥
भरतश्रेष्ठ जनमेजय! उन पाण्डवने यज्ञसेन द्रुपदको मन्त्रियोंसहित संग्रामभूमिमें बंदी बनाकर द्रोणाचार्यको उपहारके रूपमें दे दिया ।। ६३ ।। भग्नदर्प हृतधनं तं तथा वशमागतम् । स वैरं मनसा ध्यात्वा द्रोणो द्रुपदमब्रवीत् ।। ६४ ।। उनका अभिमान चूर्ण हो गया था, धन छीन लिया गया था और वे पूर्णरूपसे वशमें आ चुके थे; उस समय द्रोणाचार्यने मन-ही-मन पिछले वैरका स्मरण करके राजा द्रुपदसे कहा — ।। ६४ ।। विमृद्य तरसा राष्ट्रं पुरं ते मृदितं मया । प्राप्य जीवं रिपुवशं सखिपूर्वं किमिष्यते ।। ६५ ।। ‘राजन्! मैंने बलपूर्वक तुम्हारे राष्ट्रको रौंद डाला। तुम्हारी राजधानी मिट्टीमें मिला दी। अब तुम शत्रुके वशमें पड़े हुए जीवनको लेकर यहाँ आये हो। बोलो, अब पुरानी मित्रता चाहते हो क्या?’ ।। ६५ ।। एवमुक्त्वा प्रहस्यैनं किंचित् स पुनरब्रवीत् । मा भैः प्राणभयाद् वीर क्षमिणो ब्राह्मणा वयम् ।। ६६ ।। यों कहकर द्रोणाचार्य कुछ हँसे। उसके बाद फिर उनसे इस प्रकार बोले—‘वीर! प्राणोंपर संकट आया जानकर भयभीत न होओ। हम क्षमाशील ब्राह्मण हैं ।। ६६ ।। आश्रमे क्रीडितं यत् तु त्वया बाल्ये मया सह । तेन संवर्द्धितः स्नेहः प्रीतिश्च क्षत्रियर्षभ ।। ६७ ।। ‘क्षत्रियशिरोमणे! तुम बचपनमें मेरे साथ आश्रममें जो खेले-कूदे हो, उससे तुम्हारे ऊपर मेरा स्नेह एवं प्रेम बहुत बढ़ गया है ।। ६७ ।। प्रार्थयेयं त्वया सख्यं पुनरेव जनाधिप । वरं ददामि ते राजन् राज्यस्यार्धमवाप्नुहि ।। ६८ ।। ‘नरेश्वर! मैं पुनः तुमसे मैत्रीके लिये प्रार्थना करता हूँ। राजन्! मैं तुम्हें वर देता हूँ, तुम इस राज्यका आधा भाग मुझसे ले लो ।। ६८ ।। अराजा किल नो राज्ञः सखा भवितुमर्हसि । अतः प्रयतितं राज्ये यज्ञसेन मया तव ।। ६९ ।। ‘यज्ञसेन! तुमने कहा था—जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता; इसीलिये मैंने तुम्हारा राज्य लेनेका प्रयत्न किया है ।। ६९ ।। राजासि दक्षिणे कूले भागीरथ्याहमुत्तरे । सखायं मां विजानीहि पाञ्चाल यदि मन्यसे ।। ७० ।। ‘गंगाके दक्षिण प्रदेशके तुम राजा हो और उत्तरके भूभागका राजा मैं हूँ। पांचाल! अब यदि उचित समझो तो मुझे अपना मित्र मानो’ ।। ७० ।। द्रुपद उवाच