महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
संवेशयित्वा नश्यन्ति वायुवेगपराहताः ॥ ८४ ॥ तत्पश्चात् समस्त आकाशको घेरकर सब ओर फैले हुए वे मेघ वायुके प्रचण्ड वेगसे छिन्न-भिन्न होकर सहसा अदृश्य हो जाते हैं ॥ ८४ ॥ ततस्तं मारुतं घोरं स्वयम्भूर्मनुजाधिप । आदिः पद्मालयो देवः पीत्वा स्वपिति भारत ॥ ८५ ॥ नरेश्वर! इसके बाद कमलमें निवास करनेवाले आदिदेव स्वयं ब्रह्माजी उस भयंकर वायुको पीकर सो जाते हैं ॥ ८५ ॥ तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते ॥ ८६ ॥ निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे । अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन् भ्रमाम्येकोऽहमाहतः ॥ ८७ ॥ इस प्रकार चराचर प्राणियों, देवताओं तथा असुर आदिके नष्ट हो जानेपर यक्ष, राक्षस, मनुष्य, हिंसक जीव, वृक्ष तथा अन्तरिक्षसे शून्य उस घोर एकार्णवमय जगत्में मैं अकेला ही इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ ॥ ८६-८७ ॥ एकार्णवे जले घोरे विचरन् पार्थिवोत्तम । अपश्यन् सर्वभूतानि वैक्लव्यमगमं ततः ॥ ८८ ॥ नृपश्रेष्ठ! एकार्णवके उस भयंकर जलमें विचरते हुए जब मैंने किसी भी प्राणीको नहीं देखा, तब मुझे बड़ी व्याकुलता हुई ॥ ८८ ॥ ततः सुदीर्घं गत्वाहं प्लवमानो नराधिप । श्रान्तः क्वचिन्न शरणं लभाम्यहमतन्द्रितः ॥ ८९ ॥ नरेश्वर! उस समय आलस्यशून्य होकर सुदीर्घकाल-तक तैरता हुआ मैं दूर जाकर बहुत थक गया। परंतु कहीं भी मुझे कोई आश्रय नहीं मिला ॥ ८९ ॥ ततः कदाचित् पश्यामि तस्मिन् सलिलसंचये । न्यग्रोधं सुमहन्तं वै विशालं पृथिवीपते ॥ ९० ॥ राजन्! तदनन्तर एक दिन एकार्णवकी उस अगाध जलराशिमें मैंने एक बहुत विशाल बरगदका वृक्ष देखा ॥ ९० ॥ शाखायां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णायां नराधिप । पर्यङ्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्कृते ॥ ९१ ॥ उपविष्टं महाराज पद्मेन्दुसदृशाननम् । फुल्लपद्मविशालाक्षं बालं पश्यामि भारत ॥ ९२ ॥ नराधिप! उस वृक्षकी चौड़ी शाखापर एक पलंग था, जिसके ऊपर दिव्य बिछौने बिछे हुए थे। महाराज! उस पलंगपर एक सुन्दर बालक बैठा दिखायी दिया, जिसका मुख
कमलके समान कमनीय शोभा धारण करनेवाला तथा चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था। उसके नेत्र प्रफुल्ल पद्मदलके समान विशाल थे ॥ ९१-९२ ॥ ततो मे पृथिवीपाल विस्मयः सुमहानभूत् । कथं त्वयं शिशुः शेते लोके नाशमुपागते ॥ ९३ ॥ पृथ्वीनाथ! उसे देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मैं सोचने लगा—'सारे संसारके नष्ट हो जानेपर भी यह बालक यहाँ कैसे सो रहा है?' ॥ ९३ ॥ तपसा चिन्तयंश्चापि तं शिशुं नोपलक्षये । भूतं भव्यं भविष्यं च जानन्नपि नराधिप ॥ ९४ ॥ नरेश्वर! मैं भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंका ज्ञाता होनेपर भी तपस्यासे भलीभाँति चिन्तन करता (ध्यान लगाता) रहा, तो भी उस शिशुके विषयमें कुछ न जान सका ॥ ९४ ॥ अतसीपुष्पवर्णाभः श्रीवत्सकृतभूषणः । साक्षाल्लक्ष्म्या इवावासः स तदा प्रतिभाति मे ॥ ९५ ॥ उसकी अंगकान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम थी। उसका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित था। वह उस समय मुझे साक्षात् लक्ष्मीका निवासस्थान-सा प्रतीत होता था ॥ ९५ ॥ ततो मामब्रवीद् बालः स पद्मनिभलोचनः । श्रीवत्सधारी द्युतिमान् वाक्यं श्रुतिसुखावहम् ॥ ९६ ॥ जानामि त्वां परिश्रान्तं ततो विश्रामकाङ्क्षिणम् । मार्कण्डेय इहास्स्व त्वं यावदिच्छसि भार्गव ॥ ९७ ॥ मुझे विस्मयमें पड़ा देख कमलके समान नेत्रवाले उस श्रीवत्सधारी कान्तिमान् बालकने मुझसे इस प्रकार श्रवणसुखद वचन कहा—'भृगुवंशी मार्कण्डेय! मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम बहुत थक गये हो और विश्राम चाहते हो। तुम्हारी जबतक इच्छा हो यहाँ बैठो ।।
अभ्यन्तरं शरीरे मे प्रविश्य मुनिसत्तम । आस्स्व भो विहितो वासः प्रसादस्ते कृतो मया ॥ ९८ ॥ ‘मुनिश्रेष्ठ! मैंने तुमपर कृपा की है। तुम मेरे शरीरके भीतर प्रवेश करके विश्राम करो। वहाँ तुम्हारे रहनेके लिये व्यवस्था की गयी है’ ॥ ९८ ॥ ततो बालेन तेनैवमुक्तस्यासीत् तदा मम । निर्वेदो जीविते दीर्घे मनुष्यत्वे च भारत ॥ ९९ ॥ उस बालकके ऐसा कहनेपर उस समय मुझे अपने दीर्घ-जीवन और मानव-शरीरपर बड़ा खेद और वैराग्य हुआ ॥ ९९ ॥ ततो बालेन तेनास्यं सहसा विवृतं कृतम् । तस्याहमवशो वक्त्रे दैवयोगात् प्रवेशितः ॥ १०० ॥ तदनन्तर उस बालकने सहसा अपना मुख खोला और मैं दैवयोगसे परवशकी भाँति उसमें प्रवेश कर गया ॥ १०० ॥ ततः प्रविष्टस्तत्कुक्षिं सहसा मनुजाधिप । सराष्ट्रनगराकीर्णां कृत्स्नां पश्यामि मेदिनीम् ॥ १०१ ॥ राजन्! उसमें प्रवेश करते ही मैं सहसा उस बालकके उदरमें जा पहुँचा। वहाँ मुझे समस्त राष्ट्रों और नगरोंसे भरी हुई यह सारी पृथ्वी दिखायी दी ॥ १०१ ॥ गङ्गां शतद्रुं सीतां च यमुनामथ कौशिकीम् ।
चर्मणवतीं वेत्रवतीं चन्द्रभागां सरस्वतीम् ॥ १०२ ॥ सिन्धुं चैव विपाशां च नदीं गोदावरीमपि । वस्वोकसारां नलिनीं नर्मदां चैव भारत ॥ १०३ ॥ नदीं ताम्रां च वेणां च पुण्यतोयां शुभावहाम् । सुवेणां कृष्णवेणां च इरामां च महानदीम् ॥ १०४ ॥ वितस्तां च महाराज कावेरीं च महानदीम् । शोणं च पुरुषव्याघ्र विशल्यां किम्पुनामपि ॥ १०५ ॥ एताश्चान्याश्च नद्योऽहं पृथिव्यां या नरोत्तम । परिक्रामन् प्रपश्यामि तस्य कुक्षौ महात्मनः ॥ १०६ ॥ नरश्रेष्ठ! फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना—इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा ॥ १०२—१०६ ॥ ततः समुद्रं पश्यामि यादोगणनिषेवितम् । रत्नाकरममित्रघ्न पयसो निधिमुत्तमम् ॥ १०७ ॥ शत्रुसूदन! इसके बाद जलजन्तुओंसे भरे हुए अगाध जलके भण्डार परम उत्तम रत्नाकर समुद्रको भी देखा ॥ १०७ ॥ तत्र पश्यामि गगनं चन्द्रसूर्यविराजितम् । जाज्वल्यमानं तेजोभिः पावकार्कसमप्रभम् ॥ १०८ ॥ वहाँ मुझे चन्द्रमा और सूर्यसे सुशोभित आकाशमण्डल दिखायी दिया, जो अनन्त तेजसे प्रज्वलित तथा अग्नि एवं सूर्यके समान देदीप्यमान था ॥ १०८ ॥ पश्यामि च महीं राजन् काननैरुपशोभिताम् । (सपर्वतवनद्वीपां निमग्नाशतसङ्कुलाम् ।) यजन्ते हि तदा राजन् ब्राह्मणा बहुभिर्मखैः ॥ १०९ ॥ राजन्! वहाँकी भूमि विविध काननोंसे सुशोभित, पर्वत, वन और द्वीपोंसे उपलक्षित तथा सैकड़ों सरिताओंसे संयुक्त दिखायी देती थी। ब्राह्मणलोग नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करते थे ॥ १०९ ॥ क्षत्रियाश्च प्रवर्तन्ते सर्ववर्णानुरंजनैः । वैश्याः कृषिं यथान्यायं कारयन्ति नराधिप ॥ ११० ॥ नरेश्वर! क्षत्रिय राजा सब वर्णोंकी प्रजाका अनुरंजन करते—सबको सुखी और प्रसन्न रखते थे। वैश्य न्यायपूर्वक खेतीका काम और व्यापार करते थे ॥ ११० ॥ शुश्रूषायां च निरता द्विजानां वृषलास्तदा ।
ततः परिपतन् राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मनः ॥ १११ ॥ हिमवन्तं च पश्यामि हेमकूटं च पर्वतम् । निषधं चापि पश्यामि श्वेतं च रजतान्वितम् ॥ ११२ ॥ पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम् । मन्दरं मनुजव्याघ्र नीलं चापि महागिरिम् ॥ ११३ ॥ पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम् । महेन्द्रं चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम् ॥ ११४ ॥ मलयं चापि पश्यामि पारियात्रं च पर्वतम् । एते चान्ये च बहवो यावन्तः पृथिवीधराः ॥ ११५ ॥ तस्योदरे मया दृष्टाः सर्वे रत्नविभूषिताः । सिंहान् व्याघ्रान् वराहांश्च पश्यामि मनुजाधिप ॥ ११६ ॥ शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन्! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन्! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याघ्र और वाराह आदि पशु भी देखे ॥ १११—११६ ॥
पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते । तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन् पर्यचरं तदा ॥ ११७ ॥ पृथ्वीपते! भूमण्डलमें जितने प्राणी हैं, उन सबको देखते हुए मैं उस समय उस बालकके उदरमें विचरता रहा ॥ ११७ ॥
कुक्षौ तस्य नरव्याघ्र प्रविष्टः संचरन् दिशः । शक्रादींश्चापि पश्यामि कृत्स्नान् देवगणानहम् ॥ ११८ ॥ नरश्रेष्ठ! उस शिशुके उदरमें प्रविष्ट हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते हुए इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंके भी दर्शन हुए ॥ ११८ ॥
साध्यान् रुद्रांस्तथाऽऽदित्यान् गुह्यकान् पितरस्तदा । सर्पान् नागान् सुपर्णांश्च वसूनप्यश्विनावपि ॥ ११९ ॥ गन्धर्वाप्सरसो यक्षानृषींश्चैव महीपते । दैत्यदानवसङ्घांश्च नागांश्च मनुजाधिप ॥ १२० ॥ सिंहिकातनयांश्चापि ये चान्ये सुरशत्रवः । यच्च किंचिन्मया लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम् ॥ १२१ ॥ सर्वं पश्याम्यहं राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मनः । चरमाणः फलाहारः कृत्स्नं जगदिदं विभो ॥ १२२ ॥
पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगत्में घूमता रहता॥ ११९-१२२॥
अन्तःशरीरे तस्याहं वर्षाणामधिकं शतम् ।
न च पश्यामि तस्याहं देहस्यान्तं कदाचन ॥ १२३ ॥
उस बालकके शरीरके भीतर मैं सौ वर्षसे अधिक कालतक घूमता रहा, तो भी कभी उसके शरीरका अन्त नहीं दिखायी दिया ॥ १२३ ॥
सततं धावमानश्च चिन्तयानो विशाम्पते ।
(भ्रमंस्तत्र महीपाल यदा वर्षगणान् बहून् ।)
आसादयामि नैवान्तं तस्य राजन् महात्मनः ॥ १२४ ॥
ततस्तमेव शरणं गतोऽस्मि विधिवत् तदा ।
वरेण्यं वरदं देवं मनसा कर्मणैव च ॥ १२५ ॥
युधिष्ठिर! मैं निरन्तर दौड़ लगाता और चिन्तामें पड़ा रहता था। महाराज! जब बहुत वर्षोंतक भ्रमण करनेपर भी उस महात्माके शरीरका अन्त नहीं मिला, तब मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन वरदायक एवं वरेण्य देवताकी ही विधिपूर्वक शरण ली ॥ १२४-१२५ ॥
ततोऽहं सहसा राजन् वायुवेगेन निःसृतः ।
महात्मनो मुखात् तस्य विवृतात् पुरुषोत्तम ॥ १२६ ॥
पुरुषरत्न युधिष्ठिर! उनकी शरण लेते ही मैं वायुके समान वेगसे उक्त महात्मा बालकके खुले हुए मुखकी राहसे सहसा बाहर निकल आया ॥ १२६ ॥
ततस्तस्यैव शाखायां न्यग्रोधस्य विशाम्पते ।
आस्ते मनुजशार्दूल कृत्स्नमादाय वै जगत् ॥ १२७ ॥
तेनैव बालवेषेण श्रीवत्सकृतलक्षणम् ।
आसीनं तं नरव्याघ्र पश्याम्यमिततेजसम् ॥ १२८ ॥
नरश्रेष्ठ राजन्! बाहर आकर देखा तो उसी बरगदकी शाखापर उसी बाल-वेषसे सम्पूर्ण जगत्को अपने उदरमें लेकर श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित वह अमिततेजस्वी बालक पूर्ववत् बैठा हुआ है ॥ १२७-१२८ ॥
ततो मामब्रवीद् बालः स प्रीतः प्रहसन्निव ।
श्रीवत्सधारी द्युतिमान् पीतवासा महाद्युतिः ॥ १२९ ॥
तब महातेजस्वी पीताम्बरधारी श्रीवत्सभूषित कान्तिमान् उस बालकने प्रसन्न होकर हँसते हुए-से मुझसे कहा— ॥ १२९ ॥
अपीदानीं शरीरेऽस्मिन् मामके मुनिसत्तम ।
उषितस्त्वं सुविश्रान्तो मार्कण्डेय ब्रवीहि मे ॥ १३० ॥
‘मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय! क्या तुम मेरे इस शरीरमें रहकर विश्राम कर चुके? मुझे बताओ' ॥ १३० ॥
मुहूर्तादथ मे दृष्टिः प्रादुर्भूता पुनर्नवा ।
यया निर्मुक्तमात्मानमपश्यं लब्धचेतसम् ॥ १३१ ॥
फिर दो ही घड़ीमें मुझे एक नवीन दृष्टि प्राप्त हुई, जिससे मैं अपने-आपको मायासे मुक्त और सचेत अनुभव करने लगा ॥ १३१ ॥
तस्य ताम्रतलौ तात चरणौ सुप्रतिष्ठितौ ।
सुजातौ मृदुरक्ताभिरङ्गुलीभिर्विराजितौ ॥ १३२ ॥
प्रयत्नेन मया मूर्ध्ना गृहीत्वा ह्यभिवन्दितौ ।
तात! तदनन्तर मैंने कोमल और लाल रंगकी अँगुलियोंसे सुशोभित लाल-लाल तलवेवाले उस बालकके सुन्दर एवं सुप्रतिष्ठित चरणोंको प्रयत्नपूर्वक पकड़कर उन्हें अपने मस्तकसे प्रणाम किया ॥ १३२ ½ ॥
दृष्ट्वा परिमितं तस्य प्रभावममितौजसः ॥ १३३ ॥
विनयेनाञ्जलिं कृत्वा प्रयत्नेनोपगम्य ह ।
दृष्टो मया स भूतात्मा देवः कमललोचनः ॥ १३४ ॥
उस अमित तेजस्वी शिशुका अनन्त प्रभाव देखकर मैं यत्नपूर्वक उसके समीप गया और विनीतभावसे हाथ जोड़कर सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा उस कमलनयन देवताका दर्शन किया ॥ १३३-१३४ ॥
तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमब्रुवम् ।
ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां मायां चैतां तवोत्तमाम् ॥ १३५ ॥
फिर हाथ जोड़े नमस्कार करके मैंने उससे इस प्रकार कहा—देव! मैं आपको और आपकी इस उत्तम मायाको जानना चाहता हूँ ॥ १३५ ॥
आस्येनानुप्रविष्टोऽहं शरीरे भगवंस्तव ।
दृष्टवानखिलान् सर्वान् समस्तान् जठरे हि ते ॥ १३६ ॥
‘भगवन्! मैंने आपके मुखकी राहसे शरीरमें प्रवेश करके आपके उदरमें समस्त सांसारिक पदार्थोंका अवलोकन किया है ॥ १३६ ॥
तव देव शरीरस्था देवदानवराक्षसाः ।
यक्षगन्धर्वनागाश्च जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ १३७ ॥
‘देव! आपके शरीरमें देवता, दानव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, नाग तथा समस्त स्थावर-जंगमरूप जगत् विद्यमान है॥
त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीयते ।
द्रुतमन्तःशरीरे ते सततं परिवर्ततः ॥ १३८ ॥
‘प्रभो! आपकी कृपासे आपके शरीरके भीतर निरन्तर शीघ्र गतिसे घूमते रहनेपर भी मेरी स्मरणशक्ति नष्ट नहीं हुई है॥ १३८॥
निर्गतोऽहमकामस्तु इच्छया ते महाप्रभो ।
इच्छामि पुण्डरीकाक्ष ज्ञातुं त्वाममनिन्दितम् ॥ १३९ ॥
‘महाप्रभो! मैं अपनी अभिलाषा न रहनेपर भी केवल आपकी इच्छासे बाहर निकल आया हूँ। कमलनयन! आप सर्वोत्कृष्ट देवताको मैं जानना चाहता हूँ॥ १३९॥
इह भूत्वा शिशुः साक्षात् किं भवानवतिष्ठते ।
पीत्वा जगदिदं सर्वमेतदाख्यातुमर्हसि ॥ १४० ॥
‘आप इस सम्पूर्ण जगत्को पी करके यहाँ साक्षात् बालकवेषमें क्यों विराजमान हैं? यह सब बतानेकी कृपा करें॥ १४०॥
किमर्थं च जगत् सर्वं शरीरस्थं तवानघ ।
कियन्तं च त्वया कालमिह स्थेयमरिंदम ॥ १४१ ॥
‘अनघ! यह सारा संसार आपके शरीरमें किसलिये स्थित है? शत्रुदमन! आप कितने समयतक यहाँ इस रूपमें रहेंगे?॥ १४१॥
एतदिच्छामि देवेश श्रोतुं ब्राह्मणकाम्यया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम् ॥ १४२ ॥
‘देवेश्वर! कमलनयन! ब्राह्मणमें जो सहज जिज्ञासा होती है, उससे प्रेरित होकर मैं आपसे यह सब बातें यथाविधि विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ॥ १४२॥
महद्भूयेतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान् प्रभो ।
इत्युक्तः स मया श्रीमान् देवदेवो महाद्युतिः ।
सान्त्वयन् मामिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ॥ १४३ ॥
‘प्रभो! मैंने जो कुछ देखा है, यह अगाध और अचिन्त्य है।’ मेरे इस प्रकार पूछनेपर वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी देवाधिदेव श्रीभगवान् मुझे सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले॥ १४३॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि
अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें एक सौ अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८८॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १४४ श्लोक हैं)
* अट्टमन्नं शिवो वेदो ब्राह्मणाश्च चतुष्पथाः । केशो भगं समाख्यातं शूलं तद् विक्रयं विदुः ।। (नीलकण्ठकृत टीका)
१८९-
एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः
भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना
देव उवाच
कामं देवा अपि न मां विप्र जानन्ति तत्त्वतः ।
त्वत्प्रीत्या तु प्रवक्ष्यामि यथेदं विसृजाम्यहम् ॥ १ ॥
**भगवान् बोले—**विप्रवर! देवता भी मेरे स्वरूपको यथेष्ट और यथार्थरूपसे नहीं जानते। मैं जिस प्रकार इस जगत्की रचना करता हूँ, वह तुम्हारे प्रेमके कारण तुम्हें बताऊँगा ॥ १ ॥
पितृभक्तोऽसि विप्रर्षे मां चैव शरणं गतः ।
ततो दृष्टोऽस्मि ते साक्षाद् ब्रह्मचर्यं च ते महत् ॥ २ ॥
ब्रह्मर्षे! तुम पितृभक्त हो, मेरी शरणमें आये हो और तुमने महान् ब्रह्मचर्यका पालन किया है। इन्हीं सब कारणोंसे तुम्हें मेरे साक्षात् स्वरूपका दर्शन हुआ ॥ २ ॥
अपां नारा इति पुरा संज्ञाकर्म कृतं मया ।
तेन नारायणोऽप्युक्तो मम तत् त्वयनं सदा ॥ ३ ॥
पूर्वकालमें मैंने ही जलका 'नारा' नाम रखा था। वह 'नारा' मेरा सदा अयन (वासस्थान) है, इसलिये मैं 'नारायण' नामसे विख्यात हूँ ॥ ३ ॥
अहं नारायणो नाम प्रभवः शाश्वतोऽव्ययः ।
विधाता सर्वभूतानां संहर्ता च द्विजोत्तम ॥ ४ ॥
अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शक्रश्चाहं सुराधिपः ।
अहं वैश्रवणो राजा यमः प्रेताधिपस्तथा ॥ ५ ॥
मैं नारायण ही सबकी उत्पत्तिका कारण, सनातन और अविनाशी हूँ। द्विजश्रेष्ठ! सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि और संहार करनेवाला भी मैं ही हूँ। मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही ब्रह्मा हूँ, मैं ही देवराज इन्द्र हूँ और मैं ही राजा कुबेर तथा प्रेतराज यम हूँ ॥ ४-५ ॥
अहं शिवश्च सोमश्च कश्यपोऽथ प्रजापतिः ।
अहं धाता विधाता च यज्ञश्चाहं द्विजोत्तम ॥ ६ ॥
विप्रवर! मैं ही शिव, चन्द्रमा, प्रजापति कश्यप, धाता, विधाता और यज्ञ हूँ ॥ ६ ॥
अग्निरास्यं क्षितिः पादौ चन्द्रादित्यौ च लोचने ।
द्यौर्मूर्धा खं दिशः श्रोत्रे तथाऽपः स्वेदसम्भवाः ॥ ७ ॥
सदिशं च नभः कायो वायुर्मनसि मे स्थितः ।
मया क्रतुशतैरिष्टं बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः ॥ ८ ॥
अग्नि मेरा मुख है, पृथ्वी चरण हैं, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं। द्युलोक मेरा मस्तक है। आकाश और दिशाएँ मेरे कान हैं तथा जल मेरे शरीरके पसीनेसे प्रकट हुआ है। दिशाओंसहित आकाश मेरा शरीर है। वायु मेरे मनमें स्थित है। मैंने पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अनेक शत यज्ञोंद्वारा यजन किया है ॥ ७-८ ॥
यजन्ते वेदविदुषो मां देवयजने स्थितम् ।
पृथिव्यां क्षत्रियेन्द्राश्च पार्थिवाः स्वर्गकाङ्क्षिणः ॥ ९ ॥
यजन्ते मां तथा वैश्याः स्वर्गलोकजिगीषया ।
चतुःसमुद्रपर्यन्तां मेरुमन्दरभूषणां ॥ १० ॥
शेषो भूत्वाहमेवैतां धारयामि वसुन्धराम् ।
वेदवेत्ता ब्राह्मण देवयज्ञमें स्थित मुझ यज्ञपुरुषका यजन करते हैं। पृथ्वीका पालन करनेवाले क्षत्रियनरेश स्वर्गप्राप्तिकी अभिलाषासे इस भूतलपर यज्ञोंद्वारा मेरा यजन करते हैं। इसी प्रकार वैश्य भी स्वर्गलोकपर विजय पानेकी इच्छासे मेरी सेवा-पूजा करते हैं। मैं ही शेषनाग होकर मेरुमन्दरसे विभूषित तथा चारों समुद्रोंसे घिरी हुई इस वसुन्धराको अपने सिरपर धारण करता हूँ ॥ ९-१० १/२ ॥
वाराहं रूपमास्थाय मयेयं जगती पुरा ॥ ११ ॥
मज्जमाना जले विप्र वीर्येणासीत् समुद्धृता ।
अग्निश्च वडवावक्त्रो भूत्वाहं द्विजसत्तम ॥ १२ ॥
पिबाम्यपः सदा विद्वंस्ताश्चैवं विसृजाम्यहम् ।
ब्रह्म वक्त्रं भुजौ क्षत्रमूरू मे संस्थिता विशः ॥ १३ ॥
विप्रवर! पूर्वकालमें जब यह पृथ्वी जलमें डूब गयी थी, उस समय मैंने ही वाराहरूप धारण करके इसे बलपूर्वक जलसे बाहर निकाला था। विद्वन्! मैं ही बडवामुख अग्नि होकर सदा समुद्रके जलको पीता हूँ और फिर उस जलको बरसा देता हूँ। ब्राह्मण मेरा मुख है, क्षत्रिय दोनों भुजाएँ हैं और वैश्य मेरी दोनों जाँघोंके रूपमें स्थित हैं ॥ ११—१३ ॥
पादौ शूद्रा भवन्तीमे विक्रमेण क्रमेण च ।
ऋग्वेदः सामवेदश्च यजुर्वेदोऽप्यथर्वणः ॥ १४ ॥
मत्तः प्रादुर्भवन्त्येते मामेव प्रविशन्ति च ।
ये शूद्र मेरे दोनों चरण हैं। मेरी शक्तिसे क्रमशः इनका प्रादुर्भाव हुआ है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये मुझसे ही प्रकट होते और मुझमें ही लीन हो जाते हैं ॥ १४ १/२ ॥
यतयः शान्तिपरमा यतात्मानो बुभुत्सवः ॥ १५ ॥
कामक्रोधद्वेषमुक्ता निःसंगा वीतकल्मषाः ।
सत्त्वस्था निरहङ्कारा नित्यमध्यात्मकोविदाः ॥ १६ ॥
मामेव सततं विप्राश्चिन्तयन्त उपासते ।
शान्तिपरायण, संयमी, जिज्ञासु, काम-क्रोध-द्वेषरहित आसक्तिशून्य, निष्पाप, सात्त्विक, नित्य अहंकारशून्य तथा अध्यात्मज्ञानकुशल यति एवं ब्राह्मण सदा मेरा ही चिन्तन करते हुए उपासना करते हैं ॥ १५-१६½ ॥
अहं संवर्तको वह्निरहं संवर्तकोऽनलः ॥ १७ ॥
अहं संवर्तकः सूर्यस्त्वहं संवर्तकोऽनिलः ।
तारारूपाणि दृश्यन्ते यान्येतानि नभस्तले ॥ १८ ॥
मम वै रोमकूपाणि विद्धि त्वं द्विजसत्तम ।
रत्नाकराः समुद्राश्च सर्व एव चतुर्दिशम् ॥ १९ ॥
वसनं शयनं चैव निलयं चैव विद्धि मे ।
मयैव सुविभक्तास्ते देवकार्यार्थसिद्धये ॥ २० ॥
मैं ही संवर्तक (प्रलयका कारण) वह्नि हूँ। मैं ही संवर्तक अनल हूँ। मैं ही संवर्तक सूर्य हूँ और मैं ही संवर्तक वायु हूँ। द्विजश्रेष्ठ! आकाशमें जो ये तारे दिखायी देते हैं उन सबको मेरे ही रोमकूप समझो। रत्नाकर समुद्र और चारों दिशाओंको मेरे वस्त्र, शय्या और निवासस्थान जानो। मैंने ही देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये इनकी पृथक्-पृथक् रचना की है ॥ १७—२० ॥
कामं क्रोधं च हर्षं च भयं मोहं तथैव च ।
ममैव विद्धि रोमाणि सर्वाण्येतानि सत्तम ॥ २१ ॥
साधुशिरोमणे! काम, क्रोध, हर्ष, भय और मोह—इन सभी विकारोंको मेरी ही रोमावली समझो ॥ २१ ॥
प्राप्नुवन्ति नरा विप्र यत् कृत्वा कर्म शोभनम् ।
सत्यं दानं तपश्चोग्रमहिंसा चैव जन्तुषु ॥ २२ ॥
मद्विधानेन विहिता मम देहविहारिणः ।
मयाऽऽविर्भूतविज्ञाना विचेष्टन्ते न कामतः ॥ २३ ॥
ब्रह्मन्! जिस शुभ कर्मोंके आचरणसे मनुष्यको कल्याणकी प्राप्ति होती है, वे सत्य, दान, उग्र तपस्या और किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेका स्वभाव—ये सब मेरे ही विधानसे निर्मित हुए हैं और मेरे ही शरीरमें विहार करते हैं। मैं समस्त प्राणियोंके ज्ञानको जब प्रकट कर देता हूँ, तभी वे चेष्टाशील होते हैं, अन्यथा अपनी इच्छासे वे कुछ नहीं कर सकते ॥ २२-२३ ॥
सम्यग् वेदमधीयाना यजन्ते विविधैर्मखैः ।
शान्तात्मानो जितक्रोधाः प्राप्नुवन्ति द्विजातयः ॥ २४ ॥
जो द्विजाति अच्छी तरह वेदोंका अध्ययन करके शान्तचित्त और क्रोधशून्य होकर नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा मेरी आराधना करते हैं, उन्हें ही मेरी प्राप्ति होती है ॥ २४ ॥ प्राप्तुं न शक्यो यो विद्वन् नरैर्दुष्कृतकर्मभिः । लोभाभिभूतैः कृपणैरनार्यैरकृतात्मभिः ॥ २५ ॥ तं मां महाफलं विद्धि नराणां भावितात्मनाम् । सुदुष्प्रापं विमूढानां मार्गं योगैर्निषेवितम् ॥ २६ ॥ विद्वन्! पापकर्मा, लोभी, कृपण, अनार्य और अजितात्मा मनुष्य जिसे कभी नहीं पा सकते वह महान् फल मुझे ही समझो। मैं ही शुद्ध अन्तःकरणवाले मानवोंको सुलभ होनेवाला योगसेवित मार्ग हूँ। मूढ़ मनुष्योंके लिये मैं सर्वथा दुर्लभ हूँ ॥ २५-२६ ॥ यदा यदा च धर्मस्य ग्लानिर्भवति सत्तम । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥ २७ ॥ दैत्या हिंसानुरक्ताश्च अवध्याः सुरसत्तमैः । राक्षसाश्चापि लोकेऽस्मिन् यदोत्पत्स्यन्ति दारुणाः ॥ २८ ॥ तदाहं सम्प्रसूयामि गृहेषु शुभकर्मणाम् । प्रविष्टो मानुषं देहं सर्वं प्रशमयाम्यहम् ॥ २९ ॥ महर्षे! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मका उत्थान होता है, तब-तब मैं अपने-आपको प्रकट करता हूँ। जब हिंसाप्रेमी दैत्य श्रेष्ठ देवताओंके लिये अवध्य हो जाते हैं तथा भयानक राक्षस जब इस संसारमें उत्पन्न हो अत्याचार करने लगते हैं तब मैं पुण्यात्मा पुरुषोंके घरोंपर मानवशरीरमें प्रविष्ट होकर प्रकट होता हूँ और उन दैत्यों एवं राक्षसोंका सारा उपद्रव शान्त कर देता हूँ ॥ २७—२९ ॥ सृष्ट्वा देवमनुष्यांस्तु गन्धर्वोरगराक्षसान् । स्थावराणि च भूतानि संहराम्यात्ममायया ॥ ३० ॥ मैं ही अपनी मायासे देवता, मनुष्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस तथा स्थावर प्राणियोंकी सृष्टि करके समय आनेपर पुनः उनका संहार कर डालता हूँ ॥ ३० ॥ कर्मकाले पुनर्देहमविचिन्त्यं सृजाम्यहम् । आविश्य मानुषं देहं मर्यादाबन्धकारणात् ॥ ३१ ॥ फिर सृष्टि-रचनाके समय मैं अचिन्त्यस्वरूप धारण करता हूँ; तथा मर्यादाकी स्थापना एवं रक्षाके लिये मानव-शरीरसे अवतार लेता हूँ ॥ ३१ ॥ श्वेतः कृतयुगे वर्णः पीतस्त्रेतायुगे मम । रक्तो द्वापरमासाद्य कृष्णः कलियुगे तथा ॥ ३२ ॥ सत्ययुगमें मेरे शरीरका रंग श्वेत, त्रेतामें पीला, द्वापरमें लाल और कलियुगमें काला होता है ॥ ३२ ॥ त्रयो भागा ह्यधर्मस्य तस्मिन् काले भवन्ति च ।
अन्तकाले च सन्प्राप्ते कालो भूत्वातिदारुणः ॥ ३३ ॥
त्रैलोक्यं नाशयाम्येकः कृत्स्नं स्थावरजङ्गमम् ।
उस कलिकालमें तीन हिस्सा अधर्म और एक ही हिस्सा धर्म रहता है। प्रलयकाल आनेपर मैं ही अत्यन्त दारुण कालरूप होकर अकेला ही सम्पूर्ण चराचर त्रिलोकीका नाश करता हूँ ॥ ३३ १/२ ॥
अहं त्रिवर्त्मा विश्वात्मा सर्वलोकसुखावहः ॥ ३४ ॥
आविर्भूः सर्वगोऽनन्तो हृषीकेश उरुक्रमः ।
कालचक्रं नयाम्येको ब्रह्मन्नहमरूपकम् ॥ ३५ ॥
शमनं सर्वभूतानां सर्वलोककृतोद्यमम् ।
एवं प्रणिहितः सम्यङ् ममात्मा मुनिसत्तम ।
सर्वभूतेषु विप्रेन्द्र न च मां वेत्ति कश्चन ॥ ३६ ॥
मैं तीनों लोकोंमें व्याप्त, सम्पूर्ण विश्वका आत्मा, सब लोगोंको सुख पहुँचानेवाला, सबकी उत्पत्तिका कारण, सर्वव्यापी, अनन्त, इन्द्रियोंका नियन्ता और महान् विक्रमशाली हूँ। ब्रह्मन्! यह जो सम्पूर्ण भूतोंका संहार करनेवाला और सबको उद्योगशील बनानेवाला अव्यक्त कालचक्र है, इसका संचालन केवल मैं ही करता हूँ। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार मेरा स्वरूपभूत आत्मा ही सर्वत्र सब प्राणियोंके भीतर भलीभाँति स्थित है। विप्रवर! इतनेपर भी मुझे कोई जानता नहीं है ॥ ३४-३६ ॥
सर्वलोके च मां भक्ताः पूजयन्ति च सर्वशः ।
यच्च किंचित् त्वया प्राप्तं मयि क्लेशात्मकं द्विज ॥ ३७ ॥
सुखोदयाय तत् सर्वं श्रेयसे च तवानघ ।
यच्च किंचित् त्वया लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम् ॥ ३८ ॥
विहितः सर्वथैवासी ममात्मा भूतभावनः ।
अर्धं मम शरीरस्य सर्वलोकपितामहः ॥ ३९ ॥
समस्त जगत्में भक्त पुरुष सब प्रकारसे मेरी आराधना करते हैं। तुमने मेरे निकट आकर जो कुछ भी क्लेश उठाया है, ब्रह्मन्! वह सब तुम्हारे भावी कल्याण और सुखका साधक है। अनघ! लोकमें तुमने जो कोई भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखा है, उसके रूपमें सर्वथा मेरा भूत-भावन आत्मा ही प्रकट हुआ है। सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्मा मेरा आधा अंग हैं ॥ ३७—३९ ॥
अहं नारायणो नाम शङ्खचक्रगदाधरः ।
यावद्युगानां विप्रर्षे सहस्रपरिवर्तनात् ॥ ४० ॥
तावत् स्वपिमि विश्वात्मा सर्वभूतानि मोहयन् ।
एवं सर्वमहं कालमिहास्से मुनिसत्तम ॥ ४१ ॥
अशिशुः शिशुरूपेण यावद्ब्रह्मा न बुध्यते ।
ब्रह्मर्षे! मैं शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाला विश्वात्मा नारायण हूँ, सहस्र युगके अन्तमें जो प्रलय होता है वह जबतक रहता है, तबतक सब प्राणियोंको (महानिद्रारूप मायासे) मोहित करके मैं (जलमें) शयन करता हूँ। मुनिश्रेष्ठ! यद्यपि मैं बालक नहीं हूँ, तो भी जबतक ब्रह्मा नहीं जागते, तबतक सदा इसी प्रकार बालकरूप धारण करके यहाँ रहता हूँ॥ ४०-४१ ½ ॥
मया च दत्तो विप्राग्र्य वरस्ते ब्रह्मरूपिणा ॥ ४२ ॥ असकृत् परितुष्टेन विप्रर्षिगणपूजित । सर्वमेकार्णवं दृष्ट्वा नष्टं स्थावरजङ्गमम् ॥ ४३ ॥ विकलवोऽसि मया ज्ञातस्ततस्ते दर्शितं जगत् । अभ्यन्तरं शरीरस्य प्रविष्टोऽसि यदा मम ॥ ४४ ॥ दृष्ट्वा लोकं समस्तं च विस्मितो नावबुध्यसे । ततोऽसि वक्त्राद् विप्रर्षे द्रुतं निःसारितो मया ॥ ४५ ॥
विप्रशिरोमणे! तुम ब्रह्मर्षियोंद्वारा पूजित हो। मैंने ही ब्रह्मारूपसे तुम्हारे ऊपर बार-बार संतुष्ट हो तुम्हें अभीष्ट वर प्रदान किया है। मैंने समझ लिया था कि तुम सम्पूर्ण चराचर जगत्को नष्ट तथा एकार्णवमें निमग्न हुआ देखकर व्याकुल हो रहे हो। इसीलिये तुम्हें पुनः जगत्का दर्शन कराया है। ब्रह्मर्षे! जब तुम मेरे शरीरके भीतर प्रविष्ट हुए थे और समस्त संसारको देखकर विस्मय-विमुग्ध हो फिर सचेत नहीं हो पा रहे थे, तब मैंने तुरंत तुम्हें मुखसे बाहर निकाल दिया था ॥ ४२—४५ ॥
आख्यातस्ते मया चात्मा दुर्ज्ञेयो हि सुरासुरैः ॥ ४६ ॥ यावत् स भगवान् ब्रह्मा न बुध्येत महातपाः । तावत् त्वमिह विप्रर्षे विश्रब्धश्चर वै सुखम् ॥ ४७ ॥
ब्रह्मर्षे! इस प्रकार मैंने तुम्हें अपने स्वरूपका उपदेश किया है, जिसका जानना देवता और असुरोंके लिये भी कठिन है। जबतक महातपस्वी भगवान् ब्रह्माका जागरण न हो, तबतक तुम श्रद्धा और विश्वासपूर्वक सुखसे विचरते रहो ॥ ४६-४७ ॥
ततो विबुद्धे तस्मिंस्तु सर्वलोकपितामहे । एकीभूतो हि स्रक्ष्यामि शरीराणि द्विजोत्तम ॥ ४८ ॥
द्विजश्रेष्ठ! सर्वलोकपितामह ब्रह्माके जागनेपर मैं उनसे एकीभूत हो समस्त शरीरोंकी सृष्टि करूँगा ॥ ४८ ॥
आकाशं पृथिवीं ज्योतिर्वायुं सलिलमेव च । लोके यच्च भवेच्छेषमिह स्थावरजङ्गमम् ॥ ४९ ॥
आकाश, पृथ्वी, अग्नि, वायु और जलका तथा इस संसारमें जो अन्य चराचर वस्तुएँ अवशिष्ट हैं, उन सबका निर्माण करूँगा ॥ ४९ ॥
मार्कण्डेय उवाच
इत्युक्त्वान्तर्हितस्तात स देवः परमाद्भुतः।
प्रजाश्चेमाः प्रपश्यामि विचित्रा विविधाः कृताः॥ ५०॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— तात युधिष्ठिर! ऐसा कहकर वे परम अद्भुत देवता भगवान् बालमुकुन्द अन्तर्धान हो गये। उनके अन्तर्धान होते ही मैंने देखा कि यह नाना प्रकारकी विचित्र प्रजा ज्यों-की-त्यों उत्पन्न हो गयी है॥ ५०॥
एवं दृष्टं मया राजंस्तस्मिन् प्राप्ते युगक्षये।
आश्चर्यं भरतश्रेष्ठ सर्वधर्मभृतां वर॥ ५१॥
सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भरतकुल-तिलक युधिष्ठिर! इस प्रकार उस प्रलयकालके आनेपर मुझे यह आश्चर्यजनक अनुभव हुआ था॥ ५१॥
यः स देवो मया दृष्टः पुरा पद्मायतेक्षणः।
स एष पुरुषव्याघ्र सम्बन्धी ते जनार्दनः॥ ५२॥
नरश्रेष्ठ! पुरातन प्रलयके समय मुझे जिन कमल-दललोचन देवता भगवान् बालमुकुन्दका दर्शन हुआ था, तुम्हारे सम्बन्धी ये भगवान् श्रीकृष्ण वे ही हैं॥ ५२॥
अस्यैव वरदानाद्धि स्मृतिर्न प्रजहाति माम्।
दीर्घमायुश्च कौन्तेय स्वच्छन्दमरणं मम॥ ५३॥
कुन्तीनन्दन! इन्हींके वरदानसे मुझे पूर्वजन्मकी स्मृति भूलती नहीं है। मेरी दीर्घकालीन आयु और स्वच्छन्द मृत्यु भी इन्हींकी कृपाका प्रसाद है॥ ५३॥
स एष कृष्णो वार्ष्णेयः पुराणपुरुषो विभुः।
आस्ते हरिरचिन्त्यात्मा क्रीडन्निव महाभुजः॥ ५४॥
ये वृष्णिकुल-भूषण महाबाहु श्रीकृष्ण ही वे सर्वव्यापी, अचिन्त्यस्वरूप, पुराण-पुरुष श्रीहरि हैं जो पहले बालरूपमें मुझे दिखायी दिये थे। वे ही यहाँ अवतीर्ण हो भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करते हुए-से दीख रहे हैं॥ ५४॥
एष धाता विधाता च संहर्ता चैव शाश्वतः।
श्रीवत्सवक्षा गोविन्दः प्रजापतिपतिः प्रभुः॥ ५५॥
श्रीवत्सचिह्न जिनके वक्षःस्थलकी शोभा बढ़ाता है, वे भगवान् गोविन्द ही इस विश्वकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले, सनातन प्रभु और प्रजापतियोंके भी पति हैं॥ ५५॥
दृष्ट्वेमं वृष्णिप्रवरं स्मृतिर्मामियमागता।
आदिदेवमयं जिष्णुं पुरुषं पीतवाससम्॥ ५६॥
इन आदिदेवस्वरूप, विजयशील, पीताम्बरधारी पुरुष वृष्णिकुल-भूषण श्रीकृष्णको देखकर मुझे इस पुरातन घटनाकी स्मृति हो आयी है॥ ५६॥
सर्वेषामेव भूतानां पिता माता च माधवः।
गच्छध्वमेनं शरणं शरण्यं कौरवर्षभाः॥ ५७॥
कुरुकुलश्रेष्ठ पाण्डवो! ये माधव ही समस्त प्राणियोंके पिता और माता हैं। ये ही सबको शरण देनेवाले हैं। अतः तुम सब लोग इन्हींकी शरणमें जाओ ।। ५७ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ताश्च ते पार्था यमौ च पुरुषर्षभौ ।
द्रौपद्या सहिताः सर्वे नमश्चक्रुर्जनार्दनम् ।। ५८ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! मार्कण्डेय मुनिके ऐसा कहनेपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन तथा पुरुषरत्न नकुल-सहदेव—इन सबने द्रौपदीसहित उठकर भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रणाम किया ।। ५८ ।।
स चैतान् पुरुषव्याघ्र साम्ना परमवल्गुना ।
सान्त्वयामास मानार्हो मन्यमानो यथाविधि ।। ५९ ।।
नरश्रेष्ठ! फिर सम्माननीय श्रीकृष्णने भी इन सबका विधिपूर्वक समादर करते हुए परम मधुर सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा इन्हें सब प्रकारसे आश्वासन दिया ।। ५९ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि भविष्यकथने
एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें भविष्यकथनविषयक एक सौ नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८९ ।।
युगान्तकालिक कलियुगके समयके बर्तावका तथा कल्कि-अवतारका वर्णन
नवत्यधिकशततमोऽध्यायः
युगान्तकालिक कलियुगके समयके बर्तावका तथा कल्कि-अवतारका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरस्तु कौन्तेयो मार्कण्डेयं महामुनिम्।
पुनः पप्रच्छ साम्राज्ये भविष्यां जगतो गतिम्॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने महामुनि मार्कण्डेयसे अपने साम्राज्यमें जगत्की भावी गतिविधिके विषयमें पुनः इस प्रकार प्रश्न किया॥ १॥
युधिष्ठिर उवाच
आश्चर्यभूतं भवतः श्रुतं नो वदतां वर।
मुने भार्गव यद् वृत्तं युगादौ प्रभवात्ययम्॥ २॥
युधिष्ठिर बोले— वक्ताओंमें श्रेष्ठ! भृगुवंशविभूषण महर्षे! हमने आपके मुखसे युगके आदिमें संघटित हुई उत्पत्ति और प्रलयके सम्बन्धमें बड़े आश्चर्यकी बातें सुनी हैं॥ २॥
अस्मिन् कलियुगे त्वस्ति पुनः कौतूहलं मम।
समाकुलेषु धर्मेषु किं नु शेषं भविष्यति॥ ३॥
अब मुझे इस कलियुगके विषयमें पुनः विशेषरूपसे सुननेका कुतूहल हो रहा है। जब सारे धर्मोंका उच्छेद हो जायगा, उस समय क्या शेष रह जायगा?॥ ३॥
किंवीर्या मानवास्तत्र किमाहारविहारिणः।
किमायुषः किंवसना भविष्यन्ति युगक्षये॥ ४॥
युगान्तकालमें कलियुगके मनुष्योंका बल-पराक्रम कैसा होगा? उनके आहार-विहार कैसे होंगे? उनकी आयु कितनी होगी और उनके परिधान—वस्त्राभूषण कैसे होंगे॥ ४॥
कां च काष्ठां समासाद्य पुनः सम्पत्स्यते कृतम्।
विस्तरेण मुने ब्रूहि विचित्राणीह भाषसे॥ ५॥
कलियुगके किस सीमातक पहुँच जानेपर पुनः सत्ययुग आरम्भ हो जायगा? मुने! इन सब बातोंका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये; क्योंकि आपकी कथा बड़ी विचित्र होती है॥ ५॥
इत्युक्तः स मुनिश्रेष्ठः पुनरेवाभ्यभाषत।
रमयन् वृष्णिशार्दूलं पाण्डवांश्च महानृषिः॥ ६॥
युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर मुनिश्रेष्ठ महर्षि मार्कण्डेयने वृष्णिप्रवर श्रीकृष्ण तथा पाण्डवोंको आनन्दित करते हुए पुनः इस प्रकार कहा— ।। ६ ।।
मार्कण्डेय उवाच
शृणु राजन् मया दृष्टं यत् पुरा श्रुतमेव च । अनुभूतं च राजेन्द्र देवदेवप्रसादजम् ।। ७ ।। भविष्यं सर्वलोकस्य वृत्तान्तं भरतर्षभ । कलुषं कालमासाद्य कथ्यमानं निबोध मे ।। ८ ।। **मार्कण्डेय बोले—**भरतश्रेष्ठ राजन्! मैंने देवाधिदेव भगवान् बालमुकुन्दकी कृपासे पूर्वकालमें, निकृष्ट कलिकालके प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण लोकोंके भावी वृत्तान्तके विषयमें जो कुछ देखा-सुना या अनुभव किया है, वह बताता हूँ, सुनो और समझो ।। ७-८ ।।
कृते चतुष्पात् सकलो निर्व्याजोपाधिवर्जितः । वृषः प्रतिष्ठितो धर्मो मनुष्ये भरतर्षभ ।। ९ ।। भरतश्रेष्ठ! सत्ययुगमें मनुष्योंके भीतर वृषरूप धर्म अपने चारों पादोंसे युक्त होनेके कारण सम्पूर्ण रूपमें प्रतिष्ठित होता है। उसमें छल-कपट या दम्भ नहीं होता ।। ९ ।।
अधर्मपादविद्धस्तु त्रिभिरंशैः प्रतिष्ठितः । त्रेतायां द्वापरेऽर्धेन व्यामिश्रो धर्म उच्यते ।। १० ।। किंतु त्रेतामें वह धर्म अधर्मके एक पादसे अभिभूत होकर अपने तीन अंशोंसे ही प्रतिष्ठित होता है। द्वापरमें धर्म आधा ही रह जाता है। आधेमें अधर्म आकर मिल जाता है ।। १० ।।
त्रिभिरंशैरधर्मस्तु लोकानाक्रम्य तिष्ठति । तामसं युगमासाद्य तदा भरतसत्तम ।। ११ ।। चतुर्थांशेन धर्मस्तु मनुष्यानुपतिष्ठति । आयुर्वीर्यमथो बुद्धिर्बलं तेजश्च पाण्डव ।। १२ ।। मनुष्याणामनुयुगं ह्रसतीति निबोध मे । राजानो ब्राह्मणा वैश्याः शूद्राश्चैव युधिष्ठिर ।। १३ ।। व्याजैर्धर्मं चरिष्यन्ति धर्मवैतंसिका नराः । सत्यं संक्षेप्स्यते लोके नरैः पण्डितमानिभिः ।। १४ ।। परंतु भरतश्रेष्ठ! कलियुग आनेपर अधर्म अपने तीन अंशोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंको आक्रान्त करके स्थित होता है और धर्म केवल एक पादसे मनुष्योंमें प्रतिष्ठित होता है। पाण्डुनन्दन! प्रत्येक युगमें मनुष्योंकी आयु, वीर्य, बुद्धि, बल तथा तेज क्रमशः घटते जाते हैं। युधिष्ठिर! अब कलियुगके समयका वर्णन सुनो। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी जातियोंके लोग कपटपूर्वक धर्मका आचरण करेंगे और धर्मका जाल बिछाकर दूसरे
लोगोंको ठगते रहेंगे। अपनेको पण्डित माननेवाले लोग सत्यका त्याग कर देंगे ।। ११—१४ ।।
सत्यहान्या ततस्तेषामायुरल्पं भविष्यति ।
आयुषः प्रक्षयाद् विद्यां न शक्ष्यन्त्युपजीवितुम् ।। १५ ।।
सत्यकी हानि होनेसे उनकी आयु थोड़ी हो जायगी और आयुकी कमी होनेके कारण वे अपने जीवन-निर्वाहके योग्य विद्या प्राप्त नहीं कर सकेंगे ।। १५ ।।
विद्याहीनानविज्ञानाल्लोभोऽप्यभिभविष्यति ।
लोभक्रोधपरा मूढाः कामासक्ताश्च मानवाः ।। १६ ।।
वैरबद्धा भविष्यन्ति परस्परवधैषिणः ।
विद्याके बिना ज्ञान न होनेसे उन सबको लोभ दबा लेगा। फिर लोभ और क्रोधके वशीभूत हुए मूढ़ मनुष्य कामनाओंमें फँसकर आपसमें वैर बाँध लेंगे और एक-दूसरेके प्राण लेनेकी घातमें लगे रहेंगे ।। १६ १/२ ।।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः संकीर्यन्तः परस्परम् ।। १७ ।।
शूद्रतुल्या भविष्यन्ति तपःसत्यविवर्जिताः ।
अन्त्या मध्या भविष्यन्ति मध्याश्चान्त्या न संशयः ।। १८ ।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—से आपसमें संतानोत्पादन करके वर्णसंकर हो जायँगे। वे सभी तपस्या और सत्यसे रहित हो शूद्रोंके समान हो जायँगे। अन्त्यज (चाण्डाल आदि) क्षत्रिय-वैश्य आदिके कर्म करेंगे और क्षत्रिय-वैश्य आदि चाण्डालोंके कर्म अपना लेंगे, इसमें संशय नहीं है ।। १७-१८ ।।
ईदृशो भविता लोको युगान्ते पर्युपस्थिते ।
वस्त्राणां प्रवरा शाणी धान्यानां कोरदूषकाः ।। १९ ।।
युगान्तकाल आनेपर लोगोंकी ऐसी ही दशा होगी। वस्त्रोंमें सनके बने हुए वस्त्र अच्छे समझे जायँगे। धानोंमें कोदोका आदर होगा ।। १९ ।।
भार्यामित्राश्च पुरुषा भविष्यन्ति युगक्षये ।
मत्स्यामिषेण जीवन्तो दुहन्तश्चाप्यजैडकम् ।। २० ।।
गोषु नष्टासु पुरुषा येऽपि नित्यं धृतव्रताः ।
तेऽपि लोभसमायुक्ता भविष्यन्ति युगक्षये ।। २१ ।।
उस युगक्षयके समय पुरुष केवल स्त्रियोंसे ही मित्रता करनेवाले होंगे। कितने ही लोग मछलीके मांससे जीविका चलायेंगे। गायोंके नष्ट हो जानेके कारण मनुष्य भेड़ और बकरीका भी दूध दुहकर पीयेंगे। जो लोग सदा व्रत धारण करके रहनेवाले हैं, वे भी युगान्त कालमें लोभी हो जायँगे ।। २०-२१ ।।
अन्योन्यं परिमुष्णन्तो हिंसयन्तश्च मानवाः ।
अजपा नास्तिकाः स्तेना भविष्यन्ति युगक्षये ।। २२ ।।