महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
परम दुर्जय शूर सैनिक विपक्षीको मार डालनेकी अभिलाषा लेकर अपने और परायेको भी जान नहीं पाते थे। बहुधा अपने ही पक्षके सैनिक अपने ही योद्धाओंको मारनेके लिये पकड़ लेते थे ॥ १३ ½ ॥ विमर्दः सुमहानासीदल्पानां बहुभिः सह ॥ १४ ॥ कलिङ्गैः सह चेदीनां निषादैश्च विशाम्पते । राजन्! इस प्रकार वहाँ बहुसंख्यक कलिंगों और निषादोंके साथ अल्पसंख्यक चेदिदेशीय सैनिकोंका बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा ॥ १४ ½ ॥ कृत्वा पुरुषकारं तु यथाशक्ति महाबलाः ॥ १५ ॥ भीमसेनं परित्यज्य संन्यवर्तन्त चेदयः । महाबली चेदि सैनिक यथाशक्ति पुरुषार्थ प्रकट करके भीमसेनको छोड़कर भाग चले ॥ १५ ½ ॥ सर्वैः कलिङ्गैरासन्नः संनिवृत्तेषु चेदिषु ॥ १६ ॥ स्वबाहुबलमास्थाय न न्यवर्तत पाण्डवः । न चचाल रथोपस्थाद् भीमसेनो महाबलः ॥ १७ ॥ चेदिदेशीय सैनिकोंके पलायन कर जानेपर समस्त कलिंग भीमसेनके निकट जा पहुँचे; तो भी महाबली पाण्डुनन्दन भीमसेन अपने बाहुबलका भरोसा करके पीछे नहीं हटे और न रथकी बैठकसे तनिक भी विचलित हुए ॥ १६-१७ ॥ शितैर्वाकिरद् बाणैः कलिङ्गानां वरूथिनीम् । कालिङ्गस्तु महेष्वासः पुत्रश्चास्य महारथः ॥ १८ ॥ शक्रदेव इति ख्यातो जघ्नतुः पाण्डवं शरैः । वे कलिंगोंकी सेनापर अपने तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे। महाधनुर्धर कलिंगराज और उसका महारथी पुत्र शक्रदेव दोनों मिलकर पाण्डुनन्दन भीमसेनपर बाणोंका प्रहार करने लगे ॥ १८ ½ ॥ ततो भीमो महाबाहुर्विधुन्वन् रुचिरं धनुः ॥ १९ ॥ योधयामास कालिङ्गं स्वबाहुबलमाश्रितः । तब महाबाहु भीमने अपने बाहुबलका आश्रय लेकर सुन्दर धनुषकी टंकार फैलाते हुए कलिंगराजसे युद्ध आरम्भ किया ॥ १९ ½ ॥ शक्रदेवस्तु समरे विसृजन् सायकान् बहून् ॥ २० ॥ अश्वाञ्जघान समरे भीमसेनस्य सायकैः । शक्रदेवने समरभूमिमें बहुत-से सायकोंकी वर्षा करते हुए उन सायकोंद्वारा भीमसेनके घोड़ोंको मार डाला ॥ २० ½ ॥ तं दृष्ट्वा विरथं तत्र भीमसेनमरिंदमम् ॥ २१ ॥ शक्रदेवोऽभिदुद्राव शरैरवकिरन् शितैः ।
शत्रुदमन भीमसेनको वहाँ रथहीन हुआ देख शक्रदेव तीखे बाणोंकी वर्षा करता हुआ उनकी ओर दौड़ा ॥ २१ १/२ ॥ भीमस्योपरि राजेन्द्र शक्रदेवो महाबलः ॥ २२ ॥ ववर्ष शरवर्षाणि तपान्ते जलदो यथा । राजेन्द्र! जैसे गर्मीके अन्तमें बादल पानीकी बूँदें बरसाता है, उसी प्रकार महाबली शक्रदेव भीमसेनके ऊपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥ २२ १/२ ॥ हताश्वे तु रथे तिष्ठन् भीमसेनो महाबलः ॥ २३ ॥ शक्रदेवाय चिक्षेप सर्वशैक्यायसीं गदाम् । जिसके घोड़े मारे गये थे, उसी रथपर खड़े हुए महाबली भीमसेनने शक्रदेवको लक्ष्य करके सम्पूर्णतः लोहेके सारतत्त्वकी बनी हुई अपनी गदा चलायी ॥ २३ १/२ ॥ स तया निहतो राजन् कालिङ्गतनयो रथात् ॥ २४ ॥ सध्वजः सह सूतेन जगाम धरणीतलम् । राजन्! उस गदाकी चोट खाकर कलिंगराजकुमार प्राणशून्य हो अपने सारथि और ध्वजके साथ ही रथसे नीचे पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २४ १/२ ॥ हतमात्मसुतं दृष्ट्वा कलिङ्गानां जनाधिपः ॥ २५ ॥ रथैरनेकसाहस्रैर्भीमस्यावारयद् दिशः । अपने पुत्रको मारा गया देख कलिंगराजने कई हजार रथोंके द्वारा भीमसेनकी सम्पूर्ण दिशाओंको रोक लिया ॥ २५ १/२ ॥ ततो भीमो महावेगां त्यक्त्वा गुर्वीं महागदाम् ॥ २६ ॥ निस्त्रिंशमाददे घोरं चिकीर्षुः कर्म दारुणम् । चर्म चाप्रतिमं राजन्नार्षभं पुरुषर्षभ ॥ २७ ॥ नक्षत्रैरर्धचन्द्रैश्च शातकुम्भमयैश्चितम् । नरश्रेष्ठ! तब भीमसेनने अत्यन्त वेगशालिनी एवं भारी और विशाल गदाको वहीं छोड़कर अत्यन्त भयंकर कर्म करनेकी इच्छासे तलवार खींच ली तथा ऋषभके चमड़ेकी बनी हुई अनुपम ढाल हाथमें ले ली। राजन्! उस ढालमें सुवर्णमय नक्षत्र और अर्धचन्द्रके आकारकी फूलियाँ जड़ी हुई थीं ॥ २६-२७ १/२ ॥ कालिङ्गस्तु ततः क्रुद्धो धनुर्ज्यामवमृज्य च ॥ २८ ॥ प्रगृह्य च शरं घोरमेकं सर्पविषोपमम् । प्राहिणोद् भीमसेनाय वधाकाङ्क्षी जनेश्वरः ॥ २९ ॥ इधर क्रोधमें भरे हुए कलिंगराजने धनुषकी प्रत्यंचाको रगड़कर सर्पके समान विषैला एक भयंकर बाण हाथमें लिया और भीमसेनके वधकी इच्छासे उनपर चलाया ॥ २८-२९ ॥ तमापतन्तं वेगेन प्रेरितं निशितं शरम् ।
भीमसेनो द्विधा राजंश्छिच्छेद विपुलासिना ।। ३० ।।
उदक्रोशच्च संहृष्टस्त्रासयानो वरूथिनीम् ।
राजन्! भीमसेनने अपने विशाल खड्गसे उसके वेगपूर्वक चलाये हुए तीखे बाणके दो टुकड़े कर दिये और कलिंगोंकी सेनाको भयभीत करते हुए हर्षमें भरकर बड़े जोरसे सिंहनाद किया ।। ३० १/२ ।।
कालिङ्गोऽथ ततः क्रुद्धो भीमसेनाय संयुगे ।। ३१ ।।
तोमरान् प्राहिणोच्छीघ्रं चतुर्दश शिलाशितान् ।
तब कलिंगराजने रणक्षेत्रमें अत्यन्त कुपित हो भीमसेनपर तुरंत ही चौदह तोमरोंका प्रहार किया, जिन्हें सानपर चढ़ाकर तेज किया गया था ।। ३१ १/२ ।।
तानप्राप्तान् महाबाहुः खगतानेव पाण्डवः ।। ३२ ।।
चिच्छेद सहसा राजन्नसम्भ्रान्तो वरासिना ।
राजन्! वे तोमर अभी भीमसेनतक पहुँच ही नहीं पाये थे कि उन महाबाहु पाण्डुकुमारने बिना किसी घबराहटके अपनी अच्छी तलवारसे सहसा उन्हें आकाशमें ही काट डाला ।। ३२ १/२ ।।
निकृत्य तु रणे भीमस्तोमरान् वै चतुर्दश ।। ३३ ।।
भानुमन्तं ततो भीमः प्राद्रवत् पुरुषर्षभः ।
इस प्रकार पुरुषश्रेष्ठ भीमसेनने रणक्षेत्रमें उन चौदह तोमरोंको काटकर भानुमान्पर धावा किया ।। ३३ १/२ ।।
भानुमांस्तु ततो भीमं शरवर्षेण छादयन् ।। ३४ ।।
ननाद बलवन्नादं नादयानो नभस्तलम् ।
यह देख भानुमान्ने अपने बाणोंकी वर्षासे भीमसेनको आच्छादित करके आकाशको प्रतिध्वनित करते हुए बड़े जोरसे गर्जना की ।। ३४ १/२ ।।
न च तं ममृषे भीमः सिंहनादं महाहवे ।। ३५ ।।
ततः शब्देन महता विननाद महास्वनः ।
तेन नादेन वित्रस्ता कलिङ्गानां वरूथिनी ।। ३६ ।।
भीमसेन उस महासमरमें भानुमान्की वह गर्जना न सह सके। उन्होंने और भी अधिक जोरसे सिंहके समान दहाड़ना आरम्भ किया। उनकी उस गर्जनासे कलिंगोंकी वह विशाल वाहिनी संत्रस्त हो उठी ।। ३५-३६ ।।
न भीमं समरे मेने मानुषं भरतर्षभ ।
ततो भीमो महाबाहुर्नर्दित्वा विपुलं स्वनम् ।। ३७ ।।
सासिवेगवदाप्लुत्य दन्ताभ्यां वारणोत्तमम् ।
आरुरोह ततो मध्यं नागराजस्य मारिष ।। ३८ ।।
भरतश्रेष्ठ! उस सेनाके सैनिकोंने भीनसेनको युद्धमें मनुष्य नहीं, कोई देवता समझा। आर्य! तदनन्तर महाबाहु भीमसेन जोर-जोरसे गर्जना करके हाथमें तलवार लिये वेगपूर्वक उछलकर गजराजके दाँतोंके सहारे उसके मस्तकपर चढ़ गये ॥ ३७-३८ ॥
ततो मुमोच कालिङ्गः शक्तिं तामकरोद् द्विधा ।
खड्गेन पृथुना मध्ये भानुमन्तमथाच्छिनत् ॥ ३९ ॥
इतनेहीमें कलिंगराजकुमारने उनके ऊपर शक्ति चलायी; किंतु भीमसेनने उसके दो टुकड़े कर दिये और अपने विशाल खड्गसे भानुमान्के शरीरको बीचसे काट डाला ॥ ३९ ॥
सोऽन्तर्रायुधिनं हत्वा राजपुत्रमरिंदमः ।
गुरुं भारसहं स्कन्धे नागस्यासिमपातयत् ॥ ४० ॥
इस प्रकार गजारूढ़ होकर युद्ध करनेवाले कलिंगराजकुमारको मारकर शत्रुदमन भीमसेनने भार सहनेमें समर्थ अपनी भारी तलवारको उस हाथीके कंधेपर भी दे मारा ॥ ४० ॥
छिन्नस्कन्धः स विनदन् पपात गजयूथपः ।
आरुग्णः सिन्धुवेगेन सानुमानिव पर्वतः ॥ ४१ ॥
कंधा कट जानेसे वह गजयूथपति चिग्घाड़ता हुआ समुद्रके वेगसे भग्न होकर गिरनेवाले शिखरयुक्त पर्वतके समान धराशायी हो गया ॥ ४१ ॥
ततस्तस्मादवप्लुत्य गजाद् भारत भारतः ।
खड्गपाणिरदीनात्मा तस्थौ भूमौ सुदंशितः ॥ ४२ ॥
भारत! फिर कवचधारी, खड्गपाणि, उदारचित्त, भरतवंशी भीमसेन उस हाथीसे सहसा कूदकर धरतीपर खड़े हो गये ॥ ४२ ॥
स चचार बहून् मार्गानभितः पातयन् गजान् । अग्निचक्रमिवाविद्धं सर्वतः प्रत्यदृश्यत ॥ ४३ ॥ फिर दोनों ओर घूम-घूमकर हाथियोंको गिराते हुए वे अनेक मार्गोंसे विचरण करने लगे। उस समय घूमते हुए अलातचक्रकी भाँति वे सब ओर दिखायी देते थे ॥ ४३ ॥
अश्ववृन्देषु नागेषु रथानीकेषु चाभिभूः । पदातीनां च संघेषु विनिघ्नन् शोणितोक्षितः ॥ ४४ ॥ शक्तिशाली भीमसेन घोड़ों, हाथियों, रथों और पैदलोंके समूहोंमें घुसकर सबका संहार करते हुए रक्तसे भीग गये ॥ ४४ ॥
श्येनवद् व्यचरद् भीमो रणेऽरिषु बलोत्कटः । छिन्दंस्तेषां शरीराणि शिरांसि च महाबलः ॥ ४५ ॥ प्रचण्डबलवाले महान् शक्तिशाली भीमसेन शत्रुओंके समूहमें घुसकर उनके शरीर और मस्तक काटते हुए बाज पक्षीकी तरह रणभूमिमें विचरने लगे ॥ ४५ ॥
खड्गेन शितधारेण संयुगे गजयोधिनाम् । पदातिरेकः संक्रुद्धः शत्रूणां भयवर्धनः ॥ ४६ ॥ सम्मोहयामास स तान् कालान्तकयमोपमः । उस रण-क्षेत्रमें गजारूढ़ होकर युद्ध करनेवाले योद्धाओंके मस्तकोंको अपनी तीखी धारवाली तलवारसे काटते हुए वे अकेले ही क्रोधमें भरकर पैदल विचरते और शत्रुओंके भयको बढ़ाते थे। उन्होंने प्रलयकालीन यमराजके समान भयंकर रूप धारण करके उन सबको भयसे मोहित कर दिया था ॥ ४६ १/२ ॥
मूढाश्च ते तमेवाजौ विनदन्तः समाद्रवन् ॥ ४७ ॥ सासिमुत्तमवेगेन विचरन्तं महारणे । वे मूढ़ सैनिक गर्जना करते हुए उन्हींके पास दौड़े चले आते (और मारे जाते) थे। भीमसेन हाथमें तलवार लिये उस महान् संग्राममें बड़े वेगसे विचरण करते थे ॥ ४७ १/२ ॥
निकृत्य रथिनां चाजौ रथेषांश्च युगानि च ॥ ४८ ॥ जघान रथिनश्चापि बलवान् रिपुमर्दनः । शत्रुओंका मर्दन करनेवाले बलवान् भीम युद्धमें रसारोहियोंके रथोंके ईषादण्ड और जूए काटकर उन रथियोंका भी संहार कर डालते थे ॥ ४८ १/२ ॥
भीमसेनश्चरन् मार्गान् सुबहून् प्रत्यदृश्यत ॥ ४९ ॥ भ्रान्तमाविद्धमुद्भ्रान्तमाप्लुतं प्रसृतं प्लुतम् । सम्पातं समुदीर्णं च दर्शयामास पाण्डवः ॥ ५० ॥ उस समय पाण्डुनन्दन भीमसेन अनेक मागोंपर विचरते हुए दिखायी देते थे। उन्होंने खड्गयुद्धके भ्रान्त, आविद्ध, उद्भ्रान्त, आप्लुत, प्रसृत, प्लुत, सम्पात तथा समुदीर्ण आदि
बहुत-से पैंतरे दिखाये*॥ ४९-५० ॥
केचिदग्रासिना छिन्नाः पाण्डवेन महात्मना ।
विनेदुर्भिन्नमर्माणो निपेतुश्च गतासवः ॥ ५१ ॥
पाण्डुनन्दन महामना भीमसेनके श्रेष्ठ खड्गकी चोटसे कितने ही हाथियोंके अंग छिन्न-भिन्न हो उनके मर्मस्थल विदीर्ण हो गये और वे चिग्घाड़ते हुए प्राणशून्य होकर धरतीपर गिर पड़े॥ ५१ ॥
छिन्नदन्ताग्रहस्ताश्च भिन्नकुम्भास्तथा परे ।
वियोधाः स्वान्यनीकानि जघ्नुर्भारत वारणाः ॥ ५२ ॥
निपेतुरुर्व्यां च तथा विनदन्तो महारवान् ।
भरतनन्दन! कुछ गजराजोंके दाँत और सूँड़के अग्रभाग कट गये, कुम्भस्थल फट गये और सवार मारे गये। उस अवस्थामें उन्होंने इधर-उधर भागकर अपनी ही सेनाओंको कुचल डाला और अन्तमें जोर-जोरसे चिग्घाड़ते हुए वे पृथ्वीपर गिरे और मर गये ॥ ५२ १/२ ॥
छिन्नांश्च तोमरान् राजन् महामात्रशिरांसि च ॥ ५३ ॥
परिस्तोमान् विचित्रांश्च कक्ष्याश्च कनकोज्ज्वलाः ।
ग्रैवेयाण्यथ शक्तीश्च पताकाः कणपांस्तथा ॥ ५४ ॥
तूणीरानथ यन्त्राणि विचित्राणि धनूंषि च ।
भिन्दिपालानि शुभ्राणि तोत्राणि चाङ्कुशैः सह ॥ ५५ ॥
घण्टाश्च विविधा राजन् हेमगर्भान् त्सरूनपि ।
पततः पातितांश्चैव पश्यामः सह सादिभिः ॥ ५६ ॥
राजन्! हमलोगोंने वहाँ देखा, बहुत-से तोमर और महावतोंके मस्तक कटकर गिरे हैं, हाथियोंकी पीठोंपर बिछी हुई विचित्र-विचित्र झूलें पड़ी हुई हैं। हाथियोंको कसनेके उपयोगमें आनेवाली स्वर्णभूषित चमकीली रस्सियाँ गिरी हुई हैं, हाथी और घोड़ोंके गलेके आभूषण, शक्ति, पताका, कणप (अस्त्रविशेष), तरकस, विचित्र यन्त्र, धनुष, चमकीले भिन्दिपाल, तोत्र, अंकुश, भाँति-भाँतिके घंटे तथा स्वर्णजटित खड्गमुष्टि—ये सब वस्तुएँ हाथीसवारों-सहित गिरी हुई हैं और गिरती जा रही हैं॥
छिन्नगात्रावरकरैर्निहतैश्चापि वारणैः ।
आसीद् भूमिः समास्तीर्णा पतितैर्भूधरैरिव ॥ ५७ ॥
कहीं कटे हुए हाथियोंके शरीरके ऊर्ध्वभाग पड़े थे, कहीं अधोभाग पड़े थे। कहीं कटी हुई सूँडें पड़ी थीं और कहीं मारे गये हाथियोंकी लोथें पड़ी थीं। उनसे आच्छादित हुई वह समरभूमि ढहे हुए पर्वतोंसे ढकी-सी जान पड़ती थी॥ ५७॥
विमृद्यैवं महानागान् ममर्दान्यान् महाबलः ।
अश्वारोहवरांश्चैव पातयामास संयुगे ॥ ५८ ॥
तद् घोरमभवद् युद्धं तस्य तेषां च भारत ।
भारत! इस प्रकार महाबली भीमसेनने कितने ही बड़े-बड़े गजराजोंको नष्ट करके दूसरे प्राणियोंका भी विनाश आरम्भ किया। उन्होंने युद्धस्थलमें बहुत-से प्रमुख अश्वारोहियोंको मार गिराया। इस प्रकार भीमसेन और कलिंग सैनिकोंका वह युद्ध अत्यन्त घोर रूप धारण करता गया ॥ ५८ १/२ ॥
खलीनान्यथ योक्त्राणि कक्ष्याश्च कनकोज्ज्वलाः ॥ ५९ ॥ परिस्तोमांश्च प्रासांश्च ऋष्ट्यश्च महाधनाः । कवचान्यथ चर्माणि चित्राण्यास्तरणानि च ॥ ६० ॥ तत्र तत्रापविद्धानि व्यदृश्यन्त महाहवे । उस महासमरमें घोड़ोंकी लगाम, जोत, सुवर्णमण्डित चमकीली रस्सियाँ, पीठपर कसी जानेवाली गद्दियाँ (जीन), प्रास, बहुमूल्य ऋष्टियाँ, कवच, ढाल तथा भाँति-भाँतिके विचित्र आस्तरण इधर-उधर बिखरे दिखायी देने लगे ॥ ५९-६० १/२ ॥
प्रासैैर्यन्त्रैर्विचित्रैश्च शस्त्रैश्च विमलैस्तथा ॥ ६१ ॥ स चक्रे वसुधां कीर्णां शबलैः कुसुमैरिव । भीमसेनने बहुत-से प्रासों, विचित्र यन्त्रों और चमकीले शस्त्रोंसे वहाँकी भूमिको पाट दिया, जिससे वह चितकबरे पुष्पोंसे आच्छादित-सी प्रतीत होने लगी ॥ ६१ १/२ ॥
आप्लुत्य रथिनः कांश्चित् परामृश्य महाबलः ॥ ६२ ॥ पातयामास खड्गेन सध्वजानपि पाण्डवः । महाबली पाण्डुनन्दन भीम उछलकर कितने ही रथियोंके पास पहुँच जाते और उन्हें पकड़कर ध्वजोंसहित तलवारसे काट गिराते थे ॥ ६२ १/२ ॥
मुहुरुत्पततो दिक्षु धावतश्च यशस्विनः ॥ ६३ ॥ मार्गांश्च चरतश्चित्रं व्यस्मयन्त रणे जनाः । वे बार-बार उछलते, सम्पूर्ण दिशाओंमें दौड़ते और युद्धके विचित्र पैंतरे दिखाते हुए रणभूमिमें विचरते थे। यशस्वी भीमसेनका यह पराक्रम देखकर लोगोंको बड़ा आश्चर्य होता था ॥ ६३ १/२ ॥
स जघान पदा कांश्चिद् व्याक्षिप्यान्यानपोथयत् ॥ ६४ ॥ खड्गेनान्यांश्च चिच्छेद नादेनान्यांश्च भीषयन् । ऊरुवेगेन चाप्यन्यान् पातयामास भूतले ॥ ६५ ॥ उन्होंने कितने ही योद्धाओंको पैरोंसे कुचलकर मार डाला, कितनोंको ऊपर उछालकर पटक दिया, कितनोंको तलवारसे काट दिया, दूसरे कितने ही योद्धाओंको अपनी भीषण गर्जनासे डरा दिया और कितनों-को अपने महान् वेगसे पृथ्वीपर दे मारा ॥ ६४-६५ ॥
अपरे चैनमालोक्य भयात् पञ्चत्वमागताः । एवं सा बहुला सेना कलिङ्गानां तरस्विनाम् ॥ ६६ ॥ परिवार्य रणे भीष्मं भीमसेनमुपादद्रवत् ।
दूसरे बहुत-से योद्धा इन्हें देखते ही भयके मारे निष्प्राण हो गये। इस प्रकार मारी जानेपर भी वेगशाली कलिंग वीरोंकी उस विशाल वाहिनीने रणक्षेत्रमें भीष्मकी रक्षाके लिये उन्हें चारों ओरसे घेरकर पुनः भीमसेनपर धावा किया ।। ६६ १/२ ।। ततः कालिङ्गसैन्यानां प्रमुखे भरतर्षभ ।। ६७ ।। श्रुतायुषमभिप्रेक्ष्य भीमसेनः समभ्ययात् । भरतश्रेष्ठ! कलिंगसेनाके अग्रभागमें राजा श्रुतायुको देखकर भीमसेन उसका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ।। ६७ १/२ ।। तमायान्तमभिप्रेक्ष्य कालिङ्गो नवभिः शरैः ।। ६८ ।। भीमसेनममेयात्मा प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे । उन्हें आते देख अमेय आत्मबलसे सम्पन्न कलिंग-राज श्रुतायुने भीमसेनकी छातीमें नौ बाण मारे ।। ६८ १/२ ।। कालिङ्गबाणाभिहतस्तोत्रार्दित इव द्विपः ।। ६९ ।। भीमसेनः प्रजज्वाल क्रोधेनाग्निरिवैधितः । कलिंगराजके बाणोंसे आहत हो भीमसेन अंकुशकी मार खाये हुए हाथीके समान क्रोधसे जल उठे, मानो घीकी आहुति पाकर आग प्रज्वलित हो उठी हो ।। ६९ १/२ ।। अथाशोकः समादाय रथं हेमपरिष्कृतम् ।। ७० ।। भीमं सम्पादयामास रथेन रथसारथिः । इसी समय भीमसेनके सारथि अशोकने एक सुवर्णभूषित रथ लेकर उसे भीमके पास पहुँचाकर उन्हें भी रथसे सम्पन्न कर दिया ।। ७० १/२ ।। तमारुह्य रथं तूर्णं कौन्तेयः शत्रुसूदनः ।। ७१ ।। कालिङ्गमभिदुद्राव तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् । शत्रुसूदन कुन्तीकुमार भीम तुरंत ही उस रथपर आरूढ़ हो कलिंगराजकी ओर दौड़े और बोले—'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' ।। ७१ १/२ ।। ततः श्रुतायुर्बलवान् भीमाय निशितान् शरान् ।। ७२ ।। प्रेषयामास संक्रुद्धो दर्शयन् पाणिलाघवम् । तब बलवान् श्रुतायुने कुपित हो अपने हाथकी फुर्ती दिखाते हुए बहुत-से पैने बाण भीमसेनपर चलाये ।। ७२ १/२ ।। स कार्मुकवरोत्सृष्टैर्नवभिर्निशितैः शरैः ।। ७३ ।। समाहतो महाराज कालिङ्गेन महात्मना । संचुक्रुशे भृशं भीमो दण्डाहत इवोरगः ।। ७४ ।। महाराज! महामना कलिंगराजके द्वारा श्रेष्ठ धनुषसे छोड़े हुए नौ तीखे बाणोंसे घायल हो भीमसेन डंडेकी चोट खाये हुए सर्पकी भाँति अत्यन्त कुपित हो उठे ।। ७३-७४ ।। क्रुद्धश्च चापमायम्य बलवद् बलिनां वरः ।
कालिङ्गमवधीत् पार्थो भीमः सप्तभिरायसैः ॥ ७५ ॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ कुन्तीपुत्र भीमने क्रुद्ध हो अपने सुदृढ़ धनुषको बलपूर्वक खींचकर लोहेके सात बाणोंद्वारा कलिंगराज श्रुतायुको घायल कर दिया ॥ ७५ ॥
क्षुराभ्यां चक्ररक्षौ च कालिङ्गस्य महाबलौ ।
सत्यदेवं च सत्यं च प्राहिणोद् यमसादनम् ॥ ७६ ॥
तत्पश्चात् दो क्षुर नामक बाणोंसे कलिंगराजके चक्ररक्षक महाबली सत्यदेव तथा सत्यको यमलोक पहुँचा दिया ॥ ७६ ॥
ततः पुनरमेयात्मा नाराचैर्निशितैस्त्रिभिः ।
केतुमन्तं रणे भीमोऽगमयद् यमसादनम् ॥ ७७ ॥
इसके बाद अमेय आत्मबलसे सम्पन्न भीमने तीन तीखे नाराचोंद्वारा रणक्षेत्रमें केतुमान्को मारकर उसे यमलोक भेज दिया ॥ ७७ ॥
ततः कलिङ्गाः संनद्धा भीमसेनममर्षणम् ।
अनीकैर्बहुसाहस्रैः क्षत्रियाः समवारयन् ॥ ७८ ॥
तब कलिंगदेशीय समस्त क्षत्रियोंने कई हजार सैनिकोंके साथ आकर युद्धके लिये उद्यत हो अमर्षशील भीमसेनको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ७८ ॥
ततः शक्तिगदाखड्गतोमरर्ष्टिपरश्वधैः ।
कलिङ्गाश्च ततो राजन् भीमसेनमवाकिरन् ॥ ७९ ॥
राजन्! उस समय कलिंग-योद्धा भीमसेनपर शक्ति, गदा, खड्ग, तोमर, ऋष्टि तथा फरसोंकी वर्षा करने लगे ॥ ७९ ॥
संनिवार्य स तां घोरां शरवृष्टिं समुत्थिताम् ।
गदामादाय तरसा संनिपत्य महाबलः ॥ ८० ॥
भीमः सप्त शतान् वीराननयद् यमसादनम् ।
पुनश्चैव द्विसाहस्रान् कलिङ्गानरिमर्दनः ॥ ८१ ॥
प्राहिणोन्मृत्युलोकाय तदद्भुतमिवाभवत् ।
वहाँ होती हुई उस भयंकर बाण-वर्षाको रोककर महाबली भीमसेन हाथमें गदा ले बड़े वेगसे कलिंग-सेनामें कूद पड़े। उस सेनामें घुसकर शत्रुमर्दन भीमने पहले सात सौ वीरोंको यमलोक पहुँचाया। फिर दो हजार कलिंगोंको मृत्युके लोकमें भेज दिया। यह अद्भुत-सी घटना हुई ॥ ८०-८१ १/२ ॥
एवं स तान्यनीकानि कलिङ्गानां पुनः पुनः ॥ ८२ ॥
बिभेद समरे तूर्णं प्रेक्ष्य भीष्मं महारथम् ।
इस प्रकार भीमसेनने महारथी भीष्मकी ओर देखते हुए कलिंगोंकी सेनाको बार-बार समरभूमिमें शीघ्रतापूर्वक विदीर्ण किया ॥ ८२ १/२ ॥
हतारोहाश्च मातङ्गाः पाण्डवेन कृता रणे ॥ ८३ ॥
विप्रजग्मुरनीकेषु मेघा वातहता इव ।
मृद्नन्तः स्वान्यनीकानि विनदन्तः शरातुराः ॥ ८४ ॥
उस रणभूमिमें पाण्डुनन्दन भीमके द्वारा सवारोंके मार दिये जानेपर बहुत-से मतवाले हाथी वायुके थपेड़े खाये हुए बादलोंके समान कौरव-सेनामें इधर-उधर भागने तथा अपने ही सैनिकोंको कुचलते हुए बाणोंकी व्यथासे व्याकुल हो चीत्कार करने लगे ॥ ८३-८४ ॥
ततो भीमो महाबाहुः खड्गहस्तो महाभुजः ।
सम्प्रहृष्टो महाघोषं शङ्खं प्राध्मापयद् बली ॥ ८५ ॥
तदनन्तर महाबली महाबाहु भीमसेनने खड्ग हाथमें लिये हुए अत्यन्त प्रसन्न हो बड़े जोरसे शंख बजाया ॥ ८५ ॥
सर्वकालिङ्गसैन्यानां मनांसि समकम्पयत् ।
मोहश्चापि कलिङ्गानामाविवेश परंतप ॥ ८६ ॥
परंतप! उस शंखनादके द्वारा उन्होंने सम्पूर्ण कलिंगोंके हृदयमें कम्प मचा दिया और उन सबपर बड़ा भारी मोह छा गया ॥ ८६ ॥
प्राकम्पन्त च सैन्यानि वाहनानि च सर्वशः ।
भीमेन समरे राजन् गजेन्द्रेणेव सर्वशः ॥ ८७ ॥
मार्गान् बहून् विचरता धावता च ततस्ततः ।
मुहुरुत्पतता चैव सम्मोहः समजायत ॥ ८८ ॥
राजन्! उस समरांगणमें गजराजके समान अनेक मार्गोंपर विचरते और इधर-उधर दौड़ते हुए भीमसेनके भयसे समस्त सैनिक और वाहन थर-थर काँपने लगे। उनके बार-बार उछलनेसे सबपर मोह छा गया ॥ ८७-८८ ॥
भीमसेनभयत्रस्तं सैन्यं च समकम्पत ।
क्षोभ्यमाणमसम्बाधं ग्राहेणेव महत् सरः ॥ ८९ ॥
जैसे महान् तालाब किसी ग्राहके द्वारा मथित होनेपर क्षुब्ध हो उठता है, उसी प्रकार वह सारी सेना भीमसेनके द्वारा बेरोक-टोक मथित होनेपर भयसे संत्रस्त हो काँपने लगी ॥ ८९ ॥
त्रासितेषु च सर्वेषु भीमेनाद्भुतकर्मणा ।
पुनरावर्तमानेषु विद्रवत्सु च सङ्घशः ॥ ९० ॥
सर्वकालिङ्गयोधेषु पाण्डूनां ध्वजिनीपतिः ।
अब्रवीत् स्वान्यनीकानि युध्यध्वमिति पार्षतः ॥ ९१ ॥
अद्भुतकर्मा भीमसेनके द्वारा भयभीत कर दिये जानेपर कलिंग देशके समस्त योद्धा जब दल बनाकर भागने और भाग-भागकर पुनः लौटने लगे, तब पाण्डव-सेनापति द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने अपने समस्त सैनिकोंसे कहा—'वीरो! (उत्साहके साथ) युद्ध करो' ॥ ९०-९१ ॥
सेनापतिवचः श्रुत्वा शिखण्डिप्रमुखा गणाः । भीममेवाभ्यवर्तन्त रथानीकैः प्रहारिभिः ॥ ९२ ॥ सेनापतिकी बात सुनकर शिखण्डी आदि महारथी प्रहारकुशल रथियोंकी सेनाओंके साथ भीमसेनका ही अनुसरण करने लगे ॥ ९२ ॥
धर्मराजश्च तान् सर्वानुपजग्राह पाण्डवः । महता मेघवर्णेन नागानीकेन पृष्ठतः ॥ ९३ ॥ तत्पश्चात् पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिर मेघोंकी घटाके समान हाथियोंकी विशाल सेना साथ लिये पीछेसे आकर उन सबकी सहायता करने लगे ॥ ९३ ॥
एवं संनोद्य सर्वाणि स्वान्यनीकानि पार्षतः । भीमसेनस्य जग्राह पाष्णिं सत्पुरुषैर्वृतः ॥ ९४ ॥ इस प्रकार द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नने अपनी सारी सेनाओंको युद्धके लिये प्रेरित करके श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ भीमसेनके पृष्ठभागकी रक्षाका कार्य हाथमें लिया ॥ ९४ ॥
न हि पञ्चालराजस्य लोके कश्चन विद्यते । भीमसात्यकयोरन्यः प्राणेभ्यः प्रियकृत्तमः ॥ ९५ ॥ जगत्में पांचालराज धृष्टद्युम्नके लिये भीम और सात्यकिको छोड़कर दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं था, जो प्राणोंसे भी बढ़कर हो ॥ ९५ ॥
सोऽपश्यच्च कलिङ्गेषु चरन्तमरिसूदनः । भीमसेनं महाबाहुं पार्षतः परवीरहा ॥ ९६ ॥ शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले वैरिविनाशक द्रुपद-कुमार धृष्टद्युम्नने महाबाहु भीमसेनको कलिंगोंकी सेनामें विचरते देखा ॥ ९६ ॥
ननर्द बहुधा राजन् हृष्टश्चासीत् परंतपः । शङ्खं दध्मौ च समरे सिंहनादं ननाद च ॥ ९७ ॥ राजन्! उन्हें देखते ही परंतप धृष्टद्युम्नके हृदयमें हर्षकी सीमा न रही। वे बारंबार गर्जना करने लगे। उन्होंने समरांगणमें शंख बजाया और सिंहनाद किया ॥ ९७ ॥
स च पारावताश्वस्य रथे हेमपरिष्कृते । कोविदारध्वजं दृष्ट्वा भीमसेनः समाश्वसत् ॥ ९८ ॥ कबूतरके समान रंगवाले घोड़े जिनके रथमें जोते जाते हैं, उन धृष्टद्युम्नके सुवर्णभूषित रथमें कचनार वृक्षके चिह्नसे युक्त ध्वजा फहराती देख भीमसेनको बड़ा आश्वासन मिला ॥ ९८ ॥
धृष्टद्युम्नस्तु तं दृष्ट्वा कलिङ्गैः समभिद्रुतम् । भीमसेनममेयात्मा त्राणायाजौ समभ्ययात् ॥ ९९ ॥ कलिंगोंने भीमसेनपर धावा किया है, यह देखकर अनन्त आत्मबलसे सम्पन्न धृष्टद्युम्न भीमसेनकी रक्षाके लिये युद्धस्थलमें उनके पास जा पहुँचे ॥ ९९ ॥
तौ दूरात् सात्यकिं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नवकोदरौ ।
कलिङ्गान् समरे वीरौ योधयेतां मनस्विनौ ॥ १०० ॥
उस समरभूमिमें मनस्वी वीर धृष्टद्युम्न और भीमसेनने सात्यकिको भी दूरसे आते देखा; अतः वे अधिक उत्साहसे सम्पन्न हो कलिंगोंसे युद्ध करने लगे ॥ १०० ॥
स तत्र गत्वा शैनेयो जवेन जयतां वरः ।
पार्थपार्षतयोः पार्ष्णिं जग्राह पुरुषर्षभः ॥ १०१ ॥
विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ पुरुषप्रवर सात्यकिने बड़े वेगसे वहाँ पहुँचकर भीमसेन और धृष्टद्युम्नके पृष्ठपोषणका कार्य सँभाला ॥ १०१ ॥
स कृत्वा दारुणं कर्म प्रगृहीतशरासनः ।
आस्थितो रौद्रमात्मानं कलिङ्गानन्ववैक्षत ॥ १०२ ॥
उन्होंने धनुष हाथमें लेकर भयंकर पराक्रम प्रकट करनेके पश्चात् अपने रौद्ररूपका आश्रय ले कलिंगसेनाकी ओर दृष्टिपात किया ॥ १०२ ॥
कलिङ्गप्रभवां चैव मांसशोणितकर्दमाम् ।
रुधिरस्यन्दिनीं तत्र भीमः प्रावर्तयन्नदीम् ॥ १०३ ॥
भीमसेनने वहाँ एक भयंकर नदी प्रकट कर दी, जो कलिंग-सेनारूपी उद्गमस्थानसे निकली थी। उसमें मांस और शोणितकी ही कीच थी। वह नदी रक्तकी ही धारा बहा रही थी ॥ १०३ ॥
अन्तरेण कलिङ्गानां पाण्डवानां च वाहिनीम् ।
तां संततार दुस्तारां भीमसेनो महाबलः ॥ १०४ ॥
कलिंग और पाण्डव-सेनाके बीचमें बहनेवाली उस रक्तकी दुस्तर नदीको महाबली भीमसेन अपने पराक्रमसे पार कर गये ॥ १०४ ॥
भीमसेनं तथा दृष्ट्वा प्राक्रोशंस्तावका नृप ।
कालोऽयं भीमरूपेण कलिङ्गैः सह युध्यते ॥ १०५ ॥
राजन्! भीमसेनको उस रूपमें देखकर आपके सैनिक पुकार-पुकारकर कहने लगे, यह साक्षात् काल ही भीमसेनके रूपमें प्रकट होकर कलिंगोंके साथ युद्ध कर रहा है ॥ १०५ ॥
ततः शान्तनवो भीष्मः श्रुत्वा तं निनदं रणे ।
अभ्ययात् त्वरितो भीमं व्यूढानीकः समन्ततः ॥ १०६ ॥
तदनन्तर शान्तनुनन्दन भीष्म रणभूमिमें उस कोलाहलको सुनकर अपनी सेनाको सब ओरसे व्यूह-बद्ध करके तुरंत ही भीमसेनके पास आये ॥ १०६ ॥
तं सात्यकिर्भीमसेनो धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।
अभ्यद्रवन्त भीष्मस्य रथं हेमपरिष्कृतम् ॥ १०७ ॥
भीष्मके उस सुवर्णभूषित रथपर सात्यकि, भीमसेन तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने एक साथ ही धावा किया ॥ १०७ ॥ परिवार्य तु ते सर्वे गाङ्गेयं तरसा रणे । त्रिभिस्त्रिभिः शरैर्घोरैर्भीष्ममानर्च्छुरोजसा ॥ १०८ ॥ उन सब लोगोंने रणक्षेत्रमें गंगानन्दन भीष्मको वेगपूर्वक घेरकर तीन-तीन भयंकर बाणोंद्वारा उन्हें यथाशक्ति पीड़ा पहुँचायी ॥ १०८ ॥ प्रत्यविध्यत तान् सर्वान् पिता देवव्रतस्तव । यतमानान् महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ॥ १०९ ॥ उस समय आपके पितृतुल्य भीष्मने वहाँ युद्धके लिये प्रयत्न करनेवाले उन सभी महाधनुर्धर योद्धाओं-को सीधे जानेवाले तीन-तीन बाणोंसे बींधकर बदला चुकाया ॥ १०९ ॥ ततः शरसहस्रेण संनिवार्य महारथान् । हयान् काञ्चनसंनाहान् भीमस्य न्यहनच्छरैः ॥ ११० ॥ तदनन्तर सहस्रों बाणोंकी वर्षा करके उन तीनों महारथियोंको रोककर सोनेके साज-बाज धारण करनेवाले भीमसेनके घोड़ोंको भीष्मने अपने बाणोंसे मार डाला ॥ ११० ॥ हताश्वे स रथे तिष्ठन् भीमसेनः प्रतापवान् । शक्तिं चिक्षेप तरसा गाङ्गेयस्य रथं प्रति ॥ १११ ॥ अश्वोंके मारे जानेपर भी उसी रथपर खड़े हुए प्रतापी भीमसेनने भीष्मजीके रथपर बड़े वेगसे शक्ति चलायी ॥ १११ ॥ अप्राप्तामथ तां शक्तिं पिता देवव्रतस्तव । त्रिधा चिच्छेद समरे सा पृथिव्यामशीर्यत ॥ ११२ ॥ वह शक्ति अभी पासतक पहुँची ही न थी कि आपके पितृतुल्य भीष्मने समरभूमिमें उसके तीन टुकड़े कर डाले और वह भूतलपर बिखर गयी ॥ ११२ ॥ ततः शैक्यायसीं गुर्वीं प्रगृह्य बलवान् गदाम् । भीमसेनस्ततस्तूर्णं पुप्लुवे मनुजर्षभ ॥ ११३ ॥ नरश्रेष्ठ! तब बलवान् भीमसेन पूर्णतः लोहेके सारतत्त्व (फौलाद)-की बनी हुई भारी गदा हाथमें लेकर तुरंत उस रथसे कूद पड़े ॥ ११३ ॥ सात्यकोऽपि ततस्तूर्णं भीमस्य प्रियकाम्यया । गाङ्गेयसारथिं तूर्णं पातयामास सायकैः ॥ ११४ ॥ इधर सात्यकिने भी भीमसेनका प्रिय करनेकी इच्छासे भीष्मके सारथिको तुरंत ही अपने सायकोंद्वारा मार गिराया ॥ ११४ ॥ भीष्मस्तु निहते तस्मिन् सारथौ रथिनां वरः । वातायमानैस्तैरश्वैरपनीतो रणाजिरात् ॥ ११५ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ भीष्म सारथिके मारे जानेपर हवाके समान भागनेवाले घोड़ोंके द्वारा रणभूमिसे बाहर कर दिये गये ॥ ११५ ॥ भीमसेनस्ततो राजन्नपयाते महाव्रते । प्रजज्वाल यथा वह्निर्दहन् कक्षमिवैधितः ॥ ११६ ॥ राजन्! महान् व्रतधारी भीष्मके रणभूमिसे हट जानेपर भीमसेन घास-फूसके ढेरमें लगी हुई आगके समान अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे ॥ ११६ ॥ स हत्वा सर्वकालिङ्गान् सेनामध्ये व्यतिष्ठत । नैनमभ्युत्सहन् केचित् तावका भरतर्षभ ॥ ११७ ॥ भरतश्रेष्ठ! भीमसेन सम्पूर्ण कलिंगोंका संहार करके सेनाके मध्यभागमें ही खड़े थे, परंतु आपके सैनिकोंमेंसे कोई भी उनके पास जानेका साहस न कर सके ॥ ११७ ॥ धृष्टद्युम्नस्तमारोप्य स्वरथे रथिनां वरः । पश्यतां सर्वसैन्यानामपोवाह यशस्विनम् ॥ ११८ ॥ तत्पश्चात् रथियोंमें श्रेष्ठ धृष्टद्युम्न यशस्वी भीमसेनको अपने रथपर चढ़ाकर सब सैनिकोंके देखते-देखते अपने दलमें ले गये ॥ ११८ ॥ सम्पूज्यमानः पाञ्चालैर्मत्स्यैश्च भरतर्षभ । धृष्टद्युम्नं परिष्वज्य समेयादथ सात्यकिम् ॥ ११९ ॥ भरतश्रेष्ठ! वहाँ पांचालों तथा मत्स्यदेशीय नरेशोंसे पूजित हो भीमसेन धृष्टद्युम्न और सात्यकिको भुजाओंमें भरकर दोनोंसे प्रसन्नतापूर्वक मिले ॥ ११९ ॥ अथाब्रवीद् भीमसेनं सात्यकिः सत्यविक्रमः । प्रहर्षयन् यदुव्याघ्रो धृष्टद्युम्नस्य पश्यतः ॥ १२० ॥ उस समय सत्यपराक्रमी यदुकुलसिंह सात्यकिने धृष्टद्युम्नके सामने ही भीमसेनका हर्ष बढ़ाते हुए उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १२० ॥ दिष्ट्या कलिङ्गराजश्च राजपुत्रश्च केतुमान् । शक्रदेवश्च कालिङ्गः कलिङ्गाश्च मृधे हताः ॥ १२१ ॥ ‘वीरवर! बड़े सौभाग्यकी बात है कि कलिंगराज भानुमान्, राजकुमार केतुमान्, कलिंगवीर शक्रदेव तथा अन्य बहुसंख्यक कलिंग-सैनिक आपके द्वारा युद्धमें मारे गये ॥ स्वबाहुबलवीर्येण नागाश्वरथसंकुलः । महापुरुषभूयिष्ठो धीरयोधनिषेवितः ॥ १२२ ॥ महाव्यूहः कलिङ्गानामेकेन मृदितस्त्वया । ‘आपने अकेले अपनी ही भुजाओंके बल और पराक्रमसे कलिंगोंके उस महान् व्यूहको रौंदकर मिट्टीमें मिला दिया, जिसमें बहुत-से हाथी, घोड़े और रथ भरे हुए थे। उसके अधिकांश सैनिक संसारके महान् पुरुषोंमें गिने जानेयोग्य थे। अगणित धीर-वीर योद्धा उस महान् व्यूहका सेवन करते थे' ॥ १२२ ½ ॥
एवमुक्त्वा शिनेर्नप्ता दीर्घबाहुररिंदम ॥ १२३ ॥
रथाद् रथमभिद्रुत्य पर्यष्वजत पाण्डवम् ।
शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! ऐसा कहकर बड़ी भुजाओंवाले सात्यकि अपने रथसे कूदकर भीमसेनके रथपर जा चढ़े और उनको हृदयसे लगा लिया ॥ १२३ १/२ ॥
ततः स्वरथमास्थाय पुनरेव महारथः ।
तावकानवधीत् क्रुद्धो भीमस्य बलमादधत् ॥ १२४ ॥
तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए महारथी सात्यकिने पुनः अपने रथपर बैठकर भीमसेनका बल बढ़ाते हुए आपके सैनिकोंका संहार आरम्भ किया ॥ १२४ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि द्वितीययुद्धदिवसे कलिङ्गराजवधे चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें द्वितीय दिनके युद्धमें कलिंगराजका वधविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥
* तलवारको मण्डलाकार घुमाना 'भ्रान्त' कहलाता है। यही अधिक परिश्रमसाध्य होनेपर 'आविद्ध' कहा गया है। 'भ्रान्त' की क्रिया यदि ऊपर उठते हुए की जाय तो उसे 'उद्भ्रान्त' कहते हैं। तलवार चलाते हुए ऊपर उछलना 'आप्लुत' है। सब दिशाओंमें फैलावका नाम 'प्रसृत' है। तलवार चलाते हुए एक ही दिशामें आगे बढ़ना 'प्लुत' है। वेगको 'सम्पात' कहते हैं। समस्त शत्रुओंको मारने या चोट पहुँचानेके उद्यमको 'समुदीर्ण' कहा गया है।
अध्याय (पृष्ठ 1804)
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
अभिमन्यु और अर्जुनका पराक्रम तथा दूसरे दिनके युद्धकी समाप्ति
संजय उवाच
गतपूर्वाह्णभूयिष्ठे तस्मिन्नहनि भारत ।
रथनागाश्वपत्तीनां सादिनां च महाक्षये ॥ १ ॥
द्रोणपुत्रेण शल्येन कृपेण च महात्मना ।
समसज्जत पाञ्चाल्यस्त्रिभिरेतैर्महारथैः ॥ २ ॥
**संजय कहते हैं—**भारत! उस दूसरे दिन जब पूर्वाह्णका अधिक भाग व्यतीत हो गया और बहुसंख्यक रथ, हाथी, घोड़े, पैदल और सवारोंका महान् संहार होने लगा, उस समय पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न अकेला ही द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, शल्य तथा महामनस्वी कृपाचार्य—इन तीनों महारथियोंके साथ युद्ध करने लगा ॥ १-२ ॥
स लोकविदितानश्वान् निजघान महाबलः ।
द्रौणेः पाञ्चालदायादः शितैर्दशभिराशुगैः ॥ ३ ॥
महाबली पांचालराजकुमारने दस शीघ्रगामी पैने बाण मारकर अश्वत्थामाके विश्वविख्यात घोड़ोंको मार डाला ॥ ३ ॥
ततः शल्यरथं तूर्णमास्थाय हतवाहनः ।
द्रौणिः पाञ्चालदायादमभ्यवर्षदथेषुभिः ॥ ४ ॥
वाहनोंके मारे जानेपर अश्वत्थामा तुरंत ही शल्यके रथपर चढ़ गया और वहींसे धृष्टद्युम्नपर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ४ ॥
धृष्टद्युम्नं तु संयुक्तं द्रौणिना वीक्ष्य भारत ।
सौभद्रोऽभ्यपतत् तूर्णं विकिरन् निशितान् शरान् ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! धृष्टद्युम्नको अश्वत्थामाके साथ भिड़ा हुआ देख सुभद्रानन्दन अभिमन्यु भी पैने बाण बिखेरता हुआ तुरंत वहाँ आ पहुँचा ॥ ५ ॥
स शल्यं पञ्चविंशत्या कृपं च नवभिः शरैः ।
अश्वत्थामानमष्टाभिर्विव्याध पुरुषर्षभः ॥ ६ ॥
उस पुरुषरत्न अभिमन्युने शल्यको पचीस, कृपाचार्यको नौ और अश्वत्थामाको आठ बाणोंसे बींध डाला ॥ ६ ॥
आर्जुनं तु ततस्तूर्णं द्रौणिर्विव्याध पत्रिणा ।
शल्योऽथ दशभिश्चैव कृपश्च निशितैस्त्रिभिः ॥ ७ ॥
तब अश्वत्थामाने शीघ्र ही एक बाणसे अभिमन्युको घायल कर दिया। तत्पश्चात् शल्यने दस और कृपाचार्यने तीन पैने बाण उसे मारे ॥ ७ ॥ लक्ष्मणस्तव पौत्रस्तु सौभद्रं समवस्थितम् । अभ्यवर्तत संहृष्टस्ततो युद्धमवर्तत ॥ ८ ॥ तदनन्तर आपके पौत्र लक्ष्मणने सुभद्राकुमार अभिमन्युको सामने खड़ा देख हर्ष और उत्साहमें भरकर उसपर आक्रमण किया। फिर तो दोनोंमें युद्ध आरम्भ हो गया ॥ ८ ॥ दौर्योधनिः सुसंक्रुद्धः सौभद्रं परवीरहा । विव्याध समरे राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ९ ॥ राजन्! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले दुर्योधनके पुत्र लक्ष्मणने अत्यन्त कुपित हो समरभूमिमें (अनेक बाणोंसे) अभिमन्युको बींध डाला। वह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ ९ ॥ अभिमन्युः सुसंक्रुद्धो भ्रातरं भरतर्षभ । शरैः पञ्चाशता राजन् क्षिप्रहस्तोऽभ्यविध्यत ॥ १० ॥ महाराज! भरतश्रेष्ठ! यह देख शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाला वीर अभिमन्यु अत्यन्त कुपित हो उठा और अपने भाई लक्ष्मणको उसने पचास बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १० ॥ लक्ष्मणोऽपि पुनस्तस्य धनुश्छिच्छेद पत्रिणा । मुष्टिदेशे महाराज ततस्ते चुक्रुशुर्जनाः ॥ ११॥ राजन्! तब लक्ष्मणने भी पुनः एक बाण मारकर उसके धनुषको, जहाँ मुट्ठी रखी जाती है, वहींसे काट दिया। यह देख आपके सैनिक हर्षसे कोलाहल कर उठे ॥ तद् विहाय धनुश्छिन्नं सौभद्रः परवीरहा । अन्यदादत्तवांश्चित्रं कार्मुकं वेगवत्तरम् ॥ १२ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुभद्राकुमारने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा विचित्र धनुष हाथमें लिया, जो अत्यन्त वेगशाली था ॥ १२ ॥ तौ तत्र समरे युक्तौ कृतप्रतिकृतैषिणौ । अन्योन्यं विशिखैस्तीक्ष्णैरर्जघ्नतुः पुरुषर्षभौ ॥ १३ ॥ वे दोनों पुरुषरत्न वहाँ एक-दूसरेके अस्त्रोंका निवारण अथवा प्रतीकार करनेकी इच्छा रखकर युद्धमें संलग्न थे और पैने बाणोंद्वारा एक-दूसरेको घायल कर रहे थे ॥ १३ ॥ ततो दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा पुत्रं महारथम् । पीडितं तव पौत्रेण प्रायात् तत्र प्रजेश्वरः ॥ १४ ॥ तब प्रजाजनोंका स्वामी राजा दुर्योधन अपने महारथी पुत्रको आपके पौत्र अभिमन्युसे पीड़ित देख वहाँ स्वयं जा पहुँचा ॥ १४ ॥ संनिवृत्ते तव सुते सर्व एव जनाधिपाः । आर्जुनिं रथवंशेन समन्तात् पर्यवारयन् ॥ १५ ॥
आपके पुत्र दुर्योधनके उधर लौटनेपर कौरव-पक्षके सभी नरेशोंने विशाल रथ-सेनाके द्वारा अर्जुनकुमार अभिमन्युको सब ओरसे घेर लिया ।। १५ ।।
स तैः परिवृतः शूरैः शूरो युधि सुदुर्जयैः ।
न स्म प्रव्यथते राजन् कृष्णतुल्यपराक्रमः ॥ १६ ॥
राजन्! अभिमन्युका पराक्रम भगवान् श्रीकृष्णके समान था। वह युद्धमें अत्यन्त दुर्जय उन शूरवीरोंसे घिर जानेपर भी व्यथित या चिन्तित नहीं हुआ ।। १६ ।।
सौभद्रमथ संसक्तं दृष्ट्वा तत्र धनंजयः ।
अभिदुद्राव वेगेन त्रातुकामः स्वमात्मजम् ।। १७ ।।
इसी समय अर्जुन सुभद्रकुमारको वहाँ युद्धमें संलग्न देख अपने पुत्रकी रक्षाके लिये बड़े वेगसे दौड़े आये ।। १७ ।।
ततः सरथनागाश्वा भीष्मद्रोणपुरोगमाः ।
अभ्यवर्तन्त राजानः सहिताः सव्यसाचिनम् ।। १८ ।।
यह देख भीष्म और द्रोण आदि सभी कौरव-पक्षीय नरेश रथ, हाथी और घोड़ोंकी सेनासहित एक साथ अर्जुनपर चढ़ आये ।। १८ ।।
उद्भूतं सहसा भौमं नागाश्वरथपत्तिभिः ।
दिवाकररथं प्राप्य रजस्तीव्रमदृश्यत ।। १९ ।।
उस समय हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंद्वारा उड़ायी हुई धरतीकी तीव्र धूल सहसा सूर्यके रथतक पहुँचकर सब ओर व्याप्त दिखायी देने लगी ।। १९ ।।
तानि नागसहस्राणि भूमिपालशतानि च ।
तस्य बाणपथं प्राप्य नाभ्यवर्तन्त सर्वशः ।। २० ।।
प्रणेदुः सर्वभूतानि बभूवुस्तिमिरा दिशः ।
इधर सहस्रों हाथी और सैकड़ों भूमिपाल अर्जुनके बाणोंके पथमें आकर किसी प्रकार आगे न बढ़ सके। समस्त प्राणी आर्तनाद करने लगे और सम्पूर्ण दिशाओंमें अन्धकार छा गया ।। २० १/२ ।।
कुरूणां चानयस्तीव्रः समदृश्यत दारुणः ।। २१ ।।
नाप्यन्तरिक्षं न दिशो न भूमिर्न च भास्करः ।
प्रजज्ञे भरतश्रेष्ठ शस्त्रसङ्घैः किरीटिनः ।। २२ ।।
भरतश्रेष्ठ! उस समय कौरवोंको अपने दुःसह एवं भयंकर अन्यायका परिणाम प्रत्यक्ष दिखायी देने लगा। किरीटधारी अर्जुनके शस्त्रसमूहोंसे सब कुछ आच्छादित हो जानेके कारण आकाश, दिशा, पृथ्वी और सूर्य किसीका भी भान नहीं होता था ।। २१-२२ ।।
सादिता रथनागाश्वा हताश्वा रथिनो रणे ।
विप्रद्रुतरथाः केचिद् दृश्यन्ते रथयूथपाः ।। २३ ।।
उस रणभूमिमें कितने ही रथ टूट गये, बहुतेरे हाथी नष्ट हो गये, कितने ही रथियोंके घोड़े मार डाले गये और कितने ही रथ-यूथपतियोंके रथ भागते दिखायी दिये ॥ २३ ॥ विरथा रथिनश्चान्ये धावमानाः समन्ततः । तत्र तत्रैव दृश्यन्ते सायुधाः साङ्गदैर्भुजैः ॥ २४ ॥ अन्यान्य बहुत-से रथी रथहीन होकर अंगदभूषित भुजाओंमें आयुध धारण किये जहाँ-तहाँ चारों ओर दौड़ते देखे जाते थे ॥ २४ ॥ हयारोहा हयांस्त्यक्त्वा गजारोहाश्च दन्तिनः । अर्जुनस्य भयाद् राजन् समन्ताद् विप्रदुद्रुवुः ॥ २५ ॥ महाराज! अर्जुनके भयसे घुड़सवार घोड़ोंको और हाथीसवार हाथियोंको छोड़कर सब ओर भाग चले ॥ २५ ॥ रथेभ्यश्च गजेभ्यश्च हयेभ्यश्च नराधिपाः । पतिताः पात्यमानाश्च दृश्यन्तेऽर्जुनसायकैः ॥ २६ ॥ वहाँ बहुत-से नरेश अर्जुनके सायकोंसे कटकर रथों, हाथियों और घोड़ोंसे गिरे और गिराये जाते हुए दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ २६ ॥ सगदानुद्यतान् बाहून् सखड्गांश्च विशाम्पते । सप्रासांश्च सतूणीरान् सशरान् सशरासनान् ॥ २७ ॥ साङ्कुशान् सपताकांश्च तत्र तत्रार्जुनो नृणाम् । निचकर्त शरैरुग्रै रौद्रं वपुर्धारयन् ॥ २८ ॥ प्रजानाथ! अर्जुनने उस रणक्षेत्रमें अत्यन्त भयंकर रूप धारण किया था। उन्होंने अपने उग्र बाणोंद्वारा योद्धाओंकी ऊपर उठी हुई भुजाओंको, जिनमें गदा, खड्ग, प्रास, तूणीर, धनुष-बाण, अंकुश और ध्वजा-पताका आदि शोभा पा रहे थे, काट गिराया ॥ २७-२८ ॥ परिघाणां प्रदीप्तानां मुद्गराणां च मारिष । प्रासानां भिन्दिपालानां निस्त्रिंशानां च संयुगे ॥ २९ ॥ परश्वधानां तीक्ष्णानां तोमराणां च भारत । वर्मणां चापविद्धानां काञ्चनानां च भूमिप ॥ ३० ॥ ध्वजानां चर्मणां चैव व्यजनानां च सर्वशः । छत्राणां हेमदण्डानां तोमराणां च भारत ॥ ३१ ॥ प्रतोदानां च योक्त्राणां कशानां चैव मारिष । राशयः स्मात्र दृश्यन्ते विनिकीर्णा रणक्षितौ ॥ ३२ ॥ आर्य! भरतनन्दन! भूपाल! उस रणभूमिमें गिरे हुए उद्दीप्त परिघ, मुद्गर, प्रास, भिन्दिपाल, खड्ग, फरसे, तीखे तोमर, सुवर्णमय कवच, ध्वज, ढाल, सोनेके डंडोंसे विभूषित छत्र, व्यजन, चाबुक, जोते, कोड़े और अंकुश ढेर-के-ढेर बिखरे दिखायी देते थे ॥ २९—३२ ॥
नासीत् तत्र पुमान् कश्चित् तव सैन्यस्य भारत । योऽर्जुनं समरे शूरं प्रत्युद्यायात् कथंचन ॥ ३३ ॥ भारत! उस समय आपकी सेनामें कोई भी ऐसा पुरुष नहीं था, जो समरमें शूरवीर अर्जुनका सामना करनेके लिये किसी प्रकार आगे बढ़ सके ॥ ३३ ॥
यो यो हि समरे पार्थं प्रत्युद्याति विशाम्पते । स संख्ये विशिखैस्तीक्ष्णैः परलोकाय नीयते ॥ ३४ ॥ प्रजानाथ! उस युद्धभूमिमें जो-जो वीर अर्जुनकी ओर बढ़ता था, वही-वही उनके पैने बाणोंद्वारा परलोक पहुँचा दिया जाता था ॥ ३४ ॥
तेषु विद्रवमाणेषु तव योधेषु सर्वशः । अर्जुनो वासुदेवश्च दध्मतुर्वारिजोत्तमौ ॥ ३५ ॥ तदनन्तर आपके सब योद्धा सब ओर भागने लगे। यह देख अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्णने अपने श्रेष्ठ शंख बजाये ॥ ३५ ॥
तत् प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा पिता देवव्रतस्तव । अब्रवीत् समरे शूरं भारद्वाजं स्मयन्निव ॥ ३६ ॥ कौरव-सेनाको इस प्रकार भागती देख समरभूमिमें खड़े हुए आपके ताऊ भीष्मने वीरवर आचार्य द्रोणसे मुसकराते हुए-से कहा— ॥ ३६ ॥
एष पाण्डुसुतो वीरः कृष्णेन सहितो बली । तथा करोति सैन्यानि यथा कुर्याद् धनंजयः ॥ ३७ ॥ ‘यह श्रीकृष्णसहित बलवान् वीर पाण्डुकुमार अर्जुन कौरव-सेनाकी वही दशा कर रहा है, जैसी उसे करनी चाहिये ॥ ३७ ॥
न ह्येष समरे शक्यो विजेतुं हि कथंचन । यथास्य दृश्यते रूपं कालान्तकयमोपमम् ॥ ३८ ॥ ‘यह किसी प्रकार भी समरभूमिमें जीता नहीं जा सकता; क्योंकि इसका रूप इस समय प्रलयकालके यमराज-सा दिखायी दे रहा है ॥ ३८ ॥
न निवर्तयितुं चापि शक्येयं महती चमूः । अन्योन्यप्रेक्षया पश्य द्रवतीयं वरूथिनी ॥ ३९ ॥ ‘यह विशाल सेना इस समय पीछे नहीं लौटायी जा सकती। देखिये, सारे सैनिक एक-दूसरेकी देखा-देखी भागे जा रहे हैं ॥ ३९ ॥
एष चास्तं गिरिश्रेष्ठं भानुमान् प्रतिपद्यते । चक्षूंषि सर्वलोकस्य संहरन्निव सर्वथा ॥ ४० ॥ ‘इधर ये भगवान् सूर्य सम्पूर्ण जगत्के नेत्रोंकी ज्योति सर्वथा समेटते हुए-से गिरिश्रेष्ठ अस्ताचलको जा पहुँचे हैं ॥ ४० ॥
तत्रावहारं सम्प्राप्तं मन्येऽहं पुरुषर्षभ ।