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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

ततः प्रभद्रका राजन् सोमकाश्च सहस्रशः । पतिताः पात्यमानाश्च दृश्यने शल्यसायकैः ॥ २४ ॥ राजन्! तत्पश्चात् सहस्रों प्रभद्रक और सोमक योद्धा शल्यके बाणोंसे घायल होकर गिरे और गिरते हुए दिखायी देने लगे ॥ २४ ॥

भ्रमराणामिव व्राताः शलभानामिव व्रजाः । ह्रादिन्य इव मेघेभ्यः शल्यस्य न्यपतन् शराः ॥ २५ ॥ शल्यके बाण भ्रमरोंके समूह, टिड्डियोंके दल और मेघोंकी घटासे प्रकट होनेवाली बिजलियोंके समान पृथ्वीपर गिर रहे थे ॥ २५ ॥

द्विरदास्तुरगाश्चार्ताः पत्तयो रथिनस्तथा । शल्यस्य बाणैरपतन् बभ्रमुर्व्यनदंस्तथा ॥ २६ ॥ शल्यके बाणोंकी मार खाकर पीड़ित हुए हाथी, घोड़े, रथी और पैदल-सैनिक गिरने, चक्कर काटने और आर्तनाद करने लगे ॥ २६ ॥

आविष्ट इव मद्रेशो मन्युना पौरुषेण च । प्राच्छादयदरीन् संख्ये कालसृष्ट इवान्तकः ॥ २७ ॥ प्रलयकालमें प्रकट हुए यमराजके समान मद्रराज शल्य क्रोधसे आविष्ट हुए पुरुषकी भाँति अपने पुरुषार्थसे युद्धस्थलमें शत्रुओंको बाणोंद्वारा आच्छादित करने लगे ॥

विनर्दमानो मद्रेशो मेघह्रादो महाबलः । सा वध्यमाना शल्येन पाण्डवानामनीकिनी ॥ २८ ॥ अजातशत्रुं कौन्तेयमभ्यधावद् युधिष्ठिरम् । महाबली मद्रराज मेघोंकी गर्जनाके समान सिंहनाद कर रहे थे। उनके द्वारा मारी जाती हुई पाण्डव-सेना भागकर अजातशत्रु कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके पास चली गयी ॥

तां सम्मर्द्य ततः संख्ये लघुहस्तः शितैः शरैः ॥ २९ ॥ बाणवर्षेण महता युधिष्ठिरमताडयत् । शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले शल्यने युद्धस्थलमें पैने बाणोंद्वारा पाण्डव-सेनाका मर्दन करके बड़ी भारी बाण-वर्षाके द्वारा युधिष्ठिरको भी गहरी चोट पहुँचायी ॥ २९ १/२ ॥

तमापतन्तं पत्त्यश्वैः क्रुद्धो राजा युधिष्ठिरः ॥ ३० ॥ अवारयच्छरैस्तीक्ष्णैर्महाद्विपमिवाङ्कुशैः । तब क्रोधमें भरे हुए राजा युधिष्ठिरने पैदलों और घुड़सवारोंके साथ आते हुए शल्यको अपने तीखे बाणोंसे उसी प्रकार रोक दिया, जैसे महावत अंकुशोंकी मारसे विशालकाय हाथीको आगे बढ़नेसे रोक देता है ॥ ३० १/२ ॥

तस्य शल्यः शरं घोरं मुमोचाशीविषोपमम् ॥ ३१ ॥ स निर्भिद्य महात्मानं वेगेनाभ्यपतच्च गाम् ।

उस समय शल्यने युधिष्ठिरपर विषैले सर्पके समान एक भयंकर बाणका प्रहार किया। वह बाण बड़े वेगसे महात्मा युधिष्ठिरको घायल करके पृथ्वीपर गिर पड़ा॥
ततो वृकोदरः क्रुद्धः शल्यं विव्याध सप्तभिः ॥ ३२ ॥
पञ्चभिः सहदेवस्तु नकुलो दशभिः शरैः ।
द्रौपदेयाश्च शत्रुघ्नं शूरमार्तायनिं शरैः ॥ ३३ ॥
यह देख भीमसेन कुपित हो उठे। उन्होंने सात बाणोंसे शल्यको बींध डाला। फिर सहदेवने पाँच, नकुलने दस और द्रौपदीके पुत्रोंने अनेक बाणोंसे शत्रुसूदन शूरवीर शल्यको घायल कर दिया ॥ ३२-३३ ॥
अभ्यवर्षन् महाराज मेघा इव महीधरम् ।
ततो दृष्ट्वा वार्यमाणं शल्यं पार्थैः समन्ततः ॥ ३४ ॥
कृतवर्मा कृपश्चैव संक्रुद्धावभ्यधावताम् ।
उलूकश्च महावीर्यः शकुनिश्चापि सौबलः ॥ ३५ ॥
समागम्याथ शनकैरश्वत्थामा महाबलः ।
तव पुत्राश्च कार्त्स्न्येन जुगुपुः शल्यमाहवे ॥ ३६ ॥
महाराज! जैसे मेघ पर्वतपर पानी बरसाते हैं, उसी प्रकार वे शल्यपर बाणोंकी वर्षा कर रहे थे। शल्यको कुन्तीके पुत्रोंद्वारा सब ओरसे अवरुद्ध हुआ देख कृतवर्मा और कृपाचार्य क्रोधमें भरकर उनकी ओर दौड़े आये। साथ ही महापराक्रमी उलूक, सुबलपुत्र शकुनि, महाबली अश्वत्थामा तथा आपके सम्पूर्ण पुत्र भी धीरे-धीरे वहाँ आकर रणभूमिमें शल्यकी रक्षा करने लगे ॥ ३४—३६ ॥
भीमसेनं त्रिभिर्विद्ध्वा कृतवर्मा शिलीमुखैः ।
बाणवर्षेण महता क्रुद्धरूपमवारयत् ॥ ३७ ॥
कृतवर्माने क्रोधमें भरे हुए भीमसेनको तीन बाणोंसे घायल करके भारी बाण-वर्षाके द्वारा आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ३७ ॥
धृष्टद्युम्नं कृपः क्रुद्धो बाणवर्षैरपीडयत् ।
द्रौपदेयांश्च शकुनिर्ययौ च द्रौणिरभ्ययात् ॥ ३८ ॥
तत्पश्चात् कुपित हुए कृपाचार्यने धृष्टद्युम्नको अपनी बाण-वर्षाद्वारा पीड़ित कर दिया। शकुनिने द्रौपदीके पुत्रोंपर और अश्वत्थामाने नकुल-सहदेवपर धावा किया ॥ ३८ ॥
दुर्योधनो युधां श्रेष्ठ आहवे केशवार्जुनौ ।
समभ्ययादुग्रतेजाः शरैश्चाप्यहनद् बली ॥ ३९ ॥
योद्धाओंमें श्रेष्ठ, भयंकर तेजस्वी और बलवान् दुर्योधनने समरांगणमें श्रीकृष्ण और अर्जुनपर चढ़ाई की तथा बाणोंद्वारा उन्हें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३९ ॥
एवं द्वन्द्वशतान्यासंस्त्वदीयानां परैः सह ।
घोररूपाणि चित्राणि तत्र तत्र विशाम्पते ॥ ४० ॥

प्रजानाथ! इस प्रकार जहाँ-तहाँ आपके सैनिकोंके शत्रुओंके साथ सैकड़ों भयानक एवं विचित्र द्वन्द्वयुद्ध होने लगे ॥ ४० ॥ ऋक्षवर्णाञ्जघानाश्वान् भोजो भीमस्य संयुगे । सोऽवतीर्य रथोपस्थाद्धताश्वात् पाण्डुनन्दनः ॥ ४१ ॥ कालो दण्डमिवोद्यम्य गदापाणिरयुध्यत । कृतवर्माने युद्धस्थलमें भीमसेनके रीछके समान रंगवाले घोड़ोंको मार डाला। घोड़ोंके मारे जानेपर पाण्डुनन्दन भीमसेन रथकी बैठकसे नीचे उतरकर हाथमें गदा ले युद्ध करने लगे, मानो यमराज अपना दण्ड उठाकर प्रहार कर रहे हों ॥ ४१ १/२ ॥ प्रमुखे सहदेवस्य जघानाश्वान् स मद्रराट् ॥ ४२ ॥ ततः शल्यस्य तनयं सहदेवोऽसिनावधीत् । मद्रराज शल्यने अपने सामने आये हुए सहदेवके घोड़ोंको मार डाला। तब सहदेवने भी शल्यके पुत्रको तलवारसे मार गिराया ॥ ४२ १/२ ॥ गौतमः पुनराचार्यो धृष्टद्युम्नमयोधयत् ॥ ४३ ॥ असम्भ्रान्तमसम्भ्रान्तो यत्नवान् यत्नवत्तरम् । कृपाचार्य बिना किसी घबराहटके विजयके लिये यत्नशील हो सम्भ्रमरहित और अधिक प्रयत्नशील धृष्टद्युम्नके साथ युद्ध करने लगे ॥ ४३ १/२ ॥ द्रौपदेयांस्तथा वीरानेकैकं दशभिः शरैः ॥ ४४ ॥ अविद्ध्यदाचार्यसुतो नातिक्रुद्धो हसन्निव । आचार्य द्रोणके पुत्र अश्वत्थामाने अधिक क्रुद्ध न होकर हँसते हुए-से दस-दस बाणोंद्वारा द्रौपदीके वीर पुत्रोंमेंसे प्रत्येकको घायल कर दिया ॥ ४४ १/२ ॥ पुनश्च भीमसेनस्य जघानाश्वांस्तथाऽऽहवे ॥ ४५ ॥ सोऽवतीर्य रथात्तूर्णं हताश्वः पाण्डुनन्दनः । कालो दण्डमिवोद्यम्य गदां क्रुद्धो महाबलः ॥ ४६ ॥ पोथयामास तुरगान् रथं च कृतवर्मणः । कृतवर्मा त्ववप्लुत्य रथात् तस्मादपाक्रमत् ॥ ४७ ॥ (इसी बीचमें भीमसेन दूसरे रथपर आरूढ़ हो गये थे) कृतवर्माने युद्धस्थलमें पुनः भीमसेनके घोड़ोंको मार डाला। तब घोड़ोंके, मारे जानेपर महाबली पाण्डुकुमार भीमसेन शीघ्र ही रथसे उतर पड़े और कुपित हो दण्ड उठाये कालके समान गदा लेकर उन्होंने कृतवर्माके घोड़ों तथा रथको चूर-चूर कर दिया। कृतवर्मा उस रथसे कूदकर भाग गया ॥ ४५—४७ ॥ शल्योऽपि राजन् संक्रुद्धो निघ्नन् सोमकपाण्डवान् । पुनरेव शितैर्बाणैर्युधिष्ठिरमपीडयत् ॥ ४८ ॥

राजन्! इधर शल्य भी अत्यन्त क्रोधमें भरकर सोमकों और पाण्डवयोध्दाओंका संहार करने लगे। उन्होंने पुनः पैने बाणोंद्वारा युधिष्ठिरको पीड़ा देना प्रारम्भ किया॥ तस्य भीमो रणे क्रुद्धः संदश्य दशनच्छदम् । विनाशयाभिसंधाय गदामादाय वीर्यवान् ॥ ४९ ॥ यमदण्डप्रतीकाशां कालरात्रिमिवोद्यताम् । गजवाजिमनुष्याणां देहान्तकरणीमपि ॥ ५० ॥ यह देख पराक्रमी भीमसेन कुपित हो ओठ चबाते हुए रणभूमिमें शल्यके विनाशका संकल्प लेकर यमदण्डके समान भयंकर गदा लिये उनपर टूट पड़े। हाथी, घोड़े और मनुष्योंके भी शरीरोंका विनाश करनेवाली वह गदा संहारके लिये उद्यत हुई कालरात्रिके समान जान पड़ती थी॥ हेमपट्टपरिक्षिप्तामुल्कां प्रज्वलितामिव । शैक्यां व्यालीमिवान्युग्रां वज्रकल्पामयोमयीम् ॥ ५१ ॥ चन्दनागुरुपङ्काक्तां प्रमदामीप्सितामिव । वसामेदोपदिग्धाङ्गीं जिह्वां वैवस्वतीमिव ॥ ५२ ॥ उसके ऊपर सोनेका पत्र जड़ा गया था। वह लोहेकी बनी हुई वज्रतुल्य गदा प्रज्वलित उल्का तथा छींकेपर बैठी हुई सर्पिणीके समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होती थी। अंगोंमें चन्दन और अगुरुका लेप लगाये हुए मनचाही प्रियतमा रमणीके समान उसके सर्वांगमें वसा और मेद लिपटे हुए थे। वह देखनेमें यमराजकी जिह्वाके समान भयंकर थी ॥ ५१-५२ ॥ पटुघण्टाशतरवां वासवीमशनीमिव । निर्मुक्ताशीविषाकारां पृक्तां गजमदैरपि ॥ ५३ ॥ त्रासनीं सर्वभूतानां स्वसैन्यपरिहर्षिणीम् । मनुष्यलोके विख्यातां गिरिशृङ्गविदारिणीम् ॥ ५४ ॥ उसमें सैकड़ों घंटियाँ लगी थीं, जिनका कलरव गूँजता रहता था। वह इन्द्रके वज्रकी भाँति भयानक जान पड़ती थी। केंचुलसे छूटे हुए विषधर सर्पके समान वह सम्पूर्ण प्राणियोंके मनमें भय उत्पन्न करती थी और अपनी सेनाका हर्ष बढ़ाती रहती थी। उसमें हाथीके मद लिपटे हुए थे। पर्वतशिखरोंको विदीर्ण करनेवाली वह गदा मनुष्यलोकमें सर्वत्र विख्यात है॥ ५३-५४ ॥ यया कैलासभवने महेश्वरसखं बली । आह्वयामास युद्धाय भीमसेनो महाबलः ॥ ५५ ॥ यह वही गदा है, जिसके द्वारा महाबली भीमसेनने कैलासशिखरपर भगवान् शंकरके सखा कुबेरको युद्धके लिये ललकारा था॥ ५५ ॥ यया मायामयान् दृप्तान् सुबहून् धनदालये । जघान गुह्यकान् क्रुद्धो नदन् पार्थो महाबलः ॥ ५६ ॥

निवार्यमाणो बहुभिर्द्रौपद्याः प्रियमास्थितः । तथा जिसके द्वारा क्रोधमें भरे हुए महाबलवान् कुन्तीकुमार भीमने बहुतोंके मना करनेपर भी द्रौपदीका प्रिय करनेके लिये उद्यत हो गर्जना करते हुए कुबेरभवनमें रहनेवाले बहुत-से मायामय अभिमानी गुह्यकोंका वध किया था ।। ५६ १/२ ।। तां वज्रमणिरत्नौघकल्मषां वज्रगौरवाम् ।। ५७ ।। समुद्यम्य महाबाहुः शल्यमभ्यपतद् रणे । जिसमें वज्रकी गुरुता भरी है और जो हीरे, मणि तथा रत्नसमूहोंसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करती है, उसीको हाथमें उठाकर महाबाहु भीमसेन रणभूमिमें शल्यपर टूट पड़े ।। ५७ १/२ ।। गदया युद्धकुशलस्तया दारुणनादया ।। ५८ ।। पोथयामास शल्यस्य चतुरोऽश्वान् महाजवान् । युद्धकुशल भीमसेनने भयंकर शब्द करनेवाली उस गदाके द्वारा शल्यके महान् वेगशाली चारों घोड़ोंको मार गिराया ।। ५८ १/२ ।। ततः शल्यो रणे क्रुद्धः पीने वक्षसि तोमरम् ।। ५९ ।। निचखान नदन् वीरो वर्म भित्त्वा च सोऽभ्ययात् । तब रणभूमिमें कुपित हो गर्जना करते हुए वीर शल्यने भीमसेनके विशाल वक्षःस्थलमें एक तोमर धँसा दिया। वह उनके कवचको छेदकर छातीमें गड़ गया ।। वृकोदरस्त्वसम्भ्रान्तस्तमेवोद्धृत्य तोमरम् ।। ६० ।। यन्तारं मद्रराजस्य निर्बिभेद ततो हृदि । इससे भीमसेनको तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्होंने उसी तोमरको निकालकर उसके द्वारा मद्रराज शल्यके सारथिकी छाती छेद डाली ।। ६० १/२ ।। स भिन्नमर्मा रुधिरं वमन् वित्रस्तमानसः ।। ६१ ।। पपाताभिमुखो दीनो मद्रराजस्त्वपाक्रमत् । इससे सारथिका मर्मस्थल विदीर्ण हो गया और वह मुँहसे रक्त वमन करता हुआ दीन एवं भयभीतचित्त होकर शल्यके सामने ही रथसे नीचे गिर पड़ा। फिर तो मद्रराज शल्य वहाँसे पीछे हट गये ।। ६१ १/२ ।। कृतप्रतिकृतं दृष्ट्वा शल्यो विस्मितमानसः ।। ६२ ।। गदामाश्रित्य धर्मात्मा प्रत्यमित्रमैक्षत । अपने प्रहारका भरपूर उत्तर प्राप्त हुआ देख धर्मात्मा शल्यका चित्त आश्चर्यसे चकित हो उठा। वे गदा हाथमें लेकर अपने शत्रु की ओर देखने लगे ।। ६२ १/२ ।। ततः सुमनसः पार्था भीमसेनमपूजयन् । ते दृष्ट्वा कर्म संग्रामे घोरमक्लिष्टकर्मणः ।। ६३ ।।

संग्राममें अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भीमसेनका वह घोर पराक्रम देखकर कुन्तीके सभी पुत्र प्रसन्नचित्त हो उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ६३ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि भीमसेनशल्ययुद्धे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें भीमसेन और शल्यका युद्धविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥

संजय कहते हैं—राजन्! अपने सारथिको गिरा हुआ देख मद्रराज शल्य वेगपूर्वक लोहेकी गदा हाथमें लेकर पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े हो गये ॥ १ ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्वादशोऽध्यायः

भीमसेन और शल्यका भयानक गदायुद्ध तथा युधिष्ठिरके साथ शल्यका युद्ध, दुर्योधनद्वारा चेकितानका और युधिष्ठिरद्वारा चन्द्रसेन एवं द्रुमसेनका वध, पुनः युधिष्ठिर और माद्रीपुत्रोंके साथ शल्यका युद्ध

संजय उवाच

पतितं प्रेक्ष्य यन्तारं शल्यः सर्वायसीं गदाम् ।
आदाय तरसा राजंस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! अपने सारथिको गिरा हुआ देख मद्रराज शल्य वेगपूर्वक लोहेकी गदा हाथमें लेकर पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े हो गये ॥ १ ॥

तं दीप्तमिव कालाग्निं पाशहस्तमिवान्तकम् ।
सशृङ्गमिव कैलासं सवज्रमिव वासवम् ॥ २ ॥
सशूलमिव हर्यक्षं वने मत्तमिव द्विपम् ।
जवेनाभ्यपतद् भीमः प्रगृह्य महतीं गदाम् ॥ ३ ॥
वे प्रलयकालकी प्रज्वलित अग्नि, पाशधारी यमराज, शिखरयुक्त कैलास, वज्रधारी इन्द्र, त्रिशूलधारी रुद्र तथा जंगलके मतवाले हाथीके समान भयंकर जान पड़ते थे। भीमसेन बहुत बड़ी गदा हाथमें लेकर वेगपूर्वक उनके ऊपर टूट पड़े ॥ २-३ ॥

ततः शङ्खप्रणादश्च तूर्याणां च सहस्रशः ।
सिंहनादश्च संजज्ञे शूराणां हर्षवर्धनः ॥ ४ ॥
फिर तो शंखनाद, सहस्रों वाद्योंका गम्भीर घोष तथा शूरवीरोंका हर्ष बढ़ानेवाला सिंहनाद सब ओर होने लगा ॥

प्रेक्षन्तः सर्वतस्तौ हि योधा योधमहाद्विपौ ।
तावकाश्चापरे चैव साधु साध्वित्यपूजयन् ॥ ५ ॥
योद्धाओंमें महान् गजराजके समान पराक्रमी उन दोनों वीरोंको देखकर आपके और शत्रुपक्षके योद्धा सब ओरसे 'वाह-वाह' कहकर उनके प्रति सम्मान प्रकट करने लगे — ॥ ५ ॥

न हि मद्राधिपादन्यो रामाद् वा यदुनन्दनात् ।
सोढुमुत्सहते वेगं भीमसेनस्य संयुगे ॥ ६ ॥
'संसारमें मद्रराज शल्य अथवा यदुनन्दन बलरामजीके सिवा दूसरा कोई ऐसा योद्धा नहीं है, जो युद्धमें भीमसेनका वेग सह सके ॥ ६ ॥

तथा मद्राधिपस्यापि गदावेगं महात्मनः । सोढुमुत्सहते नान्यो योधो युधि वृकोदरात् ॥ ७ ॥ 'इसी प्रकार महामना मद्रराज शल्यकी गदाका वेग भी रणभूमिमें भीमसेनके सिवा दूसरा कोई योद्धा नहीं सह सकता' ॥ ७ ॥

तौ वृषाविव नर्दन्तौ मण्डलानि विचेरतुः । आवर्तितौ गदाहस्तौ मद्रराजवृकोदरौ ॥ ८ ॥ शल्य और भीमसेन दोनों वीर हाथमें गदा लिये साँड़ोंकी तरह गर्जते हुए चक्कर लगाने और पैंतरे देने लगे ॥ ८ ॥

मण्डलावर्तमार्गेषु गदाविहरणेषु च । निर्विशेषमभूद् युद्धं तयोः पुरुषसिंहयोः ॥ ९ ॥ मण्डलाकार गतिसे घूमनेमें, भाँति-भाँतिके पैंतरे दिखानेकी कलामें तथा गदाका प्रहार करनेमें उन दोनों पुरुषसिंहोंमें कोई भी अन्तर नहीं दिखायी देता था, दोनों एक-से जान पड़ते थे ॥ ९ ॥

तप्तहेममयैः शुभ्रैर्बभूव भयवर्धिनी । अग्निज्वालैरिवाबद्धा पट्टैः शल्यस्य सा गदा ॥ १० ॥ तपाये हुए उज्ज्वल सुवर्णमय पत्रोंसे जड़ी हुई शल्यकी वह भयंकर गदा आगकी ज्वालाओंसे लिपटी हुई-सी प्रतीत होती थी ॥ १० ॥

तथैव चरतो मार्गान् मण्डलेषु महात्मनः । विद्युदभ्रप्रतीकाशा भीमस्य शुशुभे गदा ॥ ११ ॥ इसी प्रकार मण्डलाकार गतिसे विचित्र पैंतरोंके साथ विचरते हुए महामनस्वी भीमसेनकी गदा बिजलीसहित मेघके समान सुशोभित होती थी ॥ ११ ॥

ताडिता मद्रराजेन भीमस्य गदया गदा । दह्यमानेव खे राजन् सासृजत् पावकार्चिषः ॥ १२ ॥ राजन्! मद्रराजने अपनी गदासे जब भीमसेनकी गदापर चोट की, तब वह प्रज्वलित-सी हो उठी और उससे आगकी लपटें निकलने लगीं ॥ १२ ॥

तथा भीमेन शल्यस्य ताडिता गदया गदा । अङ्गारवर्षं मुमुचे तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १३ ॥ इसी प्रकार भीमसेनकी गदासे ताड़ित होकर शल्यकी गदा भी अंगारे बरसाने लगी। वह अद्भुत-सा दृश्य हुआ ॥ १३ ॥

दन्तैरिव महानागौ शृङ्गैरिव महर्षभौ । तोत्रैरिव तदान्योन्यं गदाग्राभ्यां निजघ्नतुः ॥ १४ ॥ जैसे दो विशाल हाथी दाँतोंसे और दो बड़े-बड़े साँड़ सींगोंसे एक-दूसरेपर चोट करते हैं, उसी प्रकार अंकुशों-जैसी उन श्रेष्ठ गदाओं़द्वारा वे दोनों वीर एक-दूसरेपर आघात करने

लगे ।। १४ ।। तौ गदाभिहतैर्गात्रैः क्षणेन रुधिरोक्षितौ । प्रेक्षणीयतरावास्तां पुष्पिताविव किंशुकौ ।। १५ ।। उन दोनोंके अंगोंमें गदाकी गहरी चोटोंसे घाव हो गये थे। अतः दोनों ही क्षणभरमें खूनसे नहा गये। उस समय खिले हुए दो पलाशवृक्षोंके समान वे दोनों वीर देखने ही योग्य जान पड़ते थे ।। १५ ।।

गदया मद्रराजस्य सव्यदक्षिणमाहतः । भीमसेनो महाबाहुर्न चचालाचलो तथा ।। १६ ।। मद्रराजकी गदासे दायें-बायें अच्छी तरह चोट खाकर भी महाबाहु भीमसेन विचलित नहीं हुए। वे पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े रहे ।। १६ ।।

तथा भीमगदावेगैस्ताड्यमानो मुहुर्मुहुः । शल्यो न विव्यथे राजन् दन्तिनेव महागिरिः ।। १७ ।। इसी प्रकार भीमसेनकी गदाके वेगसे बारंबार आहत होनेपर भी शल्यको उसी प्रकार व्यथा नहीं हुई, जैसे दन्तार हाथीके आघातसे महान् पर्वत पीड़ित नहीं होता ।। १७ ।।

शुश्रुवे दिक्षु सर्वासु तयोः पुरुषसिंहयोः । गदानिपातसंहादो वज्रयोरिव निःस्वनः ।। १८ ।। उस समय उन दोनों पुरुषसिंहोंकी गदाओंके टकरानेकी आवाज सम्पूर्ण दिशाओंमें दो वज्रोंके आघातके समान सुनायी देती थी ।। १८ ।।

निवृत्य तु महावीर्यौ समुच्छ्रितमहागदौ । पुनरन्तरमार्गस्थौ मण्डलानि विचेरतुः ।। १९ ।। महापराक्रमी भीमसेन और शल्य दोनों वीर अपनी विशाल गदाओंको ऊपर उठाये कभी पीछे लौट पड़ते, कभी मध्यम मार्गमें स्थित होते और कभी मण्डलाकार घूमने लगते थे ।। १९ ।।

अथाभ्येत्य पदान्यष्टौ संनिपातोऽभवत् तयोः । उद्यम्य लोहदण्डाभ्यामतिमानुषकर्मणोः ।। २० ।। वे युद्ध करते-करते आठ कदम आगे बढ़ आये और लोहेके डंडे उठाकर एक-दूसरेको मारने लगे। उनका पराक्रम अलौकिक था। उन दोनोंमें उस समय भयानक संघर्ष होने लगा ।। २० ।।

पोथयन्तौ तदान्योन्यं मण्डलानि विचेरतुः । क्रियाविशेषं कृतिनौ दर्शयामासतुस्तदा ।। २१ ।। वे दोनों युद्धकलाके विद्वान् वीर, एक-दूसरेको कुचलते हुए मण्डलाकार विचरते और अपना-अपना विशेष कार्य-कौशल प्रदर्शित करते थे ।। २१ ।।

अथोद्यम्य गदे घोरे सशृङ्गाविव पर्वतौ ।

तावाजघ्नतुरन्योन्यं मण्डलानि विचेरतुः ॥ २२ ॥
तदनन्तर वे पुनः अपनी भयंकर गदाएँ उठाकर शिखरयुक्त दो पर्वतोंके समान परस्पर आघात करने और मण्डलाकार गतिसे विचरने लगे ॥ २२ ॥
क्रियाविशेषकृतिनौ रणभूमितलेऽचलौ ।
तौ परस्परसंरम्भाद् गदाभ्यां सुभृशाहतौ ॥ २३ ॥
युगपत् पेततुर्वीरावुभाविन्द्रध्वजाविव ।
उभयोः सेनयोर्वीरास्तदा हाहाकृतोऽभवन् ॥ २४ ॥
युद्धविषयक कार्यविशेषके ज्ञाता वे दोनों वीर अविचलभावसे रणभूमिमें डटे हुए थे। वे एक-दूसरेपर क्रोधपूर्वक गदाओंका प्रहार करके अत्यन्त घायल हो गये और दो इन्द्रध्वजोंके समान एक ही साथ पृथ्वीपर गिर पड़े। उस समय दोनों सेनाओंके वीर हाहाकार करने लगे ॥

भृशं मर्माण्यभिहतावुभावास्तां सुविह्वलौ ।
ततः स्वरथमारोप्य मद्राणामृषभं रणे ॥ २५ ॥
अपोवाह कृपः शल्यं तूर्णमायोधनादथ ।
भीम और शल्य दोनोंके मर्मस्थानोंमें गहरी चोटें लगी थीं; इसलिये दोनों ही अत्यन्त व्याकुल हो गये थे। इतनेहीमें कृपाचार्य मद्रराज शल्यको अपने रथपर बिठाकर तुरंत ही युद्धभूमिसे दूर हटा ले गये ॥ २५ १/२ ॥

क्षीणवद् विह्वलत्वात् तु निमेषात् पुनरुत्थितः ॥ २६ ॥
भीमसेनो गदापाणिः समाह्वयत मद्रपम् ।
इधर गदाधारी भीमसेन पलक मारते-मारते पुनः होशमें आकर उठ खड़े हुए और विह्वलताके कारण मतवाले पुरुषके समान मद्रराजको युद्धके लिये ललकारने लगे ॥

ततस्तु तावकाः शूरा नानाशस्त्रसमायुताः ॥ २७ ॥
नानावादित्रशब्देन पाण्डुसेनामयोधयन् ।
तब आपके सैनिक नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर भाँति-भाँतिके रणवाद्योंकी गम्भीर ध्वनिके साथ पाण्डव-सेनासे युद्ध करने लगे ॥ २७ १/२ ॥

भुजावुच्छ्रित्य शस्त्रं च शब्देन महता ततः ॥ २८ ॥
अभ्यद्रवन् महाराज दुर्योधनपुरोगमाः ।
महाराज! दुर्योधन आदि कौरववीर दोनों हाथ और शस्त्र उठाकर महान् कोलाहल एवं सिंहनाद करते हुए शत्रुओंपर टूट पड़े ॥ २८ १/२ ॥

तदनीकमभिप्रेक्ष्य ततस्ते पाण्डुनन्दनाः ॥ २९ ॥
प्रययुः सिंहनादेन दुर्योधनपुरोगमान् ।
उस कौरवदलको धावा करते देख पाण्डव-वीर सिंहके समान गर्जना करके दुर्योधन आदिकी ओर बढ़ चले ॥ २९ १/२ ॥

तेषामापततां तूर्णं पुत्रस्ते भरतर्षभ ।। ३० ।। प्रासेन चेकितानं वै विव्याध हृदये भृशम् । भरतश्रेष्ठ! आपके पुत्रने तुरंत ही एक प्रासका प्रहार करके उन आक्रमणकारी पाण्डव-योद्धाओंमेंसे चेकितानकी छातीपर गहरी चोट पहुँचायी ।। ३० १/२ ।।

स पपात रथोपस्थे तव पुत्रेण ताडितः ।। ३१ ।। रुधिरौघपरिक्लिन्नः प्रविश्य विपुलं तमः । आपके पुत्रद्वारा ताड़ित होकर चेकितान अत्यन्त मूर्च्छित हो रथकी बैठकमें गिर पड़ा। उस समय उसका सारा शरीर खूनसे लथपथ हो गया था ।। ३१ १/२ ।।

चेकितानं हतं दृष्ट्वा पाण्डवेया महारथाः ।। ३२ ।। असक्तमभ्यवर्षन्त शरवर्षाणि भागशः । चेकितानको मारा गया देख पाण्डव महारथी पृथक्-पृथक् बाणोंकी लगातार वर्षा करने लगे ।। ३२ १/२ ।।

तावकानामनीकेषु पाण्डवा जितकाशिनः ।। ३३ ।। व्यचरन्त महाराज प्रेक्षणीयाः समन्ततः । महाराज! विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डव आपकी सेनाओंमें सब ओर निर्भय विचरते थे। उस समय वे देखने ही योग्य थे ।। ३३ १/२ ।।

कृपश्च कृतवर्मा च सौबलश्च महारथः ।। ३४ ।। अयोधयन् धर्मराजं मद्रराजपुरस्कृताः । तत्पश्चात् कृपाचार्य, कृतवर्मा और महारथी शकुनि मद्रराज शल्यको आगे करके धर्मराज युधिष्ठिरसे युद्ध करने लगे ।। ३४ १/२ ।।

भारद्वाजस्य हन्तारं भूरिवीर्यपराक्रमम् ।। ३५ ।। दुर्योधनो महाराज धृष्टद्युम्नमयोधयत् । राजाधिराज! आपका पुत्र दुर्योधन अत्यन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न द्रोणहन्ता धृष्टद्युम्नके साथ जूझने लगा ।।

त्रिसाहस्रास्तथा राजंस्तव पुत्रेण चोदिताः ।। ३६ ।। अयोधयन्त विजयं द्रोणपुत्रपुरस्कृताः । राजन्! आपके पुत्रसे प्रेरित हो तीन हजार योद्धा अश्वत्थामाको अगुआ बनाकर अर्जुनके साथ युद्ध करने लगे ।। ३६ १/२ ।।

विजये धृतसंकल्पाः समरे त्यक्तजीविताः ।। ३७ ।। प्राविशंस्तावका राजन् हंसा इव महत् सरः । नरेश्वर! जैसे हंस महान् सरोवरमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार आपके सैनिक समरांगणमें विजयका दृढ़ संकल्प ले प्राणोंका मोह छोड़कर शत्रुओंकी सेनामें जा घुसे ।।

ततो युद्धमभूद् घोरं परस्परवधैषिणाम् ॥ ३८ ॥ अन्योन्यवधसंयुक्तमन्योन्यप्रीतिवर्धनम् । फिर तो एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले उभयपक्षके सैनिकोंमें घोर युद्ध होने लगा। सभी एक-दूसरेके संहारके लिये सचेष्ट थे और वह युद्ध उनकी पारस्परिक प्रसन्नताको बढ़ा रहा था ॥ ३८ १/२ ॥ तस्मिन् प्रवृत्ते संग्रामे राजन् वीरवरक्षये ॥ ३९ ॥ अनिलेनेरितं घोरमुत्तस्थौ पार्थिवं रजः । राजन्! बड़े-बड़े वीरोंका विनाश करनेवाले उस घोर संग्रामके आरम्भ होते ही वायुकी प्रेरणासे धरतीकी भयंकर धूल ऊपरको उठने लगी ॥ ३९ १/२ ॥ श्रवणान्नामधेयानां पाण्डवानां च कीर्तनात् ॥ ४० ॥ परस्परं विजानीमो यदयुध्यन्नभीतवत् । उस समय उस धूलके अन्धकारमें समस्त योद्धा निर्भय-से होकर युद्ध कर रहे थे। पाण्डव तथा कौरव-योद्धा जो अपना नाम लेकर परिचय देते थे, उसे ही सुनकर हमलोग एक-दूसरेको पहचान पाते थे ॥ ४० १/२ ॥ तद्रजः पुरुषव्याघ्र शोणितेन प्रशामितम् ॥ ४१ ॥ दिशश्च विमला जातास्तस्मिंस्तमसि नाशिते । पुरुषसिंह! उस समय इतना खून बहा कि उससे वहाँ छायी हुई सारी धूल बैठ गयी। उस धूलजनित अन्धकारका नाश होनेपर सम्पूर्ण दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं ॥ तथा प्रवृत्ते संग्रामे घोररूपे भयानके ॥ ४२ ॥ तावकानां परेषां च नासीत् कश्चित् पराङ्मुखः । इस प्रकार वह घोर एवं भयानक संग्राम चलने लगा। उस समय आपके और शत्रुपक्षके योद्धाओंमेंसे कोई भी युद्धसे विमुख नहीं हुआ ॥ ४२ १/२ ॥ ब्रह्मलोकपरा भूत्वा प्रार्थयन्तो जयं युधि ॥ ४३ ॥ सुयुद्धेन पराक्रान्ता नसः स्वर्गमभीप्सवः । सबका लक्ष्य था ब्रह्मलोककी प्राप्ति। वे सभी सैनिक युद्धमें विजय चाहते और उत्तम युद्धके द्वारा पराक्रम दिखाते हुए स्वर्गलोक पानेकी अभिलाषा रखते थे ॥ भर्तृपिण्डविमोक्षार्थं भर्तृकार्यविनिश्चिताः ॥ ४४ ॥ स्वर्गसंसक्तमनसो योधा युयुधिरे तदा । सभी योद्धा स्वामीके दिये हुए अन्नके ऋणसे उऋण होनेके लिये उनके कार्यको सिद्ध करनेका दृढ़ निश्चय किये मनमें स्वर्गकी अभिलाषा रखकर उस समय उत्साहपूर्वक युद्ध कर रहे थे ॥ ४४ १/२ ॥ नानारूपाणि शस्त्राणि विसृजन्तो महारथाः ॥ ४५ ॥

अथ भूयो महाराज शरेणानतपर्व

अन्योन्यमभिगर्जन्तः प्रहरन्तः परस्परम् ।
नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करके परस्पर प्रहार करनेवाले महारथी एक-दूसरेको लक्ष्य करके गर्जना करते थे ॥ ४५ १/२ ॥
हत विध्यत गृह्णीत प्रहरध्वं निकृन्तत ॥ ४६ ॥
इति स्म वाचः श्रूयन्ते तव तेषां च वै बले ।
आपकी और पाण्डवोंकी सेनामें ‘मारो, बींध डालो, पकड़ो, प्रहार करो और टुकड़े-टुकड़े कर डालो’ ये ही बातें सुनायी देती थीं ॥ ४६ १/२ ॥
ततः शल्यो महाराज धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ४७ ॥
विव्याध निशितैर्बाणैर्हन्तुकामो महारथम् ।
महाराज! तदनन्तर राजा शल्यने महारथी धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको मार डालनेकी इच्छासे पैने बाणोंद्वारा बींध डाला ॥ ४७ १/२ ॥
तस्य पार्थो महाराज नाराचान् वै चतुर्दश ॥ ४८ ॥
मर्माण्युद्दिश्य मर्मज्ञो निचखान हसन्निव ।
महाराज! मर्मज्ञ कुन्तीकुमारने शल्यके मर्मस्थानोंको लक्ष्य करके हँसते हुए-से चौदह नाराच चलाये और उनके अंगोंमें धँसा दिये ॥ ४८ १/२ ॥
आवार्य पाण्डवं बाणैर्हन्तुकामो महाबलः ॥ ४९ ॥
विव्याध समरे क्रुद्धो बहुभिः कङ्कपत्रिभिः ।
महाबली शल्य पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको रोककर उन्हें मार डालनेकी इच्छासे समरांगणमें कंकपत्रयुक्त अनेक बाणोंद्वारा उनपर क्रोधपूर्वक प्रहार करने लगे ॥
अथ भूयो महाराज शरेणानतपर्वणा ॥ ५० ॥
युधिष्ठिरं समाजघ्ने सर्वसैन्यस्य पश्यतः ।
राजाधिराज! फिर उन्होंने सारी सेनाके देखते-देखते झुकी हुई गाँठवाले बाणसे युधिष्ठिरको घायल कर दिया ॥
धर्मराजोऽपि संक्रुद्धो मद्रराजं महायशाः ॥ ५१ ॥
विव्याध निशितैर्बाणैः कङ्कबर्हिणवाजितैः ।
तब महायशस्वी धर्मराजने भी अत्यन्त कुपित हो कंक और मोरकी पाँखोंवाले पैने बाणोंसे मद्रराज शल्यको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ५१ १/२ ॥
चन्द्रसेनं च सप्तत्या सूतं च नवभिः शरैः ॥ ५२ ॥
द्रुमसेनं चतुःषष्ट्या निजघान महारथः ।
इसके बाद महारथी युधिष्ठिरने सत्तर बाणोंसे चन्द्रसेनको, नौ बाणोंसे शल्यके सारथिको और चौंसठ बाणोंसे द्रुमसेनको मार डाला ॥ ५२ १/२ ॥
चक्ररक्षे हते शल्यः पाण्डवेन महात्मना ॥ ५३ ॥

निजघान ततो राजंश्चेदीन् वै पञ्चविंशतिम् ।
महात्मा पाण्डवके द्वारा अपने चक्ररक्षकके मारे जानेपर राजा शल्यने पचीस चेदि-योद्धाओंका संहार कर डाला ॥ ५३ १/२ ॥
सात्यकिं पञ्चविंशत्या भीमसेनं च पञ्चभिः ॥ ५४ ॥
माद्रीपुत्रौ शतेनाजौ विव्याध निशितैः शरैः ।
फिर सात्यकिको पचीस, भीमसेनको पाँच तथा माद्रीके पुत्रोंको सौ तीखे बाणोंसे रणभूमिमें घायल कर दिया ॥
एवं विचरतस्तस्य संग्रामे राजसत्तम ॥ ५५ ॥
सम्प्रेषयच्छितान् पार्थः शरानाशीविषोपमान् ।
नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार संग्राममें विचरते हुए राजा शल्यको लक्ष्य करके कुन्तीकुमारने विषधर सर्पोंके समान भयंकर एवं तीखे बाण चलाये ॥ ५५ १/२ ॥
ध्वजाग्रं चास्य समरे कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ५६ ॥
प्रमुखे वर्तमानस्य भल्लेनापाहरद् रथात् ।
कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने समरांगणमें सामने खड़े हुए शल्यकी ध्वजाके अग्रभागको एक भल्लके द्वारा रथसे काट गिराया ॥ ५६ १/२ ॥
पाण्डुपुत्रेण वै तस्य केतुं छिन्नं महात्मना ॥ ५७ ॥
निपतन्तमपश्याम गिरिशृङ्गमिवहतम् ।
महात्मा पाण्डुपुत्रके द्वारा कटकर गिरते हुए उस ध्वजको हमलोगोंने वज्रके आघातसे टूटकर नीचे गिरनेवाले पर्वत-शिखरके समान देखा था ॥ ५७ १/२ ॥
ध्वजं निपतितं दृष्ट्वा पाण्डवं च व्यवस्थितम् ॥ ५८ ॥
संक्रुद्धो मद्रराजोऽभूच्छरवर्षं मुमोच ह ।
ध्वज नीचे गिर पड़ा और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर सामने खड़े हैं; यह देखकर मद्रराज शल्यको बड़ा क्रोध हुआ और वे बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ५८ १/२ ॥
शल्यः सायकवर्षेण पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ ५९ ॥
अभ्यवर्षदमेयात्मा क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभः ।
अमेय आत्मबलसे सम्पन्न क्षत्रियशिरोमणि शल्य वृष्टिकारी मेघके समान क्षत्रियोंपर बाणोंकी वर्षा कर रहे थे ॥ ५९ १/२ ॥
सात्यकिं भीमसेनं च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ ६० ॥
एकैकं पञ्चभिर्विद्ध्वा युधिष्ठिरमपीडयत् ।
सात्यकि, भीमसेन और माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव—इनमेंसे प्रत्येकको पाँच-पाँच बाणोंसे घायल करके वे युधिष्ठिरको पीड़ा देने लगे ॥ ६० १/२ ॥
ततो बाणमयं जालं विततं पाण्डवोरसि ॥ ६१ ॥

अपश्याम महाराज मेघजालमिवोद्गतम् ।
महाराज! तदनन्तर हमलोगोंने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी छातीपर बाणोंका जाल-सा बिछा हुआ देखा, मानो आकाशमें मेघोंकी घटा घिर आयी हो ।। ६१ १/२ ।।
तस्य शल्यो रणे क्रुद्धः शरैः संनतपर्वभिः ।। ६२ ।।
दिशः संछादयामास प्रदिशश्च महारथः ।
रणभूमिमें कुपित हुए महारथी शल्यने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे युधिष्ठिरकी सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओंको ढक दिया ।। ६२ १/२ ।।
ततो युधिष्ठिरो राजा बाणजालेन पीडितः ।
बभूवाद्भुतविक्रान्तो जम्भो वृत्रहणा यथा ।। ६३ ।।
उस समय अद्भुत पराक्रमी राजा युधिष्ठिर उस बाणसमूहसे वैसे ही पीड़ित हो गये, जैसे इन्द्रने जम्भासुरको संतप्त किया था ।। ६३ ।।

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे द्वादशोऽध्यायः ।। १२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2527)

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त्रयोदशोऽध्यायः

मद्रराज शल्यका अद्भुत पराक्रम

संजय उवाच

पीडिते धर्मराजे तु मद्रराजेन मारिष ।
सात्यकिर्भीमसेनश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ १ ॥
परिवार्य रथैः शल्यं पीडयामासुराहवे ।
**संजय कहते हैं—**आर्य! जब मद्रराज शल्य धर्मराज युधिष्ठिरको पीड़ा देने लगे, तब सात्यकि, भीमसेन और माद्रीपुत्र पाण्डव नकुल-सहदेवने युद्धस्थलमें शल्यको रथोंद्वारा घेरकर उन्हें पीड़ा देना प्रारम्भ किया ॥

तमेकं बहुभिर्दृष्ट्वा पीड्यमानं महारथैः ॥ २ ॥
साधुवादो महाञ्जज्ञे सिद्धाश्चासन् प्रहर्षिताः ।
आश्चर्यमित्यभाषन्त मुनयश्चापि सङ्गताः ॥ ३ ॥
अकेले शल्यको अनेक महारथियोंद्वारा पीड़ित होते देख उनको सब ओरसे महान् साधुवाद प्राप्त होने लगा। वहाँ एकत्र हुए सिद्ध और महर्षि भी हर्षमें भरकर बोल उठे—'आश्चर्य है' ।। २-३ ।।

भीमसेनो रणे शल्यं शल्यभूतं पराक्रमे ।
एकेन विद्ध्वा बाणेन पुनर्विव्याध सप्तभिः ॥ ४ ॥
भीमसेनने रणभूमिमें अपने पराक्रमके लिये कण्टकरूप शल्यको पहले एक बाणसे घायल करके फिर सात बाणोंसे बींध डाला ।। ४ ।।

सात्यकिश्च शतेनैनं धर्मपुत्रपरीप्सया ।
मद्रेश्वरमवाकीर्य सिंहनादमथानदत् ।। ५ ।।
सात्यकि भी धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये मद्रराजको सौ बाणोंसे आच्छादित करके सिंहके समान दहाड़ने लगे ।। ५ ।।

नकुलः पञ्चभिश्चैनं सहदेवश्च पञ्चभिः ।
विद्ध्वा तं तु पुनस्तूर्णं ततो विव्याध सप्तभिः ।। ६ ।।
नकुल और सहदेवने पाँच-पाँच बाणोंसे शल्यको घायल करके फिर सात बाणोंसे उन्हें तुरंत ही बींध डाला ।।

स तु शूरो रणे यत्तः पीडितस्तैर्महारथैः ।
विकृष्य कार्मुकं घोरं वेगघ्नं भारसाधनम् ।। ७ ।।
सात्यकिं पञ्चविंशत्या शल्यो विव्याध मारिष ।
भीमसेनं तु सप्तत्या नकुलं सप्तभिस्तथा ।। ८ ।।

माननीय नरेश! समरांगणमें शूरवीर शल्यने उन महारथियोंद्वारा पीड़ित होनेपर भी विजयके लिये यत्नशील हो भार सहन करनेमें समर्थ और शत्रुके वेगका नाश करनेवाले एक भयंकर धनुषको खींचकर सात्यकिको पचीस, भीमसेनको सत्तर और नकुलको सात बाण मारे ।।

ततः सविशिखं चापं सहदेवस्य धन्विनः । छित्त्वा भल्लेन समरे विव्याधैनं त्रिसप्तभिः ।। ९ ।। तत्पश्चात् समरभूमिमें एक भल्लके द्वारा धनुर्धर सहदेवके बाणसहित धनुषको काटकर शल्यने उन्हें इक्कीस बाणोंसे घायल कर दिया ।। ९ ।।

सहदेवस्तु समरे मातुलं भूरिवर्चसम् । सज्यमन्यद् धनुः कृत्वा पञ्चभिः समताडयत् ।। १० ।। शरैराशीविषाकारैर्ज्वलज्ज्वलनसंनिभैः । तब सहदेवने संग्राममें दूसरे धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर अपने अत्यन्त तेजस्वी मामाको विषधर सर्पोंके समान भयंकर और जलती हुई आगके समान प्रज्वलित पाँच बाणोंद्वारा घायल कर दिया ।। १० १/२ ।।

सारथिं चास्य समरे शरेणानतपर्वणा ।। ११ ।। विव्याध भृशसंक्रुद्धस्तं वै भूयस्त्रिभिः शरैः । साथ ही अत्यन्त कुपित होकर उन्होंने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे उनके सारथिको भी पीट दिया और उन्हें भी पुनः तीन बाणोंसे घायल किया ।। ११ १/२ ।।

भीमसेनस्तु सप्तत्या सात्यकिर्नवभिः शरैः ।। १२ ।। धर्मराजस्तथा षष्ट्या गात्रे शल्यं समार्पयत् । तत्पश्चात् भीमसेनने सत्तर, सात्यकिने नौ और धर्मराज युधिष्ठिरने साठ बाणोंसे शल्यके शरीरको चोट पहुँचायी ।। १२ १/२ ।।

ततः शल्यो महाराज निर्विद्धस्तैर्महारथैः ।। १३ ।। सुस्राव रुधिरं गात्रैर्गैरिकं पर्वतो यथा । महाराज! उन महारथियोंद्वारा अत्यन्त घायल कर दिये जानेपर राजा शल्य अपने अंगोंसे रक्तकी धारा बहाने लगे, मानो पर्वत गेरु-मिश्रित जलका झरना बहा रहा हो ।। १३ १/२ ।।

तांश्च सर्वान् महेष्वासान् पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ।। १४ ।। विव्याध तरसा राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् । राजन्! उन्होंने उन सभी महाधनुर्धरोंको पाँच-पाँच बाणोंसे वेगपूर्वक घायल कर दिया। वह उनके द्वारा अद्भुत-सा कार्य हुआ ।। १४ १/२ ।।

ततोऽपरेण भल्लेन धर्मपुत्रस्य मारिष ।। १५ ।।

धनुश्चिच्छेद समरे सज्‍यं स सुमहारथः ।
मान्यवर! तदनन्तर उन श्रेष्ठ महारथी शल्यने समरांगणमें एक दूसरे भल्लके द्वारा धर्मपुत्र युधिष्ठिरके प्रत्यंचासहित धनुषको काट डाला ॥ १५ १/२ ॥
अथान्यद् धनुरदाय धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १६ ॥
साश्वसूतध्वजरथं शल्यं प्राच्छादयच्छरैः ।
तब धर्मपुत्र युधिष्ठिरने दूसरा धनुष हाथमें लेकर घोड़े, सारथि, ध्वज और रथसहित शल्यको अपने बाणोंसे आच्छादित कर दिया ॥ १६ १/२ ॥
स च्छाद्यमानः समरे धर्मपुत्रस्य सायकैः ॥ १७ ॥
युधिष्ठिरमथाविध्यद् दशभिर्निशितैः शरैः ।
समरांगणमें धर्मपुत्रके बाणोंसे आच्छादित होते हुए शल्यने युधिष्ठिरको दस पैने बाणोंसे बींध डाला ॥ १७ १/२ ॥
सात्यकिस्तु ततः क्रुद्धो धर्मपुत्रे शरार्दिते ॥ १८ ॥
मद्राणामधिपं शूरं शरैर्विव्याध पञ्चभिः ।
जब धर्मपुत्र युधिष्ठिर शल्यके बाणोंसे पीड़ित हो गये, तब क्रोधमें भरे हुए सात्यकिने शूरवीर मद्रराजपर पाँच बाणोंका प्रहार किया ॥ १८ १/२ ॥
स सात्यकेः प्रचिच्छेद क्षुरप्रेण महद् धनुः ॥ १९ ॥
भीमसेनमुखांस्तांश्च त्रिभिस्त्रिभिरताडयत् ।
यह देख शल्यने एक क्षुरप्रसे सात्यकिके विशाल धनुषको काट दिया और भीमसेन आदिको भी तीन-तीन बाणोंसे चोट पहुँचायी ॥ १९ १/२ ॥
तस्य क्रुद्धो महाराज सात्यकिः सत्यविक्रमः ॥ २० ॥
तोमरं प्रेषयामास स्वर्णदण्डं महाधनम् ।
महाराज! तब सत्यपराक्रमी सात्यकिने कुपित हो शल्यपर सुवर्णमय दण्डसे विभूषित एक बहुमूल्य तोमरका प्रहार किया ॥ २० १/२ ॥
भीमसेनोऽथ नाराचं ज्वलन्तमिव पन्नगम् ॥ २१ ॥
नकुलः समरे शक्तिं सहदेवो गदां शुभाम् ।
धर्मराजः शतघ्नीं च जिघांसुः शल्यमाहवे ॥ २२ ॥
भीमसेनने प्रज्वलित सर्पके समान नाराच चलाया, नकुलने संग्रामभूमिमें शल्यपर शक्ति छोड़ी, सहदेवने सुन्दर गदा चलायी और धर्मराज युधिष्ठिरने रणक्षेत्रमें शल्यको मार डालनेकी इच्छासे उनपर शतघ्नीका प्रहार किया ॥ २१-२२ ॥
तानापतत एवाशु पञ्चानां वै भुजच्युतान् ।
वारयामास समरे शस्त्रसङ्घैः स मद्रराट् ॥ २३ ॥

परंतु मद्रराज शल्यने समरांगणमें अपने शस्त्रसमूहों द्वारा उन पाँचों वीरोंके हाथोंसे छूटे हुए उक्त सभी अस्त्रोंका शीघ्र ही निवारण कर दिया ।। २३ ।।
सात्यकिप्रहितं शल्यो भल्लैश्चिच्छेद तोमरम् ।
प्रहितं भीमसेनेन शरं कनकभूषणम् ।। २४ ।।
द्विधा चिच्छेद समरे कृतहस्तः प्रतापवान् ।
सिद्धहस्त एवं प्रतापी वीर शल्यने अपने भल्लोंद्वारा सात्यकिके चलाये हुए तोमरके टुकड़े-टुकड़े कर डाले और भीमसेनके छोड़े हुए सुवर्णभूषित बाणके दो खण्ड कर डाले ।। २४ १/२ ।।
नकुलप्रोषितां शक्तिं हेमदण्डां भयावहाम् ।। २५ ।।
गदां च सहदेवेन शरौघैः समवारयत् ।
इसी प्रकार उन्होंने नकुलकी चलायी हुई स्वर्ण-दण्ड-विभूषित भयंकर शक्तिका तथा सहदेवकी फेंकी हुई गदाका भी अपने बाणसमूहोंद्वारा निवारण कर दिया ।।
शराभ्यां च शतघ्नीं तां राजंश्चिच्छेद भारत ।। २६ ।।
पश्यतां पाण्डुपुत्राणां सिंहनादं ननाद च ।
भारत! फिर शल्यने दो बाणोंसे राजा युधिष्ठिरकी उस शतघ्नीको भी पाण्डवोंके देखते-देखते काट डाला और सिंहके समान दहाड़ना आरम्भ किया ।। २६ १/२ ।।
नामृष्यत्तत्र शैनेयः शत्रोर्विजयमाहवे ।। २७ ।।
अथान्यद् धनुरदाय सात्यकिः क्रोधमूर्च्छितः ।
द्वाभ्यां मद्रेश्वरं विद्ध्वा सारथिं च त्रिभिः शरैः ।। २८ ।।
युद्धमें शत्रु की इस विजयको शिनिपौत्र सात्यकि नहीं सहन कर सके। उन्होंने दूसरा धनुष हाथमें लेकर क्रोधसे आतुर हो दो बाणोंसे मद्रराजको घायल करके तीनसे उनके सारथिको भी बींध डाला ।। २७-२८ ।।
ततः शल्यो रणे राजन् सर्वान्स्तान् दशभिः शरैः ।
विव्याध भृशसंक्रुद्धस्तोत्रैरिव महाद्विपान् ।। २९ ।।
राजन्! तब राजा शल्य रणभूमिमें अत्यन्त कुपित हो उठे और जैसे महावत अंकुशोंसे बड़े-बड़े हाथियोंको चोट पहुँचाते हैं, उसी प्रकार उन्होंने उन सब योद्धाओंको दस बाणोंसे घायल कर दिया ।। २९ ।।
ते वार्यमाणाः समरे मद्रराज्ञा महारथाः ।
न शेकुः सम्मुखे स्थातुं तस्य शत्रुनिषूदनाः ।। ३० ।।
समरांगणमें मद्रराज शल्यके द्वारा इस प्रकार रोके जाते हुए शत्रुसूदन पाण्डव-महारथी उनके सामने ठहर न सके ।।
ततो दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा शल्यस्य विक्रमम् ।
निहतान् पाण्डवान् मेने पञ्चालानथ सृञ्जयान् ।। ३१ ।।

उस समय राजा दुर्योधन शल्यका वह पराक्रम देखकर ऐसा समझने लगा कि अब पाण्डव, पांचाल और सृंजय अवश्य मार डाले जायँगे ॥ ३१ ॥

ततो राजन् महाबाहुर्भीमसेनः प्रतापवान् ।
संत्यज्य मनसा प्राणान् मद्राधिपमयोधयत् ॥ ३२ ॥

राजन्! तदनन्तर प्रतापी महाबाहु भीमसेन मनसे प्राणोंका मोह छोड़कर मद्रराज शल्यके साथ युद्ध करने लगे ॥ ३२ ॥

नकुलः सहदेवश्च सात्यकिश्च महारथः ।
परिवार्य तदा शल्यं समन्ताद् व्यकिरन् शरैः ॥ ३३ ॥

नकुल, सहदेव और महारथी सात्यकिने भी उस समय शल्यको घेरकर उनके ऊपर चारों ओरसे बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ३३ ॥

स चतुर्भिर्महेष्वासैः पाण्डवानां महारथैः ।
वृतस्तान् योधयामास मद्रराजः प्रतापवान् ॥ ३४ ॥

इन चार महाधनुर्धर पाण्डवपक्षके महारथियोंसे घिरे हुए प्रतापी मद्रराज शल्य उन सबके साथ युद्ध कर रहे थे ॥ ३४ ॥

तस्य धर्मसुतो राजन् क्षुरप्रेण महाहवे ।
चक्ररक्षं जघानाशु मद्रराजस्य पार्थिवः ॥ ३५ ॥

राजन्! उन महासमरमें धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने एक क्षुरप्रद्वारा मद्रराज शल्यके चक्ररक्षकको शीघ्र ही मार डाला ॥ ३५ ॥

तस्मिंस्तु निहते शूरे चक्ररक्षे महारथे ।
मद्रराजोऽपि बलवान् सैनिकानावृणोच्छरैः ॥ ३६ ॥

अपने महारथी शूरवीर चक्ररक्षकके मारे जानेपर बलवान् मद्रराजने भी बाणोंद्वारा शत्रुपक्षके समस्त योद्धाओंको आच्छादित कर दिया ॥ ३६ ॥

समावृतांस्ततस्तांस्तु राजन् वीक्ष्य स्वसैनिकान् ।
चिन्तयामास समरे धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ३७ ॥

राजन्! समरांगणमें अपने समस्त सैनिकोंको बाणोंसे ढका हुआ देख धर्मपुत्र युधिष्ठिर मन-ही-मन इस प्रकार चिन्ता करने लगे— ॥ ३७ ॥

कथं नु समरे शक्यं तन्माधववचो महत् ।
न हि क्रुद्धो रणे राजा क्षपयेत बलं मम ॥ ३८ ॥

'इस युद्धस्थलमें भगवान् श्रीकृष्णकी कही हुई वह महत्त्वपूर्ण बात कैसे सिद्ध हो सकेगी? कहीं ऐसा न हो कि रणभूमिमें कुपित हुए महाराज शल्य मेरी सारी सेनाका संहार कर डालें ॥ ३८ ॥

(अहं मद्भ्रातरश्चैव सात्यकिश्च महारथः ।
पञ्चालाः सृञ्जयाश्चैव न शक्ताः स्म हि मद्रपम् ॥