महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कच्चिन्न निहतः संख्ये सौभद्रः परवीरहा ॥ २२ ॥ 'शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला महाधनुर्धर सुभद्राकुमार अभिमन्यु युद्धमें शत्रुओंके उस व्यूहका अनेकों बार भेदन करके अन्तमें वहीं मारा तो नहीं गया? ॥ २२ ॥ लोहिताक्षं महाबाहुं जातं सिंहमिवाद्रिषु । उपेन्द्रसदृशं ब्रूत कथमायोधने हतः ॥ २३ ॥ 'पर्वतोंमें उत्पन्न हुए सिंहके समान लाल नेत्रोंवाले, श्रीकृष्णतुल्य पराक्रमी महाबाहु अभिमन्युके विषयमें आपलोग बतावें। वह युद्धमें किस प्रकार मारा गया? ॥ २३ ॥ सुकुमारं महेष्वासं वासवस्यात्मजात्मजम् । सदा मम प्रियं ब्रूत कथमायोधने हतः ॥ २४ ॥ 'इन्द्रके पौत्र तथा मुझे सदा प्रिय लगनेवाले सुकुमार शरीर महाधनुर्धर अभिमन्युके विषयमें बताइये। वह युद्धमें कैसे मारा गया? ॥ २४ ॥ सुभद्रायाः प्रियं पुत्रं द्रौपद्याः केशवस्य च । अम्बायाश्च प्रियं नित्यं कोऽवधीत् कालमोहितः ॥ २५ ॥ 'सुभद्रा और द्रौपदीके प्यारे पुत्र अभिमन्युको, जो श्रीकृष्ण और माता कुन्तीका सदा दुलारा रहा है, किसने कालसे मोहित होकर मारा है? ॥ २५ ॥ सदृशो वृष्णिवीरस्य केशवस्य महात्मनः । विक्रमश्रुतमाहात्म्यैः कथमायोधने हतः ॥ २६ ॥ 'वृष्णिकुलके वीर महात्मा केशवके समान पराक्रमी, शास्त्रज्ञ और महत्त्वशाली अभिमन्यु युद्धमें किस प्रकार मारा गया है? ॥ २६ ॥ वार्ष्णेयदियितं शूरं मया सततलालितम् । यदि पुत्रं न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् ॥ २७ ॥ 'सुभद्राके प्राणप्यारे शूरवीर पुत्रको, जिसको मैंने सदा लाड़-प्यार किया है, यदि नहीं देखूँगा तो मैं भी यमलोक चला जाऊँगा ॥ २७ ॥ मृदुकुञ्चितकेशान्तं बालं बालमृगेक्षणम् । मत्तद्विरदविक्रान्तं शालपोतमिवोद्गतम् ॥ २८ ॥ स्मिताभिभाषिणं शान्तं गुरुवाक्यकरं सदा । बाल्येऽप्यतुलकर्माणं प्रियवाक्यममत्सरम् ॥ २९ ॥ महोत्साहं महाबाहुं दीर्घराजीवलोचनम् । भक्तानुकम्पिनं दान्तं न च नीचानुसारिणम् ॥ ३० ॥ कृतज्ञं ज्ञानसम्पन्नं कृतास्त्रमनिवर्तिनम् । युद्धाभिनन्दिनं नित्यं द्विषतां भयवर्धनम् ॥ ३१ ॥ स्वेषां प्रियहिते युक्तं पितॄणां जयगृद्धिनम् । न च पूर्वं प्रहर्तारं संग्रामे नष्टसम्भ्रमम् ॥ ३२ ॥
यदि पुत्रं न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् । ‘जिसके केशप्रान्त कोमल और घुँघराले थे, दोनों नेत्र मृगछौनेके समान चंचल थे, जिसका पराक्रम मतवाले हाथीके समान और शरीर नूतन शालवृक्षके समान ऊँचा था, जो मुसकराकर बातें करता था, जिसका मन शान्त था, जो सदा गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करता था, बाल्यावस्थामें भी जिसके पराक्रमकी कोई तुलना नहीं थी, जो सदा प्रिय वचन बोलता और किसीसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखता था, जिसमें महान् उत्साह भरा था, जिसकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी और दोनों नेत्र विकसित कमलके समान सुन्दर एवं विशाल थे, जो भक्तजनोंपर दया करता, इन्द्रियोंको वशमें रखता और नीच पुरुषोंका साथ कभी नहीं करता था, जो कृतज्ञ, ज्ञानवान्, अस्त्र-विद्यामें पारंगत, युद्धसे मुँह न मोड़नेवाला, युद्धका अभिनन्दन करनेवाला तथा सदा शत्रुओंका भय बढ़ानेवाला था, जो स्वजनोंके प्रिय और हितमें तत्पर तथा अपने पितृकुलकी विजय चाहनेवाला था, संग्राममें जिसे कभी घबराहट नहीं होती थी और जो शत्रुपर पहले प्रहार नहीं करता था, अपने उस पुत्र बालक अभिमन्युको यदि नहीं देखूँगा तो मैं भी यमलोककी राह लूँगा ॥ २८—३२ ½ ॥ रधेषु गण्यमानेषु गणितं तं महारथम् ॥ ३३ ॥ मयाध्यर्धगुणं संख्ये तरुणं बाहुशालिनम् । प्रद्युम्नस्य प्रियं नित्यं केशवस्य ममैव च ॥ ३४ ॥ यदि पुत्रं न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् । ‘रथियोंकी गणना होते समय जो महारथी गिना गया था, जिसे युद्धमें मेरी अपेक्षा ड्यौढ़ा समझा जाता था तथा अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाला जो तरुण वीर प्रद्युम्नको, श्रीकृष्णको और मुझे भी सदैव प्रिय था, उस पुत्रको यदि मैं नहीं देखूँगा तो यमराजके लोकमें चला जाऊँगा ॥ ३३-३४ ½ ॥ सुनसं सुललाटान्तं स्वक्षिभ्रूदशनच्छदम् ॥ ३५ ॥ अपश्यतस्तद्वदनं का शान्तिर्हृदयस्य मे । ‘जिसकी नासिका, ललाटप्रान्त, नेत्र, भौंह तथा ओष्ठ—ये सभी परम सुन्दर थे, अभिमन्युके उस मुखको न देखनेपर मेरे हृदयमें क्या शान्ति होगी? ॥ ३५ ½ ॥ तन्त्रीस्वनसुखं रम्यं पुंस्कोकिलसमध्वनिम् ॥ ३६ ॥ अशृण्वतः स्वनं तस्य का शान्तिर्हृदयस्य मे । ‘अभिमन्युका स्वर वीणाकी ध्वनिके समान सुखद, मनोहर तथा कोयलकी काकलीके तुल्य मधुर था। उसे न सुननेपर मेरे हृदयको क्या शान्ति मिलेगी? ॥ ३६ ½ ॥ रूपं चाप्रतिमं तस्य त्रिदशैरपि दुर्लभम् ॥ ३७ ॥ अपश्यतो हि वीरस्य का शान्तिर्हृदयस्य मे ।
'उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी। देवताओंके लिये भी वैसा रूप दुर्लभ है। यदि वीर अभिमन्युके उस रूपको नहीं देख पाता हूँ तो मेरे हृदयको क्या शान्ति मिलेगी? ।। ३७ १/२ ।।'
अभिवादनदक्षं तं पितॄणां वचने रतम् ॥ ३८ ॥
नाद्याहं यदि पश्यामि का शान्तिर्हृदयस्य मे ।
'प्रणाम करनेमें कुशल और पितृवर्गकी आज्ञाका पालन करनेमें तत्पर अभिमन्युको यदि आज मैं नहीं देखता हूँ तो मेरे हृदयको क्या शान्ति मिलेगी? ।। ३८ १/२ ।।
सुकुमारः सदा वीरो महार्हशयनोचितः ॥ ३९ ॥
भूमावनाथवच्छेते नूनं नाथवतां वरः ।
'जो सदा बहुमूल्य शय्यापर सोनेके योग्य और सुकुमार था, वह सनाथशिरोमणि वीर अभिमन्यु आज निश्चय ही अनाथकी भाँति पृथ्वीपर सो रहा है ।। ३९ १/२ ।।
शयानं समुपासन्ति यं पुरा परमस्त्रियः ॥ ४० ॥
तमद्य विप्रविद्धाङ्गमुपासन्त्यशिवाः शिवाः ।
'आजसे पहले सोते समय परम सुन्दरी स्त्रियाँ जिसकी उपासना करती थीं, अपने क्षत-विक्षत अंगोंसे पृथ्वीपर पड़े हुए उस अभिमन्युके पास आज अमंगलजनक शब्द करनेवाली सियारिनें बैठी होंगी ।। ४० १/२ ।।
यः पुरा बोध्यते सुप्तः सूतमागधवन्दिभिः ॥ ४१ ॥
बोधयन्त्यद्य तं नूनं श्वापदा विकृतैः स्वनैः ।
'जिसे पहले सो जानेपर सूत, मागध और बन्दीजन जगाया करते थे, उसी अभिमन्युको आज निश्चय ही हिंसक जन्तु अपने भयंकर शब्दोंद्वारा जगाते होंगे ।। ४१ १/२ ।।
छत्रच्छायासमुचितं तस्य तद् वदनं शुभम् ॥ ४२ ॥
नूनमद्य रजोध्वस्तं रणरेणुः करिष्यति ।
'उसका वह सुन्दर मुख सदा छत्रकी छायामें रहने योग्य था; परंतु आज युद्धभूमिमें उड़ती हुई धूल उसे आच्छादित कर देगी ।। ४२ १/२ ।।
हा पुत्रकावितृप्तस्य सततं पुत्रदर्शने ॥ ४३ ॥
भाग्यहीनस्य कालेन यथा मे नीयसे बलात् ।
'हा पुत्र! मैं बड़ा भाग्यहीन हूँ। निरन्तर तुम्हें देखते रहनेपर भी मुझे तृप्ति नहीं होती थी, तो भी काल आज बलपूर्वक तुम्हें मुझसे छीनकर लिये जा रहा है ।। ४३ १/२ ।।
सा च संयमनी नूनं सदा सुकृतिनां गतिः ॥ ४४ ॥
स्वभाभिर्भासिता रम्या त्वयात्यर्थं विराजते ।
‘निश्चय ही वह संयमनी पुरी सदा पुण्यवानोंका आश्रय है; जो आज अपनी प्रभासे प्रकाशित और मनोहारिणी होती हुई भी तुम्हारे द्वारा अत्यन्त उद्भासित हो उठी होगी॥ ४४ ½॥
नूनं वैवस्वतश्च त्वां वरुणश्च प्रियातिथिम्॥ ४५॥ शतक्रतुर्धनेशश्च प्राप्तमर्चन्त्यभीरुकम्। ‘अवश्य ही आज वैवस्वत यम, वरुण, इन्द्र और कुबेर वहाँ तुम-जैसे निर्भय वीरको अपने प्रिय अतिथिके रूपमें पाकर तुम्हारा बड़ा आदर-सत्कार करते होंगे’॥ ४५ ½ ॥
एवं विलप्य बहुधा भिन्नपोतो वणिग् यथा॥ ४६॥ दुःखेन महताऽऽविष्टो युधिष्ठिरमपृच्छत। इस प्रकार बारंबार विलाप करके टूटे हुए जहाजवाले व्यापारीकी भाँति महान् दुःखसे व्याप्त हो अर्जुनने युधिष्ठिरसे इस प्रकार पूछा—॥ ४६ ½ ॥
कच्चित्स कदनं कृत्वा परेषां कुरुनन्दन॥ ४७॥ स्वर्गतोऽभिमुखः संख्ये युध्यमानो नरर्षभैः। ‘कुरुनन्दन! क्या उन श्रेष्ठ वीरोंके साथ युद्ध करता हुआ अभिमन्यु रणभूमिमें शत्रुओंका संहार करके सम्मुख मारा जाकर स्वर्गलोकमें गया है?॥ ४७ ½ ॥
स नूनं बहुभिर्यत्तैर्युध्यमानो नरर्षभैः॥ ४८॥ असहायः सहायार्थी मामनुध्यातवान् ध्रुवम्। ‘अवश्य ही बहुत-से श्रेष्ठ एवं सावधानीके साथ प्रयत्नपूर्वक युद्ध करनेवाले योद्धाओंके साथ अकेले लड़ते हुए अभिमन्युने सहायताकी इच्छासे मेरा बारंबार स्मरण किया होगा॥ ४८ ½ ॥
पीड्यमानः शरैस्तीक्ष्णैः कर्णद्रोणकृपादिभिः॥ ४९॥ नानालिङ्गैः सुधौताग्रैर्मम पुत्रोऽल्पचेतनः। इह मे स्यात् परित्राणं पितेति स पुनः पुनः॥ ५०॥ इत्येवं विलपन् मन्ये नृशंसैर्भुवि पातितः। ‘जब कर्ण, द्रोण और कृपाचार्य आदिने चमकते हुए अग्रभागवाले नाना प्रकारके तीखे बाणोंद्वारा मेरे पुत्रको पीड़ित किया होगा और उसकी चेतना मन्द होने लगी होगी, उस समय अभिमन्युने बारंबार विलाप करते हुए यह कहा होगा कि यदि यहाँ मेरे पिताजी होते तो मेरे प्राणोंकी रक्षा हो जाती। मैं समझता हूँ, उसी अवस्थामें उन निर्दयी शत्रुओंने उसे पृथ्वीपर मार गिराया होगा॥ ४९-५० ½ ॥
अथवा मत्प्रसूतः स स्वस्रीयो माधवस्य च॥ ५१॥ सुभद्रायां च सम्भूतो न चैवं वक्तुमर्हति।
'अथवा वह मेरा पुत्र, श्रीकृष्णका भानजा था, सुभद्राकी कोखसे उत्पन्न हुआ था; इसलिये ऐसी दीनतापूर्ण बात नहीं कह सकता था ।। ५१ १/२ ।। वज्रसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम ।। ५२ ।। अपश्यतो दीर्घबाहुं रक्ताक्षं यन्न दीर्यते । 'निश्चय ही मेरा यह हृदय अत्यन्त सुदृढ़ एवं वज्रसारका बना हुआ है, तभी तो लाल नेत्रोंवाले महाबाहु अभिमन्युको न देखनेपर भी यह फट नहीं जाता है ।। ५२ १/२ ।। कथं बाले महेष्वासा नृशंसा मर्मभेदिनः ।। ५३ ।। स्वस्त्रीये वासुदेवस्य मम पुत्रेऽक्षिपन् शरान् । 'उन क्रूरकर्मा महान् धनुर्धरोंने श्रीकृष्णके भानजे और मेरे बालक पुत्रपर मर्मभेदी बाणोंका प्रहार कैसे किया? ।। ५३ १/२ ।। यो मां नित्यमदीनात्मा प्रत्युद्गम्याभिनन्दति ।। ५४ ।। उपायान्तं रिपून् हत्वा सोऽद्य मां किं न पश्यति । 'जब मैं शत्रुओंको मारकर शिविरको लौटता था, उस समय जो प्रतिदिन प्रसन्नचित्त हो आगे बढ़कर मेरा अभिनन्दन करता था, वह अभिमन्यु आज मुझे क्यों नहीं देख रहा है? ।। ५४ १/२ ।। नूनं स पातितः शेते धरण्यां रुधिरोक्षितः ।। ५५ ।। शोभयन् मेदिनीं गात्रैरादित्य इव पातितः । 'निश्चय ही शत्रुओंने उसे मार गिराया है और वह खूनसे लथपथ होकर धरतीपर पड़ा सो रहा है एवं आकाशसे नीचे गिराये हुए सूर्यकी भाँति वह अपने अंगोंसे इस भूमिकी शोभा बढ़ा रहा है ।। ५५ १/२ ।। सुभद्रामनुशोचामि या पुत्रमपलायिनम् ।। ५६ ।। रणे विनिहतं श्रुत्वा शोकार्ता वै विनङ्क्ष्यति । 'मुझे बारंबार सुभद्राके लिये शोक हो रहा है, जो युद्धसे मुँह न मोड़नेवाले अपने वीर पुत्रको रणभूमिमें मारा गया सुनकर शोकसे आतुर हो प्राण त्याग देगी ।। ५६ १/२ ।। सुभद्रा वक्ष्यते किं मामभिमन्युमपश्यती ।। ५७ ।। द्रौपदी चैव दुःखार्ते ते च वक्ष्यामि किं न्वहम् । 'अभिमन्युको न देखकर सुभद्रा मुझे क्या कहेगी? द्रौपदी भी मुझसे किस प्रकार वार्तालाप करेगी? इन दोनों दुःखकातर देवियोंको मैं क्या जवाब दूँगा? ।। ५७ १/२ ।। वज्रसारमयं नूनं हृदयं यन्न यास्यति ।। ५८ ।। सहस्रधा वधूं दृष्ट्वा रुदतीं शोककर्शिताम् । 'निश्चय ही मेरा हृदय वज्रसारका बना हुआ है, जो शोकसे कातर हुई बहू उत्तराको रोती देखकर सहस्रों टुकड़ोंमें विदीर्ण नहीं हो जाता? ।। ५८ १/२ ।।
दृप्तानां धार्तराष्ट्राणां सिंहनादो मया श्रुतः ।। ५९ ।।
युयुत्सुश्चापि कृष्णेन श्रुतो वीरानुपालभन् ।
'मैंने घमण्डमें भरे हुए धृतराष्ट्रपुत्रोंका सिंहनाद सुना है और श्रीकृष्णने यह भी सुना है कि युयुत्सु उन कौरववीरोंको इस प्रकार उपालम्भ दे रहा था ।। ५९ १/२ ।।'
अशक्नुवन्तो बीभत्सुं बालं हत्वा महारथाः ।। ६० ।।
किं मोदध्वमधर्मज्ञाः पाण्डवं दृश्यतां बलम् ।
'युयुत्सु कह रहा था, धर्मको न जाननेवाले महारथी कौरवो! अर्जुनपर जब तुम्हारा वश न चला, तब तुम एक बालककी हत्या करके क्यों आनन्द मना रहे हो? कल पाण्डवोंका बल देखना ।। ६० १/२ ।।'
किं तयोर्विप्रियं कृत्वा केशवार्जुनयोर्मृधे ।। ६१ ।।
सिंहवन्नदथ प्रीताः शोककाल उपस्थिते ।
'रणक्षेत्रमें श्रीकृष्ण और अर्जुनका अपराध करके तुम्हारे लिये शोकका अवसर उपस्थित है, ऐसे समयमें तुमलोग प्रसन्न होकर सिंहनाद कैसे कर रहे हो? ।। ६१ १/२ ।।'
आगमिष्यति वः क्षिप्रं फलं पापस्य कर्मणः ।। ६२ ।।
अधर्मो हि कृतस्तीव्रः कथं स्यादफलश्चिरम् ।
'तुम्हारे पापकर्मका फल तुम्हें शीघ्र ही प्राप्त होगा। तुमलोगोंने घोर पाप किया है। उसका फल मिलनेमें अधिक विलम्ब कैसे हो सकता है? ।। ६२ १/२ ।।'
इति तान् परिभाषन् वै वैश्यापुत्रो महामतिः ।। ६३ ।।
अपायाच्छस्त्रमुत्सृज्य कोपदुःखसमन्वितः ।
'राजा धृतराष्ट्रकी वैश्यजातीय पत्नीका परम बुद्धिमान् पुत्र युयुत्सु कोप और दुःखसे युक्त हो कौरवोंसे उपर्युक्त बातें कहकर शस्त्र त्यागकर चला आया है' ।।
किमर्थमेतन्नाख्यातं त्वया कृष्ण रणे मम ।। ६४ ।।
अधाक्षं तानहं क्रूरांस्तदा सर्वान् महारथान् ।
'श्रीकृष्ण! आपने रणक्षेत्रमें ही यह बात मुझसे क्यों नहीं बता दी? मैं उसी समय उन समस्त क्रूर महारथियोंको जलाकर भस्म कर डालता' ।। ६४ १/२ ।।
संजय उवाच
पुत्रशोकार्दितं पार्थं ध्यायन्तं साश्रुलोचनम् ।। ६५ ।।
निगृह्य वासुदेवस्तं पुत्राधिभिरभिप्लुतम् ।
मैवमित्यब्रवीत् कृष्णस्तीव्रशोकसमन्वितम् ।। ६६ ।।
संजय कहते हैं—महाराज! इस प्रकार अर्जुनको पुत्रशोकसे पीड़ित और उसीका चिन्तन करते हुए नेत्रोंसे आँसू बहाते देख भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें पकड़कर सँभाला। वे
पुत्रवियोगके कारण होनेवाली गहरी मनोव्यथामें डूबे हुए थे और तीव्र शोक उन्हें संतप्त कर रहा था। भगवान् बोले—‘मित्र! ऐसे व्याकुल न होओ।। ६५-६६ ।। सर्वेषामेष वै पन्थाः शूराणामनिवर्तिनाम् । क्षत्रियाणां विशेषेण येषां युद्धेन जीविका ।। ६७ ।। ‘युद्धमें पीठ न दिखानेवाले सभी शूरवीरोंका यही मार्ग है। विशेषतः उन क्षत्रियोंको, जिनकी युद्धसे जीविका चलती है, इस मार्गसे जाना ही पड़ता है ।। ६७ ।। एषा वै युध्यमानानां शूराणामनिवर्तिनाम् । विहिता सर्वशास्त्रज्ञैर्गतिर्मतिमतां वर ।। ६८ ।। ‘बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ वीर! जो युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते हैं, उन युद्धपरायण शूरवीरोंके लिये सम्पूर्ण शास्त्रज्ञोंने यही गति निश्चित की है ।। ६८ ।। ध्रुवं हि युद्धे मरणं शूराणामनिवर्तिनाम् । गतः पुण्यकृतां लोकानभिमन्युर्न संशयः ।। ६९ ।। ‘पीछे पैर न हटानेवाले शूरवीरोंका युद्धमें मरण अवश्यम्भावी है। अभिमन्यु पुण्यात्मा पुरुषोंके लोकमें गया है, इसमें संशय नहीं है ।। ६९ ।। एतच्च सर्ववीराणां काङ्क्षितं भरतर्षभ । संग्रामेऽभिमुखो मृत्युं प्राप्नुयादिति मानद ।। ७० ।। ‘दूसरोंको मान देनेवाले भरतश्रेष्ठ! संग्राममें सम्मुख युद्ध करते हुए वीरको मृत्युकी प्राप्ति हो, यही सम्पूर्ण शूरवीरोंका अभीष्ट मनोरथ हुआ करता है ।। ७० ।। स च वीरान् रणे हत्वा राजपुत्रान् महाबलान् । वीरैराकाङ्क्षितं मृत्युं सम्प्राप्तोऽभिमुखं रणे ।। ७१ ।। ‘अभिमन्युने रणक्षेत्रमें महाबली वीर राजकुमारोंका वध करके वीर पुरुषोंद्वारा अभिलषित संग्राममें सम्मुख मृत्यु प्राप्त की है ।। ७१ ।। मा शुचः पुरुषव्याघ्र पूर्वैरेष सनातनः । धर्मकृद्भिः कृतो धर्मः क्षत्रियाणां रणे क्षयः ।। ७२ ।। ‘पुरुषसिंह! शोक न करो। प्राचीन धर्मशास्त्रकारोंने संग्राममें वध होना क्षत्रियोंका सनातनधर्म नियत किया है ।। ७२ ।। इमे ते भ्रातरः सर्वे दीना भरतसत्तम । त्वयि शोकसमाविष्टे नृपाश्च सुहृदस्तव ।। ७३ ।। ‘भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे शोकाकुल हो जानेसे ये तुम्हारे सभी भाई, नरेशगण तथा सुहृद् दीन हो रहे हैं ।। ७३ ।। एतांश्च वचसा साम्ना समाश्वासय मानद । विदितं वेदितव्यं ते न शोकं कर्तुमर्हसि ।। ७४ ।।
‘मानद! इन सबको अपने शान्तिपूर्ण वचनसे आश्वासन दो। तुम्हें जाननेयोग्य तत्त्वका ज्ञान हो चुका है। अतः तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये' ॥ ७४ ॥
एवमाश्वासितः पार्थः कृष्णेनाद्भुतकर्मणा । ततोऽब्रवीत् तदा भ्रातॄन् सर्वान् पार्थः सगद्गदान् ॥ ७५ ॥ अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीकृष्णके इस प्रकार समझाने-बुझानेपर अर्जुन उस समय वहाँ गद्गद कण्ठवाले अपने सब भाइयोंसे बोले— ॥ ७५ ॥
स दीर्घबाहुः पृथ्वंसो दीर्घराजीवलोचनः । अभिमन्युर्यथावृत्तः श्रोतुमिच्छाम्यहं तथा ॥ ७६ ॥ ‘मोटे कंधों, बड़ी भुजाओं तथा कमलसदृश विशाल नेत्रोंवाला अभिमन्यु संग्राममें जिस प्रकार लड़ा था, वह सब वृत्तान्त मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ७६ ॥
सनागस्यन्दनहयान् द्रक्ष्यध्वं निहतान् मया । संग्रामे सानुबन्धांस्तान् मम पुत्रस्य वैरिणः ॥ ७७ ॥ ‘कल आपलोग देखेंगे कि मेरे पुत्रके वैरी अपने हाथी, रथ, घोड़े और सगे-सम्बन्धियोंसहित युद्धमें मेरे द्वारा मार डाले गये ॥ ७७ ॥
कथं च वः कृतास्त्राणां सर्वेषां शस्त्रपाणिनाम् । सौभद्रो निधनं गच्छेद्वज्रिणापि समागतः ॥ ७८ ॥ ‘आप सब लोग अस्त्रविद्याके पण्डित और हाथमें हथियार लिये हुए थे। सुभद्रकुमार अभिमन्यु साक्षात् वज्रधारी इन्द्रसे भी युद्ध करता हो तो भी आपके सामने कैसे मारा जा सकता था? ॥ ७८ ॥
यद्येवमहमज्ञास्यमशक्तान् रक्षणे मम । पुत्रस्य पाण्डुपञ्चालान् मया गुप्तो भवेत् ततः ॥ ७९ ॥ ‘यदि मैं ऐसा जानता कि पाण्डव और पांचाल मेरे पुत्रकी रक्षा करनेमें असमर्थ हैं तो मैं स्वयं उसकी रक्षा करता ॥ ७९ ॥
कथं च वो रथस्थानां शरवर्षाणि मुञ्चताम् । नीतोऽभिमन्युर्निधनं कदर्थीकृत्य वः परैः ॥ ८० ॥ ‘आपलोग रथपर बैठे हुए बाणोंकी वर्षा कर रहे थे तो भी शत्रुओंने आपकी अवहेलना करके कैसे अभिमन्युको मार डाला? ॥ ८० ॥
अहो वः पौरुषं नास्ति न च वोऽस्ति पराक्रमः । यत्राभिमन्युः समरे पश्यतां वो निपातितः ॥ ८१ ॥ ‘अहो! आपलोगोंमें पुरुषार्थ नहीं है और पराक्रम भी नहीं है; क्योंकि समरभूमिमें आपलोगोंके देखते-देखते अभिमन्यु मार डाला गया ॥ ८१ ॥
आत्मानमेव गर्हेयं यदहं वै सुदुर्बलान् । युष्मानाज्ञाय निर्यातो भीरूनकृतनिश्चयान् ॥ ८२ ॥
‘मैं अपनी ही निन्दा करूँगा; क्योंकि आपलोगोंको अत्यन्त दुर्बल, डरपोक और सुदृढ़ निश्चयसे रहित जानकर भी मैं (अभिमन्युको आपलोगोंके भरोसे छोड़कर) अन्यत्र चला गया ॥ ८२ ॥
आहोस्विद् भूषणार्थाय वर्म शस्त्रायुधानि वः ।
वाचस्तु वक्तुं संसद्सु मम पुत्रमरक्षताम् ॥ ८३ ॥
‘अथवा आपलोगोंके ये कवच और अस्त्र-शस्त्र क्या शरीरका आभूषण बनानेके लिये हैं? मेरे पुत्रकी रक्षा न करके वीरोंकी सभामें केवल बातें बनानेके लिये हैं?’ ॥
एवमुक्त्वा ततो वाक्यं तिष्ठंश्चापवरासिमान् ।
न स्माशक्यत बीभत्सुः केनचित्प्रसमीक्षितुम् ॥ ८४ ॥
ऐसा कहकर फिर अर्जुन धनुष और श्रेष्ठ तलवार लेकर खड़े हो गये। उस समय कोई उनकी ओर आँख उठाकर देख भी न सका ॥ ८४ ॥
तमन्तकमिव क्रुद्धं निःश्वसन्तं मुहुर्मुहुः ।
पुत्रशोकाभिसंतप्तमश्रुपूर्णमुखं तदा ॥ ८५ ॥
वे यमराजके समान कुपित हो बारंबार लंबी साँसें छोड़ रहे थे। उस समय पुत्रशोकसे संतप्त हुए अर्जुनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी ॥ ८५ ॥
न भाषितुं शक्नुवन्ति द्रष्टुं वा सुहृदोऽर्जुनम् ।
अन्यत्र वासुदेवाद्वा ज्येष्ठाद्वा पाण्डुनन्दनात् ॥ ८६ ॥
उस अवस्थामें वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण अथवा ज्येष्ठ पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको छोड़कर दूसरे सगे-सम्बन्धी न तो उनसे कुछ बोल सकते थे और न तो देखनेका ही साहस करते थे ॥ ८६ ॥
सर्वास्ववस्थासु हितावर्जुनस्य मनोऽनुगौ ।
बहुमानात् प्रियत्वाच्च तावेनं वक्तुमर्हतः ॥ ८७ ॥
श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर सभी अवस्थाओंमें अर्जुनके हितैषी और उनके मनके अनुकूल चलनेवाले थे; क्योंकि अर्जुनके प्रति उनका बड़ा आदर और प्रेम था। अतः वे ही दोनों इनसे उस समय कुछ कहनेका अधिकार रखते थे ॥ ८७ ॥
ततस्तं पुत्रशोकेन भृशं पीडितमानसम् ।
राजीवलोचनं क्रुद्धं राजा वचनमब्रवीत् ॥ ८८ ॥
तदनन्तर मन-ही-मन पुत्रशोकसे अत्यन्त पीड़ित हुए क्रोधभरे कमलनयन अर्जुनसे राजा युधिष्ठिरने इस प्रकार कहा— ॥ ८८ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि अर्जुनकोपे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें अर्जुनकोपविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ९१ १/३ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 481)
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः
युधिष्ठिरके मुखसे अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनकर अर्जुनकी जयद्रथको मारनेके लिये शपथपूर्ण प्रतिज्ञा
युधिष्ठिर उवाच
त्वयि याते महाबाहो संशप्तकबलं प्रति ।
प्रयत्नमकरोत् तीव्रमाचार्यो ग्रहणे मम ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले— महाबाहो! जब तुम संशप्तक सेनाके साथ युद्धके लिये चले गये, उस समय आचार्य द्रोणने मुझे पकड़नेके लिये घोर प्रयत्न किया ॥ १ ॥
व्यूढानीका वयं द्रोणं वारयामः स्म सर्वशः ।
प्रतिव्यूह्य रथानीकं यतमानं तथा रणे ॥ २ ॥
वे रथोंकी सेनाका व्यूह बनाकर बारंबार उद्योग करते थे और हमलोग रणक्षेत्रमें अपनी सेनाको व्यूहाकारमें संघटित करके सब प्रकारसे द्रोणाचार्यको आगे बढ़नेसे रोक देते थे ॥ २ ॥
स वार्यमाणो रथिभिर्मयि चापि सुरक्षिते ।
अस्मानभिजगामाशु पीडयन् निशितैः शरैः ॥ ३ ॥
जब रथियोंके द्वारा आचार्य रोक दिये गये और मैं सर्वथा सुरक्षित रह गया, तब उन्होंने अपने तीखे बाणोंद्वारा हमें पीड़ा देते हुए हमलोगोंपर तीव्र वेगसे आक्रमण किया ॥ ३ ॥
ते पीड्यमाना द्रोणेन द्रोणानीकं न शक्नुमः ।
प्रतिवीक्षितुमप्याजौ भेत्तुं तत् कुत एव तु ॥ ४ ॥
द्रोणाचार्यसे पीड़ित होनेके कारण हमलोग उनके सैन्यव्यूहकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते थे; फिर युद्धभूमिमें उसका भेदन तो कर ही कैसे सकते थे? ॥ ४ ॥
वयं त्वप्रतिमं वीर्ये सर्वे सौभद्रमात्मजम् ।
उक्तवन्तः स्म तं तात भिन्ध्यनीकमिति प्रभो ॥ ५ ॥
तब हम सब लोग अनुपम पराक्रमी अपने पुत्र सुभद्रानन्दन अभिमन्युसे बोले—‘तात! तुम इस व्यूहका भेदन करो; क्योंकि तुम ऐसा करनेमें समर्थ हो’ ॥ ५ ॥
स तथा नोदितोऽस्माभिः सदश्व इव वीर्यवान् ।
असह्यमपि तं भारं वोढुमेवोपचक्रमे ॥ ६ ॥
हमारे इस प्रकार आज्ञा देनेपर उस पराक्रमी वीरने अच्छे घोड़ेकी भाँति उस असह्य भारको भी वहन करनेका ही प्रयत्न किया ॥ ६ ॥
स तवास्त्रोपदेशेन वीर्येण च समन्वितः ।
प्राविशत् तद्बलं बालः सुपर्ण इव सागरम् ।। ७ ।।
तुम्हारे दिये हुए अस्त्र-विद्याके उपदेश और पराक्रमसे सम्पन्न बालक अभिमन्युने उस सेनामें उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे गरुड़ समुद्रमें घुस जाते हैं ।।
तेऽनुयाता वयं वीरं सात्वतीपुत्रमाहवे ।
प्रवेष्टुकामास्तेनैव येन स प्राविशच्चमूमू ।। ८ ।।
तत्पश्चात् हमलोग रणक्षेत्रमें वीर सुभद्राकुमार अभिमन्युके पीछे उस व्यूहमें प्रवेश करनेकी इच्छासे चले। हम भी उसी मार्गसे उसमें घुसना चाहते थे, जिसके द्वारा उसने शत्रुसेनामें प्रवेश किया था ।। ८ ।।
ततः सैन्धवको राजा क्षुद्रस्तात जयद्रथः ।
वरदानेन रुद्रस्य सर्वान् नः समवारयत् ।। ९ ।।
तात! ठीक इसी समय नीच सिंधुनरेश राजा जयद्रथने सामने आकर भगवान् शंकरके दिये हुए वरदानके प्रभावसे हम सब लोगोंको रोक दिया ।। ९ ।।
ततो द्रोणः कृपः कर्णो द्रौणिः कौसल्य एव च ।
कृतवर्मा च सौभद्रं षड् रथाः पर्यवारयन् ।। १० ।।
तदनन्तर द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, बृहद्वल और कृतवर्मा—इन छः महारथियोंने सुभद्राकुमारको चारों ओरसे घेर लिया ।। १० ।।
परिवार्य तु तैः सर्वैर्युधि बालो महारथैः ।
यतमानः परं शक्त्या बहुभिर्विरथीकृतः ।। ११ ।।
घिरा होनेपर भी वह बालक पूरी शक्ति लगाकर उन सबको जीतनेका प्रयत्न करता रहा; तथापि वे संख्यामें अधिक थे, अतः उन समस्त महारथियोंने उसे घेरकर रथहीन कर दिया ।। ११ ।।
ततो दौःशासनिः क्षिप्रं तथा तैर्विरथीकृतम् ।
संशयं परमं प्राप्य दिष्टान्तेनाभ्ययोजयत् ।। १२ ।।
तत्पश्चात् दुःशासनपुत्रने अभिमन्युके प्रहारसे भारी प्राणसंकटमें पड़कर पूर्वोक्त महारथियोंद्वारा रथहीन किये हुए अभिमन्युको शीघ्र ही (गदाके आघातसे) मार डाला ।। १२ ।।
स तु हत्वा सहस्राणि नराश्वरथदन्तिनाम् ।
अष्टौ रथसहस्राणि नव दन्तिशतानि च ।। १३ ।।
राजपुत्रसहस्रे द्वे वीरांश्चालक्षितान् बहून् ।
बृहद्वलं च राजानं स्वर्गेणाजौ प्रयोज्य ह ।। १४ ।।
ततः परमधर्मात्मा दिष्टान्तमुपजग्मिवान् ।
इसके पहले उसने हजारों हाथी, रथ, घोड़े और मनुष्योंको मार डाला था। आठ हजार रथों और नौ सौ हाथियोंका संहार किया था। दो हजार राजकुमारों तथा और भी बहुत-से अलक्षित वीरोंका वध करके राजा बृहद्दलको भी युद्धस्थलमें स्वर्गलोकका अतिथि बनाया। इसके बाद परम धर्मात्मा अभिमन्यु स्वयं मृत्युको प्राप्त हुआ ।। १३-१४ १/२ ।। (गतःसुकृतिनां लोकान् ये च स्वर्गजितां शुभाः । अदीनस्त्रासयञ्छत्रून् नन्दयित्वा च बान्धवान् ।। असकृन्नाम विश्राव्य पितॄणां मातुलस्य च । वीरो दिष्टान्तमापन्नः शोचयन् बान्धवान् बहून् ।। ततः स्म शोकसंतप्ता भवताद्य समेयुषः ।) वह पुण्यात्माओंके लोकोंमें गया है। अपने पुण्यके बलसे स्वर्गलोकपर विजय पानेवाले धर्मात्मा पुरुषोंको जो शुभ लोक सुलभ होते हैं, वे ही उसे भी प्राप्त हुए हैं। उसने कभी युद्धमें दीनता नहीं दिखायी। वह वीर शत्रुओंको त्रास और बान्धवोंको आनन्द प्रदान करता हुआ अपने पितरों और मामाके नामको बारंबार विख्यात करके अपने बहुसंख्यक बन्धुओंको शोकमें डालकर मृत्युको प्राप्त हुआ है। तभीसे हमलोग शोकसे संतप्त हैं और इस समय तुमसे हमारी भेंट हुई है। एतावदेव निर्वृत्तमस्माकं शोकवर्धनम् ।। १५ ।। स चैवं पुरुषव्याघ्रः स्वर्गलोकमवाप्तवान् । यही हमलोगोंके लिये शोक बढ़ानेवाली घटना घटित हुई है। पुरुषसिंह अभिमन्यु इस प्रकार स्वर्गलोकमें गया है ।। १५ १/२ ।। ततोऽर्जुनो वचः श्रुत्वा धर्मराजेन भाषितम् ।। १६ ।। हा पुत्र इति निःश्वस्य व्यथितो न्यपतद् भुवि । धर्मराज युधिष्ठिरकी कही हुई यह बात सुनकर अर्जुन व्यथासे पीड़ित हो लंबी साँस खींचते हुए ‘हा पुत्र’ कहकर पृथ्वीपर गिर पड़े ।। १६ १/२ ।। विषण्णवदनाः सर्वे परिवार्य धनंजयम् ।। १७ ।। नेत्रैरनिमिषैर्दीनाः प्रत्यवैक्षन् परस्परम् । उस समय सबके मुखपर विषाद छा गया। सब लोग अर्जुनको घेरकर दुःखी हो एकटक नेत्रोंसे एक-दूसरेकी ओर देखने लगे ।। १७ १/२ ।। प्रतिलभ्य ततः संज्ञां वासविः क्रोधमूर्च्छितः ।। १८ ।। कम्पमानो ज्वरेणेव निःश्वसंश्च मुहुर्मुहुः । पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य श्वसमानोऽश्रुनेत्रवान् ।। १९ ।। उन्मत्त इव विप्रेक्षन्निदं वचनमब्रवीत् ।
तदनन्तर इन्द्रपुत्र अर्जुन होशमें आकर क्रोधसे व्याकुल हो मानो ज्वरसे काँप रहे हों— इस प्रकार बारंबार लंबी साँस खींचते और हाथपर हाथ मलते हुए नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे और उन्मत्तके समान देखते हुए इस तरह बोले— ।। १८-१९ १/२ ।।
अर्जुन उवाच
सत्यं वः प्रतिजानामि श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम् ।
न चेद् वधभयाद् भीतो धार्तराष्ट्रान् प्रहास्यति ।। २० ।।
न चास्मान् शरणं गच्छेत् कृष्णं वा पुरुषोत्तमम् ।
भवन्तं वा महाराज श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम् ।। २१ ।।
अर्जुनने कहा— मैं आपलोगोंके सामने सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ, कल जयद्रथको अवश्य मार डालूँगा। महाराज! यदि वह मारे जानेके भयसे डरकर धृतराष्ट्रपुत्रोंको छोड़ नहीं देगा, मेरी, पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी अथवा आपकी शरणमें नहीं आ जायगा तो कल उसे अवश्य मार डालूँगा ।। २०-२१ ।।
धार्तराष्ट्रप्रियकरं मयि विस्मृतसौहृदम् ।
पापं बालवधे हेतुं श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम् ।। २२ ।।
जो धृतराष्ट्रके पुत्रोंका प्रिय कर रहा है, जिसने मेरे प्रति अपना सौहार्द भुला दिया है तथा जो बालक अभिमन्युके वधमें कारण बना है, उस पापी जयद्रथको कल अवश्य मार डालूँगा ।। २२ ।।
रक्षमाणांश्च तं संख्ये ये मां योत्स्यन्ति केचन ।
अपि द्रोणकृपौ राजन् छादयिष्यामि ताञ्छरैः ।। २३ ।।
राजन्! युद्धमें जयद्रथकी रक्षा करते हुए जो कोई मेरे साथ युद्ध करेंगे, वे द्रोणाचार्य और कृपाचार्य ही क्यों न हों, उन्हें अपने बाणोंके समूहसे आच्छादित कर दूँगा ।। २३ ।।
यद्येतदेवं संग्रामे न कुर्यां पुरुषर्षभाः ।
मा स्म पुण्यकृतां लोकान् प्राप्नुयां शूरसम्मतान् ।। २४ ।।
पुरुषश्रेष्ठ वीरो! यदि संग्रामभूमिमें मैं ऐसा न कर सकूँ तो पुण्यात्मा पुरुषोंके उन लोकोंको, जो शूरवीरोंको प्रिय हैं, न प्राप्त करूँ ।। २४ ।।
ये लोका मातृहन्तॄणां ये चापि पितृघातिनाम् ।
गुरुदारगतानां ये पिशुनानां च ये सदा ।। २५ ।।
साधूनसूयतां ये च ये चापि परिवादिनाम् ।
ये च निक्षेपहर्तॄणां ये च विश्वासघातिनाम् ।। २६ ।।
भुक्तपूर्वां स्त्रियं ये च विन्दतामघशंसिनाम् ।
ब्रह्मघ्नानां च ये लोका ये च गोघातिनामपि ।। २७ ।।
पायसं वा यवान्नं वा शाकं कृसरमेव वा ।
संयावापूपमांसानि ये च लोका वृथाश्नताम् ॥ २८ ॥
तानन्वायाधिगच्छेयं न चेद्धन्यां जयद्रथम् ।
माता-पिताकी हत्या करनेवालोंको जो लोक प्राप्त होते हैं, गुरु-पत्नीगामी और चुगलखोरोंको जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है, साधुपुरुषोंकी निन्दा करनेवालों और दूसरोंको कलंक लगानेवालोंको जो लोक प्राप्त होते हैं, धरोहर हड़पने और विश्वासघात करनेवालोंको जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है, दूसरेके उपभोगमें आयी हुई स्त्रीको ग्रहण करनेवाले, पापकी बातें करनेवाले, ब्रह्महत्यारे और गोघातियोंको जो लोक प्राप्त होते हैं, खीर, यवान्न, साग, खिचड़ी, हलवा, पूआ आदिको बलिवैश्वदेव किये बिना ही खानेवाले मनुष्योंको जो लोक प्राप्त होते हैं, यदि मैं कल जयद्रथका वध न कर डालूँ तो मुझे भी तत्काल उन्हीं लोकोंको जाना पड़े ॥ २५—२८ १/२ ॥
अध्याय (पृष्ठ 486)
अर्जुनका जयद्रथवधके लिये प्रतिज्ञा करना
वेदाध्यायिनमत्यर्थं संशितं वा द्विजोत्तमम् ।। २९ ।। अवमन्यमानो यान् याति वृद्धान् साधून् गुरूस्तथा । स्पृशतो ब्राह्मणं गां च पादेनाग्निं च या भवेत् ।। ३० ।। याऽप्सु श्लेष्म पुरीषं च मूत्रं वा मुञ्चतां गतिः । तां गच्छेयं गतिं कष्टां न चेद्धन्यां जयद्रथम् ।। ३१ ।। वेदोंका स्वाध्याय अथवा अत्यन्त कठोर व्रतका पालन करनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मणकी तथा बड़े-बूढ़ों, साधु-पुरुषों और गुरुजनोंकी अवहेलना करनेवाला पुरुष जिन नरकोंमें पड़ता है, ब्राह्मण, गौ और अग्निको पैरसे छूनेवाले पुरुषकी जो गति होती है तथा जलमें थूक अथवा मल-मूत्र छोड़नेवालोंकी जो दुर्गति होती है, यदि मैं कल जयद्रथको न मारूँ तो उसी कष्टदायिनी गतिको मैं भी प्राप्त करूँ ।। २९—३१ ।। नग्नस्य स्नायमानस्य या च वन्ध्यातिथेर्गतिः । उत्कोचिनां मृषोक्तीनां वञ्चकानां च या गतिः ।। ३२ ।। आत्मापहारिणां या च या च मिथ्याभिशंसिनाम् । भृत्यैः संदिश्यमानानां पुत्रदाराश्रितैस्तथा ।। ३३ ।। असंविभज्य क्षुद्राणां या गतिर्मिष्टमश्नताम् । तां गच्छेयं गतिं घोरां न चेद्धन्यां जयद्रथम् ।। ३४ ।। नंगे नहानेवाले तथा अतिथिको भोजन दिये बिना ही उसे असफल लौटा देनेवाले पुरुषकी जो गति होती है; घूसखोर, असत्यवादी तथा दूसरोंके साथ वंचना (ठगी) करनेवालोंकी जो दुर्गति होती है; आत्माका हनन करनेवाले, दूसरोंपर झूठे दोषारोपण करनेवाले, भृत्योंकी आज्ञाके अधीन रहनेवाले तथा स्त्री, पुत्र एवं आश्रित जनोंके साथ यथायोग्य बँटवारा किये बिना ही अकेले मिष्टान्न उड़ानेवाले क्षुद्र पुरुषोंको जिस घोर नारकी गतिकी प्राप्ति होती है, यदि मैं कल जयद्रथको न मारूँ तो मुझे भी वही दुर्गति प्राप्त हो ।। ३२—३४ ।। संश्रितं चापि यस्त्यक्त्वा साधुं तद्वचने रतम् । न बिभर्ति नृशंसात्मा निन्दते चोपकारिणम् ।। ३५ ।। अर्हते प्रातिवेश्याय श्राद्धं यो न ददाति च । अनर्हेभ्यश्च यो दद्याद् वृषलीपत्तये तथा ।। ३६ ।। मद्यपो भिन्नमर्यादः कृतघ्नो भर्तृनिन्दकः । तेषां गतिमिया क्षिप्रं न चेद्धन्यां जयद्रथम् ।। ३७ ।। जो नृशंस स्वभावका मनुष्य शरणागत, साधुपुरुष तथा आज्ञापालनमें तत्पर रहनेवाले पुरुषको त्यागकर उसका भरण-पोषण नहीं करता, जो उपकारीकी निन्दा करता है, पड़ोसमें रहनेवाले योग्य व्यक्तिको श्राद्धका दान नहीं देता और अयोग्य व्यक्तियोंको तथा शूद्राके स्वामी ब्राह्मणको देता है, जो मद्य पीनेवाला, धर्म-मर्यादाको तोड़नेवाला, कृतघ्न
और स्वामीकी निन्दा करनेवाला है—इन सभी लोगोंको जो दुर्गति प्राप्त होती है, उसीको मैं भी शीघ्र ही प्राप्त करूँ; यदि कल जयद्रथका वध न कर डालूँ ।। ३५—३७ ।। भुञ्जानानां तु सव्येन उत्सङ्गे चापि खादताम् । पालाशमासनं चैव तिन्दुकैर्दन्तधावनम् ।। ३८ ।। ये चावर्जयतां लोकाः स्वपतां च तथोषसि । जो बायें हाथसे भोजन करते हैं, गोदमें रखकर खाते हैं, जो पलासके आसनका और तेंदूकी दातुनका त्याग नहीं करते तथा उषःकालमें सोते हैं, उनको जो नरकलोक प्राप्त होते हैं (वे ही मुझे भी मिले; यदि मैं जयद्रथको न मार डालूँ) ।। ३८१/२ ।। शीतभीताश्च ये विप्रा रणभीताश्च क्षत्रियाः ।। ३९ ।। एककूपोदकग्रामे वेदध्वनिविवर्जिते । षण्मासं तत्र वसतां तथा शास्त्रं विनिन्दताम् ।। ४० ।। दिवामैथुनिनां चापि दिवसेषु च शेरते । अगारदाहिनां चैव गरदानां च ये मताः ।। ४१ ।। अग्न्यातिथ्यविहीनाश्च गोपानेषु च विघ्नदाः । रजस्वलां सेवयन्तः कन्यां शुल्केन दायिनः ।। ४२ ।। या च वै बहुयाजिनां ब्राह्मणानां श्ववृत्तिनाम् । आस्यमैथुनिकानां च ये दिवा मैथुने रताः ।। ४३ ।। ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुत्य यो वै लोभाद् ददाति न । तेषां गतिं गमिष्यामि श्वो न हन्यां जयद्रथम् ।। ४४ ।। जो ब्राह्मण होकर सर्दीसे और क्षत्रिय होकर युद्धसे डरते हैं, जिस गाँवमें एक ही कुएँका जल पीया जाता हो और जहाँ कभी वेदमन्त्रोंकी ध्वनि न हुई हो, ऐसे स्थानोंमें जो छः महीनोंतक निवास करते हैं, जो शास्त्रकी निन्दामें तत्पर रहते, दिनमें मैथुन करते और सोते हैं, जो दूसरोंके घरोंमें आग लगाते और दूसरोंको जहर दे देते हैं, जो कभी अग्निहोत्र और अतिथि-सत्कार नहीं करते तथा गायोंके पानी पीनेमें विघ्न डालते हैं, जो रजस्वला स्त्रीका सेवन करते और शुल्क लेकर कन्या देते हैं, जो बहुतोंकी पुरोहिती करते, ब्राह्मण होकर सेवा-वृत्तिसे जीविका चलाते, मुँहमें मैथुन करते अथवा दिनमें स्त्री-सहवास करते हैं, जो ब्राह्मणको कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर लोभवश नहीं देते हैं, उन सबको जिन लोकों अथवा दुर्गतिकी प्राप्ति होती है, उन्हींको मैं भी प्राप्त होऊँ; यदि कलतक जयद्रथको न मार डालूँ ।। ३९—४४ ।। धर्मादपेता ये चान्ये मया नात्रानुकीर्तिताः । ये चानुकीर्तितास्तेषां गतिं क्षिप्रमवाप्नुयाम् ।। ४५ ।। यदि व्युष्टामिमां रात्रिं श्वो न हन्यां जयद्रथम् ।
ऊपर जिन पापियोंका नाम मैंने गिनाया है तथा जिन दूसरे पापियोंका नाम नहीं गिनाया है, उनको जो दुर्गति प्राप्त होती है, उसीको शीघ्र ही मैं भी प्राप्त करूँ; यदि यह रात बीतनेपर कल जयद्रथको न मार डालूँ ॥ ४५ १/२ ॥
इमां चाप्यपरां भूयः प्रतिज्ञां मे निबोधत ॥ ४६ ॥ यद्यस्मिन्नहते पापे सूर्योऽस्तमुपयास्यति । इहैव सम्प्रवेष्टाहं ज्वलितं जातवेदसम् ॥ ४७ ॥ अब आपलोग पुनः मेरी यह दूसरी प्रतिज्ञा भी सुन लें। यदि इस पापी जयद्रथके मारे जानेसे पहले ही सूर्यदेव अस्ताचलको पहुँच जायँगे तो मैं यहीं प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा ॥ ४६-४७ ॥
असुरसुरमनुष्याः पक्षिणो वोरगा वा पितृरजनिचरा वा ब्रह्मदेवर्षयो वा । चरमचरमपीदं यत्परं चापि तस्मात् तदपि ममरिपूं तं रक्षितुं नैव शक्ताः ॥ ४८ ॥ देवता, असुर, मनुष्य, पक्षी, नाग, पितर, निशाचर, ब्रह्मर्षि, देवर्षि, यह चराचर जगत् तथा इसके परे जो कुछ है, वह—ये सब मिलकर भी मेरे शत्रु जयद्रथकी रक्षा नहीं कर सकते ॥ ४८ ॥
यदि विशति रसातलं तदग्र्यं वियदपि देवपुरं दितेः पुरं वा । तदपि शरशतैरहं प्रभाते भृशमभिमन्युरिपोः शिरोऽभिहर्ता ॥ ४९ ॥ यदि जयद्रथ पातालमें घुस जाय या उससे भी आगे बढ़ जाय अथवा आकाश, देवलोक या दैत्योंके नगरमें जाकर छिप जाय तो भी मैं कल अपने सैकड़ों बाणोंसे अभिमन्युके उस घोर शत्रु्का सिर अवश्य काट लूँगा ॥
एवमुक्त्वा विचिक्षेप गाण्डीवं सव्यदक्षिणम् । तस्य शब्दमतिक्रम्य धनुःशब्दोऽस्पृशद् दिवम् ॥ ५० ॥ ऐसा कहकर अर्जुनने दाहिने और बायें हाथसे भी गाण्डीव धनुषकी टंकार की। उसकी ध्वनि दूसरे शब्दोंको दबाकर सम्पूर्ण आकाशमें गूँज उठी ॥ ५० ॥
अर्जुनेन प्रतिज्ञाते पाञ्चजन्यं जनार्दनः । प्रदध्मौ तत्र संक्रुद्धो देवदत्तं च फाल्गुनः ॥ ५१ ॥ अर्जुनके इस प्रकार प्रतिज्ञा कर लेनेपर भगवान् श्रीकृष्णने भी अत्यन्त कुपित होकर पांचजन्य शंख बजाया। इधर अर्जुनने भी देवदत्त नामक शंखको फूँका ॥ ५१ ॥
स पाञ्चजन्योऽच्युतवक्त्रवायुना भृशं सुपूर्णोदरनिःसृतध्वनिः ।
जगत् सपातालवियद्दिगीश्वरं
प्रकम्पयामास युगात्यये यथा ॥ ५२ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके मुखकी वायुसे भीतरी भाग भर जानेके कारण अत्यन्त भयंकर ध्वनि प्रकट करनेवाले पांचजन्यने आकाश, पाताल, दिशा और दिक्पालोंसहित सम्पूर्ण जगत्को कम्पित कर दिया, मानो प्रलयकाल आ गया हो ॥ ५२ ॥
ततो वादित्रघोषाश्च प्रादुरासन् सहस्रशः ।
सिंहनादश्च पाण्डूनां प्रतिज्ञाते महात्मना ॥ ५३ ॥
महामना अर्जुनने जब उक्त प्रतिज्ञा कर ली, उस समय पाण्डवोंके शिविरमें अनेक बाजोंके हजारों शब्द और पाण्डव वीरोंका सिंहनाद भी सब ओर गूँजने लगा ॥ ५३ ॥
(भीम उवाच
प्रतिज्ञोद्भवशब्देन कृष्णशङ्खस्वनेन च ।
निहतो धार्तराष्ट्रोऽय सानुबन्धः सुयोधनः ॥
भीमसेनने कहा—अर्जुन! तुम्हारी प्रतिज्ञाके शब्दसे और भगवान् श्रीकृष्णके इस शंखनादसे मुझे विश्वास हो गया कि यह धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन अपने सगे-सम्बन्धियोंसहित अवश्य मारा जायगा।
अथ मृदिततमाग्र्यदाममाल्यं
तव सुतशोकमयं च रोषजातम् ।
व्यपनुदति महाप्रभावमेत-
न्नरवर वाक्यमिदं महार्थमिष्टम् ॥)
नरश्रेष्ठ! तुम्हारा यह वचन महान् अर्थसे युक्त और मुझे अत्यन्त प्रिय है। यह अत्यन्त प्रभावशाली वाक्य तुम्हारे पुत्रशोकमय उस रोष-समूहका निवारण कर रहा है, जिसने तुम्हारे गलेके सुन्दर पुष्पहारको मसल डाला था।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि अर्जुनप्रतिज्ञायां त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें अर्जुनप्रतिज्ञाविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५७ १/३ श्लोक हैं।)