महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अददान्मुदितो राजन् पूजयित्वा द्विजोत्तमान् ।
ययौ राजंस्ततो रामो बकस्याश्रममन्तिकात् ।
यत्र तेपे तपस्तीव्रं दाल्भ्यो बक इति श्रुतिः ॥ ३२ ॥
राजन्! बलरामजीने उस श्रेष्ठ तीर्थमें उत्तम ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें दूध देनेवाली गौएँ, वाहन, शय्या, वस्त्र अलंकार तथा खाने-पीनेके सुन्दर पदार्थ प्रसन्नतापूर्वक दिये। फिर वहाँसे वे बकके आश्रमके निकट गये, जहाँ दल्भपुत्र बकने तीव्र तपस्या की थी ॥ ३०—३२ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने
चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥
अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन
एकचत्वारिंशोऽध्यायः
अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
ब्रह्मयोनेरवाकीर्णं जगाम यदुनन्दनः ।
यत्र दाल्भ्यो बको राजन्नाश्रमस्थो महातपाः ॥ १ ॥
जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं वैचित्रवीर्यिणः ।
तपसा घोररूपेण कर्षयन् देहमात्मनः ॥ २ ॥
क्रोधेन महताऽऽविष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी 'अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था ॥ १-२ १/२ ॥
पुरा हि नैमिषीयाणां सत्रे द्वादशवार्षिके ॥ ३ ॥
वृत्ते विश्वजितोऽन्ते वै पञ्चालानृषयोऽगमन् ।
तत्रेश्वरमयाचन्त दक्षिणार्थं मनस्विनः ॥ ४ ॥
पूर्वकालमें नैमिषारण्यनिवासी ऋषियोंने बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाले एक सत्रका आरम्भ किया था। जब वह पूरा हो गया, तब वे सब ऋषि विश्वजित् नामक यज्ञके अन्तमें पांचाल देशमें गये। वहाँ जाकर उन मनस्वी मुनियोंने उस देशके राजासे दक्षिणाके लिये धनकी याचना की ॥
(तत्र ते लेभिरे राजन् पञ्चालेभ्यो महर्षयः)
बलान्वितान् वत्सतरान् निर्व्याधीनेकविंशतिम् ।
तानब्रवीद् बको दाल्भ्यो विभजध्वं पशूनिति ॥ ५ ॥
पशूनेतानहं त्यक्त्वा भिक्षिष्ये राजसत्तमम् ।
राजन्! वहाँ महर्षियोंने पांचालोंसे इक्कीस बलवान् और नीरोग बछड़े प्राप्त किये। तब उनमेंसे दलभपुत्र बकने अन्य सब ऋषियोंसे कहा—'आपलोग इन पशुओंको बाँट लें। मैं इन्हें छोड़कर किसी श्रेष्ठ राजासे दूसरे पशु माँग लूँगा' ॥ ५ १/२ ॥
एवमुक्त्वा ततो राजन्नृषीन् सर्वान् प्रतापवान् ॥ ६ ॥
जगाम धृतराष्ट्रस्य भवनं ब्राह्मणोत्तमः ।
नरेश्वर! उन सब ऋषियोंसे ऐसा कहकर वे प्रतापी उत्तम ब्राह्मण राजा धृतराष्ट्रके घरपर गये ॥ ६ १/२ ॥
स समीपगतो भूत्वा धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ॥ ७ ॥
अयाचत पशून् दाल्भ्यः स चैनं रुषितोऽब्रवीत् ।
यद्च्छया मृता दृष्ट्वा गास्तदा नृपसत्तमः ॥ ८ ॥
एतान् पशून् नय क्षिप्रं ब्रह्मबन्धो यदिच्छसि ।
निकट जाकर दल्भ्यने कौरवनरेश धृतराष्ट्रसे पशुओंकी याचना की। यह सुनकर नृपश्रेष्ठ धृतराष्ट्र कुपित हो उठे। उनके यहाँ कुछ गौएँ दैवेच्छासे मर गयी थीं। उन्हींको लक्ष्य करके राजाने क्रोधपूर्वक कहा—'ब्रह्मबन्धो! यदि पशु चाहते हो तो इन मरे हुए पशुओंको ही शीघ्र ले जाओ' ॥ ७-८ १/२ ॥
ऋषिस्तथा वचः श्रुत्वा चिन्तयामास धर्मवित् ॥ ९ ॥
अहो बत नृशंसं वै वाक्यमुक्तोऽस्मि संसदि ।
उनकी वैसी बात सुनकर धर्मज्ञ ऋषिने चिन्तामग्न होकर सोचा—'अहो! बड़े खेदकी बात है कि इस राजाने भरी सभामें मुझसे ऐसा कठोर वचन कहा है' ॥ ९ १/२ ॥
चिन्तयित्वा मुहूर्तेन रोषाविष्टो द्विजोत्तमः ॥ १० ॥
मतिं चक्रे विनाशाय धृतराष्ट्रस्य भूपतेः ।
दो घड़ीतक इस प्रकार चिन्ता करके रोषमें भरे हुए द्विजश्रेष्ठ दाल्भ्यने राजा धृतराष्ट्रके विनाशका विचार किया ॥ १० १/२ ॥
स तूत्कृत्य मृतानां वै मांसानि मुनिसत्तमः ॥ ११ ॥
जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं नरपतेः पुरा ।
वे मुनिश्रेष्ठ उन मृत पशुओंके ही मांस काट-काटकर उनके द्वारा राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रकी ही आहुति देने लगे ॥ ११ १/२ ॥
अवाकीर्णे सरस्वत्यास्तीर्थे प्रज्वाल्य पावकम् ॥ १२ ॥
बको दाल्भ्यो महाराज नियमं परमं स्थितः ।
स तैरेव जुहावास्य राष्ट्रं मांसैर्महातपाः ॥ १३ ॥
महाराज! सरस्वतीके अवाकीर्णतीर्थमें अग्नि प्रज्वलित करके महातपस्वी दल्भपुत्र बक उत्तम नियमका आश्रय ले उन मृत पशुओंके मांसोंद्वारा ही उनके राष्ट्रका हवन करने लगे ॥ १२-१३ ॥
तस्मिंस्तु विधिवत् सत्रे सम्प्रवृत्ते सुदारुणे ।
अक्षीयत ततो राष्ट्रं धृतराष्ट्रस्य पार्थिव ॥ १४ ॥
राजन्! वह भयंकर यज्ञ जब विधिपूर्वक आरम्भ हुआ, तबसे धृतराष्ट्रका राष्ट्र क्षीण होने लगा ॥ १४ ॥
ततः प्रक्षीयमाणं तद् राज्यं तस्य महीपतेः । छिद्यमानं यथानन्तं वनं परशुना विभो ॥ १५ ॥ बभूवापद्गतं तच्च व्यवकीर्णमचेतनम् । प्रभो! जैसे बड़ा भारी वन कुल्हाड़ीसे काटा जा रहा हो, उसी प्रकार उस राजाका राज्य क्षीण होता हुआ भारी आफतमें फँस गया, वह संकटग्रस्त होकर अचेत हो गया ॥ १५१/२ ॥
दृष्ट्वा तथावकीर्णं तु राष्ट्रं स मनुजाधिपः ॥ १६ ॥ बभूव दुर्मना राजंश्चिन्तयामास च प्रभुः । मोक्षार्थमकरोद् यत्नं ब्राह्मणैः सहितः पुरा ॥ १७ ॥ राजन्! अपने राष्ट्रको इस प्रकार संकटमग्न हुआ देख वे नरेश मन-ही-मन बहुत दुःखी हुए और गहरी चिन्तामें डूब गये। फिर ब्राह्मणोंके साथ अपने देशको संकटसे बचानेका प्रयत्न करने लगे ॥ १६-१७ ॥
न च श्रेयोऽध्यगच्छत्तु क्षीयते राष्ट्रमेव च । यदा स पार्थिवः खिन्नस्ते च विप्रास्तदानघ ॥ १८ ॥ अनघ! जब किसी प्रकार भी वे भूपाल अपने राष्ट्रका कल्याण-साधन न कर सके और वह दिन-प्रतिदिन क्षीण होता ही चला गया, तब राजा और उन ब्राह्मणोंको बड़ा खेद हुआ ॥ १८ ॥
यदा चापि न शक्नोति राष्ट्रं मोक्षयितुं नृप । अथ वै प्राश्निकांस्तत्र पप्रच्छ जनमेजय ॥ १९ ॥ नरेश्वर जनमेजय! जब धृतराष्ट्र अपने राष्ट्रको उस विपत्तिसे छुटकारा दिलानेमें समर्थ न हो सके, तब उन्होंने प्राश्निकों (प्रश्न पूछनेपर भूत, वर्तमान और भविष्यकी बातें बतानेवालों)-को बुलाकर उनसे इसका कारण पूछा ॥ १९ ॥
ततो वै प्राश्निकाः प्राहुः पशोर्विप्रकृतस्त्वया । मांसैरभिर्जुहोतीदं तव राष्ट्रं मुनिर्बकः ॥ २० ॥ तब उन प्राश्निकोंने कहा—'आपने पशुके लिये याचना करनेवाले बक मुनिका तिरस्कार किया है; इसलिये वे मृत पशुओंके मांसोंद्वारा आपके इस राष्ट्रका विनाश करनेकी इच्छासे होम कर रहे हैं ॥ २० ॥
तेन ते हूयमानस्य राष्ट्रस्यास्य क्षयो महान् । तस्यैतत् तपसः कर्म येन तेऽद्य लयो महान् ॥ २१ ॥ 'उनके द्वारा आपके राष्ट्रकी आहुति दी जा रही है; इसलिये इसका महान् विनाश हो रहा है। यह सब उनकी तपस्याका प्रभाव है, जिससे आपके इस देशका इस समय महान् विलय होने लगा है ॥ २१ ॥
अपां कुञ्जे सरस्वत्यास्तं प्रसादय पार्थिव । सरस्वतीं ततो गत्वा स राजा बकमब्रवीत् ॥ २२ ॥
‘भूपाल! सरस्वतीके कुंजमें जलके समीप वे मुनि विराजमान हैं, आप उन्हें प्रसन्न कीजिये।’ तब राजाने सरस्वतीके तटपर जाकर बक मुनिसे इस प्रकार कहा ॥ २२ ॥ निपत्य शिरसा भूमौ प्राञ्जलिर्भरतर्षभ । प्रसादये त्वां भगवन्नपराधं क्षमस्व मे ॥ २३ ॥ मम दीनस्य लुब्धस्य मौर्ख्येण हतचेतसः । त्वं गतिस्त्वं च मे नाथः प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ २४ ॥ भरतश्रेष्ठ! वे पृथ्वीपर माथा टेक हाथ जोड़कर बोले—‘भगवन्! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। आप मुझ दीन, लोभी और मूर्खतासे हतबुद्धि हुए अपराधीके अपराधको क्षमा कर दें। आप ही मेरी गति हैं। आप ही मेरे रक्षक हैं। आप मुझपर अवश्य कृपा करें’ ॥ २३-२४ ॥ तं तथा विलपन्तं तु शोकोपहतचेतसम् । दृष्ट्वा तस्य कृपा जज्ञे राष्ट्रं तस्य व्यमोचयत् ॥ २५ ॥ राजा धृतराष्ट्रको इस प्रकार शोकसे अचेत होकर विलाप करते देख उनके मनमें दया आ गयी और उन्होंने राजाके राज्यको संकटसे मुक्त कर दिया ॥ २५ ॥ ऋषिः प्रसन्नस्तस्याभूत् संरम्भं च विहाय सः । मोक्षार्थं तस्य राज्यस्य जुहाव पुनराहुतिम् ॥ २६ ॥ ऋषि क्रोध छोड़कर राजापर प्रसन्न हुए और पुनः उनके राज्यको संकटसे बचानेके लिये आहुति देने लगे ॥ मोक्षयित्वा ततो राष्ट्रं प्रतिगृह्य पशून् बहून् । हृष्टात्मा नैमिषारण्यं जगाम पुनरेव सः ॥ २७ ॥ इस प्रकार राज्यको विपत्तिसे छुड़ाकर राजासे बहुत-से पशु ले प्रसन्नचित्त हुए महर्षि दाल्भ्य पुनः नैमिषारण्यको ही चले गये ॥ २७ ॥ धृतराष्ट्रोऽपि धर्मात्मा स्वस्थचेता महामनाः । स्वमेव नगरं राजन् प्रतिपेदे महर्द्धिमत् ॥ २८ ॥ राजन्! फिर महामनस्वी धर्मात्मा धृतराष्ट्र भी स्वस्थचित्त हो अपने समृद्धिशाली नगरको ही लौट आये ॥ तत्र तीर्थे महाराज बृहस्पतिरुदारधीः । असुराणामभावाय भवाय च दिवौकसाम् ॥ २९ ॥ मांसैरभिजुहावेष्टिमक्षीयन्त ततोऽसुराः । दैवतैरपि सम्भग्ना जितकाशिभिराहवे ॥ ३० ॥ महाराज! उसी तीर्थमें उदारबुद्धि बृहस्पतिजीने असुरोंके विनाश और देवताओंकी उन्नतिके लिये मांसोंद्वारा आभिचारिक यज्ञका अनुष्ठान किया था। इससे वे असुर क्षीण हो गये और युद्धमें विजयसे सुशोभित होनेवाले देवताओंने उन्हें मार भगाया ॥ २९-३० ॥
तत्रापि विधिवद् दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशाः ।
वाजिनः कुञ्जरांश्चैव रथांश्चाश्वतरीयुतान् ॥ ३१ ॥
रत्नानि च महार्हाणि धनं धान्यं च पुष्कलम् ।
ययौ तीर्थं महाबाहुर्यायातं पृथिवीपते ॥ ३२ ॥
पृथिवीनाथ! महायशस्वी महाबाहु बलरामजी उस तीर्थमें भी ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक हाथी, घोड़े, खच्चरियोंसे जुते हुए रथ, बहुमूल्य रत्न तथा प्रचुर धन-धान्यका दान करके वहाँसे यायात तीर्थमें गये ॥ ३१-३२ ॥
तत्र यज्ञे ययातेश्च महाराज सरस्वती ।
सर्पिः पयश्च सुस्राव नाहुषस्य महात्मनः ॥ ३३ ॥
महाराज! वहाँ पूर्वकालमें नहुषनन्दन महात्मा ययातिने यज्ञ किया था, जिसमें सरस्वतीने उनके लिये दूध और घीका स्रोत बहाया था ॥ ३३ ॥
तत्रेष्ट्वा पुरुषव्याघ्रो ययातिः पृथिवीपतिः ।
अक्रामदूर्ध्वं मुदितो लेभे लोकांश्च पुष्कलान् ॥ ३४ ॥
पुरुषसिंह भूपाल ययाति वहाँ यज्ञ करके प्रसन्नतापूर्वक ऊर्ध्वलोकमें चले गये और वहाँ उन्हें बहुत-से पुण्यलोक प्राप्त हुए ॥ ३४ ॥
पुनस्तत्र च राज्ञस्तु ययातेर्यजतः प्रभोः ।
औदार्यं परमं कृत्वा भक्तिं चात्मनि शाश्वतीम् ॥ ३५ ॥
ददौ कामान् ब्राह्मणेभ्यो यान् यान् यो मनसेच्छति ।
शक्तिशाली राजा ययाति जब वहाँ यज्ञ कर रहे थे, उस समय उनकी उत्कृष्ट उदारताको दृष्टिमें रखकर और अपने प्रति उनकी सनातन भक्ति देख सरस्वतीने उस यज्ञमें आये हुए ब्राह्मणोंको, जिसने अपने मनसे जिन-जिन भोगोंको चाहा, वे सभी मनोवांछित भोग प्रदान किये ॥ ३५½ ॥
यो यत्र स्थित एवेह आहूतो यज्ञसंस्तरे ॥ ३६ ॥
तस्य तस्य सरिच्छ्रेष्ठा गृहादिशयनादिकम् ।
षड्रसं भोजनं चैव दानं नानाविधं तथा ॥ ३७ ॥
राजाके यज्ञमण्डपमें बुलाकर आया हुआ जो ब्राह्मण जहाँ कहीं ठहर गया, वहीं उसके लिये सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने पृथक्-पृथक् गृह, शय्या, आसन, षड्रस भोजन तथा नाना प्रकारके दानकी व्यवस्था की ॥ ३६-३७ ॥
ते मन्यमाना राज्ञस्तु सम्प्रदानमनुत्तमम् ।
राजानं तुष्टुवुः प्रीता दत्त्वा चैवाशिषः शुभाः ॥ ३८ ॥
उन ब्राह्मणोंने यह समझकर कि राजाने ही वह उत्तम दान दिया है, अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा ययातिको शुभाशीर्वाद दे उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ३८ ॥
तत्र देवाः सगन्धर्वाः प्रीता यज्ञस्य सम्पदा ।
विस्मिता मानुषाश्चासन् दृष्ट्वा तां यज्ञसम्पदम् ॥ ३९ ॥
उस यज्ञकी सम्पत्तिसे देवता और गन्धर्व भी बड़े प्रसन्न हुए थे। मनुष्योंको तो वह यज्ञ-वैभव देखकर महान् आश्चर्य हुआ था ॥ ३९ ॥
ततस्तालकेतुर्महाधर्मकेतु-
र्महात्मा कृतात्मा महादाननित्यः ।
वसिष्ठापवाहं महाभीमवेगं
धृतात्मा जितात्मा समभ्याजगाम ॥ ४० ॥
तदनन्तर महान् धर्म ही जिनकी ध्वजा है और जिनकी पताकापर ताड़का चिह्न सुशोभित है, वे महात्मा, कृतात्मा, धृतात्मा तथा जितात्मा बलरामजी, जो प्रतिदिन बड़े-बड़े दान किया करते थे, वहाँसे वसिष्ठापवाह नामक तीर्थमें गये, जहाँ सरस्वतीका वेग बड़ा भयंकर है ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने
एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४० १/३ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2780)
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
वसिष्ठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता
जनमेजय उवाच
वसिष्ठस्यापवाहोऽसौ भीमवेगः कथं नु सः ।
किमर्थं च सरिच्छ्रेष्ठा तमृषिं प्रत्यवाहयत् ॥ १ ॥
कथमस्याभवद् वैरं कारणं किं च तत् प्रभो ।
शंस पृष्टो महाप्राज्ञ न हि तृप्यामि ते वचः ॥ २ ॥
जनमेजयने पूछा—प्रभो! वसिष्ठापवाह तीर्थमें सरस्वतीके जलका भयंकर वेग कैसे हुआ? सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने उन महर्षिको किस लिये बहाया? उनके साथ उसका वैर कैसे हुआ? उस वैरका कारण क्या है? महामते! मैंने जो पूछा है, वह बताइये। मैं आपके वचनोंको सुनते-सुनते तृप्त नहीं होता हूँ ॥
वैशम्पायन उवाच
विश्वामित्रस्य विप्रर्षेर्वसिष्ठस्य च भारत ।
भृशं वैरमभूद् राजंस्तपःस्पर्धाकृतं महत् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—भारत! तपस्यामें होड़ लग जानेके कारण विश्वामित्र तथा ब्रह्मर्षि वसिष्ठमें बड़ा भारी वैर हो गया था ॥ ३ ॥
आश्रमो वै वसिष्ठस्य स्थाणुतीर्थेऽभवन्महान् ।
पूर्वतः पार्श्वतश्चासीद् विश्वामित्रस्य धीमतः ॥ ४ ॥
सरस्वतीके स्थाणुतीर्थमें पूर्वतटपर वसिष्ठका बहुत बड़ा आश्रम था और पश्चिमतटपर बुद्धिमान् विश्वामित्र मुनिका आश्रम बना हुआ था ॥ ४ ॥
यत्र स्थाणुर्महाराज तप्तवान् परमं तपः ।
तत्रास्य कर्म तद् घोरं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ५ ॥
महाराज! जहाँ भगवान् स्थाणुने बड़ी भारी तपस्या की थी, वहाँ मनीषी पुरुष उनके घोर तपका वर्णन करते हैं ॥ ५ ॥
यत्रेष्ट्वा भगवान् स्थाणुः पूजयित्वा सरस्वतीम् ।
स्थापयामास तत् तीर्थं स्थाणुतीर्थमिति प्रभो ॥ ६ ॥
प्रभो! जहाँ भगवान् स्थाणु (शिव)-ने सरस्वतीका पूजन और यज्ञ करके तीर्थकी स्थापना की थी, वहाँ वह तीर्थ स्थाणुतीर्थके नामसे विख्यात हुआ ॥ ६ ॥
तत्र तीर्थे सुराः स्कन्दमभ्यषिञ्चन्नराधिप ।
सैनापत्येन महता सुरारिविनिबर्हणम् ॥ ७ ॥ नरेश्वर! उसी तीर्थमें देवताओंने देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले स्कन्दको महान् सेनापतिके पदपर अभिषिक्त किया था ॥ ७ ॥
तस्मिन् सारस्वते तीर्थे विश्वामित्रो महामुनिः । वसिष्ठं चालयामास तपसोग्रेण तच्छृणु ॥ ८ ॥ उसी सारस्वततीर्थमें महामुनि विश्वामित्रने अपनी उग्र तपस्यासे वसिष्ठमुनिको विचलित कर दिया था। वह प्रसंग सुनाता हूँ, सुनो ॥ ८ ॥
विश्वामित्रवसिष्ठौ तावहन्यहनि भारत । स्पर्धां तपःकृतां तीव्रां चक्रतुस्तौ तपोधनौ ॥ ९ ॥ भारत! विश्वामित्र और वसिष्ठ दोनों ही तपस्याके धनी थे, वे प्रतिदिन होड़ लगाकर अत्यन्त कठोर तप किया करते थे ॥ ९ ॥
तत्राप्याधिकसंतापो विश्वामित्रो महामुनिः । दृष्ट्वा तेजो वसिष्ठस्य चिन्तामभिजगाम ह ॥ १० ॥ उनमें भी महामुनि विश्वामित्रको ही अधिक संताप होता था, वे वसिष्ठका तेज देखकर चिन्तामग्न हो गये थे ॥ १० ॥
तस्य बुद्धिरियं ह्यासीद् धर्मनित्यस्य भारत । इयं सरस्वती तूर्णं मत्समीपं तपोधनम् ॥ ११ ॥ आनयिष्यति वेगेन वसिष्ठं तपतां वरम् । इहागतं द्विजश्रेष्ठं हनिष्यामि न संशयः ॥ १२ ॥ भरतनन्दन! सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले विश्वामित्र मुनिके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि यह सरस्वती तपोधन वसिष्ठको अपने जलके वेगसे तुरंत ही मेरे समीप ला देगी और यहाँ आ जानेपर तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ विप्रवर वसिष्ठका मैं वध कर डालूँगा; इसमें संशय नहीं है ॥ ११-१२ ॥
एवं निश्चित्य भगवान् विश्वामित्रो महामुनिः । सस्मार सरितां श्रेष्ठां क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ १३ ॥ ऐसा निश्चय करके पूज्य महामुनि विश्वामित्रके नेत्र क्रोधसे रक्तवर्ण हो गये। उन्होंने सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीका स्मरण किया ॥ १३ ॥
सा ध्याता मुनिना तेन व्याकुलत्वं जगाम ह । जज्ञे चैनं महावीर्यं महाकोपं च भाविनी ॥ १४ ॥ उन मुनिके चिन्तन करनेपर विचारशीला सरस्वती व्याकुल हो उठी। उसे ज्ञात हो गया कि ये महान् शक्तिशाली महर्षि इस समय बड़े भारी क्रोधसे भरे हुए हैं ॥ १४ ॥
तत एनं वेपमाना विवर्णा प्राञ्जलिस्तदा । उपतस्थे मुनिवरं विश्वामित्रं सरस्वती ॥ १५ ॥
इससे सरस्वतीकी कान्ति फीकी पड़ गयी और वह हाथ जोड़ थर-थर काँपती हुई मुनिवर विश्वामित्रकी सेवामें उपस्थित हुई ॥ १५ ॥
हतवीरा यथा नारी साभवद् दुःखिता भृशम् ।
ब्रूहि किं करवाणीति प्रोवाच मुनिसत्तमम् ॥ १६ ॥
जिसका पति मारा गया हो उस विधवा नारीके समान वह अत्यन्त दुःखी हो गयी और उन मुनिश्रेष्ठसे बोली—'प्रभो! बताइये, मैं आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ?' ॥ १६ ॥
तामुवाच मुनिः क्रुद्धो वसिष्ठं शीघ्रमानय ।
यावदेनं निहन्म्यद्य तच्छ्रुत्वा व्यथिता नदी ॥ १७ ॥
तब कुपित हुए मुनिने उससे कहा—'वसिष्ठको शीघ्र यहाँ बहाकर ले आओ, जिससे आज मैं इनका वध कर डालूँ।' यह सुनकर सरस्वती नदी व्यथित हो उठी ॥
प्राञ्जलिं तु ततः कृत्वा पुण्डरीकनिभेक्षणा ।
प्राकम्पत भृशं भीता वायुनेवाहता लता ॥ १८ ॥
वह कमलनयना अबला हाथ जोड़कर वायुके झकोरेसे हिलायी गयी लताके समान अत्यन्त भयभीत हो जोर-जोरसे काँपने लगी ॥ १८ ॥
तथारूपां तु तां दृष्ट्वा मुनिराह महानदीम् ।
अविचारं वसिष्ठं त्वमानयस्वान्तिकं मम ॥ १९ ॥
उसकी ऐसी अवस्था देखकर मुनिने उस महानदीसे कहा—'तुम बिना कोई विचार किये वसिष्ठको मेरे पास ले आओ' ॥ १९ ॥
सा तस्य वचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा पापं चिकीर्षितम् ।
वसिष्ठस्य प्रभावं च जानन्त्यप्रतिमं भुवि ॥ २० ॥
साभिगम्य वसिष्ठं च इदमर्थमचोदयत् ।
यदुक्ता सरितां श्रेष्ठा विश्वामित्रेण धीमता ॥ २१ ॥
विश्वामित्रकी बात सुनकर और उनकी पापपूर्ण चेष्टा जानकर वसिष्ठके भूतलपर विख्यात अनुपम प्रभावको जानती हुई उस नदीने उनके पास जाकर बुद्धिमान् विश्वामित्रने जो कुछ कहा था, वह सब उनसे कह सुनाया ॥
उभयोः शापयोर्भीता वेपमाना पुनः पुनः ।
चिन्तयित्वा महाशापमृषिवित्रासिता भृशम् ॥ २२ ॥
वह दोनोंके शापसे भयभीत हो बारंबार काँप रही थी। महान् शापका चिन्तन करके विश्वामित्र ऋषिके डरसे बहुत डर गयी थी ॥ २२ ॥
तां कृशां च विवर्णां च दृष्ट्वा चिन्तासमन्विताम् ।
उवाच राजन् धर्मात्मा वसिष्ठो द्विपदां वरः ॥ २३ ॥
राजन्! उसे दुर्बल, उदास और चिन्तामग्न देख मनुष्योंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा वसिष्ठने कहा ॥ २३ ॥
वसिष्ठ उवाच
पाह्यात्मानं सरिच्छ्रेष्ठे वह मां शीघ्रगामिनी । विश्वामित्रः शपेद्धि त्वां मा कृथास्त्वं विचारणाम् ॥ २४ ॥ वसिष्ठ बोले—सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती! तुम शीघ्र गतिसे प्रवाहित होकर मुझे बहा ले चलो और अपनी रक्षा करो, अन्यथा विश्वामित्र तुम्हें शाप दे देंगे; इसलिये तुम कोई दूसरा विचार मनमें न लाओ ॥ २४ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृपाशीलस्य सा सरित् । चिन्तयामास कौरव्य किं कृत्वा सुकृतं भवेत् ॥ २५ ॥ कुरुनन्दन! उन कृपाशील महर्षिका वह वचन सुनकर सरस्वती सोचने लगी, ‘क्या करनेसे शुभ होगा?’ ॥ २५ ॥
तस्याश्चिन्ता समुत्पन्ना वसिष्ठो मय्यतीव हि । कृतवान् हि दयां नित्यं तस्य कार्यं हितं मया ॥ २६ ॥ उसके मनमें यह विचार उठा कि ‘वसिष्ठने मुझपर बड़ी भारी दया की है। अतः सदा मुझे इनका हित-साधन करना चाहिये’ ॥ २६ ॥
अथ कूले स्वके राजन् जपन्तमृषिसत्तमम् । जुह्वानं कौशिकं प्रेक्ष्य सरस्वत्यभ्यचिन्तयत् ॥ २७ ॥ इदमन्तरमित्येवं ततः सा सरितां वरा । कूलापहारमकरोत् स्वेन वेगेन सा सरित् ॥ २८ ॥ राजन्! तदनन्तर ऋषिश्रेष्ठ विश्वामित्रको अपने तटपर जप और होम करते देख सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने सोचा, यही अच्छा अवसर है, फिर तो उस नदीने पूर्व-तटको तोड़कर उसे अपने वेगसे बहाना आरम्भ किया ॥
तेन कूलापहारेण मैत्रावरुणिरीह्यत । उह्यमानः स तुष्टाव तदा राजन् सरस्वतीम् ॥ २९ ॥ उस बहते हुए किनारेके साथ मित्रावरुणके पुत्र वसिष्ठजी भी बहने लगे। राजन्! बहते समय वसिष्ठजी सरस्वतीकी स्तुति करने लगे— ॥ २९ ॥
पितामहस्य सरसः प्रवृत्तासि सरस्वति । व्याप्तं चेदं जगत् सर्वं तवैवाम्भोभिरुत्तमैः ॥ ३० ॥ ‘सरस्वती! तुम पितामह ब्रह्माजीके सरोवरसे प्रकट हुई हो, इसीलिये तुम्हारा नाम सरस्वती है। तुम्हारे उत्तम जलसे ही यह सारा जगत् व्याप्त है ॥ ३० ॥
त्वमेवाकाशगा देवि मेघेषु सृजसे पयः । सर्वाश्चापस्त्वमेवेति त्वत्तो वयमधीमहि ॥ ३१ ॥ ‘देवि! तुम्हीं आकाशमें जाकर मेघोंमें जलकी सृष्टि करती हो, तुम्हीं सम्पूर्ण जल हो; तुमसे ही हम ऋषिगण वेदोंका अध्ययन करते हैं ॥ ३१ ॥
पुष्टिर्धृतिस्तथा कीर्तिः सिद्धिर्बुद्धिरुमा तथा ।
त्वमेव वाणी स्वाहा त्वं तवायत्तमिदं जगत् ।। ३२ ।।
त्वमेव सर्वभूतेषु वससीह चतुर्विधा ।
‘तुम्हीं पुष्टि, कीर्ति, धृति, सिद्धि, बुद्धि, उमा, वाणी और स्वाहा हो। यह सारा जगत्
तुम्हारे अधीन है। तुम्हीं समस्त प्राणियोंमें चार* प्रकारके रूप धारण करके निवास करती
हो' ।। ३२ ।।
एवं सरस्वती राजन् स्तूयमाना महर्षिणा ।। ३३ ।।
वेगेनोवाह तं विप्रं विश्वामित्राश्रमं प्रति ।
न्यवेदयत चाभीक्ष्णं विश्वामित्राय तं मुनिम् ।। ३४ ।।
राजन्! महर्षिके मुखसे इस प्रकार स्तुति सुनती हुई सरस्वतीने उन ब्रह्मर्षिको अपने
वेगद्वारा विश्वामित्रके आश्रमपर पहुँचा दिया और विश्वामित्रसे बारंबार निवेदन किया कि
‘वसिष्ठ मुनि उपस्थित हैं' ।। ३३-३४ ।।
तमानीतं सरस्वत्या दृष्ट्वा कोपसमन्वितः ।
अथान्वेषत् प्रहरणं वसिष्ठान्तकरं तदा ।। ३५ ।।
सरस्वतीद्वारा लाये हुए वसिष्ठको देखकर विश्वामित्र कुपित हो उठे और उनके
जीवनका अन्त कर देनेके लिये कोई हथियार ढूँढ़ने लगे ।। ३५ ।।
तं तु क्रुद्धमभिप्रेक्ष्य ब्रह्मवध्याभयान्नदी ।
अपोवाह वसिष्ठं तु प्राचीं दिशमतन्द्रिता ।। ३६ ।।
उभयोः कुर्वती वाक्यं वञ्चयित्वा च गाधिजम् ।
उन्हें कुपित देख सरस्वती नदी ब्रह्महत्याके भयसे आलस्य छोड़ दोनोंकी आज्ञाका
पालन करती हुई विश्वामित्रको धोखा देकर वसिष्ठ मुनिको पुनः पूर्व-दिशाकी ओर बहा ले
गयी ।। ३६ ।।
ततोऽपवाहितं दृष्ट्वा वसिष्ठमृषिसत्तमम् ।। ३७ ।।
अब्रवीद् दुःखसंक्रुद्धो विश्वामित्रो ह्यमर्षणः ।
यस्मान्मां त्वं सरिच्छ्रेष्ठे वञ्चयित्वा पुनर्गता ।। ३८ ।।
शोणितं वह कल्याणि रक्षोग्रामणिसम्मतम् ।
मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको पुनः अपनेसे दूर बहाया गया देख अमर्षशील विश्वामित्र दुःखसे
अत्यन्त कुपित हो बोले—‘सरिताओंमें श्रेष्ठ कल्याणमयी सरस्वती! तुम मुझे धोखा देकर
फिर चली गयी, इसलिये अब जलकी जगह रक्त बहाओ, जो राक्षसोंके समूहको अधिक
प्रिय है' ।। ३७-३८ ।।
ततः सरस्वती शप्ता विश्वामित्रेण धीमता ।। ३९ ।।
अवहच्छोणितोन्मिश्रं तोयं संवत्सरं तदा ।
बुद्धिमान् विश्वामित्रके इस प्रकार शाप देनेपर सरस्वती नदी एक सालतक रक्तमिश्रित जल बहाती रही ॥
अथर्षयश्च देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तदा ॥ ४० ॥
सरस्वतीं तथा दृष्ट्वा बभूवुर्भृशदुःखिताः ।
तदनन्तर ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सरा सरस्वतीको उस अवस्थामें देखकर अत्यन्त दुःखी हो गये ॥ ४० १/२ ॥
एवं वसिष्ठापवाहो लोके ख्यातो जनाधिप ॥ ४१ ॥
आगच्छच्च पुनर्मार्गं स्वमेव सरितां वरा ॥ ४२ ॥
नरेश्वर! इस प्रकार वह स्थान जगत्में वसिष्ठापवाहके नामसे विख्यात हुआ। वसिष्ठजीको बहानेके पश्चात् सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती फिर अपने पूर्व मार्गपर ही बहने लग गयी ॥ ४१-४२ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥
* परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी—यह चार प्रकारकी वाणी ही सरस्वतीका चतुर्विध रूप है।
अध्याय (पृष्ठ 2786)
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः
ऋषियोंके प्रयत्नसे सरस्वतीके शापकी निवृत्ति, जलकी शुद्धि तथा अरुणासंगममें स्नान करनेसे राक्षसों और इन्द्रका संकटमोचन
वैशम्पायन उवाच
सा शप्ता तेन क्रुद्धेन विश्वामित्रेण धीमता ।
तस्मिंस्तीर्थवरे शुभ्रे शोणितं समुपावहत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! कुपित हुए बुद्धिमान् विश्वामित्रने जब सरस्वती नदीको शाप दे दिया, तब वह नदी उस उज्ज्वल एवं श्रेष्ठ तीर्थमें रक्तकी धारा बहाने लगी ॥ १ ॥
अथाजग्मुस्ततो राजन् राक्षसास्तत्र भारत ।
तत्र ते शोणितं सर्वे पिबन्तः सुखमासते ॥ २ ॥
भारत! तदनन्तर वहाँ बहुत-से राक्षस आ पहुँचे। वे सब-के-सब उस रक्तको पीते हुए वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥ २ ॥
तृप्ताश्च सुभृशं तेन सुखिता विगतज्वराः ।
नृत्यन्तश्च हसन्तश्च यथा स्वर्गजितस्तथा ॥ ३ ॥
उस रक्तसे अत्यन्त तृप्त, सुखी और निश्चिन्त हो वे राक्षस वहाँ नाचने और हँसने लगे, मानो उन्होंने स्वर्गलोकको जीत लिया हो ॥ ३ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य ऋषयः सुतपोधनाः ।
तीर्थयात्रां समाजग्मुः सरस्वत्यां महीपते ॥ ४ ॥
पृथ्वीनाथ! कुछ कालके पश्चात् बहुत-से तपोधन मुनि सरस्वतीके तटपर तीर्थयात्राके लिये पधारे ॥ ४ ॥
तेषु सर्वेषु तीर्थेषु स्वाप्लुत्य मुनिपुङ्गवाः ।
प्राप्य प्रीतिं परां चापि तपोलुब्धा विशारदाः ॥ ५ ॥
प्रययुर्हि ततो राजन् येन तीर्थमसृग्वहम् ।
पूर्वोक्त सभी तीर्थोंमें गोता लगाकर वे तपस्याके लोभी विज्ञ मुनिवर पूर्ण प्रसन्न हो उसी ओर गये, जिधर रक्तकी धारा बहानेवाला पूर्वोक्त तीर्थ था ॥ ५ ½ ॥
अथागम्य महाभागास्तत् तीर्थं दारुणं तदा ॥ ६ ॥
दृष्ट्वा तोयं सरस्वत्याः शोणितेन परिप्लुतम् ।
पीयमानं च रक्षोभिर्बहुभिर्नृपसत्तम ॥ ७ ॥
नृपश्रेष्ठ! वहाँ आकर उन महाभाग मुनियोंने देखा कि उस तीर्थकी दारुण दशा हो गयी है, वहाँ सरस्वतीका जल रक्तसे ओतप्रोत है और बहुत-से राक्षस उसका पान कर रहे हैं।। ६-७ ।। तान् दृष्ट्वा राक्षसान् राजन् मुनयः संशितव्रताः । परित्राणे सरस्वत्याः परं यत्नं प्रचक्रिरे ।। ८ ।। राजन्! उन राक्षसोंको देखकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनियोंने सरस्वतीके उस तीर्थकी रक्षाके लिये महान् प्रयत्न किया ।। ८ ।। ते तु सर्वे महाभागाः समागम्य महाव्रताः । आहूय सरितां श्रेष्ठांमिदं वचनमब्रुवन् ।। ९ ।। उन सभी महान् व्रतधारी महाभाग ऋषियोंने मिलकर सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीको बुलाकर पूछा— ।। ९ ।। कारणं ब्रूहि कल्याणि किमर्थं ते ह्रदो ह्ययम् । एवमाकुलतां यातः श्रुत्वा ध्यास्यामहे वयम् ।। १० ।। ‘कल्याणि! तुम्हारा यह कुण्ड इस प्रकार रक्तसे मिश्रित क्यों हो गया? इसका क्या कारण है? बताओ। उसे सुनकर हमलोग कोई उपाय सोचेंगे' ।। १० ।। ततः सा सर्वमाचष्ट यथावृत्तं प्रवेपती । दुःखितामथ तां दृष्ट्वा ऊचुस्ते वै तपोधनाः ।। ११ ।। तब काँपती हुई सरस्वतीने सारा वृत्तान्त यथार्थ रूपसे कह सुनाया। उसे दुःखी देख वे तपोधन महर्षि उससे बोले— ।। ११ ।। कारणं श्रुतमस्माभिः शापश्चैव श्रुतोऽनघे । करिष्यन्ति तु यत् प्राप्तं सर्व एव तपोधनाः ।। १२ ।। ‘निष्पाप सरस्वती! हमने शाप और उसका कारण सुन लिया। ये सभी तपोधन इस विषयमें समयोचित कर्तव्यका पालन करेंगे' ।। १२ ।। एवमुक्त्वा सरिच्छ्रेष्ठामूचुस्तेऽथ परस्परम् । विमोचयामहे सर्वे शापादेतां सरस्वतीम् ।। १३ ।। सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीसे ऐसा कहकर वे आपसमें बोले—‘हम सब लोग मिलकर इस सरस्वतीको शापसे छुटकारा दिलावें' ।। १३ ।। ते सर्वे ब्राह्मणा राजंस्तपोभिर्नियमैस्तथा । उपवासैश्च विविधैर्दमैः कष्टव्रतैस्तथा ।। १४ ।। आराध्य पशुभर्तारं महादेवं जगत्पतिम् । तां देवीं मोक्षयामासुः सरिच्छ्रेष्ठां सरस्वतीम् ।। १५ ।। राजन्! उन सभी ब्राह्मणोंने तप, नियम, उपवास, नाना प्रकारके संयम तथा कष्टसाध्य व्रतोंके द्वारा पशुपति विश्वनाथ महादेवजीकी आराधना करके सरिताओंमें श्रेष्ठ उस
सरस्वती देवीको शापसे छुटकारा दिलाया ।।
तेषां तु सा प्रभावेण प्रकृतिस्था सरस्वती ।
प्रसन्नसलिला जज्ञे यथापूर्वं तथैव हि ।। १६ ।।
उनके प्रभावसे सरस्वती प्रकृतिस्थ हुई, उसका जल पूर्ववत् स्वच्छ हो गया ।। १६ ।।
निर्मुक्ता च सरिच्छ्रेष्ठा विबभौ सा यथा पुरा ।
दृष्ट्वा तोयं सरस्वत्या मुनिभिस्तैस्तथा कृतम् ।। १७ ।।
तानेव शरणं जग्मू राक्षसाः क्षुधितास्तथा ।
शापमुक्त हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती पहलेकी भाँति शोभा पाने लगी। उन मुनियोंके द्वारा सरस्वतीका जल वैसा शुद्ध कर दिया गया—यह देखकर वे भूखे हुए राक्षस उन्हीं महर्षियोंकी शरणमें गये ।। १७ १/२ ।।
कृत्वाञ्जलिं ततो राजन् राक्षसाः क्षुधयार्दिताः ।। १८ ।।
ऊचुस्तान् वै मुनीन् सर्वान् कृपायुक्तान् पुनः पुनः ।
वयं च क्षुधिताश्चैव धर्माद्धीनाश्च शाश्वतात् ।। १९ ।।
राजन्! तदनन्तर वे भूखसे पीड़ित हुए राक्षस उन सभी कृपालु मुनियोंसे बारंबार हाथ जोड़कर कहने लगे—'महात्माओ! हम भूखे हैं। सनातन धर्मसे भ्रष्ट हो गये हैं ।।
न च नः कामकारोऽयं यद् वयं पापकारिणः ।
युष्माकं चाप्रसादेन दुष्कृतेन च कर्मणा ।। २० ।।
यत् पापं वर्धतेऽस्माकं ततः स्मो ब्रह्मराक्षसाः ।
'हमलोग जो पापाचार करते हैं, यह हमारा स्वेच्छाचार नहीं है। आप-जैसे महात्माओंकी हमलोगोंपर कभी कृपा नहीं हुई और हम सदा दुष्कर्म ही करते चले आये। इससे हमारे पापकी निरन्तर वृद्धि होती रहती है और हम ब्रह्मराक्षस हो गये हैं ।। २० १/२ ।।
योषितां चैव पापेन योनिदोषकृतेन च ।। २१ ।।
एवं हि वैश्यशूद्राणां क्षत्रियाणां तथैव च ।
ये ब्राह्मणान् प्रद्विषन्ति ते भवन्तीह राक्षसाः ।। २२ ।।
'स्त्रियाँ अपने योनिदोषजनित पाप (व्यभिचार)-से राक्षसी हो जाती हैं। इसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंमेंसे जो लोग ब्राह्मणोंसे द्वेष करते हैं, वे भी इस जगत्में राक्षस होते हैं ।। २१-२२ ।।
आचार्यमृत्विजं चैव गुरुं वृद्धजनं तथा ।
प्राणिनो येऽवमन्यन्ते ते भवन्तीह राक्षसाः ।। २३ ।।
'जो प्राणधारी मानव आचार्य, ऋत्विज, गुरु और वृद्ध पुरुषोंका अपमान करते हैं, वे भी यहाँ राक्षस होते हैं ।।
तत् कुरुध्वमिहास्माकं तारणं द्विजसत्तमाः ।
शक्ता भवन्तः सर्वेषां लोकानामपि तारणे ।। २४ ।।
‘अतः विप्रवरो आप यहाँ हमारा उद्धार करें; क्योंकि आपलोग सम्पूर्ण लोकोंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं’ ॥
तेषां तु वचनं श्रुत्वा तुष्टुवुस्तां महानदीम् ।
मोक्षार्थं रक्षसां तेषामूचुः प्रयतमानसाः ॥ २५ ॥
उन राक्षसोंका वचन सुनकर एकाग्रचित्त महर्षियोंने उनकी मुक्तिके लिये महानदी सरस्वतीका स्तवन किया और इस प्रकार कहा— ॥ २५ ॥
क्षुतं कीटावपन्नं च यच्चोच्छिष्टाचितं भवेत् ।
सकेशमवधूतं च रुदितोपहतं च यत् ॥ २६ ॥
श्वभिः संसृष्टमन्नं च भागोऽसौ रक्षसामिह ।
तस्माज्ज्ञात्वा सदा विद्वानेतान् यत्नाद् विवर्जयेत् ॥ २७ ॥
राक्षसान्नमसो भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते ह्यन्नमीदृशम् ।
‘जिस अन्नपर थूक पड़ गयी हो, जिसमें कीड़े पड़े हों, जो जूठा हो, जिसमें बाल गिरा हो, जो तिरस्कारपूर्वक प्राप्त हुआ हो, जो अश्रुपातसे दूषित हो गया हो तथा जिसे कुत्तोंने छू दिया हो, वह सारा अन्न इस जगत्में राक्षसोंका भाग है। अतः विद्वान् पुरुष सदा समझ-बूझकर इन सब प्रकारके अन्नोंका प्रयत्नपूर्वक परित्याग करे। जो ऐसे अन्नको खाता है, वह मानो राक्षसोंका अन्न खाता है’ ॥ २६-२७ १/२ ॥
शोधयित्वा ततस्तीर्थमृषयस्ते तपोधनाः ॥ २८ ॥
मोक्षार्थं राक्षसानां च नदीं तां प्रत्यचोदयन् ।
तदनन्तर उन तपोधन महर्षियोंने उस तीर्थकी शुद्धि करके उन राक्षसोंकी मुक्तिके लिये सरस्वती नदीसे अनुरोध किया ॥ २८ १/२ ॥
महर्षीणां मतं ज्ञात्वा ततः सा सरितां वरा ॥ २९ ॥
अरुणामानयामास स्वां तनूं पुरुषर्षभ ।
तस्यां ते राक्षसाः स्नात्वा तनूस्त्यक्त्वा दिवंगताः ॥ ३० ॥
अरुणायां महाराज ब्रह्मवध्यापहा हि सा ।
नरश्रेष्ठ! महर्षियोंका यह मत जानकर सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती अपनी ही स्वरूपभूता अरुणाको ले आयी। महाराज! उस अरुणामें स्नान करके वे राक्षस अपना शरीर छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये; क्योंकि वह ब्रह्महत्याका निवारण करनेवाली है ॥ २९-३० १/२ ॥
एतमर्थमभिज्ञाय देवराजः शतक्रतुः ॥ ३१ ॥
तस्मिंस्तीर्थे वरे स्नात्वा विमुक्तः पाप्मना किल ।
राजन्! कहते हैं, इस बातको जानकर देवराज इन्द्र उसी श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करके ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हुए थे ॥ ३१ १/२ ॥
जनमेजय उवाच
किमर्थं भगवान् शक्रो ब्रह्मवध्यामवाप्तवान् ॥ ३२ ॥
कथमस्मिंश्च तीर्थे वै आप्लुत्याकल्मषोऽभवत् ।
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! भगवान् इन्द्रको ब्रह्महत्याका पाप कैसे लगा तथा वे किस प्रकार इस तीर्थमें स्नान करके पापमुक्त हुए थे? ॥ ३२ १/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणुष्वैतदुपाख्यानं यथावृत्तं जनेश्वर ॥ ३३ ॥
यथा बिभेद समयं नमुचेर्वासवः पुरा ।
**वैशम्पायनजीने कहा—**जनेश्वर! पूर्वकालमें इन्द्रने नमुचिके साथ अपनी की हुई प्रतिज्ञाको जिस प्रकार तोड़ डाला था, वह सारी कथा जैसे घटित हुई थी, तुम यथार्थरूपसे सुनो ॥ ३३ १/२ ॥
नमुचिर्वासवाद् भीतः सूर्यरश्मिं समाविशत् ॥ ३४ ॥
तेनेन्द्रः सख्यमकरोत् समयं चेदमब्रवीत् ।
न चार्द्रेण न शुष्केण न रात्रौ नापि चाहनि ॥ ३५ ॥
वधिष्याम्यसुरश्रेष्ठ सखे सत्येन ते शपे ।
पहलेकी बात है, नमुचि इन्द्रके भयसे डरकर सूर्यकी किरणोंमें समा गया था। तब इन्द्रने उसके साथ मित्रता कर ली और यह प्रतिज्ञा की ‘असुरश्रेष्ठ! मैं न तो तुम्हें गीले हथियारसे मारूँगा न सूखेसे। न दिनमें मारूँगा न रातमें। सखे! मैं सत्यकी सौगन्ध खाकर यह बात तुमसे कहता हूँ’ ॥ ३४-३५ १/२ ॥
एवं स कृत्वा समयं दृष्ट्वा नीहारमीश्वरः ॥ ३६ ॥
चिच्छेदास्य शिरो राजन्नपां फेनेन वासवः ।
राजन्! इस प्रकार प्रतिज्ञा करके भी देवराज इन्द्रने चारों ओर कुहासा छाया हुआ देख पानीके फेनसे नमुचिका सिर काट लिया ॥ ३६ १/२ ॥
तच्छिरो नमुचेश्छिन्नं पृष्ठतः शक्रमन्वियात् ॥ ३७ ॥
भो भो मित्रघ्न पापेति ब्रुवाणं शक्रमन्तिकात् ।
नमुचिका वह कटा हुआ मस्तक इन्द्रके पीछे लग गया। वह उनके पास जाकर बारंबार कहने लगा, ‘ओ मित्रघाती पापात्मा इन्द्र! तू कहाँ जाता है?’ ॥ ३७ १/२ ॥
एवं स शिरसा तेन चोद्यमानः पुनः पुनः ॥ ३८ ॥
पितामहाय संतप्त एतमर्थं न्यवेदयत् ।
इस प्रकार उस मस्तकके द्वारा बारंबार पूर्वोक्त बात पूछी जानेपर अत्यन्त संतप्त हुए इन्द्रने ब्रह्माजीसे यह सारा समाचार निवेदन किया ॥ ३८ १/२ ॥
तमब्रवील्लोकगुरुररुणायां यथाविधि ॥ ३९ ॥
इष्ट्वोपस्पृश देवेन्द्र तीर्थे पापभयापहे ।
तब लोकगुरु ब्रह्माने उनसे कहा—'देवेन्द्र! अरुणा तीर्थ पाप-भयको दूर करनेवाला है। तुम वहाँ विधिपूर्वक यज्ञ करके अरुणाके जलमें स्नान करो।। ३९ १/२ ।।
एषा पुण्यजला शक्र कृता मुनिभिरेव तु।। ४०।।
निगूढमस्यागमनमिहासीत् पूर्वमेव तु।
ततोऽभ्येत्यारुणां देवीं प्लावयामास वारिणा।। ४१।।
'शक्र! महर्षियोंने इस अरुणाके जलको परम पवित्र बना दिया है। इस तीर्थमें पहले ही गुप्तरूपसे उसका आगमन हो चुका था, फिर सरस्वतीने निकट आकर अरुणादेवीको अपने जलसे आप्लावित कर दिया।।
सरस्वत्यारुणायाश्च पुण्योऽयं संगमो महान्।
इह त्वं यज देवेन्द्र दद दानान्यनेकणः।। ४२।।
अत्राप्लुत्य सुघोरात् त्वं पातकाद् विप्रमोक्ष्यसे।
'देवेन्द्र! सरस्वती और अरुणाका यह संगम महान् पुण्यदायक तीर्थ है। तुम यहाँ यज्ञ करो और अनेक प्रकारके दान दो। फिर उसमें स्नान करके तुम भयानक पातकसे मुक्त हो जाओगे'।। ४२ १/२ ।।
इत्युक्तः स सरस्वत्याः कुञ्जे वै जनमेजय।। ४३।।
इष्ट्वा यथावद् बलभिदरुणायामुपास्पृशत्।
स मुक्तः पाप्मना तेन ब्रह्मवध्याकृतेन च।। ४४।।
जगाम संहृष्टमनास्त्रिदिवं त्रिदशेश्वरः।
जनमेजय! उनके ऐसा कहनेपर इन्द्रने सरस्वतीके कुंजमें विधिपूर्वक यज्ञ करके अरुणामें स्नान किया। फिर ब्रह्महत्याजनित पापसे मुक्त हो देवराज इन्द्र हर्षोत्फुल्ल हृदयसे स्वर्गलोकमें चले गये।। ४३-४४ १/२ ।।
शिरस्तच्चापि नमुचेस्तत्रैवाप्लुत्य भारत।
लोकान् कामदुघान् प्राप्तमक्षयान् राजसत्तम।। ४५।।
भारत! नृपश्रेष्ठ! नमुचिका वह मस्तक भी उसी तीर्थमें गोता लगाकर मनोवांछित फल देनेवाले अक्षय लोकोंमें चला गया।। ४५।।
वैशम्पायन उवाच
तत्राप्युपस्पृश्य बलो महात्मा
दत्त्वा च दानानि पृथग्विधानि।
अवाप्य धर्मं परमार्थकर्मा
जगाम सोमस्य महत् सुतीर्थम्।। ४६।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! पारमार्थिक कार्य करनेवाले महात्मा बलरामजी उस तीर्थमें भी स्नान करके नाना प्रकारकी वस्तुओंका दान करके धर्मका फल पाकर सोमके
महान् एवं उत्तम तीर्थमें गये ॥ ४६ ॥ यत्रायजद् राजसूयेन सोमः साक्षात् पुरा विधिवत् पार्थिवेन्दः । अत्रिर्धीमान् विप्रमुख्यो बभूव होता यस्मिन् क्रतुमुख्ये महात्मा ॥ ४७ ॥ जहाँ पूर्वकालमें साक्षात् राजाधिराज सोमने विधिपूर्वक राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान किया था। उस श्रेष्ठ यज्ञमें बुद्धिमान् विप्रवर महात्मा अत्रिने होताका कार्य किया था ॥ यस्यान्तेऽभूत् सुमहद् दानवानां दैतेयानां राक्षसानां च देवैः । यस्मिन् युद्धं तारकाख्यं सुतीव्रं यत्र स्कन्दस्तारकाख्यं जघान ॥ ४८ ॥ उस यज्ञके अन्तमें देवताओंके साथ दानवों, दैत्यों तथा राक्षसोंका महान् एवं भयंकर तारकामय संग्राम हुआ था, जिसमें स्कन्दने तारकासुरका वध किया था ॥ सैनापत्यं लब्धवान् देवतानां महासेनो यत्र दैत्यान्तकर्ता । साक्षाच्चैवं न्यवसत् कार्तिकेयः सदा कुमारो यत्र स प्लक्षराजः ॥ ४९ ॥ उसीमें दैत्यविनाशक महासेन कार्तिकेयने देवताओंका सेनापतित्व ग्रहण किया था। जहाँ वह पाकड़का श्रेष्ठ वृक्ष है, वहाँ साक्षात् कुमार कार्तिकेय इस तीर्थमें सदा निवास करते हैं ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥