महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
द्रोणाचार्यके द्वारा बृहत्क्षत्र, धृष्टकेतु, जरासन्धपुत्र सहदेव तथा धृष्टद्युम्नकुमार क्षत्रधर्माका वध और चेकितानकी पराजय
संजय उवाच
अपराह्ने महाराज संग्रामः सुमहानभूत् ।
पर्जन्यसमनिर्घोषः पुनर्द्रोणस्य सोमकैः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! अपराह्नकालमें सोमकोंके साथ द्रोणाचार्यका पुनः महान् संग्राम छिड़ गया, जिसमें मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर सिंहनाद हो रहा था ॥ १ ॥
शोणाश्वं रथमास्थाय नरवीरः समाहितः ।
समरेऽभ्यद्रवत् पाण्डून् जवमास्थाय मध्यमम् ॥ २ ॥
नरवीर द्रोण लाल घोड़ोंवाले रथपर आरूढ़ हो चित्तको एकाग्र करके मध्यम वेगका आश्रय ले समरभूमिमें पाण्डवोंपर टूट पड़े ॥ २ ॥
तव प्रियहिते युक्तो महेष्वासो महाबलः ।
चित्रपुङ्खैः शितैर्बाणैः कलशोत्तमसम्भवः ॥ ३ ॥
(जघान सोमकान् राजन् सृञ्जयान् केकयानपि ।)
राजन्! आपके प्रिय और हित-साधनमें लगे हुए महाधनुर्धर महाबली उत्तम कलशजन्मा द्रोणाचार्यने अपने विचित्र पंखोंवाले पैने बाणोंद्वारा सोमकों, सृंजयों तथा केकयोंका संहार आरम्भ किया ॥ ३ ॥
वरान् वरान् हि योधानां विचिन्वन्निव भारत ।
आक्रीडत रणे राजन् भारद्वाजः प्रतापवान् ॥ ४ ॥
भरतवंशी नरेश! प्रतापी द्रोणाचार्य मानो उस युद्धस्थलमें प्रधान-प्रधान योद्धाओंको चुन रहे हों, इस प्रकार उनके साथ खेल-सा कर रहे थे ॥ ४ ॥
तमभ्ययाद् बृहत्क्षत्रः केकयानां महारथः ।
भ्रातॄणां नृप पञ्चानां श्रेष्ठः समरकर्कशः ॥ ५ ॥
नरेश्वर! उस समय रणकर्कश केकय महारथी वृहत्क्षत्र, जो अपने पाँचों भाइयोंमें सबसे बड़े थे, द्रोणाचार्यका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ ५ ॥
विमुञ्चन् विशिखांस्तीक्ष्णनाचार्यं भृशमार्दयत् ।
महामेघो यथा वर्षं विमुञ्चन् गन्धमादने ॥ ६ ॥
उन्होंने गन्धमादन पर्वतपर पानी बरसानेवाले महामेघके समान पैने बाणोंकी वर्षा करके आचार्य द्रोणको अत्यन्त पीड़ित कर दिया ॥ ६ ॥ तस्य द्रोणो महाराज स्वर्णपुङ्खान् शिलाशितान् । प्रेषयामास संक्रुद्धः सायकान् दश पञ्च च ॥ ७ ॥ महाराज! तब द्रोणने अत्यन्त कुपित हो सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सोनेके पंखवाले पंद्रह बाणोंका बृहत्क्षत्रपर प्रहार किया ॥ ७ ॥ तांस्तु द्रोणविनिर्मुक्तान् क्रुद्धाशीविषसंनिभान् । एकैकं पञ्चभिर्बाणैर्युधि चिच्छेद हृष्टवत् ॥ ८ ॥ द्रोणाचार्यके छोड़े हुए रोषभरे विषधर सर्पोंके समान उन भयंकर बाणोंमेंसे प्रत्येकको बृहत्क्षत्रने युद्धमें पाँच-पाँच बाण मारकर प्रसन्नतापूर्वक काट डाला ॥ ८ ॥ तदस्य लाघवं दृष्ट्वा प्रहस्य द्विजपुङ्गवः । प्रेषयामास विशिखानष्टौ संनतपर्वणः ॥ ९ ॥ उनकी इस फुर्तीको देखकर विप्रवर द्रोणने हँसते हुए झुकी हुई गाँठवाले आठ बाणोंका प्रहार किया ॥ ९ ॥ तान् दृष्ट्वा पततस्तूर्णं द्रोणचापच्युतान् शरान् । अवारयच्छरैरेव तावद्भिर्निशितैर्मृधे ॥ १० ॥ द्रोणाचार्यके धनुषसे छूटे हुए उन बाणोंको शीघ्र ही अपने ऊपर आते देख वृहत्क्षत्रने उतने ही तीखे बाणोंद्वारा उन्हें युद्धस्थलमें काट गिराया ॥ १० ॥ ततोऽभवन्महाराज तव सैन्यस्य विस्मयः । बृहत्क्षत्रेण तत् कर्म कृतं दृष्ट्वा सुदुष्करम् ॥ ११ ॥ ततो द्रोणो महाराज बृहत्क्षत्रं विशेषयन् । प्रादुश्चक्रे रणे दिव्यं ब्राह्ममस्त्रं सुदुर्जयम् ॥ १२ ॥ महाराज! इससे आपकी सेनाको बड़ा आश्चर्य हुआ। बृहत्क्षत्रद्वारा किये हुए उस अत्यन्त दुष्कर कर्मको देखकर उनकी अपेक्षा अपनी विशेषता प्रकट करते हुए द्रोणाचार्यने रणक्षेत्रमें परम दुर्जय दिव्य ब्रह्मास्त्र प्रकट किया ॥ ११-१२ ॥ कैकेयोऽस्त्रं समालोक्य मुक्तं द्रोणेन संयुगे । ब्रह्मास्त्रेणैव राजेन्द्र ब्राह्ममस्त्रमशातयत् ॥ १३ ॥ राजेन्द्र! युद्धभूमिमें द्रोणाचार्यके द्वारा चलाये हुए ब्रह्मास्त्रको देखकर केकयनरेशने ब्रह्मास्त्रद्वारा ही उसे शान्त कर दिया ॥ १३ ॥ ततोऽस्त्रे निहते ब्राह्मे बृहत्क्षत्रस्तु भारत । विव्याध ब्राह्मणं षष्ट्या स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः ॥ १४ ॥ भरतनन्दन! ब्रह्मास्त्रका निवारण हो जानेपर बृहत्क्षत्रने सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सोनेके पंखोंसे युक्त साठ बाणोंद्वारा ब्राह्मण द्रोणाचार्यको वेध दिया ॥
तं द्रोणो द्विपदां श्रेष्ठो नाराचेन समार्पयत् । स तस्य कवचं भित्त्वा प्राविशद् धरणीतलम् ॥ १५ ॥ तब मनुष्योंमें श्रेष्ठ द्रोणने उनपर नाराच चलाया। वह नाराच बृहत्क्षत्रका कवच विदीर्ण करके धरतीमें समा गया ॥ १५ ॥
कृष्णसर्पो यथा मुक्तो वल्मीकं नृपसत्तम । तथात्यगान्महीं बाणो भित्त्वा कैकेयमाहवे ॥ १६ ॥ नृपश्रेष्ठ! जैसे काला साँप बाँबीमें प्रवेश करता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यके धनुषसे छूटा हुआ वह बाण युद्धस्थलमें केकयराजकुमार बृहत्क्षत्रको विदीर्ण करके पृथ्वीमें घुस गया ॥ १६ ॥
सोऽतिविद्धो महाराज कैकेयो द्रोणसायकैः । क्रोधेन महताऽऽविष्टो व्यावृत्य नयने शुभे ॥ १७ ॥ महाराज! द्रोणाचार्यके बाणोंसे अत्यन्त घायल हो जानेपर केकयराजकुमारको बड़ा क्रोध हुआ। वे अपनी दोनों सुन्दर आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे ॥ १७ ॥
द्रोणं विव्याध सप्तत्या स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः । सारथिं चास्य बाणेन भृशं मर्मस्वताडयत् ॥ १८ ॥ उन्होंने सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्ण-पंखयुक्त सत्तर बाणोंसे द्रोणाचार्यको बींध डाला और एक बाणद्वारा उनके सारथिके मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ १८ ॥
द्रोणस्तु बहुभिर्विद्धो बृहत्क्षत्रेण मारिष । असृजद् विशिखांस्तीक्ष्णान् कैकेयस्य रथं प्रति ॥ १९ ॥ माननीय नरेश! जब बृहत्क्षत्रने बहुसंख्यक बाणोंसे द्रोणाचार्यको क्षत-विक्षत कर दिया, तब उन्होंने केकयनरेशके रथपर तीखे सायकोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १९ ॥
व्याकुलीकृत्य तं द्रोणो बृहत्क्षत्रं महारथम् । अश्वांश्चतुर्भिर्न्यवधीच्चतुरोऽस्य पतत्रिभिः ॥ २० ॥ द्रोणाचार्यने महारथी बृहत्क्षत्रको व्याकुल करके अपने चार बाणोंद्वारा उनके चारों घोड़ोंको मार डाला ॥
सूतं चैकेन बाणेन रथनीडादपातयत् । द्वाभ्यां ध्वजं च छत्रं च छित्त्वा भूमावपातयत् ॥ २१ ॥ फिर एक बाणसे मारकर सारथिको रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया और दो बाणोंसे उनके ध्वज और छत्रको भी पृथ्वीपर काट गिराया ॥ २१ ॥
ततः साधुविसृष्टेन नाराचेन द्विजर्षभः । हृद्यविध्यद् बृहत्क्षत्रं स च्छिन्नहृदयोऽपतत् ॥ २२ ॥ तदनन्तर अच्छी तरह चलाये हुए नाराचसे द्विजश्रेष्ठ द्रोणने बृहत्क्षत्रकी छाती छेद डाली। वक्षःस्थल विदीर्ण होनेके कारण बृहत्क्षत्र धरतीपर गिर पड़े ॥ २२ ॥
बृहत्क्षेत्रे हते राजन् केकयानां महारथे । शैशुपालिरभिक्रुद्धो यन्तारमिदमब्रवीत् ॥ २३ ॥ राजन्! केकय महारथी बृहत्क्षेत्रके मारे जानेपर शिशुपालपुत्र धृष्टकेतुने अत्यन्त कुपित हो अपने सारथिसे इस प्रकार कहा— ॥ २३ ॥
सारथे याहि यत्रैष द्रोणस्तिष्ठति दंशितः । विनिघ्नन् केकयान् सर्वान् पञ्चालानां च वाहिनीम् ॥ २४ ॥ 'सारथे! जहाँ ये द्रोणाचार्य कवच धारण किये खड़े हैं और समस्त केकयों तथा पांचाल-सेनाका संहार कर रहे हैं, वहीं चलो' ॥ २४ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सारथी रथिनां वरम् । द्रोणाय प्रापयामास काम्बोजैर्जवनैर्हयैः ॥ २५ ॥ उनकी वह बात सुनकर सारथिने काम्बोजदेशीय (काबुली) वेगशाली घोड़ोंद्वारा रथियोंमें श्रेष्ठ धृष्टकेतुको द्रोणाचार्यके निकट पहुँचा दिया ॥ २५ ॥
धृष्टकेतुश्च चेदीनामृषभोऽतिबलोदितः । वधायाभ्यद्रवद् द्रोणं पतङ्ग इव पावकम् ॥ २६ ॥ अत्यन्त बलसम्पन्न चेदिराज धृष्टकेतु द्रोणाचार्यका वध करनेके लिये उनकी ओर उसी प्रकार दौड़ा, जैसे फतिंगा आगपर टूट पड़ता है ॥ २६ ॥
सोऽविध्यत तदा द्रोणं षष्ट्या साश्वरथध्वजम् । पुनश्चान्यैः शरैस्तीक्ष्णैः सुप्तं व्याघ्रं तुदन्निव ॥ २७ ॥ उसने घोड़े, रथ और ध्वजसहित द्रोणाचार्यको उस समय साठ बाणोंसे वेध दिया। फिर सोते हुए शेरको पीड़ित करते हुए-से उसने अन्य तीखे बाणोंद्वारा भी आचार्यको घायल कर दिया ॥ २७ ॥
तस्य द्रोणो धनुर्मध्ये क्षुरप्रेण शितेन च । चकर्त गार्ध्रपत्रेण यतमानस्य शुष्मिणः ॥ २८ ॥ तब द्रोणाचार्यने गीधकी पाँखवाले तीखे क्षुरप्रद्वारा विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले बलवान् धृष्टकेतुके धनुषको बीचसे ही काट दिया ॥ २८ ॥
अथान्यद् धनुरदाय शैशुपालिर्महारथः । विव्याध सायकैर्द्रोणं कङ्कबर्हिणवाजितैः ॥ २९ ॥ यह देख महारथी शिशुपालकुमारने दूसरा धनुष हाथमें लेकर कंक और मोरकी पाँखोंसे युक्त बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको घायल कर दिया ॥ २९ ॥
तस्य द्रोणो हयान् हत्वा चतुर्भिश्चतुरः शरैः । सारथेश्च शिरः कायाच्चकर्त प्रहसन्निव ॥ ३० ॥ द्रोणाचार्यने चार बाणोंसे धृष्टकेतुके चारों घोड़ोंको मारकर उनके सारथिके भी मस्तकको हँसते हुए-से काटकर धड़से अलग कर दिया ॥ ३० ॥
अथैनं पञ्चविंशत्या सायकानां समर्पयत् । अवप्लुत्य रथाच्चैद्यो गदामादाय सत्वरः ॥ ३१ ॥ भारद्वाजाय चिक्षेप रुषितामिव पन्नगीम् । तत्पश्चात् उन्होंने धृष्टकेतुको पचीस बाण मारे। उस समय धृष्टकेतुने शीघ्रतापूर्वक रथसे कूदकर गदा हाथमें ले ली और रोषमें भरी हुई सर्पिणीके समान उसे द्रोणाचार्यपर दे मारा ॥ ३१ १/२ ॥
तामापतन्तीमालोक्य कालरात्रिमिवोद्यताम् ॥ ३२ ॥ अश्मसारमयीं गुर्वीं तपनीयविभूषिताम् । शरैरनेकसाहस्रैर्भारद्वाजोऽच्छिनच्छितैः ॥ ३३ ॥ वह गदा लोहेकी बनी हुई और भारी थी। उसमें सोने जड़े हुए थे, उसे उठी हुई कालरात्रिके समान अपने ऊपर गिरती देख द्रोणाचार्यने कई हजार पैने बाणोंसे उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ ३२-३३ ॥
सा छिन्ना बहुभिर्बाणैर्भारद्वाजेन मारिष । गदा पपात कौरव्य नादयन्ती धरातलम् ॥ ३४ ॥ माननीय कौरवनरेश! द्रोणाचार्यद्वारा अनेक बाणोंसे छिन्न-भिन्न की हुई वह गदा भूतलको निनादित करती हुई धमसे गिर पड़ी ॥ ३४ ॥
गदां विनिहतां दृष्ट्वा धृष्टकेतुरमर्षणः । तोमरं व्यसृजद् वीरः शक्तिं च कनकोज्ज्वलाम् ॥ ३५ ॥ अपनी गदाको नष्ट हुई देख अमर्षमें भरे हुए वीर धृष्टकेतुने द्रोणाचार्यपर तोमर तथा स्वर्णभूषित तेजस्विनी शक्तिका प्रहार किया ॥ ३५ ॥
तोमरं पञ्चभिर्भित्त्वा शक्तिं चिच्छेद पञ्चभिः । तौ जग्मतुर्महीं छिन्नौ सर्पाविव गरुत्मता ॥ ३६ ॥ द्रोणाचार्यने तोमरको पाँच बाणोंसे छिन्न-भिन्न करके पाँच बाणोंद्वारा धृष्टकेतुकी शक्तिके भी टुकड़े-टुकड़े कर दिये। वे दोनों अस्त्र गरुड़के द्वारा खण्डित किये हुए दो सर्पोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३६ ॥
ततोऽस्य विशिखं तीक्ष्णं वधाय वधकाङ्क्षिणः । प्रेषयामास समरे भारद्वाजः प्रतापवान् ॥ ३७ ॥ तत्पश्चात् अपने वधकी इच्छा रखनेवाले धृष्टकेतुके वधके लिये प्रतापी द्रोणाचार्यने समरभूमिमें उसके ऊपर एक बाणका प्रहार किया ॥ ३७ ॥
स तस्य कवचं भित्त्वा हृदयं चामितौजसः । अभ्यगाद् धरणीं बाणो हंसः पद्मवनं यथा ॥ ३८ ॥ जैसे हंस कमलवनमें प्रवेश करता है, उसी प्रकार वह बाण अमित तेजस्वी धृष्टकेतुके कवच और वक्षःस्थलको विदीर्ण करके धरतीमें समा गया ॥ ३८ ॥
पतङ्गं हि ग्रसेच्चाषो यथा क्षुद्रं बुभुक्षितः । तथा द्रोणोऽग्रसच्छूरो धृष्टकेतुं महाहवे ॥ ३९ ॥ जैसे भूखा हुआ नीलकण्ठ छोटे फतिंगेको खा जाता है, उसी प्रकार शूरवीर द्रोणाचार्यने उस महासमरमें धृष्टकेतुको अपने बाणोंका ग्रास बना लिया ॥ ३९ ॥
निहते चेदिराजे तु तत् खण्डं पित्र्यमाविशत् । अमर्षवशमापन्नः पुत्रोऽस्य परमास्त्रवित् ॥ ४० ॥ चेदिराजके मारे जानेपर उत्तम अस्त्रोंका ज्ञाता उसका पुत्र अमर्षके वशीभूत हो पिताके स्थानपर आकर डट गया ॥ ४० ॥
तमपि प्रहसन् द्रोणः शरैर्निन्ये यमक्षयम् । महाव्याघ्रो महारण्ये मृगशावं यथा बली ॥ ४१ ॥ परंतु हँसते हुए द्रोणाचार्यने उसे भी अपने बाणोंद्वारा उसी प्रकार यमलोक पहुँचा दिया, जैसे बलवान् महाव्याघ्र विशाल वनमें किसी हिरनके बच्चेको दबोच लेता है ॥ ४१ ॥
तेषु प्रक्षीयमाणेषु पाण्डवेयेषु भारत । जरासंधसुतो वीरः स्वयं द्रोणमुपाद्रवत् ॥ ४२ ॥ भरतनन्दन! उन पाण्डवयोध्दाओंके इस प्रकार नष्ट होनेपर जरासंधके वीर पुत्र सहदेवने स्वयं ही द्रोणाचार्यपर धावा किया ॥ ४२ ॥
स तु द्रोणं महाबाहुः शरधाराभिराहवे । अदृश्यमकरोत् तूर्णं जलदो भास्करं यथा ॥ ४३ ॥ जैसे बादल आकाशमें सूर्यको ढक लेता है, उसी प्रकार महाबाहु सहदेवने युद्धस्थलमें अपने बाणोंकी धाराओंसे द्रोणाचार्यको तुरंत ही अदृश्य कर दिया ॥ ४३ ॥
तस्य तल्लाघवं दृष्ट्वा द्रोणः क्षत्रियमर्दनः । व्यसृजत् सायकांस्तूर्णं शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४४ ॥ उसकी वह फुर्ती देखकर क्षत्रियोंका संहार करनेवाले द्रोणाचार्यने शीघ्र ही उसपर सैकड़ों और सहस्रों बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ४४ ॥
छादयित्वा रणे द्रोणो रथस्थं रथिनां वरम् । जारासंधिं जघानाशु मिषतां सर्वधन्विनाम् ॥ ४५ ॥ इस प्रकार रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्यने सम्पूर्ण धनुर्धरोंके देख-देखते रथपर बैठे हुए रथियोंमें श्रेष्ठ जरासंधकुमारको अपने बाणोंद्वारा आच्छादित करके उसे शीघ्र ही कालके गालमें डाल दिया ॥ ४५ ॥
यो यः स्म नीयते तत्र तं द्रोणो ह्यन्तकोपमः । आदत्त सर्वभूतानि प्राप्ते काले यथान्तकः ॥ ४६ ॥
जैसे काल आनेपर यमराज समस्त प्राणियोंको ग्रस लेता है, उसी प्रकार कालके समान द्रोणाचार्यने जो-जो वीर उनके सामने पहुँचा, उसे-उसे मौतके हवाले कर दिया ॥ ४६ ॥
ततो द्रोणो महाराज नाम विश्राव्य संयुगे ।
शरैरनेकसाहस्रैः पाण्डवेयान् समावृणोत् ॥ ४७ ॥
महाराज! तदनन्तर द्रोणाचार्यने युद्धस्थलमें अपना नाम सुनाकर अनेक सहस्र बाणोंद्वारा पाण्डव-सैनिकोंको ढक दिया ॥ ४७ ॥
ते तु नामाङ्किता बाणा द्रोणेनास्ताः शिलाशिताः ।
नरान् नागान् हयांश्चैव निजघ्नुः शतशो मृधे ॥ ४८ ॥
द्रोणाचार्यके चलाये हुए वे बाण सानपर चढ़ाकर तेज किये गये थे। उनपर आचार्यके नाम खुदे हुए थे। उन्होंने समरभूमिमें सैकड़ों मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंका संहार कर डाला ॥ ४८ ॥
ते वध्यमाना द्रोणेन शक्रेणेव महासुराः ।
समकम्पन्त पञ्चाला गावः शीतार्दिता इव ॥ ४९ ॥
जैसे सर्दीसे पीड़ित हुई गौएँ थर-थर काँपती हैं और जैसे देवराज इन्द्रकी मार खाकर बड़े-बड़े असुर काँपने लगते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्यके बाणोंसे विद्ध होकर पांचालसैनिक काँप उठे ॥ ४९ ॥
ततो निष्ठानको घोरः पाण्डवानामाजायत ।
द्रोणेन वध्यमानेषु सैन्येषु भरतर्षभ ॥ ५० ॥
भरतश्रेष्ठ! फिर तो द्रोणाचार्यके द्वारा मारी जाती हुई पाण्डवोंकी सेनाओंमें घोर आर्तनाद होने लगा ॥ ५० ॥
प्रताप्यमानाः सूर्येण हन्यमानाश्च सायकैः ।
अन्यपद्यन्त पञ्चालास्तदा संत्रस्तचेतसः ॥ ५१ ॥
भरतनन्दन! उस समय ऊपरसे तो सूर्य तपा रहे थे और रणभूमिमें द्रोणाचार्यके सायकोंकी मार पड़ रही थी। उस अवस्थामें पांचाल वीर मन-ही-मन अत्यन्त भयभीत एवं व्याकुल हो उठे ॥ ५१ ॥
मोहिता बाणजालेन भारद्वाजेन संयुगे ।
ऊरुग्राहगृहीतानां पञ्चलानां महारथाः ॥ ५२ ॥
उस युद्धस्थलमें भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यके बाण-समूहोंसे आहत हो पांचाल महारथी मूर्छित हो रहे थे। उनकी जाँघें अकड़ गयी थीं ॥ ५२ ॥
चेदयश्च महाराज सृञ्जयाः काशिकोसलाः ।
अभ्यद्रवन्त संहृष्टा भारद्वाजं युयुत्सया ॥ ५३ ॥
महाराज! उस समय चेदि, सृंजय, काशी और कोसल प्रदेशोंके सैनिक हर्ष और उत्साहमें भरकर युद्धकी अभिलाषासे द्रोणाचार्यपर टूट पड़े ॥ ५३ ॥
ब्रुवन्तश्च रणेऽन्योन्यं चेदिपञ्चालसृञ्जयाः ।
घ्नत द्रोणं घ्नत द्रोणमिति ते द्रोणमभ्ययुः ॥ ५४ ॥
‘द्रोणाचार्यको मार डालो, द्रोणाचार्यको मार डालो’ परस्पर ऐसा कहते हुए चेदि, पांचाल और सृंजय वीरोंने द्रोणाचार्यपर धावा किया ॥ ५४ ॥
यतन्तः पुरुषव्याघ्राः सर्वशक्त्या महाद्युतिम् ।
निनीषवो रणे द्रोणं यमस्य सदनं प्रति ॥ ५५ ॥
वे पुरुषसिंह वीर समरांगणमें महातेजस्वी आचार्य द्रोणको यमराजके घर भेज देनेकी इच्छासे अपनी सारी शक्ति लगाकर प्रयत्न करने लगे ॥ ५५ ॥
यतमानांस्तु तान् वीरान् भारद्वाजः शिलीमुखैः ।
यमाय प्रेषयामास चेदिमुख्यान् विशेषतः ॥ ५६ ॥
इस प्रकार प्रयत्नमें लगे हुए उन वीरोंको विशेषतः चेदि देशके प्रमुख योद्धाओंको द्रोणाचार्यने अपने बाणोंद्वारा यमलोक भेज दिया ॥ ५६ ॥
तेषु प्रक्षीयमाणेषु चेदिमुख्येषु सर्वशः ।
पञ्चालाः समकम्पन्त द्रोणसायकपीडिताः ॥ ५७ ॥
चेदि देशके प्रधान वीर जब इस प्रकार नष्ट होने लगे, तब द्रोणाचार्यके बाणोंसे पीड़ित हुए पांचालयोद्धा थर-थर काँपने लगे ॥ ५७ ॥
प्राक्रोशन् भीमसेनं ते धृष्टद्युम्नं च भारत ।
दृष्ट्वा द्रोणस्य कर्माणि तथारूपाणि मारिष ॥ ५८ ॥
माननीय भरतनन्दन! वे द्रोणके वैसे पराक्रमको देखकर भीमसेन तथा धृष्टद्युम्नको पुकारने लगे ॥ ५८ ॥
ब्राह्मणेन तपो नूनं चरितं दुश्चरं महत् ।
तथा हि युधि संक्रुद्धो दहति क्षत्रियर्षभान् ॥ ५९ ॥
और परस्पर कहने लगे—‘इस ब्राह्मणने निश्चय ही कोई बड़ी भारी दुष्कर तपस्या की है, तभी तो यह युद्धमें अत्यन्त क्रुद्ध होकर श्रेष्ठ क्षत्रियोंको दग्ध कर रहा है ॥
धर्मो युद्धं क्षत्रियस्य ब्राह्मणस्य परं तपः ।
तपस्वी कृतविद्यश्च प्रेक्षितेनापि निर्दहेत् ॥ ६० ॥
‘युद्ध करना तो क्षत्रियका धर्म है। तप करना ही ब्राह्मणका उत्तम धर्म माना गया है। यह तपस्वी और अस्त्रविद्याका विद्वान् ब्राह्मण अपने दृष्टिपातमात्रसे दग्ध कर सकता है’ ॥ ६० ॥
द्रोणाग्निमस्त्रसंस्पर्शं प्रविष्टाः क्षत्रियर्षभाः ।
बहवो दुस्तरं घोरं यत्रादह्यन्त भारत ॥ ६१ ॥
भारत! उस युद्धमें बहुत-से क्षत्रियशिरोमणि वीर अस्त्ररूपी दाहक स्पर्शवाले द्रोणाचार्यरूपी भयंकर एवं दुस्तर अग्निमें प्रविष्ट होकर भस्म हो गये ॥ ६१ ॥
यथाबलं यथोत्साहं यथासत्त्वं महाद्युतिः । मोहयन् सर्वभूतानि द्रोणो हन्ति बलानि नः ॥ ६२ ॥ पाञ्चालसैनिक कहने लगे—‘महातेजस्वी द्रोण अपने बल, उत्साह और धैर्यके अनुसार समस्त प्राणियोंको मोहित करते हुए हमारी सेनाओंका संहार कर रहे हैं’ ॥ ६२ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा क्षत्रधर्मा व्यवस्थितः । अर्धचन्द्रेण चिच्छेद क्षत्रधर्मा महाबलः ॥ ६३ ॥ क्रोधसंविग्नमनसो द्रोणस्य सशरं धनुः । उनकी यह बात सुनकर क्षत्रधर्मा युद्धके लिये द्रोणाचार्यके सामने आकर खड़ा हो गया। उस महाबली वीरने अर्धचन्द्राकार बाण मारकर क्रोधसे उद्विग्न मनवाले द्रोणाचार्यके धनुष और बाणको काट दिया ॥ ६३ १/२ ॥
स संरब्धतरो भूत्वा द्रोणः क्षत्रियमर्दनः ॥ ६४ ॥ अन्यत् कार्मुकमादाय भास्वरं वेगवत्तरम् । तत्राधाय शरं तीक्ष्णं परानीकविशातनम् ॥ ६५ ॥ आकर्णपूर्णमाचार्यो बलवानभ्यवासृजत् । स हत्वा क्षत्रधर्माणं जगाम धरणीतलम् ॥ ६६ ॥ इससे क्षत्रियोंका मर्दन करनेवाले द्रोणाचार्य अत्यन्त कुपित हो उठे और अत्यन्त वेगशाली तथा प्रकाशमान दूसरा धनुष हाथमें लेकर उन्होंने एक तीखा बाण अपने धनुषपर रखा, जो शत्रुसेनाका विनाश करनेवाला था। बलवान् आचार्यने कानतक धनुषको खींचकर उस बाणको छोड़ दिया। वह बाण क्षत्रधर्माका वध करके धरतीमें समा गया ॥ ६४—६६ ॥
स भिन्नहृदयो वाहान्न्यपतन्मेदिनी Kos... तले । ततः सैन्यान्यकम्पन्त धृष्टद्युम्नसुते हते ॥ ६७ ॥ क्षत्रधर्मा हृदय विदीर्ण हो जानेके कारण रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा। इस प्रकार धृष्टद्युम्नकुमारके मारे जानेपर सारी सेनाएँ भयसे काँपने लगीं ॥ ६७ ॥
अथ द्रोणं समारोहच्चेकितानो महाबलः । स द्रोणं दशभिर्विद्ध्वा प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ॥ ६८ ॥ चतुर्भिः सारथिं चास्य चतुर्भिश्चतुरो हयान् । तदनन्तर महाबली चेकितानने द्रोणाचार्यपर चढ़ाई की। उन्होंने दस बाणोंसे द्रोणको घायल करके उनकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी। साथ ही चार बाणोंसे उनके सारथिको और चार ही बाणोंद्वारा उनके चारों घोड़ोंको भी बींध डाला ॥ ६८ १/२ ॥
तमाचार्यस्त्रिभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ ६९ ॥ ध्वजं सप्तभिरुन्मथ्य यन्तारमवधीत् त्रिभिः ।
तब आचार्यने उनकी दोनों भुजाओं और छातीमें कुल तीन बाण मारे। फिर सात सायकोंद्वारा उनकी ध्वजाके टुकड़े-टुकड़े करके तीन बाणोंसे सारथिका वध कर दिया॥ ६९ १/२॥ तस्य सूते हते तेऽश्वा रथमादाय विद्रुताः ॥ ७० ॥ समरे शरसंवीता भारद्वाजेन मारिष । चेकितानके सारथिके मारे जानेपर वे घोड़े उनका रथ लेकर भाग चले। आर्य! द्रोणाचार्यने समरांगणमें उनके शरीरोंको बाणोंसे भर दिया था॥ ७० १/२॥ चेकितानरथं दृष्ट्वा हताश्वं हतसारथिम् ॥ ७१ ॥ तान् समेतान् रणे शूरांश्चेदिपञ्चालसृञ्जयान् । समन्ताद् द्रावयन् द्रोणो बह्वशोभत मारिष ॥ ७२ ॥ जिसके घोड़े और सारथि मार दिये गये थे, चेकितानके उस रथको देखकर तथा रणक्षेत्रमें एकत्र हुए चेदि, पांचाल तथा सृंजय वीरोंपर दृष्टिपात करके द्रोणाचार्यने उन सबको चारों ओर भगा दिया। आर्य! उस समय उनकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ ७१-७२॥ आकर्णपलितः श्यामो वयसाशीतिपञ्चकः । रणे पर्यचरद् द्रोणो वृद्धः षोडशवर्षवत् ॥ ७३ ॥ जिनके कानतकके बाल पक गये थे, शरीरकी कान्ति श्याम थी तथा जो पचासी (या चार सौ) वर्षोंकी अवस्थाके बूढ़े थे, वे द्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें सोलह वर्षके नवजवानकी भाँति विचर रहे थे॥ ७३॥ अथ द्रोणं महाराज विचरन्तमभीतवत् । वज्रहस्तममन्यन्त शत्रवः शत्रुसूदनम् ॥ ७४ ॥ महाराज! रणभूमिमें निर्भय-से विचरते हुए शत्रुसूदन द्रोणको शत्रुओंने वज्रधारी इन्द्र समझा॥ ७४॥ ततोऽब्रवीन्महाबाहुर्द्रुपदो बुद्धिमान् नृप । लुब्धोऽयं क्षत्रियान् हन्ति व्याघ्रः क्षुद्रमृगानिव ॥ ७५ ॥ नरेश्वर! उस समय महाबाहु बुद्धिमान् राजा द्रुपदने कहा—'जैसे बाघ छोटे मृगोंको मारता है, उसी प्रकार यह व्याध-तुल्य ब्राह्मण क्षत्रियोंका संहार कर रहा है॥ ७५॥ कृच्छ्रान् दुर्योधनो लोकान् पापः प्राप्स्यति दुर्मतिः । यस्य लोभाद् विनिहताः समरे क्षत्रियर्षभाः ॥ ७६ ॥ 'दुर्बुद्धि पापी दुर्योधन अत्यन्त कष्टप्रद लोकोंमें जायगा, जिसके लोभसे इस समरांगणमें बहुत-से क्षत्रियशिरोमणि वीर मारे गये हैं॥ ७६॥ शतशः शेरते भूमौ निकृत्ता गोवृषा इव । रुधिरेण परीताङ्गा श्वशृगालादनीकृताः ॥ ७७ ॥
‘सैकड़ों योद्धा कटकर गाय-बैलोंके समान धरतीपर सो रहे हैं। इन सबके शरीर खूनसे लथपथ हो गये हैं और ये कुत्तों तथा सियारोंके भोजन बन गये हैं’ ॥ ७७ ॥
एवमुक्त्वा महाराज द्रुपदोऽक्षौहिणीपतिः ।
पुरस्कृत्य रणे पार्थान् द्रोणमभ्यद्रवद् द्रुतम् ॥ ७८ ॥
महाराज! ऐसा कहकर एक अक्षौहिणी सेनाके स्वामी राजा द्रुपदने रणक्षेत्रमें कुन्तीके पुत्रोंको आगे करके तुरंत ही द्रोणाचार्यपर धावा बोल दिया ॥ ७८ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि द्रोणपराक्रमे
पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें द्रोणपराक्रमविषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ७८ १/३ श्लोक हैं।)
१२६-
षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका चिन्तित होकर भीमसेनको अर्जुन और सात्यकिका पता लगानेके लिये भेजना
संजय उवाच
व्यूहेष्वालोड्यमानेषु पाण्डवानां ततस्ततः ।
सुदूरमन्वयुः पार्थाः पञ्चालाः सह सोमकैः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! जब द्रोणाचार्य पाण्डवोंके व्यूहोंको इस प्रकार जहाँ-तहाँसे रौंदने लगे, तब पार्थ, पांचाल तथा सोमक योद्धा उनसे बहुत दूर हट गये ॥ १ ॥
वर्तमाने तथा रौद्रे संग्रामे लोमहर्षणे ।
संक्षये जगतस्तीव्रे युगान्त इव भारत ॥ २ ॥
भरतनन्दन! वह रोमांचकारी भयंकर संग्राम प्रलयकालमें होनेवाले जगत्के भीषण संहार-सा उपस्थित हुआ था ॥ २ ॥
द्रोणे युधि पराक्रान्ते नर्दमाने मुहुर्मुहुः ।
पञ्चालेषु च क्षीणेषु वध्यमानेषु पाण्डुषु ॥ ३ ॥
नापश्यच्छरणं किञ्चिद् धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
चिन्तयामास राजेन्द्र कथमेतद् भविष्यति ॥ ४ ॥
जब द्रोणाचार्य युद्धमें पराक्रम प्रकट करके बारंबार गर्जना कर रहे थे, पांचाल वीरोंका विनाश हो रहा था और पाण्डव-सैनिक मारे जा रहे थे, उस समय धर्मराज युधिष्ठिरको कोई भी अपना आश्रय या रक्षक नहीं दिखायी दिया। राजेन्द्र! वे सोचने लगे कि यह कैसे होगा? ॥ ३-४ ॥
ततो वीक्ष्य दिशः सर्वाः सव्यसाचिदिदृक्षया ।
युधिष्ठिरों ददर्शार्थ नैव पार्थं न माधवम् ॥ ५ ॥
तदनन्तर युधिष्ठिरने सव्यसाची अर्जुनको देखनेकी इच्छासे सम्पूर्ण दिशाओंमें दृष्टि दौड़ायी; परंतु उन्हें कहीं भी अर्जुन और सात्यकि नहीं दिखायी दिये ॥ ५ ॥
सोऽपश्यन् नरशार्दूलं वानरर्षभलक्षणम् ।
गाण्डीवस्य च निर्घोषमशृण्वन् व्यथितेन्द्रियः ॥ ६ ॥
वानरश्रेष्ठ हनुमान्के चिह्नसे युक्त ध्वजवाले पुरुषसिंह अर्जुनको न देखकर और उनके गाण्डीवका गम्भीर घोष न सुनकर उनकी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं ॥ ६ ॥
अपश्यन् सात्यकिं चापि वृष्णीनां प्रवरं रथम् ।
चिन्तयाभिपरीताङ्गो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ७ ॥
वृष्णिवंशके प्रमुख महारथी सात्यकिको भी न देखनेके कारण धर्मराज युधिष्ठिरका एक-एक अंग चिन्ताकी आगसे संतप्त हो उठा ।। ७ ।। नाध्यगच्छत् तदा शान्तिं तावपश्यन् नरोत्तमौ । लोकोपक्रोशभीरुत्वाद् धर्मराजो महामनाः ।। ८ ।। महामनस्वी धर्मराज युधिष्ठिर लोकनिन्दाके डरसे बहुत डरते थे। अतः नरश्रेष्ठ अर्जुन और सात्यकिको न देखनेसे उस समय उन्हें तनिक भी शान्ति नहीं मिली ।। अचिन्तयन्महाबाहुः शैनेयस्य रथं प्रति । पदवीं प्रेषितश्चैव फाल्गुनस्य मया रणे ।। ९ ।। शैनेयः सात्यकिः सत्यो मित्राणामभयंकरः । तदिदं ह्येकमेवासीद् द्विधा जातं ममाद्य वै ।। १० ।। महाबाहु युधिष्ठिर सात्यकिके रथके विषयमें मन-ही-मन इस प्रकार चिन्ता करने लगे—'अहो! मैंने ही रणक्षेत्रमें मित्रोंको अभय देनेवाले सत्यवादी शिनिपौत्र सात्यकिको अर्जुनके मार्गपर जानेके लिये भेजा था। इसलिये यह मेरा हृदय जो पहले एकहीकी चिन्तामें निमग्न था, अब दो व्यक्तियोंके लिये चिन्तित होकर दो भागोंमें बँट गया है ।। ९-१० ।। सात्यकिश्च हि विज्ञेयः पाण्डवश्च धनंजयः । सात्यकिं प्रेषयित्वा तु पाण्डवस्य पदानुगम् ।। ११ ।। सात्वतस्यापि कं युद्धे प्रेषयिष्ये पदानुगम् । 'इस समय सात्यकिका भी पता लगाना चाहिये और पाण्डुपुत्र अर्जुनका भी। मैंने पाण्डुपुत्र अर्जुनके पीछे तो सात्यकिको भेज दिया। अब सात्यकिके पीछे किसको युद्धभूमिमें भेजूँगा? ।। ११ १/२ ।। करिष्यामि प्रयत्नेन भ्रातुरन्वेषणं यदि ।। १२ ।। युयुधानमनन्विष्य लोको मां गर्हयिष्यति । 'यदि मैं युयुधानकी खोज न कराकर प्रयत्नपूर्वक केवल अपने भाई अर्जुनका ही अन्वेषण करूँगा तो संसार मेरी निन्दा करेगा ।। १२ १/२ ।। भ्रातुरन्वेषणं कृत्वा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।। १३ ।। परित्यजति वार्ष्णेयं सात्यकिं सत्यविक्रमम् । 'सब लोग यही कहेंगे कि धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने भाईकी खोज करके वृष्णिवंशी वीर सत्यपराक्रमी सात्यकिकी उपेक्षा कर रहे हैं ।। १३ १/२ ।। लोकापवादभीरुत्वात् सोऽहं पार्थं वृकोदरम् ।। १४ ।। पदवीं प्रेषयिष्यामि माधवस्य महात्मनः । 'मुझे लोकनिन्दासे बड़ा भय मालूम होता है। अतः कुन्तीनन्दन भीमसेनको मैं महामनस्वी सात्यकिका पता लगानेके लिये भेजूँगा ।। १४ १/२ ।।
यथैव च मम प्रीतिरर्जुने शत्रुसूदने ।। १५ ।। तथैव वृष्णिवीरेऽपि सात्वते युद्धदुर्मदे । अतिभारे नियुक्तश्च मया शैनेयनन्दनः ।। १६ ।। ‘शत्रुसूदन अर्जुनपर जैसा मेरा प्रेम है, वैसा ही रणदुर्मद वृष्णिवंशी वीर सात्यकिपर भी है। मैंने शिनिवंशका आनन्द बढ़ानेवाले सात्यकिको महान् कार्यभार सौंप रखा था ।। १५-१६ ।।
स तु मित्रोपरोधेन गौरवात्तु महाबलः । प्रविष्टो भारतीं सेनां मकरः सागरं यथा ।। १७ ।। ‘उन महाबली सात्यकिने मित्रके अनुरोधसे और अपने लिये गौरवकी बात समझकर समुद्रमें मगरकी भाँति कौरवीसेनामें प्रवेश किया था ।। १७ ।।
असौ हि श्रूयते शब्दः शूराणामनिवर्तिनाम् । मिथः संयुध्यमानानां वृष्णिवीरेण धीमता ।। १८ ।। ‘बुद्धिमान् वृष्णिवंशी वीर सात्यकिके साथ परस्पर युद्ध करनेवाले उन शूरवीरोंका वह महान् कोलाहल सुनायी पड़ता है, जो युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते हैं ।। १८ ।।
प्राप्तकालं सुबलवन्निश्चितं बहुधा हि मे । तत्रैव पाण्डवेयस्य भीमसेनस्य धन्विनः ।। १९ ।। गमनं रोचते मह्यं यत्र यातौ महारथौ । ‘इस समय जो कर्तव्य प्राप्त है, उसपर मैंने अनेक प्रकारसे प्रबल विचार कर लिया है। जहाँ महारथी अर्जुन और सात्यकि गये हैं, वहीं धनुर्धर वीर पाण्डुनन्दन भीमसेनको भी जाना चाहिये—यही मुझे ठीक जँचता है ।। १९ १/२ ।।
न चाप्यसह्यं भीमस्य विद्यते भुवि किंचन ।। २० ।। शक्तो ह्येष रणे यत्तः पृथिव्यां सर्वधन्विनाम् । स्वबाहुबलमास्थाय प्रत्यूहितुमञ्जसा ।। २१ ।। ‘इस भूतलपर कोई ऐसा कार्य नहीं है, जो भीमसेनके लिये असह्य हो। ये अपने बाहुबलका आश्रय ले रणक्षेत्रमें प्रयत्नशील होकर भूमण्डलके समस्त धनुर्धरोंका अनायास ही सामना करनेमें समर्थ हैं ।। २०-२१ ।।
यस्य बाहुबलं सर्वे समाश्रित्य महात्मनः । वनवासान्निवृत्ताः स्म न च युद्धेषु निर्जिताः ।। २२ ।। ‘इस महामनस्वी वीरके बाहुबलका आश्रय लेकर हम सब भाई वनवाससे सकुशल लौटे हैं और युद्धोंमें कभी पराजित नहीं हुए हैं ।। २२ ।।
इतो गते भीमसेने सात्वतं प्रति पाण्डवे । सनाथौ भवितारौ हि युधि सात्वतफाल्गुनौ ।। २३ ।।
‘यहाँसे सात्यकिके पथपर पाण्डुपुत्र भीमसेनके जानेपर युद्धस्थलमें डटे हुए सात्यकि और अर्जुन सनाथ हो जायँगे ॥ २३ ॥
कामं त्वशोचनीयौ तौ रणे सात्वतफाल्गुनौ ।
रक्षितौ वासुदेवेन स्वयं शस्त्रविशारदौ ॥ २४ ॥
‘निश्चय ही सात्यकि और अर्जुन रणक्षेत्रमें शोकके योग्य नहीं हैं; क्योंकि वे दोनों स्वयं तो शस्त्रविद्यामें कुशल हैं ही, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा भी पूर्णरूपसे सुरक्षित हैं ॥ २४ ॥
अवश्यं तु मया कार्यमात्मनः शोकनाशनम् ।
तस्माद् भीमं नियोक्ष्यामि सात्वतस्य पदानुगम् ॥ २५ ॥
‘तथापि मुझे अपने मानसिक दुःखको निवारण करनेके लिये ऐसी व्यवस्था अवश्य करनी चाहिये। इसलिये मैं भीमसेनको सात्यकिके मार्गका अनुगामी अवश्य बनाऊँगा ॥ २५ ॥
ततः प्रतिकृतं मन्ये विधानं सात्यकिं प्रति ।
एवं निश्चित्य मनसा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ २६ ॥
यन्तारमब्रवीद् राजा भीमं प्रति नयस्व माम् ।
‘ऐसा करके ही मैं समझूँगा कि मैंने सात्यकिके प्रति समुचित कर्तव्यका पालन किया है।’ मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने अपने सारथिसे कहा—‘मुझे भीमके पास ले चलो’ ॥ २६ १/२ ॥
धर्मराजवचः श्रुत्वा सारथिर्हयकोविदः ॥ २७ ॥
रथं हेमपरिष्कारं भीमान्तिकमुपानयत् ।
धर्मराजकी बात सुनकर अश्वसंचालनमें कुशल सारथिने उनके सुवर्णभूषित रथको भीमसेनके निकट पहुँचा दिया ॥ २७ १/२ ॥
भीमसेनमनुप्राप्य प्राप्तकालमचिन्तयत् ॥ २८ ॥
कश्मलं प्राविशद् राजा बहु तत्र समादिशन् ।
भीमसेनके पास पहुँचकर राजा युधिष्ठिर समयोचित कर्तव्यका चिन्तन करने लगे और वहाँ बहुत कुछ कहते हुए वे मूर्च्छित-से हो गये ॥ २८ १/२ ॥
स कश्मलसमाविष्टो भीममाहूय पार्थिवः ॥ २९ ॥
अब्रवीद् वचनं राजन् कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
राजन्! इस प्रकार मोहाविष्ट हुए कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने भीमसेनको सम्बोधित करके इस प्रकार कहा— ॥ २९ १/२ ॥
यः सदेवान् सगन्धर्वान् दैत्यांश्चैकरथोऽजयत् ॥ ३० ॥
तस्य लक्ष्म न पश्यामि भीमसेनानुजस्य ते ।
‘भीमसेन! जिन्होंने एकमात्र रथकी सहायतासे देवताओंसहित गन्धर्वों और दैत्योंपर भी विजय पायी थी, उन्हीं तुम्हारे छोटे भाई अर्जुनका आज मुझे कोई चिह्न नहीं दिखायी देता है’॥ ३० १/२ ॥ ततोऽब्रवीद् धर्मराजं भीमसेनस्तथागतम् ॥ ३१ ॥ नेवाद्राक्षं न चाश्रौषं तव कश्मलमीदृशम् । तब वैसी अवस्थामें पड़े हुए धर्मराज युधिष्ठिरसे भीमसेनने कहा—‘राजन्! आपकी ऐसी घबराहट तो पहले मैंने न कभी देखी थी और न सुनी ही थी ॥ ३१ १/२ ॥ पुरातिदुःखदीर्णानां भवान् गतिरभूद्धि नः ॥ ३२ ॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजेन्द्र शाधि किं करवाणि ते । ‘पहले जब कभी हमलोग अत्यन्त दुःखसे अधीर हो उठते थे, तब आप ही हमें सहारा दिया करते थे। राजेन्द्र! उठिये, उठिये, आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ ३२ १/२ ॥ न ह्यसाध्यमकार्यं वा विद्यते मम मानद ॥ ३३ ॥ आज्ञापय कुरुश्रेष्ठ मा च शोके मनः कृथाः । ‘मानद! इस संसारमें ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो मेरे लिये असाध्य हो अथवा जिसे मैं आपकी आज्ञा मिलनेपर न करूँ। कुरुश्रेष्ठ! आज्ञा दीजिये। अपने मनको शोकमें न डालिये’ ॥ ३३ १/२ ॥ तमब्रवीदश्रुपूर्णः कृष्णसर्प इव श्वसन् ॥ ३४ ॥ भीमसेनमिदं वाक्यं म्लानवदनो नृपः । तब राजा युधिष्ठिर म्लानमुख हो काले सर्पके समान लंबी साँसें खींचते हुए नेत्रोंमें आँसू भरकर भीमसेनसे इस प्रकार बोले— ॥ ३४ १/२ ॥ यथा शङ्खस्य निर्घोषः पाञ्चजन्यस्य श्रूयते ॥ ३५ ॥ पूरितो वासुदेवेन संरब्धेन यशस्विना । नूनमद्य हतः शेते तव भ्राता धनंजयः ॥ ३६ ॥ ‘भैया! इस समय पांचजन्य शंखकी जैसी ध्वनि सुनायी देती है और यशस्वी वासुदेवने क्रोधमें भरकर उस शंखको जिस तरह बजाया है, उससे जान पड़ता है, आज तुम्हारा भाई अर्जुन निश्चय ही मारा जाकर रणभूमिमें सो रहा है ॥ ३५-३६ ॥ तस्मिन् विनिहते नूनं युध्यतेऽसौ जनार्दनः । यस्य सत्त्ववतो वीर्यं ह्युपजीवन्ति पाण्डवाः ॥ ३७ ॥ यं भयेष्वभिगच्छन्ति सहस्राक्षमिवामराः । स शूरः सैन्धवप्रेप्सुरन्वयाद् भारतीं चमूम् ॥ ३८ ॥
'उसके मारे जानेपर स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ही युद्ध कर रहे हैं। जिस शक्तिशाली वीरके पराक्रमका भरोसा करके हम समस्त पाण्डव जी रहे हैं, भयके अवसरोंपर हम उसी प्रकार जिसका आश्रय लेते हैं, जैसे देवता देवराज इन्द्रका, वही शूरवीर अर्जुन सिंधुराज जयद्रथको अपने वशमें करनेके लिये कौरव-सेनामें घुसा है।। ३७-३८।। तस्य वै गमनं विद्मो भीम नावर्तनं पुनः। श्यामो युवा गुडाकेशो दर्शनीयो महारथः॥ ३९॥ 'भीमसेन! हमें उसके जानेका ही पता है, पुनः लौटनेका नहीं। अर्जुनकी अंगकान्ति श्याम है। वह नवयुवक, निद्रापर विजय पानेवाला, देखनेमें सुन्दर और महारथी है।। ३९।। व्यूढोरस्को महाबाहुर्मत्तद्विरदविक्रमः। चकोरनेत्रस्ताम्रास्यो द्विषतां भयवर्धनः॥ ४०॥ 'उसकी छाती चौड़ी और भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं। उसका पराक्रम मतवाले हाथीके समान है, आँखें चकोरके नेत्रोंके समान विशाल हैं और उसके मुख एवं ओष्ठ लाल-लाल हैं। वह शत्रुओंका भय बढ़ाता है।। ४०।। (मम प्रियहितार्थं च शक्रलोकादिहागतः। वृद्धोपसेवी धृतिमान् कृतज्ञः सत्यसङ्गरः॥ प्रविष्टो महतीं सेनामपर्यन्तां धनंजयः। प्रविष्टे च चमूं घोरामर्जुने शत्रुनाशने॥ प्रेषितः सात्वतो वीरः फाल्गुनस्य पदानुगः। तस्याभिगमनं जाने भीम नावर्तनं पुनः॥) 'अर्जुन मेरे प्रिय और हितके लिये इन्द्रलोकसे यहाँ आया है। वह वृद्धजनोंका सेवक, धैर्यवान्, कृतज्ञ तथा सत्यप्रतिज्ञ है। वह धनंजय शत्रुओंकी विशाल एवं अपार सेनामें घुसा है। शत्रुनाशन अर्जुनके उस भयंकर सेनामें प्रवेश करनेपर मैंने सात्वतवीर सात्यकिको उसके चरणोंका अनुगामी बनाकर भेजा है। भीमसेन! सात्यकिके भी मुझे जानेका ही पता है, लौटनेका नहीं। तदिदं मम भद्रं ते शोकस्थानमरिंदम। अर्जुनार्थे महाबाहो सात्वतस्य च कारणात्॥ ४१॥ वर्धते हविषेवाग्निरिध्यमानः पुनः पुनः। तस्य लक्ष्म न पश्यामि तेन विन्दामि कश्मलम्॥ ४२॥ 'शत्रुदमन महाबाहु भीम! तुम्हारा कल्याण हो। यही मेरे शोकका कारण है। अर्जुन और सात्यकिके लिये ही मैं दुःखी हो रहा हूँ। जैसे बारंबार घी डालनेसे आग प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार मेरी शोकाग्नि बढ़ती जाती है। मैं अर्जुनका कोई चिह्न नहीं देखता, इसीसे मुझपर मोह छा रहा है।। ४१-४२।। तं विद्धि पुरुषव्याघ्रं सात्वतं च महारथम्।
स तं महारथं पश्चादनुयातस्तवानुजम् ॥ ४३ ॥ ‘उन सात्वतवंशी पुरुषसिंह महारथी सात्यकिका भी पता लगाओ। वे तुम्हारे छोटे भाई महारथी अर्जुनके पीछे गये हैं ॥ ४३ ॥ तमपश्यन्महाबाहुमहं विन्दामि कश्मलम् । पार्थे तस्मिन् हते चैव युध्यते नूनमग्रणीः ॥ ४४ ॥ ‘उन महाबाहु सात्यकिको न देखनेके कारण भी मैं भारी घबराहटमें पड़ गया हूँ। पार्थके मारे जानेपर अवश्य ही सात्यकि भी आगे होकर युद्ध कर रहे हैं ॥ ४४ ॥ सहायोनास्य वै कश्चित् तेन विन्दामि कश्मलम् । तस्मिन् कृष्णे हते नूनं युध्यते युद्धकोविदः ॥ ४५ ॥ ‘उनका कोई दूसरा सहायक नहीं है। इससे मुझे बड़ी घबराहट हो रही है। निश्चय ही उनके मारे जानेपर युद्धकलाकोविद भगवान् श्रीकृष्ण युद्ध कर रहे हैं ॥ ४५ ॥ न हि मे शुध्यते भावस्तयोरेव परंतप । स तत्र गच्छ कौन्तेय यत्र यातो धनंजयः ॥ ४६ ॥ सात्यकिश्च महावीर्यः कर्तव्यं यदि मन्यसे । वचनं मम धर्मज्ञ भ्राता ज्येष्ठो भवामि ते ॥ ४७ ॥ न तेऽर्जुनस्तथा ज्ञेयो ज्ञातव्यः सात्यकिर्यथा । चिकीर्षुर्मत्प्रियं पार्थ स यातः सव्यसाचिनः । पदवीं दुर्गमां घोरामगम्यामकृतात्मभिः ॥ ४८ ॥ ‘परंतप! अर्जुन और सात्यकिके जीवनके विषयमें जो मेरे मनमें संशय उत्पन्न हो गया है, वह दूर नहीं हो रहा है। अतः कुन्तीनन्दन! तुम वहीं जाओ, जहाँ अर्जुन और महापराक्रमी सात्यकि गये हैं। धर्मज्ञ! मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ। यदि तुम मेरी आज्ञाका पालन करना उचित मानते हो तो ऐसा ही करो। तुम्हें अर्जुनकी उतनी खोज नहीं करनी है, जितनी सात्यकिकी। पार्थ! सात्यकिने मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे सव्यसाची अर्जुनके उस दुर्गम एवं भयंकर पथका अनुसरण किया है, जो अजितात्मा पुरुषोंके लिये अगम्य है ॥ ४६—४८ ॥ दृष्ट्वा कुशलिनौ कृष्णौ सात्वतं चैव सात्यकिम् । संविदं चैव कुर्यास्त्वं सिंहनादेन पाण्डव ॥ ४९ ॥ ‘पाण्डुनन्दन! जब तुम भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा सात्वतवंशी वीर सात्यकिको सकुशल देखना, तब उच्च स्वरसे सिंहनाद करके मुझे इसकी सूचना दे देना’ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि युधिष्ठिरचिन्तायां षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें युधिष्ठिरकी चिन्ताविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२६ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ५२ श्लोक हैं।)
१२७-
सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीमसेनका कौरव-सेनामें प्रवेश, द्रोणाचार्यके सारथिसहित रथका चूर्ण कर देना तथा उनके द्वारा धृतराष्ट्रके ग्यारह पुत्रोंका वध, अवशिष्ट पुत्रोंसहित सेनाका पलायन
भीमसेन उवाच
ब्रह्मेशानेन्द्रवरुणानवहद् यः पुरा रथः ।
तमास्थाय गतौ कृष्णौ न तयोर्विद्यते भयम् ॥ १ ॥
**भीमसेनने कहा—**महाराज! जो रथ पहले ब्रह्मा, महादेव, इन्द्र और वरुणकी सवारीमें आ चुका है, उसीपर बैठकर श्रीकृष्ण और अर्जुन युद्धके लिये गये हैं। अतः उनके लिये तनिक भी भय नहीं है ॥ १ ॥
आज्ञां तु शिरसा बिभ्रदेष गच्छामि मा शुचः ।
समेत्य तान् नरव्याघ्रांस्तव दास्यामि संविदम् ॥ २ ॥
तथापि आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके यह मैं जा रहा हूँ। आप शोक या चिन्ता न करें। मैं उन पुरुषसिंहोंसे मिलकर आपको सूचना दूँगा ॥ २ ॥
संजय उवाच
एतावदुक्त्वा प्रययौ परिदाय युधिष्ठिरम् ।
धृष्टद्युम्नाय बलवान् सुहृद्भयश्च पुनः पुनः ॥ ३ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! ऐसा कहकर बलवान् भीमसेन राजा युधिष्ठिरको धृष्टद्युम्न तथा अन्य सुहृदोंकी देख-रेखमें सौंपकर वहाँसे चल दिये ॥ ३ ॥
धृष्टद्युम्नं चेदमाह भीमसेनो महाबलः ।
विदितं ते महाबाहो यथा द्रोणो महारथः ॥ ४ ॥
ग्रहणे धर्मराजस्य सर्वोपायेन वर्तते ।
जाते समय महाबली भीमसेनने धृष्टद्युम्नसे इस प्रकार कहा—‘महाबाहो! तुम्हें तो यह मालूम ही है कि महारथी द्रोण सारे उपाय करके किस प्रकार धर्मराजको पकड़नेपर तुले हुए हैं ॥ ४ १/२ ॥
न च मे गमने कृत्यं तादृक् पार्षत विद्यते ॥ ५ ॥
यादृशं रक्षणे राज्ञः कार्यमात्ययिकं हि नः ।