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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पञ्चभिर्निशितैर्भल्लैर्जत्रुदेशे समाहनत् ।
हृदिकवंशी यादवोंके महारथी वीर कृतवर्माको सामने पाकर शिखण्डीने उसके गलेकी हँसलीपर पाँच तीखे भल्लोंद्वारा प्रहार किया ॥ २२ १/२ ॥
कृतवर्मा तु संक्रुद्धो भित्त्वा षष्ट्या पतत्रिभिः ॥ २३ ॥
धनुरेकेन चिच्छेद हसन् राजन् महारथः ।
राजन्! तब महारथी कृतवर्माने अत्यन्त कुपित हो साठ बाणोंसे शिखण्डीको घायल करके एकसे हँसते-हँसते उसका धनुष काट डाला ॥ २३ १/२ ॥
अथान्यद् धनुरादाय द्रुपदस्यात्मजो बली ॥ २४ ॥
तिष्ठ तिष्ठेति संक्रुद्धो हार्दिक्यं प्रत्यभाषत ।
तत्पश्चात् द्रुपदके बलवान् पुत्रने दूसरा धनुष हाथमें लेकर कृतवर्मासे क्रोधपूर्वक कहा—‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह’ ॥ २४ १/२ ॥
ततोऽस्य नवतिं बाणान् रुक्मपुङ्खान् सुतेजनान् ॥ २५ ॥
प्रेषयामास राजेन्द्र तेऽस्याभ्रश्यन्त वर्मणः ।
राजेन्द्र! फिर सोनेकी पाँखवाले नब्बे पैने बाण उसने चलाये, परंतु वे कृतवर्माके कवचसे फिसलकर गिर गये ॥ २५ १/२ ॥
वितथांस्तान् समालक्ष्य पतितांश्च महीतले ॥ २६ ॥
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन कार्मुकं चिच्छिदे भृशम् ।
उन्हें व्यर्थ होकर पृथ्वीपर गिरा देख शिखण्डीने तीखे क्षुरप्रसे कृतवर्माके धनुषके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥
अथैनं छिन्नधन्वानं भग्नशृङ्गमिवर्षभम् ॥ २७ ॥
अशीत्या मार्गणैः क्रुद्धो बाह्वोरुरसि चार्पयत् ।
धनुष कट जानेपर कृतवर्माकी दशा टूटे सींगवाले बैलके समान हो गयी। उस समय शिखण्डीने कुपित होकर उसकी दोनों भुजाओं तथा छातीमें अस्सी बाण मारे ॥
कृतवर्मा तु संक्रुद्धो मार्गणैः क्षतविक्षतः ॥ २८ ॥
ववाम रुधिरं गात्रैः कुम्भवक्रादिवोदकम् ।
कृतवर्मा उन बाणोंसे क्षत-विक्षत होकर अत्यन्त कुपित हो उठा और जैसे घड़ेके मुँहसे जल गिर रहा हो, उसी प्रकार वह अपने अंगोंसे रक्त वमन करने लगा ॥
रुधिरेण परिक्लिन्नः कृतवर्मा त्वराजत ॥ २९ ॥
वर्षेण क्लेदितो राजन् यथा गैरिकपर्वतः ।
राजन्! खूनसे लथपथ हुआ कृतवर्मा वर्षासे भीगे हुए गेरूके पहाड़के समान शोभा पा रहा था ॥ २९ १/२ ॥
अथान्यद् धनुरादाय समार्गणगुणं प्रभुः ॥ ३० ॥

शिखण्डिनं बाणगणैः स्कन्धदेशे व्यताडयत् । तदनन्तर शक्तिशाली कृतवर्माने बाण और प्रत्यंचा-सहित दूसरा धनुष हाथमें लेकर शिखण्डीके कंधोंपर अपने बाण-समूहोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३० ½ ॥
स्कन्धदेशस्थितैर्बाणैः शिखण्डी तु व्यराजत ॥ ३१ ॥
शाखाप्रशाखाविपुलः सुमहान् पादपो यथा ।
कंधोंमें धँसे हुए उन बाणोंसे शिखण्डी वैसी ही शोभा पाने लगा, जैसे कोई महान् वृक्ष अपनी शाखा-प्रशाखाओंके कारण अधिक विस्तृत दिखायी देता हो ॥
तावन्योन्यं भृशं विद्ध्वा रुधिरेण समुक्षितौ ॥ ३२ ॥
(पोप्लूयमानौ हि यथा महान्तौ शोणितह्रदे ।)
वे दोनों महान् वीर एक-दूसरेको अत्यन्त घायल करके खूनसे इस प्रकार नहा गये थे, मानो रक्तके सरोवरमें बारंबार डुबकी लगाकर आये हों ॥ ३२ ॥
अन्योन्यशृङ्गाभिहतौ रेजतुर्वृषभाविव ।
उस समय एक-दूसरेके सींगोंसे चोट खाये हुए दो साँड़के समान उन दोनोंकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥
अन्योन्यस्य वधे यत्नं कुर्वाणौ तौ महारथौ ॥ ३३ ॥
रथाभ्यां चेरतुस्तत्र मण्डलानि सहस्रशः ।
एक-दूसरेके वधके लिये प्रयत्न करते हुए वे दोनों महारथी अपने रथके द्वारा वहाँ सहस्रों बार मण्डलाकार गतिसे विचरते थे ॥ ३३ ½ ॥
कृतवर्मा महाराज पार्षतं निशितैः शरैः ॥ ३४ ॥
रणे विव्याध सप्तत्या स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः ।
महाराज! कृतवर्माने रणभूमिमें सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले सत्तर बाणोंसे द्रुपदपुत्र शिखण्डीको घायल कर दिया ॥ ३४ ½ ॥
ततोऽस्य समरे बाणं भोजः प्रहरतां वरः ॥ ३५ ॥
जीवितान्तकरं घोरं व्यसृजत्त्वरयान्वितः ।
तत्पश्चात् प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ कृतवर्माने उसके ऊपर समरांगणमें बड़ी उतावलीके साथ एक भयंकर प्राणान्तकारी बाण छोड़ा ॥ ३५ ½ ॥
स तेनाभिहतो राजन् मूर्च्छामाशु समाविशत् ॥ ३६ ॥
ध्वजयष्टिं च सहसा शिश्रिये कश्मलावृतः ।
राजन्! उस बाणसे आहत हो शिखण्डी तत्काल मूर्च्छित हो गया। उसने सहसा मोहाच्छन्न होकर ध्वजदण्डका सहारा ले लिया ॥ ३६ ½ ॥
अपोवाह रणात्तूर्णं सारथी रथिनां वरम् ॥ ३७ ॥
हार्दिक्यशरसंतप्तं निःश्वसन्तं पुनः पुनः ।

कृतवर्माके बाणोंसे संतप्त हो बारंबार लंबी साँस खींचते हुए रथियोंमें श्रेष्ठ शिखण्डीको उसका सारथि तुरंत रणभूमिसे बाहर हटा ले गया ॥ ३७ १/२ ॥
पराजिते ततः शूरे द्रुपदस्यात्मजे प्रभो ।
व्यद्रवत् पाण्डवी सेना वध्यमाना समन्ततः ॥ ३८ ॥
प्रभो! शूरवीर द्रुपदपुत्रके पराजित हो जानेपर सब ओरसे मारी जाती हुई पाण्डव-सेना भागने लगी ॥ ३८ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे षड्‌विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुल-युद्धविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३८ १/२ श्लोक हैं)


* शरभ आठ पैरोंका एक जानवर है, जिसका आधा शरीर पशुका और आधा पक्षीका होता है। भगवान् नृसिंहकी भाँति उसका शरीर भी द्विविध आकृतियोंके सम्मिश्रणसे बना है। वह इतना प्रबल है कि सिंहको भी मार सकता है।

अध्याय (पृष्ठ 1757)

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सप्तविंशोऽध्यायः

अर्जुनद्वारा राजा श्रुतंजय, सौश्रुति, चन्द्रदेव और सत्यसेन आदि महारथियोंका वध एवं संशप्तक-सेनाका संहार

संजय उवाच

श्वेताश्वोऽथ महाराज व्यधमत्तावकं बलम् ।
यथा वायुः समासाद्य तूलराशिं समन्ततः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! एक ओर श्वेतवाहन अर्जुन आपकी सेनाको उसी प्रकार छिन्न-भिन्न कर रहे थे, जैसे वायु रूईके ढेरको पाकर उसे सब ओर बिखेर देती है ॥ १ ॥

प्रत्युद्ययुस्त्रिगर्त्तास्तं शिबयः कौरवैः सह ।
शाल्वाः संशप्तकाश्चैव नारायणबलं च तत् ॥ २ ॥
उस समय उनका सामना करनेके लिये त्रिगर्त, शिबि, कौरवोंसहित शाल्व, संशप्तकगण तथा नारायणी-सेनाके सैनिक आगे बढ़े ॥ २ ॥

सत्यसेनश्चन्द्रदेवो मित्रदेवः श्रुतंजयः ।
सौश्रुतिश्चित्रसेनश्च मित्रवर्मा च भारत ॥ ३ ॥
त्रिगर्तराजः समरे भ्रातृभिः परिवारितः ।
पुत्रैश्चैव महेष्वासैर्नानाशस्त्रविशारदैः ॥ ४ ॥
भरतनन्दन! सत्यसेन, चन्द्रदेव, मित्रदेव, श्रुतंजय, सौश्रुति, चित्रसेन तथा मित्रवर्मा— इन सात भाइयों तथा नाना प्रकारके शस्त्रोंके प्रहारमें कुशल महाधनुर्धर पुत्रोंसे घिरा हुआ त्रिगर्तराज सुशर्मा समरांगणमें उपस्थित हुआ ॥

ते सृजन्तः शरव्रातान् किरन्तोऽर्जुनमाहवे ।
अभ्यवर्तन्त सहसा वार्योघा इव सागरम् ॥ ५ ॥
वे सभी वीर युद्धस्थलमें अर्जुनपर बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए जैसे जलका प्रवाह समुद्रकी ओर जाता है, उसी प्रकार सहसा उनके सामने आ पहुँचे ॥ ५ ॥

ते त्वर्जुनं समासाद्य योधाः शतसहस्रशः ।
अगच्छन् विलयं सर्वे तार्क्ष्यं दृष्ट्वेव पन्नगाः ॥ ६ ॥
परंतु जैसे गरुड़को देखते ही सर्प अपने प्राण खो देते हैं, उसी प्रकार वे सब-के-सब लाखों योद्धा अर्जुनके पास पहुँचते ही कालके गालमें चले गये ॥ ६ ॥

ते हन्यमानाः समरे नाजहुः पाण्डवं रणे ।
हन्यमाना महाराज शलभा इव पावकम् ॥ ७ ॥

जैसे पतंगे जलते रहनेपर भी आगमें टूटे पड़ते हैं, उसी प्रकार रणभूमिमें मारे जानेपर भी वे समस्त योद्धा युद्धमें पाण्डुकुमार अर्जुनको छोड़कर भाग न सके ।। ७ ।।
सत्यसेनस्त्रिभिर्बाणैर्विव्याध युधि पाण्डवम् ।
मित्रदेवस्त्रिषष्ट्या तु चन्द्रदेवस्तु सप्तभिः ।। ८ ।।
मित्रवर्मा त्रिसप्तत्या सौश्रुतिश्चापि सप्तभिः ।
श्रुतंजयस्तु विंशत्या सुशर्मा नवभिः शरैः ।। ९ ।।
सत्यसेनने तीन, मित्रदेवने तिरसठ, चन्द्रदेवने सात, मित्रवर्माने तिहत्तर, सौश्रुतिने सात, श्रुतंजयने बीस तथा सुशर्माने नौ बाणोंसे युद्धस्थलमें पाण्डुपुत्र अर्जुनको बींध डाला ।। ८-९ ।।
स विद्धो बहुभिः संख्ये प्रतिविव्याध तान् नृपान् ।
सौश्रुतिं सप्तभिर्विद्ध्वा सत्यसेनं त्रिभिः शरैः ।। १० ।।
इस प्रकार रणभूमिमें बहुसंख्यक योद्धाओंन्द्वारा घायल किये जानेपर बदलेमें अर्जुनने भी उन सभी नरेशोंको क्षत-विक्षत कर दिया। उन्होंने सौश्रुतिको सात बाणोंसे घायल करके सत्यसेनको तीन बाण मारे ।। १० ।।
श्रुतंजयं च विंशत्या चन्द्रदेवं तथाष्टभिः ।
मित्रदेवं शतेनैव श्रुतसेनं त्रिभिः शरैः ।। ११ ।।
नवभिर्मित्रवर्माणं सुशर्माणं तथाष्टभिः ।
श्रुतंजयको बीस, चन्द्रदेवको आठ, मित्रदेवको सौ, श्रुतसेन (चित्रसेन)-को तीन, मित्रवर्माको नौ तथा सुशर्माको आठ बाणोंसे घायल कर दिया ।। ११ १/२ ।।
श्रुतंजयं च राजानं हत्वा तत्र शिलाशितैः ।। १२ ।।
सौश्रुतेः सशिरस्त्राणं शिरः कायादपाहरत् ।
त्वरितश्चन्द्रदेवं च शरैर्निन्ये यमक्षयम् ।। १३ ।।
फिर सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए कई बाणोंसे राजा श्रुतंजयका वध करके सौश्रुतिके शिरस्त्राणसहित सिरको धड़से अलग कर दिया। फिर तुरंत ही चन्द्रदेवको भी अपने बाणोंद्वारा यमलोक पहुँचा दिया ।। १२-१३ ।।
तथैतरान् महाराज यतमानान् महारथान् ।
पञ्चभिः पञ्चभिर्बाणैरेकैकं प्रत्यवारयत् ।। १४ ।।
महाराज! इसी प्रकार विजयके लिये प्रयत्नशील अन्य महारथियोंमेंसे प्रत्येकको पाँच-पाँच बाण मारकर रोक दिया ।। १४ ।।
सत्यसेनस्तु संक्रुद्धस्तोमरं व्यसृजन्महत् ।
समुद्दिश्य रणे कृष्णं सिंहनादं ननाद च ।। १५ ।।
तब सत्यसेनने अत्यन्त कुपित होकर रणभूमिमें श्रीकृष्णको लक्ष्य करके एक विशाल तोमरका प्रहार किया और सिंहके समान गर्जना की ।। १५ ।।

स निर्भिद्य भुजं सव्यं माधवस्य महात्मनः । अयस्मयो हेमदण्डो जगाम धरणीं तदा ॥ १६ ॥ सुवर्णमय दण्डवाला वह लोहनिर्मित तोमर महात्मा श्रीकृष्णकी बायीं भुजापर चोट करके तत्काल धरतीपर गिर पड़ा ॥ १६ ॥ माधवस्य तु विद्धस्य तोमरेण महारणे । प्रतोदः प्रापतद्धस्ताद् रश्मयश्च विशाम्पते ॥ १७ ॥ प्रजानाथ! उस महासमरमें तोमरसे घायल हुए श्रीकृष्णके हाथसे चाबुक और बागडोर गिर पड़ी ॥ १७ ॥ वासुदेवं विभिन्नाङ्गं दृष्ट्वा पार्थो धनंजयः । क्रोधमाहारयत्तीव्रं कृष्णं चेदमुवाच ह ॥ १८ ॥ श्रीकृष्णके शरीरमें घाव देखकर कुन्तीकुमार अर्जुन-को बड़ा क्रोध हुआ। वे उनसे इस प्रकार बोले— ॥ १८ ॥ प्रापयाश्वान् महाबाहो सत्यसेनं प्रति प्रभो । यावदेनं शरैस्तीक्ष्णैर्नयामि यमसादनम् ॥ १९ ॥ ‘प्रभो! महाबाहो! आप घोड़ोंको सत्यसेनके निकट पहुँचाइये। मैं अपने तीखे बाणोंसे पहले इसीको यमलोक भेज दूँगा’ ॥ १९ ॥ प्रतोदं गृह्य सोऽन्यत्तु रश्मीनपि यथा पुरा । वाहयामास तानश्वान् सत्यसेनरथं प्रति ॥ २० ॥ तब भगवान् श्रीकृष्णने दूसरा चाबुक लेकर पूर्ववत् घोड़ोंकी बागडोर सँभाली और उन घोड़ोंको सत्यसेनके रथके समीप पहुँचा दिया ॥ २० ॥ विष्वक्सेनं तु निर्भिन्नं दृष्ट्वा पार्थो धनंजयः । सत्यसेनं शरैस्तीक्ष्णैर्वारयित्वा महारथः ॥ २१ ॥ ततः सुनिशितैर्भल्लै राज्ञस्तस्य महच्छिरः । कुण्डलोपचितं कायाच्चकर्त पृतनान्तरे ॥ २२ ॥ कुन्तीकुमार महारथी अर्जुनने श्रीकृष्णको घायल हुआ देख सत्यसेनको तीखे बाणोंसे रोककर तेज धारवाले भल्लोंसे सेनाके मध्यभागमें उस राजकुमारके कुण्डलमण्डित महान् मस्तकको धड़से काट डाला ॥ २१-२२ ॥ तन्निकृत्य शितैर्बाणैर्मित्रवर्माणमाक्षिपत् । वत्सदन्तेन तीक्ष्णेन सारथिं चास्य मारिष ॥ २३ ॥ मान्यवर! सत्यसेनको मारकर तीखे बाणोंद्वारा मित्रवर्माको और एक पैने वत्सदन्तसे उसके सारथिको भी मार गिराया ॥ २३ ॥ ततः शरशतैर्भूयः संशप्तकगणान् बली । पातयामास संक्रुद्धः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २४ ॥

तदनन्तर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए बलवान् अर्जुनने पुनः हजारों और सैकड़ों संशप्तकगणोंको सैकड़ों बाणोंसे मारकर धरतीपर सुला दिया ॥ २४ ॥
ततो रजतपुङ्खेन राजञ्छीर्षं महात्मनः ।
मित्रदेवस्य चिच्छेद क्षुरप्रेण महारथः ॥ २५ ॥
राजन्! फिर महारथी धनंजयने रजतमय पंखवाले क्षुरप्रसे महामना मित्रदेवके मस्तकको काट डाला ॥ २५ ॥
सुशर्माणं सुसंक्रुद्धो जत्रुदेशे समाहनत् ।
ततः संशप्तकाः सर्वे परिवार्य धनंजयम् ॥ २६ ॥
शस्त्रौघैर्ममृदुः क्रुद्धा नादयन्तो दिशो दश ।
साथ ही अत्यन्त कुपित होकर अर्जुनने सुशर्माके गलेकी हँसलीपर भी गहरी चोट पहुँचायी। फिर तो क्रोधमें भरे हुए सभी संशप्तक दसों दिशाओंको अपनी गर्जनासे प्रतिध्वनित करते हुए अर्जुनको चारों ओरसे घेरकर अपने अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा पीड़ा देने लगे ॥ २६ १/२ ॥
अभ्यर्दितस्तु तैर्जिष्णुः शक्रतुल्यपराक्रमः ॥ २७ ॥
ऐन्द्रमस्त्रममेयात्मा प्रादुश्चक्रे महारथः ।
उनसे पीड़ित होकर इन्द्रके तुल्य पराक्रमी तथा अमेय आत्मबलसे सम्पन्न महारथी अर्जुनने ऐन्द्रास्त्र प्रकट किया ॥ २७ १/२ ॥
ततः शरसहस्राणि प्रादुरासन् विशाम्पते ॥ २८ ॥
ध्वजानां छिद्यमानानां कार्मुकाणां च मारिष ।
रथानां सपताकानां तूणीराणां युगैः सह ॥ २९ ॥
अक्षाणामथ चक्राणां योक्त्राणां रश्मिभिः सह ।
कूबराणां वरूथानां पूष्त्कानां च संयुगे ॥ ३० ॥
अश्वानां पततां चापि प्रासानाम्ऋष्टिभिः सह ।
गदानां परिघानां च शक्तितोमरपट्टिशैः ॥ ३१ ॥
शतघ्नीनां सचक्राणां भुजानां चोरुभिः सह ।
कण्ठसूत्राङ्गदानां च केयूराणां च मारिष ॥ ३२ ॥
हाराणामथ निष्काणां तनूत्राणां च भारत ।
छत्राणां व्यजनानां च शिरसां मुकुटैः सह ॥ ३३ ॥
अश्रूयत महाशब्दस्तत्र तत्र विशाम्पते ।

प्रजानाथ! फिर तो वहाँ हजारों बाण प्रकट होने लगे। माननीय भरतवंशी प्रजापालक नरेश! उस समय कट-कटकर गिरनेवाले ध्वज, धनुष, रथ, पताका, तरकस, जूए, धुरे, पहिये, जोत, बागडोर, कूबर, वरूथ (रथका चर्ममय आवरण), बाण, घोड़े, प्रास, ऋष्टि, गदा, परिघ, शक्ति, तोमर, पट्टिश, चक्रयुक्त शतघ्नी, बाँह-जाँघ, कण्ठसूत्र, अंगद, केयूर, हार, निष्क, कवच, छत्र, व्यजन और मुकुटसहित मस्तकोंका महान् शब्द युद्धस्थलमें जहाँ-तहाँ सब ओर सुनायी देने लगा ।। २८—३३ १/२ ।। सकुण्डलानि स्वक्षीणि पूर्णचन्द्रनिभानि च ।। ३४ ।। शिरांस्युर्व्यामदृश्यन्त ताराजालमिवाम्बरे । पृथ्वीपर गिरे हुए कुण्डल और सुन्दर नेत्रोंसे युक्त पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मस्तक आकाशमें ताराओंके समूहकी भाँति दिखायी देते थे ।। ३४ १/२ ।। सुस्रग्वीणि सुवासांसि चन्दनेनोक्षितानि च ।। ३५ ।। शरीराणि व्यदृश्यन्त निहतानां महीतले । वहाँ मारे गये राजाओंके सुन्दर हारोंसे सुशोभित, उत्तम वस्त्रोंसे सम्पन्न तथा चन्दनसे चर्चित शरीर पृथ्वीपर पड़े देखे जाते थे ।। ३५ १/२ ।। गन्धर्वनगराकारं घोरमायोधनं तदा ।। ३६ ।। निहतै राजपुत्रैश्च क्षत्रियैश्च महाबलैः । उस समय वहाँ मारे गये राजकुमारों तथा महाबली क्षत्रियोंकी लाशोंसे वह युद्धस्थल गन्धर्वनगरके समान भयानक जान पड़ता था ।। ३६ १/२ ।। हस्तिभिः पतितैश्चैव तुरङ्गैश्चाभवन्मही ।। ३७ ।। अगम्यरूपा समरे विशीर्णैरिव पर्वतैः । समरांगणमें टूट-फूटकर गिरे हुए पर्वतोंके समान धराशायी हुए हाथियों और घोड़ोंके कारण वहाँकी भूमिपर चलना-फिरना असम्भव हो गया था ।। ३७ १/२ ।। नासीच्चक्रपथस्तत्र पाण्डवस्य महात्मनः ।। ३८ ।। निघ्नतः शात्रवान् भल्लैर्हस्त्यश्वं चास्यतो महत् । अपने भल्लोंसे शत्रुसैनिकों तथा उनके हाथी-घोड़ेके महान् समुदायको मारते-गिराते हुए महामना पाण्डुकुमार अर्जुनके रथके पहियोंके लिये मार्ग नहीं मिलता था ।। ३८ १/२ ।। आतङ्कादिव सीदन्ति रथचक्राणि मारिष ।। ३९ ।। चरतस्तस्य संग्रामे तस्मिंल्लोहितकर्दमे । मान्यवर! उस संग्राममें रक्तकी कीच मच गयी थी। उसमें विचरते हुए अर्जुनके रथके पहिये मानो भयसे शिथिल होते जा रहे थे ।। ३९ १/२ ।। सीदमानानि चक्राणि समूहुस्तुरगा भृशम् ।। ४० ।। श्रमेण महता युक्ता मनोमारुतरंहसः ।

मन और वायुके समान वेगशाली घोड़े भी वहाँ धँसते हुए पहियोंको बड़े परिश्रमसे खींच पाते थे ।। ४० १/२ ।।
वध्यमानं तु तत् सैन्यं पाण्डुपुत्रेण धन्विना ।। ४१ ।।
प्रायशो विमुखं सर्वं नावतिष्ठत भारत ।
धनुर्धर पाण्डुकुमारकी मार खाकर आपकी वह सारी सेना प्राय: पीठ दिखाकर भाग चली। वहाँ क्षणभरके लिये भी ठहर न सकी ।। ४१ १/२ ।।
ताञ्जित्वा समरे जिष्णुः संशप्तकगणान् बहून् ।। ४२ ।।
विरराज तदा पार्थो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ।। ४३ ।।
उस समय समरांगणमें उन बहुसंख्यक संशप्तकगणोंको परास्त करके विजयी कुन्तीकुमार अर्जुन धूमरहित प्रज्वलित अग्निके समान शोभा पा रहे थे ।। ४२-४३ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संशप्तकजये सप्तविंशोऽध्यायः ।। २७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संशप्तकोंकी पराजयविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २७ ।।

अर्जुनके द्वारा मित्रसेनका शिरश्छेद

अध्याय (पृष्ठ 1764)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टाविंशोऽध्यायः

युधिष्ठिर और दुर्योधनका युद्ध, दुर्योधनकी पराजय तथा उभयपक्षकी सेनाओंका अमर्यादित भयंकर संग्राम

संजय उवाच

युधिष्ठिरं महाराज विसृजन्तं शरान् बहून् ।
स्वयं दुर्योधनो राजा प्रत्यगृह्णादभीतवत् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! बहुत-से बाणोंकी वर्षा करते हुए युधिष्ठिरका स्वयं राजा दुर्योधनने एक निर्भीक वीरकी भाँति सामना किया ॥ १ ॥

तमापतन्तं सहसा तव पुत्रं महारथम् ।
धर्मराजो द्रुतं विद्ध्वा तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ २ ॥
सहसा आते हुए आपके महारथी पुत्रको धर्मराज युधिष्ठिरने तुरंत ही घायल करके कहा—‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह’ ॥ २ ॥

स तु तं प्रतिविव्याध नवभिर्निशितैः शरैः ।
सारथिं चास्य भल्लेन भृशं क्रुद्धोऽभ्यताडयत् ॥ ३ ॥
इससे दुर्योधनको बड़ा क्रोध हुआ। उसने युधिष्ठिरको नौ तीखे बाणोंसे बेधकर बदला चुकाया और उनके सारथिपर भी एक भल्लका प्रहार किया ॥ ३ ॥

ततो युधिष्ठिरो राजन् स्वर्णपुङ्खाञ्छिलीमुखान् ।
दुर्योधनाय चिक्षेप त्रयोदश शिलाशितान् ॥ ४ ॥
राजन्! तब युधिष्ठिरने सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले तेरह बाण दुर्योधनपर चलाये ॥ ४ ॥

चतुर्भिंश्चतुरो वाहांस्तस्य हत्वा महारथः ।
पञ्चमेन शिरः कायात् सारथेश्च समाक्षिपत् ॥ ५ ॥
महारथी युधिष्ठिरने उनमेंसे चार बाणोंद्वारा दुर्योधनके चारों घोड़ोंको मारकर पाँचवेंसे उसके सारथिका भी मस्तक धड़से काट गिराया ॥ ५ ॥

षष्ठेन तु ध्वजं राज्ञः सप्तमेन तु कार्मुकम् ।
अष्टमेन तथा खड्गं पातयामास भूतले ॥ ६ ॥
फिर छठे बाणसे राजा दुर्योधनके ध्वजको, सातवेंसे उसके धनुषको और आठवेंसे उसकी तलवारको भी पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ६ ॥

पञ्चभिर्नृपतिं चापि धर्मराजोऽर्दयद् भृशम् ।
तदनन्तर पाँच बाणोंसे धर्मराजने राजा दुर्योधनको भी गहरी चोट पहुँचायी ॥ ६ ½ ॥

हताश्वात्तु रथात्तस्मादवप्लुत्य सुतस्तव ॥ ७ ॥ उत्तमं व्यसनं प्राप्तो भूमावेवावतिष्ठत । उस अश्वहीन रथसे कूदकर आपका पुत्र भारी संकटमें पड़नेपर भी वहाँ पृथ्वीपर ही खड़ा रहा (युद्ध छोड़कर भागा नहीं) ॥ ७ १/२ ॥

तं तु कृच्छ्रगतं दृष्ट्वा कर्णद्रौणिकृपादयः ॥ ८ ॥ अभ्यवर्तन्त सहसा परीप्सन्तो नराधिपम् । उसे संकटमें पड़ा देख कर्ण, अश्वत्थामा तथा कृपाचार्य आदि वीर अपने राजाकी रक्षा चाहते हुए सहसा युधिष्ठिरके सामने आ पहुँचे ॥ ८ १/२ ॥

अथ पाण्डुसुताः सर्वे परिवार्य युधिष्ठिरम् ॥ ९ ॥ अन्वयुः समरे राजंस्ततो युद्धमवर्तत । राजन्! तत्पश्चात् समस्त पाण्डव भी युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर उनका अनुसरण करने लगे; फिर तो दोनों दलोंमें भारी युद्ध छिड़ गया ॥ ९ १/२ ॥

ततस्तूर्यसहस्राणि प्रावाद्यन्त महामृधे ॥ १० ॥ ततः किलकिलाशब्दाः प्रादुरासन् महीपते । भूपाल! तदनन्तर उस महासमरमें सहस्रों बाजे बजने लगे और वहाँ किलकिलाहटकी आवाज गूँज उठी ॥ १० १/२ ॥

यत्राभ्यगच्छन् समरे पञ्चालाः कौरवैः सह ॥ ११ ॥ नरा नरैः समाजग्मुर्वारणा वरवारणैः । रथाश्च रथिभिः सार्धं हयाश्च हयसादिभिः ॥ १२ ॥ उस युद्धमें समस्त पांचाल कौरवोंके साथ भिड़ गये। पैदल पैदलोंके, हाथी हाथियोंके, रथी रथियोंके और घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ११-१२ ॥

द्वन्द्वान्यासन् महाराज प्रेक्षणीयानि संयुगे । विविधान्यप्यचिन्त्यानि शस्त्रवन्त्युत्तमानि च ॥ १३ ॥ महाराज! उस रणभूमिमें होनेवाले नाना प्रकारके अचिन्तनीय, शस्त्रयुक्त तथा उत्तम द्वन्द्वयुद्ध देखने ही योग्य थे ॥ १३ ॥

ते शूराः समरे सर्वे चित्रं लघु च सुष्ठु च । अयुध्यन्त महावेगाः परस्परवधैषिणः ॥ १४ ॥ वे महान् वेगशाली समस्त शूरवीर समरांगणमें एक-दूसरेके वधकी इच्छासे विचित्र, शीघ्रतापूर्ण तथा सुन्दर रीतिसे युद्ध करने लगे ॥ १४ ॥

अन्योन्यं समरे जघ्नुर्योधव्रतमनुष्ठिताः । न हि ते समरं चक्रुः पृष्ठतो वै कथञ्चन ॥ १५ ॥ वे वीर योद्धाके व्रतका पालन करते हुए युद्धस्थलमें एक-दूसरेको मारते थे। उन्होंने किसी तरह भी युद्धमें पीठ नहीं दिखायी ॥ १५ ॥

मुहूर्तमेव तद् युद्धमासीन्मधुरदर्शनम् । तत उन्मत्तवद् राजन् निर्मर्यादमवर्तत ॥ १६ ॥ राजन्! दो ही घड़ीतक वह युद्ध देखनेमें मधुर जान पड़ा। फिर तो वहाँ उन्मत्तके समान मर्यादाशून्य बर्ताव होने लगा ॥ १६ ॥ रथी नागं समासाद्य दारयन् निशितैः शरैः । प्रेषयामास कालाय शरैः संनतपर्वभिः ॥ १७ ॥ रथी हाथीका सामना करके झुकी हुई गाँठवाले तीखे बाणोंद्वारा उसे विदीर्ण करते हुए कालके गालमें भेजने लगे ॥ १७ ॥ नागा हयान् समासाद्य विक्षिपन्तो बहून् रणे । दारयामासुरत्युग्रं तत्र तत्र तदा तदा ॥ १८ ॥ हाथी बहुत-से घोड़ोंको पकड़-पकड़कर रणभूमिमें इधर-उधर फेंकने और विदीर्ण करने लगे। उससे वहाँ उस समय बड़ा भयंकर दृश्य उपस्थित हो गया ॥ १८ ॥ हयारोहाश्च बहवः परिवार्य गजोत्तमान् । तलशब्दरवांश्चक्रुः सम्पतन्तस्ततस्ततः ॥ १९ ॥ धावमानांस्ततस्तांस्तु द्रवमाणान् महागजान् । पार्श्वतः पृष्ठतश्चैव निजघ्नुर्ह्ययसादिनः ॥ २० ॥ बहुत-से घुड़सवार उत्तम गजराजोंको चारों ओरसे घेरकर इधर-उधर दौड़ने और ताली पीटने लगे। इससे जब वे विशालकाय हाथी दौड़ने और भागने लगते, तब वे घुड़सवार अगल-बगलसे और पीछेकी ओरसे उनपर बाणोंकी चोट करते थे ॥ १९-२० ॥ विद्राव्य च बहूनश्वान् नागा राजन् मदोत्कटाः । विषाणैश्चापरे जघ्नुर्ममृदुश्चापरे भृशम् ॥ २१ ॥ राजन्! कितने ही मदोन्मत्त हाथी भी बहुत-से घोड़ोंको खदेड़कर उन्हें दाँतोंसे दबाकर मार डालते अथवा वेगपूर्वक पैरोंसे कुचल डालते थे ॥ २१ ॥ साश्वारोहांश्च तुरगान् विषाणैर्विव्यधू रुषा । अपरे चिक्षिपुर्वेगात् प्रगृह्यातिबलास्तदा ॥ २२ ॥ कितने ही हाथियोंने रोषमें भरकर सवारोंसहित घोड़ोंको अपने दाँतोंसे विदीर्ण कर डाला तथा कुछ अत्यन्त बलवान् गजराजोंने उन घोड़ोंको पकड़कर वेगपूर्वक दूर फेंक दिया ॥ २२ ॥ पादातैराहता नागा विवरेषु समन्ततः । चक्रुरार्तस्वरं घोरं दुद्रुवुश्च दिशो दश ॥ २३ ॥ प्रहारका अवसर मिलनेपर पैदल सैनिक भी चारों ओरसे हाथियोंको गहरी चोट पहुँचाते और वे घोर आर्तनाद करते हुए सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भाग जाते थे ॥ २३ ॥ पदातीनां तु सहसा प्रद्रुतानां महाहवे ।

उत्सृज्याभरणं तूर्णमवप्लुत्य रणाजिरे ॥ २४ ॥ निमित्तं मन्यमानास्तु परिणाम्य महागजाः । जगृहुर्बिभिदुश्चैव चित्राण्याभरणानि च ॥ २५ ॥ पैदल सैनिक युद्धस्थलमें अपने आभूषण त्यागकर तुरंत उछल-उछलकर बड़े वेगसे भागने लगे। उस समय सहसा भागते हुए उन पैदलोंके उन विचित्र आभूषणोंको अपने ऊपर प्रहार होनेमें निमित्त मानकर हाथी उन्हें सूँड़से उठा लेते और फिर दाँतोंसे दबाकर फोड़ डालते थे ॥ २४-२५ ॥

तांस्तु तत्र प्रसक्तान् वै परिवार्य पदातयः । हस्त्यारोहान् निजघ्नुस्ते महावेगा बलोत्कटाः ॥ २६ ॥ इस प्रकार आभूषणोंमें उलझे हुए उन हाथियों और उनके सवारोंको चारों ओरसे घेरकर महान् वेगशाली तथा बलोन्मत्त पैदल योद्धा मार डालते थे ॥ २६ ॥

अपरे हस्तिभिर्हस्तैः खं विक्षिप्ता महाहवे । निपतन्तो विषाणाग्रैर्भृशं विद्धाः सुशिक्षितैः ॥ २७ ॥ कितने ही पैदल सैनिक उस महासमरमें सुशिक्षित हाथियोंकी सूँड़ोंसे आकाशमें फेंक दिये जाते और उधरसे गिरते समय उन हाथियोंके दन्ताग्रभागोंद्वारा अत्यन्त विदीर्ण कर दिये जाते थे ॥ २७ ॥

अपरे सहसा गृह्य विषाणैरेव सूदिताः । सेनान्तरं समासाद्य केचित् तत्र महागजैः ॥ २८ ॥ क्षुण्णगात्रा महाराज विक्षिप्य च पुनः पुनः । अपरे व्यजनानीव विभ्राम्य निहता मृधे ॥ २९ ॥ कितने ही योद्धा हाथियोंद्वारा पकड़े जाकर उनके दाँतोंसे ही मार डाले गये। महाराज! बहुत-से विशालकाय गजराज सेनाके भीतर घुसकर कितने ही पैदलोंको सहसा पकड़कर उनके शरीरोंको बारंबार पटक-झटककर चूर-चूर कर देते और कितनोंको व्यजनोंके समान घुमाकर युद्धमें मार डालते थे ॥ २८-२९ ॥

पुरःसराश्च नागानामपरेषां विशाम्पते । शरीराण्यतिविद्धानि तत्र तत्र रणाजिरे ॥ ३० ॥ प्रजानाथ! जो हाथियोंके आगे चलनेवाले पैदल थे, वे दूसरे पक्षके हाथियोंके शरीरोंको जहाँ-तहाँ रणभूमिमें अत्यन्त घायल कर देते थे ॥ ३० ॥

प्रतिमानेषु कुम्भेषु दन्तवेष्टेषु चापरे । निगृहीता भृशं नागाः प्रासतोमरशक्तिभिः ॥ ३१ ॥ कहीं-कहीं पैदल सैनिक प्रास, तोमर और शक्तिद्वारा शत्रुपक्षके हाथियोंके दोनों दाँतोंके बीचके स्थानमें, कुम्भस्थलमें और ओठोंके ऊपर प्रहार करके उन्हें अत्यन्त काबूमें कर लेते थे ॥ ३१ ॥

निगृह्य च गजाः केचित् पार्श्वस्थैर्भृशदारुणैः । रथाश्वसादिभिस्तत्र सम्भिन्ना न्यपतन् भुवि ॥ ३२ ॥ कितने ही हाथियोंको अवरुद्ध करके पार्श्वभागमें खड़े हुए अत्यन्त भयंकर रथी और घुड़सवार उन्हें बाणोंसे विदीर्ण कर डालते, जिससे वे हाथी वहीं पृथ्वीपर गिर जाते थे ॥ ३२ ॥

सहसा सादिनस्तत्र तोमरेण महामृधे । भूमावमृद्नन् वेगेन सचर्माणं पदातिनम् ॥ ३३ ॥ उस महासमरमें कितने ही हाथीसवार सहसा तोमरका प्रहार करके ढालसहित पैदल योद्धाको गिराकर उसे वेगपूर्वक धरतीपर रौंद डालते थे ॥ ३३ ॥

तथा सावरणान् कांश्चित्तत्र तत्र विशाम्पते । रथान् नागाः समासाद्य परिगृह्य च मारिष ॥ ३४ ॥ व्याक्षिपन् सहसा तत्र घोररूपे भयानके । नाराचैर्निहताश्चापि गजाः पेतुर्महाबलाः ॥ ३५ ॥ पर्वतस्येव शिखरं वज्ररुग्णं महीतले । माननीय नरेश! उस घोर एवं भयानक युद्धमें कितने ही हाथी निकट आकर अपनी सूँड़ोंसे कुछ आवरणयुक्त रथोंको पकड़ लेते और उन्हें वेगपूर्वक खींचकर सहसा दूर फेंक देते थे। फिर वे महाबली हाथी भी नाराचोंसे मारे जाकर वज्रके तोड़े हुए पर्वत-शिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ते थे ॥ ३४-३५ १/२ ॥

योधा योधान् समासाद्य मुष्टिभिर्व्यहनन् युधि ॥ ३६ ॥ केशेष्वन्योन्यमाक्षिप्य चिक्षिपुर्बिभिदुश्च ह । बहुत-से पैदल योद्धा दूसरे योद्धाओंको निकट पाकर युद्धस्थलमें उनपर मुक्कोंसे प्रहार करने लगते थे। कितने ही एक-दूसरेकी चुटिया पकड़कर परस्पर झटकते-फेंकते और एक-दूसरेको घायल करते थे ॥ ३६ १/२ ॥

उद्यम्य च भुजावन्यो निक्षिप्य च महीतले ॥ ३७ ॥ पदा चोरः समाक्रम्य स्फुरतोऽपाहरच्छिरः । दूसरा योद्धा अपनी दोनों भुजाओंको उठाकर उनके द्वारा शत्रुको पृथ्वीपर पटक देता और एक पैरसे उसकी छातीको दबाकर उसके छटपटाते रहनेपर भी उसका सिर काट लेता था ॥ ३७ १/२ ॥

पततश्चापरो राजन् विजहारासिना शिरः ॥ ३८ ॥ जीवतश्च तथैवान्यः शस्त्रं काये न्यमज्जयत् । राजन्! दूसरा सैनिक किसी गिरते हुए योद्धाका सिर अपनी तलवारसे काट लेता था और कोई जीवित शत्रुके ही शरीरमें अपना शस्त्र घुसेड़ देता था ॥ ३८ १/२ ॥

मुष्टियुद्धं महच्चासीद् योधानां तत्र भारत ॥ ३९ ॥

तथा केशग्रहश्चोग्रो बाहुयुद्धं च भैरवम् । भारत! वहाँ योद्धाओंमें बहुत बड़ा मुष्टियुद्ध हो रहा था। साथ ही भयंकर केशग्रहण और भयानक बाहुयुद्ध भी चालू था ॥ ३९ ½ ॥

समासक्तस्य चान्येन अविज्ञातस्तथापरः ॥ ४० ॥ जहार समरे प्राणान् नानाशास्त्रैरनेकधा । कोई-कोई योद्धा दूसरेके साथ उलझे हुए सैनिकसे स्वयं अपरिचित रहकर नाना प्रकारके अनेक अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा युद्धमें उसके प्राण हर लेता था ॥ ४० ½ ॥

संसक्तेषु च योधेषु वर्तमाने च संकुले ॥ ४१ ॥ कबन्धान्युत्थितानि स्युः शतशोऽथ सहस्रशः । इस प्रकार जब सभी योद्धा युद्धमें लगे थे और तुमुल संग्राम चल रहा था, उस समय सैकड़ों और हजारों कबन्ध (धड़) उठ खड़े हुए थे ॥ ४१ ½ ॥

शोणितैः सिच्यमानानि शस्त्राणि कवचानि च ॥ ४२ ॥ महारागानुरक्तानि वस्त्राणीव चकाशिरे । खूनसे भीगे हुए शस्त्र और कवच गाढ़े रंगमें रँगे हुए वस्त्रोंके समान सुशोभित होते थे ॥ ४२ ½ ॥

एवमेतन्महद् युद्धं दारुणे शस्त्रसंकुलम् ॥ ४३ ॥ उन्मत्तगङ्गाप्रतिमं शब्देनापूरयज्जगत् । इस प्रकार अस्त्र-शस्त्रोंसे परिपूर्ण यह महाभयानक युद्ध बढ़ी हुई गंगाके समान जगत्को कोलाहलसे परिपूर्ण कर रहा था ॥ ४३ ½ ॥

नैव स्वे न परे राजन् विज्ञायन्ते शरातुराः ॥ ४४ ॥ योद्धव्यमिति युध्यन्ते राजानो जयगृद्धिनः । राजन्! बाणोंकी चोटसे व्याकुल हुए अपने और पराये योद्धा पहचानमें नहीं आते थे। विजयकी अभिलाषा रखनेवाले राजालोग—'युद्ध करना अपना कर्तव्य है' यह समझकर जूझ रहे थे ॥ ४४ ½ ॥

स्वान् स्वे जघ्नुर्महाराज परांश्चैव समागतान् ॥ ४५ ॥ उभयोः सेनयोर्वीरैर्व्याकुलं समपद्यत । महाराज! सामने आये हुए अपने और शत्रुपक्षके योद्धाओंको भी अपने ही पक्षके लोग मार डालते थे। दोनों सेनाओंके वीर मर्यादाशून्य युद्धमें प्रवृत्त हो गये थे ॥ ४५ ½ ॥

रथैर्भग्नैर्महाराज वारणैश्च निपातितैः ॥ ४६ ॥ हयैश्च पतितैस्तत्र नरैश्च विनिपातितैः । अगम्यरूपा पृथिवी क्षणेन समपद्यत ॥ ४७ ॥

राजेन्द्र! टूटे हुए रथों, धराशायी हुए हाथियों, मरकर गिरे हुए घोड़ों और गिराये गये पैदल सैनिकोंसे क्षणभरमें यह पृथ्वी ऐसी हो गयी कि वहाँ चलना-फिरना असम्भव हो गया ॥ ४६-४७ ॥

क्षणेनासीन्महीपाल क्षतजैघिप्रवर्तिनी ।
पञ्चालानहनत् कर्णस्त्रिगर्तांश्च धनंजयः ॥ ४८ ॥
भूपाल! क्षणभरमें वहाँ भूतलपर खूनकी नदी बह चली। कर्णने पंचालोंका और अर्जुनने त्रिगर्तोंका संहार कर डाला ॥ ४८ ॥

भीमसेनः कुरून् राजन् हस्त्यनीकं च सर्वशः ।
एवमेष क्षयो वृत्तः कुरुपाण्डवसेनयोः ।
अपराह्ने गते सूर्ये काङ्क्षतां विपुलं यशः ॥ ४९ ॥
राजन्! भीमसेनने कौरवों तथा आपकी गजसेनाको सर्वथा नष्ट कर दिया। इस प्रकार सूर्यदेवके अपराह्नकालमें जाते-जाते कौरव और पाण्डव दोनों सेनाओंमें महान् यशकी अभिलाषा रखनेवाले वीरोंका यह विनाश-कार्य सम्पन्न हुआ ॥ ४९ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुल-युद्धविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1771)

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एकोनत्रिंशोऽध्यायः

युधिष्ठिरके द्वारा दुर्योधनकी पराजय

धृतराष्ट्र उवाच

अतितीव्राणि दुःखानि दुःसहानि बहूनि च ।
त्वत्तोऽहं संजयाश्रौषं पुत्राणां चैव संक्षयम् ॥ १ ॥
यथा त्वं मे कथयसे तथा युद्धमवर्तत ।
न सन्ति सूत कौरव्या इति मे निश्चिता मतिः ॥ २ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! तुमसे मैंने अबतक अत्यन्त तीव्र और दुःसह दुःख देनेवाली बहुत-सी घटनाएँ सुनी हैं। अपने पुत्रोंके विनाशकी बात भी सुन ली। सूत! जैसा तुम मुझसे कह रहे हो और जिस प्रकार वह युद्ध सम्पन्न हुआ, उसे देखते हुए मेरा यह दृढ़ निश्चय हो रहा है कि अब कुरुवंशी जीवित नहीं रहे ॥ १-२ ॥

दुर्योधनश्च विरथः कृतस्तत्र महारथः ।
धर्मपुत्रः कथं चक्रे तस्य वा नृपतिः कथम् ॥ ३ ॥
सुनता हूँ महारथी दुर्योधन भी वहाँ रथहीन कर दिया गया। धर्मपुत्र युधिष्ठिरने उसके साथ किस प्रकार युद्ध किया अथवा राजा दुर्योधनने युधिष्ठिरके प्रति कैसा बर्ताव किया? ॥ ३ ॥

अपराह्ने कथं युद्धमभवल्लोमहर्षणम् ।
तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन कुशलो ह्यसि संजय ॥ ४ ॥
संजय! अपराह्नकालमें किस प्रकार वह रोमांचकारी युद्ध हुआ था? यह मुझे ठीक-ठीक बताओ; क्योंकि तुम उसका वर्णन करनेमें कुशल हो ॥ ४ ॥

संजय उवाच

संसक्तेषु तु सैन्येषु वध्यमानेषु भागशः ।
रथमन्यं समास्थाय पुत्रस्तव विशाम्पते ॥ ५ ॥
क्रोधेन महता युक्तः सविषो भुजगो यथा ।
**संजयने कहा—**प्रजानाथ! जब सारी सेनाएँ विभिन्न भागोंमें बँटकर जूझने और मरने लगीं, तब आपका पुत्र दुर्योधन दूसरे रथपर बैठकर विषधर सर्पके समान अत्यन्त कुपित हो उठा ॥ ५ १/२ ॥

(सर्वसैन्यमुदीक्ष्यैव क्रोधादुद्वृत्तलोचनः ।
दृष्ट्वा धर्मसुतं चापि सैन्यमध्ये व्यवस्थितम् ॥
श्रिया ज्वलन्तं कौन्तेयं यथा वज्रधरं युधि ।)

दुर्योधनः समालक्ष्य धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥ ६ ॥
प्रोवाच सूतं त्वरितो याहि याहीति भारत ।
तत्र मां प्रापय क्षिप्रं सारथे यत्र पाण्डवः ॥ ७ ॥
ध्रियमाणातपत्रेण राजा राजति दंशितः ।
सारी सेनाओंपर दृष्टिपात करके क्रोधसे उसकी आँखें घूमने लगीं। उस समय युद्धस्थलमें धर्मपुत्र कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर वज्रधारी इन्द्रके समान अपनी दिव्य कान्तिसे प्रकाशित होते हुए सेनाके बीचमें खड़े थे। भारत! उन धर्मराज युधिष्ठिरको देखकर दुर्योधनने तुरंत अपने सारथिसे कहा—'सारथे! चलो, चलो, जहाँ पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर कवच बाँधकर छत्र धारण किये सुशोभित हो रहे हैं, वहाँ मुझे शीघ्र पहुँचा दो' ॥ ६-७ १/२ ॥

स सूतश्चोदितो राज्ञा राज्ञः स्यन्दनमुत्तमम् ॥ ८ ॥
युधिष्ठिरस्याभिमुखं प्रेषयामास संयुगे ।
राजा दुर्योधनसे इस प्रकार प्रेरित होकर सारथिने उस उत्तम रथको राजा युधिष्ठिरके सामने बढ़ाया ॥ ८ १/२ ॥

ततो युधिष्ठिरः क्रुद्धः प्रभिन्न इव कुञ्जरः ॥ ९ ॥
सारथिं चोदयामास याहि यत्र सुयोधनः ।
तब मदस्रावी हाथीके समान कुपित हुए राजा युधिष्ठिरने भी अपने सारथिको आज्ञा दी, 'जहाँ दुर्योधन है, वहीं चलो' ॥ ९ १/२ ॥

तौ समाजग्मतुर्वीरौ भ्रातरौ रथसत्तमौ ॥ १० ॥
समेत्य च महावीरौ संरब्धौ युद्धदुर्मदौ ।
ववर्षतुर्महेष्वासौ शरैरन्योन्यमाहवे ॥ ११ ॥
इस प्रकार वे महाधनुर्धर, महावीर और महारथी दोनों रणदुर्मद बन्धु एक-दूसरेके सामने आ गये और क्रोधपूर्वक आपसमें भिड़कर युद्धस्थलमें परस्पर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ १०-११ ॥

ततो दुर्योधनो राजा धर्मशीलस्य मारिष ।
शिलाशितेन भल्लेन धनुश्चिच्छेद संयुगे ॥ १२ ॥
मान्यवर! तदनन्तर युद्धस्थलमें राजा दुर्योधनने सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए भल्लसे धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरका धनुष काट दिया ॥ १२ ॥

तं नामृष्यत संक्रुद्धो ह्यवमानं युधिष्ठिरः ।
अपविध्य धनुश्छिन्नं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ १३ ॥
अन्यत् कार्मुकमादाय धर्मपुत्रश्चमूमुखे ।
दुर्योधनस्य चिच्छेद ध्वजं कार्मुकमेव च ॥ १४ ॥
राजा युधिष्ठिर उस अपमानको सहन न कर सके। उनका क्रोध बहुत बढ़ गया। उनकी आँखें रोषसे लाल हो गयीं। उन्होंने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा हाथमें ले लिया।

फिर उन धर्मपुत्रने सेनाके मुहानेपर दुर्योधनके ध्वज और धनुषको भी काट डाला ॥ १३-१४ ॥

अथान्यद् धनुरादाय प्राविध्यत युधिष्ठिरम् ।
तावन्योन्यं सुसंक्रुद्धौ शस्त्रवर्षान्यमुञ्चताम् ॥ १५ ॥
तत्पश्चात् दुर्योधनने दूसरा धनुष लेकर युधिष्ठिरको बींध डाला। वे दोनों वीर अत्यन्त क्रोधमें भरकर एक-दूसरेपर अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे ॥ १५ ॥

सिंहाविव सुसंरब्धौ परस्परजिगीषया ।
जघ्नतुस्तौ रणेऽन्योन्यं नर्दमानौ वृषाविव ॥ १६ ॥
परस्पर विजयकी इच्छासे रोषमें भरे हुए दो सिंहोंके समान दहाड़ते अथवा दो साँड़ोंके समान गरजते हुए वे रणभूमिमें एक-दूसरेपर चोट करते थे ॥ १६ ॥

अन्तरं मार्गमाणौ च चेरतुस्तौ महारथौ ।
ततः पूर्णायतोत्सृष्टैः शरैस्तौ तु कृतव्रणौ ॥ १७ ॥
विरेजतुर्महाराज किंशुकाविव पुष्पितौ ।
वे दोनों महारथी एक-दूसरेका अन्तर (प्रहार करनेका अवसर) ढूँढ़ते हुए रणभूमिमें विचर रहे थे। महाराज! धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये बाणोंद्वारा वे दोनों वीर क्षत-विक्षत होकर फूले हुए दो पलाश-वृक्षोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ १७ १/२ ॥

ततो राजन् विमुञ्चन्तौ सिंहनादान् मुहुर्मुहुः ॥ १८ ॥
तलयोश्च तथा शब्दान् धनुषश्च महाहवे ।
शङ्खशब्दवरांश्चैव चक्रतुस्तौ नरेश्वरौ ॥ १९ ॥
राजन्! तब वे दोनों नरेश बारंबार सिंहनाद करते हुए उस महासमरमें तालियाँ बजाने, धनुषकी टंकार करने और उत्तम शंखनाद फैलाने लगे ॥ १८-१९ ॥

अन्योन्यं तौ महाराज पीडयाञ्चक्रतुर्भृशम् ।
ततो युधिष्ठिरो राजा पुत्रं तव शरैस्त्रिभिः ॥ २० ॥
आजघानोरसि क्रुद्धो वज्रवेगैर्दुरासदैः ।
महाराज! वे दोनों एक-दूसरेको अत्यन्त पीड़ा दे रहे थे। तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने वज्रके समान वेगशाली एवं दुर्जय तीन बाणोंद्वारा आपके पुत्रकी छातीमें क्रोधपूर्वक प्रहार किया ॥ २० १/२ ॥

प्रतिविव्याध तं तूर्णं तव पुत्रो महीपतिः ॥ २१ ॥
पञ्चभिर्निशितैर्बाणैः स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः ।
आपके पुत्र राजा दुर्योधनने भी शिलापर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले पाँच पैने बाणोंद्वारा युधिष्ठिरको घायल करके तुरंत बदला चुकाया ॥ २१ १/२ ॥

ततो दुर्योधनो राजा शक्तिं चिक्षेप भारत ॥ २२ ॥
सर्वपारशवीं तीक्ष्णां महोल्काप्रतिमां तदा ।