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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अनेन चास्य क्षुरनेमिनाद्य संछिन्धि मूर्धानमरेः प्रसह्य ॥ ४५ ॥ मया विसृष्टेन सुदर्शनेन वज्रेण शक्रो नमुचेरिवारेः । ‘तुम मेरे दिये हुए इस सुदर्शनचक्रके द्वारा जिसके नेमिभागमें (किनारे) क्षुर लगे हुए हैं, आज बलपूर्वक शत्रु का मस्तक काट डालो। जैसे इन्द्रने वज्रके द्वारा अपने शत्रु नमुचिका सिर काट दिया था॥ ४५ १/२ ॥

किरातरूपी भगवान् सुधृत्या त्वया महात्मा परितोषितोऽभूत् ॥ ४६ ॥ तां त्वं पुनर्वीर धृतिं गृहीत्वा सहानुबन्धं जहि सूतपुत्रम् । ‘वीर! तुमने अपने जिस उत्तम धैर्यके द्वारा किरातरूपधारी महात्मा भगवान् शंकरको संतुष्ट किया था, उसी धैर्यको पुनः अपनाकर सगे-सम्बन्धियोंसहित सूतपुत्रका वध कर डालो॥ ४६ १/२ ॥

ततो महीं सागरमेखलां त्वं सपत्तनां ग्रामवतीं समृद्धाम् ॥ ४७ ॥ प्रयच्छ राज्ञे निहितारिसंघां यशश्च पार्थातुलमाप्नुहि त्वम् । ‘पार्थ! तत्पश्चात् समुद्रसे घिरी हुई नगरों और गाँवोंसे युक्त तथा शत्रुसमुदायसे शून्य यह समृद्धिशालिनी पृथ्वी राजा युधिष्ठिरको दे दो और अनुपम यश प्राप्त करो’॥

स एवमुक्तोऽतिबलो महात्मा चकार बुद्धिं हि वधाय सौतेः ॥ ४८ ॥ स चोदितो भीमजनार्दनाभ्यां स्मृत्वा तथाऽऽत्मानमवेक्ष्य सर्वम् । इहात्मनश्चागमने विदित्वा प्रयोजनं केशवमित्युवाच ॥ ४९ ॥ भीमसेन और श्रीकृष्णके इस प्रकार प्रेरणा देने और कहनेपर अत्यन्त बलशाली महात्मा अर्जुनने सूतपुत्रके वधका विचार किया। उन्होंने अपने स्वरूपका स्मरण करके सब बातोंपर दृष्टिपात किया और इस युद्धभूमिमें अपने आगमनके प्रयोजनको समझकर श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा— ॥ ४८-४९ ॥

प्रादुष्करोम्येष महास्त्रमुग्रं शिवाय लोकस्य वधाय सौतेः । तन्मेऽनुजानातु भवान् सुराश्च

ब्रह्मा भवो वेदविदश्च सर्वे ॥ ५० ॥ 'प्रभो! मैं जगत्‌के कल्याण और सूतपुत्रके वधके लिये अब एक महान्‌ एवं भयंकर अस्त्र प्रकट कर रहा हूँ। इसके लिये आप, ब्रह्माजी, शंकरजी, समस्त देवता तथा सम्पूर्ण ब्रह्मवेत्ता मुझे आज्ञा दें' ॥ ५० ॥

इत्युच्य देवं स तु सव्यसाची
नमस्कृत्या ब्रह्मणे सोऽमितात्मा ।
तदुत्तमं ब्राह्ममसह्यमस्त्रं
प्रादुश्चक्रे मनसा यद् विधेयम् ॥ ५१ ॥
भगवान्‌ श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर अमितात्मा सव्यसाची अर्जुनने ब्रह्माजीको नमस्कार करके जिसका मनसे ही प्रयोग किया जाता है, उस असह्य एवं उत्तम ब्रह्मास्त्रको प्रकट किया ॥ ५१ ॥

तदस्य हत्वा विरराज कर्णो
मुक्त्वा शरान् मेघ इवाम्बुधाराः ।
समीक्ष्य कर्णेन किरीटिनस्तु
तथाऽऽजिमध्ये निहतं तदस्त्रम् ॥ ५२ ॥
ततोऽमर्षी बलवान् क्रोधदीप्तो
भीमोऽब्रवीदर्जुनं सत्यसंधम् ।
परंतु जैसे मेघ जलकी धारा गिराता है, उसी प्रकार बाणोंकी बौछारसे कर्ण उस अस्त्रको नष्ट करके बड़ी शोभा पाने लगा। रणभूमिमें किरीटधारी अर्जुनके उस अस्त्रको कर्णद्वारा नष्ट हुआ देख अमर्षशील बलवान् भीमसेन पुनः क्रोधसे जल उठे और सत्यप्रतिज्ञ अर्जुनसे इस प्रकार बोले— ॥ ५२½ ॥

ननु त्वाहर्वेदितारं महास्त्रं
ब्राह्मं विधेयं परमं जनास्तत् ॥ ५३ ॥
तस्मादन्यद् योजय सव्यसाचि-
न्निति स्मोक्तोऽयोजयत् सव्यसाची ।
ततो दिशः प्रदिशश्चापि सर्वाः
समावृणोत् सायकैर्भूरितेजाः ॥ ५४ ॥
गाण्डीवमुक्तैर्भुजगैरि्रवोग्रै-
र्दिवाकरांशुप्रतिमैर्ज्वलद्भिः ।

‘सव्यसाचिन्! सब लोग कहते हैं कि तुम परम उत्तम एवं मनके द्वारा प्रयोग करनेयोग्य

महान् ब्रह्मास्त्रके ज्ञाता हो; इसलिये तुम दूसरे किसी श्रेष्ठ अस्त्रका प्रयोग करो।’ उनके ऐसा

कहनेपर सव्यसाची अर्जुनने दूसरे दिव्यास्त्रका प्रयोग किया। इससे महातेजस्वी अर्जुनने

अपने गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए सर्पोंके समान भयंकर और सूर्य-किरणोंके तुल्य तेजस्वी

बाणोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया, कोना-कोना ढक दिया ।। ५३-५४ १/२

।।

सृष्टास्तु बाणा भरतर्षभेण

शतं शतानीव सुवर्णपुङ्खाः ।। ५५ ।।

प्राच्छादयन् कर्णरथं क्षणेन

युगान्तवह्न्यर्ककरप्रकाशाः ।

भरतश्रेष्ठ अर्जुनके छोड़े हुए प्रलयकालीन सूर्य और अग्निकी किरणोंके समान

प्रकाशित होनेवाले दस हजार बाणोंने क्षणभरमें कर्णके रथको आच्छादित कर दिया ।।

ततश्च शूलानि परश्वधानि

चक्राणि नाराचशतानि चैव ।। ५६ ।।

निश्चक्रमुर्घोरतराणि योधा-

स्ततो ह्यहन्यन्त समन्ततोऽपि ।

उस दिव्यास्त्रसे शूल, फरसे, चक्र और सैकड़ों नाराच आदि घोरतर अस्त्र-शस्त्र प्रकट

होने लगे, जिनसे सब ओरके योद्धाओंका विनाश होने लगा ।।

छिन्नं शिरः कस्यचिदाजिमध्ये

पपात योधस्य परस्य कायात् ।। ५७ ।।

भयेन सोऽप्याशु पपात भूमा-

वन्यः प्रणष्टः पतितं विलोक्य ।

अन्यस्य सासिर्निपपात कृत्तो

योधस्य बाहुः करिहस्ततुल्यः ।। ५८ ।।

उस युद्धस्थलमें किसी शत्रुपक्षीय योद्धाका सिर धड़से कटकर धरतीपर गिर पड़ा। उसे

देखकर दूसरा भी भयके मारे धराशायी हो गया। उसको गिरा हुआ देख तीसरा योद्धा

वहाँसे भाग खड़ा हुआ। किसी दूसरे योद्धाकी हाथीकी सूँड़के समान मोटी दाहिनी बाँह

तलवारसहित कटकर गिर पड़ी ।। ५७-५८ ।।

अन्यस्य सव्यः सह वर्मणा च

क्षुरप्रकृत्तः पतितो धरण्याम् ।

एवं समस्तानपि योधमुख्यान्

विध्वंसयामास किरीटमाली ।। ५९ ।।

दूसरेकी बायीं भुजा क्षुरोंद्वारा कवचके साथ कटकर भूमिपर गिर गयी। इस प्रकार किरीटधारी अर्जुनने शत्रुपक्षके सभी मुख्य-मुख्य योद्धाओंका संहार कर डाला ।।
शरैः शरीरान्तकरैः सुघोरै-
दर्योधनं सैन्यमशेषमेव ।
वैकर्तनेनापि तथाऽऽजिमध्ये
सहस्रशो बाणगणा विसृष्टाः ॥ ६० ॥
उन्होंने शरीरका अन्त कर देनेवाले घोर बाणोंद्वारा दुर्योधनकी सारी सेनाका विध्वंस कर दिया। इसी प्रकार वैकर्तन कर्णने भी समरांगणमें सहस्रों बाणसमूहोंकी वर्षा की ॥ ६० ॥
ते घोषिणः पाण्डवमभ्युपेयुः
पर्जन्यमुक्ता इव वारिधाराः ।
ततः स कृष्णं च किरीटिनं च
वृकोदरं चाप्रतिमप्रभावः ॥ ६१ ॥
त्रिभिस्त्रिभिर्भीमबलो निहत्य
ननाद घोरं महता स्वरेण ।
वे बाण मेघोंकी बरसायी हुई जलधाराओंके समान शब्द करते हुए पाण्डुपुत्र अर्जुनको जा लगे। तत्पश्चात् अप्रतिम प्रभावशाली और भयंकर बलवान् कर्णने तीन-तीन बाणोंसे श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीमसेनको घायल करके बड़े जोरसे भयानक गर्जना की ॥ ६१ १/२ ॥
स कर्णबाणाभिहतः किरीटी
भीमं तथा प्रेक्ष्य जनार्दनं च ॥ ६२ ॥
अमृष्यमाणः पुनरेव पार्थः
शरान् दशाष्टौ च समुद्धबर्ह ।
कर्णके बाणोंसे घायल हुए किरीटधारी कुन्तीकुमार अर्जुन भीमसेन तथा भगवान् श्रीकृष्णको भी उसी प्रकार क्षत-विक्षत देखकर सहन न कर सके; अतः उन्होंने अपने तरकससे पुनः अठारह बाण निकाले ॥ ६२ १/२ ॥
स केतुमेकेन शरेण विद्ध्वा
शल्यं चतुर्भिस्त्रिभिरेव कर्णम् ॥ ६३ ॥
ततः स मुक्तैर्दशभिर्जघान
सभापतिं काञ्चनवर्मनद्धम् ।
एक बाणसे कर्णकी ध्वजाको बींधकर अर्जुनने चार बाणोंसे शल्यको और तीनसे कर्णको घायल कर दिया। तत्पश्चात् उन्होंने दस बाण छोड़कर सुवर्णमय कवच धारण करनेवाले सभापति नामक राजकुमारको मार डाला ॥
स राजपुत्रो विशिरा विबाहु-

विर्वाजिसूतो विधनुर्विकेतुः ॥ ६४ ॥ हतो रथाग्रादपतत् स रुग्णः परश्वधैः शाल इवावकृत्तः । वह राजकुमार मस्तक, भुजा, घोड़े, सारथि, धनुष और ध्वजसे रहित हो मरकर रथके अग्रभागसे नीचे गिर पड़ा, मानो फरसोंसे काटा गया शालवृक्ष टूटकर धराशायी हो गया हो ॥ ६४ १/२ ॥

पुनश्च कर्णं त्रिभिरष्टभिश्च द्वाभ्यां चतुर्भिर्दशभिश्च विद्ध्वा ॥ ६५ ॥ चतुःशतान् द्विरदान् सायुधान् वै हत्वा रथानष्टशताञ्जघान । इसके बाद अर्जुनने पुनः तीन, आठ, दो, चार और दस बाणोंद्वारा कर्णको बारंबार घायल करके अस्त्र-शस्त्रधारी सवारोंसहित चार सौ हाथियोंको मारकर आठ सौ रथोंको नष्ट कर दिया ॥ ६५ १/२ ॥

सहस्रशोऽश्वांश्च पुनः स सादी- नष्टौ सहस्राणि च पत्तिवीरान् ॥ ६६ ॥ कर्णं ससूतं सरथं सकेतु- मदृश्यमज्जोगतिभिः प्रचक्रे । तदनन्तर सवारोंसहित हजारों घोड़ों और सहस्रों पैदल वीरोंको मारकर रथ, सारथि और ध्वजसहित कर्णको भी शीघ्रगामी बाणोंद्वारा ढककर अदृश्य कर दिया ॥

अथाक्रोशन् कुरवो वध्यमाना धनंजयेनाधिरथिं समन्तात् ॥ ६७ ॥ मुञ्चाभिविद्ध्यर्जुनमाशु कर्ण बाणैः पुरा हन्ति कुरून् समग्रान् । अर्जुनकी मार खाते हुए कौरव-सैनिक चारों ओरसे कर्णको पुकारने लगे—'कर्ण! शीघ्र बाण छोड़ो और अर्जुनको घायल कर डालो। कहीं ऐसा न हो कि ये पहले ही समस्त कौरवोंका वध कर डालें' ॥ ६७ १/२ ॥

स चोदितः सर्वयत्नेन कर्णो मुमोच बाणान् सुबहूनभीक्ष्णम् ॥ ६८ ॥ ते पाण्डुपञ्चालगणान् निजघ्नु- र्मर्मच्छिदः शोणितपांसुदिग्धाः । इस प्रकार प्रेरणा मिलनेपर कर्णने सारी शक्ति लगाकर बारंबार बहुत-से बाण छोड़े। रक्त और धूलमें सने हुए वे मर्मभेदी बाण पाण्डव और पांचालोंका विनाश करने लगे ॥

तावुत्तमौ सर्वधनुर्धराणां

महाबलौ सर्वसपत्नसाहौ ॥ ६९ ॥
निजघ्नतुश्चाहितसैन्यमुग्र-
मन्योन्यमप्यस्त्रविद्वौ महास्त्रैः।
वे दोनों सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ, महाबली, सारे शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ और अस्त्रविद्याके विद्वान् थे; अतः भयंकर शत्रुसेनाको तथा आपसमें भी एक-दूसरेको महान् अस्त्रोंद्वारा घायल करने लगे ॥ ६९ १/२ ॥
अथोपयातस्त्वरितो दिदृक्षु-
र्मन्त्रौषधीभिर्निरुजो विशल्यः ॥ ७० ॥
कृतः सुहृद्भिर्भिषजां वरिष्ठै-
र्युधिष्ठिरस्तत्र सुवर्णवर्मा ।
तत्पश्चात् शिविरमें हितैषी वैद्यशिरोमणियोंने मन्त्र और ओषधियोंद्वारा राजा युधिष्ठिरके शरीरसे बाण निकालकर उन्हें रोगरहित (स्वस्थ) कर दिया; इसलिये वे बड़ी उतावलीके साथ सुवर्णमय कवच धारण करके वहाँ युद्ध देखनेके लिये आये ॥ ७० १/२ ॥
तथोपयातं युधि धर्मराजं
दृष्ट्वा मुदा सर्वभूतान्यनन्दन् ॥ ७१ ॥
राहोर्विमुक्तं विमलं समग्रं
चन्द्रं यथैवाभ्युदितं तथैव ।
धर्मराजको युद्धस्थलमें आया हुआ देख समस्त प्राणी बड़ी प्रसन्नताके साथ उनका अभिनन्दन करने लगे। ठीक उसी तरह, जैसे राहुके ग्रहणसे छूटे हुए निर्मल एवं सम्पूर्ण चन्द्रमाको उदित देख सब लोग बड़े प्रसन्न होते हैं ॥
दृष्ट्वा तु मुख्यावथ युध्यमानौ
दिदृक्षवः शूरवरावरिघ्नौ ॥ ७२ ॥
कर्णं च पार्थं च विलोकयन्तः
खस्था महीस्थाश्च जनावतस्थुः ।
परस्पर जूझते हुए उन दोनों शत्रुनाशक एवं प्रधान शूरवीर कर्ण और अर्जुनको देखकर उन्हींकी ओर दृष्टि लगाये आकाश और भूतलमें ठहरे हुए सभी दर्शक अपनी-अपनी जगह स्थिरभावसे खड़े रहे ॥ ७२ १/२ ॥
स कार्मुकज्यातलसंनिपातः
सुमुक्तबाणस्तुमुलो बभूव ॥ ७३ ॥
घ्नतोस्तथान्योन्यमिषुप्रवेकै-
र्धनंजयस्याधिरथेश्च तत्र ।

उस समय वहाँ अर्जुन और कर्ण उत्तम बाणोंद्वारा एक-दूसरेको चोट पहुँचा रहे थे। उनके धनुष, प्रत्यंचा और हथेलीका संघर्ष बड़ा भयंकर होता जा रहा था और उससे उत्तमोत्तम बाण छूट रहे थे ॥ ७३ १/२ ॥

ततो धनुर्ज्यां सहसातिकृष्टा
सुघोषमच्छिद्यत पाण्डवस्य ॥ ७४ ॥
तस्मिन् क्षणे पाण्डवं सूतपुत्रः
समाचिनोत् क्षुद्रकाणां शतेन ।

इसी समय पाण्डुपुत्र अर्जुनके धनुषकी डोरी अधिक खींची जानेके कारण सहसा भारी आवाजके साथ टूट गयी। उस अवसरपर सूतपुत्र कर्णने पाण्डुकुमार अर्जुनको सौ बाण मोर ॥ ७४ १/२ ॥

निर्मुक्तसर्पप्रतिमैरभीक्ष्णं
तैलप्रधौतैः खगपत्रवाजैः ॥ ७५ ॥
षष्ट्या बिभेदाशु च वासुदेव-
मनन्तरं फाल्गुनमष्टभिश्च ।

फिर तेलके धोये और पक्षियोंके पंख लगाये गये, केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पोंके समान भयंकर साठ बाणोंद्वारा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको भी तुरंत ही क्षत-विक्षत कर दिया। इसके बाद पुनः अर्जुनको आठ बाण मारे ॥ ७५ १/२ ॥

पूषात्मजो मर्मसु निर्बिभेद
मरुत्सुतं चायुतशः शराग्र्यैः ॥ ७६ ॥
कृष्णं च पार्थं च तथा ध्वजं च
पार्थानुजान् सोमकान् पातयंश्च ।

तदनन्तर सूर्यकुमार कर्णने दस हजार उत्तम बाणोंद्वारा वायुपुत्र भीमसेनके मर्मस्थानोंपर गहरा आघात किया। साथ ही, श्रीकृष्ण, अर्जुन और उनके रथकी ध्वजाको, उनके छोटे भाइयोंको तथा सोमकोंको भी उसने मार गिरानेका प्रयत्न किया ॥ ७६ १/२ ॥

प्राच्छादयंस्ते विशिखैः पृषत्कै-
र्जीमूतसंघा नभसीव सूर्यम् ॥ ७७ ॥
आगच्छतस्तान् विशिखैरनेकै-
र्व्यष्टम्भयत् सूतपुत्रः कृतास्त्रः ।

तब जैसे मेघोंके समूह आकाशमें सूर्यको ढक लेते हैं, उसी प्रकार सोमकोंने अपने बाणोंद्वारा कर्णको आच्छादित कर दिया; परंतु सूतपुत्र अस्त्रविद्याका महान् पण्डित था, उसने अनेक बाणोंद्वारा अपने ऊपर आक्रमण करते हुए सोमकोंको जहाँ-के-तहाँ रोक दिया ॥

तैरस्तमस्त्रं विनिहत्य सर्वं

जघान तेषां रथवाजिनागान् ॥ ७८ ॥
तथा तु सैन्यप्रवरांश्च राज-
न्नभ्यर्दयन्मार्गणैः सूतपुत्रः ।
राजन्! उनके चलाये हुए सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका नाश करके सूतपुत्रने उनके बहुत-से रथों, घोड़ों और हाथियोंका भी संहार कर डाला और अपने बाणोंद्वारा शत्रुपक्षके प्रधान-प्रधान योद्धाओंको पीड़ा देना प्रारम्भ किया ॥ ७८ १/२ ॥
ते भिन्नदेहा व्यसवो निपेतुः
कर्णेषुभिर्भूमितले स्वनन्तः ॥ ७९ ॥
सिंहेन क्रुद्धेन यथा श्वयूथ्या
महाबला भीमबलेन तद्वत् ।
उन सबके शरीर कर्णके बाणोंसे विदीर्ण हो गये और वे आर्तनाद करते हुए प्राणशून्य हो पृथ्वीपर गिर पड़े। जैसे क्रोधमें भरे हुए भयंकर बलशाली सिंहने कुत्तोंके महाबली समुदायको मार गिराया हो, वही दशा सोमकोंकी हुई ॥
पुनश्च पाञ्चालवरास्तथान्ये
तदन्तरे कर्णधनंजयाभ्याम् ॥ ८० ॥
प्रस्कन्दन्तो बलिना साधुमुक्तैः
कर्णेन बाणैर्निहताः प्रसह्य ।
पांचालोंके प्रधान-प्रधान सैनिक तथा दूसरे योद्धा पुनः कर्ण और अर्जुनके बीचमें आ पहुँचे; परंतु बलवान् कर्णने अच्छी तरह छोड़े हुए बाणोंद्वारा उन सबको हठपूर्वक मार गिराया ॥ ८० १/२ ॥
जयं मत्वा विपुलं वै त्वदीया-
स्तलान् निजघ्नुः सिंहनादांश्च नेदुः ॥ ८१ ॥
सर्वे ह्यमन्यन्त वशे कृतौ तौ
कर्णेन कृष्णाविति ते विमर्दे ।
फिर तो आपके सैनिक कर्णकी बड़ी भारी विजय मानकर ताली पीटने और सिंहनाद करने लगे। उन सबने यह समझ लिया कि 'इस युद्धमें श्रीकृष्ण और अर्जुन कर्णके वशमें हो गये' ॥ ८१ १/२ ॥
ततो धनुर्ज्यामवनाम्य शीघ्रं
शरानस्तानाधिरथेर्विधम्य ॥ ८२ ॥
सुसंरब्धः कर्णशरक्षताङ्गो
रणे पार्थः कौरवान् प्रत्यगृह्णात् ।
तब कर्णके बाणोंसे जिनका अंग-अंग क्षत-विक्षत हो गया था, उन कुन्तीकुमार अर्जुनने रणभूमिमें अत्यन्त कुपित हो शीघ्र ही धनुषकी प्रत्यंचाको झुकाकर चढ़ा दिया और

कर्णके चलाये हुए बाणोंको छिन्न-भिन्न करके कौरवोंको आगे बढ़नेसे रोक दिया ।।
ज्यां चानुमृज्याभ्यहनत् तलत्रे
बाणान्धकारं सहसा च चक्रे ।। ८३ ।।
कर्णं च शल्यं च कुरूंश्च सर्वान्
बाणैरविध्यत् प्रसभं किरीटी ।
तत्पश्चात् किरीटधारी अर्जुनने धनुषकी प्रत्यंचाको हाथसे रगड़कर कर्णके दस्तानेपर आघात किया और सहसा बाणोंका जाल फैलाकर वहाँ अन्धकार कर दिया। फिर कर्ण, शल्य और समस्त कौरवोंको अपने बाणोंद्वारा बलपूर्वक घायल किया ।। ८३ १/२ ।।
न पक्षिणो बभ्रुरन्तरिक्षे
तदा महास्त्रेण कृतेऽन्धकारे ।। ८४ ।।
वायुर्वियत्स्थैरीरितो भूतसंघै-
रुवाह दिव्यः सुरभिस्तदानीम् ।
अर्जुनके महान् अस्त्रोंद्वारा आकाशमें घोर अन्धकार फैल जानेसे उस समय वहाँ पक्षी भी नहीं उड़ पाते थे। तब अन्तरिक्षमें खड़े हुए प्राणिसमूहोंसे प्रेरित होकर तत्काल वहाँ दिव्य सुगन्धित वायु चलने लगी ।। ८४ १/२ ।।
शल्यं च पार्थो दशभिः पृषत्कै-
र्भृशं तनुत्रे प्रहसन्नविध्यत् ।। ८५ ।।
ततः कर्णं द्वादशभिः सुमुक्तै-
र्विद्ध्वा पुनः सप्तभिरभ्यविध्यत् ।
इसी समय कुन्तीकुमार अर्जुनने हँसते-हँसते दस बाणोंसे शल्यको गहरी चोट पहुँचायी और उनके कवचको छिन्न-भिन्न कर डाला। फिर अच्छी तरह छोड़े हुए बारह बाणोंसे कर्णको घायल करके पुनः उसे सात बाणोंसे बींध डाला ।। ८५ १/२ ।।
स पार्थबाणासनवेगमुक्तै-
र्दृढाहतः पत्रिभिरुग्रवेगैः ।। ८६ ।।
विभिन्नगात्रः क्षतजोक्षिताङ्गः
कर्णो बभौ रुद्र इवाततेषुः ।
प्रक्रीडमानोऽथ श्मशानमध्ये
रौद्रे मुहूर्ते रुधिरार्द्रगात्रः ।। ८७ ।।
अर्जुनके धनुषसे वेगपूर्वक छूटे हुए भयंकर वेगशाली बाणोंद्वारा गहरी चोट खाकर कर्णके सारे अंग विदीर्ण हो गये। वह खूनसे नहा उठा और रौद्र मुहूर्तमें श्मशानके भीतर क्रीड़ा करते हुए, बाणोंसे व्याप्त एवं रक्तसे भीगे शरीरवाले रुद्रदेवके समान प्रतीत होने लगा ।। ८६-८७ ।।
ततस्त्रिभिस्तं त्रिदशाधिपोपमं

शरैर्बिभेदाधिरथिर्धनंजयम् । शरांश्च पञ्च ज्वलितानिवोरगान् प्रवेशयामास जिघांसयाच्युतम् ॥ ८८ ॥ तदनन्तर अधिरथपुत्र कर्णने देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी अर्जुनको तीन बाणोंसे बींध डाला और श्रीकृष्णको मार डालनेकी इच्छासे उनके शरीरमें प्रज्वलित सर्पोंके समान पाँच बाण घुसा दिये ॥ ८८ ॥

ते वर्म भित्त्वा पुरुषोत्तमस्य सुवर्णचित्रा न्यपतन् सुमुक्ताः । वेगेन गामाविविशुः सुवेगाः स्नात्वा च कर्णाभिमुखाः प्रतीयुः ॥ ८९ ॥ अच्छी तरह छोड़े हुए वे सुवर्णजटित वेगशाली बाण पुरुषोत्तम श्रीकृष्णके कवचको विदीर्ण करके बड़े वेगसे धरतीमें समा गये और पातालगांगामें नहाकर पुनः कर्णकी ओर जाने लगे ॥ ८९ ॥

तान् पञ्च भल्लैर्दशभिः सुमुक्तै- स्त्रिधा त्रिधैककमथोच्चकर्त । धनंजयास्त्रैर्न्यपतन् पृथिव्यां महाहयस्तक्षकपुत्रपक्षाः ॥ ९० ॥ वे बाण नहीं, तक्षकपुत्र अश्वसेनके पक्षपाती पाँच विशाल सर्प थे। अर्जुनने सावधानीसे छोड़े गये दस भल्लोंद्वारा उनमेंसे प्रत्येकके तीन-तीन टुकड़े कर डाले। अर्जुनके बाणोंसे मारे जाकर वे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ९० ॥

ततः प्रजज्वाल किरीटमाली क्रोधेन कक्षं प्रदहन्निवाग्निः । तथा विनुन्नाङ्गमवेक्ष्य कृष्णं सर्वैषुभिः कर्णभुजप्रसृष्टैः ॥ ९१ ॥ कर्णके हाथोंसे छूटे हुए उन सभी बाणोंद्वारा श्रीकृष्णके श्रीअंगोंको घायल हुआ देख किरीटधारी अर्जुन सूखे काठ या घास-फूसके ढेरको जलानेवाली आगके समान क्रोधसे प्रज्वलित हो उठे ॥ ९१ ॥

स कर्णमाकर्णविकृष्टैः शरैः शरीरान्तकरैर्ज्वलद्भिः । मर्मस्वविध्यत् स चचाल दुःखाद् दैवादवातिष्ठत धैर्यबुद्धिः ॥ ९२ ॥ उन्होंने कानतक खींचकर छोड़े गये शरीरनाशक प्रज्वलित बाणोंद्वारा कर्णके मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी। कर्ण दुःखसे विचलित हो उठा; परन्तु किसी तरह मनमें

धैर्य धारण करके दैवयोगसे रणभूमिमें डटा रहा ॥ ९२ ॥
ततः शरौघैः प्रदिशो दिशश्च
रवेः प्रभा कर्णरथश्च राजन् ।
अदृश्यमासीत् कुपिते धनंजये
तुषारनीहारवृतं यथा नभः ॥ ९३ ॥
राजन्! तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए अर्जुनने बाणसमूहोंका ऐसा जाल फैलाया कि दिशाएँ, विदिशाएँ, सूर्यकी प्रभा और कर्णका रथ सब कुछ कुहासेसे ढके हुए आकाशकी भाँति अदृश्य हो गया ॥ ९३ ॥
स चक्ररक्षानथ पादरक्षान्
पुरःसरान् पृष्ठगोपांश्च सर्वान् ।
दुर्योधनेनानुमतानरिघ्नः
समुद्यतान् स रथान् सारभूतान् ॥ ९४ ॥
द्विसाहस्रान् समरे सव्यसाची
कुरुप्रवीरानृषभः कुरूणाम् ।
क्षणेन सर्वान् सरथाश्वसूतान्
निनाय राजन् क्षयमेकवीरः ॥ ९५ ॥
नरेश्वर! कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुष अद्वितीय वीर शत्रुनाशक सव्यसाची अर्जुनने कर्णके चक्ररक्षक, पादरक्षक, अग्रगामी और पृष्ठरक्षक सभी कौरवदलके सारभूत प्रमुख वीरोंको, जो दुर्योधनकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले युद्धके लिये सदा उद्यत रहनेवाले थे तथा जिनकी संख्या दो हजार थी, एक ही क्षणमें रथ, घोड़ों और सारथियोंसहित कालके गालमें भेज दिया ॥ ९४-९५ ॥
ततोऽपलायन्त विहाय कर्णं
तवात्मजाः कुरवो येऽवशिष्टाः ।
हतानपाकीर्य शरक्षतांश्च
लालप्यमानांस्तनयान् पितृंश्च ॥ ९६ ॥
तदनन्तर जो मरनेसे बच गये थे, वे आपके पुत्र और कौरव-सैनिक कर्णको छोड़कर तथा मारे गये और बाणोंसे घायल हो सगे-सम्बन्धियोंको पुकारनेवाले अपने पुत्रों एवं पिताओंकी भी उपेक्षा करके वहाँसे भाग गये ॥
(सर्वे प्रणेगुः कुरवो विभिन्नाः
पार्थेषुभिः सम्परिकम्पमानाः ।
सुयोधनेनाथ पुनर्वरिष्ठाः
प्रचोदिताः कर्णरथानुयाने ॥

अर्जुनके बाणोंसे संतप्त और क्षत-विक्षत हो समस्त कौरवयোদ্ধा जब वहाँसे भाग खड़े हुए, तब दुर्योधनने उनमेंसे श्रेष्ठ वीरोंको पुनः कर्णके रथके पीछे जानेके लिये आज्ञा दी।

दुर्योधन उवाच

भो क्षत्रियाः शूरतमास्तु सर्वे
क्षात्रे च धर्मे निरताः स्थ यूयम् ।
न युक्तरूपं भवतां समीपात्
पलायनं कर्णमिह प्रहाय ॥

**दुर्योधन बोला—**क्षत्रियो! तुम सब लोग शूरवीर हो, क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहते हो। यहाँ कर्णको छोड़कर उसके निकटसे भाग जाना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है।

संजय उवाच

तवात्मजेनापि तथोच्यमानाः
पार्थेषुभिः सम्परितप्यमानाः ।
नैवावतिष्ठन्त भयाद् विवर्णाः
क्षणेन नष्टाः प्रदिशो दिशश्च ॥

**संजय कहते हैं—**राजन्! आपके पुत्रके इस प्रकार कहनेपर भी वे योद्धा वहाँ खड़े न हो सके। अर्जुनके बाणोंसे उन्हें बड़ी पीड़ा हो रही थी। भयसे उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी; इसलिये वे क्षणभरमें दिशाओं और उनके कोनोंमें जाकर छिप गये।

स सर्वतः प्रेक्ष्य दिशो विशून्या
भयावदीर्णैः कुरुभिर्विहीनः ।
न विव्यथे भारत तत्र कर्णः
प्रहृष्ट एवार्जुनमभ्यधावत् ॥ ९७ ॥

भारत! भयसे भागे हुए कौरवयোদ্ধाओंसे परित्यक्त हो सम्पूर्ण दिशाओंको सूनी देखकर भी वहाँ कर्ण अपने मनमें तनिक भी व्यथित नहीं हुआ। उसने पूरे हर्ष और उत्साहके साथ ही अर्जुनपर धावा किया ॥ ९७ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णार्जुनद्वैरथे एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्धविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १०२ १/३ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 2351)

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नवतितमोऽध्यायः

अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना

संजय उवाच

ततः प्रयाताः शरपातमात्र-
मवस्थिताः कुरवो भिन्नसेनाः।
विद्युत्प्रकाशं ददृशुः समन्ताद्
धनंजयास्त्रं समुदीर्यमाणम्॥ १॥

**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर भागे हुए कौरव, जिनकी सेना तितर-बितर हो गयी थी, धनुषसे छोड़ा हुआ बाण जहाँतक पहुँचता है, उतनी दूरीपर जाकर खड़े हो गये। वहींसे उन्होंने देखा कि अर्जुनका बड़े वेगसे बढ़ता हुआ अस्त्र चारों ओर बिजलीके समान चमक रहा है॥

तदर्जुनास्त्रं ग्रसति स्म कर्णो
वियद्गतं घोरतरैः शरैस्तत्।
क्रुद्धेन पार्थेन भृशाभिसृष्टं
वधाय कर्णस्य महाविमर्दे॥ २॥

उस महासमरमें अर्जुन कुपित होकर कर्णके वधके लिये जिस-जिस अस्त्रका वेगपूर्वक प्रयोग करते थे, उसे आकाशमें ही कर्ण अपने भयंकर बाणोंद्वारा काट देता था॥

उदीर्यमाणं स्म कुरून् दहन्तं
सुवर्णपुङ्खैर्विशिखैर्ममर्द।
कर्णस्त्वमोघेष्वसनं दृढज्यं
विस्फारयित्वा विसृजञ्छरौघान्॥ ३॥

कर्णका धनुष अमोघ था। उसकी डोरी भी बहुत मजबूत थी। वह अपने धनुषको खींचकर उसके द्वारा बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगा। कौरव-सेनाको दग्ध करनेवाले अर्जुनके छोड़े हुए अस्त्रको उसने सुवर्णमय पंखवाले बाणोंद्वारा धूलमें मिला दिया॥ ३॥

रामादुपात्तेन महामहिम्ना
ह्याथर्वणेनारिविनाशनेन।

तदर्जुनास्त्रं व्यधमद् दहन्तं कर्णस्तु बाणैर्निशितैर्महात्मा ॥ ४ ॥ महामनस्वी वीर कर्णने परशुरामजीसे प्राप्त हुए महाप्रभावशाली शत्रुनाशक आथर्वण अस्त्रका प्रयोग करके पैने बाणोंद्वारा अर्जुनके उस अस्त्रको, जो कौरव-सेनाको दग्ध कर रहा था, नष्ट कर दिया ॥ ४ ॥

ततो विमर्दः सुमहान् बभूव तत्रार्जुनस्याधिरथेश्च राजन् । अन्योन्यमासादयतोः पृषत्कै- र्विषाणघातैर्द्विपयोरिवोग्रैः ॥ ५ ॥ राजन्! जैसे दो हाथी अपने भयंकर दाँतोंसे एक-दूसरेपर चोट करते हैं, उसी प्रकार अर्जुन और कर्ण एक-दूसरेपर बाणोंका प्रहार कर रहे थे। उस समय उन दोनोंमें बड़ा भारी युद्ध होने लगा ॥ ५ ॥

तत्रास्त्रसंघातसमावृतं तदा बभूव राजंस्तुमुलं स्म सर्वतः । तत् कर्णपार्थौ शरवृष्टिसंघै- र्निरन्तरं चक्रतुरम्बरं तदा ॥ ६ ॥ नरेश्वर! उस समय वहाँ अस्त्रसमूहोंसे आच्छादित होकर सारा प्रदेश सब ओरसे भयंकर प्रतीत होने लगा। कर्ण और अर्जुनने अपने बाणोंकी वर्षासे आकाशको ठसाठस भर दिया ॥ ६ ॥

ततो जालं बाणमयं महान्तं सर्वेऽद्राक्षुः कुरवः सोमकाश्च । नान्यं च भूतं ददृशुस्तदा ते बाणान्धकारे तुमुलेऽथ किंचित् ॥ ७ ॥ तदनन्तर समस्त कौरवों और सोमकोंने भी देखा कि वहाँ बाणोंका विशाल जाल फैल गया है। बाणजनित उस भयानक अन्धकारमें उस समय उन्हें दूसरे किसी प्राणीका दर्शन नहीं होता था ॥ ७ ॥

(ततस्तु तौ वै पुरुषप्रवीरौ राजन् वरौ सर्वधनुर्धराणाम् । त्यक्त्वाऽऽत्मदेहौ समरेऽतिघोरे प्राप्तश्रमौ शत्रुदुरासदौ हि ॥ दृष्ट्वा तु तौ संयति सम्प्रयुक्तौ परस्परं छिद्रनिविष्टदृष्टी । देवर्षिगन्धर्वगणाः सयक्षाः

संतुष्टुवुस्तौ पितरश्च हृष्टाः ॥) राजन्! सम्पूर्ण धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ वे दोनों नरवीर उस भयानक समरमें अपने शरीरोंका मोह छोड़कर बड़ा भारी परिश्रम कर रहे थे, वे दोनों ही शत्रुओंके लिये दुर्जय थे। युद्धमें तत्पर होकर एक-दूसरेके छिद्रोंकी ओर दृष्टि रखनेवाले उन दोनों वीरोंको देखकर देवता, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष और पितर सभी हर्षमें भरकर उनकी प्रशंसा करने लगे।

तौ संदधानावनिशं च राजन् समस्यन्तौ चापि शराननेकान् । संदर्शयेतां युधि मार्गान् विचित्रान् धनुर्धरौ तौ विविधै कृतास्त्रैः ॥ ८ ॥ राजन्! निरन्तर अनेकानेक बाणोंका संधान और प्रहार करते हुए वे दोनों धनुर्धर वीर सिद्ध किये हुए विविध अस्त्रोंद्वारा युद्धमें अद्भुत पैंतरे दिखाने लगे ॥ ८ ॥

तयोरेवं युध्यतोराजिमध्ये सूतात्मजोऽभूदधिकः कदाचित् । पार्थः कदाचित् त्वधिकः किरीटी वीर्यास्त्रमायाबलपौरुषेण ॥ ९ ॥ इस प्रकार संग्रामभूमिमें जूझते समय उन दोनों वीरोंमें पराक्रम, अस्त्रसंचालन, मायाबल तथा पुरुषार्थकी दृष्टिसे कभी सूतपुत्र कर्ण बढ़ जाता था और कभी किरीटधारी अर्जुन ॥ ९ ॥

दृष्ट्वा तयोस्तं युधि सम्प्रहारं परस्परस्यान्तरमीक्षमाणयोः । घोरं तयोर्दुविषहं रणेऽन्यै- र्योधाः सर्वे विस्मयमभ्यगच्छन् ॥ १० ॥ युद्धस्थलमें एक-दूसरेपर प्रहार करनेका अवसर देखते हुए उन दोनों वीरोंका दूसरोंके लिये दुःसह वह घोर आघात-प्रत्याघात देखकर रणभूमिमें खड़े हुए समस्त योद्धा आश्चर्यसे चकित हो उठे ॥ १० ॥

ततो भूतान्यन्तरिक्षस्थितानि तौ कर्णपार्थौ प्रशशंसुरिन्द्र । भोः कर्ण साध्वर्जुन साधु चेति वियत्सु वाणी श्रूयते सर्वतोऽपि ॥ ११ ॥ नरेन्द्र! उस समय आकाशमें स्थित हुए प्राणी कर्ण और अर्जुन दोनोंकी प्रशंसा करने लगे। 'वाह रे कर्ण!' 'शाबाश अर्जुन!' यही बात अन्तरिक्षमें सब ओर सुनायी देने लगी ॥ ११ ॥

तस्मिन् विमर्दे रथवाजिनागै-

स्तदाभिघातैर्दलिते हि भूतले । ततस्तु पातालतले शयानो नागोऽश्वसेनः कृतवैरोऽर्जुनेन ॥ १२ ॥ राजंस्तदा खाण्डवदाहमुक्तो विवेश कोपाद् वसुधातले यः । अथोत्पपातोर्ध्वगतिर्जवेन संदृश्य कर्णार्जुनयोर्विमर्दम् ॥ १३ ॥ राजन्! उस समय घमासान युद्धमें जब रथ, घोड़े और हाथियोंद्वारा सारा भूतल रौंदा जा रहा था, उस समय पातालनिवासी अश्वसेन नामक नाग, जिसने अर्जुनके साथ वैर बाँध रखा था और जो खाण्डवदाहके समय जीवित बचकर क्रोधपूर्वक इस पृथ्वीके भीतर घुस गया था; कर्ण तथा अर्जुनका वह संग्राम देखकर बड़े वेगसे ऊपरको उछला और उस युद्धस्थलमें आ पहुँचा; उसमें ऊपरको उड़नेकी भी शक्ति थी ॥ १२-१३ ॥

अयं हि कालोऽस्य दुरात्मनो वै पार्थस्य वैरप्रतियातनाय । संचिन्त्य तूणं प्रविवेश चैव कर्णस्य राजन् शररूपधारी ॥ १४ ॥ नरेश्वर! वह यह सोचकर कि 'दुरात्मा अर्जुनके वैरका बदला लेनेके लिये यही सबसे अच्छा अवसर है' बाणका रूप धारण करके कर्णके तरकसमें घुस गया ॥

ततोऽस्त्रसंघातसमाकुलं तदा बभूव जन्यं विततांशुजालम् । तत् कर्णपार्थौ शरसंघवृष्टिभि- र्निरन्तरं चक्रतुरम्बरं तदा ॥ १५ ॥ तदनन्तर अस्त्रसमूहोंके प्रहारसे भरा हुआ वह युद्धस्थल ऐसा प्रतीत होने लगा, मानो वहाँ किरणोंका जाल बिछ गया हो। कर्ण और अर्जुनने अपने बाणसमूहोंकी वर्षासे आकाशमें तिलभर भी अवकाश नहीं रहने दिया ॥

तद् बाणजालैकमयं महान्तं सर्वेऽत्रसन् कुरवः सोमकाश्च । नान्यत् किंचिद् ददृशुः सम्पतद् वै बाणान्धकारे तुमुलेऽतिमात्रम् ॥ १६ ॥ वहाँ बाणोंका एक महाजाल-सा बना हुआ देखकर कौरव और सोमक सभी भयसे थर्रा उठे। उस अत्यन्त घोर बाणान्धकारमें उन्हें दूसरा कुछ भी गिरता नहीं दिखायी देता था ॥ १६ ॥

ततस्तौ पुरुषव्याघ्रौ सर्वलोकधनुर्धरौ ।

त्यक्तप्राणौ रणे वीरौ युद्धश्रममुपागतौ । समुत्क्षेपैर्वीज्यमानौ सिक्तौ चन्दनवारिणा ॥ १७ ॥ सवालव्यजनैर्दिव्यैर्दिविस्थैरप्सरोगणैः । शक्रसूर्यकराब्जाभ्यां प्रमार्जितमुखावुभौ ॥ १८ ॥ तदनन्तर सम्पूर्ण विश्वके विख्यात धनुर्धर वीर पुरुषसिंह कर्ण और अर्जुन प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध करते-करते थक गये। उस समय आकाशमें खड़ी हुई अप्सराओंने दिव्य चँवर डुलाकर उन दोनोंको चन्दनके जलसे सींचा। फिर इन्द्र और सूर्यने अपने कर-कमलोंसे उनके मुँह पोंछे ॥

कर्णोऽथ पार्थं न विशेषयद् यदा भृशं च पार्थेन शराभितप्तः । ततस्तु वीरः शरविक्षताङ्गो दध्रे मनो ह्योकशयस्य तस्य ॥ १९ ॥ जब किसी तरह कर्ण युद्धमें अर्जुनसे बढ़कर पराक्रम न दिखा सका और अर्जुनने अपने बाणोंकी मारसे उसे अत्यन्त संतप्त कर दिया, तब बाणोंके आघातसे सारा शरीर क्षत-विक्षत हो जानेके कारण वीर कर्णने उस सर्पमुख बाणके प्रहारका विचार किया ॥ १९ ॥

ततो रिपुघ्नं समधत्त कर्णः सुसंचितं सर्पमुखं ज्वलन्तम् । रौद्रं शरं संनतमुग्रधौतं पार्थार्थमत्यर्थचिराभिगुप्तम् ॥ २० ॥ सदार्चितं चन्दनचूर्णशायितं सुवर्णतूणीरशयं महार्चिषम् । आकर्णपूर्णं च विकृष्य कर्णः पार्थोन्मुखः संदधे चोत्तमौजाः ॥ २१ ॥ उत्तम बलशाली कर्णने अर्जुनको मारनेके लिये ही जिसे सुदीर्घकालसे सुरक्षित रख छोड़ा था, सोनेके तरकसमें चन्दनके चूर्णके अंदर जिसे रखता था और सदा जिसकी पूजा करता था, उस शत्रुनाशक, झुकी हुई गाँठवाले, स्वच्छ, महातेजस्वी, सुसंचित, प्रज्वलित एवं भयानक सर्पमुख बाणको उसने धनुषपर रखा और कानतक खींचकर अर्जुनकी ओर संधान किया ॥

प्रदीप्तमैरावतवंशसम्भवं शिरो जिहीर्षुर्युधि सव्यसाचिनः । ततः प्रजज्वाल दिशो नभश्च उल्काश्च घोराः शतशः प्रपेतुः ॥ २२ ॥

कर्ण युद्धमें सव्यसाची अर्जुनका मस्तक काट लेना चाहता था। उसका चलाया हुआ वह प्रज्वलित बाण ऐरावतकुलमें उत्पन्न अश्वसेन ही था। उस बाणके छूटते ही सम्पूर्ण दिशाओंसहित आकाश जाज्वल्यमान हो उठा। सैकड़ों भयंकर उल्काएँ गिरने लगीं ॥ २२ ॥

तस्मिंस्तु नागे धनुषि प्रयुक्ते हाहाकृता लोकपालाः सशक्राः । न चापि तं बुबुधे सूतपुत्रो बाणे प्रविष्टं योगबलेन नागम् ॥ २३ ॥

धनुषपर उस नागका प्रयोग होते ही इन्द्रसहित सम्पूर्ण लोकपाल हाहाकार कर उठे। सूतपुत्रको भी यह मालूम नहीं था कि मेरे इस बाणमें योगबलसे नाग घुसा बैठा है ॥ २३ ॥

दशशतनयनोऽहिं दृश्य बाणे प्रविष्टं निहत इति सुतो मे स्रस्तगात्रो बभूव । जलजकुसुमयोनिः श्रेष्ठभावो जितात्मा त्रिदशपतिमवोचन्मा व्यथिष्ठा जये श्रीः ॥ २४ ॥

सहस्रनेत्रधारी इन्द्र उस बाणमें सर्पको घुसा हुआ देख यह सोचकर शिथिल हो गये कि 'अब तो मेरा पुत्र मारा गया।' तब मनको वशमें रखनेवाले श्रेष्ठस्वभाव कमलयोनि ब्रह्माजीने उन देवराज इन्द्रसे कहा—'देवेश्वर! दुःखी न होओ। विजयश्री अर्जुनको ही प्राप्त होगी' ॥ २४ ॥

ततोऽब्रवीन्मद्रराजो महात्मा दृष्ट्वा कर्णं प्रहितेषुं तमुग्रम् । न कर्ण ग्रीवामिषुरेष लप्स्यते समीक्ष्य संधत्स्व शरं शिरोध्रम् ॥ २५ ॥

उस समय महामनस्वी मद्रराज शल्यने कर्णको उस भयंकर बाणका प्रहार करनेके लिये उद्यत देख उससे कहा—'कर्ण! तुम्हारा यह बाण शत्रुके कण्ठमें नहीं लगेगा; अतः सोच-विचारकर फिरसे बाणका संधान करो, जिससे वह मस्तक काट सके' ॥ २५ ॥

अथाब्रवीत् क्रोधसंरक्तनेत्रो मद्राधिपं सूतपुत्रस्तरस्वी । न संधत्ते द्विः शरं शल्य कर्णो न मादृशा जिह्मयुद्धा भवन्ति ॥ २६ ॥

यह सुनकर वेगशाली सूतपुत्र कर्णके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उसने मद्रराजसे कहा—'कर्ण दो बार बाणका संधान नहीं करता। मेरे-जैसे वीर कपटपूर्वक युद्ध नहीं करते हैं' ॥ २६ ॥

इतीदमुक्त्वा विससर्ज तं शरं

प्रयत्नतो वर्षगणाभिपूजितम् ।
हतोऽसि वै फाल्गुन इत्यधिक्षिप-
न्नुवाच चोच्चैर्गिरमूर्जितां वृषः ॥ २७ ॥

ऐसा कहकर कर्णने जिसकी वर्षोंसे पूजा की थी, उस बाणको प्रयत्नपूर्वक शत्रुको ओर छोड़ दिया और आक्षेप करते हुए उच्च स्वरसे कहा ‘अर्जुन! अब तू निश्चय ही मारा गया’ ॥ २७ ॥
स सायकः कर्णभुजप्रसृष्टो
हुताशनार्कप्रतिमः सुघोरः ।
गुणच्युतः कर्णधनुःप्रमुक्तो
वियद्गतः प्राज्वलदन्तरिक्षे ॥ २८ ॥

अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी वह अत्यन्त भयंकर बाण कर्णकी भुजाओंसे प्रेरित हो उसके धनुष और प्रत्यंचासे छूटकर आकाशमें जाते ही प्रज्वलित हो उठा ॥
तं प्रेक्ष्य दीप्तं युधि माधवस्तु
त्वरान्वितं सत्वरयैव लीलया ।
पदा विनिष्पिष्य रथोत्तमं स
प्रावेशयत् पृथिवीं किंचिदेव ॥ २९ ॥
क्षितिं गता जानुभिस्तेऽथ वाहा
हेमच्छन्नाश्चन्द्रमरीचिवर्णाः ।
ततोऽन्तरिक्षे सुमहान् निनादः
सम्पूजनार्थं मधुसूदनस्य ॥ ३० ॥
दिव्याश्च वाचः सहसा बभूवु-
र्दिव्यानि पुष्पाण्यथ सिंहनादाः ।
तस्मिंस्तथा वै धरणीं निमग्ने
रथे प्रयत्नान्मधुसूदनस्य ॥ ३१ ॥

उस प्रज्वलित बाणको बड़े वेगसे आते देख भगवान् श्रीकृष्णने युद्धस्थलमें खेल-सा करते हुए अपने उत्तम रथको तुरंत ही पैरसे दबाकर उसके पहियोंका कुछ भाग पृथ्वीमें धँसा दिया। साथ ही सोनेके साज-बाजसे ढके हुए चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेतवर्णवाले उनके घोड़े भी धरतीपर घुटने टेककर झुक गये। उस समय आकाशमें सब ओर महान् कोलाहल गूँज उठा। भगवान् मधुसूदनकी स्तुति-प्रशंसाके लिये कहे गये दिव्य वचन सहसा सुनायी देने लगे। श्रीमधुसूदनके प्रयत्नसे उस रथके धरतीमें धँस जानेपर भगवान्‌के ऊपर दिव्यपुष्पोंकी वर्षा होने लगी और दिव्य सिंहनाद भी प्रकट होने लगे ॥ २९–३१ ॥
ततः शरः सोऽभ्यहनत् किरीटं
तस्येन्द्रदत्तं सुदृढं च धीमतः ।

अथार्जुनस्योत्तमगात्रभूषणं धरावियद्द्योसलिलेषु विश्रुतम् ॥ ३२ ॥ बुद्धिमान् अर्जुनके मस्तकको विभूषित करनेवाला किरीट भूतल, अन्तरिक्ष, स्वर्ग और वरुणलोकमें भी विख्यात था। वह मुकुट उन्हें इन्द्रने प्रदान किया था। कर्णका चलाया हुआ वह सर्पमुख बाण रथ नीचा हो जानेके कारण अर्जुनके उसी किरीटमें जा लगा ॥ ३२ ॥

व्यालास्त्रसर्गोत्तमयत्नमन्युभिः शरेण मूर्ध्नः प्रजहार सूतजः । दिवाकरेन्दुज्वलनप्रभत्विषं सुवर्णमुक्तामणिवज्रभूषितम् ॥ ३३ ॥ सूतपुत्र कर्णने सर्पमुख बाणके निर्माणकी सफलता, उत्तम प्रयत्न और क्रोध—इन सबके सहयोगसे जिस बाणका प्रयोग किया था, उसके द्वारा अर्जुनके मस्तकसे उस किरीटको नीचे गिरा दिया, जो सूर्य, चन्द्रमा और अग्निके समान कान्तिमान् तथा सुवर्ण, मुक्ता, मणि एवं हीरोंसे विभूषित था ॥ ३३ ॥

पुरन्दरार्थं तपसा प्रयत्नतः स्वयं कृतं यद् विभुना स्वयम्भुवा । महार्हरूपं द्विषतां भयंकरं बिभर्तुरत्यर्थसुखं सुगन्धिनम् ॥ ३४ ॥ जिघांसते देवरिपून् सुरेश्वरः स्वयं ददौ यत् सुमनाः किरीटिने । हराम्बुपाखण्डलवित्तगोप्तृभिः पिनाकपाशाशनिसाएकोत्तमैः ॥ ३५ ॥ सुरोत्तमैरप्यविषह्यमर्दितुं प्रसह्य नागेन जहार तद् वृषः । स दुष्टभावो वितथप्रतिज्ञः किरीटमत्यद्भुतमर्जुनस्य ॥ ३६ ॥ नागो महार्हं तपनीयचित्रं पार्थोत्तमाङ्गात् प्रहरत् तरस्वी ।