महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
यह सुनकर महादेवजी ठठाकर हँस पड़े और उन आसक्तिसे मोहित हुए मुनिसे बोले—‘विप्रवर! मुझे तो यह देखकर विस्मय नहीं हो रहा है। मेरी ओर देखो’॥
एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं महादेवेन धीमता ॥ ४७ ॥
अङ्गुल्यग्रेण राजेन्द्र स्वऽङ्गुष्ठस्ताडितोऽभवत् ।
ततो भस्म क्षताद् राजन् निर्गतं हिमसंनिभम् ॥ ४८ ॥
राजेन्द्र! मुनिश्रेष्ठ मंकणकसे ऐसा कहकर बुद्धिमान् महादेवजीने अपनी अंगुलिके अग्रभागसे अँगूठेमें घाव कर दिया। उस घावसे बर्फके समान सफेद भस्म झड़ने लगा॥ ४७-४८॥
तद् दृष्ट्वा व्रीडितो राजन् स मुनिः पादयोर्गतः ।
मेने देवं महादेवमिदं चोवाच विस्मितः ॥ ४९ ॥
राजन्! यह देखकर मुनि लजा गये और महादेवजीके चरणोंमें गिर पड़े। उन्होंने महादेवजीको पहचान लिया और विस्मित होकर कहा— ॥ ४९ ॥
नान्यं देवाद्दहं मन्ये रुद्रात् परतरं महत् ।
सुरासुरस्य जगतो गतिस्त्वमसि शूलधृत् ॥ ५० ॥
‘भगवन्! मैं रुद्रदेवके सिवा दूसरे किसी देवताको परम महान् नहीं मानता। आप ही देवताओं तथा असुरोंसहित सम्पूर्ण जगत्के आश्रयभूत त्रिशूलधारी महादेव हैं॥ ५० ॥
त्वया सृष्टमिदं विश्वं वदन्तीह मनीषिणः ।
त्वामेव सर्वं व्रजति पुनरेव युगक्षये ॥ ५१ ॥
‘मनीषी पुरुष कहते हैं कि आपने ही इस सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि की है। प्रलयके समय यह सारा जगत् आपमें ही विलीन हो जाता है॥ ५१॥
देवैरपि न शक्यस्त्वं परिज्ञातुं कुतो मया ।
त्वयि सर्वे स्म दृश्यन्ते भावा ये जगति स्थिताः ॥ ५२ ॥
‘सम्पूर्ण देवता भी आपको यथार्थरूपसे नहीं जान सकते, फिर मैं कैसे जान सकूँगा? संसारमें जो-जो पदार्थ स्थित हैं, वे सब आपमें देखे जाते हैं॥ ५२॥
त्वामुपासन्त वरदं देवा ब्रह्मादयोऽनघ ।
सर्वस्त्वमसि देवानां कर्ता कारयिता च ह ॥ ५३ ॥
त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे मोदन्तीहाकुतोभयाः ।
‘अनघ! ब्रह्मा आदि देवता आप वरदायक प्रभुकी ही उपासना करते हैं। आप सर्वस्वरूप हैं। देवताओंके कर्ता और कारयिता भी आप ही हैं। आपके प्रसादसे ही सम्पूर्ण देवता यहाँ निर्भय हो आनन्दका अनुभव करते हैं॥ ५३ ½ ॥
(त्वं प्रभुः परमैश्वर्यादधिकं भासि शङ्कर ।
त्वयि ब्रह्मा च शक्रश्च लोकान् संधार्य तिष्ठतः ॥
'शंकर! आप सबके प्रभु हैं। अपने उत्कृष्ट ऐश्वर्यसे आपकी अधिक शोभा हो रही है। ब्रह्मा और इन्द्र सम्पूर्ण लोकोंको धारण करके आपमें ही स्थित हैं।
त्वन्मूलं च जगत् सर्वं त्वदन्तं हि महेश्वर ।
त्वया हि वितता लोकाः सप्तेमे सर्वसम्भव ॥
'महेश्वर! सम्पूर्ण जगत्के मूलकारण आप ही हैं। इसका अन्त भी आपमें ही होता है। सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत परमेश्वर! ये सातों लोक आपसे ही उत्पन्न होकर ब्रह्माण्डमें फैले हुए हैं।
सर्वथा सर्वभूतेश त्वामेवार्चन्ति देवताः ।
त्वन्मयं हि जगत् सर्वं भूतं स्थावरजङ्गमम् ॥
'सर्वभूतेश्वर! देवता सब प्रकारसे आपकी ही पूजा-अर्चा करते हैं। सम्पूर्ण विश्व तथा चराचर भूतोंके उपादान कारण भी आप ही हैं।
स्वर्गं च परमं स्थानं नृणामभ्युदयार्थिनाम् ।
ददासि कर्मिणां कर्म भावयन् ध्यानयोगतः ॥
'आप ही अभ्युदयकी इच्छा रखनेवाले सत्कर्मपरायण मनुष्योंको ध्यानयोगसे उनके कर्मोंका विचार करके उत्तम पद—स्वर्गलोक प्रदान करते हैं।
न वृथास्ति महादेव प्रसादस्ते महेश्वर ।
यस्मात् त्वयोपकरणात् करोमि कमलेक्षण ॥
प्रपद्ये शरणं शम्भुं सर्वदा सर्वतः स्थितम् ।)
'महादेव! महेश्वर! कमलनयन! आपका कृपाप्रसाद कभी व्यर्थ नहीं होता! आपकी दी हुई सामग्रीसे ही मैं कार्य कर पाता हूँ, अतः सर्वदा सब ओर स्थित हुए सर्वव्यापी आप भगवान् शंकरकी मैं शरणमें आता हूँ।'
एवं स्तुत्वा महादेवं स ऋषिः प्रणतोऽभवत् ॥ ५४ ॥
यदिदं चापलं देव कृतमेतत् स्मयादिकम् ।
ततः प्रसादयामि त्वां तपो मे न क्षरेदिति ॥ ५५ ॥
इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके वे महर्षि नतमस्तक हो गये और इस प्रकार बोले—'देव! मैंने जो यह अहंकार आदि प्रकट करनेकी चपलता की है, उसके लिये क्षमा माँगते हुए आपसे प्रसन्न होनेकी मैं प्रार्थना करता हूँ। मेरी तपस्या नष्ट न हो' ॥ ५४-५५ ॥
ततो देवः प्रीतमनास्तमृषिं पुनरब्रवीत् ।
तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात् सहस्रधा ॥ ५६ ॥
आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सार्धमहं सदा ।
सप्तसारस्वते चास्मिन् यो मामर्चिष्यते नरः ॥ ५७ ॥
न तस्य दुर्लभं किञ्चिद् भवितेह परत्र वा ।
सारस्वतं च ते लोकं गमिष्यन्ति न संशयः ॥ ५८ ॥
यह सुनकर महादेवजीका मन प्रसन्न हो गया। वे उन महर्षिसे पुनः बोले—'विप्रवर! मेरे प्रसादसे तुम्हारी तपस्या सहस्रगुनी बढ़ जाय। मैं इस आश्रममें सदा तुम्हारे साथ निवास करूँगा। जो इस सप्तसारस्वततीर्थमें मेरी पूजा करेगा, उसके लिये इहलोक या परलोकमें कुछ भी दुर्लभ न होगा। वे सारस्वत लोकमें जायँगे—इसमें संशय नहीं है' ।। ५६—५८ ।।
एतन्मङ्कणकस्यापि चरितं भूरितेजसः ।
स हि पुत्रः सुकन्यायामुत्पन्नो मातरिश्वना ।। ५९ ।।
यह महातेजस्वी मंकणक मुनिका चरित्र बताया गया है। वे वायुके औरस पुत्र थे। वायुदेवताने सुकन्याके गर्भसे उन्हें उत्पन्न किया था ।। ५९ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां
सारस्वतोपाख्यानेऽष्टात्रिंशोऽध्यायः ।। ३८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३८ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ६४ १/३ श्लोक हैं।)
* इन्हीं ऋषियोंकी तपस्यासे कल्पान्तरमें दितिके गर्भसे उनचास मरुद्गणोंका आविर्भाव हुआ। ये ही दितिके उदरमें एक गर्भके रूपमें प्रकट हुए, फिर इन्द्रके वज्रसे कटकर उनचास अमर शरीरोंके रूपमें उत्पन्न हुए—ऐसा समझना चाहिये।
औशनस एवं कपालमोचनतीर्थकी माहात्म्यकथा तथा रुषंगुके आश्रम पृथूदकतीर्थकी महिमा
एकोनचत्वारिंशाेऽध्यायः
औशनस एवं कपालमोचनतीर्थकी माहात्म्यकथा तथा रुषंगुके आश्रम पृथूदकतीर्थकी महिमा
वैशम्पायन उवाच
उषित्वा तत्र रामस्तु सम्पूज्याश्रमवासिनः ।
तथा मङ्कणके प्रीतिं शुभां चक्रे हलायुधः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! उस सप्तसारस्वत-तीर्थमें रहकर हलधर बलरामजीने आश्रमवासी ऋषियोंका पूजन किया और मंकणक मुनिपर अपनी उत्तम प्रीतिका परिचय दिया ॥ १ ॥
दत्त्वा दानं द्विजातिभ्यो रजनीं तामुपोष्य च ।
पूजितो मुनिसङ्घैश्च प्रातरुत्थाय लाङ्गली ॥ २ ॥
अनुज्ञाप्य मुनीन् सर्वान् स्पृष्ट्वा तोयं च भारत ।
प्रययौ त्वरितो रामस्तीर्थहेतोर्महाबलः ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! वहाँ ब्राह्मणोंको दान दे उस रात्रिमें निवास करनेके पश्चात् प्रातःकाल उठकर मुनिमण्डलीसे सम्मानित हो महाबली लांगलधारी बलरामने पुनः तीर्थके जलमें स्नान किया और सम्पूर्ण ऋषि-मुनियोंकी आज्ञा ले अन्य तीर्थोंमें जानेके लिये वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कर दिया ॥ २-३ ॥
ततस्त्वौशनसं तीर्थमाजगाम हलायुधः ।
कपालमोचनं नाम यत्र मुक्तो महामुनिः ॥ ४ ॥
महता शिरसा राजन् ग्रस्तजङ्घो महोदरः ।
राक्षसस्य महाराज रामक्षिप्तस्य वै पुरा ॥ ५ ॥
तदनन्तर हलधारी बलराम औशनसतीर्थमें आये, जिसका दूसरा नाम कपालमोचनतीर्थ भी है। महाराज! पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामने एक राक्षसको मारकर उसे दूर फेंक दिया था। उसका विशाल सिर महामुनि महोदरकी जाँघमें चिपक गया था। वे महामुनि इस तीर्थमें स्नान करनेपर उस कपालसे मुक्त हुए थे ॥ ४-५ ॥
तत्र पूर्वं तपस्तप्तं काव्येन सुमहात्मना ।
यत्रास्य नीतिरखिला प्रादुर्भूता महात्मनः ॥ ६ ॥
महात्मा शुक्राचार्यने वहीं पहले तप किया था, जिससे उनके हृदयमें सम्पूर्ण नीति-विद्या स्फुरित हुई थी ॥ ६ ॥
यत्रस्थश्चिन्तयामास दैत्यदानवविग्रहम् ।
तत् प्राप्य च बलो राजंस्तीर्थप्रवरमुत्तमम् ॥ ७ ॥ विधिवद् वै ददौ वित्तं ब्राह्मणानां महात्मनाम् । वहीं रहकर उन्होंने दैत्यों अथवा दानवोंके युद्धके विषयमें विचार किया था। राजन्! उस श्रेष्ठ तीर्थमें पहुँचकर बलरामजीने महात्मा ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक धनका दान दिया था॥ ७ १/२ ॥
जनमेजय उवाच
कपालमोचनं ब्रह्मन् कथं यत्र महामुनिः ॥ ८ ॥ मुक्तः कथं चास्य शिरो लग्नं केन च हेतुना । जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! उस तीर्थका नाम कपालमोचन कैसे हुआ, जहाँ महामुनि महोदरको छुटकारा मिला था? उनकी जाँघमें वह सिर कैसे और किस कारणसे चिपक गया था? ॥ ८ १/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
पुरा वै दण्डकारण्ये राघवेण महात्मना ॥ ९ ॥ वसता राजशार्दूल राक्षसान् शमयिष्यता । जनस्थाने शिरश्छिन्नं राक्षसस्य दुरात्मनः ॥ १० ॥ क्षुरेण शितधारेण उत्पपात महावने । महोदरस्य तल्लग्नं जंघायां वै यदृच्छया ॥ ११ ॥ वने विचरतो राजन्नस्थि भित्त्वास्फुरत् तदा । वैशम्पायनजीने कहा—नृपश्रेष्ठ! पूर्वकालकी बात है, रघुकुलतिलक महात्मा श्रीरामचन्द्रजीने दण्डकारण्यमें रहते समय जब राक्षसोंके संहारका विचार किया, तब तीखी धारवाले धुरसे जनस्थानमें उस दुरात्मा राक्षसका मस्तक काट दिया। वह कटा हुआ मस्तक उस महान् वनमें ऊपरको उछला और दैवयोगसे वनमें विचरते हुए महोदर मुनिकी जाँघमें जा लगा। नरेश्वर! उस समय उनकी हड्डी छेदकर वह भीतरतक घुस गया॥ ९—११ १/२ ॥
स तेन लग्नेन तदा द्विजातिर्न शशाक ह ॥ १२ ॥ अभिगन्तुं महाप्राज्ञस्तीर्थान्यायतनानि च । उस मस्तकके चिपक जानेसे वे महाबुद्धिमान् ब्राह्मण किसी तीर्थ या देवालयमें सुगमतापूर्वक आ-जा नहीं सकते थे॥ १२ १/२ ॥
स पूतिना विस्रवता वेदनार्तो महामुनिः ॥ १३ ॥ जगाम सर्वतीर्थानि पृथिव्यां चेति नः श्रुतम् । उस मस्तकसे दुर्गन्धयुक्त पीब बहती रहती थी और महामुनि महोदर वेदनासे पीड़ित हो गये थे। हमने सुना है कि मुनिने किसी तरह भूमण्डलके सभी तीर्थोंकी यात्रा की॥
स गत्वा सरितः सर्वाः समुद्रांश्च महातपाः ॥ १४ ॥
कथयामास तत् सर्वमृषीणां भावितात्मनाम् । आप्लुत्य सर्वतीर्थेषु न च मोक्षमवाप्तवान् ॥ १५ ॥ उन महातपस्वी महर्षिने सम्पूर्ण सरिताओं और समुद्रोंकी यात्रा करके वहाँ रहनेवाले पवित्रात्मा मुनियोंसे वह सब वृत्तान्त कह सुनाया। सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करके भी वे उस कपालसे छुटकारा न पा सके ॥ १४-१५ ॥
स तु शुश्राव विप्रेन्द्र मुनीनां वचनं महत् । सरस्वत्यास्तीर्थवरं ख्यातमौशनसं तदा ॥ १६ ॥ सर्वपापप्रशमनं सिद्धिक्षेत्रमनुत्तमम् । विप्रवर! उन्होंने मुनियोंके मुखसे यह महत्त्वपूर्ण बात सुनी कि 'सरस्वतीका श्रेष्ठ तीर्थ जो औशनस नामसे विख्यात है, सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला तथा परम उत्तम सिद्धिक्षेत्र है' ॥ १६ १/२ ॥
स तु गत्वा ततस्तत्र तीर्थमौशनसं द्विजः ॥ १७ ॥ तत औशनसे तीर्थे तस्योपस्पृशतस्तदा । तच्छिरश्चरणं मुक्त्वा पपातान्तर्जले तदा ॥ १८ ॥ तदनन्तर वे ब्रह्मर्षि वहाँ औशनसतीर्थमें गये और उसके जलसे आचमन एवं स्नान किया। उसी समय वह कपाल उनके चरण (जाँघ)-को छोड़कर पानीके भीतर गिर पड़ा ॥ १७-१८ ॥
विमुक्तस्तेन शिरसा परं सुखमवाप ह । स चाप्यन्तर्जले मूर्धा जगामादर्शनं विभो ॥ १९ ॥ प्रभो! उस मस्तक या कपालसे मुक्त होनेपर महोदर मुनिको बड़ा सुख मिला। साथ ही वह मस्तक भी (जो उनकी जाँघसे छूटकर गिरा था) पानीके भीतर अदृश्य हो गया ॥ १९ ॥
ततः स विशिरा राजन् पूतात्मा वीतकल्मषः । आजगामाश्रमं प्रीतः कृतकृत्यो महोदरः ॥ २० ॥ राजन्! उस कपालसे मुक्त हो निष्पाप एवं पवित्र अन्तःकरणवाले महोदर मुनि कृतकृत्य हो प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रमपर लौट आये ॥ २० ॥
सोऽथ गत्वाऽऽश्रमं पुण्यं विप्रमुक्तो महातपाः । कथयामास तत् सर्वमृषीणां भावितात्मनाम् ॥ २१ ॥ संकटसे मुक्त हुए उन महातपस्वी मुनिने अपने पवित्र आश्रमपर जाकर वहाँ रहनेवाले पवित्रात्मा ऋषियोंसे अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ २१ ॥
ते श्रुत्वा वचनं तस्य ततस्तीर्थस्य मानद । कपालमोचनमिति नाम चक्रुः समागताः ॥ २२ ॥
मानद! तदनन्तर वहाँ आये हुए महर्षियोंने महोदर मुनिकी बात सुनकर उस तीर्थका नाम कपालमोचन रख दिया ॥ २२ ॥ स चापि तीर्थप्रवरं पुनर्गत्वा महानृषिः । पीत्वा पयः सुविपुलं सिद्धिमायात् तदा मुनिः ॥ २३ ॥ इसके बाद महर्षि महोदर पुनः उस श्रेष्ठ तीर्थमें गये और वहाँका प्रचुर जल पीकर उत्तम सिद्धिको प्राप्त हुए ॥ २३ ॥ तत्र दत्त्वा बहून् दायान् विप्रान् सम्पूज्य माधवः । जगाम वृष्णिप्रवरो रुषङ्गोराश्रमं तदा ॥ २४ ॥ वृष्णिवंशावतंस बलरामजीने वहाँ ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें बहुत धनका दान किया। इसके बाद वे रुषंगु मुनिके आश्रमपर गये ॥ २४ ॥ यत्र तप्तं तपो घोरमार्ष्टिषेणेन भारत । ब्राह्मण्यं लब्धवांस्तत्र विश्वामित्रो महामुनिः ॥ २५ ॥ भरतनन्दन! वहीं आर्ष्टिषेतो मुनिने घोर तपस्या की थी और वहीं महामुनि विश्वामित्रने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था ॥ २५ ॥ सर्वकामसमृद्धं च तदाश्रमपदं महत् । मुनिभिर्ब्राह्मणैश्चैव सेवितं सर्वदा विभो ॥ २६ ॥ प्रभो! वह महान् आश्रम सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुओंसे सम्पन्न है। वहाँ बहुत-से मुनि और ब्राह्मण सदा निवास करते हैं ॥ २६ ॥ ततो हलधरः श्रीमान् ब्राह्मणैः परिवारितः । जगाम तत्र राजेन्द्र रुषङ्गुस्तनुमत्यजत् ॥ २७ ॥ राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रीमान् हलधर ब्राह्मणोंसे घिरकर उस स्थानपर गये, जहाँ रुषंगुने अपना शरीर छोड़ा था ॥ २७ ॥ रुषङ्गुर्ब्राह्मणो वृद्धस्तपोनित्यश्च भारत । देहन्यासे कृतमना विचिन्त्य बहुधा तदा ॥ २८ ॥ ततः सर्वानुपादाय तनयान् वै महातपाः । रुषङ्गुरब्रवीत् तत्र नयध्वं मां पृथूदकम् ॥ २९ ॥ भारत! बूढ़े ब्राह्मण रुषंगु सदा तपस्यामें संलग्न रहते थे। एक समय उन महातपस्वी रुषंगु मुनिने शरीर त्याग देनेका विचार करके बहुत कुछ सोचकर अपने सभी पुत्रोंको बुलाया और उनसे कहा—'मुझे पृथूदक तीर्थमें ले चलो' ॥ २८-२९ ॥ विज्ञायातीतवयसं रुषङ्गुं ते तपोधनाः । तं च तीर्थमुपानिन्युः सरस्वत्यास्तपोधनम् ॥ ३० ॥ उन तपस्वी पुत्रोंने तपोधन रुषंगुको अत्यन्त वृद्ध जानकर उन्हें सरस्वतीके उस उत्तम तीर्थमें पहुँचा दिया ॥ ३० ॥
स तैः पुत्रैस्तदा धीमानानीतो वै सरस्वतीम् । पुण्यां तीर्थशतोपेतां विप्रसङ्घैर्निषेविताम् ॥ ३१ ॥ स तत्र विधिना राजन्नाप्लुत्य सुमहातपाः । ज्ञात्वा तीर्थगुणांश्चैव प्राहैदमृषिसत्तमः ॥ ३२ ॥ सुप्रीतः पुरुषव्याघ्र सर्वान् पुत्रानुपासतः । राजन्! नरव्याघ्र! वे पुत्र जब उन बुद्धिमान् मुनिको ब्राह्मणसमूहोंसे सेवित तथा सैकड़ों तीर्थोंसे सुशोभित पुण्यसलिला सरस्वतीके तटपर ले आये, तब वे महातपस्वी महर्षि वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके तीर्थके गुणोंको जानकर अपने पास बैठे हुए सभी पुत्रोंसे प्रसन्नतापूर्वक बोले— ॥ सरस्वत्युत्तरे तीरे यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् ॥ ३३ ॥ पृथूदके जप्यपरो नैनं श्वोमरणं तपेत् । ‘जो सरस्वतीके उत्तर तटपर पृथूदकतीर्थमें जप करते हुए अपने शरीरका परित्याग करता है, उसे भविष्यमें पुनः मृत्युका कष्ट नहीं भोगना पड़ता’ ॥ ३३ १/२ ॥ तत्राप्लुत्य स धर्मात्मा उपस्पृश्य हलायुधः ॥ ३४ ॥ दत्त्वा चैव बहून् दायान् विप्राणां विप्रवत्सलः । धर्मात्मा विप्रवत्सल हलधर बलरामजीने उस तीर्थमें स्नान करके ब्राह्मणोंको बहुत धनका दान किया ॥ ३४ १/२ ॥ ससर्ज यत्र भगवाँल्लोकाँल्लोकपितामहः ॥ ३५ ॥ यत्रार्ष्टिषेणः कौरव्य ब्राह्मण्यं संशितव्रतः । तपसा महता राजन् प्राप्तवानृषिसत्तमः ॥ ३६ ॥ सिन्धुद्वीपश्च राजर्षिर्देवापिश्च महातपाः । ब्रह्मण्यं लब्धवान् यत्र विश्वामित्रस्तथा मुनिः ॥ ३७ ॥ महातपस्वी भगवानुग्रतेजा महायशाः । तत्राजगाम बलवान् बलभद्रः प्रतापवान् ॥ ३८ ॥ कुरुवंशी नरेश! तत्पश्चात् बलवान् एवं प्रतापी बलभद्रजी उस तीर्थमें आ गये, जहाँ लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने सृष्टि की थी, जहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनिश्रेष्ठ आर्ष्टिषेणने बड़ी भारी तपस्या करके ब्राह्मणत्व पाया था तथा जहाँ राजर्षि सिन्धुद्वीप, महान् तपस्वी देवापि और महायशस्वी, उग्रतेजस्वी एवं महातपस्वी भगवान् विश्वामित्र मुनिने भी ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था ॥ ३५—३८ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्यान एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३९ ।।
अध्याय (पृष्ठ 2769)
चत्वारिंशोऽध्यायः
आर्ष्टिषेण एवं विश्वामित्रकी तपस्या तथा वरप्राप्ति
जनमेजय उवाच
कथमार्ष्टिषेणो भगवान् विपुलं तप्तवांस्तपः ।
सिन्धुद्वीपः कथं चापि ब्राह्मण्यं लब्धवांस्तदा ॥ १ ॥
देवापिश्च कथं ब्रह्मन् विश्वामित्रश्च सत्तम ।
तन्ममाचक्ष्व भगवन् परं कौतूहलं हि मे ॥ २ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! मुनिश्रेष्ठ! आर्ष्टिषेणने वहाँ किस प्रकार बड़ी भारी तपस्या की थी तथा सिन्धुद्वीप, देवापि और विश्वामित्रजीने किस तरह ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था? भगवन्! यह सब मुझे बताइये। इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी भारी उत्सुकता है ॥ १-२ ॥
वैशम्पायन उवाच
पुरा कृतयुगे राजन्नार्ष्टिषेणो द्विजोत्तमः ।
वसन् गुरुकुले नित्यं नित्यमध्ययने रतः ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! प्राचीन कालके सत्ययुगकी बात है, द्विजश्रेष्ठ आर्ष्टिषेण सदा गुरुकुलमें निवास करते हुए निरन्तर वेद-शास्त्रोंके अध्ययनमें लगे रहते थे ॥ ३ ॥
तस्य राजन् गुरुकुले वसतो नित्यमेव च ।
समाप्तिं नागमद् विद्या नापि वेदा विशाम्पते ॥ ४ ॥
प्रजानाथ! नरेश्वर! गुरुकुलमें सर्वदा रहते हुए भी न तो उनकी विद्या समाप्त हुई और न वे सम्पूर्ण वेद ही पढ़ सके ॥ ४ ॥
स निर्विण्णस्ततो राजंस्तपस्तेपे महातपाः ।
ततो वै तपसा तेन प्राप्य वेदाननुत्तमान् ॥ ५ ॥
स विद्वान् वेदयुक्तश्च सिद्धश्चाप्यृषिसत्तमः ।
तत्र तीर्थे वरान् प्रादात् त्रीनेव सुमहातपाः ॥ ६ ॥
नरेश्वर! इससे महातपस्वी आर्ष्टिषेण खिन्न एवं विरक्त हो उठे, फिर उन्होंने सरस्वतीके उसी तीर्थमें जाकर बड़ी भारी तपस्या की। उस तपके प्रभावसे उत्तम वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके वे ऋषिश्रेष्ठ विद्वान् वेदज्ञ और सिद्ध हो गये। तदनन्तर उन महातपस्वीने उस तीर्थको तीन वर प्रदान किये— ॥ ५-६ ॥
अस्मिंस्तीर्थे महानद्या अद्यप्रभृति मानवः ।
आप्लुतो वाजिमेधस्य फलं प्राप्स्यति पुष्कलम् ॥ ७ ॥ अद्यप्रभृति नैवात्र भयं व्यालाद् भविष्यति । अपि चाल्पेन कालेन फलं प्राप्स्यति पुष्कलम् ॥ ८ ॥ 'आजसे जो मनुष्य महानदी सरस्वतीके इस तीर्थमें स्नान करेगा, उसे अश्वमेध-यज्ञका सम्पूर्ण फल प्राप्त होगा। आजसे इस तीर्थमें किसीको सर्पसे भय नहीं होगा। थोड़े समयतक ही इस तीर्थके सेवनसे मनुष्यको बहुत अधिक फल प्राप्त होगा' ॥ ७-८ ॥ एवमुक्त्वा महातेजा जगाम त्रिदिवं मुनिः । एवं सिद्धः स भगवानाष्टिषेणः प्रतापवान् ॥ ९ ॥ ऐसा कहकर वे महातेजस्वी मुनि स्वर्गलोकको चले गये। इस प्रकार पूजनीय एवं प्रतापी आष्टिषेण ऋषि उस तीर्थमें सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं ॥ ९ ॥ तस्मिन्नेव तदा तीर्थे सिन्धुद्वीपः प्रतापवान् । देवापिश्च महाराज ब्राह्मण्यं प्राप्तुर्महत् ॥ १० ॥ महाराज! उन्हीं दिनों उसी तीर्थमें प्रतापी सिन्धुद्वीप तथा देवापिने वहाँ तप करके महान् ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था ॥ १० ॥ तथा च कौशिकस्तात तपोनित्यो जितेन्द्रियः । तपसा वै सुतप्तेन ब्राह्मणत्वमवाप्तवान् ॥ ११ ॥ तात! कुशिकवंशी विश्वामित्र भी वहीं निरन्तर इन्द्रिय-संयमपूर्वक तपस्या करते थे। उस भारी तपस्याके प्रभावसे उन्हें ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति हुई ॥ ११ ॥ गाधिर्नाम महानासीत् क्षत्रियः प्रथितो भुवि । तस्य पुत्रोऽभवद् राजन् विश्वामित्रः प्रतापवान् ॥ १२ ॥ राजन्! पहले इस भूतपर गाधिनामसे विख्यात महान् क्षत्रिय राजा राज्य करते थे। प्रतापी विश्वामित्र उन्हींके पुत्र थे ॥ १२ ॥ स राजा कौशिकस्तात महायोग्योभवत् किल । स पुत्रमभिषिच्याथ विश्वामित्रं महातपाः ॥ १३ ॥ देहन्यासे मनश्चक्रे तमूचुः प्रणताः प्रजाः । न गन्तव्यं महाप्राज्ञ त्राहि चास्मान् महाभयात् ॥ १४ ॥ तात! लोग कहते हैं कि कुशिकवंशी राजा गाधि महान् योगी और बड़े भारी तपस्वी थे। उन्होंने अपने पुत्र विश्वामित्रको राज्यपर अभिषिक्त करके शरीरको त्याग देनेका विचार किया। तब सारी प्रजा उनसे नतमस्तक होकर बोली—'महाबुद्धिमान् नरेश! आप कहीं न जायें, यहीं रहकर हमारी इस जगत्के महान् भयसे रक्षा करते रहें' ॥ १३-१४ ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच ततो गाधिः प्रजास्ततः । विश्वस्य जगतो गोप्ता भविष्यति सुतो मम ॥ १५ ॥
उनके ऐसा कहनेपर गाधिने सम्पूर्ण प्रजाओंसे कहा—'मेरा पुत्र सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करनेवाला होगा (अतः तुम्हें भयभीत नहीं होना चाहिये)' ।। १५ ।।
इत्युक्त्वा तु ततो गाधिर्विश्वामित्रं निवेश्य च ।
जगाम त्रिदिवं राजन् विश्वामित्रोऽभवन्नृपः ॥ १६ ॥
राजन्! यों कहकर राजा गाधि विश्वामित्रको राजसिंहासनपर बिठाकर स्वर्गलोकको चले गये। तत्पश्चात् विश्वामित्र राजा हुए ॥ १६ ॥
न स शक्नोति पृथिवीं यत्नवानपि रक्षितुम् ।
ततः शुश्राव राजा स राक्षसेभ्यो महाभयम् ॥ १७ ॥
वे प्रयत्नशील होनेपर भी सम्पूर्ण भूमण्डलकी रक्षा नहीं कर पाते थे। एक दिन राजा विश्वामित्रने सुना कि 'प्रजाको राक्षसोंसे महान् भय प्राप्त हुआ है' ॥ १७ ॥
निर्ययौ नगराच्चापि चतुरङ्गबलान्वितः ।
स गत्वा दूरमध्वानं वसिष्ठाश्रममभ्ययात् ॥ १८ ॥
तब वे चतुरङ्गिणी सेना लेकर नगरसे निकल पड़े और दूरतकका रास्ता तय करके वसिष्ठके आश्रमके पास जा पहुँचे ॥ १८ ॥
तस्य ते सैनिका राजंश्चक्रुस्तत्रानयान् बहून् ।
ततस्तु भगवान् विप्रो वसिष्ठोऽऽश्रममभ्ययात् ॥ १९ ॥
राजन्! उनके उन सैनिकोंने वहाँ बहुत-से अन्याय एवं अत्याचार किये। तदनन्तर पूज्य ब्रह्मर्षि वसिष्ठ कहींसे अपने आश्रमपर आये ॥ १९ ॥
ददृशेऽथ ततः सर्वं भज्यमानं महावनम् ।
तस्य क्रुद्धो महाराज वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥ २० ॥
आकर उन्होंने देखा कि वह सारा विशाल वन उजाड़ होता जा रहा है। महाराज! यह देखकर मुनिवर वसिष्ठ राजा विश्वामित्रपर कुपित हो उठे ॥ २० ॥
सृजस्व शबरान् घोरानिति स्वां गामुवाच ह ।
तथोक्ता सासृजद् धेनुः पुरुषान् घोरदर्शनान् ॥ २१ ॥
फिर उन्होंने अपनी गौ नन्दिनीसे कहा—'तुम भयंकर भील जातिके सैनिकोंकी सृष्टि करो'। उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर उनकी होमधेनुने ऐसे पुरुषोंको उत्पन्न किया, जो देखनेमें बड़े भयानक थे ॥ २१ ॥
ते तु तद्बलमासाद्य बभञ्जुः सर्वतोदिशम् ।
तच्छ्रुत्वा विद्रुतं सैन्यं विश्वामित्रस्तु गाधिजः ॥ २२ ॥
तपः परं मन्यमानस्तपस्येव मनो दधे ।
उन्होंने विश्वामित्रकी सेनापर आक्रमण करके उनके सैनिकोंको सम्पूर्ण दिशाओंमें मार भगाया। गाधिनन्दन विश्वामित्रने जब यह सुना कि मेरी सेना भाग गयी तो तपको ही अधिक प्रबल मानकर तपस्यामें ही मन लगाया ॥ २२ १/२ ॥
सोऽस्मिंस्तीर्थवरे राजन् सरस्वत्याः समाहितः ।। २३ ।।
नियमैश्चोपवासैश्च कर्षयन् देहमात्मनः ।
राजन्! उन्होंने सरस्वतीके उस श्रेष्ठ तीर्थमें चित्तको एकाग्र करके नियमों और उपवासोंके द्वारा अपने शरीरको सुखाना आरम्भ किया ।। २३ १/२ ।।
जलाहारो वायुभक्षः पर्णाहारश्च सोऽभवत् ।। २४ ।।
तथा स्थण्डिलशायी च ये चान्ये नियमाः पृथक् ।
वे कभी जल पीकर रहते, कभी वायुको ही आहार बनाते और कभी पत्ते चबाकर रहते थे। सदा भूमिकी वेदी बनाकर उसपर सोते और तपस्यासम्बन्धी जो अन्य सारे नियम हैं, उनका भी पृथक्-पृथक् पालन करते थे ।। २४ १/२ ।।
असकृत्तस्य देवास्तु व्रतविघ्नं प्रचक्रिरे ।। २५ ।।
न चास्य नियमाद् बुद्धिरपयाति महात्मनः ।
देवताओंने उनके व्रतमें बारंबार विघ्न डाला; परंतु उन महात्माकी बुद्धि कभी नियमसे विचलित नहीं होती थी ।। २५ १/२ ।।
ततः परेण यत्नेन तप्त्वा बहुविधं तपः ।। २६ ।।
तेजसा भास्कराकारो गाधिजः समपद्यत ।
तदनन्तर महान् प्रयत्नके द्वारा नाना प्रकारकी तपस्या करके गाधिनन्दन विश्वामित्र अपने तेजसे सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे ।। २६ १/२ ।।
तपसा तु तथा युक्तं विश्वामित्रं पितामहः ।। २७ ।।
अमन्यत महातेजा वरदो वरमस्य तत् ।
विश्वामित्रको ऐसी तपस्यासे युक्त देख महातेजस्वी एवं वरदायक ब्रह्माजीने उन्हें वर देनेका विचार किया ।। २७ १/२ ।।
स तु वव्रे वरं राजन् स्यामहं ब्राह्मणस्त्विति ।। २८ ।।
तथेति चाब्रवीद् ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ।
राजन्! तब उन्होंने यह वर माँगा कि 'मैं ब्राह्मण हो जाऊँ।' सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीने उन्हें 'तथास्तु' कहकर वह वर दे दिया ।। २८ १/२ ।।
स लब्ध्वा तपसोग्रेण ब्राह्मणत्वं महायशाः ।। २९ ।।
विचचार महीं कृत्स्नां कृतकामः सुरोपमः ।
उस उग्र तपस्याके द्वारा ब्राह्मणत्व पाकर सफलमनोरथ हुए महायशस्वी विश्वामित्र देवताके समान समस्त भूमण्डलमें विचरने लगे ।। २९ १/२ ।।
तस्मिंस्तीर्थवरे रामः प्रदाय विविधं वसु ।। ३० ।।
पयस्विनीस्तथा धेनूर्यानानि शयनानि च ।
अथ वस्त्राण्यलङ्कारं भक्ष्यं पेयं च शोभनम् ।। ३१ ।।
अददान्मुदितो राजन् पूजयित्वा द्विजोत्तमान् ।
ययौ राजंस्ततो रामो बकस्याश्रममन्तिकात् ।
यत्र तेपे तपस्तीव्रं दाल्भ्यो बक इति श्रुतिः ॥ ३२ ॥
राजन्! बलरामजीने उस श्रेष्ठ तीर्थमें उत्तम ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें दूध देनेवाली गौएँ, वाहन, शय्या, वस्त्र अलंकार तथा खाने-पीनेके सुन्दर पदार्थ प्रसन्नतापूर्वक दिये। फिर वहाँसे वे बकके आश्रमके निकट गये, जहाँ दल्भपुत्र बकने तीव्र तपस्या की थी ॥ ३०—३२ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने
चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥
अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन
एकचत्वारिंशोऽध्यायः
अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
ब्रह्मयोनेरवाकीर्णं जगाम यदुनन्दनः ।
यत्र दाल्भ्यो बको राजन्नाश्रमस्थो महातपाः ॥ १ ॥
जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं वैचित्रवीर्यिणः ।
तपसा घोररूपेण कर्षयन् देहमात्मनः ॥ २ ॥
क्रोधेन महताऽऽविष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी 'अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था ॥ १-२ १/२ ॥
पुरा हि नैमिषीयाणां सत्रे द्वादशवार्षिके ॥ ३ ॥
वृत्ते विश्वजितोऽन्ते वै पञ्चालानृषयोऽगमन् ।
तत्रेश्वरमयाचन्त दक्षिणार्थं मनस्विनः ॥ ४ ॥
पूर्वकालमें नैमिषारण्यनिवासी ऋषियोंने बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाले एक सत्रका आरम्भ किया था। जब वह पूरा हो गया, तब वे सब ऋषि विश्वजित् नामक यज्ञके अन्तमें पांचाल देशमें गये। वहाँ जाकर उन मनस्वी मुनियोंने उस देशके राजासे दक्षिणाके लिये धनकी याचना की ॥
(तत्र ते लेभिरे राजन् पञ्चालेभ्यो महर्षयः)
बलान्वितान् वत्सतरान् निर्व्याधीनेकविंशतिम् ।
तानब्रवीद् बको दाल्भ्यो विभजध्वं पशूनिति ॥ ५ ॥
पशूनेतानहं त्यक्त्वा भिक्षिष्ये राजसत्तमम् ।
राजन्! वहाँ महर्षियोंने पांचालोंसे इक्कीस बलवान् और नीरोग बछड़े प्राप्त किये। तब उनमेंसे दलभपुत्र बकने अन्य सब ऋषियोंसे कहा—'आपलोग इन पशुओंको बाँट लें। मैं इन्हें छोड़कर किसी श्रेष्ठ राजासे दूसरे पशु माँग लूँगा' ॥ ५ १/२ ॥
एवमुक्त्वा ततो राजन्नृषीन् सर्वान् प्रतापवान् ॥ ६ ॥
जगाम धृतराष्ट्रस्य भवनं ब्राह्मणोत्तमः ।
नरेश्वर! उन सब ऋषियोंसे ऐसा कहकर वे प्रतापी उत्तम ब्राह्मण राजा धृतराष्ट्रके घरपर गये ॥ ६ १/२ ॥
स समीपगतो भूत्वा धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ॥ ७ ॥
अयाचत पशून् दाल्भ्यः स चैनं रुषितोऽब्रवीत् ।
यद्च्छया मृता दृष्ट्वा गास्तदा नृपसत्तमः ॥ ८ ॥
एतान् पशून् नय क्षिप्रं ब्रह्मबन्धो यदिच्छसि ।
निकट जाकर दल्भ्यने कौरवनरेश धृतराष्ट्रसे पशुओंकी याचना की। यह सुनकर नृपश्रेष्ठ धृतराष्ट्र कुपित हो उठे। उनके यहाँ कुछ गौएँ दैवेच्छासे मर गयी थीं। उन्हींको लक्ष्य करके राजाने क्रोधपूर्वक कहा—'ब्रह्मबन्धो! यदि पशु चाहते हो तो इन मरे हुए पशुओंको ही शीघ्र ले जाओ' ॥ ७-८ १/२ ॥
ऋषिस्तथा वचः श्रुत्वा चिन्तयामास धर्मवित् ॥ ९ ॥
अहो बत नृशंसं वै वाक्यमुक्तोऽस्मि संसदि ।
उनकी वैसी बात सुनकर धर्मज्ञ ऋषिने चिन्तामग्न होकर सोचा—'अहो! बड़े खेदकी बात है कि इस राजाने भरी सभामें मुझसे ऐसा कठोर वचन कहा है' ॥ ९ १/२ ॥
चिन्तयित्वा मुहूर्तेन रोषाविष्टो द्विजोत्तमः ॥ १० ॥
मतिं चक्रे विनाशाय धृतराष्ट्रस्य भूपतेः ।
दो घड़ीतक इस प्रकार चिन्ता करके रोषमें भरे हुए द्विजश्रेष्ठ दाल्भ्यने राजा धृतराष्ट्रके विनाशका विचार किया ॥ १० १/२ ॥
स तूत्कृत्य मृतानां वै मांसानि मुनिसत्तमः ॥ ११ ॥
जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं नरपतेः पुरा ।
वे मुनिश्रेष्ठ उन मृत पशुओंके ही मांस काट-काटकर उनके द्वारा राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रकी ही आहुति देने लगे ॥ ११ १/२ ॥
अवाकीर्णे सरस्वत्यास्तीर्थे प्रज्वाल्य पावकम् ॥ १२ ॥
बको दाल्भ्यो महाराज नियमं परमं स्थितः ।
स तैरेव जुहावास्य राष्ट्रं मांसैर्महातपाः ॥ १३ ॥
महाराज! सरस्वतीके अवाकीर्णतीर्थमें अग्नि प्रज्वलित करके महातपस्वी दल्भपुत्र बक उत्तम नियमका आश्रय ले उन मृत पशुओंके मांसोंद्वारा ही उनके राष्ट्रका हवन करने लगे ॥ १२-१३ ॥
तस्मिंस्तु विधिवत् सत्रे सम्प्रवृत्ते सुदारुणे ।
अक्षीयत ततो राष्ट्रं धृतराष्ट्रस्य पार्थिव ॥ १४ ॥
राजन्! वह भयंकर यज्ञ जब विधिपूर्वक आरम्भ हुआ, तबसे धृतराष्ट्रका राष्ट्र क्षीण होने लगा ॥ १४ ॥
ततः प्रक्षीयमाणं तद् राज्यं तस्य महीपतेः । छिद्यमानं यथानन्तं वनं परशुना विभो ॥ १५ ॥ बभूवापद्गतं तच्च व्यवकीर्णमचेतनम् । प्रभो! जैसे बड़ा भारी वन कुल्हाड़ीसे काटा जा रहा हो, उसी प्रकार उस राजाका राज्य क्षीण होता हुआ भारी आफतमें फँस गया, वह संकटग्रस्त होकर अचेत हो गया ॥ १५१/२ ॥
दृष्ट्वा तथावकीर्णं तु राष्ट्रं स मनुजाधिपः ॥ १६ ॥ बभूव दुर्मना राजंश्चिन्तयामास च प्रभुः । मोक्षार्थमकरोद् यत्नं ब्राह्मणैः सहितः पुरा ॥ १७ ॥ राजन्! अपने राष्ट्रको इस प्रकार संकटमग्न हुआ देख वे नरेश मन-ही-मन बहुत दुःखी हुए और गहरी चिन्तामें डूब गये। फिर ब्राह्मणोंके साथ अपने देशको संकटसे बचानेका प्रयत्न करने लगे ॥ १६-१७ ॥
न च श्रेयोऽध्यगच्छत्तु क्षीयते राष्ट्रमेव च । यदा स पार्थिवः खिन्नस्ते च विप्रास्तदानघ ॥ १८ ॥ अनघ! जब किसी प्रकार भी वे भूपाल अपने राष्ट्रका कल्याण-साधन न कर सके और वह दिन-प्रतिदिन क्षीण होता ही चला गया, तब राजा और उन ब्राह्मणोंको बड़ा खेद हुआ ॥ १८ ॥
यदा चापि न शक्नोति राष्ट्रं मोक्षयितुं नृप । अथ वै प्राश्निकांस्तत्र पप्रच्छ जनमेजय ॥ १९ ॥ नरेश्वर जनमेजय! जब धृतराष्ट्र अपने राष्ट्रको उस विपत्तिसे छुटकारा दिलानेमें समर्थ न हो सके, तब उन्होंने प्राश्निकों (प्रश्न पूछनेपर भूत, वर्तमान और भविष्यकी बातें बतानेवालों)-को बुलाकर उनसे इसका कारण पूछा ॥ १९ ॥
ततो वै प्राश्निकाः प्राहुः पशोर्विप्रकृतस्त्वया । मांसैरभिर्जुहोतीदं तव राष्ट्रं मुनिर्बकः ॥ २० ॥ तब उन प्राश्निकोंने कहा—'आपने पशुके लिये याचना करनेवाले बक मुनिका तिरस्कार किया है; इसलिये वे मृत पशुओंके मांसोंद्वारा आपके इस राष्ट्रका विनाश करनेकी इच्छासे होम कर रहे हैं ॥ २० ॥
तेन ते हूयमानस्य राष्ट्रस्यास्य क्षयो महान् । तस्यैतत् तपसः कर्म येन तेऽद्य लयो महान् ॥ २१ ॥ 'उनके द्वारा आपके राष्ट्रकी आहुति दी जा रही है; इसलिये इसका महान् विनाश हो रहा है। यह सब उनकी तपस्याका प्रभाव है, जिससे आपके इस देशका इस समय महान् विलय होने लगा है ॥ २१ ॥
अपां कुञ्जे सरस्वत्यास्तं प्रसादय पार्थिव । सरस्वतीं ततो गत्वा स राजा बकमब्रवीत् ॥ २२ ॥
‘भूपाल! सरस्वतीके कुंजमें जलके समीप वे मुनि विराजमान हैं, आप उन्हें प्रसन्न कीजिये।’ तब राजाने सरस्वतीके तटपर जाकर बक मुनिसे इस प्रकार कहा ॥ २२ ॥ निपत्य शिरसा भूमौ प्राञ्जलिर्भरतर्षभ । प्रसादये त्वां भगवन्नपराधं क्षमस्व मे ॥ २३ ॥ मम दीनस्य लुब्धस्य मौर्ख्येण हतचेतसः । त्वं गतिस्त्वं च मे नाथः प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ २४ ॥ भरतश्रेष्ठ! वे पृथ्वीपर माथा टेक हाथ जोड़कर बोले—‘भगवन्! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। आप मुझ दीन, लोभी और मूर्खतासे हतबुद्धि हुए अपराधीके अपराधको क्षमा कर दें। आप ही मेरी गति हैं। आप ही मेरे रक्षक हैं। आप मुझपर अवश्य कृपा करें’ ॥ २३-२४ ॥ तं तथा विलपन्तं तु शोकोपहतचेतसम् । दृष्ट्वा तस्य कृपा जज्ञे राष्ट्रं तस्य व्यमोचयत् ॥ २५ ॥ राजा धृतराष्ट्रको इस प्रकार शोकसे अचेत होकर विलाप करते देख उनके मनमें दया आ गयी और उन्होंने राजाके राज्यको संकटसे मुक्त कर दिया ॥ २५ ॥ ऋषिः प्रसन्नस्तस्याभूत् संरम्भं च विहाय सः । मोक्षार्थं तस्य राज्यस्य जुहाव पुनराहुतिम् ॥ २६ ॥ ऋषि क्रोध छोड़कर राजापर प्रसन्न हुए और पुनः उनके राज्यको संकटसे बचानेके लिये आहुति देने लगे ॥ मोक्षयित्वा ततो राष्ट्रं प्रतिगृह्य पशून् बहून् । हृष्टात्मा नैमिषारण्यं जगाम पुनरेव सः ॥ २७ ॥ इस प्रकार राज्यको विपत्तिसे छुड़ाकर राजासे बहुत-से पशु ले प्रसन्नचित्त हुए महर्षि दाल्भ्य पुनः नैमिषारण्यको ही चले गये ॥ २७ ॥ धृतराष्ट्रोऽपि धर्मात्मा स्वस्थचेता महामनाः । स्वमेव नगरं राजन् प्रतिपेदे महर्द्धिमत् ॥ २८ ॥ राजन्! फिर महामनस्वी धर्मात्मा धृतराष्ट्र भी स्वस्थचित्त हो अपने समृद्धिशाली नगरको ही लौट आये ॥ तत्र तीर्थे महाराज बृहस्पतिरुदारधीः । असुराणामभावाय भवाय च दिवौकसाम् ॥ २९ ॥ मांसैरभिजुहावेष्टिमक्षीयन्त ततोऽसुराः । दैवतैरपि सम्भग्ना जितकाशिभिराहवे ॥ ३० ॥ महाराज! उसी तीर्थमें उदारबुद्धि बृहस्पतिजीने असुरोंके विनाश और देवताओंकी उन्नतिके लिये मांसोंद्वारा आभिचारिक यज्ञका अनुष्ठान किया था। इससे वे असुर क्षीण हो गये और युद्धमें विजयसे सुशोभित होनेवाले देवताओंने उन्हें मार भगाया ॥ २९-३० ॥
तत्रापि विधिवद् दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशाः ।
वाजिनः कुञ्जरांश्चैव रथांश्चाश्वतरीयुतान् ॥ ३१ ॥
रत्नानि च महार्हाणि धनं धान्यं च पुष्कलम् ।
ययौ तीर्थं महाबाहुर्यायातं पृथिवीपते ॥ ३२ ॥
पृथिवीनाथ! महायशस्वी महाबाहु बलरामजी उस तीर्थमें भी ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक हाथी, घोड़े, खच्चरियोंसे जुते हुए रथ, बहुमूल्य रत्न तथा प्रचुर धन-धान्यका दान करके वहाँसे यायात तीर्थमें गये ॥ ३१-३२ ॥
तत्र यज्ञे ययातेश्च महाराज सरस्वती ।
सर्पिः पयश्च सुस्राव नाहुषस्य महात्मनः ॥ ३३ ॥
महाराज! वहाँ पूर्वकालमें नहुषनन्दन महात्मा ययातिने यज्ञ किया था, जिसमें सरस्वतीने उनके लिये दूध और घीका स्रोत बहाया था ॥ ३३ ॥
तत्रेष्ट्वा पुरुषव्याघ्रो ययातिः पृथिवीपतिः ।
अक्रामदूर्ध्वं मुदितो लेभे लोकांश्च पुष्कलान् ॥ ३४ ॥
पुरुषसिंह भूपाल ययाति वहाँ यज्ञ करके प्रसन्नतापूर्वक ऊर्ध्वलोकमें चले गये और वहाँ उन्हें बहुत-से पुण्यलोक प्राप्त हुए ॥ ३४ ॥
पुनस्तत्र च राज्ञस्तु ययातेर्यजतः प्रभोः ।
औदार्यं परमं कृत्वा भक्तिं चात्मनि शाश्वतीम् ॥ ३५ ॥
ददौ कामान् ब्राह्मणेभ्यो यान् यान् यो मनसेच्छति ।
शक्तिशाली राजा ययाति जब वहाँ यज्ञ कर रहे थे, उस समय उनकी उत्कृष्ट उदारताको दृष्टिमें रखकर और अपने प्रति उनकी सनातन भक्ति देख सरस्वतीने उस यज्ञमें आये हुए ब्राह्मणोंको, जिसने अपने मनसे जिन-जिन भोगोंको चाहा, वे सभी मनोवांछित भोग प्रदान किये ॥ ३५½ ॥
यो यत्र स्थित एवेह आहूतो यज्ञसंस्तरे ॥ ३६ ॥
तस्य तस्य सरिच्छ्रेष्ठा गृहादिशयनादिकम् ।
षड्रसं भोजनं चैव दानं नानाविधं तथा ॥ ३७ ॥
राजाके यज्ञमण्डपमें बुलाकर आया हुआ जो ब्राह्मण जहाँ कहीं ठहर गया, वहीं उसके लिये सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने पृथक्-पृथक् गृह, शय्या, आसन, षड्रस भोजन तथा नाना प्रकारके दानकी व्यवस्था की ॥ ३६-३७ ॥
ते मन्यमाना राज्ञस्तु सम्प्रदानमनुत्तमम् ।
राजानं तुष्टुवुः प्रीता दत्त्वा चैवाशिषः शुभाः ॥ ३८ ॥
उन ब्राह्मणोंने यह समझकर कि राजाने ही वह उत्तम दान दिया है, अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा ययातिको शुभाशीर्वाद दे उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ३८ ॥
तत्र देवाः सगन्धर्वाः प्रीता यज्ञस्य सम्पदा ।
विस्मिता मानुषाश्चासन् दृष्ट्वा तां यज्ञसम्पदम् ॥ ३९ ॥
उस यज्ञकी सम्पत्तिसे देवता और गन्धर्व भी बड़े प्रसन्न हुए थे। मनुष्योंको तो वह यज्ञ-वैभव देखकर महान् आश्चर्य हुआ था ॥ ३९ ॥
ततस्तालकेतुर्महाधर्मकेतु-
र्महात्मा कृतात्मा महादाननित्यः ।
वसिष्ठापवाहं महाभीमवेगं
धृतात्मा जितात्मा समभ्याजगाम ॥ ४० ॥
तदनन्तर महान् धर्म ही जिनकी ध्वजा है और जिनकी पताकापर ताड़का चिह्न सुशोभित है, वे महात्मा, कृतात्मा, धृतात्मा तथा जितात्मा बलरामजी, जो प्रतिदिन बड़े-बड़े दान किया करते थे, वहाँसे वसिष्ठापवाह नामक तीर्थमें गये, जहाँ सरस्वतीका वेग बड़ा भयंकर है ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने
एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४० १/३ श्लोक हैं।)