भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

भरतश्रेष्ठ! ये तथा और भी नाना रूपधारिणी बहुत-सी सहस्रों मातृकाएँ हैं, जो कुमार कार्तिकेयका अनुसरण करती हैं ॥ ३० १/२ ॥
दीर्घनख्यो दीर्घदन्त्यो दीर्घतुण्ड्यश्च भारत ॥ ३१ ॥
सबला मधुराश्चैव यौवनस्थाः स्वलंकृताः ।
माहात्म्येन च संयुक्ताः कामरूपधरास्तथा ॥ ३२ ॥
भरतनन्दन! इनके नख, दाँत और मुख सभी विशाल हैं। वे सबला, मधुरा (सुन्दरी), युवावस्थासे सम्पन्न तथा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हैं। इनकी बड़ी महिमा है। ये अपनी इच्छाके अनुसार रूप धारण करनेवाली हैं ॥ ३१-३२ ॥
निर्मांसगात्र्यः श्वेताश्च तथा काञ्चनसंनिभाः ।
कृष्णमेघनिभाश्चान्या धूम्राश्च भरतर्षभ ॥ ३३ ॥
इनमेंसे कुछ मातृकाओंके शरीर केवल हड्डियोंके ढाँचे हैं। उनमें मांसका पता नहीं है। कुछ श्वेतवर्णकी हैं और कितनोंकी ही अंगकान्ति सुवर्णके समान है। भरतश्रेष्ठ! कुछ मातृकाएँ कृष्णमेघके समान काली तथा कुछ धूम्रवर्णकी हैं ॥ ३३ ॥
अरुणाभा महाभोगा दीर्घकेश्यः सिताम्बराः ।
ऊर्ध्ववेणीधराश्चैव पिङ्गाक्ष्यो लम्बमेखलाः ॥ ३४ ॥
कितनोंकी कान्ति अरुणवर्णकी है। वे सभी महान् भोगोंसे सम्पन्न हैं। उनके केश बड़े-बड़े और वस्त्र उज्ज्वल हैं। वे ऊपरकी ओर वेणी धारण करनेवाली, भूरी आँखोंसे सुशोभित तथा लम्बी मेखलासे अलंकृत हैं ॥
लम्बोदर्यो लम्बकर्णास्तथा लम्बपयोधराः ।
ताम्राक्ष्यस्ताम्रवर्णाश्च हर्यक्ष्यश्च तथा पराः ॥ ३५ ॥
उनमेंसे किन्हींके उदर, किन्हींके कान तथा किन्हींके दोनों स्तन लंबे हैं। कितनोंकी आँखें ताँबेके समान लाल रंगकी हैं। कुछ मातृकाओंके शरीरकी कान्ति भी ताम्रवर्णकी हैं। बहुतोंकी आँखें काले रंगकी हैं ॥ ३५ ॥
वरदाः कामचारिण्यो नित्यं प्रमुदितास्तथा ।
याम्या रौद्रास्तथा सौम्याः कौबेर्योऽथ महाबलाः ॥ ३६ ॥
वारुण्योऽथ च माहेन्द्र्यस्तथाऽऽग्नेय्यः परंतप ।
वायव्याश्चाथ कौमार्यो ब्राह्मयश्च भरतर्षभ ॥ ३७ ॥
वैष्णव्यश्च तथा सौर्यो वाराह्यश्च महाबलाः ।
रूपेणाप्सरसां तुल्या मनोहार्यो मनोरमाः ॥ ३८ ॥
वे वर देनेमें समर्थ, अपनी इच्छाके अनुसार चलनेवाली और सदा आनन्दमें निमग्न रहनेवाली हैं। शत्रुओंको संताप देनेवाले भरतश्रेष्ठ! उन मातृकाओंमेंसे कुछ यमकी शक्तियाँ हैं, कुछ रुद्रकी। कुछ सोमकी शक्तियाँ हैं और कुछ कुबेरकी। वे सब-की-सब महान् बलसे सम्पन्न हैं। इसी तरह कुछ वरुणकी, कुछ देवराज इन्द्रकी, कुछ अग्नि, वायु, कुमार, ब्रह्मा,

विष्णु, सूर्य तथा भगवान् वराहकी महाबलशालिनी शक्तियाँ हैं, जो रूपमें अप्सराओंके समान मनोहारिणी और मनोरमा हैं॥ ३६—३८॥ परपुष्टोपमा वाक्ये तथर्द्ध्या धनदोपमाः। शक्रवीर्योपमा युद्धे दीप्त्या वह्निसमास्तथा॥ ३९॥ वे मीठी वाणी बोलनेमें कोयल और धनसमृद्धिमें कुबेरके समान हैं। युद्धमें इन्द्रके सदृश पराक्रम प्रकट करनेवाली तथा अग्निके समान तेजस्विनी हैं॥ ३९॥ शत्रूणां विग्रहे नित्यं भयदास्ता भवन्त्युत। कामरूपधराश्चैव जवे वायुसमास्तथा॥ ४०॥ युद्ध छिड़ जानेपर वे सदा शत्रुओंके लिये भयदायिनी होती हैं। वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली तथा वायुके समान वेगशालिनी हैं॥ ४०॥ अचिन्त्यबलवीर्याश्च तथाचिन्त्यपराक्रमाः। वृक्षचत्वरवासिन्यश्चतुष्पथनिकेतनाः॥ ४१॥ उनके बल, वीर्य और पराक्रम अचिन्त्य हैं। वे वृक्षों, चबूतरों और चौराहोंपर निवास करती हैं॥ ४१॥ गुहाश्मशानवासिन्यः शैलप्रस्रवणालयाः। नानाभरणधारिण्यो नानामाल्याम्बरास्तथा॥ ४२॥ गुफाएँ, श्मशान, पर्वत और झरने भी उनके निवासस्थान हैं। वे नाना प्रकारके आभूषण, पुष्पहार और वस्त्र धारण करती हैं॥ ४२॥ नानाविचित्रवेषाश्च नानाभाषास्तथैव च। एते चान्ये च बहवो गणाः शत्रुभयंकराः॥ ४३॥ अनुजग्मुर्महात्मानं त्रिदशेन्द्रस्य सम्मते। उनके वेश नाना प्रकारके और विचित्र हैं। वे अनेक प्रकारकी भाषाएँ बोलती हैं। ये तथा और भी बहुत-से शत्रुओंको भयभीत करनेवाले गण देवेन्द्रकी सम्मतिसे महात्मा स्कन्दका अनुसरण करने लगे॥ ४३ १/२॥ ततः शक्त्यस्त्रमददद् भगवान् पाकशासनः॥ ४४॥ गुहाय राजशार्दूल विनाशाय सुरद्विषाम्। महास्वनां महाघण्टां द्योतमानां सितप्रभाम्॥ ४५॥ नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर भगवान् पाकशासनने देवद्रोहियोंके विनाशके लिये कुमार कार्तिकेयको शक्ति नामक अस्त्र प्रदान किया। साथ ही उन्होंने बड़े जोरसे आवाज करनेवाला एक विशाल घंटा भी दिया, जो अपनी उज्ज्वल प्रभासे प्रकाशित हो रहा था॥ ४४-४५॥ अरुणादित्यवर्णां च पताकां भरतर्षभ। ददौ पशुपतिस्तस्मै सर्वभूतमहाचमूम्॥ ४६॥

भरतश्रेष्ठ! भगवान् पशुपतिने उन्हें अरुण और सूर्यके समान प्रकाशमान एक पताका और अपने सम्पूर्ण भूतगणोंकी विशाल सेना भी प्रदान की ॥ ४६ ॥ उग्रां नानाप्रहरणां तपोवीर्यबलान्विताम् । अजेयां स्वगणैर्युक्तां नाम्ना सेनां धनंजयाम् ॥ ४७ ॥ रुद्रतुल्यबलैर्युक्तां योधानामयुतैस्त्रिभिः । न सा विजानाति रणात् कदाचिद् विनिवर्तितुम् ॥ ४८ ॥ वह भयंकर सेना धनंजय नामसे विख्यात थी। उसमें सभी सैनिक नाना प्रकारके अस्त्र, शस्त्र, तपस्या, बल और पराक्रमसे सम्पन्न थे। रुद्रके समान बलशाली तीस हजार रुद्रगणोंसे युक्त वह सेना शत्रुओंके लिये अजेय थी। वह कभी भी युद्धसे पीछे हटना जानती ही नहीं थी ॥ विष्णुर्ददौ वैजयन्तीं मालां बलविवर्धिनीम् । उमा ददौ विरजसी वाससी रविसप्रभे ॥ ४९ ॥ भगवान् विष्णुने कुमारको बल बढ़ानेवाली वैजयन्ती माला दी और उमाने सूर्यके समान चमकीले दो निर्मल वस्त्र प्रदान किये ॥ ४९ ॥ गङ्गा कमण्डलुं दिव्यममृतोद्भवमुत्तमम् । ददौ प्रीत्या कुमाराय दण्डं चैव बृहस्पतिः ॥ ५० ॥ गंगाने कुमारको प्रसन्नतापूर्वक एक दिव्य और उत्तम कमण्डलु दिया, जो अमृत प्रकट करनेवाला था। बृहस्पतिजीने दण्ड प्रदान किया ॥ ५० ॥ गरुडो दयितं पुत्रं मयूरं चित्रबर्हिणम् । अरुणस्ताम्रचूडं च प्रददौ चरणायुधम् ॥ ५१ ॥ गरुडने विचित्र पंखोंसे सुशोभित अपना प्रिय पुत्र मयूर भेंट किया। अरुणने लाल शिखावाले अपने पुत्र ताम्रचूड (मुर्ग)-को समर्पित किया, जिसका पैर ही आयुध था ॥ नागं तु वरुणो राजा बलवीर्यसमन्वितम् । कृष्णाजिनं ततो ब्रह्मा ब्रह्मण्याय ददौ प्रभुः ॥ ५२ ॥ समरेषु जयं चैव प्रददौ लोकभावनः । राजा वरुणने बल और वीर्यसे सम्पन्न एक नाग भेंट किया और लोकस्रष्टा भगवान् ब्रह्माने ब्राह्मणहितैषी कुमारको काला मृगचर्म तथा युद्धमें विजयका आशीर्वाद प्रदान किया ॥ ५२½ ॥ सेनापत्यमनुप्राप्य स्कन्दो देवगणस्य ह ॥ ५३ ॥ शुशुभे ज्वलितोऽर्चिष्मान् द्वितीय इव पावकः । देवताओंका सेनापतित्व पाकर तेजस्वी स्कन्द अपने तेजसे प्रज्वलित हो दूसरे अग्निदेवके समान सुशोभित होने लगे ॥ ५३½ ॥ ततः पारिषदैश्चैव मातृभिश्च समन्वितः ॥ ५४ ॥

ययौ दैत्यविनाशाय ह्लादयन् सुरपुङ्गवान् । तदनन्तर अपने पार्षदों तथा मातृकागणोंके साथ कुमार कार्तिकेयने देवेश्वरोंको आनन्द प्रदान करते हुए दैत्योंके विनाशके लिये प्रस्थान किया ॥ ५४½ ॥ सा सेना नैर्ऋती भीमा सघण्टोच्छ्रितकेतना ॥ ५५ ॥ सभेरीशङ्खमुरजा सायुधा सपताकिनी । शारदी द्यौरिवाभाति ज्योतिर्भिरिव शोभिता ॥ ५६ ॥ नैर्ऋतों (भूतगणों)-की वह भयंकर सेना घंटा, भेरी, शंख और मृदंगकी ध्वनिसे गूँज रही थी। उसकी ऊँचे उठी हुई पताकाएँ फहरा रही थीं। अस्त्र-शस्त्रों और पताकाओंसे सम्पन्न वह विशाल वाहिनी नक्षत्रोंसे सुशोभित शरत्कालके आकाशकी भाँति शोभा पा रही थी ॥

ततो देवनिकायास्ते नानाभूतगणास्तथा । वादयामासुरव्यग्रा भेरीः शङ्खांश्च पुष्कलान् ॥ ५७ ॥ पटहान् झर्झरांश्चैव क्रकचान् गोविषाणकान् । आडम्बरान् गोमुखांश्च डिण्डिमांश्च महास्वनान् ॥ ५८ ॥ तदनन्तर वे देवसमूह तथा नाना प्रकारके भूतगण शान्तचित्त हो भेरी, बहुत-से शंख, पटह, झाँझ, क्रकच, गोशृंग, आडम्बर, गोमुख और भारी आवाज करनेवाले नगाड़े बजाने लगे ॥ ५७-५८ ॥

तुष्टुवुस्ते कुमारं तु सर्वे देवाः सवासवाः । जगुश्च देवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ५९ ॥ फिर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता कुमारकी स्तुति करने लगे। देव-गन्धर्व गाने और अप्सराएँ नाचने लगीं ॥ ५९ ॥

ततः प्रीतो महासेनस्त्रिदशेभ्यो वरं ददौ । रिपून् हन्तास्मि समरे ये वो वधचिकीर्षवः ॥ ६० ॥ इससे प्रसन्न होकर कुमार महासेनने देवताओंको यह वर दिया कि ‘जो आपलोगोंका वध करना चाहते हैं, आपके उन समस्त शत्रुओंका मैं समरांगणमें संहार कर डालूँगा’ ॥ ६० ॥

प्रतिगृह्य वरं देवास्तस्माद् विबुधसत्तमात् । प्रीतात्मानो महात्मानो मेनिरे निहतान् रिपून् ॥ ६१ ॥ उन सुरश्रेष्ठ कुमारसे वह वर पाकर महामनस्वी देवता बड़े प्रसन्न हुए और अपने शत्रुओंको मरा हुआ ही मानने लगे ॥ ६१ ॥

सर्वेषां भूतसंघानां हर्षन्नादः समुत्थितः । अपूरयत लोकांस्त्रीन् वरे दत्ते महात्मना ॥ ६२ ॥

महात्मा कुमारके वर देनेपर सम्पूर्ण भूतसमुदायोंने जो हर्षनाद किया, वह तीनों

लोकोंमें गूँज उठा ।। ६२ ।।

स निर्ययौ महासेनो महत्या सेनया वृतः ।

वधाय युधि दैत्यानां रक्षार्थं च दिवौकसाम् ।। ६३ ।।

तत्पश्चात् विशाल सेनासे घिरे हुए स्वामी महासेन युद्धमें दैत्योंका वध और देवताओंकी

रक्षा करनेके लिये आगे बढ़े ।। ६३ ।।

व्यवसायो जयो धर्मः सिद्धिर्लक्ष्मीर्धृतिः स्मृतिः ।

महासेनस्य सैन्यानामग्रे जग्मुर्नर्राधिप ।। ६४ ।।

नरेश्वर! उस समय व्यवसाय (दृढ़ निश्चय), विजय, धर्म, सिद्धि, लक्ष्मी, धृति और स्मृति

—ये सब-के-सब महासेनके सैनिकोंके आगे-आगे चलने लगे ।।

स तया भीमया देवः शूलमुद्गरहस्तया ।

ज्वलितालातधारिण्या चित्राभरणवर्मया ।। ६५ ।।

गदामुसलनाराचशक्तितोमरहस्तया ।

दृप्तसिंहनिनादिन्या विनद्य प्रययौ गृहः ।। ६६ ।।

वह सेना बड़ी भयंकर थी। उसने हाथोंमें शूल, मुद्गर, जलते हुए काठ, गदा, मुसल,

नाराच, शक्ति और तोमर धारण कर रखे थे। सारी सेना विचित्र आभूषणों और कवचोंसे

सुसज्जित थी तथा दर्पयुक्त सिंहके समान दहाड़ रही थी, उस सेनाके साथ सिंहनाद करके

कुमार कार्तिकेय युद्धके लिये प्रस्थित हुए ।।

तं दृष्ट्वा सर्वदैतेया राक्षसा दानवास्तथा ।

व्यद्रवन्त दिशः सर्वा भयोद्विग्नाः समन्ततः ।। ६७ ।।

उन्हें देखकर सम्पूर्ण दैत्य, दानव और राक्षस भयसे उद्विग्न हो सारी दिशाओंमें सब

ओर भाग गये ।। ६७ ।।

अभ्यद्रवन्त देवास्तान् विविधायुधपाणयः ।

दृष्ट्वा च स ततः क्रुद्धः स्कन्दस्तेजोबलान्वितः ।। ६८ ।।

शक्त्यस्त्रं भगवान् भीमं पुनः पुनरवाकिरत् ।

आदधच्चात्मनस्तेजो हविषेद्ध इवानलः ।। ६९ ।।

देवता अपने हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र ले उन दैत्योंका पीछा करने लगे। यह

सब देखकर तेज और बलसे सम्पन्न भगवान् स्कन्द कुपित हो उठे और शक्ति नामक

भयानक अस्त्रका बारंबार प्रयोग करने लगे। उन्होंने उसमें अपना तेज स्थापित कर दिया

था और वे उस समय घीसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ।।

अभ्यस्यमाने शक्त्यस्त्रे स्कन्देनामिततेजसा ।

उल्काज्वाला महाराज पपात वसुधातले ।। ७० ।।

महाराज! अमित तेजस्वी स्कन्दके द्वारा शक्तिका बारंबार प्रयोग होनेसे पृथ्वीपर प्रज्वलित उल्का गिरने लगी ।। संह्लादयन्तश्च तथा निर्घाताश्चापतन् क्षितौ । यथान्तकालसमये सुघोराः स्युस्तथा नृप ।। ७१ ।। नरेश्वर! जैसे प्रलयके समय अत्यन्त भयंकर वज्र भारी गड़गड़ाहटके साथ पृथ्वीपर गिरने लगते हैं, उसी प्रकार उस समय भी भीषण गर्जनाके साथ वज्रपात होने लगा ।। क्षिप्ता ह्येका यदा शक्तिः सुघोरानलसूनुना । ततः कोट्यो विनिष्पेतुः शक्तीनां भरतर्षभ ।। ७२ ।। भरतश्रेष्ठ! अग्निकुमारने जब एक बार अत्यन्त भयंकर शक्ति छोड़ी, तब उससे करोड़ों शक्तियाँ प्रकट होकर गिरने लगीं ।। ७२ ।। ततः प्रीतो महासेनो जघान भगवान् प्रभुः । दैत्येन्द्रं तारकं नाम महाबलपराक्रमम् ।। ७३ ।। वृतं दैत्यायुतैर्वीरैर्बलिभिर्दशभिर्नृप । इससे प्रभावशाली भगवान् महासेन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने महान् बल एवं पराक्रमसे सम्पन्न उस दैत्यराज तारकको मार गिराया, जो एक लाख बलवान् एवं वीर दैत्योंसे घिरा हुआ था ।। ७३ ½ ।। महिषं चाष्टभिः पद्मैर्वृतं संख्ये निजघ्निवान् ।। ७४ ।। त्रिपादं चायुतशतैर्जघान दशभिर्वृतम् । ह्रदोदरं निखर्वैश्च वृतं दशभिरीश्वरः ।। ७५ ।। जघानानुचरैः सार्धं विविधायुधपाणिभिः । साथ ही उन्होंने युद्धस्थलमें आठ पद्म दैत्योंसे घिरे हुए महिषासुरका, दस लाख असुरोंसे सुरक्षित त्रिपादका और दस निखर्व दैत्य-योद्धाओंसे घिरे हुए ह्रदोदरका भी नाना प्रकारके आयुधधारी अनुचरोंसहित वध कर डाला ।। तथाकुर्वन्त विपुलं नादं वध्यत्सु शत्रुपु ।। ७६ ।। कुमारानुचरा राजन् पूरयन्तो दिशो दश । ननृतुश्च ववल्गुश्च जहसुश्च मुदान्विताः ।। ७७ ।। राजन्! जब शत्रु मारे जाने लगे, उस समय कुमारके अनुचर दसों दिशाओंको गुँजाते हुए बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। इतना ही नहीं, वे आनन्दमग्न होकर नाचने, कूदने तथा जोर-जोरसे हँसने लगे ।। ७६-७७ ।। शक्त्यस्त्रस्य तु राजेन्द्र ततोऽर्चिर्भिः समन्ततः । त्रैलोक्यं त्रासितं सर्वं जृम्भमाणाभिरेव च ।। ७८ ।। राजेन्द्र! उस शक्तिनामक अस्त्रकी सब ओर फैलती हुई ज्वालाओंसे सारी त्रिलोकी थर्रा उठी ।। ७८ ।।

दग्धाः सहस्रशो दैत्या नादैः स्कन्दस्य चापरे । पताकयावधूताश्च हताः केचित् सुरद्विषः ॥ ७९ ॥ सहस्रों दैत्य उस शक्तिकी आगमें जलकर भस्म हो गये। कितने ही स्कन्दके सिंहनादोंसे ही डरकर अपने प्राण खो बैठे तथा कुछ देवद्रोही उनकी पताकासे ही कम्पित होकर मर गये ॥ ७९ ॥

केचिद् घण्टारवत्रस्ता निषेदुर्वसुधातले । केचित् प्रहरणैश्छिन्ना विनिष्पेतुर्गतायुषः ॥ ८० ॥ कुछ दैत्य उनके घण्टानादसे संत्रस्त होकर धरतीपर बैठ गये और कुछ उनके आयुधोंसे छिन्न-भिन्न हो गतायु होकर पृथ्‍वीपर गिर पड़े ॥ ८० ॥

एवं सुरद्विषोऽनेकान् बलवानातातयिनः । जघान समरे वीरः कार्तिकेयो महाबलः ॥ ८१ ॥ इस प्रकार महाबली शक्तिशाली वीर कार्तिकेयने समरांगणमें अनेक आततायी देवद्रोहियोंका संहार कर डाला ॥

बाणो नामाथ दैतेयो बलेः पुत्रो महाबलः । क्रौञ्चं पर्वतमाश्रित्य देवसंघानबाधत ॥ ८२ ॥ राजा बलिका महाबली पुत्र बाणासुर क्रौंच पर्वतका आश्रय लेकर देवसमूहोंको कष्ट पहुँचाया करता था ॥ ८२ ॥

तमभ्यायान्महासेनः सुरशत्रुमुदारधीः । स कार्तिकेयस्य भयात् क्रौञ्चं शरणमीयिवान् ॥ ८३ ॥ उदारबुद्धि महासेनने उस दैत्यपर भी आक्रमण किया। तब वह कार्तिकेयके भयसे क्रौंच पर्वतकी शरणमें जा छिपा ॥

ततः क्रौञ्चं महामन्युः क्रौञ्चनादनिनादितम् । शक्त्या बिभेद भगवान् कार्तिकेयोऽग्निदत्तया ॥ ८४ ॥ इससे भगवान् कार्तिकेयको महान् क्रोध हुआ। उन्होंने अग्निकी दी हुई शक्तिसे क्रौंच पक्षियोंके कोलाहलसे गूँजते हुए क्रौंच पर्वतको विदीर्ण कर डाला ॥ ८४ ॥

स शालस्कन्धशबलं त्रस्तवानरवारणम् । प्रोड्डीनोद्भ्रान्तविहगं विनिष्पतितपन्नगम् ॥ ८५ ॥ गोलाङ्गूलर्क्षसंघैश्च द्रवद्भिरनुनादितम् । कुरङ्गमविनिर्घोषनिनादितवनान्तरम् ॥ ८६ ॥ विनिष्पतद्भिः शरभैः सिंहैश्च सहसा द्रुतैः । शोच्यामपि दशां प्राप्तो राजेव स पर्वतः ॥ ८७ ॥ क्रौंच पर्वत शालवृक्षके तनोंसे भरा हुआ था। वहाँके वानर और हाथी संत्रस्त हो उठे थे, पक्षी भयसे व्याकुल होकर उड़ चले थे, सर्प धराशायी हो गये थे, गोलांगूल जातिके वानरों

और रीछोंके समुदाय भाग रहे थे तथा उनके चीत्कारसे वह पर्वत गूँज उठा था, हरिणोंके आर्तनादसे उस पर्वतका वनप्रान्त प्रतिध्वनित हो रहा था, गुफासे निकलकर सहसा भागनेवाले सिंहों और शरभोंके कारण वह पर्वत बड़ी शोचनीय दशामें पड़ गया था तो भी वह सुशोभित-सा ही हो रहा था ।। विद्याधराः समुत्पेतुस्तस्य शृङ्गनिवासिनः । किन्नराश्च समुद्विग्नाः शक्तिपातरवोद्धताः ।। ८८ ।। उस पर्वतके शिखरपर निवास करनेवाले विद्याधर और किन्नर शक्तिके आघातजनित शब्दसे उद्विग्न होकर आकाशमें उड़ गये ।। ८८ ।। ततो दैत्या विनिष्पेतुः शतशोऽथ सहस्रशः । प्रदीप्तात् पर्वतश्रेष्ठाद् विचित्राभरणस्रजः ।। ८९ ।। तत्पश्चात् उस जलते हुए श्रेष्ठ पर्वतसे विचित्र आभूषण और माला धारण करनेवाले सैकड़ों और हजारों दैत्य निकल पड़े ।। ८९ ।। तान् निजघ्नुरतिक्रम्य कुमारानुचरा मृधे । स चैव भगवान् क्रुद्धो दैत्येन्द्रस्य सुतं तदा ।। ९० ।। सहानुजं जघानाशु वृत्रं देवपतिर्यथा । कुमारके पार्षदोंने युद्धमें आक्रमण करके उन सब दैत्योंको मार गिराया। साथ ही भगवान् कार्तिकेयने कुपित होकर वृत्रासुरको मारनेवाले देवराज इन्द्रके समान दैत्यराजके उस पुत्रको उसके छोटे भाईसहित शीघ्र ही मार डाला ।। बिभेद क्रौञ्चं शक्त्या च पावकिः परवीरहा ।। ९१ ।। बहुधा चैकधा चैव कृत्वाऽऽत्मानं महाबलः । शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाबली अग्निपुत्र कार्तिकेयने अपने-आपको एक और अनेक रूपोंमें प्रकट करके शक्तिद्वारा क्रौंच पर्वतको विदीर्ण कर डाला ।। शक्तिः क्षिप्ता रणे तस्य पाणिमेति पुनः पुनः ।। ९२ ।। एवंप्रभावो भगवांस्ततो भूयश्च पावकिः । शौर्यादिगुणयोगेन तेजसा यशसा श्रिया ।। ९३ ।। क्रौञ्चस्तेन विनिर्भिन्नो दैत्याश्च शतशो हताः । रणभूमिमें बार-बार चलायी हुई उनकी शक्ति शत्रुका संहार करके पुनः उनके हाथमें लौट आती थी। अग्निपुत्र कार्तिकेयका ऐसा ही प्रभाव है, बल्कि इससे भी बढ़कर है। वे शौर्यकी अपेक्षा उत्तरोत्तर दुगुने तेज, यश और श्रीसे सम्पन्न हैं। उन्होंने क्रौंच पर्वतको विदीर्ण करके सैकड़ों दैत्योंको मार गिराया ।। ९२-९३ १/२ ।। ततः स भगवान् देवो निहत्य विबुधद्विषः ।। ९४ ।। सभाज्यमानो विबुधैः परं हर्षमवाप ह ।

तदनन्तर भगवान् स्कन्ददेव देवशत्रुओंका संहार करके देवताओंसे सेवित हो अत्यन्त आनन्दित हुए ।। ततो दुन्दुभयो राजन् नेदुः शङ्खाश्च भारत ।। ९५ ।। मुमुचुर्देवयोषाश्च पुष्पवर्षमनुत्तमम् । योगिनामीश्वरं देवं शतशोऽथ सहस्रशः ।। ९६ ।। भरतवंशी नरेश! तत्पश्चात् दुन्दुभियाँ बज उठीं, शंखोंकी ध्वनि होने लगी, सैकड़ों और हजारों देवांगनाएँ योगीश्वर स्कन्ददेवपर उत्तम फूलोंकी वर्षा करने लगीं ।। दिव्यगन्धमुपादाय ववौ पुण्यश्च मारुतः । गन्धर्वास्तुष्टुवुश्चैनं यज्वानश्च महर्षयः ।। ९७ ।। दिव्य फूलोंकी सुगन्ध लेकर पवित्र वायु चलने लगी। गन्धर्व और यज्ञपरायण महर्षि उनकी स्तुति करने लगे ।। केचिदेनं व्यवस्यन्ति पितामहसुतं प्रभुम् । सनत्कुमारं सर्वेषां ब्रह्मयोनिं तमग्रजम् ।। ९८ ।। कोई उनके विषयमें यह निश्चय करने लगे कि ‘ये ब्रह्माजीके पुत्र, सबके अग्रज एवं ब्रह्मयोनि सनत्कुमार हैं’ ।। केचिन्महेश्वरसुतं केचित् पुत्रं विभावसोः । उमायाः कृत्तिकानां च गङ्गायाश्च वदन्त्युत ।। ९९ ।। कोई उन्हें महादेवजीका, कोई अग्निका, कोई पार्वतीका, कोई कृत्तिकाओंका और कोई गंगाजीका पुत्र बताने लगे ।। ९९ ।। एकधा च द्विधा चैव चतुर्धा च महाबलम् । योगिनामीश्वरं देवं शतशोऽथ सहस्रशः ।। १०० ।। उन महाबली योगेश्वर स्कन्ददेवको लोग एक, दो, चार, सौ तथा सहस्रों रूपोंमें देखते और जानते हैं ।। एतत् ते कथितं राजन् कार्तिकेयाभिषेचनम् । शृणु चैव सरस्वत्यास्तीर्थवर्यस्य पुण्यताम् ।। १०१ ।। राजन्! यह मैंने तुम्हें कार्तिकेयके अभिषेकका प्रसंग सुनाया है। अब तुम सरस्वतीके उस श्रेष्ठ तीर्थकी पावनताका वर्णन सुनो ।। १०१ ।। बभूव तीर्थप्रवरं हतेषु सुरशत्रुषु । कुमारेण महाराज त्रिविष्टपमिवापरम् ।। १०२ ।। महाराज! कुमार कार्तिकेयके द्वारा देवशत्रुओंके मारे जानेपर वह श्रेष्ठ तीर्थ दूसरे स्वर्गके समान सुखदायक हो गया ।। १०२ ।। ऐश्वर्याणि च तत्रस्थो ददावीशः पृथक् पृथक् । ददौ नैर्ऋतमुख्येभ्यस्त्रैलोक्यं पावकात्मजः ।। १०३ ।।

वहीं रहकर स्वामी स्कन्दने पृथक्-पृथक् ऐश्वर्य प्रदान किये। अग्निकुमारने अपनी सेनाके मुख्य-मुख्य अधिकारियोंको तीनों लोक सौंप दिये ॥ १०३ ॥ एवं स भगवांस्तस्मिंस्तीर्थे दैत्यकुलान्तकः । अभिषिक्तो महाराज देवसेनापतिः सुरैः ॥ १०४ ॥ महाराज! इस प्रकार दैत्यकुलविनाशक देवसेनापति भगवान् स्कन्दका उस तीर्थमें देवताओंद्वारा अभिषेक किया गया ॥ १०४ ॥ तैजसं नाम तत् तीर्थं यत्र पूर्वमपां पतिः । अभिषिक्तः सुरगणैर्वरुणो भरतर्षभ ॥ १०५ ॥ भरतश्रेष्ठ! वह तैजस नामका तीर्थ है, जहाँ पहले जलके स्वामी वरुणदेवका देवताओंद्वारा अभिषेक किया गया था ॥ १०५ ॥ अस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा स्कन्दं चाभ्यर्च्य लाङ्गली । ब्राह्मणेभ्यो ददौ रुक्मं वासांस्याभरणानि च ॥ १०६ ॥ उस श्रेष्ठ तीर्थमें हलधारी बलरामने स्नान करके स्कन्ददेवका पूजन किया और ब्राह्मणोंको सुवर्ण, वस्त्र एवं आभूषण दिये ॥ १०६ ॥ उषित्वा रजनीं तत्र माधवः परवीरहा । पूज्य तीर्थवरं तच्च स्पृष्ट्वा तोयं च लाङ्गली ॥ १०७ ॥ हृष्टः प्रीतमनाश्चैव ह्यभवन्माधवोत्तमः । शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले मधुवंशी हलधर वहाँ रातभर रहे और उस श्रेष्ठ तीर्थका पूजन एवं उसके जलमें स्नान करके हर्षसे खिल उठे। उन यदुश्रेष्ठ बलरामका मन वहाँ प्रसन्न हो गया था ॥ १०७१/२ ॥ एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । यथाभिषिक्तो भगवान् स्कन्दो देवैः समागतैः ॥ १०८ ॥ (सेनानीश्च कृतो राजन् बाल एव महाबलः ।) राजन्! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे थे, वह सब प्रसंग मैंने तुम्हें कह सुनाया। समागत देवताओंद्वारा किस प्रकार भगवान् स्कन्दका अभिषेक हुआ और किस प्रकार बाल्यावस्थामें ही वे महाबली कुमार सेनापति बना दिये गये, यह सब कुछ बता दिया गया ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने तारकवधे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा एवं सारस्वतोपाख्यानके प्रसंगमें तारकासुरका वधविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल १०८ १/२ श्लोक हैं।)


अध्याय (पृष्ठ 2829)

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

वरुणका अभिषेक तथा अग्नितीर्थ, ब्रह्मयोनि और कुबेरतीर्थकी उत्पत्तिका प्रसंग

जनमेजय उवाच

अत्यद्भुतमिदं ब्रह्मन् श्रुतवानस्मि तत्त्वतः ।
अभिषेकं कुमारस्य विस्तरेण यथाविधि ॥ १ ॥
**जनमेजयने कहा—**ब्रह्मन्! आज मैंने आपके मुखसे कुमारके विधिपूर्वक अभिषेकका यह अद्भुत वृत्तान्त यथार्थरूपसे और विस्तारपूर्वक सुना है ॥ १ ॥

यच्छ्रुत्वा पूतमात्मानं विजानामि तपोधन ।
प्रहृष्टानि च रोमाणि प्रसन्नं च मनो मम ॥ २ ॥
तपोधन! उसे सुनकर मैं अपने-आपको पवित्र हुआ समझता हूँ। हर्षसे मेरे रोयें खड़े हो गये हैं और मेरा मन प्रसन्नतासे भर गया है ॥ २ ॥

अभिषेकं कुमारस्य दैत्यानां च वधं तथा ।
श्रुत्वा मे परमा प्रीतिर्भूयः कौतूहलं हि मे ॥ ३ ॥
कुमारके अभिषेक और उनके द्वारा दैत्योंके वधका वृत्तान्त सुनकर मुझे बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ है और पुनः मेरे मनमें इस विषयको सुननेकी उत्कण्ठा जागृत् हो गयी है ॥

अपां पतिः कथं ह्यस्मिन्नभिषिक्तः पुरा सुरैः ।
तन्मे ब्रूहि महाप्राज्ञ कुशलो ह्यसि सत्तम ॥ ४ ॥
साधुशिरोमणे! महाप्राज्ञ! इस तीर्थमें देवताओंने पहले जलके स्वामी वरुणका अभिषेक किस प्रकार किया था, वह सब मुझे बताइये; क्योंकि आप प्रवचन करनेमें कुशल हैं ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

शृणु राजन्निदं चित्रं पूर्वकल्पे यथातथम् ।
आदौ कृतयुगे राजन् वर्तमाने यथाविधि ॥ ५ ॥
वरुणं देवताः सर्वा यमेत्येदमथाब्रुवन् ।
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! इस विचित्र प्रसंगको यथार्थरूपसे सुनो। पूर्वकल्पकी बात है, जब आदि कृतयुग चल रहा था, उस समय सम्पूर्ण देवताओंने वरुणके पास जाकर इस प्रकार कहा— ॥ ५ १/२ ॥

यथास्मान् सुरराट् शक्रो भयेभ्यः पाति सर्वदा ॥ ६ ॥
तथा त्वमपि सर्वासां सरितां वै पतिर्भव ।

‘जैसे देवराज इन्द्र सदा भयसे हमलोगोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप भी समस्त सरिताओंके अधिपति हो जाइये (और हमारी रक्षा कीजिये) ।। ६ १/२ ।।
वासश्च ते सदा देव सागरे मकरालये ।। ७ ।।
समुद्रोऽयं तव वशे भविष्यति नदीपतिः ।
सोमेन सार्धं च तव हानिवृद्धी भविष्यतः ।। ८ ।।
‘देव! मकरालय समुद्रमें आपका सदा निवासस्थान होगा और यह नदीपति समुद्र सदा आपके वशमें रहेगा। चन्द्रमाके साथ आपकी भी हानि और वृद्धि होगी’ ।।
एवमस्त्विति तान् देवान् वरुणो वाक्यमब्रवीत् ।
समागम्य ततः सर्वे वरुणं सागरालयम् ।। ९ ।।
अपां पतिं प्रचक्रुर्हि विधिदृष्टेन कर्मणा ।
तब वरुणने उन देवताओंसे कहा—‘एवमस्तु’। इस प्रकार उनकी अनुमति पाकर सब देवता इकट्ठे होकर उन्होंने समुद्रनिवासी वरुणको शास्त्रीय विधिके अनुसार जलका राजा बना दिया ।। ९ १/२ ।।
अभिषिच्य ततो देवा वरुणं यादसां पतिम् ।। १० ।।
जग्मुः स्वान्येव स्थानानि पूजयित्वा जलेश्वरम् ।
जलजन्तुओंके स्वामी जलेश्वर वरुणका अभिषेक और पूजन करके सम्पूर्ण देवता अपने-अपने स्थानको ही चले गये ।। १० १/२ ।।
अभिषिक्तस्ततो देवैर्वरुणोऽपि महायशाः ।। ११ ।।
सरितः सागरांश्चैव नदांश्चापि सरांसि च ।
पालयामास विधिना यथा देवान् शतक्रतुः ।। १२ ।।
देवताओंद्वारा अभिषिक्त होकर महायशस्वी वरुण देवगणोंकी रक्षा करनेवाले इन्द्रके समान सरिताओं, सागरों, नदों और सरोवरोंका भी विधिपूर्वक पालन करने लगे ।।
ततस्तत्राप्युपस्पृश्य दत्त्वा च विविधं वसु ।
अग्नितीर्थं महाप्राज्ञो जगामाथ प्रलम्बहा ।। १३ ।।
प्रलम्बासुरका वध करनेवाले महाज्ञानी बलरामजी उस तीर्थमें स्नान और भाँति-भाँतिके धनका दान करके अग्नितीर्थमें गये ।। १३ ।।
नष्टो न दृश्यते यत्र शमीगर्भे हुताशनः ।
लोकालोकविनाशे च प्रादुर्भूते तदानघ ।। १४ ।।
उपतस्थुः सुरा यत्र सर्वलोकपितामहम् ।
अग्निः प्रणष्टो भगवान् कारणं च न विद्महे ।। १५ ।।
सर्वभूतक्षयो मा भूत् सम्पादय विभोऽनलम् ।

निष्पाप नरेश! जब शमीके गर्भमें छिप जानेके कारण कहीं अग्निदेवका दर्शन नहीं हो रहा था और सम्पूर्ण जगत्के प्रकाश अथवा दृष्टिशक्तिके विनाशकी घड़ी उपस्थित हो गयी, तब सब देवता सर्वलोक-पितामह ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुए और बोले—‘प्रभो! भगवान् अग्निदेव अदृश्य हो गये हैं। इसका क्या कारण है, यह हमारी समझमें नहीं आता। सम्पूर्ण भूतोंका विनाश न हो जाय, इसके लिये अग्निदेवको प्रकट कीजिये’ ॥ १४-१५ १/२ ॥

जनमेजय उवाच

किमर्थं भगवानग्निः प्रणष्टो लोकभावनः ॥ १६ ॥
विज्ञातश्च कथं देवैस्तन्ममाचक्ष्व तत्त्वतः ।
जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! लोकभावन भगवान् अग्नि क्यों अदृश्य हो गये थे और देवताओंने कैसे उनका पता लगाया? यह यथार्थरूपसे बताइये ॥ १६ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच

भृगोः शापाद् भृशं भीतो जातवेदाः प्रतापवान् ॥ १७ ॥
शमीगर्भमथासाद्य ननाश भगवांस्ततः ।
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! एक समयकी बात है कि प्रतापी भगवान् अग्निदेव महर्षि भृगुके शापसे अत्यन्त भयभीत हो शमीके भीतर जाकर अदृश्य हो गये ॥ १७ १/२ ॥
प्रणष्टे तु तदा वह्नौ देवाः सर्वे सवासवाः ॥ १८ ॥
अन्वैषन्त तदा नष्टं ज्वलनं भृशदुःखिताः ।
उस समय अग्निदेवके दिखायी न देनेपर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता बहुत दुःखी हो उनकी खोज करने लगे ॥
ततोऽग्नितीर्थमासाद्य शमीगर्भस्थमेव हि ॥ १९ ॥
ददृशुर्ज्वलनं तत्र वसमानं यथाविधि ।
तत्पश्चात् अग्नितीर्थमें आकर देवताओंने अग्निको शमीके गर्भमें विधिपूर्वक निवास करते देखा ॥ १९ १/२ ॥
देवाः सर्वे नरव्याघ्र बृहस्पतिपुरोगमाः ॥ २० ॥
ज्वलनं तं समासाद्य प्रीताभूवन् सवासवाः ।
नरव्याघ्र! इन्द्रसहित सब देवता बृहस्पतिको आगे करके अग्निदेवके समीप आये और उन्हें देखकर बड़े प्रसन्न हुए ॥ २० १/२ ॥
पुनर्यथागतं जग्मुः सर्वभक्षश्च सोऽभवत् ॥ २१ ॥
भृगोः शापान्महाभाग यदुक्तं ब्रह्मवादिना ।
महाभाग! फिर वे जैसे आये थे, वैसे लौट गये और अग्निदेव महर्षि भृगुके शापसे सर्वभक्षी हो गये। उन ब्रह्मवादी मुनिने जैसा कहा था, वैसा ही हुआ ॥

तत्राप्याप्लुत्य मतिमान् ब्रह्मयोनिं जगाम ह ॥ २२ ॥ ससर्ज भगवान् यत्र सर्वलोकपितामहः । उस तीर्थमें गोता लगाकर बुद्धिमान् बलरामजी ब्रह्मयोनि तीर्थमें गये, जहाँ सर्वलोकपितामह ब्रह्माने सृष्टि की थी ॥ २२ १/२ ॥

तत्राप्लुत्य ततो ब्रह्मा सह देवैः प्रभुः पुरा ॥ २३ ॥ ससर्ज तीर्थानि तथा देवतानां यथाविधि । पूर्वकालमें देवताओंसहित भगवान् ब्रह्माने वहाँ स्नान करके विधिपूर्वक देवतीर्थोंकी रचना की थी ॥ २३ १/२ ॥

तत्र स्नात्वा च दत्त्वा च वसूनि विविधानि च ॥ २४ ॥ कौबेरं प्रययौ तीर्थं तत्र तप्त्वा महत्तपः । धनाधिपत्यं सम्प्राप्तो राजन्नैलविलः प्रभुः ॥ २५ ॥ राजन्! उस तीर्थमें स्नान और नाना प्रकारके धनका दान करके बलरामजी कुबेरतीर्थमें गये, जहाँ बड़ी भारी तपस्या करके भगवान् कुबेरने धनाध्यक्षका पद प्राप्त किया था ॥ २५ ॥

तत्रस्थमेव तं राजन् धनानि निधयस्तथा । उपतस्थुर्नरश्रेष्ठ तत् तीर्थं लाङ्गली बलः ॥ २६ ॥ गत्वा स्नात्वा च विधिवद् ब्राह्मणेभ्यो धनं ददौ । नरेश्वर! वहीं उनके पास धन और निधियाँ पहुँच गयी थीं। नरश्रेष्ठ! हलधारी बलरामने उस तीर्थमें जाकर स्नानके पश्चात् ब्राह्मणोंके लिये विधिपूर्वक धनका दान किया ॥ २६ १/२ ॥

ददृशे तत्र तत् स्थानं कौबेरे काननोत्तमे ॥ २७ ॥ पुरा यत्र तपस्तप्तं विपुलं सुमहात्मना । यक्षराज्ञा कुबेरेण वरा लब्धाश्च पुष्कलाः ॥ २८ ॥ तत्पश्चात् उन्होंने वहाँके एक उत्तम वनमें कुबेरके उस स्थानका दर्शन किया, जहाँ पूर्वकालमें महात्मा यक्षराज कुबेरने बड़ी भारी तपस्या की और बहुत-से वर प्राप्त किये ॥ २७-२८ ॥

धनाधिपत्यं सख्यं च रुद्रेणामिततेजसा । सुरत्वं लोकपालत्वं पुत्रं च नलकूबरम् ॥ २९ ॥ यत्र लेभे महाबाहो धनाधिपतिरञ्जसा । महाबाहो! धनपति कुबेरने वहाँ अमिततेजस्वी रुद्रके साथ मित्रता, धनका स्वामित्व, देवत्व, लोकपालत्व और नलकूबर नामक पुत्र अनायास ही प्राप्त कर लिये ॥

अभिषिक्तश्च तत्रैव समागम्य मरुद्गणैः ॥ ३० ॥ वाहनं चास्य तद् दत्तं हंसयुक्तं मनोजवम् ।

विमानं पुष्पकं दिव्यं नैर्ऋतैश्वर्यमेव च ॥ ३१ ॥
वहीं आकर देवताओंने उनका अभिषेक किया तथा उनके लिये हंसोंसे जुता हुआ और मनके समान वेगशाली वाहन दिव्य पुष्पक विमान दिया। साथ ही उन्हें यक्षोंका राजा बना दिया ॥ ३०-३१ ॥

तत्राप्लुत्य बलो राजन् दत्त्वा दायांश्च पुष्कलान् ।
जगाम त्वरितो रामस्तीर्थं श्वेतानुलेपनः ॥ ३२ ॥
निषेवितं सर्वसत्त्वैर्नाम्ना बदरपाचनम् ।
नानर्तुकवनोपेतं सदापुष्पफलं शुभम् ॥ ३३ ॥
राजन्! उस तीर्थमें स्नान और प्रचुर दान करके श्वेत चन्दनधारी बलरामजी शीघ्रतापूर्वक बदरपाचन नामक शुभ तीर्थमें गये, जो सब प्रकारके जीव-जन्तुओंसे सेवित, नाना ऋतुओंकी शोभासे सम्पन्न वनस्थलियोंसे युक्त तथा निरन्तर फूलों और फलोंसे भरा रहनेवाला था ॥ ३२-३३ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने
सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा और सारस्वतोपाख्यानविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥

बदरपाचनतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें श्रुतावती और अरुन्धतीके तपकी कथा

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

बदरपाचनतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें श्रुतावती और अरुन्धतीके तपकी कथा

वैशम्पायन उवाच

ततस्तीर्थवरं रामो ययौ बदरपाचनम् ।
तपस्विसिद्धचरितं यत्र कन्या धृतव्रता ॥ १ ॥
भरद्वाजस्य दुहिता रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
श्रुतावती नाम विभो कुमारी ब्रह्मचारिणी ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! पहले कहा गया है कि वहाँसे बलरामजी बदरपाचन नामक श्रेष्ठ तीर्थमें गये, जहाँ तपस्वी और सिद्ध पुरुष विचरण करते हैं तथा जहाँ पूर्वकालमें उत्तम व्रत धारण करनेवाली भरद्वाजकी ब्रह्मचारिणी पुत्री कुमारी कन्या श्रुतावती, जिसके रूप और सौन्दर्यकी भूमण्डलमें कहीं तुलना नहीं थी, निवास करती थी ॥ १-२ ॥

तपश्चचार सात्युग्रं नियमैर्बहुभिर्वृता ।
भर्ता मे देवराजः स्यादिति निश्चित्य भामिनी ॥ ३ ॥
वह भामिनी बहुत-से नियमोंको धारण करके वहाँ अत्यन्त उग्र तपस्या कर रही थी। उसने अपनी तपस्याका यही उद्देश्य निश्चित कर लिया था कि देवराज इन्द्र मेरे पति हों ॥ ३ ॥

समास्तस्या व्यतिक्रान्ता बह्व्यः कुरुकुलोद्वह ।
चरन्त्या नियमांस्तांस्तान् स्त्रीभिस्तीव्रान् सुदुश्चरान् ॥ ४ ॥
कुरुकुलभूषण! स्त्रियोंके लिये जिनका पालन अत्यन्त दुष्कर और दुःसह है, उन-उन कठोर नियमोंका पालन करती हुई श्रुतावतीके वहाँ अनेक वर्ष व्यतीत हो गये ॥

तस्यास्तु तेन वृत्तेन तमसा च विशाम्पते ।
भक्त्या च भगवान् प्रीतः परया पाकशासनः ॥ ५ ॥
प्रजानाथ! उसके उस आचरण, तपस्या तथा पराभक्तिसे भगवान् पाकशासन (इन्द्र) बड़े प्रसन्न हुए ॥

आजगामाश्रमं तस्यास्त्रिदशाधिपतिः प्रभुः ।
आस्थाय रूपं विप्रर्षेर्वसिष्ठस्य महात्मनः ॥ ६ ॥
वे शक्तिशाली देवराज ब्रह्मर्षि महात्मा वसिष्ठका रूप धारण करके उसके आश्रमपर आये ॥ ६ ॥

सा तं दृष्ट्वोग्रतपसं वसिष्ठं तपतां वरम् ।
आचारैर्मुनिभिर्हृष्टैः पूजयामास भारत ॥ ७ ॥
भरतनन्दन! उसने तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ और उग्र तपस्यापरायण वसिष्ठको देखकर मुनिजनोचित आचारोंद्वारा उनका पूजन किया ॥ ७ ॥
उवाच नियमज्ञा च कल्याणी सा प्रियंवदा ।
भगवन् मुनिशार्दूल किमाज्ञापयसि प्रभो ॥ ८ ॥
सर्वमद्य यथाशक्ति तव दास्यामि सुव्रत ।
शक्रभक्त्या च ते पाणिं न दास्यामि कथंचन ॥ ९ ॥
फिर नियमोंका ज्ञान रखनेवाली और मधुर एवं प्रिय वचन बोलनेवाली कल्याणमयी श्रुतावतीने इस प्रकार कहा—'भगवन्! मुनिश्रेष्ठ! प्रभो! मेरे लिये क्या आज्ञा है? सुव्रत! आज मैं यथाशक्ति आपको सब कुछ दूँगी; परंतु इन्द्रके प्रति अनुराग रखनेके कारण अपना हाथ आपको किसी प्रकार नहीं दे सकूँगी ॥ ८-९ ॥
व्रतैश्च नियमैश्चैव तपसा च तपोधन ।
शक्रस्तोषयितव्यो वै मया त्रिभुवनेश्वरः ॥ १० ॥
'तपोधन! मुझे अपने व्रतों, नियमों तथा तपस्याद्वारा त्रिभुवनसम्राट् भगवान् इन्द्रको ही संतुष्ट करना है' ॥ १० ॥
इत्युक्तो भगवान् देवः स्मयन्निव निरीक्ष्य ताम् ।
उवाच नियमं ज्ञात्वा सांत्वयन्निव भारत ॥ ११ ॥
भारत! श्रुतावतीके ऐसा कहनेपर भगवान् इन्द्रने मुसकराते हुए-से उसकी ओर देखा और उसके नियमको जानकर उसे सान्त्वना देते हुए-से कहा— ॥ ११ ॥
उग्रं तपश्चरसि वै विदिता मेऽसि सुव्रते ।
यदर्थमयमारम्भस्तव कल्याणि हृद्गतः ॥ १२ ॥
तच्च सर्वं यथाभूतं भविष्यति वरानने ।
'सुव्रते! मैं जानता हूँ तुम बड़ी उग्र तपस्या कर रही हो। कल्याणि! सुमुखि! जिस उद्देश्यसे तुमने यह अनुष्ठान आरम्भ किया है और तुम्हारे हृदयमें जो संकल्प है, वह सब यथार्थरूपसे सफल होगा ॥ १२ १/२ ॥
तपसा लभ्यते सर्वं यथाभूतं भविष्यति ॥ १३ ॥
यथा स्थानानि दिव्यानि विबुधानां शुभानने ।
तपसा तानि प्राप्याणि तपोमूलं महत् सुखम् ॥ १४ ॥
'शुभानने! तपस्यासे सब कुछ प्राप्त होता है। तुम्हारा मनोरथ भी यथावत् रूपसे सिद्ध होगा। देवताओंके जो दिव्य स्थान हैं, वे तपस्यासे प्राप्त होनेवाले हैं। महान् सुखका मूल कारण तपस्या ही है ॥ १३-१४ ॥
इति कृत्वा तपो घोरं देहं संन्यस्य मानवाः ।

देवत्वं यान्ति कल्याणि शृणुष्वैकं वचो मम ॥ १५ ॥
'कल्याणि! इस उद्देश्यसे मनुष्य घोर तपस्या करके अपने शरीरको त्यागकर देवत्व प्राप्त कर लेते हैं। अच्छा, अब तुम मेरी एक बात सुनो ॥ १५ ॥
पञ्च चैतानि सुभगे बदराणि शुभव्रते ।
पचेत्युक्त्वा तु भगवाञ्जगाम बलसूदनः ॥ १६ ॥
आमन्त्र्यतां तु कल्याणीं ततो जप्यं जजाप सः ।
अविदूरे ततस्तस्मादाश्रमात् तीर्थमुत्तमम् ॥ १७ ॥
'सुभगे! शुभव्रते! ये पाँच बेरके फल हैं। तुम इन्हें पका दो।' ऐसा कहकर भगवान् इन्द्र कल्याणी श्रुतावतीसे पूछकर उस आश्रमसे थोड़ी ही दूरपर स्थित उत्तम तीर्थमें गये और वहाँ स्नान करके जप करने लगे ॥ १६-१७ ॥
इन्द्रतीर्थेति विख्यातं त्रिषु लोकेषु मानद ।
तस्या जिज्ञासनार्थं स भगवान् पाकशासनः ॥ १८ ॥
बदराणामपचनं चकार विबुधाधिपः ।
मानद! वह तीर्थ तीनों लोकोंमें इन्द्रतीर्थके नामसे विख्यात है। देवराज भगवान् पाकशासनने उस कन्याके मनोभावकी परीक्षा लेनेके लिये उन बेरके फलोंको पकने नहीं दिया ॥ १८ १/२ ॥
ततः प्रतप्ता सा राजन् वाग्यता विगतक्लमा ॥ १९ ॥
तत्परा शुचिसंवीता पावके समधिश्रयत् ।
अपचद् राजशार्दूल बदराणि महाव्रता ॥ २० ॥
राजन्! तदनन्तर शौचाचारसे सम्पन्न उस तपस्विनीने थकावटसे रहित हो मौनभावसे उन फलोंको आगपर चढ़ा दिया। नृपश्रेष्ठ! फिर वह महाव्रता कुमारी बड़ी तत्परताके साथ उन बेरके फलोंको पकाने लगी ॥ १९-२० ॥
तस्याः पचन्त्याः सुमहान् कालोऽगात् पुरुषर्षभ ।
न च स्म तान्यपच्यन्त दिनं च क्षयमभ्यगात् ॥ २१ ॥
पुरुषप्रवर! उन फलोंको पकाते हुए उसका बहुत समय व्यतीत हो गया, परंतु वे फल पक न सके। इतनेमें ही दिन समाप्त हो गया ॥ २१ ॥
हुताशनेन दग्धश्च यस्तस्याः काष्ठसंचयः ।
अकाष्ठमग्निं सा दृष्ट्वा स्वशरीरमथादहत् ॥ २२ ॥
उसने जो ईंधन जमा कर रखे थे, वे सब आगमें जल गये। तब अग्निको ईंधनरहित देख उसने अपने शरीरको जलाना आरम्भ किया ॥ २२ ॥
पादौ प्रक्षिप्य सा पूर्वं पावके चारुदर्शना ।
दग्धौ दग्धौ पुनः पादावुपावर्तयतानघ ॥ २३ ॥

निष्पाप नरेश! मनोहर दिखायी देनेवाली उस कन्याने पहले अपने दोनों पैर आगमें डाल दिये। वे ज्यों-ज्यों जलने लगे, त्यों-ही-त्यों वह उन्हें आगके भीतर बढ़ाती गयी॥ २३॥

चरणौ दह्यमानौ च नाचिन्तयदनिन्दिता ।
कुर्वाणा दुष्करं कर्म महर्षिप्रियकाम्यया ॥ २४ ॥
उस साध्वीने अपने जलते हुए चरणोंकी कुछ भी परवा नहीं की। वह महर्षिका प्रिय करनेकी इच्छासे दुष्कर कार्य कर रही थी॥ २४॥

न वैमनस्यं तस्यास्तु मुखभेदोऽथवाभवत् ।
शरीरमग्निनाऽऽदीप्य जलमध्ये यथा स्थिता ॥ २५ ॥
उसके मनमें तनिक भी उदासी नहीं आयी। मुखकी कान्तिमें भी कोई अन्तर नहीं पड़ा। वह अपने शरीरको आगमें जलाकर भी ऐसी प्रसन्न थी, मानो जलके भीतर खड़ी हो॥ २५॥

तच्चास्या वचनं नित्यमवर्तद्धृदि भारत ।
सर्वथा बदराण्येव पक्तव्यानीति कन्यका ॥ २६ ॥
भारत! उसके मनमें निरन्तर इसी बातका चिन्तन होता रहता था कि ‘इन बेरके फलोंको हर तरहसे पकाना है’॥

सा तन्मनसि कृत्वैव महर्षेर्वचनं शुभा ।
अपचद् बदराण्येव न चापच्यन्त भारत ॥ २७ ॥
भरतनन्दन! महर्षिके वचनको मनमें रखकर वह शुभलक्षणा कन्या उन बेरोंको पकाती ही रही, परंतु वे पक न सके॥ २७॥

तस्यास्तु चरणौ वह्निर्ददाह भगवान् स्वयम् ।
न च तस्या मनोदुःखं स्वल्पमप्यभवत् तदा ॥ २८ ॥
भगवान् अग्निने स्वयं ही उसके दोनों पैरोंको जला दिया, तथापि उस समय उसके मनमें थोड़ा-सा भी दुःख नहीं हुआ॥ २८॥

अथ तत् कर्म दृष्ट्वास्याः प्रीतस्त्रिभुवनेश्वरः ।
ततः संदर्शयामास कन्यायै रूपमात्मनः ॥ २९ ॥
उसका वह कर्म देखकर त्रिभुवनके स्वामी इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए। फिर उन्होंने उस कन्याको अपना यथार्थ रूप दिखाया॥ २९॥

उवाच च सुरश्रेष्ठस्तां कन्यां सुदृढव्रताम् ।
प्रीतोऽस्मि ते शुभे भक्त्या तपसा नियमेन च ॥ ३० ॥
तस्माद् योऽभिमतः कामः स ते सम्पत्स्यते शुभे ।
देहं त्यक्त्वा महाभागे त्रिदिवे मयि वत्स्यसि ॥ ३१ ॥