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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

महासागरकी गर्जना थी; ऐसे द्रोणरूपी सागरको जो छोटे-बड़े नाना प्रकारके शस्त्रोंकी नौका बनाकर पार गये, वे ही राजकुमार असावधानीसे मार डाले गये ॥ १७-१८ ॥

न हि प्रमादात् परमस्ति कश्चिद् वधो नराणामिह जीवलोके । प्रमत्तमर्था हि नरं समन्तात् त्यजन्त्यनर्थाश्च समाविशन्ति ॥ १९ ॥

‘प्रमादसे बढ़कर इस संसारमें मनुष्योंके लिये दूसरी कोई मृत्यु नहीं। प्रमादी मनुष्यको सारे अर्थ सब ओरसे त्याग देते हैं और अनर्थ बिना बुलाये ही उसके पास चले आते हैं ॥ १९ ॥

ध्वजोत्तमाग्रोच्छ्रितधूमकेतुं शरार्चिषं कोपमहासमीरम् । महाधनुर्ज्यातलनेमिघोषं तनुत्रनानाविधशस्त्रहोमम् ॥ २० ॥ महाचमूकक्षदवाभिपन्नं महाहवे भीष्ममयाग्निदाहम् । ये सेहुरात्तायुधतीक्ष्णवेगं ते राजपुत्रा निहताः प्रमादात् ॥ २१ ॥

‘महासमरमें भीष्मरूपी अग्नि जब पाण्डव-सेनाको जला रही थी, उस समय ऊँची ध्वजाओंके शिखरपर फहराती हुई पताका ही धूमके समान जान पड़ती थी, बाण-वर्षा ही आगकी लपटें थीं, क्रोध ही प्रचण्ड वायु बनकर उस ज्वालाको बढ़ा रहा था, विशाल धनुषकी प्रत्यंचा, हथेली और रथके पहियोंका शब्द ही मानो उस अग्निदाहसे उठनेवाली चट-चट ध्वनि था, कवच और नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र उस आगकी आहुति बन रहे थे, विशाल सेनारूपी सूखे जंगलमें दावानलके समान वह आग लगी थी, हाथमें लिये हुए अस्त्र-शस्त्र ही उस अग्निके प्रचण्ड वेग थे, ऐसे अग्निदाहके कष्टको जिन्होंने सह लिया, वे ही राजपुत्र प्रमादवश मारे गये ॥ २०-२१ ॥

न हि प्रमत्तेन नरेण शक्यं विद्या तपः श्रीर्विपुलं यशो वा । पश्याप्रमादेन निहत्य शत्रून् सर्वान् महेन्द्रं सुखमेधमानम् ॥ २२ ॥

‘प्रमादी मनुष्य कभी विद्या, तप, वैभव अथवा महान् यश नहीं प्राप्त कर सकता। देखो, देवराज इन्द्र प्रमाद छोड़ देनेके ही कारण अपने सारे शत्रुओंका संहार करके सुखपूर्वक उन्नति कर रहे हैं ॥ २२ ॥

इन्द्रोपमान् पार्थिवपुत्रपौत्रान्

पश्याविशेषेण हतान् प्रमादात् । तीर्त्वा समुद्रं वणिजः समृद्धा मग्नाः कुनद्यामिव हेलमानाः ॥ २३ ॥ ‘देखो, प्रमादके ही कारण ये इन्द्रके समान पराक्रमी, राजाओंके पुत्र और पौत्र सामान्य रूपसे मार डाले गये, जैसे समृद्धिशाली व्यापारी समुद्रको पार करके प्रमादवश अवहेलना करनेके कारण छोटी-सी नदीमें डूब गये हों ॥ २३ ॥

अमर्षितैर्ये निहताः शयाना निःसंशयं ते त्रिदिवं प्रपन्नाः । कृष्णां तु शोचामि कथं नु साध्वी शोकार्णवे साद्य विनङ्क्ष्यतीति ॥ २४ ॥ ‘शत्रुओंने अमर्षके वशीभूत होकर जिन्हें सोते समय ही मार डाला है वे तो निःसंदेह स्वर्गलोकमें पहुँच गये हैं। मुझे तो उस सती साध्वी कृष्णाके लिये चिन्ता हो रही है जो आज शोकके समुद्रमें डूबकर नष्ट हो जानेकी स्थितिमें पहुँच गयी है ॥ २४ ॥

भ्रातॄंश्च पुत्रांश्च हतान् निशम्य पाञ्चालराजं पितरं च वृद्धम् । ध्रुवं विसंज्ञा पतिता पृथिव्यां सा शोष्यते शोककृशाङ्गयष्टिः ॥ २५ ॥ ‘एक तो पहलेसे ही शोकके कारण क्षीण होकर उसकी देह सूखी लकड़ीके समान हो गयी है? दूसरे फिर जब वह अपने भाइयों, पुत्रों तथा बूढ़े पिता पांचालराज द्रुपदकी मृत्युका समाचार सुनेगी तब और भी सूख जायगी तथा अवश्य ही अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़ेगी ॥ २५ ॥

तच्छोकजं दुःखमपारयन्ती कथं भविष्यत्युचिता सुखानाम् । पुत्रक्षयभ्रातृवधप्रणुन्ना प्रदह्यमानेन हुताशनेन ॥ २६ ॥ ‘जो सदा सुख भोगनेके ही योग्य है, वह उस शोकजनित दुःखको न सह सकनेके कारण न जाने कैसी दशाको पहुँच जायगी? पुत्रों और भाइयोंके विनाशसे व्यथित हो उसके हृदयमें जो शोककी आग जल उठेगी, उससे उसकी बड़ी शोचनीय दशा हो जायगी’ ॥ २६ ॥

इत्येवमार्तः परिदेवयन् स राजा कुरूणां नकुलं बभाषे । गच्छानयैनामिह मन्दभाग्यां समातृपक्षामिति राजपुत्रीम् ॥ २७ ॥

इस प्रकार आर्तस्वरसे विलाप करते हुए कुरुराज युधिष्ठिरने नकुलसे कहा—'भाई! जाओ, मन्दभागिनी राजकुमारी द्रौपदीको उसके मातृपक्षकी स्त्रियोंके साथ यहाँ लिया लाओ' ॥ २७ ॥

माद्रीसुतस्तत् परिगृह्य वाक्यं
धर्मेण धर्मप्रतिमस्य राज्ञः ।
ययौ रथेनालयमाशु देव्याः
पाञ्चालराजस्य च यत्र दाराः ॥ २८ ॥

माद्रीकुमार नकुलने धर्माचरणके द्वारा साक्षात् धर्मराजकी समानता करनेवाले राजा युधिष्ठिरकी आज्ञा शिरोधार्य करके रथके द्वारा तुरंत ही महारानी द्रौपदीके उस भवनकी ओर प्रस्थान किया, जहाँ पांचालराजके घरकी भी महिलाएँ रहती थीं ॥ २८ ॥

प्रस्थाप्य माद्रीसुतमजमीढः
शोकार्तितस्तैः सहितः सुहृद्भिः ।
रूरूयमाणः प्रययौ सुताना-
मायोधनं भूतगणानुकीर्णम् ॥ २९ ॥

माद्रीकुमारको वहाँ भेजकर अजमीढ़कुलनन्दन युधिष्ठिर शोकाकुल हो उन सभी सुहृदोंके साथ बारंबार रोते हुए पुत्रोंके उस युद्धस्थलमें गये, जो भूतगणोंसे भरा हुआ था ॥ २९ ॥

स तत् प्रविश्याशिवमुग्ररूपं
ददर्श पुत्रान् सुहृदः सखींश्च ।
भूमौ शयानान् रुधिरार्द्रगात्रान्
विभिन्नदेहान् प्रहृतोत्तमाङ्गान् ॥ ३० ॥

उस भयंकर एवं अमंगलमय स्थानमें प्रवेश करके उन्होंने अपने पुत्रों, सुहृदों और सखाओंको देखा, जो खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर पड़े थे। उनके शरीर छिन्न-भिन्न हो गये थे और मस्तक कट गये थे ॥ ३० ॥

स तांस्तु दृष्ट्वा भृशमार्तरूपो
युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः ।
उच्चैः प्रचुक्रोश च कौरवाग्र्यः
पपात चोर्व्यां सगणो विसंज्ञः ॥ ३१ ॥

उन्हें देखकर कुरुकुलशिरोमणि तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखी हो गये और उच्चस्वरसे फूट-फूटकर रोने लगे। धीरे-धीरे उनकी संज्ञा लुप्त हो गयी और वे अपने साथियोंसहित पृथ्वीपर गिर पड़े ॥

इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि युधिष्ठिरशिविरप्रवेशे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें युधिष्ठिरका शिविरमें प्रवेशविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥

अध्याय (पृष्ठ 3061)

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एकादशोऽध्यायः

युधिष्ठिरका शोकमें व्याकुल होना, द्रौपदीका विलाप तथा द्रोणकुमारके वधके लिये आग्रह, भीमसेनका अश्वत्थामाको मारनेके लिये प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच

स दृष्ट्वा निहतान् संख्ये पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा ।
महादुःखपरीतात्मा बभूव जनमेजय ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अपने पुत्रों, पौत्रों और मित्रोंको युद्धमें मारा गया देख राजा युधिष्ठिरका हृदय महान् दुःखसे संतप्त हो उठा ॥ १ ॥

ततस्तस्य महान् शोकः प्रादुरासीन्महात्मनः ।
स्मरतः पुत्रपौत्राणां भ्रातॄणां स्वजनस्य ह ॥ २ ॥
उस समय पुत्रों, पौत्रों, भाइयों और स्वजनोंका स्मरण करके उन महात्माके मनमें महान् शोक प्रकट हुआ ॥ २ ॥

तमश्रुपरिपूर्णाक्षं वेपमानमचेतसम् ।
सुहृदो भृशसंविग्नाः सान्त्वयाञ्चक्रिरे तदा ॥ ३ ॥
उनकी आँखें आँसुओंसे भर आयीं, शरीर काँपने लगा और चेतना लुप्त होने लगी। उनकी ऐसी अवस्था देख उनके सुहृद् अत्यन्त व्याकुल हो उस समय उन्हें सान्त्वना देने लगे ॥ ३ ॥

ततस्तस्मिन् क्षणे कल्पो रथेनादित्यवर्चसा ।
नकुलः कृष्णया सार्धमुपायात् परमार्तया ॥ ४ ॥
इसी समय सामर्थ्यशाली नकुल सूर्यके समान तेजस्वी रथके द्वारा शोकसे अत्यन्त पीड़ित हुई कृष्णाको साथ लेकर वहाँ आ पहुँचे ॥ ४ ॥

उपप्लव्यं गता सा तु श्रुत्वा सुमहदप्रियम् ।
तदा विनाशं सर्वेषां पुत्राणां व्यथिताभवत् ॥ ५ ॥
उस समय द्रौपदी उपप्लव्य नगरमें गयी हुई थी, वहाँ अपने सारे पुत्रोंके मारे जानेका अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर वह व्यथित हो उठी थी ॥ ५ ॥

कम्पमानेव कदली वातेनाभिसमीरिता ।
कृष्णा राजानमासाद्य शोकार्ता न्यपतद् भुवि ॥ ६ ॥
राजा युधिष्ठिरके पास पहुँचकर शोकसे व्याकुल हुई कृष्णा हवासे हिलायी गयी कदलीके समान कम्पित हो पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ६ ॥

बभूव वदनं तस्याः सहसा शोककर्षितम् । फुल्लपद्मपलाशाक्ष्यास्तमोग्रस्त इवांशुमान् ॥ ७ ॥ प्रफुल्ल कमलके समान विशाल एवं मनोहर नेत्रोंवाली द्रौपदीका मुख सहसा शोकसे पीड़ित हो राहुके द्वारा ग्रस्त हुए सूर्यके समान तेजोहीन हो गया ॥ ७ ॥

ततस्तां पतितां दृष्ट्वा संरम्भी सत्यविक्रमः । बाहुभ्यां परिजग्राह समुत्पत्य वृकोदरः ॥ ८ ॥ सा समाश्वासिता तेन भीमसेनेन भामिनी । उसे गिरी हुई देख क्रोधमें भरे हुए सत्यपराक्रमी भीमसेनने उछलकर दोनों बाँहोंसे उसको उठा लिया और उस मानिनी पत्नीको धीरज बँधाया ॥ ८½ ॥

रुदती पाण्डवं कृष्णा सा हि भारतमब्रवीत् ॥ ९ ॥ दिष्ट्या राजन्नवाप्येमामखिलां भोक्ष्यसे महीम् । आत्मजान् क्षत्रधर्मेण सम्प्रदाय यमाय वै ॥ १० ॥ उस समय रोती हुई कृष्णाने भरतनन्दन पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे कहा—'राजन्! सौभाग्यकी बात है कि आप क्षत्रिय-धर्मके अनुसार अपने पुत्रोंको यमराजकी भेंट चढ़ाकर यह सारी पृथ्वी पा गये और अब इसका उपभोग करेंगे ॥ ९-१० ॥

दिष्ट्या त्वं कुशली पार्थ मत्तमातङ्गगामिनीम् । अवाप्य पृथिवीं कृत्स्नां सौभद्रं न स्मरिष्यसि ॥ ११ ॥ 'कुन्तीनन्दन! सौभाग्यसे ही आपने कुशलपूर्वक रहकर इस मत्त-मातंगगामिनी सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य प्राप्त कर लिया, अब तो आपको सुभद्राकुमार अभिमन्युकी भी याद नहीं आयेगी ॥ ११ ॥

आत्मजान् क्षत्रधर्मेण श्रुत्वा शूरान् निपातितान् । उपप्लव्ये मया सार्धं दिष्ट्या त्वं न स्मरिष्यसि ॥ १२ ॥ 'अपने वीर पुत्रोंको क्षत्रिय-धर्मके अनुसार मारा गया सुनकर भी आप उपप्लव्यनगरमें मेरे साथ रहते हुए उन्हें सर्वथा भूल जायँगे; यह भी भाग्यकी ही बात है ॥

प्रसुप्तानां वधं श्रुत्वा द्रौणिना पापकर्मणा । शोकस्तपति मां पार्थ हुताशन इवाश्रयम् ॥ १३ ॥ 'पार्थ! पापाचारी द्रोणपुत्रके द्वारा मेरे सोये हुए पुत्रोंका वध किया गया, यह सुनकर शोक मुझे उसी प्रकार संतप्त कर रहा है, जैसे आग अपने आधारभूत काष्ठको ही जला डालती है ॥ १३ ॥

तस्य पापकृतो द्रौणेर्न चेदद्य त्वया रणे । ह्रियते सानुबन्धस्य युधि विक्रम्य जीवितम् ॥ १४ ॥ इहैव प्रायमासिष्ये तन्निबोधत पाण्डवाः । न चेत् फलमवाप्नोति द्रौणिः पापस्य कर्मणः ॥ १५ ॥

‘यदि आज आप रणभूमिमें पराक्रम प्रकट करके सगे-सम्बन्धियोंसहित पापाचारी द्रोणकुमारके प्राण नहीं हर लेते हैं तो मैं यहीं अनशन करके अपने जीवनका अन्त कर दूँगी। पाण्डवो! आप सब लोग इस बातको कान खोलकर सुन लें। यदि अश्वत्थामा अपने पापकर्मका फल नहीं पा लेता है तो मैं अवश्य प्राण त्याग दूँगी’।।

एवमुक्त्वा ततः कृष्णा पाण्डवं प्रत्युपाविशत् ।
युधिष्ठिरं याज्ञसेनी धर्मराजं यशस्विनी ॥ १६ ॥
ऐसा कहकर यशस्विनी द्रुपदकुमारी कृष्णा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके सामने ही अनशनके लिये बैठ गयी ॥ १६ ॥

दृष्ट्वोपविष्टां राजर्षिः पाण्डवो महिषीं प्रियाम् ।
प्रत्युवाच स धर्मात्मा द्रौपदीं चारुदर्शनाम् ॥ १७ ॥
अपनी प्रिय महारानी परम सुन्दरी द्रौपदीको उपवासके लिये बैठी देख धर्मात्मा राजर्षि युधिष्ठिरने उससे कहा— ॥ १७ ॥

धर्म्यं धर्मेण धर्मज्ञे प्राप्तास्ते निधनं शुभे ।
पुत्रास्ते भ्रातरश्चैव तान्न शोचितुमर्हसि ॥ १८ ॥
‘शुभे! तुम धर्मको जाननेवाली हो। तुम्हारे पुत्रों और भाइयोंने धर्मपूर्वक युद्ध करके धर्मानुकूल मृत्यु प्राप्त की है; अतः तुम्हें उनके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ १८ ॥

स कल्याणि वनं दुर्गं दूरं द्रौणिरितो गतः ।
तस्य त्वं पातनं संख्ये कथं ज्ञास्यसि शोभने ॥ १९ ॥
‘कल्याणि! द्रोणकुमार तो यहाँसे भागकर दुर्गम वनमें चला गया है। शोभने! यदि उसे युद्धमें मार गिराया जाय तो भी तुम्हें इसका विश्वास कैसे होगा?’ ॥

द्रौपद्युवाच

द्रोणपुत्रस्य सहजो मणिः शिरसि मे श्रुतः ।
निहत्य संख्ये तं पापं पश्येयं मणिमाहृतम् ॥ २० ॥
राजन् शिरसि ते कृत्वा जीवेयमिति मे मतिः ।
द्रौपदी बोली— महाराज! मैंने सुना है कि द्रोणपुत्रके मस्तकमें एक मणि है जो उसके जन्मके साथ ही पैदा हुई है। उस पापीको युद्धमें मारकर यदि वह मणि ला दी जायगी तो मैं उसे देख लूँगी। राजन्! उस मणिको आपके सिरपर धारण कराकर ही मैं जीवन धारण कर सकूँगी; ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय है ॥ २० १/२ ॥

इत्युक्त्वा पाण्डवं कृष्णा राजानं चारुदर्शना ॥ २१ ॥
भीमसेनमथागत्य परमं वाक्यमब्रवीत् ।
त्रातुमर्हसि मां भीम क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ॥ २२ ॥

पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर सुन्दरी कृष्णा भीमसेनके पास आयी और यह उत्तम वचन बोली—'प्रिय भीम! आप क्षत्रिय-धर्मका स्मरण करके मेरे जीवनकी रक्षा कर सकते हैं ।। २१-२२ ।। जहि तं पापकर्माणं शम्बरं मघवानिव । न हि ते विक्रमे तुल्यः पुमानस्तीह कश्चन ॥ २३ ॥ 'वीर! जैसे इन्द्रने शम्बरासुरको मारा था, उसी प्रकार आप भी उस पापकर्मी अश्वत्थामाका वध करें। इस संसारमें कोई भी पुरुष पराक्रममें आपकी समानता करनेवाला नहीं है ।। २३ ।। श्रुतं तत् सर्वलोकेषु परमव्यसने यथा । द्वीपोऽभूस्त्वं हि पार्थानां नगरे वारणावते ॥ २४ ॥ 'यह बात सम्पूर्ण जगत्में प्रसिद्ध है कि वारणावतनगरमें जब कुन्तीके पुत्रोंपर भारी संकट पड़ा था, तब आप ही द्वीपके समान उनके रक्षक हुए थे ।। हिडिम्बदर्शने चैव तथा त्वमभवो गतिः । तथा विराटनगरे कीचकेन भृशार्दिताम् ॥ २५ ॥ मामप्युद्धृतवान् कृच्छ्रात् पौलोमीं मघवानिव । 'इसी प्रकार हिडिम्बासुरसे भेंट होनेपर भी आप ही उनके आश्रयदाता हुए। विराटनगरमें जब कीचकने मुझे बहुत तंग कर दिया, तब उस महान् संकटसे आपने मेरा भी उसी तरह उद्धार किया, जैसे इन्द्रने शचीका किया था ।। २५१/२ ।। यथैतान्यकृथाः पार्थ महाकर्माणि वै पुरा ॥ २६ ॥ तथा द्रौणिममित्रघ्न विनिहत्य सुखी भव । 'शत्रुसूदन पार्थ! जैसे पूर्वकालमें ये महान् कर्म आपने किये थे, उसी प्रकार इस द्रोणपुत्रको भी मारकर सुखी हो जाइये' ।। २६१/२ ।। तस्या बहुविधं दुःखान्निशम्य परिदेवितम् ॥ २७ ॥ नामर्षयत कौन्तेयो भीमसेनो महाबलः । दुःखके कारण द्रौपदीका यह भाँति-भाँतिका विलाप सुनकर महाबली कुन्तीकुमार भीमसेन इसे सहन न कर सके ।। स काञ्चनविचित्राङ्गमारुरोह महारथम् ॥ २८ ॥ आदाय रुचिरं चित्रं समार्गणगुणं धनुः । नकुलं सारथिं कृत्वा द्रोणपुत्रवधे धृतः ॥ २९ ॥ विस्फार्य सशरं चापं तूर्णमश्वानचोदयत् । वे द्रोणपुत्रके वधका निश्चय करके सुवर्णभूषित विचित्र अंगोंवाले रथपर आरूढ़ हुए। उन्होंने बाण और प्रत्यंचासहित एक सुन्दर एवं विचित्र धनुष हाथमें लेकर नकुलको सारथि बनाया तथा बाणसहित धनुषको फैलाकर तुरंत ही घोड़ोंको हँकवाया ।। २८-२९१/२ ।।

ते हयाः पुरुषव्याघ्र चोदिता वातरंहसः ॥ ३० ॥
वेगेन त्वरिता जग्मुर्हरयः शीघ्रगामिनः ।
पुरुषसिंह नरेश! नकुलके द्वारा हाँके गये वे वायुके समान वेगवाले शीघ्रगामी घोड़े बड़ी उतावलीके साथ तीव्र गतिसे चल दिये ॥ ३० १/२ ॥
शिबिरात् स्वाद् गृहीत्वा स रथस्य पदमच्युतः ॥ ३१ ॥
(द्रोणपुत्रगतेनाशु ययौ मार्गेण भारत ।)
भरतनन्दन! छावनीसे बाहर निकलकर अपनी टेकसे न टलनेवाले भीमसेन अश्वत्थामाके रथका चिह्न देखते हुए उसी मार्गसे शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़े, जिससे द्रोणपुत्र अश्वत्थामा गया था ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि द्रौणिवधार्थं भीमसेनगमने एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें अश्वत्थामाके वधके लिये भीमसेनका प्रस्थानविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३१ १/२ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 3066)

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द्वादशोऽध्यायः

श्रीकृष्णका अश्वत्थामाकी चपलता एवं क्रूरताके प्रसंगमें सुदर्शनचक्र माँगनेकी बात सुनाते हुए उससे भीमसेनकी रक्षाके लिये प्रयत्न करनेका आदेश देना

वैशम्पायन उवाच

तस्मिन् प्रयाते दुर्धर्षे यदूनामृषभस्ततः ।
अब्रवीत् पुण्डरीकाक्षः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! दुर्धर्ष वीर भीमसेनके चले जानेपर यदुकुलतिलक कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरसे कहा— ॥ १ ॥

एष पाण्डव ते भ्राता पुत्रशोकपरायणः ।
जिघांसुर्द्रौणिमाक्रन्दे एक एवाभिधावति ॥ २ ॥
'पाण्डुनन्दन! ये आपके भाई भीमसेन पुत्रशोकमें मग्न होकर युद्धमें द्रोणकुमारके वधकी इच्छासे अकेले ही उसपर धावा कर रहे हैं ॥ २ ॥

भीमः प्रियस्ते सर्वेभ्यो भ्रातृभ्यो भरतर्षभ ।
तं कृच्छ्रगतमद्य त्वं कस्मान्नाभ्युपपद्यसे ॥ ३ ॥
'भरतश्रेष्ठ! भीमसेन आपको समस्त भाइयोंसे अधिक प्रिय हैं; किंतु आज वे संकटमें पड़ गये हैं। फिर आप उनकी सहायताके लिये जाते क्यों नहीं हैं? ॥

यत् तदाचष्ट पुत्राय द्रोणः परपुरञ्जयः ।
अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम दहेत पृथिवीमपि ॥ ४ ॥
'शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले द्रोणाचार्यने अपने पुत्रको जिस ब्रह्मशिर नामक अस्त्रका उपदेश दिया है, वह समस्त भूमण्डलको भी दग्ध कर सकता है ॥ ४ ॥

तन्महात्मा महाभागः केतुः सर्वधनुष्मताम् ।
प्रत्यपादयदाचार्यः प्रीयमाणो धनंजयम् ॥ ५ ॥
'सम्पूर्ण धनुर्धरोंके सिरमौर महाभाग महात्मा द्रोणाचार्यने प्रसन्न होकर वह अस्त्र पहले अर्जुनको दिया था ॥ ५ ॥

तं पुत्रोऽप्येक एवैनमन्वयाचदमर्षणः ।
ततः प्रोवाच पुत्राय नातिहृष्टमना इव ॥ ६ ॥
'अश्वत्थामा इसे सहन न कर सका। वह उनका एकलौता पुत्र था; अतः उसने भी अपने पितासे उसी अस्त्रके लिये प्रार्थना की। तब आचार्यने अपने पुत्रको उस अस्त्रका उपदेश कर दिया; किंतु इससे उनका मन अधिक प्रसन्न नहीं था ॥ ६ ॥

विदितं चापलं ह्यासीदात्मजस्य दुरात्मनः ।
सर्वधर्मविदाचार्यः सोऽन्वशात् स्वसुतं ततः ॥ ७ ॥
‘उन्हें अपने दुरात्मा पुत्रकी चपलता ज्ञात थी; अतः सब धर्मोंके ज्ञाता आचार्यने अपने पुत्रको इस प्रकार शिक्षा दी— ॥ ७ ॥

परमापद्गतेनापि न स्म तात त्वया रणे ।
इदमस्त्रं प्रयोक्तव्यं मानुषेषु विशेषतः ॥ ८ ॥
“बेटा! बड़ी-से-बड़ी आपत्तिमें पड़नेपर भी तुम्हें रणभूमिमें विशेषतः मनुष्योंपर इस अस्त्रका प्रयोग नहीं करना चाहिये' ॥ ८ ॥

इत्युक्तवान् गुरुः पुत्रं द्रोणः पश्चादथोक्तवान् ।
न त्वं जातु सतां मार्गे स्थातेति पुरुषर्षभ ॥ ९ ॥
‘नरश्रेष्ठ! अपने पुत्रसे ऐसा कहकर गुरु द्रोण पुनः उससे बोले—‘बेटा! मुझे संदेह है कि तुम कभी सत्पुरुषोंके मार्गपर स्थिर नहीं रहोगे' ॥ ९ ॥

स तदाज्ञाय दुष्टात्मा पितुर्वचनमप्रियम् ।
निराशः सर्वकल्याणैः शोकात् पर्यचरन्महीम् ॥ १० ॥
‘पिताके इस अप्रिय वचनको सुन और समझकर दुष्टात्मा द्रोणपुत्र सब प्रकारके कल्याणकी आशा छोड़ बैठा और बड़े शोकसे पृथ्वीपर विचरने लगा ॥ १० ॥

ततस्तदा कुरुश्रेष्ठ वनस्थे त्वयि भारत ।
अवसद् द्वारकामेत्य वृष्णिभिः परमार्चितः ॥ ११ ॥
‘भरतनन्दन! कुरुश्रेष्ठ! तदनन्तर जब तुम वनमें रहते थे, उन्हीं दिनों अश्वत्थामा द्वारकामें आकर रहने लगा। वहाँ वृष्णिवंशियोंने उसका बड़ा सत्कार किया ॥ ११ ॥

स कदाचित् समुद्रान्ते वसन् द्वारवतीमनु ।
एक एकं समागम्य मामुवाच हसन्निव ॥ १२ ॥
‘एक दिन द्वारकामें समुद्रके तटपर रहते समय उसने अकेले ही मुझ अकेलेके पास आकर हँसते हुए-से कहा— ॥ १२ ॥

यत् तदुग्रं तपः कृष्ण चरन् सत्यपराक्रमः ।
अगस्त्याद् भारताचार्यः प्रत्यपद्यत मे पिता ॥ १३ ॥
अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम देवगन्धर्वपूजितम् ।
तदद्य मयि दाशार्ह यथा पितरि मे तथा ॥ १४ ॥
अस्मत्तस्तदुपादाय दिव्यमस्त्रं यदूत्तम ।
ममात्यस्त्रं प्रयच्छ त्वं चक्रं रिपुहणं रणे ॥ १५ ॥
“दशार्हनन्दन! श्रीकृष्ण! भरतवंशके आचार्य मेरे सत्यपराक्रमी पिताने उग्र तपस्या करके महर्षि अगस्त्यसे जो ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया था, वह देवताओं और गन्धर्वोंद्वारा सम्मानित अस्त्र इस समय जैसा मेरे पिताके पास है, वैसा ही मेरे पास भी है; अतः यदुश्रेष्ठ!

आप मुझसे वह दिव्य अस्त्र लेकर रणभूमिमें शत्रुओंका नाश करनेवाला अपना चक्र नामक अस्त्र मुझे दे दीजिये' ।। १३—१५ ।।

स राजन् प्रीयमाणेन मयाप्युक्तः कृताञ्जलिः । याचमानः प्रयत्नेन मत्तोऽस्त्रं भरतर्षभ ।। १६ ।।

‘भरतश्रेष्ठ! वह हाथ जोड़कर बड़े प्रयत्नके द्वारा मुझसे अस्त्रकी याचना कर रहा था, तब मैंने भी प्रसन्नतापूर्वक ही उससे कहा— ।। १६ ।।

देवदानवगन्धर्वमनुष्यपतगोरगाः । न समा मम वीर्यस्य शतांशेनापि पिण्डिताः ।। १७ ।।

“ब्रह्मन्! देवता, दानव, गन्धर्व, मनुष्य, पक्षी और नाग—ये सब मिलकर मेरे पराक्रमके सौवें अंशकी भी समानता नहीं कर सकते ।। १७ ।।

इदं धनुरियं शक्तिरिदं चक्रमियं गदा । यद्यदिच्छसि चेदस्त्रं मत्तस्तत् तद् ददामि ते ।। १८ ।।

“यह मेरा धनुष है, यह शक्ति है, यह चक्र है और यह गदा है। तुम जो-जो अस्त्र मुझसे लेना चाहते हो, वही वह तुम्हें दिये देता हूँ ।। १८ ।।

यच्छक्नोषि समुद्यन्तुं प्रयोक्तुमपि वा रणे । तद् गृहाण विनास्त्रेण यन्मे दातुमभीप्ससि ।। १९ ।।

“तुम मुझे जो अस्त्र देना चाहते हो, उसे दिये बिना ही रणभूमिमें मेरे जिस आयुधको उठा अथवा चला सको, उसे ही ले लो' ।। १९ ।।

स सुनाभं सहस्रारं वज्रनाभमयस्मयम् । वव्रे चक्रं महाभागो मत्तः स्पर्धन्मया सह ।। २० ।।

‘तब उस महाभागने मेरे साथ स्पर्धा रखते हुए मुझसे मेरा वह लोहमय चक्र माँगा, जिसकी सुन्दर नाभिमें वज्र लगा हुआ है तथा जो एक सहस्र अरोंसे सुशोभित होता है! ।। २० ।।

गृहाण चक्रमित्युक्तो मया तु तदनन्तरम् । जग्राहोत्पत्य सहसा चक्रं सव्येन पाणिना ।। २१ ।।

‘मैंने भी कह दिया—‘ले लो चक्र,' मेरे इतना कहते ही उसने सहसा उछलकर बायें हाथसे चक्रको पकड़ लिया ।। २१ ।।

न चैनमशकत् स्थानात् संचालयितुमप्युत । अथैनं दक्षिणेनापि गृहीतुमुपचक्रमे ।। २२ ।।

‘परंतु वह उसे अपनी जगहसे हिला भी न सका। तब उसने उसे दाहिने हाथसे उठानेका प्रयत्न आरम्भ किया ।। २२ ।।

सर्वयत्नबलेनापि गृह्णन्नेवमिदं ततः । ततः सर्वबलेनापि यदैनं न शशाक ह ।। २३ ।।

उद्यन्तुं वा चालयितुं द्रौणिः परमदुर्मनाः । कृत्वा यत्नं परिश्रान्तः स न्यवर्तत भारत ॥ २४ ॥ 'सारा प्रयत्न और सारी शक्ति लगाकर भी जब उसे पकड़कर उठा अथवा हिला न सका, तब द्रोणकुमार मन-ही-मन बहुत दुःखी हो गया। भारत! यत्न करके थक जानेपर वह उसे लेनेकी चेष्टासे निवृत्त हो गया ।। २३-२४ ।।

निवृत्तमनसं तस्मादभिप्रयाद् विचेतसम् । अहमामन्त्र्य संविग्नमश्वत्थामानमब्रुवम् ॥ २५ ॥ 'जब उस संकल्पसे उसका मन हट गया और वह दुःखसे अचेत एवं उद्विग्न हो गया, तब मैंने अश्वत्थामाको बुलाकर पूछा— ।। २५ ।।

यः सदैव मनुष्येषु प्रमाणं परमं गतः । गाण्डीवधन्वा श्वेताश्वः कपिप्रवरकेतनः ॥ २६ ॥ यः साक्षाद् देवदेवेशं शितिकण्ठमुमापतिम् । द्वन्द्वयुद्धे पराजिष्णुस्तोषायामास शङ्करम् ॥ २७ ॥ यस्मात् प्रियतरो नास्ति ममान्यः पुरुषो भुवि । नादेयं यस्य मे किञ्चिदपि दाराः सुतास्तथा ॥ २८ ॥ तेनापि सुहृदा ब्रह्मन् पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा । नोक्तपूर्वमिदं वाक्यं यत् त्वं मामभिभाषसे ॥ २९ ॥ “ब्रह्मन्! जो मनुष्य समाजमें सदा ही परम प्रामाणिक समझे जाते हैं, जिनके पास गाण्डीव धनुष और श्वेत घोड़े हैं, जिनकी ध्वजापर श्रेष्ठ वानर विराजमान होता है, जिन्होंने द्वन्द्वयुद्धमें साक्षात् देवदेवेश्वर नीलकण्ठ उमा-वल्लभ भगवान् शंकरको पराजित करनेका साहस करके उन्हें संतुष्ट किया था, इस भूमण्डलमें मुझे जिनसे बढ़कर परम प्रिय दूसरा कोई मनुष्य नहीं है, जिनके लिये मेरे पास स्त्री, पुत्र आदि कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो देने योग्य न हो, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले मेरे उस प्रिय सुहृद् कुन्तीकुमार अर्जुनने भी पहले कभी ऐसी बात नहीं कही थी, जो आज तुम मुझसे कह रहे हो ।।

ब्रह्मचर्यं महत् घोरं तीर्त्वा द्वादशवार्षिकम् । हिमवत्पार्श्वमास्थाय यो मया तपसार्जितः ॥ ३० ॥ समानव्रतचारिण्यां रुक्मिण्यां योऽन्वजायत । सनत्कुमारस्तेजस्वी प्रद्युम्नो नाम मे सुतः ॥ ३१ ॥ तेनाप्येतन्महद् दिव्यं चक्रमप्रतिमं रणे । न प्रार्थितमभून्मूढ यदिदं प्रार्थितं त्वया ॥ ३२ ॥ “मूढ़ ब्राह्मण! मैंने बारह वर्षोंतक अत्यन्त घोर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करके हिमालयकी घाटीमें रहकर बड़ी भारी तपस्याके द्वारा जिसे प्राप्त किया था, मेरे समान व्रतका पालन करनेवाली रुक्मिणीदेवीके गर्भसे जिसका जन्म हुआ है, जिसके रूपमें

साक्षात् तेजस्वी सनत्कुमारने ही मेरे यहाँ अवतार लिया है, वह प्रद्युम्न मेरा प्रिय पुत्र है। परंतु रणभूमिमें जिसकी कहीं तुलना नहीं है, मेरे इस परम दिव्य चक्रको कभी उस प्रद्युम्नने भी नहीं माँगा था, जिसकी आज तुमने माँग की है ।। रामेणातिबलेनैतन्नोक्तपूर्वं कदाचन । न गदेन न साम्बेन यदिदं प्रार्थितं त्वया ॥ ३३ ॥ “अत्यन्त बलशाली बलरामजीने भी पहले कभी ऐसी बात नहीं कही है। जिसे तुमने माँगा है, उसे गद और साम्बने भी कभी लेनेकी इच्छा नहीं की ॥ ३३ ॥ द्वारकावासिभिश्चान्यैर्वृष्ण्यन्धकमहारथैः । नोक्तपूर्वमिदं जातु यदिदं प्रार्थितं त्वया ॥ ३४ ॥ “द्वारकामें निवास करनेवाले जो अन्य वृष्णि तथा अन्धकवंशके महारथी हैं, उन्होंने भी कभी मेरे सामने ऐसा प्रस्ताव नहीं किया था, जैसा कि तुमने इस चक्रको माँगते हुए किया है ॥ ३४ ॥ भारताचार्यपुत्रस्त्वं मानितः सर्वयादवैः । चक्रेण रथिनां श्रेष्ठ कं नु तात युयुत्ससे ॥ ३५ ॥ “तात! रथियोंमें श्रेष्ठ! तुम तो भरतकुलके आचार्यके पुत्र हो। सम्पूर्ण यादवोंने तुम्हारा बड़ा सम्मान किया है। फिर बताओ तो सही, इस चक्रके द्वारा तुम किसके साथ युद्ध करना चाहते हो?' ॥ ३५ ॥ एवमुक्तो मया द्रौणिर्मामिदं प्रत्युवाच ह । प्रयुज्य भवते पूजां योत्स्ये कृष्ण त्वया सह ॥ ३६ ॥ प्रार्थितं ते मया चक्रं देवदानवपूजितम् । अजेयः स्यामिति विभो सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३७ ॥ 'जब मैंने इस तरह पूछा, तब द्रोणकुमारने मुझे इस प्रकार उत्तर दिया—'श्रीकृष्ण! मैं आपकी पूजा करके फिर आपके ही साथ युद्ध करूँगा। प्रभो! मैं यह सच कहता हूँ कि मैंने इस देव-दानवपूजित चक्रको आपसे इसीलिये माँगा था कि इसे पाकर अजेय हो जाऊँ ।। त्वत्तोऽहं दुर्लभं काममनवाप्यैव केशव । प्रतियास्यामि गोविन्द शिवेनाभिवदस्व माम् ॥ ३८ ॥ “किंतु केशव! अब मैं अपनी इस दुर्लभ कामनाको आपसे प्राप्त किये बिना ही लौट जाऊँगा। गोविन्द! आप मुझसे केवल इतना कह दें कि 'तेरा कल्याण हो' ॥ ३८ ॥ एतत् सुभीमं भीमानावृषभेण त्वया धृतम् । चक्रमप्रतिचक्रेण भुवि नान्योऽभिपद्यते ॥ ३९ ॥ “यह चक्र अत्यन्त भयंकर है और आप भी भयानक वीरोंके शिरोमणि हैं। आपके किसी विरोधीके पास ऐसा चक्र नहीं है। आपने ही इसे धारण कर रखा है। इस भूतलपर दूसरा कोई पुरुष इसे नहीं उठा सकता' ॥ ३९ ॥

एतावदुक्त्वा द्रौणिर्मां युग्यानश्वान् धनानि च । आदायोपययौ काले रत्नानि विविधानि च ॥ ४० ॥ ‘मुझसे इतना ही कहकर द्रोणकुमार अश्वत्थामा रथमें जोतने योग्य घोड़े, धन तथा नाना प्रकारके रत्न लेकर वहाँसे यथासमय लौट गया ।। ४० ।। स संरम्भी दुरात्मा च चपलः क्रूर एव च । वेद चास्त्रं ब्रह्मशिरस्तस्माद् रक्ष्यो वृकोदरः ॥ ४१ ॥ ‘वह क्रोधी, दुष्टात्मा, चपल और क्रूर है। साथ ही उसे ब्रह्मास्त्रका भी ज्ञान है; अतः उससे भीमसेनकी रक्षा करनी चाहिये’ ।। ४१ ।।

इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि युधिष्ठिरकृष्णसंवादे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें युधिष्ठिर और श्रीकृष्णका संवादविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२ ।।

अध्याय (पृष्ठ 3072)

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त्रयोदशोऽध्यायः

श्रीकृष्ण, अर्जुन और युधिष्ठिरका भीमसेनके पीछे जाना, भीमका गंगातटपर पहुँचकर अश्वत्थामाको ललकारना और अश्वत्थामाके द्वारा ब्रह्मास्त्रका प्रयोग

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा युधां श्रेष्ठः सर्वयादवनन्दनः ।
सर्वायुधवरोपेतमारुरोह रथोत्तमम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! सम्पूर्ण यादवकुलको आनन्दित करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण ऐसा कहकर समस्त श्रेष्ठ आयुधोंसे सम्पन्न उत्तम रथपर आरूढ़ हुए ॥ १ ॥

युक्तं परमकाम्बोजैस्तुरगैर्हेममालिभिः ।
आदित्योदयवर्णस्य धुरं रथवरस्य तु ॥ २ ॥
दक्षिणामवहच्छैब्यः सुग्रीवः सव्यतोऽभवत् ।
पार्ष्णिवाहौ तु तस्यास्तां मेघपुष्पबलाहकौ ॥ ३ ॥
उसमें सोनेकी माला पहने हुए अच्छी जातिके काबुली घोड़े जुते हुए थे। उस श्रेष्ठ रथकी कान्ति उदयकालीन सूर्यके समान अरुण थी। उसकी दाहिनी धुरीका बोझ शैव्य ढो रहा था और बायींका सुग्रीव। उन दोनोंके पार्श्वभागमें क्रमशः मेघपुष्प और बलाहक जुते हुए थे ॥ २-३ ॥

विश्वकर्मकृता दिव्या रत्नधातुविभूषिता ।
उच्छ्रितेव रथे माया ध्वजयष्टिरदृश्यत ॥ ४ ॥
उस रथपर विश्वकर्माद्वारा निर्मित तथा रत्नमय धातुओंसे विभूषित दिव्य ध्वजा दिखायी दे रही थी, जो ऊँचे उठी हुई मायाके समान प्रतीत होती थी ॥ ४ ॥

वैनतेयः स्थितस्तस्यां प्रभामण्डलरश्मिवान् ।
तस्य सत्यवतः केतुर्भुजगारिरदृश्यत ॥ ५ ॥
उस ध्वजापर प्रभापुंज एवं किरणोंसे सुशोभित विनतानन्दन गरुड़ विराज रहे थे। सर्पोंके शत्रु गरुड़ सत्यवान् श्रीकृष्णके रथकी पताकाके रूपमें दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ५ ॥

अथारोहद्धृषीकेशः केतुः सर्वधनुष्मताम् ।
अर्जुनः सत्यकर्मा च कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥
सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण पहले उस रथपर सवार हुए। तत्पश्चात् सत्यपराक्रमी अर्जुन तथा कुरुराज युधिष्ठिर उस रथपर बैठे ॥ ६ ॥

अशोभेतां महात्मानौ दाशार्हमभितः स्थितौ । रथस्थं शार्ङ्गधन्वानमश्विनाविव वासवम् ॥ ७ ॥ वे दोनों महात्मा पाण्डव रथपर स्थित हुए शार्ङ्ग धनुषधारी दाशार्हकुलनन्दन श्रीकृष्णके समीप विराजमान हो इन्द्रके पास बैठे हुए दोनों अश्विनीकुमारोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ७ ॥

तावुपारोप्य दाशार्हः स्यन्दनं लोकपूजितम् । प्रतोदेन जवोपेतान् परमाश्वानचोदयत् ॥ ८ ॥ उन दोनों भाइयोंको उस लोकपूजित रथपर चढ़ाकर दशार्हवंशी श्रीकृष्णने वेगशाली उत्तम अश्वोंको चाबुकसे हाँका ॥ ८ ॥

ते हयाः सहसोत्पेतुरृहीत्वा स्यन्दनोत्तमम् । आस्थितं पाण्डवेयाभ्यां यदूनामृषभेण च ॥ ९ ॥ वे घोड़े दोनों पाण्डवों तथा यदुकुलतिलक श्रीकृष्णकी सवारीमें आये हुए उस उत्तम रथको लेकर सहसा उड़ चले ॥ ९ ॥

वहतां शार्ङ्गधन्वानमश्वानां शीघ्रगामिनाम् । प्रादुरासीन्महान् शब्दः पक्षिणां पततामिव ॥ १० ॥ शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णकी सवारी ढोते हुए उन शीघ्रगामी अश्वोंका महान् शब्द उड़ते हुए पक्षियोंके समान प्रकट हो रहा था ॥ १० ॥

ते समाच्छन्नरव्याघ्राः क्षणेन भरतर्षभ । भीमसेनं महेष्वासं समनुद्रुत्य वेगिताः ॥ ११ ॥ भरतश्रेष्ठ! वे तीनों नरश्रेष्ठ बड़े वेगसे पीछे-पीछे दौड़कर क्षणभरमें महाधनुर्धर भीमसेनके पास जा पहुँचे ॥ ११ ॥

क्रोधदीप्तं तु कौन्तेयं द्विषदर्थे समुद्यतम् । नाशक्नुवन् वारयितुं समेत्यापि महारथाः ॥ १२ ॥ इस समय कुन्तीकुमार भीमसेन क्रोधसे प्रज्वलित हो शत्रुके संहार करनेके लिये तुले हुए थे। इसलिये वे तीनों महारथी उनसे मिलकर भी उन्हें रोक न सके ॥ १२ ॥

स तेषां प्रेक्षतामेव श्रीमतां दृढधन्विनाम् । ययौ भागीरथीतीरं हरिभिर्भृशवेगितैः ॥ १३ ॥ यत्र स्म श्रूयते द्रौणिः पुत्रहन्ता महात्मनाम् । उन सुदृढ़ धनुर्धर तेजस्वी वीरोंके देखते-देखते वे अत्यन्त वेगशाली घोड़ोंके द्वारा भागीरथीके तटपर जा पहुँचे, जहाँ उन महात्मा पाण्डवोंके पुत्रोंका वध करनेवाला अश्वत्थामा बैठा सुना गया था ॥ १३ ½ ॥

स ददर्श महात्मानमुदकान्ते यशस्विनम् ॥ १४ ॥ कृष्णद्वैपायनं व्यासमासीनमृषिभिः सह ।

तं चैव क्रूरकर्माणं घृताक्तं कुशचीरिनम् ॥ १५ ॥
रजसा ध्वस्तमासीनं ददर्श द्रौणिमन्तिके ।
वहाँ जाकर उन्होंने गङ्गाजीके जलके किनारे परम यशस्वी महात्मा श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यासको अनेकों महर्षियोंके साथ बैठे देखा। उनके पास ही वह क्रूरकर्मा द्रोणपुत्र भी बैठा दिखायी दिया। उसने अपने शरीरमें घी लगाकर कुशका चीर पहन रखा था। उसके सारे अंगोंपर धूल छा रही थी ॥ १४-१५ १/२ ॥

तमभ्यधावत् कौन्तेयः प्रगृह्य सशरं धनुः ॥ १६ ॥
भीमसेनो महाबाहुस्तिष्ठेति चाब्रवीत् ।
कुन्तीकुमार महाबाहु भीमसेन बाणसहित धनुष लिये उसकी ओर दौड़े और बोले—'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ १६ १/२ ॥

स दृष्ट्वा भीमधन्वानं प्रगृहीतशरासनम् ॥ १७ ॥
भ्रातरौ पृष्ठतश्चास्य जनार्दनरथे स्थितौ ।
व्यथितात्माभवद् द्रौणिः प्राप्तं चेदममन्यत ॥ १८ ॥
अश्वत्थामाने देखा कि भयंकर धनुर्धर भीमसेन हाथमें धनुष लिये आ रहे हैं। उनके पीछे श्रीकृष्णके रथपर बैठे हुए दो भाई और हैं। यह सब देखकर द्रोणकुमारके हृदयमें बड़ी व्यथा हुई। उस घबराहटमें उसने यही करना उचित समझा ॥ १७-१८ ॥

स तद् दिव्यमदीनात्मा परमास्त्रमचिन्तयत् ।
जग्राह च स चैषीकां द्रौणिः सव्येन पाणिना ॥ १९ ॥
उदारहृदय अश्वत्थामाने उस दिव्य एवं उत्तम अस्त्रका चिन्तन किया। साथ ही बायें हाथसे एक सींक उठा ली ॥ १९ ॥

स तामापदमासाद्य दिव्यमस्त्रमुदैरयत् ।
अमृष्यमाणस्तान् शूरान् दिव्यायुधवरान् स्थितान् ॥ २० ॥
अपाण्डवायेति रुषा व्यसृजद् दारुणं वचः ।
दिव्य आयुध धारण करके खड़े हुए उन शूरवीरोंका आना वह सहन न कर सका। उस आपत्तिमें पड़कर उसने रोषपूर्वक दिव्यास्त्रका प्रयोग किया और मुखसे कठोर वचन निकाला कि 'यह अस्त्र समस्त पाण्डवोंका विनाश कर डाले' ॥ २० १/२ ॥

इत्युक्त्वा राजशार्दूल द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ॥ २१ ॥
सर्वलोकप्रमोहार्थं तदस्त्रं प्रमुमोच ह ।
नृपश्रेष्ठ! ऐसा कहकर प्रतापी द्रोणपुत्रने सम्पूर्ण लोकोंको मोहमें डालनेके लिये वह अस्त्र छोड़ दिया ॥ २१ १/२ ॥

ततस्तस्यामिषीकायां पावकः समजायत ।
प्रधक्ष्यन्निव लोकांस्त्रीन् कालान्तकयमोपमः ॥ २२ ॥

तदनन्तर उस सींकमें काल, अन्तक और यमराजके समान भयंकर आग प्रकट हो गयी। उस समय ऐसा जान पड़ा कि वह अग्नि तीनों लोकोंको जलाकर भस्म कर डालेगी ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि ब्रह्मशिरोऽस्त्रत्यागे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें अश्वत्थामाके द्वारा ब्रह्मास्त्रका प्रयोगविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 3076)

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चतुर्दशोऽध्यायः

अश्वत्थामाके अस्त्रका निवारण करनेके लिये अर्जुनके द्वारा ब्रह्मास्त्रका प्रयोग एवं वेदव्यासजी और देवर्षि नारदका प्रकट होना

वैशम्पायन उवाच

इङ्गितेनैव दाशार्हस्तमभिप्रायमादितः ।
द्रौणेर्बुद्ध्वा महाबाहुरर्जुनं प्रत्यभाषत ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! दशार्हनन्दन महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण अश्वत्थामाकी चेष्टासे ही उसके मनका भाव पहले ही ताड़ गये थे। उन्होंने अर्जुनसे कहा— ॥ १ ॥