भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

‘अतः आपलोग संग्राममें मेरी रक्षा करें। कहीं ऐसा न हो कि अर्जुन आपलोगोंके सिरपर पैर रखकर अपने लक्ष्यतक पहुँच जाय; अतः इसके लिये आप आवश्यक व्यवस्था करें।। १५ ।।

अथ रक्षा न मे संख्ये क्रियते कुरुनन्दन ।
अनुजानीहि मां राजन् गमिष्यामि गृहान् प्रति ।। १६ ।।
‘कुरुनन्दन! यदि आप युद्धमें मेरी रक्षा न कर सकें तो मुझे आज्ञा दें; राजन्! मैं अपने घर चला जाऊँगा ।। १६ ।।

एवमुक्तस्तवावाक्शीर्षो विमनाः स सुयोधनः ।
श्रुत्वा तं समयं तस्य ध्यानमेवान्वपद्यत ।। १७ ।।
‘जयद्रथके ऐसा कहनेपर दुर्योधन अपना सिर नीचे किये मन-ही-मन बहुत दुःखी हो गया और तुम्हारी उस प्रतिज्ञाको सुनकर उसे बड़ी भारी चिन्ता हो गयी ।। १७ ।।

तमार्तमभिसंप्रेक्ष्य राजा किल स सैन्धवः ।
मृदु चात्महितं चैव साक्षेपमिदमुक्तवान् ।। १८ ।।
‘दुर्योधनको उद्विग्नचित्त देखकर सिन्धुराज जयद्रथने व्यंग्य करते हुए कोमल वाणीमें अपने हितकी बात इस प्रकार कही— ।। १८ ।।

नेह पश्यामि भवतां तथावीर्यं धनुर्धरम् ।
योऽर्जुनस्यास्त्रमस्त्रेण प्रतिहन्यान्महाहवे ।। १९ ।।
‘राजन्! आपकी सेनामें किसी भी ऐसे पराक्रमी धनुर्धरको नहीं देखता, जो उस महायुद्धमें अपने अस्त्रद्वारा अर्जुनके अस्त्रका निवारण कर सके ।। १९ ।।

वासुदेवसहायस्य गाण्डीवं धुन्वतो धनुः ।
कोऽर्जुनस्याग्रतस्तिष्ठेत् साक्षादपि शतक्रतुः ।। २० ।।
‘श्रीकृष्णके साथ आकर गाण्डीव धनुषका संचालन करते हुए अर्जुनके सामने कौन खड़ा हो सकता है? साक्षात् इन्द्र भी तो उसका सामना नहीं कर सकते ।। २० ।।

महेश्वरोऽपि पार्थेन श्रूयते योधितः पुरा ।
पदातिना महावीर्यो गिरौ हिमवति प्रभुः ।। २१ ।।
‘मैंने सुना है कि पूर्वकालमें हिमालयपर्वतपर पैदल अर्जुनने महापराक्रमी भगवान् महेश्वरके साथ भी युद्ध किया था ।। २१ ।।

दानवानां सहस्राणि हिरण्यपुरवासिनाम् ।
जघानैकरथेनैव देवराजप्रचोदितः ।। २२ ।।
‘देवराज इन्द्रकी आज्ञा पाकर उसने एकमात्र रथकी सहायतासे हिरण्यपुरवासी सहस्रों दानवोंका संहार कर डाला था ।। २२ ।।

समायुक्तो हि कौन्तेयो वासुदेवेन धीमता ।
सामरानपि लोकांस्त्रीन् हन्यादिति मतिर्मम ।। २३ ।।

'मेरा तो ऐसा विश्वास है कि परम बुद्धिमान् वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके साथ रहकर कुन्तीकुमार अर्जुन देवताओंसहित तीनों लोकोंको नष्ट कर सकता है ।। २३ ।।
सोऽहमिच्छाम्यनुज्ञातं रक्षितुं वा महात्मना ।
द्रोणेन सहपुत्रेण वीरेण यदि मन्यसे ।। २४ ।।
'इसलिये मैं यहाँसे चले जानेकी अनुमति चाहता हूँ। अथवा यदि आप ठीक समझें तो पुत्रसहित वीर महामना द्रोणाचार्यके द्वारा मैं अपनी रक्षाका आश्वासन चाहता हूँ' ।। २४ ।।
स राज्ञा स्वयमाचार्यो भृशमत्रार्थितोऽर्जुन ।
संविधानं च विहितं रथाश्च किल सज्जिताः ।। २५ ।।
'अर्जुन! तब राजा दुर्योधनने स्वयं ही आचार्य द्रोणसे जयद्रथकी रक्षाके लिये बड़ी प्रार्थना की है। अतः उसकी रक्षाका पूरा प्रबन्ध कर लिया गया है तथा रथ भी सजा दिये गये हैं ।। २५ ।।
कर्णो भूरिश्रवा द्रौणिर्वृषसेनश्च दुर्जयः ।
कृपश्च मद्रराजश्च षडेतेऽस्य पुरोगमाः ।। २६ ।।
'कलके युद्धमें कर्ण, भूरिश्रवा, अश्वत्थामा, दुर्जय वीर वृषसेन, कृपाचार्य और मद्रराज शल्य—ये छः महारथी उसके आगे रहेंगे' ।। २६ ।।
शकटः पद्मकर्णार्धो व्यूहो द्रोणेन निर्मितः ।
पद्मकर्णिकमध्यस्थः सूचीपार्श्वे जयद्रथः ।। २७ ।।
स्थास्यते रक्षितो वीरैः सिंधुस्राट् स सुदुर्मदः ।
'द्रोणाचार्यने ऐसा व्यूह बनाया है, जिसका अगला आधा भाग शकटके आकारका है और पिछला कमलके समान। कमलव्यूहके मध्यकी कर्णिकाके बीच सूचीव्यूहके पार्श्व भागमें युद्धदुर्मद सिन्धुराज जयद्रथ खड़ा होगा और अन्यान्य वीर उसकी रक्षा करते रहेंगे ।। २७ १/२ ।।
धनुष्यस्त्रे च वीर्ये च प्राणे चैव तथौरसे ।। २८ ।।
अविषह्यतमा ह्येते निश्चिताः पार्थ षड् रथाः ।
एतानजित्वा षड् रथान् नैव प्राप्यो जयद्रथः ।। २९ ।।
'पार्थ! ये पूर्व निश्चित छः महारथी धनुष, बाण, पराक्रम, प्राणशक्ति तथा मनोबलमें अत्यन्त असह्य माने गये हैं। इन छः महारथियोंको जीते बिना जयद्रथको प्राप्त करना असम्भव है ।। २८-२९ ।।
तेषामेकैकशो वीर्यं षण्णां त्वमनुचिन्तय ।
सहिता हि नरव्याघ्र न शक्या जेतुमञ्जसा ।। ३० ।।
'पुरुषसिंह! पहले तुम इन छः महारथियोंमें एक-एकके बल-पराक्रमका विचार करो। फिर जब ये छः एक साथ होंगे, उस समय इन्हें सुगमतासे नहीं जीता जा सकता ।। ३० ।।
भूयस्तु मन्त्रयिष्यामि नीतिमात्महिताय वै ।

मन्त्रज्ञैः सचिवैः सार्धं सुहृद्भिः कार्यसिद्धये ॥ ३१ ॥
‘अब मैं पुनः अपने हितका ध्यान रखते हुए कार्यकी सिद्धिके लिये मन्त्रज्ञ मन्त्रियों और हितैषी सुहृदोंके साथ सलाह करूँगा' ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥

अध्याय (पृष्ठ 502)

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षट्सप्ततितमोऽध्यायः

अर्जुनके वीरोचित वचन

अर्जुन उवाच

षड् रथान् धार्तराष्ट्रस्य मन्यसे यान् बलाधिकान् ।
तेषां वीर्यं ममार्धेन न तुल्यमिति मे मतिः ॥ १ ॥
अस्त्रमस्त्रेण सर्वेषामेतेषां मधुसूदन ।
मया द्रक्ष्यसि निर्भिन्नं जयद्रथवधैषिणा ॥ २ ॥

**अर्जुन बोले—**मधुसूदन! दुर्योधनके जिन छह महारथियोंको आप बलमें अधिक मानते हैं, उनका पराक्रम मेरे आधेके बराबर भी नहीं है, ऐसा मेरा विश्वास है। जयद्रथके वधकी इच्छासे मेरे युद्ध करते समय आप देखेंगे कि मैंने इन सबके अस्त्रोंको अपने अस्त्रसे काट गिराया है ॥

द्रोणस्य मिषतश्चाहं सगणस्य विलप्यतः ।
मूर्धानं सिन्धुराजस्य पातयिष्यामि भूतले ॥ ३ ॥

मैं द्रोणाचार्यके देखते-देखते अपने सैनिकोंसहित विलाप करते हुए सिन्धुराज जयद्रथका मस्तक पृथ्वीपर गिरा दूँगा ॥ ३ ॥

यदि साध्याश्च रुद्राश्च वसवश्च सहाश्विनः ।
मरुतश्च सहेन्द्रेण विश्वेदेवाः सहेश्वराः ॥ ४ ॥
पितरः सहगन्धर्वाः सुपर्णाः सागराद्रयः ।
द्यौर्वियत् पृथिवी चेयं दिशश्च सदिगीश्वराः ॥ ५ ॥
ग्रामारण्यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
त्रातारः सिन्धुराजस्य भवन्ति मधुसूदन ॥ ६ ॥
तथापि बाणैर्निहतं श्वो द्रष्टासि रणे मया ।
सत्येन च शपे कृष्ण तथैवायुधमालभे ॥ ७ ॥

मधुसूदन श्रीकृष्ण! यदि साध्य, रुद्र, वसु, अश्विनीकुमार, इन्द्रसहित मरुद्गण, विश्वेदेव, देवेश्वरगण, पितर, गन्धर्व, गरुड़, समुद्र, पर्वत, स्वर्ग, आकाश, यह पृथ्वी, दिशाएँ, दिक्पाल, गाँवों तथा जंगलोंमें निवास करनेवाले प्राणी और सम्पूर्ण चराचर जीव भी सिन्धुराज जयद्रथकी रक्षाके लिये उद्यत हो जायँ तो भी मैं सत्यकी शपथ खाकर और अपना धनुष छूकर कहता हूँ कि कल युद्धमें आप मेरे बाणोंद्वारा जयद्रथको मारा गया देखेंगे ॥ ४—७ ॥

यस्तु गोप्ता महेष्वासस्तस्य पापस्य दुर्मतेः ।
तमेव प्रथमं द्रोणमभियास्यामि केशव ॥ ८ ॥

केशव! उस दुर्बुद्धि पापी जयद्रथकी रक्षाका बीड़ा उठाये हुए जो महाधनुर्धर आचार्य द्रोण हैं, पहले उन्हींपर आक्रमण करूँगा॥ ८॥ तस्मिन् द्यूतमिदं बद्धं मन्यते स सुयोधनः। तस्मात् तस्यैव सेनाग्रं भित्त्वा यास्यामि सैन्धवम्॥ ९॥ दुर्योधन आचार्यपर ही इस युद्धरूपी द्यूतको आबद्ध (अवलम्बित) मानता है; अतः उसीकी सेनाके अग्रभागका भेदन करके मैं सिन्धुराजके पास जाऊँगा॥ ९॥ द्रष्टासि श्वो महेष्वासान् नाराचैस्तिग्मतेजितैः। शृङ्गाणीव गिरेर्वज्रैर्दार्यमाणान् मया युधि॥ १०॥ जैसे इन्द्र अपने वज्रद्वारा पर्वतोंके शिखरोंको विदीर्ण कर देते हैं, उसी प्रकार कल युद्धमें मैं अच्छी तरह तेज किये हुए नाराचोंद्वारा बड़े-बड़े धनुर्धरोंको चीर डालूँगा; यह आप देखेंगे॥ १०॥ नरनागाश्वदेहेभ्यो विस्रविष्यति शोणितम्। पतद्भ्यः पतितेभ्यश्च विभिन्नेभ्यः शितैः शरैः॥ ११॥ मेरे तीखे बाणोंद्वारा विदीर्ण होकर गिरते और गिरे हुए मनुष्य, हाथी और घोड़ोंके शरीरोंसे खूनकी धारा बह चलेगी॥ ११॥ गाण्डीवप्रेषिता बाणा मनोऽनिलसमा जवे। नृनागाश्वान् विदेहासून् कर्तारश्च सहस्रशः॥ १२॥ गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाण मन और वायुके समान वेगशाली होते हैं। वे शत्रुओंके सहस्रों हाथी-घोड़े और मनुष्योंको शरीर और प्राणोंसे शून्य कर देंगे॥ १२॥ यमात् कुबेराद् वरुणादिन्द्राद् रुद्राच्च यन्मया। उपात्तमस्त्रं घोरं तद् द्रष्टारोऽत्र नरा युधि॥ १३॥ यम, कुबेर, वरुण, इन्द्र तथा रुद्रसे मैंने जो भयंकर अस्त्र प्राप्त किये हैं, उन्हें कलके युद्धमें सब लोग देखेंगे॥ १३॥ ब्राह्मेणास्त्रेण चास्त्राणि हन्यमानानि संयुगे। मया द्रष्टासि सर्वेषां सैन्धवस्याभिरक्षिणाम्॥ १४॥ जयद्रथके समस्त रक्षकोंद्वारा छोड़े हुए अस्त्रोंको मैं युद्धमें ब्रह्मास्त्रद्वारा काट डालूँगा, यह आप देखेंगे॥ १४॥ शरवेगसमुत्कृत्तै राज्ञां केशव मूर्धभिः। आस्तीर्यमाणां पृथिवीं द्रष्टासि श्वो मया युधि॥ १५॥ केशव! कलके युद्धमें आप देखेंगे कि इस पृथ्वीपर मेरे बाणोंके वेगसे कटे हुए राजाओंके मस्तक बिछ गये हैं॥ १५॥ क्रव्यादांस्तर्पयिष्यामि द्रावयिष्यामि शात्रवान्। सुहृदो नन्दयिष्यामि प्रमथिष्यामि सैन्धवम्॥ १६॥

कल मैं मांसभोजी प्राणियोंको तृप्त कर दूँगा, शत्रु-सैनिकोंको मार भगाऊँगा, सुहृदोंको आनन्द प्रदान करूँगा और सिन्धुराज जयद्रथको मथ डालूँगा ॥ १६ ॥ बह्वागस्कृत् कुसम्बन्धी पापदेशसमुद्भवः । मया सैन्धवको राजा हतः स्वान् शोचयिष्यति ॥ १७ ॥ सिन्धुराज जयद्रथ पापपूर्ण प्रदेशमें उत्पन्न हुआ है। उसने बहुत-से अपराध किये हैं। वह एक दुष्ट सम्बन्धी है। अतः कल मेरे द्वारा मारा जाकर अपने सुजनोंको शोकमें निमग्न कर देगा ॥ १७ ॥ सर्वक्षीरान्नभोक्तारं पापाचारं रणाजिरे । मया सराजकं बाणैर्भिन्नं द्रक्ष्यसि सैन्धवम् ॥ १८ ॥ सदा सब प्रकारसे दूध-भात खानेवाले पापाचारी जयद्रथको रणांगणमें आप राजाओंसहित मेरे बाणोंद्वारा विदीर्ण हुआ देखेंगे ॥ १८ ॥ तथा प्रभाते कर्तास्मि यथा कृष्ण सुयोधनः । नान्यं धनुर्धरं लोके मंस्यते मत्समं युधि ॥ १९ ॥ श्रीकृष्ण! मैं कल सबेरे ऐसा युद्ध करूँगा, जिससे दुर्योधन रणक्षेत्रके भीतर संसारके दूसरे किसी धनुर्धरको मेरे समान नहीं मानेगा ॥ १९ ॥ गाण्डीवं च धनुर्दिव्यं योद्धा चाहं नरर्षभ । त्वं च यन्ता हृषीकेश किं नु स्यादजितं मया ॥ २० ॥ नरश्रेष्ठ हृषीकेश! जहाँ गाण्डीव-जैसा दिव्य धनुष है, मैं योद्धा हूँ और आप सारथि हैं, वहाँ मैं किसको नहीं जीत सकता? ॥ २० ॥ तव प्रसादाद् भगवन् किमिवास्ति रणे मम । अविषह्यं हृषीकेश किं जानन् मां विगर्हसे ॥ २१ ॥ भगवन्! आपकी कृपासे इस युद्धस्थलमें कौन-सी ऐसी शक्ति है, जो मेरे लिये असह्य हो। हृषीकेश! आप यह जानते हुए भी क्यों मेरी निन्दा करते हैं? ॥ २१ ॥ यथा लक्ष्म स्थिरं चन्द्रे समुद्रे च यथा जलम् । एवमेतां प्रतिज्ञां मे सत्यां विद्धि जनार्दन ॥ २२ ॥ जनार्दन! जैसे चन्द्रमामें काला चिह्न स्थिर है, जैसे समुद्रमें जलकी सत्ता सुनिश्चित है, उसी प्रकार आप मेरी इस प्रतिज्ञाको भी सत्य समझें ॥ २२ ॥ मावमंस्था ममास्त्राणि मावमंस्था धनुर्दृढम् । मावमंस्था बलं बाह्वोर्मावमंस्था धनंजयम् ॥ २३ ॥ प्रभो! आप मेरे अस्त्रोंका अनादर न करें। मेरे इस सुदृढ़ धनुषकी अवहेलना न करें। इन दोनों भुजाओंके बलका तिरस्कार न करें और अपने इस सखा धनंजयका अपमान न करें ॥ २३ ॥ तथाभियामि संग्रामं न जीयेयं जयामि च ।

तेन सत्येन संग्रामे हतं विद्धि जयद्रथम् ॥ २४ ॥
मैं संग्राममें इस प्रकार चलूँगा, जिससे कोई मुझे जीत न सके, वरं मैं ही विजयी होऊँ। इस सत्यके प्रभावसे आप रणक्षेत्रमें जयद्रथको मारा गया ही समझें ॥
ध्रुवं वै ब्राह्मणे सत्यं ध्रुवा साधुषु संनतिः ।
श्रीर्ध्रुवापि च यज्ञेषु ध्रुवो नारायणे जयः ॥ २५ ॥
जैसे ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मणमें सत्य, साधुपुरुषोंमें नम्रता और यज्ञोंमें लक्ष्मीका होना ध्रुव सत्य है, उसी प्रकार जहाँ आप नारायण विद्यमान हैं, वहाँ विजय भी अटल है ॥ २५ ॥

संजय उवाच

एवमुक्त्वा हृषीकेशं स्वयमात्मानमात्मना ।
संदिदेशार्जुनो नर्दन् वासविः केशवं प्रभुम् ॥ २६ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! इन्द्रकुमार अर्जुनने गर्जना करते हुए इस प्रकार उपर्युक्त बातें कहकर सम्पूर्ण इन्द्रियोंके नियन्ता तथा सब कुछ करनेमें समर्थ अपने आत्मस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको स्वयं ही मनसे सोचकर इस प्रकार आदेश दिया— ॥ २६ ॥
यथा प्रभातां रजनीं कल्पितः स्याद् रथो मम ।
तथा कार्यं त्वया कृष्ण कार्यं हि महदुद्यतम् ॥ २७ ॥
‘श्रीकृष्ण! आप ऐसा प्रबन्ध कर लें कि कल सबेरा होते ही मेरा रथ तैयार हो जाय; क्योंकि हमलोगोंपर महान् कार्यभार आ पड़ा है’ ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वण्यर्जुनवाक्ये षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 506)

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सप्तसप्ततितमोऽध्यायः

नाना प्रकारके अशुभसूचक उत्पात, कौरव-सेनामें भय और श्रीकृष्णका अपनी बहिन सुभद्राको आश्वासन देना

संजय उवाच

तां निशां दुःखशोकार्तौ निःश्वसन्ताविवोरगौ ।
निद्रां नैवोपलेभाते वासुदेवधनंजयौ ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! दुःख और शोकसे पीड़ित हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन सर्पोंके समान लंबी साँस खींच रहे थे। उन दोनोंको उस रातमें नींद नहीं आयी ॥ १ ॥

नरनारायणौ क्रुद्धौ ज्ञात्वा देवाः सवासवाः ।
व्यथिताश्चिन्तयामासुः किंस्विदेतद् भविष्यति ॥ २ ॥
नर और नारायणको कुपित जान इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता व्यथित हो चिन्ता करने लगे; यह क्या होनेवाला है? ॥ २ ॥

ववुश्च दारुणा वाता रूक्षा घोराभिशंसिनः ।
सकबन्धस्तथाऽऽदित्ये परिधिः समदृश्यत ॥ ३ ॥
रूक्ष, भयसूचक एवं दारुण वायु बहने लगी। (दूसरे दिन सूर्योदय होनेपर) सूर्यमण्डलमें कबन्धयुक्त घेरा देखा गया ॥ ३ ॥

शुष्काशन्यश्च निष्पेतुः सनिर्घाताः सविद्युतः ।
चचाल चापि पृथिवी सशैलवनकानना ॥ ४ ॥
बिना वर्षाके ही वज्र गिरने लगे। आकाशमें बिजलीकी चमकके साथ भयंकर गर्जना होने लगी। पर्वत, वन और काननोंसहित पृथिवी काँपने लगी ॥ ४ ॥

चुक्षुभुश्च महाराज सागरा मकरालयाः ।
प्रतिस्रोतः प्रवृत्ताश्च तथा गन्तुं समुद्रगाः ॥ ५ ॥
महाराज! ग्राहोंके निवासस्थान समुद्रोंमें ज्वार आ गया। समुद्रगामिनी नदियाँ उलटी धारामें बहकर अपने उद्गमकी ओर जाने लगीं ॥ ५ ॥

रथाश्वनरनागानां प्रवृत्तमधरोत्तरम् ।
क्रव्यादानां प्रमोदार्थं यमराष्ट्रविवृद्धये ॥ ६ ॥
मांसभक्षी प्राणियोंके आनन्द और यमराजके राज्यकी वृद्धिके लिये रथ, घोड़े, मनुष्य और हाथियोंके नीचे-ऊपरके ओष्ठ फड़कने लगे ॥ ६ ॥

वाहनानि शकृन्मूत्रे मुमुचु रुरुदुश्च ह ।
तान् दृष्ट्वा दारुणान् सर्वानुत्पाताँल्लोमहर्षणान् ॥ ७ ॥

सर्वे ते व्यथिताः सैन्यास्त्वदीया भरतर्षभ । श्रुत्वा महाबलस्योग्रां प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः ॥ ८ ॥ भरतश्रेष्ठ! हाथी, घोड़े आदि वाहन मल-मूत्र करने और रोने लगे। उन सब भयंकर एवं रोमांचकारी उत्पातोंको देखकर और महाबली सव्यसाची अर्जुनकी उस भयंकर प्रतिज्ञाको सुनकर आपके सभी सैनिक व्यथित हो उठे ॥ ७-८ ॥

अथ कृष्णं महाबाहुरब्रवीत् पाकशासनिः । आश्वासय सुभद्रां त्वं भगिनीं स्नुषया सह ॥ ९ ॥ स्नुषां चास्या वयस्याश्च विशोकाः कुरु माधव । साम्ना सत्येन युक्तेन वचसाऽऽश्वासय प्रभो ॥ १० ॥ इधर इन्द्रकुमार महाबाहु अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—'माधव! आप पुत्रवधू उत्तरासहित अपनी बहिन सुभद्राको धीरज बँधाइये। उत्तरा और उसकी सखियोंका शोक दूर कीजिये। प्रभो! शान्तिपूर्ण, सत्य और युक्तियुक्त वचनोंद्वारा इन सबको आश्वासन दीजिये' ॥ ९-१० ॥

ततोऽर्जुनगृहं गत्वा वासुदेवः सुदुर्मनाः । भगिनीं पुत्रशोकार्तामाश्वासयत दुःखिताम् ॥ ११ ॥ तब भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त उदास मनसे अर्जुनके शिविरमें गये और पुत्रशोकसे पीड़ित हुई अपनी दुखिया बहिनको आश्वासन देने लगे ॥ ११ ॥

वासुदेव उवाच

मा शोकं कुरु वार्ष्णेयि कुमारं प्रति सस्नुषा । सर्वेषां प्राणिनां भीरु निष्ठैषा कालनिर्मिता ॥ १२ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण बोले—वृष्णिनन्दिनी! तुम और पुत्रवधू उत्तरा कुमार अभिमन्युके लिये शोक न करो। भीरु! काल एक दिन सभी प्राणियोंकी ऐसी ही अवस्था कर देता है ॥ १२ ॥

कुले जातस्य धीरस्य क्षत्रियस्य विशेषतः । सदृशं मरणं ह्येतत् तव पुत्रस्य मा शुचः ॥ १३ ॥ तुम्हारा पुत्र उत्तम कुलमें उत्पन्न धीर-वीर और विशेषतः क्षत्रिय था। यह मृत्यु उसके योग्य ही हुई है; इसलिये शोक न करो ॥ १३ ॥

दिष्ट्या महारथो धीरः पितुस्तुल्यपराक्रमः । क्षात्रेण विधिना प्राप्तो वीराभिलषितां गतिम् ॥ १४ ॥ यह सौभाग्यकी बात है कि पिताके तुल्य पराक्रमी धीर महारथी अभिमन्यु क्षत्रियोचित कर्तव्यका पालन करके उस उत्तम गतिको प्राप्त हुआ है, जिसकी वीर पुरुष अभिलाषा करते हैं ॥ १४ ॥

जित्वा सुबहुशः शत्रून् प्रेषयित्वा च मृत्यवे । गतः पुण्यकृतां लोकान् सर्वकामदुहोऽक्षयान् ॥ १५ ॥ वह बहुत-से शत्रुओंको जीतकर और बहुतोंको मृत्युके लोकमें भेजकर पुण्यात्माओंको प्राप्त होनेवाले उन अक्षय लोकोंमें गया है, जो सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं ॥ १५ ॥

तपसा ब्रह्मचर्येण श्रुतेन प्रज्ञयापि च ।

सन्तो यां गतिमिच्छन्ति तां प्राप्तस्तव पुत्रकः ॥ १६ ॥ तपस्या, ब्रह्मचर्य, शास्त्रज्ञान और सद्बुद्धिके द्वारा साधुपुरुष जिस गतिको पाना चाहते हैं, वही गति तुम्हारे पुत्रको भी प्राप्त हुई है ॥ १६ ॥

वीरसूर्वीरपत्नी त्वं वीरजा वीरबान्धवा । मा शुचस्तनयं भद्रे गतः स परमां गतिम् ॥ १७ ॥ सुभद्रे! तुम वीरमाता, वीरपत्नी, वीरकन्या और वीर भाइयोंकी बहिन हो। तुम पुत्रके लिये शोक न करो। वह उत्तम गतिको प्राप्त हुआ है ॥ १७ ॥

प्राप्स्यते चाप्यसौ पापः सैन्धवो बालघातकः । अस्यावलेपस्य फलं ससुहृद्गणबान्धवः ॥ १८ ॥ व्युष्टायां तु वरारोहे रजन्यां पापकर्मकृत् । न हि मोक्ष्यति पार्थात् स प्रविष्टोऽप्यमरावतीम् ॥ १९ ॥ वरारोहे! बालककी हत्या करानेवाला वह पापकर्मा पापी सिंधुराज जयद्रथ रात बीतनेपर प्रातःकाल होते ही अपने सुहृदों और बन्धु-बान्धवोंसहित इस अपराधका फल पायेगा। वह अमरावतीपुरीमें जाकर छिप जाय तो भी अर्जुनके हाथसे उसका छुटकारा नहीं होगा ॥ १८-१९ ॥

श्वः शिरः श्रोष्यसे तस्य सैन्धवस्य रणे हतम् । समन्तपञ्चकाद् बाह्यं विशोका भव मा रुदः ॥ २० ॥ तुम कल ही सुनोगी कि रणक्षेत्रमें जयद्रथका मस्तक काट लिया गया है और वह समन्तपंचक क्षेत्रसे बाहर जा गिरा है। अतः शोक त्याग दो और रोना बंद करो ॥ २० ॥

क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य गतः शूरः सतां गतिम् । यां गतिं प्राप्नुयामेह ये चान्ये शस्त्रजीविनः ॥ २१ ॥ शूरवीर अभिमन्युने क्षत्रिय-धर्मको आगे रखकर सत्पुरुषोंकी गति पायी है, जिसे हमलोग और इस संसारके दूसरे शस्त्रधारी क्षत्रिय भी पाना चाहते हैं ॥ २१ ॥

व्यूढोरस्को महाबाहुरनिवर्ती रथप्रणुत् । गतस्तव वरारोहे पुत्रः स्वर्गं ज्वरं जहि ॥ २२ ॥ सुन्दरी! चौड़ी छाती और विशाल भुजाओंसे सुशोभित युद्धसे पीछे न हटनेवाला तथा शत्रुपक्षके रथियोंपर विजय पानेवाला तुम्हारा पुत्र स्वर्गलोकमें गया है। तुम चिन्ता छोड़ो ॥ २२ ॥

अनुयातश्च पितरं मातृपक्षं च वीर्यवान् । सहस्रशो रिपून् हत्वा हतः शूरो महारथः ॥ २३ ॥ बलवान्, शूरवीर और महारथी अभिमन्यु पितृकुल तथा मातृकुलकी मर्यादाका अनुसरण करते हुए सहस्रों शत्रुओंको मारकर मरा है ॥ २३ ॥

आश्वासय स्नुषां राज्ञि मा शुचः क्षत्रिये भृशम् ।

श्वः प्रियं सुमहच्छ्रुत्वा विशोका भव नन्दिनि ॥ २४ ॥ रानी बहिन! अधिक चिन्ता छोड़ो और बहूको धीरज बँधाओ। अपने कुलको आनन्दित करनेवाली क्षत्रियकन्ये! कल अत्यन्त प्रिय समाचार सुनकर शोकरहित हो जाओ ॥ २४ ॥ यत् पार्थेन प्रतिज्ञातं तत् तथा न तदन्यथा । चिकीर्षितं हि ते भर्तुर्न भवेज्जातु निष्फलम् ॥ २५ ॥ अर्जुनने जिस बातके लिये प्रतिज्ञा कर ली है, वह उसी रूपमें पूर्ण होगी। उसे कोई पलट नहीं सकता। तुम्हारे स्वामी जो कुछ करना चाहते हैं, वह कभी निष्फल नहीं होता ॥ २५ ॥ यदि च मनुजपन्नगाः पिशाचा रजनिचराः पतगाः सुरासुराश्च । रणगतमभियान्ति सिन्धुराजं न स भविता सह तैरपि प्रभाते ॥ २६ ॥ यदि मनुष्य, नाग, पिशाच, निशाचर, पक्षी, देवता और असुर भी रणक्षेत्रमें आये हुए सिंधुराज जयद्रथकी सहायताके लिये आ जायँ तो भी वह कल उन सहायकोंके साथ ही जीवनसे हाथ धो बैठेगा ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि सुभद्राश्वासने सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें सुभद्राको श्रीकृष्णका आश्वासनविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 511)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टसप्ततितमोऽध्यायः

सुभद्राका विलाप और श्रीकृष्णका सबको आश्वासन

संजय उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य केशवस्य महात्मनः ।
सुभद्रा पुत्रशोकार्ता विललाप सुदुःखिता ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! महात्मा केशवका यह कथन सुनकर पुत्रशोकसे व्याकुल और अत्यन्त दुःखित हुई सुभद्रा इस प्रकार विलाप करने लगी— ॥ १ ॥

हा पुत्र मम मन्दायाः कथमेत्यासि संयुगे ।
निधनं प्राप्तवांस्तात पितुस्तुल्यपराक्रमः ॥ २ ॥
‘हा पुत्र! हा बेटा अभिमन्यु! तुम मुझ अभागिनीके गर्भमें आकर क्रमशः पिताके तुल्य पराक्रमी होकर युद्धमें मारे कैसे गये? ॥ २ ॥

कथमिन्दीवरश्यामं सुदंष्ट्रं चारुलोचनम् ।
मुखं ते दृश्यते वत्स गुण्ठितं रणरेणुना ॥ ३ ॥
‘वत्स! नील कमलके समान श्याम, सुन्दर दन्तपंक्तियोंसे सुशोभित, मनोहर नेत्रोंवाला तुम्हारा मुख आज युद्धकी धूलसे आच्छादित होकर कैसा दिखायी देता होगा? ॥ ३ ॥

नूनं शूरं निपतितं त्वां पश्यन्त्यनिवर्तिनम् ।
सुशिरोग्रीवबाव्हंसं व्यूढोरस्कं नतोदरम् ॥ ४ ॥
चारूपचितसर्वाङ्गं स्वक्षं शस्त्रक्षताचितम् ।
भूतानि त्वां निरीक्षन्ते नूनं चन्द्रमिवोदितम् ॥ ५ ॥
‘बेटा! तुम शूरवीर थे। युद्धसे कभी पीछे पैर नहीं हटाते थे। मस्तक, ग्रीवा, बाहु और कंधे आदि तुम्हारे सभी अंग सुन्दर थे, छाती चौड़ी थी, उदर एवं नाभिदेश नीचा था, समस्त अंग मनोहर और हृष्ट-पुष्ट थे। सम्पूर्ण इन्द्रियाँ विशेषतः नेत्र बड़े सुन्दर थे तथा तुम्हारे सारे अंग शस्त्रजनित आघातसे व्याप्त थे। इस दशामें तुम धरतीपर पड़े होगे और निश्चय ही समस्त प्राणी उदय होते हुए चन्द्रमाके समान तुम्हें देख रहे होंगे ॥ ४-५ ॥

शयनीयं पुरा यस्य स्पर्ध्यास्तरणसंवृतम् ।
भूमावद्य कथं शेषे विप्रविद्धः सुखोचितः ॥ ६ ॥
‘हाय! पहले जिसके शयन करनेके लिये बहुमूल्य बिछौनेसे ढकी हुई शय्या बिछायी जाती थी, वही बेटा अभिमन्यु सुख भोगनेके योग्य होकर भी आज बाणविद्ध शरीरसे भूतलपर कैसे सो रहा होगा? ॥ ६ ॥

योऽन्वास्यत पुरा वीरो वरस्त्रीभिर्महाभुजः ।
कथमन्वास्यते सोऽद्य शिवाभिः पतितो मृधे ॥ ७ ॥

‘जिस महाबाहु वीरके पास पहले सुन्दरी स्त्रियाँ बैठा करती थीं, वही आज युद्धभूमिमें पड़ा होगा और उसके आस-पास सियारिनें बैठी होंगी; यह सब कैसे सम्भव हुआ?’ ।। ७ ।।
योऽस्तूयत पुरा हृष्टैः सूतमागधवन्दिभिः ।
सोऽद्य क्रव्याद्गणैर्घोरैर्विनदद्भिरुपास्यते ।। ८ ।।
‘पहले हर्षमें भरे हुए सूत, मागध और वन्दीजन जिसकी स्तुति किया करते थे, उसीकी आज विकट गर्जना करते हुए भयंकर मांसभक्षी जन्तुओंके समुदाय उपासना करते होंगे ।। ८ ।।
पाण्डवेषु च नाथेषु वृष्णिवीरेषु वा विभो ।
पञ्चालेषु च वीरेषु हतः केनास्यनाथवत् ।। ९ ।।
‘शक्तिशाली पुत्र! तुम्हारे रक्षक पाण्डवों, वृष्णिवीरों तथा पांचालवीरोंके होते हुए भी तुम्हें अनाथकी भाँति किसने मारा? ।। ९ ।।
अतृप्तदर्शना पुत्र दर्शनस्य तवानघ ।
मन्दभाग्या गमिष्यामि व्यक्तमद्य यमक्षयम् ।। १० ।।
‘बेटा! तुम्हें देखनेके लिये मेरी आँखें तरस रही हैं, इनकी प्यास नहीं बुझी। अनघ! कितनी मन्दभागिनी हूँ। निश्चय ही आज मैं यमलोकको चली जाऊँगी ।। १० ।।
विशालाक्षं सुकेशान्तं चारुवाक्यं सुगन्धि च ।
तव पुत्र कदा भूयो मुखं द्रक्ष्यामि निर्व्रणम् ।। ११ ।।
‘वत्स! बड़े-बड़े नेत्र, सुन्दर केशप्रान्त, मनोहर वाक्य और उत्तम सुगंधसे युक्त तुम्हारा घावरहित सुन्दर मुख मैं फिर कब देख पाऊँगी? ।। ११ ।।
धिक् बलं भीमसेनस्य धिक् पार्थस्य धनुष्मताम् ।
धिक् वीर्यं वृष्णिवीराणां पञ्चालानां च धिग् बलम् ।। १२ ।।
‘भीमसेनके बलको धिक्कार है, अर्जुनके धनुष-धारणको धिक्कार है, वृष्णिवंशी वीरोंके पराक्रमको धिक्कार है तथा पांचालोंके बलको भी धिक्कार है! ।।
धिक्केकयांस्तथा चेदीन् मत्स्यांश्चैवाथ सृञ्जयान् ।
ये त्वां रणगतं वीरं न शेकुरभिरक्षितुम् ।। १३ ।।
‘केकय, चेदि तथा मत्स्यदेशके वीरों और सृंजयवंशी क्षत्रियोंको भी धिक्कार है, जो युद्धमें गये हुए तुम-जैसे वीरकी रक्षा न कर सके ।। १३ ।।
अद्य पश्यामि पृथिवीं शून्यामिव हतत्विषम् ।
अभिमन्युमपश्यन्ती शोकव्याकुललोचना ।। १४ ।।
‘अभिमन्युको न देखनेके कारण मेरे नेत्र शोकसे व्याकुल हो रहे हैं। आज मुझे सारी पृथ्‍वी सूनी एवं कान्तिहीन-सी दिखायी देती है ।। १४ ।।
स्वस्त्रीयं वासुदेवस्य पुत्रं गाण्डीवधन्वनः ।

कथं त्वातिरथं वीरं द्रक्ष्याम्यद्य निपातितम् ॥ १५ ॥ 'वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके भानजे और गाण्डीवधारी अर्जुनके अतिरथी वीर पुत्र अभिमन्युको आज मैं धरतीपर पड़ा हुआ कैसे देख सकूँगी? ॥ १५ ॥

एह्येहि तृषितो वत्स स्तनौ पूर्णौ पिबाशु मे। अङ्कमारुह्य मन्दाया ह्यतृप्तायाश्च दर्शने ॥ १६ ॥ 'बेटा! आओ, आओ। तुम्हें प्यास लगी होगी। तुम्हें देखनेके लिये प्यासी हुई मुझ अभागिनी माताकी गोदमें बैठकर मेरे दूधसे भरे हुए इन स्तनोंको शीघ्र पी लो ॥ १६ ॥

हा वीर दृष्टो नष्टश्च धनं स्वप्न इवासि मे। अहो ह्यनित्यं मानुष्यं जलबुद्बुदचञ्चलम् ॥ १७ ॥ 'हा वीर! तुम सपनेमें मिले हुए धनकी भाँति मुझे दिखायी दिये और नष्ट हो गये। अहो! यह मनुष्यजीवन पानीके बुलबुलेके समान चंचल एवं अनित्य है ॥ १७ ॥

इमां ते तरुणीं भार्यां तवाधिभिरभिप्लुताम्। कथं संधारयिष्यामि विवत्सामिव धेनुकाम् ॥ १८ ॥ 'बेटा! तुम्हारी यह तरुणी पत्नी तुम्हारे विरहशोकमें डूबी हुई है। जिसका बछड़ा खो गया हो, उस गायकी भाँति व्याकुल है। मैं इसे कैसे धीरज बँधाऊँगी? ॥ १८ ॥

(उत्तरामुत्तमां जात्या सुशीलां प्रियभाषिणीम्। शनकैः परिरभ्यैनां स्नुषां मम यशस्विनीम् ॥ सुकुमारीं विशालाक्षीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम्। बालपल्लवतन्वङ्गीं मत्तमातङ्गगामिनीम् ॥ बिम्बाधरोष्ठीमबलामभिमन्यो प्रहर्षय।) 'यह उत्तरा जातिसे उत्तम, सुशीला, प्रियभाषिणी, यशस्विनी तथा मेरी प्यारी बहू है। यह सुकुमारी है। इसके नेत्र बड़े-बड़े और मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति परम मनोहर है। इसके अंग नूतन पल्लवोंके समान कृश हैं। यह मतवाले हाथीके समान मन्दगतिसे चलनेवाली है। इसके ओठ बिम्बफलके समान लाल हैं। बेटा अभिमन्यु! तुम मेरी इस बहूको धीरे-धीरे हृदयसे लगाकर आनन्दित करो।

अहो ह्यकाले प्रस्थानं कृतवानसि पुत्रक। विहाय फलकाले मां सुगृद्धां तव दर्शने ॥ १९ ॥ 'अहो वत्स! जब पुत्रके होनेका फल मिलनेका समय आया है, तब तुम मुझे अपने दर्शनोंके लिये भी तरसती हुई छोड़कर असमयमें ही चल बसे ॥ १९ ॥

नूनं गतिः कृतान्तस्य प्राज्ञैरपि सुदुर्विदा। यत्र त्वं केशवे नाथे संग्रामेऽनाथवद्धतः ॥ २० ॥ 'निश्चय ही कालकी गति बड़े-बड़े विद्वानोंके लिये भी अत्यन्त दुर्बोध है, जिसके अधीन होकर तुम श्रीकृष्ण-जैसे संरक्षकके रहते हुए संग्रामभूमिमें अनाथकी भाँति मारे

गये ।। २० ।। यज्वनां दानशीलानां ब्राह्मणानां कृतात्मनाम् । चरितब्रह्मचर्याणां पुण्यतीर्थावगाहिनाम् ।। २१ ।। कृतज्ञानां वदान्यानां गुरुशुश्रूषिणामपि । सहस्रदक्षिणानां च या गतिस्तामवाप्नुहि ।। २२ ।। 'वत्स! यज्ञकर्ता, दानी, जितेन्द्रिय, ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण, ब्रह्मचारी, पुण्यतीर्थोंमें नहानेवाले, कृतज्ञ, उदार, गुरुसेवा-परायण और सहस्रोंकी संख्यामें दक्षिणा देनेवाले धर्मात्मा पुरुषोंको जो गति प्राप्त होती है, वही तुम्हें भी मिले ।। या गतिर्युध्यमानानां शूराणामनिवर्तिनाम् । हत्वारीन् निहतानां च संग्रामे तां गतिं व्रज ।। २३ ।। 'संग्राममें युद्धतत्पर हो कभी पीछे पैर न हटानेवाले और शत्रुओंको मारकर मरनेवाले शूरवीरोंको जो गति प्राप्त होती है, वही तुम्हें भी मिले ।। २३ ।। गोसहस्रप्रदातॄणां क्रतुदानां च या गतिः । नैवेशिकं चाभिमतं ददतां या गतिः शुभा ।। २४ ।। 'सहस्र गोदान करनेवाले, यज्ञके लिये दान देनेवाले तथा मनके अनुरूप सब सामग्रियोंसहित निवासस्थान प्रदान करनेवाले पुरुषोंको जो शुभ गति प्राप्त होती है, वही तुम्हें भी मिले ।। २४ ।। ब्राह्मणेभ्यः शरण्येभ्यो निधिं निदधतां च या । या चापि न्यस्तदण्डानां तां गतिं व्रज पुत्रक ।। २५ ।। 'जो शरणागतवत्सल ब्राह्मणोंके लिये निधि स्थापित करते हैं तथा किसी भी प्राणीको दण्ड नहीं देते, उन्हें जिस गतिकी प्राप्ति होती है, बेटा! वही गति तुम्हें भी प्राप्त हो ।। २५ ।। ब्रह्मचर्येण यां यान्ति मुनयः संशितव्रताः । एकपत्न्यश्च यां यान्ति तां गतिं व्रज पुत्रक ।। २६ ।। 'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनि ब्रह्मचर्यके द्वारा जिस गतिको पाते हैं और पतिव्रता स्त्रियोंको जिस गतिकी प्राप्ति होती है, बेटा! वही गति तुम्हें भी सुलभ हो ।। २६ ।। राज्ञां सुचरितैर्या च गतिर्भवति शाश्वती । चतुराश्रमिणां पुण्यैः पावितानां सुरक्षितैः ।। २७ ।। दीनानुकम्पिनां या च सततं संविभागिनाम् । पैशुन्याच्च निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ।। २८ ।। 'पुत्र! सदाचारके पालनसे राजाओंको तथा सुरक्षित पुण्यके प्रभावसे पवित्र हुए चारों आश्रमोंके लोगोंको जो सनातन गति प्राप्त होती है; दीनोंपर दया करनेवाले, उत्तम

वस्तुओंको घरमें बाँटकर उपयोगमें लेनेवाले तथा चुगलीसे दूर रहनेवाले लोगोंको जो गति प्राप्त होती है, वही गति तुम्हें भी मिले ।। २७-२८ ।। व्रतिनां धर्मशीलानां गुरुशुश्रूषिणामपि । अमोघातिथीनां या च तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ २९ ॥ 'वत्स! व्रतपरायण, धर्मशील, गुरुसेवक एवं अतिथिको निराश न लौटानेवाले लोगोंको जिस गतिकी प्राप्ति होती है, वह तुम्हें भी प्राप्त हो ।। २९ ।। कृच्छ्रेषु या धारयतामात्मानं व्यसनेषु च । गतिः शोकाग्निदग्धानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ ३० ॥ 'बेटा! जो लोग भारी-से-भारी कठिनाइयोंमें और संकटोंमें पड़नेपर तथा शोकाग्निसे दग्ध होनेपर भी धैर्य धारण करके अपने-आपको स्थिर रखते हैं, उन्हें मिलनेवाली गतिको तुम भी प्राप्त करो ।। ३० ।। मातापित्रोश्च शुश्रूषां कल्पयन्तीह ये सदा । स्वदारनिरतानां च या गतिस्तामवाप्नुहि ॥ ३१ ॥ 'जो सदा इस जगत्में माता-पिताकी सेवा करते हैं और अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखते हैं, उनकी जैसी गति होती है, वही तुम्हें भी प्राप्त हो ।। ३१ ।। ऋतुकाले स्वकां भार्यां गच्छतां या मनीषिणाम् । परस्त्रीभ्यो निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ ३२ ॥ 'पुत्र! ऋतुकालमें अपनी स्त्रीसे सहवास करते हुए परायी स्त्रियोंसे सदा दूर रहनेवाले मनीषी पुरुषोंको जो गति प्राप्त होती है, वही तुम्हें भी मिले ।। ३२ ।। साम्ना ये सर्वभूतानि पश्यन्ति गतमत्सराः । नारुंतुदानां क्षमिणां या गतिस्तामवाप्नुहि ॥ ३३ ॥ 'जो ईर्ष्या-द्वेषसे दूर रहकर समस्त प्राणियोंको समभावसे देखते हैं तथा जो किसीके मर्मस्थानको वाणीद्वारा चोट नहीं पहुँचाते एवं सबके प्रति क्षमाभाव रखते हैं, उनकी जो गति होती है, उसीको तुम भी प्राप्त करो ।। ३३ ।। मधुमांसनिवृत्तानां मदाद् दम्भात् तथानृतात् । परोपतापत्यक्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ ३४ ॥ 'पुत्र! जो मद्य और मांसका सेवन नहीं करते, मद, दम्भ और असत्यसे अलग रहते और दूसरोंको संताप नहीं देते हैं, उन्हें मिलनेवाली सद्गति तुम्हें भी प्राप्त हो ।। ३४ ।। ह्रीमन्तः सर्वशास्त्रज्ञा ज्ञानतृप्ता जितेन्द्रियाः । यां गतिं साधवो यान्ति तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ ३५ ॥ 'बेटा! सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता, लज्जाशील, ज्ञानसे परितृप्त, जितेन्द्रिय श्रेष्ठपुरुष जिस गतिको पाते हैं, उसीको तुम भी प्राप्त करो' ।। ३५ ।। एवं विलपतीं दीनां सुभद्रां शोककर्शिताम् ।

अन्वपद्यत पाञ्चाली वैराटीसहितां तदा ॥ ३६ ॥
इस प्रकार उत्तरासहित विलाप करती हुई दीन-दुःखी एवं शोकसे दुर्बल सुभद्राके पास उस समय द्रौपदी भी आ पहुँची ॥ ३६ ॥
ताः प्रकामं रुदित्वा च विलप्य च सुदुःखिताः ।
उन्मत्तवत् तदा राजन् विसंज्ञान्यपतन् क्षितौ ॥ ३७ ॥
राजन्! वे सब-की-सब अत्यन्त दुःखी हो इच्छानुसार रोती और विलाप करती हुई पगली-सी हो गयीं और मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ ३७ ॥
सोपचारस्तु कृष्णश्च दुःखितां भृशदुःखितः ।
सिक्त्वाम्भसा समाश्वास्य तत्तदुक्त्वा हितं वचः ॥ ३८ ॥
विसंज्ञकल्पां रुदतीं मर्मविद्धां प्रवेपतीम् ।
भगिनीं पुण्डरीकाक्ष इदं वचनमब्रवीत् ॥ ३९ ॥
तब कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त दुःखी हो उन सबको होशमें लानेके लिये उपचार करने लगे। उन्होंने अपनी दुःखिनी बहिन सुभद्रापर जल छिड़ककर नाना प्रकारके हितकर वचन कहते हुए उसे आश्वासन दिया। पुत्र-शोकसे मर्माहत हो वह रोती हुई काँप रही थी और अचेत-सी हो गयी थी। उस अवस्थामें भगवान्ने उससे कहा— ॥ ३८-३९ ॥
सुभद्रे मा शुचः पुत्रं पाञ्चाल्याश्वासयोत्तराम् ।
गतोऽभिमन्युः प्रथितां गतिं क्षत्रियपुङ्गवः ॥ ४० ॥
'सुभद्रे! तुम पुत्रके लिये शोक न करो। द्रुपदकुमारी! तुम उत्तराको धीरज बँधाओ। वह क्षत्रियशिरोमणि सर्वश्रेष्ठ गतिको प्राप्त हुआ है ॥ ४० ॥
ये चान्येऽपि कुले सन्ति पुरुषा नो वरानने ।
सर्वे ते तां गतिं यान्तु ह्यभिमन्योर्यशस्विनः ॥ ४१ ॥
'सुमुखि! हमारी इच्छा तो यह है कि हमारे कुलमें और भी जितने पुरुष हैं, वे सब यशस्वी अभिमन्युकी ही गति प्राप्त करें' ॥ ४१ ॥
कुर्याम तद् वयं कर्म क्रियासु सुहृदश्च नः ।
कृतवान् यादृगद्यैकस्तव पुत्रो महारथः ॥ ४२ ॥
'तुम्हारे महारथी पुत्रने अकेले ही आज जैसा पराक्रम किया है, उसे हम और हमारे सुहृद् भी कार्यरूपमें परिणत करें' ॥ ४२ ॥
एवमाश्वास्य भगिनीं द्रौपदीमपि चोत्तराम् ।
पार्थस्यैव महाबाहुः पार्श्वमागादरिंदमः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार अपनी बहिन सुभद्रा, उत्तरा तथा द्रौपदीको आश्वासन देकर शत्रुदमन महाबाहु श्रीकृष्ण पुनः अर्जुनके ही पास चले आये ॥ ४३ ॥
ततोऽभ्यनुज्ञाय नृपान् कृष्णो बन्धूंस्तथार्जुनम् ।
विवेशान्तःपुरे राजंस्ते च जग्मुर्यथालयम् ॥ ४४ ॥

राजन्! तदनन्तर श्रीकृष्ण राजाओं, बन्धुजनों तथा अर्जुनसे अनुमति ले अन्तःपुरमें गये और वे राजालोग भी अपने-अपने शिविरमें चले गये ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि सुभद्राप्रविलापे अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें सुभद्रा-विलापविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४६ १/३ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 518)

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनाशीतितमोऽध्यायः

श्रीकृष्णका अर्जुनकी विजयके लिये रात्रिमें भगवान् शिवका पूजन करवाना, जागते हुए पाण्डव-सैनिकोंकी अर्जुनके लिये शुभाशंसा तथा अर्जुनकी सफलताके लिये श्रीकृष्णके दारुकके प्रति उत्साहभरे वचन

संजय उवाच

ततोऽर्जुनस्य भवनं प्रविश्याप्रतिमं विभुः ।
स्पृष्ट्वाम्भः पुण्डरीकाक्षः स्थण्डिले शुभलक्षणे ॥ १ ॥
संतस्तार शुभां शय्यां दर्भैर्वैदूर्यसंनिभैः ।
ततो माल्येन विधिवल्लाजैर्गन्धैः सुमङ्गलैः ॥ २ ॥
अलंचकार तां शय्यां परिवार्यायधोत्तमैः ।
ततः स्पृष्टोदके पार्थे विनीताः परिचारकाः ॥ ३ ॥
दर्शयन्तोऽन्तिके चक्रुर्नैशं त्र्यम्बकं बलिम् ।

संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके अनुपम भवनमें प्रवेश करके जलका स्पर्श किया और शुभ लक्षणोंसे युक्त वेदीपर वैदूर्यमणिके सदृश कुशोंकी सुन्दर शय्या बिछायी। तत्पश्चात् विधिपूर्वक परम मंगलकारी अक्षत, गन्ध एवं पुष्पमाला आदिसे उस शय्याको सजाया। उसके चारों ओर उत्तम आयुध रख दिये। इसके बाद जब अर्जुन आचमन कर चुके, तब विनीत (सुशिक्षित) परिचारकोंने उन्हें दिखाते हुए उनके निकट ही भगवान् शंकरका निशीथ-पूजन किया ॥ १—३ ½ ॥

ततः प्रीतमनाः पार्थो गन्धमाल्यैश्च माधवम् ॥ ४ ॥
अलंकृत्योपहारं तं नैशं तस्मै न्यवेदयत् ।
स्मयमानस्तु गोविन्दः फाल्गुनं प्रत्यभाषत ॥ ५ ॥

तत्पश्चात् अर्जुनने प्रसन्नचित्त होकर श्रीकृष्णको गन्ध और मालाओंसे अलंकृत करके रात्रिका वह सारा उपहार उन्हींको समर्पित किया। तब मुसकराते हुए भगवान् गोविन्द अर्जुनसे बोले— ॥ ४-५ ॥

सुप्यतां पार्थ भद्रं ते कल्याणाय व्रजाम्यहम् ।
स्थापयित्वा ततो द्वाःस्थान् गोप्तूंश्चात्तायुधान् नरान् ॥ ६ ॥
दारुकानुगतः श्रीमान् विवेश शिबिरं स्वकम् ।