भारतकोश
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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

तद् विहत्यास्य राधेयस्तत एनं समभ्ययात् ॥ ७९ ॥
संरम्भात् पाण्डवं संख्ये युद्धाय समुपस्थितम् ।
उनके रथ आदि साधनोंको नष्ट करके राधानन्दन कर्णने फिर क्रोधपूर्वक रणक्षेत्रमें युद्धके लिये उपस्थित हुए इन पाण्डुपुत्र भीमसेनपर आक्रमण किया ॥ ७९ १/२ ॥
तौ समेतौ महाराज स्पर्धमानौ महाबलौ ॥ ८० ॥
जीमूताविव धर्मान्ते गर्जमानौ नरर्षभौ ।
महाराज! एक-दूसरेसे स्पर्धा रखनेवाले वे दोनों नरश्रेष्ठ महाबली वीर परस्पर भिड़कर वर्षा-ऋतुमें गर्जना करनेवाले दो मेघोंके समान गरज रहे थे ॥ ८० १/२ ॥
तयोरासीत् सम्प्रहारः क्रुद्धयोर्नरसिंहयोः ॥ ८१ ॥
अमृष्यमाणयोः संख्ये देवदानवयोरिव ।
युद्धस्थलमें अमर्ष और क्रोधसे भरे हुए उन दोनों पुरुषसिंहोंका संग्राम देव-दानव-युद्धके समान भयंकर हो रहा था ॥ ८१ १/२ ॥
क्षीणशस्त्रस्तु कौन्तेयः कर्णेन समभिद्रुतः ॥ ८२ ॥
दृष्ट्वार्जुनहतान् नागान् पतितान् पर्वतोपमान् ।
रथमार्गविघातार्थं व्यायुधः प्रविवेश ह ॥ ८३ ॥
जब कुन्तीकुमार भीमसेनके सारे अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो गये, उनके पास एक भी आयुध शेष नहीं रह गया और कर्णके द्वारा उनपर पूर्ववत् आक्रमण होता रहा, तब वे रथके मार्गको बंद कर देनेके लिये अर्जुनके मारे हुए पर्वताकार हाथियोंको वहाँ गिरा देख उनके भीतर प्रवेश कर गये ॥ ८२-८३ ॥
हस्तिनां व्रजमासाद्य रथदुर्गं प्रविश्य च ।
पाण्डवो जीविताकाङ्क्षी राधेयं नाभ्यहारयत् ॥ ८४ ॥
हाथियोंके समूहमें पहुँचकर मानो वे रथके आक्रमणसे बचनेके लिये दुर्गके भीतर प्रविष्ट हो गये हों, ऐसा अनुभव करते हुए पाण्डुपुत्र भीम केवल अपने प्राण बचानेकी इच्छा करने लगे, उन्होंने राधापुत्र कर्णपर प्रहार नहीं किया ॥
व्यवस्थानमथाकाङ्क्षन् धनंजयशरैर्हतम् ।
उद्यम्य कुञ्जरं पार्थस्तस्थौ परपुरंजयः ॥ ८५ ॥
महौषधिसमायुक्तं हनूमानिव पर्वतम् ।
शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले कुन्तीकुमार भीमसेन यह चाहते थे कि कर्णके बाणोंसे बचनेके लिये कोई व्यवधान (आड़) मिल जाय; इसीलिये वे अर्जुनके बाणोंसे मारे गये एक हाथीकी लाशको उठाकर चुपचाप खड़े हो गये। उस समय वे संजीवन नामक महान् औषधिसे युक्त पर्वत उठाये हुए हनुमान्‌जीके समान जान पड़ते थे ॥ ८५ १/२ ॥
तमस्य विशिखैः कर्णो व्यधमत् कुञ्जरं पुनः ॥ ८६ ॥
हस्त्यङ्गान्यथ कर्णाय प्राहिणोत् पाण्डुनन्दनः ।

चक्राण्यश्वांस्तथा चान्यद् यद् यत् पश्यति भूतले ॥ ८७ ॥
तत् तदादाय चिक्षेप क्रुद्धः कर्णाय पाण्डवः ।
तदस्य सर्वं चिच्छेद क्षिप्तं क्षिप्तं शितैः शरैः ॥ ८८ ॥
कर्णने अपने बाणोंद्वारा उस हाथीके भी टुकड़े-टुकड़े कर दिये। तब पाण्डुनन्दन भीमने हाथीके कटे हुए अंगोंको ही कर्णपर फेंकना शुरू किया। रथोंके पहिये, घोड़ोंकी लाशें तथा और भी जो-जो वस्तुएँ वे धरतीपर पड़ी देखते, उन्हें उठाकर क्रोधपूर्वक कर्णपर फेंकते थे; परंतु वे जो-जो वस्तु फेंकते, उन सबको कर्ण अपने तीखे बाणोंसे काट डालता था ॥ ८६—८८ ॥
भीमोऽपि मुष्टिमुद्यम्य वज्रगर्भां सुदारुणाम् ।
हन्तुमैच्छत् सूतपुत्रं संस्मरन्नर्जुनं क्षणात् ॥ ८९ ॥
शक्तोऽपि नावधीत् कर्णं समर्थः पाण्डुनन्दनः ।
रक्षमाणः प्रतिज्ञां तां या कृता सव्यसाचिना ॥ ९० ॥
अब भीमसेनने अपने अंगूठेको मुट्ठीके भीतर करके वज्रतुल्य अत्यन्त भयंकर घूँसा तानकर सूतपुत्र कर्णको मार डालनेकी इच्छा की। तबतक क्षणभरमें उन्हें अर्जुनकी याद आ गयी। अतः सव्यसाची अर्जुनने पहले जो प्रतिज्ञा की थी, उसकी रक्षा करते हुए पाण्डुनन्दन भीमने समर्थ एवं शक्तिशाली होनेपर भी उस समय कर्णका वध नहीं किया ॥ ८९-९० ॥
तमेवं व्याकुलं भीमं भूयो भूयः शितैः शरैः ।
मूर्च्छयाभिपरीताङ्गमकरोत् सूतनन्दनः ॥ ९१ ॥
इस प्रकार वहाँ बाणोंके आघातसे व्याकुल हुए भीमसेनको सूतपुत्र कर्णने बारंबार अपने पैने बाणोंकी मारसे मूर्च्छित-सा कर दिया ॥ ९१ ॥
व्यायुधं नावधीच्चैनं कर्णः कुन्त्या वचः स्मरन् ।
धनुषोऽग्रेण तं कर्णः सोऽभिद्रुत्य परामृशत् ॥ ९२ ॥
परंतु कुन्तीके वचनका स्मरण करके उसने शस्त्रहीन भीमसेनका वध नहीं किया। कर्णने उनके पास जाकर अपने धनुषकी नोकसे उनका स्पर्श किया ॥ ९२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 974)

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भीमसेनका कर्णके रथपर हाथीकी लाश फेंकना

धनुषा स्पृष्टमात्रेण क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् ।
आच्छिद्य स धनुस्तस्य कर्णं मूर्धन्यताडयत् ॥ ९३ ॥
धनुषका स्पर्श होते ही वे क्रोधमें भरे हुए सर्पके समान फुफकार उठे और उन्होंने कर्णके हाथसे वह धनुष छीनकर उसे उसीके मस्तकपर दे मारा ॥ ९३ ॥

ताडितो भीमसेनेन क्रोधादारक्तलोचनः ।
विहसन्निव राधेयो वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ९४ ॥
भीमसेनकी मार खाकर राधापुत्र कर्णकी आँखें लाल हो गयीं। उसने हँसते हुए-से यह बात कही— ॥ ९४ ॥

पुनः पुनस्तूबरक मूढ औदरिकेति च ।
अकृतास्त्रक मा योत्सीर्बाल संग्रामकातर ॥ ९५ ॥
‘ओ बिना दाढ़ी-मूंछके नपुंसक! ओ मूर्ख! अरे पेटू! तू तो अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञानसे सर्वथा शून्य है। युद्धभीरु कायर! छोकरे! अब फिर कभी युद्ध न करना ॥ ९५ ॥

यत्र भोज्यं बहुविधं भक्ष्यं पेयं च पाण्डव ।

तत्र त्वं दुर्मते योग्यो न युद्धेषु कदाचन ॥ ९६ ॥
‘दुर्बुद्धि पाण्डव! जहाँ अनेक प्रकारकी खाने-पीनेकी वस्तुएँ रखी हों, तू वहीं रहनेके योग्य है! युद्धोंमें तुझे कभी नहीं आना चाहिये ॥ ९६ ॥
मूलपुष्पफलाहारो व्रतेषु नियमेषु च ।
उचितस्त्वं वने भीम न त्वं युद्धविशारदः ॥ ९७ ॥
‘भीम! वनमें रहकर तू फल-मूल और फूल खाकर व्रत एवं नियम आदि पालन करनेके योग्य है। युद्धकौशल तुझमें नाममात्रको भी नहीं है ॥ ९७ ॥
क्व युद्धं क्व मुनित्वं च वनं गच्छ वृकोदर ।
न त्वं युद्धोचितस्तात वनवासरतिर्भवान् ॥ ९८ ॥
‘वृकोदर! कहाँ युद्ध और कहाँ मुनिवृत्ति। जा, जा, वनमें चला जा। तात! तुझमें युद्धकी योग्यता नहीं है। तू तो वनवासका ही प्रेमी है ॥ ९८ ॥
(सूदं त्वामहमाजाने मात्स्ये प्रेष्यककारकम् ।)
सूदान् भृत्यजनान् दासांस्त्वं गृहे त्वरयन् भृशम् ।
योग्यस्ताडयितुं क्रोधाद् भोजनार्थं वृकोदर ॥ ९९ ॥
‘मैं तुझे अच्छी तरह जानता हूँ। तू मत्स्यराज विराट्का नौकर एक रसोइया रहा है। वृकोदर! तू तो घरमें रसोइयों, भृत्यजनों तथा दासोंको बहुत जल्दी भोजन तैयार करनेके लिये प्रेरणा देते हुए क्रोधसे उन्हें डाँटने और मारने-पीटनेकी योग्यता रखता है ॥ ९९ ॥
मुनिर्भूत्वाथवा भीम फलान्यादत्स्व दुर्मते ।
वनाय व्रज कौन्तेय न त्वं युद्धविशारदः ॥ १०० ॥
‘दुर्मति कुन्तीकुमार भीम! अथवा तू मुनि होकर वनमें चला जा। वहाँ इधर-उधरसे फल ले आ और खा। तू युद्धमें निपुण नहीं है ॥ १०० ॥
फलमूलाशने शक्तस्त्वं तथातिथिपूजने ।
न त्वां शस्त्रसमुद्योगे योग्यं मन्ये वृकोदर ॥ १०१ ॥
‘वृकोदर! तू फल-मूल खाने और अतिथिसत्कार करनेमें समर्थ है। मैं तुझे हथियार उठानेके योग्य नहीं मानता’ ॥ १०१ ॥
कौमारे यानि वृत्तानि विप्रियाणि विशाम्पते ।
तानि सर्वाणि चाप्येव रूक्षाण्यश्रावयद् भृशम् ॥ १०२ ॥
प्रजापालक नरेश! कर्णने बाल्यावस्थामें जो अप्रिय वृत्तान्त घटित हुए थे, उन सबका उल्लेख करते हुए बहुत-सी रूखी बातें सुनायीं ॥ १०२ ॥
अथैनं तत्र संलीनमस्पृशद् धनुषा पुनः ।
प्रहसंश्च पुनर्वाक्यं भीममाह वृषस्तदा ॥ १०३ ॥
तत्पश्चात् वहाँ छिपे हुए भीमसेनका कर्णने पुनः धनुषसे स्पर्श किया और उस समय उनका उपहास करते हुए फिर कहा— ॥ १०३ ॥

योद्धव्यं मारिषाण्यत्र न योद्धव्यं च मादृशैः । मादृशैर्युध्यमानानामेतच्चान्यच्च विद्यते ॥ १०४ ॥ 'आर्य! तुझे और लोगोंके साथ युद्ध करना चाहिये। मेरे-जैसे वीरोंके साथ नहीं। मेरे-जैसे योद्धाओंसे जूझनेवालोंकी ऐसी ही अथवा इससे भी बुरी दशा होती है ॥ १०४ ॥ गच्छ वा यत्र तौ कृष्णौ तौ त्वां रक्षिष्यतो रणे । गृहं वा गच्छ कौन्तेय किं ते युद्धेन बालक ॥ १०५ ॥ 'अथवा जहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुन हैं, वहीं चला जा। वे रणभूमिमें तेरी रक्षा करेंगे अथवा कुन्तीकुमार! तू घर चला जा। बच्चे! तुझे युद्धसे क्या लाभ है?' ॥ १०५ ॥ कर्णस्य वचनं श्रुत्वा भीमसेनोऽतिदारुणम् । उवाच कर्णं प्रहसन् सर्वेषां शृण्वतां वचः ॥ १०६ ॥ कर्णके ये अत्यन्त कठोर वचन सुनकर भीमसेन ठठाकर हँस पड़े और सबके सुनते हुए उससे इस प्रकार बोले— ॥ १०६ ॥ जितस्त्वमसकृद् दुष्ट कत्थसे किं वृथाऽऽत्मना । जयाजयौ महेन्द्रस्य लोके दृष्टौ पुरातनैः ॥ १०७ ॥ 'अरे दुष्ट! मैंने तुझे एक बार नहीं, बारंबार हराया है; फिर क्यों व्यर्थ अपने ही मुँहसे अपनी बड़ाई कर रहा है। संसारमें पूर्वपुरुषोंने देवराज इन्द्रकी भी कभी जय और कभी पराजय होती देखी है ॥ १०७ ॥ मल्लयुद्धं मया सार्धं कुरु दुष्कुलसम्भव । महाबलो महाभोगी कीचको निहतो यथा ॥ १०८ ॥ तथा त्वां घातयिष्यामि पश्यत्सु सर्वराजसु । 'नीच कुलमें पैदा हुए कर्ण! आ, मेरे साथ मल्ल-युद्ध कर ले। जैसे मैंने महान् बलशाली महाभोगी कीचकको पीस डाला था, उसी प्रकार इन समस्त राजाओंके देखते-देखते मैं तुझे अभी मौतके हवाले कर दूँगा' ॥ १०८ १/२ ॥ भीमस्य मतमाज्ञाय कर्णो बुद्धिमतां वरः ॥ १०९ ॥ विरराम रणात् तस्मात् पश्यतां सर्वधन्विनाम् । भीमसेनका यह अभिप्राय जानकर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कर्ण समस्त धनुर्धरोंके सामने ही उस युद्धसे हट गया ॥ १०९ १/२ ॥ एवं तं विरथं कृत्वा कर्णो राजन् व्यकत्थयत् ॥ ११० ॥ प्रमुखे वृष्णिसिंहस्य पार्थस्य च महात्मनः । ततो राजन् शिलाधौतान् शरान् शाखामृगध्वजः ॥ १११ ॥ प्राहिणोत् सूतपुत्राय केशवेन प्रचोदितः ।

राजन्! इस प्रकार कर्णने भीमसेनको रथहीन करके जब वृष्णिवंशके सिंह भगवान् श्रीकृष्ण और महामना अर्जुनके सामने ही अपनी इतनी प्रशंसा की, तब श्रीकृष्णकी प्रेरणासे कपिध्वज अर्जुनने शिलापर स्वच्छ किये हुए बहुत-से बाणोंको सूतपुत्र कर्णपर चलाया ।। ११०-१११ १/२ ।।

ततः पार्थभुजोत्सृष्टाः शराः कनकभूषणाः ।। ११२ ।। गाण्डीवप्रभवाः कर्णं हंसाः क्रौञ्चमिवाविशन् । तत्पश्चात् अर्जुनकी भुजाओंसे छोड़े गये तथा गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए वे सुवर्णभूषित बाण कर्णके शरीरमें उसी प्रकार घुस गये, जैसे हंस क्रौंच पर्वतकी गुफाओंमें समा जाते हैं ।। ११२ १/२ ।।

स भुजङ्गैरिवाविष्टैर्गाण्डीवप्रेषितैः शरैः ।। ११३ ।। भीमसेनादपासेधत् सूतपुत्रं धनंजयः । इस प्रकार धनंजयने गाण्डीव धनुषसे छोड़े गये रोषभरे सर्पोंके समान बाणोंद्वारा सूतपुत्र कर्णको भीमसेनसे दूर हटा दिया ।। ११३ १/२ ।।

स च्छिन्नधन्वा भीमेन धनंजयशराहतः ।। ११४ ।। कर्णो भीमादपायासीद् रथेन महता द्रुतम् । भीमसेनने कर्णके धनुषको तो पहलेसे ही तोड़ दिया था। इसलिये वह धनंजयके बाणोंसे घायल हो भीमसेनको छोड़कर अपने विशाल रथके द्वारा तुरंत ही वहाँसे दूर हट गया ।। ११४ १/२ ।।

भीमोऽपि सात्यकेर्वाहं समारुह्य नरर्षभः ।। ११५ ।। अन्वयाद् भ्रातरं संख्ये पाण्डवं सव्यसाचिनम् । इधर नरश्रेष्ठ भीमसेन भी सात्यकिके रथपर आरूढ़ हो युद्धस्थलमें सव्यसाची पाण्डुपुत्र भाई अर्जुनके पास जा पहुँचे ।। ११५ १/२ ।।

ततः कर्णं समुद्दिश्य त्वरमाणो धनंजयः ।। ११६ ।। नाराचं क्रोधताम्राक्षः प्रैषीन्मृत्युमिवान्तकः । तत्पश्चात् क्रोधसे लाल आँखें किये अर्जुनने बड़ी उतावलीके साथ कर्णको लक्ष्य करके एक नाराच चलाया, मानो यमराजने किसीके लिये मौत भेज दी हो ।। ११६ १/२ ।।

स गरुत्मानिवाकाशे प्रार्थयन् भुजगोत्तमम् ।। ११७ ।। नाराचोऽभ्यपतत् कर्णं तूर्णं गाण्डीवचोदितः । गाण्डीव धनुषसे छूटा हुआ वह नाराच आकाशमार्गसे तुरंत ही कर्णकी ओर चला, मानो गरुड़ किसी उत्तम सर्पको पकड़नेके लिये जा रहे हों ।। ११७ १/२ ।।

तमन्तरिक्षे नाराचं द्रौणिश्चिच्छेद पत्रिणा ।। ११८ ।। धनंजयभयात् कर्णमुज्जिहीर्षन् महारथः ।

उस समय अर्जुनके भयसे कर्णका उद्धार करनेकी इच्छा रखकर महारथी अश्वत्थामाने अपने बाणसे उस नाराचको आकाशमें ही काट दिया ।। ११८ १/२ ।।
ततो द्रौणिं चतुःषष्ट्या विव्याध कुपितोऽर्जुनः ।। ११९ ।।
शिलीमुखैर्महाराज मा गास्तिष्ठेति चाब्रवीत् ।
महाराज! तब क्रोधमें भरे हुए अर्जुनने अश्वत्थामाको चौंसठ बाण मारे और कहा—'खड़े रहो, भागना मत' ।। ११९ १/२ ।।
स तु मत्तगजाकीर्णमनीकं रथसंकुलम् ।। १२० ।।
तूर्णमभ्याविशद् द्रौणिर्धनंजयशरार्दितः ।
परंतु अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित हो अश्वत्थामा तुरंत ही रथसे व्याप्त एवं मतवाले हाथियोंसे भरे हुए व्यूहके भीतर घुस गया ।। १२० १/२ ।।
ततः सुवर्णपृष्ठानां चापानां कूजतां रणे ।। १२१ ।।
शब्दं गाण्डीवघोषेण कौन्तेयोऽभ्यभवद् बली ।
तब बलवान् कुन्तीकुमार अर्जुनने रणक्षेत्रमें टंकार करते हुए सुवर्णमय पृष्ठभागवाले समस्त धनुषोंके सम्मिलित शब्दोंको अपने गाण्डीव धनुषके गम्भीर घोषसे दबा दिया ।। १२१ १/२ ।।
धनंजयस्तथा यान्तं पृष्ठतो द्रौणिमभ्यगात् ।। १२२ ।।
नातिदीर्घमिवाध्वानं शरैः संत्रासयन् बलम् ।
अर्जुन भागते हुए अश्वत्थामाके पीछे-पीछे अपने बाणोंद्वारा कौरव-सेनाको संत्रस्त करते हुए कुछ दूरतक गये ।। १२२ १/२ ।।
विदार्य देहान् नाराचैर्नरवारणवाजिनाम् ।। १२३ ।।
कङ्कबर्हिणवासोभिर्बलं व्यधमदर्जुनः ।
उस समय उन्होंने कंक और मोरकी पाँखोंसे युक्त नाराचोंद्वारा घोड़ों, हाथियों और मनुष्योंके शरीरोंको विदीर्ण करके सारी सेनाको तहस-नहस कर दिया ।।
तद् बलं भरतश्रेष्ठ सवाजिद्विपमानवम् ।। १२४ ।।
पाकशासनिरायत्तः पार्थः स निजघान ह ।। १२५ ।।
भरतश्रेष्ठ! उस समय सावधान हुए इन्द्रकुमार कुन्तीपुत्र अर्जुनने हाथी, घोड़ों और मनुष्योंसे भरी हुई उस सेनाका संहार कर डाला ।। १२४-१२५ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भीमकर्णयुद्धे
एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें भीमसेन और कर्णका युद्धविषयक एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३९ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल १२५ १/२ श्लोक हैं।)

१४०-

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चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

सात्यकिद्वारा राजा अलम्बुषका और दुःशासनके घोड़ोंका वध

धृतराष्ट्र उवाच

अहन्यहनि मे दीप्तं यशः पतति संजय। हता मे बहवो योधा मन्ये कालस्य पर्ययम्॥ १॥ **धृतराष्ट्र बोले—**संजय! प्रतिदिन मेरा उज्ज्वल यश घटता या मन्द पड़ता जा रहा है, मेरे बहुत-से योद्धा मारे गये, इसे मैं समयका ही फेर समझता हूँ॥ १॥

धनंजयः सुसंक्रुद्धः प्रविष्टो मामकं बलम्। रक्षितं द्रौणिकर्णाभ्यामप्रवेश्यं सुरैरपि॥ २॥ अश्वत्थामा और कर्णके द्वारा सुरक्षित मेरी सेनामें, जहाँ देवताओंका भी प्रवेश असम्भव था, क्रोधमें भरे हुए अर्जुन प्रविष्ट हो गये॥ २॥

ताभ्यामूर्जितवीर्याभ्यामाप्यायितपराक्रमः। सहितः कृष्णभीमाभ्यां शिनीनामृषभेण च॥ ३॥ महान् पराक्रमी श्रीकृष्ण और भीमसेन तथा शिनिप्रवर सात्यकिका साथ होनेसे अर्जुनका बल तथा पराक्रम और भी बढ़ गया है॥ ३॥

तदाप्रभृति मां शोको दहत्यग्निरिवाशयम्। ग्रस्तानिव प्रपश्यामि भूमिपालान् ससैन्धवान्॥ ४॥ जबसे यह बात मुझे मालूम हुई है, तबसे शोक मुझे उसी प्रकार दग्ध कर रहा है, जैसे काष्ठसे पैदा होनेवाली आग अपने आधारभूत काष्ठको ही जला देती है। मैं सिंधुराज जयद्रथसहित समस्त राजाओंको कालके गालमें गया हुआ ही समझता हूँ॥ ४॥

अप्रियं सुमहत् कृत्वा सिन्धुराजः किरीटिनः। चक्षुर्विषयमापन्नः कथं जीवितमाप्नुयात्॥ ५॥ सिंधुराज जयद्रथ किरीटधारी अर्जुनका महान् अप्रिय करके जब उनकी आँखोंके सामने आ गया है, तब कैसे जीवित रह सकता है?॥ ५॥

अनुमानाच्च पश्यामि नास्ति संजय सैन्धवः। युद्धं तु तद् यथावृत्तं तन्ममाचक्ष्व तत्त्वतः॥ ६॥ संजय! मैं अनुमानसे यह देख रहा हूँ कि सिंधुराज जयद्रथ अब जीवित नहीं है। अब वह युद्ध जिस प्रकार हुआ था, वह सब यथार्थरूपसे बताओ॥ ६॥

यश्च विक्षोभ्य महतीं सेनामालोड्य चासकृत्।

एकः प्रविष्टः संक्रुद्धो नलिनीमिव कुञ्जरः ॥ ७ ॥ तस्य मे वृष्णिवीरस्य ब्रूहि युद्धं यथातथम् । धनंजय्यार्थे यत्तस्य कुशलो ह्यसि संजय ॥ ८ ॥ संजय! जैसे हाथी किसी पोखरेमें प्रवेश करता है, उसी प्रकार जिन्होंने अकेले ही कुपित होकर मेरी विशाल सेनाको क्षुब्ध करके बारंबार उसे मथकर उसके भीतर प्रवेश किया था, उन वृष्णिवंशी वीर सात्यकिने अर्जुनके लिये प्रयत्नपूर्वक जैसा युद्ध किया था, उसका वर्णन करो; क्योंकि तुम कथा कहनेमें कुशल हो ॥ ७-८ ॥

संजय उवाच

तथा तु वैकर्तनपीडितं तं भीमं प्रयान्तं पुरुषप्रवीरम् । समीक्ष्य राजन् नरवीरमध्ये शिनिप्रवीरोऽनुययौ रथेन ॥ ९ ॥ संजयने कहा—राजन्! पुरुषोंमें प्रमुख वीर भीमसेन अर्जुनके पास जाते समय जब पूर्वोक्त प्रकारसे कर्णद्वारा पीड़ित होने लगे, तब उन्हें उस अवस्थामें देखकर शिनिवंशके प्रधान वीर सात्यकिने उन नरवीरोंके समूहमें रथके द्वारा भीमसेनकी सहायताके लिये उनका अनुसरण किया ॥ ९ ॥

नदन् यथा वज्रधरस्तपान्ते ज्वलन् यथा जलदान्ते च सूर्यः । निघ्नन्नमित्रान् धनुषा दृढेन स कम्पयंस्तव पुत्रस्य सेनाम् ॥ १० ॥ जैसे वज्रधारी इन्द्र वर्षाकालमें मेघरूपसे गर्जना करते हैं और जैसे सूर्य शरत्कालमें प्रज्वलित होते हैं, उसी प्रकार गरजते और तेजसे प्रज्वलित होते हुए सात्यकि अपने सुदृढ़ धनुषद्वारा आपके पुत्रकी सेनाको कँपाते हुए शत्रुओंका संहार करने लगे ॥ १० ॥

तं यान्तमश्वै रजतप्रकाशै- रायोधने वीरवरं नदन्तम् । नाशक्नुवन् वारयितुं त्वदीयाः सर्वे रथा भारत माधवाग्र्यम् ॥ ११ ॥ भारत! उस युद्धस्थलमें रजतवर्णके अश्वोंद्वारा आगे बढ़ते और गर्जना करते हुए मधुवंशशिरोमणि वीरवर सात्यकिको आपके सारे रथी मिलकर भी रोक न सके ॥ ११ ॥

अमर्षपूर्णस्त्वनिवृत्तयोधी शरासनी काञ्चनवर्मधारी । अलम्बुषः सात्यकिं माधवाग्र्य-

मवारयद् राजवरोऽभिपत्य ॥ १२ ॥ उस समय सोनेका कवच और धनुष धारण किये, युद्धसे कभी पीठ न दिखानेवाले, राजाओंमें श्रेष्ठ अलम्बुषने अमर्षमें भरकर मधुकुलके महान् वीर सात्यकिको सहसा सामने आकर रोका ॥ १२ ॥ तयोर्भूद् भारत सम्प्रहारो यथाविधो नैव बभूव कश्चित् । प्रेक्षन्त एवाहवशोभिनौ तौ योधास्त्वदीयाश्च परे च सर्वे ॥ १३ ॥ भरतनन्दन! उन दोनोंका जैसा संग्राम हुआ, वैसा दूसरा कोई युद्ध नहीं हुआ था। आपके और शत्रुपक्षके समस्त योद्धा संग्राममें शोभा पानेवाले उन दोनों वीरोंको देखते ही रह गये थे ॥ १३ ॥ आविध्यदेनं दशभिः पृषत्कै- रलम्बुषो राजवरः प्रसह्य । अनागतानेव तु तान् पृषत्कां- श्चिच्छेद बाणैः शिनिपुङ्गवोऽपि ॥ १४ ॥ राजाओंमें श्रेष्ठ अलम्बुषने सात्यकिको बलपूर्वक दस बाण मारे। शिनिप्रवर सात्यकिने भी बाणोंद्वारा अपने पास आनेसे पहले ही उन समस्त बाणोंको काट गिराया ॥ १४ ॥ पुनः स बाणैस्त्रिभिरग्निकल्पै- राकर्णपूर्णैर्निशितैः सुपुङ्खैः । विव्याध देहावरणं विदार्य ते सात्यकेराविविशुः शरीरम् ॥ १५ ॥ तब अलम्बुषने धनुषको कानतक खींचकर अग्निके समान प्रज्वलित, सुन्दर पंखवाले तीन तीखे बाणोंद्वारा पुनः सात्यकिपर प्रहार किया। वे बाण सात्यकिके कवचको विदीर्ण करके उनके शरीरमें घुस गये ॥ १५ ॥ तैः कायमस्यान्यनिलप्रभावै- र्विदार्य बाणैर्निशितैर्ज्वलद्भिः । आजघ्निवांस्तान् रजतप्रकाशा- नश्वांश्चतुर्भिश्चतुरः प्रसह्य ॥ १६ ॥ अग्नि और वायुके समान प्रभावशाली उन प्रज्वलित तीखे बाणोंद्वारा सात्यकिका शरीर विदीर्ण करके अलम्बुषने चाँदीके समान चमकनेवाले उनके उन चारों घोड़ोंको भी चार बाणोंसे हठात् घायल कर दिया ॥ १६ ॥ तथा तु तेनाभिहतस्तरस्वी नप्ता शिनेश्चक्रधरप्रभावः ।

अलम्बुषस्योत्तमवेगवद्भि-
रश्वांश्चतुर्भिर्निजघान बाणैः ।। १७ ।।
इस प्रकार अलम्बुषके द्वारा घायल होकर चक्रधारी विष्णुके समान प्रभावशाली और वेगवान् वीर शिनिपौत्र सात्यकिने अपने उत्तम वेगवाले चार बाणोंद्वारा राजा अलम्बुषके चारों घोड़ोंको मार डाला ।। १७ ।।

अथास्य सूतस्य शिरो निकृत्य
भल्लेन कालानलसंनिभेन ।
सकुण्डलं पूर्णशशिप्रकाशं
भ्राजिष्णु वक्त्रं निचकर्त देहात् ।। १८ ।।
तत्पश्चात् उनके सारथिका भी मस्तक काटकर कालाग्निके समान तेजस्वी भल्लद्वारा पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिसे प्रकाशित होनेवाले उनके कुण्डलमण्डित मुखमण्डलको भी धड़से काट गिराया ।। १८ ।।

निहत्य तं पार्थिवपुत्रपौत्रं
संख्ये यदूनामृषभः प्रमाथी ।
ततोऽन्वयादर्जुनमेव वीरः
सैन्यानि राजंस्तव संनिवार्य ।। १९ ।।
राजन्! शत्रुओंको मथ डालनेवाले यदुकुलतिलक वीर सात्यकिने इस प्रकार युद्धस्थलमें राजाके पुत्र और पौत्र अलम्बुषको मारकर आपकी सेनाको स्तब्ध करके फिर अर्जुनका ही अनुसरण किया ।। १९ ।।

अन्वागतं वृष्णिवीरं समीक्ष्य तथारिमध्ये परिवर्तमानम् । घ्नन्तं कुरूणामिषुभिर्बलानि पुनः पुनर्वायुमिवाभ्रपूगान् ॥ २० ॥ ततोऽवहन् सैन्धवाः साधुदान्ता गोक्षीरकुन्देन्दुहिमप्रकाशाः । सुवर्णजालावतताः सदश्वा यतो यतः कामयते नृसिंहः ॥ २१ ॥ अथात्मजास्ते सहिताभिपेतु- रन्ये च योधास्त्वरितास्त्वदीयाः । कृत्वा मुखं भारत योधमुख्यं दुःशासनं त्वत्सुतमाजमीढ ॥ २२ ॥

उस समय गोदुग्ध, कुन्दकुसुम, चन्द्रमा तथा हिमके समान कान्तिवाले सिंधुदेशीय सुशिक्षित सुन्दर घोड़े, जो सोनेकी जालीसे आवृत थे, पुरुषसिंह सात्यकि जहाँ-जहाँ जाना चाहते, वहाँ-वहाँ उन्हें ले जाते थे। अजमीढवंशी भरतनन्दन! इस प्रकार जैसे वायु मेघोंकी

घटाको छिन्न-भिन्न करती रहती है, वैसे ही बारंबार बाणोंद्वारा कौरव-सेनाओंका संहार करते और शत्रुओंके बीचमें विचरते हुए वृष्णिवीर सात्यकिको वहाँ आया हुआ देख योद्धाओंमें प्रधान आपके पुत्र दुःशासनको अगुआ बनाकर आपके बहुत-से पुत्र तथा आपके पक्षके अन्य योद्धा भी शीघ्रतापूर्वक एक साथ ही उनपर टूट पड़े ॥ २०—२२ ॥

ते सर्वतः सम्परिवार्य संख्ये
शैनेयमाजघ्नुरनीकसाहाः ।
स चापि तान् प्रवरः सात्वतानां
न्यवारयद् बाणजालेन वीरः ॥ २३ ॥

वे सभी बड़ी-बड़ी सेनाओंका आक्रमण सहनेमें समर्थ थे। उन सबने युद्धस्थलमें सात्यकिको चारों ओरसे घेरकर उनपर प्रहार आरम्भ कर दिया। सात्वतशिरोमणि वीर सात्यकिने भी अपने बाणोंके समूहसे उन सबको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ २३ ॥

निवार्य तांस्तूर्णममित्रघाती
नप्ता शिनेः पत्रिभिरग्निकल्पैः ।
दुःशासनस्याभिजघान वाहा-
नुद्यम्य बाणासनमाजमीढ ॥ २४ ॥

अजमीढनन्दन! उन सबको रोककर शत्रुघाती शिनिपौत्र सात्यकिने तुरंत ही धनुष उठाकर अग्निके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा दुःशासनके घोड़ोंको मार डाला ॥ २४ ॥

ततोऽर्जुनो हर्षमवाप संख्ये
कृष्णश्च दृष्ट्वा पुरुषप्रवीरम् ॥ २५ ॥

उस समय श्रीकृष्ण और अर्जुन पुरुषोंमें प्रधान वीर सात्यकिको उस युद्धभूमिमें उपस्थित देख बड़े प्रसन्न हुए ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि अलम्बुषवधे
चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें अलम्बुषवधविषयक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४० ॥

१४१-

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एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

सात्यकिका अद्भुत पराक्रम, श्रीकृष्णका अर्जुनको सात्यकिके आगमनकी सूचना देना और अर्जुनकी चिन्ता

संजय उवाच

तमुद्यतं महाबाहुं दुःशासनरथं प्रति ।
त्वरितं त्वरणीयेषु धनंजयजयैषिणम् ॥ १ ॥
त्रिगर्तानां महेष्वासाः सुवर्णविकृतध्वजाः ।
सेनासमुद्रमाविष्टमनन्तं पर्यवारयन् ॥ २ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! महाबाहु सात्यकि जल्दी करनेयोग्य कार्योंमें बड़ी फुर्ती दिखाते थे। वे अर्जुनकी विजय चाहते थे। उन्हें अनन्त सैन्य-सागरमें प्रविष्ट होकर दुःशासनके रथपर आक्रमण करनेके लिये उद्यत देख सोनेकी ध्वजा धारण करनेवाले त्रिगर्तदेशीय महाधनुर्धर योद्धाओंने सब ओरसे घेर लिया ॥ १-२ ॥

अथैनं रथवंशेन सर्वतः संनिवार्य ते ।
अवाकिरन् शरव्रातैः क्रुद्धाः परमधन्विनः ॥ ३ ॥
रथसमूहद्वारा सब ओरसे सात्यकिको अवरुद्ध करके उन परम धनुर्धर योद्धाओंने उनपर क्रोधपूर्वक बाणसमूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ३ ॥

अजयद् राजपुत्रांस्तान् भ्राजमानान् महारणे ।
एकः पञ्चाशतं शत्रून् सात्यकिः सत्यविक्रमः ॥ ४ ॥
परंतु उस महासमरमें शोभा पानेवाले अपने शत्रुरूप उन पचास राजकुमारोंको सत्यपराक्रमी सात्यकिने अकेले ही परास्त कर दिया ॥ ४ ॥

सम्प्राप्य भारतीमध्यं तलघोषसमाकुलम् ।
असिशक्तिगदापूर्णमप्लवं सलिलं यथा ॥ ५ ॥
तत्राद्भुतमपश्याम शैनेयचरितं रणे ।
कौरव-सेनाका वह मध्यभाग हथेलियोंके चट-चट शब्दसे गूँज उठा था। खड्ग, शक्ति तथा गदा आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे व्याप्त था और नौकारहित अगाध जलके समान दुस्तर प्रतीत होता था। वहाँ पहुँचकर हमलोगों ने रणभूमिमें सात्यकिका अद्भुत चरित्र देखा ॥ ५ १/२ ॥

प्रतीच्यां दिशि तं दृष्ट्वा प्राच्यां पश्यामि लाघवात् ॥ ६ ॥
उदीचीं दक्षिणां प्राचीं प्रतीचीं विदिशस्तथा ।
नृत्यन्निवाचरच्छूरो यथा रथशतं तथा ॥ ७ ॥

वे इतनी फुर्तीसे इधर-उधर जाते थे कि मैं उन्हें पश्चिम दिशामें देखकर तुरंत ही पूर्व दिशामें भी उपस्थित देखता था, सैकड़ों रथियोंके समान वे शूरवीर सात्यकि उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम तथा कोणवर्ती दिशाओंमें भी नाचते हुए-से विचर रहे थे ॥ ६-७ ॥

तद् दृष्ट्वा चरितं तस्य सिंहविक्रान्तगामिनः ।
त्रिगर्ताः संन्यवर्तन्त संतप्ताः स्वजनं प्रति ॥ ८ ॥

सिंहके समान पराक्रमसूचक गतिसे चलनेवाले सात्यकिके उस चरित्रको देखकर त्रिगर्तदेशीय योद्धा अपने स्वजनोंके लिये शोक-संताप करते हुए पीछे लौट गये ॥ ८ ॥

तमन्ये शूरसेनानां शूराः संख्ये न्यवारयन् ।
नियच्छन्तः शरव्रातैर्मत्तं द्विपमिवाङ्कुशैः ॥ ९ ॥

तदनन्तर युद्धस्थलमें दूसरे शूरसेनदेशीय शूरवीर सैनिकोंने अपने शरसमूहोंद्वारा उनपर नियन्त्रण करते हुए उन्हें उसी प्रकार रोका, जैसे महावत मतवाले हाथीको अंकुशोंद्वारा रोकते हैं ॥ ९ ॥

तैर्व्यावहरदार्यात्मा मुहूर्तदेव सात्यकिः ।
ततः कलिङ्गैर्ययुधे सोऽचिन्त्यबलविक्रमः ॥ १० ॥

तब अचिन्त्य बल और पराक्रमसे सम्पन्न महामना सात्यकिने उनके साथ युद्ध करके दो ही घड़ीमें उन्हें हरा दिया और फिर वे कलिंगदेशीय सैनिकोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ १० ॥

तां च सेनामतिक्रम्य कलिङ्गानां दुरत्ययाम् ।
अथ पार्थं महाबाहुर्धनंजयमुपासदत् ॥ ११ ॥

कलिंगोंकी उस दुर्जय सेनाओंको लाँघकर महाबाहु सात्यकि कुन्तीकुमार अर्जुनके निकट जा पहुँचे ॥ ११ ॥

तरन्निव जले श्रान्तो यथा स्थलमुपेयिवान् ।
तं दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रं युयुधानः समाश्वसत् ॥ १२ ॥

जैसे जलमें तैरते-तैरते थका हुआ मनुष्य स्थलमें पहुँच जाय, उसी प्रकार पुरुषसिंह अर्जुनको देखकर युयुधानको बड़ा आश्वासन मिला ॥ १२ ॥

तमायान्तमभिप्रेक्ष्य केशवः पार्थमब्रवीत् ।
असावायाति शैनेयस्तव पार्थ पदानुगः ॥ १३ ॥

सात्यकिको आते देख भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—'पार्थ! देखो, यह तुम्हारे चरणोंका अनुगामी शिनिपौत्र सात्यकि आ रहा है ॥ १३ ॥

एष शिष्यः सखा चैव तव सत्यपराक्रमः । सर्वान् योधांस्तृणीकृत्य विजिग्ये पुरुषर्षभः ॥ १४ ॥ 'यह सत्यपराक्रमी वीर तुम्हारा शिष्य और सखा भी है। इस पुरुषसिंहने समस्त योद्धाओंको तिनकोंके समान समझकर परास्त कर दिया है ॥ १४ ॥ एष कौरवयोधानां कृत्वा घोरमुपद्रवम् । तव प्राणैः प्रियतमः किरीटिन्नैति सात्यकिः ॥ १५ ॥ 'किरीटधारी अर्जुन! जो तुम्हें प्राणोंके समान अत्यन्त प्रिय है, वही यह सात्यकि कौरव योद्धाओंमें घोर उपद्रव मचाकर आ रहा है ॥ १५ ॥ एष द्रोणं तथा भोजं कृतवर्माणमेव च । कदर्थीकृत्य विशिखैः फाल्गुनाभ्येति सात्यकिः ॥ १६ ॥ 'फाल्गुन! यह सात्यकि अपने बाणोंद्वारा द्रोणाचार्य तथा भोजवंशी कृतवर्माका भी तिरस्कार करके तुम्हारे पास आ रहा है ॥ १६ ॥ धर्मराजप्रियान्वेषी हत्वा योधान् वरान् वरान् । शूरश्चैव कृतास्त्रश्च फाल्गुनाभ्येति सात्यकिः ॥ १७ ॥

‘फाल्गुन! यह शूरवीर एवं उत्तम अस्त्रोंका ज्ञाता सात्यकि धर्मराजके प्रिय तुम्हारे समाचार लेनेके लिये बड़े-बड़े योद्धाओंको मारकर यहाँ आ रहा है ।। १७ ।। कृत्वा सुदुष्करं कर्म सैन्यमध्ये महाबलः । तव दर्शनमन्विच्छन् पाण्डवाभ्येति सात्यकिः ॥ १८ ॥ ‘पाण्डुनन्दन! महाबली सात्यकि कौरव-सेनाके भीतर अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके तुम्हें देखनेकी इच्छासे यहाँ आ रहा है ।। १८ ।। बहूनेकरथेनाजौ योधयित्वा महारथान् । आचार्यप्रमुखान् पार्थ प्रयात्येष स सात्यकिः ॥ १९ ॥ ‘पार्थ! युद्धस्थलमें द्रोणाचार्य आदि बहुत-से महारथियोंके साथ एकमात्र रथकी सहायतासे युद्ध करके यह सात्यकि इधर आ रहा है ।। १९ ।। स्वबाहुबलमाश्रित्य विदार्य च वरूथिनीम् । प्रेषितो धर्मराजेन पार्थैषोऽभ्येति सात्यकिः ॥ २० ॥ ‘कुन्तीकुमार! अपने बाहुबलका आश्रय ले कौरव-सेनाको विदीर्ण करके धर्मराजका भेजा हुआ यह सात्यकि यहाँ आ रहा है ।। २० ।। यस्य नास्ति समो योधः कौरवेषु कथंचन । सोऽयमायाति कौन्तेय सात्यकिर्युद्धदुर्मदः ॥ २१ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! कौरव-सेनामें किसी प्रकार भी जिसकी समता करनेवाला एक भी योद्धा नहीं है, वही यह रणदुर्मद सात्यकि यहाँ आ रहा है ।। २१ ।। कुरुसैन्याद् विमुक्तो वै सिंहो मध्याद् गवामिव । निहत्य बहुलाः सेनाः पार्थैषोऽभ्येति सात्यकिः ॥ २२ ॥ ‘पार्थ! जैसे सिंह गायोंके बीचसे अनायास ही निकल जाता है, उसी प्रकार कौरव-सेनाके घेरेसे छूटकर निकला हुआ यह सात्यकि बहुत-सी शत्रु-सेनाओंका संहार करके इधर आ रहा है ।। २२ ।। एष राजसहस्राणां वक्त्रैः पङ्कजसंनिभैः । आस्तीर्य वसुधां पार्थ क्षिप्रमायाति सात्यकिः ॥ २३ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! यह सात्यकि सहस्रों राजाओंके कमलसदृश मस्तकोंद्वारा इस रणभूमिको पाटकर शीघ्रतापूर्वक इधर आ रहा है ।। २३ ।। एष दुर्योधनं जित्वा भ्रातृभिः सहितं रणे । निहत्य जलसंधं च क्षिप्रमायाति सात्यकिः ॥ २४ ॥ ‘यह सात्यकि रणभूमिमें भाइयोंसहित दुर्योधनको जीतकर और जलसंधका वध करके शीघ्र यहाँ आ रहा है ।। २४ ।। रुधिरौघवतीं कृत्वा नदीं शोणितकर्दमाम् । तृणवद् व्यस्य कौरव्यानेष ह्यायाति सात्यकिः ॥ २५ ॥

'शोणित और मांसरूपी कीचड़से युक्त खूनकी नदी बहाकर और कौरव-सैनिकोंको तिनकोंके समान उड़ाकर यह सात्यकि इधर आ रहा है' ॥ २५ ॥

ततः प्रहृष्टः कौन्तेयः केशवं वाक्यमब्रवीत् ।
न मे प्रियं महाबाहो यन्मामभ्येति सात्यकिः ॥ २६ ॥
तब हर्षमें भरे हुए कुन्तीकुमार अर्जुनने केशवसे कहा—'महाबाहो! सात्यकि जो मेरे पास आ रहे हैं, यह मुझे प्रिय नहीं है ॥ २६ ॥

न हि जानामि वृत्तान्तं धर्मराजस्य केशव ।
सात्वतेन विहीनः स यदि जीवति वा न वा ॥ २७ ॥
'केशव! पता नहीं, धर्मराजका क्या हाल है? सात्यकिसे रहित होकर वे जीवित हैं या नहीं? ॥ २७ ॥

एतेन हि महाबाहो रक्षितव्यः स पार्थिवः ।
तमेष कथमुत्सृज्य मम कृष्ण पदानुगः ॥ २८ ॥
'महाबाहो! सात्यकिको तो उन्हींकी रक्षा करनी चाहिये थी। श्रीकृष्ण! उन्हें छोड़कर ये मेरे पीछे कैसे चले आये? ॥ २८ ॥

राजा द्रोणाय चोत्सृष्टः सैन्धवश्चानिपातितः ।
प्रत्युद्याति च शैनेयमेष भूरिश्रवा रणे ॥ २९ ॥
'इन्होंने राजा युधिष्ठिरको द्रोणाचार्यके लिये छोड़ दिया और सिन्धुराज जयद्रथ भी अभी मारा नहीं गया। इसके सिवा ये भूरिश्रवा रणमें शिनिपौत्र सात्यकिकी ओर अग्रसर हो रहे हैं ॥ २९ ॥

सोऽयं गुरुतरो भारः सैन्धवार्थे समाहितः ।
ज्ञातव्यश्च हि मे राजा रक्षितव्यश्च सात्यकिः ॥ ३० ॥
'इस समय सिन्धुराज जयद्रथके कारण यह मुझपर बहुत बड़ा भार आ गया। एक तो मुझे राजाका कुशल-समाचार जानना है, दूसरे सात्यकिकी भी रक्षा करनी है ॥ ३० ॥

जयद्रथश्च हन्तव्यो लम्बते च दिवाकरः ।
श्रान्तश्चैष महाबाहुरल्पप्राणश्च साम्प्रतम् ॥ ३१ ॥
परिश्रान्ता हयाश्चास्य हययन्ता च माधव ।
न च भूरिश्रवाः श्रान्तः ससहायश्च केशव ॥ ३२ ॥
'इसके सिवा जयद्रथका भी वध करना है। इधर सूर्यदेव अस्ताचलपर जा रहे हैं। माधव! ये महाबाहु सात्यकि इस समय थककर अल्पप्राण हो रहे हैं। इनके घोड़े और सारथि भी थक गये हैं। किंतु केशव! भूरिश्रवा और उनके सहायक थके नहीं हैं ॥ ३१-३२ ॥

अपीदानीं भवेदस्य क्षेममस्मिन् समागमे ।
कच्चिन्न सागरं तीर्त्वा सात्यकिः सत्यविक्रमः ॥ ३३ ॥

गोष्पदं प्राप्य सीदेत महौजाः शिनिपुङ्गवः ।
‘क्या इन दोनोंके इस संघर्षमें इस समय सात्यकि सकुशल विजयी हो सकेंगे? कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि सत्यपराक्रमी शिनिप्रवर महाबली सात्यकि समुद्रको पार करके गायकी खुरीके बराबर जलमें डूबने लगे ।। ३३ १/२ ।।
अपि कौरवमुख्येन कृतास्त्रेण महात्मना ।। ३४ ।।
समेत्य भूरिश्रवसा स्वस्तिमान् सात्यकिर्भवेत् ।
‘कौरवकुलके मुख्य वीर अस्त्रवेत्ता महामना भूरिश्रवासे भिड़कर क्या सात्यकि सकुशल रह सकेंगे ।। ३३ १/२ ।।
व्यतिक्रममिमं मन्ये धर्मराजस्य केशव ।। ३५ ।।
आचार्याद् भयमुत्सृज्य यः प्रैषयत् सात्यकिम् ।
‘केशव! मैं तो धर्मराजके इस कार्यको विपरीत समझता हूँ, जिन्होंने द्रोणाचार्यका भय छोड़कर सात्यकिको इधर भेज दिया ।। ३५ १/२ ।।
ग्रहणं धर्मराजस्य खगः श्येन इवामिषम् ।। ३६ ।।
नित्यमाशंसते द्रोणः कच्चित् स्यात् कुशली नृपः ।। ३७ ।।
‘जैसे बाजपक्षी मांसपर झपट्टा मारता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्य प्रतिदिन धर्मराजको बंदी बनाना चाहते हैं। क्या राजा युधिष्ठिर सकुशल होंगे?’ ।। ३६-३७ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यक्यर्जुनदर्शने
एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकि और अर्जुनका परस्पर साक्षात्कारविषयक एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४१ ।।