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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

वह दस योजन विस्तृत शिखर आगकी लपटोंसे घिरा हुआ है। शक्तिशाली भगवान् अग्निदेव वहाँ स्वयं विराजमान हैं ॥ २३ ॥ सर्वान् विघ्नान् प्रशमयन् महादेवस्य धीमतः । दिव्यं वर्षसहस्रं हि पादेनैकेन तिष्ठतः ॥ २४ ॥ देवान् संतापयँस्तत्र महादेवो महाव्रतः । परम बुद्धिमान् महादेवजी सहस्र दिव्य वर्षोंतक वहाँ एक पैरसे खड़े रहे और उनकी तपस्याके सम्पूर्ण विघ्नोंका निवारण करते हुए अग्निदेव वहीं विराजमान थे। महान् व्रतधारी महादेवजी वहाँ देवताओंको संतप्त करते हुए महान् तपमें प्रवृत्त थे ॥ २४ १/२ ॥ ऐन्द्रीं तु दिशमास्थाय शैलराजस्य धीमतः ॥ २५ ॥ विविक्ते पर्वततटे पाराशर्यो महातपाः । वेदानध्यापयामास व्यासः शिष्यान् महामतिः ॥ २६ ॥ सुमन्तुं च महाभागं वैशम्पायनमेव च । जैमिनिं च महाप्राज्ञं पैलं चापि तपस्विनम् ॥ २७ ॥ उसी बुद्धिमान् गिरिराज हिमवान्‌की पूर्व दिशाका आश्रय लेकर पर्वतके एकान्त तटप्रान्तमें महातपस्वी महाबुद्धिमान् पराशरनन्दन व्यास अपने शिष्य महाभाग सुमन्तु, महाबुद्धिमान् जैमिनि, तपस्वी पैल तथा वैशम्पायन-इन चार शिष्योंको वेद पढ़ा रहे थे ॥ २५-२७ ॥ यत्र शिष्यैः परिवृतो व्यास आस्ते महातपाः । तत्राश्रमपदं रम्यं ददर्श पितुरुत्तमम् ॥ २८ ॥ जहाँ महातपस्वी व्यास अपने शिष्योंसे घिरे हुए बैठे थे, वहाँ शुकदेवजीने अपने पिताके उस रमणीय एवं उत्तम आश्रमको देखा ॥ २८ ॥ आरणेयो विशुद्धात्मा नभसीव दिवाकरः । अथ व्यासः परिक्षिप्तं ज्वलन्तमिव पावकम् ॥ २९ ॥ ददृशे सुतमायान्तं दिवाकरसमप्रभम् । उस समय विशुद्ध अन्तःकरणवाले अरणीनन्दन शुकदेव आकाशमें स्थित सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे, इतनेहीमें व्यासजीने भी प्रज्वलित अग्नि तथा सूर्यके समान तेजस्वी पुत्रको सब ओर अपनी प्रभा बिखेरते हुए आते देखा ॥ २९ १/२ ॥ असज्जमानं वृक्षेषु शैलेषु विषयेषु च । योगयुक्तं महात्मानं यथा बाणं गुणच्युतम् ॥ ३० ॥ योगयुक्त महात्मा शुकदेव धनुषकी डोरीसे छूटे हुए बाणके समान तीव्र गतिसे आ रहे थे। वे वृक्षों और पर्वतोंमें कहीं भी अटक नहीं पाते थे ॥ ३० ॥ सोऽभिगम्य पितुः पादावगृह्णादरणीसुतः । यथोपजोषं तैश्चापि समागच्छन्महामुनिः ॥ ३१ ॥

निकट आकर अरणीपुत्र महामुनि शुकदेवने पिताके दोनों पैर पकड़ लिये और शान्तभावसे उनके अन्य सब शिष्योंके साथ भी मिले ।। ३१ ।। ततो निवेदयामास पित्रे सर्वमशेषतः । शुको जनकराजेन संवादं प्रीतमानसः ॥ ३२ ॥ तदनन्तर प्रसन्नचित्त हुए शुकने राजा जनकके साथ जो वार्तालाप हुआ था, वह सारा-का-सारा वृत्तान्त अपने पितासे कह सुनाया ।। ३२ ।। एवमध्यापयन् शिष्यान् व्यासः पुत्रं च वीर्यवान् । उवास हिमवत्पृष्ठे पाराशर्यो महामुनिः ॥ ३३ ॥ इस प्रकार शक्तिशाली महामुनि पराशरनन्दन व्यास अपने शिष्यों और पुत्रको पढ़ाते हुए हिमालयके शिखरपर ही रहने लगे ।। ३३ ।। ततः कदाचिच्छिष्यास्तं परिवार्यावतस्थिरे । वेदाध्ययनसम्पन्नाः शान्तात्मानो जितेन्द्रियाः ॥ ३४ ॥ वेदेषु निष्ठां सम्प्राप्य साङ्गेष्वपि तपस्विनः । अथोचुस्ते तदा व्यासं शिष्याः प्राञ्जलयो गुरुम् ॥ ३५ ॥ तदनन्तर किसी समय वेदाध्ययनसे सम्पन्न, शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, सांगवेदमें पारंगत और तपस्वी शिष्यगण गुरुवर व्यासजीको चारों ओरसे घेरकर बैठ गये और उनसे हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले ।। ३४-३५ ।।

शिष्या ऊचुः महता तेजसा युक्ता यशसा चापि वर्धिताः । एकं त्विदानीमिच्छामो गुरुणाग्रहं कृतम् ॥ ३६ ॥ शिष्योंने कहा— गुरुदेव! हम आपकी कृपासे महान् तेजस्वी हो गये हैं। हमारा यश भी चारों ओर बढ़ गया है। अब इस समय हम यह चाहते हैं कि आप एक बार और हमलोगोंपर अनुग्रह करें ।। ३६ ।। इति तेषां वचः श्रुत्वा ब्रह्मर्षिस्तानुवाच ह । उच्यतामिति तद् वत्सा यद् वः कार्यं प्रियं मया ॥ ३७ ॥ शिष्योंकी यह बात सुनकर ब्रह्मर्षि व्यासने उनसे कहा—'बच्चो! कहो, क्या चाहते हो? मुझे तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करना है?' ।। ३७ ।। एतद् वाक्यं गुरोः श्रुत्वा शिष्यास्ते हृष्टमानसाः । पुनः प्राञ्जलयो भूत्वा प्रणम्य शिरसा गुरुम् ॥ ३८ ॥ ऊचुस्ते सहिता राजन्निदं वचनमुत्तमम् । यदि प्रीत उपाध्यायो धन्याः स्मो मुनिसत्तम ॥ ३९ ॥

गुरुदेवका यह वचन सुनकर उन शिष्योंका हृदय हर्षसे खिल उठा। राजन्! वे पुनः हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर गुरुजीको प्रणाम करके एक साथ यह उत्तम वचन बोले—'मुनिश्रेष्ठ! आप हमारे उपाध्याय हैं। यदि आप प्रसन्न हैं तो हम धन्य हो गये ॥ ३८-३९ ॥

कांक्षामस्तु वयं सर्वे वरं दातुं महर्षिणा ।
षष्ठः शिष्यो न ते ख्यातिं गच्छेदत्र प्रसीद नः ॥ ४० ॥
'हम सब लोग यह चाहते हैं कि महर्षि एक वरदान दें, वह यह कि आपका कोई छठा शिष्य प्रसिद्ध न हो। यहाँ हमलोगोंपर इतनी ही कृपा कीजिये ॥ ४० ॥

चत्वारस्ते वयं शिष्या गुरुपुत्रश्च पञ्चमः ।
इह वेदाः प्रतिष्ठेरन्नेष नः कांक्षितो वरः ॥ ४१ ॥
'हम चार आपके शिष्य हैं और पंचम शिष्य गुरुपुत्र शुकदेव हैं। इन पाँचोंमें ही आपके पढ़ाये हुए सम्पूर्ण वेद प्रतिष्ठित हों; यही हमारे लिये मनोवाञ्छित वर है, ॥ ४१ ॥

शिष्याणां वचनं श्रुत्वा व्यासो वेदार्थतत्त्ववित् ।
पराशरात्मजो धीमान् परलोकार्थचिन्तकः ॥ ४२ ॥
उवाच शिष्यान् धर्मात्मा धर्म्यं नैःश्रेयसं वचः ।
शिष्योंकी यह बात सुनकर वेदार्थके तत्त्वज्ञ, पारलौकिक अर्थका चिन्तन करनेवाले, धर्मात्मा, पराशरनन्दन बुद्धिमान् व्यासजीने अपने समस्त शिष्योंसे यह धर्मानुकूल कल्याणकारी वचन कहा— ॥ ४२ १/२ ॥

ब्राह्मणाय सदा देयं ब्रह्म शुश्रूषवे तथा ॥ ४३ ॥
ब्रह्मलोके निवासं यो ध्रुवं समभिकाङ्क्षते ।
'शिष्यगण! जो ब्रह्मलोकमें अटल निवास चाहता हो, उसका कर्तव्य है कि वह पढ़नेकी इच्छासे आये हुए ब्राह्मणको सदा ही वेद पढ़ावे ॥ ४३ १/२ ॥

भवन्तो बहुलाः सन्तु वेदो विस्तार्यतामयम् ॥ ४४ ॥
नाशिष्ये सम्प्रदातव्यो नाव्रते नाकृतात्मनि ।
'तुमलोग बहुसंख्यक हो जाओ और इस वेदका विस्तार करो। जिसका मन वशमें न हो, जो ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन न करता हो तथा जो शिष्यभावसे पढ़ने न आया हो, उसे वेदाध्ययन नहीं कराना चाहिये ॥ ४४ १/२ ॥

एते शिष्यगुणाः सर्वे विज्ञातव्या यथार्थतः ॥ ४५ ॥
नापरीक्षितचारित्रे विद्या देया कथंचन ।
'ये सभी शिष्यके गुण हैं। किसीको शिष्य बनानेसे पहले उसके इन गुणोंको यथार्थरूपसे परख लेना चाहिये। जिसके सदाचारकी परीक्षा न ली गयी हो, उसे किसी प्रकार विद्यादान नहीं देना चाहिये ॥ ४५ १/२ ॥

यथा हि कनकं शुद्धं तापच्छेदनिघर्षणैः ॥ ४६ ॥
परीक्ष्येत तथा शिष्यानीक्षेत् कुलगुणादिभिः ।

‘जैसे आगमें तपाने, काटने और कसौटीपर कसनेसे शुद्ध सोनेकी परख की जाती है, उसी प्रकार कुल और गुण आदिके द्वारा शिष्योंकी परीक्षा करनी चाहिये ।।
न नियोज्याश्च वः शिष्या अनियोगे महाभये ।। ४७ ।।
यथामति यथापाठं तथा विद्या फलिष्यति ।
सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु ।। ४८ ।।
‘तुमलोग अपने शिष्योंको किसी अनुचित या महान् भयदायक कार्यमें न लगाना। तुम्हारे पढ़ानेपर भी जिसकी जैसी बुद्धि होगी और जो पढ़नेमें जैसा परिश्रम करेगा, उसीके अनुसार उसकी विद्या सफल होगी। सब लोग दुर्गम संकटसे पार हों और सभी अपना कल्याण देखें ।। ४७-४८ ।।
श्रावयेच्चतुरो वर्णान् कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ।
वेदस्याध्ययनं होदं तच्च कार्यं महत् स्मृतम् ।। ४९ ।।
‘ब्राह्मणको आगे रखकर चारों वर्णोंको उपदेश देना चाहिये। यह वेदाध्ययन महान् कार्य माना गया है। इसे अवश्य करना चाहिये ।। ४९ ।।
स्तुत्यर्थमिह देवानां वेदाः सृष्टाः स्वयम्भुवा ।
यो निर्वदेत सम्मोहाद् ब्राह्मणं वेदपारगम् ।। ५० ।।
सोऽभिध्यानाद् ब्राह्मणस्य पराभूयादसंशयम् ।
‘स्वयम्भू ब्रह्माने यहाँ देवताओंकी स्तुतिके लिये वेदोंकी सृष्टि की है। जो मोहवश वेदके पारंगत ब्राह्मणकी निन्दा करता है, वह उसके अनिष्ट-चिन्तनके कारण निस्संदेह पराभवको प्राप्त होता है ।। ५० १/२ ।।
यश्चाधर्मेण विब्रूयाद् यश्चाधर्मेण पृच्छति ।। ५१ ।।
तयोरन्यतरः प्रैति विद्वेषं चाधिगच्छति ।
‘जो धार्मिक विधिका उल्लंघन करके प्रश्न करता है और जो अधर्मपूर्वक उसका उत्तर देता है, उन दोनोंमेंसे एककी मृत्यु हो जाती है अथवा एक दूसरेके द्वेषका पात्र बन जाता है ।। ५१ १/२ ।।
एतद् वः सर्वमाख्यातं स्वाध्यायस्य विधिं प्रति ।
उपकुर्याच्च शिष्याणामेतच्च हृदि वो भवेत् ।। ५२ ।।
‘यह सब मैंने तुमलोगोंसे स्वाध्यायकी विधि बतायी है। यह तुम्हारे हृदयमें सदा स्मरण रहे; क्योंकि यह शिष्योंका उपकार कर सकती है’ ।। ५२ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सप्तविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३२७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें तीन सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३२७ ।।


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३२८-

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टाविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः

शिष्योंके जानेके बाद व्यासजीके पास नारदजीका आगमन और व्यासजीको वेदपाठके लिये प्रेरित करना तथा व्यासजीका शुकदेवको अनध्यायका कारण बताते हुए 'प्रवह' आदि सात वायुओंका परिचय देना

भीष्म उवाच

एतच्छ्रुत्वा गुरोर्वाक्यं व्यासशिष्या महौजसः ।
अन्योन्यं हृष्टमनसः परिषस्वजिरे तदा ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! अपने गुरु व्यासके इस उपदेशको सुनकर उनके महातेजस्वी शिष्य मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और आपसमें एक-दूसरेको हृदयसे लगाने लगे ॥ १ ॥

उक्ताः स्मो यद् भगवता तदात्वायतिसंहितम् ।
तन्नो मनसि संरूढं करिष्यामस्तथा च तत् ॥ २ ॥
फिर व्यासजीसे बोले—'भगवन्! आपने भविष्यमें हमारे हितका विचार करके जो बातें बतायी हैं, वे हमारे मनमें बैठ गयी हैं। हम अवश्य उनका पालन करेंगे' ॥ २ ॥

अन्योन्यं संविभाष्यैवं सुप्रीतमनसः पुनः ।
विज्ञापयन्ति स्म गुरुं पुनर्वाक्यविशारदाः ॥ ३ ॥
इस प्रकार परस्पर वार्तालाप करके गुरु और शिष्य सभी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। तदनन्तर प्रवचनकुशल शिष्योंने गुरुसे इस प्रकार निवेदन किया— ॥ ३ ॥

शैलादस्मान्महीं गन्तुं कांक्षितं नो महामुने ।
वेदाननेकधा कर्तुं यदि ते रुचितं प्रभो ॥ ४ ॥
'महामुने! अब हम इस पर्वतसे पृथ्वीपर जाना चाहते हैं। वेदोंके अनेक विभाग करके उनका प्रचार करना ही हमारी इस यात्राका उद्देश्य है। प्रभो! यदि आपको यह रुचिकर जान पड़े तो हमें जानेकी आज्ञा दें' ॥ ४ ॥

शिष्याणां वचनं श्रुत्वा पराशरसुतः प्रभुः ।
प्रत्युवाच ततो वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् ॥ ५ ॥
शिष्योंकी यह बात सुनकर पराशरनन्दन भगवान् व्यास यह धर्म और अर्थयुक्त हितकर वचन बोले ॥ ५ ॥

क्षितिं वा देवलोकं वा गम्यतां यदि रोचते ।
अप्रमादश्च वः कार्यो ब्रह्म हि प्रचुरच्छलम् ॥ ६ ॥

'शिष्यो! यदि तुम्हें यही अच्छा लगता है तो तुम पृथ्वीपर या देवलोकमें जहाँ चाहो जा सकते हो; परंतु प्रमाद न करना; क्योंकि वेदमें बहुत सी परोचनात्मक श्रुतियाँ हैं, जो व्याजसे (फलोंका लोभ दिखाकर) धर्मका प्रतिपादन करती हैं' ।। ६ ।।

तेऽनुज्ञातास्ततः सर्वे गुरुणा सत्यवादिना ।
जग्मुः प्रदक्षिणं कृत्वा व्यासं मूर्ध्नाभिवाद्य च ।। ७ ।।

सत्यवादी गुरुकी यह आज्ञा पाकर सभी शिष्योंने उनके चरणोंपर सिर रखकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् वे व्यासजीकी प्रदक्षिणा करके वहाँसे चले गये' ।। ७ ।।

अवतीर्य महीं तेऽथ चातुर्होत्रमकल्पयन् ।
संयाजयन्तो विप्रांश्च राजन्यांश्च विशस्तथा ।। ८ ।।
पुज्यमाना द्विजैर्नित्यं मोदमाना गृहे रताः ।
याजनाध्यापनरताः श्रीमन्तो लोकविश्रुताः ।। ९ ।।

पृथ्वीपर उतरकर उन्होंने चातुर्होत्र कर्म (अग्निहोत्रसे लेकर सोमयागतक) का प्रचार किया और गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्योंके यज्ञ कराते हुए वे द्विजातियोंसे पूजित हो बड़े आनन्दसे रहने लगे। यज्ञ कराने और वेदोंकी शिक्षा देनेमें ही वे तत्पर रहते थे। इन्हीं कर्मोंके कारण वे श्रीसम्पन्न और लोक-विख्यात हो गये थे ।। ८-९ ।।

अवतीर्णेषु शिष्येषु व्यासः पुत्रसहायवान् ।
तूष्णीं ध्यानपरो धीमानेकान्ते समुपाविशत् ।। १० ।।

शिष्योंके पर्वतसे नीचे उतर जानेपर व्यासजीके साथ उनके पुत्र शुकदेवके सिवा और कोई नहीं रह गया। वे बुद्धिमान् व्यासजी एकान्तमें ध्यानमग्न होकर चुपचाप बैठे थे ।। १० ।।

तं ददर्शाश्रमपदे नारदः सुमहातपाः ।
अथैनमब्रवीत् काले मधुराक्षरया गिरा ।। ११ ।।

उसी समय महातपस्वी नारदजी उस आश्रमपर पधारकर व्यासजीसे मिले और मधुर अक्षरोंसे युक्त मीठी वाणीमें उनसे इस प्रकार बोले— ।। ११ ।।

भो भो ब्रह्मर्षिवाशिष्ठ ब्रह्मघोषो न वर्तते ।
एको ध्यानपरस्तूष्णीं किमास्से चिन्तयन्निव ।। १२ ।।

‘हे ब्रह्मर्षिवासिष्ठ! आज आपके इस आश्रममें वेदमन्त्रोंकी ध्वनि क्यों नहीं हो रही है? आप अकेले ध्यानमग्न होकर चुपचाप क्यों बैठे हैं? जान पड़ता है, आप किसी चिन्तामें मग्न हैं ।। १२ ।।

ब्रह्मघोषैर्विरहितः पर्वतोऽयं न शोभते ।
रजसा तमसा चैव सोमः सोपप्लवो यथा ।। १३ ।।
न भ्राजते यथापूर्वं निषादानामिवालयः ।
देवर्षिगणजुष्टोऽपि वेदध्वनिनिराकृतः ।। १४ ।।

'वेदध्वनि न होनेके कारण इस पर्वतकी पहले-जैसी शोभा नहीं रही। रज और तमसे आच्छन्न हो यह राहुग्रस्त चन्द्रमाके समान जान पड़ता है। देवर्षियोंसे सेवित होनेपर भी यह शैलशिखर ब्रह्मघोषके बिना भीलोंके घरकी तरह श्रीहीन प्रतीत होता है ।। १३-१४ ।।

ऋषयश्च हि देवाश्च गन्धर्वाश्च महौजसः ।
वियुक्ता ब्रह्मघोषेण न भ्राजन्ते यथा पुरा ।। १५ ।।

'यहाँके ऋषि, देवता और महाबली गन्धर्व भी ब्रह्मघोषसे विमुक्त हो अब पहलेकी भाँति शोभा नहीं पा रहे हैं' ।। १५ ।।

नारदस्य वचः श्रुत्वा कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ।
महर्षे यत् त्वया प्रोक्तं वेदवादविचक्षण ।। १६ ।।
एतन्मनोऽनुकूलं मे भवानर्हति भाषितुम् ।
सर्वज्ञः सर्वदर्शी च सर्वत्र च कुतूहली ।। १७ ।।

नारदजीकी बात सुनकर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने कहा—'वेदविद्याके विद्वान् महर्षे! आपने जो कुछ कहा है, यह मेरे मनके अनुकूल ही है। आप ही ऐसी बात कह सकते हैं। आप सर्वज्ञ, सर्वदर्शी और सर्वत्रकी बातें जाननेके लिये उत्कण्ठित रहनेवाले हैं ।। १६-१७ ।।

त्रिषु लोकेषु यद् भूतं सर्वं तव मते स्थितम् ।

तदाज्ञापय विप्रर्षे ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ १८ ॥ ‘तीनों लोकोंमें जो बात होती है या हो चुकी है, वह सब आपकी जानकारीमें है। ब्रह्मर्षे! बताइये, आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ १८ ॥ यन्मया समनुष्ठेयं ब्रह्मर्षे तदुदाहर । विमुक्तस्येह शिष्यैर्मे नातिहृष्टमिदं मनः ॥ १९ ॥ ‘ब्रह्मर्षि नारद! इस समय मेरा जो कर्तव्य है, उसे भी बताइये। अपने प्यारे शिष्योंसे बिछुड़ जानेके कारण इस समय मेरा यह मन विशेष प्रसन्न नहीं है’ ॥ १९ ॥

नारद उवाच

अनाम्नायमला वेदा ब्राह्मणस्याव्रतं मलम् । मलं पृथिव्या वाहीकाः स्त्रीणां कौतूहलं मलम् ॥ २० ॥ नारदजीने कहा—व्यासजी! वेद पढ़कर उसका अभ्यास (पुनरावृत्ति) न करना वेदाध्ययनका दूषण है। व्रतका पालन न करना ब्राह्मणका दूषण है। वाहीक देशके लोग पृथ्वीके दूषण हैं और नये-नये खेल-तमाशा देखनेकी लालसा स्त्रीके लिये दोषकी बात है ॥ अधीयतां भवान् वेदान् सार्धं पुत्रेण धीमता । विधुन्वन् ब्रह्मघोषेण रक्षोभयकृतं तमः ॥ २१ ॥ आप अपने वेदोच्चारणकी ध्वनिसे राक्षसभयजनित अन्धकारका नाश करते हुए बुद्धिमान् पुत्र शुकदेवजीके साथ वेदोंका स्वाध्याय करते रहें ॥ २१ ॥

भीष्म उवाच

नारदस्य वचः श्रुत्वा व्यासः परमधर्मवित् । तथेत्युवाच संहृष्टो वेदाभ्यासदृढव्रतः ॥ २२ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! नारदजीकी बात सुनकर परम धर्मज्ञ व्यासजीने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और हर्षमें भरकर वे वेदाभ्यासरूपी व्रतका दृढ़तापूर्वक पालन करने लगे ॥ शुकेन सह पुत्रेण वेदाभ्यासमथाकरोत् । स्वरेणोच्चैः स शैक्ष्येण लोकानापूरयन्निव ॥ २३ ॥ उन्होंने अपने पुत्र शुकदेवके साथ शिक्षाके नियमानुसार उच्चस्वरसे तीनों लोकोंको परिपूर्ण करते हुए-से वेदोंकी आवृत्ति आरम्भ कर दी ॥ २३ ॥ तयोरभ्यसतोरेव नानाधर्मप्रवादिनोः । वातोऽतिमात्रं प्रववौ समुद्रानिलवेजितः ॥ २४ ॥ नाना प्रकारके धर्मोंका प्रतिपादन करनेवाले वे पिता-पुत्र उक्त रूपसे वेदोंका अभ्यास कर ही रहे थे कि समुद्री हवासे प्रेरित होकर बड़े जोरकी आँधी चलने लगी ॥ २४ ॥ ततोऽनध्याय इति तं व्यासः पुत्रमवारयत् ।

शुको वारितमात्रस्तु कौतूहलसमन्वितः ॥ २५ ॥ तब अनध्याय-काल बताकर व्यासजीने अपने पुत्रको वेद पढ़नेसे उस समय रोक दिया। उनके मना करनेपर शुकदेवजीके मनमें इसका कारण जाननेके लिये प्रबल उत्कण्ठा हुई ॥ २५ ॥ अपृच्छत् पितरं ब्रह्मन् कुतो वायुरभूदयम् । आख्यातुमर्हसि भवान् वायोः सर्वं विचेष्टितम् ॥ २६ ॥ उन्होंने अपने पितासे पूछा—'ब्रह्मन्! इस वायुकी उत्पत्ति किससे हुई है? आप वायुकी सारी चेष्टाओंका विस्तारपूर्वक वर्णन करें' ॥ २६ ॥ शुकस्यैतद् वचः श्रुत्वा व्यासः परमविस्मितः । अनध्यायनिमित्तेऽस्मिन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ २७ ॥ शुकदेवजीका यह वचन सुनकर व्यासजी अत्यन्त आश्चर्यसे चकित हो उठे और अनध्यायके कारणपर प्रकाश डालते हुए इस प्रकार बोले— ॥ २७ ॥ दिव्यं ते चक्षुरुत्पन्नं स्वयं ते निर्मलं मनः । तमसा रजसा चापि त्यक्तः सत्त्वे व्यवस्थितः ॥ २८ ॥ 'बेटा! तुम्हें स्वयं ही दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गयी है। तुम्हारा हृदय अत्यन्त निर्मल है। तुम रजोगुण और तमोगुणसे रहित होकर सत्त्वगुणमें प्रतिष्ठित हो ॥ २८ ॥ आदर्शे स्वामिव च्छायां पश्यस्यात्मानमात्मना । व्यस्यात्मनि स्वयं वेदान् बुद्ध्या समनुचिन्तय ॥ २९ ॥ 'जैसे लोग दर्पणमें अपना प्रतिबिम्ब देखते हैं, उसी प्रकार तुम बुद्धिके द्वारा आत्माका साक्षात्कार करते हो; अतः स्वयं ही वेदोंको अपने भीतर स्थापित करके बुद्धिद्वारा अनध्यायके कारणभूत वायुके विषयमें विचार करो ॥ २९ ॥ देवयानचरो विष्णोः पितृयाणश्च तामसः । द्वावेतौ प्रेत्य पन्थानौ दिवं चाधश्च गच्छतः ॥ ३० ॥ 'मरकर ऊपरके लोकोंमें जानेवाले और नीचेके लोकोंमें जानेवाले मनुष्योंके लिये दो मार्ग हैं, एक तो देवयान जो कि विष्णुलोकका मार्ग है, अतः सात्त्विक है, दूसरा पितृयान जो कि तामस है ॥ ३० ॥ पृथिव्यामन्तरिक्षे च यत्र संवान्ति वायवः । सप्तैते वायुमार्गा वै तान् निबोधानुपूर्वशः ॥ ३१ ॥ 'पृथ्वीपर या आकाशमें जहाँ भी हवा चलती है, उसके बहनेके लिये सात मार्ग हैं। तुम क्रमशः उनका वर्णन सुनो ॥ ३१ ॥ तत्र देवगणाः साध्या महाभूता महाबलाः । तेषामप्यभवत् पुत्रः समानो नाम दुर्जयः ॥ ३२ ॥

'पृथ्वी और आकाशमें जो महाबली और महान् भूत-स्वरूप साध्य नामक देवगण अदृश्यभावसे रहते हैं, उनके दुर्जय पुत्रका नाम है समान ।। ३२ ।। उदानस्तस्य पुत्रोऽभूद् व्यानस्तस्याभवत् सुतः । अपानश्च ततो ज्ञेयः प्राणश्चापि ततोऽपरः ।। ३३ ।। 'समानका पुत्र है उदान, उदानका पुत्र है व्यान, उसके पुत्रका नाम अपान जानना चाहिये और अपानसे प्राणकी उत्पत्ति हुई है ।। ३३ ।। अनपत्योऽभवत् प्राणो दुर्धर्षः शत्रुतापनः । पृथक् कर्माणि तेषां ते प्रवक्ष्यामि यथातथम् ।। ३४ ।। 'प्राणके कोई संतान नहीं हुई। वह शत्रुओंको संताप देनेवाला और दुर्जय है। उन सबके कर्म पृथक्-पृथक् हैं, जिनका मैं तुमसे यथावत्रूपसे वर्णन करता हूँ ।। ३४ ।। प्राणिनां सर्वतो वायुश्चेष्टां वर्तयते पृथक् । प्राणनाच्चैव भूतानां प्राण इत्यभिधीयते ।। ३५ ।। 'वायुदेव प्राणियोंकी पृथक्-पृथक् समस्त चेष्टाओंका सम्पादन करते हैं तथा सम्पूर्ण भूतोंको अनुप्राणित (जीवित) रखते हैं, इसलिये 'प्राण' कहलाते हैं ।। ३५ ।। प्रेरयत्यभ्रसंघातान् धूमजांश्चोष्मजांश्च यः । प्रथमः प्रथमे मार्गे प्रवहो नाम योऽनिलः ।। ३६ ।। 'जो धूम तथा गर्मीसे उत्पन्न बादलों और ओलोंको इधरसे उधर ले जाता है, वह प्रथम मार्गमें प्रवाहित होनेवाला 'प्रवह' नामक प्रथम वायु है ।। ३६ ।। अम्बरे स्नेहमभ्येत्य विद्युदभ्यश्च महाद्युतिः । आवहो नाम संवाति द्वितीयः श्वसनो नदन् ।। ३७ ।। 'जो आकाशमें रसकी मात्राओं और बिजली आदिकी उत्पत्तिके लिये प्रकट होता है, वह महान् तेजसे सम्पन्न द्वितीय वायु 'आवह' नामसे प्रसिद्ध है। वह बड़ी भारी आवाजके साथ बहता है ।। ३७ ।। उदयं ज्योतिषां शश्वत् सोमादीनां करोति यः । अन्तर्देहेषु चोदानं यं वदन्ति मनीषिणः ।। ३८ ।। यश्चतुर्भ्यः समुद्रेभ्यो वायुर्धारयते जलम् । उद्धृत्याददते चापो जीमूतेभ्योऽम्बरेऽनिलः ।। ३९ ।। योऽद्भिः संयोज्य जीमूतान् पर्जन्याय प्रयच्छति । उद्वहो नाम बंहिष्ठस्तृतीयः स सदागतिः ।। ४० ।। 'जो सदा सोम, सूर्य आदि ग्रहोंका उदय एवं उद्भव करता है, मनीषी पुरुष शरीरके भीतर जिसे 'उदान' कहते हैं, जो चारों समुद्रोंसे जलको ऊपर उठाकर जीमूत नामक मेघोंमें स्थापित करता है तथा जीमूत नामक मेघोंको जलसे संयुक्त करके उन्हें पर्जन्यके

हवाले कर देता है, वह महान् वायु 'उद्वह' कहलाता है, जो तृतीय मार्गपर चलनेके कारण तीसरा कहा गया है ॥ ३८-४० ॥ समूह्यमाना बहुधा येन नीताः पृथग् घनाः । वर्षमोक्षकृतारम्भास्ते भवन्ति घनाघनाः ॥ ४१ ॥ संहता येन चाविद्धा भवन्ति नदतां नदाः । रक्षणार्थाय सम्भूता मेघत्वमुपयान्ति च ॥ ४२ ॥ योऽसौ वहति भूतानां विमानानि विहायसा । चतुर्थः संवहो नाम वायुः स गिरिमर्दनः ॥ ४३ ॥ 'जिसके द्वारा इधर-उधर ले जाये गये अनेक प्रकारके महामेघ घटा बाँधकर जल बरसाना आरम्भ करते हैं, घटाके रूपमें घनीभूत होनेपर भी जिसकी प्रेरणासे सारे बादल फट जाते हैं, फिर वे वेणुनादके समान शब्द करनेके कारण 'नद' कहलाते हैं तथा प्राणियोंकी रक्षाके लिये पुनः जलका संग्रह करके घनीभूत हो जाते हैं, जो वायु देवताओंके आकाशमार्गसे जानेवाले विमानोंको स्वयं ही वहन करता है, वह पर्वतोंका मान मर्दन करनेवाला चतुर्थ वायु 'संवह' नामसे प्रसिद्ध है ॥ ४१—४३ ॥ येन वेगवता रुग्णा रूक्षेण रुवता नगान् । वायुना सहिता मेघास्ते भवन्ति बलाहकाः ॥ ४४ ॥ दारुणोत्पातसंचारो नभसः स्तनयित्नुमान् । पञ्चमः स महावेगो विवहो नाम मारुतः ॥ ४५ ॥ 'जो रूक्षभावसे वेगपूर्वक महान् शब्दके साथ बहकर बड़े-बड़े वृक्षोंको तोड़ देता और उखाड़ फेंकता है तथा जिसके द्वारा संगठित हुए प्रलयकालीन मेघ 'बलाहक' संज्ञा धारण करते हैं, जिस वायुका संचरण भयानक उत्पात लानेवाला होता है तथा जो आकाशसे अपने साथ मेघोंकी घटाएँ लिये चलता है, उस अत्यन्त वेगशाली पंचम वायुको 'विवह' नाम दिया गया है ॥ ४४-४५ ॥ यस्मिन् पारिप्लवा दिव्या वहन्त्यापो विहायसा । पुण्यं चाकाशगङ्गायास्तोयं विष्टभ्य तिष्ठति ॥ ४६ ॥ दूरात् प्रतिहतो यस्मिन्नेकरश्मिर्दिवाकरः । योनिरंशुसहस्रस्य येन भाति वसुन्धरा ॥ ४७ ॥ यस्मादाप्यायते सोमो निधिर्दिव्योऽमृतस्य च । षष्ठः परिवहो नाम स वायुर्जयतां वरः ॥ ४८ ॥ 'जिस वायुके आधारपर आकाशमें दिव्य जल ऊपर-ही-ऊपर प्रवाहित होते हैं, जो आकाशगंगाके पवित्र जलको धारण करके स्थित है और जिसके द्वारा दूरसे ही प्रतिहत होकर सहस्रों किरणोंके उत्पत्तिस्थान सूर्यदेव, जिनसे यह पृथ्वी प्रकाशित होती है, एक ही

किरणोंसे युक्त जान पड़ते हैं तथा जिससे अमृतकी दिव्य निधि चन्द्रमाका भी पोषण होता

है, वह विजयशीलोंमें श्रेष्ठ छठा वायुतत्त्व 'परिवह' नामसे प्रसिद्ध है ।। ४६–४८ ।।

सर्वप्राणभृतां प्राणान् योऽन्तकाले निरस्यति ।

यस्य वर्त्मानुवर्तन्ते मृत्युवैवस्वतावुभौ ।। ४९ ।।

सम्यगन्वीक्षतां बुद्ध्या शान्तयाध्यात्मनित्यया ।

ध्यानाभ्यासाभिरामाणां योऽमृतत्वाय कल्पते ।। ५० ।।

यं समासाद्य वेगेन दिशोऽन्तं प्रतिपेदिरे ।

दक्षस्य दशपुत्राणां सहस्राणि प्रजापतेः ।। ५१ ।।

येन स्पृष्टः पराभूतो यात्येव न निवर्तते ।

परावहो नाम परो वायुः स दुरतिक्रमः ।। ५२ ।।

'जो वायु अन्तकालमें सम्पूर्ण प्राणियोंके प्राणोंको शरीरसे निकालता है, जिसके इस

प्राणनिष्कासनरूप मार्गका मृत्यु तथा वैवस्वत यम अनुगमनमात्र करते हैं, सदा

अध्यात्मचिन्तनमें लगी हुई शान्त बुद्धिके द्वारा भलीभाँति अनुसंधान करनेवाले तथा

ध्यानके अभ्यासमें ही सानन्द रत रहनेवाले पुरुषोंको जो अमृतत्व देनेमें समर्थ है, जिसमें

स्थित होकर प्रजापति दक्षके दस हजार पुत्र सम्पूर्ण दिशाओंके अन्तमें पहुँच गये तथा

जिससे स्पर्शित होकर विलीन हुआ प्राणी यहाँसे केवल जाता है वापस नहीं लौटता, उस

सर्वश्रेष्ठ सप्तम वायुका नाम 'परावह' है। उसका अतिक्रमण करना सभीके लिये सर्वथा

कठिन है ।। ४९–५२ ।।

एवमेते दितेः पुत्रा मारुताः परमाद्भुताः ।

अनारतं ते संवान्ति सर्वगाः सर्वधारिणः ।। ५३ ।।

'इस प्रकार ये सात मरुद्गण दितिके अत्यन्त अद्भुत पुत्र हैं। इनकी सर्वत्र गति है। ये

निरन्तर बहते और सबको धारण करते हैं ।। ५३ ।।

एतत् तु महदाश्चर्यं यदयं पर्वतोत्तमः ।

कम्पितः सहसा तेन वायुनातिप्रवायता ।। ५४ ।।

'यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि अत्यन्त वेगसे बहते हुए उस वायुके द्वारा यह पर्वतोंमें

श्रेष्ठ हिमालय भी सहसा काँप उठा है ।। ५४ ।।

विष्णोर्निःश्वासवातोऽयं यदा वेगसमीरितः ।

सहसोदीर्यते तात जगत् प्रव्यथते तदा ।। ५५ ।।

'तात! यह भगवान् विष्णुका निःश्वास है। जब कभी सहसा वह निःश्वास वेगसे निकल

पड़ता है, उस समय यह सारा जगत् व्यथित हो उठता है ।। ५५ ।।

तस्माद् ब्रह्मविदो वेदान् नाधीयन्तेऽतिवायति ।

वायोर्वायुभयं ह्युक्तं ब्रह्म तत्पीडितं भवेत् ।। ५६ ।।

'इसलिये ब्रह्मवेत्ता पुरुष प्रचण्ड वायु (आँधी) चलनेपर वेदका पाठ नहीं करते हैं। वेद भी भगवान्‌का निःश्वास ही है। उस समय वेदपाठ करनेपर वायुको वायुसे भय प्राप्त होता है और उस वेदको भी पीड़ा होती है' ॥ ५६ ॥
एतावदुक्त्वा वचनं पराशरसुतः प्रभुः ।
उक्त्वा पुत्रमधीष्वेति व्योमगङ्गामगात् तदा ॥ ५७ ॥
अनध्यायके विषयमें यह बात कहकर पराशरनन्दन भगवान् व्यास अपने पुत्र शुकदेवसे बोले—'अब तुम वेदपाठ करो।' यों कहकर वे आकाशगंगाके तटपर चल गये ॥ ५७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अनध्यायनिमित्तकथनं नामाष्टाविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें अनध्यायके कारणका कथन नामक तीन सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२८ ॥

३२९-

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एकोनत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश

भीष्म उवाच

एतस्मिन्नन्तरे शून्ये नारदः समुपागमत् ।
शुकं स्वाध्यायनिरतं वेदार्थान् वक्तुमीप्सितान् ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! व्यासजीके चले जानेके बाद उस सूने आश्रममें स्वाध्यायपरायण शुकदेवसे अपना इच्छित वेदोंका अर्थ कहनेके लिये देवर्षि नारदजी पधारे ॥ १ ॥

देवर्षिं तु शुको दृष्ट्वा नारदं समुपस्थितम् ।
अर्घ्यपूर्वेण विधिना वेदोक्तेनाभ्यपूजयत् ॥ २ ॥
देवर्षि नारदको उपस्थित देख शुकदेवने वेदोक्त विधिसे अर्घ्य आदि निवेदन करके उनका पूजन किया ॥ २ ॥

नारदोथाब्रवीत् प्रीतो ब्रूहि धर्मभृतां वर ।
केन त्वां श्रेयसा वत्स योजयामीति हृष्टवत् ॥ ३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2200)

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शुकदेवजीको नारदजीका उपदेश

उस समय नारदजीने प्रसन्न होकर कहा—'वत्स! तुम धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हो। बताओ, तुम्हें किस श्रेष्ठ वस्तुकी प्राप्ति कराऊँ?' यह बात उन्होंने बड़े हर्षके साथ कही॥ ३॥ नारदस्य वचः श्रुत्वा शुकः प्रोवाच भारत। अस्मिँल्लोके हितं यत् स्यात् तेन मां योक्तुमर्हसि॥ ४॥ भरतनन्दन! नारदजीकी यह बात सुनकर शुकदेवने कहा—'इस लोकमें जो परम कल्याणका साधन हो, उसीका मुझे उपदेश देनेकी कृपा करें'॥ ४॥

नारद उवाच

तत्त्वं जिज्ञासतां पूर्वमृषीणां भावितात्मनाम्। सनत्कुमारो भगवानिदं वचनमब्रवीत्॥ ५॥ नारदजीने कहा— वत्स! पूर्वकालकी बात है, पवित्र अन्तःकरणवाले ऋषियोंने तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रश्न किया। उसके उत्तरमें भगवान् सनत्कुमारने यह उपदेश दिया॥ ५॥ नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः। नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्॥ ६॥ विद्याके समान कोई नेत्र नहीं है। सत्यके समान कोई तप नहीं है। रागके समान कोई दुःख नहीं है और त्यागके सदृश कोई सुख नहीं है॥ ६॥ निवृत्तिः कर्मणः पापात् सततं पुण्यशीलता। सद्वृत्तिः समुदाचारः श्रेय एतदनुत्तमम्॥ ७॥ पापकर्मोंसे दूर रहना, सदा पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करना, श्रेष्ठ पुरुषोंके-से बर्ताव और सदाचारका पालन करना—यही सर्वोत्तम श्रेय (कल्याण)-का साधन है॥ ७॥ मानुष्यमसुखं प्राप्य यः सज्जति स मुह्यति। नालं स दुःखमोक्षाय संयोगो दुःखलक्षणम्॥ ८॥ जहाँ सुखका नाम भी नहीं है, ऐसे इस मानव-शरीरको पाकर जो विषयोंमें आसक्त होता है, वह मोहको प्राप्त होता है। विषयोंका संयोग दुःखरूप ही है, अतः दुःखोंसे छुटकारा नहीं दिला सकता॥ ८॥ सक्तस्य बुद्धिश्चलति मोहजालविवर्धनी। मोहजालावृतो दुःखमिह चामुत्र सोऽश्नुते॥ ९॥ विषयासक्त पुरुषकी बुद्धि चंचल होती है। वह मोहजालको बढ़ानेवाली है, मोहजालसे बँधा हुआ पुरुष इस लोक तथा परलोकमें दुःख ही भोगता है॥ ९॥ सर्वोपायात् तु कामस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः। कार्यः श्रेयोऽर्थिना तौ हि श्रेयोघातार्थमुद्यतौ॥ १०॥

जिसे कल्याणप्राप्तिकी इच्छा हो, उसे सभी उपायोंसे काम और क्रोधको दबाना चाहिये; क्योंकि ये दोनों दोष कल्याणका नाश करनेके लिये उद्यत रहते हैं ॥ १० ॥ नित्यं क्रोधात् तपो रक्षेच्छ्रियं रक्षेच्च मत्सरात् । विद्यां मानावमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥ ११ ॥ मनुष्यको चाहिये कि वह सदा तपको क्रोधसे, लक्ष्मीको डाहसे, विद्याको मानापमानसे और अपने-आपको प्रमादसे बचाये ॥ ११ ॥ आनृशंस्यं परो धर्मः क्षमा च परमं बलम् । आत्मज्ञानं परं ज्ञानं न सत्याद् विद्यते परम् ॥ १२ ॥ क्रूर स्वभावका परित्याग सबसे बड़ा धर्म है। क्षमा सबसे बड़ा बल है। आत्माका ज्ञान ही सबसे उत्कृष्ट ज्ञान है और सत्यसे बढ़कर तो कुछ है ही नहीं ॥ १२ ॥ सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत् । यद् भूतहितमत्यन्तमेतत् सत्यं मतं मम ॥ १३ ॥ सत्य बोलना सबसे श्रेष्ठ है; परंतु सत्यसे भी श्रेष्ठ है हितकारक वचन बोलना। जिससे प्राणियोंका अत्यन्त हित होता हो, वही मेरे विचारसे सत्य है ॥ १३ ॥ सर्वारम्भपरित्यागी निराशीर्निष्परिग्रहः । येन सर्वं परित्यक्तं स विद्वान् स च पण्डितः ॥ १४ ॥ जो कार्य आरम्भ करनेके सभी संकल्पोंको छोड़ चुका है, जिसके मनमें कोई कामना नहीं है, जो किसी वस्तुका संग्रह नहीं करता तथा जिसने सब कुछ त्याग दिया है, वही विद्वान् है और वही पण्डित ॥ १४ ॥ इन्द्रियैरिन्द्रियार्थान् यश्चरत्यात्मवशैरिह । असज्जमानः शान्तात्मा निर्विकारः समाहितः ॥ १५ ॥ आत्मभूतैरतद्भूतः सह चैव विनैव च । स विमुक्तः परं श्रेयो नचिरेणाधितिष्ठति ॥ १६ ॥ जो अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा यहाँ अनासक्त भावसे विषयोंका अनुभव करता है, जिसका चित्त शान्त, निर्विकार और एकाग्र है तथा जो आत्मस्वरूप प्रतीत होनेवाले देह और इन्द्रियाँ हैं, उनके साथ रहकर भी उनसे तद्रूप न हो अलग-सा ही रहता है, वह मुक्त है और उसे बहुत शीघ्र परम कल्याणकी प्राप्ति होती है ॥ १५-१६ ॥ अदर्शनमसंस्पर्शस्तथासम्भाषणं सदा । यस्य भूतैः सह मुने स श्रेयो विन्दते परम् ॥ १७ ॥ मुने! जिसकी किसी प्राणीकी ओर दृष्टि नहीं जाती, जो किसीका स्पर्श तथा किसीसे बातचीत नहीं करता, वह परम कल्याणको प्राप्त होता है ॥ १७ ॥ न हिंस्यात् सर्वभूतानि मैत्रायणगतश्चरेत् । नेदं जन्म समासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥ १८ ॥

किसी भी प्राणीकी हिंसा न करे। सबके प्रति मित्रभाव रखते हुए विचरे तथा यह मनुष्य-जन्म पाकर किसीके साथ वैर न करे ॥ १८ ॥

आकिञ्चन्यं सुसंतोषो निराशीस्त्वमचापलम् ।
एतदाहुः परं श्रेय आत्मज्ञस्य जितात्मनः ॥ १९ ॥
जो आत्मतत्त्वका ज्ञाता तथा मनको वशमें रखनेवाला है, उसके लिये यही परम कल्याणका साधन बताया गया है कि वह किसी वस्तुका संग्रह न करे, संतोष रखे तथा कामना और चंचलताको त्याग दे ॥ १९ ॥

परिग्रहं परित्यज्य भव तात जितेन्द्रियः ।
अशोकं स्थानमातिष्ठ इह चामुत्र चाभयम् ॥ २० ॥
तात शुकदेव! तुम संग्रहका त्याग करके जितेन्द्रिय हो जाओ तथा उस पदको प्राप्त करो, जो इस लोक और परलोकमें भी निर्भय एवं सर्वथा शोकरहित है ॥ २० ॥

निरामिषा न शोचन्ति त्यजेदामिषमात्मनः ।
परित्यज्यामिषं सौम्य दुःखतापाद् विमोक्ष्यसे ॥ २१ ॥
जिन्होंने भोगोंका परित्याग कर दिया है, वे कभी शोकमें नहीं पड़ते, इसलिये प्रत्येक-मनुष्यको भोगासक्तिका त्याग करना चाहिये। सौम्य! भोगोंका त्याग कर देनेपर तुम दुःख और संतापसे छूट जाओगे ॥ २१ ॥

तपोनित्येन दान्तेन मुनिना संयतात्मना ।
अजितं जेतुकामेन भाव्यं सङ्गेष्वसङ्गिना ॥ २२ ॥
जो अजित (परमात्मा)-को जीतनेकी इच्छा रखता हो, उसे तपस्वी, जितेन्द्रिय, मननशील, संयतचित्त और विषयोंमें अनासक्त रहना चाहिये ॥ २२ ॥

गुणसङ्गेष्वनासक्त एकचर्यरतः सदा ।
ब्राह्मणो नचिरादेव सुखमायात्यनुत्तमम् ॥ २३ ॥
जो ब्राह्मण त्रिगुणात्मक विषयोंमें आसक्त न होकर सदा एकान्तवास करता है, वह शीघ्र ही सर्वोत्तम सुखरूप मोक्षको प्राप्त कर लेता है ॥ २३ ॥

द्वन्द्वारामेषु भूतेषु य एको रमते मुनिः ।
विद्धि प्रज्ञानतृप्तं तं ज्ञानतृप्तो न शोचति ॥ २४ ॥
जो मुनि मैथुनमें सुख माननेवाले प्राणियोंके बीचमें रहकर भी अकेले रहनेमें ही आनन्द मानता है, उसे विज्ञानसे परितृप्त समझना चाहिये। जो ज्ञानसे तृप्त होता है, वह कभी शोक नहीं करता ॥ २४ ॥

शुभैर्लभति देवत्वं व्यामिश्रैर्जन्म मानुषम् ।
अशुभैश्चाप्यधो जन्म कर्मभिर्लभतेऽवशः ॥ २५ ॥
जीव सदा कर्मोंके अधीन रहता है। वह शुभ कर्मोंके अनुष्ठानसे देवता होता है, दोनोंके सम्मिश्रणसे मनुष्य-जन्म पाता है और केवल अशुभ कर्मोंसे पशु-पक्षी आदि नीच योनियोंमें

जन्म लेता है ॥ २५ ॥ तत्र मृत्युजरादुःखै सततं समभिद्रुतः । संसारे पच्यते जन्तुस्तत्कथं नावबुद्ध्यसे ॥ २६ ॥ उन-उन योनियोंमें जीवको सदा जरा-मृत्यु और नाना प्रकारके दुःखोंसे संतप्त होना पड़ता है। इस प्रकार संसारमें जन्म लेनेवाला प्रत्येक प्राणी संतापकी आगमें पकाया जाता है—इस बातकी ओर तुम क्यों नहीं ध्यान देते? ॥ २६ ॥ अहिते हितसंज्ञस्त्वमध्रुवे ध्रुवसंज्ञकः । अनर्थे चार्थसंज्ञस्त्वं किमर्थं नावबुद्ध्यसे ॥ २७ ॥ तुमने अहितमें ही हित-बुद्धि कर ली है, जो अध्रुव (विनाशशील) वस्तुएँ हैं, उन्हींको 'ध्रुव' (अविनाशी) नाम दे रखा है और अनर्थमें ही तुम्हें अर्थका बोध हो रहा है। यह बात तुम्हारी समझमें क्यों नहीं आती? ॥ २७ ॥ संवेष्ट्यमानं बहुभिर्मोहात् तन्तुभिरात्मजैः । कोषकार इवात्मानं वेष्टयन् नावबुध्यसे ॥ २८ ॥ जैसे रेशमका कीड़ा अपने ही शरीरसे उत्पन्न हुए तन्तुओंद्वारा अपने-आपको आच्छादित कर लेता है, उसी प्रकार तुम भी मोहवश अपनेहीसे उत्पन्न सम्बन्धके बन्धनोंद्वारा अपने-आपको बाँधते जा रहे हो तो भी यह बात तुम्हारी समझमें नहीं आ रही है ॥ २८ ॥ अलें परिग्रहेणेह दोषवान् हि परिग्रहः । कृमिर्हि कोषकारस्तु बध्यते स परिग्रहात् ॥ २९ ॥ यहाँ विभिन्न वस्तुओंके संग्रहकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि संग्रहसे महान् दोष प्रकट होता है। रेशमका कीड़ा अपने संग्रह-दोषके कारण ही बन्धनमें पड़ता है ॥ २९ ॥ पुत्रदारकुटुम्बेषु सक्ताः सीदन्ति जन्तवः । सरःपङ्कार्णवे मग्ना जीर्णा वनगजा इव ॥ ३० ॥ स्त्री-पुत्र और कुटुम्बमें आसक्त रहनेवाले प्राणी उसी प्रकार कष्ट पाते हैं, जैसे जंगलके बूढ़े हाथी तालाबके दलदलमें फँसकर दुःख उठाते हैं ॥ ३० ॥ महाजालसमाकृष्टान् स्थले मत्स्यानिवोद्धृतान् । स्नेहजालसमाकृष्टान् पश्य जन्तून् सुदुःखितान् ॥ ३१ ॥ जिस प्रकार महान् जालमें फँसकर पानीसे बाहर आये हुए मत्स्य तड़पते हैं, उसी प्रकार स्नेहजालसे आकृष्ट होकर अत्यन्त कष्ट उठाते हुए इन प्राणियोंकी ओर दृष्टिपात करो ॥ ३१ ॥ कुटुम्बं पुत्रदारांश्च शरीरं संचयाश्च ये । पारक्यमध्रुवं सर्वं किं स्वं सुकृतदुष्कृतम् ॥ ३२ ॥