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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

वर्जयन्ति दिवा स्वप्नं दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ६ ॥ जो धर्मज्ञ पुरुष सदा माता-पिताकी सेवामें लगे रहते हैं और दिनमें कभी सोते नहीं हैं, वे सभी दुःखोंसे छूट जाते हैं ॥ ६ ॥ ये वा पापं न कुर्वन्ति कर्मणा मनसा गिरा । निक्षिप्तदण्डा भूतेषु दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ७ ॥ जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी पाप नहीं करते हैं और किसी भी प्राणीको कष्ट नहीं पहुँचाते हैं, वे भी संकट से पार हो जाते हैं ॥ ७ ॥ ये न लोभान्नयन्त्यर्थान् राजानो रजसान्विताः । विषयान् परिरक्षन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ८ ॥ जो रजोगुणसम्पन्न राजा लोभवश प्रजाके धनका अपहरण नहीं करते हैं और अपने राज्यकी सब ओरसे रक्षा करते हैं, वे भी दुर्गम दुःखोंको लाँघ जाते हैं ॥ ८ ॥ स्वेषु दारेषु वर्तन्ते न्यायवृत्तिमृतावृतौ । अग्निहोत्रपराः सन्तो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ९ ॥ जो गृहस्थ प्रतिदिन अग्निहोत्र करते और ऋतुकालमें अपनी ही स्त्रीके साथ धर्मानुकूल समागम करते हैं, वे दुःखोंसे छूट जाते हैं ॥ ९ ॥ आहवेषु च ये शूरास्त्यक्त्वा मरणजं भयम् । धर्मेण जयमिच्छन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १० ॥ जो शूरवीर युद्धस्थलमें मृत्युका भय छोड़कर धर्मपूर्वक विजय पाना चाहते हैं, वे सभी दुःखोंसे पार हो जाते हैं ॥ १० ॥ ये वदन्तीह सत्यानि प्राणत्यागेऽप्युपस्थिते । प्रमाणभूता भूतानां दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ११ ॥ जो लोग प्राण जानेका अवसर उपस्थित होनेपर भी सत्य बोलना नहीं छोड़ते, वे सम्पूर्ण प्राणियोंके विश्वासपात्र बने रहकर सभी दुःखोंसे पार हो जाते हैं ।। कर्माण्यकुहकार्थानि येषां वाचश्च सूनृताः । येषामर्थाश्च सम्बद्धा दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १२ ॥ जिनके शुभ कर्म दिखावेके लिये नहीं होते, जो सदा मीठे वचन बोलते और जिनका धन सत्कर्मोंके लिये बँधा हुआ है, वे दुर्गम संकटोंसे पार हो जाते हैं ।। अनध्यायेषु ये विप्राः स्वाध्यायं नेह कुर्वते । तपोनिष्ठाः सुतपसो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १३ ॥ जो अनध्यायके अवसरोंपर वेदोंका स्वाध्याय नहीं करते और तपस्यामें ही लगे रहते हैं, वे उत्तम तपस्वी ब्राह्मण दुस्तर विपत्तिसे छुटकारा पा जाते हैं ॥ १३ ॥ ये तपश्च तपस्यन्ति कौमारब्रह्मचारिणः । विद्यावेदव्रतस्नाता दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १४ ॥

जो तपस्या करते, कुमारावस्थासे ही ब्रह्मचर्यके पालनमें तत्पर रहते और विद्या एवं वेदोंके अध्ययन-सम्बन्धी व्रतको पूर्ण करके स्नातक हो चुके हैं, वे दुस्तर दुःखोंको तर जाते हैं॥ १४ ॥

ये च संशान्तरजसः संशान्ततमसश्च ये । सत्त्वे स्थिता महात्मानो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १५ ॥ जिनके रजोगुण और तमोगुण शान्त हो गये हों तथा जो विशुद्ध सत्त्वगुणमें स्थित हैं, वे महात्मा दुर्लंघ्य संकटोंको भी लाँघ जाते हैं॥ १५ ॥

येषां न कश्चित् त्रसति न त्रसन्ति हि कस्यचित् । येषामात्मसमो लोको दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १६ ॥ जिनसे कोई भयभीत नहीं होता, जो स्वयं भी किसीसे भय नहीं मानते तथा जिनकी दृष्टिमें यह सारा जगत् अपने आत्माके ही तुल्य है, वे दुस्तर संकटोंसे तर जाते हैं॥ १६ ॥

परश्रिया न तप्यन्ति ये सन्तः पुरुषर्षभाः । ग्राम्यादर्थान्निवृत्ताश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १७ ॥ जो दूसरोंकी सम्पत्तिसे ईर्ष्यावश जलते नहीं हैं और ग्राम्य विषय-भोगसे निवृत्त हो गये हैं, वे मनुष्योंमें श्रेष्ठ साधु पुरुष दुस्तर विपत्तिसे छुटकारा पा जाते हैं॥

सर्वान् देवान् नमस्यन्ति सर्वधर्मांश्च शृण्वते । ये श्रद्दधानाः शान्ताश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १८ ॥ जो सब देवताओंको प्रणाम करते और सभी धर्मोंको सुनते हैं, जिनमें श्रद्धा और शान्ति विद्यमान है, वे सम्पूर्ण दुःखोंसे पार हो जाते हैं॥ १८ ॥

ये न मानित्वमिच्छन्ति मानयन्ति च ये परान् । मान्यमानान् नमस्यन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १९ ॥ जो दूसरोंसे सम्मान नहीं चाहते, जो स्वयं ही दूसरोंको सम्मान देते हैं और सम्माननीय पुरुषोंको नमस्कार करते हैं, वे दुर्लंघ्य संकटोंसे पार हो जाते हैं॥

ये च श्राद्धानि कुर्वन्ति तिथ्यां तिथ्यां प्रजार्थिनः । सुविशुद्धेन मनसा दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २० ॥ जो संतानकी इच्छा रखकर प्रत्येक तिथिपर विशुद्ध हृदयसे पितरोंका श्राद्ध करते हैं, वे दुर्गम विपत्तिसे छुटकारा पा जाते हैं॥ २० ॥

ये क्रोधं संनियच्छन्ति क्रुद्धान्संशमयन्ति च । न च कुप्यन्ति भूतानां दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २१ ॥ जो क्रोधको काबूमें रखते हैं, क्रोधी मनुष्योंको शान्त करते और स्वयं किसी भी प्राणीपर कुपित नहीं होते हैं, वे दुर्लंघ्य संकटोंसे पार हो जाते हैं॥ २१ ॥

मधु मांसं च ये नित्यं वर्जयन्तीह मानवाः । जन्मप्रभृति मद्यं च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २२ ॥

जो मानव जन्मसे ही सदाके लिये मधु, मांस और मदिराका त्याग कर देते हैं, वे भी दुस्तर दुःखोंसे छूट जाते हैं ॥ २२ ॥ यात्रार्थं भोजनं येषां संतानार्थं च मैथुनम् । वाक् सत्यवचनार्थाय दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २३ ॥ जिनका भोजन स्वादके लिये नहीं, जीवनयात्राका निर्वाह करनेके लिये होता है, जो विषयवासनाकी तृप्तिके लिये नहीं, संतानकी इच्छासे मैथुनमें प्रवृत्त होते हैं तथा जिनकी वाणी केवल सत्य बोलनेके लिये है, वे समस्त संकटोंसे पार हो जाते हैं ॥ २३ ॥ ईश्वरं सर्वभूतानां जगतः प्रभवाप्ययम् । भक्ता नारायणं देवं दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २४ ॥ जो समस्त प्राणियोंके स्वामी तथा जगत्की उत्पत्ति और प्रलयके हेतुभूत भगवान् नारायणमें भक्तिभाव रखते हैं, वे दुस्तर दुःखोंसे तर जाते हैं ॥ २४ ॥ य एष पद्मरक्ताक्षः पीतवासा महाभुजः । सुहृद् भ्राता च मित्रं च सम्बन्धी च तथाच्युतः ॥ २५ ॥ युधिष्ठिर! ये जो कमल पुष्पके समान कुछ-कुछ लाल रंगके नेत्रोंसे सुशोभित पीताम्बरधारी महाबाहु श्रीकृष्ण हैं, जो तुम्हारे सुहृद् भाई, मित्र और सम्बन्धी भी हैं, यही साक्षात् नारायण हैं ॥ २५ ॥ य इमान् सकलाँल्लोकाँश्चर्मवत् परिवेष्टयेत् । इच्छन् प्रभुरचिन्त्यात्मा गोविन्दः पुरुषोत्तमः ॥ २६ ॥ इनका स्वरूप अचिन्त्य है। ये पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द इन सम्पूर्ण लोकोंको इच्छापूर्वक चमड़ेकी भाँति आच्छादित किये हुए हैं ॥ २६ ॥ स्थितः प्रियहिते जिष्णोः स एष पुरुषोत्तमः । राजंस्तव च दुर्धर्षो वैकुण्ठः पुरुषर्षभ ॥ २७ ॥ पुरुषप्रवर युधिष्ठिर! वे ही ये दुर्धर्ष वीर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण साक्षात् वैकुण्ठधामके निवासी श्रीविष्णु हैं। राजन्! ये इस समय तुम्हारे और अर्जुनके प्रिय तथा हितसाधनमें संलग्न हैं ॥ २७ ॥ य एनं संश्रयन्तीह भक्ता नारायणं हरिम् । ते तरन्तीह दुर्गाणि न चात्रास्ति विचारणा ॥ २८ ॥ जो भक्त पुरुष यहाँ इन भगवान् श्रीहरि—नारायण देवकी शरण लेते हैं, वे दुस्तर संकटोंसे तर जाते हैं। इस विषयमें कोई संशय नहीं है ॥ २८ ॥ (अस्मिन्नर्पितकर्माणः सर्वभावेन भारत । कृष्णे कमलपत्राक्षे दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ भारत! जो इन कमलनयन श्रीकृष्णको सम्पूर्ण भक्तिभावसे अपने सारे कर्म समर्पित कर देते हैं, वे दुर्गम संकटोंको लाँघ जाते हैं ।।

ब्रह्माणं लोककर्तारं ये नमस्यन्ति सत्पतिम् ।
यष्टव्यं क्रतुभिर्देवं दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥
जो यज्ञोंद्वारा आराधनाके योग्य हैं, उन साधुप्रतिपालक विश्वविधाता भगवान् ब्रह्माको जो नमस्कार करते हैं, वे समस्त दुःखोंसे छुटकारा पा जाते हैं ।।
यं विष्णुरिन्द्रः शम्भुश्च ब्रह्मा लोकपितामहः ।
स्तुवन्ति विविधैः स्तोत्रैर्देवदेवं महेश्वरम् ।।
तमर्चयन्ति ये शश्वद् दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥)
विष्णु, इन्द्र, शिव तथा लोकपितामह ब्रह्मा नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, उन देवाधिदेव परमेश्वरकी जो सदा आराधना करते हैं, वे दुर्गम संकटोंसे पार हो जाते हैं ।।
दुर्गातितरणं ये च पठन्ति श्रावयन्ति च ।
कथयन्ति च विप्रेभ्यो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २९ ॥
जो लोग इस दुर्गातितरण नामक अध्यायको पढ़ते और सुनते हैं तथा ब्राह्मणोंके सामने इसकी चर्चा करते हैं, वे दुर्गम संकटोंसे पार हो जाते हैं ।। २९ ।।
इति कृत्यसमुद्देशः कीर्तितस्ते मयानघ ।
तरन्ते येन दुर्गाणि परत्रेह च मानवाः ॥ ३० ॥
निष्पाप युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने यहाँ संक्षेपसे उस कर्तव्यका प्रतिपादन किया है, जिसका पालन करनेसे मनुष्य इहलोक और परलोकमें समस्त दुःखोंसे छुटकारा पा जाते हैं ।। ३० ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दुर्गातितरणं नाम दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दुर्गातितरण नामक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३३ १/३ श्लोक हैं)

मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा

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एकादशाधिकशततमोऽध्यायः

मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा

युधिष्ठिर उवाच

असौम्याः सौम्यरूपेण सौम्याश्चासौम्यदर्शनाः ।
ईदृशान् पुरुषांस्तात कथं विद्यामहे वयम् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**तात! बहुत-से कठोर स्वभाववाले मनुष्य ऊपरसे कोमल और शान्त बने रहते हैं तथा कोमल स्वभावके लोग कठोर दिखायी देते हैं, ऐसे मनुष्योंकी मुझे ठीक-ठीक पहचान कैसे हो? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
व्याघ्रगोमायुसंवादं तं निबोध युधिष्ठिर ॥ २ ॥
**भीष्मजी बोले—**युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार लोग एक बाघ और सियारके संवादरूप प्राचीन आख्यानका उदाहरण दिया करते हैं, उसे ध्यान देकर सुनो ॥ २ ॥

पुरिकायां पुरि पुरा श्रीमत्यां पौरिको नृपः ।
परहिंसारतिः क्रूरो बभूव पुरुषाधमः ॥ ३ ॥
पूर्वकालकी बात है, प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न पुरिका नामकी नगरीमें पौरिक नामसे प्रसिद्ध एक राजा राज्य करता था। वह बड़ा ही क्रूर और नराधम था, दूसरे प्राणियोंकी हिंसामें ही उसका मन लगता था ॥ ३ ॥

स त्वायुषि परिक्षीणे जगामानीप्सितां गतिम् ।
गोमायुत्वं च सम्प्राप्तो दूषितः पूर्वकर्मणा ॥ ४ ॥
धीरे-धीरे उसकी आयु समाप्त हो गयी और वह ऐसी गतिको प्राप्त हुआ, जो किसी भी प्राणीको अभीष्ट नहीं है। वह अपने पूर्वकर्मसे दूषित होकर दूसरे जन्ममें गीदड़ हो गया ॥ ४ ॥

संस्मृत्य पूर्वभूतिं च निर्वेदं परमं गतः ।
न भक्षयति मांसानि परैरुपहृतान्यपि ॥ ५ ॥
उस समय अपने पूर्व जन्मके वैभवका स्मरण करके उस सियारको बड़ा खेद और वैराग्य हुआ। अतः वह दूसरोंके द्वारा दिये हुए मांसको भी नहीं खाता था ॥ ५ ॥

अहिंस्रः सर्वभूतेषु सत्यवाक् सुदृढव्रतः ।
स चकार यथाकालमाहारं पतितैः फलैः ॥ ६ ॥

अब उसने जीवोंकी हिंसा करनी छोड़ दी, सत्य बोलनेका नियम ले लिया और दृढ़तापूर्वक अपने व्रतका पालन करने लगा। वह नियत समयपर वृक्षोंसे अपने आप गिरे हुए फलोंका आहार करता था ।। ६ ।।

(पर्णाहारः कदाचिच्च नियमव्रतवानपि । कदाचिदुदकेनापि वर्तयन्ननुयन्त्रितः ।।) व्रत और नियमोंके पालनमें तत्पर हो कभी पत्ता चबा लेता और कभी पानी पीकर ही रह जाता था। उसका जीवन संयममें बँध गया था ।।

श्मशाने तस्य चावासो गोमायोः सम्मतोऽभवत् । जन्मभूम्यनुरोधाच्च नान्यवासमरोचयत् ।। ७ ।। वह श्मशानभूमिमें ही रहता था। वहीं उसका जन्म हुआ था, इसलिये वही स्थान उसे पंसद था। उसे और कहीं जाकर रहनेकी रुचि नहीं होती थी ।। ७ ।।

तस्य शौचममृष्यन्तस्ते सर्वे सहजातयः । चालयन्ति स्म तां बुद्धिं वचनैः प्रश्रयोत्तरैः ।। ८ ।। सियारका इस तरह पवित्र आचार-विचारसे रहना उसके सभी जाति-भाइयोंको अच्छा न लगा। यह सब उनके लिये असह्य हो उठा; इसलिये वे प्रेम और विनयभरी बातें कहकर उसकी बुद्धिको विचलित करने लगे ।। ८ ।।

वसन् पितृवने रौद्रे शौचे वर्तितुमिच्छसि । इयं विप्रतिपत्तिस्ते यदा त्वं पिशिताशनः ।। ९ ।। उन्होंने कहा ‘भाई सियार! तू तो मांसाहारी जीव है और भयंकर श्मशानभूमिमें निवास करता है, फिर भी पवित्र आचार-विचारसे रहना चाहता है—यह विपरीत निश्चय है ।। ९ ।।

तत्समानो भवास्माभिर्भोज्यं दास्यामहे वयम् । भुङ्क्ष्व शौचं परित्यज्य यद्धि भुक्तं सदास्तु ते ।। १० ।। ‘भैया! अतः तू हमारे ही समान होकर रह। तेरे लिये भोजन तो हमलोग ला दिया करेंगे। तू इस शौचाचारका नियम छोड़कर चुपचाप खा लिया करना। तेरी जातिका जो सदासे भोजन रहा है, वही तेरा भी होना चाहिये’ ।। १० ।।

इति तेषां वचः श्रुत्वा प्रत्युवाच समाहितः । मधुरैः प्रसृतैर्वाक्यैर्हेतुमद्भिर्अनिष्ठुरैः ।। ११ ।। उनकी ऐसी बात सुनकर सियार एकाग्रचित्त हो मधुर, विस्तृत, युक्तियुक्त तथा कोमल वचनोंद्वारा इस प्रकार बोला— ।। ११ ।।

अप्रमाणा प्रसूतिर्मे शीलतः क्रियते कुलम् । प्रार्थयामि च तत्कर्म येन विस्तीर्यते यशः ।। १२ ।। ‘बन्धुओ! अपने बुरे आचरणोंसे ही हमारी जातिका कोई विश्वास नहीं करता। अच्छे स्वभाव और आचरणसे ही कुलकी प्रतिष्ठा होती है; अतः मैं भी वही कर्म करना चाहता हूँ,

जिससे अपने वंशका यश बढ़े ॥ १२ ॥
श्मशाने यदि मे वासः समाधिर्मे निशम्यताम् ।
आत्मा फलति कर्माणि नाश्रमो धर्मकारणम् ॥ १३ ॥
'यदि मेरा निवास श्मशानभूमिमें है तो इसके लिये मैं जो समाधान देता हूँ, उसको सुनो। आत्मा ही शुभ कर्मोंके लिये प्रेरणा करता है। कोई आश्रम ही धर्मका कारण नहीं हुआ करता ॥ १३ ॥
आश्रमे यो द्विजं हन्याद् गां वा दद्यादनाश्रमे ।
किं तु तत्पातकं न स्यात् तद्वा दत्तं वृथा भवेत् ॥ १४ ॥
'क्या यदि कोई आश्रममें रहकर ब्राह्मणकी हत्या करे तो उसे उसका पातक नहीं लगेगा और यदि कोई बिना आश्रमके स्थानमें गोदान करे तो क्या वह व्यर्थ हो जायेगा? ॥ १४ ॥
भवन्तः स्वार्थलोभेन केवलं भक्षणे रताः ।
अनुबन्धे त्रयो दोषास्तान् न पश्यन्ति मोहिताः ॥ १५ ॥
'तुमलोग केवल स्वार्थके लोभसे मांसभक्षणमें रचे-पचे रहते हो। उसके परिणामस्वरूप जो तीन दोष प्राप्त होते हैं, उनकी ओर मोहवश तुम्हारी दृष्टि नहीं जाती ॥ १५ ॥
अप्रत्ययकृतां गर्ह्यामर्थापनयदूषिताम् ।
इह चामुत्र चानिष्टां तस्माद् वृत्तिं न रोचये ॥ १६ ॥
'तुमलोगोंकी जीविका असंतोषसे पूर्ण, निन्दनीय, धर्मकी हानिके कारण दूषित तथा इहलोक और परलोकमें भी अनिष्ट फल देनेवाली है; इसलिये मैं उसे पसंद नहीं करता हूँ ॥ १६ ॥
तं शुचिं पण्डितं मत्वा शार्दूलः ख्यातविक्रमः ।
कृत्वाऽऽत्मसदृशीं पूजां साचिव्येऽवरयत् स्वयम् ॥ १७ ॥
सियारके इस पवित्र आचार-विचारकी चर्चा चारों ओर फैल जानेके कारण एक प्रख्यातपराक्रमी व्याघ्रने उसे विद्वान् और विशुद्ध स्वभावका मानकर उसके निकट पदार्पण किया और उसकी अपने अनुरूप पूजा करके स्वयं ही मन्त्री बनानेके लिये उसका वरण किया ॥ १७ ॥

शार्दूल उवाच
सौम्य विज्ञातरूपस्त्वं गच्छ यात्रां मया सह ।
ध्रियन्तामीप्सिता भोगाः परिहार्याश्च पुष्कलाः ॥ १८ ॥
व्याघ्र बोला— सौम्य! मैं तुम्हारे स्वरूपसे परिचित हूँ। तुम मेरे साथ चलो और अपनी रुचिके अनुसार अधिक-से-अधिक भोगोंका उपभोग करो। जो वस्तुएँ प्रिय न हों, उन्हें त्याग देना ॥ १८ ॥

तीक्ष्णा इति वयं ख्याता भवन्तं ज्ञापयामहे । मृदुपूर्वं हितं चैव श्रेयश्चाधिगमिष्यसि ॥ १९ ॥ परंतु एक बात मैं तुम्हें सूचित कर देता हूँ। सारे संसारमें यह बात प्रसिद्ध है कि हमारी जातिका स्वभाव कठोर होता है; अतः यदि तुम कोमलतापूर्वक व्यवहार करते हुए मेरे हित-साधनमें लगे रहोगे तो अवश्य ही कल्याणके भागी होओगे ॥ १९ ॥

अथ सम्पूज्य तद् वाक्यं मृगेन्द्रस्य महात्मनः । गोमायुः संश्रितं वाक्यं बभाषे किंचिदानतः ॥ २० ॥ महामनस्वी मृगराजके उस कथनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके सियारने कुछ नतमस्तक होकर विनययुक्त वाणीमें कहा ॥ २० ॥

गोमायुरुवाच

सदृशं मृगराजैतत् तव वाक्यं मदन्तरे । यत् सहायान् मृगयसे धर्मार्थकुशलान् शुचीन् ॥ २१ ॥ सियार बोला—मृगराज! आपने मेरे लिये जो बात कही है, वह सर्वथा आपके योग्य ही है तथा आप जो धर्म और अर्थसाधनमें कुशल एवं शुद्ध स्वभाववाले सहायकों (मन्त्रियों) की खोज कर रहे हैं, यह भी उचित ही है ॥ २१ ॥

न शक्यं ह्यनमात्येन महत्त्वमनुशासितुम् । दुष्टामात्येन वा वीर शरीरपरिपन्थिना ॥ २२ ॥ वीर! मन्त्रीके बिना एकाकी राजा विशाल राज्यका शासन नहीं कर सकता। यदि शरीरको सुखा देनेवाला कोई दुष्ट मन्त्री मिल गया तो उसके द्वारा भी शासन नहीं चलाया जा सकता ॥ २२ ॥

सहायाननुरक्तांश्च नयज्ञानुपसंहितान् । परस्परमसंसृष्टान् विजिगीषूनलोलुपान् ॥ २३ ॥ अनतीतोपधान् प्राज्ञान् हिते युक्तान् मनस्विनः । पूजयेथा महाभाग यथाऽऽचार्यान् यथा पितॄन् ॥ २४ ॥ महाभाग! इसके लिये आपको चाहिये कि जिनका आपके प्रति अनुराग हो, जो नीतिके जानकार, सद्भाव-सम्पन्न, परस्पर गुटबंदीसे रहित, विजयकी अभिलाषासे युक्त, लोभरहित, कपटनीतिमें कुशल, बुद्धिमान्, स्वामीके हितसाधनमें तत्पर और मनस्वी हों, ऐसे व्यक्तियोंको सहायक या सचिव बनाकर आप पिता और गुरुके समान उनका सम्मान करें ॥ २३-२४ ॥

न त्वेव मम संतोषाद् रोचतेऽन्यन्मृगाधिप । न कामये सुखान् भोगानैश्वर्यं च तदाश्रयम् ॥ २५ ॥

मृगराज! मुझे तो संतोषके सिवा और कोई वस्तु रुचती ही नहीं है। मैं सुख, भोग और उनके आधारभूत ऐश्वर्यको नहीं चाहता ॥ २५ ॥

न योक्ष्यति हि मे शीलं तव भृत्यैः पुरातनैः ।
ते त्वां विभेदयिष्यन्ति दुःशीलाश्च मदन्तरे ॥ २६ ॥
आपके पुराने सेवकोंके साथ मेरे शीलस्वभावका मेल नहीं खायेगा। वे दुष्ट स्वभावके जीव हैं। अतः मेरे निमित्त वे लोग आपके कान भरते रहेंगे ॥ २६ ॥

संश्रयः श्लाघनीयस्त्वमन्येषामपि भास्वताम् ।
कृतात्मा सुमहाभागः पापकेष्वप्यदारुणः ॥ २७ ॥
आप अन्यान्य तेजस्वी प्राणियोंके भी स्पृहणीय आश्रय हैं। आपकी बुद्धि सुशिक्षित है। आप महान् भाग्यशाली तथा अपराधियोंके प्रति भी दयालु हैं ॥ २७ ॥

दीर्घदर्शी महोत्साहः स्थूललक्ष्यो महाबलः ।
कृती चामोघकर्तासि भाग्यैश्च समलंकृतः ॥ २८ ॥
आप दूरदर्शी, महान् उत्साही, स्थूललक्ष्य (जिसका उद्देश्य बहुत स्पष्ट हो वह), महाबली, कृतार्थ, सफलतापूर्वक कार्य करनेवाले तथा भाग्यसे अलंकृत हैं ॥ २८ ॥

किं तु स्वेनास्मि संतुष्टो दुःखवृत्तिरनुष्ठिता ।
सेवायां चापि नाभिज्ञः स्वच्छन्देन वनेचरः ॥ २९ ॥
इधर मैं अपने आपमें ही संतुष्ट रहनेवाला हूँ। मैंने ऐसी जीविका अपनायी है, जो अत्यन्त दुःखमयी है। मैं राजसेवाके कार्यसे अनभिज्ञ और वनमें स्वच्छन्दतापूर्वक घूमनेवाला हूँ ॥ २९ ॥

राजोपक्रोशदोषाश्च सर्वे संश्रयवासिनाम् ।
व्रतचर्या तु निःसंगा निर्भया वनवासिनाम् ॥ ३० ॥
जो राजाके आश्रयमें रहते हैं, उन्हें राजाकी निन्दासे सम्बन्ध रखनेवाले सभी दोष प्राप्त होते हैं। इधर मेरे जैसे वनवासियोंकी व्रतचर्या सर्वथा असंग और भयसे रहित होती है ॥ ३० ॥

नृपेणाहूयमानस्य यत् तिष्ठति भयं हृदि ।
न तत् तिष्ठति तुष्टानां वने मूलफलाशिनाम् ॥ ३१ ॥
राजा जिसे अपने सामने बुलाता है, उसके हृदयमें जो भय खड़ा होता है, वह वनमें फल-मूल खाकर संतुष्ट रहनेवाले लोगोंके मनमें नहीं होता ॥ ३१ ॥

पानीयं वा निरायासं स्वाद्वन्नं वा भयोत्तरम् ।
विचार्य खलु पश्यामि तत्सुखं यत्र निर्वृतिः ॥ ३२ ॥
एक जगह बिना किसी भयके केवल जल मिलता है और दूसरी जगह अन्तमें भय देनेवाला स्वादिष्ट अन्न प्राप्त होता है—इन दोनोंको यदि विचार करके मैं देखता हूँ तो मुझे वहाँ ही सुख जान पड़ता है, जहाँ कोई भय नहीं है ॥ ३२ ॥

अपराधैर्न तावन्तो भृत्याः शिष्टा नराधिपैः ।
उपघातैर्यथा भृत्या दूषिता निधनं गताः ॥ ३३ ॥
राजाओंने किन्हीं वास्तविक अपराधोंके कारण उतने सेवकोंको दण्ड नहीं दिया होगा, जितने कि लोगोंके झूठे लगाये गये दोषोंसे कलंकित होकर राजाके हाथसे मारे गये हैं ॥ ३३ ॥
यदि त्वेतन्मया कार्यं मृगेन्द्र यदि मन्यसे ।
समयं कृतमिच्छामि वर्तितव्यं यथा मयि ॥ ३४ ॥
मृगराज! यदि आप मुझसे मन्त्रित्वका कार्य लेना ही ठीक समझते हैं तो मैं आपसे एक शर्त कराना चाहता हूँ, उसीके अनुसार आपको मेरे साथ बर्ताव करना उचित होगा ॥ ३४ ॥
मदीया माननीयास्ते श्रोतव्यं च हितं वचः ।
कल्पिता या च मे वृत्तिः सा भवेत् त्वयि सुस्थिरा ॥ ३५ ॥
मेरे आत्मीयजनोंका आपको सम्मान करना होगा। मेरी कही हुई हितकर बातें आपको सुननी होंगी। मेरे लिये जो जीविकाकी व्यवस्था आपने की है, वह आपहीके पास सुस्थिर एवं सुरक्षित रहे ॥ ३५ ॥
न मन्त्रयेयमन्यैस्ते सचिवैः सह कर्हिचित् ।
नीतिमन्तः परीप्सन्तो वृथा ब्रूयुः परे मयि ॥ ३६ ॥
मैं आपके दूसरे मन्त्रियोंके साथ बैठकर कभी कोई परामर्श नहीं करूँगा; क्योंकि दूसरे नीतिज्ञ मन्त्री मुझसे ईर्ष्या करते हुए मेरे प्रति व्यर्थकी बातें कहने लगेंगे ॥ ३६ ॥
एक एकेन संगम्य रहो ब्रूयां हितं वचः ।
न च ते जातिकार्येषु प्रष्टव्योऽहं हिताहिते ॥ ३७ ॥
मैं अकेला एकान्तमें अकेले आपसे मिलकर आपको हितकी बातें बताया करूँगा। आप भी अपने जाति-भाइयोंके कार्योंमें मुझसे हिताहितकी बात न पूछियेगा ॥ ३७ ॥
मया सम्मन्त्र्य पश्चाच्च न हिंस्याः सचिवास्त्वया ।
मदीयानां च कुपितो मा त्वं दण्डं निपातयेः ॥ ३८ ॥
मुझसे सलाह लेनेके बाद यदि आपके पहलेके मन्त्रियोंकी भूल प्रमाणित हो तो भी उन्हें प्राणदण्ड न दीजियेगा तथा कभी क्रोधमें आकर मेरे आत्मीयजनोंपर भी प्रहार न कीजियेगा ॥ ३८ ॥
एवमस्त्विति तेनासौ मृगेन्द्रेणाभिपूजितः ।
प्राप्तवान् मतिसाचिव्यं गोमायुर्व्याघ्रयोनितः ॥ ३९ ॥
‘अच्छा, ऐसा ही होगा’ यह कहकर शेरने उसका बड़ा सम्मान किया। सियार बाघराजाके बुद्धिदायक सचिवके पदपर प्रतिष्ठित हो गया ॥ ३९ ॥
तं तथा सुकृतं दृष्ट्वा पूज्यमानं स्वकर्मसु ।

प्राद्विषन् कृतसंघाताः पूर्वभृत्या मुहुर्मुहुः ।। ४० ।।
सियार बहुत अच्छा कार्य करने लगा और उसको अपने सभी कार्योंमें बड़ी प्रशंसा प्राप्त होने लगी। इस प्रकार उसे सम्मानित होता देख पहलेके राजसेवक संगठित हो बारंबार उससे द्वेष करने लगे ।। ४० ।।
मित्रबुद्ध्या च गोमायुं सान्त्वयित्वा प्रसाद्य च ।
दोषैस्तु समतां नेतुमैच्छन्नशुभबुद्धयः ।। ४१ ।।
उनके मनमें दुष्टता भरी थी। वे सियारके पास मित्रभावसे आते और उसे समझा-बुझाकर प्रसन्न करके अपने ही समान दोषके पथपर चलानेकी चेष्टा करते थे ।।
अन्यथा हृषिताः पूर्वं परद्रव्याभिहारिणः ।
अशक्ताः किञ्चिदादातुं द्रव्यं गोमायुयन्त्रिताः ।। ४२ ।।
उसके आनेके पहले वे और ही प्रकारसे रहा करते थे। दूसरोंका धन हड़प लिया करते थे, परंतु अब वैसा नहीं कर सकते थे। सियारने उन सबपर ऐसी कड़ी पाबंदी लगा दी थी कि वे किसीकी कोई भी वस्तु लेनेमें असमर्थ हो गये थे ।। ४२ ।।
व्युत्थानं च विकांक्षद्भिः कथाभिः प्रतिलोभ्यते ।
धनेन महता चैव बुद्धिरस्य विलोभ्यते ।। ४३ ।।
उनकी यही इच्छा थी कि सियार भी डिग जाय; इसलिये वे तरह-तरहकी बातोंमें उसे फुसलाते और बहुत-सा धन देनेका लोभ देकर उसकी बुद्धिको प्रलोभनमें फँसाना चाहते थे ।। ४३ ।।
न चापि स महाप्राज्ञस्तस्माद् धैर्याच्चचाल ह ।
अथास्य समयं कृत्वा विनाशाय तथा परे ।। ४४ ।।
परंतु सियार बड़ा बुद्धिमान् था। अतः वह उनके प्रलोभनमें आकर धैर्यसे विचलित नहीं हुआ। तब दूसरे-दूसरे सभी सेवकोंने मिलकर उसके विनाशके लिये प्रतिज्ञा की और तदनुसार प्रयत्न आरम्भ कर दिया ।। ४४ ।।
ईप्सितं तु मृगेन्द्रस्य मांसं यत् यत्र संस्कृतम् ।
अपनीय स्वयं तद्धि तैर्न्यस्तं तस्य वेश्मनि ।। ४५ ।।
एक दिन उन सेवकोंने शेरके खानेके लिये जो मांस तैयार करके रखा गया था, उसके स्थानसे हटाकर सियारके घरमें रख दिया ।। ४५ ।।
यदर्थं चाप्यपहृतं येन तच्चैव मन्त्रितम् ।
तस्य तद् विदितं सर्वं कारणार्थं च मर्षितम् ।। ४६ ।।
जिसने जिस उद्देश्यसे उस मांसको चुराया और जिसने ऐसा करनेकी सलाह दी, वह सब कुछ सियारको मालूम हो गया तो भी किसी कारणवश उसने चुपचाप सह लिया ।। ४६ ।।
समयोऽयं कृतस्तेन साचिव्यमुपगच्छता ।

नोपघातस्त्वया कार्यो राजन् मैत्रीमिहेच्छता ॥ ४७ ॥ मन्त्रीपदपर आते समय सियारने यह शर्त करा ली थी कि राजन्! यदि आप मुझसे मैत्री चाहते हैं तो किसीके बहकावेमें आकर मेरा विनाश न कर डालियेगा ॥

भीष्म उवाच

क्षुधितस्य मृगेन्द्रस्य भोक्तुमभ्युत्थितस्य च । भोजनायोपहर्तव्यं तन्मांसं नोपदृश्यते ॥ ४८ ॥ भीष्मजी कहते हैं—राजन्! उधर शेरको जब भूख लगी और वह भोजनके लिये उठा, तब उसके खानेके लिये जो परोसा जानेवाला था, वह मांस उसे नहीं दिखायी दिया ॥ ४८ ॥

मृगराजेन चाज्ञप्तं दृश्यतां चोर इत्युत । कृतकैश्चापि तन्मांसं मृगेन्द्रायोपवर्णितम् ॥ ४९ ॥ सचिवेनापनीतं ते विदुषा प्राज्ञमानिना । तब मृगराजने सेवकोंको आज्ञा दी कि चोरका पता लगाओ। तब जिनकी यह करतूत थी, उन्हीं लोगोंने उस मांसके बारेमें शेरको बताया—'महाराज! अपनेको अत्यन्त बुद्धिमान् और पण्डित माननेवाले आपके मन्त्री महोदयने ही इस मांसका अपहरण किया है' ॥ ४९ १/२ ॥

सरोषस्त्वथ शार्दूलः श्रुत्वा गोमायुचापलम् ॥ ५० ॥ बभूवामर्षितो राजा वधं चास्य व्यरोचयत् । सियारकी यह चपलता सुनकर शेर गुस्सेसे भर गया। उससे यह बात सही नहीं गयी; अतः मृगराजने उसका वध करनेका ही विचार कर लिया ॥ ५० १/२ ॥

छिद्रं तु तस्य तद् दृष्ट्वा प्रोचुस्ते पूर्वमन्त्रिणः ॥ ५१ ॥ सर्वेषामेव सोऽस्माकं वृत्तिभङ्गे प्रवर्तते । निश्चित्यैव पुनस्तस्य ते कर्माण्यपि वर्णयन् ॥ ५२ ॥ उसका यह छिद्र देखकर पहलेके मन्त्री आपसमें कहने लगे, वह हम सब लोगोंकी जीविका नष्ट करनेपर तुला हुआ है; अतः हम भी उससे बदला लें, ऐसा निश्चय करके वे उसके अपराधोंका वर्णन करने लगे— ॥

इदं तस्येदृशं कर्म किं तेन न कृतं भवेत् । श्रुतश्च स्वामिना पूर्वं यादृशो नैव तादृशः ॥ ५३ ॥ 'महाराज! जब उसके द्वारा ऐसा कर्म किया जा सकता है, तब वह और क्या नहीं कर सकता? स्वामीने पहले उसके बारेमें जैसा सुन रक्खा है, वह वैसा नहीं है ॥

वाङ्मात्रेणैव धर्मिष्ठः स्वभावेन तु दारुणः । धर्मच्छद्मा ह्ययं पापो वृथाचारपरिग्रहः ॥ ५४ ॥

'वह बातोंसे ही धर्मात्मा बना हुआ है। स्वभावसे तो बड़ा क्रूर है। भीतरसे यह बड़ा पापी है; परंतु ऊपरसे धर्मात्मापनका ढोंग बनाये हुए है। उसका सारा आचार-विचार व्यर्थ दिखावेके लिये है ।। ५४ ।।
कार्यार्थं भोजनार्थेषु व्रतेषु कृतवान् श्रमम् ।
यदि विप्रत्ययो ह्येष तदिदं दर्शयाम ते ।। ५५ ।।
'उसने तो अपना काम बनाने और पेट भरनेके लिये ही व्रत करनेमें परिश्रम किया है। यदि आपको विश्वास न हो तो यह लीजिये, हम अभी उसके यहाँ से मांस ले आकर दिखाते हैं ।। ५५ ।।
तन्मांसं चैव गोमायोस्तैः क्षणादाशु ढौकितम् ।
मांसापनयनं ज्ञात्वा व्याघ्रः श्रुत्वा च तद्वचः ।। ५६ ।।
आज्ञापयामास तदा गोमायुर्वध्यतामिति ।
ऐसा कहकर वे क्षणभरमें ही सियारके घरसे उस मांसको उठा लाये। मांसके अपहरणकी बात जानकर और उन सेवकोंकी बातें सुनकर शेरने उस समय यह आज्ञा दे दी कि सियारको प्राणदण्ड दे दिया जाय ।। ५६ १/२ ।।
शार्दूलस्य वचः श्रुत्वा शार्दूलजननी ततः ।। ५७ ।।
मृगराजं हितैर्वाक्यैः सम्बोधयितुमागमत् ।
पुत्र नैतत् त्वया ग्राह्यं कपटारम्भसंयुतम् ।। ५८ ।।
शेरकी यह बात सुनकर उसकी माता हितकर वचनोंद्वारा उसे समझानेके लिये वहाँ आयी और बोली—'बेटा! इसमें कुछ कपटपूर्ण षड्यन्त्र हुआ मालूम पड़ता है; अतः तुम्हें इसपर विश्वास नहीं करना चाहिये ।।
कर्मसंघर्षजैर्दोषैर्दुष्येताशुचिभिः शुचिः ।
नोच्छ्रितं सहते कश्चित् प्रक्रिया वैरकारिका ।। ५९ ।।
'काममें लाग-डाँट हो जानेसे जिनके मनमें शुद्धभाव नहीं है, वे लोग निर्दोषपर ही दोषारोपण करते हैं। किसीको अपनेसे ऊँची अवस्थामें देख कर कोई-कोई ईर्ष्यावश सहन नहीं कर पाते। यही वैरभाव उत्पन्न करनेवाली प्रक्रिया है ।। ५९ ।।
शुचेरपि हि युक्तस्य दोष एव निपात्यते ।
मुनेरपि वनस्थस्य स्वानि कर्माणि कुर्वतः ।। ६० ।।
उत्पाद्यन्ते त्रयः पक्षा मित्रोदासीनशत्रवः ।
'कोई कितना ही शुद्ध और उद्योगी क्यों न हो, लोग उसपर दोषारोपण कर ही देते हैं। अपने धार्मिक कर्मोंमें लगे हुए वनवासी मुनिके भी शत्रु, मित्र और उदासीन—ये तीन पक्ष पैदा हो जाते हैं ।। ६० १/२ ।।
लुब्धानां शुचयो द्वेष्याः कातराणां तरस्विनः ।। ६१ ।।
मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या दरिद्राणां महाधनाः ।

अधार्मिकाणां धर्मिष्ठा विरूपाणां सुरूपिणः ॥ ६२ ॥ 'लोभी लोग निर्लोभीसे, कायर बलवानोंसे, मूर्ख विद्वानोंसे, दरिद्र बड़े-बड़े धनियोंसे, पापाचारी धर्मात्माओंसे और कुरूप सुन्दर रूपवालोंसे द्वेष करते हैं ॥ ६१-६२ ॥

बहवः पण्डिता मूर्खा लुब्धा मायोपजीविनः । कुर्युर्दोषमदोषस्य बृहस्पतिमतेरपि ॥ ६३ ॥ 'विद्वानोंमें भी बहुत-से ऐसे अविवेकी, लोभी और कपटी होते हैं, जो बृहस्पतिके समान बुद्धि रखनेवाले निर्दोष व्यक्तिमें भी दोष ढूँढ निकालते हैं ॥ ६३ ॥

शून्यात् तच्च गृहान्मांसं यद्यप्यपहृतं तव । नेच्छते दीयमानं च साधु तावद् विमृश्यताम् ॥ ६४ ॥ 'एक ओर तो तुम्हारे सूने घरसे मांसकी चोरी हुई है और दूसरी ओर एक व्यक्ति ऐसा है, जो देनेपर भी मांस लेना नहीं चाहता—इन दोनों बातोंपर पहले अच्छी तरह विचार करो ॥ ६४ ॥

असभ्याः सभ्यसंकाशाः सभ्याश्चासभ्यदर्शनाः । दृश्यन्ते विविधा भावास्तेषु युक्तं परीक्षणम् ॥ ६५ ॥ 'संसारमें बहुतसे असभ्य प्राणी सभ्यकी तरह और सभ्यलोग असभ्यके समान देखे जाते हैं। इस तरह अनेक प्रकारके भाव दृष्टिगोचर होते हैं; अतः उनकी परीक्षा कर लेनी उचित है ॥ ६५ ॥

तलवद् दृश्यते व्योम खद्योतो हव्यवाडिव । न चैवास्ति तलं व्योम्नि खद्योते न हुताशनः ॥ ६६ ॥ 'आकाश औंधी की हुई कड़ाहीके तले (भीतरी भागों) के समान दिखायी देता है और जुगनू अग्निके सदृश दृष्टिगोचर होता है; परंतु न तो आकाशमें तल है और न जुगनूमें अग्नि ही है ॥ ६६ ॥

तस्मात् प्रत्यक्षदृष्टोऽपि युक्तो ह्यर्थः परीक्षितुम् । परीक्ष्य ज्ञापयन्नर्थान्न पश्चात् परितप्यते ॥ ६७ ॥ 'इसलिये प्रत्यक्ष दिखायी देनवाली वस्तुकी भी परीक्षा करनी उचित है। जो परीक्षा लेकर भले-बुरेकी जाँच करके किसी कार्यके लिये आज्ञा देता है, उसे पीछे पछताना नहीं पड़ता ॥ ६७ ॥

न दुष्करमिदं पुत्र यत् प्रभुर्घातयेत् परम् । श्लाघनीया यशस्या च लोके प्रभवतां क्षमा ॥ ६८ ॥ 'बेटा! यदि शक्तिशाली राजा दूसरेको मरवा डाले तो यह उसके लिये कोई कठिन काम नहीं है; परंतु शक्तिशाली पुरुषोंमें यदि क्षमाका भाव हो तो संसारमें उसीकी बड़ाई की जाती है और उसीसे राजाओंका यश बढ़ता है ॥ ६८ ॥

स्थापितोऽयं त्वया पुत्र सामन्तेष्वपि विश्रुतः ।

दुःखेनसाद्यते पात्रं धार्यतामेष ते सुहृत् ॥ ६९ ॥ 'बेटा! तुमने ही इस सियारको मन्त्रीके पदपर बिठाया है, और तुम्हारे सामन्तोंमें भी इसकी ख्याति बढ़ गयी है। कोई सुपात्र व्यक्ति बड़ी कठिनाईसे प्राप्त होता है। यह सियार तुम्हारा हितैषी सुहृद् है; इसलिये तुम इसकी रक्षा करो ॥ ६९ ॥ दूषितं परदोषैर्हि गृह्णीते योऽन्यथा शुचिम् । स्वयं संदूषितामात्यः क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ ७० ॥ 'जो दूसरोंके मिथ्या कलंक लगानेपर किसी निर्दोषको भी दण्ड देता है, वह दुष्ट मन्त्रियोंवाला राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है' ॥ ७० ॥ तस्मादप्यरिसंघाताद् गोमायोः कश्चिदागतः । धर्मात्मा तेन चाख्यातं यथैतत् कपटं कृतम् ॥ ७१ ॥ तदनन्तर उन्हीं शत्रुओंके समूहमेंसे किसी धर्मात्मा सियारने (जो शेरका गुप्तचर बना था,) आकर गीदड़के साथ जो यह छल-कपट किया गया था, वह सब सिंहको कह सुनाया ॥ ७१ ॥ ततो विज्ञातचरितः सत्कृत्य स विमोक्षितः । परिष्वक्तश्च सस्नेहं मृगेन्द्रेण पुनः पुनः ॥ ७२ ॥ इससे शेरको सियारकी सच्चरित्रताका पता चल गया और उसने उसका सत्कार करके उसे इस अभियोगसे मुक्त कर दिया। इतना ही नहीं, मृगराजने स्नेहपूर्वक बारंबार अपने सचिवको गलेसे लगाया ॥ ७२ ॥ अनुज्ञाप्य मृगेन्द्रं तु गोमायुर्नीतिशास्त्रवित् । तेनामर्षेण संतप्तः प्रायमासितुमैच्छत ॥ ७३ ॥ तत्पश्चात् नीतिशास्त्रके ज्ञाता सियारने मृगराजकी आज्ञा लेकर अमर्षसे संतप्त हो उपवास करके प्राण त्याग देनेका विचार किया ॥ ७३ ॥ शार्दूलस्तं तु गोमायुं स्नेहात् प्रोत्फुल्ललोचनः । अवारयत् स धर्मिष्ठं पूजया प्रतिपूजयन् ॥ ७४ ॥ शेरने धर्मात्मा गीदड़का भलीभाँति आदर-सत्कार करके उसे उपवाससे रोक दिया। उस समय उसके नेत्र स्नेहसे खिल उठे थे ॥ ७४ ॥ तं स गोमायुरालोक्य स्नेहादागतसम्भ्रमम् । उवाच प्रणतो वाक्यं बाष्पगद्गदया गिरा ॥ ७५ ॥ सियारने देखा, मालिकका हृदय स्नेहसे आकुल हो रहा है, तब उसने उसे प्रणाम करके अश्रुगद्गद वाणीसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया— ॥ ७५ ॥ पूजितोऽहं त्वया पूर्वं पश्चाच्चैव विमानितः । परेषामास्पदं नीतो वस्तुं नार्हाम्यहं त्वयि ॥ ७६ ॥

'महाराज! पहले तो आपने मुझे सम्मान दिया और पीछे अपमानित कर दिया, शत्रुओंकी-सी अवस्थामें डाल दिया; अतः अब मैं आपके पास रहनेके योग्य नहीं हूँ॥ ७६ ॥ असंतोषश्च्युताः स्थानान्मानात् प्रत्यवरोपिताः । स्वयं चोपहता भृत्या ये चाप्युपहताः परैः ॥ ७७ ॥ परिक्षीणाश्च लुब्धाश्च क्रुद्धा भीताः प्रतारिताः । हृतस्वा मानिनो ये च त्यक्तादाना महेप्सवः ॥ ७८ ॥ संतापिताश्च ये केचिद् व्यसनौघप्रतीक्षिणः । अन्तर्हिताः सोपहितास्ते सर्वे परसाधनाः ॥ ७९ ॥ 'जो अपने पदसे गिरा दिये जानेके कारण असंतुष्ट हों, अपमानित किये गये हों, जो स्वयं राजासे पुरस्कृत होकर दूसरोंके द्वारा कलंक लगाये जानेके कारण उस आदरसे वंचित कर दिये गये हों, जो क्षीण, लोभी, क्रोधी, भयभीत और धोखेमें डाले गये हों, जिनका सर्वस्व छीन लिया गया हो, जो मानी हों, जिनकी आय छिन गयी हो, जो महत्त्वपूर्ण पद पाना चाहते हों, जिन्हें सताया गया हो, जो किसी राजापर आनेवाले संकटसमूहकी प्रतीक्षा कर रहे हों, छिपे रहते हों और मनमें कपटभाव रखते हों, वे सभी सेवक शत्रुओंका काम बनानेवाले होते हैं॥ ७७—७९ ॥ अवमानेन युक्तस्य स्थानभ्रष्टस्य वा पुनः । कथं यास्यसि विश्वासमहं तिष्ठामि वा कथम् ॥ ८० ॥ जब मैं एक बार अपने पदसे भ्रष्ट और अपमानित हो गया, तब पुनः आप मुझपर कैसे विश्वास कर सकेंगे? अथवा मैं ही कैसे आपके पास रह सकूँगा? ॥ समर्थ इति संगृह्य स्थापयित्वा परीक्षितः । कृतं च समयं भित्त्वा त्वयाहमवमानितः ॥ ८१ ॥ 'आपने योग्य समझकर मुझे अपनाया और मन्त्रीके पदपर बिठाकर मेरी परीक्षा ली। इसके बाद अपनी की हुई प्रतिज्ञाको तोड़कर मेरा अपमान किया॥ ८१ ॥ प्रथमं यः समाख्यातः शीलवानिति संसदि । न वाच्यं तस्य वैगुण्यं प्रतिज्ञां परिरक्षता ॥ ८२ ॥ 'पहले भरी सभामें शीलवान् कहकर जिसका परिचय दिया गया हो, प्रतिज्ञाकी रक्षा करनेवाले पुरुषको उसका दोष नहीं बताना चाहिये॥ ८२ ॥ एवं चावमतस्येह विश्वासं मे न यास्यसि । त्वयि चापेतविश्वास ममोद्वेगो भविष्यति ॥ ८३ ॥ 'जब मैं इस प्रकार यहाँ अपमानित हो गया तो अब आपपर मेरा विश्वास न होगा और आप भी मुझपर विश्वास नहीं कर सकेंगे। ऐसी दशामें आपसे मुझे सदा भय बना रहेगा॥ ८३ ॥

शङ्कितस्त्वमहं भीतः परच्छिद्रानुदर्शिनः । अस्निग्धाश्चैव दुस्तोषाः कर्म चैतद् बहुच्छलम् ॥ ८४ ॥ 'आप मुझपर संदेह करेंगे और मैं आपसे डरता रहूँगा, इधर पराये दोष ढूँढनेवाले आपके भृत्यलोग मौजूद ही हैं। इनका मुझपर तनिक भी स्नेह नहीं है तथा इन्हें संतुष्ट रखना भी मेरे लिये अत्यन्त कठिन है। साथ ही यह मन्त्रीका कर्म भी अनेक प्रकारके छल-कपटसे भरा हुआ है' ।। ८४ ।।

दुःखेन श्लिष्यते भिन्नं श्लिष्टं दुःखेन भिद्यते । भिन्ना श्लिष्टा तु या प्रीतिर्न सा स्नेहेन वर्तते ॥ ८५ ॥ 'प्रेमका बन्धन बड़ी कठिनाईसे टूटता है, पर जब वह एक बार टूट जाता है, तब बड़ी कठिनाईसे जुट पाता है। जो प्रेम बारंबार टूटता और जुड़ता रहता है, उसमें स्नेह नहीं होता' ।। ८५ ।।

कश्चिदेव हिते भर्तुर्दृश्यते न परात्मनोः । कार्यापेक्षा हि वर्तन्ते भावस्निग्धाः सुदुर्लभाः ॥ ८६ ॥ 'ऐसा मनुष्य कोई एक ही होता है, जो अपने या दूसरेके हितमें रत न रहकर स्वामीके ही हितमें संलग्न दिखायी देता हो; क्योंकि अपने कार्यकी अपेक्षा रखकर स्वार्थसाधनका उद्देश्य लेकर प्रेम करनेवाले तो बहुत होते हैं, परंतु शुद्धभावसे स्नेह रखनेवाले मनुष्य अत्यन्त दुर्लभ हैं' ।। ८६ ।।

सुदुःखं पुरुषज्ञानं चित्तं ह्येषां चलाचलम् । समर्थो वाप्यशङ्को वा शतेष्वेकोऽधिगम्यते ॥ ८७ ॥ 'योग्य मनुष्यको पहचानना राजाओंके लिये अत्यन्त दुष्कर है; क्योंकि उनका चित्त चंचल होता है, सैकड़ोंमेंसे कोई एक ही ऐसा मिलता है, जो सब प्रकारसे सुयोग्य होता हुआ भी संदेहसे परे हो' ।। ८७ ।।

अकस्मात् प्रक्रिया नृणामकस्माच्चापकर्षणम् । शुभाशुभे महत्त्वं च प्रकार्तुं बुद्धिलाघवम् ॥ ८८ ॥ 'मनुष्यके उत्कर्ष और अपकर्ष (उन्नति और अवनति) अकस्मात् होते हैं, किसीका भला करके बुरा करना और उसे महत्त्व देकर नीचे गिराना, यह सब ओछी बुद्धिका परिणाम है' ।। ८८ ।।

एवंविधं सान्त्वमुक्त्वा धर्मकामार्थहेतुमत् । प्रसादयित्वा राजानं गोमायुर्वनमभ्यगात् ॥ ८९ ॥ इस प्रकार धर्म, अर्थ, काम और मुक्तियोंसे युक्त सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर सियारने बाघराजाको प्रसन्न कर लिया और उसकी अनुमति लेकर वह वनमें चला गया ।। ८९ ।।

अगृह्णानुनयं तस्य मृगेन्द्रस्य च बुद्धिमान् । गोमायुः प्रायमास्थाय त्यक्त्वा देहं दिवं ययौ ॥ ९० ॥

वह बड़ा बुद्धिमान् था; अतः शेरकी अनुनय-विनय न मानकर मृत्युपर्यन्त निराहार रहनेका व्रत ले एक स्थानपर बैठ गया और अन्तमें शरीर त्यागकर स्वर्गधाममें जा पहुँचा ॥ ९० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्याघ्रगोमायुसंवादे एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्याघ्र और गीदड़का संवादविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १११ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ९१ श्लोक हैं।)

एतदाचक्ष्व तत्त्वेन सर्वधर्मभृतां वर ॥ १ ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः

एक तपस्वी ऊँटके आलस्यका कुपरिणाम और राजाका कर्तव्य

युधिष्ठिर उवाच

किं पार्थिवेन कर्तव्यं किं च कृत्वा सुखी भवेत् ।
एतदाचक्ष्व तत्त्वेन सर्वधर्मभृतां वर ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पितामह! राजाको क्या करना चाहिये? क्या करनेसे वह सुखी हो सकता है? यह मुझे यथार्थरूपसे बताइये? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि शृणु कार्यैकनिश्चयम् ।
यथा राज्ञा कर्तव्यं यच्च कृत्वा सुखी भवेत् ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— नरेश्वर! राजाका जो कर्तव्य है और जो कुछ करके वह सुखी हो सकता है, उस कार्यका निश्चय करके अब मैं तुम्हें बतलाता हूँ, उसे सुनो ॥ २ ॥

न चैवं वर्तितव्यं स्म यथेदमनुशुश्रुम ।
उष्ट्रस्य तु महत् वृत्तं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ३ ॥
युधिष्ठिर! हमने एक ऊँटका जो महान् वृत्तान्त सुन रखा है, उसे तुम सुनो। राजाको वैसा बर्ताव नहीं करना चाहिये ॥ ३ ॥

जातिस्मरो महानुष्ट्रः प्राजापत्ये युगेऽभवत् ।
तपः सुमहादातिष्ठदरण्ये संशितव्रतः ॥ ४ ॥
प्राजापत्ययुग (सत्ययुग) में एक महान् ऊँट था। उसको पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था। उसने कठोर व्रतके पालनका नियम लेकर वनमें बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की ॥ ४ ॥

तपसस्तस्य चान्तेऽथ प्रीतिमानभवद् विभुः ।
वरेण च्छन्दयामास ततश्चैनं पितामहः ॥ ५ ॥
उस तपस्याके अन्तमें पितामह भगवान् ब्रह्मा बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने उससे वर माँगनेके लिये कहा ॥ ५ ॥

उष्ट्र उवाच

भगवंस्त्वत्प्रसादान्मे दीर्घा ग्रीवा भवेदियम् ।
योजनानां शतं साग्रं गच्छामि चरितुं विभो ॥ ६ ॥

ऊँट बोला— भगवन्! आपकी कृपासे मेरी यह गर्दन बहुत बड़ी हो जाय, जिससे जब मैं चरनेके लिये जाऊँ तो सौ योजनसे अधिक दूरतककी खाद्य वस्तुएँ ग्रहण कर सकूँ ।। ६ ।।

एवमस्त्विति चोक्तः स वरदेन महात्मना ।
प्रतिलभ्य वरं श्रेष्ठं ययावुष्ट्रः स्वकं वनम् ॥ ७ ॥
वरदायक महात्मा ब्रह्माजीने ‘एवमस्तु’ कहकर उसे मुँहमाँगा वर दे दिया। वह उत्तम वर पाकर ऊँट अपने वनमें चला गया ।। ७ ।।

स चकार तदाऽऽलस्यं वरदानात् सुदुर्मतिः ।
न चैच्छच्चरितुं गन्तुं दुरात्मा कालमोहितः ॥ ८ ॥
उस खोटी बुद्धिवाले ऊँटने वरदान पाकर कहीं आने-जानेमें आलस्य कर लिया। वह दुरात्मा कालसे मोहित होकर चरनेके लिये कहीं जाना ही नहीं चाहता था ।। ८ ।।

स कदाचित् प्रसार्यैव तां ग्रीवां शतयोजनाम् ।
चचार श्रान्तहृदयो वातश्चागात् ततो महान् ॥ ९ ॥
एक समयकी बात है, वह अपनी सौ योजन लंबी गर्दन फैलाकर चर रहा था, उसका मन चरनेसे कभी थकता ही नहीं था। इतनेमें ही बड़े जोरसे हवा चलने लगी ।। ९ ।।

स गुहायां शिरो ग्रीवां निधाय पशुरात्मनः ।
आस्ते तु वर्षमभ्यागात् सुमहत् प्लावयज्जगत् ॥ १० ॥
वह पशु किसी गुफामें अपनी गर्दन डालकर चर रहा था, इसी समय सारे जगत्‌के जलसे आप्लावित करती हुई बड़ी भारी वर्षा होने लगी ।। १० ।।

अथ शीतपरीताङ्गो जम्बुकः क्षुच्छ्रमान्वितः ।
सदारस्तां गुहामाशु प्रविवेश जलार्दितः ॥ ११ ॥
वर्षा आरम्भ होनेपर भूख और थकावटसे कष्ट पाता हुआ एक गीदड़ अपनी स्त्रीके साथ शीघ्र ही उस गुहामें आ घुसा। वह जलसे पीड़ित था, सर्दीसे उसके सारे अंग अकड़ गये थे ।। ११ ।।

स दृष्ट्वा मांसजीवी तु सुभृशं क्षुच्छ्रमान्वितः ।
अभक्षयत् ततो ग्रीवामुष्ट्रस्य भरतर्षभ ॥ १२ ॥
भरतश्रेष्ठ! वह मांसजीवी गीदड़ अत्यन्त भूखके कारण कष्ट पा रहा था, अतः उसने ऊँटकी गर्दनका मांस काट-काटकर खाना आरम्भ कर दिया ।। १२ ।।

यदा त्वबुध्यतात्मानं भक्ष्यमाणं स वै पशुः ।
तदा संकोचने यत्नमकरोद् भृशदुःखितः ॥ १३ ॥
जब उस पशुको यह मालूम हुआ कि उसकी गर्दन खायी जा रही है, तब वह अत्यन्त दुखी हो उसे समेटनेका प्रयत्न करने लगा ।। १३ ।।

यावदूर्ध्वमधश्चैव ग्रीवां संक्षिपते पशुः ।