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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 693)

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एकोनाशीतितमोऽध्यायः

गौओंको तपस्याद्वारा अभीष्ट वरकी प्राप्ति तथा उनके दानकी महिमा, विभिन्न प्रकारके गौओंके दानसे विभिन्न उत्तम लोकोंमें गमनका कथन

वसिष्ठ उवाच

शतं वर्षसहस्राणां तपस्तप्तं सुदुष्करम् ।
गोभिः पूर्वं विसृष्टाभिर्गच्छेम श्रेष्ठतामिति ॥ १ ॥
लोकेऽस्मिन् दक्षिणानां च सर्वासां वयमुत्तमाः ।
भवेम न च लिप्यैम दोषेणेति परंतप ॥ २ ॥
अस्मत्पुरीषस्नानेन जनः पूयेत सर्वदा ।
शकृता च पवित्रार्थं कुर्वीरन् देवमानुषाः ॥ ३ ॥
तथा सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
प्रदातारश्च लोकान् नो गच्छेयुरिति मानद ॥ ४ ॥
वसिष्ठजी कहते हैं— मानद परंतप! प्राचीन कालमें जब गौओंकी सृष्टि हुई थी, तब उन गौओंने एक लाख वर्षोंतक बड़ी कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्याका उद्देश्य यह था कि हम श्रेष्ठता प्राप्त करें। इस जगत्‌में जितनी दक्षिणा देने योग्य वस्तुएँ हैं, उन सबमें हम उत्तम समझी जायँ। किसी दोषसे लिप्त न हों। हमारे गोबरसे स्नान करनेपर सदा सब लोग पवित्र हों। देवता और मनुष्य पवित्रताके लिये हमेशा हमारे गोबरका उपयोग करें। समस्त चराचर प्राणी भी हमारे गोबरसे पवित्र हो जायँ और हमारा दान करनेवाले मनुष्य हमारे ही लोक (गोलोकधाम) में जायँ ॥

ताभ्यो वरं ददौ ब्रह्मा तपसोऽन्ते स्वयं प्रभुः ।
एवं भवत्विति प्रभुर्लोकांस्तारयतेति च ॥ ५ ॥
जब उनकी तपस्या समाप्त हुई, तब साक्षात् भगवान् ब्रह्माने उन्हें वर दिया—'गौओ! ऐसा ही हो—तुम्हारे मनमें जो संकल्प है, वह परिपूर्ण हो। तुम सम्पूर्ण जगत्‌के जीवोंका उद्धार करती रहो' ॥ ५ ॥

उत्तस्थुः सिद्धकामास्ता भूतभव्यस्य मातरः ।
प्रातर्नमस्यास्ता गावस्ततः पुष्टिमवाप्नुयात् ॥ ६ ॥
इस प्रकार अपनी समस्त कामनाएँ सिद्ध हो जानेपर गौएँ तपस्यासे उठीं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंकी जननी हैं; अतः प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर गौओंको प्रणाम करना चाहिये। इससे मनुष्योंको पुष्टि प्राप्त होती है ॥ ६ ॥

तपसोऽन्ते महाराज गावो लोकपरायणाः । तस्माद् गावो महाभागाः पवित्रं परमुच्यते ॥ ७ ॥ महाराज! तपस्या समाप्त होनेपर गौएँ सम्पूर्ण जगत्का आश्रय बन गयीं; इसलिये वे महान् सौभाग्यशालिनी गौएँ परम पवित्र बतायी जाती हैं ॥ ७ ॥ तथैव सर्वभूतानां समतिष्ठन्त मूर्धनि । समानवत्सां कपिलां धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतां ब्रह्मलोके महीयते ॥ ८ ॥ ये समस्त प्राणियोंके मस्तकपर स्थित हैं (अर्थात् सबसे श्रेष्ठ एवं वन्दनीय हैं)। जो मनुष्य दूध देनेवाली सुलक्षणा कपिला गौको वस्त्र ओढ़ाकर कपिल रंगके बछड़ेसहित दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें सम्मानित होता है ॥ ८ ॥ लोहितां तुल्यवत्सां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतां सूर्यलोके महीयते ॥ ९ ॥ जो मनुष्य दूध देनेवाली सुलक्षणा लाल रंगकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर लाल रंगके बछड़ेसहित दान करता है, वह सूर्यलोकमें सम्मानित होता है ॥ ९ ॥ समानवत्सां शबलां धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतां सोमलोके महीयते ॥ १० ॥ जो पुरुष दूध देनेवाली सुलक्षणा चितकबरी गौको वस्त्र ओढ़ाकर चितकबरे बछड़ेसहित दान करता है, वह चन्द्रलोकमें पूजित होता है ॥ १० ॥ समानवत्सां श्वेतां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतामिन्द्रलोके महीयते ॥ ११ ॥ जो मानव दूध देनेवाली सुलक्षणा श्वेत वर्णकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर श्वेत वर्णके बछड़ेसहित दान करता है, उसे इन्द्रलोकमें सम्मान प्राप्त होता है ॥ ११ ॥ समानवत्सां कृष्णां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतामग्निलोके महीयते ॥ १२ ॥ जो मनुष्य दूध देनेवाली सुलक्षणा कृष्ण वर्णकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर कृष्ण वर्णके बछड़ेसहित दान करता है, वह अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १२ ॥ समानवत्सां धूम्रां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतां याम्यलोके महीयते ॥ १३ ॥ जो पुरुष दूध देनेवाली सुलक्षणा धूएँ-जैसे रंगकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर धूएँके समान रंगके बछड़ेसहित दान करता है, वह यमलोकमें सम्मानित होता है ॥ १३ ॥ अपां फेनसवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंवीतां वारुणं लोकमाप्नुते ॥ १४ ॥

जो जलके फेनके समान रंगवाली गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह वरुणलोकको प्राप्त होता है ॥ १४ ॥ वातरेणुसवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंवीतां वायुलोके महीयते ॥ १५ ॥ जो हवासे उड़ी हुई धूलके समान रंगवाली गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, उसकी वायुलोकमें पूजा होती है ॥ १५ ॥ हिरण्यवर्णां पिंगाक्षीं सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंवीतां कौबेरं लोकमश्नुते ॥ १६ ॥ जो सुवर्णके समान रंग तथा पिंगल वर्णके नेत्रवाली गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह कुबेर-लोकको प्राप्त होता है ॥ १६ ॥ पलालधूम्रवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंवीतां पितृलोके महीयते ॥ १७ ॥ जो पुआलके धूएँके समान रंगवाली बछड़ेसहित गौको वस्त्रसे आच्छादित करके कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह पितृलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १७ ॥ सवत्सां पीवरीं दत्त्वा दृतिकण्ठामलंकृताम् । वैश्वदेवमसम्बाधं स्थानं श्रेष्ठं प्रपद्यते ॥ १८ ॥ जो लटकते हुए गलकम्बलसे युक्त मोटी-ताजी सवत्सा गौको अलंकृत करके ब्राह्मणको दान देता है, वह बिना किसी बाधाके विश्वेदेवोंके श्रेष्ठ लोकमें पहुँच जाता है ॥ १८ ॥ समानवत्सां गौरीं तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतां वसूनां लोकमाप्नुयात् ॥ १९ ॥ जो गौर वर्णवाली और दूध देनेवाली शुभलक्षणा गौको वस्त्र ओढ़ाकर समान रंगवाले बछड़ेसहित दान करता है, वह वसुओंके लोकमें जाता है ॥ १९ ॥ पाण्डुकम्बलवर्णाभां सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंवीतां साध्यानां लोकमाप्नुते ॥ २० ॥ जो श्वेत कम्बलके समान रंगवाली सवत्सा गौको वस्त्रसे आच्छादित करके कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह साध्योंके लोकमें जाता है ॥ २० ॥ वैराटपृष्ठमुक्षाणं सर्वरत्नैरलंकृतम् । प्रदन्मरुतां लोकान् स राजन् प्रतिपद्यते ॥ २१ ॥ राजन्! जो विशालपृष्ठभागवाले बैलको सब प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत करके उसका दान करता है, वह मरुद्गणोंके लोकोंमें जाता है ॥ २१ ॥ वयोपपन्नं लीलांगं सर्वरत्नसमन्वितम् । गन्धर्वाप्सरसां लोकान् दत्त्वा प्राप्नोति मानवः ॥ २२ ॥

जो मनुष्य यौवनसे सम्पन्न और सुन्दर अंगवाले बैलको सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित करके उसका दान करता है, वह गन्धर्वों और अप्सराओंके लोकोंको प्राप्त करता है ॥ २२ ॥

दृतिकण्ठमनड्वाहं सर्वरत्नैरलंकृतम् । दत्त्वा प्रजापतेर्लोकान् विशोकः प्रतिपद्यते ॥ २३ ॥ जो लटकते हुए गलकम्बलवाले तथा गाड़ीका बोझ ढोनेमें समर्थ बैलको सम्पूर्ण रत्नोंसे अलंकृत करके ब्राह्मणको देता है, वह शोकरहित हो प्रजापतिके लोकोंमें जाता है ॥ २३ ॥

गोप्रदानरतो याति भित्त्वा जलदसंचयान् । विमानेनार्कवर्णेन दिवि राजन् विराजते ॥ २४ ॥ राजन्! गोदानमें अनुरागपूर्वक तत्पर रहनेवाला पुरुष सूर्यके समान देदीप्यमान विमानमें बैठकर मेघमण्डलको भेदता हुआ स्वर्गमें जाकर सुशोभित होता है ॥ २४ ॥

तं चारुवेषाः सुश्रोण्यः सहस्रं सुरयोषितः । रमयन्ति नरश्रेष्ठं गोप्रदानरतं नरम् ॥ २५ ॥ उस गोदानपरायण श्रेष्ठ मनुष्यको मनोहर वेष और सुन्दर नितम्बवाली सहस्रों देवांगनाएँ (अपनी सेवासे) रमण कराती हैं ॥ २५ ॥

वीणानां वल्लकीनां च नूपुराणां च सिञ्जितैः । हासैश्च हरिणाक्षीणां सुप्तः स प्रतिबोध्यते ॥ २६ ॥ वह वीणा और वल्लकीके मधुर गुंजन, मृगनयनी युवतियोंके नूपुरोंकी मनोहर झनकारों तथा हास-परिहासके शब्दोंको श्रवण करके नींदसे जागता है ॥ २६ ॥

यावन्ति रोमाणि भवन्ति धेन्वा- स्तावन्ति वर्षाणि महीयते सः । स्वर्गच्युतश्चापि ततो नृलोके प्रसूयते वै विपुले गृहे सः ॥ २७ ॥ गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें सम्मानपूर्वक रहता है। फिर पुण्यक्षीण होनेपर जब स्वर्गसे नीचे उतरता है, तब इस मनुष्यलोकमें आकर सम्पन्न घरमें जन्म लेता है ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥

अध्याय (पृष्ठ 697)

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अशीतितमोऽध्यायः

गौओं तथा गोदानकी महिमा

वसिष्ठ उवाच

घृतक्षीरप्रदा गावो घृतयोन्यो घृतोद्भवाः ।
घृतनद्यो घृतावर्तास्ता मे सन्तु सदा गृहे ॥ १ ॥
घृतं मे हृदये नित्यं घृतं नाभ्यां प्रतिष्ठितम् ।
घृतं सर्वेषु गात्रेषु घृतं मे मनसि स्थितम् ॥ २ ॥
गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च ।
गावो मे सर्वतश्चैव गवां मध्ये वसाम्यहम् ॥ ३ ॥
इत्याचम्य जपेत् सायं प्रातश्च पुरुषः सदा ।
यदह्ना कुरुते पापं तस्मात् स परिमुच्यते ॥ ४ ॥

**वसिष्ठजी कहते हैं—**राजन्! मनुष्यको चाहिये कि सदा सबेरे और सायंकाल आचमन करके इस प्रकार जप करे—'घी और दूध देनेवाली, घीकी उत्पत्तिका स्थान, घीको प्रकट करनेवाली, घीकी नदी तथा घीकी भँवर्रूप गौएँ मेरे घरमें सदा निवास करें। गौका घी मेरे हृदयमें सदा स्थित रहे। घी मेरी नाभिमें प्रतिष्ठित हो। घी मेरे सम्पूर्ण अंगोंमें व्याप्त रहे और घी मेरे मनमें स्थित हो। गौएँ मेरे आगे रहें। गौएँ मेरे पीछे भी रहें। गौएँ मेरे चारों ओर रहें और मैं गौओंके बीचमें निवास करूँ।' इस प्रकार प्रतिदिन जप करनेवाला मनुष्य दिनभरमें जो पाप करता है, उससे छुटकारा पा जाता है ॥ १—४ ॥

प्रासादा यत्र सौवर्णा वसोर्धारा च यत्र सा ।
गन्धर्वाप्सरसो यत्र तत्र यान्ति सहस्रदाः ॥ ५ ॥
सहस्र गौओंका दान करनेवाले मनुष्य जहाँ सोनेके महल हैं, जहाँ स्वर्गगंगा बहती हैं तथा जहाँ गन्धर्व और अप्सराएँ निवास करती हैं, उस स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥

नवनीतपङ्काः क्षीरोदा दधिशैवलसंकुलाः ।
वहन्ति यत्र वै नद्यस्तत्र यान्ति सहस्रदाः ॥ ६ ॥
सहस्र गौओंका दान करनेवाले पुरुष जहाँ दूधके जलसे भरी हुई, दहीके सेवारसे व्याप्त हुई तथा मक्खनरूपी कीचड़से युक्त हुई नदियाँ बहती हैं, वहीं जाते हैं ॥ ६ ॥

गवां शतसहस्रं तु यः प्रयच्छेद यथाविधि ।
परां वृद्धिमवाप्याथ स्वर्गलोके महीयते ॥ ७ ॥
जो विधिपूर्वक एक लाख गौओंका दान करता है, वह अत्यन्त अभ्युदयको पाकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ॥ ७ ॥

दश चोभयतः पुत्रो मातापित्रोः पितामहान् ।

दधाति सुकृतान् लोकान् पुनाति च कुलं नरः ॥ ८ ॥ वह मनुष्य अपने माता और पिताकी दस-दस पीढ़ियोंको पवित्र करके उन्हें पुण्यमय लोकोंमें भेजता है और अपने कुलको भी पवित्र कर देता है ॥ ८ ॥
धेन्वाः प्रमाणेन समप्रमाणां
धेनुं तिलानामपि च प्रदाय ।
पानीयदाता च यमस्य लोके
न यातनां काञ्चिदुपैति तत्र ॥ ९ ॥
जो गायके बराबर तिलकी गाय बनाकर उसका दान करता है, अथवा जो जलधेनुका दान करता है, उसे यमलोकमें जाकर वहाँकी कोई यातना नहीं भोगनी पड़ती है ॥ ९ ॥
पवित्रमग्रयं जगतः प्रतिष्ठा
दिवौकसां मातरोऽथाप्रमेयाः ।
अन्वालभेद् दक्षिणतो व्रजेच्च
दद्याच्च पात्रे प्रसमीक्ष्य कालम् ॥ १० ॥
गौ सबसे अधिक पवित्र, जगत्का आधार और देवताओंकी माता है। उसकी महिमा अप्रमेय है। उसका सादर स्पर्श करे और उसे दाहिने रखकर चले तथा उत्तम समय देखकर उसका सुपात्र ब्राह्मणको दान करे ॥ १० ॥
धेनुं सवत्सां कपिलां भूरिशृंगीं
कांस्योपदोहां वसनोत्तरीयाम् ।
प्रदाय तां गाहति दुर्विगाह्यां
याम्यां सभां वीतभयो मनुष्यः ॥ ११ ॥
जो बड़े-बड़े सींगोंवाली कपिला धेनुको वस्त्र ओढ़ाकर उसे बछड़े और काँसीकी दोहनीसहित ब्राह्मणको दान करता है, वह मनुष्य यमराजकी दुर्गम सभामें निर्भय होकर प्रवेश करता है ॥ ११ ॥
सुरूपा बहुरूपाश्च विश्वरूपाश्च मातरः ।
गावो मामुपतिष्ठन्तामिति नित्यं प्रकीर्तयेत् ॥ १२ ॥
प्रतिदिन यह प्रार्थना करनी चाहिये कि सुन्दर एवं अनेक प्रकारके रूप-रंगवाली विश्वरूपिणी गोमाताएँ सदा मेरे निकट आयें ॥ १२ ॥
नातः पुण्यतरं दानं नातः पुण्यतरं फलम् ।
नातो विशिष्टं लोकेषु भूतं भवितुमर्हति ॥ १३ ॥
गोदानसे बढ़कर कोई पवित्र दान नहीं है। गोदानके फलसे श्रेष्ठ दूसरा कोई फल नहीं है तथा संसारमें गौसे बढ़कर दूसरा कोई उत्कृष्ट प्राणी नहीं है ॥ १३ ॥
त्वचा लोम्नाथशृंगैर्वा वालैः क्षीरेण मेदसा ।
यज्ञं वहति सम्भूय किमस्त्यभ्यधिकं ततः ॥ १४ ॥

त्वचा, रोम, सींग, पूँछके बाल, दूध और मेदा आदिके साथ मिलकर गौ (दूध, दही, घी आदिके द्वारा) यज्ञका निर्वाह करती है; अतः उससे श्रेष्ठ दूसरी कौन-सी वस्तु है ॥ १४ ॥

यया सर्वमिदं व्याप्तं जगत् स्थावरजंगमम् ।
तां धेनुं शिरसा वन्दे भूतभव्यस्य मातरम् ॥ १५ ॥
जिसने समस्त चराचर जगत्‌को व्याप्त कर रखा है, उस भूत और भविष्यकी जननी गौको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ १५ ॥

गुणवचनसमुच्चयैकदेशो
नृवर मयैष गवां प्रकीर्तितस्ते ।
न च परमिह दानमस्ति गोभ्यो
भवति न चापि परायणं तथान्यत् ॥ १६ ॥
नरश्रेष्ठ! यह मैंने तुमसे गौओंके गुणवर्णनसम्बन्धी साहित्यका एक लघु अंशमात्र बताया है—दिग्दर्शनमात्र कराया है। गौओंके दानसे बढ़कर इस संसारमें दूसरा कोई दान नहीं है, तथा उनके समान दूसरा कोई आश्रय भी नहीं है ॥ १६ ॥

भीष्म उवाच

वरमिदमिति भूमिदो विचिन्त्य
प्रवरमृषेर्वचनं ततो महात्मा ।
व्यसृजत नियतात्मवान् द्विजेभ्यः
सुबहु च गोधनमाप्तवांश्च लोकान् ॥ १७ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**महर्षि वसिष्ठके ये वचन सुनकर भूमिदान करनेवाले संयतात्मा महामना राजा सौदासने ‘यह बहुत उत्तम पुण्यकार्य है’ ऐसा सोचकर ब्राह्मणोंको बहुत-सी गौएँ दान दीं। इससे उन्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हुई ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके अशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥

गौओंका माहात्म्य तथा व्यासजीके द्वारा शुकदेवसे गौओंकी, गोलोककी और गोदानकी महत्ताका वर्णन

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एकाशीतितमोऽध्यायः

गौओंका माहात्म्य तथा व्यासजीके द्वारा शुकदेवसे गौओंकी, गोलोककी और गोदानकी महत्ताका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

पवित्राणां पवित्रं यच्छिष्टं लोके च यद् भवेत् ।
पावनं परमं चैव तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— पितामह! संसारमें जो वस्तु पवित्रोंमें भी पवित्र तथा लोकमें पवित्र कहकर अनुमोदित एवं परम पावन हो, उसका मुझसे वर्णन कीजिये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

गावो महार्थाः पुण्याश्च तारयन्ति च मानवान् ।
धारयन्ति प्रजाश्चैमा हविषा पयसा तथा ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! गौएँ महान् प्रयोजन सिद्ध करनेवाली तथा परम पवित्र हैं। ये मनुष्योंको तारनेवाली हैं और अपने दूध-घीसे प्रजावर्गके जीवनकी रक्षा करती हैं ॥ २ ॥
न हि पुण्यतमं किंचिद् गोभ्यो भरतसत्तम ।
एताः पुण्याः पवित्राश्च त्रिषु लोकेषु सत्तमाः ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! गौओंसे बढ़कर परम पवित्र दूसरी कोई वस्तु नहीं है। ये पुण्यजनक, पवित्र तथा तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं ॥ ३ ॥
देवानामुपरिष्टाच्च गावः प्रतिवसन्ति वै ।
दत्त्वा चैतास्तारयन्ते यान्ति स्वर्गं मनीषिणः ॥ ४ ॥
गौएँ देवताओंसे भी ऊपरके लोकोंमें निवास करती हैं। जो मनीषी पुरुष इनका दान करते हैं, वे अपने आपको तारते हैं और स्वर्गमें जाते हैं ॥ ४ ॥
मान्धाता यौवनाश्वश्च ययातिर्नहुषस्तथा ।
गा वै ददन्तः सततं सहस्रशतसम्मिताः ॥ ५ ॥
गताः परमकं स्थानं देवैरपि सुदुर्लभम् ।
युवनाश्वके पुत्र राजा मान्धाता, (सोमवंशी) नहुष और ययाति—ये सदा लाखों गौओंका दान किया करते थे; इससे वे उन उत्तम स्थानोंको प्राप्त हुए हैं, जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ हैं ॥ ५ १/२ ॥
अपि चात्र पुरागीतं कथयिष्यामि तेऽनघ ॥ ६ ॥
ऋषीणामुत्तमं धीमान् कृष्णद्वैपायनं शुकः ।
अभिवाद्याह्निककृतः शुचिः प्रयतमानसः ॥ ७ ॥

पितरं परिपप्रच्छ दृष्टलोकपरावरम् । को यज्ञः सर्वयज्ञानां वरिष्ठोऽभ्युपलक्ष्यते ॥ ८ ॥ निष्पाप नरेश! इस विषयमें मैं तुम्हें एक पुराना वृत्तान्त सुना रहा हूँ। एक समयकी बात है, परम बुद्धिमान् शुकदेवजीने नित्यकर्मका अनुष्ठान करके पवित्र एवं शुद्धचित्त होकर अपने पिता—ऋषियोंमें उत्तम श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासको, जो लोकके भूत और भविष्यको प्रत्यक्ष देखनेवाले हैं, प्रणाम करके पूछा—'पिताजी! सम्पूर्ण यज्ञोंमें कौन-सा यज्ञ सबसे श्रेष्ठ देखा जाता है? ।। ६–८ ।। किं च कृत्वा परं स्थानं प्राप्नुवन्ति मनीषिणः । केन देवाः पवित्रेण स्वर्गमश्नन्ति वा विभो ॥ ९ ॥ 'प्रभो! मनीषी पुरुष कौन-सा कर्म करके उत्तम स्थानको प्राप्त होते हैं तथा किस पवित्र कार्यके द्वारा देवता स्वर्गलोकका उपभोग करते हैं? ।। ९ ।। किं च यज्ञस्य यज्ञत्वं क्व च यज्ञः प्रतिष्ठितः । देवानामुत्तमं किं च किं च सत्रमितः परम् ॥ १० ॥ 'यज्ञका यज्ञत्व क्या है? यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है? देवताओंके लिये कौन-सी वस्तु उत्तम है? इससे श्रेष्ठ यज्ञ क्या है? ।। १० ।। पवित्राणां पवित्रं च यत् तद् ब्रूहि पितर्मम । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं व्यासः परमधर्मवित् । पुत्रायाकथयत् सर्वं तत्त्वेन भरतर्षभ ॥ ११ ॥ 'पिताजी! पवित्रोंमें पवित्र वस्तु क्या है? इन सारी बातोंका मुझसे वर्णन कीजिये।' भरतश्रेष्ठ! पुत्र शुकदेवका यह वचन सुनकर परम धर्मज्ञ व्यासने उससे सब बातें ठीक-ठीक बतायीं ।। ११ ।।

व्यास उवाच

गावः प्रतिष्ठा भूतानां तथा गावः परायणम् । गावः पुण्याः पवित्राश्च गोधनं पावनं तथा ॥ १२ ॥ व्यासजी बोले—बेटा! गौएँ सम्पूर्ण भूतोंकी प्रतिष्ठा हैं। गौएँ परम आश्रय हैं। गौएँ पुण्यमयी एवं पवित्र होती हैं तथा गोधन सबको पवित्र करनेवाला है ।। पूर्वमासन्नशृंगा वै गाव इत्यनुशुश्रुम । शृंगार्थे समुपासन्त ताः किल प्रभुमव्ययम् ॥ १३ ॥ हमने सुना है कि गौएँ पहले बिना सींगकी ही थीं। उन्होंने सींगके लिये अविनाशी भगवान् ब्रह्माकी उपासना की ।। १३ ।। ततो ब्रह्मा तु गाः प्रायमुपविष्टाः समीक्ष्य ह । ईप्सितं प्रददौ ताभ्यो गोभ्यः प्रत्येकशः प्रभुः ॥ १४ ॥

भगवान् ब्रह्माजीने गौओंको प्रायोपवेशन (आमरण उपवास) करते देख उन गौओंमेंसे प्रत्येकको उनकी अभीष्ट वस्तु दी ॥ १४ ॥ तासां शृंगाण्यजायन्त यस्या यादृङ्म‌नोगतम् । नानावर्णाः शृंगवन्त्यस्ता व्यरोचन्त पुत्रक ॥ १५ ॥ बेटा! वरदान मिलनेके पश्चात् गौओंके सींग प्रकट हो गये। जिसके मनमें जैसे सींगकी इच्छा थी, उसके वैसे ही हो गये। नाना प्रकारके रूप-रंग और सींगसे युक्त हुई उन गौओंकी बड़ी शोभा होने लगी ॥ ब्रह्मणा वरदत्तास्ता हव्यकव्यप्रदाः शुभाः । पुण्याः पवित्राः सुभगा दिव्यसंस्थानलक्षणाः ॥ १६ ॥ ब्रह्माजीका वरदान पाकर गौएँ मंगलमयी, हव्य-कव्य प्रदान करनेवाली, पुण्यजनक, पवित्र, सौभाग्यवती तथा दिव्य अंगों एवं लक्षणोंसे सम्पन्न हुईं ॥ १६ ॥ गावस्तेजो महद् दिव्यं गवां दानं प्रशस्यते । ये चैताः सम्प्रयच्छन्ति साधवो वीतमत्सराः ॥ १७ ॥ ते वै सुकृतिनः प्रोक्ताः सर्वदानप्रदाश्च ते । गवां लोकं तथा पुण्यमाप्नुवन्ति च तेऽनघ ॥ १८ ॥ गौएँ दिव्य एवं महान् तेज हैं। उनके दानकी प्रशंसा की जाती है। जो सत्पुरुष मात्सर्यका त्याग करके गौओंका दान करते हैं, वे पुण्यात्मा कहे गये हैं। वे सम्पूर्ण दानोंके दाता माने गये हैं। निष्पाप शुकदेव! उन्हें पुण्यमय गोलोककी प्राप्ति होती है ॥ १७-१८ ॥ यत्र वृक्षा मधुफला दिव्यपुष्पफलोपगाः । पुष्पाणि च सुगन्धीनि दिव्यानि द्विजसत्तम ॥ १९ ॥ द्विजश्रेष्ठ! गोलोकके सभी वृक्ष मधुर एवं सुस्वादु फल देनेवाले हैं। वे दिव्य फल-फूलोंसे सम्पन्न होते हैं। उन वृक्षोंके पुष्प दिव्य एवं मनोहर गन्धसे युक्त होते हैं ॥ १९ ॥ सर्वा मणिमयी भूमिः सर्वकाञ्चनवालुका । सर्वर्तुसुखसंस्पर्शा निष्पङ्का निरजाः शुभाः ॥ २० ॥ वहाँकी भूमि मणिमयी है। वहाँकी बालुका कांचनचूर्णरूप है। उस भूमिका स्पर्श सभी ऋतुओंमें सुखद होता है। वहाँ धूल और कीचड़का नाम भी नहीं है। वह भूमि सर्वथा मंगलमयी है ॥ २० ॥ रक्तोत्पलवनैश्चैव मणिखण्डैर्हिरण्मयैः । तरुणादित्यसंकाशैर्भान्ति तत्र जलाशयाः ॥ २१ ॥ वहाँके जलाशय लाल कमलवनोंसे तथा प्रातः-कालीन सूर्यके समान प्रकाशमान मणिजटित सुवर्णमय सोपानोंसे सुशोभित होते हैं ॥ २१ ॥ महार्हमणिपत्रैश्च काञ्चनप्रभकेसरैः । नीलोत्पलविमिश्रैश्च सरोभिर्बहुपङ्कजैः ॥ २२ ॥

वहाँकी भूमि कितने ही सरोवरोंसे शोभा पाती है। उन सरोवरोंमें नीलोत्पलमिश्रित बहुत-से कमल खिले रहते हैं। उन कमलोंके दल बहुमूल्य मणिमय होते हैं और उनके केसर अपनी स्वर्णमयी प्रभासे प्रकाशित होते हैं॥ २२॥ करवीरवनैः फुल्लैः सहस्रावर्तसंवृतैः। संतानकवनैः फुल्लैर्वृक्षैश्च समलंकृताः॥ २३॥ उस लोकमें बहुत-सी नदियाँ हैं, जिनके तटोंपर खिले हुए कनेरोंके वन तथा विकसितसंतानक (कल्पवृक्ष-विशेष) के वन एवं अन्यान्य वृक्ष उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वे वृक्ष और वन अपने मूल भागमें सहस्रों आवतोंसे घिरे हुए हैं॥ २३॥ निर्मलाभिश्च मुक्ताभिर्मणिभिश्च महाप्रभैः। उद्भूतपुलिनास्तत्र जातरूपैश्च निम्नगाः॥ २४॥ उन नदियोंके तटोंपर निर्मल मोती, अत्यन्त प्रकाशमान मणिरत्न तथा सुवर्ण प्रकट होते हैं॥ २४॥ सर्वरत्नमयैश्चित्रैरवगाढा द्रुमोत्तमैः। जातरूपमयैश्चान्यैर्हुताशनसमप्रभैः॥ २५॥ कितने ही उत्तम वृक्ष अपने मूलभागके द्वारा उन नदियोंके जलमें प्रविष्ट दिखायी देते हैं। वे सर्वरत्नमय विचित्र देखे जाते हैं। कितने ही सुवर्णमय होते हैं और दूसरे बहुत-से वृक्ष प्रज्ज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होते हैं॥ २५॥ सौवर्णा गिरयस्तत्र मणिरत्नशिलोच्चयाः। सर्वरत्नमयैर्भान्ति शृंगैश्चारुभिरुच्छ्रितैः॥ २६॥ वहाँ सोनेके पर्वत तथा मणि और रत्नोंके शैलसमूह हैं, जो अपने मनोहर, ऊँचे तथा सर्वरत्नमय शिखरोंसे सुशोभित होते हैं॥ २६॥ नित्यपुष्पफलास्तत्र नगाः पत्ररथाकुलाः। दिव्यगन्धरसैः पुष्पैः फलैश्च भरतर्षभ॥ २७॥ भरतश्रेष्ठ! वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फूल और फल लगे रहते हैं। वे वृक्ष पक्षियोंसे भरे होते हैं तथा उनके फूलों और फलोंमें दिव्य सुगन्ध और दिव्य रस होते हैं॥ रमन्ते पुण्यकर्माणस्तत्र नित्यं युधिष्ठिर। सर्वकामसमृद्धार्था निःशोका गतमन्यवः॥ २८॥ युधिष्ठिर! वहाँ पुण्यात्मा पुरुष ही सदा निवास करते हैं। गोलोकवासी शोक और क्रोधसे रहित, पूर्णकाम एवं सफलमनोरथ होते हैं॥ २८॥ विमानेषु विचित्रेषु रमणीयेषु भारत। मोदन्ते पुण्यकर्माणो विहरन्तो यशस्विनः॥ २९॥ भरतनन्दन! वहाँके यशस्वी एवं पुण्यकर्मा मनुष्य विचित्र एवं रमणीय विमानोंमें बैठकर यथेष्ट विहार करते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं॥ २९॥

उपक्रीडन्ति तान् राजन् शुभाश्चाप्सरसां गणाः । एताल्लोँकानवाप्नोति गां दत्त्वा वै युधिष्ठिर ॥ ३० ॥ राजन्! उनके साथ सुन्दरी अप्सराएँ क्रीड़ा करती हैं। युधिष्ठिर! गोदान करके मनुष्य इन्हीं लोकोंमें जाते हैं ॥ ३० ॥

येषामधिपतिः पूषा मारुतो बलवान् बली । ऐश्वर्ये वरुणो राजा नाममात्रं युगन्धराः ॥ ३१ ॥ सुरूपा बहुरूपाश्च विश्वरूपाश्च मातरः । प्राजापत्यमिति ब्रह्मन् जपेन्नित्यं यतव्रतः ॥ ३२ ॥ नरेन्द्र! शक्तिशाली सूर्य और बलवान् वायु जिन लोकोंके अधिपति हैं, एवं राजा वरुण जिन लोकोंके ऐश्वर्यपर प्रतिष्ठित हैं, मनुष्य गोदान करके उन्हीं लोकोंमें जाता है। गौएँ युगन्धरा, सुरूपा, बहुरूपा, विश्वरूपा तथा सबकी माताएँ हैं। शुकदेव! मनुष्य संयम-नियमके साथ रहकर गौओंके इन प्रजापतिकथित नामोंका प्रतिदिन जप करे ॥ ३१-३२ ॥

गाश्च शुश्रूषते यश्च समन्वेति च सर्वशः । तस्मै तुष्टाः प्रयच्छन्ति वरानपि सुदुर्लभान् ॥ ३३ ॥ जो पुरुष गौओंकी सेवा और सब प्रकारसे उनका अनुगमन करता है, उसपर संतुष्ट होकर गौएँ उसे अत्यन्त दुर्लभ वर प्रदान करती हैं ॥ ३३ ॥

द्रुह्येन्न मनसा वापि गोषु नित्यं सुखप्रदः । अर्चयेत सदा चैव नमस्कारैश्च पूजयेत् ॥ ३४ ॥ गौओंके साथ मनसे भी कभी द्रोह न करे, उन्हें सदा सुख पहुँचाये, उनका यथोचित सत्कार करे और नमस्कार आदिके द्वारा उनका पूजन करता रहे ॥ ३४ ॥

दान्तः प्रीतमना नित्यं गवां व्युष्टिं तथाश्नुते । त्र्यहमुष्णं पिबेन्मूत्रं त्र्यहमुष्णं पिबेत् पयः ॥ ३५ ॥ जो मनुष्य जितेन्द्रिय और प्रसन्नचित्त होकर नित्य गौओंकी सेवा करता है, वह समृद्धिका भागी होता है। मनुष्य तीन दिनोंतक गरम गोमूत्र पीकर रहे, फिर तीन दिनतक गरम गोदुग्ध पीकर रहे ॥ ३५ ॥

गवामुष्णं पयः पीत्वा त्र्यहमुष्णं घृतं पिबेत् । त्र्यहमुष्णं घृतं पीत्वा वायुभक्षो भवेत् त्र्यहम् ॥ ३६ ॥ गरम गोदुग्ध पीनेके पश्चात् तीन दिनोंतक गरम-गरम गोघृत पीये। तीन दिनतक गरम घी पीकर फिर तीन दिनोंतक वह वायु पीकर रहे ॥ ३६ ॥

येन देवाः पवित्रेण भुञ्जते लोकमुत्तमम् । यत् पवित्रं पवित्राणां तद् घृतं शिरसा वहेत् ॥ ३७ ॥ देवगण भी जिस पवित्र घृतके प्रभावसे उत्तम-उत्तम लोकका पालन करते हैं तथा जो पवित्र वस्तुओंमें सबसे बढ़कर पवित्र है, उससे घृतको शिरोधार्य करे ॥ ३७ ॥

घृतेन जुहुयादग्निं घृतेन स्वस्ति वाचयेत् । घृतं प्राशेद् घृतं दद्याद् गवां पुष्टिं तथाश्रुते ॥ ३८ ॥ गायके घीके द्वारा अग्निमें आहुति दे। घृतकी दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराये। घृत भोजन करे तथा गोघृतका ही दान करे। ऐसा करनेसे मनुष्य गौओंकी समृद्धि एवं अपनी पुष्टिका अनुभव करता है ॥ ३८ ॥

निर्हृतैश्च यवैर्गोभिर्मासं प्रश्रितयावकः । ब्रह्महत्यासमं पापं सर्वमेतेन शुध्यते ॥ ३९ ॥ गौओंके गोबरसे निकाले हुए जौकी लप्सीका एक मासतक भक्षण करे। इससे मनुष्य ब्रह्महत्या-जैसे पापसे भी छुटकारा पा जाता है ॥ ३९ ॥

पराभवाच्च दैत्यानां देवैः शौचमिदं कृतम् । ते देवत्वमपि प्राप्ताः संसिद्धाश्च महाबलाः ॥ ४० ॥ जब दैत्योंने देवताओंको पराजित कर दिया, तब देवताओंने इसी प्रायश्चित्तका अनुष्ठान किया। इससे उन्हें पुनः (नष्ट हुए) देवत्वकी प्राप्ति हुई तथा वे महाबलवान् और परम सिद्ध हो गये ॥ ४० ॥

गावः पवित्राः पुण्याश्च पावनं परमं महत् । ताश्च दत्त्वा द्विजातिभ्यो नरः स्वर्गमुपाश्नुते ॥ ४१ ॥ गौएँ परम पावन, पवित्र और पुण्यस्वरूपा हैं। वे महान् देवता हैं। उन्हें ब्राह्मणोंको देकर मनुष्य स्वर्गका सुख भोगता है ॥ ४१ ॥

गवां मध्ये शुचिर्भूत्वा गोमतीं मनसा जपेत् । पुताभिरद्भिराचम्य शुचिर्भवति निर्मलः ॥ ४२ ॥ पवित्र जलसे आचमन करके पवित्र होकर गौओंके बीचमें गोमतीमन्त्र (गोमाँ अग्नेविमाँ अश्वि इत्यादि) का मन-ही-मन जप करे। ऐसा करनेसे वह अत्यन्त शुद्ध एवं निर्मल (पापमुक्त) हो जाता है ॥ ४२ ॥

अग्निमध्ये गवां मध्ये ब्राह्मणानां च संसदि । विद्यावेदव्रतस्नाता ब्राह्मणाः पुण्यकर्मिणः ॥ ४३ ॥ अध्यापयेरन् शिष्यान् वै गोमतीं यज्ञसम्मिताम् । त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा गोमतीं लभते वरम् ॥ ४४ ॥ विद्या और वेदव्रतमें निष्णात पुण्यात्मा ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे अग्नियों और गौओंके बीचमें तथा ब्राह्मणोंकी सभामें शिष्योंको यज्ञतुल्य गोमतीविद्याकी शिक्षा दें। जो तीन राततक उपवास करके गोमती-मन्त्रका जप करता है, उसे गौओंका वरदान प्राप्त होता है ॥ ४३-४४ ॥

पुत्रकामश्च लभते पुत्रं धनमथापि वा । पतिकामा च भर्तारं सर्वकामांश्च मानवः ।

गावस्तुष्टाः प्रयच्छन्ति सेविता वै न संशयः ॥ ४५ ॥ पुत्रकी इच्छावाला पुत्र और धन चाहनेवाला धन पाता है। पतिकी इच्छा रखनेवाली स्त्रीको मनके अनुकूल पति मिलता है। सारांश यह है कि गौओंकी आराधना करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। गौएँ मनुष्योंद्वारा सेवित और संतुष्ट होकर उन्हें सब कुछ देती हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ४५ ॥

एवमेता महाभागा यज्ञियाः सर्वकामदाः । रोहिण्य इति जानीहि नैताभ्यो विद्यते परम् ॥ ४६ ॥ इस प्रकार ये महाभाग्यशालिनी गौएँ यज्ञका प्रधान अंग हैं और सबको सम्पूर्ण कामनाएँ देनेवाली हैं। तुम इन्हें रोहिणी समझो। इनसे बढ़कर दूसरा कुछ नहीं है ॥ ४६ ॥

इत्युक्तः स महातेजाः शुकः पित्रा महात्मना । पूजयामास गां नित्यं तस्मात् त्वमपि पूजय ॥ ४७ ॥ युधिष्ठिर! अपने महात्मा पिता व्यासजीके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी शुकदेवजी प्रतिदिन गौकी सेवा-पूजा करने लगे; इसलिये तुम भी गौओंकी सेवा-पूजा करो ॥ ४७ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके एकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८१ ॥

लक्ष्मी और गौओंका संवाद तथा लक्ष्मीकी प्रार्थनापर गौओंके द्वारा गोबर और गोमूत्रमें लक्ष्मीको निवासके लिये स्थान दिया जाना

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द्व्यशीतितमोऽध्यायः

लक्ष्मी और गौओंका संवाद तथा लक्ष्मीकी प्रार्थनापर गौओंके द्वारा गोबर और गोमूत्रमें लक्ष्मीको निवासके लिये स्थान दिया जाना

युधिष्ठिर उवाच

मया गवां पुरीषं वै श्रिया जुष्टमिति श्रुतम् ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं संशयोऽत्र पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— पितामह! मैंने सुना है कि गौओंके गोबरमें लक्ष्मीका निवास है; किंतु इस विषयमें मुझे संदेह है; अतः इसके सम्बन्धमें मैं यथार्थ बात सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गोभिर्नृपेह संवादं श्रिया भरतसत्तम ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! इस विषयमें विज्ञ पुरुष गौ और लक्ष्मीके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
श्रीः कृत्वेह वपुः कान्तं गोमध्येषु विवेश ह ।
गावोऽथ विस्मितास्तस्या दृष्ट्वा रूपस्य सम्पदम् ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, लक्ष्मीने मनोहर रूप धारण करके गौओंके झुंडमें प्रवेश किया। उनके रूप-वैभवको देखकर गौएँ आश्चर्यचकित हो उठीं ॥ ३ ॥

गाव ऊचुः

कासि देवि कुतो वा त्वं रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
विस्मिताः स्म महाभागे तव रूपस्य सम्पदा ॥ ४ ॥
गौओंने पूछा— देवि! तुम कौन हो और कहाँसे आयी हो? इस पृथ्वीपर तुम्हारे रूपकी कहीं तुलना नहीं है। महाभागे! तुम्हारी इस रूप-सम्पत्तिसे हमलोग बड़े आश्चर्यमें पड़ गये हैं ॥ ४ ॥
इच्छाम त्वां वयं ज्ञातुं का त्वं क्व च गमिष्यसि ।
तत्त्वेन वरवर्णाभे सर्वमेतद् ब्रवीहि नः ॥ ५ ॥
इसलिये हम तुम्हारा परिचय जानना चाहती हैं। तुम कौन हो और कहाँ जाओगी? वरवर्णिनि! ये सारी बातें हमें ठीक-ठीक बताओ ॥ ५ ॥

श्रीरुवाच

लोककान्तास्मि भद्रं वः श्रीर्नामाहं परिश्रुता ।
मया दैत्याः परित्यक्ता विनष्टाः शाश्वतीः समाः ॥ ६ ॥
**लक्ष्मी बोलीं—**गौओ! तुम्हारा कल्याण हो। मैं इस जगत्में लक्ष्मी नामसे प्रसिद्ध हूँ। सारा जगत् मेरी कामना करता है। मैंने दैत्योंको छोड़ दिया, इसलिये वे सदाके लिये नष्ट हो गये हैं ॥ ६ ॥
मयाभिपन्ना देवाश्च मोदन्ते शाश्वतीः समाः ।
इन्द्रो विवस्वान् सोमश्च विष्णुरापोऽग्निरेव च ॥ ७ ॥
मेरे ही आश्रयमें रहनेके कारण इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, विष्णु, जलके अधिष्ठाता देवता वरुण और अग्नि आदि देवता सदा आनन्द भोग रहे हैं ॥ ७ ॥
मयाभिपन्नाः सिध्यन्ते ऋषयो देवतास्तथा ।
यान् नाविशाम्यहं गावस्ते विनश्यन्ति सर्वशः ॥ ८ ॥
देवताओं तथा ऋषियोंको मुझसे अनुगृहीत होनेपर ही सिद्धि मिलती है। गौओ! जिनके शरीरमें मैं प्रवेश नहीं करती, वे सर्वथा नष्ट हो जाते हैं ॥ ८ ॥
धर्मश्चार्थश्च कामश्च मया जुष्टाः सुखान्विताः ।
एवंप्रभावं मां गावो विजानीत सुखप्रदाः ॥ ९ ॥
धर्म, अर्थ और काम मेरा सहयोग पाकर ही सुखद होते हैं; अतः सुखदायिनी गौओ! मुझे ऐसे ही प्रभावसे सम्पन्न समझो ॥ ९ ॥
इच्छामि चापि युष्मासु वस्तुं सर्वासु नित्यदा ।
आगत्य प्रार्थये युष्मान् श्रीजुष्टा भवताथ वै ॥ १० ॥
मैं तुम सब लोगोंके भीतर भी सदा निवास करना चाहती हूँ और इसके लिये स्वयं ही तुम्हारे पास आकर प्रार्थना करती हूँ। तुमलोग मेरा आश्रय पाकर श्रीसम्पन्न हो जाओ ॥ १० ॥

गाव ऊचुः

अध्रुवा चपला च त्वं सामान्या बहुभिः सह ।
न त्वामिच्छाम भद्रं ते गम्यतां यत्र रंस्यसे ॥ ११ ॥
**गौओंने कहा—**देवि! तुम चंचला हो। कहीं भी स्थिर होकर नहीं रहती। इसके सिवा तुम्हारा बहुतोंके साथ एक-सा सम्बन्ध है; इसलिये हम तुम्हें नहीं चाहतीं। तुम्हारा कल्याण हो। तुम जहाँ आनन्दपूर्वक रह सको, जाओ ॥ ११ ॥
वपुष्मन्त्यो वयं सर्वाः किमस्माकं त्वयाद्य वै ।
यथेष्टं गम्यतां तत्र कृतकार्या वयं त्वया ॥ १२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 709)

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हमारा शरीर तो यों ही हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर है। हमें तुमसे क्या काम? तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चली जाओ। तुमने दर्शन दिया, इतनेहीसे हम कृतार्थ हो गयीं ॥ १२ ॥

भगवती लक्ष्मीकी गौओंसे आश्रयके लिये प्रार्थना

श्रीरुवाच

किमेतद् वः क्षमं गावो यन्मां नेहाभिनन्दथ ।
न मां सम्प्रति गृह्णीध्वं कस्माद् वै दुर्लभां सतीम् ॥ १३ ॥
**लक्ष्मीजीने कहा—**गौओ! यह क्या बात है? क्या यही तुम्हारे लिये उचित है कि तुम मेरा अभिनन्दन नहीं करती? मैं सती-साध्वी हूँ, दुर्लभ हूँ। फिर भी इस समय तुम मुझे स्वीकार क्यों नहीं करती? ॥ १३ ॥

सत्यं च लोकवादोऽयं लोके चरति सुव्रताः ।
स्वयं प्राप्ते परिभवो भवतीति विनिश्चयः ॥ १४ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाली गौओ! लोकमें जो यह प्रवाद चल रहा है कि 'बिना बुलाये स्वयं किसीके यहाँ जानेपर निश्चय ही अनादर होता है।' यह ठीक ही जान पड़ता है ॥ १४ ॥

महदुग्रं तपः कृत्वा मां निषेवन्ति मानवाः । देवदानवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः ॥ १५ ॥ देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस और मनुष्य बड़ी उग्र तपस्या करके मेरी सेवाका सौभाग्य प्राप्त करते हैं ॥ १५ ॥

प्रभाव एष वो गावः प्रतिगृह्णीत मामिह । नावमन्या ह्यहं सौम्यास्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ १६ ॥ सौम्य स्वभाववाली गौओ! यह तुम्हारा प्रभाव है कि मैं स्वयं तुम्हारे पास आयी हूँ। अतः तुम मुझे यहाँ ग्रहण करो। चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीमें कहीं भी मैं अपमान पानेके योग्य नहीं हूँ ॥ १६ ॥

गाव ऊचुः

नावमन्यामहे देवि न त्वां परिभवामहे । अध्रुवा चलचित्तासि ततस्त्वां वर्जयामहे ॥ १७ ॥ गौओंने कहा— देवि! हम तुम्हारा अपमान या अनादर नहीं करतीं। केवल तुम्हारा त्याग कर रही हैं। वह भी इसलिये कि तुम्हारा चित्त चंचल है। तुम कहीं भी स्थिर होकर नहीं रहती ॥ १७ ॥

बहुना च किमुक्तेन गम्यतां यत्र वाञ्छसि । वपुष्मन्त्यो वयं सर्वाः किमस्माकं त्वयानघे ॥ १८ ॥ इस विषयमें बहुत बात करनेसे क्या लाभ? तुम जहाँ जाना चाहो—चली जाओ। अनघे! हम सब लोगोंका शरीर तो यों ही हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर है; अतः तुमसे हमें क्या काम है? ॥ १८ ॥

श्रीरुवाच

अवज्ञाता भविष्यामि सर्वलोकस्य मानदाः । प्रत्याख्यानेन युष्माकं प्रसादः क्रियतां मम ॥ १९ ॥ लक्ष्मीने कहा— दूसरोंको सम्मान देनेवाली गौओ! तुम्हारे त्याग देनेसे मैं सम्पूर्ण जगत्के लिये अवहेलित और उपेक्षित हो जाऊँगी, इसलिये मुझपर कृपा करो ॥ १९ ॥

महाभागा भवत्यो वै शरण्याः शरणागताम् । परित्रायन्तु मां नित्यं भजमानामनिन्दिताम् ॥ २० ॥ तुम महान् सौभाग्यशालिनी और सबको शरण देनेवाली हो। मैं भी तुम्हारी शरणमें आयी हूँ। तुम्हारी भक्त हूँ। मुझमें कोई दोष भी नहीं है; अतः तुम मेरी रक्षा करो—मुझे अपना लो ॥ २० ॥

माननामहमिच्छामि भवत्यः सततं शिवाः । अप्येकांगेष्वधो वस्तुमिच्छामि च सुकुत्सिते ॥ २१ ॥

गौओ! मैं तुमसे सम्मान चाहती हूँ। तुम सदा सबका कल्याण करनेवाली हो। तुम्हारे किसी एक अंगमें, नीचेके कुत्सित अंगमें भी यदि स्थान मिल जाय तो मैं उसमें रहना चाहती हूँ ॥ २१ ॥
न वोऽस्ति कुत्सितं किंचिदंगेष्वालक्ष्यतेऽनघाः।
पुण्याः पवित्राः सुभगा ममादेशं प्रयच्छथ ॥ २२ ॥
वसेयं यत्र वो देहे तन्मे व्याख्यातुमर्हथ।
निष्पाप गौओ! वास्तवमें तुम्हारे अंगोंमें कहीं कोई कुत्सित स्थान नहीं दिखायी देता। तुम परम पुण्यमयी, पवित्र और सौभाग्यशालिनी हो। अतः मुझे आज्ञा दो। तुम्हारे शरीरमें जहाँ मैं रह सकूँ, उसके लिये मुझे स्पष्ट बताओ ॥ २२ ½ ॥
एवमुक्तास्ततो गावः शुभाः करुणवत्सलाः।
सम्मन्त्र्य सहिताः सर्वाः श्रियमूचुर्नराधिप ॥ २३ ॥
नरेश्वर! लक्ष्मीके ऐसा कहनेपर करुणा और वात्सल्यकी मूर्ति शुभस्वरूपा गौओंने एक साथ मिलकर सलाह की; फिर सबने लक्ष्मीसे कहा— ॥ २३ ॥
अवश्यं मानना कार्या तवास्माभिर्यशस्विनि।
शकृन्मूत्रे निवस त्वं पुण्यमेतद्धि नः शुभे ॥ २४ ॥
‘शुभे! यशस्विनि! अवश्य ही हमें तुम्हारा सम्मान करना चाहिये। तुम हमारे गोबर और मूत्रमें निवास करो; क्योंकि हमारी ये दोनों वस्तुएँ परम पवित्र हैं’ ॥ २४ ॥

श्रीरुवाच
दिष्ट्या प्रसादो युष्माभिः कृतो मेऽनुग्रहात्मकः।
एवं भवतु भद्रं वः पूजितास्मि सुखप्रदाः ॥ २५ ॥
लक्ष्मीने कहा—सुखदायिनी गौओ! धन्यभाग्य जो तुमलोगोंने मुझपर अपना कृपापूर्ण प्रसाद प्रकट किया। ऐसा ही होगा—मैं तुम्हारे गोबर और मूत्रमें ही निवास करूँगी। तुमने मेरा मान रख लिया, अतः तुम्हारा कल्याण हो ॥ २५ ॥
एवं कृत्वा तु समयं श्रीर्गोभिः सह भारत।
पश्यन्तीनां ततस्तासां तत्रैवान्तरधीयत ॥ २६ ॥
भरतनन्दन! इस प्रकार गौओंके साथ प्रतिज्ञा करके लक्ष्मीजी उनके देखते-देखते वहाँसे अन्तर्धान हो गयीं ॥ २६ ॥
एवं गोशकृतः पुत्र माहात्म्यं तेऽनुवर्णितम्।
माहात्म्यं च गवां भूयः श्रूयतां गदतो मम ॥ २७ ॥
बेटा! इस तरह मैंने तुमसे गोबरका माहात्म्य बतलाया है। अब पुनः गौओंका माहात्म्य बतला रहा हूँ, सुनो ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्रीगोसंवादो नाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लक्ष्मी और गौओंका संवादात्मक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥