महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 713)
त्र्यशीतितमोऽध्यायः
ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गौओंका उत्कर्ष बताना और गौओंको वरदान देना
भीष्म उवाच
ये च गां सम्प्रयच्छन्ति हुतशिष्टाशिनश्च ये ।
तेषां सत्राणि यज्ञाश्च नित्यमेव युधिष्ठिर ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! जो मनुष्य सदा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन और गोदान करते हैं उन्हें प्रतिदिन अन्नदान और यज्ञ करनेका फल मिलता है ॥ १ ॥
ऋते दधि घृतेनेह न यज्ञः सम्प्रवर्तते ।
तेन यज्ञस्य यज्ञत्वमतो मूलं च कथ्यते ॥ २ ॥
दही और गोघृतके बिना यज्ञ नहीं होता। उन्हींसे यज्ञका यज्ञत्व सफल होता है। अतः गौओंको यज्ञका मूल कहते हैं ॥ २ ॥
दानानामपि सर्वेषां गवां दानं प्रशस्यते ।
गावः श्रेष्ठाः पवित्राश्च पावनं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३ ॥
सब प्रकारके दानोंमें गोदान ही उत्तम माना जाता है; इसलिये गौएँ श्रेष्ठ, पवित्र तथा परम पावन हैं ॥ ३ ॥
पुष्ट्यर्थमेताः सेवेत शान्त्यर्थमपि चैव ह ।
पयोदधिघृतं चासां सर्वपापप्रमोचनम् ॥ ४ ॥
मनुष्यको अपने शरीरकी पुष्टि तथा सब प्रकारके विघ्नोंकी शान्तिके लिये भी गौओंका सेवन करना चाहिये। इनके दूध, दही और घी सब पापोंसे छुड़ानेवाले हैं ॥ ४ ॥
गावस्तेजः परं प्रोक्तमिह लोके परत्र च ।
न गोभ्यः परमं किंचित् पवित्रं भरतर्षभ ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! गौएँ इहलोक और परलोकमें भी महान् तेजोरूप मानी गयी हैं। गौओंसे बढ़कर पवित्र कोई वस्तु नहीं है ॥ ५ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
पितामहस्य संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥ ६ ॥
युधिष्ठिर! इस विषयमें विद्वान् पुरुष इन्द्र और ब्रह्माजीके इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ६ ॥
पराभूतेषु दैत्येषु शक्रस्त्रिभुवनेश्वरः ।
प्रजाः समुदिताः सर्वाः सत्यधर्मपरायणाः ॥ ७ ॥
पूर्वकालमें देवताओंद्वारा दैत्योंके परास्त हो जानेपर जब इन्द्र तीनों लोकोंके अधीश्वर हुए तब समस्त प्रजा मिलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ सत्य और धर्ममें तत्पर रहने लगी ॥ ७ ॥
अथर्षयः सगन्धर्वाः किन्नरोरगराक्षसाः ।
देवासुरसुपर्णाश्च प्रजानां पतयस्तथा ॥ ८ ॥
पर्युपासन्त कौन्तेय कदाचिद् वै पितामहम् ।
नारदः पर्वतश्चैव विश्वावसुर्हहाहूहूः ॥ ९ ॥
दिव्यतानेषु गायन्तः पर्युपासन्त तं प्रभुम् ।
तत्र दिव्यानि पुष्पाणि प्रावहत् पवनस्तदा ॥ १० ॥
आजहुर्ऋतवश्चापि सुगन्धीनि पृथक् पृथक् ।
तस्मिन् देवसमावाये सर्वभूतसमागमे ॥ ११ ॥
दिव्यवादित्रसंघुष्टे दिव्यस्त्रीचारणावृते ।
इन्द्रः पप्रच्छ देवेशमभिवाद्य प्रणम्य च ॥ १२ ॥
कुन्तीनन्दन! तदनन्तर एक दिन जब ऋषि, गन्धर्व, किन्नर, नाग, राक्षस, देवता, असुर, गरुड़ और प्रजापतिगण ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित थे, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा और हूहू नामक गन्धर्व जब दिव्य तान छेड़कर गाते हुए वहाँ उन भगवान् ब्रह्माजीकी उपासना करते थे, वायुदेव दिव्य पुष्पोंकी सुगन्ध लेकर बह रहे थे, पृथक्-पृथक् ऋतुएँ भी उत्तम सौरभसे युक्त दिव्य पुष्प भेंट कर रही थीं, देवताओंका समाज जुटा था, समस्त प्राणियोंका समागम हो रहा था, दिव्य वाद्योंकी मनोरम ध्वनि गूँज रही थी तथा दिव्यांगनाओं और चारणोंसे वह समुदाय घिरा हुआ था, उसी समय देवराज इन्द्रने देवेश्वर ब्रह्माजीको प्रणाम करके पूछा— ॥ ८—१२ ॥
देवानां भगवन् कस्माल्लोकेशानां पितामह ।
उपरिष्टाद् गवां लोक एतदिच्छामि वेदितुम् ॥ १३ ॥
'भगवन्! पितामह! गोलोक समस्त देवताओं और लोकपालोंके ऊपर क्यों है? मैं इसे जानना चाहता हूँ ॥
किं तपो ब्रह्मचर्यं वा गोभिः कृतमिहेश्वर ।
देवानामुपरिष्टाद् यद् वसन्त्यरजसः सुखम् ॥ १४ ॥
'प्रभो! गौओंने यहाँ किस तपस्याका अनुष्ठान अथवा ब्रह्मचर्यका पालन किया है, जिससे वे रजोगुणसे रहित होकर देवताओंसे भी ऊपर स्थानमें सुखपूर्वक निवास करती हैं?' ॥ १४ ॥
ततः प्रोवाच ब्रह्मा तं शक्रं बलनिषूदनम् ।
अवज्ञातास्त्वया नित्यं गावो बलनिषूदन ॥ १५ ॥
तेन त्वमासां माहात्म्यं वेत्सि शृणु यत् प्रभो ।
गवां प्रभावं परमं माहात्म्यं च सुरर्षभ ॥ १६ ॥
तब ब्रह्माजीने बलसूदन इन्द्रसे कहा—'बलासुरका विनाश करनेवाले देवेन्द्र! तुमने सदा गौओंकी अवहेलना की है। प्रभो! इसीलिये तुम इनका माहात्म्य नहीं जानते। सुरश्रेष्ठ! गौओंका महान् प्रभाव और माहात्म्य मैं बताता हूँ, सुनो ॥ १५-१६ ॥
यज्ञांगं कथिता गावो यज्ञ एव च वासव ।
एताभिश्च विना यज्ञो न वर्तेत कथंचन ॥ १७ ॥
‘वासव! गौओंको यज्ञका अंग और साक्षात् यज्ञरूप बतलाया गया है; क्योंकि इनके दूध, दही और घीके बिना यज्ञ किसी तरह सम्पन्न नहीं हो सकता ॥ १७ ॥
धारयन्ति प्रजाश्चैव पयसा हविषा तथा ।
एतासां तनयाश्चापि कृषियोगमुपासते ॥ १८ ॥
जनयन्ति च धान्यानि बीजानि विविधानि च ।
‘ये अपने दूध-घीसे प्रजाका भी पालन-पोषण करती हैं। इनके पुत्र (बैल) खेतीके काम आते तथा नाना प्रकारके धान्य एवं बीज उत्पन्न करते हैं ॥ १८ १/२ ॥
ततो यज्ञाः प्रवर्तन्ते हव्यं कव्यं च सर्वशः ॥ १९ ॥
पयोदधिघृतं चैव पुण्याश्चैताः सुराधिप ।
वहन्ति विविधान् भारान् क्षुत्तृष्णापरिपीडिताः ॥ २० ॥
‘उन्हींसे यज्ञ सम्पन्न होते और हव्य-कव्यका भी सर्वथा निर्वाह होता है। सुरेश्वर! इन्हीं गौओंसे दूध, दही और घी प्राप्त होते हैं। ये गौएँ बड़ी पवित्र होती हैं। बैल भूख-प्याससे पीड़ित होकर भी नाना प्रकारके बोझ ढोते रहते हैं ॥ १९-२० ॥
मुनींश्च धारयन्तीह प्रजाश्चैवापि कर्मणा ।
वासवाकूटवाहिन्यः कर्मणा सुकृतेन च ॥ २१ ॥
‘इस प्रकार गौएँ अपने कर्मसे ऋषियों तथा प्रजाओंका पालन करती रहती हैं। वासव! इनके व्यवहारमें माया नहीं होती। ये सदा सत्कर्ममें ही लगी रहती हैं ॥ २१ ॥
उपरिष्टात् ततोऽस्माकं वसन्त्येताः सदैव हि ।
एवं ते कारणं शक्र निवासकृतमद्य वै ॥ २२ ॥
गवां देवोपरिष्टाद्धि समाख्यातं शतक्रतो ।
एता हि वरदत्ताश्च वरदाश्चापि वासव ॥ २३ ॥
‘इसीसे ये गौएँ हम सब लोगोंके ऊपर स्थानमें निवास करती हैं। शक्र! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने यह बात बतायी कि गौएँ देवताओंके भी ऊपर स्थानमें क्यों निवास करती हैं। शतक्रतु इन्द्र! इसके सिवा ये गौएँ वरदान भी प्राप्त कर चुकी हैं और प्रसन्न होनेपर दूसरोंको वर देनेकी भी शक्ति रखती हैं ॥ २२-२३ ॥
सुरभ्यः पुण्यकर्मिण्यः पावनाः शुभलक्षणाः ।
यदर्थं गां गताश्चैव सुरभ्यः सुरसत्तम ॥ २४ ॥
तच्च मे शृणु कात्स्न्येन वदतो बलसूदन । ‘सुरभी गौएँ पुण्यकर्म करनेवाली और शुभ-लक्षणा होती हैं। सुरश्रेष्ठ! बलसूदन! वे जिस उद्देश्यसे पृथ्वीपर गयी हैं, उसको भी मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ, सुनो ।। २४½ ।।
पुरा देवयुगे तात देवेन्द्रेषु महात्मसु ।। २५ ।। त्रींल्लोकाननुशासत्सु विष्णौ गर्भत्वमागते । अदित्यास्तप्यमानायास्तपो घोरं सुदुश्चरम् ।। २६ ।। पुत्रार्थममरश्रेष्ठ पादेनैकेन नित्यदा । तां तु दृष्ट्वा महादेवीं तप्यमानां महत्तपः ।। २७ ।। दक्षस्य दुहिता देवी सुरभी नाम नामतः । अतप्यत तपो घोरं हृष्टा धर्मपरायणा ।। २८ ।। ‘तात! पहले सत्ययुगमें जब महामना देवेश्वरगण तीनों लोकोंपर शासन करते थे और अमरश्रेष्ठ! जब देवी अदिति पुत्रके लिये नित्य एक पैरसे खड़ी रहकर अत्यन्त घोर एवं दुष्कर तपस्या करती थी और उस तपस्यासे संतुष्ट होकर साक्षात् भगवान् विष्णु ही उनके गर्भमें पदार्पण करनेवाले थे उन्हीं दिनोंकी बात है, महादेवी अदितिको महान् तप करती देख दक्षकी धर्मपरायणा पुत्री सुरभी देवीने बड़े हर्षके साथ घोर तपस्या आरम्भ की ।। २५—२८ ।।
कैलासशिखरे रम्ये देवगन्धर्वसेविते । व्यतिष्ठदेकपादेन परमं योगमास्थिता ।। २९ ।। दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । संतप्तास्तपसा तस्या देवाः सर्षिमहोरगाः ।। ३० ।। ‘कैलासके रमणीय शिखरपर जहाँ देवता और गन्धर्व सदा विराजते रहते हैं, वहाँ वह उत्तम योगका आश्रय ले ग्यारह हजार वर्षोंतक एक पैरसे खड़ी रही। उसकी तपस्यासे देवता, ऋषि और बड़े-बड़े नाग भी संतप्त हो उठे ।। २९-३० ।।
तत्र गत्वा मया सार्धं पर्युपासन्त तां शुभाम् । अथाहमब्रुवं तत्र देवीं तां तपसान्विताम् ।। ३१ ।। ‘वे सब लोग मेरे साथ ही उस शुभलक्षणा तपस्विनी सुरभी देवीके पास जाकर खड़े हुए। तब मैंने वहाँ उससे कहा— ।। ३१ ।।
किमर्थं तप्यसे देवि तपो घोरमनिन्दिते । प्रीतस्तेऽहं महाभागे तपसानेन शोभने ।। ३२ ।। वरयस्व वरं देवि दातास्मीति पुरंदर ।। ३३ ।। ‘सती-साध्वी देवी! तुम किसलिये यह घोर तपस्या करती हो? शोभने! महाभागे! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ। देवि! तुम इच्छानुसार वर माँगो।” पुरंदर! इस तरह मैंने सुरभीको वर माँगनेके लिये प्रेरित किया ।। ३२-३३ ।।
सुरभ्युवाच
वरेण भगवन् मह्यं कृतं लोकपितामह ।
एष एव वरो मेऽद्य यत् प्रीतोऽसि ममानघ ॥ ३४ ॥
**सुरभीने कहा—**भगवन्! निष्पाप लोकपितामह! मुझे वर लेनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। मेरे लिये तो सबसे बड़ा वर यही है कि आज आप मुझपर प्रसन्न हो गये हैं॥ ३४ ॥
ब्रह्मोवाच
तामेवं ब्रुवतीं देवीं सुरभिं त्रिदशेश्वर ।
प्रत्यब्रुवं यद् देवेन्द्र तन्निबोध शचीपते ॥ ३५ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**देवेश्वर! देवेन्द्र! शचीपते! जब सुरभी ऐसी बात कहने लगी तब मैंने उसे जो उत्तर दिया, वह सुनो ॥ ३५ ॥
अलोभकाम्यया देवि तपसा च शुभानने ।
प्रसन्नोऽहं वरं तस्मादमरत्वं ददामि ते ॥ ३६ ॥
(मैंने कहा—) देवि! शुभानने! तुमने लोभ और कामनाको त्याग दिया है। तुम्हारी इस निष्काम तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ; अतः तुम्हें अमरत्वका वरदान देता हूँ ॥ ३६ ॥
त्रयाणामपि लोकानामुपरिष्टान्निवत्स्यसि ।
मत्प्रसादाच्च विख्यातो गोलोकः सम्भविष्यति ॥ ३७ ॥
तुम मेरी कृपासे तीनों लोकोंके ऊपर निवास करोगी और तुम्हारा वह धाम ‘गोलोक’ नामसे विख्यात होगा ॥ ३७ ॥
मानुषेषु च कुर्वाणाः प्रजाः कर्म शुभास्तव ।
निवत्स्यन्ति महाभागे सर्वा दुहितरश्च ते ॥ ३८ ॥
महाभागे! तुम्हारी सभी शुभ संतानें—समस्त पुत्र और कन्याएँ मानवलोकमें उपयुक्त कर्म करती हुई निवास करेंगी ॥ ३८ ॥
मनसा चिन्तिता भोगास्त्वया वै दिव्यमानुषाः ।
यच्च स्वर्गे सुखं देवि तत् ते सम्पत्स्यते शुभे ॥ ३९ ॥
देवि! शुभे! तुम अपने मनसे जिन दिव्य अथवा मानवी भोगोंका चिन्तन करोगी तथा जो स्वर्गीय सुख होगा, वे सभी तुम्हें स्वतः प्राप्त होते रहेंगे ॥ ३९ ॥
तस्या लोकाः सहस्राक्ष सर्वकामसमन्विताः ।
न तत्र क्रमते मृत्युर्न जरा न च पावकः ॥ ४० ॥
सहस्राक्ष! सुरभीके निवासभूत गोलोकमें सबकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण होती हैं। वहाँ मृत्यु और बुढ़ापाका आक्रमण नहीं होता है। अग्निका भी जोर नहीं चलता ॥ ४० ॥
न दैवं नाशुभं किंचिद् विद्यते तत्र वासव ।
तत्र दिव्यान्तरण्यानि दिव्यानि भवनानि च ॥ ४१ ॥
विमानानि सुयुक्तानि कामगानि च वासव ।
वासव! वहाँ न कोई दुर्भाग्य है और न अशुभ। वहाँ दिव्य वन, दिव्य भवन तथा परम सुन्दर एवं इच्छानुसार विचरनेवाले विमान मौजूद हैं ॥ ४१ १/२ ॥
ब्रह्मचर्येण तपसा यत्नेन च दमेन च ॥ ४२ ॥
दानैश्च विविधैः पुण्यैस्तथा तीर्थानुसेवनात् ।
तपसा महता चैव सुकृतेन च कर्मणा ॥ ४३ ॥
शक्यः समासादयितुं गोलोकः पुष्करेक्षण ।
कमलनयन इन्द्र! ब्रह्मचर्य, तपस्या, यत्न, इन्द्रियसंयम, नाना प्रकारके दान, पुण्य, तीर्थसेवन, महान् तप और अन्यान्य शुभ कर्मोंके अनुष्ठानसे ही गोलोककी प्राप्ति हो सकती है ॥ ४२-४३ १/२ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं मया शक्रानुपृच्छते ॥ ४४ ॥
न ते परिभवः कार्यो गवामसुरसूदन ॥ ४५ ॥
असुरसूदन शक्र! इस प्रकार तुम्हारे पूछनेके अनुसार मैंने सारी बातें बतलायी हैं। अब तुम्हें गौओंका कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिये ॥ ४४-४५ ॥
भीष्म उवाच
एतच्छ्रुत्वा सहस्राक्षः पूजयामास नित्यदा ।
गाश्चक्रे बहुमानं च तासु नित्यं युधिष्ठिर ॥ ४६ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र प्रतिदिन गौओंकी पूजा करने लगे। उन्होंने उनके प्रति बहुत सम्मान प्रकट किया ॥ ४६ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं पावनं च महाद्युते ।
पवित्रं परमं चापि गवां माहात्म्यमुत्तमम् ॥ ४७ ॥
महाद्युते! यह सब मैंने तुमसे गौओंका परम पावन, परम पवित्र और अत्यन्त उत्तम माहात्म्य कहा है ॥ ४७ ॥
कीर्तितं पुरुषव्याघ्र सर्वपापविमोचनम् ।
य इदं कथयेन्नित्यं ब्राह्मणेभ्यः समाहितः ॥ ४८ ॥
हव्यकव्येषु यज्ञेषु पितृकार्येषु चैव ह ।
सार्वकामिकमक्षय्यं पितृंस्तस्योपतिष्ठते ॥ ४९ ॥
पुरुषसिंह! यदि इसका कीर्तन किया जाय तो यह समस्त पापोंसे छुटकारा दिलानेवाला है। जो एकाग्रचित्त हो सदा यज्ञ और श्राद्धमें हव्य और कव्य अर्पण करते समय ब्राह्मणोंको यह प्रसंग सुनायेगा, उसका दिया हुआ (हव्य और कव्य) समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और अक्षय होकर पितरोंको प्राप्त होगा ॥ ४८-४९ ॥
गोषु भक्तश्च लभते यद् यदिच्छति मानवः ।
स्त्रियोऽपि भक्ता या गोषु ताश्च काममवाप्नुयुः ॥ ५० ॥
गोभक्त मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब उसे प्राप्त होती है। स्त्रियोंमें भी जो गौओंकी भक्ता हैं, वे मनोवाञ्छित कामनाएँ प्राप्त कर लेती हैं ॥ ५० ॥
पुत्रार्थी लभते पुत्रं कन्यार्थी तामवाप्नुयात् ।
धनार्थी लभते वित्तं धर्मार्थी धर्ममाप्नुयात् ॥ ५१ ॥
पुत्रार्थी मनुष्य पुत्र पाता है और कन्यार्थी कन्या। धन चाहनेवालेको धन और धर्म चाहनेवालेको धर्म प्राप्त होता है ॥ ५१ ॥
विद्यार्थी चाप्नुयाद् विद्यां सुखार्थी प्राप्नुयात् सुखम् ।
न किंचिद् दुर्लभं चैव गवां भक्तस्य भारत ॥ ५२ ॥
विद्यार्थी विद्या पाता है और सुखार्थी सुख। भारत! गोभक्तके लिये यहाँ कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ५२ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोलोकवर्णने त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोलोकका वर्णनविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥
भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका
चतुरशीतितमोऽध्यायः
भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना
युधिष्ठिर उवाच
उक्तं पितामहेनेदं गवां दानमनुत्तमम् ।
विशेषेण नरेन्द्राणामिह धर्ममवेक्षताम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— पितामह! आपने सब मनुष्योंके लिये, विशेषतः धर्मपर दृष्टि रखनेवाले नरेशोंके लिये परम उत्तम गोदानका वर्णन किया है ॥ १ ॥
राज्यं हि सततं दुःखं दुर्धरं चाकृतात्मभिः ।
भूयिष्ठं च नरेन्द्राणां विद्यते न शुभा गतिः ॥ २ ॥
राज्य सदा ही दुःखरूप है। जिन्होंने अपना मन वशमें नहीं किया है, उनके लिये राज्यको सुरक्षित रखना बहुत ही कठिन है। इसलिये प्रायः राजाओंको शुभ गति नहीं प्राप्त होती है ॥ २ ॥
पूयन्ते तत्र नियतं प्रयच्छन्तो वसुन्धराम् ।
सर्वे च कथिता धर्मास्त्वया मे कुरुनन्दन ॥ ३ ॥
उनमें वे ही पवित्र होते हैं जो नियमपूर्वक पृथ्वीका दान करते हैं। कुरुनन्दन! आपने मुझसे समस्त धर्मोंका वर्णन किया है ॥ ३ ॥
एवमेव गवामुक्तं प्रदानं ते नृगेण ह ।
ऋषिणा नाचिकेतैन पूर्वमेव निदर्शितम् ॥ ४ ॥
इसी तरह राजा नृगने जो गोदान किया था तथा नाचिकेत ऋषिने जो गौओंका दान और पूजन किया था, वह सब आपने पहले ही कहा और निर्देश किया है ॥ ४ ॥
वेदोपनिषदश्चैव सर्वकर्मसु दक्षिणाः ।
सर्वक्रतुषु चोद्दिष्टं भूमिर्गावोऽथ काञ्चनम् ॥ ५ ॥
वेद और उपनिषदोंने भी प्रत्येक कर्ममें दक्षिणाका विधान किया है। सभी यज्ञोंमें भूमि, गौ और सुवर्णकी दक्षिणा बतायी गयी है ॥ ५ ॥
तत्र श्रुतिस्तु परमा सुवर्णं दक्षिणेति वै ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पितामह यथातथम् ॥ ६ ॥
इनमें सुवर्ण सबसे उत्तम दक्षिणा है—ऐसा श्रुतिका वचन है, अतः पितामह! मैं इस विषयको यथार्थ रूपसे सुनना चाहता हूँ ।। ६ ।। किं सुवर्णं कथं जातं कस्मिन् काले किमात्मकम् । किं दैवं किं फलं चैव कस्माच्च परमुच्यते ।। ७ ।। सुवर्ण क्या है? कब और किस तरहसे इसकी उत्पत्ति हुई? सुवर्णका उपादान क्या है? इसका देवता कौन है? इसके दानका फल क्या है? सुवर्ण क्यों उत्तम कहलाता है? ।। ७ ।। कस्माद् दानं सुवर्णस्य पूजयन्ति मनीषिणः । कस्माच्च दक्षिणार्थं तद् यज्ञकर्मसु शस्यते ।। ८ ।। मनीषी विद्वान् सुवर्णदानका अधिक आदर क्यों करते हैं? तथा यज्ञ-कर्मोंमें दक्षिणाके लिये सुवर्णकी प्रशंसा क्यों की जाती है? ।। ८ ।। कस्माच्च पावनं श्रेष्ठं भूमेर्गोभ्यश्च काञ्चनम् । परमं दक्षिणार्थे च तद् ब्रवीहि पितामह ।। ९ ।। पितामह! क्यों सुवर्ण पृथ्वी और गौओंसे भी पावन और श्रेष्ठ है? दक्षिणाके लिये सबसे उत्तम वह क्यों माना गया है? यह मुझे बताइये ।। ९ ।।
भीष्म उवाच
शृणु राजन्नवहितो बहुकारणविस्तरम् । जातरूपसमुत्पत्तिमनुभूतं च यन्मया ।। १० ।। **भीष्मजीने कहा—**राजन्! ध्यान देकर सुनो! सुवर्णकी उत्पत्तिका कारण बहुत विस्तृत है। इस विषयमें मैंने जो अनुभव किया है, उसके अनुसार तुम्हें सब बातें बता रहा हूँ ।। १० ।। पिता मम महातेजाः शान्तनुर्निधनं गतः । तस्य दित्सुरहं श्राद्धं गंगाद्वारमुपागमम् ।। ११ ।। मेरे महातेजस्वी पिता महाराज शान्तनुका जब देहावसान हो गया तब मैं उनका श्राद्ध करनेके लिये गंगाद्वार तीर्थ (हरद्वार)-में गया ।। ११ ।। तत्रागम्य पितुः पुत्र श्राद्धकर्म समारभम् । माता मे जाह्नवी चात्र साहाय्यमकरोत् तदा ।। १२ ।। बेटा! वहाँ पहुँचकर मैंने पिताका श्राद्धकर्म आरम्भ किया। इस कार्यमें वहाँ उस समय मेरी माता गंगाने भी बड़ी सहायता की ।। १२ ।। ततोऽग्रतस्ततः सिद्धानुपवेश्य बहून्ऋषीन् । तोयप्रदानात् प्रभृति कार्याण्यहमथारभम् ।। १३ ।। तदनन्तर अपने सामने बहुत-से सिद्ध-महर्षियोंको बिठाकर मैंने जलदान आदि सारे कार्य आरम्भ किये ।। १३ ।।
तत् समाप्य यथोद्दिष्टं पूर्वकर्म समाहितः ।
दातुं निर्वपणं सम्यग् यथावदहमारभम् ॥ १४ ॥
एकाग्रचित्त होकर शास्त्रोक्तविधिसे पिण्डदानके पहलेके सब कार्य समाप्त करके मैंने विधिवत् पिण्डदान देना आरम्भ किया ॥ १४ ॥
ततस्तं दर्भविन्यासं भित्त्वा सुरुचिरांगदः ।
प्रलम्बाभरणो बाहुरुदतिष्ठद् विशाम्पते ॥ १५ ॥
प्रजानाथ! इसी समय पिण्डदानके लिये जो कुश बिछाये गये थे, उन्हें भेदकर एक बड़ी सुन्दर बाँह बाहर निकली। उस विशाल भुजामें बाजूबंद आदि अनेक आभूषण शोभा पा रहे थे ॥ १५ ॥
तमुत्थितमहं दृष्ट्वा परं विस्मयमागमम् ।
प्रतिग्रहीता साक्षान्मे पितेति भरतर्षभ ॥ १६ ॥
ततो मे पुनरेवासीत् संज्ञा संचिन्त्य शास्त्रतः ।
नायं वेदेषु विहितो विधिर्हस्त इति प्रभो ॥ १७ ॥
पिण्डो देयो नरेणेह ततो मतिरभून्मम ।
साक्षान्नेह मनुष्यस्य पिण्डं हि पितरः क्वचित् ॥ १८ ॥
गृह्णन्ति विहितं चेत्थं पिण्डो देयः कुशेष्विति । उसे ऊपर उठी देख मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। भरतश्रेष्ठ! साक्षात् मेरे पिता ही पिण्डका दान लेनेके लिये उपस्थित थे। प्रभो! किंतु जब मैंने शास्त्रीय विधिपर विचार किया, तब मेरे मनमें सहसा यह बात स्मरण हो आयी कि मनुष्यके लिये हाथपर पिण्ड देनेका वेदमें विधान नहीं है। पितर साक्षात् प्रकट होकर कभी मनुष्यके हाथसे पिण्ड लेते भी नहीं हैं। शास्त्रकी आज्ञा तो यही है कि कुशोंपर पिण्डदान करें ।। १६—१८ १/२ ।।
ततोऽहं तदनादृत्य पितुर्हस्तनिदर्शनम् ।। १९ ।।
शास्त्रप्रामाण्यसूक्ष्मं तु विधिं पिण्डस्य संस्मरन् ।
ततो दर्भेषु तत् सर्वमददं भरतर्षभ ।। २० ।।
भरतश्रेष्ठ! यह सोचकर मैंने पिताके प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले हाथका आदर नहीं किया। शास्त्रको ही प्रमाण मानकर उसकी पिण्डदानसम्बन्धी सूक्ष्म विधिका ध्यान रखते हुए कुशोंपर ही सब पिण्डोंका दान किया ।। १९-२० ।।
शास्त्रमार्गानुसारेण तद् विद्धि मनुजर्षभ ।
ततः सोऽन्तर्हितो बाहुः पितुर्मम जनाधिप ।। २१ ।।
नरश्रेष्ठ! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैंने शास्त्रीय मार्गका अनुसरण करके ही सब कुछ किया। नरेश्वर! तदनन्तर मेरे पिताकी वह बाँह अदृश्य हो गयी ।। २१ ।।
ततो मां दर्शयामासुः स्वप्नान्ते पितरस्तथा ।
प्रीयमाणास्तु मामूचुः प्रीताः स्म भरतर्षभ ।। २२ ।।
विज्ञानेन तवानेन यन्न मुह्यसि धर्मतः ।
तदनन्तर स्वप्नमें पितरोंने मुझे दर्शन दिया और प्रसन्नतापूर्वक मुझसे कहा—'भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे इस शास्त्रीय ज्ञानसे हम बहुत प्रसन्न हैं; क्योंकि उसके कारण तुम्हें धर्मके विषयमें मोह नहीं हुआ ।। २२ १/२ ।।
त्वया हि कुर्वता शास्त्रं प्रमाणमिह पार्थिव ।। २३ ।।
आत्मा धर्मः श्रुतं वेदाः पितरश्चर्षिभिः सह ।
साक्षात् पितामहो ब्रह्मा गुरवोऽथ प्रजापतिः ।। २४ ।।
प्रमाणमुपनीता वै स्थिताश्च न विचालिताः ।
'पृथ्वीनाथ! तुमने यहाँ शास्त्रको प्रमाण मानकर आत्मा, धर्म, शास्त्र, वेद, पितृगण, ऋषिगण, गुरु, प्रजापति और ब्रह्माजी—इन सबका मान बढ़ाया है तथा जो लोग धर्ममें स्थित हैं उन्हें भी तुमने अपना आदर्श दिखाकर विचलित नहीं होने दिया है ।। २३-२४ १/२ ।।
तदिदं सम्यगारब्धं त्वयाद्य भरतर्षभ ।। २५ ।।
किं तु भूमेर्गवां चार्थे सुवर्णं दीयतामिति ।
'भरतश्रेष्ठ! यह सब कार्य तो तुमने बहुत उत्तम किया है; किंतु अब हमारे कहनेसे भूमिदान और गोदानके निष्क्रयरूपसे कुछ सुवर्णदान भी करो ।। २५ १/२ ।।
एवं वयं च धर्मज्ञ सर्वे चास्मत्पितामहाः ॥ २६ ॥ पाविता वै भविष्यन्ति पावनं हि परं हि तत् । 'धर्मज्ञ! ऐसा करनेसे हम और हमारे सभी पितामह पवित्र हो जायँगे; क्योंकि सुवर्ण सबसे अधिक पावन वस्तु है ।। २६ १/२ ।। दशपूर्वान् दशैवान्यांस्तथा संतारयन्ति ते ।। २७ ।। सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति एवं मत्पितरोऽब्रुवन् । ततोऽहं विस्मितो राजन् प्रतिबुद्धो विशाम्पते ।। २८ ।। सुवर्णदानेऽकरवं मतिं च भरतर्षभ । 'जो सुवर्ण दान करते हैं, वे अपने पहले और पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देते हैं।' राजन्! जब मेरे पितरोंने ऐसा कहा तो मेरी नींद खुल गयी। उस समय स्वप्नका स्मरण करके मुझे बड़ा विस्मय हुआ। प्रजानाथ! भरतश्रेष्ठ! तब मैंने सुवर्णदान करनेका निश्चित विचार कर लिया ।। २७-२८ १/२ ।। इतिहासमिमं चापि शृणु राजन् पुरातनम् ।। २९ ।। जामदग्न्यं प्रति विभो धन्यमायुष्यमेव च । राजन्! अब (सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके माहात्म्यके विषयमें) एक प्राचीन इतिहास सुनो जो जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे सम्बन्ध रखनेवाला है। विभो! यह आख्यान धन तथा आयुकी वृद्धि करनेवाला है ।। २९ १/२ ।। जामदग्न्येन रामेण तीव्ररोषान्वितेन वै ॥ ३० ॥ त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी कृता निःक्षत्रिया पुरा । पूर्वकालकी बात है, जमदग्निकुमार परशुरामजीने तीव्र रोषमें भरकर इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य कर दिया था ।। ३० १/२ ।। ततो जित्वा महीं कृत्स्नां रामो राजीवलोचनः ।। ३१ ।। आजहार क्रतुं वीरो ब्रह्मक्षत्रेण पूजितम् । वाजिमेधं महाराज सर्वकामसमन्वितम् ।। ३२ ।। महाराज! इसके बाद सम्पूर्ण पृथ्वीको जीतकर वीर कमलनयन परशुरामजीने ब्राह्मणों और क्षत्रियोंद्वारा सम्मानित तथा सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया ।। ३१-३२ ।। पावनं सर्वभूतानां तेजोद्युतिविवर्धनम् । विपाप्मा च स तेजस्वी तेन क्रतुफलेन च ।। ३३ ।। नैवात्मनोऽथ लघुतां जामदग्न्योऽध्यगच्छत ।
यद्यपि अश्वमेध यज्ञ समस्त प्राणियोंको पवित्र करनेवाला तथा तेज और कान्तिको बढ़ानेवाला है तथापि उसके फलसे तेजस्वी परशुरामजी सर्वथा पापमुक्त न हो सके। इससे उन्होंने अपनी लघुताका अनुभव किया ।। ३३ ½ ।।
स तु क्रतुवरेणेष्ट्वा महात्मा दक्षिणावता ।। ३४ ।।
पप्रच्छागमसम्पन्नानृषीन् देवांश्च भार्गवः ।
पावनं यत् परं नृणामुग्रे कर्मणि वर्तताम् ।। ३५ ।।
तदुच्यतां महाभागा इति जातघृणोऽब्रवीत् ।
इत्युक्ता वेदशास्त्रज्ञास्तमूचुस्ते महर्षयः ।। ३६ ।।
प्रचुर दक्षिणासे सम्पन्न उस श्रेष्ठ यज्ञका अनुष्ठान पूर्ण करके महामना भृगुवंशी परशुरामजीने मनमें दयाभाव लेकर शास्त्रज्ञ ऋषियों और देवताओंसे इस प्रकार पूछा—‘महाभाग महात्माओ! उग्र कर्ममें लगे हुए मनुष्योंके लिये जो परम पावन वस्तु हो, वह मुझे बताइये।’ उनके इस प्रकार पूछनेपर उन वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता महर्षियोंने इस प्रकार कहा— ।। ३४—३६ ।।
राम विप्राः सत्क्रियन्तां वेदप्रामाण्यदर्शनात् ।
भूयश्च विप्रर्षिगणाः प्रष्टव्याः पावनं प्रति ।। ३७ ।।
‘परशुराम! तुम वेदोंकी प्रामाणिकतापर दृष्टि रखते हुए ब्राह्मणोंका सत्कार करो और ब्रह्मर्षियोंके समुदायसे पुनः इस पावन वस्तुके लिये प्रश्न करो ।। ३७ ।।
ते यद् ब्रूयुर्महाप्राज्ञास्तच्चैव समुदाचर ।
ततो वसिष्ठं देवर्षिमगस्त्यमथ काश्यपम् ।। ३८ ।।
तमेवार्थं महातेजाः पप्रच्छ भृगुनन्दनः ।
जाता मतिर्मे विप्रेन्द्राः कथं पूयेयमित्युत ।। ३९ ।।
केन वा कर्मयोगेन प्रदानेनेह केन वा ।
‘और वे महाज्ञानी महर्षिगण जो कुछ बतावें, उसीका प्रसन्नतापूर्वक पालन करो।’ तब महातेजस्वी भृगुनन्दन परशुरामजीने वसिष्ठ, नारद, अगस्त्य और कश्यपजीके पास जाकर पूछा—‘विप्रवरो! मैं पवित्र होना चाहता हूँ। बताइये, कैसे किस कर्मके अनुष्ठानसे अथवा किस दानसे पवित्र हो सकता हूँ? ।। ३८-३९ ½ ।।
यदि वोऽनुग्रहकृता बुद्धिर्मां प्रति सत्तमाः ।
प्रब्रूत पावनं किं मे भवेदिति तपोधनाः ॥ ४० ॥
‘साधुशिरोमणे! तपोधनो! यदि आपलोग मुझपर अनुग्रह करना चाहते हों तो बतायें, मुझे पवित्र करनेवाला साधन क्या है?’ ॥ ४० ॥
ऋषय ऊचुः
गाश्च भूमिं च वित्तं च दत्त्वेह भृगुनन्दन ।
पापकृत् पूयते मर्त्य इति भार्गव शुश्रुम ॥ ४१ ॥
ऋषियोंने कहा— भृगुनन्दन! हमने सुना है कि पाप करनेवाला मनुष्य यहाँ गाय, भूमि और धनका दान करके पवित्र हो जाता है ॥ ४१ ॥
अन्यद् दानं तु विप्रर्षे श्रूयतां पावनं महत् ।
दिव्यमत्यद्भुताकारमपत्यं जातवेदसः ॥ ४२ ॥
ब्रह्मर्षे! एक दूसरी वस्तुका दान भी सुनो। वह वस्तु सबसे बढ़कर पावन है। उसका आकार अत्यन्त अद्भुत और दिव्य है तथा वह अग्निसे उत्पन्न हुई है ॥
दग्ध्वा लोकान् पुरा वीर्यात् सम्भूतमिह शुश्रुम ।
सुवर्णमिति विख्यातं तद् ददत् सिद्धिमेष्यसि ॥ ४३ ॥
उस वस्तुका नाम है सुवर्ण। हमने सुना है कि पूर्वकालमें अग्निने सम्पूर्ण लोकोंको भस्म करके अपने वीर्यसे सुवर्णको प्रकट किया था। उसीका दान करनेसे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी॥ ४३॥
ततोऽब्रवीद् वसिष्ठस्तं भगवान् संशितव्रतः।
शृणु राम यथोत्पन्नं सुवर्णमनलप्रभम्॥ ४४॥
तदनन्तर कठोर व्रतका पालन करनेवाले भगवान् वसिष्ठने कहा—'परशुराम! अग्निके समान प्रकाशित होनेवाला सुवर्ण जिस प्रकार प्रकट हुआ है, वह सुनो॥
फलं दास्यति ते यत् तु दाने परमिहोच्यते।
सुवर्णं यच्च यस्माच्च यथा च गुणवत्तमम्॥ ४५॥
तन्निबोध महाबाहो सर्वं निगदतो मम।
'सुवर्णका दान तुम्हें उत्तम फल देगा; क्योंकि वह दानके लिये सर्वोत्तम बताया जाता है। महाबाहो! सुवर्णका जो स्वरूप है, जिससे उत्पन्न हुआ है और जिस प्रकार वह विशेष गुणकारी है, वह सब बता रहा हूँ, मुझसे सुनो॥ ४५ १/२॥
अग्नीषोमात्मकमिदं सुवर्णं विद्धि निश्चये॥ ४६॥
अजोऽग्निर्वरुणो मेषः सूर्योऽश्व इति दर्शनम्।
'यह सुवर्ण अग्नि और सोमरूप है। इस बातको तुम निश्चितरूपसे जान लो। बकरा, अग्नि, भेड़, वरुण तथा घोड़ा सूर्यका अंश है। ऐसी दृष्टि रखनी चाहिये॥
कुञ्जराश्च मृगा नागा महिषाश्चासुरा इति॥ ४७॥
कुक्कुटाश्च वराहाश्च राक्षसा भृगुनन्दन।
इडा गावः पयः सोमो भूमिरित्येव च स्मृतिः॥ ४८॥
'भृगुनन्दन! हाथी और मृग नागोंके अंश हैं। भैंसे असुरोंके अंश हैं। मुर्गा और सूअर राक्षसोंके अंश हैं इडा—गौ, दुग्ध और सोम—ये सब भूमिरूप ही हैं। ऐसी स्मृति है॥ ४७-४८॥
जगत् सर्वं च निर्मथ्य तेजोराशिः समुत्थितः।
सुवर्णमेभ्यो विप्रर्षे रत्नं परममुत्तमम्॥ ४९॥
'सारे जगत्का मन्थन करके जो तेजकी राशि प्रकट हुई है, वही सुवर्ण है। अतः ब्रह्मर्षे! यह अज आदि सभी वस्तुओंसे परम उत्तम रत्न है॥ ४९॥
एतस्मात् कारणाद् देवा गन्धर्वोरगराक्षसाः।
मनुष्याश्च पिशाचाश्च प्रयता धारयन्ति तत्॥ ५०॥
'इसीलिये देवता, गन्धर्व, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच—ये सब प्रयत्नपूर्वक सुवर्ण धारण करते हैं॥
मुकुटैरङ्गदयुतैरलंकारैः पृथग्विधैः।
सुवर्णविकृतैस्तत्र विराजन्ते भृगूत्तम॥ ५१॥
'भृगुश्रेष्ठ! वे सोनेके बने हुए मुकुट, बाजूबंद तथा अन्य नाना प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित होते हैं।। तस्मात् सर्वपवित्रेभ्यः पवित्रं परमं स्मृतम्। भूमेर्गोभ्योऽथ रत्नेभ्यस्तद् विद्धि मनुजर्षभ।। ५२ ।। ‘अतः नरश्रेष्ठ! जगत्में भूमि, गौ तथा रत्न आदि जितनी पवित्र वस्तुएँ हैं, सुवर्णको उन सबसे पवित्र माना गया है; इस बातको भलीभाँति जान लो।। ५२ ।। पृथिवीं गाश्च दत्त्वेह यच्चान्यदपि किंचन। विशिष्यते सुवर्णस्य दानं परमकं विभो।। ५३ ।। ‘विभो! पृथिवी, गौ तथा और जो कुछ भी दान किया जाता है, उन सबसे बढ़कर सुवर्णका दान है।। अक्षयं पावनं चैव सुवर्णममरद्युते। प्रयच्छ द्विजमुख्येभ्यः पावनं ह्येतदुत्तमम्।। ५४ ।। ‘देवोपम तेजस्वी परशुराम! सुवर्ण अक्षय और पावन है, अतः तुम श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको यह उत्तम और पावन वस्तु ही दान करो।। ५४ ।। सुवर्णमेव सर्वासु दक्षिणासु विधीयते। सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति सर्वदास्ते भवन्त्युत।। ५५ ।। सब दक्षिणाओंमें सुवर्णका ही विधान है; अतः जो सुवर्ण दान करते हैं, वे सब कुछ दान करनेवाले होते हैं।। देवतास्ते प्रयच्छन्ति ये सुवर्णं ददत्यथ। अग्निर्हि देवताः सर्वाः सुवर्णं च तदात्मकम्।। ५६ ।। ‘जो सुवर्ण देते हैं, वे देवताओंका दान करते हैं; क्योंकि अग्नि सर्वदेवतामय है और सुवर्ण अग्निका स्वरूप है।। ५६ ।। तस्मात् सुवर्णं ददता दत्ताः सर्वाः स्म देवताः। भवन्ति पुरुषव्याघ्र न ह्यतः परमं विदुः।। ५७ ।। ‘पुरुषसिंह! अतः सुवर्णका दान करनेवाले पुरुषोंने सम्पूर्ण देवताओंका ही दान कर दिया—ऐसा माना जाता है। अतः विद्वान् पुरुष सुवर्णसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं मानते हैं।। ५७ ।। भूय एव च माहात्म्यं सुवर्णस्य निबोध मे। गदतो मम विप्रर्षे सर्वशस्त्रभृतां वर।। ५८ ।। ‘सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ विप्रर्षे! मैं पुनः सुवर्णका माहात्म्य बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो।। ५८ ।। मया श्रुतमिदं पूर्वं पुराणे भृगुनन्दन। प्रजापतेः कथयतो यथान्यायं तु तस्य वै।। ५९ ।।
'भृगुनन्दन! मैंने पहले पुराणमें प्रजापतिकी कही हुई यह न्यायोचित बात सुन रखी है ।। ५९ ।। शूलपाणेर्भगवतो रुद्रस्य च महात्मनः । गिरौ हिमवति श्रेष्ठे तदा भृगुकुलोद्वह ।। ६० ।। देव्या विवाहे निर्वृत्ते रुद्राण्या भृगुनन्दन । समागमे भगवतो देव्या सह महात्मनः ।। ६१ ।। 'भृगुकुलरत्न! भृगुनन्दन परशुराम! यह बात उस समयकी है, जब श्रेष्ठ पर्वत हिमालयपर शूलपाणि महात्मा भगवान् रुद्रका देवी रुद्राणीके साथ विवाह-संस्कार सम्पन्न हुआ था और महामना भगवान् शिवको उमादेवीके साथ समागम-सुख प्राप्त था ।। ६०-६१ ।। ततः सर्वे समुद्विग्ना देवा रुद्रमुपागमन् । ते महादेवमासीनं देवीं च वरदामुमाम् ।। ६२ ।। 'उस समय सब देवता उद्विग्न होकर कैलास-शिखरपर बैठे हुए महान् देवता रुद्र और वरदायिनी देवी उमाके पास गये ।। ६२ ।। प्रसाद्य शिरसा सर्वे रुद्रमूचुर्भृगूद्वह । अयं समागमो देव देव्या सह तवानघ ।। ६३ ।। तपस्विनस्तपस्विन्या तेजस्विन्याऽतितेजसः । भृगुश्रेष्ठ! वहाँ उन सबने उन दोनोंके चरणोंमें मस्तक झुकाकर उन्हें प्रसन्न करके भगवान् रुद्रसे कहा—'पापरहित महादेव! यह जो देवी पार्वतीके साथ आपका समागम हुआ है, यह एक तपस्वीका तपस्विनीके साथ और एक महातेजस्वीका एक तेजस्विनीके साथ संयोग हुआ है ।। ६३ १/२ ।। अमोघतेजास्त्वं देव देवी चेयमुमा तथा ।। ६४ ।। अपत्यं युवयोर्देव बलवद् भविता विभो । तन्नूनं त्रिषु लोकेषु न किञ्चिच्छेषयिष्यति ।। ६५ ।। 'देव! प्रभो! आपका तेज अमोघ है। ये देवी उमा भी ऐसी ही अमोघ तेजस्विनी हैं। आप दोनोंकी जो संतान होगी वह अत्यन्त प्रबल होगी। निश्चय ही वह तीनों लोकोंमें किसीको शेष नहीं रहने देगी ।। तदेभ्यः प्रणतेभ्यस्त्वं देवेभ्यः पृथुलोचन । वरं प्रयच्छ लोकेश त्रैलोक्यहितकाम्यया ।। ६६ ।। 'विशाललोचन! लोकेश्वर! हम सब देवता आपके चरणोंमें पड़े हैं। आप तीनों लोकोंके हितकी इच्छासे हमें वर दीजिये ।। ६६ ।। अपत्यार्थं निगृह्णीष्व तेजः परमकं विभो । त्रैलोक्यसारौ हि युवां लोकं संतापयिष्यथः ।। ६७ ।।
‘प्रभो! संतानके लिये प्रकट होनेवाला जो आपका उत्तम तेज है, उसे आप अपने भीतर ही रोक लीजिये। आप दोनों त्रिलोकीके सारभूत हैं। अतः अपनी संतानके द्वारा सम्पूर्ण जगत्को संतप्त कर डालेंगे ॥ ६७ ॥
तदपत्यं हि युवयोर्देवानभिभवेद् ध्रुवम् ।
न हि ते पृथिवी देवी न च द्यौर्न दिवं विभो ॥ ६८ ॥
नेदं धारयितुं शक्ताः समस्ता इति मे मतिः ।
तेजःप्रभावनिर्दग्धं तस्मात् सर्वमिदं जगत् ॥ ६९ ॥
‘आप दोनोंसे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह निश्चय ही देवताओंको पराजित कर देगा। प्रभो! हमारा तो ऐसा विश्वास है कि न तो पृथिवीदेवी, न आकाश और न स्वर्ग ही आपके तेजको धारण कर सकेगा। ये सब मिलकर भी आपके इस तेजको धारण करनेमें समर्थ नहीं हैं। यह सारा जगत् आपके तेजके प्रभावसे भस्म हो जायगा ॥ ६८-६९ ॥
तस्मात् प्रसादं भगवन् कर्तुमर्हसि नः प्रभो ।
न देव्यां सम्भवेत् पुत्रो भवतः सुरसत्तम ।
धैर्यादेव निगृह्णीष्व तेजो ज्वलितमुत्तमम् ॥ ७० ॥
‘अतः भगवन्! हमपर कृपा कीजिये। प्रभो! सुरश्रेष्ठ! हम यही चाहते हैं कि देवी पार्वतीके गर्भसे आपके कोई पुत्र न हो। आप धैर्यसे ही अपने प्रज्वलित उत्तम तेजको भीतर ही रोक लीजिये’ ॥ ७० ॥
इति तेषां कथयतां भगवान् वृषभध्वजः ।
एवमस्त्विति देवांस्तान् विप्रर्षे प्रत्यभाषत ॥ ७१ ॥
‘विप्रर्षे! देवताओंके ऐसा कहनेपर भगवान् वृषभध्वजने उनसे ‘एवमस्तु’ कह दिया ॥ ७१ ॥
इत्युक्त्वा चोर्ध्वमनयद् रेतो वृषभवाहनः ।
ऊर्ध्वरेताः समभवत् ततः प्रभृति चापि सः ॥ ७२ ॥
‘देवताओंसे ऐसा कहकर वृषभवाहन भगवान् शंकरने अपने ‘रेतस्’ अर्थात् वीर्यको ऊपर चढ़ा लिया। तभीसे वे ‘ऊर्ध्वरेता’ नामसे विख्यात हुए ॥ ७२ ॥
रुद्राणीति ततः क्रुद्धा प्रजोच्छेदे तदा कृते ।
देवानथाब्रवीत् तत्र स्त्रीभावात् परुषं वचः ॥ ७३ ॥
‘देवताओंने मेरी भावी संतानका उच्छेद कर डाला’ यह सोचकर उस समय देवी रुद्राणी बहुत कुपित हुईं और स्त्री-स्वभाव होनेके कारण उन्होंने देवताओंसे यह कठोर वचन कहा— ॥ ७३ ॥
यस्मादपत्यकामो वै भर्ता मे विनिवर्तितः ।
तस्मात् सर्वे सुरा यूयमनपत्या भविष्यथ ॥ ७४ ॥
‘देवताओ! मेरे पतिदेव मुझसे संतान उत्पन्न करना चाहते थे, किंतु तुमलोगोंने इन्हें इस कार्यसे निवृत्त कर दिया; इसलिये तुम सभी देवता निर्वंश हो जाओगे ।। प्रजोच्छेदो मम कृतो यस्माद् युष्माभिरद्य वै । तस्मात् प्रजा वः खगमाः सर्वेषां न भविष्यति ॥ ७५ ॥ ‘आकाशचारी देवताओ! आज तुम सब लोगोंने मिलकर मेरी संततिका उच्छेद किया है; अतः तुम सब लोगोंके भी संतान नहीं होगी' ।। ७५ ।। पावकस्तु न तत्रासीच्छापकाले भृगूद्वह । देवा देव्यास्तथा शापादनपत्यास्ततोऽभवन् ॥ ७६ ॥ भृगुश्रेष्ठ! उस शापके समय वहाँ अग्निदेव नहीं थे; अतः उनपर यह शाप लागू नहीं हुआ। अन्य सब देवता देवीके शापसे संतानहीन हो गये ।। ७६ ।। रुद्रस्तु तेजोऽप्रतिमं धारयामास वै तदा । प्रस्कन्नं तु ततस्तस्मात् किंचित्तत्रापतद् भुवि ॥ ७७ ॥ रुद्रदेवने उस समय अपने अनुपम तेज (वीर्य) को यद्यपि रोक लिया था; तो भी किंचित् स्खलित होकर वहीं पृथ्वीपर गिर पड़ा ।। ७७ ।। उत्पपात तदा वह्नौ ववृधे चाद्भुतोपमम् । तेजस्तेजसि संयुक्तमात्मयोनित्वमागतम् ॥ ७८ ॥ वह अद्भुत तेज अग्निमें पड़कर बढ़ने और ऊपरको उठने लगा। तेजसे संयुक्त हुआ वह तेज एक स्वयम्भू पुरुषके रूपमें अभिव्यक्त होने लगा ।। ७८ ।। एतस्मिन्नेव काले तु देवाः शक्रपुरोगमाः । असुरस्तारको नाम तेन संतापिता भृशम् ॥ ७९ ॥ इसी समय तारक नामक एक असुर उत्पन्न हुआ था, जिसने इन्द्र आदि देवताओंको अत्यन्त संतप्त कर दिया था ।। ७९ ।। आदित्या वसवो रुद्रा मरुतोऽथाश्विनावपि । साध्याश्च सर्वे संत्रस्ता दैतेयस्य पराक्रमात् ॥ ८० ॥ आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार तथा साध्य—सभी देवता उस दैत्यके पराक्रमसे संत्रस्त हो उठे थे ।। ८० ।। स्थानानि देवतानां हि विमानानि पुराणि च । ऋषीणां चाश्रमाश्चैव बभूवुरसुरैर्हृताः ॥ ८१ ॥ असुरोंने देवताओंके स्थान, विमान, नगर तथा ऋषियोंके आश्रम भी छीन लिये थे ।। ८१ ।। ते दीनमनसः सर्वे देवता ऋषयश्च ये । प्रजग्मुः शरणं देवं ब्रह्माणमजरं विभुम् ॥ ८२ ॥