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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

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दशमोऽध्यायः

अनधिकारीको उपदेश देनेसे हानिके विषयमें एक शूद्र और तपस्वी ब्राह्मणकी कथा

युधिष्ठिर उवाच

मित्रसौहार्दयोगेन उपदेशं करोति यः ।
जात्याधरस्य राजर्षेर्दोषस्तस्य भवेन्न वा ॥ १ ॥
एतदिच्छामि तत्त्वेन व्याख्यातुं वै पितामह ।
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य यत्र मुह्यन्ति मानवाः ॥ २ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! यदि कोई मित्रता या सौहार्दके सम्बन्धसे किसी नीच जातिके मनुष्यको उपदेश देता है तो उस राजर्षिको दोष लगेगा या नहीं? मैं इस बातको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ। आप इसका विशदरूपसे विवेचन करें; क्योंकि धर्मकी गति सूक्ष्म है, जहाँ मनुष्य मोहमें पड़ जाते हैं ॥ १-२ ॥

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्यामि शृणु राजन् यथाक्रमम् ।
ऋषीणां वदतां पूर्वं श्रुतमासीत् यथा पुरा ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! इस विषयमें पूर्वकालमें ऋषियोंके मुखसे जैसा मैंने सुना है, उसी क्रमसे बताऊँगा, तुम ध्यान देकर सुनो ॥ ३ ॥
उपदेशो न कर्तव्यो जातिहीनस्य कस्यचित् ।
उपदेशे महान् दोष उपाध्यायस्य भाष्यते ॥ ४ ॥
किसी भी नीच जातिके मनुष्यको उपदेश नहीं देना चाहिये। उसे उपदेश देनेपर उपदेशक आचार्यके लिये महान् दोष बताया जाता है ॥ ४ ॥
निदर्शनमिदं राजन् शृणु मे भरतर्षभ ।
दुरुक्तवचने राजन् यथापूर्वं युधिष्ठिर ॥ ५ ॥
भरतभूषण राजा युधिष्ठिर! इस विषयमें एक दृष्टान्त सुनो, जो दुःखमें पड़े हुए एक नीच जातिके पुरुषको उपदेश देनेसे सम्बन्धित है ॥ ५ ॥
ब्रह्माश्रमपदे वृत्तं पार्श्वे हिमवतः शुभे ।
तत्राश्रमपदं पुण्यं नानावृक्षगणायुतम् ॥ ६ ॥
हिमालयके सुन्दर पार्श्वभागमें, जहाँ बहुत-से ब्राह्मणोंके आश्रम बने हुए हैं, यह वृत्तान्त घटित हुआ था। उस प्रदेशमें एक पवित्र आश्रम है जहाँ नाना प्रकारके हरे-भरे वृक्ष शोभा पाते हैं ॥ ६ ॥

नानागुल्मलताकीर्णं मृगद्विजनिषेवितम् । सिद्धचारणसंयुक्तं रम्यं पुष्पितकाननम् ॥ ७ ॥ नाना प्रकारकी लता-बेलें वहाँ छायी हुई हैं। मृग और पक्षी उस आश्रमका सेवन करते हैं। सिद्ध और चारण वहाँ सदा निवास करते हैं। उस रमणीय आश्रमके आस-पासका वन सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित है ॥ ७ ॥

व्रतिभिर्बहुभिः कीर्णं तापसैरुपसेवितम् । ब्राह्मणैश्च महाभागैः सूर्यज्वलनसंनिभैः ॥ ८ ॥ बहुत-से व्रतपरायण तपस्वी उस आश्रमका सेवन करते हैं। कितने ही सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी महाभाग ब्राह्मण वहाँ भरे रहते हैं ॥ ८ ॥

नियमव्रतसम्पन्नैः समाकीर्णं तपस्विभिः । दीक्षितैर्भरतश्रेष्ठ यताहारैः कृतात्मभिः ॥ ९ ॥ भरतश्रेष्ठ! नियम और व्रतसे सम्पन्न, तपस्वी, दीक्षित, मिताहारी और जितात्मा मुनियोंसे वह आश्रम भरा रहता है ॥ ९ ॥

तपोऽध्ययनघोषैश्च नादितं भरतर्षभ । वालखिल्यैश्च बहुभिर्यतिभिश्च निषेवितम् ॥ १० ॥ भरतभूषण! वहाँ सब ओर वेदाध्ययनकी ध्वनि गूँजती रहती है। बहुत-से वालखिल्य एवं संन्यासी उस आश्रमका सेवन करते हैं ॥ १० ॥

तत्र कश्चित् समुत्साहं कृत्वा शूद्रो दयान्वितः । आगतो ह्याश्रमपदं पूजितश्च तपस्विभिः ॥ ११ ॥ उसी आश्रममें कोई दयालु शूद्र बड़ा उत्साह करके आया। वहाँ रहनेवाले तपस्वी ऋषियोंने उसका बड़ा आदर-सत्कार किया ॥ ११ ॥

तांस्तु दृष्ट्वा मुनिगणान् देवकल्पान् महौजसः । विविधां वहतो दीक्षां सम्प्राहृष्यत भारत ॥ १२ ॥ भरतनन्दन! उस आश्रमके महातेजस्वी देवोपम मुनियोंको नाना प्रकारकी दीक्षा धारण किये देख उस शूद्रको बड़ा हर्ष हुआ ॥ १२ ॥

अथास्य बुद्धिरभवत् तपस्ये भरतर्षभ । ततोऽब्रवीत् कुलपतिं पादौ संगृह्य भारत ॥ १३ ॥ भारत! भरतभूषण! उसके मनमें वहाँ तपस्या करनेका विचार उत्पन्न हुआ; अतः उसने कुलपतिके पैर पकड़कर कहा— ॥ १३ ॥

भवत्प्रसादादिच्छामि धर्मं वक्तुं द्विजर्षभ । तन्मां त्वं भगवन् वक्तुं प्रव्राजयितुमर्हसि ॥ १४ ॥ ‘द्विजश्रेष्ठ! मैं आपकी कृपासे धर्मका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ। अतः भगवन्! आप मुझे विधिवत् संन्यासीकी दीक्षा दे दें’ ॥ १४ ॥

वर्णावरोऽहं भगवन् शूद्रो जात्यास्मि सत्तम ।
शुश्रूषां कर्तुमिच्छामि प्रपन्नाय प्रसीद मे ॥ १५ ॥
‘भगवन्! साधुशिरोमणे! मैं वर्णोंमें सबसे छोटा शूद्र जातिका हूँ और यहीं रहकर संतोंकी सेवा करना चाहता हूँ; अतः मुझ शरणागतपर आप प्रसन्न हों’ ॥ १५ ॥

कुलपतिरुवाच
न शक्यमिह शूद्रेण लिङ्गमाश्रित्य वर्तितुम् ।
आस्यतां यदि ते बुद्धिः शुश्रूषानिरतो भव ॥ १६ ॥
शुश्रूषया पराँल्लोकानवाप्स्यसि न संशयः ॥ १७ ॥
कुलपतिने कहा—इस आश्रममें कोई शूद्र संन्यासका चिह्न धारण करके नहीं रह सकता। यदि तुम्हारा विचार यहाँ रहनेका हो तो यों ही रहो और साधु-महात्माओंकी सेवा करो। सेवासे ही तुम उत्तम लोक प्राप्त कर लोगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १६-१७ ॥

भीष्म उवाच
एवमुक्तस्तु मुनिना स शूद्रोऽचिन्तयन्नृप ।
कथमत्र मया कार्यं श्रद्धा धर्मपरा च मे ॥ १८ ॥
भीष्मजी कहते हैं—नरेश्वर! मुनिके ऐसा कहनेपर शूद्रने सोचा, यहाँ मुझे क्या करना चाहिये? मेरी श्रद्धा तो संन्यास-धर्मके अनुष्ठानके लिये ही है ॥ १८ ॥

विज्ञातमेवं भवतु करिष्ये प्रियमात्मनः ।
गत्वाऽऽश्रमपदाद् दूरमुटजं कृतवांस्तु सः ॥ १९ ॥
अच्छा, एक बात समझमें आयी। शूद्रके लिये ऐसा ही विधान हो तो रहे। मैं तो वही करूँगा जो मुझे प्रिय लगता है—ऐसा विचारकर उसने उस आश्रमसे दूर जाकर एक पर्णकुटी बना ली ॥ १९ ॥

तत्र वेदीं च भूमिं च देवतायतनानि च ।
निवेश्य भरतश्रेष्ठ नियमस्थोऽभवन्मुनिः ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! वहाँ यज्ञके लिये वेदी, रहनेके लिये स्थान और देवालय बनाकर मुनिकी भाँति नियमपूर्वक रहने लगा ॥ २० ॥

अभिषेकांश्च नियमान् देवतायतनेषु च ।
बलिं च कृत्वा हुत्वा च देवतां चाप्यपूजयत् ॥ २१ ॥
वह तीनों समय नहाता, नियमोंका पालन करता, देव-स्थानोंमें पूजा चढ़ाता, अग्निमें आहुति देता और देवताकी पूजा करता था ॥ २१ ॥

संकल्पनियमोपेतः फलाहारो जितेन्द्रियः ।
नित्यं संनिहिताभिस्तु ओषधीभिः फलैस्तथा ॥ २२ ॥
अतिथीन् पूजयामास यथावत् समुपागतान् ।

एवं हि सुमहान् कालो व्यत्यक्रामत तस्य वै ॥ २३ ॥

वह मानसिक संकल्पोंका नियन्त्रण (चित्तवृत्तियोंका निरोध) करते हुए फल खाकर

रहता और इन्द्रियोंको काबूमें रखता था। उसके यहाँ जो अन्न और फल उपस्थित रहता,

उन्हींके द्वारा प्रतिदिन आये हुए अतिथियोंका यथोचित सत्कार करता था। इस प्रकार रहते

हुए उस शूद्र मुनिको बहुत समय बीत गया ॥

अथास्य मुनिरागच्छत् संगत्या वै तमाश्रमम् ।

सम्पूज्य स्वागतेनर्षिं विधिवत् समतोषयत् ॥ २४ ॥

एक दिन एक मुनि सत्संगकी दृष्टिसे उसके आश्रमपर पधारे। उस शूद्रने विधिवत्

स्वागत-सत्कार करके ऋषिका पूजन किया और उन्हें संतुष्ट कर दिया ॥

अनुकूलाः कथाः कृत्वा यथागतमपृच्छत ।

ऋषिः परमतेजस्वी धर्मात्मा संशितव्रतः ॥ २५ ॥

एवं सुबहुशस्तस्य शूद्रस्य भरतर्षभ ।

सोऽगच्छदाश्रममृषिः शूद्रं द्रष्टुं नरर्षभ ॥ २६ ॥

भरतभूषण नरश्रेष्ठ! तत्पश्चात् उसने अनुकूल बातें करके उनके आगमनका वृत्तान्त

पूछा। तबसे कठोर व्रतका पालन करनेवाले वे परम तेजस्वी धर्मात्मा ऋषि अनेक बार उस

शूद्रके आश्रमपर उससे मिलनेके लिये आये ॥ २५-२६ ॥

अथ तं तापसं शूद्रः सोऽब्रवीद् भरतर्षभ ।

पितृकार्यं करिष्यामि तत्र मेऽनुग्रहं कुरु ॥ २७ ॥

भरतश्रेष्ठ! एक दिन उस शूद्रने उन तपस्वी मुनिसे कहा—'मैं पितरोंका श्राद्ध करूँगा।

आप उसमें मुझपर अनुग्रह कीजिये' ॥ २७ ॥

बाढमित्येव तं विप्र उवाच भरतर्षभ ।

शुचिर्भूत्वा स शूद्रस्तु तस्यर्षेः पाद्यमानयत् ॥ २८ ॥

भरतभूषण नरेश! तब ब्राह्मणने 'बहुत अच्छा' कहकर उसका निमन्त्रण स्वीकार कर

लिया। तत्पश्चात् शूद्र नहा-धोकर शुद्ध हो उन ब्रह्मर्षिके पैर धोनेके लिये जल ले

आया ॥ २८ ॥

अथ दर्भांश्च वन्यांश्च ओषधीर्भरतर्षभ ।

पवित्रमासनं चैव बृसीं च समुपानयत् ॥ २९ ॥

भरतर्षभ! तदनन्तर वह जंगली कुशा, अन्न आदि ओषधि, पवित्र आसन और कुशकी

चटाई ले आया ॥

अथ दक्षिणमावृत्य बृसीं चरमशौर्षिकीम् ।

कृतामन्यायतो दृष्ट्वा तं शूद्रमृषिरब्रवीत् ॥ ३० ॥

उसने दक्षिण दिशामें ले जाकर ब्राह्मणके लिये पश्चिमाग्र चटाई बिछा दी। यह शास्त्रके

विपरीत अनुचित आचार देखकर ऋषिने शूद्रसे कहा— ॥ ३० ॥

कुरुष्वैतां पूर्वशीर्षां भवांश्चोदङ्मुखः शुचिः । स च तत् कृतवान् शूद्रः सर्वं यदृषिरब्रवीत् ॥ ३१ ॥ 'तुम इस कुशकी चटाईका अग्रभाग तो पूर्व दिशाकी ओर करो और स्वयं शुद्ध होकर उत्तराभिमुख बैठो।' ऋषिने जो-जो कहा, शूद्रने वह सब किया ॥ ३१ ॥ यथोपदिष्टं मेधावी दर्भाग्र्यादि यथातथम् । हव्यकव्यविधिं कृत्स्नमुक्तं तेन तपस्विना ॥ ३२ ॥ बुद्धिमान् शूद्रने कुश, अर्घ्य आदि तथा हव्य-कव्यकी विधि—सब कुछ उन तपस्वी मुनिके उपदेशके अनुसार ठीक-ठीक किया ॥ ३२ ॥ ऋषिणा पितृकार्ये च स च धर्मपथे स्थितः । पितृकार्ये कृते चापि विसृष्टः स जगाम ह ॥ ३३ ॥ ऋषिके द्वारा पितृकार्य विधिवत् सम्पन्न हो जानेपर वे ऋषि शूद्रसे विदा लेकर चले गये और वह शूद्र धर्ममार्गमें स्थित हो गया ॥ ३३ ॥ अथ दीर्घस्य कालस्य स तप्यन् शूद्रतापसः । वने पञ्चत्वमगमत् सुकृतेन च तेन वै ॥ ३४ ॥ अजायत महाराजवंशे स च महाद्युतिः । तदनन्तर दीर्घकालतक तपस्या करके वह शूद्र तपस्वी वनमें ही मृत्युको प्राप्त हुआ और उसी पुण्यके प्रभावसे एक महान् राजवंशमें महातेजस्वी बालकके रूपमें उत्पन्न हुआ ॥ ३४ १/२ ॥ तथैव स ऋषिस्तात कालधर्ममवाप ह ॥ ३५ ॥ पुरोहितकुले विप्र आजातो भरतर्षभ । एवं तौ तत्र सम्भूतावुभौ शूद्रमुनी तदा ॥ ३६ ॥ क्रमेण वर्धितौ चापि विद्यासु कुशलावुभौ ॥ ३७ ॥ तात! इसी प्रकार वे ऋषि भी कालधर्म—मृत्युको प्राप्त हुए। भरतश्रेष्ठ! वे ही ऋषि दूसरे जन्ममें उसी राजवंशके पुरोहितके कुलमें उत्पन्न हुए। इस प्रकार वह शूद्र और वे मुनि दोनों ही वहाँ उत्पन्न हुए, क्रमशः बढ़े और सब प्रकारकी विद्याओंमें निपुण हो गये ॥ अथर्ववेदे वेदे च बभूवर्षिः सुनिश्चितः । कल्पप्रयोगे चोत्पन्ने ज्योतिषे च परं गतः ॥ ३८ ॥ सांख्ये चैव परा प्रीतिस्तस्य चैवं व्यवर्धत । वे ऋषि वेद और अथर्ववेदके परिनिष्ठित विद्वान् हो गये। कल्पप्रयोग और ज्योतिषमें भी पारंगत हुए। सांख्यमें भी उनका परम अनुराग बढ़ने लगा ॥ ३८ १/२ ॥ पितर्युपरते चापि कृतशौचस्तु पार्थिव ॥ ३९ ॥ अभिषिक्तः प्रकृतिभी राजपुत्रः स पार्थिवः ।

नरेश! पिताके परलोकवासी हो जानेपर शुद्ध होनेके पश्चात् मन्त्री और प्रजा आदिने मिलकर उस राजकुमारको राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया ।। अभिषिक्तेन स ऋषिरभिषिक्तः पुरोहितः ॥ ४० ॥ राजाके अभिषिक्त होनेके साथ ही उस ऋषिका भी पुरोहितके पदपर अभिषेक कर दिया ॥ ४० ॥ स तं पुरोधाय सुखमवसद भरतर्षभ । राज्यं शशास धर्मेण प्रजाश्च परिपालयन् ॥ ४१ ॥ भरतश्रेष्ठ! ऋषिको पुरोहित बनाकर वह राजा सुखपूर्वक रहने और धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए राज्यका शासन करने लगा ॥ ४१ ॥ पुण्याहवाचने नित्यं धर्मकार्येषु चासकृत् । उत्स्मयन् प्राहसच्चापि दृष्ट्वा राजा पुरोहितम् ॥ ४२ ॥ जब पुरोहितजी प्रतिदिन पुण्याहवाचन करते और निरन्तर धर्मकार्यमें संलग्न रहते, उस समय राजा उन्हें देखकर कभी मुसकराते और कभी जोर-जोरसे हँसने लगते थे ॥ ४२ ॥ एवं स बहुशो राजन् पुरोधसमुपाहसत् । लक्षयित्वा पुरोधास्तु बहुशस्तं नराधिपम् ॥ ४३ ॥ उत्स्मयन्तं च सततं दृष्ट्वासौ मन्युमाविशत् । राजन्! इस प्रकार अनेक बार राजाने पुरोहितका उपहास किया। पुरोहितने जब अनेक बार और निरन्तर उस राजाको अपने प्रति हँसते और मुसकराते लक्ष्य किया, तब उनके मनमें बड़ा खेद और क्षोभ हुआ ।। अथ शून्ये पुरोधास्तु सह राज्ञा समागतः ॥ ४४ ॥ कथाभिरनुकूलाभी राजानं चाभ्यरोचयत् । तदनन्तर एक दिन पुरोहितजी राजासे एकान्तमें मिले और मनोनुकूल कथाएँ सुनाकर राजाको प्रसन्न करने लगे ॥ ४४ ½ ॥ ततोऽब्रवीन्नरेन्द्रं स पुरोधा भरतर्षभ ॥ ४५ ॥ वरमिच्छाम्यहं त्वेकं त्वया दत्तं महाद्युते ॥ ४६ ॥ भरतश्रेष्ठ! फिर पुरोहित राजासे इस प्रकार बोले—‘महातेजस्वी नरेश! मैं आपका दिया हुआ एक वर प्राप्त करना चाहता हूँ' ॥ ४५-४६ ॥

राजोवाच

वराणां ते शतं दद्यां किं बतैकं द्विजोत्तम । स्नेहाच्च बहुमानाच्च नास्त्यदेयं हि मे तव ॥ ४७ ॥ **राजाने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! मैं आपको सौ वर दे सकता हूँ। एककी तो बात ही क्या। आपके प्रति मेरा जो स्नेह और विशेष आदर है, उसे देखते हुए मेरे पास आपके लिये कुछ

भी अदेय नहीं है ।। ४७ ।।

पुरोहित उवाच

एकं वै वरमिच्छामि यदि तुष्टोऽसि पार्थिव ।
प्रतिजानीहि तावत् त्वं सत्यं यद् वद नानृतम् ।। ४८ ।।
**पुरोहितने कहा—**पृथ्वीनाथ! यदि आप प्रसन्न हों तो मैं एक ही वर चाहता हूँ। आप पहले यह प्रतिज्ञा कीजिये कि 'मैं दूँगा।' इस विषयमें सत्य कहिये, झूठ न बोलिये ।। ४८ ।।

भीष्म उवाच

बाढमित्येव तं राजा प्रत्युवाच युधिष्ठिर ।
यदि ज्ञास्यामि वक्ष्यामि अजानन् न तु संवदे ।। ४९ ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तब राजाने उत्तर दिया—'बहुत अच्छा। यदि मैं जानता होऊँगा तो अवश्य बता दूँगा और यदि नहीं जानता होऊँगा तो नहीं बताऊँगा' ।। ४९ ।।

पुरोहित उवाच

पुण्याहवाचने नित्यं धर्मकृत्येषु चासकृत् ।
शान्तिहोमेषु च सदा किं त्वं हससि वीक्ष्य माम् ।। ५० ।।
**पुरोहितजीने कहा—**महाराज! प्रतिदिन पुण्याह-वाचनके समय तथा बारंबार धार्मिक कृत्य कराते समय एवं शान्तिहोमके अवसरोंपर आप मेरी ओर देखकर क्यों हँसा करते हैं? ।। ५० ।।

सव्रीडं वै भवति हि मनो मे हसता त्वया ।
कामया शापितो राजन् नान्यथा वक्तुमर्हसि ।। ५१ ।।
आपके हँसनेसे मेरा मन लज्जित-सा हो जाता है। राजन्! मैं शपथ दिलाकर पूछ रहा हूँ, आप इच्छानुसार सच-सच बताइये। दूसरी बात कहकर बहलाइयेगा मत ।। ५१ ।।

सुव्यक्तं कारणं ह्यत्र न ते हास्यमकारणम् ।
कौतूहलं मे सुभृशं तत्त्वेन कथयस्व मे ।। ५२ ।।
आपके इस हँसनेमें स्पष्ट ही कोई विशेष कारण जान पड़ता है। आपका हँसना बिना किसी कारणके नहीं हो सकता। इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है; अतः आप यथार्थ रूपसे यह सब कहिये ।। ५२ ।।

राजोवाच

एवमुक्ते त्वया विप्र यदवाच्यं भवेदपि ।
अवश्यमेव वक्तव्यं शृणुष्वैकमना द्विज ।। ५३ ।।

**राजाने कहा—**विप्रवर! आपके इस प्रकार पूछनेपर तो यदि कोई न कहने योग्य बात हो तो उसे भी अवश्य ही कह देना चाहिये। अतः आप मन लगाकर सुनिये॥ ५३॥

पूर्वदेहे यथा वृत्तं तन्निबोध द्विजोत्तम।
जातिं स्मराम्यहं ब्रह्मन्नवधानेन मे शृणु॥ ५४॥
द्विजश्रेष्ठ! जब हमने पूर्वजन्ममें शरीर धारण किया था, उस समय जो घटना घटित हुई थी, उसे सुनिये। ब्रह्मन्! मुझे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण है। आप ध्यान देकर मेरी बात सुनिये॥ ५४॥

शूद्रोऽहमभवं पूर्वं तापसो भृशसंयुतः।
ऋषिरुग्रतपास्त्वं च तदाभूद् द्विजसत्तम॥ ५५॥
विप्रवर! पहले जन्ममें मैं शूद्र था। फिर बड़ा भारी तपस्वी हो गया। उन्हीं दिनों आप उग्र तप करनेवाले श्रेष्ठ महर्षि थे॥ ५५॥

प्रीयता हि तदा ब्रह्मन् ममानुग्रहबुद्धिना।
पितृकार्ये त्वया पूर्वमुपदेशः कृतोऽनघ॥ ५६॥
निष्पाप ब्रह्मन्! उन दिनों आप मुझसे बड़ा प्रेम रखते थे; अतः मेरे ऊपर अनुग्रह करनेके विचारसे आपने पितृकार्यमें मुझे आवश्यक विधिका उपदेश किया था॥ ५६॥

बृस्यां दर्भेषु हव्ये च कव्ये च मुनिसत्तम।
एतेन कर्मदोषेण पुरोधास्त्वमजायथाः॥ ५७॥
मुनिश्रेष्ठ! कुशके चट कैसे रखे जायँ? कुशा कैसे बिछायी जाय? हव्य और कव्य कैसे समर्पित किये जायँ? इन्हीं सब बातोंका आपने मुझे उपदेश दिया था। इसी कर्मदोषके कारण आपको इस जन्ममें पुरोहित होना पड़ा॥ ५७॥

अहं राजा च विप्रेन्द्र पश्य कालस्य पर्ययम्।
मत्कृतस्योपदेशस्य त्वयावाप्तमिदं फलम्॥ ५८॥
विप्रेन्द्र! यह कालका उलट-फेर तो देखिये कि मैं तो शूद्रसे राजा हो गया और मुझे ही उपदेश करनेके कारण आपको यह फल मिला॥ ५८॥

एतस्मात् कारणाद् ब्रह्मन् प्रहसे त्वां द्विजोत्तम।
न त्वां परिभवन् ब्रह्मन् प्रहसामि गुरुर्भवान्॥ ५९॥
द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मन्! इसी कारणसे मैं आपकी ओर देखकर हँसता हूँ। आपका अनादर करनेके लिये मैं आपकी हँसी नहीं उड़ाता हूँ; क्योंकि आप मेरे गुरु हैं॥

विपर्ययेण मे मन्युस्तेन संतप्यते मनः।
जातिं स्मराम्यहं तुभ्यमतस्त्वां प्रहसामि वै॥ ६०॥
यह जो उलट-फेर हुआ है, इससे मुझको बड़ा खेद है और इसीसे मेरा मन संतप्त रहता है। मैं अपनी और आपकी भी पूर्वजन्मकी बातोंको याद करता हूँ; इसीलिये आपकी ओर देखकर हँस देता हूँ॥ ६०॥

एवं तवोग्रं हि तप उपदेशेन नाशितम् । पुरोहितत्वमुत्सृज्य यतस्व त्वं पुनर्भवे ॥ ६१ ॥ आपकी उग्र तपस्या थी, वह मुझे उपदेश देनेके कारण नष्ट हो गयी। अतः आप पुरोहितका काम छोड़कर पुनः संसार-सागरसे पार होनेके लिये प्रयत्न कीजिये ॥ ६१ ॥

इतस्त्वमधमामन्यां मा योनिं प्राप्स्यसे द्विज । गृह्यतां द्रविणं विप्र पूतात्मा भव सत्तम ॥ ६२ ॥ ब्रह्मन्! साधुशिरोमणे! कहीं ऐसा न हो कि आप इसके बाद दूसरी किसी नीच योनिमें पड़ जायँ। अतः विप्रवर! जितना चाहिये धन ले लीजिये और अपने अन्तःकरणको पवित्र बनानेका प्रयत्न कीजिये ॥ ६२ ॥

भीष्म उवाच

ततो विसृष्टो राज्ञा तु विप्रो दानान्यनेकशः । ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं भूमिं ग्रामांश्च सर्वशः ॥ ६३ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर राजासे विदा लेकर पुरोहितने बहुत-से ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान दिये। धन, भूमि और ग्राम भी वितरण किये ॥ ६३ ॥

कृच्छ्राणि चीर्त्वा च ततो यथोक्तानि द्विजोत्तमैः । तीर्थानि चापि गत्वा वै दानानि विविधानि च ॥ ६४ ॥ उस समय श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके बताये अनुसार उन्होंने अनेक प्रकारके कृच्छ्रव्रत किये और तीर्थोंमें जाकर नाना प्रकारकी वस्तुएँ दान कीं ॥ ६४ ॥

दत्त्वा गाश्चैव विप्रेभ्यः पूतात्माभवदात्मवान् । तमेव चाश्रमं गत्वा चचार विपुलं तपः ॥ ६५ ॥ ब्राह्मणोंको गोदान करके पवित्रात्मा होकर उन मनस्वी ब्राह्मणने फिर उसी आश्रमपर जाकर बड़ी भारी तपस्या की ॥ ६५ ॥

ततः सिद्धिं परां प्राप्तो ब्राह्मणो राजसत्तम । सम्मतश्चाभवत् तेषामाश्रमे तन्निवासिनाम् ॥ ६६ ॥ नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर परम सिद्धिको प्राप्त होकर वे ब्राह्मण देवता उस आश्रममें रहनेवाले समस्त साधकोंके लिये सम्माननीय हो गये ॥ ६६ ॥

एवं प्राप्तो महत्कृच्छ्रमृषिः सन्नृपसत्तम । ब्राह्मणेन न वक्तव्यं तस्माद् वर्णावरे जने ॥ ६७ ॥ नृपशिरोमणे! इस प्रकार वे ऋषि शूद्रको उपदेश देनेके कारण महान् कष्टमें पड़ गये; इसलिये ब्राह्मणको चाहिये कि वह नीच वर्णके मनुष्यको उपदेश न दे ॥ ६७ ॥

(वर्जयेदुपदेशं च सदैव ब्राह्मणो नृप । उपदेशं हि कुर्वाणो द्विजः कृच्छ्रमवाप्नुयात् ।

नरेश्वर! ब्राह्मणको चाहिये कि वह कभी शूद्रको उपदेश न दे; क्योंकि उपदेश करनेवाला ब्राह्मण स्वयं ही संकटमें पड़ जाता है ॥ नेषितव्यं सदा वाचा द्विजेन नृपसत्तम । न च प्रवक्तव्यमिह किंचिद् वर्णावरे जने ॥) नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मणको अपनी वाणीद्वारा कभी उपदेश देनेकी इच्छा ही नहीं करनी चाहिये। यदि करे भी तो नीच वर्णके पुरुषको तो कदापि कुछ उपदेश न दे ॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्त्रयो वर्णा द्विजातयः । एतेषु कथयन् राजन् ब्राह्मणो न प्रदुष्यति ॥ ६८ ॥ राजन्! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीन वर्ण द्विजाति कहलाते हैं। इन्हें उपदेश देनेवाला ब्राह्मण दोषका भागी नहीं होता है ॥ ६८ ॥ तस्मात् सद्भिर्न वक्तव्यं कस्यचित् किंचिदग्रतः । सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य दुर्ज्ञेया ह्यकृतात्मभिः ॥ ६९ ॥ इसलिये सत्पुरुषोंको कभी किसीके सामने कोई उपदेश नहीं देना चाहिये; क्योंकि धर्मकी गति सूक्ष्म है। जिन्होंने अपने अन्तःकरणको शुद्ध एवं वशीभूत नहीं कर लिया है, उनके लिये धर्मकी गतिको समझना बहुत ही कठिन है ॥ ६९ ॥ तस्मान्मौनेन मुनयो दीक्षां कुर्वन्ति चादृताः । दुरुक्तस्य भयाद् राजन् नाभाषन्ते च किंचन ॥ ७० ॥ राजन्! इसीलिये ऋषि-मुनि मौनभावसे ही आदरपूर्वक दीक्षा देते हैं। कोई अनुचित बात मुँहसे न निकल जाय, इसीके भयसे वे कोई भाषण नहीं देते हैं ॥ धार्मिका गुणसम्पन्नाः सत्यार्जवसमन्विताः । दुरुक्तवाचाभिहितैः प्राप्नुवन्तीह दुष्कृतम् ॥ ७१ ॥ धार्मिक, गुणवान् तथा सत्य-सरलता आदि गुणोंसे सम्पन्न पुरुष भी शास्त्रविरुद्ध अनुचित वचन कह देनेके कारण यहाँ दुष्कर्मके भागी हो जाते हैं ॥ ७१ ॥ उपदेशो न कर्तव्यः कदाचिदपि कस्यचित् । उपदेशाद्धि तत् पापं ब्राह्मणः समवाप्नुयात् ॥ ७२ ॥ ब्राह्मणको चाहिये कि वह कभी किसीको उपदेश न करे; क्योंकि उपदेश करनेसे वह शिष्यके पापको स्वयं ग्रहण करता है ॥ ७२ ॥ विमृश्य तस्मात् प्राज्ञेन वक्तव्यं धर्ममिच्छता । सत्यानृतेन हि कृत उपदेशो हिनस्ति हि ॥ ७३ ॥ अतः धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले विद्वान् पुरुषको बहुत सोच-विचारकर बोलना चाहिये; क्योंकि साँच और झूठमिश्रित वाणीसे किया गया उपदेश हानिकारक होता है ॥ ७३ ॥ वक्तव्यमिह पृष्टेन विनिश्चित्य विनिश्चयम् ।

स चोपदेशः कर्तव्यो येन धर्ममवाप्नुयात् ॥ ७४ ॥ यहाँ किसीके पूछनेपर बहुत सोच-विचारकर शास्त्रका जो सिद्धान्त हो वही बताना चाहिये तथा उपदेश वह करना चाहिये जिससे धर्मकी प्राप्ति हो ॥ ७४ ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातमुपदेशकृते मया ।
महान् क्लेशो हि भवति तस्मान्नोपदिशेदिह ॥ ७५ ॥
उपदेशके सम्बन्धमें मैंने ये सब बातें तुम्हें बतायी हैं। अनधिकारीको उपदेश देनेसे महान् क्लेश प्राप्त होता है। इसलिये यहाँ किसीको उपदेश न दे ॥ ७५ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शूद्रमुनिसंवादे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शूद्र और मुनिका संवादविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ७७ श्लोक हैं)

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एकादशोऽध्यायः

लक्ष्मीके निवास करने और न करने योग्य पुरुष, स्त्री और स्थानोंका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

कीदृशे पुरुषे तात स्त्रीषु वा भरतर्षभ ।
श्रीः पद्मा वसते नित्यं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— तात! भरतश्रेष्ठ! कैसे पुरुषमें और किस तरहकी स्त्रियोंमें लक्ष्मी नित्य निवास करती हैं? पितामह! यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्णयिष्यामि यथावृत्तं यथाश्रुतम् ।
रुक्मिणी देवकीपुत्रसंनिधौ पर्यपृच्छत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! इस विषयमें एक यथार्थ वृत्तान्तको मैंने जैसा सुना है, उसीके अनुसार तुम्हें बता रहा हूँ। देवकीनन्दन श्रीकृष्णके समीप रुक्मिणीदेवीने साक्षात् लक्ष्मीसे जो कुछ पूछा था, वह मुझसे सुनो ॥ २ ॥

नारायणस्याङ्कगतां ज्वलन्तीं
दृष्ट्वा श्रियं पद्मसमानवर्णाम् ।
कौतूहलाद् विस्मितचारुनेत्रा
पप्रच्छ माता मकरध्वजस्य ॥ ३ ॥
भगवान् नारायणके अङ्कमें बैठी हुई कमलके समान कान्तिवाली लक्ष्मीदेवीको अपनी प्रभासे प्रकाशित होती देख जिसके मनोहर नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे थे, उन प्रद्युम्नजननी रुक्मिणीदेवीने कौतूहलवश लक्ष्मीसे पूछा— ॥ ३ ॥

कानीह भूतान्युपसेवसे त्वं
संतिष्ठसे कानिव सेवसे त्वम् ।
तानि त्रिलोकेश्वरभूतकान्ते
तत्त्वेन मे ब्रूहि महर्षिकन्ये ॥ ४ ॥
‘महर्षि भृगुकी पुत्री तथा त्रिलोकीनाथ भगवान् नारायणकी प्रियतमे! देवि! तुम इस जगत्में किन प्राणियोंपर कृपा करके उनके यहाँ रहती हो? कहाँ निवास करती हो और किन-किनका सेवन करती हो? उन सबको मुझे यथार्थरूपसे बताओ’ ॥ ४ ॥

एवं तदा श्रीरभिभाष्यमाणा
देव्या समक्षं गरुडध्वजस्य ।

उवाच वाक्यं मधुराभिधानं मनोहरं चन्द्रमुखी प्रसन्ना ॥ ५ ॥ रुक्मिणीके इस प्रकार पूछनेपर चन्द्रमुखी लक्ष्मीदेवीने प्रसन्न होकर भगवान् गरुडध्वजके सामने ही मीठी वाणीमें यह वचन कहा ॥ ५ ॥

श्रीरुवाच

वसामि नित्यं सुभगे प्रगल्भे दक्षे नरे कर्मणि वर्तमाने । अक्रोधने देवपरे कृतज्ञे जितेन्द्रिये नित्यमुदीर्णसत्त्वे ॥ ६ ॥ **लक्ष्मी बोलीं—**देवि! मैं प्रतिदिन ऐसे पुरुषमें निवास करती हूँ जो सौभाग्यशाली, निर्भीक, कार्यकुशल, कर्मपरायण, क्रोधरहित, देवाराधनतत्पर, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय तथा बढ़े हुए सत्त्वगुणसे युक्त हो ॥ ६ ॥

नाकर्मशीले पुरुषे वसामि न नास्तिके साङ्करिके कृतघ्ने । न भिन्नवृत्ते न नृशंसवर्णे न चापि चौरे न गुरुष्वसूये ॥ ७ ॥ जो पुरुष अकर्मण्य, नास्तिक, वर्णसंकर, कृतघ्न, दुराचारी, क्रूर, चोर तथा गुरुजनोंके दोष देखनेवाला हो, उसके भीतर मैं निवास नहीं करती हूँ ॥ ७ ॥

ये चाल्पतेजोबलसत्त्वमानाः क्लिश्यन्ति कुप्यन्ति च यत्र तत्र । न चैव तिष्ठामि तथाविधेषु नरेषु संगुप्तमनोरथेषु ॥ ८ ॥ जिनमें तेज, बल, सत्त्व और गौरवकी मात्रा बहुत थोड़ी है, जो जहाँ-तहाँ हर बातमें खिन्न हो उठते हैं, जो मनमें दूसरा भाव रखते हैं और ऊपरसे कुछ और ही दिखाते हैं, ऐसे मनुष्योंमें मैं निवास नहीं करती हूँ ॥ ८ ॥

यश्चात्मनि प्रार्थयते न किञ्चिद् यश्च स्वभावोपहतान्तरात्मा । तेष्वल्पसंतोषपरेषु नित्यं नरेषु नाहं निवसामि सम्यक् ॥ ९ ॥ जो अपने लिये कुछ नहीं चाहता, जिसका अन्तःकरण मूढ़तासे आच्छन्न है, जो थोड़ेमें ही संतोष कर लेते हैं, ऐसे मनुष्योंमें मैं भलीभाँति नित्य निवास नहीं करती हूँ ॥

स्वधर्मशीलेषु च धर्मवित्सु

वृद्धोपसेवानिरते च दान्ते । कृतात्मनि क्षान्तिपरे समर्थे क्षान्तासु दान्तासु तथाऽबलासु ॥ १० ॥ सत्यस्वभावार्जवसंयुतासु वसामि देवद्विजपूजिकासु । जो स्वभावतः स्वधर्मपरायण, धर्मज्ञ, बड़े-बूढ़ोंकी सेवामें तत्पर, जितेन्द्रिय, मनको वशमें रखनेवाले, क्षमाशील और सामर्थ्यशाली हैं, ऐसे पुरुषोंमें तथा क्षमाशील एवं जितेन्द्रिय अबलाओंमें भी मैं निवास करती हूँ। जो स्त्रियाँ स्वभावतः सत्यवादिनी तथा सरलतासे संयुक्त हैं, जो देवताओं और द्विजोंकी पूजा करनेवाली हैं, उनमें भी मैं निवास करती हूँ ॥ १० १/२ ॥ (अबन्ध्यकालेषु सदा दानशौचरतेषु च । ब्रह्मचर्यतपोज्ञानगोद्विजातिप्रियेषु च ॥ जो अपने समयको कभी व्यर्थ नहीं जाने देते, सदा दान एवं शौचाचारमें तत्पर रहते हैं, जिन्हें ब्रह्मचर्य, तपस्या, ज्ञान, गौ और द्विज परम प्रिय हैं, ऐसे पुरुषोंमें मैं निवास करती हूँ।। वसामि स्त्रीषु कान्तासु देवद्विजपरासु च । विशुद्धगृहभाण्डासु गोधान्याभिरतासु च ॥) जो स्त्रियाँ कमनीय गुणोंसे युक्त, देवताओं तथा ब्राह्मणोंकी सेवामें तत्पर, घरके बर्तन-भाँड़ोंको शुद्ध तथा स्वच्छ रखनेवाली एवं गौओंकी सेवा तथा धान्यके संग्रहमें तत्पर होती हैं, उनमें भी मैं सदा निवास करती हूँ ।। प्रकीर्णभाण्डामनवेक्ष्यकारिणीं सदा च भर्तुः प्रतिकूलवादिनीम् ॥ ११ ॥ परस्य वेश्माभिरतामलज्जा- मेवंविधां तां परिवर्जयामि । जो घरके बर्तनोंको सुव्यवस्थित रूपसे न रखकर इधर-उधर बिखेरे रहती हैं, सोच-समझकर काम नहीं करती हैं, सदा अपने पतिके प्रतिकूल ही बोलती हैं, दूसरोंके घरोंमें घूमने-फिरनेमें आसक्त रहती हैं और लज्जाको सर्वथा छोड़ बैठती हैं, उनको मैं त्याग देती हूँ।। पापामचोक्षामवलेहिनीं च व्यपेतधैर्यां कलहप्रियां च ॥ १२ ॥ निद्राभिभूतां सततं शयाना- मेवंविधां तां परिवर्जयामि ।

जो स्त्री निर्दयतापूर्वक पापाचारमें तत्पर रहनेवाली, अपवित्र, चटोर, धैर्यहीन, कलहप्रिय, नींदमें बेसुध होकर सदा खाटपर पड़ी रहनेवाली होती है, ऐसी नारीसे मैं सदा दूर ही रहती हूँ ॥ १२ १/२ ॥

सत्यासु नित्यं प्रियदर्शनासु
सौभाग्ययुक्तासु गुणान्वितासु ॥ १३ ॥
वसामि नारीषु पतिव्रतासु
कल्याणशीलासु विभूषितासु ।
जो स्त्रियाँ सत्यवादिनी और अपनी सौम्य वेश-भूषाके कारण देखनेमें प्रिय होती हैं, जो सौभाग्यशालिनी, सद्गुणवती, पतिव्रता एवं कल्याणमय आचार-विचारवाली होती हैं तथा जो सदा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित रहती हैं, ऐसी स्त्रियोंमें मैं सदा निवास करती हूँ ॥ १३ १/२ ॥

यानेषु कन्यासु विभूषणेषु
यज्ञेषु मेघेषु च वृष्टिमत्सु ॥ १४ ॥
वसामि फुल्लासु च पद्मिनीषु
नक्षत्रवीथीषु च शारदीषु ।
गजेषु गोष्ठेषु तथाऽऽसनेषु
सरःसु फुल्लोत्पलपङ्कजेषु ॥ १५ ॥
सुन्दर सवारियोंमें, कुमारी कन्याओंमें, आभूषणोंमें, यज्ञोंमें, वर्षा करनेवाले मेघोंमें, खिले हुए कमलोंमें, शरद् ऋतुकी नक्षत्र-मालाओंमें, हाथियों और गोशालाओंमें, सुन्दर आसनोंमें तथा खिले हुए उत्पल और कमलोंसे सुशोभित सरोवरोंमें मैं सदा निवास करती हूँ ॥ १४-१५ ॥

नदीषु हंसस्वननादितासु
क्रौञ्चावघुष्टस्वरशोभितासु ।
विकीर्णकूलद्रुमराजितासु
तपस्विसिद्धद्विजसेवितासु ॥ १६ ॥
वसामि नित्यं सुबहूदकासु
सिंहैर्गजैश्चाकुलितोदकासु ।
जहाँ हँसोंकी मधुर ध्वनि गूँजती रहती है, क्रौंच पक्षीके कलरव जिनकी शोभा बढ़ाते हैं, जो अपने तटोंपर फैले हुए वृक्षोंकी श्रेणियोंसे शोभायमान हैं, जिनके किनारे तपस्वी, सिद्ध और ब्राह्मण निवास करते हैं, जिनमें बहुत जल भरा रहता है तथा सिंह और हाथी जिनके जलमें अवगाहन करते रहते हैं, ऐसी नदियोंमें भी मैं सदा निवास करती रहती हूँ ॥ १६ १/२ ॥

मत्ते गजे गोवृषभे नरेन्द्र

सिंहासने सत्पुरुषेषु नित्यम् ।। १७ ।। यस्मिञ्जनो हव्यभुजं जुहोति गोब्राह्मणं चार्चति देवताश्च । काले च पुष्पैर्बलयः क्रियन्ते तस्मिन् गृहे नित्यमुपैमि वासम् ।। १८ ।। मतवाले हाथी, साँड़, राजा, सिंहासन और सत्पुरुषोंमें मेरा नित्य-निवास है। जिस घरमें लोग अग्निमें आहुति देते हैं, गौ, ब्राह्मण तथा देवताओंकी पूजा करते हैं और समय-समयपर जहाँ फूलोंसे देवताओंको उपहार समर्पित किये जाते हैं, उस घरमें मैं नित्य निवास करती हूँ ।। १७-१८ ।।

स्वाध्यायनित्येषु सदा द्विजेषु क्षात्रे च धर्माभिरते सदैव । वैश्ये च कृष्याभिरते वसामि शूद्रे च शुश्रूषणनित्ययुक्ते ।। १९ ।। सदा वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहनेवाले ब्राह्मणों, स्वधर्मपरायण क्षत्रियों, कृषि-कर्ममें लगे हुए वैश्यों तथा नित्य सेवापरायण शूद्रोंके यहाँ भी मैं सदा निवास करती हूँ ।। १९ ।।

नारायणे त्वेकमना वसामि सर्वेण भावेन शरीरभूता । तस्मिन् हि धर्मः सुमहान् निविष्टो ब्रह्मण्यता चात्र तथा प्रियत्वम् ।। २० ।। मैं मूर्तिमती एवं अनन्यचित्त होकर तो भगवान् नारायणमें ही सम्पूर्ण भावसे निवास करती हूँ; क्योंकि उनमें महान् धर्म संनिहित है। उनका ब्राह्मणोंके प्रति प्रेम है और उनमें स्वयं सर्वप्रिय होनेका गुण भी है ।।

नाहं शरीरेण वसामि देवि नैवं मया शक्यमिहाभिधातुम् । भावेन यस्मिन् निवसामि पुंसि स वर्धते धर्मयशोऽर्थकामैः ।। २१ ।। देवि! मैं नारायणके सिवा अन्यत्र शरीरसे नहीं निवास करती हूँ। मैं यहाँ ऐसा नहीं कह सकती कि सर्वत्र इसी रूपमें रहती हूँ। जिस पुरुषमें भावनाद्वारा निवास करती हूँ वह धर्म, यश, धन और कामसे सम्पन्न होकर सदा बढ़ता रहता है ।। २१ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्रीरुक्मिणीसंवादे एकादशोऽध्यायः ।। ११ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लक्ष्मी और रुक्मिणीका संवादविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २३ श्लोक हैं)

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द्वादशोऽध्यायः

कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान

(युधिष्ठिर उवाच

प्रायश्चित्तं कृतघ्नानां प्रतिब्रूहि पितामह ।
मातापितॄन् गुरूंश्चैव येऽवमन्यन्ति मोहिताः ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जो मोहवश माता-पिता तथा गुरुजनोंका अपमान करते हैं उन कृतघ्नोंके लिये क्या प्रायश्चित्त है? यह बताइये ।।
ये चाप्यन्ये परे तात कृतघ्ना निरपत्रपाः ।
तेषां गतिं महाबाहो श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
तात! महाबाहो! दूसरे भी जो निर्लज्ज एवं कृतघ्न हैं उनकी गति कैसी होती है? यह सब मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ।।

भीष्म उवाच

कृतघ्नानां गतिस्तात नरके शाश्वतीः समाः ।
मातापितृगुरूणां च ये न तिष्ठन्ति शासने ।।
कृमिकीटपिपीलेषु जायन्ते स्थावरेषु च ।
दुर्लभो हि पुनस्तेषां मानुष्ये पुनरुद्भवः ॥
**भीष्मजीने कहा—**तात! कृतघ्नोंकी एक ही गति है, सदाके लिये नरकमें पड़े रहना। जो माता-पिता तथा गुरुजनोंकी आज्ञाके अधीन नहीं रहते हैं वे कृमि, कीट, पिपीलिका और वृक्ष आदिकी योनियोंमें जन्म लेते हैं। मनुष्ययोनिमें फिर जन्म होना उनके लिये दुर्लभ हो जाता है ।।
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वत्सनाभो महाप्राज्ञो महर्षिः संशितव्रतः ॥
वल्मीकभूतो ब्रह्मर्षिस्तप्यते सुमहत्तपः ।
इस विषयमें जानकार मनुष्य इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण देते हैं। वत्सनाभ नामवाले एक परम बुद्धिमान् महर्षि कठोर व्रतके पालनमें लगे थे। उनके शरीरपर दीमकोंने घर बना लिया था; अतः वे ब्रह्मर्षि बाँबीरूप हो गये थे और उसी अवस्थामें वे बड़ी भारी तपस्या करते थे ।।
तस्मिंश्च तप्यति तपो वासवो भरतर्षभ ।।

ववर्ष सुमहद् वर्षं सविद्युत्स्तनयित्नुमान् ।
भरतश्रेष्ठ! उनके तप करते समय इन्द्रने बिजलीकी चमक और मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके साथ बड़ी भारी वर्षा आरम्भ कर दी॥
तत्र सप्ताहवर्षं तु मुमुचे पाकशासनः ।
निमीलिताक्षस्तद्वर्षं प्रत्यगृह्णीत वै द्विजः ॥
पाकशासन इन्द्रने लगातार एक सप्ताहतक वहाँ जल बरसाया और वे ब्राह्मण वत्सनाभ आँख मूँदकर चुपचाप उस वर्षाका आघात सहन करते रहे॥
तस्मिन् पतति वर्षे तु शीतवातसमन्विते ।
विशीर्णध्वस्तशिखरो वल्मीकोऽशनिताडितः ॥
सर्दी और हवासे युक्त वह वर्षा हो ही रही थी कि बिजलीसे आहत हो उस वल्मीक (बाँबी)-का शिखर टूटकर बिखर गया॥
ताड्यमाने ततस्तस्मिन् वत्सनाभे महात्मनि ।
कारुण्यात् तस्य धर्मः स्वमानृशंस्यमथाकरोत् ॥
अब महामना वत्सनाभपर उस वर्षाकी चोट पड़ने लगी। यह देख धर्मके हृदयमें करुणा भर आयी और उन्होंने वत्सनाभपर अपनी सहज दया प्रकट की॥
चिन्तयानस्य ब्रह्मर्षि तपन्तमधिधार्मिकम् ।
अनुरूपा मतिः क्षिप्रमुपजाता स्वभावजा ॥
तपस्यामें लगे हुए उन अत्यन्त धार्मिक ब्रह्मर्षिकी चिन्ता करते हुए धर्मके हृदयमें शीघ्र ही स्वाभाविक सुबुद्धिका उदय हुआ, जो उन्हींके अनुरूप थी॥
स्वं रूपं माहिषं कृत्वा सुमहन्तं मनोहरम् ।
त्राणार्थं वत्सनाभस्य चतुष्पादुपरी स्थितः ॥
वे विशाल और मनोहर भैंसेका-सा अपना स्वरूप बनाकर वत्सनाभकी रक्षाके लिये उनके चारों ओर अपने चारों पैर जमाकर उनके ऊपर खड़े हो गये॥
यदा त्वपगतं वर्षं शीतवातसमन्वितम् ।
ततो महिषरूपी स धर्मो धर्मभृतां वर ॥
शनैर्वल्मीकमुत्सृज्य प्राद्रवद् भरतर्षभ ।
स्थितेऽस्मिन् वृष्टिसम्पाते रक्षितः स महातपाः ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भरतभूषण युधिष्ठिर! जब शीतल हवासे युक्त वह वर्षा बंद हो गयी तब भैंसेका रूप धारण करनेवाले धर्म धीरेसे उस वल्मीकको छोड़कर वहाँसे दूर खिसक गये। उस मूसलाधार वर्षामें महिषरूपधारी धर्मके खड़े हो जानेसे महातपस्वी वत्सनाभकी रक्षा हो गयी॥
दिशः सुविपुलास्तत्र गिरीणां शिखराणि च ॥
दृष्ट्वा च पृथिवीं सर्वां सलिलेन परिप्लुताम् ।

जलाशयान् स तान् दृष्ट्वा विप्रः प्रमुदितोऽभवत् ।।
तदनन्तर वहाँ सुविस्तृत दिशाओं, पर्वतोंके शिखरों, जलमें डूबी हुई सारी पृथ्वी और जलाशयोंको देखकर ब्राह्मण वत्सनाभ बहुत प्रसन्न हुए ।।
अचिन्तयद् विस्मितश्च वर्षात् केनाभिरक्षितः ।
ततोऽपश्यत् तं महिषमवस्थितमदूरतः ।।
फिर वे विस्मित होकर सोचने लगे कि ‘इस वर्षासे किसने मेरी रक्षा की है। इतनेहीमें पास ही खड़े हुए उस भैंसेपर उनकी दृष्टि पड़ी ।।
तिर्यग्योनावपि कथं दृश्यते धर्मवत्सलः ।
अतो नु भद्रं महिषः शिलापट्ट इव स्थितः ।
पीवरश्चैव शूल्यश्च बहुमांसो भवेदयम् ।।
‘अहो! पशुयोनिमें पैदा होकर भी यह कैसा धर्मवत्सल दिखायी देता है? निश्चय ही यह भैंसा मेरे ऊपर शिलापट्टके समान खड़ा हो गया था। इसीलिये मेरा भला हुआ है। यह बड़ा मोटा और बहुत मांसल है’ ।।
तस्य बुद्धिरियं जाता धर्मसंसक्तिजा मुनेः ।
कृतघ्ना नरकं यान्ति ये तु विश्वासघातिनः ।।
तदनन्तर धर्ममें अनुराग होनेके कारण मुनिके हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘जो विश्वासघाती एवं कृतघ्न मनुष्य हैं, वे नरकमें पड़ते हैं ।।
निष्कृतिं नैव पश्यामि कृतघ्नानां कथंचन ।
ऋते प्राणपरित्यागं धर्मज्ञानां वचो यथा ।।
‘मैं प्राण-त्यागके सिवा कृतघ्नोंके उद्धारका दूसरा कोई उपाय किसी तरह नहीं देख पाता। धर्मज्ञ पुरुषोंका कथन भी ऐसा ही है ।।
अकृत्वा भरणं पित्रोरदत्त्वा गुरुदक्षिणाम् ।
कृतघ्नतां च सम्प्राप्य मरणान्ता च निष्कृतिः ।।
‘पिता-माताका भरण-पोषण न करके तथा गुरुदक्षिणा न देकर मैं कृतघ्नभावको प्राप्त हो गया हूँ। इस कृतघ्नताका प्रायश्चित्त है स्वेच्छासे मृत्युको वरण कर लेना ।।
आकाङ्क्षायामुपेक्षायां चोपपातकमुत्तमम् ।
तस्मात् प्राणान् परित्यक्ष्ये प्रायश्चित्तार्थमित्युत ।।
‘अपने कृतघ्न जीवनकी आकांक्षा और प्रायश्चित्तकी उपेक्षा करनेपर भी भारी उपपातक भी बढ़ता रहेगा। अतः मैं प्रायश्चित्तके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करूँगा’ ।।
स मेरुशिखरं गत्वा निस्सङ्गेनान्तरात्मना ।
प्रायश्चित्तं कर्तुकामः शरीरं त्यक्तुमुद्यतः ।।
निगृहीतश्च धर्मात्मा हस्ते धर्मेण धर्मवित् ।।