महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
रास्ता चलनेपर तथा मल-मूत्रका त्याग करनेपर यथोचित शुद्धि करके दो बार आचमन करे। आचमनमें इतना जल पीये कि वह हृदयतक पहुँच जाय ॥
अन्नं बुभुक्षमाणस्तु त्रिर्मुखेन स्पृशेदपः ।
भुक्त्वा चान्नं तथैव त्रिर्द्विः पुनः परिमार्जयेत् ॥ ५५ ॥
भोजन करनेकी इच्छावाला पुरुष पहले तीन बार मुखसे जलका स्पर्श (आचमन) करे। फिर भोजनके पश्चात् भी तीन आचमन करे। फिर अंगुष्ठके मूलभागसे दो बार मुँहको पोंछे ॥ ५५ ॥
प्राङ्मुखो नित्यमश्नीयाद् वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन् ।
प्रस्कन्दयेच्च मनसा भुक्त्वा चाग्निमुपस्पृशेत् ॥ ५६ ॥
भोजन करनेवाला पुरुष प्रतिदिन पूर्वकी ओर मुँह करके मौन भावसे भोजन करे। भोजन करते समय परोसे हुए अन्नकी निन्दा न करे। किंचिन्मात्र अन्न थालीमें छोड़ दे और भोजन करके मन-ही-मन अग्निका स्मरण करे ॥ ५६ ॥
आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः ।
धन्यं पश्चान्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्क्ते उदङ्मुखः ॥ ५७ ॥
जो मनुष्य पूर्व दिशाकी ओर मुँह करके भोजन करता है, उसे दीर्घायु, जो दक्षिणकी ओर मुँह करके भोजन करता है उसे यश, जो पश्चिमकी ओर मुख करके भोजन करता है उसे धन और जो उत्तराभिमुख होकर भोजन करता है उसे सत्यकी प्राप्ति होती है ॥
अग्निमालभ्य तोयेन सर्वान् प्राणानुपस्पृशेत् ।
गात्राणि चैव सर्वाणि नाभिं पाणितले तथा ॥ ५८ ॥
(मनसे) अग्निका स्पर्श करके जलसे सम्पूर्ण इन्द्रियोंका, सब अंगोंका, नाभिका और दोनों हथेलियोंका स्पर्श करे ॥ ५८ ॥
नाधितिष्ठेत् तुषं जातु केशभस्मकपालिकाः ।
अन्यस्य चाप्यवस्नातं दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ५९ ॥
भूसी, भस्म, बाल और मुर्देकी खोपड़ी आदिपर कभी न बैठे। दूसरेके नहाये हुए जलका दूरसे ही त्याग कर दे ॥ ५९ ॥
शान्तिहोमांश्च कुर्वीत सावित्राणि च धारयेत् ।
निषण्णश्चापि खादेत न तु गच्छन् कदाचन ॥ ६० ॥
शान्ति-होम करे, सावित्रसंज्ञक मन्त्रोंका जप और स्वाध्याय करे। बैठकर ही भोजन करे, चलते-फिरते कदापि भोजन नहीं करना चाहिये ॥ ६० ॥
मूत्रं नोत्तिष्ठता कार्यं न भस्मनि न गोव्रजे ।
आर्द्रपादस्तु भुञ्जीत नार्द्रपादस्तु संविशेत् ॥ ६१ ॥
खड़ा होकर पेशाब न करे। राखमें और गोशालामें भी मूत्र त्याग न करे, भीगे पैर भोजन तो करे, परंतु शयन न करे ॥ ६१ ॥
आर्द्रपादस्तु भुंजानो वर्षाणां जीवते शतम् । त्रीणि तेजांसि नोच्छिष्ट आलभेत कदाचन ॥ ६२ ॥ अग्निं गां ब्राह्मणं चैव तथा ह्यायुर्न रिष्यते । भीगे पैर भोजन करनेवाला मनुष्य सौ वर्षोंतक जीवन धारण करता है। भोजन करके हाथ-मुँह धोये बिना मनुष्य उच्छिष्ट (अपवित्र) रहता है। ऐसी अवस्थामें उसे अग्नि, गौ तथा ब्राह्मण—इन तीन तेजस्वियोंका स्पर्श नहीं करना चाहिये। इस प्रकार आचरण करनेसे आयुका नाश नहीं होता ॥ ६२ १/२ ॥
त्रीणि तेजांसि नोच्छिष्ट उदीक्षेत कदाचन ॥ ६३ ॥ सूर्याचन्द्रमसौ चैव नक्षत्राणि च सर्वशः । उच्छिष्ट मनुष्यको सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र—इन त्रिविध तेजोंकी ओर कभी दृष्टि नहीं डालनी चाहिये ॥ ६३ १/२ ॥
ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आयति ॥ ६४ ॥ प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान् प्रतिपद्यते । वृद्ध पुरुषके आनेपर तरुण पुरुषके प्राण ऊपरकी ओर उठने लगते हैं। ऐसी दशामें जब वह खड़ा होकर वृद्ध पुरुषोंका स्वागत और उन्हें प्रणाम करता है, तब वे प्राण पुनः पूर्वावस्थामें आ जाते हैं ॥ ६४ १/२ ॥
अभिवादयीत वृद्धांश्च दद्याच्चैवासनं स्वयम् ॥ ६५ ॥ कृतांजलिरुपासीत गच्छन्तं पृष्ठतोऽन्वियात् । इसलिये जब कोई वृद्ध पुरुष अपने पास आवे, तब उसे प्रणाम करके बैठनेको आसन दे और स्वयं हाथ जोड़कर उसकी सेवामें उपस्थित रहे। फिर जब वह जाने लगे, तब उसके पीछे-पीछे कुछ दूरतक जाय ॥
न चासीतासने भिन्ने भिन्नकांस्यं च वर्जयेत् ॥ ६६ ॥ नैकवस्त्रेण भोक्तव्यं न नग्नः स्नातुमर्हति । फटे हुए आसनपर न बैठे। फूटी हुई काँसीकी थालीको काममें न ले। एक ही वस्त्र (केवल धोती) पहनकर भोजन न करे (साथमें गमछा भी लिये रहे)। नग्न होकर स्नान न करे ॥ ६६ १/२ ॥
स्वप्तव्यं नैव नग्नेन न चोच्छिष्टोऽपि संविशेत् ॥ ६७ ॥ उच्छिष्टो न स्पृशेच्छीर्षं सर्वे प्राणास्तदाश्रयाः । नंगे होकर न सोये। उच्छिष्ट अवस्थामें भी शयन न करे। जूठे हाथसे मस्तकका स्पर्श न करे; क्योंकि समस्त प्राण मस्तकके ही आश्रित हैं ॥ ६७ १/२ ॥
केशग्रहं प्रहारांश्च शिरस्येतान् विवर्जयेत् ॥ ६८ ॥ न संहताभ्यां पाणिभ्यां कण्डूयेदात्मनः शिरः ।
न चाभीक्ष्णं शिरः स्नायात् तथास्यायुर्न रिष्यते ॥ ६९ ॥ सिरके बाल पकड़कर खींचना और मस्तकपर प्रहार करना वर्जित है। दोनों हाथ सटाकर उनसे अपना सिर न खुजलावे। बारंबार मस्तकपर पानी न डाले। इन सब बातोंके पालनसे मनुष्यकी आयु क्षीण नहीं होती है॥ ६८-६९॥
शिरःस्नातस्तु तैलैश्च नांगं किंचिदपि स्पृशेत् ।
तिलमृष्टं न चाश्नीयात् तथास्यायुर्न रिष्यते ॥ ७० ॥
सिरपर तेल लगानेके बाद उसी हाथसे दूसरे अंगोंका स्पर्श नहीं करना चाहिये और तिलके बने हुए पदार्थ नहीं खाने चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्यकी आयु क्षीण नहीं होती है॥ ७०॥
नाध्यापयेत् तथोच्छिष्टो नाधीयीत कदाचन ।
वाते च पूतिगन्धे च मनसापि न चिन्तयेत् ॥ ७१ ॥
जूठे मुँह न पढ़ाये तथा उच्छिष्ट अवस्थामें स्वयं भी कभी स्वाध्याय न करे। यदि दुर्गन्धयुक्त वायु चले, तब तो मनसे स्वाध्यायका चिन्तन भी नहीं करना चाहिये ॥ ७१ ॥
अत्र गाथा यमोद्गीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।
आयुरस्य निकृन्तामि प्रजास्तस्याददे तथा ॥ ७२ ॥
उच्छिष्टो यः प्राद्रवति स्वाध्यायं चाधिगच्छति ।
यश्चानध्यायकालेऽपि मोहादभ्यस्यति द्विजः ॥ ७३ ॥
तस्य वेदः प्रणश्येत आयुश्च परिहीयते ।
तस्माद् युक्तो ह्यनध्याये नाधीयीत कदाचन ॥ ७४ ॥
प्राचीन इतिहासके जानकार लोग इस विषयमें यमराजकी गायी हुई गाथा सुनाया करते हैं। (यमराज कहते हैं—) 'जो मनुष्य जूठे मुँह उठकर दौड़ता और स्वाध्याय करता है, मैं उसकी आयु नष्ट कर देता हूँ और उसकी संतानोंको भी उससे छीन लेता हूँ। जो द्विज मोहवश अनध्यायके समय भी अध्ययन करता है, उसके वैदिक ज्ञान और आयुका भी नाश हो जाता है।' अतः सावधान पुरुषको निषिद्ध समयमें कभी वेदोंका अध्ययन नहीं करना चाहिये ॥ ७२—७४ ॥
प्रत्यादित्यं प्रत्यनलं प्रति गां च प्रति द्विजान् ।
ये मेहन्ति च पन्थानं ते भवन्ति गतायुषः ॥ ७५ ॥
जो सूर्य, अग्नि, गौ तथा ब्राह्मणोंकी ओर मुँह करके पेशाब करते हैं और जो बीच रास्तेमें मूतते हैं, वे सब गतायु हो जाते हैं ॥ ७५ ॥
उभे मूत्रपुरीषे तु दिवा कुर्यादुदङ्मुखः ।
दक्षिणाभिमुखो रात्रौ तथा ह्यायुर्न रिष्यते ॥ ७६ ॥
मल और मूत्र दोनोंका त्याग दिनमें उत्तराभिमुख होकर करे और रातमें दक्षिणाभिमुख। ऐसा करनेसे आयुका नाश नहीं होता ॥ ७६ ॥
त्रीन् कृशान् नावजानीयाद् दीर्घमायुर्जिजीविषुः । ब्राह्मणं क्षत्रियं सर्पं सर्वे ह्याशीविषास्त्रयः ॥ ७७ ॥ जिसे दीर्घ कालतक जीवित रहनेकी इच्छा हो, वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और सर्प—इन तीनोंके दुर्बल होनेपर भी इनको न छेड़े; क्योंकि ये सभी बड़े जहरीले होते हैं ॥
दहत्याशीविषः क्रुद्धो यावत् पश्यति चक्षुषा । क्षत्रियोऽपि दहेत् क्रुद्धो यावत् स्पृशति तेजसा ॥ ७८ ॥ ब्राह्मणस्तु कुलं हन्याद् ध्यानेनावेक्षितेन च । तस्मादेतत् त्रयं यत्नादुपसेवेत पण्डितः ॥ ७९ ॥ क्रोधमें भरा हुआ साँप जहाँतक आँखोंसे देख पाता है, वहाँतक धावा करके काटता है। क्षत्रिय भी कुपित होनेपर अपनी शक्तिभर शत्रुको भस्म करनेकी चेष्टा करता है; परंतु ब्राह्मण जब कुपित होता है, तब वह अपनी दृष्टि और संकल्पसे अपमान करनेवाले पुरुषके सम्पूर्ण कुलको दग्ध कर डालता है; इसलिये समझदार मनुष्यको यत्नपूर्वक इन तीनोंकी सेवा करनी चाहिये ॥ ७८-७९ ॥
गुरुणा चैव निर्बन्धो न कर्तव्यः कदाचन । अनुमान्यः प्रसाद्यश्च गुरुः क्रुद्धो युधिष्ठिर ॥ ८० ॥ गुरुके साथ कभी हठ नहीं ठानना चाहिये। युधिष्ठिर! यदि गुरु अप्रसन्न हों तो उन्हें हर तरहसे मान देकर मनाकर प्रसन्न करनेकी चेष्टा करनी चाहिये ॥
सम्यङ्मिथ्याप्रवृत्तेऽपि वर्तितव्यं गुराविह । गुरुनिन्दा दहत्यायुर्मुष्याणां न संशयः ॥ ८१ ॥ गुरु प्रतिकूल बर्ताव करते हों तो भी उनके प्रति अच्छा ही बर्ताव करना उचित है; क्योंकि गुरुनिन्दा मनुष्योंकी आयुको दग्ध कर देती है, इसमें संशय नहीं है ॥ ८१ ॥
दूरादावसथान्मूत्रं दूरात् पादावसेचनम् । उच्छिष्टोत्सर्जनं चैव दूरे कार्यं हितैषिणा ॥ ८२ ॥ अपना हित चाहनेवाला मनुष्य घरसे दूर जाकर पेशाब करे, दूर ही पैर धोवे और दूरपर ही जूठे फेंके ॥ ८२ ॥
रक्तमाल्यं न धार्यं स्याच्छुक्लं धार्यं तु पण्डितैः । वर्जयित्वा तु कमलं तथा कुवलयं प्रभो ॥ ८३ ॥ प्रभो! विद्वान् पुरुषको लाल फूलोंकी नहीं, श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करनी चाहिये; परंतु कमल और कुवलयको छोड़कर ही यह नियम लागू होता है। अर्थात् कमल और कुवलय लाल हों तो भी उन्हें धारण करनेमें कोई हर्ज नहीं है ॥ ८३ ॥
रक्तं शिरसि धार्यं तु तथा वानेयमित्यपि । कांचनीयापि माला या न सा दुष्यति कर्हिचित् ॥ ८४ ॥
लाल रंगके फूल तथा वन्य पुष्पको मस्तकपर धारण करना चाहिये। सोनेकी माला पहननेसे कभी अशुद्ध नहीं होती ॥ ८४ ॥
स्नातस्य वर्णकं नित्यमार्द्रं दद्याद् विशाम्पते ।
विपर्ययं न कुर्वीत वाससो बुद्धिमान् नरः ॥ ८५ ॥
प्रजानाथ! स्नानके पश्चात् मनुष्यको अपने ललाटपर गीला चन्दन लगाना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको कपड़ोंमें कभी उलट-फेर नहीं करना चाहिये अर्थात् उत्तरीय वस्त्रको अधोवस्त्रके स्थानमें और अधोवस्त्रको उत्तरीयके स्थानमें न पहने ॥ ८५ ॥
तथा नान्यधृतं धार्यं न चापदशमेव च ।
अन्यदेव भवेद् वासः शयनीये नरोत्तम ॥ ८६ ॥
अन्यद् रथ्यासु देवानामार्चायामन्यदेव हि ।
नरश्रेष्ठ! दूसरेके पहने हुए कपड़े नहीं पहनने चाहिये। जिसकी कोर फट गयी हो, उसको भी नहीं धारण करना चाहिये। सोनेके लिये दूसरा वस्त्र होना चाहिये। सड़कोंपर घूमनेके लिये दूसरा और देवताओंकी पूजाके लिये दूसरा ही वस्त्र रखना चाहिये ॥ ८६ १/२ ॥
प्रियंगुचन्दनाभ्यां च बिल्वेन तगरेण च ॥ ८७ ॥
पृथगेवानुलिम्पेत केसरेण च बुद्धिमान् ।
बुद्धिमान् पुरुष राई, चन्दन, बिल्व, तगर तथा केसरके द्वारा पृथक्-पृथक् अपने शरीरमें उबटन लगावे ॥
उपवासं च कुर्वीत स्नातः शुचिरलंकृतः ॥ ८८ ॥
पर्वकालेषु सर्वेषु ब्रह्मचारी सदा भवेत् ।
मनुष्य सभी पर्वोंके समय स्नान करके पवित्र हो वस्त्र एवं आभूषणोंसे विभूषित होकर उपवास करे तथा पर्वकालमें सदा ही ब्रह्मचर्यका पालन करे ॥
समानमेकपात्रे तु भुञ्जेन्नान्नं जनेश्वर ॥ ८९ ॥
नालीढया परिहतं भक्षयीत कदाचन ।
तथा नोद्धृतसाराणि प्रेक्ष्यते नाप्रदाय च ॥ ९० ॥
जनेश्वर! किसीके साथ एक पात्रमें भोजन न करे। जिसे रजस्वला स्त्रीने अपने स्पर्शसे दूषित कर दिया हो, ऐसे अन्नका भोजन न करे एवं जिसमेंसे सार निकाल लिया गया हो ऐसे पदार्थको कदापि भक्षण न करे तथा जो तरसती हुई दृष्टिसे अन्नकी ओर देख रहा हो, उसे दिये बिना भोजन न करे ॥ ८९-९० ॥
न संनिकृष्टे मेधावी नाशुचेर्न च सत्सु च ।
प्रतिषिद्धान् नधर्मेषु भक्ष्यान् भुञ्जीत पृष्ठतः ॥ ९१ ॥
बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह किसी अपवित्र मनुष्यके निकट अथवा सत्पुरुषोंके सामने बैठकर भोजन न करे। धर्मशास्त्रोंमें जिनका निषेध किया गया हो, ऐसे भोजनको पीठ पीछे छिपाकर भी न खाय ॥ ९१ ॥
पिप्पलं च वटं चैव शणशाकं तथैव च ।
उदुम्बरं न खादेच्च भवार्थी पुरुषोत्तमः ॥ ९२ ॥
अपना कल्याण चाहनेवाले श्रेष्ठ पुरुषको पीपल, बड़ और गूलरके फलका तथा सनके सागका सेवन नहीं करना चाहिये ॥ ९२ ॥
न पाणौ लवणं विद्वान् प्राश्नीयान्न च रात्रिषु ।
दधिसक्तून् न भुञ्जीत वृथा मांसं च वर्जयेत् ॥ ९३ ॥
विद्वान् पुरुष हाथमें नमक लेकर न चाटे। रातमें दही और सत्तू न खाय। मांस अखाद्य वस्तु है, उसका सर्वथा त्याग कर दे ॥ ९३ ॥
सायंप्रातश्च भुञ्जीत नान्तराले समाहितः ।
वालेन तु न भुञ्जीत परश्राद्धं तथैव च ॥ ९४ ॥
प्रतिदिन सबेरे और शामको ही एकाग्रचित्त होकर भोजन करे। बीचमें कुछ भी खाना उचित नहीं है। जिस भोजनमें बाल पड़ गया हो, उसे न खाय तथा शत्रुके श्राद्धमें कभी अन्न न ग्रहण करे ॥ ९४ ॥
वाग्यतो नैकवस्त्रश्च नासंविष्टः कदाचन ।
भूमौ सदैव नाश्नीयान्नानासीनो न शब्दवत् ॥ ९५ ॥
भोजनके समय मौन रहना चाहिये। एक ही वस्त्र धारण करके अथवा सोये-सोये कदापि भोजन न करे। भोजनके पदार्थको भूमिपर रखकर कदापि न खाय। खड़ा होकर या बातचीत करते हुए कभी भोजन नहीं करना चाहिये ॥ ९५ ॥
तोयपूर्वं प्रदायान्नमतिथिभ्यो विशाम्पते ।
पश्चाद् भुञ्जीत मेधावी न चाप्यन्यमना नरः ॥ ९६ ॥
प्रजानाथ! बुद्धिमान् पुरुष पहले अतिथिको अन्न और जल देकर पीछे स्वयं एकाग्रचित्त हो भोजन करे ॥
समानमेकपङ्क्त्यां तु भोज्यमन्नं नरेश्वर ।
विषं हालाहलं भुङ्क्ते योऽप्रदाय सुहृज्जने ॥ ९७ ॥
नरेश्वर! एक पंक्तिमें बैठनेपर सबको एक समान भोजन करना चाहिये। जो अपने सुहृद्जनोंको न देकर अकेला ही भोजन करता है, वह हालाहल विष ही खाता है ॥ ९७ ॥
पानीयं पायसं सक्तून् दधिसर्पिर्मधून्यपि ।
निरस्य शेषमन्येषां न प्रदेयं तु कस्यचित् ॥ ९८ ॥
पानी, खीर, सत्तू, दही, घी और मधु—इन सबको छोड़कर अन्य भक्ष्य पदार्थोंका अवशिष्ट भाग दूसरे किसीको नहीं देना चाहिये ॥ ९८ ॥
भुञ्जानो मनुजव्याघ्र नैव शंकां समाचरेत् ।
दधि चाप्यनुपानं वै न कर्तव्यं भवार्थिना ॥ ९९ ॥
पुरुषसिंह! भोजन करते समय भोजनके विषयमें शंका नहीं करनी चाहिये तथा अपना भला चाहनेवाले पुरुषको भोजनके अन्तमें दही नहीं पीना चाहिये ।। ९९ ।। आचम्य चैकहस्तेन परिप्लाव्यं तथोदकम् । अंगुष्ठं चरणस्याथ दक्षिणस्यावसेचयेत् ।। १०० ।। भोजन करनेके पश्चात् कुल्ला करके मुँह धो ले और एक हाथसे दाहिने पैरके अँगूठेपर पानी डाले ।। पाणिं मूर्ध्नि समाधाय स्पृष्ट्वा चाग्निं समाहितः । ज्ञातिश्रैष्ठ्यमवाप्नोति प्रयोगकुशलो नरः ।। १०१ ।। फिर प्रयोगकुशल मनुष्य एकाग्रचित्त हो अपने हाथको सिरपर रखे। उसके बाद अग्निका मनसे स्पर्श करे। ऐसा करनेसे वह कुटुम्बीजनोंमें श्रेष्ठता प्राप्त कर लेता है ।। १०१ ।। अद्भिः प्राणान् समालभ्य नाभिं पाणितले तथा । स्पृशंश्चैव प्रतिष्ठेत न चाप्यार्द्रण पाणिना ।। १०२ ।। इसके बाद जलसे आँख, नाक आदि इन्द्रियों और नाभिका स्पर्श करके दोनों हाथोंकी हथेलियोंको धो डाले। धोनेके पश्चात् गीले हाथ लेकर ही न बैठ जाय (उन्हें कपड़ोंसे पोंछकर सुखा दे) ।। १०२ ।। अंगुष्ठस्यान्तराले च ब्राह्मं तीर्थमुदाहृतम् । कनिष्ठिकायाः पश्चात् तु देवतीर्थमिहोच्यते ।। १०३ ।। अँगूठेका अन्तराल (मूलस्थान) ब्राह्मतीर्थ कहलाता है, कनिष्ठा आदि अँगुलियोंका पश्चाद्भाग (अग्रभाग) देवतीर्थ कहा जाता है ।। १०३ ।। अङ्गुष्ठस्य च यन्मध्यं प्रदेशिन्याश्च भारत । तेन पित्र्याणि कुर्वीत स्पृष्ट्वापो न्यायतः सदा ।। १०४ ।। भारत! अंगुष्ठ और तर्जनीके मध्यभागको पितृतीर्थ कहते हैं। उसके द्वारा शास्त्रविधिसे जल लेकर सदा पितृकार्य करना चाहिये ।। १०४ ।। परापवादं न ब्रूयान्नाप्रियं च कदाचन । न मन्युः कश्चिदुत्पाद्यः पुरुषेण भवार्थिना ।। १०५ ।। अपनी भलाई चाहनेवाले पुरुषको दूसरोंकी निन्दा तथा अप्रिय वचन मुँहसे नहीं निकालने चाहिये और किसीको क्रोध भी नहीं दिलाना चाहिये ।। १०५ ।। पतितैस्तु कथां नेच्छेद् दर्शनं च विवर्जयेत् । संसर्गं च न गच्छेत तथाऽऽयुर्विन्दते महत् ।। १०६ ।। पतित मनुष्योंके साथ वार्तालापकी इच्छा न करे। उनका दर्शन भी त्याग दे और उनके सम्पर्कमें कभी न जाय। ऐसा करनेसे मनुष्य बड़ी आयु पाता है ।। १०६ ।। न दिवा मैथुनं गच्छेन्न कन्यां न च बन्धकीम् ।
न चास्नातां स्त्रियं गच्छेत् तथायुर्विन्दते महत् ॥ १०७ ॥ दिनमें कभी मैथुन न करे। कुमारी कन्या और कुलटाके साथ कभी समागम न करे। अपनी पत्नी भी जबतक ऋतुस्नाता न हो तबतक उसके साथ समागम न करे। इससे मनुष्यको बड़ी आयु प्राप्त होती है ॥ स्वे स्वे तीर्थे समाचम्य कार्ये समुपकल्पिते । त्रिःपीत्वाऽऽपो द्विः प्रमृज्य कृतशौचो भवेन्नरः ॥ १०८ ॥ कार्य उपस्थित होनेपर अपने-अपने तीर्थमें आचमन करके तीन बार जल पीये और दो बार ओठोंको पोंछ ले—ऐसा करनेसे मनुष्य शुद्ध हो जाता है ॥ १०८ ॥ इन्द्रियाणि सकृत्स्पृश्य त्रिर्भ्युक्ष्य च मानवः । कुर्वीत पित्र्यं दैवं च वेददृष्टेन कर्मणा ॥ १०९ ॥ पहले नेत्र आदि इन्द्रियोंका एक बार स्पर्श करके तीन बार अपने ऊपर जल छिड़के, इसके बाद वेदोक्त विधिके अनुसार देवयज्ञ और पितृयज्ञ करे ॥ १०९ ॥ ब्राह्मणार्थे च यच्छौचं तच्च मे शृणु कौरव । पवित्रं च हितं चैव भोजनाद्यन्तयोस्तथा ॥ ११० ॥ कुरुनन्दन! अब ब्राह्मणके लिये भोजनके आदि और अन्तमें जो पवित्र एवं हितकारक शुद्धिका विधान है, उसे बता रहा हूँ, सुनो ॥ ११० ॥ सर्वशौचेषु ब्राह्मेण तीर्थेन समुपस्पृशेत् । निष्ठिव्य तु तथा क्षुत्त्वा स्पृश्यापो हि शुचिर्भवेत् ॥ १११ ॥ ब्राह्मणको प्रत्येक शुद्धिके कार्यमें ब्राह्मतीर्थसे आचमन करना चाहिये। थूकने और छींकनेके बाद जलका स्पर्श (आचमन) करनेसे वह शुद्ध होता है ॥ वृद्धो ज्ञातिस्तथा मित्रं दरिद्रो यो भवेदपि । (कुलीनः पण्डित इति रक्ष्या निःस्वाः स्वशक्तितः ।) गृहे वासयितव्यास्ते धन्यमायुष्यमेव च ॥ ११२ ॥ बूढ़े कुटुम्बी, दरिद्र मित्र और कुलीन पण्डित यदि निर्धन हों तो उनकी यथाशक्ति रक्षा करनी चाहिये। उन्हें अपने घरपर ठहराना चाहिये। इससे धन और आयुकी वृद्धि होती है ॥ ११२ ॥ गृहे पारावता धन्याः शुकाश्च सहसारिकाः । गृहेष्वेते न पापाय तथा वै तैलपायिकाः ॥ ११३ ॥ (देवता प्रतिमाऽऽदर्शाश्चन्दनाः पुष्पवल्लिकाः । शुद्धं जलं सुवर्णं च रजतं गृहमंगलम् ॥) परेवा, तोता और मैना आदि पक्षियोंका घरमें रहना अभ्युदयकारी एवं मंगलमय है। ये तैलपायिक पक्षियोंकी भाँति अमंगल करनेवाले नहीं होते। देवताकी प्रतिमा, दर्पण, चन्दन,
फूलकी लता, शुद्ध जल, सोना और चाँदी—इन सब वस्तुओंका घरमें रहना मंगल-कारक है ।। ११३ ।।
उद्दीपकाश्च गृध्राश्च कपोता भ्रमरास्तथा । निविशेयुर्यदा तत्र शान्तिमेव तदाऽऽचरेत् । अमंगल्यानि चैतानि तथाक्रोशो महात्मनाम् ।। ११४ ।। उद्दीपक, गीध, कपोत (जंगली कबूतर) और भ्रमर नामक पक्षी यदि कभी घरमें आ जायँ तो सदा उसकी शान्ति ही करानी चाहिये; क्योंकि ये अमंगलकारी होते हैं। महात्माओंकी निन्दा भी मनुष्यका अकल्याण करनेवाली है ।। ११४ ।।
महात्मनोऽतिगुह्यानि न वक्तव्यानि कर्हिचित् । अगम्याश्च न गच्छेत राज्ञः पत्नीं सखीस्तथा ।। ११५ ।। महात्मा पुरुषोंके गुप्त कर्म कहीं किसीपर प्रकट नहीं करने चाहिये। परायी स्त्रियाँ सदा अगम्य होती हैं, उनके साथ कभी समागम न करे। राजाकी पत्नी और सखियोंके पास भी कभी न जाय ।। ११५ ।।
वैद्यानां बालवृद्धानां भृत्यानां च युधिष्ठिर । बन्धूनां ब्राह्मणानां च तथा शारणिकस्य च ।। ११६ ।। सम्बन्धिनां च राजेन्द्र तथाऽऽयुर्विन्दते महत् । राजेन्द्र युधिष्ठिर! वैद्यों, बालकों, वृद्धों, भृत्यों, बन्धुओं, ब्राह्मणों, शरणार्थियों तथा सम्बन्धियोंकी स्त्रियोंके पास कभी न जाय। ऐसा करनेसे दीर्घायु प्राप्त होती है ।। ११६ १/२ ।।
ब्राह्मणस्थपतिभ्यां च निर्मितं यन्निवेशनम् ।। ११७ ।। तदावसेत् सदा प्राज्ञो भवार्थी मनुजेश्वर । मनुजेश्वर! अपनी उन्नति चाहनेवाले विद्वान् पुरुषको उचित है कि ब्राह्मणके द्वारा वास्तुपूजनपूर्वक आरम्भ कराये और अच्छे कारीगरके द्वारा बनाये हुए घरमें सदा निवास करे ।। ११७ १/२ ।।
संध्यायां न स्वपेद् राजन् विद्यां न च समाचरेत् ।। ११८ ।। न भुञ्जीत च मेधावी तथायुर्विन्दते महत् । राजन्! बुद्धिमान् पुरुष सायंकालमें गोधूलिकी वेलामें न तो सोये, न विद्या पढ़े और न भोजन ही करे। ऐसा करनेसे वह बड़ी आयुको प्राप्त होता है ।। ११८ १/२ ।।
नक्तं न कुर्यात् पित्र्याणि भुक्त्वा चैव प्रसाधनम् ।। ११९ ।। पानीयस्य क्रिया नक्तं न कार्या भूतिमिच्छता । अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको रातमें श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिये। भोजन करके केशोंका संस्कार (क्षौरकर्म) भी नहीं करना चाहिये तथा रातमें जलसे स्नान करना भी उचित नहीं है ।। ११९ १/२ ।।
वर्जनीयाश्चैव नित्यं सक्तवो निशि भारत ॥ १२० ॥
शेषाणि चैव पानानि पानीयं चापि भोजने ।
भरतनन्दन! रातमें सत्तू खाना सर्वथा वर्जित है। अन्न-भोजनके पश्चात् जो पीनेयोग्य पदार्थ और जल शेष रह जाते हैं, उनका भी त्याग कर देना चाहिये ॥
सौहित्यं न च कर्तव्यं रात्रौ न च समाचरेत् ॥ १२१ ॥
द्विजच्छेदं न कुर्वीत भुक्त्वा न च समाचरेत् ।
रातमें न स्वयं डटकर भोजन करे और न दूसरेको ही डटकर भोजन करावे। भोजन करके दौड़े नहीं। ब्राह्मणोंका वध कभी न करे ॥ १२१ १/२ ॥
महाकुले प्रसूतां च प्रशस्तां लक्षणैस्तथा ॥ १२२ ॥
वयःस्थां च महाप्राज्ञः कन्यामावोढुमर्हति ।
जो श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुई हो, उत्तम लक्षणोंसे प्रशंसित हो तथा विवाहके योग्य अवस्थाको प्राप्त हो गयी हो, ऐसी सुलक्षणा कन्याके साथ श्रेष्ठ बुद्धिमान् पुरुष विवाह करे ॥ १२२ १/२ ॥
अपत्यमुत्पाद्य ततः प्रतिष्ठाप्य कुलं तथा ॥ १२३ ॥
पुत्राः प्रदेया ज्ञानेषु कुलधर्मेषु भारत ।
भारत! उसके गर्भसे संतान उत्पन्न करके वंश-परम्पराको प्रतिष्ठित करे और ज्ञान तथा कुलधर्मकी शिक्षा पानेके लिये पुत्रोंको गुरुके आश्रममें भेज दे ॥
कन्या चोत्पाद्य दातव्या कुलपुत्राय धीमते ॥ १२४ ॥
पुत्रा निवेश्याश्च कुलाद् भृत्या लभ्याश्च भारत ।
भरतनन्दन! यदि कन्या उत्पन्न करे तो बुद्धिमान् एवं कुलीन वरके साथ उसका ब्याह कर दे। पुत्रका विवाह भी उत्तम कुलकी कन्याके साथ करे और भृत्य भी उत्तम कुलके मनुष्योंको ही बनावे ॥ १२४ १/२ ॥
शिरःस्नातोऽथ कुर्वीत दैवं पित्र्यमथापि च ॥ १२५ ॥
नक्षत्रे न च कुर्वीत यस्मिन् जातो भवेन्नरः ।
न प्रोष्ठपदयोः कार्यं तथाग्नेये च भारत ॥ १२६ ॥
भारत! मस्तकपरसे स्नान करके देवकार्य तथा पितृकार्य करे। जिस नक्षत्रमें अपना जन्म हुआ हो उसमें एवं पूर्वा और उत्तरा दोनों भाद्रपदाओंमें तथा कृत्तिका नक्षत्रमें भी श्राद्धका निषेध है ॥ १२५-१२६ ॥
दारुणेषु च सर्वेषु प्रत्यरिं च विवर्जयेत् ।
ज्योतिषे यानि चोक्तानि तानि सर्वाणि वर्जयेत् ॥ १२७ ॥
(आश्लेषा, आर्द्रा, ज्येष्ठा और मूल आदि) सम्पूर्ण दारुण नक्षत्रों और प्रत्यरिताराका* भी परित्याग कर देना चाहिये। सारांश यह है कि ज्योतिष-शास्त्रके भीतर जिन-जिन
नक्षत्रोंमें श्राद्धका निषेध किया गया है, उन सबमें देवकार्य और पितृकार्य नहीं करना चाहिये ॥ १२७ ॥
प्राङ्मुखः श्मश्रुकर्माणि कारयेत् सुसमाहितः ।
उदङ्मुखो वा राजेन्द्र तथायुर्विन्दते महत् ॥ १२८ ॥
राजेन्द्र! मनुष्य एकाग्रचित्त होकर पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके हजामत बनवाये, ऐसा करनेसे बड़ी आयु प्राप्त होती है ॥ १२८ ॥
(सतां गुरूणां वृद्धानां कुलस्त्रीणां विशेषतः ।)
परिवादं न च ब्रूयात् परेषामात्मनस्तथा ।
परिवादो ह्यधर्म्याय प्रोच्यते भरतर्षभ ॥ १२९ ॥
भरतश्रेष्ठ! सत्पुरुषों, गुरुजनों, वृद्धों और विशेषतः कुलांगनाओंकी, दूसरे लोगोंकी और अपनी भी निन्दा न करे; क्योंकि निन्दा करना अधर्मका हेतु बताया गया है ॥ १२९ ॥
वर्जयेद् व्यङ्गिनीं नारीं तथा कन्यां नरोत्तम ।
समार्षां व्यङ्गितां चैव मातुः स्वकुलजां तथा ॥ १३० ॥
नरश्रेष्ठ! जो कन्या किसी अंगसे हीन हो अथवा जो अधिक अंगवाली हो, जिसके गोत्र और प्रवर अपने ही समान हो तथा जो माताके कुलमें (नानाके वंशमें) उत्पन्न हुई हो, उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिये ॥ १३० ॥
वृद्धां प्रव्रजितां चैव तथैव च पतिव्रताम् ।
तथा निकृष्टवर्णां च वर्णोत्कृष्टां च वर्जयेत् ॥ १३१ ॥
जो बूढ़ी, संन्यासिनी, पतिव्रता, नीच वर्णकी तथा ऊँचे वर्णकी स्त्री हो, उसके सम्पर्कसे दूर रहना चाहिये ॥
अयोनिं च वियोनिं च न गच्छेत विचक्षणः ।
पिंगलां कुष्ठिनीं नारीं न त्वमुद्वोढुमर्हसि ॥ १३२ ॥
जिसकी योनि अर्थात् कुलका पता न हो तथा जो नीच कुलमें पैदा हुई हो, उसके साथ विद्वान् पुरुष समागम न करे। युधिष्ठिर! जिसके शरीरका रंग पीला हो तथा जो कुष्ठ रोगवाली हो, उसके साथ तुम्हें विवाह नहीं करना चाहिये ॥ १३२ ॥
अपस्मारिकुले जातां निहीनां चापि वर्जयेत् ।
श्वित्रिणां च कुले जातां क्षयिणां मनुजेश्वर ॥ १३३ ॥
नरेश्वर! जो मृगीरोगसे दूषित कुलमें उत्पन्न हुई हो, नीच हो, सफेद कोढ़वाले और राजयक्ष्माके रोगी मनुष्यके कुलमें पैदा हुई हो, उसको भी त्याग देना चाहिये ॥ १३३ ॥
लक्षणैरन्विता या च प्रशस्ता या च लक्षणैः ।
मनोज्ञां दर्शनीयां च तां भवान् वोढुमर्हति ॥ १३४ ॥
जो उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न, श्रेष्ठ आचरणोंद्वारा प्रशंसित, मनोहारिणी तथा दर्शनीय हो, उसीके साथ तुम्हें विवाह करना चाहिये ॥ १३४ ॥
महाकुले निवेष्टव्यं सदृशे वा युधिष्ठिर । अवरा पतिता चैव न ग्राह्या भूतिमिच्छता ॥ १३५ ॥ युधिष्ठिर! अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको अपनी अपेक्षा महान् या समान कुलमें विवाह करना चाहिये। नीच जातिवाली तथा पतिता कन्याका पाणिग्रहण कदापि नहीं करना चाहिये ॥ १३५ ॥
अग्नीनुत्पाद्य यत्नेन क्रियाः सुविहिताश्च याः । वेदे च ब्राह्मणैः प्रोक्तास्ताश्च सर्वाः समाचरेत् ॥ १३६ ॥ (अरणी-मन्थनद्वारा) अग्निका उत्पादन एवं स्थापन करके ब्राह्मणोंद्वारा बतायी हुई सम्पूर्ण वेदविहित क्रियाओंका यत्नपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १३६ ॥
न चेर्ष्या स्त्रीषु कर्तव्या रक्ष्या दाराश्च सर्वशः । अनायुष्या भवेदीर्ष्या तस्मादीर्ष्यां विवर्जयेत् ॥ १३७ ॥ सभी उपायोंसे अपनी स्त्रीकी रक्षा करनी चाहिये। स्त्रियोंसे ईर्ष्या रखना उचित नहीं है। ईर्ष्या करनेसे आयु क्षीण होती है। इसलिये उसे त्याग देना ही उचित है ॥ १३७ ॥
अनायुष्यं दिवा स्वप्नं तथाभ्युदितशायिता । प्रगे निशामाशु तथा नैवोच्छिष्टाः स्वपन्ति वै ॥ १३८ ॥ दिनमें एवं सूर्योदयके पश्चात् शयन आयुको क्षीण करनेवाला है। प्रातःकाल एवं रात्रिके आरम्भमें नहीं सोना चाहिये। अच्छे लोग रातमें अपवित्र होकर नहीं सोते हैं ॥ १३८ ॥
पारदार्यमनायुष्यं नापितोच्छिष्टता तथा । यत्नतो वै न कर्तव्यमभ्यासश्चैव भारत ॥ १३९ ॥ परस्त्रीसे व्यभिचार करना और हजामत बनवाकर बिना नहाये रह जाना भी आयुका नाश करनेवाला है। भारत! अपवित्रावस्थामें वेदोंका अध्ययन यत्नपूर्वक त्याग देना चाहिये ॥ १३९ ॥
संध्यायां च न भुञ्जीत न स्नायेन्न तथा पठेत् । प्रयतश्च भवेत् तस्यां न च किंचित् समाचरेत् ॥ १४० ॥ संध्याकालमें स्नान, भोजन और स्वाध्याय कुछ भी न करे। उस बेलामें शुद्ध चित्त होकर ध्यान एवं उपासना करनी चाहिये। दूसरा कोई कार्य नहीं करना चाहिये ॥ १४० ॥
ब्राह्मणान् पूजयेच्चापि तथा स्नात्वा नराधिप । देवांश्च प्रणमेत् स्नातो गुरूंश्चाप्यभिवादयेत् ॥ १४१ ॥ नरेश्वर! ब्राह्मणोंकी पूजा, देवताओंको नमस्कार और गुरुजनोंको प्रणाम स्नानके बाद ही करने चाहिये ॥
अनिमन्त्रितो न गच्छेत यज्ञं गच्छेत दर्शकः । अनर्चिते ह्यानायुष्यं गमनं तत्र भारत ॥ १४२ ॥
बिना बुलाये कहीं भी न जाय, परंतु यज्ञ देखनेके लिये मनुष्य बिना बुलाये भी जा सकता है। भारत! जहाँ अपना आदर न होता हो, वहाँ जानेसे आयुका नाश होता है ॥ १४२ ॥
न चैकेन परिव्रज्यं न गन्तव्यं तथा निशि ।
अनागतायां संध्यायां पश्चिमायां गृहे वसेत् ॥ १४३ ॥
अकेले परदेश जाना और रातमें यात्रा करना मना है। यदि किसी कामके लिये बाहर जाय तो संध्या होनेके पहले ही घर लौट आना चाहिये ॥ १४३ ॥
मातुः पितुर्गुरूणां च कार्यमेवानुशासनम् ।
हितं चाप्यहितं चापि न विचार्यं नरर्षभ ॥ १४४ ॥
नरश्रेष्ठ! माता-पिता और गुरुजनोंकी आज्ञाका अविलम्ब पालन करना चाहिये। इनकी आज्ञा हितकर है या अहितकर, इसका विचार नहीं करना चाहिये ॥
धनुर्वेदे च वेदे च यत्नः कार्यो नराधिप ।
हस्तिपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च रथचर्यासु चैव ह ॥ १४५ ॥
यत्नवान् भव राजेन्द्र यत्नवान् सुखमेधते ।
अप्रधृष्यश्च शत्रूणां भृत्यानां स्वजनस्य च ॥ १४६ ॥
नरेश्वर! क्षत्रियको धनुर्वेद और वेदाध्ययनके लिये यत्न करना चाहिये। राजेन्द्र! तुम हाथी-घोड़ेकी सवारी और रथ हाँकनेकी कलामें निपुणता प्राप्त करनेके लिये प्रयत्नशील बनो, क्योंकि यत्न करनेवाला पुरुष सुखपूर्वक उन्नतिशील होता है। वह शत्रुओं, स्वजनों और भृत्योंके लिये दुर्धर्ष हो जाता है ॥ १४५-१४६ ॥
प्रजापालनयुक्तश्च न क्षतिं लभते क्वचित् ।
युक्तिशास्त्रं च ते ज्ञेयं शब्दशास्त्रं च भारत ॥ १४७ ॥
जो राजा सदा प्रजाके पालनमें तत्पर रहता है, उसे कभी हानि नहीं उठानी पड़ती। भरतनन्दन! तुम्हें तर्कशास्त्र और शब्दशास्त्र दोनोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ १४७ ॥
गान्धर्वशास्त्रं च कलाः परिज्ञेया नराधिप ।
पुराणमितिहासाश्च तथाख्यानानि यानि च ॥ १४८ ॥
महात्मनां च चरितं श्रोतव्यं नित्यमेव ते ।
नरेश्वर! गान्धर्वशास्त्र (संगीत) और समस्त कलाओंका ज्ञान प्राप्त करना भी तुम्हारे लिये आवश्यक है। तुम्हें प्रतिदिन पुराण, इतिहास, उपाख्यान तथा महात्माओंके चरित्रका श्रवण करना चाहिये ॥ १४८½ ॥
(मान्यानां माननं कुर्यान्निन्द्यानां निन्दनं तथा ।
गोब्राह्मणार्थे युध्येत प्राणानपि परित्यजेत् ॥)
राजा माननीय पुरुषोंका सम्मान और निन्दनीय मनुष्योंकी निन्दा करे। वह गौओं तथा ब्राह्मणोंके लिये युद्ध करे। उनकी रक्षाके लिये आवश्यकता हो तो प्राणोंको भी निछावर कर
दे ।।
पत्नी रजस्वला या च नाभिगच्छेन्न चाह्वयेत् ॥ १४९ ॥
स्नातां चतुर्थे दिवसे रात्रौ गच्छेद् विचक्षणः ।
पञ्चमे दिवसे नारी षष्ठेऽहनि पुमान् भवेत् ॥ १५० ॥
अपनी पत्नी भी रजस्वला हो तो उसके पास न जाय और न उसे ही अपने पास बुलाये। जब चौथे दिन वह स्नान कर ले, तब रातमें बुद्धिमान् पुरुष उसके पास जाय। पाँचवें दिन गर्भाधान करनेसे कन्याकी उत्पत्ति होती है और छठे दिन पुत्रकी अर्थात् समरात्रिमें गर्भाधानसे पुत्रका और विषमरात्रिमें गर्भाधान होनेसे कन्याका जन्म होता है ॥ १४९-१५० ॥
एतेन विधिना पत्नीमुपगच्छेत् पण्डितः ।
ज्ञातिसम्बन्धिमित्राणि पूजनीयानि सर्वशः ॥ १५१ ॥
इसी विधिसे विद्वान् पुरुष पत्नीके साथ समागम करे। भाई-बन्धु, सम्बन्धी और मित्र—इन सबका सब प्रकारसे आदर करना चाहिये ॥ १५१ ॥
यष्टव्यं च यथाशक्ति यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ।
अत ऊर्ध्वमरण्यं च सेवितव्यं नराधिप ॥ १५२ ॥
अपनी शक्तिके अनुसार भाँति-भाँतिकी दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये। नरेश्वर! तदनन्तर गार्हस्थ्यकी अवधि समाप्त हो जानेपर वानप्रस्थके नियमोंका पालन करते हुए वनमें निवास करना चाहिये ॥ १५२ ॥
एष ते लक्षणोद्देश आयुष्याणां प्रकीर्तितः ।
शेषस्त्रैविद्यवृद्धेभ्यः प्रत्याहार्यो युधिष्ठिर ॥ १५३ ॥
युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने तुमसे आयुकी वृद्धि करनेवाले नियमोंका संक्षेपसे वर्णन किया है। जो नियम बाकी रह गये हैं, उन्हें तुम तीनों वेदोंके ज्ञानमें बढ़े-चढ़े ब्राह्मणोंसे पूछकर जान लेना ॥ १५३ ॥
आचारो भूतिजनन आचारः कीर्तिवर्धनः ।
आचाराद् वर्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १५४ ॥
सदाचार ही कल्याणका जनक और सदाचार ही कीर्तिको बढ़ानेवाला है। सदाचारसे आयुकी वृद्धि होती है और सदाचार ही बुरे लक्षणोंका नाश करता है ॥ १५४ ॥
आगमानां हि सर्वेषामाचारः श्रेष्ठ उच्यते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मादायुर्र्विवर्धते ॥ १५५ ॥
सम्पूर्ण आगमोंमें सदाचार ही श्रेष्ठ बतलाया जाता है। सदाचारसे धर्मकी उत्पत्ति होती है और धर्मसे आयु बढ़ती है ॥ १५५ ॥
एतद् यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् ।
अनुकम्प्य सर्ववर्णान् ब्रह्मणा समुदाहृतम् ॥ १५६ ॥
पूर्वकालमें सब वर्णोंके लोगोंपर दया करके ब्रह्माजीने यह सदाचार धर्मका उपदेश दिया था। यह यश, आयु और स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा कल्याणका परम आधार है ।। १५६ ।।
(य इमं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
स शुभान् प्राप्नुते लोकान् सदाचारव्रतान्नृप ॥)
नरेश्वर! जो प्रतिदिन इस प्रसंगको सुनता और कहता है, वह सदाचार-व्रतके प्रभावसे शुभ लोकोंमें जाता है ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि आयुष्याख्याने
चतुरधिकशततमोऽध्यायः ।। १०४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें आयु बढ़ानेवाले साधनोंका वर्णनविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १६५ १/३ श्लोक हैं)
* अपने जन्मनक्षत्रसे वर्तमान नक्षत्रतक गिने, गिननेपर जितनी संख्या हो उसमें नौका भाग दे। यदि पाँच शेष रहे तो उस दिनके नक्षत्रको प्रत्यरि तारा समझे।
बड़े और छोटे भाईके पारस्परिक बर्ताव तथा माता-पिता, आचार्य आदि गुरुजनोंके गौरवका वर्णन
पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः
बड़े और छोटे भाईके पारस्परिक बर्ताव तथा माता-पिता, आचार्य आदि गुरुजनोंके गौरवका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
यथा ज्येष्ठः कनिष्ठेषु वर्तेत भरतर्षभ ।
कनिष्ठाश्च यथा ज्येष्ठे वर्तेरंस्तद् ब्रवीहि मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! बड़ा भाई अपने छोटे भाइयोंके साथ कैसा बर्ताव करे? और छोटे भाइयोंका बड़े भाईके साथ कैसा बर्ताव होना चाहिये? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
ज्येष्ठवत् तात वर्तस्व ज्येष्ठोऽसि सततं भवान् ।
गुरोर्गरीयसी वृत्तिर्या च शिष्यस्य भारत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— तात भरतनन्दन! तुम अपने भाइयोंमें सबसे बड़े हो; अतः सदा बड़ेके अनुरूप ही बर्ताव करो। गुरुको अपने शिष्यके प्रति जैसा गौरवयुक्त बर्ताव होता है, वैसा ही तुम्हें भी अपने भाइयोंके साथ करना चाहिये ॥ २ ॥
न गुरावकृतप्रज्ञे शक्यं शिष्येण वर्तितुम् ।
गुरोर्हि दीर्घदर्शित्वं यत् तच्छिष्यस्य भारत ॥ ३ ॥
यदि गुरु अथवा बड़े भाईका विचार शुद्ध न हो तो शिष्य या छोटे भाई उसकी आज्ञाके अधीन नहीं रह सकते। भारत! बड़ेके दीर्घदर्शी होनेपर छोटे भाई भी दीर्घदर्शी होते हैं ॥ ३ ॥
अन्धः स्यादन्धवेलायां जडः स्यादपि वा बुधः ।
परिहारेण तद् ब्रूयाद् यस्तेषां स्याद् व्यतिक्रमः ॥ ४ ॥
बड़े भाईको चाहिये कि वह अवसरके अनुसार अन्ध, जड़ और विद्वान् बने अर्थात् यदि छोटे भाइयोंसे कोई अपराध हो जाय तो उसे देखते हुए भी न देखे। जानकर भी अनजान बना रहे और उनसे ऐसी बात करे, जिससे उनकी अपराध करनेकी प्रवृत्ति दूर हो जाय ॥ ४ ॥
प्रत्यक्षं भिन्नहृदया भेदयेयुः कृतं नराः ।
श्रियाभितप्ताः कौन्तेय भेदकामास्तथारयः ॥ ५ ॥
यदि बड़ा भाई प्रत्यक्षरूपसे अपराधका दण्ड देता है तो उसके छोटे भाइयोंका हृदय छिन्न-भिन्न हो जाता है और वे उस दुर्व्यवहारका लोगोंमें प्रचार कर देते हैं, तब उनके
ऐश्वर्यको देखकर जलनेवाले कितने ही शत्रु उनमें मतभेद पैदा करनेकी इच्छा करने लगते हैं॥ ५ ॥
ज्येष्ठः कुलं वर्धयति विनाशयति वा पुनः। हन्ति सर्वमपि ज्येष्ठः कुलं यत्रावजायते ॥ ६ ॥ जेठा भाई अपनी अच्छी नीतिसे कुलको उन्नतिशील बनाता है; किंतु यदि वह कुनीतिका आश्रय लेता है तो उसे विनाशके गर्तमें डाल देता है! जहाँ बड़े भाईका विचार खोटा हुआ, वहाँ वह जिसमें उत्पन्न हुआ है, अपने उस समस्त कुलको ही चौपट कर देता है॥ ६ ॥
अथ यो विनिकुर्वीत ज्येष्ठो भ्राता यवीयसः। अज्येष्ठः स्यादभागश्च नियम्यो राजभिश्च सः ॥ ७ ॥ जो बड़ा भाई होकर छोटे भाइयोंके साथ कुटिलतापूर्ण बर्ताव करता है, वह न तो ज्येष्ठ कहलाने योग्य है और न ज्येष्ठांश पानेका ही अधिकारी है। उसे तो राजाओंके द्वारा दण्ड मिलना चाहिये॥ ७ ॥
निकृती हि नरो लोकान् पापान् गच्छत्यसंशयम्। विदुलस्येव तत् पुष्पं मोघं जनयितुः स्मृतम् ॥ ८ ॥ कपट करनेवाला मनुष्य निःसंदेह पापमय लोकों (नरक)-में जाता है। उसका जन्म पिताके लिये बेतके फूलकी भाँति निरर्थक ही माना गया है॥ ८ ॥
सर्वानर्थः कुले यत्र जायते पापपूरुषः। अकीर्तिं जनयत्येव कीर्तिमन्तर्दधाति च ॥ ९ ॥ जिस कुलमें पापी पुरुष जन्म लेता है, उसके लिये वह सम्पूर्ण अनर्थोंका कारण बन जाता है। पापात्मा मनुष्य कुलमें कलंक लगाता और उसके सुयशका नाश करता है॥ ९ ॥
सर्वे चापि विकर्मस्था भागं नार्हन्ति सोदराः। नाप्रदाय कनिष्ठेभ्यो ज्येष्ठः कुर्वीत यौतकम् ॥ १० ॥ यदि छोटे भाई भी पापकर्ममें लगे रहते हों तो वे पैतृक धनका भाग पानेके अधिकारी नहीं हैं। छोटे भाइयोंको उनका उचित भाग दिये बिना बड़े भाईको पैतृक-सम्पत्तिका भाग ग्रहण नहीं करना चाहिये॥ १० ॥
अनुपघ्नन् पितुर्दायं जङ्घाश्रमफलोऽध्वगः। स्वयमीहितलब्धं तु नाकामौ दातुमर्हति ॥ ११ ॥ यदि बड़ा भाई पैतृक धनको हानि पहुँचाये बिना ही केवल जाँघोंके परिश्रमसे परदेशमें जाकर धन पैदा करे तो वह उसके निजी परिश्रमकी कमाई है। अतः यदि उसकी इच्छा न हो तो वह उस धनमेंसे भाइयोंको नहीं दे सकता है॥ ११ ॥
भ्रातॄणामविभक्तानामुत्थानमपि चेत् सह।
न पुत्रभागं विषमं पिता दद्यात् कदाचन ॥ १२ ॥
यदि भाइयोंके हिस्सेका बटवारा न हुआ हो और सबने साथ-ही-साथ व्यापार आदिके द्वारा धनकी उन्नति की हो, उस अवस्थामें यदि पिताके जीते-जी सब अलग होना चाहें तो पिताको उचित है कि वह कभी किसीको कम और किसीको अधिक धन न दे अर्थात् वह सब पुत्रोंको बराबर-बराबर हिस्सा दे ॥ १२ ॥
न ज्येष्ठो वावमन्येत दुष्कृतः सुकृतोऽपि वा ।
यदि स्त्री यद्यवरजः श्रेयश्चेत् तत् तदाचरेत् ॥ १३ ॥
धर्मं हि श्रेय इत्याहुरिति धर्मविदो जनाः ।
बड़ा भाई अच्छा काम करनेवाला हो या बुरा, छोटेको उसका अपमान नहीं करना चाहिये। इसी तरह यदि स्त्री अथवा छोटे भाई बुरे रास्तेपर चल रहे हों तो श्रेष्ठ पुरुषको जिस तरहसे भी उनकी भलाई हो, वही उपाय करना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुषोंका कहना है कि धर्म ही कल्याणका सर्वश्रेष्ठ साधन है ॥ १३ १/२ ॥
दशाचार्यानुपाध्याय उपाध्यायान् पिता दश ॥ १४ ॥
दश चैव पितॄन् माता सर्वां वा पृथिवीमपि ।
गौरवेणाभिभवति नास्ति मातृसमो गुरुः ॥ १५ ॥
गौरवमें दस आचार्योंसे बढ़कर उपाध्याय, दस उपाध्यायोंसे बढ़कर पिता और दस पिताओंसे बढ़कर माता है। माता अपने गौरवसे समूची पृथिवीको भी तिरस्कृत कर देती है। अतः माताके समान दूसरा कोई गुरु नहीं है ॥ १४-१५ ॥
माता गरीयसी यच्च तेनैतां मन्यते जनः ।
ज्येष्ठो भ्राता पितृसमो मृते पितरि भारत ॥ १६ ॥
भरतनन्दन! माताका गौरव सबसे बढ़कर है, इसलिये लोग उसका विशेष आदर करते हैं। भारत! पिताकी मृत्यु हो जानेपर बड़े भाईको ही पिताके समान समझना चाहिये ॥ १६ ॥
स ह्येषां वृत्तिदाता स्यात् स चैतान् प्रतिपालयेत् ।
कनिष्ठास्तं नमस्येरन् सर्वे छन्दानुवर्तिनः ॥ १७ ॥
तमेव चोपजीवेरन् यथैव पितरं तथा ।
बड़े भाईको उचित है कि वह अपने छोटे भाइयोंको जीविका प्रदान करे तथा उनका पालन-पोषण करे। छोटे भाइयोंका भी कर्तव्य है कि वे सब-के-सब बड़े भाईके सामने नतमस्तक हों और उसकी इच्छाके अनुसार चलें। बड़े भाईको ही पिता मानकर उनके आश्रयमें जीवन व्यतीत करें ॥ १७ १/२ ॥
शरीरमेतौ सृजतः पिता माता च भारत ॥ १८ ॥
आचार्यशास्ता या जातिः सा सत्या साजरामरा ।
भारत! पिता और माता केवल शरीरकी सृष्टि करते हैं, किंतु आचार्यके उपदेशसे जो ज्ञानरूप नवीन जीवन प्राप्त होता है, वह सत्य, अजर और अमर है ॥
ज्येष्ठा मातृसमा चापि भगिनी भरतर्षभ ॥ १९ ॥
भ्रातृभार्या च तद्वत् स्याद् यस्या बाल्ये स्तनं पिबेत् ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! बड़ी बहिन भी माताके समान है। इसी तरह बड़े भाईकी पत्नी तथा बचपनमें जिसका दूध पिया गया हो, वह धाय भी माताके समान है ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ज्येष्ठकनिष्ठवृत्तिर्नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बड़े और छोटे भाईका पारस्परिक बर्तावनामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥
मास, पक्ष एवं तिथिसम्बन्धी विभिन्न व्रतोपवासके फलका वर्णन
षडधिकशततमोऽध्यायः
मास, पक्ष एवं तिथिसम्बन्धी विभिन्न व्रतोपवासके फलका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषामेव वर्णानां म्लेच्छानां च पितामह ।
उपवासे मतिरियं कारणं च न विद्महे ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! सभी वर्णों और म्लेच्छ जातिके लोग भी उपवासमें मन लगाते हैं, किंतु इसका क्या कारण है? यह समझमें नहीं आता ॥ १ ॥
ब्रह्मक्षत्रेण नियमाश्र्र्तव्या इति नः श्रुतम् ।
उपवासे कथं तेषां कृत्यमस्ति पितामह ॥ २ ॥
पितामह! सुननेमें आया है कि ब्राह्मण और क्षत्रियोंको नियमोंका पालन करना चाहिये; परंतु उपवास करनेसे किस प्रकार उनके प्रयोजनकी सिद्धि होती है, यह नहीं जान पड़ता है ॥ २ ॥
नियमांश्चोपवासांश्च सर्वेषां ब्रूहि पार्थिव ।
आप्नोति कां गतिं तात उपवासपरायणः ॥ ३ ॥
पृथ्वीनाथ! आप कृपा करके हमें सम्पूर्ण नियमों और उपवासोंकी विधि बताइये। तात! उपवास करनेवाला मनुष्य किस गतिको प्राप्त होता है? ॥ ३ ॥
उपवासः परं पुण्यमुपवासः परायणम् ।
उपोष्येह नरश्रेष्ठ किं फलं प्रतिपद्यते ॥ ४ ॥
नरश्रेष्ठ! कहते हैं, उपवास बहुत बड़ा पुण्य है और उपवास सबसे बड़ा आश्रय है; परंतु उपवास करके यहाँ मनुष्य कौन-सा फल पाता है? ॥ ४ ॥
अधर्मान्मुच्यते केन धर्ममाप्नोति वा कथम् ।
स्वर्गं पुण्यं च लभते कथं भरतसत्तम ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! मनुष्य किस कर्मके द्वारा पापसे छुटकारा पाता है और क्या करनेसे किस प्रकार उसे धर्मकी प्राप्ति होती है? वह पुण्य और स्वर्ग कैसे पाता है? ॥
उपोष्य चापि किं तेन प्रदेयं स्यान्नराधिप ।
धर्मेण च सुखानर्थांल्लभेद येन ब्रवीहि तम् ॥ ६ ॥
नरेश्वर! उपवास करके मनुष्यको किस वस्तुका दान करना चाहिये? जिस धर्मसे सुख और धनकी प्राप्ति हो सके, वही मुझे बताइये ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच