भारतकोश
संग्रह पर लौटें

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १६९


अविवेकिनाम् । किं चात्मप्रबोधोऽपि मनोनिग्रहायत्त एव । तथाक्षयापि मोक्षाख्या शान्तिः तेषां मनोनिग्रहायत्तैव ॥४०॥क्षय नहीं हो सकता । इसके सिवा उनका आत्मज्ञान भी मनके निग्रहके ही अधीन है तथा मोक्षनाम्नी उनकी अक्षय शान्ति भी मनोनिग्रहके ही अधीन है ॥ ४० ॥

मनोनिग्रह धैर्यपूर्वक ही हो सकता है

उत्सेक उदधेर्यद्वत्कुशाग्रेणैकबिन्दुना ।
मनसो निग्रहस्तद्वद्भवेदपरिखेदतः ॥ ४१ ॥

जिस प्रकार [ उद्विग्नता छोड़कर ] कुशाके अग्रभागसे एक-एक बूँदद्वारा समुद्रको उलोचा जा सकता है उसी प्रकार सब प्रकारकी खिन्नताका त्याग कर देनेपर मनका निग्रह हो सकता है ॥ ४१ ॥

मनोनिग्रहोऽपि तेषामुदधेः कुशाग्रेणैकबिन्दुना उत्सेचनेन शोषणव्यवसायवद्व्यवसायवतामनवस्रान्तःकरणानामनिर्वेदादपरिखेदतो भवतीत्यर्थः ॥४१॥कुशके अग्रभागसे एक-एक बूँदके द्वारा समुद्रके उत्सेचन अर्थात् सुखानेके प्रयत्नके समान अखिन्नचित्त और उद्यमशील रहनेवाले उन योगियोंके मनका निग्रह भी खेदशून्य रहनेसे ही होता है—यह इसका तात्पर्य है ॥ ४१ ॥

मनोनिग्रहके विघ्न

किमपरिखिन्नव्यवसायमात्रमेव मनोनिग्रह उपायः ? न, इत्युच्यते ।तो क्या खेदरहित उद्योग ही मनोनिग्रहका उपाय है ? इसपर कहते हैं—'नहीं'
१७०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

उपायेन निगृह्णीयाद्विक्षिप्तं कामभोगयोः ।
सुप्रसन्नं लये चैव यथा कामो लयस्तथा ॥ ४२ ॥

काम्यविषय और भोगोंमें विक्षिप्त हुए चित्तका उपायपूर्वक निग्रह करे तथा लयावस्थामें अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त हुए चित्तका भी संयम करे, क्योंकि जैसा [ अनर्थकारक ] काम है वैसा ही लय भी है ॥४२॥

अपरिखिन्नव्यवसायवान्सन् वक्ष्यमाणेनोपायेन कामभोगविषयेषु विक्षिप्तं मनो निगृह्णीयान्निरुन्ध्यादात्मन्येवेत्यर्थः । किं च लीयतेऽस्मिन्निति सुषुप्तौ लयस्तस्मिँल्लये च सुप्रसन्नम् आयासवर्जितम् अपि इत्येतत्, निगृह्णीयादित्यनुवर्तते ।अथक उद्योगशील होकर आगे कहे जानेवाले उपायसे काम और भोगरूप विषयोंमें विक्षिप्त हुए चित्तका निग्रह करे, अर्थात् उसका आत्मामें ही निरोध करे । तथा, जिस अवस्थामें चित्त लीन हो जाता है उस सुषुप्तिका नाम लय है, उस लयावस्थामें अत्यन्त प्रसन्न अर्थात् आयासरहित स्थितिको प्राप्त हुए चित्तका भी निग्रह करे । यहाँ 'निगृह्णीयात्' इस पदकी अनुवृत्ति की जाती है।
सुप्रसन्नं चेत्कस्मान्निगृह्यत इत्युच्यते । यस्माद्यथा कामोऽनर्थहेतुस्तथा लयोऽपि । अतः कामविषयस्य मनसो निग्रहवल्लयादपि निरोद्धव्यमित्यर्थः ४२यदि उस अवस्थामें चित्त अत्यन्त प्रसन्न हो जाता है तो उसका निग्रह क्यों करना चाहिये ? इसपर कहा जाता है-क्योंकि जिस प्रकार काम अनर्थका कारण है उसी प्रकार लय भी है; इसलिये तात्पर्य यह है कि कामविषयक मनके निग्रहके समान उसका लयसे भी निरोध करना चाहिये ॥ ४२ ॥

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १७१


कः स उपायः ? इत्युच्यते—वह उपाय क्या है ? इस विषयमें कहा जाता है—

दुःखं सर्वमनुस्मृत्य कामभोगान्निवर्तयेत् ।
अजं सर्वमनुस्मृत्य जातं नैव तु पश्यति ॥ ४३ ॥

सम्पूर्ण द्वैत दुःखरूप है—ऐसा निरन्तर स्मरण करते हुए चित्तको कामजनित भोगोंसे हटाये। इस प्रकार निरन्तर सब वस्तुओंको अजन्मा ब्रह्मरूप स्मरण करता हुआ फिर कोई जात पदार्थ नहीं देखता ॥ ४३॥

सर्वं द्वैतमविद्याविजृम्भितं दुःखमेवेत्यनुस्मृत्य कामभोगात्कामनिमित्तो भोग इच्छाविषयस्तस्माद्विप्रसृतं मनो निवर्तयेद्वैराग्यभावनयेत्यर्थः। अजं ब्रह्म सर्वमित्येतच्छास्त्राचार्योपदेशतोऽनुस्मृत्य तद्विपरीतं द्वैतजातं नैव तु पश्यति, अभावात् ॥४३॥अविद्यासे प्रतीत होनेवाला सारा द्वैत दुःखरूप ही है—ऐसा निरन्तर स्मरण करता हुआ कामभोगसे—कामनानिमित्तक भोगसे अर्थात् इच्छाजनित विषयसे उसमें फैले हुए चित्तको वैराग्यभावनाद्वारा निवृत्त करे—यह इसका तात्पर्य है। फिर ‘यह सब अजन्मा ब्रह्म ही है’ ऐसा शास्त्र और आचार्यके उपदेशानुसार निरन्तर स्मरण करता हुआ उससे विपरीत द्वैतजातको—उसका अभाव हो जानेके कारण—वह नहीं देखता ॥ ४३ ॥

लये संबोधयेच्चित्तं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः ।
सकषायं विजानीयात्समप्राप्तं न चालयेत् ॥ ४४ ॥

चित्त [ सुषुप्तिमें ] लीन होने लगे तो उसे आत्मविवेकमें नियुक्त करे, यदि विक्षिप्त हो जाय तो उसे पुनः शान्त करे और [ यदि इन दोनोंके बीचकी अवस्थामें रहे तो उसे ] सकषाय—रागयुक्त समझे। तथा साम्यावस्थाको प्राप्त हुए चित्तको चञ्चल न करे ॥ ४४ ॥

१७२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
एवमनेन ज्ञानाभ्यासवैराग्य- <br> द्वयोपायेन लये सुषुप्ते लीनं <br> संबोधयेन्मन आत्मविवेक- <br> दर्शनेन योजयेत् । चित्तं मन <br> इत्यनर्थान्तरम् । विक्षिप्तं च <br> कामभोगेषु शमयेत्पुनः । एवं <br> पुनः पुनरभ्यस्यतो लयातसंबोधितं <br> विषयेभ्यश्च व्यावर्तितं नापि <br> साम्यापन्नमन्तरालावस्थं सकषायं <br> सरागं बीजसंयुक्तं मन इति <br> विजानीयात् । ततोऽपि यत्नतः <br> साम्यमापादयेत् । यदा तु <br> सम्प्राप्तं भवति सम्प्राप्त्यभिमुखी- <br> भवतीत्यर्थः, ततस्तन्न विचाल- <br> येद्विषयाभिमुखं न कुर्यादि- <br> त्यर्थः ॥ ४४ ॥इस प्रकार ज्ञानाभ्यास और <br> वैराग्य—इन दो उपायोंसे, लय अर्थात् <br> सुषुप्तिमें लीन हुए चित्तको, सम्बोधित <br> अर्थात् आत्मविवेकदर्शनमें नियुक्त <br> करे । चित्त और मन—ये कोई भिन्न <br> पदार्थ नहीं हैं । तथा कामना और <br> भोगोंमें विक्षिप्त हुए, चित्तको पुनः <br> शान्त करे । इस प्रकार वारम्वार <br> अभ्यासद्वारा लयावस्थासे सम्बोधित <br> और विषयोंसे निवृत्त किया हुआ <br> चित्त जब अन्तरालावस्थामें स्थित <br> होकर समताको भी प्राप्त न हो <br> तो यह समझे कि इस समय <br> मन सकषाय—रागयुक्त अर्थात् बीजा- <br> वस्थासंयुक्त है । उस अवस्थासे भी <br> उसे यत्नपूर्वक साम्यावस्थामें स्थित <br> करे । किन्तु जिस समय वह <br> समताको प्राप्त हो अर्थात् साम्या- <br> वस्थाप्राप्तिके अभिमुख हो उस समय <br> उस अवस्थामें उसे विचलित न करे; <br> अर्थात् विषयाभिमुख न करे ॥४४॥

नास्वादयेत्सुखं तत्र निःसङ्गः प्रज्ञया भवेत् ।
निश्चलं निश्चरच्चित्तमेकीकुर्यात्प्रयत्नतः ॥ ४५ ॥

उस साम्यावस्थामें [ प्राप्त होनेवाले ] सुखका आस्वादन न करे, बल्कि विवेकवती बुद्धिके द्वारा उससे निःसंग रहे । फिर यदि चित्त बाहर निकलने लगे तो उसे प्रयत्नपूर्वक निश्चल और एकाग्र करे ॥ ४५ ॥

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १७३


समाधित्सतो योगिनो यत्सुखं जायते तन्नास्वादयेत्, तत्र न रज्येतेत्यर्थः । कथं तर्हि ? निःसङ्गो निःस्पृहः प्रज्ञया विवेकबुद्ध्या यदुपलभ्यते सुखं तदविद्यापरिकल्पितं मृषैवेति विभावयेत् । ततोऽपि सुखरागान्निगृह्णीयादित्यर्थः ।समाधिकी इच्छावाले योगीको जो सुख प्राप्त होता है उसका आस्वादन न करे अर्थात् उसमें राग न करे । तो फिर कैसे रहे ? निःसङ्ग अर्थात् निःस्पृह होकर प्रज्ञा-विवेकवती बुद्धिसे ऐसी भावना करे कि यह जो कुछ सुख अनुभव हो रहा है वह अविद्यापरिकल्पित और मिथ्या ही है । तात्पर्य यह कि उस सुखके रागसे भी चित्तका निग्रह करे ।
यदा पुनः सुखरागानिवृत्तं निश्चलस्वभावं सन्निश्चरद्बहिर्निर्गच्छद्भवति चित्तं ततस्ततो नियम्योक्तोपायेनात्मन्येवैकीकुर्यात्प्रयत्नतः । चित्स्वरूपसत्तामात्रमेवापादयेदित्यर्थः ॥ ४५ ॥जिस समय सुखके रागसे निवृत्त होकर निश्चलस्वभाव हुआ चित्त फिर बाहर निकलने लगे तब उसे उपर्युक्त उपायसे वहाँसे भी रोककर प्रयत्नपूर्वक आत्मामें एकाग्र करे । तात्पर्य यह है कि उसे चित्स्वरूप सत्तामात्र ही सम्पादित करे ॥४५॥

मन कब ब्रह्मरूप होता है ?

यदा न लीयते चित्तं न च विक्षिप्यते पुनः ।
अनिङ्गनमनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा ॥ ४६ ॥

जिस समय चित्त सुषुप्तिमें लीन न हो और फिर विक्षिप्त भी न हो तथा निश्चल और विषयाभाससे रहित हो जाय उस समय वह ब्रह्म ही हो जाता है ॥ ४६ ॥

४. चतुर्थ प्रकरण — अलातशान्तिप्रकरण (१०० कारिकाएँ)

१७२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
यथोक्तोपायेन निगृहीतं चित्तं यदा सुषुप्ते न लीयते न च पुनविषयेषु विक्षिष्यते, अनिङ्गनमचलं निवातप्रदीपकल्पम्, अनाभासं न केनचित्कल्पितेन विषयभावेनावभासत इति, यदैवंलक्षणं चित्तं तदा निष्पन्नं ब्रह्म ब्रह्मस्वरूपेण निष्पन्नं चित्तं भवतीत्यर्थः ॥४६॥उपर्युक्त उपायसे निग्रह किया हुआ चित्त जिस समय सुषुप्तिमें लीन नहीं होता और न फिर विषयोंमें ही विक्षिप्त होता है तथा वायुशून्य स्थानमें रखे हुए दीपकके समान निश्चल और अनाभास अर्थात् जो किसी भी कल्पित विषयभावसे प्रकाशित नहीं होता—ऐसा जिस समय यह चित्त हो जाता है उस समय यह ब्रह्म ही हो जाता है; अर्थात् उस अवस्थामें चित्त ब्रह्मरूपसे निष्पन्न हो जाता है ॥४६॥

स्वस्थं शान्तं सनिर्वाणमकथ्यं सुखमुत्तमम् ।

अजमजेन ज्ञेयेन सर्वज्ञं परिचक्षते ॥ ४७ ॥

[ उस अवस्थामें जो आनन्द अनुभव होता है उसे ब्रह्मज्ञ लोग ] स्वस्थ, शान्त, निर्वाणयुक्त, अकथनीय, निरतिशयसुखस्वरूप, अजन्मा, अजन्मा ज्ञेय (ब्रह्म) से अभिन्न और सर्वज्ञ बतलाते हैं ॥ ४७ ॥

यथोक्तं परमार्थसुखमात्मतत्वानुबोधलक्षणं स्वस्थं स्वात्मनि स्थितम्, शान्तं सर्वानर्थोपशमरूपम्, सनिर्वाणं निर्वृतिर्निर्वाणं कैवल्यं सह निर्वाणेन वर्तते, तथाकथ्यं न शक्यते कथयितुम्, अत्यन्तासाधारणविषयत्वात् ;उपर्युक्त आत्मतत्त्वानुबोधरूप परमार्थ-सुख 'स्वस्थम्'—अपने आत्मामें ही स्थित, 'शान्तम्'—सब प्रकारके अनर्थकी निवृत्तिरूप, 'सनिर्वाणम्'—निर्वाण—निर्वृति अर्थात् कैवल्यको कहते हैं, उस निर्वाणके सहित, तथा 'अकथ्यम्'—जो कहा न जा सके, क्योंकि उसका विषय अत्यन्त अ-

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १७५


सुखमुत्तमं निरतिशयं हि तद्योगिप्रत्यक्षमेव । न जातमित्यजं यथा विषयविषयम् । अजेनानुत्पन्नेन ज्ञेयेनाव्यतिरिक्तं सत्त्वेन सर्वज्ञरूपेण सर्वज्ञं ब्रह्मैव सुखं परिचक्षते कथयन्ति ब्रह्मविदः ॥ ४७ ॥साधारण है, 'सुखमुत्तमम्'—योगियोंको ही प्रत्यक्ष होनेवाला होनेके कारण निरतिशय सुख है। तथा 'अजम्'—जो उत्पन्न न हो, जिस प्रकार कि विषयसम्बन्धी सुख हुआ करता है, और अज यानी उत्पन्न न होनेवाले ज्ञेयसे अभिन्न होनेके कारण अपने सर्वज्ञरूपसे स्वयं ब्रह्म ही वह सुख है—ऐसा ब्रह्मज्ञलोग [उसके विषयमें] कहते हैं ॥ ४७ ॥

परमार्थसत्य क्या है ?

सर्वोऽप्ययं मनोनिग्रहादिर्मृल्लोहादिवत्सृष्टिरुपासना चोक्ता परमार्थस्वरूपप्रतिपत्त्युपायतत्वेन न परमार्थसत्येति । परमार्थसत्यं तुमृत्तिका और लोहादिके समान ये मनोनिग्रहादि सम्पूर्ण सृष्टि तथा उपासना परमार्थस्वरूपकी प्राप्तिके उपायरूपसे ही कहे गये हैं; ये परमार्थसत्य नहीं हैं। परमार्थसत्य तो यही है कि—

न कश्चिज्जायते जीवः संभवोऽस्य न विद्यते ।
एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किञ्चिन्न जायते ॥ ४८ ॥

कोई भी जीव उत्पन्न नहीं होता; क्योंकि उसका कोई कारण ही नहीं है। जिस अजन्मा ब्रह्ममें किसीकी उत्पत्ति नहीं होती वही सर्वोत्तम सत्य है ॥ ४८ ॥

१७६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
न कश्चिज्जायते जीवः कर्ता भोक्ता च नोत्पद्यते केनचिदपि प्रकारेण । अतः स्वभावतोऽजस्यास्यैकस्यात्मनः संभवः कारणं न विद्यते नास्ति । यस्मान्न विद्यतेऽस्य कारणं तस्मान्न कश्चिज्जायते जीव इत्येतत् । पूर्वेषूपायत्वेनोक्तानां सत्यानामेतदुत्तमं सत्यं यस्मिन्सत्यस्वरूपे ब्रह्मण्यणुमात्रमपि किंचिन्न जायत इति ॥ ४८ ॥कोई भी जीव उत्पन्न नहीं होता—अर्थात् किसी भी प्रकारसे कर्ता-भोक्ताकी उत्पत्ति नहीं होती । अतः स्वभावसे ही इस एक अजन्मा आत्माका कोई सम्भव—कारण नहीं है। और क्योंकि इसका कोई कारण नहीं है इसलिये किसी जीवकी उत्पत्ति भी नहीं होती—यही इसका तात्पर्य है। पहले उपायरूपसे बतलाये हुए सत्योंमें यही उत्तम सत्य है, जिस सत्यस्वरूप ब्रह्ममें कोई भी वस्तु अणुमात्र भी उत्पन्न नहीं होती ॥४८॥

इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीशङ्करभगवतः कृतौ गौडपादीयागमशास्त्रभाष्येऽद्वैताख्यं
तृतीयं प्रकरणम् ॥ ३ ॥

ॐ तत्सत्

अलातशान्तिप्रकरणम्


प्रकरण-प्रयोजनम्ओङ्कारनिर्णयद्वारेणागमतः प्रतिज्ञातस्याद्वैतस्य बाह्यविषयभेदवैतथ्याच्च सिद्धस्य पुनरद्वैते शास्त्रयुक्तिभ्यां साक्षान्निर्धारितस्यैतदुत्तमं सत्यमित्युपसंहारः कृतोऽन्ते । तस्यैतस्यागमार्थस्याद्वैतदर्शनस्य प्रतिपक्षभूता द्वैतिनो वैनाशिकाश्च तेषां चान्योन्यविरोधाद्रागद्वेषादिक्लेशास्पदं दर्शनमिति मिथ्यादर्शनत्वं सूचितम् । क्लेशानास्पदत्वात्तत्सम्यग्दर्शनमित्यद्वैतदर्शनं स्तूयते । तदिह विस्तरेणान्योन्यविरुद्धतयाऽसम्यग्दर्शनत्वं प्रदर्श्यओंकारके निर्णयद्वारा आगमप्रकरणमें प्रतिज्ञा किये अद्वैतका—जिसे कि [वैतथ्यप्रकरणमें] बाह्य विषयभेदके मिथ्यात्वद्वारा सिद्ध किया है और फिर अद्वैत प्रकरणमें शास्त्र और युक्तियोंसे साक्षात् निश्चय किया है, [पिछले प्रकरणके] अन्तमें 'एतदुत्तमं सत्यम्' ऐसा कहकर उपसंहार किया गया । वेदके तात्पर्यभूत इस अद्वैतदर्शनके विरोधी जो द्वैतवादी और वैनाशिक (बौद्ध आदि) हैं उनके दर्शन परस्पर विरोधी होनेके कारण राग-द्वेषादि क्लेशोंके आश्रय हैं, अतः उनका मिथ्यादर्शनत्व सूचित होता है । और राग-द्वेषादि क्लेशोंका आश्रय न होनेके कारण अद्वैतदर्शन ही सम्यग्दर्शन है—इस प्रकार उसकी स्तुति की जाती है । अब यहाँ, परस्पर विरोधी होनेके कारण विस्तारपूर्वक उन (द्वैतवादी आदि दार्शनिकोंके दर्शन) का मिथ्यादर्शनत्व प्रदर्शित कर उनके प्रति-

२३–२४

१७८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

तत्प्रतिषेधेनाद्वैतदर्शनसिद्धिरूप-पेधद्वारा आवीतन्यायसे* अद्वैतदर्शन-
संहर्त्तव्यावीतन्यायेनेत्यलात-की सिद्धिका उपसंहार करना है—इसी-
शान्तिरारभ्यते ।लिये अलातशान्तिप्रकरणका आरम्भ किया जाता है ।
तत्राद्वैतदर्शनसम्प्रदायकर्तुःउसमें अद्वैतदर्शनसम्प्रदायके
अद्वैतस्वरूपेणैव नमस्कारार्थो-कर्ताको अद्वैतरूपसे ही नमस्कार
ऽयमाद्यश्लोकः । आचार्यपूजाकरनेके लिये यह पहला श्लोक है,
ह्यभिप्रेतार्थसिद्धयर्थेष्यते शास्त्रा-क्योंकि शास्त्रके आरम्भमें आचार्यकी
रम्भे ।पूजा अभिप्रेत अर्थकी सिद्धिके लिये इष्ट ही है ।

नारायण-नमस्कार

ज्ञानेनाकाशकल्पेन धर्मान्यो गगनोपमान् ।
ज्ञेयाभिन्नेन संबुद्धस्तं वन्दे द्विपदां वरम् ॥ १ ॥

जिसने ज्ञेय (आत्मा) से अभिन्न आकाशसदृश ज्ञानसे आकाश-सदृश धर्मों (जीवों) को जाना है उस पुरुषोत्तमको नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥

आकाशेनेषदसमाप्तमाकाश-जो आकाशकी अपेक्षा कुछ
कल्पमाकाशतुल्यमेतत् । तेना-असम्पूर्ण हो † उसे आकाशकल्प
काशकल्पेन ज्ञानेन, किम् ?अर्थात् आकाशतुल्य कहते हैं ।
धर्मान्आत्मनः, किविशिष्टान्-ग-उस आकाशसदृश ज्ञानसे—किसे ? आत्माके धर्मोंको । किस प्रकारके

* अनुमान दो प्रकारका है—अन्वयी और व्यतिरेकी । अन्वयी अनुमानमें एक वस्तुकी सत्तासे दूसरी वस्तुकी सत्ता सिद्ध की जाती है तथा व्यतिरेकीमें एक वस्तुके अभावसे दूसरी वस्तुका अभाव सिद्ध किया जाता है । इस व्यतिरेकी अनुमानका ही दूसरा नाम ‘आवीत अनुमान’ भी है ।

† असम्पूर्णका यह भाव नहीं समझना चाहिये कि ब्रह्म आकाशकी अपेक्षा कुछ न्यून है । इसका केवल यही भाव है कि वह सर्वथा आकाशरूप ही नहीं है—आकाशसे कुछ मिलता-जुलता है ।

शां० भा० ]अलातशान्तिप्रकरण१७९

नोपमान्गगनमुपमा येषां ते गग-<br>नोपमास्तानात्मनो धर्मान् ।<br>ज्ञानस्यैव पुनर्विशेषणम्—<br>ज्ञेयैर्धर्मैरात्मभिरभिन्नमग्न्युष्ण-<br>वत्सचितृप्रकाशवच्च ज्ञानं तेन<br>ज्ञेयाभिन्नेन ज्ञानेनाकाशकल्पेन<br>ज्ञेयात्मस्वरुपान्व्यतिरिक्तेन गग-<br>नोपमान्धर्मान्यः संबुद्धः संबुद्धवा-<br>निति, अयमेवेश्वरो यो नारायणा-<br>ख्यस्तं वन्देऽभिवादये द्विपदां वरं<br>द्विपदोपलक्षितानां पुरुषाणां वरं<br>प्रधानं पुरुषोत्तममित्यभिप्रायः ।<br>उपदेष्टृनमस्कारमुखेन ज्ञान-<br>ज्ञेयज्ञातृभेदरहितं परमार्थतत्त्व-<br>दर्शनमिह प्रकरणे प्रतिपिपाद-<br>यिषितं प्रतिपक्षप्रतिषेधद्वारेण<br>प्रतिज्ञातं भवति ॥ १ ॥धर्मोंको ? गगनोपम धर्मोंको—गगन<br>( आकाश ) जिनकी उपमा हो<br>उन्हें गगनोपम कहते हैं—ऐसे आत्मा-<br>के धर्मोंको । ज्ञानका ही फिर<br>विशेषण देते हैं—अग्निसे उष्णता<br>और सूर्यसे प्रकाशके समान जो<br>ज्ञान ज्ञेय धर्मों अर्थात् आत्माओंसे<br>अभिन्न है उस ज्ञेयाभिन्न अर्थात्<br>ज्ञेय आत्माके स्वरूपसे अन्यतिरिक्त<br>आकाशसदृश ज्ञानसे जिसने<br>आकाशोपम धर्मोंको सदा ही सम्यक्<br>प्रकार जाना है—ऐसा जो नारायण-<br>संज्ञक* ईश्वर है उस द्विपदांवर—<br>दो पदोंसे उपलक्षित पुरुषोंमें श्रेष्ठ<br>यानी प्रधान पुरुषोत्तमकी वन्दना—<br>अभिवादन करता हूँ ।<br>उपदेष्टाको नमस्कार करनेसे<br>यह प्रतिज्ञा की जाती है कि इस<br>प्रकरणमें विरुद्ध पक्षके प्रतिषेधद्वारा<br>ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाताके भेदसे रहित<br>परमार्थदर्शनका प्रतिपादन करना<br>अभीष्ट है ॥ १ ॥

* यहाँ अद्वैतसम्प्रदायके आदि आचार्य बदरिकाश्रमाधीश्वर तापसाग्रगण्य श्रीनारायणकी वन्दना की गयी है ।

१८०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

अद्वैतदर्शनकी वन्दना

अधुना अद्वैतदर्शनयोगस्य नमस्कारस्तत्स्तुतये--अब अद्वैतदर्शनयोगको, उसकी स्तुतिके लिये, नमस्कार किया जाता है—

अस्पर्शयोगो वै नाम सर्वसत्त्वसुखो हितः ।
अविवादोऽविरुद्धश्च देशितस्तं नमाम्यहम् ॥ २ ॥

[ शास्त्रोंमें ] जिस सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये सुखकर, हितकारी, निर्विवाद और अविरोधी अस्पर्शयोगका उपदेश किया गया है, उसे मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥

| स्पर्शनं स्पर्शः संबन्धो न विद्यते यस्य योगस्य केनचित्कदाचिदपि सोऽस्पर्शयोगो ब्रह्मस्वभाव एव, वै नामेति ब्रह्मविदामस्पर्शयोग इत्येवं-प्रसिद्ध इत्यर्थः । स च सर्वसत्त्वसुखः । भवति कश्चिदत्यन्तसुखसाधनविशिष्टोऽपि दुःखरूपः, यथा तपः । अयं तु न तथा । किं तर्हि सर्वसत्त्वानां सुखः । | जिस योगका किसीसे कभी स्पर्श यानी सम्बन्ध नहीं है उसे ‘अस्पर्शयोग’ कहते हैं; वह ब्रह्मस्वभाव ही है । ‘वै’ ‘नाम’ इन पदोंका यह तात्पर्य है कि वह ‘ब्रह्मवेत्ताओंका अस्पर्शयोग’ इस नामसे प्रसिद्ध है और वह समस्त प्राणियोंके लिये सुखकर होता है । कोई विषय तो अत्यन्त सुखसाधन-विशिष्ट होनेपर भी दुःखरूप होता है, जैसा कि तप । किन्तु यह ऐसा नहीं है । तो फिर कैसा है ? यह सभी प्राणियोंके लिये सुखदायक है । | | तथेह भवति कश्चिद्विषयोपभोगः सुखो न हितः । अयं तु | इसी प्रकार इस लोकमें कोई-कोई विषयसामग्री सुखदायक तो होती है किन्तु हितकर नहीं होती । |

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १८१


सुखो हितश्च नित्यमप्रचलित-स्वभावत्वात् । किं चाविवादो विरुद्धवदनं विवादः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहेण यस्मिन्न विद्यते सोऽविवादः । कस्मात् ? यतोऽविरुद्धश्च । य ईदृशो योगो देशितः उपदिष्टः शास्त्रेण तं नमाम्यहं प्रणमामीत्यर्थः ॥ २ ॥किन्तु यह तो सर्वदा अविचल-स्वभाव होनेके कारण सुखदायक भी है और हितकर भी। यही नहीं, यह अविवाद भी है। जिसमें पक्ष-प्रतिपक्ष स्वीकार करके विरुद्ध कथनस्वरूप विवाद नहीं होता उसे अविवाद कहते हैं। ऐसा यह क्यों है ? क्योंकि यह सबसे अविरुद्ध है। ऐसे जिस योगका शास्त्रने उपदेश किया है, उसे मैं नमस्कार यानी प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥

द्वैतवादियोंका पारस्परिक विरोध

कथं द्वैतिनः परस्परं विरुध्यन्ते ? इत्युच्यते--द्वैतवादियोंमें परस्पर किस प्रकार विरोध है ? सो बतलाया जाता है--

भूतस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः केचिदेव हि ।
अभूतस्यापरे धीरा विवदन्तः परस्परम् ॥ ३ ॥

उनमेंसे कोई-कोई वादी तो सत् पदार्थकी उत्पत्ति मानते हैं और कोई दूसरे बुद्धिशाली परस्पर विवाद करते हुए असत्पदार्थकी उत्पत्ति स्वीकार करते हैं ॥ ३ ॥

भूतस्य विद्यमानस्य वस्तुनो जातिमुत्पत्तिमिच्छन्ति वादिनः केचिदेव हि सांख्या न सर्वकोई-कोई वादी—केवल सांख्य-मतावलम्बी, सम्पूर्ण द्वैतवादी नहीं—भूत यानी विद्यमान वस्तुकी जाति—उत्पत्ति मानते हैं; और क्योंकि

१८२                                  माण्डूक्योपनिषद्                          [ गौ० का०


एव द्वैतिनः । यस्मादभूतस्या-विद्यमानस्यापरे वैशेषिका नैयायिकाश्च धीरा धीमन्तः प्राज्ञाभिमानिन इत्यर्थः विवदन्तो विरुद्धं वदन्तो ह्यन्योन्यमिच्छन्ति जेतुमित्यभिप्रायः॥३॥दूसरे धीर-बुद्धिमान् यानी प्राज्ञाभिमानी वैशेषिक और नैयायिक-लोग अभूत अर्थात् अविद्यमान वस्तु-का जन्म स्वीकार करते हैं, इसलिये परस्पर विवाद यानी विरुद्ध भाषण करते हुए वे एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा करते रहते हैं—यह इसका तात्पर्य है ॥ ३ ॥
तैरेवं विरुद्धवदनेनान्योन्यपक्षप्रतिषेधं कुर्वद्भिः किं ख्यापितं भवत्युच्यते—परस्पर विवाद करके एक-दूसरेके पक्षका खण्डन करनेवाले उन वादियोंद्वारा किस सिद्धान्तका प्रकाश किया जाता है, सो बतलाते हैं—

भूतं न जायते किंचिदभूतं नैव जायते ।
विवदन्तोऽद्वया ह्येवमजातिं ख्यापयन्ति ते ॥ ४ ॥

[ किन्हींका मत है—] 'कोई सद्वस्तु उत्पन्न नहीं होती' और [ कोई कहते हैं—] 'असद्वस्तुका जन्म नहीं होता'—इस प्रकार परस्पर विवाद करनेवाले ये अद्वैतवादी* अजाति (अजातवाद) को ही प्रकाशित करते हैं ॥ ४ ॥

भूतं विद्यमानं वस्तु न जायते किंचिद्विद्यमानत्वादेवात्मवदित्येवं वदन्नसद्वादी सांख्यपक्षं प्रतिषेधति सज्जन्म । तथा भूतमविद्यमानमविद्यमानत्वान्नैव जायतेकोई भी भूत अर्थात् विद्यमान वस्तु, विद्यमान होनेके कारण ही, उत्पन्न नहीं होती; जैसे कि आत्मा—इस प्रकार कहकर असद्वादी, सांख्यके पक्ष सद्वादका, खण्डन करता है। तथा सांख्य भी 'अभूत—अविद्यमान वस्तु अविद्यमान होनेके कारण ही

* यहाँ द्वैतवादियोंको ही व्यंगसे 'अद्वैतवादी' कहा है।

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १८३


शशविषाणवदित्येवं वदन्सां-शशशृङ्गके समान उत्पन्न नहीं हो
ख्योऽप्यसद्वादिपक्षमसज्जन्म प्रति-सकती'—ऐसा कहकर असद्वादीके
पक्ष असत्‌की उत्पत्तिका प्रतिषेध
षेधति। विवदन्तो विरुद्धं वदन्तो-करता है। इस प्रकार परस्पर विवाद
यानी विरुद्ध भाषण करनेवाले ये
ऽद्वया अद्वैतिनो ह्येते अन्योन्यस्यअद्वैतवादी—क्योंकि वस्तुतः ये अद्वैत-
पक्षौ सदसतोर्जन्मनी प्रतिषेधन्तो-वादी ही हैं—एक-दूसरेके पक्ष
सज्जन्म और असज्जन्मका खण्डन
ऽजातिमनुत्पत्तिमर्थात्ख्यापयन्तिकरते हुए अर्थतः अजाति—अनुत्पत्ति-
प्रकाशयन्ति ते ॥४॥को ही प्रकाशित करते हैं ॥ ४ ॥

द्वैतवादियोंद्वारा प्रदर्शित अजातिका अनुमोदन

ख्याप्यमानामजातिं तैरनुमोदामहे वयम् ।
विवदामो न तैः सार्धमविवादं निबोधत ॥ ५ ॥

उनके द्वारा प्रकाशित की हुई अजातिका हम भी अनुमोदन करते हैं। हम उनसे विवाद नहीं करते अतः तुम उस निर्विवाद [ परमार्थ-दर्शन ] को अच्छी तरह समझ लो ॥ ५ ॥

तैरेवं ख्याप्यमानामजातिमेव-उनके द्वारा इस प्रकार प्रकाशित
मस्त्वित्यनुमोदामहे केवलं नकी गयी अजातिका हम 'ऐसा ही
हो' इस प्रकार केवल अनुमोदन
तैः सार्धं विवदामः पक्षप्रतिपक्ष-करते हैं। तात्पर्य यह है कि पक्ष-
ग्रहणेन; यथा तेऽन्योन्यमित्य-प्रतिपक्ष लेकर उनके साथ विवाद
नहीं करते, जैसा कि वे आपसमें
भिप्रायः। अतस्तमविवादं विवाद-किया करते हैं। अतः हे शिष्यगण !
हमारेद्वारा उपदेश किये हुए उस
रहितं परमार्थदर्शनमनुज्ञातमस्मा-अविवाद—विवादरहित परमार्थदर्शन-
भिर्निबोधत हे शिष्याः ॥५॥को तुम अच्छी तरह समझ लो ॥५॥
१८४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

अजातस्यैव धर्मस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः ।
अजातो ह्यमृतो धर्मो मर्त्यतां कथमेष्यति ॥ ६ ॥

ये वादीलोग अजात वस्तुका ही जन्म होना स्वीकार करते हैं। किन्तु जो पदार्थ निश्चय ही अजात और अमृत है वह मरणशीलताको कैसे प्राप्त हो सकता है ? ॥ ६ ॥

सदसद्वादिनः सर्वेऽपीति पुरस्तात्कृतभाष्यश्लोकः ॥ ६ ॥यहाँ [ 'वादिनः' पदसे ] सभी सद्वादी और असद्वादी अभिप्रेत हैं। इस श्लोकका भाष्य पहले * किया जा चुका है ॥ ६ ॥

स्वभावविपर्यय असम्भव है

न भवत्यमृतं मर्त्यं न मर्त्यममृतं तथा ।
प्रकृतेरन्यथाभावो न कथंचिद्भविष्यति ॥ ७ ॥

मरणरहित वस्तु कभी मरणशील नहीं हो सकती और मरणशील मरणहीन नहीं हो सकती, क्योंकि किसीके स्वभावका विपर्यय किसी प्रकार होनेवाला नहीं है ॥ ७ ॥

स्वभावेनामृतो यस्य धर्मो गच्छति मर्त्यताम् ।
कृतकेनामृतस्तस्य कथं स्थास्यति निश्चलः ॥ ८ ॥

जिसके मतमें स्वभावसे ही मरणहीन धर्म मरणशीलताको प्राप्त हो जाता है; उसके सिद्धान्तानुसार कृतक (जन्म) होनेके कारण वह अमृत पदार्थ निश्चल (चिरस्थायी) कैसे रह सकेगा ? ॥ ८ ॥


* देखिये अद्वैतप्रकरण श्लोक २० का अर्थ।

शां० भा० ]अलातशान्तिप्रकरण१८५
उक्तार्थानां श्लोकानामिहोपन्यासः परवादिपक्षाणामन्योन्यविरोधख्यापितानुत्पत्त्यनुमोदनप्रदर्शनार्थः ॥ ७-८ ॥जिनका अर्थ पहले कहा जा चुका है ऐसे उपर्युक्त [तीन] श्लोकोंका उल्लेख यहाँ विपक्षी वादियोंके पक्षोंके पारस्परिक विरोधसे प्रकाशित अजातिका अनुमोदन प्रदर्शित करनेके लिये किया गया है ॥ ७-८ ॥

यस्माल्लौकिक्यपि प्रकृतिर्न विपर्येति, कासावित्याह—क्योंकि लौकिकी प्रकृतिका भी विपर्यय नहीं होता [फिर पारमार्थिकीका तो कैसे होगा ?] किन्तु वह प्रकृति है क्या ? इसपर कहते हैं—

सांसिद्धिकी स्वाभाविकी सहजा अकृता च या ।
प्रकृतिः सेति विज्ञेया स्वभावं न जहाति या ॥ ९ ॥

जो उत्तम सिद्धिद्वारा प्राप्त, स्वभावसिद्धा, सहजा और अकृता है तथा कभी अपने स्वभावका परित्याग नहीं करती वही ‘प्रकृति’ है—ऐसा जानना चाहिये ॥ ९ ॥

सम्यक्सिद्धिः संसिद्धिस्तत्र भवा सांसिद्धिकी यथा योगिनां सिद्धानामणिमाद्यैश्वर्यप्राप्तिः प्रकृतिः । सा भूतभविष्यत्कालयोरपि योगिनां न विपर्येति तथैव सा । तथा स्वाभाविकी द्रव्यस्वभावत एव यथाग्न्या-सम्यक् सिद्धिका नाम संसिद्धि है; उससे होनेवालीको ‘सांसिद्धिकी’ कहते हैं; जिस प्रकार कि सिद्ध योगियोंको अणिमादि ऐश्वर्यकी प्राप्ति उनकी प्रकृति है । योगियोंकी उस प्रकृतिका भूत और भविष्यत् कालमें भी विपर्यय नहीं होता—वह जैसी-की-तैसी ही रहती है । तथा ‘स्वाभाविकी’ वस्तुके स्वभावसे सिद्ध; जैसी कि
१८६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
दीनाम् उष्णप्रकाशादिलक्षणा, सापि न कालान्तरे व्यभिचरति देशान्तरे च । तथा सहजा आत्मना सहैव जाता यथा पक्ष्यादीनामाकाशगमनादिलक्षणा ।<br><br>अन्यापि या काचिदकृता केनचिन्न कृता यथापां निम्नदेशगमनादिलक्षणा । अन्यापि या काचित्स्वभावं न जहाति सा सर्वा प्रकृतिरिति विज्ञेया लोके। मिथ्याकल्पितेषु लौकिकेष्वपि वस्तुषु प्रकृतिर्नान्यथा भवति किमुताजस्वभावेषु परमार्थवस्तुष्वमृतत्वलक्षणा प्रकृतिर्नान्यथा भवतीत्यभिप्रायः ॥ ९॥अग्नि आदिकी उष्णता एवं प्रकाशादिरूपा प्रकृति होती है । उसका भी कालान्तर और देशान्तरमें व्यभिचार नहीं होता । तथा 'सहजा'—अपने साथ ही उत्पन्न होनेवाली; जैसे कि पक्षी आदिकी आकाशगमनादिरूपा प्रकृति होती है ।<br><br>और भी जो कोई 'अकृता'—किसीके द्वारा सम्पादन न की हुई; जैसे कि जलोंकी प्रकृति निम्न प्रदेशकी ओर जानेकी है । तथा इसके सिवा अन्य भी जो कोई अपने स्वभावको नहीं छोड़ती उस सबको लोकमें 'प्रकृति' नामसे ही जानना चाहिये । मिथ्या कल्पना की हुई लौकिक वस्तुओंमें भी उनकी प्रकृति अन्यथा नहीं होती; फिर अजस्वभाव परमार्थ वस्तुओंमें उनकी अमृतत्वलक्षणा प्रकृति अन्यथा नहीं हो सकती—इसमें तो कहना ही क्या है ? यह इसका अभिप्राय है ॥९॥

जीवका जरामरण माननेमें दोष

किंविषया पुनः सा प्रकृतिर्यस्या अन्यथाभावो वादिभिःवादीलोग जिसके अन्यथाभावकी कल्पना करते हैं उस प्रकृतिका विषय क्या है ? और उनकी

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १८७


कल्प्यते कल्पनायां वा को दोष इत्याह—कल्पनामें क्या दोष है ? इसपर कहते हैं—

जरामरणनिर्मुक्ताः सर्वे धर्माः स्वभावतः ।
जरामरणमिच्छन्तश्च्यवन्ते तन्मनीषया ॥ १० ॥

समस्त जीव स्वभावसे ही जरा-मरणसे रहित हैं। उनके जरा-मरण स्वीकार करनेवाले लोग, इस विचारके कारण ही, स्वभावसे च्युत हो जाते हैं ॥ १० ॥

| जरामरणनिर्मुक्ताः—जरा-मरणादिसर्वविक्रियावर्जिता इत्यर्थः । के ? सर्वे धर्माः सर्व आत्मान इत्येतत्स्वभावतः प्रकृतितः । एवंस्वभावाः सन्तो धर्मा जरामरणमिच्छन्त इच्छन्त इवेच्छन्तो रज्ज्वामिव सर्पमात्मनि कल्पयन्तश्च्यवन्ते स्वभावतश्चलन्तीत्यर्थः, तन्मनीषया जन्ममरणचिन्तया तद्भावभावितत्वदोषेणेत्यर्थः ॥ १० ॥ | ‘जरामरणनिर्मुक्ताः’ अर्थात् जरा-मरणादि सम्पूर्ण विकारोंसे रहित हैं। कौन ? सम्पूर्ण धर्म अर्थात् समस्त जीवात्मा, स्वभावतः यानी प्रकृतिसे ही । ऐसे स्वभाववाले होनेपर भी जरा-मरणके इच्छुकके समान इच्छा करनेवाले अर्थात् रज्जुमें सर्पकी भाँति आत्मामें जरा-मरणकी कल्पना करनेवाले जीव, उसकी मनीषा—जरामरणकी चिन्तासे अर्थात् उस भावसे भावित होनेके दोषवश अपने स्वभावसे च्युत—विचलित हो जाते हैं ॥ १० ॥ |


सांख्यमतपर वैशेषिककी आपत्ति

कथं सञ्जातिवादिभिः सांख्यैरनुपपन्नमुच्यत इत्याह वैशेषिकः—सञ्जातिवादी सांख्यमतावलम्बियोंका कथन किस प्रकार असङ्गत है ? सो वैशेषिकमतावलम्बी बतलाते हैं—
१८८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

कारणं यस्य वै कार्यं कारणं तस्य जायते ।
जायमानं कथमजं भिन्नं नित्यं कथं च तत् ॥ ११ ॥

जिस (सांख्यमतावलम्बी) के मतमें कारण ही कार्य है उसके सिद्धान्तानुसार कारण ही उत्पन्न होता है । किन्तु जब कि वह जन्म लेनेवाला है तो अजन्मा कैसे हो सकता है और भिन्न (विदीर्ण) होनेपर भी नित्य कैसे हो सकता है ? ॥ ११ ॥

कारणं मृद्वदुपादानलक्षणं यस्य वादिनो वै कार्यं कारणमेव कार्याकारेण परिणमते यस्य वादिन इत्यर्थः, तस्याजमेव सत्प्रधानादि कारणं महदादि-कार्यरूपेण जायत इत्यर्थः । महदाद्याकारेण चेज्जायमानं प्रधानं कथमजमुच्यते तैरिति-प्रतिषिद्धं चेदं जायतेऽजं चेति ।<br><br>नित्यं च तैरूच्यते प्रधानं भिन्नं विदीर्णं स्फुटितमेकदेशेन सत्कथं नित्यं भवेदित्यर्थः । न हि सावयवं घटादि एकदेश-जिस वादीके मतमें मृत्तिकाके समान उपादान कारण ही कार्य है अर्थात् जिसके मतमें कारण ही कार्यरूपमें परिणत होता है उसके सिद्धान्तानुसार प्रधानादि कारण अजन्मा होता हुआ भी महदादि कार्यरूपसे उत्पन्न होता है—ऐसा इसका तात्पर्य है । किन्तु यदि प्रधान महदादिरूपसे उत्पन्न होने-वाला है तो वे उसे अजन्मा कैसे बतलाते हैं ? उत्पन्न होता है और अजन्मा भी है—ऐसा कथन तो परस्पर विरुद्ध है ।<br><br>इसके सिवा वे प्रधानको नित्य भी बतलाते हैं । किन्तु वह भिन्न—विदीर्ण अर्थात् एक देशमें स्फुटित यानी विकृत होनेवाला* होकर भी नित्य कैसे हो सकता है ? तात्पर्य यह कि घटादि सावयव पदार्थ, जो एक

* जैसे बीज अङ्कुररूपसे फूटता है ।