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माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

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ओमित्येतदक्षरमिदँ सर्वम्

१. प्रथम प्रकरण — आगमप्रकरण (२९ कारिकाएँ)

तत्सद्ब्रह्मणे नमः

माण्डूक्योपनिषद्

गौडपादीयकारिका, मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित


जाग्रदादित्रयोन्मुक्तं जाग्रदादिमयं तथा।
ओङ्कारैकसुसंवेद्यं यत्पदं तन्नमाम्यहम् ॥


शान्तिपाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

हे देवगण ! हम कानोंसे कल्याणमय वचन सुनें । यज्ञकर्ममें समर्थ होकर नेत्रोंसे शुभ दर्शन करें तथा अपने स्थिर अंग और शरीरोंसे स्तुति करनेवाले हमलोग देवताओंके लिये हितकर आयुका भोग करें । त्रिविध तापकी शान्ति हो ।

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

महान् कीर्तिमान् इन्द्र हमारा कल्याण करे; परम ज्ञानवान् [अथवा परम धनवान्] पूषा हमारा कल्याण करे, जो अरिष्टों (आपत्तियों) के लिये चक्रके समान [घातक] है वह गरुड हमारा कल्याण करे तथा बृहस्पतिजी हमारा कल्याण करें, त्रिविध तापकी शान्ति हो ।


आगम-प्रकरण


भाष्यकारका मङ्गलाचरण

प्रज्ञानांशुप्रतानैः स्थिरचरनिकरव्यापिभिर्व्याप्य लोकान्
भुक्त्वा भोगान्स्थविष्ठान्पुनरपि धिषणोद्भासितान्कामजन्यान् ।
पीत्वा सर्वान्विशेषान्स्वपिति मधुरभुङ् मायया भोजयन्नो
मायासंख्यातुरीयं परममृतमजं ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि ॥१॥

जो अपनी चराचरव्यापिनी ज्ञानरश्मियोंके विस्तारसे सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त कर [ जाग्रत्-अवस्थामें ] स्थूल विषयोंका भोग करनेके अनन्तर फिर [ स्वप्नावस्थामें ] बुद्धिसे प्रकाशित वासनाजनित सम्पूर्ण भोगोंका पानकर मायासे हम सब जीवोंको भोग कराता हुआ [ स्वयं ] आनन्दका भोक्ता होकर शयन करता है तथा जो परम अमृत और अजन्मा ब्रह्म मायासे 'तुरीय' ( चौथी ) संख्यावाला हैं, उसे हम नमस्कार करते हैं ॥ १ ॥

यो विश्वात्मा विधिजविषयान् प्राश्य भोगान्स्थविष्ठान्
पश्चाच्चान्यान्स्वमतिविभवान् ज्योतिषा स्वेन सूक्ष्मान् ।
सर्वानैतान्पुनरपि शनैः स्वात्मनि स्थापयित्वा
हित्वा सर्वान्विशेषान्निर्गतगुणगणः पात्वसौ नस्तुरीयः ॥२॥

जो सर्वात्मा [ जाग्रत्-अवस्थामें ] शुभाशुभ कर्मजनित स्थूल भोगोंको भोगकर फिर [ स्वप्नकालमें ] अपनी बुद्धिसे परिकल्पित सूक्ष्म विषयोंको [ सूर्य आदि बाह्य ज्योतियोंका अभाव होनेके कारण ] अपने ही प्रकाशसे भोगता है और फिर धीरे-धीरे इन सभीको अपनेमें स्थापित कर सम्पूर्ण विशेषोंको छोड़कर निर्गुणरूपसे स्थित हो जाता है, वह तुरीय परमात्मा हमारी रक्षा करे ॥ २ ॥

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ३


सम्बन्धभाष्य

[अनुबन्ध-विमर्शः]
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम् ।<br>तस्योपव्याख्यानं<br>वेदान्तार्थसारसंग्रह-<br>भूतमिदं प्रकरण-<br>चतुष्टयमोमित्येतदक्षरमित्याद्या-<br>रभ्यते । अत एव न पृथक्सम्बन्धा-<br>भिधेयप्रयोजनानि वक्तव्यानि ।<br>यान्येव तु वेदान्ते सम्बन्धाभि-<br>धेयप्रयोजनानि तान्येवेह भवितु-<br>मर्हन्ति । तथापि प्रकरणव्या-<br>चिख्यासुना संक्षेपतो वक्तव्यानि।‘ॐ’ यह अक्षर ही यह सब कुछ है। उसका व्याख्यानरूप तथा वेदान्तार्थका सारसंग्रहभूत यह चार प्रकरणोंवाला ग्रन्थ ‘ओमित्येतदक्षर-मिदम्’ आदि मन्त्रद्वारा आरम्भ किया जाता है। इसीलिये इसके सम्बन्ध, विषय और प्रयोजनका पृथक् वर्णन करनेकी आवश्यकता नहीं है । वेदान्तशास्त्रमें जो-जो सम्बन्ध, विषय और प्रयोजन हुआ करते हैं वे ही इस ग्रन्थमें भी हो सकते हैं। तो भी [ व्याख्याकार ऐसा मानते हैं कि ] जिन्हें किसी प्रकरण-ग्रन्थकी व्याख्या करनेकी इच्छा हो उन्हें संक्षेपसे उनका वर्णन कर ही देना चाहिये ।
तत्र प्रयोजनवत्साधनाभि-<br>व्यञ्जकत्वेनाभिधेयसम्बद्धं शास्त्रं<br>पारम्पर्येण विशिष्टसम्बन्धाभिधेय-<br>प्रयोजनवद्भवति । किं पुनस्त-<br>त्प्रयोजनमित्युच्यते, रोगा-<br>र्तस्येव रोगनिवृत्तौ स्वस्थता ।<br>तथा दुःखात्मकस्यात्मनो द्वैत-तहाँ, प्रयोजनसिद्धिके अनुकूल साधन अभिव्यक्त करनेके कारण अपने प्रतिपाद्य विषयसे सम्बन्ध रखनेवाला शास्त्र परम्परासे विशिष्ट सम्बन्ध, विषय और प्रयोजनवाला हुआ करता है। अच्छा तो, [ इस शास्त्रका ] वह क्या प्रयोजन है ? सो बतलाया जाता है—जिस प्रकार रोगी पुरुषको रोगकी निवृत्ति होनेपर स्वस्थता होती है उसी प्रकार दुःखाभिमानी आत्माको द्वैत-
माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
प्रपञ्चोपशमे स्वस्थता । अद्वैतभावः प्रयोजनम् ।प्रपञ्चकी निवृत्ति होनेपर स्वस्थता मिलती है। अतः अद्वैतभाव ही इसका प्रयोजन है ।
द्वैतप्रपञ्चस्याविद्याकृतत्वाद्दिद्यया तदुपशमः स्यादिति ब्रह्मविद्याप्रकाशनायास्यारम्भः क्रियते । "यत्र हि द्वैतमिव भवति" (बृ० उ० २ । ४ । १४) "यत्र वान्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येदन्योऽन्यद्विजानीयात्" (बृ० उ० ४ । ३ । ३१) "यत्र वास्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्केन कं विजानीयात्" (बृ० उ० २ । ४ । १४) इत्यादिश्रुतिभ्योऽस्यार्थस्य सिद्धिः ।द्वैतप्रपञ्च अविद्याजनित है इसलिये उसकी निवृत्ति विद्यासे ही हो सकती है । अतः ब्रह्मविद्याको प्रकाशित करनेके लिये ही इसका आरम्भ किया जाता है । "जहाँ द्वैतके समान होता है" "जहाँ भिन्नके समान हो वहीं कोई दूसरा दूसरेको देख सकता है अथवा दूसरा दूसरेको जानता है" "जहाँ इसके लिये सब कुछ आत्मा ही हो गया है वहाँ यह किसके द्वारा किसे देखे ? और किसके द्वारा किसे जाने ?" इत्यादि श्रुतियोंसे इसी बातकी सिद्धि होती है ।
[प्रकरण-चतुष्टय-प्रतिपाद्यार्थ-निरूपणम्]<br><br>तत्र तावदोङ्कारनिर्णयाय प्रथमं प्रकरणमागमप्रधानम् आत्मतत्त्वप्रतिपत्त्युपायभूतम् । यस्य द्वैतप्रपञ्चस्योपशमेऽद्वैतप्रतिपत्तौ रज्ज्वामिव सर्पादिविकल्पोपशमे रज्जुतत्त्व-उन (चारों प्रकरणों) में पहला प्रकरण तो ओंकारके स्वरूपका निर्णय करनेके लिये है । वह आगम-(श्रुति) प्रधान और आत्मतत्त्वकी प्राप्तिका उपायभूत है । रज्जुमें सर्पादि विकल्पकी निवृत्ति होनेपर जिस प्रकार रज्जुके स्वरूपका ज्ञान हो जाता है उसी प्रकार जिस द्वैतप्रपञ्चकी निवृत्ति होनेपर अद्वैत

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५


प्रतिपत्तिस्तस्य द्वैतस्य हेतुतो वैतथ्यप्रतिपादनाय द्वितीयं प्रकरणम् । तथाद्वैतस्यापि वैतथ्यप्रसङ्गप्राप्तौ युक्तितस्तथा-त्वदर्शनाय तृतीयं प्रकरणम् । अद्वैतस्य तथात्वप्रतिपत्तिप्रतिपक्ष-भूतानि यानि वादान्तराण्यवैदि-कानि तेषामन्योन्यविरोधि-त्वादतथार्थत्वेन तदुपपत्तिभिरेव निराकरणाय चतुर्थं प्रकरणम् ।तत्त्वका बोध होता है उसी द्वैतका युक्तिपूर्वक मिथ्यात्व प्रतिपादन करने-के लिये [ वैतथ्यनामक ] द्वितीय प्रकरण है । इसी प्रकार अद्वैतके भी मिथ्यात्वका प्रसंग उपस्थित न हो जाय इसलिये युक्तिद्वारा उसका सत्यत्व प्रतिपादन करनेके लिये तृतीय ( अद्वैत ) प्रकरण है । तथा अद्वैतके सत्यत्व-निश्चयके विपक्षी जो अन्य अवैदिक मतान्तर हैं वे परस्पर विरोधी होनेके कारण मिथ्या हैं, अतः उन्हींकी युक्तियोंसे उनका खण्डन करनेके लिये चतुर्थ (अलात शान्ति ) प्रकरण है ।
कथं पुनरोङ्कारनिर्णय आत्म-तत्त्वप्रतिपत्त्युपा-यत्वं प्रतिपद्यत इत्युच्यते—<br>(ओंकारस्य आत्मप्रतिपत्ति-साधनत्वम्)ओंकारका निर्णय किस प्रकार आत्मतत्त्वकी प्राप्तिका उपाय होता है, सो अब बतलाया जाता है—
“ओमित्येतत्” (क० उ० १।२।१५) “एतदालम्बनम्” (क० उ० १।२।१७) “एतद्वै सत्य-काम” (प्र० उ० ५।२) “ओमि-त्यात्मानं युञ्जीत” ( मैत्र्यु० ६।३ ) “ओमिति ब्रह्म” ( तै० उ० १।८।१ ) “ओङ्कार एवेदं सर्वम्” ( छा० उ० २।२३।३ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः ।“ॐ यही [ वह पद ] है” “यही आलम्बन है” “हे सत्यकाम ! यह [ जो ओंकार है वही पर और अपर ब्रह्म है ]” “आत्माका ॐ इस प्रकार ध्यान करे” “ॐ यही ब्रह्म है” “यह सब ओंकार ही है” इत्यादि श्रुतियोंसे यही बात जानी जाती है ।
रज्ज्वादिरिव सर्पादि-सर्पादि विकल्पकी अधिष्ठानभूत
माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
ओंकारस्य सर्वास्पदत्वम्
विकल्पस्यास्पदोऽद्वय आत्मा परमार्थः सन्प्राणादिविकल्पस्यास्पदो यथा तथा सर्वोऽपि वाक्प्रपञ्चः प्राणाद्यात्मविकल्पविषय ओङ्कार एव । स चात्मस्वरूपमेव, तदभिधायकत्वात् । ओङ्कारविकारशब्दाभिधेयश्च सर्वः प्राणादिरात्मविकल्पोऽभिधानव्यतिरेकेण नास्ति । "वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" (छा० उ० ६।१।४) "तदस्येदं वाचा तन्त्या नामभिर्दामभिः सर्वं सितम्" "सर्वं हीदं नामनि" इत्यादिश्रुतिभ्यः । <br><br> अत आह—रज्जु आदिके समान जिस प्रकार अद्वितीय आत्मा परमार्थ सत्य होनेपर भी प्राणादि विकल्पका आश्रय है उसी प्रकार प्राणादि विकल्पको विषय करनेवाला सम्पूर्ण वाग्विलास ओंकार ही है। और वह (ओंकार) आत्माका प्रतिपादन करनेवाला होनेसे उसका स्वरूप ही है। तथा ओंकारके विकाररूप शब्दोंके प्रतिपाद्य आत्माके विकल्परूप समस्त प्राणादि भी अपने प्रतिपादक शब्दोंसे भिन्न नहीं हैं, जैसा कि "विकार केवल वाणीका विलास और नाममात्र है" "उस ब्रह्मका यह सम्पूर्ण जगत् वाणीरूप सूत्रद्वारा नाममयी डोरीसे व्याप्त है" "यह सब नाममय ही है" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। <br><br> इसीलिये कहते हैं—

ॐ ही सब कुछ है

ओमित्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥१॥

ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है। यह जो कुछ भूत, भविष्यत् और वर्तमान है उसीकी व्याख्या है; इसलिये यह सब ओंकार ही है। इसके सिवा जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है वह भी ओंकार ही है ॥ १ ॥

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ७


ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वमिति । यदिदमर्थजातमभिधेयभूतं तस्याभिधानाव्यतिरेकात्, अभिधानस्य चोङ्काराव्यतिरेकादोङ्कार एवेदं सर्वम् । परं च ब्रह्माभिधानाभिधेयोपायपूर्वकमेव गम्यत इत्योङ्कार एव ।ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है। यह अभिधेय ( प्रतिपाद्य ) रूप जितना पदार्थसमूह है वह अपने अभिधान ( प्रतिपादक ) से अभिन्न होनेके कारण और सम्पूर्ण अभिधान भी ओंकारसे अभिन्न होनेके कारण यह सब कुछ ओंकार ही है। पर-ब्रह्म भी अभिधान-अभिधेय ( वाच्य-वाचक ) रूप उपायके द्वारा ही जाना जाता है, इसलिये वह भी ओंकार ही है ।
तस्यैतस्य परापरब्रह्मरूपस्याक्षरस्योमित्येतस्योपव्याख्यानम्; ब्रह्मप्रतिपत्त्युपायत्वाद्ब्रह्मसमीपतया विस्पष्टं प्रकथनमुपव्याख्यानं प्रस्तुतं वेदितव्यमिति वाक्यशेषः।यह जो परापर ब्रह्मरूप अक्षर ॐ है, उसका उपव्याख्यान—ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय होनेके कारण उसके समीपतासे स्पष्ट कथनका नाम उपव्याख्यान है वही—यहाँ प्रस्तुत जानना चाहिये । इस वाक्यमें 'प्रस्तुतं वेदितव्यम् ( प्रस्तुत जानना चाहिये )' यह वाक्यशेष है ।
भूतं भवद्भविष्यदिति कालत्रयपरिच्छेद्यं यत्तदप्योङ्कार एवोक्तन्यायतः । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं कार्याधिगम्यं कालापरिच्छेद्यमव्याकृतादि तदप्योङ्कार एव ॥ १ ॥भूत, वर्तमान और भविष्यत् इन तीनों कालोंसे जो कुछ परिच्छेद्य है वह भी उपर्युक्त न्यायसे ओंकार ही है। इसके सिवा जो तीनों कालोंसे परे, अपने कार्यसे ही विदित होनेवाला और कालसे अपरिच्छेद्य अव्याकृत आदि है वह भी ओंकार ही है ॥ १ ॥
माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

ओंकारवाच्य ब्रह्मकी सर्वात्मकता

अभिधानाभिधेययोरेकत्वेऽप्य-वाचक और वाच्यका अभेद होने-
भिधानप्राधान्येन निर्देशः कृतः।पर भी वाचककी प्रधानतासे ही ॐ
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वमित्यादि।यह अक्षर ही सब कुछ है
अभिधानप्राधान्येन निर्दिष्टस्यइत्यादि रूपसे निर्देश किया गया
पुनरभिधेयप्राधान्येन निर्देशो-है। वाचककी प्रधानतासे निर्दिष्ट
ऽभिधानाभिधेययोरेकत्वप्रति-वस्तुका फिर वाच्यकी प्रधानतासे
पत्त्यर्थः । इतरथा ह्यभिधान-किया हुआ निर्देश वाचक और
तन्त्राभिधेयप्रतिपत्तिरित्याभिधे-वाच्यका एकत्व प्रतिपादन करनेके
यस्याभिधानत्वं गौणमित्याशङ्कालिये है; अन्यथा वाच्यकी प्रतिपत्ति
स्यात् । एकत्वप्रतिपत्तेश्च प्रयो-वाचकके अधीन होनेके कारण
जनमभिधानाभिधेययोरेकेनैववाच्यका वाचकरूप होना गौण
प्रयत्नेन युगपत्प्रविलापयंस्त-ही होगा—ऐसी आशंका हो सकती
द्विलक्षणं ब्रह्म प्रतिपद्येतेति ।है। किन्तु वाच्य (ब्रह्म) और
तथा च वक्ष्यति "पादा मात्रावाचक (ओंकार) की एकत्व-
मात्राश्च पादाः" (मा० उ० ८)प्रतिपत्तिका तो यही प्रयोजन है कि
इति। तदाह—उन दोनोंको एक ही प्रयत्नसे एक
साथ लीन करके उनसे विलक्षण
ब्रह्मको प्राप्त किया जाय । ऐसा ही
"पाद ही मात्रा हैं और मात्रा ही
पाद हैं" इस श्रुतिसे कहेंगे भी।
अब वही बात कहते हैं—

सर्वँ ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥२॥

यह सब ब्रह्म ही है। यह आत्मा भी ब्रह्म ही है। वह यह आत्मा चार पादों (अंशों) वाला है ॥२॥

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ९


सर्वं ह्येतद्ब्रह्मेति । सर्वं यदुक्तमोङ्कारमात्रमिति तदेतद्ब्रह्म । तच्च ब्रह्म परोक्षाभिहितं प्रत्यक्षतो विशेषेण निर्दिशति—अयमात्मा ब्रह्मेति । अयमिति चतुष्पात्त्वेन प्रविभज्यमानं प्रत्यगात्मतयाऽभिनयेन निर्दिशति—अयमात्मेति । सोऽयमात्माऽोङ्काराभिधेयः परापरत्वेन व्यवस्थितश्चतुष्पात्कार्षापणवन्न गौरिवेति । त्रयाणां विश्वादीनां पूर्वपूर्वप्रविलापनेन तुरीयस्य प्रतिपत्तिरिति करणसाधनः पादशब्दः । तुरीयस्य पद्यत इति कर्मसाधनः पादशब्दः ॥ २ ॥यह सब ब्रह्म ही है। अर्थात् यह सब, जो ओंकारमात्र कहा गया है, ब्रह्म है। अबतक परोक्षरूपसे बतलाये हुए उस ब्रह्मको विशेषरूपसे प्रत्यक्षतया 'यह आत्मा ब्रह्म है' ऐसा कहकर निर्देश करते हैं। यहाँ 'अयम्' शब्दद्वारा चतुष्पादरूपसे विभक्त किये जानेवाले आत्माको अपने अन्तरात्मस्वरूपसे अभिनय (अंगुलि-निर्देश) पूर्वक 'अयमात्मा ब्रह्म' ऐसा कहकर बतलाते हैं। ओंकार नामसे कहा जानेवाला तथा पर और अपर-रूपसे व्यवस्थित वह यह आत्मा कार्षापणके* समान चार पाद (अंश) वाला है, गौके समान नहीं। विश्व आदि तीन पादोंमेंसे क्रमशः पूर्व-पूर्व-का लय करते हुए अन्तमें तुरीय ब्रह्मकी उपलब्धि होती है। अतः पहले तीन पादोंमें 'पाद' शब्द करणवाच्य है और तुरीयमें 'जो प्राप्त किया जाय' इस प्रकार कर्मवाच्य है ॥२॥
कथं चतुष्पात्त्वमित्याह—वह किस प्रकार चार पादोंवाला है सो बतलाते हैं—

* किसी देशविशेषमें प्रचलित सिक्केका नाम कार्षापण है। यह सोलह पणका होता है। जिस प्रकार रुपयेमें चार चवन्नी अथवा सेरमें चार पौवे होते हैं उसी प्रकार उसमें चार पाद माने गये हैं।

१० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


आत्माका प्रथम पाद—वैश्वानर

जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥३॥

जाग्रत् अवस्था जिस [ की अभिव्यक्ति ] का स्थान है, जो बहिः-प्रज्ञ (बाह्य विषयोंको प्रकाशित करनेवाला) सात अंगोंवाला, उन्नीस मुखोंवाला और स्थूल विषयोंका भोक्ता है वह वैश्वानर पहला पाद है।३।


जागरितं स्थानमस्येति जागरितस्थानः । बहिष्प्रज्ञः स्वात्मव्यतिरिक्ते विषये प्रज्ञा यस्य स बहिष्प्रज्ञो बहिर्विषयेव प्रज्ञाऽविद्याकृतावभासत इत्यर्थः । तथा सप्ताङ्गन्यस्य "तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादौ" (छा० उ० ५।१८।२) इत्यग्निहोत्रकल्पनाशेषत्वेनाहवनीयोऽग्निरस्य मुखत्वेनोक्त इत्येवं सप्ताङ्गानि यस्य स सप्ताङ्गः । <br><br> तथैकोनविंशतिर्मुखान्‍यस्य बुद्धीन्द्रियाणि कर्मेन्द्रियाणि च दश वायवश्च प्राणादयः पञ्चजाग्रत्-अवस्था जिसका स्थान है उसे जागरितस्थान कहते हैं । जिसकी अपनेसे भिन्न विषयोंमें प्रज्ञा है उसे बहिष्प्रज्ञ कहते हैं, अर्थात् जिसकी अविद्याकृत बुद्धि बाह्य विषयोंसे सम्बद्ध-सी भासती है। इसी प्रकार जिसके सात अंग हैं अर्थात् "इस उस वैश्वानर आत्माका द्युलोक शिर है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, आकाश मध्यस्थान (देह) है, अन्न (अन्नका कारणरूप जल) ही मूत्र स्थान है और पृथिवी ही चरण है" इस श्रुतिके अनुसार अग्निहोत्रकल्पनामें अंगभूत होनेके कारण आहवनीय अग्नि उसके मुखरूपसे बतलाया गया है। इस प्रकार जिसके सात अंग हैं उसे ही सप्तांग कहते हैं । <br><br> तथा जिसके उन्नीस मुख हैं, दश तो ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राणादि वायु, तथा मन, बुद्धि,

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ११


मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तमिति मुखानीव मुखानि तान्युपलब्धिद्वाराणीत्यर्थः, स एवंविशिष्टो वैश्वानरो यथोक्तद्वारैः शब्दादीन्स्थूलान्विषयान्भुङ्क्त इति स्थूलभुक् । विश्वेषां नराणामनेकधा नयनाद्वैश्वानरः । यद्वा विश्वश्चासौ नरश्चेति विश्वानरः । विश्वानर एव वैश्वानरः । सर्वपिण्डात्मनानन्यत्वात् स प्रथमः पादः । एतत्पूर्वकत्वादुत्तरपादाधिगमस्य प्राथम्यमस्य ।अहंकार और चित्त—ये जिसके मुखके समान मुख अर्थात् उपलब्धिके द्वार हैं, वह ऐसे विशेषणोंवाला वैश्वानर उपर्युक्त द्वारोंसे शब्द आदि स्थूल विषयोंको भोगता है इसलिये वह स्थूलभुक् है । सम्पूर्ण नरोंको [अनेक प्रकारकी योनियोंमें] नयन (वहन) करनेके कारण वह ‘वैश्वानर’ कहलाता है; अथवा वह विश्व (समस्त) नररूप है इसलिये विश्वानर है । विश्वानर ही [स्वार्थमें तद्धित अण् प्रत्यय होनेसे] वैश्वानर कहलाता है । समस्त देहोंसे अभिन्न होनेके कारण वही पहला पाद है । परवर्ती पादोंका ज्ञान पहले इसका ज्ञान होनेपर ही होता है, इसलिये यह प्रथम है ।
कथमयमात्मा ब्रह्मेति प्रत्यगात्मनोऽस्य चतुष्पात्त्वे प्रकृते द्युलोकादीनां मूर्धाद्यङ्गत्वमिति ।शंका—“अयमात्मा ब्रह्म” इस श्रुतिके अनुसार यहाँ प्रत्यगात्माको चार पादोंवाला बतलानेका प्रसङ्ग था। उसमें द्युलोकादिको उसके मूर्धा आदि अंगरूपसे कैसे बतलाने लगे ?
(वैश्वानरस्य सप्ताङ्गत्त्वादिप्रतिपादने हेतुः चतुष्पात्त्वस्य)<br>नैष दोषः । सर्वस्य प्रपञ्चस्य साधिदैविकस्यानेनात्मना विवक्षितत्वात् ।**समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि इस आत्माके द्वारा ही अधिदैवसहित सम्पूर्ण प्रपञ्चके चतुष्पात्त्वका प्रतिपादन करना इष्ट है ।
१२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

| एवं च सति सर्वप्रपञ्चोपशमेऽद्वैतसिद्धिः। सर्वभूतस्थश्चात्मैको दृष्टः स्यात् सर्वभूतानि चात्मनि। "यस्तु सर्वाणि भूतानि" (ई० उ० ६) इत्यादिश्रुत्यर्थ उपसंहृतश्चैवं स्यात्। अन्यथा हि स्वदेहपरिच्छिन्न एव प्रत्यगात्मा सांख्यादिभिरिव दृष्टः स्यात्तथा च सत्यद्वैतमिति श्रुतिकृतो विशेषो न स्यात्, सांख्यादिदर्शनेनाविशेषात्। इष्यते च सर्वोपनिषदां सर्वात्मैक्यप्रतिपादकत्वम्। अतो युक्तमेवाध्यात्मिकस्य पिण्डात्मनो द्युलोकाद्यङ्गत्वेन विराडात्मनाधिदैविकेनैकत्वमभिप्रेत्य सप्ताङ्गत्ववचनम्। "मूर्धा ते व्यपतिष्यत्" (छा० उ० ५। १२। २) इत्यादिलिङ्गदर्शनाच्च। <br><br> विराजैकत्वमुपलक्षणार्थं हिरण्यगर्भाव्याकृतात्मनोः। उक्तं चैतत् | ऐसा होनेपर ही सारे प्रपञ्चके निषेधपूर्वक अद्वैतकी सिद्धि हो सकेगी। समस्त भूतोंमें स्थित एक आत्मा और आत्मामें सम्पूर्ण भूतोंका साक्षात्कार हो सकेगा और इसी प्रकार "जो सारे भूतोंको [आत्मामें ही देखता है]" इत्यादि श्रुतियोंके अर्थका उपसंहार हो सकेगा। नहीं तो सांख्यदर्शन आदिके समान अपने देहमें परिच्छिन्न अन्तरात्माका ही दर्शन होगा। ऐसा होनेपर 'अद्वैत है' इस श्रुतिप्रतिपादित विशेष भावकी सिद्धि नहीं होगी; क्योंकि सांख्यादि दर्शनोंकी अपेक्षा इसमें कुछ विशेषता नहीं रहेगी। परन्तु सम्पूर्ण उपनिषदोंको आत्माके एकत्वका प्रतिपादन तो इष्ट ही है। इसलिये इस आध्यात्मिक पिण्डात्माका द्युलोक आदिके अंगरूपसे आधिदैविक पिण्डात्माके साथ एकत्व प्रतिपादन करनेके अभिप्रायसे उसका सप्ताङ्गत्व प्रतिपादन उचित ही है। इसके सिवा [आत्माकी व्यस्तोपासनाके निन्दक] "तेरा शिर गिर जाता" आदि वाक्य भी इसमें हेतु हैं। <br><br> यहाँ जो विराट्के साथ एकत्व प्रतिपादन किया है वह हिरण्यगर्भ और अव्याकृतके एकत्वको उपलक्षित |

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ९३


मधुब्राह्मणे "यश्चायमस्यां पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मम्" (बृ० उ० २।५।१) इत्यादि । सुषुप्ताव्याकृतयोस्त्वेकत्वं सिद्धमेव निर्विशेषत्वात् । एवं च सत्येतत्सिद्धं भविष्यति सर्वद्वैतोपशमे चाद्वैतमिति ॥३॥करानेके लिये है । मधुब्राह्मणमें ऐसा कहा भी है—"यह जो इस पृथिवीमें तेजोमय एवं अमृतमय पुरुष है तथा यह जो अध्यात्मपुरुष है [वे दोनों एक हैं ]" इत्यादि । कोई विशेषता न रहनेके कारण सोये हुए पुरुष और अव्याकृतका एकत्व तो सिद्ध ही है। ऐसा होनेपर ही यह सिद्ध होगा कि सम्पूर्ण द्वैतकी निवृत्ति होनेपर अद्वैत ही है ॥३॥

आत्माका द्वितीय पाद—तैजस

स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तेजसो द्वितीयः पादः ॥४॥

स्वप्न जिसका स्थान है तथा जो अन्तःप्रज्ञ, सात अंगोंवाला, उन्नीस मुखवाला और सूक्ष्म विषयोंका भोक्ता है वह तैजस [इसका] दूसरा पाद है।

स्वप्नः स्थानमस्य तैजसस्य स्वप्नस्थानः । जाग्रत्प्रज्ञानेकसाधना वहिर्विषयेवावभासमाना मनःस्पन्दनमात्रा सती तथाभूतं संस्कारं मनस्याधत्ते। तन्मनस्तथा संस्कृतं चित्रित इव पटो बाह्यसाधनानपेक्षमविद्याकामकर्मभिःस्वप्न इस तैजसका स्थान है, इसलिये यह स्वप्नस्थानवाला [कहा जाता] है। अनेक साधनवती जाग्रत्कालीना बुद्धि मनका स्फुरणमात्र होनेपर भी बाह्यविषयसम्बन्धिनी-सी प्रतीत होती हुई मनमें वैसा ही संस्कार उत्पन्न करती है। चित्रित वस्त्रके समान इस प्रकारके संस्कारोंसे युक्त हुआ वह मन अविद्या कामना और कर्मके कारण बाह्यसाधनकी अपेक्षाके बिना

१४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


प्रेर्य्यमाणं जाग्रद्वदवभासते। तथा चोक्तम्—"अस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामपादाय" (बृ० उ० ४।३।९) इति। तथा "परे देवे मनस्येकीभवति" (प्र० उ० ४।२) इति प्रस्तुत्य "अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति" (प्र० उ० ४।५) इत्याथर्वणे।हो प्रेरित होकर जाग्रत्-सा भासने लगता है । ऐसा ही कहा भी है—"इस सर्वसाधन-सम्पन्न लोकके संस्कार ग्रहण करके [स्वप्न देखता है]" इत्यादि । तथा आथर्वणश्रुतिमें भी [समस्त इन्द्रियाँ] "परम (इन्द्रियादिसे उत्कृष्ट) देव (प्रकाशनशील) मनमें एकरूप हो जाती हैं" इस प्रकार प्रस्तावनाकर कहा है "यहाँ—स्वप्नावस्थामें यह देव अपनी महिमाका अनुभव करता है।"
इन्द्रियापेक्षयान्तःस्थत्वान्मनसतद्वासनारूपा च स्वप्ने प्रज्ञा यस्येत्यन्तःप्रज्ञः। विषयशून्यायां केवलप्रकाशस्वरूपायां विषयित्वेन भवतीति तैजसः। विश्वस्य सविषयत्वेन प्रज्ञायाः स्थूलाया भोज्यत्वम्। इह पुनः केवला वासनामात्रा प्रज्ञा भोज्येति प्रविविक्तो भोग इति । समानमन्यत्। द्वितीयः पादस्तैजसः॥४॥अन्य इन्द्रियोंकी अपेक्षा मन अधिक अन्तःस्थ है, स्वप्नावस्थामें जिसकी प्रज्ञा उस (मन) की वासनाके अनुरूप रहती है उसे अन्तःप्रज्ञ कहते हैं; वह अपनी विषयशून्य और केवल प्रकाशस्वरूप प्रज्ञाका विषयी (अनुभव करनेवाला) होनेके कारण 'तैजस' कहा जाता है । विश्व बाह्यविषययुक्त होता है, इसलिये जागरित अवस्थामें स्थूल प्रज्ञा उसकी भोज्य है । किन्तु तैजसके लिये केवल वासनामात्रा प्रज्ञा भोजनीया है; इसलिये इसका भोग सूक्ष्म है । शेष अर्थ पहलेहीके समान है । यह तैजस ही दूसरा पाद है ॥ ४ ॥

शां० भा० ] आगम-प्रकरण १५


दर्शनादर्शनवृत्त्योस्तत्त्वाप्रबोधलक्षणस्य स्वापस्य तुल्यत्वात् सुषुप्तिग्रहणार्थं यत्र सुप्त इत्यादि विशेषणम् । अथ वा त्रिष्वपि स्थानेषु तत्त्वाप्रतिबोधलक्षणः स्वापोऽविशिष्ट इति पूर्वाभ्यां सुषुप्तं विभजते—[ तत्त्वज्ञानका अभावरूप ] स्वापावस्थाके दर्शन (जाग्रत्स्थान) और अदर्शन (स्वप्नस्थान) इन दोनों ही वृत्तियोंमें समान होनेके कारण सुषुप्ति अवस्थाको [ उससे पृथक् ] ग्रहण करनेके लिये 'यत्र सुप्तः' इत्यादि विशेषण दिये जाते हैं। अथवा तीनों ही अवस्थाओंमें तत्त्वका अज्ञानरूप निद्रा समान ही है इसलिये पहले दो स्थानोंसे सुषुप्तिका विभाग करते हैं—

आत्माका तृतीय पाद—प्राज्ञ

यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥५॥

जिस अवस्थामें सोया हुआ पुरुष किसी भोगकी इच्छा नहीं करता और न कोई स्वप्न ही देखता है उसे सुषुप्ति कहते हैं। वह सुषुप्ति जिसका स्थान है तथा जो एकीभूत प्रकृष्ट ज्ञानस्वरूप होता हुआ ही आनन्दमय, आनन्दका भोक्ता और चेतनारूप मुखवाला है वह प्राज्ञ ही तीसरा पाद है॥५॥

यत्र यस्मिन्स्थाने काले वा सुप्तो न कञ्चन स्वप्नं पश्यति न कञ्चन कामं कामयते । न हि सुप्ते पूर्वयोरिवान्यथाग्रहणलक्षणंजहाँ यानी जिस स्थान अथवा समयमें सोया हुआ पुरुष न कोई स्वप्न देखता और न किसी भोगकी ही इच्छा करता है, क्योंकि सुषुप्तावस्थामें पहली दोनों अवस्थाओंके समान अन्यथा ग्रहणरूप स्वप्नदर्शन

| १६ | मांडूक्योपनिषद् | [ गौ० कां० | | :--- | :--- |


स्वप्नदर्शनं कामो वा क्वचन विद्यते। तदेतत्सुषुप्तं स्थानमस्येति सुषुप्तस्थानः।अथवा किसी प्रकारकी कामना नहीं होती, वह यह सुषुप्त अवस्था ही जिसका स्थान है उसे सुषुप्तस्थान कहते हैं ।
स्थानद्वयप्रविभक्तं मनःस्पन्दितं द्वैतजातं तथारूपापरित्यागेनाविवेकापन्नं नैशतमोग्रस्तमिवाहः सप्रपञ्चमेकीभूतमित्युच्यते।जिस प्रकार रात्रिके अन्धकारसे दिन आच्छादित हो जाता है उसी प्रकार पूर्वोक्त दोनों स्थानोंमें विभिन्न रूपसे प्रतीत होनेवाला मनका स्फुरणरूप द्वैतसमूह [इस अवस्थामें] प्रपञ्चके सहित अपने उस (विशिष्ट) स्वरूपका त्याग न कर अज्ञानसे आच्छादित
अत एव स्वप्नजाग्रन्मनःस्पन्दनानि प्रज्ञानानि घनीभूतानीव सेयमवस्थाविवेकरूपत्वात्प्रज्ञानघन उच्यते । यथा रात्रौ नैशेन तमसाविभज्यमानं सर्वं घनमिव तद्वत्प्रज्ञानघन एव । एवशब्दान्न जात्यन्तरं प्रज्ञानव्यतिरेकेणास्तीत्यर्थः ।हो जाता है; इसलिये इसे 'एकीभूत' ऐसा कहा जाता है । अतः जिस अवस्थामें स्वप्न और जाग्रत्—ये मनके स्फुरणरूप प्रज्ञान घनीभूतसे हो जाते हैं, वह यह अवस्था अविवेकरूपा होनेके कारण प्रज्ञानघन कही जाती है । जिस प्रकार रात्रिमें रात्रिके अन्धकारसे पृथक्त्वकी प्रतीति न होनेके कारण सम्पूर्ण प्रपञ्च घनीभूत-सा जान पड़ता है उसी प्रकार यह प्रज्ञानघन ही है । 'एव' शब्दसे यह तात्पर्य है कि उस समय प्रज्ञानके सिवा कोई अन्य जाति नहीं रहती ।
मनसो विषयविषय्याकारस्पन्दनायासदुःखाभावादानन्दमय आनन्दप्रायो नानन्द एव ।मनका जो विषय और विषयीरूपसे स्फुरित होनेके आयासका दुःख है उसका अभाव होनेके कारण यह आनन्दमय अर्थात् आनन्दबहुल है; केवल आनन्दमात्र

शां० भा० ] आगम-प्रकरण १७


अनात्यन्तिकत्वात् । यथा लोके निरायासस्थितः सुख्यानन्दभुगुच्यते, अत्यन्तानायासरूपा हीयं स्थितिरनेनानुभूयत इत्यानन्दभुक्, "एषोऽस्य परम आनन्दः" (बृ० उ० ४।३।३२) इति श्रुतेः ।ही नहीं है, क्योंकि इस अवस्थामें आनन्दकी आत्यन्तिकता नहीं है; जिस प्रकार लोकमें अनायासरूपसे स्थित पुरुष सुखी या आनन्द भोग करनेवाला कहा जाता है, उसी प्रकार, क्योंकि इस अवस्थामें यह आत्मा इस अत्यन्त अनायासरूपा स्थितिका अनुभव करता है, इसलिये यह आनन्दभुक् कहा जाता है; जैसा कि "यह इसका परम आनन्द है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ।
स्वप्नादिप्रतिबोधचेतः प्रति द्वारीभूतत्वाच्चेतोमुखः। बोधलक्षणं वा चेतो द्वारं मुखमस्य स्वप्नाद्यागमनं प्रतीति चेतोमुखः। भूतभविष्यज्ज्ञातृत्वं सर्वविषयज्ञातृत्वमस्यैवेति प्राज्ञः। सुषुप्तोऽपि हि भूतपूर्वगत्या प्राज्ञ उच्यते । अथ वा प्रज्ञप्तिमात्रमस्यैवासाधारणं रूपमिति प्राज्ञः, इतरयोर्विशिष्टमपि विज्ञानमस्ति । सोऽयं प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥स्वप्नादिज्ञानरूप चेतनाके प्रति द्वारस्वरूप होनेके कारण यह चेतोमुख है । अथवा स्वप्नादिकी प्राप्तिके लिये ज्ञानस्वरूप चित्त ही इसका द्वार यानी मुख है, इसलिये यह चेतोमुख है । भूत-भविष्यत्का तथा सम्पूर्ण विषयोंका ज्ञाता यही है, इसलिये यह प्राज्ञ है । सुषुप्त होनेपर भी इसे भूतपूर्वगतिसे 'प्राज्ञ' कहा जाता है । अथवा केवल प्रज्ञप्ति (ज्ञान) मात्र इसीका असाधारणरूप है, इसलिये यह प्राज्ञ है, क्योंकि दूसरोंको (विश्व और तैजसको) तो विशिष्ट विज्ञान भी होता है । वह यह प्राज्ञ ही तीसरा पाद है ॥ ५ ॥

३-४

१८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


प्राज्ञका सर्वकारणत्व

एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञः एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥६॥

यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह अन्तर्यामी है और समस्त जीवोंकी उत्पत्ति तथा लयका स्थान होनेके कारण यह सबका कारण भी है ॥ ६ ॥

एष हि स्वरूपावस्थः सर्वेश्वरः साधिदैविकस्य भेदजातस्य सर्वस्येशिता नैतस्माज्जात्यन्तरभूतोऽन्येषामिव । “प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः” (छा० उ० ६।८।२) इति श्रुतेः। अयमेव हि सर्वस्य सर्वभेदावस्थो ज्ञातेत्येष सर्वज्ञः । एषोऽन्तर्याम्यन्तरनुप्रविश्य सर्वेषां भूतानां नियन्ताप्येष एव । अत एव यथोक्तं सभेदं जगत्प्रसूयत इत्येष योनिः सर्वस्य । यत एवं प्रभवश्चाप्ययश्च प्रभवाप्ययौ हि भूतानामेष एव ॥ ६ ॥अपने स्वरूपमें स्थित यह (प्राज्ञ) ही सर्वेश्वर है, अर्थात् अधिदैवके सहित सम्पूर्ण भेदसमूहका ईश्वर—ईशान (शासन) करनेवाला है। “हे सोम्य ! यह मन (जीव) प्राण (प्राणसंज्ञक ब्रह्म) रूप बन्धनवाला है” इस श्रुतिसे अन्य मतावलम्बियोंके सिद्धान्तानुसार [सर्वज्ञ परमेश्वर] इस प्राज्ञसे कोई विजातीय पदार्थ नहीं है। सम्पूर्ण भेदमें स्थित हुआ यही सबका ज्ञाता है; इसलिये यह सर्वज्ञ है। [अतएव] यह अन्तर्यामी है अर्थात् समस्त प्राणियोंके भीतर अनुप्रविष्ट होकर उनका नियमन करनेवाला भी यही है। इसीसे पूर्वोक्त भेदके सहित सारा जगत् उत्पन्न होता है; इसलिये यही सबका कारण है। क्योंकि ऐसा है, इसलिये यही समस्त प्राणियोंका उत्पत्ति और लयस्थान भी है ॥६॥