भारतकोश
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माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
१२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

| एवं च सति सर्वप्रपञ्चोपशमेऽद्वैतसिद्धिः। सर्वभूतस्थश्चात्मैको दृष्टः स्यात् सर्वभूतानि चात्मनि। "यस्तु सर्वाणि भूतानि" (ई० उ० ६) इत्यादिश्रुत्यर्थ उपसंहृतश्चैवं स्यात्। अन्यथा हि स्वदेहपरिच्छिन्न एव प्रत्यगात्मा सांख्यादिभिरिव दृष्टः स्यात्तथा च सत्यद्वैतमिति श्रुतिकृतो विशेषो न स्यात्, सांख्यादिदर्शनेनाविशेषात्। इष्यते च सर्वोपनिषदां सर्वात्मैक्यप्रतिपादकत्वम्। अतो युक्तमेवाध्यात्मिकस्य पिण्डात्मनो द्युलोकाद्यङ्गत्वेन विराडात्मनाधिदैविकेनैकत्वमभिप्रेत्य सप्ताङ्गत्ववचनम्। "मूर्धा ते व्यपतिष्यत्" (छा० उ० ५। १२। २) इत्यादिलिङ्गदर्शनाच्च। <br><br> विराजैकत्वमुपलक्षणार्थं हिरण्यगर्भाव्याकृतात्मनोः। उक्तं चैतत् | ऐसा होनेपर ही सारे प्रपञ्चके निषेधपूर्वक अद्वैतकी सिद्धि हो सकेगी। समस्त भूतोंमें स्थित एक आत्मा और आत्मामें सम्पूर्ण भूतोंका साक्षात्कार हो सकेगा और इसी प्रकार "जो सारे भूतोंको [आत्मामें ही देखता है]" इत्यादि श्रुतियोंके अर्थका उपसंहार हो सकेगा। नहीं तो सांख्यदर्शन आदिके समान अपने देहमें परिच्छिन्न अन्तरात्माका ही दर्शन होगा। ऐसा होनेपर 'अद्वैत है' इस श्रुतिप्रतिपादित विशेष भावकी सिद्धि नहीं होगी; क्योंकि सांख्यादि दर्शनोंकी अपेक्षा इसमें कुछ विशेषता नहीं रहेगी। परन्तु सम्पूर्ण उपनिषदोंको आत्माके एकत्वका प्रतिपादन तो इष्ट ही है। इसलिये इस आध्यात्मिक पिण्डात्माका द्युलोक आदिके अंगरूपसे आधिदैविक पिण्डात्माके साथ एकत्व प्रतिपादन करनेके अभिप्रायसे उसका सप्ताङ्गत्व प्रतिपादन उचित ही है। इसके सिवा [आत्माकी व्यस्तोपासनाके निन्दक] "तेरा शिर गिर जाता" आदि वाक्य भी इसमें हेतु हैं। <br><br> यहाँ जो विराट्के साथ एकत्व प्रतिपादन किया है वह हिरण्यगर्भ और अव्याकृतके एकत्वको उपलक्षित |

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ९३


मधुब्राह्मणे "यश्चायमस्यां पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मम्" (बृ० उ० २।५।१) इत्यादि । सुषुप्ताव्याकृतयोस्त्वेकत्वं सिद्धमेव निर्विशेषत्वात् । एवं च सत्येतत्सिद्धं भविष्यति सर्वद्वैतोपशमे चाद्वैतमिति ॥३॥करानेके लिये है । मधुब्राह्मणमें ऐसा कहा भी है—"यह जो इस पृथिवीमें तेजोमय एवं अमृतमय पुरुष है तथा यह जो अध्यात्मपुरुष है [वे दोनों एक हैं ]" इत्यादि । कोई विशेषता न रहनेके कारण सोये हुए पुरुष और अव्याकृतका एकत्व तो सिद्ध ही है। ऐसा होनेपर ही यह सिद्ध होगा कि सम्पूर्ण द्वैतकी निवृत्ति होनेपर अद्वैत ही है ॥३॥

आत्माका द्वितीय पाद—तैजस

स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तेजसो द्वितीयः पादः ॥४॥

स्वप्न जिसका स्थान है तथा जो अन्तःप्रज्ञ, सात अंगोंवाला, उन्नीस मुखवाला और सूक्ष्म विषयोंका भोक्ता है वह तैजस [इसका] दूसरा पाद है।

स्वप्नः स्थानमस्य तैजसस्य स्वप्नस्थानः । जाग्रत्प्रज्ञानेकसाधना वहिर्विषयेवावभासमाना मनःस्पन्दनमात्रा सती तथाभूतं संस्कारं मनस्याधत्ते। तन्मनस्तथा संस्कृतं चित्रित इव पटो बाह्यसाधनानपेक्षमविद्याकामकर्मभिःस्वप्न इस तैजसका स्थान है, इसलिये यह स्वप्नस्थानवाला [कहा जाता] है। अनेक साधनवती जाग्रत्कालीना बुद्धि मनका स्फुरणमात्र होनेपर भी बाह्यविषयसम्बन्धिनी-सी प्रतीत होती हुई मनमें वैसा ही संस्कार उत्पन्न करती है। चित्रित वस्त्रके समान इस प्रकारके संस्कारोंसे युक्त हुआ वह मन अविद्या कामना और कर्मके कारण बाह्यसाधनकी अपेक्षाके बिना

१४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


प्रेर्य्यमाणं जाग्रद्वदवभासते। तथा चोक्तम्—"अस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामपादाय" (बृ० उ० ४।३।९) इति। तथा "परे देवे मनस्येकीभवति" (प्र० उ० ४।२) इति प्रस्तुत्य "अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति" (प्र० उ० ४।५) इत्याथर्वणे।हो प्रेरित होकर जाग्रत्-सा भासने लगता है । ऐसा ही कहा भी है—"इस सर्वसाधन-सम्पन्न लोकके संस्कार ग्रहण करके [स्वप्न देखता है]" इत्यादि । तथा आथर्वणश्रुतिमें भी [समस्त इन्द्रियाँ] "परम (इन्द्रियादिसे उत्कृष्ट) देव (प्रकाशनशील) मनमें एकरूप हो जाती हैं" इस प्रकार प्रस्तावनाकर कहा है "यहाँ—स्वप्नावस्थामें यह देव अपनी महिमाका अनुभव करता है।"
इन्द्रियापेक्षयान्तःस्थत्वान्मनसतद्वासनारूपा च स्वप्ने प्रज्ञा यस्येत्यन्तःप्रज्ञः। विषयशून्यायां केवलप्रकाशस्वरूपायां विषयित्वेन भवतीति तैजसः। विश्वस्य सविषयत्वेन प्रज्ञायाः स्थूलाया भोज्यत्वम्। इह पुनः केवला वासनामात्रा प्रज्ञा भोज्येति प्रविविक्तो भोग इति । समानमन्यत्। द्वितीयः पादस्तैजसः॥४॥अन्य इन्द्रियोंकी अपेक्षा मन अधिक अन्तःस्थ है, स्वप्नावस्थामें जिसकी प्रज्ञा उस (मन) की वासनाके अनुरूप रहती है उसे अन्तःप्रज्ञ कहते हैं; वह अपनी विषयशून्य और केवल प्रकाशस्वरूप प्रज्ञाका विषयी (अनुभव करनेवाला) होनेके कारण 'तैजस' कहा जाता है । विश्व बाह्यविषययुक्त होता है, इसलिये जागरित अवस्थामें स्थूल प्रज्ञा उसकी भोज्य है । किन्तु तैजसके लिये केवल वासनामात्रा प्रज्ञा भोजनीया है; इसलिये इसका भोग सूक्ष्म है । शेष अर्थ पहलेहीके समान है । यह तैजस ही दूसरा पाद है ॥ ४ ॥

शां० भा० ] आगम-प्रकरण १५


दर्शनादर्शनवृत्त्योस्तत्त्वाप्रबोधलक्षणस्य स्वापस्य तुल्यत्वात् सुषुप्तिग्रहणार्थं यत्र सुप्त इत्यादि विशेषणम् । अथ वा त्रिष्वपि स्थानेषु तत्त्वाप्रतिबोधलक्षणः स्वापोऽविशिष्ट इति पूर्वाभ्यां सुषुप्तं विभजते—[ तत्त्वज्ञानका अभावरूप ] स्वापावस्थाके दर्शन (जाग्रत्स्थान) और अदर्शन (स्वप्नस्थान) इन दोनों ही वृत्तियोंमें समान होनेके कारण सुषुप्ति अवस्थाको [ उससे पृथक् ] ग्रहण करनेके लिये 'यत्र सुप्तः' इत्यादि विशेषण दिये जाते हैं। अथवा तीनों ही अवस्थाओंमें तत्त्वका अज्ञानरूप निद्रा समान ही है इसलिये पहले दो स्थानोंसे सुषुप्तिका विभाग करते हैं—

आत्माका तृतीय पाद—प्राज्ञ

यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥५॥

जिस अवस्थामें सोया हुआ पुरुष किसी भोगकी इच्छा नहीं करता और न कोई स्वप्न ही देखता है उसे सुषुप्ति कहते हैं। वह सुषुप्ति जिसका स्थान है तथा जो एकीभूत प्रकृष्ट ज्ञानस्वरूप होता हुआ ही आनन्दमय, आनन्दका भोक्ता और चेतनारूप मुखवाला है वह प्राज्ञ ही तीसरा पाद है॥५॥

यत्र यस्मिन्स्थाने काले वा सुप्तो न कञ्चन स्वप्नं पश्यति न कञ्चन कामं कामयते । न हि सुप्ते पूर्वयोरिवान्यथाग्रहणलक्षणंजहाँ यानी जिस स्थान अथवा समयमें सोया हुआ पुरुष न कोई स्वप्न देखता और न किसी भोगकी ही इच्छा करता है, क्योंकि सुषुप्तावस्थामें पहली दोनों अवस्थाओंके समान अन्यथा ग्रहणरूप स्वप्नदर्शन

| १६ | मांडूक्योपनिषद् | [ गौ० कां० | | :--- | :--- |


स्वप्नदर्शनं कामो वा क्वचन विद्यते। तदेतत्सुषुप्तं स्थानमस्येति सुषुप्तस्थानः।अथवा किसी प्रकारकी कामना नहीं होती, वह यह सुषुप्त अवस्था ही जिसका स्थान है उसे सुषुप्तस्थान कहते हैं ।
स्थानद्वयप्रविभक्तं मनःस्पन्दितं द्वैतजातं तथारूपापरित्यागेनाविवेकापन्नं नैशतमोग्रस्तमिवाहः सप्रपञ्चमेकीभूतमित्युच्यते।जिस प्रकार रात्रिके अन्धकारसे दिन आच्छादित हो जाता है उसी प्रकार पूर्वोक्त दोनों स्थानोंमें विभिन्न रूपसे प्रतीत होनेवाला मनका स्फुरणरूप द्वैतसमूह [इस अवस्थामें] प्रपञ्चके सहित अपने उस (विशिष्ट) स्वरूपका त्याग न कर अज्ञानसे आच्छादित
अत एव स्वप्नजाग्रन्मनःस्पन्दनानि प्रज्ञानानि घनीभूतानीव सेयमवस्थाविवेकरूपत्वात्प्रज्ञानघन उच्यते । यथा रात्रौ नैशेन तमसाविभज्यमानं सर्वं घनमिव तद्वत्प्रज्ञानघन एव । एवशब्दान्न जात्यन्तरं प्रज्ञानव्यतिरेकेणास्तीत्यर्थः ।हो जाता है; इसलिये इसे 'एकीभूत' ऐसा कहा जाता है । अतः जिस अवस्थामें स्वप्न और जाग्रत्—ये मनके स्फुरणरूप प्रज्ञान घनीभूतसे हो जाते हैं, वह यह अवस्था अविवेकरूपा होनेके कारण प्रज्ञानघन कही जाती है । जिस प्रकार रात्रिमें रात्रिके अन्धकारसे पृथक्त्वकी प्रतीति न होनेके कारण सम्पूर्ण प्रपञ्च घनीभूत-सा जान पड़ता है उसी प्रकार यह प्रज्ञानघन ही है । 'एव' शब्दसे यह तात्पर्य है कि उस समय प्रज्ञानके सिवा कोई अन्य जाति नहीं रहती ।
मनसो विषयविषय्याकारस्पन्दनायासदुःखाभावादानन्दमय आनन्दप्रायो नानन्द एव ।मनका जो विषय और विषयीरूपसे स्फुरित होनेके आयासका दुःख है उसका अभाव होनेके कारण यह आनन्दमय अर्थात् आनन्दबहुल है; केवल आनन्दमात्र

शां० भा० ] आगम-प्रकरण १७


अनात्यन्तिकत्वात् । यथा लोके निरायासस्थितः सुख्यानन्दभुगुच्यते, अत्यन्तानायासरूपा हीयं स्थितिरनेनानुभूयत इत्यानन्दभुक्, "एषोऽस्य परम आनन्दः" (बृ० उ० ४।३।३२) इति श्रुतेः ।ही नहीं है, क्योंकि इस अवस्थामें आनन्दकी आत्यन्तिकता नहीं है; जिस प्रकार लोकमें अनायासरूपसे स्थित पुरुष सुखी या आनन्द भोग करनेवाला कहा जाता है, उसी प्रकार, क्योंकि इस अवस्थामें यह आत्मा इस अत्यन्त अनायासरूपा स्थितिका अनुभव करता है, इसलिये यह आनन्दभुक् कहा जाता है; जैसा कि "यह इसका परम आनन्द है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ।
स्वप्नादिप्रतिबोधचेतः प्रति द्वारीभूतत्वाच्चेतोमुखः। बोधलक्षणं वा चेतो द्वारं मुखमस्य स्वप्नाद्यागमनं प्रतीति चेतोमुखः। भूतभविष्यज्ज्ञातृत्वं सर्वविषयज्ञातृत्वमस्यैवेति प्राज्ञः। सुषुप्तोऽपि हि भूतपूर्वगत्या प्राज्ञ उच्यते । अथ वा प्रज्ञप्तिमात्रमस्यैवासाधारणं रूपमिति प्राज्ञः, इतरयोर्विशिष्टमपि विज्ञानमस्ति । सोऽयं प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥स्वप्नादिज्ञानरूप चेतनाके प्रति द्वारस्वरूप होनेके कारण यह चेतोमुख है । अथवा स्वप्नादिकी प्राप्तिके लिये ज्ञानस्वरूप चित्त ही इसका द्वार यानी मुख है, इसलिये यह चेतोमुख है । भूत-भविष्यत्का तथा सम्पूर्ण विषयोंका ज्ञाता यही है, इसलिये यह प्राज्ञ है । सुषुप्त होनेपर भी इसे भूतपूर्वगतिसे 'प्राज्ञ' कहा जाता है । अथवा केवल प्रज्ञप्ति (ज्ञान) मात्र इसीका असाधारणरूप है, इसलिये यह प्राज्ञ है, क्योंकि दूसरोंको (विश्व और तैजसको) तो विशिष्ट विज्ञान भी होता है । वह यह प्राज्ञ ही तीसरा पाद है ॥ ५ ॥

३-४

१८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


प्राज्ञका सर्वकारणत्व

एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञः एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥६॥

यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह अन्तर्यामी है और समस्त जीवोंकी उत्पत्ति तथा लयका स्थान होनेके कारण यह सबका कारण भी है ॥ ६ ॥

एष हि स्वरूपावस्थः सर्वेश्वरः साधिदैविकस्य भेदजातस्य सर्वस्येशिता नैतस्माज्जात्यन्तरभूतोऽन्येषामिव । “प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः” (छा० उ० ६।८।२) इति श्रुतेः। अयमेव हि सर्वस्य सर्वभेदावस्थो ज्ञातेत्येष सर्वज्ञः । एषोऽन्तर्याम्यन्तरनुप्रविश्य सर्वेषां भूतानां नियन्ताप्येष एव । अत एव यथोक्तं सभेदं जगत्प्रसूयत इत्येष योनिः सर्वस्य । यत एवं प्रभवश्चाप्ययश्च प्रभवाप्ययौ हि भूतानामेष एव ॥ ६ ॥अपने स्वरूपमें स्थित यह (प्राज्ञ) ही सर्वेश्वर है, अर्थात् अधिदैवके सहित सम्पूर्ण भेदसमूहका ईश्वर—ईशान (शासन) करनेवाला है। “हे सोम्य ! यह मन (जीव) प्राण (प्राणसंज्ञक ब्रह्म) रूप बन्धनवाला है” इस श्रुतिसे अन्य मतावलम्बियोंके सिद्धान्तानुसार [सर्वज्ञ परमेश्वर] इस प्राज्ञसे कोई विजातीय पदार्थ नहीं है। सम्पूर्ण भेदमें स्थित हुआ यही सबका ज्ञाता है; इसलिये यह सर्वज्ञ है। [अतएव] यह अन्तर्यामी है अर्थात् समस्त प्राणियोंके भीतर अनुप्रविष्ट होकर उनका नियमन करनेवाला भी यही है। इसीसे पूर्वोक्त भेदके सहित सारा जगत् उत्पन्न होता है; इसलिये यही सबका कारण है। क्योंकि ऐसा है, इसलिये यही समस्त प्राणियोंका उत्पत्ति और लयस्थान भी है ॥६॥

शां० भा० ] आगम-प्रकरण १९

एक ही आत्माके तीन भेद अत्रैते श्लोका भवन्ति— इसी अर्थमें ये श्लोक हैं—

अत्रैतस्मिन्यथोक्तेऽर्थ एते श्लोका भवन्ति ।यहाँ इस पूर्वोक्त अर्थमें ये श्लोक हैं—

बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः ।
घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः ॥ १ ॥

विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्तःप्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ (प्रज्ञानघन) है। इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकारसे कहा जाता है ॥१॥

बहिष्प्रज्ञ इति । पर्यायेण त्रिस्थानत्वात्सोऽहमिति स्मृत्या प्रतिसन्धानाच्च स्थानत्रयव्यतिरिक्तत्वमेकत्वं शुद्धत्वमसङ्गत्वं च सिद्धमित्यभिप्रायः। महामत्स्यादिदृष्टान्तश्रुतेः ॥ १ ॥बहिष्प्रज्ञ इत्यादि । इस श्लोकका तात्पर्य यह है कि क्रमशः तीन स्थानोंवाला होनेसे और 'मैं वही हूँ' इस प्रकारकी स्मृतिद्वारा अनुसन्धान किया जानेके कारण आत्माका तीनों स्थानोंसे पृथक्त्व, एकत्व, शुद्धत्व और असंगत्व सिद्ध होता है, जैसा कि महामत्स्यादि दृष्टान्तका वर्णन करनेवाली श्रुति * बतलाती है ॥१॥

* जिस प्रकार किसी नदीमें रहनेवाला कोई बलवान् मत्स्य उसके प्रवाहसे विचलित न होकर उसके दोनों तटोंपर आता-जाता रहता है; किन्तु उन तटोंसे पृथक् होनेके कारण उनके गुण-दोषोंसे युक्त नहीं होता तथा जिस प्रकार कोई बड़ा पक्षी आकाशमें स्वच्छन्दगतिसे उड़ता रहता है उसी प्रकार स्वप्न और जाग्रत् दोनों स्थानोंमें सञ्चार करनेवाला आत्मा एक, असंग और शुद्ध है—ऐसा मानना उचित ही है। (देखिये बृ० उ० ४।३।१८, १९)

२०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

विश्वादिके विभिन्न स्थान

जागरितावस्थायामेव विश्वादीनां त्रयाणामनुभवप्रदर्शनार्थोऽयं श्लोकः-जाग्रत् अवस्थामें ही विश्व आदि तीनोंका अनुभव दिखलानेके लिये यह श्लोक कहा जाता है—

दक्षिणाक्षिमुखे विश्वो मनस्यन्तस्तु तैजसः ।
आकाशे च हृदि प्राज्ञस्त्रिधा देहे व्यवस्थितः ॥ २ ॥

दक्षिणनेत्ररूप द्वारमें विश्व रहता है, तैजस मनके भीतर रहता है, प्राज्ञ हृदयाकाशमें उपलब्ध होता है । इस प्रकार यह [ एक ही आत्मा ] शरीरमें तीन प्रकारसे स्थित है ॥ २ ॥

दक्षिणमक्ष्य्येव मुखं तस्मिन् प्राधान्येन द्रष्टा स्थूलानां विश्वोऽनुभूयते । “इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः” ( बृ० उ० ४।२।२ ) इति श्रुतेः। इन्धो दीप्तिगुणो वैश्वानरः । आदित्यान्तर्गतो वैराज आत्मा चक्षुषि च द्रष्टैकः ।दक्षिण नेत्र ही मुख (उपलब्धिका स्थान) है; उसीमें प्रधानतासे स्थूल पदार्थोंके साक्षी विश्वका अनुभव होता है । “यह जो दक्षिण नेत्रमें स्थित पुरुष है 'इन्ध'<sup></sup> नामसे प्रसिद्ध है” इस श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है। दीप्तिगुणविशिष्ट वैश्वानरको 'इन्ध' कहते हैं । आदित्यान्तर्गत वैराजसंज्ञक आत्मा और नेत्रोंमें स्थित साक्षी—ये दोनों एक ही हैं ।
नन्वन्यो हिरण्यगर्भः क्षेत्रज्ञो दक्षिणेऽक्षण्यक्षणोर्नियन्ता द्रष्टा चान्यो देहस्वामी ।शंका—हिरण्यगर्भ अन्य है तथा दक्षिण नेत्रमें स्थित नेत्रेन्द्रियका नियन्ता और साक्षी देहका स्वामी क्षेत्रज्ञ अन्य है । [ उन दोनोंकी एकता कैसे हो सकती है ? ]

१. जो जागरित अवस्थामें स्थूल पदार्थोंका भोक्ता होनेके कारण इद्ध-दीप्त होता है ।

मां० का० ]आगम-प्रकरण२१
न, स्वतः भेदानभ्युपगमात् । <br> "एको देवः सर्वभूतेषु गूढः" <br> ( श्वे० उ० ६ । ११) इति <br> श्रुतेः । "क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि <br> सर्वक्षेत्रेषु भारत" (गीता १३। <br> २) "अविभक्तं च भूतेषु विभक्त- <br> मिव च स्थितम्" (गीता १३। <br> १६) इति स्मृतेः। सर्वेषु करणे- <br> ष्वविशेषेऽपि दक्षिणाक्ष्युप- <br> लब्धिपाटवदर्शनात्तत्र विशेषेण <br> निर्देशो विश्वस्य ।**समाधान—**नहीं [ ऐसी बात नहीं है], क्योंकि उनका स्वाभाविक भेद नहीं माना गया, क्योंकि "सम्पूर्ण भूतोंमें एक ही देव छिपा हुआ है" इस श्रुतिसे तथा "हे भारत ! समस्त क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ मुझे ही जान" "[ वह वस्तुतः ] विभक्त न होकर भी विभक्तके समान स्थित है" इत्यादि स्मृतियोंसे भी [ यही बात सिद्ध होती है ]। सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें समान-रूपसे स्थित होनेपर भी दक्षिण नेत्रमें उसकी उपलब्धिकी स्पष्टता देखनेसे वहीं विश्वका विशेषरूपसे निर्देश किया जाता है ।
दक्षिणाक्षिगतो रूपं दृष्ट्वा नि- <br> मीलिताक्षस्तदेव स्मरन्मनस्यन्तः <br> स्वप्न इव तदेव वासनारूपाभि- <br> व्यक्तं पश्यति । यथात्र तथा <br> स्वप्ने । अतो मनस्यन्तस्तु तैजसो- <br> ऽपि विश्व एव ।दक्षिणनेत्रस्थित जीवात्मा रूप-को देखकर फिर नेत्र मूँद मनमें उसीका स्मरण करता हुआ वासना-रूपसे अभिव्यक्त उसी रूपका स्वप्नमें उपलब्धकी तरह दर्शन करता है । जिस प्रकार इस अवस्थामें होता है, ठीक वैसा ही स्वप्नमें होता है । [इसलिये यह जाग्रत्में स्वप्न ही है] अतः मनके भीतर स्थित तैजस भी विश्व ही है ।
आकाशे च हृदि स्मरणाख्य- <br> व्यापारोपरमे प्राज्ञ एकीभूतोतथा स्मरणरूप व्यापारके निवृत्त हो जानेपर हृदयाकाशमें स्थित प्राज्ञ मनोव्यापारका अभाव, हो जानेके
३२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ०का०
घनप्रज्ञ एव भवति; मनोव्यापाराभावात् । दर्शनस्मरणे एव हि मनःस्पन्दिते; तदभावे हृद्येवाविशेषेण प्राणात्मनावस्थानम् । "प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्ते" (छा० उ० ४।३।३) इति श्रुतेः। तैजसो हिरण्यगर्भो मनःस्थत्वात् । "लिङ्गं मनः" (बृ० उ० ४।४।६) । "मनोमयोऽयं पुरुषः" (बृ० उ० ५।६।१) इत्यादिश्रुतिभ्यः ।कारण एकीभूत और घनप्रज्ञ ही हो जाता है। दर्शन और स्मरण ही मनका स्फुरण हैं, उनका अभाव हो जानेपर जो जीवका हृदयके भीतर ही निर्विशेष प्राणरूपसे स्थित होना है [वही जाग्रत्में सुषुप्ति है]। "प्राण ही इन सबको अपनेमें लीन कर लेता है" इस श्रुतिसे यहाँ प्रमाणित होता है। मनःस्थित होनेके कारण तैजस ही हिरण्यगर्भ है।* "[सत्रह अवयववाला] लिङ्गरूप मन" "यह पुरुष¹ मनोमय है" इत्यादि श्रुतियोंसे भी [तैजस और हिरण्यगर्भकी एकता सिद्ध होती है]।
ननु व्याकृतः प्राणः सुषुप्ते । तदात्मकानि करणानि भवन्ति । कथमव्याकृतता ?शंका— सुषुप्तिमें भी प्राण तो व्याकृत (विशेषभावापन्न) ही होता है † तथा ['प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्ते' इस श्रुतिके अनुसार] इन्द्रियाँ भी प्राणरूप ही हो जाती हैं। फिर उसकी अव्याकृतता कैसे कही गयी?

* क्योंकि तैजसकी उपाधि व्यष्टि मन है और हिरण्यगर्भकी समष्टि मन तथा समष्टि-व्यष्टिका परस्पर अभेद है।
१-यहाँ हिरण्यगर्भको ही 'पुरुष' कहा गया है।
† क्योंकि सोये हुए पुरुषके पास बैठे हुए लोगोंको वह ऐसा ही दिखायी देता है।

शां० भा० ] आगम-प्रकरण२३

| (सुषुप्तौ प्राणानामव्याकृतत्वम्) <br><br> नैष दोषः, अव्याकृतस्य देशकालविशेषाभावात्। यद्यपि प्राणाभिमाने सति व्याकृततैव प्राणस्य तथापि पिण्डपरिच्छिन्नविशेषाभिमाननिरोधः प्राणे भवतीत्यव्याकृत एव प्राणः सुषुप्ते परिच्छिन्नाभिमानवताम्। <br><br> यथा प्राणलये परिच्छिन्नाभिमानिनां प्राणोऽव्याकृतस्तथा प्राणाभिमानिनोऽप्यविशेषापत्तावव्याकृतता समाना प्रसवबीजात्मकत्वं च तदध्यक्षश्चैकोऽव्याकृतावस्थः। परिच्छिन्नाभिमानिनामध्यक्षाणां च तेनैकत्वमिति पूर्वोक्तं विशेषणमेकीभूतः प्रज्ञानघन इत्याद्युपपन्नम्। तस्मिन्नुक्तहेतुत्वाच्च। | समाधान— यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि अव्याकृत पदार्थमें देश-कालरूप विशेष भावका अभाव होता है। यद्यपि [ जैसा कि स्वप्नावस्थामें होता है ] प्राणका अभिमान रहते हुए तो उसकी व्याकृतता है ही तथापि सुषुप्तावस्थामें प्राणमें पिण्डपरिच्छिन्न विशेषका अभिमान [ अर्थात् यह मेरे शरीरसे परिच्छिन्न प्राण है—ऐसा अभिमान ] नहीं रहता; अतः परिच्छिन्नदेहाभिमानियोंके लिये भी उस समय वह अव्याकृत ही है। <br><br> जिस प्रकार प्राणका लय [ अर्थात् मृत्यु ] होनेपर परिच्छिन्न देहाभिमानियोंका प्राण अव्याकृतरूपमें रहता है उसी प्रकार प्राणाभिमानियोंको भी प्राणकी अविशेषता प्राप्त होनेपर उसकी अव्याकृतता और प्रसव-बीजरूपता वैसी ही है। अतः [ अव्याकृत और सुषुप्ति ] इन दोनों अवस्थाओंका साक्षी भी अव्याकृत अवस्थामें रहनेवाला एक ही [ चेतन आत्मा ] है। परिच्छिन्न देहोंके अभिमानी और उनके साक्षियोंकी उसके साथ एकता है; अतः [ प्राज्ञके लिये ] 'एकीभूतः प्रज्ञानघनः' आदि पूर्वोक्त विशेषण उचित ही हैं; विशेषतः इसलिये भी, क्योंकि इसमें [ अधिदैव अव्याकृत और अध्यात्म प्राज्ञकी एकतारूप ] उपर्युक्त हेतु भी विद्यमान है। |

२४: माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


प्राणशब्दस्य बीजब्रह्मपरत्वम्
कथं प्राणशब्दत्वमव्याकृतस्य।**शंका—**किन्तु अव्याकृत 'प्राण' शब्दवाच्य कैसे हुआ ?
"प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः" (छा० उ० ६।८।२) इति श्रुतेः।समाधान—"हे सोम्य ! मन प्राणके ही अधीन है" इस श्रुतिके अनुसार।
ननु तत्र "सदेव सोम्य" (छा० उ० ६।२।१) इति प्रकृतं सद्ब्रह्म प्राणशब्दवाच्यम्।**शंका—**किन्तु वहाँ तो "सदेव सोम्य" इस श्रुतिके अनुसार प्रसङ्ग-प्राप्त सद्ब्रह्म ही 'प्राण' शब्दका वाच्य है।
नैष दोषः, बीजात्मकत्वाभ्युपगमात्सतः। यद्यपि सद्ब्रह्म प्राणशब्दवाच्यं तत्र तथापि जीवप्रसवबीजात्मकत्वमपरित्यज्यैव प्राणशब्दत्वं सतः सच्छब्दवाच्यता च। यदि हि निर्बीजरूपं विवक्षितं ब्रह्माभविष्यत् "नेति नेति" (बृ० उ० ४।४।२२, ४।५।१५) "यतो वाचो निवर्तन्ते" (तै० उ० २।९) "अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितात्" (के० उ० १।३) इत्यवक्ष्यत् "न सत्तन्नासदुच्यते" (गीता १३।१२) इति स्मृतेः।**समाधान—**वहाँ यह दोष नहीं हो सकता, क्योंकि [उस प्रसङ्गमें] सद्ब्रह्मकी बीजात्मकता स्वीकार की है। यद्यपि वहाँ 'प्राण' शब्दका वाच्य सद्ब्रह्म है तथापि जीवोंकी उत्पत्तिकी बीजात्मकताका त्याग न करते हुए ही उस सद्ब्रह्ममें प्राणशब्दत्व और 'सत्' शब्दका वाच्यत्व माना गया है। यदि वहाँ 'सत्' शब्दसे निर्बीजब्रह्म कहना इष्ट हो तो उसे "यह नहीं है, यह नहीं है" "जहाँसे वाणी लौट आती है" "वह विदितसे अन्य है और अविदितसे भी ऊपर है" इत्यादि प्रकारसे कहा जायगा, जैसा कि "वह न सत् कहा जाता है और न असत्" इस स्मृतिसे भी सिद्ध होता है।

शां० भा० ] आगम-प्रकरण २५


निर्बीजतयैव चेत्सति लीनानां सुषुप्तप्रलययोः पुनरुत्थानानुपपत्तिः स्यात् । मुक्तानां च पुनरुत्पत्तिप्रसङ्गः, बीजाभावाविशेषात् । ज्ञानदाह्यबीजाभावे च ज्ञानानर्थक्यप्रसङ्गः। तस्मात्सबीजत्वाभ्युपगमेनैव सतः प्राणत्वव्यपदेशः सर्वश्रुतिषु च कारणत्वव्यपदेशः ।

अत एव "अक्षरात्परतः परः" (मु० उ० २।१।२) । "सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः" (मु० उ० २।१।२) । "यतो वाचो निवर्तन्ते" (तै० उ० २।९) । "नेति नेति" (बृ० उ० ४।४।२२) इत्यादिना बीजवत्त्वापनयनेन व्यपदेशः । तामबीजावस्थां तस्यैव प्राज्ञशब्द- | और यदि वहाँ ['सत्' शब्दसे] ब्रह्मका निर्बीजरूपसे ही निर्देश करना इष्ट हो तो सुषुप्ति और प्रलय (मरण) अवस्थामें सत्‌में लीन हुए पुरुषोंका फिर उठना [अर्थात् उत्पन्न होना] सम्भव नहीं होगा तथा मुक्त पुरुषोंके पुनः उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा,* क्योंकि [मुक्त और सत्‌में लीन हुए पुरुषोंमें] बीजत्वका अभाव समान ही है। तथा ज्ञानसे दग्ध होनेवाले बीजका अभाव होनेपर ज्ञानकी व्यर्थताका भी प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा। अतः सद्ब्रह्मकी सबीजता स्वीकार करके ही उसका प्राणरूपसे समस्त श्रुतियोंमें कारणरूपसे उल्लेख किया गया है।

इसीलिये "वह पर अक्षरसे भी पर है" "वह बाह्य (कार्य) और अभ्यन्तर (कारण) के सहित [उनका अधिष्ठान होनेके कारण] अजन्मा है" "जहाँसे वाणी लौट आती है" "यह नहीं है यह नहीं है" इत्यादि श्रुतियोंद्वारा शुद्ध ब्रह्मका निर्देश बीजवत्त्वका निरास करके ही किया गया है। उस 'प्राज्ञ' शब्दवाच्य जीवकी, देहादिसम्बन्ध तथा जाग्रत् आदि अवस्थासे रहित,


* क्योंकि निर्बीज ब्रह्ममें लीन हुए मुक्तोंका पुनर्जन्म माना नहीं गया और यदि उस अवस्थामें भी पुनर्जन्म स्वीकार किया जाय तो मुक्तिसे भी पुनर्जन्म होना मानना पड़ेगा।

२६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
वाच्यस्य तुरीयत्वेन देहादिसंबन्ध-जाग्रदादिरहितां पारमार्थिकीं पृथग्वक्ष्यति । बीजावस्थापि न किंचिदवेदिषमित्युत्थितस्य प्रत्ययदर्शनाद्देहेऽनुभूयत एवेति त्रिधा देहे व्यवस्थित इत्युच्यते ॥२॥उस पारमार्थिकी अबीजावस्थाका तुरीयरूपसे अलग वर्णन करेंगे। बीजावस्था भी जाग्रत् होनेपर 'मुझे कुछ भी पता नहीं रहा' ऐसी प्रतीति देखनेसे शरीरमें अनुभव होती ही है। इसीसे 'वह देहमें तीन प्रकारसे स्थित है' ऐसा कहा गया है ॥२॥

विश्वादिका त्रिविध भोग

विश्वो हि स्थूलभुङ्नित्यं तैजसः प्रविविक्तभुक् ।
आनन्दभुक्तथा प्राज्ञस्त्रिधा भोगं निबोधत ॥ ३ ॥

विश्व सर्वदा स्थूल पदार्थोंको ही भोगनेवाला है, तैजस सूक्ष्म पदार्थोंका भोक्ता है तथा प्राज्ञ आनन्दको भोगनेवाला है; इस प्रकार इनका तीन तरहका भोग जानो ॥३॥

स्थूलं तर्पयते विश्वं प्रविविक्तं तु तैजसम् ।
आनन्दश्च तथा प्राज्ञं त्रिधा तृप्तिं निबोधत ॥ ४ ॥

स्थूल पदार्थ विश्वको तृप्त करता है, सूक्ष्म तैजसकी तृप्ति करनेवाला है तथा आनन्द प्राज्ञकी; इस प्रकार इनकी तृप्ति भी तीन तरहकी समझो ॥४॥

उक्तार्थौ श्लोकौ ॥ ३-४ ॥इन दोनों श्लोकोंका अर्थ कहा जा चुका है ॥ ३-४ ॥

त्रिविध भोक्ता और भोग्यके ज्ञानका फल

त्रिषु धामसु यद्भोज्यं भोक्ता यश्च प्रकीर्तितः ।
वेदैतदुभयं यस्तु स भुञ्जानो न लिप्यते ॥ ५ ॥

शां० भा० ] आगम-प्रकरण २७

[ जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन ] तीनों स्थानोंमें जो भोज्य और भोक्ता बतलाये गये हैं—इन दोनोंको जो जानता है, वह [भोगोंको] भोगते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता ॥ ५ ॥

| त्रिषु धामसु जाग्रदादिषु स्थूलप्रविविक्तानन्दाख्यं भोज्यमेकं त्रिधाभूतम् । यश्च विश्वतैजसप्राज्ञाख्यो भोक्तैकः सोऽहमित्येकत्वेन प्रतिसन्धानाद्रष्टृत्वाविशेषाच्च प्रकीर्तितः; यो वेद तदुभयं भोज्यभोक्तृतयानेकधा भिन्नं स भुञ्जानो न लिप्यते; भोज्यस्य सर्वस्यैकस्य भोक्तुर्भोज्यत्वात् । न ह्यस्य यो विषयः स तेन हीयते वर्धते वा; न ह्यग्निः स्वविषयं दग्ध्वा काष्ठादि तद्वत् ॥ ५ ॥ | जाग्रत् आदि तीन स्थानोंमें जो स्थूल, सूक्ष्म और आनन्दसंज्ञक तीन भेदोंमें बँटा हुआ एक ही भोज्य है और 'वह मैं हूँ' इस प्रकार एकरूपसे अनुसंधान किये जाने तथा द्रष्टृत्वमें कोई विशेषता न होनेके कारण विश्व, तैजस और प्राज्ञनामक जो एक ही भोक्ता बतलाया गया है—इस प्रकार भोज्य और भोक्त्तारूपसे अनेक प्रकार विभिन्न हुए इन दोनों (भोक्ता और भोज्य) को जो जानता है वह भोगता हुआ भी लिप्त नहीं होता, क्योंकि समस्त भोज्य एक ही भोक्ताका भोग है। जैसे अग्नि अपने विषय काष्ठादिको जलाकर [न्यूनाधिक नहीं होता अपने स्वरूपमें सदा समान रहता है] उसी प्रकार जिसका जो विषय होता है वह उस विषयकें कारण ह्रास अथवा वृद्धिको प्राप्त नहीं होता ॥५॥ |

प्राण ही सबकी सृष्टि करता है—

प्रभवः सर्वभावानां सतामिति विनिश्चयः । सर्वं जनयति प्राणश्चेतोंऽशून्पुरुषः पृथक् ॥ ६ ॥

२८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

यह सुनिश्चित बात है कि जो पदार्थ विद्यमान होते हैं उन्हीं सबकी उत्पत्ति हुआ करती है । बीजात्मक प्राण ही सबकी उत्पत्ति करता है और चेतनात्मक पुरुष चैतन्यके आभासभूत जीवोंको अलग-अलग प्रकट करता है ॥६॥

सतां विद्यमानानां स्वेनाविद्याकृतनामरूपमायास्वरूपेण सर्वभावानां विश्वतैजसप्राज्ञभेदानां प्रभव उत्पत्तिः । वक्ष्यति च—<br>“वन्ध्यापुत्रो न तत्त्वेन मायया वापि जायते” इति । यदि ह्यसतामेव जन्म स्याद्ब्रह्मणोऽव्यवहार्यस्य ग्रहणद्वाराभावादसत्त्वप्रसङ्गः । दृष्टं च रज्जुसर्पादीनामविद्याकृतमायाबीजोत्पन्नानां रज्ज्वाद्यात्मना सत्त्वम् । न हि निरास्पदा रज्जुसर्पमृगतृष्णिकादयः क्वचिदुपलभ्यन्ते केनचित् । यथा रज्ज्वां प्राक्सर्पोत्पत्ते रज्ज्वात्मना सर्पः सन्नेवासीत्, एवं सर्वभावानामुत्पत्तेः प्राक्प्राणबीजात्मनैव सत्त्वम् । इत्यतः श्रुतिरपि वक्ति—<br>“ब्रह्मैवेदम” (मु० उ० २।२।११)<br>“आत्मैवेदमग्र आसीत्” (बृ० उ० १।४।१) इति ।सत् अर्थात् अपने अविद्याकृत नामरूपात्मक मायिक स्वरूपसे विद्यमान विश्व, तैजस और प्राज्ञ भेदवाले सम्पूर्ण पदार्थोंकी उत्पत्ति हुआ करती है। आगे (प्रक० ३ का० २८ में) यह कहेंगे भी कि “वन्ध्यापुत्र न तो वस्तुतः और न मायासे ही उत्पन्न होता है।” यदि असत् (स्वरूपसे अविद्यमान) पदार्थोंकी ही उत्पत्ति हुआ करती तो अव्यवहार्य ब्रह्मको ग्रहण करनेका कोई मार्ग न रहनेसे उसकी असत्ताका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता । अविद्याकृत मायामय बीजसे उत्पन्न हुए रज्जुसर्पादिकी भी रज्जु आदिरूपसे सत्ता देखी गयी है । किसी भी पुरुषने निराश्रय रज्जुसर्प अथवा मृगतृष्णा आदि कभी नहीं देखे । जिस प्रकार सर्पकी उत्पत्तिसे पूर्व वह रज्जुमें रज्जुरूपसे सत् ही था उसी प्रकार समस्त पदार्थ अपनी उत्पत्तिसे पूर्व प्राणात्मक बीजरूपसे सत् ही थे। इसीसे श्रुति भी कहती है—“यह ब्रह्म ही है” “पहले यह आत्मा ही था” इत्यादि ।

शां० भा० ] आगम-प्रकरण २९


सर्वं जनयति प्राणश्चेतों-शूनंशव इव रवेश्चिदात्मकस्य पुरुषस्य चेतोरूपा जलार्कसमाः प्राज्ञतैजसविश्वभेदेन देवतिर्यगादिदेहभेदेषु विभाव्यमानाश्चेतोंशवो ये तान्पुरुषः पृथग्विषयभावविलक्षणानग्निविस्फुलिङ्गवत् सलक्षणाञ्जलार्कवच्च जीवलक्षणांस्त्वितरान् सर्वभावान् प्राणो बीजात्मा जनयति “यथोर्णनाभिः” (मु० उ० १।१ ।७) “यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गाः” (बृ० उ० २।१।२०) इत्यादिश्रुतेः ॥६॥सब पदार्थोंको [बीजरूप] प्राण ही उत्पन्न करता है। तथा जो जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यके समान देव, मनुष्य और तिर्यगादि विभिन्न शरीरोंमें प्राज्ञ, तैजस एवं विश्वरूपसे भासमान चिदात्मक पुरुषके किरणरूप चिदाभास हैं, उन विषयभावसे विलक्षण तथा अग्निकी चिनगारी और जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यके समान सजातीय जीवोंको पुरुष अलग ही उत्पन्न करता है। उनके सिवाय अन्य समस्त पदार्थोंको बीजात्मक प्राण उत्पन्न करता है, जैसा कि “जिस प्रकार मकड़ी [जाला बनाती है]” तथा “जैसे अग्निसे छोटी-छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है ॥६॥

सृष्टिके विषयमें भिन्न-भिन्न विकल्प

विभूतिं प्रसवं त्वन्ये मन्यन्ते सृष्टिचिन्तकाः ।
स्वप्नमायासरूपेति सृष्टिरन्यैर्विकल्पिता ॥ ७ ॥

सृष्टिके विषयमें विचार करनेवाले दूसरे लोग भगवान्‌की विभूतिको ही जगत्की उत्पत्ति मानते हैं तथा दूसरे लोगोंद्वारा यह सृष्टि स्वप्न और मायाके समान मानी गयी है ॥७॥

३० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


विभूतिर्विस्तार ईश्वरस्य सृष्टि-यह सृष्टि ईश्वरकी विभूति यानी
रिति सृष्टिचिन्तका मन्यन्ते नउसका विस्तार है—ऐसा सृष्टिके
तु परमार्थचिन्तकानां सृष्टावादरविषयमें विचार करनेवाले लोग मानते
इत्यर्थः। "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूपहैं। तात्पर्य यह है कि परमार्थ-चिन्तन करनेवालोंका सृष्टिके विषयमें आदर नहीं होता; जैसा कि "इन्द्र (परमात्मा) मायासे अनेक रूप-
ईयते" (बृ० उ० २।५।१९)वाला हो जाता है" इस श्रुतिसे सिद्ध
इति श्रुतेः। न हि मायाविनंहोता है, [केवल बहिर्मुख पुरुष ही उसकी उत्पत्तिके विषयमें तरह-
सूत्रमाकाशे निक्षिप्य तेनतरहकी कल्पना किया करते हैं]।
सायुधमारुह्य चक्षुर्गोचरतामतीत्यआकाशमें सूत फेंककर उसपर शस्त्रोंसहित आरूढ़ हो नेत्रेन्द्रियकी
युद्धेन खण्डशश्छिन्नं पतितंपहुँचसे परे जाकर युद्धके द्वारा अनेकों टुकड़ोंमें विभक्त होकर गिरे
पुनरुत्थितं च पश्यतां तत्कृत-हुए मायावीको पुनः उठता देखने-वाले पुरुषोंको उसकी रची हुई माया
मायादिसत्त्वतत्त्वचिन्तायामादरोआदिके स्वरूपके चिन्तनमें आदर
भवति। तथैवायं मायाविनः सूत्र-नहीं होता। उस मायावीके सूत्र-विस्तारके समान ही ये सुषुप्ति एवं
प्रसारणसमः सुषुप्तस्वप्नादिविका-स्वप्नादिके विकास हैं; तथा उस (सूत्र) पर चढ़े हुए मायावीके
रस्तदारूढमायाविसमश्च तत्स्थःसमान ही उन (सुषुप्ति आदि अवस्थाओं) में स्थित प्राज्ञ एवं
प्राज्ञतैजसादिः। सूत्रतदारूढाभ्या-तैजस आदि हैं। किन्तु वास्तविक
मन्यः परमार्थमायावी स एवमायावी तो सूत्र और उसपर चढ़े हुए मायावीसे भिन्न है और वही
भूमिष्ठो मायाच्छन्नोऽदृश्यमान एवजैसे मायासे आच्छादित रहनेके कारण दिखलायी न देता हुआ ही
स्थितो यथा तथा तुरीयाख्यंपृथिवीपर स्थित रहता है वैसा ही

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ३१


परमार्थतत्त्वम् । अतस्तच्चिन्तायामेवादरो मुमुक्षूणामार्याणां न निष्प्रयोजनायां सृष्टावादर इत्यतः सृष्टिचिन्तकानामेवैते विकल्पा इत्याह—स्वप्नमायासरूपेति । स्वप्नरूपा मायासरूपा चेति ॥७॥तुरीयसंज्ञक परमार्थ तत्त्व भी है । अतः मोक्षकामी आर्य पुरुषोंका उसीके चिन्तनमें आदर होता है । प्रयोजनहीन सृष्टिमें उनका आदर नहीं होता । अतः ये सब विकल्प सृष्टिका चिन्तन करनेवालोंके ही हैं; इसीसे कहा है—'स्वप्नमायासरूपा इति' अर्थात् [ दूसरे इसे ] स्वप्नरूपा और मायारूपा [ बतलाते हैं ] ॥७॥

इच्छामात्रं प्रभोः सृष्टिरिति सृष्टौ विनिश्चिताः ।
कालात्प्रसूतिं भूतानां मन्यन्ते कालचिन्तकाः ॥ ८ ॥

कोई-कोई सृष्टिके विषयमें ऐसा निश्चय रखते हैं कि 'प्रभुकी इच्छा ही सृष्टि है।' तथा कालके विषयमें विचार करनेवाले [ ज्योतिषी लोग ] कालसे ही जीवोंकी उत्पत्ति मानते हैं ॥ ८ ॥

इच्छामात्रं प्रभोः सत्यसंकल्पत्वात्सृष्टिर्घटादिः संकल्पनामात्रं न संकल्पनातिरिक्तम् । कालादेव सृष्टिरिति केचित् ॥८॥भगवान् सत्यसंकल्प हैं; अतः घटादिकी सृष्टि प्रभुका संकल्पमात्र है—उनके संकल्पसे भिन्न नहीं है । तथा कोई-कोई 'सृष्टि कालहीसे हुई है' ऐसा कहते हैं ॥ ८ ॥

भोगार्थं सृष्टिरित्यन्ये क्रीडार्थमिति चापरे ।
देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा ॥ ९ ॥

कुछ लोग 'सृष्टि भोगके लिये है' ऐसा मानते हैं और कुछ 'क्रीडाके लिये है' ऐसा समझते हैं । [ परन्तु वास्तवमें तो ] यह भगवान्‌का स्वभाव ही है क्योंकि पूर्णकामको इच्छा ही क्या हो सकती है ? ॥ ९ ॥