मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
मन भी दिखेगा। तो पता चल जाता है कि यह तो मन को प्रिय लगा। बस, मन की ताकत ख़त्म। मन तो पंगु है। वो कोई क्रिया करने में सक्षम नहीं है। मन आत्मा को कहता है, आम खाना है। मन आम नहीं खा सकता है, वो आत्मा को क्रियाशील रखता है। पर साहिब कह रहे हैं—
‘मन जाता है जान दे, गहके राख शरीर। उतरा पड़ा कमान से, क्या कर सकता तीर ॥’ तीर की ताकत कमान के साथ में है। कमान से उतरा हुआ है तो तीर का घाव नहीं होगा। मन की ताकत तो आत्मा के साथ में है। मन बेचारा हो जायेगा, यदि आत्मा का सहयोग नहीं मिलेगा तो। अंधकार में रहकर हकूमत कर रहा है। मन की हरेक क्रिया समझ आने लगती है। काँटों के रास्ते पर चलते हैं तो एक पल भी असावधान नहीं होंगे। तो गुरु नाम से जो चेतन हो जाता है, सावधान हो जाता है, जानता है कि असावधान हुए तो मन चुभेगा। ‘उसको काल क्या करे, जो आठ पहर हुशियार।’ वो सुरति में रहने लगता है। ‘क्षण सुमिरे क्षण बिसरे, यह तो सुमिरण नाहिं। आठ पहर वीणा रहे, सुमिरण सोई कहाई ॥’ आपके सामने काला साँप है तो हमेशा सावधान रहेंगे। तो मन से भी ऐसे ही सावधान रहना है। सच बताऊँ, तब जान जाता है कि मेरा बैरी मन के अलावा कोई नहीं है। मन से एक पल भी असावधान नहीं रहेंगे। असावधानी ही मन चाहता है। तब आप आत्मनिष्ठ रहेंगे। पर संतरी की तरह नहीं।
..... तो वो हमेशा प्रज्ञा अवस्था में रहने लगता है। बाकियों को जानने लग जाता है कि उलझे हैं। ‘जगत की नज़र में भक्त गया। भक्त की नज़र में जगत गया ॥’ नाम के बिना करोड़ों प्रयास से भी सुधर नहीं सकोगे। तो परम-पुरुष ने कहा कि यह गुप्त वस्तु लो, मन का जोर नहीं चलेगा। इसलिए नहीं चलता है।
साहिब कहते हैं कि नाम से अंतःकरण चेतन हो जाता है। फिर अनात्म चीज़ों में शामिल नहीं होती आत्मा। जितना आवश्यक है, उतना ही करता है। मन को फालतू हरकत भी नहीं करने देता। यह है मन पर
सवारी। 'मन पर जो असवार है, ऐसा बिरला कोय।' मन को चारों स्वरूपों पर नियंत्रण होगा, उस पर अधिकार होगा। सोचें कि कितना महान हो गया। बड़े-2 तपस्वी भी मन की वृत्तियों पर नियंत्रण नहीं कर पाए। तभी तो मीरा कह रही है—'सखी री मैं तो नाम रतन धन पायो।' आत्मा का ठिकाना बताता हूँ। मन समझने लगता है। मन से तो भी होशियार रहना। अंतिम बिंदु तक इसकी चेष्टा रहती है कि मारूँ। जब भी लगे कि इसके बिना नहीं रह सकता हूँ तो यह सम्मोहन है। किसी पदार्थ के बिना नहीं जी सकते तो सम्मोहन है। मन के पास वेग है। गुरु ताकृत देता है तो मन पर नियंत्रण होने लग जाता है। 24 घण्टे मन के हमले हो रहे हैं। 'चश्म दिल से देख तू, क्या-2 तमाशे हो रहे.....।' प्रहार आत्मा पर हो रहा है। यह प्रहार किये जा रहा है। बड़े-2 धुरंधरों ने दीर्ध साधनाएँ की, काया को गला डाला, घर छोड़ सन्यासी हो गये, पर पार नहीं पाया मन का।
कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा।
गूह छोड़ भये सन्यासी, तऊ ना पावत पारा॥
मन बहुत ही बलशाली है, तीन लोक मन का पिंजड़ा है। 'तीन लोक मैं मनहिं विराजी। तेहि ना चीन्हे पंडित काजी॥।' तीन लोक में मन विराजमान है। पर नाम के बाद मन शक्तिहीन हो जाता है। 'मन के चलाए तन चले....।' जिसका भी मन के चलाए तन चल रहा है, सर्वत्र नाश हो जायेगा। दीर्ध साधना के बाद भी मन नियंत्रण में नहीं आता। शृंगी ऋषि ने अपने शरीर को लकड़ी बना दिया था, सोचा कि खाऊँ गा नहीं तो रक्त नहीं बनेगा, रक्त नहीं होगा तो वीर्य नहीं बनेगा, वीर्य नहीं बनेगा तो विषय हो पायेगा। बाद में वेश्या से शादी कर बैठा था।
मन की संज्ञा ही परमात्मा है। सहस्र नाम मन के हैं। पर उस परम सत्ता को साहिब कहा, सतपुरुष कहा। वेदों में वर्णित है। बड़ी बारीकी में बैठा है मन। पर नाम के बाद मन की हरकतें समझ आने लगती हैं। क्रोध आकर नाड़ियों को चलायमान करता है तो पता चल
जाता है। मन के वेग में विरोधी शक्तियाँ दिखने लगती हैं। किसी ने पत्थर मारा, आपने देख लिया तो पीछे हो जाते हैं। मेरा मन कभी नहीं कहता कि शादी करें। जानता है कि करेगा नहीं। कभी नहीं कहता कि माँस खाएँ। जानता है कि खाएगा नहीं। मन इसी सिस्टम से उलझा रहा है। मन का मास्टर नहीं है कोई। ‘मन पर जो असवार है, ऐसा बिरला कोई।’
मुम्बई में एक शांति सम्वाय सम्मेलन हुआ था। उसमें दलाईलामा जी, शंकराचार्य जी, ईसाइयों के धर्मगुरु, जैनियों के धर्मगुरु आदि सबको बुलाया गया था। संयोग से मुझे भी बुलाया, क्योंकि मुझे महात्मा गाँधी शांति पुरस्कार मिला था। मैं चला गया। आपसी मतभेद, हिंसा, पाप आदि दुनिया में बढ़ जाने से बुद्धिजीवियों ने विचार किया कि धर्मगुरुओं को बुलाकर इसका कारण ढूँढ़ा जाए और यह समझा जाए कि कैसे दुनिया के लोग अच्छे बनें।
मुझे यह देखकर अफसोस हुआ कि कोई कहने लगा कि यह फलाना मंत्र करके लाभ होगा, कोई कहने लगा कि सुबह उठकर नहाएँ और शरीर की अच्छी साफ सफाई करें, कोई यज्ञ की युक्ति बताने लगा। पर किसी के पास भी मार्कूल फार्मूला नहीं था। वो तो छोड़ो, किसी को भी यह पता ही नहीं था कि ऐसा क्यों हो रहा है। मेरी भी स्पीच हुई। मैंने बताया कि कैसे मन का परिवार, काम, क्रोध आदि मनुष्य को अज्ञान में रखकर पाप की तरफ ले जा रहा है। नाम रूपी औषधि पाने के बाद जब ज्ञान आ जायेगा तो प्राणी किसी को नहीं मारेगा। यही एकमात्र फार्मूला है। बाद में जो मुख्य आयोजक था, उसने कहा कि मधुपरमहंस जी की बात सुनकर ऐसा लगा कि मानो कबीर धरती पर उतर आया है।
सुबह 4 बजे उठने से शांति होगी क्या। माँसाहार हिंसा को बढ़ावा देता है। शेर में कैसे हिंसा आई। यह माँस से है। मैंने इन चीजों पर बोला। तो मैंने सुझाव दिये।
ध्यान में मन की बाधा
ध्यान में मन की बाधा
जब भी आप ध्यान में बैठते हैं तो एक चीज़ ध्यान देना कि मन कहाँ है आपका। मन को ठूँढना। ‘मनवाँ तो दश दिशि फिरे, यह तो सुमिरन नाही।’ इच्छा भी क्रिया है, याद भी क्रिया है, निश्चय भी क्रिया है, क्रिया भी क्रिया है। इच्छा करेंगे तो इन्हीं पदार्थों में ध्यान लगेगा। वैसे गुरु कृपा से सब होना है। इच्छा का निरोध करोगे तो मन निश्चय की तरफ लगता है। फैंसला भी क्रिया है। इसे रोकोगे तो याद दिलाएगा। यह भी क्रिया है। आटोमेटिक नहीं है। याद दिलाएगा कि फसल काटनी है। दराट ठूँढेंगे। यह क्रिया है। इसलिए ध्यान में बैठो तो चार तरह से मन क्रिया करेगा। कोई बात याद आए तो चिंतन नहीं करना। स्वाँसा को समझना। स्वाँस भी क्रिया है। छोड़ने के लिए, लेने के लिए भी आप शामिल हैं। यह भी एक क्रिया है। सभी पर कण्ट्रोल कर लेंगे तो साँस अड़चन है। जब तक यह नाभि दल में घूमती रहेगी तो एकाग्र नहीं हो पाओगे। इसको पलटकर ‘शून्य में देय समय।’ यह चंचल है। शून्य समाधि का अर्थ है, जब मन संकल्प नहीं कर रहा। चारों तरफ की क्रियाओं को समाप्त कर शून्य में समाने को कहा। इसकी ताकत गुरु देगा। बिना ताकत के मन पर नियंत्रण नहीं कर पाओगे। अपनी बुद्धि, विचार से मन पर नियंत्रण नहीं हो सकता है। गुरु नाम देता है तो ‘सहजे सहज पाइये’ वाली बात हो जाती है। बहुत आराम से चीज़ें मिल जाती हैं। मन पर सवारी हो जायेगी। ‘मन ही निरंजन सबै नचावे।’ पर आगे कह रहे हैं—‘नाम होय तो माथ नमावे।।’
मन घुमाता रहता है, चंचल है। उदास हो जाते हैं, तो भी मन का हमला है। मन ड्यूटी का पाबंद है। यह तीव्र साधक है। इसने 70 युग एक बार तपस्या की है, 70 युग दूसरी बार और 64 युग तीसरी बार। यह
नहीं सोता है। आपको भटकाता रहता है। 24 घण्टे भ्रमित कर रहा है। आपको वजूद और स्वरूप की प्राप्ति नहीं होने दे रहा है। यह बड़ा ताकतवर है। सब पर मन माया का नशा है। चाहे कितना भी तप करे कोई। बड़े-2 साधकों ने तपस्याएँ भी की, पर नशा नहीं उतरा। मन का पिंजड़ा बड़ा तगड़ा है। अगर शरीर के अंदर आत्मा की कोई पहचान है तो ‘ध्यान।’ साहिब ने सुरति के अंग पर बहुत कहा। आत्मा इस पिंजड़े में कैसे रहती है ! जैसे पंछी असहाय-सा होकर पिंजड़े में बैठा रहता है। शिकारी उसका बहुत बड़ा शत्रु है। पंछी की आजादी छीन ली उसने। ऐसे ही आत्म-देव असहाय हो गया है। साहिब ने बड़े जोरदार शब्दों में कहा—‘तेरा बैरी कोई नहीं, तेरा बैरी मन।’ मन जालिम है। यह मन काल है; सावधान रहना इससे। पंछी अपनी कोशिश से निकल नहीं सकता है। जब तक पिंजड़े का द्वार खोल ना दिया जाए। ऐसे ही ‘बिन सतगुरु बाँचे नहीं, कोई कोटिन करे उपाय ॥’ आप मन को लाँघ कर नहीं जा सकते हैं। कोई न जा सका अपनी ताकत से। साहिब कह रहे हैं—‘ज्ञानहीन जाने ना भाई। जीव के संग मन काल रहाई ॥’ अब छुटकारा कैसे होगा! मन की आज्ञानुसार हम कर्म कर रहे हैं। इसी कारण जन्म-मरण में आ रहे हैं। कर्म ही कारण है जन्म-मरण का। कर्म का प्रेरक है, मन। याद रखें, अच्छे-बुरे दोनों कर्म मन के द्वारा होते हैं। ‘यह मन चीहने बिरला योगी।’
आइये, मैं थोड़ा अपने अतीत की तरफ चलता हूँ। नाम प्राप्ति के बाद मैं भजन करने लगा। स्मरण करते करते जब मैं एकाग्र हुआ तो मुझे कुछ डिस्टर्ब करने लगा। अपने अंदर जब मुझे डिस्टर्ब लगने लगे तो वो क्या कि मैं भजन करना चाहता हूँ, कोई मुझे नहीं करने दे रहा है, तो मुझे लगा कि कोई मुझे डिस्टर्ब कर रहा है। मैं और कन्संट्रेट हुआ। मैंने कहा, देखें, मुझे कौन डिस्टर्ब कर रहा है। पर मुझे डिस्टर्ब करने वाला नजर नहीं आ रहा है। मुझमें एक आकांक्षा उठी कि मैं डिस्टर्ब करने वाले को जरूर देखूँगा कि मुझे कौन व्यवधान डाल रहा है। मैं एकाग्रचित होकर काम करने लगा। धीरे धीरे वो डिस्टर्ब मुझे अब इस तरह करने लगा जैसे मेरे स्वरूप से हटकर कोई चीज कर रही है। तो मैं और सतर्क हुआ। मैंने कहा कि मैंने इस डिस्टर्ब को अच्छी तरह देखना है कि मुझे कौन
व्यवधान कर रहा है। और जब मुझे बहाया जाने लगा तो मैं एक ही वस्तु को पकड़े रहा—नाम को। तो मैं बहा नहीं। मैं अब एकाग्र होने लगा। धीरे धीरे मुझे अनुभव होने लगा। अब डिस्टर्ब जिन जिन चीजों से हो रहा है, साफ नजर आ रहा है। लेकिन अभी भी मुझे दिखाई नहीं दे रहा है। मैं स्मरण में ही रहा। मुझे जो व्यवधान आ रहा है, वो नजर आ रहा है। अभी भी व्यवधान कौन कर रहा है, यह नजर नहीं आ रहा है। मैं और कन्संट्रेट हुआ। मैं सब तरफ से सब काम छोड़कर भजन करने लगा, क्योंकि मेरे लिए एक ही चीज थी कि मुझे रुकावट कौन दे रहा है। मुझे देखना यही था। अब मैंने देखा, मुझे खाना-पीना भी डिस्टर्ब दे रहा था। मैंने कहा, छोड़ो खाने को। मैंने पक्का संकल्प किया कि जब मैं आत्मरूप हूँ तो खाना क्यों खाऊँ। मैं एकाग्र हुआ। अब मैं तो भोजन खाना नहीं चाह रहा हूँ, कोई मुझे प्रेरणा दे रहा है, अन्दर से कि खाना खाओ। मैं एकदम चेतन हुआ, मैं खाना नहीं खाना चाहता हूँ, कौन मुझे प्रेरणा दे रहा है। मैं पूरी तरह से कन्संट्रेट हुआ.....खाना नहीं खाना है। अब मुझे यूँ लगने लगा जैसे कोई कह रहा है—खाना खाओ। आपसे भी यूँ ही कहा जा रहा है। पर आप लैंगवेज पढ़ नहीं पा रहे हैं। मैंने कहा—नहीं, मैं खाना नहीं खाऊँगा, क्योंकि मैं शरीर नहीं हूँ। यह पूर्ण सच है कि मैं आत्मा हूँ, शरीर नहीं हूँ। खाना नहीं खाऊँगा। अब मैंने कहा कि आत्मा सोती जागती भी नहीं है। मैं जागरूक हो गया—सोऊँगा नहीं। मुझे कोई प्रेरणा दे रहा है, सो जाओ, वरना कमजोर हो जाओगे। मैंने कहा, यह तो मेरी सोच नहीं है कि सो जाओ वरना कमजोर हो जाओगे। यह कौन सोचवा रहा है। मैं और एकाग्र होने लगा। मैंने सोना भी छोड़ दिया, खाना भी छोड़ दिया और कर क्या रहा हूँ—स्मरण। अब तक एक भी श्वास मैं नहीं छोड़ना चाहता हूँ और मैं सुष्मना में आ गया। अब छः महीने जब मैं लगातार इस अवस्था में रहा तो मुझे आदेश देने वाला नजर आने लगा। मैंने कहा—तुम थे। इतने पीछे रहते हो....इतनी गहराई में। अब आमने सामने आदेश देने वाला मुझे नजर आ रहा था कि किस तरह बोलता है, किस बिंदू पर बैठा है। अब उसे कोई भी हरकत नहीं
करने दी। संसार की समग्र चीजों से मैं समग्र रूप से अलग हो गया। उसी बिंदू में मुझे परमानन्द की अनुभूति हुआ अर्थात उस आनन्द के पीछे ही मन बैठा हुआ था।
तब मैंने देखा, मैं शरीर नहीं हूँ। इन अवस्थाओं में अब एक वो आनन्द आ रहा था, आपने सुना होगा कि आत्मा आनन्द से परिपूर्ण है। यथार्थ में मैं आनन्द में था। अब मैंने कहा, शरीर की अनुभूति से ही पूरे दुख हैं, इसलिए जो भी भाव मन, शरीर हूँ, की तरफ लाता था, मैं वहीं पकड़ लेता था, यही मन है, अब बस हो चुकी है, अब अधिक धोखा नहीं, इसके बाद और कुछ नहीं।
‘मन को मार गगन चढ़ जाई।’ यह किसके द्वारा। मैंने एक चीज पकड़ी हुई थी, वरना मैं बहुत दूर बह जाता, वो था—नाम, जिसने मुझे इसके संकल्प, इसके भावों में, इसके बहाव में नहीं बहने दिया। उस बिंदू पर मैंने देखा, यही मौत है, यही काल है, इसलिए काल के अन्दर संसार के सभी जीव हैं। तब मैंने सोचा कि संसार के सभी जीव कितने बड़े धोखे में हैं। अब उसकी पूर्णता वहीं स्टाप कर दी। किसी भी आदमी को जब आप पूर्णरूप से जान जायेंगे, वो अपनी कला आपके साथ फिर नहीं करने वाला है, क्योंकि आपने उसे हकीकत में जान लिया है। पर इस बिंदु पर सब आदमी नहीं जा पायेंगे। अब आप सोचें, उसके बाद कैसी अनुभूति होगी। मैं शरीर में नीचे नहीं आता था। इसे विदेह मोक्ष कहते हैं। अर्थात—देह में विदेह दर्शै। अब विदेह पद को प्राप्त हो गया। जो इस चीज को जान जाता है, किसी भी समय मन पर विजय प्राप्त कर लेता है। अब वो अकाल हो गया, क्योंकि अब किसी भी देशकाल, अवस्था में मन से त्रुटि नहीं कर पाता है। समग्र विश्व इस मन के अन्दर है। तो मेरे भाई, यह कार्य बुद्धि से नहीं किया जा सकेगा। अब यह थी, नाम की महिमा।
साखियाँ और सब्द
साखियाँ और सब्द
साखियाँ
मन ही सरूपी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई ।
हे हंसा तू अमर-लोक का, पड़ा काल बस आई ॥
जीवात्मा को सम्बोधित करते हुए साहिब कह रहे हैं कि हे जीवात्मा ! यह मन ही निरंजन है, जो तुम्हें युगों-2 से भ्रमित कर रहा है। तू तो अमर-लोक का जीव है, वहाँ रहने वाला है, लेकिन काल-पुरुष (मन) के वश में तू आ गया है।
मन ही सरूपी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई ।
पाँच पसीच तीन का पिंजड़ा, जामें तोहि राखा भरमाई ॥
साहिब स्पष्ट कह रहे हैं कि मन, जिसे निरंजन भी कहा जाता है, निराकार भी कहा जाता है, तुम्हें युगों-युगों से भटका रहा है। यह शरीर तो पिंजड़ा है, जिसमें निर्मल आत्मा को कैद कर दिया है, उसने।
अलख निरंजन लखे न कोई, जिहि बंधे बंधा सब लेई ।
जेहि झूठे सब बंधु अयाना, झूठी बात साँच कै माना ॥
साहिब कह रहे हैं कि अलख निरंजन, जिसे कोई देख नहीं पाता, ही संसार के समस्त प्राणियों को बाँधे हुए है। अज्ञानी लोग उसकी झूठी माया को सच मानकर उसके बंधन में स्वयं ही बँध गये हैं। इस प्रकार सारा संसार भ्रम में पड़ा हुआ है, दही के स्थान पर पानी का मंथन किये जा रहा है। जिस तरह चकोर अंगार को ही चन्द्रमा मानकर उसे मुँह
में डालता है, उसकी जीभ और चोंच जलती है और फिर वो उसे उगल देता है, पर दूसरे ही क्षण फिर-फिर उसे मुँह में डालता है और अंत में परम दुख को प्राप्त होता है। इसी तरह संसारी मनुष्य निरंजन को ही अंतिम सत्य मान बैठे हैं, उसी की तरफ जा रहे हैं, उसी की भक्ति कर रहे हैं और अंत में परम दुख को प्राप्त हो रहे हैं, क्योंकि वे आवागमन से नहीं छूट पा रहे और निरंतर निरंजन की चौरासी की चक्की में पिस रहे हैं।
पलटू यह मन अधम है, चोरों से बड़ चोर।
गुन तजि ओगुन गहतु है, तातें बड़ा कठोर॥
पलटू साहिब कह रहे हैं कि यह मन बड़ा ही नीच है। यह तो चोरों से भी बड़ा चोर है। यह गुणों को छोड़कर अवगुणों को ही ग्रहण करता है, उन्हें ही पकड़ता है। इसी कारण से यह इतना कठोर हो गया है।
कबीर यह मन मसखरा, कहूँ तो मानै रोस।
जा मारग साहिब मिलै, तहाँ न चालै कोस॥
यह मन तो मसखरा है। अगर इसे डाँट दिया जाए तो नाराज हो जाता है। जिस राह पर परमात्मा की प्राप्ति होनी है, वहाँ तो एक कोस भी चलने को तैयार नहीं है।
कबीर यह मन लालची, समझै नहीं गँवार।
भजन करन को आलसी, खाने को तैयार॥
यह मन बहुत लालची है, समझने से समझता नहीं है। भजन करने को तो यह आलस करता है और खाने के लिए हर समय तैयार रहता है।
यहु बन हरिया देखि करि, फूल्यौ फिरै गँवार।
दादू यह मन गिरगला, काल अहेड़ी लार॥
दादू दयाल जी कह रहे हैं कि संसार रूपी बन को हरा-भरा अर्थात् सुखमय समझकर मूर्ख लोग फूले-फूले फिर रहे हैं, पर उन्हें नहीं
पता है कि मन अर्थात् काल रूपी शिकारी ने ही यहाँ पर सुखों के जाल बिछाकर रखे हैं।
मन के मते न चालिये, मन के मते अनेक।
जो मन पर असवार है, सो साधू कोई एक ॥
मन के कहे अनुसार कोई भी कार्य न करो, क्योंकि इस मन का कोई एक मत नहीं है। कभी यह मन कुछ कहता है, कभी कुछ। इसके अनेक मत हैं। लेकिन हमेशा ही यह मन शरीर के सुखों के अनुसार काम करने को ही कहता है। कभी भी यह मन आत्मा के कल्याण के लिए कोई काम करने को नहीं कहता। जो मन की आज्ञा का पालन न करते हुए मन को अपनी आज्ञानुसार चलाता है, ऐसा कोई बिरला ही साधू होता है।
सुर नर मुनि सबको ठगा, मनहिं लिया औतार।
जो कोई याते बचै, तीन लोक से न्यार ॥
साहिब कह रहे हैं कि इस मन ने सुर, नर, मुनि सबको ठगा है। यही मन संसार में अवतार धारण करके आता है। जो इससे बच जाए, वो इसके तीन लोक से छूटकर न्यारा हो जाता है।
कबीर मन तो एक है, भावै तहाँ लगाय।
भावै गुरु की भक्ति कर, भावै विषय कमाय ॥
साहिब कह रहे हैं कि यह मन तो एक है, एक ही जगह लगेगा। अब तो तेरी, इच्छा पर है। यदि तू चाहे तो इसे विषय विचारों में उलझा दे या फिर इसे गुरु चरणों में लगाकर गुरु की भक्ति कर।
मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीत।
कहैं कबीर गुरु पाइपे, मन ही के परतीत ॥
साहिब कह रहे हैं कि हम मन से हार मान लें तो हम हार जाते हैं और यदि हम मन से जीतने का विश्वास बना लें तो हम जीत भी सकते हैं। इसी तरह सच्चे प्रेम से भरोसा करने पर हम गुरु को भी पा सकते हैं
अर्थात् मन से ही सब कुछ सम्भव है।
मन के बहुतक रंग हैं, छिन-छिन बदले सोय।
एक रंग में जो रहै, ऐसा बिरला कोय ॥
इस मन के अनेक रंग हैं, जो समय-समय पर बदलते रहते हैं अर्थात् कभी तो यह मन अच्छा बन जाता है और कभी बहुत ही बुरा। पर जो हर समय एक ही रंग में रहे अर्थात् हर समय मन को अच्छाई पर ही लगाए रखे, वो कोई बिरला संत ही होता है।
मन पाँचों के वश पड़ा, मन के वश नहिं पाँच।
जित देखूँ तित दौं लगी, जित भागूँ तित आँच ॥
काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से ही मन का शरीर है। लेकिन फिर भी ये मन के वश में नहीं हैं, मन ही इन पाँचों के वश में है। काम मन पर सवार हो जाता है, क्रोध भी मन को ही आता है, अहंकार भी मन पर छाए रहता है। साहिब कहते हैं कि जहाँ देखता हूँ, जहाँ भागता हूँ, वहीं काम, क्रोध आदि की अग्नि जलती दिखाई देती है।
मना मनोरथ छाड़ि दे, तेरा किया न होय।
पानी में घी नीकसै, रुखा खाय न कोय ॥
मन की इच्छाएँ कभी पूरी नहीं होतीं। वो तो बिना पंख आकाश में उड़ना चाहता है। इसलिए आकांक्षाओं को त्याग दो, मन द्वारा की गयी आकांक्षाएँ कभी पूरी नहीं होंगी। मन की इच्छाएँ तो कभी समाप्त ही नहीं होती हैं, इसलिए इन इच्छाओं को पूर्ण नहीं किया जा सकता। यदि जल का मंथन करने से घी निकल सकता तो रूखी रोटी कोई नहीं खाता। यदि मन की सारी इच्छाएँ पूर्ण की जा सकतीं तो संसार में कोई दुखी नहीं होता।
यह मन नीचा मूल है, नीचा कर्म सुहाय।
अमृत छाड़ै मान करि, विषहिं प्रीति करि खाय ॥
यह मन बड़ा ही निकृष्ट है, गन्दा है। गन्दे कार्यों में ही इसे मजा आता है। अमृत समान मीठा फल प्रदान करने वाले आत्म-कल्याण
के कार्यों को तो अभिमान से त्याग देता है और ज़हर समान कड़वा फल प्रदान करने वाले गन्दे और अनात्म कार्यों से ही प्रेम करता है।
महमंता मन मारि ले, घट ही माहीं घेर ।
जबही चालै पीठ दे, आँकुस दै दै फेर ॥
मन को अन्तःकरण में घेर कर दबा लो, मार लो। जब भी यह गलत जगह भागे, गलत इच्छाएँ करे तो गुरु के नाम का अंकुश लगाकर इसे ठीक जगह फेर दो।
सुर नर मुनि सबको ठगै, मनहिं लिया औतार ।
जो कोई याते बचै, तीन लोक से न्यार ॥
इस मन ने मनुष्य, मुनिजन, देवतालोग सबको धोखा दिया है। मन ने ही अवतार धारण किये हैं और रक्षक बनकर सामने आया है। जो कोई इस मन के धोखे को समझकर इससे बचकर सद्गुरु की शरण में आ जाता है, वो तीन-लोक से न्यारा होकर चौथे-लोक (अमर-लोक) में चला जाता है।
बात बनाई जग ठग्यो, मन परमोधा नाहिं ।
कहैं कबीर मन लै गया, लख चौरासी माहिं ॥
पाप-पुण्य की बातों में उलझाकर मन सारे संसार को ठगता रहा है। इसे कोई भी समझ नहीं पाया। साहिब कहते हैं कि मन ने ही संसार के सब जीवों को चौरासी की धारा में डाला हुआ है।
यह काम परम-पुरुष (साहिब) का नहीं है। वो किसी को नहीं ठगता, किसी को कष्ट नहीं देता।
बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन साथ ।
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥
जिस तरह बाजीगर बन्दर को साथ लेकर घर-घर नचाता फिरता है, इसी तरह मन रूपी बाजीगर भी जीवात्मा को बन्दर की तरह जैसा भी नाच चाहे, नचवा लेता है।
काल जीव को ग्रासई, बहुत कह्यो समुझाय ।
कहैं कबीर मैं क्या करूँ, कोई नहीं पतियाय ॥
साहिब कह रहे हैं कि मैंने तो बहुत समझाया कि मन रूपी काल जीव को खा रहा है, पर कोई मेरी बात को मान ही नहीं रहा है, अब मैं क्या करूँ !
कबीर यह मन लालची, समझौं नहीं गँवार ।
भजन करन को आलसी, खाने को तैयार ॥
यह मन बहुत लालची है, समझाने से समझता नहीं है। भजन करने में तो आलस करता है और खाने के लिए हर समय तैयार रहता है।
मन मुरीद संसार है, गुरु मुरीद कोई साथ ।
जो माने गुरु वचन को, ताका मता अगाध ॥
सारा संसार मन का दास है, जो जो मन कहता है, वो-वो ही करता जाता है..... उसी की आज्ञा में रहता है, पर गुरु का दास कोई बिरला साधु ही होता है। जो गुरु की आज्ञा को मानता हुआ चलता है, वो गंभीर विचार वाला है।
मन दाता मन लालची, मन राजा मन रंक ।
जो यह मन गुरु सों मिलै, तो गुरु मिलै निसंक ॥
मन ही दाता बन जाता है, मन ही लालची बन जाता है, मन ही राजा समान हृदय वाला हो जाता है और मन ही कंजूस हृदय का बन जाता है। यदि यह मन गुरु में लग जाए तो निश्चय ही गुरु की प्राप्ति हो जाए।
मन चलता तन भी चलै, ताते मन को घेर ।
तन मन दोऊ बस करै, होय राई सुमेर ॥
मन के चलाने से ही शरीर चलता है, इसलिए मन को घेरकर काबू में कर। जब शरीर और मन दोनों बस में हो जायेंगे तो बहुत ऊँचा
उठ जायेगा ।
मनुवा तो पंछी भया, उड़ि के चला अकास ।
ऊपर ही ते गिर पड़ा, फिरि माया के पास ॥
यह मन तो पंछी की तरह है, जो कभी अच्छा बनकर आकाश में ऊँचा चला जाता है, पर दूसरे ही क्षण फिर नीचे आकर माया में लिपट जाता है.....गन्दा हो जाता है ।
जेती लहर समुद्र की, तेती मन की दौर ।
सहजै हीरा नीपजै, जो मन आवै ठौर ॥
जितनी समुद्र में लहरे हैं, उतनी ही मन में इच्छाएँ हैं । बहुत ही चंचल है यह मन । यदि इच्छाएँ समाप्त होकर यह मन शान्त हो जाए तो आत्म-ज्ञान रूपी हीरा सहज ही प्राप्त हो जाए ।
पहिले यह मन काग था, करता जीवन घात ।
अब तो मन हँसा भया, मोती चुनि चुनि खात ॥
गुरु का नाम मिलने से पहले तो यह मन कौवे की तरह था.....अन्य जीवों को मारता फिरता था, पर अब यह कौवे से हँस बन गया है.....ज्ञान रूपी मोती चुन-चुन कर खाता है ।
बिना सीस का मिरग है, चहुँ दिशि चरने जाय ।
बाँधि लगाओ गुरु ज्ञानसों, राखो तत्व समाय ॥
यह मन बिना सिर का पशु है, जो चारों ओर विषय-विकारों की घास चरता रहता है । इसे गुरु ज्ञान की रस्सी से बाँध कर नाम रूपी तत्व में लीन कर दो ।
धरती फाटै मेघ मिलै, कपड़ा फाटै डौर ।
तन फाटै को औषधी, मन फाटै नहिं ठौर ॥
धरती फट जाए तो जल बरसने से मिल जाती है, कपड़ा फट जाए तो धागे से मिला लिया जाता है, तन फट जाए तो औषध से ठीक हो जाता है, पर यदि मन फट जाए तब कोई रास्ता नहीं है.....फिर नहीं
कबीर मन मरकट भया, कहूँ न नेक ठहराय ।
सत्य नाम बाँधे बिना, जित भावे तित जाय ॥
साहिब कहते हैं कि यह मन तो बन्दर की तरह उछल-कूद करने वाला है । यह कभी अच्छा बनकर नहीं रह सकता । सच्चे नाम से बाँधे बिना तो यह जहाँ दिल करे, चला जायेगा ।
सबद
सोई काल धरे औतारा
राम कृष्ण औतारी आहीं । भोगे कर्म जाड़ तन माहीं ॥
दस औतार निरंजन धरिया । सोऊ काल बस भौं में परिया ॥
सोई निरंजन सोई निरंकारा । सोई काल धरै औतारा ॥
कर्म भाव तिन देही पाई । करै भोग भौं में भरमाई ॥
सारा जग बेदन भरमैया । औतारी साँचे गोहरैया ॥
दीनदयाल पुरुष है न्यारा । निराकार काल के पारा ॥
निरंकार तह काल न जावै । वहँ की गम जोती नहिं पावै ॥
वो स्वामी है अगम अगाही । जह संतन ने सुरति समाई ॥
सुरति समाड़ पुरुष को देखा । मिला पुरुष गम अगम अलेखा ॥
उनका लेखा बेद न पावै । नेति नेति चारों गोहरावै ॥
पंचम बेद सुषम नहिं जाना । षष्ठम प्रसंग बेद कहै नाना ॥
चारि बेद पुनि गुप्त रहाई । तामें कागद लगै न स्याही ॥
तुम पुनि पुरुष भेद नहिं जाना । दसो बेद कहै नहिं पहिचाना ॥
दसो बेद से भेद न्यारा । पुरुष भेद नहिं पावै पारा ॥
निरंकार जोती नहिं जाना । जहँ पहुँचे कोड़ संत सुजाना ॥
तुलसी सैल सुरति से कीन्हा । पाया अगम गम्य का चीन्हा ॥
पत्थर पानी दूर बहावा। तब घर अगम राह को पावा ॥
बेद कितेब पुरान उठाये। तब लिखि सुरति अगम को धाये ॥
नेम अचार चार नहीं माना। बोलै सब घट माहिं दिखाना ॥
बोल अबोल दोऊ के पारा। तहँवा तुलसी सुरति सवारा ॥
छर अच्छर निःअच्छर पारा। देखा तुलसी निरखि निहारा ॥
अगम अगाध पुरुष दरबारा। तुलसी मिलै सुरति की लारा ॥
तन में देखि ब्रह्मण्ड पसारा। सो हिये हेर सुरति की लारा ॥
हिये में हेर फोड़ ब्रह्मण्ड। हिये की लार सार नौखण्डा ॥
अंतर हेर हिये के माई। अंड फोड़ ब्रह्मण्ड दिखाई ॥
अंतर खोज कीन्ह हिये माई। अंतर हिये माहि दरसाई ॥
तन में तोड़ फोड़ हिये कीन्हा। अंतर सार हिये में चीन्हा ॥
दस औतार काल के भाई
दस औतार काल के भाई। तामें नरसिंह है दस माहीं ॥
हरनाकुस का उदर बिदारा। ये जानौ सब काल पसारा ॥
वे दयाल एक सब माहीं। वो कहौ केहि का मारन जाई ॥
हरनाकुस कौ मारि बिदारा। पुनि पहलाद राज बैठारा ॥
राज भोग जिन कीन्हा भाई। सो तेहि पुत्र बिलोचन राई ॥
वे लोचन केवलि भयौ सोई। जा को बावन बाँधे जोई ॥
जो मुक्ति वा की होड़ जाते। बली छुड़ावन केहि विधि आते ॥
आवागमन मुक्ति नहीं भाई। बली छुड़ावन कस कस आई ॥
भागवत में देखौ यह सारखी। बली काज आये अस भारखी ॥
जो पहलाद मुक्ति को जाता। आवागमन केहि कारन आता ॥
सहाय करी नरसिंह बतावा। पिता मारि राज जिन पावा ॥
राज करै सो नरकै जाई। कस कस ताकी मुक्ति बताई ॥
जो नरसिंध जिवत ले जाता। तौ ता की हम मानै बाता ॥
राज थापि तेहि भोग करावा। भोग भोग भौ खानै आवा ॥
ताकी मुक्ति साखि बतलावौ। कहि झूठी झूठी समझावौ ॥
सुवा पढ़ावत गनिका तारी। सहजै होत जक्त सब मुक्ति ॥
सुवा सुवा घर घर में होते। तौ मुक्ति का सोच न करते ॥
धूू तप की तुम साखि बताई। गोपीचंद भरथरी भाई ॥
पढ़ पढ़ सुवा मुक्ति जो होते। तौ पुनि राज काहे को तजते ॥
धूू को तप की बिधि बताया। राज छाड़ि तन खाक मिलाया ॥
गनिका मुक्ति सहज बतलावौ। धूू जी राज गये किमि गावौ ॥
कभि सुवा पढ़ते सहज बतावा। कभि कभि कष्ट तपस्या गावा ॥
ये तौ बिधि मिली नहीं भाई। ये सब झूठ झूठ सी गाई ॥
काल के फंद की खबर नाहीं
अंध रे अंध संसार सब अंध है, काल के फंद की खबर नाहीं।
करत उन्माद विष स्वाद संसार का, मगन मस्तान है तासु माहीं ॥
नैन मद अंध अरु बैन मुख छार है, चलन गुमान में छाँह देखै ॥
कहैं कबीर नर नारि सब एक से, काल चपेट हैं नाहिं पेखै ॥
सारा संसार अंधा है। किसी को भी काल के जाल का पता नहीं है। सभी संसार के विषय-विकारों रूपी विष का सेवन कर पागल बने रहते हैं, जिसके फलस्वरूप उनकी विवेक की आँखें फूट चुकी हैं, मुख से कड़वी बातें ही निकलती रहती हैं। वो घमण्ड के साथ चलते हैं और समझते हैं कि वे सही दिशा में जा रहे हैं। साहिब कहते हैं कि स्त्री-पुरुष सब काल के जाल में फँसे हुए हैं और उसके जाल को समझ नहीं पा रहे हैं।
निरंजन ख्याल पसारा हो
सुनो कोई साधु प्रेम लगाय के, निरंजन ख्याल पसारा हो ॥
धरती आकाश रचा अमृत मण्डल, तीन लोक विस्तारा हो।
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर प्रगटे, इनके सिर दीना भारा हो ॥
ठोर ठोर तीरथ ब्रत थापत, ठगवत को संसारा हो।
लख चौरासी जीव भुलाना, कोई न पावे पारा हो ॥
बार बार भस्म कर डारे, फिर फिर देड़ अवतारा हो।
सतगुरु मिले तो शब्द लखावे, भवसागर करे पारा हो ॥
सतगुरु के शब्द चीन्हे बिना रे, बहो जाय संसारा हो।
माया मोहि सकल जग बँधा, कोई न पावे पारा हो ॥
भागत जीव ठोर नहीं पावत, अटकत काल के द्वारा हो।
देख करामात सब कोई भूले, सिद्ध साध बेवहारा हो ॥
अमर लोक में पुरुष विदेही, रोकत उनका द्वारा हो।
सेवा कीन पुरुष वर दीना, धर्मराय बटपारा हो ॥
विषया रूप आप बन बैठे, जीवन करत आहारा हो।
ब्रह्मा विष्णु महादेव कहे यह, नहीं पावे कोऊ पारा हो ॥
इन तीनों से निरंजन पारा, निरंजन से पुरुष निन्यारा हो।
कठिन काल से बचा चाहो, गहो शब्द टकसारा हो ॥
कहे कबीर अमर लो होवे, जो निज होय हमारा हो।
कठिन काल सों लेहु उबारी, बहुरि न आवे संसारा हो ॥
कह रहे हैं कि निरंजन ने धरती, आकाश, स्वर्ग आदि तीन लोक में बनाकर अपना जाल फैलाया हुआ है। उस निरंजन और उसकी शक्ति से ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर उत्पन्न हुए, जिनके सिर पर उसने सारा भार दे दिया है। जगह-जगह पर उसने तीर्थ स्थान, ब्रत आदि दुनिया को ठगने के लिए बना रखे हैं। चौरासी लाख योनियों के सभी जीव इसकी दुनिया में भूले हुए हैं और कोई भी इसका पार नहीं पा रहा है। यह बार-बार जीवों को भस्म करके फिर-फिर प्रगट करता है। यदि सद्गुरु मिल जाएँ तो वो सार-शब्द देकर भवसागर से पार कर देते हैं। बिना सद्गुरु के सार-शब्द के जीव संसार-सागर में बह जाता है। माया-मोह आदि में सारा संसार बँधा हुआ है और कोई भी इससे पार नहीं पा
रहा है। जीव जगह-जगह बचने के लिए भाग रहे हैं, भटक रहे हैं, पर काल के द्वार पर ही माथा पटक रहे हैं, वहीं अटक रहे हैं। कोई सिद्धि शक्तियों को देख भ्रमित हो रहा है, कोई किसी साधु की करामात देखकर भ्रमित हो रहा है। ये सब निरंजन के ही जाल हैं, जो जीव को अमर-लोक के सच्चे साहिब के द्वार पर नहीं जाने देते हैं। परम-पुरुष की सेवा करके इस निरंजन ने उनसे तीन लोक में राज्य करने का वर माँग लिया है। यह स्वयं विषयों का आनन्द लेता है और फिर उनका कष्ट जीवों को देकर उन्हें खा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु और महादेव भी उसकी इस चाल को नहीं समझते हैं। इन त्रिदेव से निरंजन न्यारा है और निरंजन से भी परम-पुरुष न्यारा है। यदि इस कठिन काल निरंजन से बचना चाहते हो तो सद्गुरु के सार-शब्द को पकड़े रहो। क्योंकि फिर वो हमारा हंस हो जाता है और दुबारा काल के इस संसार में नहीं आता।
साधो यह मन है बड़ा जालिम
साधो यह मन है बड़ा जालिम।
जा को मन से काम परो है, तिसही है है मालूम॥
मन कारन जो उनको छाया, तेहि छाया में अटकै।
निरगुन सरगुन मन की बाजी, खरे सयाने अटकै॥
मन ही चौदह लोक बनाया, पाँच तत्त्व गुन कीन्है।
तीन लोक जीवन बस कीन्है, परै न काहू चीन्है।
जो कोउ कहै हम मन को मारा, जाके रूप न रेखा।
छिन छिन में कितनौ रंग ल्यावै, जे सपनेहु नहिं देखा॥
रसातल इकइस ब्रह्मण्डा, सब पर अदल चलावै।
षट रस में भोगी मन राजा, सो कैसे के पावै॥
सब के ऊपर नाम निअच्छर, तहैं लै मन को राखै।
तब मन की गति जान परै यह, सत कबीर मुख भाखै॥
साहिब कह रहे हैं कि विचार करो ! यह मन बड़ा ही जालिम है । जिसका इस मन से पाला पड़ता है, वो ही इसे समझ सकता है । मन के कारण ही संसार का भ्रम दिखाई दे रहा है । इसी भ्रम में सब अटक के हैं । सगुण-निर्गुण दोनों मन का खेल है, जिसमें बड़े-बड़े चतुर भी अटक हुए हैं । ये 14 लोक भी मन ने ही पाँच तत्व और तीन गुण से बनाए हैं । 14 लोक में जीवों को फँसा दिया है, जिसे कोई समझ नहीं पा रहा है । जो कोई कहे कि उसने मन को मार लिया है, तो समझो कि झूठ बोल रहा है, क्योंकि मन की कोई रूप-रेखा नहीं है । यह तो एक पल में इतने रंग दिखाता है कि जो सपने भी नहीं देखे होते । यह 21 ब्रह्माणों में सब पर शासन चलाता है । जितने भी रस हैं, उन सब का भोग करने वाला मन राजा ही है, फिर उसे बस में कैसे किया जा सकता है ! सबके परे एक निःअच्छर नाम है, जब उसमें मन को लगाया जाता है, तब ही यह मन समझ में आता है । साहिब कह रहे हैं कि यह बात मैं बिलकुल सत्य कह रहा हूँ ।
यह मन जालिम जोर रे
बरजे नहीं माने, यह मन जालिम जोर रे ॥
जो कोई मन को पकड़ा चाहे, भागत साँकर तोड़ रे ॥
सुर नर मुनि सब पछि पछि हारे, हाथ न आवे चोर रे ॥
जो हँसा सतगुरु के होई, राखे ममता छोट रे ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, बचो गुरु की ओट रे ॥
हे हँसा ! यह मन बड़ा जालिम और ताकतवर है, रोके नहीं रुकता । कोई उसे पकड़ने की कोशिश करे, वश में करने का प्रयास करे तो यह जंजीर तोड़ कर भाग जाता है । सुर, नर, मुनि सब इसे वश में करते-करते हार गये, पर यह चोर किसी के वश में नहीं आया । जो हँस सद्गुरु की शरण ग्रहण करता है, वो संसार की ममता को त्यागकर इसे अपने वश कर लेता है । इसलिए साहिब कह रहे हैं मेरी बात सुनकर उस पर विचार करो और सद्गुरु की शरण में आकर बच लो ।
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