भारतकोश
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संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

• धर्मपक्षीद्वारा जैमिनिके प्रश्नोंका उत्तर • ११


पक्षियोंने कहा— ब्रह्मन्! आपका प्रश्न यदि हमारी बुद्धिके बाहर न होगा तो हम अवश्य उसका समाधान करेंगे। आप निःशङ्क होकर सुनें। विप्रवर! चारों वेद, धर्मशास्त्र, सम्पूर्ण वेदाङ्ग तथा और भी जो वेदोंके समान माननीय इतिहास-पुराणादि हैं, उन सबमें हमारी बुद्धिका प्रवेश है; तथापि हम कोई प्रतिज्ञा नहीं कर सकते। आपको महाभारतमें जो-जो सन्दिग्ध बात जान पड़े, उसे निर्भीक होकर पूछिये।

जैमिनि बोले— पक्षियो! आपलोगोंका अन्तःकरण निर्मल है। महाभारतमें मेरे लिये जो संदिग्ध बातें हैं, उन्हें बताता हूँ; सुनिये और सुनकर उनकी व्याख्या कीजिये। सर्वव्यापी भगवान् जनार्दन सम्पूर्ण जगत्‌के आधार, समस्त कारणोंके भी कारण और निर्गुण होते हुए भी मनुष्य-शरीरको कैसे प्राप्त हुए? द्रुपदकुमारी कृष्णा अकेली ही पाँच पाण्डवोंकी महारानी क्योंकर हुई? इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है। इसके सिवा द्रौपदीके पाँच महारथी पुत्र, जिनका अभी विवाहस्तक नहीं हुआ था, समस्त पाण्डव जिनके रक्षक थे तथा जो स्वयं भी बड़े बलवान् थे, अनाथकी भाँति कैसे मारे गये? महाभारतके विषयमें यह मेरा सन्देह है। आपलोग इसका निवारण करें।

पक्षियोंने कहा— जो सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी, सर्वव्यापक, सबकी उत्पत्तिके कारण, अन्तर्यामी, प्रमाणोंके अधिपत्य, सनातन, अविनाशी, चतुर्व्यूह-स्वरूप, त्रिगुणमय, निर्गुण, सबसे बड़े, अत्यन्त गौरवशाली, सर्वश्रेष्ठ तथा अमृतस्वरूप हैं, उन भगवान् विष्णुको हम सबसे पहले नमस्कार करते हैं। जिनसे बढ़कर सूक्ष्म तथा जिनसे अधिक बड़ा भी कोई नहीं है, जिनके द्वारा यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त है, जो इस जगत्‌के आदिकारण और अजन्मा हैं, जो उत्पत्ति, लय, प्रत्यक्ष और परोक्ष—सबसे विलक्षण हैं, इस सम्पूर्ण जगत्‌को जिनकी रचना बतलाते हैं तथा अन्तमें जिनके भीतर इसका संहार होता है, उन परमेश्वरको हमारा नमस्कार है। तत्पश्चात् जो अपने चारों मुखोंसे ऋक्-साम आदि वेदोंका उच्चारण करते हुए तीनों लोकोंको पवित्र करते हैं, उन आदिदेव ब्रह्माजीको भी हम एकाग्रचित्तसे नमस्कार करते हैं। इसी प्रकार जिनके एका ही बाणसे पराजित होकर असुरगण कभी ऋषियोंके यज्ञोंका विनाश नहीं करते, उन भगवान् शङ्करको भी मस्तक झुकाते हैं। इसके बाद हम अद्भुत कर्म करनेवाले व्यासजीके सम्पूर्ण मतोंकी व्याख्या करेंगे, जिन्होंने महाभारतके उद्देश्यसे धर्म आदिका रहस्य प्रकट किया है। तत्त्वदर्शी मुनियोंने जलको 'नारा' कहा है। वह नारा ही पूर्वकालमें भगवान्‌का निवासस्थान रहा, इसलिये वे नारायण कहे गये हैं।* ब्रह्मन्! ये सर्वव्यापी भगवान् नारायणदेव सबको व्याप्त


* आपो नारा इति प्रोक्ता मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः । अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ (१। ३३)

६२ • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण •


करके स्थित हैं। वे सगुण भी हैं और निर्गुण भी। उनका प्रथम स्वरूप ऐसा है कि जिसका शब्दोंद्वारा प्रतिपादन नहीं किया जा सकता। विद्वान् पुरुष उसे शुक्ल (शुद्धस्वरूप) देखते हैं। भगवान्‌का वह दिव्य विग्रह ज्योतिःपुञ्जसे परिपूर्ण है। वही योगी पुरुषोंकी परानिष्ठा (अन्तिम लक्ष्य) है। वह दिव्यस्वरूप दूर भी है और समीप भी। उसे सब गुणोंसे अतीत जानना चाहिये। उस दिव्यस्वरूपका ही नाम वासुदेव है। अहंता और ममताका त्याग करनेसे ही उसका साक्षात्कार होता है। रूप और वर्ण आदि काल्पनिक भाव उसमें नहीं हैं। वह सदा परम शुद्ध एवं उत्तम अधिष्ठानस्वरूप है। भगवान्‌का दूसरा स्वरूप शेषके नामसे प्रसिद्ध है, जो पाताललोकमें रहकर पृथ्वीको अपने मस्तकपर धारण करता है। इसे तिर्यक्स्वरूपको प्राप्त हुई तामसी मूर्ति कहते हैं। श्रीहरिकी तीसरी मूर्ति समस्त प्रजाके पालन-पोषणमें तत्पर रहती है। वही इस पृथ्वीपर धर्मकी निश्चित व्यवस्था करती है। धर्मका नाश करनेवाले उद्दण्ड असुरोंको मारती तथा धर्मकी रक्षामें संलग्न रहनेवाले देवताओं और साधु-संतोंकी रक्षा करती है। जैमिनिजी! संसारमें जब-जब धर्मका ह्रास और अधर्मका उत्थान होता है, तब-तब वह अपनेको यहाँ प्रकट करती है।

पूर्वकालमें वही वाराहरूप धारण करके अपने थूथुनसे जलको हटाकर इस पृथ्वीको एक ही दाँतसे जलके ऊपर ऐसे उठा लायीं मानो वह कोई कमलका फूल हो। उन्हीं भगवान्‌ने नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुका वध किया और विप्रचित्ति आदि अन्य दानवोंको मार गिराया। इसी प्रकार भगवान्‌के वामन आदि और भी बहुत-से अवतार हैं, जिनकी गणना करनेमें हम असमर्थ हैं। इस समय भगवान्‌ने मथुरामें श्रीकृष्णरूपमें अवतार लिया है। इस तरह भगवान्‌की वह सात्त्विकी मूर्ति ही भिन्न-भिन्न अवतार धारण करती है। यह आपके पहले प्रश्नका उत्तर बतलाया गया कि भगवान् पूर्णकाम होते हुए भी धर्म आदिकी रक्षाके लिये सदा स्वेच्छासे ही अवतीर्ण होते हैं।

ब्रह्मन्! पूर्वकालमें त्वष्टा प्रजापतिके पुत्र विश्वरूप इन्द्रके हाथसे मारे गये थे, इसलिये ब्रह्महत्याने इन्द्रको धर दबाया। इससे उनके तेजकी बड़ी क्षति हुई। इस अन्यायके कारण इन्द्रका तेज धर्मराजके शरीरमें प्रवेश कर गया, अतः इन्द्र निस्तेज हो गये। तदनन्तर अपने पुत्रके मारे जानेका समाचार सुनकर त्वष्टा प्रजापतिको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अपने मस्तकसे एक जटा उखाड़कर सबको सुनाते हुए यह बात कही—'आज देवताओंसहित तीनों लोक मेरे पराक्रमको देखें। वह खोटी बुद्धिवाला ब्रह्मघाती इन्द्र भी मेरी शक्तिका साक्षात्कार कर ले; क्योंकि उस दुष्टने अपने ब्राह्मणोचित कर्ममें लगे हुए मेरे पुत्रका वध किया है।' यों कहकर क्रोधसे लाल आँखें किये प्रजापतिने वह जटा अग्निमें होम दी। फिर तो उस होमकुण्डसे वृत्र नामक महान् असुर

• धर्मपक्षीद्वारा जैमिनिके प्रश्नोंका उत्तर • १३

प्रकट हुआ, जिसके शरीरसे सब ओर आगकी लपटें निकल रहीं थीं। विशाल देह, बड़ी-बड़ी दाढ़ें और कटे-छाँटे कोयलेके ढेरकी भाँति शरीरका रंग था। उस महान् असुर वृत्रासुरको अपने वधके लिये उत्पन्न देख इन्द्र भयसे व्याकुल हो उठे। उन्होंने सन्धिकी इच्छासे सप्तर्षियोंको उसके पास भेजा। सम्पूर्ण भूतोंके हितसाधनमें संलग्न रहनेवाले वे महर्षि बड़ी प्रसन्नताके साथ गये और उन्होंने कुछ शर्तोंके साथ इन्द्र और वृत्रासुरमें मित्रता करा दी। इन्द्रने सन्धिकी शर्तोंका उल्लङ्घन करके जब वृत्रासुरको मार डाला, तब पुनः उनपर ब्रह्महत्याका आक्रमण हुआ। उस समय उनका सारा बल नष्ट हो गया। इन्द्रके शरीरसे निकला हुआ बल वायुदेवतामें समा गया। तदनन्तर जब इन्द्रने गौतमका रूप धारण करके उनकी पत्नी अहल्याके सतीत्वका नाश किया, उस समय उनका रूप भी नष्ट हो गया। उनके अङ्ग-प्रत्यङ्गका लावण्य, जो बड़ा ही मनोरम था, व्यभिचार-दोषसे दूषित देवराज इन्द्रको छोड़कर दोनों अश्विनीकुमारोंके पास चला गया। इस प्रकार इन्द्र अपने धर्म, तेज, बल और रूपसे वञ्चित हो गये। यह जानकर दैत्योंने उन्हें जीतनेका उद्योग आरम्भ किया।

महामुने! उन दिनों पृथ्वीपर जो अधिक पराक्रमी राजा थे, उन्हींके कुलोंमें देवराजको जीतनेकी इच्छा रखनेवाले अत्यन्त बलशाली दैत्य उत्पन्न हुए। कुछ कालके अनन्तर यह पृथ्वी पापके भारी भारसे पीड़ित हो मेरु पर्वतके शिखरपर, जहाँ देवताओंकी दिव्य सभा है, गयी। वहाँ पहुँचकर उसने दानवों और दैत्योंसे होनेवाले अपने खेदका कारण बतलाया। वह बोली—'देवताओ! आपने पूर्वकालमें जिन महापराक्रमी असुरोंका वध किया है, वे सब इस समय मनुष्यलोकमें जाकर राजाओंके घरमें उत्पन्न हुए हैं। ऐसे दैत्योंकी अनेक अक्षौहिणी सेनाएँ हैं। मैं उनके भारसे पीड़ित होकर नीचेकी ओर धँसी जाती हूँ। आपलोग ऐसा कोई उपाय करें, जिससे मुझे शान्ति मिले।'

पक्षी कहते हैं—पृथ्वीके यों कहनेपर सम्पूर्ण देवता अपने-अपने तेजके अंशसे पृथ्वीपर अवतार लेने लगे। उनके अवतारके दो ही उद्देश्य थे—प्रजाजनोंका उपकार और पृथ्वीके भारका अपहरण। इन्द्रके शरीरसे जो तेज प्राप्त हुआ था, उसे स्वयं धर्मराजने कुन्तीके गर्भमें स्थापित किया। उसीसे महातेजस्वी राजा युधिष्ठिरका जन्म हुआ। फिर वायु देवताने इन्द्रके ही बलको कुन्तीके उदरमें स्थापित किया। उससे भीम उत्पन्न हुए। इन्द्रके आधे अंशसे अर्जुनका जन्म हुआ। इसी प्रकार इन्द्रका ही सुन्दर रूप अश्विनीकुमारोंद्वारा माद्रीके गर्भमें स्थापित किया गया था, जिससे अत्यन्त कान्तिमान् नकुल और सहदेव उत्पन्न हुए। इस प्रकार देवराज इन्द्र पाँच रूपोंमें अवतीर्ण हुए। उनकी पत्नी शची ही महाभागा कृष्णाके रूपमें अग्निसे प्रकट हुई। अतः कृष्णा एकमात्र इन्द्रकी ही पत्नी थी और किसीकी नहीं। योगेश्वर भी अनेक शरीर धारण कर लेते हैं। फिर इन्द्र तो देवता हैं, उनके पाँच शरीर धारण कर लेनेमें क्या सन्देह है। इस प्रकार पाँच पाण्डवोंकी जो एक पत्नी हुई, उसका रहस्य बताया गया।

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  • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *

राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र

पक्षी कहते हैं—पहलेकी बात है, त्रेतायुगमें हरिश्चन्द्र नामसे प्रसिद्ध एक राजर्षि रहते थे। वे बड़े धर्मात्मा, भूमण्डलके पालक, सुन्दर कीर्तिसे युक्त और सब प्रकारसे श्रेष्ठ थे। उनके राज्यकालमें कभी अकाल नहीं पड़ा, किसीको रोग नहीं हुआ, मनुष्योंकी अकालमृत्यु नहीं हुई और पुरवासियोंकी कभी अधर्ममें रुचि नहीं हुई। उस समय प्रजावर्गके लोग धन, वीर्य और तपस्याके मदसे उन्मत्त नहीं होते थे। कोई भी स्त्री ऐसी नहीं देखी जाती थी, जो पूर्ण यौवनावस्थाको प्राप्त किये बिना ही सन्तानको जन्म देती रही हो। एक दिन महाबाहु राजा हरिश्चन्द्र जंगलमें शिकार खेलने गये थे। वहाँ शिकारके पीछे दौड़ते हुए उन्होंने बारंबार कुछ स्त्रियोंकी कातरवाणी सुनी। वे कह रही थीं, 'हमें बचाओ, बचाओ।' राजाने शिकारका पीछा छोड़ दिया और उन स्त्रियोंको लक्ष्य करके कहा—'डरो मत, डरो मत। कौन ऐसा दुष्टबुद्धिवाला पुरुष है जो मेरे शासनकालमें भी ऐसा अन्याय करता है?' यों कहकर स्त्रियोंके रोनेके शब्दका अनुसरण करते हुए राजा उसी ओर चल दिये। इसी बीचमें प्रत्येक कार्यके आरम्भमें बाधा उपस्थित करनेवाला रुद्रकुमार विघ्नराज इस प्रकार सोचने लगा—'ये महर्षि विश्वामित्र बड़े पराक्रमी हैं और अनुपम तपस्याका आश्रय लेकर उत्तम व्रतका पालन करते हुए उन भवादि विद्याओंका साधन करते हैं, जो पहले इन्हें सिद्ध नहीं हो सकी हैं। ये महर्षि क्षमा, मौन तथा आत्मसंयमपूर्वक जिन विद्याओंका साधन करते हैं, वे उनके भयसे पीड़ित होकर यहाँ विलाप कर रही हैं। इनके उद्धारका कार्य मुझे किस प्रकार करना चाहिये?' इस प्रकार विचार करते हुए रुद्रकुमार विघ्नराजने राजाके शरीरमें प्रवेश किया। उनके आवेशसे युक्त होनेपर राजाने क्रोधपूर्वक ये बात कही—'वह कौन पापाचारी मनुष्य है, जो कपड़ेके गठरोमें अग्निको बाँध रहा है? बल और प्रचण्ड तेजसे उद्दीप्त मुझ राजाके उपस्थित रहते हुए आज कौन ऐसा पापी है, जो मेरे धनुषसे छूटकर सम्पूर्ण दिशाओंको देदीप्यमान करनेवाले बाणोंसे सर्वाङ्गमें छिन्न-भिन्न होकर कभी न टूटनेवाली निद्रामें प्रवेश करना चाहता है?'

राजाकी यह बात सुनकर तपस्वी विश्वामित्र कुपित हो उठे। उनके मनमें क्रोधका उदय होते ही वे सम्पूर्ण विद्याएँ, जो स्त्रियोंके रूपमें रो रही थीं, क्षणभरमें अन्तर्धान हो गयीं। तदनन्तर राजाने उन तपस्याके भण्डार महर्षि विश्वामित्रकी ओर दृष्टिपात किया तो वे बड़े भयभीत हुए और सहसा पीपलके पत्तेकी भाँति थरथर काँपने लगे। इतनेमें विश्वामित्र बोल उठे—'ओ दुरात्मा! खड़ा तो रह!' तब राजाने विनयपूर्वक मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और कहा—'भगवन्! यह मेरा धर्म था। प्रभो! इसे आप मेरा अपराध न मानें। मुने! अपने धर्मकी रक्षामें लगे हुए मुझ राजापर आपको

  • राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * १५

क्रोध नहीं करना चाहिये। धर्मज्ञ राजाको तो यह उचित ही है कि वह धर्मशास्त्रके अनुसार दान दे, रक्षा करे और धनुष उठाकर युद्ध करे।'

विश्वामित्र बोले- 'राजन्! यदि तुम्हें अधर्मका डर है, तो शीघ्र बताओ—किसको दान देना चाहिये? किनकी रक्षा करनी चाहिये और किनके साथ युद्ध करना चाहिये?

हरिश्चन्द्रने कहा- श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तथा जिनकी जीविका नष्ट हो गयी हो, ऐसा अन्य मनुष्योंको भी दान देना चाहिये। भयभीत प्राणियोंकी रक्षा करनी चाहिये और शत्रुओंके साथ सदा युद्ध करना चाहिये।*

विश्वामित्र बोले-यदि तुम राजा हो और राजधर्मको भलीभाँति जानते हो तो मैं प्रतिग्रहकी इच्छा रखनेवाला ब्राह्मण हूँ, मुझे इच्छानुसार दक्षिणा दो।

पक्षीगण कहते हैं- महर्षिकी यह बात सुनकर राजाने अपना नया जन्म हुआ माना और प्रसन्नचित्तसे कहा।

हरिश्चन्द्र बोले— भगवन्! आपको मैं क्या दूँ, आप निःशङ्क होकर कहिये। यदि कोई दुर्लभ-से-दुर्लभ वस्तु हो तो उसे भी दी हुई ही समझें।

विश्वामित्रने कहा— वीरवर! तुम समुद्र, पर्वत, ग्राम और नगरोंसहित यह सारी पृथ्वी मुझे दे दो। रथ, घोड़े, हाथी, कोठार और खजानेसहित सारा राज्य भी मुझे समर्पित कर दो। इसके अतिरिक्त भी जो कुछ तुम्हारे पास है, वह मुझे दे दो। केवल अपनी स्त्री, पुत्र और शरीरको अपने पास रख लो। साथ ही अपने धर्मको भी तुम्हीं रखो; क्योंकि वह सदा कर्ताके ही साथ रहता है, परलोकमें जानेपर भी वह साथ जाता है।

मुनिका यह वचन सुनकर राजाने प्रसन्नचित्तसे 'तथास्तु' कहा। हाथ जोड़कर उनकी आज्ञा स्वीकार की। उस समय उनके मुखपर शोक या चिन्ताका कोई चिह्न नहीं था।

विश्वामित्र बोले- राजर्षे! यदि तुमने अपना राज्य, पृथ्वी, सेना और धन आदि सर्वस्व मुझे समर्पित कर दिया तो मुझ तपस्वीके इस राज्यमें रहते किसका प्रभुत्व रहा?

हरिश्चन्द्रने कहा— 'ब्रह्मन्! मैंने जिस समय यह पृथ्वी दी है, उसी समय आप मेरे भी स्वामी हो गये। फिर आपके इस पृथ्वीके राजा होनेकी तो बात ही क्या है।

विश्वामित्र बोले— राजन्! यदि तुमने यह सारी पृथ्वी मुझे दान कर दी तो जहाँ-जहाँ मेरा प्रभुत्व हो, वहाँसे तुम्हें निकल जाना चाहिये। करधनी आदि समस्त आभूषणोंका संग्रह यहीं छोड़कर तुम वल्कलका वस्त्र लपेट लो और अपनी पत्नी तथा पुत्रके साथ चले जाओ।

'बहुत अच्छा' कहकर राजा हरिश्चन्द्र अपनी पत्नी शैव्या तथा पुत्र रोहिताश्वको साथ ले वहाँसे जाने लगे। उस समय विश्वामित्रने उनका मार्ग रोककर कहा—'मुझे राजसूय-यज्ञकी दक्षिणा दिये बिना ही तुम कहाँ जा रहे हो?'

हरिश्चन्द्र बोले— भगवन्! यह अकण्टक राज्य


* दातव्यं विप्रमुख्येभ्यो ये चान्ये कृशवृत्तयः। रक्ष्या भीताः सदा युद्धं कर्तव्यं परिपन्थिभिः ॥ (७। २७)

९६ • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण •


तो मैंने आपको दे ही दिया, अब तो मेरे पास ये तीन शरीर ही शेष बचे हैं।

विश्वामित्रने कहा—तो भी तुम्हें मुझे यज्ञकी दक्षिणा तो देनी ही चाहिये। विशेषतः ब्राह्मणोंको कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके यदि न दिया जाय तो वह प्रतिज्ञा-भङ्गका दोष उस व्यक्तिका नाश कर डालता है। राजन्! राजसूय-यज्ञमें ब्राह्मणोंको जितनेसे सन्तोष हो, उस यज्ञकी उतनी ही दक्षिणा देनी चाहिये। तुमने ही पहले प्रतिज्ञा की है कि देनेकी घोषणा कर देनेपर अवश्य देना चाहिये, आततायियोंसे युद्ध करना चाहिये तथा आर्तजनोंकी रक्षा करनी चाहिये।

हरिश्चन्द्र बोले—भगवन्! इस समय मेरे पास कुछ भी नहीं है। समयानुसार अवश्य आपको दूँगा।

विश्वामित्रने कहा—राजन् ! इसके लिये मुझे कितने समयतक प्रतीक्षा करनी होगी, शीघ्र बताओ।

हरिश्चन्द्र बोले—ब्रह्मर्षे ! मैं एक महीनेमें आपको दक्षिणाके लिये धन दूँगा। इस समय मेरे पास धन नहीं है, अतः मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये।

विश्वामित्रने कहा—नृपश्रेष्ठ ! जाओ, जाओ! अपने धर्मका पालन करो। तुम्हारा मार्ग कल्याणमय हो।

पक्षी कहते हैं—विश्वामित्रने जब 'जाओ' कहकर जानेकी आज्ञा दी, तब राजा हरिश्चन्द्र नगरसे चले। उनके पीछे उनकी प्यारी पत्नी शैब्या भी चली, जो पैदल चलनेके योग्य कदापि नहीं थी। रानी और राजकुमारसहित राजा हरिश्चन्द्रको नगरसे निकलते देख उनके अनुयायी सेवकगण तथा पुरवासी मनुष्य विलाप करने लगे—'हा नाथ! हम पीड़ितोंका आप क्यों परित्याग कर रहे हैं? राजन् ! आप धर्ममें तत्पर रहनेवाले तथा पुरवासियोंपर कृपा रखनेवाले हैं। राजर्षे ! यदि आप धर्म समझें तो हमें भी अपने साथ ले चलें। महाराज ! दो घड़ी तो ठहर जाइये। हमारे नेत्ररूपी भ्रमर आपके मुखारविन्दकी रूपसुधाका पान कर लें। फिर हमें कब आपके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त होगा। हाय! जिन महाराजके आगे-आगे चलनेपर पीछेसे कितने ही राजा चला करते थे, आज उन्हींके पीछे उनकी यह रानी अपने बालक पुत्रको गोद लेकर चल रही है। यात्राके समय जिनके सेवक भी हाथियोंपर बैठकर आगे जाते थे, वे ही महाराज हरिश्चन्द्र आज पैदल चल रहे हैं! हा राजन्! मनोहर भौंहों, चिकनी त्वचा तथा ऊँची नासिकासे सुशोभित आपका सुकुमार मुख मार्गमें धूलिसे धूसरित एवं क्लेशयुक्त होकर न जाने कैसी दशाको प्राप्त होगा। नृपश्रेष्ठ ! ठहर जाइये, ठहर जाइये; यहाँ अपने धर्मका पालन कीजिये। क्रूरताका परित्याग ही सबसे बड़ा धर्म है। विशेषतः क्षत्रियोंके लिये तो यही सबसे उत्तम है। नाथ ! अब हमें स्त्री, पुत्र, धन धान्य आदिसे क्या लेना है। यह सब छोड़कर हमलोग आपके साथ छायाकी भाँति रहेंगे। हा नाथ! हा महाराज !!

  • राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * १७

हा स्वामिन् ! ! ! आप हमें क्यों त्याग रहे हैं ? जहाँ आप रहेंगे, वहीं हम भी रहेंगे। जहाँ आप हैं, वहीं सुख है। जहाँ आप हैं, वहीं नगर है और जहाँ हमारे महाराज आप हैं, वहीं हमारे लिये स्वर्ग है !'

पुरवासियोंकी ये बातें सुनकर राजा हरिश्चन्द्र शोकमग्न हो उनपर दया करनेके लिये ही मार्गमें उस समय ठहर गये। विश्वामित्रने देखा, राजाका चित्त पुरवासियोंके वचनोंसे व्याकुल हो उठा है; तब वे उनके पास आ पहुँचे और रोष तथा अमर्षसे आँखें फाड़कर बोले—'अरे ! तू तो बड़ा दुराचारी, झूठा और कपटपूर्ण बातें करनेवाला है। धिक्कार है तुझे, जो मुझे राज्य देकर फिर उसे वापस ले लेना चाहता है।' विश्वामित्रका यह कठोर वचन सुनकर राजा काँप उठे और 'जाता हूँ, जाता हूँ' कहकर अपनी पत्नीका हाथ पकड़कर खींचते हुए शीघ्रतापूर्वक चले। राजा अपनी पत्नीको खींच रहे थे। वह सुकुमारी अबला चलनेके परिश्रमसे थककर व्याकुल हो रही थी तो भी विश्वामित्रने सहसा उसकी पीठपर डंडेसे प्रहार किया। महारानीको इस प्रकार मार खाते देख महाराज हरिश्चन्द्र दुःखसे आतुर होकर केवल इतना ही कह सके, 'भगवन् ! जाता हूँ।' उनके मुखसे और कोई बात नहीं निकल सकी। उस समय परम दयालु पाँच विश्वेदेव आपसमें इस प्रकार कहने लगे—'ओह ! यह विश्वामित्र तो बड़ा पापी है। न जाने किन लोकोंमें जायगा। इसने यज्ञकर्ताओंमें श्रेष्ठ इन महाराजको अपने राज्यसे नीचे उतार दिया है।'

विश्वेदेवोंकी यह बात सुनकर विश्वामित्रको बड़ा रोष हुआ। उन्होंने उन सबको शाप देते हुए कहा—'तुम सब लोग मनुष्य हो जाओ।' फिर उनके अनुनय-विनयसे प्रसन्न होकर उन महामुनिने कहा—'मनुष्य होनेपर भी तुम्हारे कोई सन्तान नहीं होगी, तुम विवाह भी नहीं करोगे। तुम्हारे मनमें किसीके प्रति ईर्ष्या और द्वेष भी नहीं होगा। तुम पुनः काम-क्रोधसे मुक्त होकर देवत्वको प्राप्त कर लोगे।' तदनन्तर वे विश्वेदेव अपने अंशसे कुरुवंशियोंके घरमें अवतीर्ण हुए। वे ही द्रौपदीके गर्भसे उत्पन्न पाँचों पाण्डवकुमार थे। महामुनि विश्वामित्रके शापसे ही उनका विवाह नहीं हुआ। जैमिनि ! इस प्रकार हमने पाण्डवकुमारोंकी कथासे सम्बन्ध रखनेवाली बातें तुम्हें बतला दीं। अब और क्या सुनना चाहते हो ?

**जैमिनि बोले—**आपलोगोंने क्रमशः मेरे प्रश्नोंके उत्तरमें ये सारी बातें बतायीं। अब मुझे हरिश्चन्द्रकी शेष कथा सुननेके लिये बड़ा कौतूहल हो रहा है। अहो, उन महात्माने बहुत बड़ा कष्ट उठाया। श्रेष्ठ पक्षियो! क्या उन्हें इस दुःखके अनुरूप ही कोई सुख भी कभी प्राप्त हुआ?

**पक्षियोंने कहा—**विश्वामित्रकी बात सुनकर राजा दुःखी हो धीरे-धीरे आगे बढ़े। उनके पीछे नन्हें-से पुत्रको गोद लिये रानी शैव्या चल रही थीं। दिव्य वाराणसीपुरीके पास पहुँचकर राजाने विचार किया कि यह काशी मनुष्योंको भोग्य भूमि

१८ • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण •


नहीं है, इसपर केवल शूलपाणि भगवान् शङ्करका अधिकार है; अतः यह मेरे राज्यसे बाहर है। ऐसा निश्चय करके दुःखसे पीड़ित हो उन्होंने अपनी अनुकूल पत्नीके साथ पैदल ही काशीमें प्रवेश किया। पुरमें प्रवेश करते ही उन्हें महर्षि विश्वामित्र सामने खड़े दिखायी दिये। उन्हें उपस्थित देख राजा हरिश्चन्द्र हाथ जोड़कर विनीत भावसे खड़े हो गये और बोले—'मुने ! ये मेरे प्राण, यह पुत्र और यह पत्नी यहाँ प्रस्तुत हैं। इनमेंसे जिसकी आपको आवश्यकता हो, उसे उत्तम अर्घ्यके रूपमें स्वीकार कीजिये अथवा हमलोग यदि आपकी और कोई सेवा कर सकते हों तो उसके लिये भी आज्ञा दीजिये।'

विश्वामित्र बोले—राजर्षे ! आज एक मास पूर्ण हो गया। यदि आपको अपनी बातका स्मरण हो तो मुझे राजसूय यज्ञके लिये दक्षिणा दीजिये।

हरिश्चन्द्रने कहा—तपोधन ! अभी आज ही महीना पूरा हो रहा है। उसमें आधा दिन शेष है। इतने समयतक और प्रतीक्षा कीजिये। अब अधिक देरी नहीं होगी।

विश्वामित्र बोले—महाराज ! ऐसा ही सही। मैं फिर आऊँगा। यदि आज मुझे दक्षिणा न दोगे तो मैं तुम्हें शाप दे दूँगा।

यों कहकर विश्वामित्र चले गये। उस समय राजा इस चिन्तामें पड़े कि पहले स्वीकार की हुई दक्षिणा मैं इन्हें किस प्रकार दूँ। क्या मैं अपने प्राण त्याग दूँ ? इस अकिञ्चन दशामें किधर जाऊँ ? यदि प्रतिज्ञा की हुई दक्षिणा दिये बिना ही मर जाऊँ तो ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेके कारण पापात्मा समझा जाऊँगा और मुझे अधम-से-अधम कीटयोनिमें जन्म लेना पड़ेगा। अथवा यह दक्षिणा चुकानेके लिये अपनेको बेचकर किसीकी दासता स्वीकार कर लूँ ? बस, अपनेको बेचना ही ठीक है।

राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त व्याकुल एवं दीन होकर नीचा मुख किये जब इस प्रकार चिन्ता कर रहे थे, उस समय उनकी पत्नीने नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए गद्गदवाणीमें कहा—'महाराज ! चिन्ता छोड़िये। अपने सत्यकी रक्षा कीजिये। जो मनुष्य सत्यसे विचलित होता है, वह श्मशानकी भाँति त्याग देने योग्य है। नरश्रेष्ठ ! पुरुषके लिये अपने सत्यकी रक्षासे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं बतलाया गया है। जिसका वचन निरर्थक (मिथ्या) हो जाता है, उसके अग्निहोत्र, स्वाध्याय तथा दान आदि सम्पूर्ण कर्म निष्फल हो जाते हैं। धर्मशास्त्रोंमें बुद्धिमान् पुरुषोंने सत्यको ही संसारसागरसे तारनेके लिये सर्वोत्तम साधन बताया है। इसी प्रकार जिनका मन अपने वशमें नहीं है, ऐसे पुरुषोंको पतनके गर्तमें गिरानेके लिये असत्यको ही प्रधान कारण बताया गया है।* कृति नामके राजा सात


* त्यज चिन्तां महाराज स्वसत्यमनुपालय। श्मशानवद्वर्जनीयो नरः सत्यबहिष्कृतः ॥
यतः परतरं धर्मं वदन्ति पुरुषस्य तु। तादृशं पुरुषव्याघ्र स्वसत्यपरिपालनम् ॥

  • राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * ११

अश्वमेध और एक राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान करके भी एक ही बार असत्य बोलनेके कारण स्वर्गसे गिर गये थे। महाराज ! मुझसे पुत्रका जन्म हो चुका है.......।' इतना कहकर रानी शैव्या फूट-फूटकर रोने लगी।

हरिश्चन्द्र बोले—कल्याणि ! यह सन्ताप छोड़ो और जो कुछ कहना चाहती थी, उसे साफ-साफ कहो।

रानीने कहा—महाराज ! मुझसे पुत्रका जन्म हो चुका है। श्रेष्ठ पुरुष स्त्री संग्रहका फल पुत्र ही बतलाते हैं। वह फल आपको मिल चुका है, अतः मुझको बेंचकर ब्राह्मणको दक्षिणा चुका दीजिये।

महारानीका यह वचन सुनकर राजा हरिश्चन्द्र मूर्च्छित हो गये। फिर होशमें आनेपर वे अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगे—'कल्याणी ! वह महान् दुःखकी बात है, जो तुम मुझसे ऐसा कह रही हो।' यों कहकर नरश्रेष्ठ हरिश्चन्द्र पृथ्वीपर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये। महाराज हरिश्चन्द्रको पृथ्वीपर पड़ा देख रानी अत्यन्त दुःखित होकर बड़ी करुणाके साथ बोलीं—'हा महाराज! यह किसका चीता हुआ अनिष्ट फल आपको प्राप्त हुआ ? आप तो रंकुनामक मृगके रोएँसे बने हुए कोमल एवं चिकने वस्त्रपर शयन करने योग्य हैं, किन्तु आज भूमिपर पड़े हैं। जिन्होंने करोड़ोंसे भी अधिक गोधन ब्राह्मणोंको दान दिया है, वे ही ये मेरे प्राणनाथ महाराज इस समय धरतीपर सो रहे हैं! हाय! कितने कष्टकी बात है। अरे ओ दुर्दैव! इन महाराजने तेरा क्या बिगाड़ा था, जो इन्द्र और भगवान् विष्णुके तुल्य होकर भी ये यहाँ मूर्च्छित दशामें पड़े हैं' इतना कहकर सुन्दरी शैव्या पतिके दुःखोंके असह्य बोझसे पीड़ित हो स्वयं भी गिरकर मूर्च्छित हो गयी।

इसी बीचमें महातपस्वी विश्वामित्रजी भी आ धमके। उन्होंने राजा हरिश्चन्द्रको मूर्च्छित होकर भूमिपर पड़ा देख उनपर जलके छींटे डाले और इस प्रकार कहा—'राजेन्द्र ! उठो, उठो। यदि तुम्हारी दृष्टि धर्मपर हो तो मुझे पूर्वोक्त दक्षिणा दे दो। सत्यसे ही सूर्य तप रहा है। सत्यपर ही पृथ्वी टिकी हुई है। सत्य-भाषण सबसे बड़ा धर्म है। सत्यपर ही स्वर्ग प्रतिष्ठित है। एक हजार अश्वमेध और एक सत्यको यदि तराजूपर तोला जाय तो हजार अश्वमेधसे सत्य ही भारी सिद्ध होगा।*


अग्निहोत्रमधीतं वा दानाद्याश्चाखिलाः क्रियाः। भजन्ते तस्य वैफल्यं यस्य वाक्यमकारणम्॥
सत्यन्वयन्तमुदितं धर्मशास्त्रेषु धीमताम्। तपसावानृतं तद्वत् पतनायाकृतात्मनाम्॥
(अ० ८। १७–२०)

* सत्येनार्कः प्रतपति सत्ये तिष्ठति मेदिनी। सत्यं चोक्तं परो धर्मः स्वर्गः सत्ये प्रतिष्ठितः ॥
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम्। अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥
(अ० ८। ४१-४२)

२०

  • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *

राजन्! यदि आज तुम मुझे दक्षिणा न दोगे तो सूर्यास्त होनेपर तुम्हें निश्चय ही शाप दे दूँगा।' इतना कहकर विश्वामित्र चले गये। इधर राजा हरिश्चन्द्र उनके भयसे व्याकुल हो उठे। सोचने लगे—'हाय! मैं अधम कहाँ भागकर जाऊँ।' उनकी दशा क्रूर स्वभाववाले धनीसे पीड़ित निर्धन पुरुषकी-सी हो रही थी। उस समय उनकी पत्नीने फिर कहा—'नाथ! मेरी बात मानकर वैसा ही कीजिये, अन्यथा आपको शापाग्निसे दग्ध होकर मरना पड़ेगा।' जब पत्नीने बार-बार उन्हें प्रेरित किया, तब राजा बोले—'कल्याणी! मैं बड़ा निर्दयी हूँ। लो, अब तुम्हें बेचने चलता हूँ। क्रूर-से-क्रूर मनुष्य भी जो कार्य नहीं कर सकते, वही आज मैं करूँगा।' पत्नीसे यों कहकर राजा व्याकुलचित्तसे नगरमें गये और नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए गद्गदकण्ठसे बोले।

राजा ने कहा—ओ नागरिको! तुम सब लोग मेरी बात सुनो, क्या तुम मेरा परिचय पूछ रहे हो? लो, सुनो, मैं मनुष्य नहीं, अत्यन्त क्रूर प्राणी हूँ; क्योंकि अपनी प्राणप्यारी पत्नीको यहाँ बेचनेके लिये आया हूँ। यदि आपलोगोंमेंसे किसीको मेरी इस प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतमा पत्नीसे दासीका काम लेनेकी आवश्यकता हो तो वह शीघ्र बोले; इस असह्य दुःखमें भी जबतक मैं जीवन धारण किये हुए हूँ, तभीतक बात कर ले।

तदनन्तर कोई बूढ़ा ब्राह्मण सामने आकर राजासे बोला—'दासीको मेरे हवाले करो। मैं इसे धन देकर खरीदता हूँ। मेरे पास धन बहुत है और मेरी प्यारी पत्नी अत्यन्त सुकुमारी है। वह घरके काम-काज नहीं कर सकती। इसलिये यह दासी मुझे दे दो। तुम अपनी इस पत्नीकी कार्यदक्षता, अवस्था, रूप और स्वभावके अनुरूप यह धन लो और इसे मेरे हवाले करो।' ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर राजा हरिश्चन्द्रका हृदय दुःखसे विदीर्ण हो गया। वे उसे कोई उत्तर न दे सके। तब उस ब्राह्मणने राजाके वल्कल-वस्त्रमें उस धनको अच्छी तरह बाँध दिया और उनकी पत्नीको खींचकर वह अपने साथ ले चला। माताको इस दशामें देखकर बालक रोहिताश्व रो उठा और हाथसे उसका वस्त्र पकड़कर अपनी ओर खींचने

  • राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * २१

लगा। उस समय रानीने अपने पुत्रसे कहा—'बेटा! आओ, जी भरकर देख लो। तुम्हारी माता अब दासी हो गयी। तुम राजपुत्र हो, मेरा स्पर्श न करो। अब मैं तुम्हारे स्पर्श करनेयोग्य न रही।' फिर सहसा अपनी माताको खींचकर ले जाये जाते हुए देख बालक रोहिताश्व 'मा, मा' कहकर रोता हुआ दौड़ा। उस समय उसके नेत्रोंसे आँसू बह रहे थे। जब बालक पास आया, तब उस ब्राह्मणने क्रोधमें भरकर उसे लातसे मारा तो भी उसने अपनी मांको नहीं छोड़ा। केवल 'माई, माई' कहकर बिलखता रहा।

तब रानीने ब्राह्मणसे कहा—स्वामिन् ! आप मुझपर कृपा कीजिये। इस बालकको भी खरीद लीजिये। यद्यपि आपने मुझे खरीद लिया है, तथापि इस बालकके बिना मैं आपके कार्यको अच्छी तरह नहीं कर सकती। मैं बड़ी अभागिनी हूँ। आप मुझपर दया करके प्रसन्न हों और बछड़ेसे गायकी तरह इस बालकसे मुझे मिलाइये।

ब्राह्मण बोला—राजन् ! यह धन लो और इस बालकको भी मेरे हवाले करो।

यों कहकर उसने पूर्ववत् राजाके उत्तरीय-खण्डमें वह धन बाँध दिया और बालकको उसकी माताके साथ लेकर चल दिया। इस प्रकार पत्नी और पुत्रको ले जाये जाते देख राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त दुःखसे कातर हो गये और विलाप करने लगे—'हाय! पहले जिसे वायु, सूर्य, चन्द्रमा तथा बाहरी लोग कभी नहीं देख पाते थे, वही मेरी पत्नी आज दासी बन गयी। जिसके हाथोंकी अँगुलियाँ अत्यन्त सुकुमार हैं, यह सूर्यवंशमें उत्पन्न मेरा बालक आज बेच दिया गया। हा प्रिये ! हा पुत्र !! हा वत्स !!! मुझ नीचके अन्यायसे तुम्हें दैवाधीन दशाको प्राप्त होना पड़ा। फिर भी मेरी मृत्यु नहीं होती—मुझे धिक्कार है।'

राजा हरिश्चन्द्र इस प्रकार विलाप कर रहे थे, इतनेमें ही वह ब्राह्मण उन दोनोंको साथ ले ऊँचे-ऊँचे वृक्ष और गृह आदिकी ओटमें छिप गया। वह बड़ी शीघ्रतासे चल रहा था। तदनन्तर विश्वामित्रने वहाँ पहुँचकर राजासे धन माँगा। हरिश्चन्द्रने भी वह धन उन्हें समर्पित कर दिया। पत्नी और पुत्रको बेचनेसे प्राप्त हुए उस धनको थोड़ा देखकर कौशिक मुनिने शोकाकुल राजासे कुपित होकर कहा—'क्षत्रियाधम ! क्या तू इसको मेरे यज्ञके अनुरूप दक्षिणा मानता है ? यदि ऐसी बात है तो मेरे महान् बलको देख। अपनी भलीभाँति की हुई तपस्याका, निर्मल ब्राह्मणत्वका, उग्र प्रभावका तथा विशुद्ध स्वाध्यायका बल तुझे दिखाता हूँ।'

हरिश्चन्द्रने कहा—भगवन् ! कुछ काल और प्रतीक्षा कीजिये और भी दक्षिणा दूँगा। इस समय नहीं है। मेरी पत्नी और पुत्र बिक चुके हैं।

विश्वामित्रने कहा—राजन् ! दिनका चौथा भाग शेष है। इतने ही समयतक मुझे प्रतीक्षा करनी है। बस, इसके उत्तरमें तुम्हें कुछ कहनेकी आवश्यकता नहीं है।

राजा हरिश्चन्द्रसे इस प्रकार निर्दयतापूर्ण निष्ठुर वचन कहकर और उस धनको लेकर कोपमें भरे हुए विश्वामित्र तुरंत वहाँसे चल दिये। उनके

२२ • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण •

आनेपर राजा भय और शोकके समुद्रमें डूब गये; उन्होंने सब प्रकार विचार करके अपना कर्तव्य निश्चित किया और नीचा मुँह करके आवाज लगायी—‘जो मनुष्य मुझे धनसे खरीदकर दासका काम लेना चाहता हो, वह सूर्यके रहते-रहते शीघ्र ही बोले।’ उसी समय धर्म चाण्डालका रूप धारण करके तुरंत वहाँ आये। उस चाण्डालके शरीरसे दुर्गन्ध निकल रही थी। विकृत आकार, रूखा बदन, दाढ़ी-मूँछें बढ़ी हुई और दाँत निकले हुए थे। निर्दयताकी तो वह मूर्ति ही था। काला रंग, लंबा पेट, पीलापन लिये हुए रूखे नेत्र और कठोर वाणी—यही उसकी हुलिया थी। उसने झुंड-के-झुंड पक्षियोंको पकड़ रखा था। मुर्दोंपर चढ़ी हुई मालाओंसे वह अलङ्कृत था। उसने एक हाथमें खोपड़ी और दूसरेमें लाठी ले रखी थी। उसका मुँह बहुत बड़ा था। वह देखनेमें भयानक तथा बारंबार बहुत बकवाद करनेवाला था। कुत्तोंसे घिरे होनेके कारण उसकी भयंकरता और भी बढ़ गयी थी।

**चाण्डाल बोला—**मुझे तुम्हारी आवश्यकता है। तुम शीघ्र ही अपनी कीमत बताओ। थोड़े अथवा बहुत, जितने धनसे तुम प्राप्त हो सको, उसे कहो।

चाण्डालकी दृष्टिसे क्रूरता टपक रही थी। वह बड़ी निष्ठुरताके साथ बातें करता था। देखनेसे अत्यन्त दुराचारी प्रतीत होता था। इस रूपमें उसे देखकर राजाने पूछा—‘तू कौन है ?’

**चाण्डालने कहा—**मैं चाण्डाल हूँ। इस श्रेष्ठ नगरीमें मुझे सब लोग प्रवीरके नामसे पुकारते हैं। मैं वध्य मनुष्योंका वध करनेवाला और मुर्दोंका वस्त्र लेनेवाला प्रसिद्ध हूँ।

**हरिश्चन्द्र बोले—**मैं चाण्डालका दास होना नहीं चाहता। यह बहुत ही निन्दित कर्म है। शापाग्निसे जल मरना अच्छा, किन्तु चाण्डालके अधीन होना कदापि अच्छा नहीं है।

वे इस प्रकार कह ही रहे थे कि महान् तपस्वी विश्वामित्र मुनि आ पहुँचे और क्रोध एवं अमर्षसे आँखें फाड़कर राजासे बोले—‘यह चाण्डाल तुम्हें बहुत-सा धन देनेके लिये उपस्थित है। उसे ग्रहण करके मुझे यज्ञकी पूरी दक्षिणा क्यों नहीं देते ? यदि तुम चाण्डालके हाथ अपनेको बेचकर उससे मिला हुआ धन मुझे नहीं दोगे, तो मैं निःसन्देह तुम्हें शाप दे दूँगा।’

**हरिश्चन्द्रने कहा—**ब्रह्मर्षे ! मैं आपका दास हूँ, दुःखी हूँ, भयभीत हूँ और विशेषतः आपका भक्त हूँ। आप मुझपर कृपा करें। चाण्डालका सम्पर्क बड़ा ही निन्दनीय है। मुनिश्रेष्ठ ! शेष धनके बदले मैं आपका ही सब कार्य करनेवाला, आपके अधीन रहनेवाला तथा आपकी इच्छाके अनुसार चलनेवाला दास बनकर रहूँगा।

**विश्वामित्र बोले—**यदि तुम मेरे दास हो तो मैंने एक अरब स्वर्णमुद्रा लेकर तुम्हें चाण्डालको दे दिया। अब तुम इसके दास हो गये।

मुनिके ऐसा कहनेपर चाण्डाल मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुआ। उसने विश्वामित्रको धन देकर

  • राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * २३

स्मरण किया करते थे। अपना सर्वस्व छिन जानेके कारण राजा बहुत व्याकुल रहते थे। कुछ कालके बाद राजा हरिश्चन्द्र चाण्डालके वशमें होनेके कारण श्मशानघाटपर मुर्दोंके कपड़े (कफ़न) संग्रह करनेके काममें नियुक्त हुए। चाण्डालने उन्हें आज्ञा दी थी कि 'तुम मुर्दोंके आनेकी प्रतीक्षामें रात-दिन यहीं रहो।' वह आदेश पाकर राजा काशीपुरीके दक्षिण श्मशान-भूमिमें बने हुए शवमन्दिरमें गये। उस श्मशानमें बड़ा भयङ्कर शब्द होता था। वहाँ सैकड़ों सियारिनें भरी रहती थीं। चारों ओर मुर्दोंकी खोपड़ियाँ बिखरी पड़ी थीं। सारा श्मशान दुर्गन्धसे व्याप्त और अत्यन्त धूमसे आच्छादित था। उसमें पिशाच, भूत, वेताल, डाकिनी और यक्ष रहा करते थे। गिद्धों और गोहड़ोंसे भी वह स्थान भरा रहता था। झुंड-के-झुंड कुत्ते उसे घेरे रहते थे। यत्र-तत्र हड्डियोंके ढेर लगे हुए थे। सब ओरसे बड़ी दुर्गन्ध आती थी। अनेकों मृत व्यक्तियोंके बन्धु-बान्धवोंके करुण-क्रन्दनसे वह श्मशान-भूमि बड़ी ही भयानक और कोलाहलपूर्ण रहती थी। 'हा पुत्र! हा मित्र!

राजाको बाँध लिया और उन्हें डंडोंकी मारसे अचेत-सा करता हुआ वह अपने घरकी ओर ले चला। उस समय राजाकी इन्द्रियाँ अत्यन्त व्याकुल हो गयी थीं। तदनन्तर राजा हरिश्चन्द्र चाण्डालके घरमें रहने लगे। वे प्रतिदिन सबेरे, दोपहर और शामको निम्नाङ्कित बातें गुनगुनाया करते थे। 'हाय! मेरी दीनमुखी पत्नी अपने आगे दीनमुख बालक रोहिताश्वको देखकर अत्यन्त दुःखमें मग्न हो जाती होगी और उस समय इस आशासे कि राजा धन कमाकर हम दोनोंको छुड़ायेंगे, बारंबार मेरा स्मरण करती होगी। उसे इस बातका पता न होगा कि मैं ब्राह्मणको और भी अधिक धन देकर अत्यन्त पापमय संसर्गमें जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। राज्यका नाश, सुहृदोंका त्याग, पत्नी और पुत्रका विक्रय तथा अन्तमें चाण्डालत्वकी प्राप्ति— अहो! यह एकके बाद एक दुःखोंकी कैसी परम्परा चली आती है।'

इस प्रकार वे चाण्डालके घरमें रहते हुए प्रतिदिन अपने प्रिय पुत्र तथा अनुकूल पत्नीका

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  • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *

हा बन्धु ! हा भ्राता ! हा वत्स ! हा प्रियतम ! हा पतिदेव ! हाय बहिन ! हा माता ! हा मामा ! हा पितामह ! हा मातामह ! हा पिताजी ! हा पौत्र ! हा बान्धव ! तुम कहाँ चले गये ? लौट आओ !' इस प्रकार विलाप करनेवालोंकी करुणापूर्ण ध्वनि वहाँ जोर-जोरसे सुनायी पड़ती थी। ऐसी भूमिमें निवास करनेके कारण राजा न रातमें सो पाते थे, न दिनमें। बारंबार हाहाकार करते रहते थे। इस प्रकार उनके बारह महीने सौ वर्षोंके समान बीते। अन्तमें राजाने दुःखी होकर देवताओंकी शरण ली और कहा—'महान् धर्मको नमस्कार है। जो सच्चिदानन्दस्वरूप, सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करनेवाले विधाता, परात्पर ब्रह्म, शुद्ध, पुराणपुरुष एवं अविनाशी हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। देवगुरु बृहस्पति ! तुम्हें नमस्कार है। इन्द्रको भी नमस्कार है।' यों कहकर राजा पुनः चाण्डालके कार्यमें लग गये।

तदनन्तर महाराज हरिश्चन्द्रकी पत्नी शैब्या साँपके काटनेसे मरे हुए अपने बालकको गोदमें उठाये विलाप करती हुई श्मशान-भूमिमें आयी। वह बार-बार यही कहती थी, 'हा वत्स ! हा पुत्र ! हा शिशो !' उसका शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया था। कान्ति मलिन पड़ गयी थी। मन बेचैन था। सिरके बालोंमें धूल जम गयी थी। शैब्याके विलापका शब्द सुनकर राजा हरिश्चन्द्र तुरंत उसके पास गये। उन्हें आशा थी, यहाँ भी मुर्देके शरीरका कफन मिलेगा। वे जोर-जोरसे रोती हुई अपनी पत्नीको पहचान न सके। अधिक कालतक प्रवासमें रहनेके कारण वह बहुत सन्तप्त थी। ऐसी जान पड़ती थी, मानो उसका दूसरा जन्म हुआ हो। शैब्याने भी पहले उनके मस्तकको मनोहर केशोंसे सुशोभित देखा था। अब उनके सिरपर जटा थी। वे सूखे हुए वृक्षके समान जान पड़ते थे। इस अवस्थामें वह भी अपने पतिको न पहचान सकी। राजाने काले कपड़ेमें लिपटे हुए बालकको, जिसे साँपने काट खाया था तथा जिसके अङ्गोंमें राजोचित चिह्न दिखायी देते थे, जब देखा तो उन्हें बड़ी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—'अहो ! बड़े कष्टकी बात है, यह बालक किसी राजाके कुलमें उत्पन्न हुआ था; किन्तु दुरात्मा कालने इसे किसी और ही दशाको पहुँचा दिया। अपनी माताकी गोदमें पड़े हुए इस बालकको देखकर मुझे कमलके समान नेत्रोंवाला अपना पुत्र रोहिताश्व याद आ रहा है। यदि उसे भयंकर कालने अपना ग्रास न बनाया होगा तो वह मेरा लाड़ला भी इसी उम्रका हुआ होगा।'

इतनेमें ही रानीने विलाप करते हुए कहा—हा वत्स ! किस पापके कारण यह अत्यन्त भयंकर दुःख आ पड़ा है, जिसका कभी अन्त ही नहीं आता। हा प्राणनाथ ! आप कहाँ हैं ? ओ विधाता ! तूने राज्यका नाश किया, सुहृदोंसे विक्षोह कराया और स्त्री तथा पुत्रको भी बिकवा दिया। अरे ! तूने राजर्षि हरिश्चन्द्रकी कौन-सी दुर्दशा नहीं की।

रानीका यह वचन सुनकर अपने पथसे भ्रष्ट हुए राजा हरिश्चन्द्रने अपनी प्राणप्यारी पत्नी तथा मृत्युके मुखमें पड़े हुए पुत्रको पहचान लिया। 'ओह ! कितने कष्टकी बात है, यह शैब्या इस अवस्थामें और यह वही मेरा पुत्र है ?' यों कहते हुए वे दुःखसे सन्तप्त होकर रोते-रोते मूर्च्छित हो गये। इस अवस्थामें पहुँचे हुए राजाको पहचानकर रानीको भी बड़ा दुःख हुआ। वह भी मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर पड़ी। उसका शरीर निश्चेष्ट हो गया। फिर थोड़ी देर बाद होशमें आनेपर महाराज और महारानी दोनों साथ-ही-साथ शोकके भारसे पीड़ित एवं सन्तप्त हो विलाप करने लगे।

राजाने कहा—हा वत्स ! सुन्दर नेत्र, भौंह, नासिका और बालोंसे युक्त तुम्हारा यह सुकुमार एवं दीन मुख देखकर मेरा हृदय क्यों नहीं विदीर्ण हो जाता। हा बेटा ! तुम मेरे अङ्ग-प्रत्यङ्गसे उत्पन्न

  • राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * २५

तथा मन और हृदयको आनन्द देनेवाले थे, किन्तु मुझ-जैसे दुष्ट पिताने तुम्हें एक साधारण वस्तुकी भाँति बेच डाला। हाय ! दुर्दैवरूपी क्रूर सर्पने सब प्रकारके साधन और वैभवसे पूर्ण मेरे महान् राज्यका अपहरण करके अब मेरे पुत्रको भी काट खाया। दैवरूपी सर्पसे डसे हुए अपने पुत्रके मुख कमलको देखते हुए भी मैं इस समय उसीके भयंकर विषके प्रभावसे अंधा हो रहा हूँ।

आँसू बहाते हुए गद्गदकण्ठसे यों कहकर राजाने बालकको उठाकर छातीसे लगा लिया और मूर्च्छासे निश्चेष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़े।

उस समय रानी इस प्रकार बोली—ये तो वही नरश्रेष्ठ जान पड़ते हैं। केवल स्वरसे इनकी पहचान हो रही है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि ये विद्वज्जनोंके हृदयरूपी चकोरको आह्लादित करनेवाले चन्द्ररूप महाराज हरिश्चन्द्र ही हैं; किन्तु वे महाराज इस समय श्मशानमें कैसे आ पहुँचे ?

अब शैव्या पुत्र-शोकको भूलकर गिरे हुए पतिको देखने लगी। पति और पुत्र दोनोंकी चिन्तासे पीड़ित, विस्मित एवं दीन हुई रानी जब पतिकी दशाका निरीक्षण कर रही थी, उस समय उसकी दृष्टि अपने स्वामीके उस दण्डपर पड़ी, जो बहुत ही घृणित एवं चाण्डालके धारण करने योग्य था। वह देखते ही वह बेहोश होकर गिर पड़ी। फिर धीरे-धीरे जब चेत हुआ तो गद्गद-वाणीमें कहने लगी—'ओ दैव! तूने देवताके समान कान्तिमान् इन महाराजको चाण्डालकी दशाको पहुँचा दिया। तूने इनके राज्यका नाश, सुहृदोंका त्याग और स्त्री-पुत्रका विक्रय कराकर भी इन्हें नहीं छोड़ा। आखिर इन्हें राजासे चाण्डाल बना दिया ! हा राजन् ! आज मैं आपके पास छत्र, झारी, चँवर और व्यजन—कुछ भी नहीं देखती। यह विधाताका कैसा विपरीत भाव है ! पूर्वकालमें जिनके आगे आगे चलनेपर कितने ही राजा सेवक बनकर अपनी चादरोंसे धरती बुहारा करते थे, वे ही महाराज अब दुःखसे पीड़ित हो इस अपवित्र श्मशानभूमिमें विचरते हैं, जहाँ खोपड़ियोंसे सटे कितने ही मिट्टीके घड़े चारों ओर बिखरे पड़े हैं। जहाँ मृतकोंकी लाशसे चर्बी गल-गलकर पृथ्वीके सूखे दोनोंमें पड़ रही है। चिताकी राख, अँगारे, अधजली हड्डियों और मज्जाके ढेरसे यहाँकी भयंकरता बहुत बढ़ गयी है। यहाँसे गृध्रों और गीदड़ोंके भयंकर नाद सुनकर छोटे-छोटे पक्षी भाग गये हैं। चिताके धुएँसे यहाँकी सारी दिशाएँ काली दिखायी देती हैं।'

यों कहकर महारानी शैव्या महाराज हरिश्चन्द्रके कण्ठमें लग गयी तथा कष्ट एवं सैकड़ों प्रकारके शोकसे आक्रान्त हो आर्तवाणीमें विलाप करने लगी—'राजन् ! यह स्वप्न है या सत्य ? महाभाग ! आप इसे जैसा समझते हों, बतलायें। मेरा मन अचेत होता जा रहा है?'

रानीकी यह बात सुनकर महाराज हरिश्चन्द्रने गरम साँस ली और गद्गदवाणीमें अपनेको चाण्डालत्व प्राप्त होनेकी सारी कथा कह सुनायी। उसे

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२४ * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *


सुनकर रानीको बड़ा दुःख हुआ और उसने गरम साँस खींचकर बहुत देरतक रोनेके पश्चात् अपने पुत्रकी मृत्युकी यथार्थ घटना निवेदित की। पुत्रके मरनेकी बात सुनकर राजा पुनः पृथ्वीपर गिर पड़े और विलाप करते हुए बोले—'प्रिये ! अब मैं अधिक दिनोंतक जीवित रहकर क्लेश भोगना नहीं चाहता; परन्तु मेरा अभाग्य तो देखो, मेरा आत्मा भी मेरे अधीन नहीं है। तुम मेरे अपराधोंको क्षमा करना। मैं आज्ञा देता हूँ, तुम ब्राह्मणके घर चली जाओ। शुभे ! 'मैं राजपत्नी हूँ', इस अभिमानमें आकर कभी उस ब्राह्मणका अपमान न करना। सब प्रकारके यत्न करके उसे सन्तुष्ट रखना; क्योंकि स्वामी देवताके समान होता है।'

रानी बोली—राजर्षे! मुझसे भी अब यह दुःखका भार नहीं सहा जाता, अतः आपके साथ ही मैं भी चिताकी जलती हुई आगमें प्रवेश करूँगी।

यह सुनकर राजाने कहा—'पतिव्रते ! जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा ही करो।' तदनन्तर राजाने चिता बनाकर उसके ऊपर अपने पुत्रको रखा और अपनी पत्नीके साथ हाथ जोड़कर सबके ईश्वर परमात्मा नारायण श्रीहरिका स्मरण किया, जो हृदयरूपी गुफामें विराजमान हैं तथा जिनका वासुदेव, सुरेश्वर, आदि-अन्तरहित, ब्रह्म, कृष्ण, पीताम्बर एवं शृंग आदि नामोंसे चिन्तन किया जाता है। उनके इस प्रकार भगवत्स्मरण करनेपर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता धर्मको अगुआ बनाकर तुरंत वहाँ आये और इस प्रकार बोले—'राजन्! हमारी बात सुनो, तुम्हारे स्मरण करनेपर सम्पूर्ण देवता यहाँ उपस्थित हुए हैं। ये साक्षात् पितामह ब्रह्माजी हैं और ये स्वयं भगवान् धर्म हैं। इनके सिवा साध्यगण, विश्वेदेव, मरुद्गण और लोकपाल भी अपने वाहनोंसहित पधारे हैं। नाग, सिद्ध, गन्धर्व, रुद्र, अश्विनीकुमार तथा और भी बहुत-से देवता यहाँ उपस्थित हुए हैं। साथ ही बाबा विश्वामित्रजी भी हैं।'

तत्पश्चात् धर्मने कहा—राजन् ! प्राण त्यागनेका साहस न करो। मैं साक्षात् धर्म तुम्हारे पास आया हूँ। तुमने अपने क्षमा, इन्द्रियसंयम तथा सत्य आदि गुणोंसे मुझे सन्तुष्ट किया है।

इन्द्र बोले—महाभाग हरिश्चन्द्र ! मैं इन्द्र तुम्हारे पास आया हूँ। तुमने स्त्री-पुत्रके साथ सनातन लोकोंपर अधिकार प्राप्त किया है। राजन्! पत्नी और पुत्रको साथ लेकर स्वर्गलोकको चलो, जिसे तुमने अपने शुभकर्मोंसे प्राप्त किया है तथा जो दूसरे मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है।

इसके बाद इन्द्रने चिताके ऊपर आकाशसे अमृतकी वृष्टि की, जो अकालमृत्युका निवारण करनेवाली है। फिर फूलोंकी भी वर्षा होने लगी। देवताओंकी दुन्दुभि जोर-जोरसे बज उठी। इस प्रकार वहाँ एकत्रित हुए देवताओंके समाजमें महात्मा राजाका पुत्र रोहिताश्व चितासे जीवित हो उठा। उसका शरीर सुकुमार और स्वस्थ था। उसकी इन्द्रियों और मनमें प्रसन्नता थी। फिर तो महाराज हरिश्चन्द्रने अपने पुत्रको

  • राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * २७

तुरंत छातीसे लगा लिया। वे स्त्रीसहित पूर्ववत् तेज और कान्तिसे सम्पन्न हो गये। उनकी देहपर दिव्य हार और वस्त्र शोभा पाने लगे। राजा स्वस्थ एवं पूर्णमनोरथ हो परम आनन्दमें निमग्न हो गये। उस समय इन्द्रने पुनः उनसे कहा—'महाभाग! स्त्री और पुत्रसहित तुम्हें उत्तम गति प्राप्त होगी, अतः अपने कर्मोंके फल भोगनेके लिये दिव्य लोकको चलो।'

हरिश्चन्द्रने कहा—देवराज! मैं अपने स्वामी चाण्डालकी आज्ञा लिये बिना तथा उसके ऋणसे उद्धार पाये बिना देवलोकको नहीं चल सकूँगा।*

धर्म बोले—राजन् ! तुम्हारे इस भावी संकटको जानकर मैंने ही मायासे अपनेको चाण्डालके रूपमें प्रकट किया तथा चाण्डालत्वका प्रदर्शन किया था।

इन्द्रने कहा—हरिश्चन्द्र ! पृथ्वीके समस्त मनुष्य जिस परमधामके लिये प्रार्थना करते हैं, केवल पुण्यवान् मनुष्योंको प्राप्त होनेवाले उस धामको चलो।

हरिश्चन्द्र बोले—देवराज! आपको नमस्कार है। मेरा यह वचन सुनिये; आप मुझपर प्रसन्न हैं, अतएव मैं विनीतभावसे आपके सम्मुख कुछ निवेदन करता हूँ। अयोध्याके सब मनुष्य मेरे विरह-शोकमें मग्न हैं। आज उन्हें छोड़कर मैं दिव्यलोकको कैसे जाऊँगा? ब्राह्मणकी हत्या, गुरुकी हत्या, गौका वध और स्त्रीका वध—इन सबके समान ही भक्तोंका त्याग करनेमें भी महान् पाप बताया गया है। जो दोषरहित एवं त्यागनेके अयोग्य भक्त पुरुषको त्याग देता है, उसे इहलोक या परलोकमें कहीं भी सुखकी प्राप्ति नहीं दिखायी देती; इसलिये इन्द्र! आप स्वर्गको लौट जाइये। सुरेश्वर! यदि अयोध्यावासी पुरुष मेरे साथ ही स्वर्ग चल सकें तब तो मैं भी चलूँगा; अन्यथा उन्होंके साथ नरकमें भी जाना मुझे स्वीकार है।

इन्द्रने कहा—राजन्! उन सब लोगोंके पृथक्-पृथक् नाना प्रकारके बहुत-से पुण्य और पाप हैं। फिर तुम स्वर्गको सबका भोग्य बनाकर वहाँ कैसे चल सकोगे ?

हरिश्चन्द्र बोले—इन्द्र! राजा अपने कुटुम्बियोंके ही प्रभावसे राज्य भोगता है। प्रजावर्ग भी राजाका कुटुम्बी ही है। उन्हींके सहयोगसे राजा बड़े बड़े यज्ञ करता, पोखरे खुदवाता और बगीचे आदि लगवाता है। वह सब कुछ मैंने अयोध्यावासियोंके प्रभावसे किया है, अतः स्वर्गके लोभमें पड़कर मैं अपने उपकारियोंका त्याग नहीं कर सकता। देवेश! यदि मैंने कुछ भी पुण्य किया हो, दान, यज्ञ अथवा जपका अनुष्ठान मुझसे हुआ हो, उन सबका फल उन सबके साथ ही मुझे मिले। उसमें


* देवराजाननुज्ञातः स्वामिना ऋणेन वै। अगत्वा निष्कृतिं तस्य नारोक्ष्येऽहं सुरालयम् ॥ (देवी० ८। २४५)

२८ * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *

उनका समान अधिकार हो।*

'ऐसा ही होगा' यों कहकर त्रिभुवनपति इन्द्र, धर्म और गाधिनन्दन विश्वामित्र मन ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। लोगोंपर अनुग्रह रखनेवाले देवेन्द्रने स्वर्गलोकसे भूतलतक करोड़ों विमानोंका ताँता बाँध दिया। फिर चारों वर्णों और आश्रमोंसे युक्त अयोध्या नगरमें प्रवेश करके राजा हरिश्चन्द्रके समीप ही देवराज इन्द्रने कहा—'प्रजाजनो! तुम सब लोग शीघ्र आओ। धर्मके प्रसादसे तुम सब लोगोंको अत्यन्त दुर्लभ स्वर्गलोक प्राप्त हुआ है।'

इन्द्रकी यह बात सुनकर महाराज हरिश्चन्द्रकी प्रसन्नताके लिये महातपस्वी विश्वामित्रने राजकुमार रोहिताश्वको परम रमणीय अयोध्यापुरीमें ला वहाँ राज्य-सिंहासनपर अभिषिक्त कर दिया। देवताओं, मुनियों और सिद्धोंके साथ रोहिताश्वका राज्याभिषेक करके राजासहित सभी बन्धु-बान्धव बहुत प्रसन्न हुए। उसके बाद वहाँके सब लोग अपने पुत्र, भृत्य और स्त्रियोंसहित स्वर्गलोकको चले। वे पग-पगपर एक विमानसे दूसरे विमानपर जा पहुँचते थे। विमानोंके सहित यह अनुपम ऐश्वर्य पाकर महाराज हरिश्चन्द्र बहुत प्रसन्न हुए। स्वर्गमें नगरके आकारवाले सुन्दर विमानोंमें, जो परकोटोंसे सुशोभित था, महाराज हरिश्चन्द्र विराजमान हुए। उनकी यह समृद्धि देखकर सब शास्त्रोंका तत्त्व जाननेवाले दैत्याचार्य महाभाग शुक्रने इस प्रकार उनका यशोगान किया—'अहो! क्षमाका कैसा माहात्म्य है। दानका कितना महान् फल है, जिससे हरिश्चन्द्र अमरावतीपुरीमें आये और इन्द्रपदको प्राप्त हुए।'

पक्षीगण कहते हैं—जैमिनिजी! राजा हरिश्चन्द्रका यह सारा चरित्र मैंने आपसे वर्णन किया। दुःखमें पड़ा हुआ जो मनुष्य इसका श्रवण करता है, वह महान् सुख पाता है। इसके श्रवणसे पुत्रार्थीको पुत्र, सुखार्थीको सुख, स्त्रीकी इच्छा रखनेवालेको स्त्री और राज्यकी कामनावालेको राज्यकी प्राप्ति होती है। उसको संग्राममें विजय होती है और वह कभी नरकमें नहीं पड़ता।


* हरिश्चन्द्र उवाच
देवराज नमस्तुभ्यं वाक्यं चैतन्निबोध मे। प्रसादसुमुखं यत् त्वां ब्रवीमि प्रणयान्वितः॥
मच्छोकशमनसः कोसलानगरे जनाः। तिष्ठन्ति तानपोत्सृज्य कथं यास्याम्यहं दिवम्॥
ब्रह्महत्या गुरोर्घातो गोवधः स्त्रीवधस्तथा। तुल्यमेभिर्महापापं भक्तत्यागोऽप्युदाहृतम्॥
भजतो भक्तमल्पाभ्यामहृष्टं त्यजतः सुखम्। नेह नामुत्र पश्यामि तस्माच्छक्र दिवं व्रज॥
यदि ते सहिताः स्वर्गं मया यान्ति सुरेश्वर। ततोऽहमपि यास्यामि नरकं वापि तैः सह॥
इन्द्र उवाच
बहूनि पुण्यपापानि तेषां भिन्नानि वै पृथक्। कथं सहैकभोग्यं त्वं भूयः स्वर्गमवाप्स्यसि॥
हरिश्चन्द्र उवाच
शक्र भुङ्क्ते नृपो राज्यं प्रभावेण कुटुम्बिनाम्। कश्चित् करोति यन्महायज्ञैः कर्म शौचं करोति च॥
तन्न तेषां प्रभावेण मया सर्वमनुष्ठितम्। उपकर्तॄन् न सन्त्यक्ष्ये तानहं स्वर्गलिप्सया॥
तस्माद् यन्मम देवेश किञ्चिदस्ति सुचेष्टितम्। दत्तमिष्टमथो जप्तं सामान्यं तैस्तदस्तु नः॥
(अ० ८। २४८—२५६)

२. जड़-सुमति-पिता-संवाद व कर्मविपाक

  • पिता-पुत्र-संवादका आरम्भ, जीवकी मृत्यु तथा नरक-गतिका वर्णन * २९

पिता-पुत्र-संवादका आरम्भ, जीवकी मृत्यु तथा नरक-गतिका वर्णन

जैमिनिने पूछा—श्रेष्ठ पक्षियो! प्राणियोंकी उत्पत्ति और लय कहाँ होते हैं ? इस विषयमें मुझे सन्देह है। मेरे प्रश्नके अनुसार आपलोग इसका समाधान करें। जीव कैसे जन्म लेता है? कैसे मरता है? और किस प्रकार गर्भमें पीड़ा सहकर माताके उदरमें निवास करता है? फिर गर्भसे बाहर निकलनेपर वह किस प्रकार बुद्धिको प्राप्त होता है? और मृत्युकालमें किस तरह चैतन्यस्वरूपके द्वारा शरीरसे विलग होता है। सभी प्राणी मृत्युके पश्चात् पुण्य और पाप दोनोंका फल भोगते हैं; किन्तु वे पुण्य और पाप किस प्रकार अपना फल देते हैं? ये सारी बातें मुझे बताइये, जिससे मेरा सब सन्देह दूर हो जाय।

पक्षी बोले—महर्षे ! आपने हमलोगोंपर बहुत बड़े प्रश्नका भार रख दिया। इसकी कहीं तुलना नहीं है। महाभाग! इस विषयमें एक प्राचीन वृत्तान्त सुनिये। पूर्वकालमें एक परम बुद्धिमान् भृगुवंशी ब्राह्मण थे। उनके सुमति नामका एक पुत्र था। वह बड़ा ही शान्त और जड़रूपमें रहनेवाला था। उपनयन संस्कार हो जानेके बाद उस बालकसे उसके पिताने कहा—‘सुमते! तुम सभी वेदोंको क्रमशः आद्योपान्त पढ़ो, गुरुकी सेवामें लगे रहो और भिक्षाके अन्नका भोजन किया करो। इस प्रकार ब्रह्मचर्यकी अवधि पूरी करके गृहस्थाश्रममें प्रवेश करो और वहाँ उत्तम-उत्तम यज्ञोंका अनुष्ठान करके अपने मनके अनुरूप सन्तान उत्पन्न करो। तदनन्तर वनकी शरण लो और वानप्रस्थके नियमोंका पालन करनेके पश्चात् परिग्रहरहित, सर्वस्वत्यागी संन्यासी हो जाओ। ऐसा करनेसे तुम्हें उस ब्रह्मकी प्राप्ति होगी, जहाँ जाकर तुम शोकसे मुक्त हो जाओगे।'

इस प्रकार अनेकों बार कहनेपर भी सुमति जड़ होनेके कारण कुछ भी नहीं बोलता था। पिता भी स्नेहवश बारंबार अनेक प्रकारसे ये बातें उसके सामने रखते थे। उन्होंने पुत्रप्रेमके कारण मीठी वाणीमें अनेक बार उसे लोभ दिखाया। इस प्रकार उनके बार-बार कहनेपर एक दिन सुमतिने हँसकर कहा—'पिताजी! आज आप जो उपदेश दे रहे हैं, उसका मैंने बहुत बार अभ्यास किया है। इसी प्रकार दूसरे-दूसरे शास्त्रों और भौति-भौतिकी शिल्पकलाओंका भी सेवन किया है। इस समय मुझे अपने दस हजारसे भी अधिक जन्म स्मरण हो आये हैं। खेद, सन्तोष, क्षय, वृद्धि और उदयका भी मैंने बहुत अनुभव किया है। शत्रु, मित्र और पत्नीके संयोग-वियोग भी मुझे देखनेको मिले हैं। अनेक प्रकारके माता-पिताके भी दर्शन हुए हैं। मैंने हजारों बार सुख और दुःख भोगे हैं। कितनी ही स्त्रियोंके विष्ठा और मूत्रसे भरे हुए गर्भमें निवास किया है। सहस्रों

३० • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण •

प्रकारके रोगोंकी भयानक पीड़ाएँ सहन की हैं। गर्भावस्थामें मैंने जो अनेकों प्रकारके दुःख भोगे हैं, बचपन, जवानी और बुढ़ापेमें भी जो क्लेश सहन किये हैं, वे सब मुझे याद आ रहे हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंकी योनियोंमें, फिर पशु, मृग, कीट और पक्षियोंकी योनियोंमें तथा राजसेवकों एवं युद्धमें पराक्रम दिखानेवाले राजाओंके घरोंमें भी मेरे कई बार जन्म हो चुके हैं। इसी तरह अबकी बार आपके घरमें भी मैंने जन्म लिया है। मैं बहुत बार मनुष्योंका भृत्य, दास, स्वामी, ईश्वर और दरिद्र रह चुका हूँ। दूसरोंने मुझे और मैंने दूसरोंको अनेक बार दान दिये हैं। पिता, माता, सुहृद्, भाई और स्त्री इत्यादिके कारण कई बार संतुष्ट हुआ हूँ और कई बार दीन हो-होकर रोते हुए मुझे आँसुओंसे मुँह धोना पड़ा है। पिताजी! यों ही इस संसार-चक्रमें भटकते हुए मैंने अब वह ज्ञान प्राप्त किया है, जो मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला है। उस ज्ञानको प्राप्त कर लेनेपर अब यह ऋक्, यजु और सामवेदोक्त समस्त क्रिया कलाप गुणशून्य दिखायी देनेके कारण मुझे अच्छा नहीं लगता। अतः जब ज्ञान प्राप्त हो गया तब वेदोंसे मुझे क्या प्रयोजन है। अब तो मैं गुरु-विज्ञानसे परितृप्त, निरीह एवं सदात्मा हूँ। अतः छः प्रकारके भावविकार (जन्म, सत्ता, वृद्धि, परिणाम, क्षय और नाश), दुःख, सुख, हर्ष, राग तथा सम्पूर्ण गुणोंसे वर्जित उस परमपदरूप ब्रह्मको प्राप्त होऊँगा। पिताजी! जो राग, हर्ष, भय, उद्वेग, क्रोध, अमर्ष और वृद्धावस्थासे व्याप्त है तथा कुत्ते, मृग आदिकी योनिमें बाँधनेवाले सैकड़ों बन्धनोंसे युक्त है, उस दुःखकी परम्पराका परित्याग करके अब मैं चला जाऊँगा।'

पुत्रकी यह बात सुनकर महाभाग पिताका हृदय प्रसन्नतासे भर गया। उन्होंने हर्ष और विस्मयसे गद्गदवाणीमें अपने पुत्रसे कहा— 'बेटा! तुम यह क्या कहते हो? तुम्हें कहाँसे ज्ञान प्राप्त हो गया? पहले तुममें जड़ता क्यों थी और इस समय ज्ञान कहाँसे जग उठा? क्या यह मुनियों अथवा देवताओंके दिये हुए शापका विकार था, जिससे पहले तुम्हारा ज्ञान छिप गया था और इस समय पुनः प्रकट हो गया? मैं यह सारा रहस्य सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है। बेटा! तुमपर पहले जो कुछ बीत चुका है, वह सब मुझे बताओ।'

पुत्रने कहा—पिताजी! मेरा जो यह सुख और दुःख देनेवाला पूर्व वृत्तान्त है, उसे सुनिये। इस जन्मके पहले पूर्वजन्ममें मैं जो कुछ था, वह सब बताता हूँ। पूर्वकालमें मैं परमात्माके ध्यानमें मन लगानेवाला एक ब्राह्मण था। आत्मविद्याके विचारमें मैं पराकाष्ठाको पहुँचा हुआ था। मैं सदा योगसाधनमें संलग्न रहता था। निरन्तर अभ्यासमें लगने, सत्पुरुषोंका सङ्ग करने, अपने स्वभावसे ही विचारपरायण होने, तत्त्वमसि आदि महावाक्योंके विचारने और तत्पदार्थके शोधन करने आदिके कारण उस परमात्मतत्त्वमें ही मेरी परम प्रीति हो गयी। फिर मैं शिष्योंके सन्देहका निवारण करनेवाला आचार्य बन गया। फिर बहुत समयके पश्चात् मैं एकान्तसेवी हो गया; किन्तु दैवात् अज्ञानसे सद्भावका नाश हो जानेके कारण प्रमादमें पड़कर मेरी मृत्यु हो गयी। तथापि मृत्युकालसे लेकर अबतक मेरी स्मरणशक्तिका लोप नहीं हुआ। मेरे जन्मोंके जितने वर्ष बीत गये हैं, उन सबकी स्मृति हो आयी है। पिताजी! उस पूर्वजन्मके अभ्याससे ही जितेन्द्रिय होकर अब फिर मैं वैसा ही यत्न करूँगा, जिससे भविष्यमें फिर मेरा जन्म न हो। मैंने जो दूसरोंको ज्ञान दिया था, उसीका यह फल है कि मुझे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण हो रहा है। केवल त्रयीधर्म (कर्मकाण्ड) का सहारा लेनेवाले मनुष्योंको इसकी प्राप्ति नहीं होती, अतः मैं इस प्रथम आश्रमसे ही संन्यास-धर्मका आश्रय ले एकान्तसेवी हो आत्माके