संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना * | १९१ ---|---
उसका क्षय होता है और न परिणाम। पृथ्वी आदि भूतसमुदायसे न तो वह काटा जाता है, न भीगकर गलता है, न जलता है और न सूखता ही है। शब्द आदि विषय भी उसको लुभा नहीं सकते। उसके लिये शब्द आदि विषय हैं ही नहीं। न तो वह उनका भोक्ता है और न उनसे उसका संयोग होता है। जैसे अन्य खोटे द्रव्योंसे मिला और खण्ड-खण्ड हुआ सुवर्ण जब आगमें तपाया जाता है, तब उसका दोष जल जाता है और वह शुद्ध होकर अपने दूसरे टुकड़ोंसे मिलकर एक हो जाता है, उसी प्रकार बलशील योगी जब योगाग्निसे तपता है, तब अन्तःकरणके समस्त दोष जल जानेके कारण ब्रह्मके साथ एकताको प्राप्त हो जाता है। फिर वह किसीसे पृथक् नहीं रहता। जैसे आगमें डाली हुई आग उसमें मिलकर एक हो जाती है, उसका वही नाम और वही स्वरूप हो जाता है, फिर उसको विशेष रूपसे पृथक् नहीं किया जा सकता, उसी तरह जिसके पाप दग्ध हो गये हैं, वह योगी परब्रह्मके साथ एकताको प्राप्त होनेपर फिर कभी उनसे पृथक् नहीं होता। जैसे जलमें डाला हुआ जल उसके साथ मिलकर एक हो जाता है, उसी प्रकार योगीका आत्मा परमात्मामें मिलकर तदाकार हो जाता है।
योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना
अलर्क बोले— भगवन्! अब मैं योगीके आचार-व्यवहारका यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ। वह किस प्रकार ब्रह्मके मार्गका अनुसरण करके कभी क्लेशमें नहीं पड़ता?
दत्तात्रेयजीने कहा— राजन्! ये जो मान और अपमान हैं, ये साधारण मनुष्योंको प्रसन्नता और उद्वेग देनेवाले होते हैं। उन्हें मानसे प्रसन्नता और अपमानसे उद्वेग होता है; किन्तु योगी उन दोनोंको ही ठीक उलटे अर्थमें ग्रहण करता है। अतः वे उसकी सिद्धिमें सहायक होते हैं। योगके लिये मान और अपमानको विष एवं अमृतके रूपमें बताया गया है। इनमें अपमान तो अमृत है और मान भयंकर विष। योगी मार्गको भलीभाँति देखकर पैर रखे। वस्त्रसे छानकर जल पीये, सत्य वचन बोले और बुद्धिसे विचार करके जो ठीक जान पड़े, उसीका चिन्तन करे।* योगवेत्ता पुरुष आतिथ्य, श्राद्ध, यज्ञ, देवयात्रा तथा उत्सवोंमें न जाय। कार्यकी सिद्धिके लिये किसी बड़े आदमीके यहाँ भी कभी न जाय। जब गृहस्थके यहाँ रसोई घरसे धुआँ न निकलता हो, आग बुझ गयी हो और घरके सब लोग खा-पी चुके हों, उस समय योगी भिक्षाके लिये जाय; परन्तु प्रतिदिन एक ही घरपर न जाय। योगमें प्रवृत्त रहनेवाला पुरुष सत्पुरुषोंके मार्गको कलङ्कित न करते हुए प्रायः ऐसा व्यवहार करे, जिससे लोग उसका सम्मान न करें, तिरस्कार ही करें। वह गृहस्थोंके यहाँसे अथवा घूमते-फिरते रहनेवाले लोगोंके घरोंसे भिक्षा ग्रहण करे; इनमें भी पहली अर्थात् गृहस्थके घरकी भिक्षा ही सर्वश्रेष्ठ एवं मुख्य है। जो गृहस्थ विनीत, श्रद्धालु, जितेन्द्रिय, श्रोत्रिय एवं उदार हृदयवाले हों, उन्हींके यहाँ योगीको सदा भिक्षाके लिये जाना चाहिये। इनके बाद जो दुष्ट और पतित न हों, ऐसे अन्य लोगोंके
* मानापमानौ बालेतौ प्रीत्युद्वेगकरौ नृणाम्। तावेव विपरीतार्थौ योगिनः सिद्धिकारकौ॥
मानापमानौ यावेतौ तयोरेतद्विचिन्तयेत्। अपमानोऽमृतं तत्र मानस्तु विषमं विषम्॥
चक्षुःपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। सत्यपूतां वदेद्वाणीं बुद्धिपूतं च चिन्तयेत्॥ (४१ । २—४)
१९२ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •
यहाँ भी वह भिक्षाके लिये जा सकता है; परन्तु छोटे वर्णके लोगोंके यहाँ भिक्षा माँगना निकृष्ट वृत्ति मानी गयी है। योगीके लिये भिक्षाप्राप्त अन्न, जौकी लपसी, छाछ, दूध, जौकी खिचड़ी, फल, मूल, कँगनी, कण, तिलका चूर्ण और सत्तू—ये आहार उत्तम और सिद्धिदायक हैं। अतः योगी इन्हें भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्तसे भोजनके काममें ले। पहले एक बार जलसे आचमन करके मौन हो क्रमशः पाँच ग्रासोंकी प्राणरूप अग्निमें आहुति दे। 'प्राणाय स्वाहा' कहकर पहला ग्रास मुँहमें डाले। यही प्रथम आहुति मानी गयी है। इसी प्रकार 'अपानय स्वाहा' से दूसरी, 'समानाय स्वाहा' से तीसरी, 'उदानाय स्वाहा' से चौथी और 'व्यानाय स्वाहा' से पाँचवीं आहुति दे। फिर प्राणायामके द्वारा इन्हें पृथक् करके शेष अन्न इच्छानुसार भोजन करे। भोजनके अन्तमें फिर एक बार आचमन करे। तत्पश्चात् हाथ-मुँह धोकर हृदयका स्पर्श करे। चोरी न करना, ब्रह्मचर्यका पालन, त्याग, लोभका अभाव और अहिंसा—ये भिक्षुओंके पाँच व्रत हैं। क्रोधका अभाव, गुरुकी सेवा, पवित्रता, हल्का भोजन और प्रतिदिन स्वाध्याय—ये पाँच उनके नियम बताये गये हैं।*
जो योगी 'यह जानने योग्य है, वह जानने योग्य है' इस प्रकार भिन्न-भिन्न विषयोंकी जानकारीके लिये लालायित-सा होकर इधर-उधर बिचरता है, वह हजारों कल्पोंमें भी ज्ञातव्य वस्तुको नहीं पा सकता। आसक्तिका त्याग करके, क्रोधको जीतकर, स्वल्पाहारी और जितेन्द्रिय हो, बुद्धिसे इन्द्रियद्वारोंको रोककर मनको ध्यानमें लगावे। योगयुक्त रहनेवाला योगी सदा एकान्त स्थानोंमें, गुफाओं और वनोंमें भलीभाँति ध्यान करे। वाग्दण्ड, कर्मदण्ड और मनोदण्ड—ये तीन दण्ड जिसके अधीन हों, वही महायति त्रिदण्डी है। राजन्! जिसकी दृष्टिमें सत्-असत् तथा गुण-अवगुणरूप यह समस्त जगत् आत्मस्वरूप हो गया है, उस योगीके लिये कौन प्रिय है और कौन अप्रिय। जिसकी बुद्धि शुद्ध है, जो मिट्टीके ढेले और सुवर्णको समान समझता है, सब प्राणियोंके प्रति जिसका समान भाव है, वह एकाग्रचित्त योगी उस सनातन अविनाशी परम पदको प्राप्त होकर फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। वेदोंसे सम्पूर्ण यज्ञकर्म श्रेष्ठ हैं, यज्ञोंसे जप, जपसे ज्ञानमार्ग और उससे आसक्ति एवं रागसे रहित ध्यान श्रेष्ठ है। ऐसे ध्यानके प्राप्त हो जानेपर सनातन ब्रह्मकी उपलब्धि होती है। जो एकाग्रचित्त, ब्रह्मपरायण, प्रमादरहित, पवित्र, एकान्तप्रेमी और जितेन्द्रिय होता है, वही महात्मा इस योगको पाता है और फिर अपने उस योगसे ही वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।†
* अस्तेयं ब्रह्मचर्यं च त्यागोऽलोभस्तथैव च। व्रतानि पञ्च भिक्षूणामहिंसापरमाणि वै॥
अक्रोधो गुरुशुश्रूषा शौचमाहारलाघवम्। नित्यस्वाध्याय इत्येते नियमाः पञ्च कीर्त्तिताः॥
(४१। १६-१७)
† त्यक्तसङ्गो जितक्रोधो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः। विधाय बुद्ध्या द्वाराणि मनो ध्याने निवेशयेत्॥
शून्येष्वेवावकाशेषु गुहासु च वनेषु च। नित्ययुक्तः सदा योगी ध्यानं सम्युगुपक्रमेत्॥
वाग्दण्डः कर्मदण्डश्च मनोदण्डश्च ते त्रयः। यस्यैते नियता दण्डाः स त्रिदण्डी महायतिः॥
सर्वमात्ममयं यस्य सदसज्जगदीदृशम्। गुणगुण्यमयं तस्य कः प्रियः को नृपाप्रियः॥
विशुद्धबुद्धिः समलोष्टकाञ्चनः समन्तभूतेषु समः समाहितः।
स्थानं परं शाश्वतमव्ययं च परं हि गत्वा न पुनः प्रजायते॥
वेदाच्छ्रेष्ठाः सर्वयज्ञक्रियाश्च यज्ञाज्जप्यं ज्ञानमार्गाश्च ध्यानात्।
ज्ञानाद्ध्यानं सङ्गरागव्यपेतं तस्मिन् प्राप्ते शाश्वतस्योपलब्धिः॥
समाहितो ब्रह्मपरोऽप्रमादी शुचिस्तथैकान्तगतिर्यतेन्द्रियः।
समाप्नुयाद् योगमिमं महात्मा विमुक्तिमाप्नोति ततः स्वयोगतः॥ (४१। २०-२६)
- योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना * ११३
दत्तात्रेयजी कहते हैं—जो योगी इस प्रकार भलीभाँति योगचर्यामें स्थित होते हैं, उन्हें सैकड़ों जन्मोंमें भी अपने पथसे विचलित नहीं किया जा सकता। जिनके सब ओर चरण, मस्तक और कण्ठ हैं, जो इस विश्वके स्वामी तथा विश्वको उत्पन्न करनेवाले हैं, उन विश्वरूपी परमात्माका प्रत्यक्ष दर्शन करके उनकी प्राप्तिके लिये परम पुण्यमय 'ॐ' इस एकाक्षर मन्त्रका जप करे; उसीका अध्ययन करे। अब उसके स्वरूपका वर्णन सुनो। अकार, उकार और मकार—ये जो तीन अक्षर हैं, ये ही तीन मात्राएँ हैं। ये क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस हैं। इनके सिवा एक अर्द्धमात्रा भी है जो अनुस्वार या बिन्दुके रूपमें इन सबके ऊपर स्थित है। वह अर्द्धमात्रा निर्गुण है। योगी पुरुषोंको ही उसका ज्ञान हो पाता है। उसका उच्चारण गान्धार स्वरसे होता है, इसलिये उसे 'गान्धारी' भी कहते हैं। उसका स्पर्श चींटीकी गतिके समान होता है। प्रयोग करनेपर वह मस्तक-स्थानमें दृष्टिगोचर होती है। जैसे ॐकार उच्चारण किया जानेपर मस्तकके प्रति गमन करता है, उसी प्रकार ॐकारमय योगी अक्षरब्रह्ममें मिलकर अक्षररूप हो जाता है। प्रणव (ॐकार) धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म वेधनेयोग्य उत्तम लक्ष्य है। उस लक्ष्यको सावधानीके साथ वेधना चाहिये और बाणकी ही भाँति लक्ष्यमें प्रवेश करके तन्मय हो जाना चाहिये। यह ॐकार ही तीनों वेद, तीनों लोक, तीनों अग्नि, ब्रह्मा विष्णु तथा महादेव एवं ऋक्-साम और यजुर्वेद है। इस ॐकारमें वस्तुतः साढ़े तीन मात्राएँ जाननी चाहिये। उनके चिन्तनमें लगा हुआ योगी उन्हींमें लयको प्राप्त होता है। अकार भूर्लोक, उकार भुवर्लोक और व्यञ्जनरूप मकार स्वर्लोक कहलाता है। पहली मात्रा व्यक्त, दूसरी अव्यक्त, तीसरी चिच्छक्ति तथा चौथी अर्द्धमात्रा परमपद कहलाती है। इसी क्रमसे इन मात्राओंको योगकी भूमि समझना चाहिये। ॐकारके उच्चारणसे सम्पूर्ण सत् और असत्का ग्रहण हो जाता है। पहली मात्रा ह्रस्व, दूसरी दीर्घ और तीसरी प्लुत है, किन्तु अर्द्धमात्रा वाणीका विषय नहीं है। इस प्रकार यह ॐकार नामक अक्षर परब्रह्मस्वरूप है। जो मनुष्य इसे भलीभाँति जानता अथवा इसका ध्यान करता है, वह संसार-चक्रका त्याग करके त्रिविध बन्धनोंसे मुक्त हो परब्रह्म परमात्मामें लीन हो जाता है।* जिसका
* तन्प्राप्तये महत् पुण्यामोमित्येकाक्षरं जपेत्। तदेवाध्ययनं तस्य स्वरूपं शृण्वतः परम्॥
अकारश्च तथोकारो मकारश्चाक्षरत्रयम्। एता एव त्रयो मात्राः सात्त्वराजसतामसाः॥
निर्गुणा योगिगम्यान्त्या चार्द्धमात्रोर्ध्वसंस्थिता।
गान्धारीति च विज्ञेया गान्धारस्वरसंश्रया। पिपीलिकागतिस्पर्शा प्रयुक्ता मूर्ध्नि लक्ष्यते॥
यथा प्रयुक्त ओङ्कारः प्रतियातीति मूर्द्धनि। तथोङ्कारमयी योगी त्वक्षरे त्वक्षरो भवेत्॥
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुत्तमम्। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥
ओमितिह्येतत् त्रयो वेदास्त्रयो लोकास्त्रयोऽग्नयः। विष्णुर्ब्रह्मा हरश्चैव ऋक्सामानि यजूंषि च॥
मात्राः सार्द्धाश्च तिस्रश्च विज्ञेयाः परमार्थतः। तत्र युक्तस्तु यो योगी स तल्लयमवाप्नुयात्॥
अकारस्त्वथ भूर्लोक उकारश्चोच्यते भुवः। सव्यञ्जने मकारश्च स्वर्लोकः परिकल्प्यते।
व्यक्ता तु प्रथमा मात्रा द्वितीयाव्यक्तसंज्ञिता। मात्रा तृतीया चिच्छक्तिरर्द्धमात्रा परं पदम्॥
अनेनैव क्रमेणैता विज्ञेया योगभूमयः। ओमित्युच्चारणात् सर्वं गृहीतं सदसद्द्वयम्॥
ह्रस्वा तु प्रथमा मात्रा द्वितीया दीर्घसंयुक्ता। तृतीया च प्लुता ज्ञेया वचसः सा न गोचरा॥
इत्येतदक्षरं ब्रह्म परमोङ्कारसंज्ञितम्। यस्तु वेद नरः सम्यक् तथा ध्यायति वा पुनः॥
संसारचक्रमुत्सृज्य त्यक्तत्रिविधबन्धनः। प्राप्नोति ब्रह्मणि लयं परमे परमात्मनि॥
(४२ ३—१५)
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- संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
कर्मबन्धन क्षीण नहीं हुआ है, वह अरिष्टसे अपनी मृत्यु जानकर प्राणत्यागके समय भी योगका चिन्तन करे। इससे वह दूसरे जन्ममें पुनः योगी होता है। इसलिये जिसका योग सिद्ध नहीं हुआ है, वह तथा जिसका योग सिद्ध हो चुका है, वह भी सदा मृत्युसूचक अरिष्टोंको जाने, जिससे मृत्युके समय उसे कष्ट न उठाना पड़े।
महाराज! अब अरिष्टोंका वर्णन सुनो। मैं उन अरिष्टोंको बतलाता हूँ, जिनके देखनेसे योगवेत्ता पुरुष अपनी मृत्युको जान लेता है। जो मनुष्य देवमार्ग (आकाशगङ्गा), ध्रुव, शुक्र, चन्द्रमाकी छाया और अरुन्धतीको नहीं देख पाता, वह एक वर्षके बाद जीवित नहीं रहता। जो सूर्यके मण्डलको किरणोंसे रहित और अग्निको किरणमालाओंसे मण्डित देखता है, वह मनुष्य ग्यारह महीनेसे अधिक नहीं जी सकता। जो स्वप्नमें वमन, मूत्र और विष्ठाके भीतर सोने और चाँदीका प्रत्यक्ष दर्शन करता है, उसकी आयु दस महीनेतककी ही है। जो प्रेत, पिशाच आदि, गन्धर्वनगर तथा सुवर्णके वृक्ष देखने लगता है, वह नौ महीनेतक जीवित रहता है। जो अकस्मात् स्थूल शरीरसे दुर्बल शरीरका हो जाता है या दुर्बलसे स्थूल हो जाता है तथा जिसकी प्रकृति सहसा बदल जाती है, उसका जीवन आठ महीनेतक ही रहता है। धूल या कीचड़में पैर रखनेपर जिसकी एड़ी या पादाग्रभागका चिह्न खण्डित दिखायी दे, वह सात मासतक जीवित रहता है। यदि गीध, कबूतर, डाभ्र, कौआ, मांसखोर पक्षी या नीले रंगका पक्षी मस्तकपर बैठ जाय तो वह छः मास आयु शेष रहनेकी सूचना देता है। यदि कौए आकर चोंच मारें या धूलकी वर्षासे आहत होना पड़े तथा अपनी छाया और तरहकी दिखायी दे तो वह चार पाँच महीने ही जीवित रहता है। यदि बिना बादलके ही दक्षिण दिशाके आकाशमें बिजली चमकती दिखायी दे और रातमें इन्द्रधनुषका दर्शन हो तो उस मनुष्यका जीवन दो तीन महीनेका ही है। जो घी, तेल, दर्पण अथवा जलमें अपनी परछाईं न देख सके अथवा देखे भी तो बेसिरकी ही परछाईं दिखायी दे तो वह एक महीनेसे अधिक नहीं जी सकता। राजन्! जिस योगीके शरीरसे बकरे अथवा मुर्देकी-सी दुर्गन्ध आती हो, उसका जीवन पंद्रह दिनोंका ही समझना चाहिये। स्नान करते ही जिसकी छाती और पैर सूख जायें तथा जल पीनेपर भी कण्ठ सूखने लगे, वह केवल दस दिनतक ही जीवित रह सकता है। जिसके भीतरकी वायु पृथक् होकर मर्मस्थानोंको छेदती-सी जान पड़े तथा जलके स्पर्शसे भी जिसके शरीरमें रोमाञ्च न हो, उसकी मृत्यु पास खड़ी है। जो स्वप्नमें भालू और वानरकी सवारीपर बैठकर गीत गाता हुआ दक्षिण दिशामें जाय, उसकी मृत्यु समयकी प्रतीक्षा नहीं करती। स्वप्नमें ही लाल और काले कपड़े पहने हुए कोई स्त्री हँसती-गाती हुई जिसे दक्षिण दिशाकी ओर ले जाय, वह भी जीवित नहीं रहता। यदि स्वप्नमें नंगा एवं मूँड़ मुँड़ाया हुआ कोई महाबली मनुष्य हँसता और उछलता कूदता दिखायी दे तो समझना चाहिये कि मौत आ गयी। जो स्वप्नावस्थामें अपनेको पैरसे लेकर चोटीतक कीचड़के समुद्रमें डूबा देखता है, वह मनुष्य तत्काल मृत्युको प्राप्त होता है। जो स्वप्नमें केश, अँगार, भस्म, सर्प और बिना पानीकी नदी देखता है, उसकी दसवेंसे लेकर ग्यारहवें दिनतक मृत्यु हो जाती है। स्वप्नमें विकराल, भयंकर और काले रंगके पुरुष हाथोंमें हथियार लिये जिसको पत्थरोंसे मारते हैं, उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है। सूर्योदयके समय जिसके
- योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना * ११५
| सम्मुख और बायें-दायें गीदड़ी रोती हुई जाय, उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है। भोजन कर लेनेपर भी जिसके हृदयमें भूखका कष्ट होता हो तथा जो दाँतोंसे दाँत घिसता रहे, उसकी आयु भी निश्चय ही समाप्त हो चुकी है। जिसको दीपककी गन्धका अनुभव न होता हो, जो रात और दिनमें भी डरता हो तथा दूसरेके नेत्रमें अपनी परछाईं न देखता हो, वह जीवित नहीं रहता। जो आधी रातके समय इन्द्रधनुष और दिनमें तारोंको देख ले, वह आत्मवेत्ता पुरुष अपनी आयु क्षीण हुई समझे। जिसकी नाक टेढ़ी और कान ऊँचे-नीचे हो जाते हैं तथा जिसके बायें नेत्रसे सदा पानी गिरता रहता है, उसकी आयु समाप्त हो चुकी है। यदि मुँह सब ओरसे लाल और जीभ काली पड़ जाय तो बुद्धिमान् पुरुषको अपनी मृत्यु निकट समझनी चाहिये। जो स्वप्नमें ऊँट या गदहेपर बैठकर दक्षिण दिशाकी ओर जाय, उसको तत्काल मृत्यु होनेवाली है—ऐसा जानना चाहिये। जो अपने दोनों कान बंद कर लेनेपर अपनी ही आवाज न सुने तथा जिसके नेत्रोंकी ज्योति नष्ट हो जाय, वह भी जीवित नहीं रह सकता। जो स्वप्नमें किसी गढ्ढेके भीतर गिरे और उससे निकलनेका द्वार बंद हो जाय तथा फिर वह उस गढ्ढेसे न निकल सके तो वहींतक उसका जीवन समझना चाहिये। जिसकी दृष्टि ऊपरकी ओर उठे किन्तु वहाँ ठहर न सके, बार-बार लाल होकर घूमती रहे, मुँह गरम हो और नाभि शीतल हो जाय तो ये लक्षण मनुष्यके शरीर-परिवर्तनकी सूचना देते हैं। जो स्वप्नमें अग्नि या जलके भीतर प्रवेश करके फिर न निकले, उसके जीवनका वही अन्त है। जिसको दुष्ट जीव रातमें और दिनमें भी मारें, वह सात रातके भीतर निश्चय ही मृत्युको प्राप्त हो जाता है। जो अपने निर्मल श्वेत | वस्त्रको भी लाल या काले रंगका देखे, उसकी भी मृत्यु निकट समझनी चाहिये। स्वभावका विपरीत होना और प्रकृतिका बिल्कुल बदल जाना भी मृत्युके निकट होनेकी सूचना देते हैं।<br><br>जिसका काल निकट आ गया है, वह मनुष्य जिनके सामने सदा विनीत रहता था, जो लोग उसके परम पूजनीय थे, उन्हींकी अवहेलना और निन्दा करता है। वह देवताओंकी पूजा नहीं करता। बड़े-बूढ़ों, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है, माता-पिता तथा दामादका सत्कार नहीं करता। इतना ही नहीं, वह योगियों, ज्ञानी विद्वानों तथा अन्य महात्मा पुरुषोंके आदर-सत्कारसे भी मुँह मोड़ लेता है। बुद्धिमान् पुरुषोंको मृत्युके इन लक्षणोंकी जानकारी रखनी चाहिये। राजन्! योगी पुरुषोंको उचित है कि वे सदा यत्नपूर्वक इन अरिष्टोंपर दृष्टि रखें; क्योंकि ये वर्षके अन्तमें तथा दिन-रातके भीतर भी फल देनेवाले होते हैं। राजन्! इनके विशद फलोंको भलीभाँति देखना चाहिये और मन-ही-मन विचार करके उस समयके अनुसार कार्य करना चाहिये। मृत्युकालको जान लेनेपर योगी किसी निर्भय स्थानमें बैठकर योगाभ्यासमें प्रवृत्त हो जाय, जिससे उसका वह समय निष्फल न जाने पावे। अरिष्ट देखकर योगी मृत्युका भय छोड़ दे और उसके स्वभावका विचार करके जितने समयमें वह आनेवाली हो, उतने समयके प्रत्येक भागमें योगी योग-साधनमें लगा रहे। दिनके पूर्वाह्न, मध्याह्न तथा अपराह्नमें अथवा रात्रिके जिस भागमें अरिष्टका दर्शन हो, तभीसे लेकर जबतक मृत्यु न आवे तबतक योगमें लगा रहे। तदनन्तर सारा भय छोड़कर जितात्मा पुरुष उस कालपर विजय प्राप्त करके उसी स्थानपर या और कहीं—जहाँ भी अपना चित्त स्थिर हो सके, योगमें संलग्न हो जाय और तीनों गुणोंको जीतकर परमात्मामें तन्मय हो |
१९६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
चिद्वृत्तिका भी त्याग कर दे। यों करनेसे वह उस इन्द्रियातीत परम निर्वाणस्वरूप ब्रह्मको प्राप्त होता है, जो न तो बुद्धिका विषय है और न वाणी ही जिसका वर्णन कर सकती है। अलर्क! इन सब बातोंका मैंने तुमसे यथार्थ वर्णन किया है; अब तुम जिस प्रकार ब्रह्मको प्राप्त हो सकोगे, वह संक्षेपमें सुनो।
जैसे चन्द्रमाका संयोग पाकर ही चन्द्रकान्तमणि जलकी सृष्टि करती है, उनका संयोग पाये बिना नहीं, यही उपमा योगीके लिये भी है। योगी भी योगयुक्त होकर ही सिद्धि लाभ कर सकता है, अन्यथा नहीं। जैसे सूर्यकी किरणोंका संयोग पाकर ही सूर्यकान्तमणि आग पैदा करती है, अकेली रहकर नहीं, यही उपमा योगोंके लिये भी है। उसे योगका आश्रय कभी नहीं छोड़ना चाहिये। जैसे चींटी, चूहा, नेवला, छिपकली और गौरैया—ये सब घरमें गृहस्वामीकी ही भाँति रहते हैं और घर गिर जानेपर अन्यत्र चल देते हैं, किन्तु घरके गिरनेका दुःख केवल स्वामीको ही होता है, उन सबोंको उसके लिये कुछ भी कष्ट नहीं होता, योगकी सिद्धिके लिये भी यही उपमा है। अर्थात् योगीको अपने गृह, वैभव और शरीर आदिके प्रति तनिक भी ममता नहीं रखनी चाहिये। हरिनके बच्चेके मस्तकपर जब सींग उगने लगता है, तब पहले उसका अग्रभाग तिलके समान दिखायी देता है। फिर वह उस हरिनके साथ ही साथ बढ़ता है। इस दृष्टान्तपर विचार करनेसे योगी सिद्धिको प्राप्त होता है। अर्थात् उसे भी धीरे-धीरे अपनी योगसाधना बढ़ानी चाहिये। जैसे मनुष्य रोगसे पीड़ित होनेपर भी अपनी इन्द्रियोंसे काम लेता ही है, उसी प्रकार योगी बुद्धि आदि परकीय साधनोंसे, जो आत्मासे सर्वथा भिन्न हैं, परम पुरुषार्थका साधन करे।
अलर्ककी मुक्ति एवं पिता-पुत्रके संवादका उपसंहार
**सुमति कहते हैं—**तदनन्तर राजा अलर्कने अत्रिनन्दन दत्तात्रेयजीके चरणोंमें प्रणाम करके अत्यन्त प्रसन्नताके साथ विनीतभावसे कहा—‘ब्रह्मन्! देवताओंने मुझे शत्रुद्वारा पराजित कराकर जो मेरे समक्ष प्राणोंको संशयमें डालनेवाला अत्यन्त उग्र भय उपस्थित कर दिया, इसे मैं अपना परम सौभाग्य मानता हूँ। काशिराजका महान् बल-वैभवसे सम्पन्न पराक्रम मेरा विनाश करनेके लिये यहाँ प्रकट हुआ था; किन्तु उसने मुझे आपके सत्सङ्गका शुभ अवसर प्रदान किया, यह कितने आनन्दकी बात है। सौभाग्यसे ही मेरा सैनिक-बल घट गया, सौभाग्यसे ही मेरे सेवक मारे गये, सौभाग्यसे ही मेरा खजाना खाली हुआ, सौभाग्यसे ही मैं भयको प्राप्त हुआ, सौभाग्यने ही मुझे आपके युगल चरणोंकी स्मृति करायी और सौभाग्यसे ही आपका सारा उपदेश मेरे चित्तमें बैठ गया। ब्रह्मन्! सौभाग्यवश आपके सङ्गसे मुझे ज्ञान प्राप्त हुआ और सौभाग्यसे ही आपने मुझपर कृपा की। जब पुरुषके शुभ दिन आते हैं तब अनर्थ भी अर्थका साधक बन जाता है, जैसे इस समय यह शत्रुजनित आपत्ति भी आपके समागमसे उपकार करनेवाली सिद्ध हुई। भगवन्! भाई सुबाहु तथा काशिराज दोनों ही मेरे उपकारी हैं, जिनके कारण मुझे आपके समीप आनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ। आपके प्रसादरूपी अग्निसे मेरा अज्ञान और पाप जल गया। अब मैं ऐसा यत्न करूँगा, जिससे फिर इस प्रकार दुःखका भागी न बनूँ। आप मेरे ज्ञानदाता महात्मा हैं; अतः आपसे आज्ञा लेकर मैं गार्हस्थ्य-आश्रमका परित्याग करूँगा, जो विपत्तिरूपी वृक्षोंका वन है।’
- अलर्ककी मुक्ति एवं पिता-पुत्रके संवादका उपसंहार * १२७
दत्तात्रेयजी बोले—राजेन्द्र! जाओ, तुम्हारा कल्याण हो। मैंने जैसा तुम्हें बताया है, उसीके अनुसार ममता और अहङ्कारसे रहित हो मोक्षके लिये विचरते रहो।
सुमति कहते हैं—दत्तात्रेयजीके यों कहनेपर राजा अलर्कने उन्हें प्रणाम किया और बड़ी उतावलीके साथ वे उस स्थानपर आये, जहाँ उनके बड़े भाई सुबाहु और काशिराज मौजूद थे। महाबाहु वीरवर काशिराजके निकट पहुँचकर अलर्कने सुबाहुके सामने ही हँसते हुए कहा—
'राज्यकी इच्छा रखनेवाले काशिराज! अब तुम इस बढ़े हुए राज्यको भोगो। अथवा यदि तुम्हारी इच्छा हो तो भाई सुबाहुको ही दे डालो।'
काशिराजने कहा—अलर्क! तुमने युद्धके बिना ही राज्य क्यों छोड़ दिया? यह तो क्षत्रियका धर्म नहीं है और तुम क्षत्रियधर्मके ज्ञाता हो। जब अमात्यवर्ग पराजित हो जाय, तब राजा स्वयं ही मृत्युका भय छोड़कर अपने शत्रुको लक्ष्य करके बाणका संधान करे और उसे जीतकर इच्छानुसार श्रेष्ठ भोगोंका उपभोग करे। साथ ही परम सिद्धिके लिये बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान भी करता रहे।
अलर्क बोले—वीर! तुम्हारा कथन ठीक है, पहले मेरे मनमें भी ऐसे ही विचार उठते थे; किन्तु अब मेरी विपरीत धारणा हो गयी है। इसका कारण सुनो। नरेश्वर! तुम्हारे भयसे अत्यन्त दुःख पाकर मैंने योगीश्वर दत्तात्रेयजीकी शरण ली और उनकी कृपासे अब मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया है। समस्त इन्द्रियोंको जीतकर तथा सब ओरसे आसक्ति हटाकर मनको ब्रह्ममें लगाना और इस प्रकार मनको जीतना ही सबसे बड़ी विजय है; अतः अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं हूँ, तुम भी मेरे शत्रु नहीं हो तथा ये सुबाहु भी मेरे अपकारी नहीं हैं। मैंने इन सब बातोंको अच्छी तरह समझ लिया है। अतः राजन्! अब अपने लिये तुम कोई दूसरा शत्रु ढूँढ़ो।
अलर्कके यों कहनेपर राजा सुबाहु अत्यन्त प्रसन्न होकर उठे और 'धन्य! धन्य!' कहकर अपने भाईका अभिनन्दन करनेके पश्चात् वे काशिराजसे इस प्रकार बोले—'नृपश्रेष्ठ! मैं जिस कार्यके लिये तुम्हारी शरणमें आया था, वह सब पूरा हो गया। अब मैं जाता हूँ। तुम सुखी रहो।'
काशिराजने कहा—सुबाहो! तुम किसलिये आये थे? और तुम्हारा कौन सा कार्य सिद्ध हुआ? यह बताओ। मुझे तुम्हारी बातोंसे बड़ा कौतूहल हो रहा है। तुमने मेरे पास आकर कहा था कि 'मेरे बाप-दादोंका बहुत बड़ा राज्य अलर्कने हड़प लिया है। वह उनसे जीतकर मुझे दे दो।' तब मैंने तुम्हारे भाईपर आक्रमण करके यह राज्य अपने वशमें किया। यह तुम्हें कुलपरम्परासे प्राप्त है, अतः इसका उपभोग करो।
सुबाहु बोले—काशिराज! मैंने जिस उद्देश्यसे यह प्रयत्न किया था और जिसके लिये तुमसे भी महान् उद्योग कराया, वह बतलाता हूँ; सुनो। मेरा यह छोटा भाई तत्त्वज्ञ होकर भी सांसारिक भोगोंमें फँसा हुआ था। मेरे दो बड़े भाई परम
११८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
ज्ञानी हैं। उन दोनोंको तथा मुझे भी हमारी माताने जब बचपनमें दूध पिलाया, उसी समय कानोंमें तत्त्वज्ञान भी भर दिया। मनुष्यमात्रको जिनका ज्ञान होना चाहिये, वे सभी पदार्थ माताने हमारे सामने प्रकाशित कर दिये। किन्तु यह अलर्क उस ज्ञानसे वंचित रह गया था। राजन् ! जैसे एक साथ यात्रा करनेवालोंमेंसे एकको कष्टमें पड़ा देखकर साधु पुरुषोंके हृदयमें दुःख होता है, उसी प्रकार इस अलर्कको गृहस्थ-आश्रमके मोहमें फँसकर कष्ट उठाते हुए देखकर हम तीनों भाइयोंको कष्ट होता था। क्योंकि यह इस शरीरका सम्बन्धी है, और इसके साथ 'भाई' की कल्पना जुड़ी हुई है। तब मैंने सोचा, दुःख पड़नेपर ही इसके मनमें वैराग्यकी भावना जाग्रत् होगी; अतः युद्धोद्योगके लिये तुम्हारा आश्रय लिया। फिर इस दुःखसे इसको वैराग्य हुआ और वैराग्यसे ज्ञानकी प्राप्ति हुई। इस प्रकार जो कार्य मुझे अभीष्ट था, वह पूरा हो गया। अतः तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जाता हूँ। मदालसाके गर्भमें रहकर और उसके स्तनोंका दूध पीकर यह अलर्क दूसरी स्त्रीके पुत्रोंद्वारा ग्रहण किये हुए मार्गपर न जाय, यही विचारकर मैंने तुम्हारा सहारा लिया था। सो सब कार्य पूरा हो गया, अब मैं सिद्धिके लिये जाता हूँ। नरेन्द्र ! जो लोग कष्टमें पड़े हुए अपने स्वजन, बन्धु और सुहृद्की उपेक्षा करते हैं, वे मेरे विचारसे विकलेन्द्रिय हैं, उनकी इन्द्रियाँ—हाथ-पैर आदि बेकार हैं। जो समर्थ सुहृद्, स्वजन और बन्धुके होते हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्षसे वंचित हो कष्ट भोगता है, वहाँ उसके वे सुहृद् आदि ही निन्दाके पात्र होते हैं। राजन् ! तुम्हारे सङ्गसे मैंने यह बहुत बड़ा कार्य सिद्ध कर लिया। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जाऊँगा। साधुश्रेष्ठ ! तुम भी ज्ञानी बनो।
काशिराजने कहा— महात्मन् ! तुमने अलर्कका तो बहुत बड़ा उपकार किया, अब मेरी भलाईमें अपना मन क्यों नहीं लगाते? सत्पुरुषोंका साधु पुरुषोंके साथ जो समागम होता है, वह सदा फल देनेवाला ही होता है, निष्फल नहीं; अतः तुम्हारे सङ्गसे मेरी भी उन्नति होनी चाहिये।
सुबाहु बोले— राजन् ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चार पुरुषार्थ हैं। इनमेंसे धर्म, अर्थ और काम तो तुम्हें प्राप्त हैं। केवल मोक्षसे तुम वंचित हो, अतः वही तुम्हें संक्षेपसे बतलाता हूँ। एकाग्रचित्त होकर सुनो। सुनकर भलीभाँति उसकी आलोचना करो और उसीके अनुसार अपने कल्याणके यत्नमें लग जाओ। राजन् ! 'यह मेरा है और यह मैं हूँ' इस प्रकारकी प्रतीति तुम्हें नहीं करनी चाहिये; क्योंकि आलोचनाका विषय तो बाह्य धर्म ही होता है। धर्मके अभावमें कोई आश्रय नहीं रहता। अहं (मैं) यह संज्ञा किसको है, इस बातका तुम्हें विचार करना चाहिये। बाह्य और आन्तरिक तत्त्वकी आलोचना करनी चाहिये। आधी रातके बाद भी इस तत्त्वका विचार करना चाहिये। अव्यक्तसे लेकर विशेषतक जो विकाररहित, अचेतन व्यक्त और अव्यक्त तत्त्व है, उसे जानना चाहिये और उनका ज्ञाता जो मैं हूँ, वह मैं
- मार्कण्डेय-क्रौष्टुकि-संवादका आरम्भ, प्राकृत सर्गका वर्णन * १९९
कौन हूँ—इसे भी जानना चाहिये। इस 'मैं' को ही जान लेनेपर तुम्हें सबका ज्ञान हो जायगा। अनात्मामें आत्मबुद्धिका होना और जो अपना नहीं है उसे अपना मानना—यही अज्ञान है। भूपाल! वह मैं सर्वत्र व्यापक आत्मा हूँ, तथापि तुम्हारे पूछनेपर लोकव्यवहारकी दृष्टिसे मैंने ये सब बातें बता दी हैं। अब मैं जाता हूँ।
सुमति कहते हैं— काशीनरेशसे यों कहकर परम बुद्धिमान् सुबाहु चले गये। काशिराजने भी अलर्कका सत्कार करके अपने नगरकी राह ली। अलर्कने अपने ज्येष्ठ पुत्रको राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया और स्वयं सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग करके वे आत्मसिद्धिके लिये वनमें चले गये। वहाँ बहुत समयतक वे निर्द्वन्द्व एवं परिग्रहशून्य होकर रहे और अनुपम योगसम्पत्तिको पाकर परम निर्वाणपदको प्राप्त हुए।
पिताजी! आप भी अपनी मुक्तिके लिये इस उत्तम योगका साधन कीजिये। इससे आप उस ब्रह्मको प्राप्त होंगे, जहाँ जानेपर आपको शोक नहीं होगा। अब मैं भी जाऊँगा। यज्ञ और जपसे मुझे क्या लेना है। कृतकृत्य पुरुषका प्रत्येक कार्य ब्रह्मभावकी प्राप्तिके लिये ही होता है, अतः आपकी आज्ञा लेकर मैं जाता हूँ। अब निर्द्वन्द्व एवं परिग्रहशून्य होकर मुक्तिके लिये ऐसा यत्न करूँगा, जिससे मुझे परम सन्तोषकी प्राप्ति हो।
पक्षी कहते हैं— जैमिनिजी! अपने पितासे यों कहकर और उनकी आज्ञा ले परम बुद्धिमान् सुमति सब प्रकारके संग्रहको छोड़कर चले गये। उनके महाबुद्धिमान् पिता भी उसी प्रकार क्रमशः वानप्रस्थ आश्रममें जाकर चौथे आश्रममें प्रविष्ट हुए। वहाँ पुत्रसे पुनः उनकी भेंट हुई और उन्होंने गुण आदि बन्धनोंका त्याग करके तत्काल प्राप्त हुई उत्तम बुद्धिसे युक्त हो परम सिद्धि प्राप्त की।
ब्रह्मन्! आपने हमलोगोंसे जो प्रश्न किया था, उसका विस्तारपूर्वक हमने यथावत् वर्णन किया। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?
मार्कण्डेय-क्रौष्टुकि संवादका आरम्भ, प्राकृत सर्गका वर्णन
जैमिनि बोले— श्रेष्ठ पक्षिगण! आपने प्रवृत्ति और निवृत्ति—दो प्रकारके वैदिक कर्म बतलाते हुए मुझे बहुत सुन्दर उपदेश दिया है। अहो! पिताकी कृपासे आपलोगोंका ज्ञान ऐसा है, जिससे तिर्यग्योनिको प्राप्त होकर भी आपने मोहका त्याग कर दिया। आपलोग धन्य हैं; क्योंकि उत्तम सिद्धिकी प्राप्तिके लिये आपलोगोंका मन आज भी पूर्वावस्थामें ही स्थित है। विषयजनित मोह उसे विचलित नहीं कर पाते। मेरा बड़ा भाग्य है कि महर्षि मार्कण्डेयजीने मुझे आपलोगोंका परिचय दिया। आप सब प्रकारके संदेहोंका निराकरण करनेमें सबसे श्रेष्ठ हैं। इस अत्यन्त सङ्कटपूर्ण संसारमें भटकते हुए मनुष्योंको बिना तपस्या किये आप-जैसे सन्तोंका सङ्ग प्राप्त होना दुर्लभ है। मैं तो ऐसा समझता हूँ कि प्रवृत्ति, निवृत्ति एवं ज्ञानके विषयमें आपलोगोंकी बुद्धि जैसी निर्मल है, वैसी दूसरे किसीकी नहीं है। यदि आपका मुझपर अनुग्रह है तो मेरे लिये आगे बतायी जानेवाली बातोंका पूर्णरूपसे वर्णन करनेकी कृपा कीजिये।
यह स्थावर-जङ्गम जगत् कैसे उत्पन्न हुआ? कल्पान्तमें पुनः किस प्रकार यह लयको प्राप्त होगा? देवता, ऋषि, पितर और भूत आदिके वंश कैसे हुए? मन्वन्तर किस प्रकार होते हैं? उनके वंशमें उत्पन्न महापुरुषोंके जीवन चरित्र कैसे हैं? जितनी सृष्टि, जितने प्रलय, जैसे जैसे कल्पोंके विभाग, जो जो मन्वन्तरकी स्थिति, जैसी पृथ्वीकी स्थिति, जितना बड़ा पृथ्वीका विस्तार तथा समुद्र,
१२० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
पर्वत, नदी, वन, भूलोक आदि, खलोकसमुदाय और पातालकी जिस प्रकारकी स्थिति है, वह सब मुझे बताइये। सूर्य, चन्द्रमा आदि ग्रह, नक्षत्र और तारोंकी गति तथा प्रलयकालतककी सारी बातें मैं सुनना चाहता हूँ। जब इस जगत्का संहार हो जायगा, तब उसके बाद क्या शेष रहेगा? इस प्रश्नपर भी प्रकाश डालिये।
पक्षियोंने कहा—मुनिश्रेष्ठ! आपने हमलोगोंपर प्रश्नोंका ऐसा भार रख दिया, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। अब हम आपके पूछे हुए विषयोंका वर्णन करते हैं, सुनिये। पूर्वकालमें मार्कण्डेयजीने ब्राह्मणकुमार क्रौष्टुकिसे, जो परम बुद्धिमान्, व्रतस्नात तथा शान्त स्वभाववाले थे, जो कुछ कहा था, वही हम आपसे कहते हैं। एक समय महात्मा मार्कण्डेय मुनि श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे घिरे बैठे थे। वहीं क्रौष्टुकिने यही बात पूछी थी, जिसे आपने हमसे पूछा है। भृगुनन्दन मार्कण्डेयजीने बड़ी प्रसन्नताके साथ क्रौष्टुकि के प्रश्नोंका उत्तर दिया। उसीका हम आपसे वर्णन करते हैं। आप ध्यान देकर सुनें। जो सृष्टिके समय ब्रह्मा, पालन-कालमें विष्णु तथा संहारके समय जगत्का अन्त करनेवाले अनन्त भयङ्कर रुद्र हैं, उन सम्पूर्ण जगत्के स्वामी पद्मयोनि पितामह ब्रह्माजीको मैं प्रणाम करता हूँ।
मार्कण्डेयजीने कहा—पूर्वकालमें अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके प्रकट होते ही उनके मुखोंसे क्रमशः पुराण और वेद प्रकट हुए, फिर महर्षियोंने पुराणकी बहुत-सी संहिताएँ रचीं और वेदोंके भी सैकड़ों विभाग किये। धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य—ये चारों महात्मा ब्रह्माजीके उपदेश बिना नहीं सिद्ध हो सकते थे। ब्रह्माजीके मानस पुत्र सप्तर्षियोंने उनसे वेदोंको ग्रहण किया और ब्रह्माजीके मनसे उत्पन्न हुए भृगु आदि ऋषियोंने पुराणको अपनाया। भृगुसे च्यवनने और च्यवनसे ब्रह्मर्षियोंने उसे प्राप्त किया। फिर उन्होंने दक्षको उपदेश दिया और दक्षने मुझे इस पुराणको सुनाया था। वही आज मैं तुमसे कहता हूँ। यह पुराण कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।
जो सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिका स्थान, अजन्मा, अविनाशी, आश्रयस्वरूप, चराचर जगत्को धारण करनेवाले तथा परमपदस्वरूप हैं, जिन्हें आदिपुरुष ब्रह्मा कहा जाता है, जो उत्पत्ति, पालन और संहारके कारण हैं, किसीके औरस पुत्र न होकर स्वयम्भू हैं, जिनमें सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है, जो हिरण्यगर्भ, लोकसृष्टिमें लगे रहनेवाले और परम बुद्धिमान् हैं, उन भगवान् ब्रह्माजीको नमस्कार करके मैं परम उत्तम भूतसर्गका वर्णन आरम्भ करता हूँ! यह भूतसमुदाय^१ पाँचोंकी संख्यामें जाननेके योग्य तथा त्रिविध^२ स्रोतोंसे युक्त है। महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त उसकी स्थिति है। उसमें किसका कैसा लक्षण है और किसके रूपमें कितनी विभिन्नता है, इन सब बातोंका ज्ञान कराते हुए भूतसमुदायका वर्णन करता हूँ। इस भौतिक जगत्का जो कारण है, उसे 'प्रधान' कहते हैं। उसीको महर्षियोंने अव्यक्त कहा है और वही सूक्ष्म, नित्य एवं सदसत्स्वरूप प्रकृति है। सृष्टिके आदिकालमें केवल ब्रह्म था, जो नित्य, अविनाशी, अजर और अप्रमेय है। उसका दूसरा कोई आधार नहीं है। वह गन्ध, रूप, रस, शब्द और स्पर्शसे रहित है। उसका आदि और अन्त नहीं है। वह सम्पूर्ण जगत्की योनि, तीनों गुणोंका कारण एवं अविनाशी है। उसे आधुनिक नहीं, पुरातन एवं सनातन कहा गया है। वह ज्ञान-विज्ञानका विषय नहीं है। प्रलयके पश्चात् उस ब्रह्मसे ही यह सब कुछ व्याप्त था।
१. पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पाँच भूत हैं।
२. पशु-पक्षी आदिकी सृष्टिको 'तिर्यक्स्रोत', मानवसर्गको 'अर्वाक्स्रोत' और देवसर्गको 'ऊर्ध्वस्रोत' कहते हैं।
- मार्कण्डेय-क्रौष्टुकि संवादका आरम्भ, प्राकृत सर्गका वर्णन * १२१
मुने! फिर सृष्टिकाल आनेपर गुणोंकी साम्यावस्थारूप प्रकृति जब ब्रह्मके क्षेत्रज्ञरूपसे अधिष्ठित हुई, तब उससे महत्तत्त्वका आविर्भाव हुआ। उत्पन्न हुए उस महत्तत्त्वको प्रधान (प्रकृति) ने आवृत्त कर रखा है। जैसे बीज त्वचासे घिरा हुआ होता है, उसी प्रकार अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्त्व आच्छादित है। वह सात्त्विक, राजस और तामसभेदसे तीन प्रकारका बताया गया है। तत्पश्चात् उस महत्तत्त्वसे वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस) तथा भूतादिरूप तामस—इन तीन भेदोंवाला अहङ्कार उत्पन्न हुआ। जैसे अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्त्व आवृत्त है, उसी प्रकार अहङ्कार भी महत्तत्त्वसे आवृत्त है। भूतादि नामक तामस अहङ्कारने शब्द-तन्मात्राकी सृष्टि की। उस शब्द-तन्मात्रासे शब्द-गुणवाला आकाश उत्पन्न हुआ; फिर भूतादि तामस अहङ्कारने शब्द-तन्मात्रारूप आकाशको आच्छादित किया। इससे स्पर्श-तन्मात्राकी सृष्टि हुई, जिससे बलवान् वायुका प्राकट्य हुआ। वायुका गुण स्पर्श माना गया है। शब्द-तन्मात्रारूप आकाशने जब स्पर्श-तन्मात्रावाले वायुको आच्छादित किया, तब वायुने भी विकृत होकर रूप-तन्मात्राकी रचना की। इस प्रकार वायुसे अग्नितत्त्व प्रकट हुआ, जिसका गुण रूप बतलाया जाता है। तदनन्तर स्पर्श-तन्मात्रावाले वायुने रूप-तन्मात्रावाले तेजको आवृत्त किया, जिससे विकृत होकर उस तेजने रस-तन्मात्राकी सृष्टि की। उस रस-तन्मात्रासे जल प्रकट हुआ, जो रस नामक गुणसे युक्त है। फिर रूप-तन्मात्रावाले अग्नितत्त्वने रस-तन्मात्रायुक्त जलको आवृत्त किया। इससे जलमें भी विकार आया और उसमें गन्ध-तन्मात्राकी सृष्टि हुई। उसीसे यह स्थूलरूपा पृथ्वी उत्पन्न हुई, जिसका गुण गन्ध है। उन-उन भूतोंमें कारणरूपसे तन्मात्राएँ हैं, इसलिये वे भूततन्मात्रारूप माने गये हैं। तन्मात्राएँ किसी विशेष भावका बोध नहीं करातीं। इसलिये वे अविशेष हैं। इस प्रकार तामस अहङ्कारसे यह भूततन्मात्रारूप सर्ग प्रकट हुआ।
वैकारिक अहङ्कारमें सत्त्वगुणकी अधिकता होनेसे वह सात्त्विक भी कहलाता है। उससे एक ही साथ वैकारिक सर्गकी उत्पत्ति होती है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ तैजस (राजस) अहङ्कारसे उत्पन्न बतलायी जाती हैं और उनके अधिष्ठाता दस देवता वैकारिक (सात्त्विक) अहङ्कारसे प्रकट हुए हैं। ग्यारहवें मनको भी वैकारिक सर्गमें ही जानना चाहिये। इस प्रकार मन तथा इन्द्रियाधिष्ठाता देवता वैकारिक माने गये हैं। श्रवण, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—ये पाँच इन्द्रियाँ शब्दादि विषयोंका ज्ञान करानेके लिये हैं, इसलिये इन्हें ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं। दोनों पैर, गुदा, उपस्थ, दोनों हाथ और वाक्—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। क्रमशः चलना, मलत्याग, रतिके आनन्दका अनुभव, शिल्परचना और बोलना—ये पाँच इनके कर्म हैं। शब्द-तन्मात्रायुक्त आकाश स्पर्श-तन्मात्रावाले वायुमें प्रविष्ट है, इसलिये वायु दो गुणोंसे युक्त होता है। उसका अपना गुण स्पर्श है। उसके साथ आकाशका शब्द भी रहता है। इसी प्रकार शब्द और स्पर्श—ये दो गुण रूपमें प्रवेश करते हैं; इसलिये अग्नि शब्द, स्पर्श और रूप—इन तीन गुणोंसे युक्त होता है। फिर शब्द, स्पर्श और रूप—इन तीनोंका रसमें प्रवेश होता है। इसलिये रसात्मक जलको चार गुणोंसे युक्त समझना चाहिये। इसी प्रकार शब्द, स्पर्श, रूप और रस—ये चारों गन्धमें प्रवेश करते हैं और उससे मिलकर सब ओरसे पृथ्वीको आवृत्त कर लेते हैं। इसलिये पृथ्वी पाँच गुणोंसे युक्त है और सब भूतोंमें स्थूल दिखायी देती है। ये पाँचों भूत शान्त, घोर और मूढ़ हैं। अर्थात् सुख, दुःख एवं मोहसे युक्त हैं। इसलिये ये विशेष कहलाते हैं।* परस्पर
* परस्पर मिलनेसे सभी भूत शान्त, घोर और मूढ़ प्रतीत होते हैं; किन्तु पृथक्-पृथक् विचार करनेपर पृथ्वी और जल शान्त हैं, तेज और वायु घोर हैं तथा आकाश मूढ़ है।
[ 539 ] सं० मा० पु०—५
५२२ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
प्रवेश करनेपर वे एक-दूसरेको धारण करते हैं।
ये महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त सभी भूत एक दूसरेसे मिलकर और परस्पर आश्रित हो एक संघातको ही अपना लक्ष्य बना जब पूर्णरूपसे एक हो जाते हैं, तब पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण प्रधान तत्त्वके सम्बन्धसे अण्डकी उत्पत्ति करते हैं। वह महान् अण्ड जलके बुलबुलेके समान क्रमशः बढ़ता है और जलपर स्थित रहता है। उस प्राकृत अण्डमें ब्रह्मा नामसे प्रसिद्ध क्षेत्रज्ञ पुरुष भी वृद्धिको प्राप्त होता है। वे ब्रह्मा ही सबसे प्रथम शरीरधारी होनेके कारण पुरुष कहलाते हैं। भूतोंके आदिकर्ता ब्रह्माजी सबसे पहले प्रकट हुए; उन्होंने चर-अचरसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको व्याप्त कर रखा है। अण्डके गर्भमें स्थित उन महात्मा ब्रह्माजीके लिये मेरु पर्वत ही गर्भको ढकनेवाली झिल्ली हुआ। अन्य पर्वत जरायु (जेर) हुए तथा समुद्र ही उस गर्भाशयका जल था। उस अण्डमें ही देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ तथा पर्वत, द्वीप, समुद्र और नक्षत्र मण्डलके साथ त्रिभुवनका आविर्भाव हुआ। वह अण्ड क्रमशः जल, अग्नि, वायु, आकाश तथा तामस अहङ्कारके द्वारा बाहरसे आवृत्त है। ये आवरण एककी अपेक्षा दूसरे दसगुने बड़े हैं। तामस-अहंकार उससे दसगुने बड़े महत्तत्त्वके द्वारा आवृत है और महत्तत्त्व भी उन सबके साथ अव्यक्त प्रकृतिके द्वारा घिरा हुआ है। इस प्रकार इन सात प्राकृत आवरणोंसे यह अण्ड आवृत्त है। इस तरह ये आठ प्रकृतियाँ एक-दूसरेको आवृत्त करके स्थित हैं। वह प्रकृति नित्य है और उसके भीतर वे ही पुरुष हैं, जो तुम्हें ब्रह्माके नामसे बताये गये हैं। अब संक्षेपसे पुनः इस विषयका वर्णन सुनो—जैसे कोई पुरुष जलमें डूबकर फिर निकलते समय जलको फेंकता है, उसी प्रकार भगवान् ब्रह्माजी भी प्रकृतिको हटाते हुए उससे प्रकट होते हैं। अव्यक्त प्रकृतिको क्षेत्र बताया गया है और ब्रह्माजी क्षेत्रज्ञ कहलाते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् क्षेत्र-क्षेत्रज्ञरूप ही है—ऐसा समझना चाहिये। इस प्रकार यह प्राकृत सर्गका वर्णन हुआ। इसके भीतर अधिष्ठातारूपसे क्षेत्रज्ञ विराजमान रहता है। प्राकृत सर्ग ही प्रथम सृष्टि है।
एक ही परमात्माके त्रिविध रूप, ब्रह्माजीकी आयु आदिका मान तथा सृष्टिका संक्षिप्त वर्णन
क्रौष्टुकिने कहा— भगवन्! आपने ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिका यथावत् वर्णन किया तथा महात्मा ब्रह्माजीके प्रादुर्भावकी बात भी बतलायी। भृगुकुलनन्दन! अब मैं आपसे यह सुनना चाहता हूँ कि प्रलयके अन्तमें, जब कि सबका उपसंहार हो जाता है और प्राणियोंकी सृष्टि नहीं हुई होती, क्या शेष रहता है? अथवा कुछ रहता ही नहीं?
मार्कण्डेयजी बोले— मुने! जब यह सम्पूर्ण जगत् प्रकृतिमें लीन होता है, उस समयकी स्थितिको विद्वान् पुरुष प्राकृत प्रलय कहते हैं। जब अव्यक्त प्रकृति अपने स्वरूप (गुणोंकी साम्यावस्था)-में स्थित होती है तथा महत्तत्त्वादि सम्पूर्ण विकारोंका उपसंहार हो जाता है, उस समय प्रकृति और पुरुष समानधर्मा (निष्क्रिय, निर्विकार) होकर रहते हैं। उस समय सत्त्व और तम समानरूपमें और परस्पर ओत-प्रोत रहते हैं तथा जैसे तिलमें तेल और दूधमें घी रहता है, उसी प्रकार तमोगुण और सत्त्वगुणमें रजोगुण घुला-मिला होता है। जब परमेश्वरकी योगदृष्टिसे प्रकृतिमें क्षोभ होता है, तब महान् अण्डके
- एक ही परमात्माके विभिन्न रूप, ब्रह्माजीकी आयु आदिका मान तथा सृष्टिका संक्षिप्त वर्णन * १२३
भीतरसे ब्रह्माजी प्रकट होते हैं—यह बात तुम्हें बतलायी जा चुकी है। यद्यपि ब्रह्माजी सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके स्थान और निर्गुण हैं, तथापि रजोगुणका उपभोग करते हुए सृष्टिमें प्रवृत्त होते हैं और ब्रह्माके कर्तव्यका पालन करते हैं। फिर परमेश्वर सत्त्वगुणके उत्कर्षसे युक्त हो श्रीविष्णुका स्वरूप धारणकर धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हैं। फिर तमोगुणकी अधिकतासे युक्त हो रुद्ररूप धारण करके सम्पूर्ण जगत्का संहार करते और निश्चिन्त सोते हैं। इस प्रकार सृष्टि, पालन और संहार—इन तीनों कालोंमें तीन गुणोंसे युक्त होकर भी वे परमेश्वर वास्तवमें निर्गुण ही हैं। जैसे खेतिहर पहले बीजको बोता, फिर पौधेकी रक्षा करता और अन्तमें खेती पक जानेपर उसे काटता है तथा इन कार्योंके अनुसार बोनेवाला, रक्षा करनेवाला और काटनेवाला—ये तीन नाम धारण करता है, उसी प्रकार एक ही परमेश्वर भिन्न-भिन्न कार्योंके अनुसार ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र नाम धारण करते हैं। ब्रह्मा होकर संसारकी सृष्टि करते और रुद्र होकर उसका संहार करते हैं तथा विष्णुरूपमें इन दोनों कार्योंसे उदासीन रहकर सबका पालन करते हैं। इस तरह स्वयम्भू परमात्माकी तीन अवस्थाएँ होती हैं। रजोगुणप्रधान ब्रह्मा, तमोगुणप्रधान रुद्र और सत्त्वप्रधान विश्वपालक विष्णु हैं। ये ही तीन देवता हैं और ये ही तीन गुण हैं। ये परस्पर एक-दूसरेके आश्रित और एक-दूसरेसे मिले रहते हैं। इनमें एक क्षणका भी वियोग नहीं होता। ये एक-दूसरेका कभी त्याग नहीं करते।
इस प्रकार जगत्के आदिकारण देवाधिदेव चतुर्मुख ब्रह्माजी रजोगुणका आश्रय लेकर सृष्टिके कार्यमें संलग्न रहते हैं। उनकी आयु अपने ही मानसे सौ वर्षोंकी होती है। उसका परिमाण बतलाता हूँ, सुनो। पंद्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है, तीस काष्ठाओंकी एक कला, तीस कलाओंका एक मुहूर्त तथा तीस मुहूर्तोंका एक दिन-रात होता है। यह मनुष्योंके दिन-रातका मान है। तीस दिन-रात व्यतीत होनेपर दो पक्ष अथवा एक मास पूर्ण होता है। छह मासोंका एक अयन और दो अयनोंका एक वर्ष होता है। दो अयनोंका नाम क्रमशः दक्षिणायन और उत्तरायण है। इस प्रकार मनुष्योंका एक वर्ष देवताओंका एक दिन-रात है। उसमें दिन तो उत्तरायण और रात दक्षिणायन है। देवताओंके बारह हजार वर्षोंकी एक चतुर्युगी होती है, जिसे सत्ययुग, त्रेता आदि कहते हैं। अब इनका विभाग सुनो। चार हजार दिव्य वर्षोंका सत्ययुग होता है, चार सौ दिव्य वर्षोंकी उसकी सन्ध्या और उतने ही वर्षोंका सन्ध्यांश होता है। तीन हजार दिव्य वर्षोंका त्रेतायुग है। उसकी सन्ध्या और सन्ध्यांशका समय तीन-तीन सौ दिव्य वर्षोंका है। दो हजार दिव्य वर्षोंका द्वापरयुग होता है और दो-दो सौ दिव्य वर्ष उसकी सन्ध्या तथा सन्ध्यांशके होते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! एक हजार दिव्य वर्षोंका कलियुग होता है तथा सौ-सौ दिव्य वर्ष उसकी सन्ध्या एवं सन्ध्यांशके बताये गये हैं। इस प्रकार विद्वानोंने बारह हजार दिव्य वर्षोंकी एक चतुर्युगी बतायी है। एक हजार चतुर्युगी बीतनेपर ब्रह्माका एक दिन होता है। ब्रह्मन् ! ब्रह्माजीके एक दिनमें बारी-बारीसे चौदह मनु होते हैं। देवता, सप्तर्षि, इन्द्र, मनु और मनुपुत्र—ये सब लोग एक ही साथ उत्पन्न होते हैं और एक ही साथ इनका संहार भी होता है। इस प्रकार इकहत्तर चतुर्युगोंसे कुछ अधिक कालका एक मन्वन्तर होता है।* अब मनुष्य-
* इकहत्तर चतुर्युगोंके हिसाबसे चौदह मन्वन्तरोंमें ९९४ चतुर्युगी होते हैं और ब्रह्माके एक दिनमें एक हजार चतुर्युग होते हैं, अतः छः चतुर्युग और बचे। छः चतुर्युगोंका चौदहवाँ भाग कुछ कम पाँच हजार एक सौ तीन दिव्य वर्ष होता है; इस प्रकार एक मन्वन्तरमें इकहत्तर चतुर्युगके अतिरिक्त इतने दिव्य वर्ष और अधिक होते हैं।
५२४
- संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
वर्ष-गणनाके अनुसार मन्वन्तरका मान सुनो। पूरे तीस करोड़ सरसठ लाख और बीस हजार वर्षोंका एक मन्वन्तर माना गया है। देवताओंके वर्षसे एक मन्वन्तरमें आठ लाख, बावन हजार वर्ष होते हैं। इस कालका चौदह गुणा करनेपर ब्रह्माका एक दिन होता है। इसके अन्तमें विद्वानोंने नैमित्तिक प्रलयका होना बतलाया है। उसमें भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक जलकर नष्ट हो जाते हैं। महर्लोक बच जाता है; किन्तु नीचेके लोकोंके जलनेसे वहाँ इतना ताप पहुँचता है कि उस लोकके निवासी जनलोकमें चले जाते हैं। फिर तीनों लोक एक महासमुद्रके गर्भमें छिप जाते हैं। ब्रह्माकी रात आ जाती है, इसलिये वे उसमें शयन करते हैं। ब्रह्माके दिनके बराबर ही उनकी रात भी होती है। उनके बीतनेपर फिर सृष्टिका क्रम चालू होता है। इस प्रकार क्रमशः ब्रह्माका एक वर्ष बीतता है और पूरे सौ वर्षतक उनका जीवन रहता है। उनके सौ वर्षको एक 'पर' कहते हैं। उसमेंसे पचास वर्षोंकी 'परार्द्ध' संज्ञा है। इस तरह ब्रह्माका एक परार्द्ध बीत चुका है। उसके अन्तमें पाद्म नामसे विख्यात महाकल्प हुआ था। ब्रह्मन्! अब उनका दूसरा परार्द्ध चल रहा है। इसमें यह वाराह कल्प प्रथम कल्प है।
**क्रौष्टुकि बोले—**सृष्टिके आदिकर्ता तथा प्रजापतियोंके स्वामी भगवान् ब्रह्माजीने जिस प्रकार प्रजाको उत्पन्न किया, उसका मेरे लिये विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।
**मार्कण्डेयजीने कहा—**ब्रह्मन्! पाद्म कल्पके अन्तमें जो प्रलय हुआ था, उसके बाद रात्रि बीतनेपर जब सत्त्वगुणके उत्कर्षसे युक्त श्रीविष्णुरूप ब्रह्माजी सोकर उठे, उस समय उन्होंने संसारको शून्य देखा। जगत्की उत्पत्ति और संहार करनेवाले ब्रह्मस्वरूप भगवान् नारायणके विषयमें विद्वान् पुरुष यह श्लोक कहा करते हैं—
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
तासु शेते स यस्माच्च तेन नारायणः स्मृतः॥
'जल नरसे प्रकट हुआ है, इसलिये वह नार कहलाता है। भगवान् उसमें सोते हैं—भगवान्का वह अयन है, इसलिये वे नारायण कहे गये हैं।'
जागनेके बाद उन्होंने पृथ्वीको जलके भीतर डूबी हुई जानकर उसे निकालनेकी इच्छासे वाराहरूप धारण किया। उनका वह स्वरूप वेदमय, यज्ञमय एवं दिव्य था। उन सर्वव्यापी भगवान्ने वाराहरूपसे ही जलमें प्रवेश किया और पातालसे पृथ्वीको निकालकर जलके ऊपर रखा। उस समय जनलोकनिवासी सिद्धगण उन जगदीश्वरका चिन्तन एवं स्तवन कर रहे थे। पृथ्वी उस जल-राशिके ऊपर बहुत बड़ी नौकाकी भाँति स्थित हुई। पृथ्वीका आकार बहुत विशाल और विस्तृत है, इसलिये यह जलमें डूब नहीं पाती। तदनन्तर पृथ्वीको बराबर करके भगवान्ने उसपर पर्वतोंकी सृष्टि की। पूर्वकल्पकी सृष्टि जब प्रलयाग्निसे दग्ध होने लगी थी, उस समय सब पर्वत पृथ्वीपर खण्ड-खण्ड होकर बिखर गये और एकार्णवके जलमें डूब गये। फिर वायुके द्वारा वहाँ बहुत-सा जल एकत्रित हुआ। उस जलसे भीगकर और प्रवाहमें बहकर जो पर्वत जहाँ लग गये, वे वहाँ अचलरूपसे स्थित हो गये।
**क्रौष्टुकिने कहा—**ब्रह्मन्! आपने थोड़ेमें ही सृष्टिका भलीभाँति वर्णन किया, अब मुझे देवता आदिकी उत्पत्तिका वृत्तान्त विस्तारके साथ बतलाइये।
**मार्कण्डेयजी बोले—**ब्रह्मन्! ब्रह्माजीने जब सृष्टि रचनेका विचार किया, तब पहले उनसे मानस पुत्र ही उत्पन्न हुए। तदनन्तर देवता, असुर, पितर और मनुष्य—इन चारोंको उत्पन्न
- एक ही परमात्माके त्रिविध रूप, ब्रह्माजीकी आयु आदिका मान तथा सृष्टिका संक्षिप्त वर्णन * १२५
करनेकी इच्छासे उन्होंने जलमें अपनेको योगयुक्त किया। योगस्थ होनेपर ब्रह्माजीके कटिप्रदेशसे पहले असुरोंकी उत्पत्ति हुई। तब उन्होंने अपने उस तमोगुणी शरीरको त्याग दिया। त्यागनेपर वह शरीर रात्रिके रूपमें परिणत हो गया। फिर दूसरा शरीर धारण करके जब प्रजापतिने सृष्टिका विचार किया, तब उन्हें प्रसन्नता हुई। उस अवस्थामें उनके मुखसे सत्त्वगुणके उत्कर्षसे युक्त देवता उत्पन्न हुए। फिर भगवान् ब्रह्माने उस शरीरको भी त्याग दिया। त्यागनेपर वह सत्त्वप्राय दिनके रूपमें परिणत हो गया। तदनन्तर पुनः उन्होंने सत्त्वगुणी शरीरको ही धारण किया। उस समय उन्होंने अपनेको सबका पिता माना, इसलिये उनसे पितरोंकी उत्पत्ति हुई। पितरोंकी सृष्टिके बाद ब्रह्माजीने वह शरीर भी छोड़ दिया। वह छोड़ा हुआ शरीर सन्ध्याकालके रूपमें परिणत हुआ, जो दिन और रातके मध्यमें स्थित होता है। तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्माने रजोगुणकी अधिकतासे युक्त दूसरा शरीर धारण किया। उससे मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई। मनुष्योंकी सृष्टिके बाद उस शरीरको भी उन्होंने त्याग दिया। वह शरीर ज्योत्स्नाकालके रूपमें परिणत हुआ, जो रातके अन्त और दिनके प्रारम्भमें हुआ करता है। इस प्रकार ये रात दिन, सन्ध्या और ज्योत्स्नाकाल देवाधिदेव भगवान् ब्रह्माके शरीर हैं।
ब्रह्माजीने अपने प्रथम मुखसे गायत्री छन्द, ऋग्वेद, त्रिवृत्, रथन्तर साम तथा अग्निष्टोम यज्ञको उत्पन्न किया। दक्षिण मुखसे यजुर्वेद, त्रिष्टुप् छन्द, पञ्चदश स्तोम तथा बृहत्सामकी सृष्टि की। पश्चिम मुखसे सामवेद, जगती छन्द, पञ्चदश स्तोम, वैरूप साम तथा अतिरात्र यज्ञका निर्माण किया और उत्तर मुखसे इक्कीसवाँ अथर्व, आप्तोर्याम यज्ञ, अनुष्टुप् छन्द तथा वैराज सामको प्रकट किया। उन्होंने कल्पके आदिमें बिजली, वज्र, मेघ, लाल इन्द्रधनुष और पक्षियोंकी सृष्टि की। तथा उनके शरीरसे छोटे-बड़े अनेक प्राणी उत्पन्न हुए। पूर्वकालमें देवता, असुर, पितर और मनुष्य—इन चारोंकी सृष्टि करनेके पश्चात् उन्होंने अन्य स्थावर-जङ्गम प्राणियोंको उत्पन्न किया। यक्ष, पिशाच, गन्धर्व, अप्सरा, नर, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, मृग, सर्प आदि जङ्गम तथा स्थावर भूतोंकी सृष्टि की। उनमेंसे जिनके पूर्वकल्पमें जैसे कर्म थे, वैसे ही कर्म वे पुनः-पुनः नूतन सृष्टिमें प्राप्त करते हैं। हिंसा-अहिंसा, मृदुता क्रूरता, धर्म-अधर्म तथा सत्य असत्यको वे पूर्वजन्मकी भावनाके अनुसार ही प्राप्त करते हैं और उस भावनाके अनुकूल वस्तु ही उन्हें रुचिकर जान पड़ती है। इन्द्रियोंके विषयों, भूतों तथा शरीरोंमें स्वयं ब्रह्माजीने ही नानात्वका विधान किया है—उन्हें अनेक रूपोंमें उत्पन्न किया है। देवता आदि भूतोंके नाम और रूपका तथा कार्योंके विस्तारका उन्होंने वेदके शब्दोंसे ही प्रतिपादन किया है। ऋषियोंके नाम भी वेदोंसे ही निश्चित किये हैं। ब्रह्माजीकी रात्रिका अन्त होनेपर उन्होंने देवता आदि जिन-जिन भूतोंकी सृष्टि की है, उन सबके नाम-रूप और कर्तव्यका ज्ञान भी वे वेदोंसे ही प्रदान करते हैं। जिस ऋतुमें जिस प्रकारके अनेकों चिह्न देखे जाते हैं, युगादिमें सृष्टि होनेपर वे सभी वैसे ही दृष्टिगोचर होते हैं। रात्रिके अन्तमें जगे हुए अव्यक्तजन्मा ब्रह्माकी सृष्टि प्रत्येक कल्पमें ऐसी ही होती है।
| १२६ | * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * |
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प्रजाकी सृष्टि, निवास-स्थान, जीविकाके उपाय और वर्णाश्रम-धर्मके पालनका माहात्म्य
क्रौष्टुकिने कहा—ब्रह्मन्! आपने अवाक्स्रोत नामक सर्गका, जो मानवसर्ग ही है, वर्णन किया; अब विस्तारपूर्वक यह बतलानेकी कृपा करें कि ब्रह्माजीने सृष्टिका विस्तार कैसे किया। महामते! उन्होंने वर्णोंकी सृष्टि कैसे की? उनके गुण क्या हैं तथा ब्राह्मण आदि वर्णोंका कर्म कौन-सा माना गया है?
मार्कण्डेयजी बोले—मुने! सत्यका चिन्तन करनेवाले ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जब सृष्टि-रचना आरम्भ की, तब उनके मुखसे एक हजार स्त्री-पुरुष उत्पन्न हुए। वे सब-के-सब सात्त्विक तथा सहृदय थे। तदनन्तर ब्रह्माजीने अपने वक्षःस्थलसे एक सहस्र अन्य स्त्री-पुरुषोंको उत्पन्न किया। वे सभी रजोगुणकी अधिकतासे युक्त, शूरवीर और क्रोधी थे। उसके बाद उन्होंने अपनी दोनों जाँघोंसे दूसरे एक सहस्र स्त्री-पुरुषोंको प्रकट किया। वे सब तमोगुणी, श्रीहीन तथा मन्दबुद्धि थे। वे सब जोड़ेके रूपमें उत्पन्न हुए जीव अत्यन्त प्रसन्न होकर एक दूसरेके साथ मैथुनकी क्रियामें प्रवृत्त हो गये। तभीसे इस कल्पमें मैथुनका प्रसार हुआ। फिर ब्रह्माजीने पिशाच, सर्प, राक्षस, द्रोह करनेवाले मनुष्य, पशु-पक्षी, मगर, मछली, बिच्छू तथा अण्डज आदिको उत्पन्न किया।
पहलेकी प्रजा सात्त्विक और धर्मपरायण थी, अतः यहाँ सब ओर सुख-शान्ति थी। इसके बाद कालान्तरमें उनके भीतर लोभका उदय हुआ। फिर तो शीत, उष्ण, क्षुधा आदि द्वन्द्व प्रकट हुए। प्रजाओंने उस द्वन्द्वको दूर करनेके लिये पहले पुरोंका निर्माण किया। कुछ लोग मरुभूमि अथवा धन्वदेशको शत्रुओंके लिये दुर्गम समझकर उसमें रहने लगे। कुछ लोगोंने पर्वतों और गुफाओंका आश्रय लिया। कुछ मनुष्योंने वृक्षों, पर्वतों और जलके दुर्गोंको अपना निवास-स्थान बनाया। कुछ लोग कृत्रिम दुर्ग बनाकर उसमें रहने लगे। उन्होंने वस्तुओंकी लंबाई-चौड़ाई नापनेके लिये अँगुलियोंसे नाप-नापकर पहले कुछ माप तैयार किये। उनका पैमाना इस प्रकार बना। सबसे सूक्ष्म वस्तु है परमाणु। उससे बड़ा त्रसरेणु होता है, जो पृथ्वीकी धूलिका एक कण है। उससे उत्तरोत्तर बड़े प्रमाण हैं—बालाग्र, लिक्षा, यूका और यवोदर। ये एक-दूसरेकी अपेक्षा आठ-आठ गुने बड़े हैं। आठ यवका एक अङ्गुल, छः अङ्गुलका एक पद, दो पदका एक बित्ता और दो बित्तेका एक हाथ होता है। चार हाथका एक धनुर्दण्ड होता है। इसीको नाड़िकायुग भी कहते हैं। दो हजार धनुषको एक गव्यूति और चार गव्यूतिका एक योजन होता है।
तदनन्तर प्रजावर्गने अपने रहनेके लिये पुर, खेट, द्रोणीमुख, शाखा-नगर, खर्वट, द्रमी आदिका निर्माण किया। उन सबमें ग्राम, गोशाला आदिकी व्यवस्था करके वहाँ पृथक्-पृथक् निवास-स्थान बनाये। जिसके चारों ओर ऊँची चहारदीवारी हो, जो खाइयोंसे घिरा हो, जिसकी लंबाई दो कोस और चौड़ाई उसका आठवाँ भाग हो, वह पुर कहलाता है। उसके पूर्व और उत्तरमें जलप्रवाहका होना उत्तम माना गया है। वहाँसे बाहर निकलनेके लिये शुद्ध बाँसका पुल बना होना चाहिये। जिसकी लंबाई-चौड़ाई पुरकी अपेक्षा आधी हो, वह खेट कहलाता है और जो पुरके चौथाई हिस्सेके बराबर हो, उसे खर्वट कहते हैं। जिसकी लंबाई-चौड़ाई पुरके आठवें हिस्सेके बराबर हो, वह द्रोणीमुख कहलाता है। जहाँ चहारदीवारी और खाई नहीं है, उस पुरको खर्वट कहते हैं। जहाँ मन्त्री, सामन्त तथा भोगके बहुत-से सामान हों, वह शाखानगर कहलाता है। जहाँ अधिकांश शूद्र
- प्रजाकी सृष्टि, निवास-स्थान, जीविकाके उपाय और वर्णाश्रम-धर्मके पालनका माहात्म्य * १२७
हों, अपनी समृद्धिसे युक्त किसान रहते हों, जो खेतों और उपभोगयोग्य भूमि (बाग-बगीचों) के बीचमें बसा हो, उसका नाम गाँव है। जहाँ किसी कार्यके लिये मनुष्य अन्य नगर आदिसे आकर बसते हों, उसको बस्ती कहते हैं। जहाँ अधिकांश दुष्टोंका निवास हो, जहाँके रहनेवाले अपने पास खेत न होनेपर भी दूसरेकी भूमिपर अधिकार जमाते और भोगते हैं, वह गाँव द्रमीके नामसे पुकारा जाता है। जहाँ प्रायः वे ही लोग निवास करते हैं, जो राजाके प्रिय हों। जहाँ ग्वाले अपने बर्तन-भाँड़े गाड़ियोंपर लादकर रखते हों, बिना बाजारके ही गोरस मिलता हो, गायोंका समूह रहता हो, जहाँ इच्छानुसार भूमि रहनेके लिये सुलभ हो, उस स्थानका नाम घोष है।
इस प्रकार नगर आदिका निर्माण करके प्रजाने अपने रहनेके लिये घर बनाये। वे घर इस उद्देश्यसे बनाये गये थे कि वहाँ शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे रक्षा हो सके। जैसे पहले उनके घरके आकारके वृक्ष होते थे और वहाँ उन्हें जैसी सुविधाएँ प्राप्त होती थीं, उन सबका स्मरण करके उन्होंने घर बनाये। जैसे वृक्षकी शाखाएँ एकके बाद दूसरी तथा छोटी-बड़ी, ऊँची-नीची होती हैं, उसी प्रकार उन्होंने अनेक प्रकारकी शालाएँ बनायीं। द्विजश्रेष्ठ! पूर्वकालमें जो कल्पवृक्षकी शाखाएँ थीं, वे ही उस समय प्रजावर्गके घरोंमें शाला बनानेके काममें आयीं। इस प्रकार गृह-निर्माणके द्वारा शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंको दूर करके सब लोग जीविकाका उपाय सोचने लगे; क्योंकि उस समय समस्त कल्पवृक्ष मधुसहित नष्ट हो चुके थे। जब प्रजा भूख और प्याससे व्याकुल एवं शोकसे आतुर हो उठी तब त्रेताके आरम्भमें उनके अभीष्टकी सिद्धि हुई। उनकी इच्छाके अनुसार वर्षा हुई और वह वर्षाका जल नीची भूमिमें बहकर एकत्र होने लगा। उससे स्रोत, पोखरे और नदियाँ बन गयीं। उस जलका पृथ्वीके साथ संयोग होनेसे बिना जोते-बोये ही ग्राम्य और आरण्य—सब मिलकर चौदह प्रकारके अन्न पैदा हुए। वृक्षों और लताओंमें ऋतुके अनुसार फल और फूल लगने लगे। त्रेतायुगमें पहले-पहल अन्नका प्रादुर्भाव हुआ। उसीसे उस युगमें सब प्रजाका जीवन-निर्वाह होने लगा।
फिर अकस्मात् सब लोगोंके मनमें राग और लोभका प्राकट्य हुआ। इससे वे एक-दूसरेके प्रति ईर्ष्या रखने लगे और अपनी शक्तिके अनुसार नदी, खेत, पर्वत, वृक्ष और झाड़ियोंपर अधिकार जमाने लगे। उनके इस दोषसे सबके देखते-देखते सब अनाज नष्ट हो गये। पृथ्वीने एक साथ ही सब ओषधियोंको अपना ग्रास बना लिया। अनाजके नष्ट होनेसे प्रजा भूखसे व्याकुल होकर फिर इधर-उधर भटकने लगी और अन्तमें ब्रह्माजीकी शरणमें गयी। ब्रह्माजीने भी प्रजाका सारा समाचार ठीक-ठीक जानकर पृथ्वीको गायके रूपमें बाँधा और मेरु पर्वतको बछड़ा बनाकर उसका दूध दुहा। ब्रह्माजीने दूधके रूपमें सब प्रकारके अन्न दुह लिये थे, वे ही बीजरूपमें प्रकट हुए और उनसे ग्राम्य तथा आरण्य—सब प्रकारके अन्न पैदा हुए, जो फलके पक जानेपर काट लिये जाते हैं। धान, जौ, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, कँगनी, ज्वार, कोदो, चीना, उड़द, मूँग, मसूर, मटर, कुलथी, अरहर, चना और सण—ये सत्रह ग्राम्य ओषधियोंकी जातियाँ हैं। यज्ञके काममें आनेवाली केवल चौदह ओषधियाँ हैं, जिनमें सात ग्राम्य और सात आरण्य हैं। उनके नाम ये हैं—धान, जौ, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, कँगनी, कुलथी, माथी, साँवा, वनतिल, गवेधुक, कुरूविन्द, मर्कट और वेणुयव।
जब बोनेपर भी वे ओषधियाँ फिर न जम सकीं, तब भगवान् ब्रह्माजीने अन्नकी वृद्धिके लिये हाथसे काम करनेकी प्रणालीको ही जीविकाका उपाय बनाया; तबसे जोतने-बोनेपर अन्नकी उपज होने लगी। इस प्रकार जीविकाका प्रबन्ध हो
१२८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
जानेपर ब्रह्माजीने न्याय और गुणके अनुसार वर्णाश्रम-धर्मकी मर्यादा स्थापित की। अपने कर्मोंमें लगे हुए ब्राह्मणोंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। युद्धमें पीठ न दिखानेवाले क्षत्रियोंको इन्द्रका पद प्राप्त होता है। स्वधर्मपरायण वैश्योंको मरुद्गणोंका लोक मिलता है। सेवामें संलग्न रहनेवाले शूद्र गन्धर्वलोकमें जाते हैं। जो लोग गुरुकुलमें रहकर ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक वेदाध्ययन करते हैं, उन्हें अठासी हजार ऊर्ध्वरेता महर्षियोंको प्राप्त होनेवाला स्थान मिलता है। वानप्रस्थधर्मका पालन करनेवाले लोग सप्तर्षियोंके लोकमें जाते हैं। गृहस्थधर्मका विधिवत् पालन करनेवालोंको प्राजापत्य लोककी प्राप्ति होती है। संन्यासियोंको ब्रह्मपद और योगियोंको अमृतत्वकी उपलब्धि होती है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न वर्णधर्म और आश्रम धर्मोंका पालन करनेवाले लोगोंके लिये पृथक्-पृथक् लोकोंकी कल्पना की गयी है।
स्वायम्भुव मनुकी वंश-परम्परा तथा अलक्ष्मी-पुत्र दुःसहके स्थान आदिका वर्णन
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**मुने! तदनन्तर ब्रह्माजी जब ध्यान कर रहे थे, उस समय उनके मनसे मानसी प्रजा उत्पन्न हुई; साथ ही उनके शरीरसे कारण और कार्यका भी प्रादुर्भाव हुआ। देवताओंसे लेकर स्थावरपर्यन्त सभी जीव त्रिगुणात्मक माने गये हैं। इसी प्रकार समस्त चराचर भूतोंकी सृष्टि हुई। जब प्रयत्न करनेपर भी ब्रह्माजीकी प्रजा बढ़ न सकी, तब उन्होंने अपने ही सदृश सामर्थ्यसे युक्त नौ मानस-पुत्रोंको उत्पन्न किया। उनके नाम ये हैं—भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अङ्गिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ। पुराणोंमें ये नौ ब्रह्मा माने गये हैं।* इसके बाद ब्रह्माजीने अपने क्रोधसे रुद्रको प्रकट किया; फिर संकल्प और धर्मको उत्पन्न किया, जो पूर्वजोंके भी पूर्वज हैं। स्वयम्भू ब्रह्माजीने जिन्हें सबसे पहले उत्पन्न किया, वे सनन्दन आदि चार भाई लोकमें आसक्त नहीं हुए। वे सब-के-सब निरपेक्ष, एकाग्रचित्त, भविष्यको जाननेवाले, वीतराग और मत्सररहित थे।
तत्पश्चात् प्रजापतिने अनेक प्रकारके स्त्री-पुरुष उत्पन्न किये, जिनमें कोमल, क्रूर, शान्त, श्यामवर्ण तथा गौरवर्ण—सभी तरहके लोग थे। इसके बाद उन्होंने अपने ही समान प्रभावशाली एक पुत्ररत्न उत्पन्न किया, जिनका नाम स्वायम्भुव मनु हुआ। उन्हें ब्रह्माजीने प्रजाजनोंका रक्षक बनाया। फिर स्वायम्भुव मनुने शतरूपाको अपनी पत्नी बनाया, जो तपस्याके प्रभावसे सर्वथा निष्पाप थी। शतरूपाने स्वायम्भुव मनुके सम्पर्कसे दो पुत्रोंको जन्म दिया। वे प्रियव्रत और उत्तानपादके नामसे विख्यात हुए। उन दोनोंकी अपने कर्मोंसे प्रसिद्धि हुई। शतरूपाके गर्भसे दो कन्याओंका भी जन्म हुआ। उनमेंसे एकका नाम ऋद्धि (आकूति) और दूसरीका प्रसूति था। स्वायम्भुव मनुने प्रसूतिको विवाह दक्षसे और ऋद्धि (आकूति)-का रुचि प्रजापतिसे किया। प्रजापति रुचि और आकूतिसे जुड़वीं सन्तान उत्पन्न हुई, जिनमें एक पुत्र था और दूसरी कन्या। पुत्रका नाम यज्ञ और कन्याका दक्षिणा था। यज्ञके 'याम' नामसे विख्यात बारह पुत्र हुए। वे ही स्वायम्भुव मन्वन्तरमें बारह देवता कहलाये। ये बड़े तेजस्वी थे।
दक्षने प्रसूतिके गर्भसे चौबीस कन्याएँ उत्पन्न
* भृगुं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुमङ्गिरसं तथा। मरीचिं दक्षमत्रिं च वसिष्ठं चैव मानसम्।
नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः॥ (५०। ५-६)
- स्वायम्भुव मनुकी वंश-परम्परा तथा अलक्ष्मी-पुत्र दुःसहके स्थान आदिका वर्णन * १२९
कीं; उनके नाम ये हैं, सुनो—श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि तथा तेरहवीं कीर्ति। इन सबको धर्मने अपनी पत्नीके रूपमें ग्रहण किया। इनसे शेष जो ग्यारह छोटी कन्याएँ थीं, उनके नाम इस प्रकार हैं—ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, संनति, ऊर्जा, अनसूया, स्वाहा और स्वधा। इन सबको क्रमशः भृगु, महादेवजी, मरीचि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, अत्रि, अग्नि और पितरोंने ग्रहण किया। श्रद्धाने कामको, लक्ष्मीने दर्पको, धृतिने नियमको, तुष्टिने संतोष और पुष्टिने लोभको उत्पन्न किया। मेधासे श्रुतका, क्रियासे दण्ड, नय और विनयका, बुद्धिसे बोधका, लज्जासे विनयका, वपुसे व्यवसायका, शान्तिसे क्षेमका, सिद्धिसे सुखका और कीर्तिसे यशका जन्म हुआ। ये सभी धर्मके पुत्र हैं।
कामसे उसकी पत्नी रतिने हर्ष नामक पुत्र उत्पन्न किया, जो धर्मका पौत्र कहलाया। अधर्मकी स्त्री हिंसा थी। उसके गर्भसे अनृत नामक पुत्र और निरृति नामवाली कन्या उत्पन्न हुई। फिर इन दोनोंसे दो पुत्रों तथा दो कन्याओंका जन्म हुआ। पुत्रोंके नाम थे नरक और भय तथा कन्याओंके नाम थे माया और वेदना। वे उनकी पत्नयाँ हुईं। इनमें भयकी स्त्री मायाने सब प्राणियोंका संहार करनेवाले 'मृत्यु' नामक पुत्रको उत्पन्न किया और वेदनाने नरकके संसर्गसे दुःख नामक पुत्रको जन्म दिया। मृत्युसे व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा और क्रोध उत्पन्न हुए। ये सब अधर्मरूप हैं और दुःखके हेतु बतलाये जाते हैं। इनके स्त्री और पुत्र नहीं हैं। ये सभी ऊर्ध्वरेता हैं।
अलक्ष्मीके चौदह पुत्र हैं, जिनमें तेरह तो क्रमशः दस इन्द्रिय, मन, बुद्धि और अहङ्कारमें पृथक्-पृथक् रहते हैं। चौदहवेंका नाम दुःसह है, वह मनुष्योंके गृहोंमें निवास करता है। वह भूखसे दुर्बल, नीचा मुख किये, नंग-धड़ंग और चिथड़ा लपेटे रहता है; उसकी आवाज कौएके समान है। जब ब्रह्माजीने उसे उत्पन्न किया, तब वह सबको खा जानेके लिये उद्यत हुआ। वह तमोगुणका भंडार था और बड़ी-बड़ी दाढ़ोंके कारण अत्यन्त विकराल जान पड़ता था। उसका मुँह फैला हुआ था, इससे वह और भी भयंकर जान पड़ता था। उसको आहारके लिये उत्सुक देख लोकपितामह ब्रह्माजीने कहा—'दुःसह ! तुझे इस संसारका भक्षण नहीं करना चाहिये। तू अपना क्रोध शान्त कर। रजोगुणकी कला त्याग और इस तामसी वृत्तिको भी छोड़ दे।'
दुःसहने कहा—जगदीश्वर ! मैं भूखसे दुर्बल हो रहा हूँ और प्यास भी मुझे जोरसे सता रही है। नाथ ! बताइये—मुझे कैसे तृप्ति हो, मैं किस तरह बलवान् बनूँ? तथा मेरा निवास-स्थान कौन है, जहाँ मैं सुखसे रह सकूँ?
ब्रह्माजीने कहा—बेटा ! मनुष्योंका घर तुम्हारा निवास-स्थान है, अधर्मपरायण पुरुष तुम्हारे बल हैं तथा नित्यकर्मके त्यागसे ही तुम्हारी पुष्टि होगी। मर्म-व्रण और फोड़े तुम्हारे वस्त्र होंगे। अब तुम्हारे लिये आहारकी व्यवस्था करता हूँ। जिसमें किसी प्रकारकी क्षति पहुँची हो, कीड़े पड़ गये हों, कुत्तेने दृष्टि डाली हो, जो फूटे बर्तनमें रखा हो, जिसे मुँहसे फूँक-फूँककर ठंडा किया गया हो, जो जूठा और अपक्व हो, जिसमेंसे पानी छूटता हो, जिसको किसीने चख लिया हो, जो शुद्धतापूर्वक तैयार न किया गया हो, जिसे फटे आसनोंपर बैठकर भोजन किया गया हो, जो अपने समीपवर्तीको नहीं दिया गया हो, विपरीत दिशा अथवा कोणकी ओर मुँह करके खाया गया हो, दोनों सन्ध्याओंके समय और नाच, बाजा एवं स्वर-तालके साथ जिसको खाया गया हो, जिसे रजस्वला स्त्रीके द्वारा लाया, खाया अथवा देखा गया हो तथा जो और किसी दोषसे युक्त हो—ऐसा कोई भी खाने-पीनेका सामान तुम्हारी पुष्टिके लिये मैं तुम्हें देता हूँ।
१३० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
यक्ष्मन्! बिना श्रद्धाका हवन, बिना नहाये, बिना जलके, अवहेलनापूर्वक दिया हुआ दान, जो व्यर्थ पड़ो हो अथवा फेंक दी जानेवाली हो, ऐसी वस्तुका दान और अत्यन्त अभिमानसे, दोषसे, क्रोधसे तथा कष्ट मानकर किया हुआ दान—इन सबका फल तुम्हें ही मिलेगा! कन्याका मूल्य चुकानेके लिये जो धनोपार्जनकी क्रिया की जाती है तथा जो असत् शास्त्रोंद्वारा सम्पादित होनेवाली क्रियाएँ हैं, उन सबका फल तुम्हारी पुष्टिके लिये तुम्हें देता हूँ। जो कार्य केवल धन कमानेके लिये किया जाता है, धर्मकी दृष्टिसे नहीं तथा जो सत्यकी अवहेलनापूर्वक अध्ययन किया जाता है, वह सब तुम्हारी इच्छा-पूर्तिके लिये तुम्हें दे रहा हूँ। जो मनुष्य गर्भिणी स्त्रीके साथ समागम करते, सन्ध्या और नित्यकर्मका उल्लङ्घन करते तथा असत्-शास्त्रोंके अनुसार कार्य या उनकी चर्चा करके दूषित होते हैं, ऐसे मनुष्योंको दबानेकी तुममें पूरी शक्ति होगी।
दुःसह! जहाँ एक ही पङ्क्तिमें दो तरहका भोजन परोसा जाता हो, अतिथि-सत्कार और बलिवैश्वदेवका उद्देश्य न रखकर केवल अपने लिये भोजन बनाया जाता हो, भोजनमें भेद रखा जाता हो अर्थात् किसीके लिये अच्छा और किसीके लिये खराब बनता हो और जहाँ घरमें रोज-रोज कलह होता हो, वहीं तुम्हारा निवास है। जहाँ गाय-घोड़े आदि वाहन बिना खिलाये-पिलाये बाँध दिये जाते हों और संध्याके पहले ही जिस घरको धो-बुहारकर साफ नहीं किया जाता हो, वहाँ रहनेवाले मनुष्योंको तुमसे भय प्राप्त होगा। जो मनुष्य बिना व्रतके ही उपवास करते, जूए और स्त्रियोंमें आसक्त रहते, दुःसह वचन बोलते और विडालव्रती होते—बिल्लियोंकी तरह ऊपरसे साधु बनकर छिपे-छिपे अपना उल्लू सीधा करते हैं, वे सब तुम्हारे उपकारी हैं। जो ब्रह्मचर्यपालनके बिना ही अध्ययन और विद्वान् हुए बिना ही यज्ञ करते हैं, तपोवनमें रहकर भी ग्राम्य विषय भोगोंका सेवन करते और अपने मनको जीतनेका यत्न नहीं करते तथा जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र अपने-अपने कर्मसे भ्रष्ट होते हैं, ऐसे लोग परलोककी इच्छासे जो भी चेष्टा करते हैं, उसका सारा फल तुम्हींको मिलेगा।
यक्ष्मन्! तुम्हारी पुष्टिके लिये और भी उपाय बताता हूँ, सुनो। जो लोग बलिवैश्वदेवके अन्तमें तुम्हारे नामके उच्चारणपूर्वक तुम्हें बलि अर्पण करते हैं और 'यक्ष्मँस्तत्ते निर्णेजनं नमः' कहकर उसे त्यागते हैं, जो शुद्धतापूर्वक बना हुआ अन्न विधिपूर्वक भोजन करते, बाहर-भीतरसे पवित्र रहते, लोलुपता नहीं रखते और स्त्रियोंके वशीभूत नहीं होते, ऐसे मनुष्योंके घरोंको तुम त्याग देना। जहाँ हविष्यसे देवताओंकी और श्राद्धान्नसे पितरोंकी पूजा होती हो तथा कुलकी स्त्रियों, बहनों और अतिथियोंका स्वागत सत्कार होता हो, उस घरको भी छोड़ देना। जहाँ बालक, वृद्ध, स्त्री-पुरुष तथा स्वजनवर्गमें प्रेम हो, जहाँकी स्त्रियाँ आनन्दपूर्वक रहती हों, बाहर जानेके लिये उत्सुक नहीं होतीं तथा लज्जाकी रक्षा करती हैं, उस घरपर भी दृष्टि न डालना। जहाँ अवस्था और सम्बन्धके अनुसार शयन, आसन और भोजनकी व्यवस्था हो, जहाँके निवासी दयालु, सत्कर्मपरायण और साधारण सामग्रीसे युक्त हों तथा जिस घरके लोग गुरु, वृद्ध एवं ब्राह्मणोंके खड़े रहनेपर स्वयं भी आसनपर नहीं बैठते, वह घर भी तुम्हें छोड़ देना चाहिये। देवता, पितर, मनुष्य और अतिथियोंके भोजनसे बचा हुआ अन्न ही जिसका भोजन है, उस पुरुषके घरमें भी तुम पैर न रखना।
जो सत्यवादी, क्षमाशील, अहिंसक, दूसरोंको पीड़ा न देनेवाले तथा दोषदृष्टिसे रहित हों, ऐसे पुरुषोंको तुम छोड़ देना। जो अपने पतिकी सेवामें संलग्न रहती, दुष्टा स्त्रियोंका साथ नहीं करती तथा कुटुम्बके लोगों एवं पतिके भोजन करनेसे बचे हुए अन्नको ही खाकर अपने शरीरका पोषण करती है, ऐसी स्त्रीको भी तुम हाथ न लगाना।