मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
५२८ मार्क्सवाद और रामराज्य प्राचीन भौतिकवादी एव द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी दोनोंहीकी खोजसे परमार्थ सत्य मिलनेवाला नहीं है । परमार्थ निःसीम सत्य एक ही है, उसमे पूर्णता- अपूर्णताकी खिचड़ी नहीं है । उसी परमार्थ सत्यका औपाधिकरूप स्वप्न, शुक्ति, रजतादिमें प्रातिभासिक सत्यरूपमें प्रस्फुटित होता है । व्यावहारिक आकाशादिमें व्यावहारिक सत्यरूपमें प्रस्फुटित होता है । अत्यन्त अबाध्य वस्तु ही परमार्थ सत्य होती है, अतः परमार्थ सत्यका अनन्त एव कालातीत होना स्वाभाविक है । अविचारित संघातप्राय मनुष्य भले ही आपेक्षिक सत्य हो, परंतु विचारनिर्णीत स्वरूप तो मनुष्योका ही नहीं प्राणिमात्रका अनन्त सत्य ही है और इस अनृत मर्त्य मनुष्य-देहादिसे ही सत्य अमृत प्राप्त करना जीवनका ध्येय है, यही बुद्धिमानोकी मनीषाका माहात्म्य है— एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम् । यत्सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम् ॥ ( श्रीमद्भा० ११।२९।२२ ) अठारहवीं सदीके भौतिकवादियोसे बहुत पहले ईसाके भी बहुत पहले भगवान् श्रीकृष्णने स्थूलदेह एवं इन्द्रिय, मन, बुद्धि प्राणादि युक्त सूक्ष्म शरीरको यन्त्र मानकर यन्त्रारूढ जीवोको ईश्वराधिष्ठित मायाद्वारा भ्रमण करना माना है— ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ( गीता १८ । ६१ ) शरीर, दिमाग आदिसे उत्तम यन्त्र अबतक कोई भी नहीं निकले हैं । बल्कि यों कहना चाहिये कि रेल, तार, रेडियो, मोटर, हवाईजहाज एव अन्य कारखानोके मशीन-यन्त्र आदि सबका आविर्भाव करनेवाला मनुष्य शरीर, बुद्धि, मस्तिष्क ही है । सुतरां इस सर्वोत्कृष्ट यन्त्रका निर्माता तथा संचालक सर्वज्ञ ईश्वर ही है । वस्तुकी स्वयंगति असिद्ध है । अचेतन रथादिकी गति चेतनाधिष्ठित ही होती है । अतः जल, वायु आदिकी प्रवृत्ति भी अन्तर्यामी चेतनसे अधिष्ठित ही होती है । यदि स्वयंगति भूत है तब उनसे स्वयं ही विलक्षण कार्योंकी उत्पत्ति होनी चाहिये, फिर चेतन मनुष्यकी इच्छानुसार जडभूतकी कार्याकारेण परिणति न होनी चाहिये । अग्नि, जल, वायुके तुल्य स्वयं गति होनेपर भी कार्यानुकूल गतिके लिये चेतन ईश्वर नियामक एवं व्यवस्थापकरूपसे आवश्यक है । विरोधियोके एकत्वके सम्बन्धमें कहा जा चुका है कि भाव, अभाव-जैसे विरोधियोंकी एकता सर्वथा असम्भव तथा अदृष्ट है । अग्नि, जल, सत्त्व, रज, तम-जैसे विरोधियोका भी सहयोग होता है, एकता नहीं । 'वस्तु अर्थात् कार्यसे मनन-क्रिया अर्थात् ज्ञानका आरम्भ होता है', यह कल्पना भी व्यर्थ
है । अनुभव-सिद्ध बात है कि 'जानाति, इच्छति, अथ करोति' प्राणी किसी वस्तुको जानता है, फिर इच्छा करता है, फिर कर्म करता है । किसी भी कर्मके लिये पहले सङ्कल्प अपेक्षित होता है । 'यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते।' (छा० उ०) प्राणी जैसा सङ्कल्प करता है, वैसा ही कर्म करता है— सङ्कल्पमूलः कामो वै यज्ञाः सङ्कल्पसम्भवाः । व्रतानि यमधर्माश्च सर्वे सङ्कल्पजाः स्मृताः ॥ अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कर्हिचित् । यद्यद्धि कुरुते किंचित्तत्तत्कामस्य चेष्टितम् ॥ (मनुस्मृ० २ । ३-४) सभी काम सङ्कल्पसे ही होते हैं और सकामकी ही क्रिया होती है । निःसङ्कल्प निष्कामकी कोई भी क्रिया कभी भी देखी नहीं जाती । विश्वनिर्माण भी ईश्वरीय सङ्कल्पन तथा चिकीर्षामूलक ही है । व्यवहारमें भी कोई शिल्पी पहले वस्तुकी कल्पना या सङ्कल्प करता है, फिर इच्छा करता है, पुनः साधन-सङ्ग्रहपूर्वक मनःस्थ वस्तुको बाह्याकार देता है । लेनिनका सूत्र इस सहज स्वाभाविक व्यवहारका उल्लङ्घन करता है । वस्तु-तत्त्वको तोड़ना और पुनर्निर्माण करना यह द्वन्द्ववादी भाषा ही असङ्गत है । पुनर्निर्माण शब्द निर्मित वस्तुके ही पुनर्निर्माणके अर्थमें प्रयुक्त होता है, नव निर्माण और पुनर्निर्माणमें यही अन्तर है । मृत्पिण्डका विभाजन घट- निर्माणके लिये होता है । एक अवस्था हटनेपर ही दूसरी अवस्था आ सकती है । अतः पिण्डावस्था हटती है, तब घटावस्था आती है । इस तरह कार्यावस्थासे पूर्व व्यवस्थाका प्रत्यावर्तन नहीं होता । देशकाल तथा विविध सम्बन्धित पदार्थोंसे सम्बन्ध रहनेपर भी पृथक्त्व रहता ही है, वैज्ञानिक विश्लेषण भी तभी सार्थक है । सम्मिलित, सम्बन्धित, अविविक्त भूमण्डल सूर्यमण्डलमें विवेकद्वारा विभिन्न गुणधर्मयुक्त अनेक पदार्थ मिलते हैं । यों तो कारणरूपसे सभीकी एकता है । पार्थिवरूपसे अभिन्न होते हुए भी लोहा, सोना, चाँदी, पत्थर, मिट्टी आदि रूपसे भिन्नता मानना ही तत्त्वज्ञान है । अध्यात्मवादके लिये यह कोई नयी वस्तु नहीं है । वस्तुके यथार्थ जो भी दृष्टिकोण हो, उपयोगिताकी दृष्टिसे सभीपर विचार होना चाहिये । काकदन्तपरीक्षा, गर्दभरोमगणना आदि व्यर्थकी परीक्षाएँ होती हैं, वे अमान्य होती हैं । कहा जाता है कि 'प्रत्येक वस्तु विराट् विश्वप्रक्रियाका एक अङ्ग है । इसकी प्रकृतिको इसकी रूपान्तरिक अवस्थासे अलग करके नहीं समझा जा सकता ।' यही लेनिनका तीसरा सूत्र है । 'हमें वस्तु या दृश्यगत घटनाओंके विकास इसकी अपनी गति, इसके अपने जीवन आदिका विचार करना चाहिये ।
मा० रा० ३४—
५३० मार्क्सवाद और रामराज्य लेकिन यह विकास ऐसा नहीं है जो मनमानी ढंग.से, बिना किसी कारणके रहस्य- मयरूपमें होता है। विकास सदा बाहरी सम्बन्ध तथा आन्तरिक सम्बन्धोंकी जाँचका है। हमें वस्तुकी अन्तर्विरोधी प्रवृत्तियो और दिशाओकी खोज करनी चाहिये। यही लेनिनका चौथा सूत्र है। पाँचवाँ सूत्र है कि 'हमें वस्तुको विरोधियोंके एकत्व तथा योगफलके रूपमें देखना चाहिये।' छठा सूत्र है—इन विरोधियोंके पटविस्तार तथा संघर्षको हमें देखना चाहिये और सातवाँ सूत्र वस्तुके विश्लेषण तथा समन्वयका एकीकरण है। आठवाँ सूत्र है—प्रत्येक वस्तुका सम्बन्ध न केवल बहुविध है बल्कि सार्वभौमिक है। प्रत्येक वस्तु प्रत्येक अन्य वस्तुसे सम्बन्धित है। नवाँ सूत्र न केवल विपरीतोंका एकत्व बल्कि प्रत्येक गुणका उसके विपरीतमें रूपान्तरित होना है। दसवाँ सूत्र नये पाश्र्वों और सम्बन्धोंके दृश्यगत होनेकी असीम क्रिया है। ग्यारहवाँ सूत्र है—मनुष्यद्वारा वस्तु, दृश्य, क्रिया इत्यादिके ज्ञानको गहराईमें ले जानेकी तथा बाह्यावरणसे तत्त्वपर और कम गहराईके तत्त्वसे अधिक गहराईके तत्त्वपर पहुँचनेकी असीम क्रिया। बारहवाँ सूत्र है—सह अस्तित्वसे कार्य-कारणके सम्बन्धको पहुँचना। एक प्रकारके सम्बन्ध और पारस्परिक निर्भरतासे अधिक गहरा तथा अधिक व्यापक सम्बन्ध—तथा पारस्परिक निर्भरताकी ओर जाना। तेरहवाँ सूत्र निम्नस्तरसे ऊँचेस्तरपर विकासकी क्रियामें कुछ गुणोंकी पुनरावृत्ति है। चौदहवाँ सूत्र प्रतीयमानरूपसे पुराने रूपपर लौट जाना 'प्रतिषेधका प्रतिषेध' है।।" रामराज्यकी दृष्टिमें प्रत्येक वस्तु महाविराट्का ही अंश है। सुतरां मूलके गुण-धर्म, शाखा-उपशाखाओंमें होने उचित ही हैं। कारणकी अपेक्षा कार्योंमें अनिर्वचनीय विलक्षणता भी होती ही है। स्पष्टतया स्पर्शहीन आकाशसे स्पर्शवान् वायुकी, रूपहीनवायुसे रूपवान् तेजकी उत्पत्ति स्पष्टरूपसे होती है। मनमानी ढंगसे विकास तो जड़वादी ही मानते हैं। अध्यात्मवादी तो हरएक कार्यके साधारण, असाधारण— कई ढंगके कारण मानते हैं, परंतु सभी कारण दृष्ट ही नहीं, कुछ अदृष्ट भी होते हैं। दिक्, काल-आकाश, ईश्वर, अपूर्व 'अदृष्ट' प्रागभाव, प्रतिबन्धकाभाव आदि साधारण कारण होते हैं। उपादान, निमित्त, सहकारी आदि अनेक असाधारण कारणका योग होता है, तभी कोई विकार सम्पन्न होता है। विरोधियोंके एकत्व- की अपेक्षा सहयोगियोंके सहयोग.से कार्यकी उत्पत्ति कहना कहीं अधिक सङ्गत है। विरोधियोंके संघर्षकी कल्पनाकी अपेक्षा यही कहना ठीक है कि किसी समान उद्देश्यकी सिद्धिके लिये विरोधी भी सहयोगी हो जाते हैं। विरोधियोंके संघर्षका सहयोगरूपमें परिवर्तन हुए बिना दोमेंसे एकका विनाश ध्रुव है। फिर
Wait, does our second letter look like 'द'? No, our second letter has a vertical line on the right! Wait, does 'त' have a vertical line on the right? In Devanagari, 'त' has a vertical line on the right, and a horizontal stroke curving down to the left! Does our second letter have that? Wait, look at 'त' in 'रहते' (right next to it!): 'र', 'ह', 'ते'. In 'ते': vertical line on the right, stroke going left and down. Look at our second letter: Vertical line on the right... wait! Does it have a loop? Wait, look at 'त' in 'एकताका' (line 1): 'ए' 'क' 'ता' 'का'. Look at the mystery word: Wait, could it be: "सतत् रहते हुए"? Wait, why would there be a reph on the third letter? Wait, is that a reph on the third letter? Let's look at the image really closely. Let's look at the dot above it or mark above it. Wait! Could it be: "स त र् थ"? Wait, what about "सर्वथा"? Could it be "सर्वथा"? Let's spell "सर्वथा": स र् on व? No, 'र्' on 'था'! Wait, in "सर्वथा": 'स', 'र्व', 'था
५३२ मार्क्सवाद और रामराज्य अनित्य ही हैं । जिस वस्तुका प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव तथा अत्यन्ताभाव बन सकता है, उस वस्तुको निस्सीम कहना उपहासास्पद ही है । जैसे अनादि परमाणुकी श्यामता अग्निजन्य पाकसे नष्ट होती है, अग्निसे दग्ध होनेसे अनादि बीजाङ्कुरकी परम्परा टूट जाती है, उसी तरह विश्वप्रपञ्चकी परम्परा भी कालसे किंवा तत्त्वज्ञानसे टूट जाती है । मार्क्सवादी विश्वकी निस्सीमतामें प्रत्यक्ष-प्रमाण एव प्रत्यक्ष साधन-यन्त्रोंका प्रयोग वर्तमान कालके लिये जो भी करे, परंतु भविष्यके सम्बन्धमें तो प्रत्यक्ष या यन्त्र कथमपि सफल नहीं हो सकते । अनुमान कोई ऐसा निर्दोष नहीं है जिसने विश्वकी अनन्तता या निस्सीमता विदित हो सके । फिर क्रिया कोई भी चाहे वह प्रातिस्विक हो या सामूहिक, निःसीम नहीं कही जा सकती । मनुष्यद्वारा वस्तु, दृश्य, क्रिया इत्यादिके ज्ञानकी गहराईमें ले जानेकी तथा बाह्यावरणसे तत्त्वपर और कम गहराईके तत्त्वसे अधिक गहराईपर पहुँचनेकी असीम क्रियाकी बात भी कल्पना ही है । अतत्त्व अनात्मसम्बन्धी ज्ञान यद्यपि अल्पज्ञ जीवके लिये असीम ही है, फिर भी सर्वज्ञ ईश्वरके लिये वह भी निस्सीम नहीं । दूसरी दृष्टिमे ज्ञातरूपसे तथा अज्ञातरूपसे सभी वस्तु साक्षी भास्य है— ‘किञ्चिज्जानामि किञ्चिन्न जानामि’ अमुकको नहीं जानता हूँ, अमुकको जानता हूँ— इस रूपसे अज्ञानविषयतया या ज्ञानविषयतया सभी वस्तु साक्षीभास्य हैं । सर्वकारण सर्वाधिष्ठानरूपसे भी परम तत्त्वका ज्ञान अन्तिम ही तत्त्वज्ञान है । इसी ज्ञानके सम्बन्धमें गीताचार्यका कहना है— ' यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते । (७।२) जिसको जानकर पुनः अन्य कुछ भी ज्ञातव्य नहीं रहता— एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ (१५।२०) इस तत्त्वको जानकर प्राणी बुद्धिमान् होता है और कृतकृत्य हो जाता है । उपनिषदे भी कहती हैं—आत्माके श्रवण, मनन, विज्ञानमें सबका श्रवण, मनन तथा विज्ञान हो जाता है— आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् । (बृहदा० उप० २।४।५) जैसे पृथ्वीके विज्ञानसे पार्थिवतत्त्व, जलके विज्ञानसे जलीयतत्त्व तरङ्ग आदिका विज्ञान हो जाता है, वैसे ही सर्वकारण सर्वाधिष्ठानके विज्ञानसे सब कुछ विज्ञात हो जाता है । सहयोगियोंका सहअस्तित्व तो सभी मानते हैं। विरोधियोंका भी सहअस्तित्व अगर मार्क्सवादको मान्य है, तब तो फिर मजदूर और मालिकका भी सहअस्तित्व
हो ही सकता है। फिर मार्क्सवादी चूहा, बिल्लीके तुल्य वर्गोंका अमिट विरोध क्यो मानते हैं ? पारस्परिक सम्बन्ध तथा निर्भरताकी बात अच्छी है, पर स्वात्मनिर्भरताका भी महत्त्व नहीं भूलना चाहिये । परमुखापेक्षिता दोष भी है। अध्यात्मपक्ष माननेपर तो बाह्य साधनानपेक्षता बडे ही महत्त्वकी वस्तु है। उत्तरोत्तर ज्ञान, क्रिया, शक्तिका विकास हो रहा है, संसार उन्नतिके उच्च शिखरकी ओर बढ़ रहा है, इस विश्वासमें भी अन्धविश्वासका ही अंश अधिक है। स्तर भेद होनेपर भिन्नता ही कहना चाहिये, पुनरावृत्ति नहीं। प्रतिषेधके प्रतिषेधकी मार्क्सवादी मान्यता असङ्गत है, यह पीछे दिखाया जा चुका है। अङ्कुरके कारणभूत जौके दाने अङ्कुरके फलभूत जौके दानोंसे सर्वथा भिन्न हैं। यह प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण नहीं हो सकता । इसका शुद्ध उदाहरण पीछे दिखलाया जा चुका है। “पन्द्रहवाँ सूत्र लेनिनका है—रूप और सार, आवार और आकारके अदर अस्तित्वका सघर्ष तथा इसका विपरीत। सोलहवाँ सूत्र है—परिमाणका गुणोंमें परिवर्तन तथा इसका विपरीत, व्याख्या और उदाहरण । जीवनका उदाहरण प्रकृतिके द्वन्द्वात्मक रूपपर स्पष्ट प्रकाश डालता है । अवयवके तथा कोषके जीवनमें जीवन और मृत्यु, आविर्भाव और तिरोभाव, अन्तर्ग्रहण तथा बहिर्मोचन, भूत और शक्तिको ये पास-पास ही मिलते हैं तथा परस्पर संश्लिष्ट रहते हैं । इसके अतिरिक्त पूँजीवादमे अन्तर्विरोधके तीन सूत्र हैं— १. प्रत्येक भिन्न फैक्टरीमें उत्पादनका सुचारुरूपसे संघटन होता है और सामाजिक उत्पादन क्षेत्रमें अराजकताकी चेष्टा की जाती है । २. एक ओर मशीनकी उत्पत्ति और उत्पादनका विस्तार प्रत्येक पूँजीवादी- के लिये बाध्यतामूलक नियम है, दूसरी ओर उद्योगकी रिजर्व सेनामें वृद्धि और सामयिक संकटका बार-बार होना, ये उत्पादनके सम्बन्ध पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्धोंके विरुद्ध विद्रोह करते हैं । ३. सम्पूर्ण पूँजीवादी प्रथामें एक ओर पूँजी ही सम्पत्ति है और दूसरी ओर उद्योगमें पूँजीका प्रयोग किया जाता है यानी एक ओर बैंकमे एकत्रित पूँजी है और दूसरी ओर औद्योगिक पूँजी है। इस प्रभेदके उदाहरण हैं सूदजीवी, जिनकी जीविका है पूँजीपर सूदद्वारा और दूसरे जो अपनी जीविका पूँजीके व्यावहारिक प्रयोगसे अर्जन करते हैं । ( लेनिन ) “हर प्रथा या क्रियाके आन्तरिक विरोधोके रूप और गुण भिन्न होते हैं । सर्वहाराके अधिनायकत्वमे राष्ट्रका लोप भी विरोधका उदाहरण है, पर यही वर्ग-संघर्षके अन्तका कारण बन जाता है और इस प्रकार राष्ट्रका लोप होता है । आपेक्षिक और पूर्ण सत्य भी विरोधका उदाहरण है।
मार्क्स-दर्शन ५३५ समुन्नत जीवनस्तर बनानेकी जिम्मेदारी मालिकोंपर होगी । व्यक्ति, समाज तथा सरकार—सभीका अनिवार्यरूपसे यह कर्तव्य होगा कि बेकारी तथा आर्थिक असन्तुलन सर्वथा दूर कर दिया जाय । विद्रोह भी प्रचारमूलक है, वास्तविक नहीं । वर्गसहयोगकी सम्भावनाका विस्तार होनेसे विद्रोहका अन्त हो सकता है । मशीनोंकी उत्पत्ति बाध्यतामूलक नहीं है, किंतु लोभमूलक ही है । अन्ततोगत्वा मनुके सिद्धान्तानुसार महायन्त्रोंके निर्माणपर प्रतिबन्ध भी आवश्यक होगा । जैसे विश्वका संहारकारक एवं अनिष्ठ- कारक होनेसे हाइड्रोजन बम आदिके विकासपर प्रतिबन्ध लगाना मार्क्सवादियोंको भी आज आवश्यक प्रतीत हो रहा है, उसी तरह बेकारी एवं संघर्ष तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका नाश होनेसे महायन्त्रोंपर भी प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक होगा । अर्थ तथा औद्योगिक पूँजीका आपसमें कार्यकारण भाव है । दोनोंका दोनों- से विस्तार होता है । उद्योगवृद्धिसे अर्थमें वृद्धि होती है । उससे उद्योगवृद्धिमें सहायता मिलती है । पूँजीपर सूद तो अब रूसमें भी मिलता है । पूँजी उत्पादन- साधन है, जैसे सब उत्पादनोंसे लाभ होता है, वैसे ही पूँजीसे भी सूदके रूपमें लाभ होना उचित ही है । फिर रामराज्यकी दृष्टिमें तो कुसीदवृद्धि निम्नकोटिका जीविका साधन माना जाता है । प्रवाहों एवं क्रियाओंमें अन्तर्विरोध अप्रामाणिक है । सर्वहाराके अधिनायकत्वमें राज्यलोपकी कल्पना तो अभी स्वप्न ही है । अभी तो सर्वहाराका अधिनायकत्व भीषण तानाशाही बन रहा है । सर्वहाराके अधिनायकत्वमें वर्गका लोप केवल डण्डेके बलपर प्रतीत होता है । वस्तुतः लेखन- भाषण, प्रेसकी स्वतन्त्रता न होनेसे वर्गभेद व्यक्त नहीं हो पाता । जब कभी अवकाश मिलेगा, वर्गभेद व्यक्त हो जायगा । मजदूर-किसान आदि समान वर्गोंमें भी परस्पर संघर्ष चलना ही है । सोवियत रूसमें भी कम्युनिस्टोंमें स्टालिन ट्राटस्की आदिका भीषण संघर्ष विख्यात है । आपेक्षिक एवं पूर्ण सत्यका भी विपर्यय होनेसे विरोध असङ्गत है । एक ही वस्तु आपेक्षित तथा पूर्ण सत्य नहीं हो सकती, यह कहा जा चुका है । व्यापकमें कोई विरोध नहीं है—जैसे पशुत्वका गोत्वसे, मनुष्यत्वका ब्राह्मणत्वसे कोई विरोध नहीं । इसी प्रकार सभी व्यापक-व्याप्योंमें अविरोध ही है । बुखारिनका यह कथन आंशिक सत्य है कि एक दूसरेके विरुद्ध भिन्न कार्यकारिणी शक्तियाँ पृथ्वीपर वर्तमान हैं । यह कहना उचित है कि विविध विश्वमें विरोधिनी तथा अनुरोधिनी अनेक प्रकारकी शक्तियाँ वर्तमान हैं । यदि विरोध ही जगत्का तत्त्व है, तब तो सहयोगमूलक कार्य ही नहीं होना चाहिये । किंतु वैर, प्रेम, सहयोग, विरोध—सभी संसारमें चलता है । सत्त्वादि गुण परस्पर
५३४ मार्क्सवाद और रामराज्य विशिष्ट और व्यापकके सम्बन्धमे अन्तःप्रवेश भी विरोधका एक उदाहरण है। (व्यापक साधारण) के सम्बन्धसे विच्छिन्न होकर विशिष्टका कोई अस्तित्व नहीं है और विशिष्टोंसे ही व्यापकका अस्तित्व है। प्रत्येक व्यापकरूप केवल करीब-करीब ही सब विशिष्ट वस्तुओका अपनी व्यापकतामें ला सकता है। और प्रत्येक विशिष्ट वस्तु कुछ-न-कुछ व्यापक रूप ग्रहण करती है।" अन्तर्विरोधपर बुखारिन "एक दूसरेकी विरोधी भिन्न कार्यकारी शक्तियाँ पृथ्वीमें वर्तमान हैं। व्यतिक्रमके रूपमे इन शक्तियोंका समीकरण होता है, तब विरामकी स्थिति होती है। यानी उनके वास्तविक विरोधपर एक आवरण पड जाता है। लेकिन किसी एक शक्तिमें तनिकमात्र परिवर्तन करनेहीसे अन्तर्विरोधोका पुनराभास होता है। और उस समीकरणका अन्त होता है और यदि एक नये समीकरणकी सृष्टि होती है तो यह एक नये आधारपर यानी शक्तियोके एक नये संयोगसे ही होती है। मार्क्सीय द्वन्द्वन्याय इस विरोधको भुला नहीं देता, लेकिन सामाजिक विकासमें इस विरोधको मुख्य स्थान नहीं देता। इतिहासके अध्ययनसे हम यह पाते है कि यद्यपि भिन्न देशोंमें भूगोल, जलवायु, उद्भिज, जगम और प्राकृतिक सम्पद्मे परिवर्तन नहींके बराबर हुआ, तथापि वहाँके सामजिक सम्बन्धोंमें महान् परिवर्तन हो गये, जैसे सामन्तप्रथाके स्थानपर पूँजीवादकी स्थापना।' रूप एव सार आदिका सघर्ष तथा परिमाणका गुणमें परिवर्तनकी कल्पना निराधार है। जीवन-मृत्युका तिरोभाव-आविर्भाव, अन्तर्ग्रहण तथा बहिर्मोचन आदि काल और विषयभिन्न होनेसे विरोध या सघर्षका प्रश्न ही नही उठता। ये सब चीजे समान वस्तुके विषयमे समान कालमें परस्पर विरुद्ध ठहरती हैं। कालभेदसे किसी भी वस्तुका आविर्भाव-तिरोभाव आदि निर्विरोध ही है। इसी तरह एक ही कालमे एककी मृत्यु अन्यका जन्म आदि होनेसे कोई विरोध नहीं होता। पूर्वगृहीत वस्तुका बहिर्विमोचन, अगृहीत वस्तुका ग्रहण भी परस्पर विरुद्ध नहीं है। अतः इसे सघर्ष नही कहा जा सकता। पूँजीवादके अन्तर्विरोधकी कल्पना भी अतात्त्विक ही है। रामराज्यप्रणालीसे उत्पादन तथा वितरणकी व्यवस्था होनेसे यह विरोध टिक ही नहीं सकता। धन एवं पूँजीका भेद सिद्धान्ततः अमान्य है। प्रजाके उपभोगार्थ उत्पादनसे भी लाभ आनुषङ्गिकरूपमें प्राप्त होता है। उत्पादन-कार्यमें लाभके अनुसार कामके घंटोंमें कमी, मजदूरोकी सख्याकी वृद्धि तथा मजदूरोंका भी उचित दर होनेसे न बेकारी ही रहेगी और न क्रयशक्तिमें ही कमी आयगी और न मालकी खपतमे कोई गड़बडी होगी। भोगोपयोगी वस्तुओका ही निर्माण करना और मजदूरोके
५३६ मार्क्सवाद और रामराज्य विरोधी होनेपर भी विमर्दवैचित्र्य, परस्पर सहकारसे वे भी कार्यक्षम होते हैं। गुणोंकी विषमतासे गुणोंमे सहकार होता है, समतामें विरोध होता है। सारी सृष्टि गुणोंकी विषमता एवं सहकारके आधारपर ही टिकी है। परिणामी गुणोंका समता, विषमता—दोनो ही धर्म है। प्रलयानुगुण कर्मोंकी अपेक्षासे समता तथा सृष्टिके अनुगुण कर्मोंसे विषमता होती है। संसारमें प्रेम, परोपकार, सहयोग स्वाभाविक है; विरोध, ध्वंस निम्नगामिनी प्रवृत्तियोंके परिणाम तथा प्रामादिक हैं। वेदान्तकी दृष्टिसे सभी चराचर विश्व विशेषतः प्राणिवर्ग परमेश्वरकी ही संतान है—'अमृतस्य पुत्राः।' उनका तो समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृत्ता ही मुख्य स्वभाव है। विरोध ही आवरणका कारण होता है, आवरण हटते ही विरोधका कहीं पता नहीं लगता—'उमा जे राम चरनरत बिगत काम मद क्रोध। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध ॥' जो जगत्की स्वाभाविक मूलभूत स्वाभाविक स्थितिको पहचानते हैं, वे लोग सम्पूर्ण ससारको भगवद्रूप ही देखते हैं। फिर वे किससे विरोध करे ? स्वाभाविक स्थितिसे अविद्या, काम, कर्मद्वारा प्रच्युति होनेपर अविद्या स्वार्थ आदिके जागरूक होनेपर फिर विरोध-वैमनस्य चलता है। तभी 'जीवो जीवस्य जीवनम्' जीवसे ही जीवका जीवन चलता है—यह धर्म-प्रच्युतिमूलक मात्स्यन्याय फैलता है। स्पेन्सर आदिके संघर्षवादका अन्धानुकरण ही मार्क्सवादियोका अन्तर्विरोध है। इसके अनुसार जो प्रबल होगा उसीका जीवित रहना न्यायसिद्ध है। इसमें किसी गरीब कमजोरकी सहायता करना मूर्खता है। जो अपनेको बदली हुई परिस्थितिके अनुकूल नहीं बदल सकता, वही गरीब है। उसपर दया करना बेकार है। परंतु आजके परस्पर सहकार सहयोगके जमानेमें यह एक अत्यन्त उपहासास्पद वस्तु है। इसी तरह 'पुराने समीकरणका अन्त तथा नये समीकरणको नये आधारपर शक्तियोंके नये संयोगसे सृष्टि होती है'—यह कहना भी पिष्टपेषण ही है। अभ्युदयानुगुण परिवर्तनमें नये संयोगो या नये परिणामोंका अङ्गीकार सभीको सम्मत है ही। सामाजिक परिवर्तनोंका कारण ज्ञान, क्रिया, शक्तिका परिवर्तन ही है, और उनमें भी ज्ञान-शक्तिका विकास ही मुख्य है। भौगोलिक तथा वातावरणका परिवर्तन भी इन नये परिवर्तनोंमें कारण होते हैं। जो लोग उत्पादन-साधनोंके परिवर्तनोंके आधारपर ही सामाजिक परिवर्तन मानते हैं, उन्हें भी उत्पादन साधनोंके परिवर्तनका कारण ढूंढ़ना पड़ेगा और अन्ततोगत्वा बुद्धिपर ही आना पड़ेगा। बुद्धिमें कारण शिक्षण तथा अभ्यास ही होता है। आरम्भमें शिक्षण, अन्तमें अभ्यास और अन्वेषणके ही प्राखर्यसे बुद्धिका विकास होता है। बुद्धि- विकाससे धन-धान्य समृद्धिके कारण यन्त्रोंका भी विकास होता है और उसके
बिना भी आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक क्षेत्रमें विकास होता है, इसीलिये कल- कारखानोंके विकासके बिना भी प्राचीन भारतमें आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक विकास उच्चकोटिका हुआ था। यद्यपि महायन्त्रोंका विकास प्राचीनकालमें भी हुआ था, तथापि उसका दुष्परिणाम देखकर उसे उपपातक निश्चितकर उसपर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। फिर भी विशिष्ट शस्त्रास्त्र, विमान, रथ तथा शिल्पकलादिका विकास मय, विश्व- कर्माद्वारा होता ही रहा। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि भाप या बिजलीकी चक्की तथा कपड़ों, लोहों, ताम्रादिके बड़े-बड़े कल-कारखानोंके विकास बिना धार्मिक, सामाजिक विकास या कोई उन्नति नहीं होगी। वस्तुतः व्यापक इतिहासके महान् क्षेत्रमें सामन्तवाद और पूँजीवाद-जैसी प्रथाओंका कोई बड़ा महत्त्व नहीं है। प्रमाद-पुरुषार्थ, सुव्यवस्था-दुर्व्यवस्थाके अनुकूल ही अनुकूल-प्रतिकूल परिवर्तन होते रहते हैं। मार्क्सवादियोंके सामने केवल कुछ शताब्दियोंका ही इतिहास है। यदि शताब्दियोंके इतिहासमें इतने परिवर्तन हुए हैं, तो सहस्राब्दियों एवं लक्षाब्दियोंके इतिहासमें क्या क्या परिवर्तन हुए होंगे, इसका भी तो विचार करना चाहिये। आस्तिकोंकी दृष्टिसे मनुष्यलोकमें ही नहीं, किंतु देवलोकके भी विकास तथा अभ्युदयकी पराकाष्ठा निर्धारित ही है, और परम उत्कर्ष कैवल्य—अपवर्गका भी स्वरूप निश्चित है। तैत्तिरीय, बृहदा- रण्यक, कौषीतकि आदि उपनिषदों, इतिहास, पुराणोंमें लौकिक-पारलौकिक उन्नति तथा परम निःश्रेयसके स्वरूप निर्धारित हैं। अन्तमें कहा गया है कि अचिन्त्य अनन्त स्वरूपभूत परमानन्द सुधासिन्धुका एक तुषारमात्र आनन्द ही अनन्त ब्रह्माण्डके धर्मिष्ठ सार्वभौम सम्राट्, मनुष्यगन्धर्व, देवगन्धर्व, कर्मदेव, आजानदेव, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति, ब्रह्मादिके उत्तरोत्तर प्रकृष्ट आनन्दके रूपमें वितरित होता है। मनुष्यलोकके उत्कर्ष-अपकर्षकी कोई ऐसी अवस्था नहीं जो इन करोड़ों वर्षोंमें न आयी हो, अतः शताब्दियोंकी परिवर्तनपरम्परा कोई अभूतपूर्व घटना नहीं है। गुण-परिवर्तन “पूँजीवादमें समाज और प्रकृतिका विरोध तो विद्यमान रहता है, लेकिन इस विरोधके विशिष्टरूपका निराकरण होता है भौगोलिक परिवेष्टनके गुणोंद्वारा नहीं; बल्कि पूँजीवादके विकासके मूल नियमोंके द्वारा। समाज अपने आन्तरिक नियमोंसे और अपनी उत्पादक-शक्तियोंके विकाससे हर विशेष सामाजिक संगठनोंके विशेष साधनोंद्वारा अपने भौगोलिक परिवेष्टनमें परिवर्तन करता है। जंगलोंकी कमी हो गयी है, पेड़ोंके लगाने और गिरानेपर नियन्त्रण रखा जाता है। कोयला काफी नहीं है, पेट्रोलियम उसके स्थानपर इस्तेमाल किया जाता है। चमड़ा, रेशम, ऊनकी कमी है, अतः ये कृत्रिम उपायोंसे बनाये जाते हैं।
हवामें नमीकी कमी है, आवपाशीसे काम लिया जाता है । पशु और वनस्पति जगत्से नये रूपमे प्राप्त होते हैं, क्योकि इनके नये किस्मकी सृष्टि होती रहती है । यदि इतना होते हुए भी पूँजीवादी समाजमे प्राकृतिक परिवर्तन इतना सीमित है तो इसका कारण प्रकृति और समाजके विरोधमें नहीं मिलेगा, बल्कि पूँजीवादी उत्पादक सम्बन्धोमें मिलेगा जो उत्पादक-शक्तियोका पूरा-पूरा विकास नहीं होने देता । समाजवादमें ही यह प्राकृतिक परिवर्तन पूर्णरूपमें सम्भव है, जिसमे मुनाफ़ाके लिये नहीं, उपभोगके लिये पदार्थ बनाये जाते हैं। "किसी वस्तुकी मूल गति ही उसके गुणका निर्देश करती है। भूत अपनी गतिसे ही असख्य गुणोकी सृष्टि करता है । मनुष्य, सामान्य जीवनकोष, जड पदार्थ—सभी एक ही भौतिक विकासकी चढती सीढ़ीके कदम हैं और ये कदम भिन्न गुणसम्पन्न हैं । प्रत्येक गतिमें यान्त्रिक गति सम्मिलित है और इसके कारण भूत कणोंकी सजावटमे भिन्नता आ जाती है । इन यान्त्रिक गतियोको समझना विज्ञानका पहला काम है; लेकिन यह केवल पहला ही कदम है। यान्त्रिक गतिसे व्यापक गतिका अन्त नहीं हो जाता । गति केवल स्थान- परिवर्तनमात्र नहीं है। यन्त्र-राज्यसे ऊपर यह गुणका भी परिवर्तन है। यान्त्रिक गति हर उच्च प्रकारकी गतिका एक आवश्यक अङ्ग है, यद्यपि यह गतिके और गुणोंकी भी सृष्टि करती है। रासायनिक क्रियाके साथ उत्ताप और वैद्युतिक परिवर्तनका निरन्तर संयोग है । सावयव जीवन बिना यान्त्रिक, कणिक, रासायनिक उत्ताप और बिजली सम्बन्धी परिवर्तनोके असम्भव है । लेकिन प्रत्येक क्षेत्रोमें इन समवर्तमान रूपोसे मूलरूपके तत्त्वका भडार चुक नहीं जाता । "इसमें कोई सदेह नही कि विशिष्ट गुणसम्पन्न भूतकी नयी अवस्थाका आविष्कार गतिके एक नये प्रकारका आविष्कार होगा । परिणामकी वृद्धिसे वस्तुविशेषका गुण अपने विपरीतमें परिवर्तित हो जाता है। जैसे, निर्विरोध प्रतियोगिता पूँजीवादका और साधारणतः पण्य-उत्पादनका मौलिक गुण है। एकाधिकार इसका ठीक उल्टा है । लेकिन हम अपनी आँखके सामने प्रतियोगिताको एकाधिकारमें रूपान्तरित होते देख रहे हैं, जिससे बड़े पैमानेपर उत्पादनकी सृष्टि होकर छोटी फैक्टरियाँ दबती जा रही हैं और उत्पादन बड़े-से-बड़े पैमानेपर होकर अन्तमें पूँजी और उत्पादनका इस प्रकार एकत्रीकरण हो जाता है कि इसका परिणाम एकाधिकार हो जाता है।" (लेनिनका साम्राज्यवाद) वस्तुतः समाज और प्रकृतिमें विरोध नहीं होता, क्योकि प्रकृतिद्वारा समाजका विकास एवं उपोद्वलन होता है; प्रकृतिसे ही सम्पूर्ण प्रकारकी सुविधा
प्राप्त होती है। समाजद्वारा उपयोग करते-करते जो प्राकृतिक वस्तुओंकी कमी होती है, इसे विरोध नहीं कहा जा सकता। पृथ्वीसे घटादिका निर्माण होता है, मृत्तिकाका उपयोग होता है, फिर भी घटादि कार्य प्रकृतिविरोधी नहीं समझे जाते। कारणसे कार्यकी उत्पत्ति होती है, किंचित् कारणांशका उसमें उपक्षय भी होता है। माता-पितासे सन्तानोंकी उत्पत्ति होती है, वहाँ भी किंचित् उपक्षय होता है, तथापि यहाँ विरोध नहीं समझा जाता । जंगलोंकी कमी रोकनेके लिये पेड लगाना तथा गिरानेपर नियन्त्रण करना, कोयलेकी कमी होनेपर पेट्रोलियमका प्रयोग आदि समाज अपना काम चलानेके लिये करता है, इसे विरोध-निराकरण नहीं कहा जा सकता। अन्ततः प्राकृतिक परिवर्तनोंसे उन-उन कमियोंकी पूर्ति होती है, जैसे खेतोंकी उर्वराशक्ति अधिक फसल उपजानेसे नष्ट हो जाती है, तदर्थ कृत्रिम खाद डालने आदि उपायोंसे उर्वरा शक्ति बढ़ायी जाती है। परन्तु कुछ समय तक फसल न उपजानेसे या बाढ आदि प्राकृतिक परिवर्तनसे पुनः उर्वरा शक्तिकी वृद्धि हो जाती है। इसी तरह अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, महामारी, युद्ध, खण्ड प्रलयादि द्वारा प्राकृतिक परिवर्तन होता है। कालक्रमसे कितने ही अरण्यनगर तथा नगर अरण्य हो जाते हैं। इन परिवर्तनोंकी दृष्टिमें शताब्दि तथा सहस्राब्दिका काल अत्यल्प है। पशुओं तथा वनस्पतियोंके कृत्रिम कलम एव नस्ल सुधारद्वारा नया रूप प्राप्त होता है, यह मनुष्यकी कृतिकी विशेषता है। इसमें भी प्रकृतिके सहयोगसे ही काम चलता है। वस्तुतः ईश्वरका अंश ही जीव है । ईश्वरकी ज्ञान-क्रिया- शक्तिका ही अंश जीवकी ज्ञान-क्रिया-शक्ति है, इसीलिये ईश्वरके तुल्य अनेक वस्तुओं- की निर्माणशक्ति मनुष्य आदि जीवोंमें भी उपलब्ध होती है। इस तरह प्राकृतिक वस्तुओंके कमी होनेपर मनुष्य प्राकृतिक वस्तुओंके सहारे प्रकारान्तरसे कमी पूरी करनेका प्रयत्न करता है। उत्पादक-शक्तियोंके विकासके मूलमें समाजवाद या पूँजीवाद नहीं है। किंतु आवश्यकताकी अनुभूति तथा तदनुकूल प्रयत्नपरायणता ही है। इसीलिये वेदों, पुराणोंसे विदित होता है कि आध्यात्मिक धार्मिक विस्तारके समय भी उत्पादक- शक्तियोंका पर्याप्त विकास था। फिर भी बेकारी आदिका कारण होनेसे उसे अधिक सार्वजनिक रूप नहीं दिया गया । आज भी समाजवादी रूसकी अपेक्षा पूँजीवादी अमेरिकामें उत्पादक-शक्तियोंका कम विकास नहीं कहा जा सकता। समाजके उपभोगको ही लक्ष्य बनाकर उत्पादन साधनोंका विकास रामराज्यप्रणालीमें मान्य होता है, किंतु उससे मुनाफा आनुषङ्गिक रूपमें ही प्राप्त होता है । उपभोग- से अधिक माल बननेसे मालकी खपतमें कमी होनेसे सुतरा उद्योगपतियोंकी अन्य अपेक्षित वस्तुओंके उत्पादनमें प्रवृत्ति स्वाभाविक है।
भूतोंकी स्वयं गति असिद्ध है। अचेतनकी प्रवृत्ति चेतनसे ही अधिष्ठित होती है। सत्त्व, रज आदि गुण; वायु, तेज, जल आदि भूतोंकी स्वयं गति निर्विवाद नहीं है । चेतनाधिष्ठित भूतोंकी गतिका भी गुणात्मक परिणाम सीमित है; निस्सीम नहीं । इसीलिये तैजस परिणाम चक्षुसे ही रूपका दर्शन होता है, पार्थिव घ्राणेन्द्रियसे नहीं । इसीलिये भूतोंका गुणात्मक परिणाम होनेपर भी भूतोंसे चैतन्यकी उत्पत्ति नहीं होती है। जैसे पटात्मक परिणामके लिये तन्तुमें ही शक्ति है, वायुमें नहीं। तिलसे ही तेल होता है, बालूसे नहीं। उसी तरह जड भूतोंका शब्दादि गुण-परिणाम सम्भव है, किंतु चैतन्यभूतोंका परिणाम नहीं सिद्ध होता । भले ही भूत तथा भौतिक देह, दिमाग, मस्तिष्क आदिके होनेपर ही चैतन्यका उपलम्भ होता है, तथापि इतने मात्रसे चैतन्य भूतका धर्म नहीं सिद्ध हो सकता क्योकि यदि अन्वयमात्रसे ही गुण-धर्मनिर्णय हो तब तो आकाशके रहनेपर भी सब कार्य होते हैं, फिर तो गन्धादि भी आकाशके धर्म समझे जाने चाहिये । अतः अन्वय-व्यतिरेक—दोनोके घटनेपर ही कारण-कार्य-भाव या धर्म-धर्मीभावका निर्णय होता है । प्रस्तुत प्रसङ्ग में अन्वय व्यभिचरित है । घटादिमें एव मृत शरीरमें भूत रहता है, किंतु वहाँ चैतन्यका उपलम्भ नहीं होता। ‘विशिष्ट अवस्थायुक्त अन्नसे मदशक्तिकी तरह विशिष्ट अवस्थावाले भूतोंसे ही चैतन्यकी उत्पत्ति होती है’, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योकि अन्नमें मदशक्ति पहले भी रहती है। यह अनशनके पश्चात् अन्न लेनेसे स्पष्ट प्रतीत होता है। यदि बालूमें तेलकी तरह वह पहले न हो तो किसी भी अवस्थामें उसका प्राकट्य नहीं हो सकता । भूतोंमें चैतन्यका अस्तित्व होता तो अवश्य ही वह घटादिमें भी उपलब्ध होता। व्यतिरेक तो सर्वथा ही संदिग्ध रहता है। भूतोंके न रहनेपर चैतन्य रहता ही नहीं, इसीलिये अनुपलम्भ है, अथवा रहता हुआ भी अभिव्यञ्जक भूत न होनेसे अनुपलम्भ होता है ? सुस्पष्ट है कि लोहा, लक्कड़, तार आदि पार्थिव जलीय पदार्थ अग्निके अभिव्यञ्जक हैं । अतएव उनके न रहनेपर अग्निके रहते हुए भी अभिव्यक्ति नहीं होती । इसी तरह देह, दिल, दिमाग आदि आत्मचैतन्यके व्यञ्जक हैं; अतएव उनके न रहनेपर आत्मचैतन्यकी रहते हुए भी अभिव्यक्ति नहीं होती । भूतोंकी यान्त्रिक गति और व्यापक गतिमें वास्तविक भेद नहीं है । व्यष्टि चेतन मनुष्यादिद्वारा यान्त्रिक गति बनती है । समष्टि ईश्वर चेतनद्वारा व्यापक गति बनती है । सर्वथापि चेतनके बिना भूत या गुण किसीकी स्वाभाविक गति नहीं हो सकती । गुणात्मक परिवर्तन भी यन्त्र-राज्यके बहिर्भूत नहीं है । तन्तुसे पट, जलसे बर्फ या भाप आदिका निर्माण यान्त्रिक गतिसे सम्पन्न होता ही है । वस्तुतः प्रत्यक्षानुमानद्वारा विदित भूत ही प्रकृति नहीं है । किंतु प्रत्यक्षानुमानसे अज्ञात
मार्क्स-दर्शन ५४१ अपौरुषेय तथा आर्षशास्त्रोमे विज्ञात भूत एवं उससे भी अधिक उच्च स्तरकी सत्त्व, रज, तम आदिकी साम्यावस्थारूप प्रकृति अत्यधिक सूक्ष्म है और उसका भण्डार सचमुच अखण्ड है । उसीसे सब कमियोकी पूर्ति होती रहती है । उसी कारण धरतीसे अगणित अपरिमित अन्नोंके उपजानेपर भी उसका भण्डार नहीं टूटता । उत्ताप एव वैद्युतिक परिवर्तन सबही यान्त्रिक गतिपूर्वक ही है । यह जैसे मान्य है, वैसे ही अन्य परिवर्तनोंमें भी ईश्वरीय या मानवीय यान्त्रिक गति ही काम देती है । इसीलिये विशिष्ट गुणसम्पन्न भूतकी प्रत्येक अवस्था चेतनद्वारा ही आविष्कृत होती है । विपरीत गुणमे परिवर्तन भी यान्त्रिक गतिका ही परिणाम है । निर्विरोध प्रतियोगिता या एकाधिकार अपनी अपनी सीमामें गुण है । राम- राज्य-प्रणालीमें जहाँ विकासके लिये प्रतियोगिता गुण है वहाँ वह निःसीम भी नहीं है । इसीलिये तो महायन्त्रोंके निर्माणपर प्रतिबन्ध आवश्यक समझा गया है । [ प्रतियोगितापर भी नियन्त्रण अपेक्षित माना गया है, उत्पादनके केन्द्रीयकरणकी अपेक्षा विकेन्द्रीकरणको रामराज्य-प्रणाली अधिक महत्त्व देती है, परंतु समाज- वादमें उलटा महायन्त्रोंका अधिकाधिक विकास करके छोटी फैक्टरियोंका अस्तित्व सर्वथा ही समाप्त कर दिया जाता है । समाजवादियोका फैसला तो बन्दरबाँटका फैसला है । मजदूरों तथा छोटी फैक्टरियोंका पक्ष लेकर मिलमालिको एवं बड़े- बड़े कल कारखानोंको भला-बुरा कहते-कहते बड़े-छोटे सब कारखानो, मालिक- मजदूर, किसान, जमींदार सभी भूमि-सम्पत्ति, उद्योग धंधेको राष्ट्रीयकरणके नाम- पर छीन लेते हैं । समाजवादी समाजके नामपर ऐसा भीषण तानाशाही एकाधि- कार स्थापित करते हैं कि सबकी भूमि, सम्पत्ति, कल, कारखानोको छीनकर लेखन, भाषणकी स्वतन्त्रता छीनकर सभीको परतन्त्रताके बन्धनोंमें जकड़ देते हैं । कहा जाता है कि "गुणसे परिणामके परिवर्तनका साधारण उदाहरण है अच्छा बीज, जिसके बोनेसे उपजका परिमाण बहुत बढ़ जाता है । इसी तरह रूसकी सामूहिक खेती इसका दूसरा उदाहरण है जिसके कारण भी उपजका परिमाण बहुत बढ़ जाता है । लेवीने गुणपरिवर्तनके सम्बन्धमें वस्तुओको दो श्रेणियोंमें विभक्त किया है । कणिक ( वैयक्तिक, आटोमैटिक ) तथा सामूहिक ( स्टैटिस्टिकल ) [L2
५४२ मार्क्सवाद और रामराज्य उदाहरण १ ( क ) मनुष्यकी बाल्यावस्थासे वृद्धावस्था । ( ख ) खनिज पदार्थ—प्राकृतिक अवस्थासे व्यावहारिक वस्तुके रूपमें । ( ग ) जमीनका टुकड़ा जिसका व्यावहारिक मूल्य सामाजिक विकासके कारण बढ़ गया हो । २ आस्ट्रेलियामें भेजा गया खरगोशका पहला जोड़ा, जहाँ अब उनका ढेर एक उत्पात बन गया है । ३ एक धूपका 'दिन', बहुत-से धूपके दिन सूखा । ४ इसमे सभी वे उदाहरण हैं जिनमें समूह टूटकर अलग-अलग हो जाते हैं, जैसे एक परिवारका टूटना । “परिवर्तनकी कल्पनाके लिये ये उदाहरण सहायक हैं, लेकिन यह ध्यान रहे कि ये सभी उदाहरण द्वन्द्वात्मक परिवर्तनके उदाहरण नहीं । इसी प्रकार लेवीने उद्भिज्जराज्यके दो उदाहरण दिये हैं । १—जंगलमे सोतोके पास एक प्रकारकी काई जमती है स्फैगमनसास, जो धीरे-धीरे जंगलको उजाड़ देती है । २—एक झील है। उसकी तहपर उद्भिज्ज सड़ते रहते हैं । तह ऊपरको उठती है और उसकी सतहपर लता तैरने लगती है । झील दलदल बन जाती है । लताओंकी जड़े जमकर धीरे-धीरे घासका मैदान बन जाती है । हवाके झोकोसे बीज उड़कर लगनेसे पेड़ पोदे जम जाते हैं, फिर एक जंगल बन जाता है ।” अच्छे बीजसे, अच्छे खेतसे, अच्छी खादसे भी, उपजके परिमाणका बढ़ना सर्वसम्मत है, परंतु यहाँ भी बीजादिकी अच्छाई रूप, गुणसे उपजका विस्तार होता है । यहाँ गुणका परिमाणके रूपसे परिवर्तन नहीं कहा जा सकता । गुण गुण ही रहता है, वह गुण रहकर ही उपजके परिमाणकी वृद्धिका कारण बनता है । दूसरी दृष्टिसे बीजादिकी अच्छाईसे उपजकी अच्छाई होती है, उपजकी अच्छाईके स्वरूपमें ही वस्तुकी अच्छाई और संख्यावृद्धि आ जाती है । लेवीके गुण-परिवर्तनके कणिकसे कणिकका उदाहरण भी कोई चीज नहीं है । मनुष्यकी बाल्यावस्था मे वृद्धावस्था, खनिज पदार्थोंका प्राकृतिक अवस्थासे व्यावहारिक अवस्थाके रूपमें परिवर्तन होना, सामाजिक विकासके कारण भूमिके टुकड़ेका व्यावहारिक मूल्य बढ़ जाना आदिका षड्भाव-विकारमे अन्तर्भाव हो जाता है । बाल्यावस्था मे वृद्धावस्थाका परिवर्तन, वृद्धि और विपरिणामके भीतर ही है । दूसरा उदाहरण भी इसी तरहका है । तीसरा उदाहरण तो माँगपूर्तिके सिद्धान्तानुसार माँग बढ़ जानेसे मूल्य बढ़ जाना है ।
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मार्क्स-दर्शन ५४३ आस्ट्रेलियाके खरगोशके जोड़ेसे बहुत-से खरगोशोंका उत्पन्न हो जाना भी कौन-सी नयी बात है ? अनुकूल परिस्थिति मिलनेसे कुत्ते, शूकर, मुर्गे आदि किसी भी जोड़ेसे सामूहिक विस्तार होता है । कणिकसे सामूहिक परिवर्तनका उदाहरण भी इसी ढंगका है । 'एक धूपका दिन साधारण है, परंतु वही परिमाण- की वृद्धिसे होकर बहुत सा धूपका दिन सूखा बन जाता है,' यह भी कोई चमत्कृति नहीं है । दीपक आदिरूपमें छोटी अग्नि वायुसे बुझ जाती है, बड़ी अग्निका वायु सहायक बन जाता है । मृदु आतप रोचक होता है, तीव्र हो जानेपर वही उद्वेजक हो जाता है । अग्निका एक सीमाका सन्निधान अनुकूल होता है, अन्य प्रकारका सन्निधान मारक हो जाता है । सामूहिकसे कणिकका उदाहरण, समूह टूटकर अलग- अलग हो जाना, परिवार टूटकर पृथक्-पृथक् हो जाना आदि भी किसी सिद्धान्तका साधक नहीं है । विभाजनसे समूहका विशरण होना प्रसिद्ध है । इसी प्रकार लेवीका जगलकी काईसे जगलके उजड
५३४ मार्क्सवाद और रामराज्य "सम्बन्ध की चेतना ही ज्ञान है, विशेषकर वस्तु-जगत्के अस्तित्वोंके बीचका तथा आत्मानुभूत (दृष्टिगत वस्तु, कल्पनाएँ आदि) अस्तित्वोंके बीचका सम्बन्ध तथा इन दोनों जगतोंके बीचके सम्बन्धकी चेतना ही ज्ञान है। एक और दृष्टिकोणसे व्यावहारिक अर्थमें विचार वस्तु-जगत्को ठीक-ठीक प्रतिफलित और प्रतिबिम्बित करता है, इसकी निश्चयता ही ज्ञान है। भौतिकवादने प्रकृतिकों क्रियाशील रूपमें माना और विचारको अक्रिय रूपमें, जिसका केवलमात्र काम था इन्द्रियग्राह्य वस्तुओंको ग्रहण करना तथा उसपर मन्थन करना। यह कान्ट और कान्टके पश्चात्के आदर्शवादी थे जिन्होंने मननशक्तिकी रचनात्मक क्रियापर जोर दिया, लेकिन इतना अधिक जोर दिया कि उसको बेहिसाब बढ़ा-चढ़ा दिया। "अंग्रेजी और फ्रांसीसी भौतिकवादने उस मूक स्वीकृतिसे आरम्भ किया कि विचारकी वस्तु (विचारका कर्म) का अस्तित्व विचारकर्ताके अस्तित्वसे पहले है और विचारकर्ता इसकी अनुभूति प्राप्त करता है। लेकिन वह इससे आगे न बढ़ सके। हमास् हवम् ने इस मतको इन शब्दोंमें रखा है। 'मनुष्यके विचारके सम्बन्ध- में, अलग-अलग रूपमें इनमेंसे प्रत्येक वस्तु, हमारे शरीर और मनके बाहर किसी वस्तुके किसी गुणका प्रतीक या प्रतिनिधि है, जो वस्तुकी मनुष्यकी इन्द्रियों- पर अपनी क्रियाकी विचित्रतामे विविध दृश्योंकी सृष्टि करती है (लिवायथन)। यह प्रश्न भौतिकवादियोंके सामने इस रूपमें था कि इस ज्ञानकी उत्पत्ति इन्द्रियग्राह्य रूपोंके मूल उद्गमस्थानसे होकर एक विशेषशक्ति प्रज्ञाद्वारा होती है, लेकिन यह विशेषशक्ति क्या है, यही एक झगड़ेका विषय हो गया। आदर्शवादी इस मतका पोषण करते थे कि यह 'प्रज्ञा' धर्मपण्डितोंकी आत्मा ही है जो एक अतिप्राकृतिक शक्ति है, जो इन्द्रियानुभूत मायावी रूपोंको परम और अनन्त सत्य- में परिणत करती है। भौतिकवादी इस मतके लिये झगड़ते रहे कि यह 'प्रज्ञा' कितनी ही रहस्यमयी हो, फिर भी यह प्राकृतिक ही है। प्रसिद्ध लेखक आनातोल फ्रांसने परिस्थितिको इस तरह चित्रित किया है 'मठकी दीवारके नीचे जहाँ छोटे बच्चे अपना खेल खेल रहे थे, हमारे साधुमित्र वहाँ एक और खेल खेल रहे थे जो उतना ही व्यर्थ था, लेकिन मै वहाँ जा मिला क्योंकि समय बिताना ही चाहिये। हमारा खेल शब्दोंका खेल था जो हमारे गूढ़ मगज लेकिन सूक्ष्म दिमागके लिये सुखकर था, एक विचारशैलीको दूसरी विचारशैलीके विरुद्ध उभारनेवाला था और उसने सारे ईसाई समाजमें हलचल मचा दी। हम दो विरोधी दलोंमें बँट गये। एक दलका कहना था कि सेबों (फल) के पहले सेव
जाति थी, केलोंके पहले केला जाति थी, भ्रष्टचरित्र और लालची साधुओंके पहले साधु जाति, लालच तथा भ्रष्टचरित्रता थी ही। पीठपर लात जमानेके लिये लात और पीठसे पहले पीठ जमानेवाला लात सदासे ईश्वरके अन्तःस्थलमें विद्यमान था।' और दूसरे दलने उत्तर दिया कि 'नहीं, नेत्रोंसे ही सेव जातिकी धारणा होती है, केलोंसे ही केला जातिका अस्तित्व है। साधुओंसे ही साधु जाति, लालच तथा भ्रष्ट- चरित्रता की उत्पत्ति है। लात जमाने और खानेके बाद ही पीठपर लातका कोई अर्थ होता है। बस खिलाड़ी गरम हो गये और घूंसा चलने लगा। मैं दूसरे दलका पृष्ठ पोषक था, क्योंकि उसका मत मेरे लिये बुद्धिग्राह्य था और सोवासियोंकी बैठकने इस मनको अग्राह्य बनाया ( रिवोल्ट आफ ऐजिल्स ) ।' "प्रज्ञावादी दृष्टिकोणसे वैज्ञानिक ज्ञानका चिह्न है इसके प्रतिपाद्योंकी व्यापकता और अवश्यम्भाविता । व्यापकताका अर्थ है कि सिद्धान्तका प्रयोग बिना व्यतिक्रमके हमारे सब अनुभवोंपर हो सके और अवश्यम्भाविताका अर्थ है कि सब मनुष्योंकी बुद्धि ऐसे सत्यको ग्रहण करनेके लिये उनको बाध्य करे । लेकिन प्रज्ञावादीको कार्यकारण-सम्बन्धोंका एक सूत्रबद्ध सिलसिला कहाँसे मिल जाता है, जो उनके अनुसार वस्तुओंके भ्रमपूर्ण चित्रोंके मूलमें है ? इन विचारोंके स्पष्ट और स्वयं सिद्ध तथा तर्कसङ्गत होनेसे ही ऐसा क्यों अनुमान किया जाय कि ये बाहरी दुनियाकी सच्ची तस्वीरें हैं ? लेनिनके शब्दोंमें इस रहस्यका इस प्रकार उद्घाटन हो जाता है । करोड़ों बार दुहरानेसे मनुष्यके अभ्यास और अनुभव चेतनामें तर्क सकेनका रूप धारण कर लेते हैं । तथाकथित तर्कसङ्गत विचारके सार्वभौमरूपोंका ऐतिहासिक आधार यही है।" वस्तुतः यह परिभाषा अन्योन्याश्रय-दोषसे युक्त है । ज्ञानका निश्चय होनेपर ही ज्ञान-सम्बन्धका निश्चय होगा और ज्ञान-सम्बन्ध निश्चय होनेसे ज्ञानका निश्चय होगा। साथ ही ज्ञान और चेतना-दोनों एक ही वस्तु हैं, फिर 'ज्ञान-सम्बन्धोंकी चेतना ज्ञान है,' इसका यह अर्थ हुआ कि ज्ञान-सम्बन्धोंका ज्ञान ही ज्ञान है। इस तरह आत्माश्रय दोष भी है। जबतक ज्ञान नहीं विदित है तब- तक ज्ञान-सम्बन्धोंका भी ज्ञान कैसे होगा ? इसी प्रकार 'वस्तुविषयक, आत्म- विषयक तथा जीवधारी मनुष्यके रूप और बाहरी दुनियाके चेतनाको ज्ञान कहते हैं', यह परिभाषा भी अपूर्ण है। क्योंकि ज्ञान और चेतना दोनों एक ही वस्तु हैं। फिर 'ज्ञानके लक्षणकी जिज्ञासा अमुक सम्बन्धकी चेतना ज्ञान है', इतना कह देनेसे वह कैसे पूर्ण होगी ? इसके अतिरिक्त सम्बन्ध-चेतना यदि ज्ञान है तो प्रश्न होगा कि वस्तु-चेतना ज्ञान है या नहीं ? सम्बन्ध चेतना ही वस्तुकी चेतना है, यह कहना भी असङ्गत है, क्योंकि सम्बन्ध सम्बन्धीसे भिन्न ही होता है। मा० रा० ३५—
५४६ मार्क्सवाद और रामराज्य अतएव सम्बन्ध-सम्बन्धीका आधाराधेय भाव होता है। जैसे घट-ज्ञान पट-ज्ञान- का लक्षण नहीं होता, उसी तरह वस्तु-सम्बन्ध-ज्ञान वस्तु-ज्ञानका लक्षण नहीं हो सकता। इसी प्रकार बाहरी दुनियाके व्यापक और विशिष्ट तफसीलोंके बीचका सम्बन्ध भी ज्ञान नहीं कहा जा सकता। सम्बन्ध द्विष्ठ होता है; अर्थात् दो सम्बन्धि- योंमें रहता है, जैसे संयोग। जिन दो वस्तुओंका संयोग होता है, उन दोनोंमें ही सम्बन्ध रहता है। ज्ञान आत्मामें ही रहता है। इसके अतिरिक्त सम्बन्ध स्वयं ही ज्ञेय पदार्थ है, उसका भी ज्ञान होता है, फिर वह स्वयं ही ज्ञान कैसे हो जायगा ? इसी तरह 'दृष्टिभूत वस्तु तथा उसकी कल्पनाके बीचका सम्बन्ध जिसमे और जिसके द्वारा हम अस्तित्वका अनुभव करते हैं वह ज्ञान है', यह भी कहना गलत है। क्योंकि अनुभव भी तो ज्ञान ही है। चेतना, अनुभव, ज्ञान आदि पर्यायवाची शब्द हैं। उसी वस्तुका लक्षण करनेमें उसीका उपयोग होना अयुक्त है। 'अपने और बाहरी दुनियाके बीच समता और प्रभेद दोनोंका जिन दृष्टिभूत वस्तुओं और उनकी कल्पनाओंमें अनु- भव करते हैं वह ज्ञान है', यह भी कहना अपर्याप्त है, क्योंकि दृष्टि और उनकी कल्पनाओंका भी अन्तर्भाव ज्ञानमें ही है। अतः जबतक ज्ञान या अनुभव या चेतनाका स्पष्ट लक्षण न हो जाय तबतक इन वाक्याडम्बरोंसे काम नहीं चल सकता। इसी तरह 'मनन-क्रियाकी भीतरी दुनियामें विचित्र प्रकार एवं परिमाणकी समता और प्रभेदका मान चित्रमें चित्रित कर सकना और इन सबको सम अस्तित्व और अनुवर्त्तनक्रिया, प्रतिक्रिया, परस्परक्रिया और कार्य-कारण निर्भरताके उचित सम्बन्धोंमें सजाने तथा व्यवस्थित करनेका नाम ही ज्ञान है', यह कथन भी शब्दा- डम्बरको छोड़कर कुछ नहीं है। वस्तुतः कल्पना, मनन-क्रिया, चित्रण करना, सजाना आदि क्रिया कर्तृतन्त्र ही होती है, परंतु ज्ञान तो कृति और इच्छासे भी पहले होता है। इसीलिये 'जानाति, इच्छति, अथ करोति' का व्यवहार होता है। अर्थात् कोई भी प्राणी जानता है, फिर इच्छा करता है, पुनश्च कर्म करता है। प्राणी जैसा संकल्प करता है, वैसी ही क्रिया करता है-यह पीछे कहा जा चुका है। कोई भी क्रिया चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक, कर्त्ताके परतन्त्र ही होती है। किंतु ज्ञान कर्त्ताकी इच्छापर निर्भर नहीं होता; प्रमाणकी उपस्थितिमें कर्त्ताकी इच्छा न होनेपर भी ज्ञान होता है। दुर्गन्ध-ज्ञानको हम नहीं चाहते तब भी निर्दोष घ्राणकी उपस्थितिमें दुर्गन्ध रहनेपर ज्ञान अनिवार्य ही है, यहाँ कर्त्ताकी स्वतन्त्रता नहीं होती है। मानस परिणाम होनेपर भी मनन-क्रिया, भावना एवं ज्ञानमें यही भेद रहता है। बाहरी दुनियाकी वास्तविकता और भीतरी दुनियाकी समता तथा भिन्नताका मनमें चित्रण करना ज्ञाता या प्रमाताका काम हो सकता है। इन
मार्क्स-दर्शन ५२७ सबका सम अस्तित्व और अनुवर्तनक्रिया, प्रतिक्रिया और कार्य-कारणके उचित सम्बन्धमें सजाने और व्यवस्थित करने आदिका काम भी प्रमाताका ही है, ज्ञानका नहीं। भौतिकवादियोंके यहाँ जीवित मनुष्य ही प्रमाता हो सकता है। देह- से भिन्न प्रमाता कोई आत्मा मार्क्सवादियोको मान्य नहीं है। ज्ञान स्वयं- प्रकाश है। व्यवस्थापन करना, सजाना आदि ज्ञानका काम नहीं होता। प्रमाण भी अज्ञात-ज्ञापक होता है, अकृतकारक नहीं। इसी तरह 'सम्बन्धकी चेतना ही ज्ञान है या वस्तु-जगत्के अस्तित्वोंके बीचका तथा आत्मानुभूत अस्तित्वोंके बीचका सम्बन्ध एवं उन दोनों जगतोंके बीचके सम्बन्धोंके बीचकी चेतनाका नाम भी ज्ञान है', यह भी कथन व्यर्थ है। क्योंकि वस्तुतः अस्तित्वका स्वतः सम्बन्ध नहीं होता। अस्तित्ववाली वस्तुओंका सम्बन्ध होता है और वे सम्बन्ध ज्ञेय एवं गुणविशेष होते हैं, चेतना या ज्ञान नहीं। उसी प्रकार आत्मा मार्क्सवादमे देह-भिन्न है ही नहीं। अनुभव ज्ञानसे भिन्न कोई वस्तु नहीं होती, फिर आत्मानुभूत अस्तित्वोंका सम्बन्ध भी स्वयं अनुभव या ज्ञानस्वरूप नहीं हो सकता। विचार वस्तु-जगत्को ठीक ठीक प्रति- फलित, प्रतिबिम्बित करता है, इसकी निश्चयता ही ज्ञान है। यहाँ भी वस्तुतः वस्तु- का अन्तःकरणमें प्रतिफलन या प्रतिबिम्बन ही विचार या निश्चय कहलाता है। यहाँ भी निश्चय, ज्ञान, विचारादि समानार्थक हैं। यहाँ भी अन्योन्याश्रय आदि दोष उपस्थित होते हैं। भारतीय नैयायिकोंकी दृष्टिसे सर्वव्यवहारहेतु आत्मगुणको ही ज्ञान माना जाता है। सुस्पष्ट है कि संसारके सभी व्यवहार तथा व्यापार ज्ञानमूलक हैं। संसारमें अकामकी कोई भी क्रिया नहीं होती और सभी काम सङ्कल्पमूलक ही होते हैं। वेदान्तकी दृष्टिमे काम, सङ्कल्प, विचिकित्सा, श्रद्धा, अश्रद्धा, ह्री, धी, भय—ये सभी मनके धर्म हैं। नैयायिकोंके तथा वैशेषिकोंके अनुसार आत्ममनः- संयोगसे उत्पन्न होनेवाले ये सब आत्माके ही गुण हैं। सामाजिक व्यवस्था कम्युनिष्ट यह मानते हैं कि 'मनुष्य जिस किसी भी अवस्थामें रहा हो उसके समक्ष कुछ सिद्धान्त, नियम एवं आदर्श रहे हैं' परंतु उनके मतानुसार 'समाजकी अवस्था बदलनेके साथ उनके सिद्धान्तों, नियमों एवं आदर्शोंमें भी परिवर्तन होता रहता है।' उनकी इस मान्यताका मूल कारण यही है कि 'सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, विश्वस्रष्टा ईश्वर उनकी समझमें आता ही नहीं।' अतएव सर्व- देश-कालके अनुसार निर्धारित शाश्वत सिद्धान्तों, सत्यों एवं नियमोंपर उनका विश्वास नहीं जमता। सबसे बड़ा दोष तो यह है कि 'वे परिस्थिति-परतन्त्र मनुष्योंकी परिस्थित्यनुसारिणी विचार-धाराओंको ही दर्शनोंका स्रोत मानते हैं,