मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६६८ * मत्स्यपुराण *
| तस्मिन् विनिहते दैत्ये त्रिदशानां महोत्सवे।<br>नाभूत्कश्चित्तदा दुःखी नरकेष्वपि पापकृत्॥ २७<br>स्तुवन्तः षण्मुखं देवाः क्रीडन्तश्चाङ्गनायुताः।<br>जग्मुः स्वानेव भवनान् भूरिधामान उत्सुकाः ॥ २८<br>ददुश्चापि वरं सर्वे देवाः स्कन्दमुखं प्रति।<br>तुष्टाः सम्प्राप्तसर्वेच्छाः सह सिद्धैस्तपोधनैः ॥ २९ | इस प्रकार उस दैत्यके मारे जानेपर देवताओंके उस महोत्सवके अवसरपर नरकोंमें भी कोई पापकर्मा प्राणी दुःखी नहीं था। परम तेजस्वी देवगण षडाननकी स्तुति करके अपनी-अपनी स्त्रियोंसहित क्रीडा करते हुए उत्सुकतापूर्वक अपने-अपने गृहोंको चले गये। सभी इच्छाओंकी पूर्ति हो जानेके कारण सभी देवता परम संतुष्ट थे। वे जाते समय तपोधन सिद्धोंके साथ स्कन्दको वर देते हुए बोले ॥ २७-२९॥ |
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| देवा ऊचुः<br>यः पठेत् स्कन्दसम्बद्धां कथां मर्त्यो महामतिः।<br>शृणुयाच्छावयेद्वापि स भवेत् कीर्तिमान्नरः ॥ ३०<br>बह्वायुः सुभगः श्रीमान् कान्तिमाञ्छुभदर्शनः।<br>भूतेभ्यो निर्भयश्चापि सर्वदुःखविवर्जितः ॥ ३१<br>संध्यामुपास्य यः पूर्वा स्कन्दस्य चरितं पठेत्।<br>स मुक्तः किल्बिषैः सर्वैर्महाधनपतिर्भवेत् ॥ ३२<br>बालानां व्याधिजुष्टानां राजद्वारं च सेवताम्।<br>इदं तत्परमं दिव्यं सर्वदा सर्वकामदम्।<br>तनुक्षये च सायुज्यं षण्मुखस्य व्रजेन्नरः॥ ३३ | देवताओंने कहा—जो महाबुद्धिमान् मरणधर्मा मनुष्य स्कन्दसे सम्बन्ध रखनेवाली इस कथाको पढ़ेगा, सुनेगा अथवा दूसरेको सुनायेगा, वह कीर्तिमान्, दीर्घायु, सौभाग्यशाली, श्रीसम्पन्न, कान्तिमान्, शुभदर्शन, सभी प्राणियोंसे निर्भय और सम्पूर्ण दुःखोंसे रहित हो जायगा। जो मनुष्य प्रातःकालिक संध्याकी उपासना करनेके बाद स्कन्दके चरित्रका पाठ करेगा वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर महान् धनराशिका स्वामी होगा। यह परम दिव्य स्कन्द-चरित बालकों, रोगियों और राजद्वारपर सेवा करनेवाले पुरुषोंके लिये सर्वदा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। इसका पाठ करनेवाला मनुष्य शरीरान्त होनेपर षडाननकी सायुज्यताको प्राप्त हो जायगा ॥ ३०-३३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकवधो नाम षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तारकवध नामक एक सौ साठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १६०॥
एक सौ एकसठवाँ अध्याय
हिरण्यकशिपुकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे वरप्राप्ति, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, विष्णुद्वारा देवताओंको अभयदान, भगवान् विष्णुका नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुकी विचित्र सभामें प्रवेश
| ऋषय ऊचुः<br>इदानीं श्रोतुमिच्छामो हिरण्यकशिपोर्वधम्।<br>नरसिंहस्य माहात्म्यं तथा पापविनाशनम्॥ १ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी ! अब हमलोग दानवराज हिरण्यकशिपुका वध तथा भगवान् नरसिंहके पापविनाशक माहात्म्यको सुनना चाहते हैं (आप उसे हमें सुनाइये) ॥ १॥ |
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| सूत उवाच<br>पुरा कृतयुगे विप्रा हिरण्यकशिपुः प्रभुः।<br>दैत्यानामादिपुरुषश्चकार स महत्तपः ॥ २<br>दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च।<br>जलवासी समभवत् स्नानमौनधृतव्रतः ॥ ३ | सूतजी कहते हैं—विप्रवरो ! पूर्वकालमें कृतयुगमें दैत्योंके आदि पुरुष सामर्थ्यशाली हिरण्यकशिपुने महान् तप किया। उसने स्नान और मौनका व्रत धारण करके ग्यारह हजार वर्षोंतक जलमें निवास किया। |
| * अध्याय १६१ * | ६६९ |
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| ततः शमदमाभ्यां च ब्रह्मचर्येण चैव हि।<br>ब्रह्मा प्रीतोऽभवत्तस्य तपसा नियमेन च॥ ४<br>ततः स्वयम्भूभगवान् स्वयमागम्य तत्र ह।<br>विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता॥ ५<br>आदित्यैर्वसुभिः साध्यैर्मरुद्भिर्दैवतैस्तथा।<br>रुद्रैर्विश्वैस्सहायैश्च यक्षराक्षसपन्नगैः॥ ६<br>दिग्भिश्चैव विदग्भिश्च नदीभिः सागरैस्तथा।<br>नक्षत्रैश्च मुहूर्तैश्च खेचरैश्च महाग्रहैः॥ ७<br>देवैर्ब्रह्मर्षिभिः सार्धं सिद्धैः सप्तर्षिभिस्तथा।<br>राजर्षिभिः पुण्यकृद्भिर्गन्धर्वाप्सरसां गणैः॥ ८<br>चराचरगुरुः श्रीमान् वृतः सर्वैर्दिवौकसैः।<br>ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यं वचनमब्रवीत्॥ ९<br>प्रीतोऽस्मि तव भक्तस्य तपसानेन सुव्रत।<br>वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि॥ १० | तब उसके मनःसंयम, इन्द्रियनिग्रह, ब्रह्मचर्य, तपस्या और नियमपालनसे ब्रह्मा प्रसन्न हो गये। तत्पश्चात् स्वयं भगवान् ब्रह्मा सूर्यके समान तेजस्वी एवं चमकीले विमानपर, जिसमें हंस जुते हुए थे, सवार होकर आदित्यों, वसुओं, साध्यों, मरुद्गणों, देवताओं, रुद्रों, विश्वेदेवों, यक्षों, राक्षसों, नागों, दिशाओं, विदिशाओं, नदियों, सागरों, नक्षत्रों, मुहूर्तों, आकाशचारी महान् ग्रहों, देवगणों, ब्रह्मर्षियों, सिद्धों, सप्तर्षियों, पुण्यकर्मा राजर्षियों, गन्धर्वों और अप्सराओंके गणोंके साथ वहाँ आये। तदुपरान्त सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ चराचरगुरु श्रीमान् ब्रह्मा उस दैत्यसे इस प्रकार बोले—'सुव्रत! तुम-जैसे भक्तकी इस तपस्यासे मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम यथेष्ट वर माँग लो और अपना मनोरथ सिद्ध करो'॥ २—१०॥ | | हिरण्यकशिपुरुवाच | हिरण्यकशिपु बोला— | | न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः।<br>न मानुषाः पिशाचा वा हन्युर्मां देवसत्तम॥ ११<br>ऋषयो वा न मां शापैः शपेयुः प्रपितामह।<br>यदि मे भगवान् प्रीतो वर एष वृतो मया॥ १२<br>न चास्त्रेण न शस्त्रेण गिरिणा पादपेन च।<br>न शुष्केण न चार्द्रेण न दिवा न निशाथ वा॥ १३<br>भवेयमहमेवार्कः सोमो वायुर्हुताशनः।<br>सलिलं चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि दिशो दश॥ १४<br>अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो वासवो यमः।<br>धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षः किंपुरुषाधिपः॥ १५ | देवसत्तम! देवता, असुर गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य अथवा पिशाच—ये कोई भी मुझे न मार सकें। प्रपितामह! ऋषिगण अपने शापोंद्वारा मुझे अभिशप्त न कर सकें। न अस्त्रसे, न शस्त्रसे, न पर्वतसे, न वृक्षसे, न शुष्क पदार्थसे, न गीले पदार्थसे, न दिनमें, न रातमें—अर्थात् कभी भी अथवा किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो। मैं ही सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल, आकाश, नक्षत्र, दसों दिशाएँ, क्रोध, काम, वरुण, इन्द्र, यम, धनाध्यक्ष कुबेर और किम्पुरुषोंका अधीश्वर यक्ष हो जाऊँ। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं यही वर माँग रहा हूँ॥ ११—१५॥ | | ब्रह्मोवाच | ब्रह्माने कहा— | | एते दिव्या परास्तात मया दत्तास्तवाद्भुताः।<br>सर्वान्कामान्सदा वत्स प्राप्स्यसे त्वं न संशयः॥ १६<br>एवमुक्त्वा स भगवाञ्जगामाकाश एव हि।<br>वैराजं ब्रह्मसदनं ब्रह्मर्षिगणसेवितम्॥ १७<br>ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा ऋषिभिः सह।<br>वरप्रदानं श्रुत्वैव पितामहमुपस्थिताः॥ १८ | तात! मैंने तुम्हें इन दिव्य एवं अद्भुत वरदानोंको प्रदान कर दिया। वत्स! तुम सदा सभी मनोरथोंको प्राप्त करते रहोगे, इसमें संशय नहीं है। ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा आकाशमार्गसे ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित अपने वैराज नामक निवासस्थानको चले गये। तदनन्तर ऋषियोंसहित देवता, नाग और गन्धर्व इस प्रकारके वरप्रदानकी बात सुनते ही पितामहके पास पहुँचे (और बोले) ॥ १६—१८॥ |
१६३- नरसिंह और हिरण्यकशिपुका भीषण युद्ध, दैत्योंको उत्पातदर्शन, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, नरसिंहद्वारा हिरण्यकशिपुका वध तथा ब्रह्माद्वारा नरसिंहकी स्तुति
| ६७० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| देवा ऊचुः<br>वरप्रदानाद् भगवन् वधिष्यति स नोऽसुरः।<br>तत्प्रसीदाशु भगवन् वधोऽप्यस्य विचिन्त्यताम्॥ १९<br>भगवन् सर्वभूतानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः।<br>स्रष्टा त्वं हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्बुधः॥ २०<br>सर्वलोकहितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजापतिः।<br>आश्वासयामास सुरान् सुशीतैर्वचनाम्बुभिः॥ २१<br>अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपसः फलम्।<br>तपसान्तेऽस्य भगवान् वधं विष्णुः करिष्यति॥ २२<br>तच्छ्रुत्वा विबुधा वाक्यं सर्वे पङ्कजजन्मनः।<br>स्वानि स्थानानि दिव्यानि विप्रजग्मुर्मुदान्विताः॥ २३ | देवताओंने कहा—भगवन्! आपके इस वरप्रदानसे तो वह असुर हमलोगोंका वध कर डालेगा। अतः प्रभो! कृपा कीजिये और शीघ्र ही उसके वधका भी उपाय सोचिये। भगवन्! आप स्वयं सम्पूर्ण प्राणियोंके आदिकर्ता, स्वामी, हव्य एवं कव्यके स्रष्टा, अव्यक्तप्रकृति और सर्वज्ञ हैं। देवताओंके समस्त लोकोंके लिये हितकारक ऐसे वचनको सुनकर प्रजापति ब्रह्माने अपने परम शीतल वचनरूपी जलसे देवताओंको संसिक्त एवं आश्वस्त करते हुए बोले—'देवगण! उसे अपनी तपस्याका फल तो अवश्य ही मिलना चाहिये। हाँ, तपस्याके पुण्यफलके समाप्त हो जानेपर भगवान् विष्णु उसका वध करेंगे।' कमलजन्मा ब्रह्माकी वह बात सुनकर सभी देवता हर्षपूर्वक अपने-अपने दिव्य स्थानोंको लौट गये॥ १९—२३॥ |
| लब्धमात्रे वरे चाथ सर्वाः सोऽबाधत प्रजाः।<br>हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पितः॥ २४<br>आश्रमेषु महाभागान् स मुनीञ्छंसितव्रतान्।<br>सत्यधर्मपरान् दान्तान् धर्षयामास दानवः॥ २५<br>देवांस्त्रिभुवनस्थांश्च पराजित्य महासुरः।<br>त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः॥ २६<br>यदा वरमदोत्सिक्तश्चोदितः कालधर्मतः।<br>यज्ञियानकरोद् दैत्यानयज्ञियांश्च देवताः॥ २७<br>तदादित्याश्च साध्याश्च विश्वे च वसवस्तथा।<br>सेन्द्रा देवगणा यक्षाः सिद्धद्विजमहर्षयः॥ २८<br>शरण्यं शरणं विष्णुमुपतस्थुर्महाबलम्।<br>देवदेवं यज्ञमयं वासुदेवं सनातनम्॥ २९ | उधर वर प्राप्त होते ही उस वरदानसे गर्वित हुआ दैत्यराज हिरण्यकशिपु सभी प्रजाओंको कष्ट देना प्रारम्भ किया। उस दानवने आश्रमोंमें जाकर उन महान् भाग्यशाली मुनियोंको, जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, सत्यधर्म-परायण और जितेन्द्रिय थे, धर्षित कर दिया। उस महान् असुरने त्रिभुवनमें स्थित सभी देवताओंको पराजित कर दिया। तब वह दानव त्रिलोकीको अपने अधीन करके स्वर्गमें निवास करने लगा। इस प्रकार कालधर्मकी प्रेरणासे जब उसने वरदानके मदसे उन्मत्त हो दैत्योंको यज्ञभागका अधिकारी बनाया और देवताओंको उनके समुचित यज्ञभागोंसे वञ्चित कर दिया, तब आदित्यगण, साध्यगण, विश्वेदेव, वसुगण, इन्द्रसहित देवगण, यक्ष, सिद्धगण और महर्षिगण—ये सभी उन महाबली विष्णुकी शरणमें गये, जो शरणदाता, देवाधिदेव, यज्ञमूर्ति, वसुदेवके पुत्र और अविनाशी हैं॥ २४—२९॥ |
| देवा ऊचुः<br>नारायण महाभाग देवास्त्वां शरणं गताः।<br>त्रायस्व जहि दैत्येन्द्रं हिरण्यकशिपुं प्रभो॥ ३०<br>त्वं हि नः परमो धाता त्वं हि नः परमो गुरुः।<br>त्वं हि नः परमो देवो ब्रह्मादीनां सुरोत्तम॥ ३१ | देवताओंने कहा—महाभाग्यशाली नारायण! हम सभी देवता आपकी शरणमें आये हुए हैं, आप हमारी रक्षा कीजिये। प्रभो! आप दैत्यराज हिरण्यकशिपुका वध कीजिये। सुरोत्तम! आप ही हमलोगोंके परम पालक हैं, आप ही हमलोगोंके सर्वोत्कृष्ट गुरु हैं और आप ही हम ब्रह्मा आदि देवताओंके परम देव हैं॥ ३०-३१॥ |
| विष्णुरुवाच<br>भयं त्यजध्वममरा अभयं वो ददाम्यहम् ।<br>तथैव त्रिदिवं देवाः प्रतिपद्यत मा चिरम्॥ ३२ | भगवान् विष्णुने कहा—देवताओ! तुमलोग भय छोड़ दो। मैं तुमलोगोंको अभयदान दे रहा हूँ। पहलेकी तरह पुनः तुमलोगोंका शीघ्र ही स्वर्गपर अधिकार हो जायगा। |
| * अध्याय १६१ * | ६७१ |
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| एषोऽहं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम्।<br>अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम्॥ ३३<br>एवमुक्त्वा तु भगवान् विसृज्य त्रिदशेश्वरान्।<br>वधं संकल्पयामास हिरण्यकशिपोः प्रभुः॥ ३४<br>साहाय्यं च महाबाहुरोङ्कारं गृह्य सत्वरम्।<br>अर्थोंकारसहायस्तु भगवान् विष्णुरव्ययः॥ ३५<br>हिरण्यकशिपुस्थानं जगाम हरिरीश्वरः।<br>तेजसा भास्कराकारः शशी कान्त्यैव चापरः॥ ३६<br>नरस्य कृत्वाधंतनुं सिंहस्यार्धतनुं तथा।<br>नारसिंहेन वपुषा पाणिं संस्पृश्य पाणिना॥ ३७<br>ततोऽपश्यत विस्तीर्णां दिव्यां रम्यां मनोरमाम्।<br>सर्वकामयुतां शुभ्रां हिरण्यकशिपोः सभाम्॥ ३८<br>विस्तीर्णां योजनशतं शतमध्यर्धमायताम्।<br>वैहायसीं कामगमां पञ्चयोजनविस्तृताम्॥ ३९<br>जराशोकक्लमापेतां निष्प्रकम्पां शिवां सुखाम्।<br>वेश्महर्म्यवतीं रम्यां ज्वलन्तीमिव तेजसा॥ ४० | मैं सेनासहित उस दानवराज दैत्यका, जो वरदानकी प्राप्तिसे गर्वीला और देवेश्वरोंके लिये अवध्य हो गया है, वध करूँगा। ऐसा कहकर महाबाहु भगवान् विष्णुने देवेश्वरोंको विदा कर दिया और स्वयं शीघ्रतापूर्वक ओंकारको (सहायकरूपमें) साथ लेकर हिरण्यकशिपुके वधका विचार करने लगे। तदनन्तर जो सर्वव्यापक, अविनाशी, परमेश्वर, सूर्यके समान तेजस्वी और दूसरे चन्द्रमाके-से कान्तिमान् थे, वे भगवान् श्रीहरि ओंकारको साथ लेकर हिरण्यकशिपुके स्थानपर गये। उस समय वे आधा मनुष्यका और आधा सिंहका शरीर धारण कर नरसिंहारूपसे स्थित हो हाथसे हाथ मल रहे थे। तदनन्तर उन्होंने हिरण्यकशिपुकी चमकती हुई दिव्य सभा देखी, जो विस्तृत, अत्यन्त रुचिर, मनको लुभानेवाली और सम्पूर्ण अभिलषित पदार्थोंसे युक्त थी। सौ योजनके विस्तारमें फैली हुई वह सभा पचास योजन लम्बी और पाँच योजन चौड़ी थी। वह स्वेच्छानुसार आकाशमें उड़नेवाली तथा बुढ़ापा, शोक और थकावटसे रहित, निश्चल, कल्याणकारिणी, सुखदायिनी और परम रमणीय थी। उसमें अट्टालिकाओंसे युक्त भवन बने थे और वह तेजसे प्रज्वलित-सी हो रही थी॥ ३२—४०॥ |
| अन्तःसलिलसंयुक्तां विहितां विश्वकर्मणा।<br>दिव्यरत्नमयैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युताम्॥ ४१<br>नीलपीतसितश्यामैः कृष्णैर्लोहितकैरपि।<br>अवतानैस्तथा गुल्मैर्मञ्जरीशतधारिभिः॥ ४२<br>सिताभ्रघनसङ्काशा प्लवन्तीव व्यदृश्यत।<br>रश्मिवती भास्वरा च दिव्यगन्धमनोरमा॥ ४३<br>सुसुखा न च दुःखा सा न शीता न च घर्मदा।<br>न क्षुत्पिपासे ग्लानिं वा प्राप्य तां प्राप्नुवन्ति ते॥ ४४<br>नानारूपैरुपकृतां विचित्रैरतिभास्वरैः।<br>स्तम्भैर्न बिभृता सा वै शाश्वती चाक्षपा सदा॥ ४५<br>अति चन्द्रं च सूर्यं च शिखिनं च स्वयम्प्रभा।<br>दीप्यते नाकपृष्ठस्था भासयन्तीव भास्करान्॥ ४६ | उसके भीतर जलाशय थे। वह फल-पुष्प प्रदान करनेवाले दिव्य रत्नमय वृक्षोंसे संयुक्त थी। उसे विश्वकर्माने बनाया था। वह नीले, पीले, श्वेत, श्याम, कृष्ण और लोहित रंगके आवरणों और सैकड़ों मंजरियोंसे युक्त गुल्मोंसे आच्छादित होनेके कारण श्वेत बादलकी तरह उड़ती हुई-सी दीख रही थी। उसमेंसे किरणें फूट रही थीं। वह चमकीली और दिव्य गन्धसे युक्त होनेके कारण मनोरम थी। वह सर्वथा सुखदायिनी थी। उसमें दुःख, सर्दी और धूपका नाम-निशान नहीं था। उसमें पहुँचकर दानवोंको भूख-प्यास और ग्लानिकी प्राप्ति नहीं होती थी। वह चित्र-विचित्र रंगवाले एवं अत्यन्त चमकीले नाना प्रकारके खम्भोंसे युक्त थी, परंतु उन खम्भोंपर आधारित नहीं थी। वहाँ रात नहीं होती थी, अपितु निरन्तर दिन ही बना रहता था। वह अपनी प्रभासे सूर्य, चन्द्रमा और अग्निका तिरस्कार कर रही थी तथा स्वर्गलोकमें स्थित होकर अनेकों सूर्योंको उद्भासित करती हुई-सी उद्दीप्त हो रही थी। |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सर्वे च कामाः प्रचुरा ये दिव्या ये च मानुषाः।<br>रसयुक्तं प्रभूतं च भक्ष्यभोज्यमनन्तकम्॥ ४७<br><br>पुण्यगन्धस्रजश्चात्र नित्यपुष्पफलद्रुमाः।<br>उष्णे शीतानि तोयानि शीते चोष्णानि सन्ति च॥ ४८<br><br>पुष्पिताग्रा महाशाखाः प्रवालाङ्कुरधारिणः।<br>लतावितानसंछन्ना नदीषु च सरःसु च॥ ४९<br><br>वृक्षान् बहुविधांस्तत्र मृगेन्द्रो ददृशे प्रभुः।<br>गन्धवन्ति च पुष्पाणि रसवन्ति फलानि च॥ ५०<br><br>नातिशीतानि नोष्णानि तत्र तत्र सरांसि च।<br>अपश्यत् सर्वतीर्थानि सभायां तस्य स प्रभुः॥ ५१ | सभी प्रकारके मनोरथ, चाहे वे दिव्य हों या मानुष, सब-के-सब वहाँ प्रचुरमात्रामें उपलब्ध थे। वहाँ असंख्य प्रकारके अधिक-से-अधिक रसीले भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थ और पुण्यगन्धमयी मालाएँ सुलभ थीं। वहाँके वृक्ष नित्य पुष्प और फल देनेवाले थे। वहाँका जल गर्मीमें शीतल और सर्दीमें उष्ण रहता था। वहाँ नदियों और सरोवरोंके तटपर बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले वृक्ष लगे थे, जिनके अग्रभागमें पुष्प खिले हुए थे और जो लाल-लाल पल्लवों और अङ्कुरोंसे सुशोभित एवं लतारूपी वितानसे आच्छादित थे। भगवान् नृसिंह वहाँ ऐसे अनेकों प्रकारके वृक्ष देखे, जो सुगन्धित पुष्पों और रसदार फलोंसे लदे हुए थे। वहाँ यत्र-तत्र सरोवर भी थे, जिनमें न तो अत्यन्त शीतल और न गरम जल भरा रहता था॥ ४१-५० १/२ ॥ |
| नलिजैः पुण्डरीकैश्च शतपत्रैः सुगन्धिभिः।<br>रक्तैः कुवलयैर्नीलैः कुमुदैः संवृतानि च॥ ५२<br>सुकान्तैर्धार्तराष्ट्रैश्च राजहंसैश्च सुप्रियैः।<br>कारण्डवैश्चक्रवाकैः सारसैः कुररैरपि॥ ५३<br>विमलैः स्फाटिकाभैश्च पाण्डुरच्छदनैर्द्विजैः।<br>बहुहंसोपगीतानि सारसाभिरुतानि च॥ ५४<br>गन्धवत्यः शुभास्तत्र पुष्पमञ्जरिधारिणीः।<br>दृष्टवान् पर्वताग्रेषु नानापुष्पधरा लताः॥ ५५ | भगवान् नृसिंहने उसकी सभामें सभी पुण्यक्षेत्रोंको भी देखा, जो सुगन्धयुक्त कमल, श्वेत कमल, लाल कमल, नील कमल और कुमुदिनी आदि पुष्पोंसे तथा अत्यन्त सुन्दर काली चोंच और काले पैरोंवाले हंसों, परमप्रिय लगनेवाले राजहंसों, बतखों, चक्रवाकों, सारसों, कराँकुलों एवं स्फटिककी-सी कान्तिवाले निर्मल और पीले पंखोंसे सुशोभित अन्यान्य पक्षियोंसे आच्छादित थे। उनमें बहुत-से हंस कूर्ज रहे थे और सर्वत्र सारसोंकी बोली सुनायी पड़ती थी। भगवान् नृसिंहने पर्वत-शिखरोंपर पुष्पोंसे लदी हुई अनेकों प्रकारकी लताओंको भी देखा, जो सुन्दर मंजरियोंसे सुशोभित थीं और जिनसे मनोरम गन्ध फैल रही थी। उस सभामें |
| केतक्यशोकसरलाः पुन्नागतिलकार्जुनाः।<br>चूता नीपाः प्रस्थपुष्पाः कदम्बा बकुला धवाः॥ ५६<br>प्रियङ्गुपाटलावृक्षाः शाल्मल्यः सहरिद्रकाः।<br>सालास्तालास्तमालाश्च चम्पकाश्र्च मनोरमाः॥ ५७<br>तथैवान्ये व्यराजन्त सभायां पुष्पिता द्रुमाः।<br>विद्रुमाश्च द्रुमाश्चैव ज्वलिताग्निसमप्रभाः॥ ५८<br>स्कन्धवन्तः सुशाखाश्च बहुतालसमुच्छ्रयाः।<br>अर्जुनाशोकवर्णाश्च बहवश्चित्रका द्रुमाः॥ ५९<br>वरुणो वत्सनाभश्च पनसाः सह चन्दनैः।<br>नीपाः सुमनसश्चैव निम्बा अश्वत्थतिन्दुकाः॥ ६०<br>पारिजाताश्च लोध्राश्च मल्लिका भद्रदारवः।<br>आमलक्यस्तथा जम्बूलकुचाः शैलवालुकाः॥ ६१ | केतकी, अशोक, सरल (चीड़), पुन्नाग, तिलक, अर्जुन, आम, नीप, प्रस्थपुष्प, कदम्ब, बकुल, धव, प्रियंगु, पाटल, शाल्मली, हरिद्रक, साल, ताल, तमाल, मनोरम चम्पक, विद्रुम तथा प्रज्वलित अग्निकी-सी कान्तिवाले अन्यान्य वृक्ष फूलोंसे लदे हुए शोभा पा रहे थे। वहाँ अर्जुन और अशोकके-से वर्णवाले मोटी-मोटी डालों एवं सुन्दर शाखाओंसे युक्त बहुत-से चित्रक (रेंड़ या तिलक)-के वृक्ष थे, जिनकी ऊँचाई अनेकों तालवृक्षोंके बराबर थी। वहाँ वरुण, वत्सनाभ, कटहल, चन्दन, सुन्दर पुष्पोंसे युक्त नीप, नीम, पीपल, तिन्दुक, पारिजात, लोध्र, मल्लिका, भद्रदारु, आमला, जामुन, बड़हर, शैलबालुक, |
| * अध्याय १६१ * | ६७३ |
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| खर्जूर्यो नारिकेलाश्च हरीतग्विभीतकाः ।<br>कालीयका द्रुकालाश्च हिङ्गवः पारियात्रकाः ॥ ६२<br>मन्दारकुन्दलक्ताश्च पतङ्गाः कुटजास्तथा।<br>रक्ताः कुरण्टकाश्चैव नीलाश्चागरुभिः सह ॥ ६३<br>कदम्बाश्चैव भव्याश्च दाडिमा बीजपूरकाः।<br>सप्तपर्णाश्च बिल्वाश्च मधुपैरावृतास्तथा ॥ ६४<br>अशोकाश्च तमालाश्च नानागुल्मलतावृताः।<br>मधूकाः सप्तपर्णाश्च बहवस्तीरगा द्रुमाः ॥ ६५ | खजूर, नारियल, हरीतकी, विभीतक, कालीयक, द्रुकाल, हींग, पारियात्रक, मन्दार, कुन्द, लक्त, पतंग, कुटज, लाल कुरण्टक, अगुरु, कदम्ब, सुन्दर अनार, बिजौरा नींबू, सप्तपर्ण, बेल, भँवरोंसे घिरे हुए अशोक, अनेकों गुल्मों और लताओंसे आच्छादित तमाल, महुआ और सप्तपर्ण आदि बहुत-से वृक्ष तटपर उगे हुए थे॥ ५१–६५॥ |
| लताश्च विविधाकाराः पत्रपुष्पफलोपगाः।<br>एते चान्ये च बहवस्तत्र काननजा द्रुमाः ॥ ६६<br>नानापुष्पफलोपेता व्यराजन्त समंततः।<br>चकोराः शतपत्राश्च मत्तकोकिलसारिकाः ॥ ६७<br>पुष्पिताः पुष्पिताग्रैश्च सम्पतन्ति महाद्रुमाः।<br>रक्तपीतारुणास्तत्र पादपाग्रगताः खगाः ॥ ६८<br>परस्परमवेक्षन्ते प्रहृष्टा जीवजीवकाः।<br>तस्यां सभायां दैत्येन्द्रो हिरण्यकशिपुस्तदा ॥ ६९<br>स्त्रीसहस्रैः परिवृतो विचित्राभरणाम्बरः।<br>अनर्घ्यमणिवज्रार्चिः शिखाज्वलितकुण्डलः ॥ ७०<br>आसीनश्चासने चित्रे दशनल्वप्रमाणतः।<br>दिवाकरनिभे दिव्ये दिव्यास्तरणसंस्तृते ॥ ७१<br>दिव्यगन्धवहस्तत्र मारुतः सुसुखो ववौ।<br>हिरण्यकशिपुर्दैत्य आस्ते ज्वलितकुण्डलः ॥ ७२<br>उपचेरुर्महादैत्यं हिरण्यकशिपुं तदा।<br>दिव्यतानेन गीतानि जगुर्गन्धर्वसत्तमाः ॥ ७३ | वहाँ पत्र, पुष्प और फलसे सुशोभित अनेकों प्रकारकी लताएँ फैली हुई थीं। ये तथा इनके अतिरिक्त अन्यान्य बहुत-से जंगली वृक्ष नाना प्रकारके पुष्पों और फलोंसे लदे हुए चारों ओर शोभा पा रहे थे। चकोर, शतपत्र (कठफोड़वा), मतवाली कोयल और मैना एक पुष्पित वृक्षके पल्लवसे उड़कर दूसरे पुष्पित महान् वृक्षपर बैठ रही थीं। वहाँ रक्त, पीत और अरुण वर्णवाले बहुतेरे पक्षी वृक्षोंके शिखरोंपर बैठे थे तथा चकोर प्रसन्न मनसे परस्पर एक-दूसरेकी ओर देख रहे थे। उसी सभामें उस समय दैत्यराज हिरण्यकशिपु सूर्यके समान चमकीले एवं दिव्य बिछौनोंसे आच्छादित एक दस नल्व* प्रमाणवाले रमणीय दिव्य सिंहासनपर आसीन था। वह विचित्र ढंगके आभूषणों और वस्त्रोंसे सुसज्जित तथा हजारों स्त्रियोंसे घिरा हुआ था। उसके कुण्डल बहुमूल्य मणियों और हीरेकी प्रभासे उद्भासित हो रहे थे। ऐसे उद्दीप्त कुण्डलोंसे विभूषित दैत्यराज हिरण्यकशिपु वहाँ विराजमान था। उस समय दिव्य गन्धसे युक्त परम सुखदायिनी वायु चल रही थी। परिचारकगण महादैत्य हिरण्यकशिपुकी सेवामें जुटे हुए थे। गन्धर्वश्रेष्ठ दिव्य तानद्वारा गीत आलाप रहे थे॥ ६६–७३॥ |
| विश्वाची सहजन्या च प्रम्लोचेत्यभिविश्रुता।<br>दिव्याथ सौरभेयी च समीची पुञ्जिकस्थली ॥ ७४<br>मिश्रकेशी च रम्भा च चित्रलेखा शुचिस्मिता।<br>चारुकेशी घृताची च मेनका चोर्वशी तथा ॥ ७५<br>एताः सहस्रशश्चान्या नृत्यगीतविशारदाः।<br>उपत्तिष्ठन्ति राजानं हिरण्यकशिपुं प्रभुम् ॥ ७६ | उस समय विश्वाची, सहजन्या, सुविख्यात प्रम्लोचा, दिव्या, सौरभेयी, समीची, पुंजिकस्थली, मिश्रकेशी, रम्भा, पवित्र मुसकानवाली चित्रलेखा, चारुकेशी, घृताची, मेनका तथा उर्वशी—ये तथा अन्य हजारों नाचने-गानेमें निपुण अप्सराएँ सामर्थ्यशाली दैत्यराज हिरण्यकशिपुकी सेवामें उपस्थित थीं। |
* चार सौ हाथका या किसी-किसीके मतसे एक सौ हाथका प्राचीन माप।
| ६७४ | * मत्स्यपुराण * |
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| तत्रासीनं महाबाहुं हिरण्यकशिपुं प्रभुम्।<br>उपासते दितेः पुत्राः सर्वे लब्धवरास्तथा ॥ ७७<br>तमप्रतिमकर्माणं शतशोऽथ सहस्रशः।<br>बलिवैरोचनस्तत्र नरकः पृथिवीसुतः ॥ ७८<br>प्रह्लादो विप्रचित्तिश्च गविष्ठश्च महासुरः।<br>सुरहन्ता दुःखहन्ता सुनामा सुमतिर्वरः ॥ ७९<br>घटोदरो महापार्श्वः क्रथनः पिठरस्तथा।<br>विश्वरूपः सुरूपश्च स्वबलश्च महाबलः ॥ ८०<br>दशग्रीवश्च वाली च मेघवासा महासुरः।<br>घटास्योऽकम्पनश्चैव प्रजनश्चेन्द्रतापनः ॥ ८१<br>दैत्यदानवसङ्घाते सर्वे ज्वलितकुण्डलाः।<br>स्रग्विणोवाग्मिनः सर्वे सदैव चरितव्रताः ॥ ८२<br>सर्वे लब्धवराः शूराः सर्वे विगतमृत्युवः।<br>एते चान्ये च बहवो हिरण्यकशिपुं प्रभुम् ॥ ८३<br>उपासन्ति महात्मानं सर्वे दिव्यपरिच्छदाः।<br>विमानैर्विविधाकारैर्भ्राजमानैरिवाग्निभिः ॥ ८४<br>महेन्द्रवपुषः सर्वे विचित्राङ्गदबाहवः।<br>भूषिताङ्गा दितेः पुत्रास्तमुपासन्त सर्वशः ॥ ८५<br>तस्यां सभायां दिव्यायामसुराः पर्वतोपमाः।<br>हिरण्यवपुषः सर्वे दिवाकर समप्रभाः ॥ ८६<br>न श्रुतं नैव दृष्टं हि हिरण्यकशिपोर्यथा।<br>ऐश्वर्यं दैत्यसिंहस्य यथा तस्य महात्मनः ॥ ८७ | अनुपम कर्म करनेवाले सामर्थ्यशाली महाबाहु हिरण्यकशिपुके वहाँ विराजमान होनेपर वरप्राप्तिवाले सैकड़ों-हजारों दैत्य उसकी सेवा करते रहते थे। बलि, विरोचन, भूमि-पुत्र नरक, प्रह्लाद, विप्रचित्ति, महान् असुर गविष्ठ, सुरहन्ता, दुःखहन्ता, सुनामा, असुरश्रेष्ठ सुमति, घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, सुरूप, महाबली स्वबल, दशग्रीव, वाली, महान् असुर मेघवासा, घटास्य, अकम्पन, प्रजन और इन्द्रतापन—ये तथा इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-से दैत्यों एवं दानवोंके समुदाय महान् आत्मबलसे सम्पन्न एवं सामर्थ्यशाली हिरण्यकशिपुकी सेवा कर रहे थे। उन सभीके कानोंमें चमकीले कुण्डल झलमला रहे थे और गलेमें माला शोभा पा रही थी। वे सभी बोलनेमें निपुण तथा सदा व्रतका पालन करनेवाले थे। वे सभी शूरवीर, वरदानसे सम्पन्न, मृत्युरहित और दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित थे। वे अग्निके समान चमकीले विविध प्रकारके विमानोंसे सम्पन्न थे। उनके शरीर आभूषणोंसे विभूषित थे। उनकी भुजाओंपर विचित्र केयूर बँधा हुआ था और उनके शरीर महेन्द्रके समान सुन्दर थे। इस प्रकार वे दैत्य सब तरहसे हिरण्यकशिपुकी उपासना कर रहे थे। उस दिव्य सभामें बैठनेवाले सभी असुर पर्वतके समान विशालकाय थे। उनका शरीर स्वर्णके समान चमकीला था और उनकी कान्ति सूर्यके समान थी। महान् आत्मबलसे सम्पन्न उस दैत्यसिंह हिरण्यकशिपुका जैसा ऐश्वर्य था, वैसा न कभी देखा गया था और न सुना ही गया था॥ ७७–८७॥ | | कनकरजतचित्रवेदिकायां<br>परिहतरलविचित्रवीथिकायाम् ।<br>स ददर्श मृगाधिपः सभायां<br>सुरचितरत्नगवाक्षशोभितायाम् ॥ ८८<br>कनकविमलहारविभूषिताङ्गं<br>दितितनयं स मृगाधिपो ददर्श।<br>दिवसकरमहाप्रभाव्वलन्तं<br>दितिजसहस्रशतैर्निषेव्यमाणम् ॥ ८९ | जिसमें सुवर्ण और चाँदीकी सुन्दर वेदिकाएँ बनी थीं, रत्नजटित होनेके कारण जिसकी गलियाँ अत्यन्त मनोहर लग रही थीं और जो सुन्दर ढंगसे बनाये गये रत्नोंके झरोखोंसे सुशोभित थी। उस सभामें भगवान् नृसिंहने दितिनन्दन हिरण्यकशिपुको देखा, उसका शरीर स्वर्णनिर्मित विमल हारसे विभूषित था, वह सूर्यकी उत्कट प्रभाके समान उद्दीप्त हो रहा था और उसकी सैकड़ों-हजारों दैत्य सेवा कर रहे थे॥ ८८-८९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नारसिंहप्रादुर्भावे एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नारसिंहप्रादुर्भावप्रसङ्गमें एक सौ एकसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६१॥
| * अध्याय १६२ * | ६७५ |
|---|
एक सौ बासठवाँ अध्याय
प्रह्लादद्वारा भगवान् नरसिंहका स्वरूप-वर्णन तथा नरसिंह और दानवोंका भीषण युद्ध
| सूत उवाच | |
|---|---|
| ततो दृष्ट्वा महात्मानं कालचक्रमिवागतम्।<br>नरसिंहवपुश्छन्नं भस्मच्छन्नमिवानलम्॥ १<br>हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्लादो नाम वीर्यवान्।<br>दिव्येन चक्षुषा सिंहमपश्यद् देवमागतम्॥ २<br>तं दृष्ट्वा रुक्मशैलाभमपूर्वां तनुमाश्रितम्।<br>विस्मिता दानवाः सर्वे हिरण्यकशिपुश्च सः॥ ३ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर राखमें छिपी हुई अग्निकी तरह नरसिंह-शरीरमें छिपे हुए महात्मा विष्णुको कालचक्रकी भाँति आया देख हिरण्यकशिपुके पुत्र पराक्रमी प्रह्लादने दिव्य दृष्टिसे सिंहको देखकर समझ लिया कि भगवान् विष्णु आ गये। सुमेरु पर्वतकी-सी कान्तिवाले अपूर्व शरीरको धारण किये हुए उस सिंहको देखकर हिरण्यकशिपुसहित सभी दानव घबरा गये॥ १—३॥ |
| प्रह्लाद उवाच | तब प्रह्लादने कहा— |
| महाबाहो महाराज दैत्यानामादिसम्भवः।<br>न श्रुतं न च नो दृष्टं नारसिंहमिदं वपुः॥ ४<br>अव्यक्तप्रभवं दिव्यं किमिदं रूपमागतम्।<br>दैत्यान्तकरणं घोरं संशतीव मनो मम॥ ५<br>अस्य देवाः शरीरस्थाः सागराः सरितश्च याः।<br>हिमवान् पारियात्रश्च ये चान्ये कुलपर्वताः॥ ६<br>चन्द्रमाश्च सनक्षत्रैरादित्यैर्वसुभिः सह।<br>धनदो वरुणश्चैव यमः शक्रः शचीपतिः॥ ७<br>मरुतो देवगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>नागा यक्षाः पिशाचाश्च राक्षसा भीमविक्रमाः॥ ८<br>ब्रह्मा देवः पशुपतिर्ललाटस्था भ्रमन्ति वै।<br>स्थावराणि च सर्वाणि जङ्गमानि तथैव च॥ ९<br>भवांश्च सहितोऽस्माभिः सर्वैर्दैत्यगणैर्वृतः।<br>विमानशतसङ्कीर्णा तथैव भवतः सभा॥ १०<br>सर्वे त्रिभुवनं राजँल्लोकधर्माश्च शाश्वताः।<br>दृश्यन्ते नारसिंहेऽस्मिंस्तथैदमखिलं जगत्॥ ११<br>प्रजापतिश्चात्र मनुर्महात्मा<br>ग्रहाश्च योगाश्च महीरुहाश्च।<br>उत्पातकालश्च धृतिर्मतिश्च<br>रतिश्च सत्यं च तपो दमश्च॥ १२ | महाबाहु महाराज! आप दैत्योंके मूल पुरुष हैं। आपके इस नरसिंह-शरीरके विषयमें अबतक कभी कुछ न सुना ही गया और न इसे कभी देखा ही गया, अज्ञातरूपसे उत्पन्न होनेवाला यह कौन-सा दिव्यरूप आ पहुँचा है? मुझे लगता है कि आपका यह भयंकर रूप दैत्योंका अन्त ही करनेवाला है। इस सिंहके शरीरमें सभी देवता, समुद्र, सभी नदियाँ, हिमवान्, पारियात्र (विन्ध्य) आदि सभी कुलपर्वत, नक्षत्रों, आदित्यगणों और वसुगणोंसहित चन्द्रमा, कुबेर, वरुण, यमराज, शचीपति इन्द्र, मरुद्गण, देवगन्धर्व, तपोधन महर्षि, नाग, यक्ष, पिशाच, भयंकर पराक्रमी राक्षस, ब्रह्मा और भगवान् शंकर स्थित हैं। ये सभी ललाटमें स्थित होकर भ्रमण कर रहे हैं। राजन्! सभी स्थावर-जङ्गम प्राणी, हमलोगोंसहित तथा समस्त दैत्यगणोंसे घिरे हुए आप, सैकड़ों विमानोंसे भरी हुई आपकी यह सभा, सारी त्रिलोकी, शाश्वत लोकधर्म तथा यह अखिल जगत् इस नरसिंहके शरीरमें दिखायी पड़ रहे हैं। साथ ही इस शरीरमें प्रजापति, महात्मा मनु, ग्रह, योग, वृक्ष, उत्पात, काल, धृति, |
| ६७६ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमारश्च महानुभावो<br>विश्वे च देवा ऋषयश्च सर्वे।<br>क्रोधश्च कामश्च तथैव हर्षो<br>धर्मश्च मोहः पितरश्च सर्वे॥ १३ | मति, रति, सत्य, तप, दम, महानुभाव सनत्कुमार, विश्वेदेवगण, सभी ऋषिगण, क्रोध, काम, हर्ष, धर्म, मोह और सभी पितृगण भी विद्यमान हैं॥४—१३॥ |
| प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा हिरण्यकशिपुः प्रभुः।<br>उवाच दानवान् सर्वान् गणांश्च स गणाधिपः ॥ १४<br>मृगेन्द्रो गृह्यतामेष अपूर्वां तनुमास्थितः।<br>यदि वा संशयः कश्चिद् वध्यतां वनगोचरः॥ १५<br>ते दानवगणाः सर्वे मृगेन्द्रं भीमविक्रमम्।<br>परिक्षिपन्तो मुदितास्त्रासयामासुरोजसा ॥ १६<br>सिंहनादं विमुच्याथ नरसिंहो महाबलः।<br>बभञ्ज तां सभां सर्वां व्यादितास्य इवान्तकः ॥ १७<br>सभायां भज्यमानायां हिरण्यकशिपुः स्वयम्।<br>चिक्षेपास्त्राणि सिंहस्य रोषाद् व्याकुललोचनः ॥ १८ | इस प्रकार प्रह्लादकी बात सुनकर दानवगणोंके अधीश्वर सामर्थ्यशाली हिरण्यकशिपुने सभी दानवगणोंको आदेश देते हुए कहा—'दानवो! अपूर्व शरीर धारण करनेवाले इस मृगेन्द्रको पकड़ लो। अथवा यदि पकड़नेमें कोई संदेह हो तो इस बनैले जीवको मार डालो।' यह सुनकर वे सभी दानवगण हर्षपूर्वक उस भयंकर पराक्रमी मृगेन्द्रपर टूट पड़े और बलपूर्वक त्रास देने लगे। तदनन्तर मुख फैलाये हुए कालकी तरह भीषण दीखनेवाले महाबली नरसिंहने सिंहनाद करके उस सारी सभाको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। सभाको विध्वंस होते देखकर हिरण्यकशिपुके नेत्र क्रोधसे व्याकुल हो गये, तब वह स्वयं नरसिंहपर अस्त्र छोड़ने लगा॥१४—१८॥ |
| सर्वास्त्राणामथ ज्येष्ठं दण्डमस्त्रं सुदारुणम्।<br>कालचक्रं तथा घोरं विष्णुचक्रं तथा परम्॥ १९<br>पैतामहं तथाप्युग्रं त्रैलोक्यदहनं महत्।<br>विचित्रामशनीं चैव शुष्कार्द्रा चाशनिद्वयम्॥ २०<br>रौद्रं तथोग्रं शूलं च कङ्कालं मुसलं तथा।<br>मोहनं शोषणं चैव सन्तापनविलापनम्॥ २१<br>वायव्यं मथनं चैव कापालमथ कैङ्करम्।<br>तथाप्रतिहतां शक्तिं क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च ॥ २२<br>अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैव सोमास्त्रं शिशिरं तथा।<br>कम्पनं शातनं चैव त्वाष्ट्रं चैव सुभैरवम्॥ २३<br>कालमुद्गरमक्षोभ्यं तपनं च महाबलम्।<br>संवर्तनं मादनं च तथा मायाधरं परम्॥ २४<br>गान्धर्वमस्त्रं दयितमसिरत्नं च नन्दकम्।<br>प्रस्वापनं प्रमथनं वारुणं चास्त्रमुत्तमम्।<br>अस्त्रं पाशुपतं चैव यस्याप्रतिहता गतिः॥ २५<br>अस्त्रं हयशिरश्चैव ब्राह्ममस्त्रं तथैव च।<br>नारायणास्त्रमैन्द्रं च सार्पमस्त्रं तथाद्भुतम् ॥ २६<br>पैशाचमस्त्रमजितं शोषदं शामनं तथा।<br>महाबलं भावनं च प्रस्थापनविकम्पने ॥ २७<br>एतान्यस्त्राणि दिव्यानि हिरण्यकशिपुस्तदा।<br>असृजन्नरसिंहस्य दीप्तस्याग्नेरिवाहुतिम्॥ २८ | उस समय हिरण्यकशिपु सम्पूर्ण अस्त्रोंमें सबसे बड़ा दण्ड अस्त्र, अत्यन्त भीषण कालचक्र, अतिशय भयंकर विष्णुचक्र, त्रिलोकीको भस्म कर देनेवाला अत्यन्त उग्र पितामहका महान् अस्त्र ब्रह्मास्त्र, विचित्र वज्र, सूखी और गीली दोनों प्रकारकी अशनि, भयानक तथा उग्र शूल, कंकाल, मूसल, मोहन, शोषण, संतापन, विलापन, वायव्य, मथन, कापाल, कैंकर, अमोघ शक्ति, क्रौञ्चास्त्र, ब्रह्मशिरा अस्त्र, सोमास्त्र, शिशिर, कम्पन, शातन, अत्यन्त भयंकर त्वाष्ट्रास्त्र, कभी क्षुब्ध न होनेवाला कालमुद्गर, महाबलशाली तपन, संवर्तन, मादन, परमोत्कृष्ट मायाधर, परमप्रिय गान्धर्वास्त्र, असिरत्न नन्दक, प्रस्वापन, प्रमथन, सर्वोत्तम वारुणास्त्र, जिसकी गति अप्रतिहत होती है ऐसा पाशुपतास्त्र, हयशिरा अस्त्र, ब्राह्म अस्त्र, नारायणास्त्र, ऐन्द्रास्त्र, अद्भुत नागास्त्र, अजेय पैशाचास्त्र, शोषण, शामन, महाबलसे सम्पन्न भावन, प्रस्थापन, विकम्पन—इन सभी दिव्यास्त्रोंको नरसिंहके ऊपर उसी प्रकार छोड़ रहा था, मानो प्रज्वलित अग्निमें आहुति डाल रहा हो। |
१६४- पद्मोद्भवके प्रसङ्गमें मनुद्वारा भगवान् विष्णुसे सृष्टिसम्बन्धी विविध प्रश्न और भगवान्का उत्तर
- अध्याय १६२ * | ६७७ -|-
| अस्त्रैः प्रज्वलितैः सिंहमावृणोदसुरोत्तमः।<br>विवस्वान् घर्मसमये हिमवन्तमिवांशुभिः॥ २९<br>स ह्यामर्षानिलोद्भूतो दैत्यानां सैन्यसागरः।<br>क्षणेन प्लावयामास मैनाकमिव सागरः॥ ३०<br>प्रासैः पाशैश्च खड्गैश्च गदाभिर्मुसलैस्तथा।<br>वज्रैरशनिभिश्चैव साग्निभिश्च महाद्रुमैः॥ ३१<br>मुद्गरैर्भिन्दिपालैश्च शिलोलूखलपर्वतैः।<br>शतघ्नीभिश्च दीप्ताभिर्दण्डैरपि सुदारुणैः॥ ३२<br>ते दानवाः पाशगृहीतहस्ता<br>महेन्द्रवज्राशनितुल्यवेगाः।<br>समन्ततोऽभ्युद्यतबाहुकायाः<br>स्थितास्त्रिशीर्षा इव नागपाशाः॥ ३३<br>सुवर्णमालाकुलभूषिताङ्गाः<br>पीतांशुकाभोगविभाविताङ्गाः।<br>मुक्तावलीदामसनाथकक्षा<br>हंसा इवाभान्ति विशालपक्षाः॥ ३४<br>तेषां तु वायुप्रतिमौजसां वै<br>केयूरमौलीबलयोत्कटानाम्।<br>तान्युत्तमाङ्गान्युभितो विभान्ति<br>प्रभातसूर्यांशुसमप्रभाणि ॥ ३५<br>क्षिपद्भिरुग्रैर्ज्वलितैर्महाबलै-<br>र्महास्त्रपूगैः सुसमावृत्तो बभौ।<br>गिरिर्यथा संततवर्षिभिर्घनैः<br>कृतान्धकारान्तरकन्दरो द्रुमैः॥ ३६<br>तैर्हन्यमानोऽपि महास्त्रजालै-<br>र्महाबलैर्दैत्यगणैः समेतैः।<br>नाकम्पताजौ भगवान् प्रताप-<br>स्थितः प्रकृत्या हिमवानिवाचलः॥ ३७<br>संत्रासितास्तेन नृसिंहरूपिणा<br>दितेः सुताः पावकतुल्यतेजसा।<br>भयाद् विचेलुः पवनोद्धुताङ्गा<br>यथोर्मयः सागरवारिसम्भवाः॥ ३८ | उस असुरश्रेष्ठने नरसिंहको प्रज्वलित अस्त्रोंद्वारा ऐसा आच्छादित कर दिया, जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें सूर्य अपनी किरणोंसे हिमवान् पर्वतको ढक लेते हैं। दैत्योंका वह सेनारूपी सागर क्रोधरूपी वायुसे उच्छ्वलित हो उठा और क्षणमात्रमें ही वहाँकी भूमिपर इस प्रकार छा गया, जैसे सागर मैनाक पर्वतको डुबाकर उबल उठा था। फिर तो वे भाला, पाश, तलवार, गदा, मुसल, वज्र, अग्निसहित अशनि, विशाल वृक्ष, मुद्गर, भिन्दिपाल, शिला, ओखली, पर्वत, प्रज्वलित शतघ्नी (तोप) और अत्यन्त भीषण दण्डसे नरसिंहपर प्रहार करने लगे॥ २९-३२॥<br><br>उस समय महेन्द्रके वज्र एवं अशनिके समान वेगशाली वे दानव हाथमें पाश लिये हुए चारों ओर अपनी भुजाओं और शरीरोंको ऊपर उठाये हुए स्थित थे, जो तीन शिखावाले नागपाशकी तरह दीख रहे थे। उनके शरीर सोनेकी मालाओंसे विभूषित थे, उनके अङ्गोंपर पीला रेशमी वस्त्र शोभा पा रहा था तथा कटिबंध मोतियोंकी लड़ियोंसे संयुक्त थे, जिससे वे विशाल पंखधारी हंसकी भाँति शोभा पा रहे थे। केयूर, मुकुट और कंकणसे सुशोभित उन उत्कट पराक्रमी एवं वायुके समान ओजस्वी दानवोंके मस्तक प्रातःकालीन सूर्यकी किरणोंकी कान्ति-सदृश चमक रहे थे। उन महाबली दानवोंद्वारा चलाये गये भयंकर एवं उद्दीप्त महान् अस्त्रसमूहोंसे आच्छादित हुए भगवान् नरसिंह उसी प्रकार शोभा पा रहे थे, मानो निरन्तर वर्षा करनेवाले बादलों और वृक्षोंसे अन्धकारित किये गये गुफाओंसे युक्त पर्वत हो। संगठित हुए उन महाबली दैत्योंद्वारा महान् अस्त्रसमूहोंसे आघात किये जानेपर भी प्रतापशाली भगवान् नरसिंह युद्धस्थलमें विचलित नहीं हुए, अपितु प्रकृतिसे अटल रहनेवाले हिमवान्की तरह अडिग होकर डटे रहे। अग्निके समान तेजस्वी नृसिंहरूपधारी भगवान् विष्णुके द्वारा डराये गये दैत्यगण भयके कारण उसी प्रकार विचलित हो गये, जैसे समुद्रके जलमें उठी हुई लहरें वायुके थपेड़ोंसे क्षुब्ध हो जाती हैं॥ ३३-३८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नारसिंहप्रादुर्भावो नाम द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नारसिंहप्रादुर्भाव नामक एक सौ बासठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६२ ॥
| ६७८ | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ तिरसठवाँ अध्याय
नरसिंह और हिरण्यकशिपुका भीषण युद्ध, दैत्योंको उत्पातदर्शन, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, नरसिंहद्वारा हिरण्यकशिपुका वध तथा ब्रह्माद्वारा नरसिंहकी स्तुति
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
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| खरश्वानमुखाश्चैव मकराशीविषाननाः।<br>ईहामृगमुखाश्चान्ये वराहमुखसंस्थिताः॥ १<br><br>बालसूर्यमुखाश्चान्ये धूमकेतुमुखास्तथा।<br>अर्धचन्द्रार्धवक्त्राश्च अग्निदीप्तमुखास्तथा॥ २<br><br>हंसकुक्कुटवक्त्राश्च व्यादितास्या भयावहाः।<br>सिंहास्या लेलिहानाश्च काकगृध्रमुखास्तथा॥ ३<br><br>द्विजिव्हाका वक्रशीर्षास्तथोल्कामुखसंस्थिताः।<br>महाग्राहमुखाश्चान्ये दानवा बलदर्पिताः॥ ४<br><br>शैलसंवर्ष्मणस्तस्य शरीरे शरवृष्टिभिः।<br>अवध्यस्य मृगेन्द्रस्य न व्यथां चक्रुराहवे॥ ५<br><br>एवं भूयो परान् घोरानसृजन् दानवेश्वराः।<br>मृगेन्द्रस्योपरि क्रुद्धा निःश्वसन्त इवोरगाः॥ ६<br><br>ते दानवशरा घोरा दानवेन्द्रसमीरिताः।<br>विलयं जग्मुराकाशे खद्योता इव पर्वते॥ ७<br><br>ततश्चक्राणि दिव्यानि दैत्याः क्रोधसमन्विताः।<br>मृगेन्द्रायासृजन्नाशु ज्वलितानि समन्ततः॥ ८<br><br>तैरासीद् गगनं चक्रैः सम्पतद्भिरितस्ततः।<br>युगान्ते सम्प्रकाशद्भिश्चन्द्रादित्यग्रहैरिव॥ ९<br><br>तानि सर्वाणि चक्राणि मृगेन्द्रेण महात्मना।<br>ग्रस्तान्युदीर्णानि तदा पावकार्चिःसमानि वै॥ १०<br><br>तानि चक्राणि वदने विशमानानि भान्ति वै।<br>मेघोदरदरीष्वेव चन्द्रसूर्यग्रहा इव॥ ११ | ऋषियो! उन दानवोंमें किन्हींके मुख गधे और कुत्तेके समान थे तो कुछ मकर और सर्पके-से मुखवाले थे। किन्हींके मुख भेड़िया-सदृश तो कुछके सूअर-जैसे थे। कुछ उदयकालीन सूर्यके समान तो कुछ धूमकेतु-से मुखवाले थे। किन्हींके मुख अर्धचन्द्र तथा किन्हींके अग्निकी तरह उद्दीप्त थे। किन्हींका मुख आधा ही था। किन्हींके मुख हंस और मुर्गेके समान थे। किन्हींके मुख फैले हुए थे, जो बड़े भयावने लग रहे थे। कुछ सिंहके-से मुखवाले दानव जीभ लपलपा रहे थे। किन्हींके मुख कौओं और गीधों-जैसे थे। किन्हींके मुखमें दो जिह्वाएँ थीं, किन्हींके मस्तक टेढ़े थे और कुछ उल्का-सरीखे मुखवाले थे। किन्हींके मुख महाग्राह-सदृश थे। इस प्रकार वे बलाभिमानी दानव रणभूमिमें पर्वतके समान सुदृढ़ शरीरवाले उन अवध्य मृगेन्द्रके शरीरपर बाणोंकी वृष्टि करके उन्हें पीड़ित न कर सके। तब क्रुद्ध हुए सर्पकी भाँति निःश्वास छोड़ते हुए वे दानवेश्वर नरसिंहके ऊपर पुनः दूसरे भयंकर बाणोंकी वृष्टि करने लगे, परंतु दानवेश्वरोंद्वारा छोड़े गये वे भयंकर बाण उसी प्रकार आकाशमें विलीन हो जाते थे, जैसे पर्वतपर चमकते हुए जुगनू। तत्पश्चात् क्रोधसे भरे हुए दैत्य शीघ्र ही नरसिंहके ऊपर चारों ओरसे चमकते हुए दिव्य चक्रोंकी वर्षा करने लगे। इधर-उधर गिरते हुए उन चक्रोंसे आकाशमण्डल ऐसा दीख रहा था, मानो युगान्तके समय प्रकाशित हुए चन्द्रमा, सूर्य आदि ग्रहोंसे युक्त हो गया हो। अग्निकी लपटोंके समान उठते हुए उन सभी चक्रोंको महात्मा नरसिंह निगल गये। उस समय उनके मुखमें प्रविष्ट होते हुए वे चक्र मेघोंकी घनघोर घटामें घुसते हुए चन्द्र, सूर्य एवं अन्यान्य ग्रहोंकी भाँति सुशोभित हो रहे थे॥ १—११॥ |
| हिरण्यकशिपुर्दैत्यो भूयः प्रासृजदूर्जिताम्।<br>शक्तिं प्रज्वलितां घोरां धौतशस्त्रतडित्प्रभाम्॥ १२ | तदनन्तर दैत्यराज हिरण्यकशिपुने भगवान् नरसिंहपर पुनः अपनी भयंकर शक्ति छोड़ी, जो चमकीली, अत्यन्त शक्तिशाली और धुली होनेके कारण बिजली-सी चमक |
| * अध्याय १६३ * | ६७९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य मृगेन्द्रः शक्तिमुज्ज्वलाम्।<br>हुङ्कारेणैव रौद्रेण बभञ्ज भगवांस्तदा॥ १३<br><br>रराज भग्ना सा शक्तिर्मृगेन्द्रेण महीतले।<br>सविस्फुलिङ्गा ज्वलिता महोल्केव दिवश्च्युता॥ १४<br><br>नाराचपङ्क्तिः सिंहस्य प्राप्ता रेजेऽविदूरतः।<br>नीलोत्पलपलाशानां मालेवोज्ज्वलदर्शना॥ १५<br><br>स गर्जित्वा यथान्यायं विक्रम्य च यथासुखम्।<br>तत्सैन्यमुत्सारितवांस्तृणाग्राणीव मारुतः॥ १६<br><br>ततोऽश्मवर्षं दैत्येन्द्रा व्यसृजन्त नभोगताः।<br>नगमात्रैः शिलाखण्डैर्गिरिशृङ्गैर्महाप्रभैः॥ १७<br><br>तदश्मवर्षं सिंहस्य महन्मूर्धनि पातितम्।<br>दिशो दश विशीर्णा वै खद्योतप्रकरा इव॥ १८<br><br>तदाश्मौघैर्दैत्यगणाः पुनः सिंहमरिन्दमम्।<br>छादयांचक्रिरे मेघा धाराभिरिव पर्वतम्॥ १९<br><br>न च तं चालयामासुर्दैत्यौघा देवसत्तमम्।<br>भीमवेगोऽचलश्रेष्ठं समुद्र इव मन्दरम्॥ २० | रही थी। तब उस उज्ज्वल शक्तिको अपनी ओर आती हुई देखकर भगवान् नरसिंहने अपने भयंकर हुंकारसे ही उसे तोड़कर टूक-टूक कर दिया। नरसिंहद्वारा तोड़ी गयी वह शक्ति ऐसी शोभा पा रही थी, जैसे आकाशमें भूतलपर गिरी हुई चिनगारियोंसहित प्रज्वलित महान् उल्का हो। नरसिंहके निकट पहुँची हुई (दैत्योंद्वारा छोड़े गये) बाणोंकी उज्ज्वल वर्णवाली पंक्ति नीले कमल-दलकी मालाकी तरह शोभा पा रही थी। यह देखकर भगवान् नरसिंहने न्यायतः पराक्रम प्रदर्शित कर सुखपूर्वक गर्जना की और उस दानवसेनाको वायुद्वारा उड़ाये गये क्षुद्र तिनकोंकी तरह खदेड़ दिया। तदुपरान्त दैत्येश्वरगण आकाशमें स्थित होकर पत्थरकी वर्षा करने लगे। पत्थरोंकी वह वर्षा नरसिंहके विशाल मस्तकपर गिरकर चूर-चूर हो जुगनुओंके समूहकी भाँति दसों दिशाओंमें बिखर गयी। तब दैत्यगणोंने पुनः पर्वत-सरीखे शिलाखण्डों, पर्वत-शिखरों और पत्थरोंसे उन शत्रुसूदन नरसिंहको इस प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे मेघ जलकी धाराओंद्वारा पर्वतको ढक देते हैं। फिर भी वह दैत्यसमुदाय उन देवश्रेष्ठ नरसिंहको उसी प्रकार विचलित नहीं कर सका, जैसे भयंकर वेगशाली समुद्र पर्वतश्रेष्ठ मन्दरको नहीं डिगा सका॥ १२–२०॥ |
| ततोऽश्मवर्षे विहते जलवर्षमनन्तरम्।<br>धाराभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीत्समन्ततः॥ २१<br><br>नभसः प्रच्युता धारास्तिग्मवेगाः समंततः।<br>आवृत्य सर्वतो व्योम दिशश्चोपविशस्तथा॥ २२<br><br>धारा दिवि च सर्वत्र वसुधायां च सर्वशः।<br>न स्पृशन्ति च ता देवं निपतन्त्योऽनिशं भुवि॥ २३<br><br>बाह्यतो ववृषुर्वर्षं नोपरिष्टाच्च ववृषुः।<br>मृगेन्द्रप्रतिरूपस्य स्थितस्य युधि मायया॥ २४<br><br>हतेऽश्मवर्षे तुमुले जलवर्षे च शोषिते।<br>सोऽसृजद् दानवो मायामग्निवायुसमीरिताम्॥ २५<br><br>महेन्द्रस्तोयदैः सार्धं सहस्राक्षो महाद्युतिः।<br>महता तोयवर्षेण शमयामास पावकम्॥ २६ | तदनन्तर पत्थरोंकी वृष्टिके विफल हो जानेपर चारों ओर मूसलाधार जलकी वृष्टि होने लगी। चारों ओर आकाशसे गिरती हुई वे तीव्र वेगशाली धाराएँ सब ओरसे आकाश, दिशाओं तथा विदिशाओंको आच्छादित करके लगातार भूतलपर गिर रही थीं। यद्यपि वे धाराएँ आकाश तथा पृथ्वीपर सर्वत्र सब प्रकारसे व्याप्त थीं, तथापि वे भगवान् नरसिंहका स्पर्श नहीं कर पा रही थीं। युद्धभूमिमें मायाद्वारा मृगेन्द्रका रूप धारण करनेवाले भगवान्के ऊपर वे धाराएँ नहीं गिर रही थीं, अपितु बाहर चारों ओर वर्षा कर रही थीं। इस प्रकार जब वह शिलावृष्टि नष्ट कर दी गयी और घनघोर जलवृष्टि सोख ली गयी, तब दानवराज हिरण्यकशिपुने अग्नि और वायुद्वारा प्रेरित मायाका विस्तार किया, किंतु परम कान्तिमान् सहस्र नेत्रधारी महेन्द्रने बादलोंके साथ वहाँ आकर जलकी घनघोर वृष्टिसे उस अग्निको शान्त कर |
१६५- चारों युगोंकी व्यवस्थाका वर्णन
६८० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्यां प्रतिहतायां तु मायायां युधि दानवः।<br>असृजद् घोरसंकाशं तमस्तीव्रं समन्ततः॥ २७<br>तमसा संवृते लोके दैत्येष्वात्तायुधेषु च।<br>स्वतेजसा परिवृतो दिवाकर इवावभौ॥ २८<br>त्रिशिखां भृकुटीं चास्य ददृशुर्दानवा रणे।<br>ललाटस्थां त्रिशूलाङ्कां गङ्गां त्रिपथगामिव॥ २९ | दिया। युद्धस्थलमें उस मायाके नष्ट हो जानेपर उस दानवने चारों ओर भयंकर दीखनेवाले घने अन्धकारकी सृष्टि की। उस समय सारा जगत् अन्धकारसे ढक गया और दैत्यगण अपना-अपना हथियार लिये डटे रहे। उसके मध्य अपने तेजसे घिरे हुए भगवान् नरसिंह सूर्यकी तरह शोभा पा रहे थे। दानवोंने रणभूमिमें नरसिंहके ललाटमें स्थित त्रिशूलकी-सी आकारवाली उनकी त्रिशिखा भृकुटिको देखा, जो त्रिपथगा गङ्गाकी तरह प्रतीत हो रही थी॥ २१—२९॥ |
| ततः सर्वासु मायासु हतासु दितिनन्दनाः।<br>हिरण्यकशिपुं दैत्यं विवर्णाः शरणं ययुः॥ ३०<br>ततः प्रज्वलितः क्रोधात् प्रदहन्निव तेजसा।<br>तस्मिन् क्रुद्धे तु दैत्येन्द्रे तमोभूतमभूज्जगत्॥ ३१<br>आवहः प्रवहश्चैव विवहोऽथ ह्युदावहः।<br>परावहः संवहश्च महाबलपराक्रमाः॥ ३२<br>तथा परिवहः श्रीमानुत्पातभयशंसाः।<br>इत्येवं क्षुभिताः सप्त मरुतो गगनेचराः॥ ३३<br>ये ग्रहाः सर्वलोकस्य क्षये प्रादुर्भवन्ति वै।<br>ते सर्वे गगने दृष्टा व्यचरन्त यथासुखम्॥ ३४<br>अयोगतश्चाप्यचरद् योगं निशि निशाकरः।<br>सग्रहः सह नक्षत्रै राकापतिररिन्दमः॥ ३५<br>विवर्णतां च भगवान् गतो दिवि दिवाकरः।<br>कृष्णं कबन्धं च तथा लक्ष्यते सुमहद्दिवि॥ ३६<br>अमुञ्चच्चार्चिषां वृन्दं भूमिवृत्तिर्विभावसुः।<br>गगनस्थश्च भगवानभीक्ष्णं परिदृश्यते॥ ३७<br>सप्त धूम्रनिभा घोरा सूर्याद्दिवि समुत्थिताः।<br>सोमस्य गगनस्थस्य ग्रहास्तिष्ठन्ति शृङ्गगाः॥ ३८<br>वामे तु दक्षिणे चैव स्थितौ शुक्रबृहस्पती।<br>शनैश्चरो लोहिताङ्गो ज्वलनाङ्गासमद्युती॥ ३९<br>समं समधिरोहन्तः सर्वे ते गगनेचराः।<br>शृङ्गानि शनकैर्घोरा युगान्तावर्तिनो ग्रहाः॥ ४० | इस प्रकार सभी मायाओंके नष्ट हो जानेपर तेजोहीन दैत्य अपने स्वामी हिरण्यकशिपुकी शरणमें गये। यह देख वह अपने तेजसे जगत्को जलाता-सा क्रोधसे प्रज्वलित हो उठा। उस दैत्येन्द्रके क्रुद्ध होनेपर सारा जगत् अन्धकारमय हो गया। पुनः आवह, प्रवह, विवह, उदावह, परावह, संवह तथा श्रीमान् परिवह—ये महान् बल एवं पराक्रमसे सम्पन्न आकाशचारी सातों वायुमार्ग उत्पातके भयकी सूचना देते हुए क्षुब्ध हो उठे। समस्त लोकोंके विनाशके अवसरपर जो ग्रह प्रकट होते हैं, वे सभी आकाशमें दृष्टिगोचर होकर सुखपूर्वक विचरण करने लगे। राहुने अमा एवं पूर्णिमाके बिना ही ग्रहणका दृश्य उपस्थित कर दिया। रातमें नक्षत्रों और ग्रहोंसहित राकापति शत्रुसूदन चन्द्रमा और दिनमें भगवान् सूर्य कान्तिहीन हो गये तथा आकाशमें अत्यन्त विशाल काले रंगका कबन्ध (धूमकेतु) दिखायी देने लगा। भगवान् अग्नि एक ओर पृथ्वीपर रहकर चिनगारियाँ छोड़ने लगे और दूसरी ओर वे निरन्तर आकाशमें भी स्थित दिखायी दे रहे थे। आकाशमण्डलमें धुएँकी-सी कान्तिवाले सात भयंकर सूर्य प्रकट हो गये। ग्रहगण आकाशमें स्थित चन्द्रमाके शिखरपर स्थित हो गये। उनके वामभागमें शुक्र और दाहिने भागमें बृहस्पति स्थित हो गये। अग्निके समान कान्तिमान् शनैश्चर और मङ्गल भी दृष्टिगोचर हुए। युगान्तके समय प्रकट होनेवाले वे सभी भयंकर ग्रह शनैः-शनैः एक साथ शिखरोंपर आरूढ़ हो आकाशमें विचरण करने लगे॥ ३०—४०॥ |
| चन्द्रमाश्च सनक्षत्रैर्ग्रहैः सह तमोनुदः।<br>चराचरविनाशाय रोहिणीं नाभ्यनन्दत॥ ४१<br>गृह्यते राहुणा चन्द्र उल्काभिरभिहन्यते।<br>उल्काः प्रज्वलिताश्चन्द्रे विचरन्ति यथासुखम्॥ ४२ | इसी प्रकार अन्धकारका विनाश करनेवाले चन्द्रमा नक्षत्रों और ग्रहोंके साथ रहकर चराचर जगत्का विनाश करनेके लिये रोहिणीका अभिनन्दन नहीं कर रहे थे। राहु चन्द्रमाको ग्रस्त कर रहा था और उल्काएँ उन्हें मार भी रही थीं। प्रज्वलित उल्काएँ चन्द्रलोकमें सुखपूर्वक |
* अध्याय १६३ * । ६८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देवानामपि यो देवः सोऽप्यवर्षत शोणितम्।<br>अपतनगनादुल्का विद्युद्रूपा महास्वनाः॥ ४३<br>अकाले च द्रुमाः सर्वे पुष्पन्ति च फलन्ति च।<br>लताश्च सफलाः सर्वा ये चाहुर्दैत्यनाशनम्॥ ४४<br>फलैः फलान्यजायन्त पुष्पैः पुष्पं तथैव च।<br>उन्मीलन्ति निमीलन्ति हसन्ति च रुदन्ति च॥ ४५<br>विक्रोशन्ति च गम्भीरा धूमयन्ति ज्वलन्ति च।<br>प्रतिमाः सर्वदेवानां वेदयन्ति महत् भयम्॥ ४६<br>आरण्यैः सह संसृष्टा ग्राम्याश्च मृगपक्षिणः।<br>चक्रुः सुभैरवं तत्र महायुद्धमुपस्थितम्॥ ४७<br>नद्यश्च प्रतिकूलानि वहन्ति कलुषोदकाः।<br>न प्रकाशन्ति च दिशो रक्तरेणुसमाकुलाः॥ ४८<br>वानस्पत्यो न पूज्यन्ते पूजनार्हाः कथञ्चन।<br>वायुवेगेन हन्यन्ते भज्यन्ते प्रणमन्ति च॥ ४९ | विचरण कर रही थीं। जो देवताओंका भी देवता (इन्द्र) है, वह रक्तकी वर्षा करने लगा। आकाशसे बिजलीकी-सी कान्तिवाली उल्काएँ भयंकर शब्द करती हुई पृथ्वीपर गिरने लगीं। सभी वृक्ष असमयमें ही फूलने और फलने लगे तथा सभी लताएँ फलसे युक्त हो गयीं, जो दैत्योंके विनाशकी सूचना दे रही थीं। फलोंसे फल तथा फूलोंसे फूल प्रकट होने लगे। सभी देवताओंकी मूर्तियाँ कभी आँख फाड़कर देखतीं, कभी आँखें बंद कर लेतीं, कभी हँसती थीं तो कभी रोने लगती थीं। वे कभी जोर-जोरसे चिल्लाने लगती थीं, कभी गम्भीररूपसे धुआँ फेंकती थीं तो कभी प्रज्वलित हो जाती थीं। इस प्रकार वे महान् भयकी सूचना दे रही थीं। उस समय ग्रामीण मृग-पक्षी वन्य मृग-पक्षियोंसे संयुक्त होकर अत्यन्त भयंकर महान् युद्ध करने लगे। गंदे जलसे भरी हुई नदियाँ उलटी दिशामें बहने लगीं। रक्त और धूलसे व्याप्त दिशाएँ दिखायी नहीं दे रही थीं। पूजनीय वृक्षोंकी किसी प्रकार पूजा (रक्षा) नहीं हो रही थी। वे वायुके झोंकेसे प्रताडित हो रहे थे, झुक जाते थे और टूट भी जाते थे॥ ४१—४९॥ |
| यदा च सर्वभूतानां छाया न परिवर्तते।<br>अपराह्नगते सूर्ये लोकानां युगसंक्षये॥ ५०<br>तदा हिरण्यकशिपोर्दैत्यस्योपरि वेश्मनः।<br>भाण्डागारायुधागारे निविष्टमभवन्मधु॥ ५१<br>असुराणां विनाशाय सुराणां विजयाय च।<br>दृश्यन्ते विविधोत्पाता घोरा घोरनिदर्शनाः॥ ५२ | इस प्रकार लोकोंके युगान्तके समय सूर्यके अपराह्नसमयमें पहुँचनेपर जब सभी प्राणियोंकी छायामें कोई परिवर्तन नहीं दीखने लगा, तब दैत्यराज हिरण्यकशिपुके महल, भाण्डारागार और आयुधागारके ऊपर मधु टपकने लगा। इस प्रकार असुरोंके विनाश और देवताओंकी विजयके लिये भयकी सूचना देनेवाले अनेकों प्रकारके भयंकर उत्पात दिखायी दे रहे थे। |
| एते चान्ये च बहवो घोरोत्पाताः समुत्थिताः।<br>दैत्येन्द्रस्य विनाशाय दृश्यन्ते कालनिर्मिताः॥ ५३ | ये तथा इनके अतिरिक्त और भी बहुत-से भयंकर उत्पात, जो कालद्वारा निर्मित थे, दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपुके विनाशके लिये प्रकट हुए दीख रहे थे। |
| मेदिन्यां कम्पमानायां दैत्येन्द्रेण महात्मना।<br>महीधरा नागगणा निपेतुरमितौजसः॥ ५४<br>विषज्वालाकुलैर्वक्त्रैर्विमुञ्चन्तो हुताशनम्।<br>चतुःशीर्षाः पञ्चशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च पन्नगाः॥ ५५<br>वासुकिस्तक्षकश्चैव कर्कोटकधनञ्जयौ।<br>एलामुखः कालियश्च महापद्मश्च वीर्यवान्॥ ५६<br>सहस्रशीर्षो नागो वै हेमतालध्वजः प्रभुः।<br>शेषोऽनन्तोमहाभागो दुष्प्रकम्प्यः प्रकम्पितः॥ ५७ | महान् आत्मबलसे सम्पन्न दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपुद्वारा पृथ्वीके प्रकम्पित किये जानेपर पर्वत तथा अमित तेजस्वी नागगण गिरने लगे। वे चार, पाँच अथवा सात सिरवाले नाग विषकी ज्वालासे व्याप्त मुखोंद्वारा अग्नि उगलने लगे। वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, धनञ्जय, एलामुख, कालिय, पराक्रमी महापद्म, एक हजार फणोंवाला सामर्थ्यशाली नाग हेमतालध्वज तथा महान् भाग्यशाली अनन्त शेषनाग—इन सबका काँपना यद्यपि अत्यन्त कठिन था, तथापि ये सभी काँप उठे। |
१६६- महाप्रलयका वर्णन
६८२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दीप्तान्यन्तर्जंलस्थानि पृथिवीधरणानि च।<br>तदा क्रुद्धेन महता कम्पितानि समन्ततः॥५८<br>नागास्तेजोधराश्चापि पातालतलचारिणः।<br>हिरण्यकशिपुर्द्दैत्यस्तदा संस्पृष्टवान् महीम्॥५९<br>संदष्टौष्ठपुटः क्रोधाद्वारह इव पूर्वजः। | उसने चारों ओर जलके भीतर स्थित रहनेवाले उदीप्त पर्वतोंको भी अत्यन्त क्रोधवश कँपा दिया। उस समय पाताललोकमें विचरण करनेवाले तेजस्वी नाग भी प्रकम्पित हो उठे। इस प्रकार दैत्यराज हिरण्यकशिपु क्रोधवश दाँतोंसे होंठोंको दबाये हुए जब पृथ्वीपर खड़ा हुआ तो वह पूर्वकालमें प्रकट हुए वाराहकी तरह दीख रहा था॥५०—५९१/२॥ |
| नदी भागीरथी चैव शरयूः कौशिकी तथा॥६०<br>यमुना त्वथ कावेरी कृष्णवेणा च निम्नगा।<br>सुवेणा च महाभागा नदी गोदावरी तथा॥६१<br>चर्मण्वती च सिन्धुश्च तथा नदनदीपतिः।<br>कमलप्रभवश्चैव शोणो मणिनिभोदकः॥६२<br>नर्मदा शुभतोया च तथा वेत्रवती नदी।<br>गोमती गोकुलाकीर्णा तथा पूर्वसरस्वती॥६३<br>मही कालमही चैव तमसा पुष्पवाहिनी।<br>जम्बूद्वीपं रत्नवटं सर्वरत्नोपशोभितम्॥६४<br>सुवर्णप्रकटं चैव सुवर्णकरमण्डितम्।<br>महानदं च लौहित्यं शैलकाननशोभितम्॥६५<br>पत्तनं कोशकरणमृषिवीरजनाकरम्।<br>मागधाश्च महाग्रामा मुण्डाः शृङ्गास्तथैव च॥६६<br>सुह्मा मल्ला विदेहाश्च मालवाः काशिकोसलाः।<br>भवनं वैनतेयस्य दैत्येन्द्रेणाभिकम्पितम्॥६७<br>कैलासशिखराकारं यत् कृतं विश्वकर्मणा।<br>रक्ततोयो महाभीमो लौहित्यो नाम सागरः॥६८<br>उदयश्च महाशैल उत्थितः शतयोजनम्।<br>सुवर्णवेदिकः श्रीमान् मेघपङ्क्तिनिषेवितः॥६९<br>भ्राजमानोऽर्कसदृशैर्जातरूपमयैर्द्रुमैः।<br>शालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः॥७०<br>अयोमुखश्च विख्यातः पर्वतो धातुमण्डितः।<br>तमालवनगन्धश्च पर्वतो मलयः शुभः॥७१<br>सुराष्ट्राश्च सबाहीकाः शूराभीरास्तथैव च।<br>भोजाः पाण्ड्याश्च वङ्गाश्च कलिङ्गास्ताम्रलिप्तकाः॥७२<br>तथैवोण्ड्राश्च पौण्ड्राश्च वामचूडाः सकेरलाः।<br>क्षोभितास्तेन दैत्येन सदेवाश्चाप्सरोगणाः॥७३ | इसी प्रकार भागीरथी नदी, सरयू, कौशिकी, यमुना, कावेरी, कृष्णवेणा नदी, महाभागा, सुवेणा, गोदावरी नदी, चर्मण्वती, सिन्धु, नद और नदियोंका स्वामी, कमल उत्पन्न करनेवाला तथा मणिसदृश जलसे परिपूर्ण शोण, पुण्यसलिला नर्मदा, वेत्रवती नदी, गोकुलसे सेवित होनेवाली गोमती, प्राचीसरस्वती, मही, कालमही, तमसा, पुष्पवाहिनी, जम्बूद्वीप, सम्पूर्ण रत्नोंसे सुशोभित रत्नवट, सुवर्णकी खानोंसे युक्त सुवर्णप्रकट, पर्वतों और काननोंसे सुशोभित महानद लौहित्य, ऋषियों और वीरजनोंका उत्पत्तिस्थानस्वरूप कोशकरण नामक नगर, बड़े-बड़े ग्रामोंसे युक्त मागध, मुण्ड, शृङ्ग, सुह्म, मल्ल, विदेह, मालव, काशी, कोसल—इन सबको तथा गरुडके भवनको, जो कैलासके शिखरकी-सी आकृतिवाला था तथा जिसे विश्वकर्माने बनाया था, उस दैत्येन्द्रने प्रकम्पित कर दिया। रक्तरूपी जलसे भरा हुआ महान् भयंकर लौहित्य सागर तथा जो स्वर्णमयी वेदिकासे युक्त, शोभाशाली, मेघकी पङ्क्तियोंद्वारा सुसेवित और सूर्य-सदृश एवं स्वर्णमय खिले हुए साल, ताल, तमाल और कनेरके वृक्षोंसे सुशोभित है, वह सौ योजन ऊँचा महान् पर्वत उदयाचल, धातुओंसे विभूषित अयोमुख नामक विख्यात पर्वत, तमाल-वनके गन्धसे सुवासित सुन्दर मलय पर्वत, सुराष्ट्र, बाहीक, शूर, आभीर, भोज, पाण्ड्य, वङ्ग, कलिङ्ग, ताम्रलिप्तक, उण्ड्र, पौण्ड्र, केरल—इन सबको तथा देवों और अप्सराओंके समूहोंको उस दैत्यने क्षुब्ध कर दिया॥६०–७३॥ |
| अगस्त्यभवनं चैव यदगम्यं कृतं पुरा।<br>सिद्धचारणसङ्घैश्च विप्रकीर्णं मनोहरम्॥७४ | इसी प्रकार जो पहले अगम्य कर दिया गया था तथा सिद्धों और चारणोंके समूहोंसे व्याप्त, |
- अध्याय १६३ * | ६८३ ---|---:
| विचित्रनानाविहगं सुपुष्पितमहाद्रुमम्।<br>जातरूपमयैः शृङ्गैरप्सरोगणनादितम्॥ ७५<br>गिरिपुष्पितकश्चैव लक्ष्मीवान् प्रियदर्शनः।<br>उत्थितः सागरं भित्त्वा विश्रामश्चन्द्रसूर्ययोः।<br>रराज सुमहाशृङ्गैर्गगनं विलिखन्निव॥ ७६<br>चन्द्रसूर्यांशुसङ्काशैः सागराम्बुसमावृतैः।<br>विद्युत्वान् सर्वतः श्रीमानायतः शतयोजनम्॥ ७७<br>विद्युतां यत्र सङ्घाता निपात्यन्ते नगोत्तमे।<br>ऋषभः पर्वतश्चैव श्रीमान् वृषभसंज्ञितः॥ ७८<br>कुञ्जरः पर्वतः श्रीमान् यत्रागस्त्यगृहं शुभम्।<br>विशालाक्षश्च दुर्धर्षः सर्पाणामालयः पुरी॥ ७९<br>तथा भोगवती चापि दैत्येन्द्रेणाभिकम्पिता।<br>महासेनो गिरिश्चैव पारियात्रश्च पर्वतः॥ ८०<br>चक्रवांश्च गिरिश्रेष्ठो वाराहश्चैव पर्वतः।<br>प्राग्ज्योतिषपुरं चापि जातरूपमयं शुभम्॥ ८१<br>यस्मिन् वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानवः।<br>मेघश्च पर्वतश्रेष्ठो मेघगम्भीरनिःस्वनः॥ ८२<br>षष्टिस्तत्र सहस्राणि पर्वतानां द्विजोत्तमाः।<br>तरुणादित्यसंकाशो मेरुस्तत्र महागिरिः॥ ८३<br>यक्षराक्षसगन्धर्वैर्नित्यं सेवितकन्दरः।<br>हेमगर्भो महाशैलस्तथा हेमसंखो गिरिः॥ ८४<br>कैलासश्चैव शैलेन्द्रो दानवेन्द्रेण कम्पिताः। | मनोहर, नाना प्रकारके रंग-विरंगे पक्षियोंसे युक्त और पुष्पोंसे लदे हुए महान् वृक्षोंसे सुशोभित था, उस अगस्त्य-भवनको भी कँपा दिया। इसके बाद जो लक्ष्मीवान्, प्रियदर्शन और अपने अत्यन्त ऊँचे शिखरोंसे आकाशमें रेखा-सी खींच रहा था तथा चन्द्रमा और सूर्यको विश्राम देनेके लिये सागरका भेदन कर बाहर निकला था, वह पुष्पितक गिरि अपने स्वर्णमय शिखरोंसे शोभा पा रहा था। फिर चन्द्रमा और सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले एवं सागरके जलसे घिरे हुए शिखरोंसे युक्त शोभाशाली विद्युत्वान् पर्वत था, जो सब ओरसे सौ योजन विस्तृत था। उस पर्वतश्रेष्ठपर बिजलियोंके समूह गिराये जाते थे। वृषभ नामसे पुकारा जानेवाला शोभासम्पन्न ऋषभ पर्वत तथा शोभाशाली कुंजर पर्वत, जिसपर महर्षि अगस्त्यका सुन्दर आश्रम था। सर्पोंका दुर्धर्ष निवासस्थान विशालाक्ष तथा भोगवती पुरी—ये सभी दैत्येन्द्रद्वारा प्रकम्पित कर दिये गये। द्विजवरो! वहाँ महासेन गिरि, पारियात्र पर्वत, गिरिश्रेष्ठ चक्रवान्, वाराह पर्वत, स्वर्णनिर्मित रमणीय प्राग्ज्योतिषपुर, जिसमें नरक नामक दुष्टात्मा दानव निवास करता है, बादलोंके समान गम्भीर शब्द करनेवाला पर्वतश्रेष्ठ मेघ आदि साठ हजार पर्वत थे, वहीं मध्याह्नकालीन सूर्यके समान प्रकाशमान विशाल पर्वत मेरु था, जिसकी कन्दराओंमें यक्ष, राक्षस और गन्धर्व नित्य निवास करते थे। महान् पर्वत हेमगर्भ, हेमसंख गिरि तथा पर्वतराज कैलास—इन सबको भी दानवेन्द्र हिरण्यकशिपुने कँपा दिया॥ ७४-८४ ½ ॥ | | हेमपुष्करसंछन्नं तेन वैखानसं सरः॥ ८५<br>कम्पितं मानसं चैव हंसकारण्डवाकुलम्।<br>त्रिशृङ्गपर्वतश्चैव कुमारी च सरिद्वरा॥ ८६<br>तुषारचयसंच्छन्नो मन्दरश्चापि पर्वतः।<br>उशीरबिन्दुश्च गिरिश्चन्द्रप्रस्थस्तथाद्रिराट्॥ ८७<br>प्रजापतिगिरिश्चैव तथा पुष्करपर्वतः।<br>देवाभ्रपर्वतश्चैव तथा वै रेणुको गिरिः॥ ८८<br>क्रौञ्चः सप्तर्षिशैलश्च धूप्रवर्णश्च पर्वतः।<br>एते चान्ये च गिरयो देशा जनपदास्तथा॥ ८९<br>नद्यः ससागराः सर्वाः सोऽकम्पयत दानवः।<br>कपिलश्च महीपुत्रो व्याघ्रवांश्चैव कम्पितः॥ ९० | हिरण्यकशिपुने स्वर्ण-सदृश कमल-पुष्पोंसे आच्छादित वैखानस सरोवर तथा हंसों और बतखोंसे भरे हुए मानसरोवरको भी कम्पित कर दिया। इसके बाद त्रिशृङ्ग पर्वत, नदियोंमें श्रेष्ठ कुमारी नदी, तुषारसमूहसे आच्छादित मन्दर पर्वत, उशीरविन्दु गिरि, पर्वतराज चन्द्रप्रस्थ, प्रजापति गिरि, पुष्कर पर्वत, देवाभ्र पर्वत, रेणुक गिरि, क्रौंच पर्वत, सप्तर्षिशैल तथा धूप्रवर्ण पर्वत—इनको तथा इनके अतिरिक्त अन्यान्य पर्वतों, देशों, जनपदों तथा सागरोंसहित सभी नदियोंको उस दानवने कम्पित कर दिया। साथ ही महीपुत्र कपिल और व्याघ्रवान् भी काँप उठे। |
१६७- भगवान् विष्णुका एकार्णवके जलमें शयन, मार्कण्डेयको आश्चर्य तथा भगवान् विष्णु और मार्कण्डेयका संवाद
| ६८४ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| खेचराश्च सतीपुत्राः पातालतलवासिनः।<br>गणस्तथा परो रौद्रो मेघनामाङ्कुशायुधः॥ ९१<br>ऊर्ध्वगो भीमवेगश्च सर्व एवाभिकम्पिताः।<br>गदी शूली करालश्च हिरण्यकशिपुस्तदा॥ ९२<br>जीमूतघनसङ्काशो जीमूतघननिःस्वनः।<br>जीमूतघननिर्घोषो जीमूत इव वेगवान्॥ ९३<br>देवारिर्दितिजो वीरो नृसिंहं समुपाद्रवत्।<br>समुत्पत्य ततस्तीक्ष्णैर्मृगेन्द्रेण महानखैः॥ ९४<br>तदोंकारसहायेन विदार्य निहतो युधि। | आकाशचारी एवं पाताललोकमें निवास करनेवाले सतीके पुत्र, अङ्कुशको अस्त्ररूपमें धारण करनेवाला परम भयंकर मेघ नामक गण तथा ऊर्ध्वग और भीमवेग—ये सभी कँपा दिये गये। तदनन्तर जो गदा और त्रिशूल धारण किये हुए था, जिसकी आकृति बड़ी विकराल थी, जो देवताओंका शत्रु, घने बादलके समान कान्तिमान्, घने बादल-जैसा बोलनेवाला, घने बादल-सदृश गरजनेवाला और बादल-सा वेगशाली था, उस दितिनन्दन वीरवर हिरण्यकशिपुने भगवान् नरसिंहपर आक्रमण किया। तब युद्धस्थलमें ओंकारकी सहायतासे भगवान् नरसिंहने आकाशमें उछलकर अपने तीखे विशाल नखोंसे उनके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर उसे मार डाला॥ ८५—९४ १/२॥ |
| मही च कालश्च शशी नभश्च<br>ग्रहाश्च सूर्यश्च दिशश्च सर्वाः।<br>नद्यश्च शैलाश्च महार्णवाश्च<br>गताः प्रसादं दितिपुत्रनाशात्॥ ९५<br>ततः प्रमुदिता देवा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>तुष्टुवुर्नामभिर्दिव्यैरादिदेवं सनातनम्॥ ९६<br>यत्त्वया विहितं देव नारसिंहमिदं वपुः।<br>एतदेवार्चयिष्यन्ति परावरविदो जनाः॥ ९७ | इस प्रकार उस दितिपुत्र हिरण्यकशिपुके मौतके मुखमें चले जानेसे पृथ्वी, काल, चन्द्रमा, आकाश, ग्रहगण, सूर्य, सभी दिशाएँ, नदियाँ, पर्वत और महासागर प्रसन्न हो गये। तदनन्तर हर्षसे फूले हुए देवता और तपोधन ऋषिगण दिव्य नामोंद्वारा उन अविनाशी आदि देवकी स्तुति करते हुए कहने लगे—'देव! आपने जो यह नरसिंहका शरीर धारण किया है, इसकी पूर्वापरके ज्ञाता लोग अर्चना करेंगे'॥ ९५—९७॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>भवान् ब्रह्मा च रुद्रश्च महेन्द्रो देवसत्तमः।<br>भवान् कर्ता विकर्ता च लोकानां प्रभवाव्ययः॥ ९८<br>परां च सिद्धिं च परं च देवं<br>परं च मन्त्रं परमं हविश्च।<br>परं च धर्मं परमं च विश्वं<br>त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ ९९<br>परं शरीरं परमं च ब्रह्म<br>परं च योगं परमां च वाणीम्।<br>परं रहस्यं परमां गतिं च<br>त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १००<br>एवं परस्यापि परं पदं यत्<br>परं परस्यापि परं च देवम्।<br>परं परस्यापि परं च भूतं<br>त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १०१ | ब्रह्माजीने कहा—देव! आप ही ब्रह्मा, रुद्र और देवश्रेष्ठ महेन्द्र हैं। आप ही लोकोंके कर्ता, संहर्ता और उत्पत्तिस्थान हैं। आपका कभी विनाश नहीं होता। आपको ही परमोत्कृष्ट सिद्धि, परात्पर देव, परम मन्त्र, परम हवि, परम धर्म, परम विश्व और आदि पुराणपुरुष कहा जाता है। आपको ही परम शरीर, परम ब्रह्म, परम योग, परमा वाणी, परम रहस्य, परम गति और अग्रजन्मा पुराण पुरुष कहा जाता है। इसी प्रकार जो परात्पर पद, परात्पर देव, परात्पर भूत और सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुष है, वह आप ही हैं। |
| * अध्याय १६४ * | ६८५ |
|---|
| परं परस्यापि परं रहस्यं<br> परं परस्यापि परं महत्त्वम्।<br>परं परस्यापि परं महद्द्यत्<br> त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १०२<br>परं परस्यापि परं निधानं<br> परं परस्यापि परं पवित्रम्।<br>परं परस्यापि परं च दान्तं<br> त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १०३<br>एवमुक्त्वा तु भगवान् सर्वलोकपितामहः।<br>स्तुत्वा नारायणं देवं ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः॥ १०४<br>ततो नदत्सु तूर्येषु नृत्यन्तीष्वप्सरःसु च।<br>क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जगाम हरिरीश्वरः॥ १०५<br>नारसिंहं वपुर्देवः स्थापयित्वा सुदीप्तिमत्।<br>पौराणं रूपमास्थाय प्रययौ गरुडध्वजः॥ १०६<br>अष्टचक्रेण यानेन भूतयुक्तेन भास्वता।<br>अव्यक्तप्रकृतिर्देवः स्वस्थानं गतवान् प्रभुः॥ १०७ | जो परात्पर रहस्य, परात्पर महत्त्व और परात्पर महत्तत्त्व है, वह सब आप अग्रजन्मा पुराणपुरुषको ही कहा जाता है। आप सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुषको परसे भी परम निधान, परसे भी परम पवित्र और परसे भी परम उदार कहा जाता है। ऐसा कहकर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह सामर्थ्यशाली भगवान् ब्रह्मा नारायणदेवकी स्तुति कर ब्रह्मलोकको चले गये। उस समय तुरहियाँ बज रही थीं और अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं। इसी बीच जगदीश्वर श्रीहरि क्षीरसागरके उत्तर तटपर जानेके लिये उद्यत हुए। वहाँसे जाते समय भगवान् गरुडध्वजने परम कान्तिमान् उस नरसिंह-शरीरको जगत्में स्थापित कर अपने पुराने रूपको धारण कर लिया था। फिर अव्यक्त प्रकृतिवाले भगवान् विष्णु पञ्चभूतोंसे युक्त एवं चमकीले आठ पहियेवाले रथपर सवार हो अपने निवास स्थानको चले गये॥ ९८—१०७॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे हिरण्यकशिपुवधो नाम त्रिषष्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें हिरण्यकशिपु-वध नामक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६३॥
एक सौ चौंसठवाँ अध्याय
पद्मोद्भवके प्रसङ्गमें मनुद्वारा भगवान् विष्णुसे सृष्टिसम्बन्धी विविध प्रश्न और भगवान्का उत्तर
| ऋषय ऊचुः<br>कथितं नरसिंहस्य माहात्म्यं विस्तरेण च।<br>पुनस्तस्यैव माहात्म्यमन्यद्विस्तरतो वद॥ १<br>पद्मरूपमभूदेतत् कथं हेममयं जगत्।<br>कथं च वैष्णवी सृष्टिः पद्ममध्येऽभवत् पुरा॥ २ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! आप भगवान् नरसिंहके माहात्म्यका तो विस्तारपूर्वक वर्णन कर चुके, अब पुनः उन्हीं भगवान्के दूसरे माहात्म्यको विस्तारपूर्वक बतलाइये। भला, पूर्वकालमें स्वर्णमय कमलसे यह जगत् कैसे उत्पन्न हुआ था और उस कमलमेंसे वैष्णवी सृष्टि कैसे प्रादुर्भूत हुई थी?॥ १-२॥ |
| सूत उवाच<br>श्रुत्वा च नरसिंहस्य माहात्म्यं रविनन्दनः।<br>विस्मयोत्फुल्लनयनः पुनः पप्रच्छ केशवम्॥ ३ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! भगवान् नरसिंहके माहात्म्यको सुनकर सूर्यपुत्र मनुके नेत्र आश्चर्यसे उत्फुल्ल हो उठे, तब उन्होंने पुनः भगवान् केशवसे प्रश्न किया॥ ३॥ |
| मनुरुवाच<br>कथं पाद्मे महाकल्पे तव पद्ममयं जगत्।<br>जलार्णवगतस्येह नाभौ जातं जनार्दन॥ ४ | **मनुने पूछा—**जनार्दन! 'पाद्मकल्प' में जब आप इस जलार्णवके मध्यमें स्थित थे, तब आपकी नाभिसे यह पद्ममय जगत् कैसे उत्पन्न हुआ था? |
| ६८६ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रभावात् पद्मनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि।<br>पुष्करे च कथं भूता देवाः सर्षिगणाः पुरा॥ ५<br>एनमाख्याहि निखिलं योगं योगविदां पते।<br>शृण्वतस्तस्य मे कीर्तिं न तृप्तिरुपजायते॥ ६<br>कियता चैव कालेन शेते वै पुरुषोत्तमः।<br>कियन्तं वा स्वपिति च कोऽस्य कालस्य सम्भवः॥ ७<br>कियता वाथ कालेन ह्युत्तिष्ठति महायशाः।<br>कथं चोत्थाय भगवान् सृजते निखिलं जगत्॥ ८<br>के प्रजापतयस्तावदासन् पूर्वं महामुने।<br>कथं निर्मितावांश्चैव चित्रं लोकं सनातनम्॥ ९<br>कथमेकार्णवे शून्ये नष्टस्थावरजङ्गमे।<br>दग्धे देवासुरनरे प्रनष्टोरगराक्षसे॥ १०<br>नष्टानिलानले लोके नष्टाकाशमहीतले।<br>केवलं गह्वरीभूते महाभूतविपर्यये॥ ११<br>विभुर्महाभूतपतिर्महातेजा महाकृतिः।<br>आस्ते सुरवरश्रेष्ठो विधिमास्थाय योगवित्॥ १२<br>शृणुयां परया भक्त्या ब्रह्मैनेतदशेषतः।<br>वक्तुमर्हसि धर्मिष्ठ यशो नारायणात्मकम्॥ १३<br>श्रद्धया चोपविष्टानां भगवन् वक्तुमर्हसि॥ १४ | पूर्वकालमें समुद्रके जलमें शयन करनेवाले भगवान् पद्मनाभके प्रभावसे उस कमलमें ऋषिगणोंसहित देवगण कैसे उत्पन्न हुए थे? योगवेत्ताओंके अधीश्वर! इस सम्पूर्ण योगका वर्णन कीजिये; क्योंकि भगवान्की कीर्तिका वर्णन सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है। (कृपया यह बतलाइये कि) भगवान् पुरुषोत्तम कितने समयके पश्चात् शयन करते हैं? कितने कालतक सोते हैं? इस कालका उद्भव (निर्धारण) कहाँसे होता है? फिर वे महायशस्वी भगवान् कितने समयके बाद निद्रा त्यागकर उठते हैं? निद्रासे उठकर वे भगवान् किस प्रकार सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं? महामुने! पूर्वकालमें कौन-कौन-से प्रजापति थे? इस विचित्र सनातन लोकका निर्माण किस प्रकार किया गया था? महाप्रलयके समय जब स्थावर-जङ्गम-सभी प्राणी नष्ट हो जाते हैं, देवता, राक्षस और मनुष्य जलकर भस्म हो जाते हैं, नागों और राक्षसोंका विनाश हो जाता है, लोकमें अग्नि, वायु, आकाश और पृथ्वीतलका सर्वथा लोप हो जाता है, उस समय पञ्चमहाभूतोंका विपर्यय हो जानेपर केवल घना अन्धकार छाया रहता है, तब उस शून्य एकार्णवके जलमें सर्वव्यापी, पञ्चमहाभूतोंके स्वामी, महातेजस्वी, विशालकाय, सुरेश्वरोंमें श्रेष्ठ एवं योगवेत्ता भगवान् किस प्रकार विधिका सहारा लेकर स्थित रहते हैं? ब्रह्मन्! यह सारा प्रसङ्ग मैं परम भक्तिके साथ सुनना चाहता हूँ। धर्मिष्ठ! आप इस नारायण-सम्बन्धी यशका वर्णन कीजिये। भगवन्! हमलोग श्रद्धापूर्वक आपके समक्ष बैठे हैं, अतः आप इसका अवश्य वर्णन कीजिये॥ ४—१४ ॥ |
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
| नारायणस्य यशसः श्रवणे या तव स्पृहा।<br>तद्वंश्यान्वयभूतस्य न्याय्यं रविकुलर्षभ॥ १५<br>शृणुष्वादिपुराणेषु वेदेभ्यश्च यथा श्रुतम्।<br>ब्राह्मणानां च वदतां श्रुत्वा वै सुमहात्मनाम्॥ १६<br>यथा च तपसा दृष्ट्वा बृहस्पतिसमद्युतिः।<br>पराशरसुतः श्रीमान् गुरुद्वैपायनोऽब्रवीत्॥ १७<br>तत्तेऽहं कथयिष्यामि यथाशक्ति यथाश्रुति।<br>यद्विज्ञातुं मया शक्यमृषिमात्रेण सत्तमाः॥ १८<br>कः समुत्सहते ज्ञातुं परं नारायणात्मकम्।<br>विश्वायनश्च यद् ब्रह्मा न वेदयति तत्त्वतः॥ १९ | सूर्यकुलसत्तम! नारायणकी यशोगाथा सुननेमें जो आपकी विशेष स्पृहा है, यह नारायणके वंशजोंके कुलमें उत्पन्न होनेवाले आपके लिये उचित ही है। मैंने पुराणों, वेदों तथा प्रवचनकर्ता श्रेष्ठ महात्मा ब्राह्मणोंके मुखसे जैसा सुना है तथा बृहस्पतिके समान कान्तिमान् पराशरनन्दन गुरुदेव श्रीमान् कृष्णद्वैपायन व्यासजीने तपोबलसे साक्षात्कार करके जैसा मुझे बतलाया है, वही मैं अपनी जानकारीके अनुसार यथाशक्ति आपसे वर्णन कर रहा हूँ, सावधानीपूर्वक श्रवण कीजिये। द्विजवरो! जिसे ऋषियोंमें केवल मैं ही जान सकता हूँ। जिसे विश्वके आश्रयस्थान ब्रह्मा भी तत्त्वपूर्वक नहीं जानते, नारायणके उस परम तत्त्वको जाननेके लिये दूसरा कौन उत्साह कर सकता है। |
| * अध्याय १६४ * | ६८७ |
|---|---|
| तत्कर्म विश्ववेदानां तद्रहस्यं महर्षिणाम्।<br>तमिज्यं सर्वयज्ञानां तत्तत्त्वं सर्वदर्शिनाम्।<br>तदध्यात्मविदां चिन्त्यं नरकं च विकर्मिणाम्॥ २०<br>अधिदैवं च यद्दैवमधियज्ञं सुसंज्ञितम्।<br>तद्भूतमधिभूतं च तत्परं परमर्षिणाम्॥ २१<br>स यज्ञो वेदनिर्दिष्टस्तत्तपः कवयो विदुः।<br>यः कर्ता कारको बुद्धिमर्नः क्षेत्रज्ञ एव च॥ २२<br>प्रणवः पुरुषः शास्ता एकश्चेति विभाव्यते।<br>प्राणः पञ्चविधश्चैव ध्रुव अक्षर एव च॥ २३<br>कालः पाकश्च पक्ता च द्रष्टा स्वाध्याय एव च।<br>उच्यते विविधैर्देवः स एवायं न तत्परम्॥ २४<br>स एव भगवान् सर्वं करोति विकरोति च।<br>सोऽस्मान् कारयते सर्वान् सोऽत्येति व्याकुलीकृतान्॥ २५<br>यजामहे तमेवाद्यं तमेवेच्छाम निर्वृताः।<br>यो वक्ता यच्च वक्तव्यं यच्चाहं तद् ब्रवीमि वः॥ २६<br>श्रूयते यच्च वै श्राव्यं यच्चान्यत् परिजल्प्यते।<br>याः कथाश्चैव वर्तन्ते श्रुतयो वाथ तत्पराः।<br>विश्वं विश्वपतिर्यश्च स तु नारायणः स्मृतः॥ २७<br>यत्सत्यं यदमृतमक्षरं परं यत्-<br>यद्भूतं परममिदं च यद्भविष्यत्।<br>यत् किंचिच्चरमचरं यदस्ति चान्यत्<br>तत् सर्वं पुरुषवरः प्रभुः पुराणः॥ २८ | वही समस्त वेदोंका कर्म है। वही महर्षियोंका रहस्य है। सम्पूर्ण यज्ञोंद्वारा पूजनीय वही है। वही सर्वज्ञोंका तत्त्व है। अध्यात्मवेत्ताओंके लिये वही चिन्तनीय और कुकर्मियोंके लिये नरकस्वरूप है। उसीको अधिदेव, देव और अधियज्ञ नामसे अभिहित किया जाता है। वही भूत, अधिभूत और परमर्षियोंका परम तत्त्व है॥१५-२१॥<br><br>वेदोंद्वारा निर्दिष्ट यज्ञ वही है। विद्वान्लोग उसे तपरूपसे जानते हैं। जो कर्ता, कारक, बुद्धि, मन, क्षेत्रज्ञ, प्रणव, पुरुष, शास्ता और अद्वितीय कहा जाता है तथा विभिन्न देवता जिसे पाँच प्रकारका प्राण, अविनाशी ध्रुव, काल, पाक, पक्ता (पचानेवाला), द्रष्टा और स्वाध्याय कहते हैं, वह यही है। इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। वे ही भगवान् सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक हैं और वे ही संहारक भी हैं। वे ही हम सब लोगोंको उत्पन्न करते हैं और अन्तमें व्याकुल करके नष्ट कर देते हैं। हमलोग उन्हीं आदि पुरुषकी यज्ञद्वारा आराधना करते हैं और निवृत्तिपरायण होकर उन्हींको प्राप्त करनेकी इच्छा करते हैं। जो वक्ता है, जो वक्तव्य है, जिसके विषयमें मैं आपलोगोंसे कह रहा हूँ, जो सुना जाता है, जो सुनने योग्य है, जिसके विषयमें अन्य सारी बातें कही जाती हैं, जो कथाएँ प्रचलित हैं, श्रुतियाँ जिसके परायण हैं, जो विश्वस्वरूप और विश्वका स्वामी है, वही नारायण कहा गया है। जो सत्य है, जो अमृत है, जो अक्षर है, जो परात्पर है, जो भूत है और जो भविष्यत् है, जो चर-अचर जगत् है, इसके अतिरिक्त अन्य जो कुछ है, वह सब कुछ सामर्थ्यशाली एवं सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुष ही है॥२२-२८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ चौंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६४॥