मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय १८६ * | ७७७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सदेवासुरगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>तपस्तप्त्वा महाराज सिद्धिं च परमां गताः॥ १३<br>यत्र स्नात्वा नरो राजन् नियमस्थो जितेन्द्रियः।<br>उपोष्य रजनीमेकां कुलानां तारयेच्छतम्॥ १४<br>जलेश्वरे नरः स्नात्वा पिण्डं दत्त्वा यथाविधि।<br>पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १५ | महाराज! इसके तटपर देवता, असुर, गन्धर्व और तपस्यामें रत ऋषिगणोंने तपस्या कर परम सिद्धिको प्राप्त किया है। राजन्! यदि नियमनिष्ठ एवं जितेन्द्रिय मनुष्य नर्मदामें स्नानकर एक रात उपवास करके वहाँ निवास करे तो वह अपने सौ पीढ़ियोंको तार देता है। यदि मनुष्य जलेश्वर (जलेश्वर-तीर्थ)-में स्नानकर पिण्ड-दान करता है तो उसके पितर विधिपूर्वक प्रलयकालपर्यन्त तृप्त रहते हैं॥ ८—१५॥ |
| पर्वतस्य समंतात् तु रुद्रकोटिः प्रतिष्ठिता।<br>स्नात्वा यः कुरुते तत्र गन्धमाल्यानुलेपनैः॥ १६<br>प्रीतस्तस्य भवेच्छर्वो रुद्रकोटिर्न संशयः।<br>पश्चिमे पर्वतस्यान्ते स्वयं देवो महेश्वरः॥ १७<br>तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः।<br>पितृकार्यं च कुर्वीत विधिवन्नियतेन्द्रियः॥ १८<br>तिलोदकेन तत्रैव तर्पयेत् पितृदेवताः।<br>आसप्तमं कुलं तस्य स्वर्गे मोदेत पाण्डव॥ १९<br>षष्टिवर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोके महीयते।<br>अप्सरोगणसंकीर्णे सिद्धचारणसेविते॥ २०<br>दिव्यगन्धानुलिप्तश्च दिव्यालङ्कारभूषितः।<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जायते विपुले कुले॥ २१<br>धनवान् दानशीलश्च धार्मिकश्चैव जायते।<br>पुनः स्मरति तत् तीर्थं गमनं तत्र रोचते॥ २२<br>कुलानि तारयेत् सप्त रुद्रलोकं स गच्छति।<br>योजनानां शतं साग्रं श्रूयते सरिदुत्तमा॥ २३<br>विस्तारेण तु राजेन्द्र योजनद्वयमायता।<br>षष्टितीर्थसहस्त्राणि षष्टिकोट्यस्तथैव च॥ २४<br>सर्वं तस्य समंतात् तु तिष्ठत्यमरकण्टके। | अमरकण्टक पर्वतके चारों ओर करोड़ों रुद्र प्रतिष्ठित हैं। जो मनुष्य वहाँ स्नानकर गन्ध, माल्य और चन्दनॉंसे शिवजीकी पूजा करता है, उसपर भगवान् रुद्रकोटि प्रसन्न हो जाते हैं—इसमें संदेह नहीं है। पाण्डुनन्दन! उस पर्वतके पश्चिम भागके अन्तमें साक्षात् महेश्वरदेव विराजमान हैं। जो मनुष्य वहाँ स्नान करके पवित्र हो जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी एवं इन्द्रियोंको वशमें करके विधिपूर्वक पितृकार्य करता है तथा तिल-जलसे पितरों और देवताओंका तर्पण करता है, उसके सात पीढ़ीहतकके पितर स्वर्गमें आनन्दका भोग करते हैं। साथ ही वह व्यक्ति दिव्य गन्धोंके अनुलेपनसे युक्त तथा दिव्य अलंकारोंसे विभूषित हो साठ हजार वर्षोंतक अप्सरासमूहोंसे परिव्यास एवं सिद्धों और चारणोंसे सेवित स्वर्गलोकमें पूजित होता है। तदनन्तर स्वर्गसे भ्रष्ट होनेपर प्रतिष्ठित कुलमें जन्म ग्रहण करता है। यहाँ वह धनवान्, दानशील और धार्मिक होता है। वह उस तीर्थका पुनः-पुनः स्मरण करता है तथा उसको वहाँ जाना प्रिय लगता है। वहाँ जाकर वह सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है और रुद्रलोकको चला जाता है। राजेन्द्र! ऐसी ख्याति है कि यह श्रेष्ठ नदी सौ योजनसे अधिक लम्बी और दो योजन चौड़ी है। साठ करोड़ साठ हजार तीर्थ इस अमरकण्टकके चारों ओर वर्तमान हैं॥ १६—२४ १/२॥ |
| ब्रह्मचारी शुचिर्भूत्वा जितक्रोधो जितेन्द्रियः॥ २५<br>सर्वहिंसानिवृत्तस्तु सर्वभूतहिते रतः।<br>एवं सर्वसमाचारो यस्तु प्राणान् परित्यजेत्॥ २६<br>तस्य पुण्यफलं राजञ्शृणुष्वावहितो मम।<br>शतं वर्षसहस्त्राणां स्वर्गे मोदेत पाण्डव॥ २७ | राजन्! जो मनुष्य ब्रह्मचारी, पवित्र, क्रोधजयी, जितेन्द्रिय, सभी प्रकारकी हिंसाओंसे रहित, सभी प्राणियोंके हितमें तत्पर—इस प्रकार सभी सदाचारोंसे युक्त होकर यहाँ अपने प्राणोंका परित्याग करता है, उसे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, उसे आप मुझसे सावधान होकर सुनिये। |
| ७७८ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| अप्सरोगणसंकीर्णे सिद्धचारणसेविते।<br>दिव्यगन्धानुलिप्तश्च दिव्यपुष्पोपशोभितः ॥ २८<br>क्रीडते देवलोकस्थो दैवतैः सह मोदते।<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो राजा भवति वीर्यवान् ॥ २९<br>गृहं तु लभते वै स नानारत्नविभूषितम्।<br>स्तम्भैर्मणिमयैर्दिव्यैर्वज्रवैडूर्यभूषितैः ॥ ३०<br>आलेख्यसहितं दिव्यं दासीदाससमन्वितम्।<br>मत्तमातङ्गशब्दैश्च हयानां हेषितेन च ॥ ३१<br>क्षुभ्यते तस्य तद्द्वारमिन्द्रस्य भवनं यथा।<br>राजराजेश्वरः श्रीमान् सर्वस्त्रीजनवल्लभः ॥ ३२<br>तस्मिन् गृहे उषित्वा तु क्रीडाभोगसमन्विते।<br>जीवेद् वर्षशतं साग्रं सर्वरोगविवर्जितः ॥ ३३<br>एवं भोगो भवेत् तस्य यो मृतोऽमरकण्टके।<br>अग्नौ विषजले वापि तथा चैव ह्यनाशके ॥ ३४<br>अनिवर्तिका गतिस्तस्य पवनस्याम्बरे यथा।<br>पतनं कुरुते यस्तु अमरेशे नराधिप ॥ ३५<br>कन्यानां त्रिसहस्त्राणि एकैकस्यापि चापरे।<br>तिष्ठन्ति भुवने तस्य प्रेषणं प्रार्थयन्ति च।<br>दिव्यभोगैः सुसम्पन्नः क्रीडते कालमक्षयम् ॥ ३६ | पाण्डुपुत्र! वह एक लाख वर्षोंतक अप्सराओंसे व्याप्त तथा सिद्धों एवं चारणोंसे सेवित स्वर्गमें आनन्दका उपभोग करता है। वह दिव्य चन्दनके लेपसे युक्त एवं दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित हो देवलोकमें रहता हुआ देवोंके साथ क्रीड़ा करते हुए आनन्दका अनुभव करता है। तत्पश्चात् स्वर्गसे भ्रष्ट होकर इस लोकमें पराक्रमी राजा होता है। उसे अनेक प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत ऐसे भवनकी प्राप्ति होती है, जो दिव्य हीरे, वैदूर्य और मणिमय स्तम्भोंसे विभूषित होता है। वह दिव्य चित्रोंसे सुशोभित तथा दासी-दाससे समन्वित रहता है। उसका द्वार मदमत्त हाथियोंके चिग्घाड़ और घोड़ोंकी हिनहिनाहटसे इन्द्रभवनके समान संकुलित रहता है। वह सम्पूर्ण स्त्रीजनोंका प्रिय, श्रीसम्पन्न और सभी प्रकारके रोगोंसे रहित होकर राजराजेश्वरके रूपमें क्रीड़ा और भोगसे समन्वित उस गृहमें निवासकर सौ वर्षोंसे भी अधिक समयतक जीवित रहता है। जो अमरकण्टकमें शरीरका त्याग करता है, उसे इस प्रकारके आनन्दका उपभोग मिलता है। जो अग्नि, विष, जल तथा अनशन करके यहाँ मरता है, उसे आकाशमें वायुके समान स्वच्छन्द गति प्राप्त होती है। नरेश्वर! जो इस अमरकण्टक पर्वतसे गिरकर देहत्याग करता है, उसके भवनमें एक-से-एक बढ़कर सुन्दरी तीन हजार कन्याएँ स्थित रहती हैं, जो उसकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करती रहती हैं। वह दिव्य भोगोंसे परिपूर्ण होकर अक्षय कालतक क्रीडा करता है॥ २५–३६॥ | | पृथिव्यामासमुद्रायामीदृशो नैव जायते।<br>यादृशोऽयं नृपश्रेष्ठ पर्वतेऽमरकण्टके ॥ ३७ | नृपश्रेष्ठ! अमरकण्टक पर्वतपर शरीरका त्याग करनेसे जैसा पुण्य होता है, वैसा समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर कहीं भी नहीं होता। इस तीर्थको पर्वतके पश्चिम प्रान्तमें समझना चाहिये। | | तावत् तीर्थं तु विज्ञेयं पर्वतस्य तु पश्चिमे।<br>ह्रदो जलेश्वरो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ ३८<br>तत्र पिण्डप्रदानेन संध्योपासनकर्मणा।<br>पितरो दश वर्षाणि तर्पितास्तु भवन्ति वै ॥ ३९ | यहाँ तीनों लोकोंमें विख्यात जलेश्वर नामक कुण्ड वर्तमान है, वहाँ पिण्डदान एवं संध्योपासन कर्म करनेसे पितरगण दस वर्षोंतक तृप्त बने रहते हैं। | | दक्षिणे नर्मदाकूले कपिलेति महानदी।<br>सकलार्जुनसंछन्ना नातिदूरे व्यवस्थिता ॥ ४०<br>सापि पुण्या महाभागा त्रिषु लोकेषु विश्रुता।<br>तत्र कोटिशतं साग्रं तीर्थानां तु युधिष्ठिर ॥ ४१ | नर्मदाके दक्षिण तटपर समीप ही कपिला नामकी महानदी स्थित है। वह सब ओरसे अर्जुन वृक्षोंसे परिव्याप्त है। युधिष्ठिर! वह महाभागा पुण्यतोया नदी भी तीनों लोकोंमें विख्यात है। वहाँ सौ करोड़से भी अधिक तीर्थ हैं। | | पुराणे श्रूयते राजन् सर्वं कोटिगुणं भवेत्।<br>तस्यास्तीरे तु ये वृक्षाः पतिताः कालपर्ययात् ॥ ४२ | राजन्! पुराणमें जैसा वर्णन है, उसके अनुसार वे सभी तीर्थ करोड़गुना फल देनेवाले हैं। उसके तटके जो वृक्ष कालवश गिर जाते हैं, |
| * अध्याय १८६ * | ७७९ |
|---|
| नर्मदातोयसंस्पृष्टास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।<br>द्वितीया तु महाभागा विशल्यकरणी शुभा ॥ ४३<br>तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा विशल्यो भवति क्षणात्।<br>तत्र देवगणाः सर्वे सकिन्नरमहोरगाः ॥ ४४<br>यक्षराक्षसगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>सर्वे समागतास्तत्र पर्वतेऽमरकण्टके ॥ ४५<br>तैश्च सर्वैः समागम्य मुनिभिश्च तपोधनैः।<br>नर्मदामाश्रिता पुण्या विशल्या नाम नामतः ॥ ४६<br>उत्पादिता महाभागा सर्वपापप्रणाशिनी।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ॥ ४७<br>उपोष्य रजनीमेकां कुलानां तारयेच्छतम्।<br>कपिला च विशल्या च श्रूयते राजसत्तम ॥ ४८<br>ईश्वरेण पुरा प्रोक्ते लोकानां हितकाम्यया।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्नश्वमेधफलं लभेत् ॥ ४९ | वे भी नर्मदाके जलके स्पर्शसे श्रेष्ठ गतिको प्राप्त हो जाते हैं। दूसरी महाभागा मङ्गलदायिनी विशल्यकरणी नदी है। मनुष्य उस तीर्थमें स्नानकर उसी क्षण दुःखरहित हो जाता है। वहाँ सभी देवगण, किन्नर, महान् सर्पगण, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, तपस्वी ऋषिगण आये और उस अमरकण्टकपर्वतपर मुनियों और तपस्वियोंके साथ स्थित हुए। वहाँ उन लोगोंने सभी पापोंका विनाश करनेवाली महाभागा पुण्यसलिला विशल्या नामसे विख्यात नदीको उत्पन्न किया, जो नर्मदामें मिलती है। राजन्! वहाँ जो मनुष्य ब्रह्मचर्यपूर्वक जितेन्द्रिय होकर स्नानकर उपवासपूर्वक एक रात भी निवास करता है, वह अपनी सौ पीढ़ियोंको तार देता है। नृपश्रेष्ठ! ऐसा सुना जाता है कि पूर्वकालमें लोगोंके हितकी कामनासे महेश्वरने कपिला और विशल्या नामके तीर्थोंका वर्णन किया था। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य अश्वमेधके फलको प्राप्त करता है॥ ३७–४९॥ | | अनाशकं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति ॥ ५०<br>नर्मदायास्तु राजेन्द्र पुराणे यन्मया श्रुतम्।<br>यत्र यत्र नरः स्नात्वा चाश्वमेधफलं लभेत् ॥ ५१<br>ये वसन्त्युत्तरे कूले रुद्रलोके वसन्ति ते।<br>सरस्वत्यां च गङ्गायां नर्मदायां युधिष्ठिर ॥ ५२<br>समं स्नानं च दानं च यथा मे शंकरोऽब्रवीत्।<br>परित्यजति यः प्राणान् पर्वतेऽमरकण्टके ॥ ५३<br>वर्षकोटिशतं साग्रं रुद्रलोके महीयते।<br>नर्मदाया जलं पुण्यं फेनोर्मिभिरलङ्कृतम् ॥ ५४<br>पवित्रं शिरसा वन्द्यं सर्वपापैः प्रमोचनम्।<br>नर्मदा च सदा पुण्या ब्रह्महत्यापहारिणी ॥ ५५<br>अहोरात्रोपवासेन मुच्यते ब्रह्महत्यया।<br>एवं रम्या च पुण्या च नर्मदा पाण्डुनन्दन ॥ ५६<br>त्रयाणामपि लोकानां पुण्या ह्येषा महानदी।<br>वटेश्वरे महापुण्ये गङ्गाद्वारे तपोवने ॥ ५७<br>एतेषु सर्वस्थानेषु द्विजाः स्युः संशितव्रताः।<br>श्रुतं दशगुणं पुण्यं नर्मदोदधिसंगमे ॥ ५८ | नरेश्वर! इस तीर्थमें जो अनशन करता है, वह सभी पापोंसे रहित होकर रुद्रलोकको प्राप्त करता है। राजेन्द्र! मैंने स्कन्दपुराणमें नर्मदाका जो फल सुना है, उसके अनुसार वहाँ-वहाँ स्नानकर मनुष्य अश्वमेधके फलको प्राप्त करता है। जो नर्मदाके उत्तर तटपर निवास करते हैं, वे रुद्रलोकमें निवास करते हैं। युधिष्ठिर! जैसा मुझसे शंकरजीने कहा था, उसके अनुसार सरस्वती, गङ्गा और नर्मदामें स्नान और दानका फल समान होता है। जो अमरकण्टक पर्वतपर प्राणोंका परित्याग करता है, वह सौ करोड़ वर्षोंसे भी अधिक कालतक रुद्रलोकमें पूजित होता है। नर्मदाका लहरियोंके फेनसे अलंकृत, पुण्यमय पवित्र जल सभी पापोंसे मुक्त करनेवाला है, अतः वह सिरसे वन्दना करनेयोग्य है। पुण्यतोया नर्मदा ब्रह्महत्याका नाश करनेवाली है। यहाँ एक दिन-रात उपवास करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे छूट जाता है। पाण्डुपुत्र! नर्मदा इस प्रकार पुण्यमयी और रमणीया है। यह महानदी तीनों लोकोंमें भी पुण्यमयी है। महापुण्यप्रद वटेश्वर, तपोवन और गङ्गाद्वार—इन स्थानोंमें द्विजगण व्रतानुष्ठान करते हैं, परंतु नर्मदा और समुद्रके सङ्गमपर उससे दसगुना अधिक फल सुना जाता है॥ ५०–५८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यमें एक सौ छियासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८६ ॥
७८२ * मत्स्यपुराण *
| अनौपम्योवाच<br>भगवन् मानुषे लोके केन तुष्यति केशवः।<br>व्रतेन नियमेनाथ दानेन तपसापि वा॥ २६ | अनौपम्याने पूछा—भगवन्! मनुष्यलोकमें केशव व्रत, नियम, दान अथवा तपस्या—इनमें किससे प्रसन्न होते हैं?॥ २६॥ |
|---|---|
| नारद उवाच<br>तिलधेनुं च यो दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे।<br>ससागरवनद्वीपा दत्ता भवति मेदिनी॥ २७<br>सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानैः सार्वकामिकैः।<br>मोदते चाक्षयं कालं यावच्चन्द्रार्कतारकम्॥ २८<br>आम्रामलकपित्थानि बदराणि तथैव च।<br>कदम्बचम्पकाशोकपुन्नागविविधद्रुमान् ॥ २९<br>अश्वत्थपिप्पलांश्चैव कदलीवटदाडिमान्।<br>पिचुमन्दं मधूकं च उपोष्य स्त्री ददाति या॥ ३०<br>स्तनौ कपित्थसदृशावूरू च कदलीसमौ।<br>अश्वत्थे वन्दनीया च पिचुमन्दे सुगन्धिनी॥ ३१<br>चम्पके चम्पकाभा स्यादशोके शोकवर्जिता।<br>मधूके मधुरं वक्ति वटे च मृदुगात्रिका॥ ३२<br>बदरी सर्वदा स्त्रीणां महासौभाग्यदायिनी।<br>कुक्कुटी कर्कटी चैव द्रव्यषष्ठी न शस्यते॥ ३३<br>कदम्बमिश्रकनकमञ्जरीपूजनं तथा।<br>अनग्निपक्कमन्नं च पक्वान्नानामभक्षणम्॥ ३४<br>फलानां च परित्यागः संध्यामौनं तथैव च।<br>प्रथमं क्षेत्रपालस्य पूजा कार्या प्रयत्नतः॥ ३५<br>तस्या भवति वै भर्ता मुखप्रेक्षी सदानघे।<br>अष्टमी च चतुर्थी च पञ्चमी द्वादशी तथा॥ ३६<br>संक्रान्तिर्विषुवच्चैव दिनच्छिद्रमुखं तथा।<br>एतांस्तु दिवसान् दिव्यानुपवसन्ति याः स्त्रियः।<br>तासां तु धर्मयुक्तानां स्वर्गवासो न संशयः॥ ३७<br>कलिकालुष्यनिर्मुक्ताः सर्वपापविवर्जिताः।<br>उपवासरतां नारीं नोपसर्पति तां यमः॥ ३८ | नारदजीने कहा— जो मनुष्य वेदमें पारङ्गत ब्राह्मणको तिलधेनुका दान करता है, उसके द्वारा समुद्र, वन और द्वीपोंसहित पृथ्वीका दान सम्पन्न हुआ समझना चाहिये। वह दाता करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान एवं सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंद्वारा सूर्य, चन्द्र और तारोंकी स्थितिपर्यन्त अक्षय कालतक आनन्द मनाता है। जो स्त्री उपवास करके आम, आँवला, कैथ, बेर, कदम्ब, चम्पक, अशोक, पुंनाग, जायफल, पीपल, केला, वट, अनार, नीम, महुआ आदि अनेक प्रकारके वृक्षोंका दान करती है, उसके दोनों स्तन कैथके समान और दोनों जंघाएँ केलेके सदृश सुन्दर होती हैं। वह अश्वत्थके दानसे वन्दनीय और नीमके दानसे सुगन्धयुक्त होती है। वह चम्पाके दानसे चम्पाकी-सी कान्तिवाली और अशोकके दानसे शोकरहित होती है। महुआके दानसे वह मधुरभाषिणी होती है और वटके दानसे उसका शरीर कोमल होता है। बेर स्त्रियोंके लिये सदा महान् सौभाग्यदायी होता है। ककड़ी, जटाधारी और द्रव्यषष्ठीका दान, कदम्बसे मिश्रित धतूरेकी मंजरीसे पूजन, बिना अग्निसे पकाया हुआ अन्न एवं पके हुए अन्नोंका अभक्षण, फलोंका परित्याग तथा संध्याकालमें मौनधारण—ये स्त्रियोंके लिये प्रशस्त नहीं हैं। सर्वप्रथम प्रयत्नपूर्वक क्षेत्रपालकी पूजा करनी चाहिये। पापशून्ये! उस स्त्रीका पति सदा उसका मुख ही देखा करता है। जो स्त्रियाँ अष्टमी, चतुर्थी, पञ्चमी और द्वादशी तिथि, संक्रान्ति, विषुवयोग और दिनच्छिद्रमुख (दोपहरमें चन्द्रमाका नये मासकी तिथिमें प्रवेश करना)—इन दिव्य दिनोंमें उपवास करती हैं, उस धर्मयुक्त स्त्रियोंका स्वर्गमें निवास होता है—इसमें संदेह नहीं है। वे कलियुगके पापोंसे रहित और सभी पापोंसे शून्य हो जाती हैं। इस प्रकार जो स्त्री उपवासमें तत्पर रहती है, उसके समीप यम भी नहीं आते॥ २७—३८॥ |
| अनौपम्योवाच<br>अस्मिन् कृतेन पुण्येन पुराजन्मकृतेन वा।<br>भवदागमनं भूतं किंचित् पृच्छाम्यहं व्रतम्॥ ३९ | अनौपम्या बोली— नारदजी! पता नहीं, इस जन्ममें या पूर्व जन्ममें किये हुए पुण्यसे ही आपका यहाँ आगमन हुआ है। अब मैं आपसे कतिपय व्रतोंके विषयमें पूछती |
| * अध्याय १८७ * | ७८३ |
|---|---|
| अस्ति विन्ध्यावलिर्नाम बलिपत्नी यशस्विनी।<br>श्वश्रूर्ममापि विप्रेन्द्र न तुष्यति कदाचन॥ ४०<br>श्वशुरोऽपि सर्वकालं दृष्ट्वा चापि न पश्यति।<br>अस्ति कुम्भीनसी नाम ननान्दा पापकारिणी॥ ४१<br>दृष्ट्वा चैवाङ्गुलीभङ्गं सदा कालं करोति माम्।<br>दिव्येन तु पथा याति मम सौख्यं कथं वद॥ ४२<br>ऊषरे न प्ररोहन्ति बीजाङ्कुराः कथञ्चन।<br>येन व्रतेन चीर्णेन भवन्ति वशगा मम।<br>तद्व्रतं ब्रूहि विप्रेन्द्र दासभावं व्रजामि ते॥ ४३<br><br>नारद उवाच<br>यदेतत् ते मया पूर्वं व्रतमुक्तं शुभानने।<br>अनेन पार्वती देवी चीर्णेन वरवर्णिनि॥ ४४<br>शंकरस्य शरीरस्था विष्णोर्लक्ष्मीस्तथैव च।<br>सावित्री ब्रह्मणश्चैव वसिष्ठस्याप्यरुन्धती॥ ४५<br>एतेनोपोषितेनेह भर्ता स्थास्यति ते वशे।<br>श्वश्रूश्वशुरयोश्चैव मुखबन्धो भविष्यति॥ ४६<br>एवं श्रुत्वा तु सुश्रोणि यथेष्टं कर्तुमर्हसि।<br>नारदस्य वचः श्रुत्वा राज्ञी वचनमब्रवीत्॥ ४७<br>प्रसादं कुरु विप्रेन्द्र दानं ग्राह्यं यथेप्सितम्।<br>सुवर्णमणिरत्नानि वस्त्राण्याभरणानि च॥ ४८<br>तव दास्याम्यहं विप्र यच्चान्यदपि दुर्लभम्।<br>प्रगृहाण द्विजश्रेष्ठ प्रीयेतां हरिशंकरौ॥ ४९<br><br>नारद उवाच<br>अन्यस्मै दीयतां भद्रे क्षीणवृत्तिस्तु यो द्विजः।<br>अहं तु सर्वसम्पन्नो मद्भक्तिः क्रियतामिति॥ ५०<br>एवं तासां मनो हृत्वा सर्वासां तु पतिव्रतात्।<br>जगाम भरतश्रेष्ठ स्वकीयं स्थानकं पुनः॥ ५१<br>ततो हृष्टहृदया अन्यतोगतमानसाः।<br>पतिव्रतात्वमुत्सृज्य तासां तेजो गतं ततः।<br>पुरे छिद्रं समुत्पन्नं बाणस्य तु महात्मनः॥ ५२ | हूँ। विप्रवर! जो बलिकी पत्नी यशस्विनी विन्ध्यावलि हैं, वे मेरी भी सास हैं। वे मुझसे कभी भी प्रसन्न नहीं रहतीं। मेरे श्वशुर भी मुझे सभी समय देखते हुए भी अनदेखी करते हैं। पापाचरणमें रत रहनेवाली कुम्भीनसी नामकी मेरी ननद है। वह सभी समय मुझे देखकर अङ्गुली तोड़ती रहती है। वह दिव्य मार्गसे कैसे चले और मुझे सुखकी प्राप्ति कैसे हो—यह बतानेकी कृपा करें। (यह सत्य है कि) ऊषर भूमिमें डाले हुए बीजसे किसी प्रकार भी अङ्कुर नहीं उत्पन्न होते, फिर भी जिस व्रतका अनुष्ठान करनेसे ये मेरे वशमें आ जायँ, वह व्रत मुझे बतलाइये। विप्रेन्द्र! मैं आपकी दासी हूँ॥ ३९–४३॥<br><br>नारदजीने कहा—सुन्दर मुखवाली! जो व्रत मैंने पूर्वमें तुमसे कहा है, उस व्रतका अनुष्ठान करनेसे पार्वतीदेवी शंकरके, लक्ष्मी विष्णुके, सावित्री ब्रह्माके, अरुन्धती वसिष्ठके शरीरमें विराजमान रहती हैं। इस उपवास-व्रतसे तुम्हारा पति भी तुम्हारे अधीन रहेगा तथा सास और श्वशुरका भी मुख बंद हो जायगा अर्थात् वे तुमसे प्रेम करने लगेंगे। सुश्रोणि! ऐसा सुनकर तुम जैसा चाहो वैसा कर सकती हो। नारदजीके वचनको सुनकर रानीने इस प्रकार कहा—'विप्रवर! मुझपर कृपा कीजिये और यथाभिलषित दान स्वीकार कीजिये। विप्र! सुवर्ण, मणि, रत्न, वस्त्र, आभूषण एवं अन्य जो भी दुर्लभ पदार्थ हैं, वह सब मैं आपको दूँगी। द्विजश्रेष्ठ! आप उसे ग्रहण करें, जिससे विष्णु और शंकर मुझपर प्रसन्न हो जायँ॥ ४४–४९॥<br><br>नारदजी बोले—कल्याणि! जो ब्राह्मण जीविकारहित हो, उसे ही यह दान दो। मैं तो सर्वसम्पन्न हूँ। तुम मेरे प्रति भक्ति-भाव रखो। भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उन सभी स्त्रियोंके मनको पातिव्रतसे विचलित कर नारदजी पुनः अपने स्थानपर चले गये। तभीसे उन स्त्रियोंका हृदय उदास रहने लगा और उनका मन दूसरी ओर लग गया। इस प्रकार पातिव्रत्यके त्यागसे उनका तेज नष्ट हो गया तथा महान् आत्मबलसे सम्पन्न बाणके नगरमें छिद्र (दोष) उत्पन्न हो गया॥ ५०–५२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदामाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ सत्तासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १८७ ॥
७८२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अनौपम्योवाच<br>भगवन् मानुषे लोके केन तुष्यति केशवः।<br>व्रतेन नियमेनाथ दानेन तपसापि वा॥ २६ | अनौपम्या ने पूछा— भगवन्! मनुष्यलोकमें केशव व्रत, नियम, दान अथवा तपस्या—इनमें किससे प्रसन्न होते हैं?॥ २६॥ |
| नारद उवाच<br>तिलधेनुं च यो दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे।<br>ससागरवनद्वीपा दत्ता भवति मेदिनी॥ २७<br>सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानैः सार्वकामिकैः।<br>मोदते चाक्षयं कालं यावच्चन्द्रार्कतारकम्॥ २८<br>आम्रामलकपित्थानि बदराणि तथैव च।<br>कदम्बचम्पकाशोकपुन्नागविविधद्रुमान् ॥ २९<br>अश्वत्थपिप्पलांश्चैव कदलीवटदाडिमान्।<br>पिचुमन्दं मधूकं च उपोष्य स्त्री ददाति या॥ ३०<br>स्तनौ कपित्थसदृशावूरू च कदलीसभौ।<br>अश्वत्थे वन्दनीया च पिचुमन्दे सुगन्धिनी॥ ३१<br>चम्पके चम्पकाभा स्यादशोके शोकवर्जिता।<br>मधूके मधुरं वक्ति वटे च मृदुगात्रिका॥ ३२<br>बदरी सर्वदा स्त्रीणां महासौभाग्यदायिनी।<br>कुक्कुटी कर्कटी चैव द्रव्यषष्ठी न शस्यते॥ ३३<br>कदम्बमिश्रकनकमञ्जरीपूजनं तथा।<br>अनग्निपक्वमन्नं च पक्वान्नानामभक्षणम्॥ ३४<br>फलानां च परित्यागः संध्यामौनं तथैव च।<br>प्रथमं क्षेत्रपालस्य पूजा कार्या प्रयत्नतः॥ ३५<br>तस्या भवति वै भर्ता मुखप्रेक्षी सदानघे।<br>अष्टमी च चतुर्थी च पञ्चमी द्वादशी तथा॥ ३६<br>संक्रान्तिर्विषुवच्चैव दिनच्छिद्रमुखं तथा।<br>एतांस्तु दिवसान् दिव्यानुपवसन्ति याः स्त्रियः।<br>तासां तु धर्मयुक्तानां स्वर्गवासो न संशयः॥ ३७<br>कलिकालुष्यनिर्मुक्ताः सर्वपापविवर्जिताः।<br>उपवासरतां नारीं नोपसर्पति तां यमः॥ ३८ | नारदजीने कहा— जो मनुष्य वेदमें पारङ्गत ब्राह्मणको तिलधेनुका दान करता है, उसके द्वारा समुद्र, वन और द्वीपोंसहित पृथ्वीका दान सम्पन्न हुआ समझना चाहिये। वह दाता करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान एवं सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंद्वारा सूर्य, चन्द्र और तारोंकी स्थितिपर्यन्त अक्षय कालतक आनन्द मनाता है। जो स्त्री उपवास करके आम, आँवला, कैथ, बेर, कदम्ब, चम्पक, अशोक, पुंनाग, जायफल, पीपल, केला, वट, अनार, नीम, महुआ आदि अनेक प्रकारके वृक्षोंका दान करती है, उसके दोनों स्तन कैथके समान और दोनों जंघाएँ केलेके सदृश सुन्दर होती हैं। वह अश्वत्थके दानसे वन्दनीय और नीमके दानसे सुगन्धयुक्त होती है। वह चम्पाके दानसे चम्पाकी-सी कान्तिवाली और अशोकके दानसे शोकरहित होती है। महुआके दानसे वह मधुरभाषिणी होती है और वटके दानसे उसका शरीर कोमल होता है। बेर स्त्रियोंके लिये सदा महान् सौभाग्यदायी होता है। ककड़ी, जटाधारी और द्रव्यषष्ठीका दान, कदम्बसे मिश्रित धतूरेकी मंजरीसे पूजन, बिना अग्निसे पकाया हुआ अन्न एवं पके हुए अन्नोंका अभक्षण, फलोंका परित्याग तथा संध्याकालमें मौनधारण—ये स्त्रियोंके लिये प्रशस्त नहीं हैं। सर्वप्रथम प्रयत्नपूर्वक क्षेत्रपालकी पूजा करनी चाहिये। पापशून्ये! उस स्त्रीका पति सदा उसका मुख ही देखा करता है। जो स्त्रियाँ अष्टमी, चतुर्थी, पञ्चमी और द्वादशी तिथि, संक्रान्ति, विषुवयोग और दिनच्छिद्रमुख (दोपहरमें चन्द्रमाका नये मासकी तिथिमें प्रवेश करना)—इन दिव्य दिनोंमें उपवास करती हैं, उस धर्मयुक्त स्त्रियोंका स्वर्गमें निवास होता है—इसमें संदेह नहीं है। वे कलियुगके पापोंसे रहित और सभी पापोंसे शून्य हो जाती हैं। इस प्रकार जो स्त्री उपवासमें तत्पर रहती है, उसके समीप यम भी नहीं आते॥२७—३८॥ |
| अनौपम्योवाच<br>अस्मिन् कृतेन पुण्येन पुराजन्मकृतेन वा।<br>भवदागमनं भूतं किंचित् पृच्छाम्यहं व्रतम्॥ ३९ | अनौपम्या बोली— नारदजी! पता नहीं, इस जन्ममें या पूर्व जन्ममें किये हुए पुण्यसे ही आपका यहाँ आगमन हुआ है। अब मैं आपसे कतिपय व्रतोंके विषयमें पूछती |
१८९- नर्मदा-कावेरी-संगमका माहात्म्य
| * अध्याय १८७ * | ७८३ |
|---|
| अस्ति विन्ध्यावलिर्नाम बलिपत्नी यशस्विनी।<br>श्वश्रूर्ममापि विप्रेन्द्र न तुष्यति कदाचन ॥ ४०<br>श्वशुरोऽपि सर्वकालं दृष्ट्वा चापि न पश्यति।<br>अस्ति कुम्भीनसी नाम ननान्दा पापकारिणी ॥ ४१<br>दृष्ट्वा चैवाङ्गुलीभङ्गं सदा कालं करोति माम्।<br>दिव्येन तु पथा याति मम सौख्यं कथं वद ॥ ४२<br>ऊषरे न प्ररोहन्ति बीजाङ्कुराः कथञ्चन।<br>येन व्रतेन चीर्णेन भवन्ति वशगा मम।<br>तद्व्रतं ब्रूहि विप्रेन्द्र दासभावं व्रजामि ते ॥ ४३<br><br>नारद उवाच<br>यदेतत् ते मया पूर्वं व्रतमुक्तं शुभानने।<br>अनेन पार्वती देवी चीर्णेन वरवर्णिनि ॥ ४४<br>शंकरस्य शरीरस्था विष्णोर्लक्ष्मीस्तथैव च।<br>सावित्री ब्रह्मणश्चैव वसिष्ठस्याप्यरुन्धती ॥ ४५<br>एतेनोपोषितेनेह भर्ता स्थास्यति ते वशे।<br>श्वश्रूश्वशुरयोश्चैव मुखबन्धो भविष्यति ॥ ४६<br>एवं श्रुत्वा तु सुश्रोणि यथेष्टं कर्तुमर्हसि।<br>नारदस्य वचः श्रुत्वा राज्ञी वचनमब्रवीत् ॥ ४७<br>प्रसादं कुरु विप्रेन्द्र दानं ग्राह्यं यथेप्सितम्।<br>सुवर्णमणिरत्नानि वस्त्राण्याभरणानि च ॥ ४८<br>तव दास्याम्यहं विप्र यच्चान्यदपि दुर्लभम्।<br>प्रगृहाण द्विजश्रेष्ठ प्रीयेतां हरिशंकरौ ॥ ४९<br><br>नारद उवाच<br>अन्यस्मै दीयतां भद्रे क्षीणवृत्तिस्तु यो द्विजः।<br>अहं तु सर्वसम्पन्नो मद्भक्तिः क्रियतामिति ॥ ५०<br>एवं तासां मनो हृत्वा सर्वासां तु पतिव्रतात्।<br>जगाम भरतश्रेष्ठ स्वकीयं स्थानकं पुनः ॥ ५१<br>ततो ह्यहृष्टहृदया अन्यतोगतमानसाः।<br>पतिव्रतात्वमुत्सृज्य तासां तेजो गतं ततः।<br>पुरे छिद्रं समुत्पन्नं बाणस्य तु महात्मनः ॥ ५२ | हूँ। विप्रवर! जो बलिकी पत्नी यशस्विनी विन्ध्यावलि हैं, वे मेरी भी सास हैं। वे मुझसे कभी भी प्रसन्न नहीं रहतीं। मेरे श्वशुर भी मुझे सभी समय देखते हुए भी अनदेखी करते हैं। पापाचरणमें रत रहनेवाली कुम्भीनसी नामकी मेरी ननद है। वह सभी समय मुझे देखकर अङ्गुली तोड़ती रहती है। वह दिव्य मार्गसे कैसे चले और मुझे सुखकी प्राप्ति कैसे हो—यह बतानेकी कृपा करें। (यह सत्य है कि) ऊषर भूमिमें डाले हुए बीजसे किसी प्रकार भी अङ्कुर नहीं उत्पन्न होते, फिर भी जिस व्रतका अनुष्ठान करनेसे ये मेरे वशमें आ जायँ, वह व्रत मुझे बतलाइये। विप्रेन्द्र! मैं आपकी दासी हूँ॥ ३९–४३॥<br><br>नारदजीने कहा—सुन्दर मुखवाली! जो व्रत मैंने पूर्वमें तुमसे कहा है, उस व्रतका अनुष्ठान करनेसे पार्वतीदेवी शंकरके, लक्ष्मी विष्णुके, सावित्री ब्रह्माके, अरुन्धती वसिष्ठके शरीरमें विराजमान रहती हैं। इस उपवास-व्रतसे तुम्हारा पति भी तुम्हारे अधीन रहेगा तथा सास और श्वशुरका भी मुख बंद हो जायगा अर्थात् वे तुमसे प्रेम करने लगेंगे। सुश्रोणि! ऐसा सुनकर तुम जैसा चाहो वैसा कर सकती हो। नारदजीके वचनको सुनकर रानीने इस प्रकार कहा—'विप्रवर! मुझपर कृपा कीजिये और यथाभिलषित दान स्वीकार कीजिये। विप्र! सुवर्ण, मणि, रत्न, वस्त्र, आभूषण एवं अन्य जो भी दुर्लभ पदार्थ हैं, वह सब मैं आपको दूँगी। द्विजश्रेष्ठ! आप उसे ग्रहण करें, जिससे विष्णु और शंकर मुझपर प्रसन्न हो जायँ॥ ४४–४९॥<br><br>नारदजी बोले—कल्याणि! जो ब्राह्मण जीविकारहित हो, उसे ही यह दान दो। मैं तो सर्वसम्पन्न हूँ। तुम मेरे प्रति भक्ति-भाव रखो। भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उन सभी स्त्रियोंके मनको पातिव्रतसे विचलित कर नारदजी पुनः अपने स्थानपर चले गये। तभीसे उन स्त्रियोंका हृदय उदास रहने लगा और उनका मन दूसरी ओर लग गया। इस प्रकार पातिव्रत्यके त्यागसे उनका तेज नष्ट हो गया तथा महान् आत्मबलसे सम्पन्न बाणके नगरमें छिद्र (दोष) उत्पन्न हो गया॥ ५०–५२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये समाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदामाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ सत्तासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १८७ ॥
१९०- नर्मदाके तटवर्ती तीर्थ
७८४ * मत्स्यपुराण *
एक सौ अठासीवाँ अध्याय
त्रिपुर-दाहका वृत्तान्त
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मार्कण्डेय उवाच<br>यन्मां पृच्छसि कौन्तेय तन्मे कथयतः शृणु।<br>एतस्मिन्नन्तरे रुद्रो नर्मदातटमास्थितः॥ १<br>नाम्ना माहेश्वरं स्थानं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>तस्मिन् स्थाने महादेवोऽचिन्तयत् त्रिपुरक्षयम्॥ २<br>गाण्डीवं मन्दरं कृत्वा गुणं कृत्वा च वासुकिम्।<br>स्थानं कृत्वा तु वैशाखं विष्णुं कृत्वा शरोत्तमम्॥ ३<br>शल्ये चाग्निं प्रतिष्ठाप्य पुङ्खे वायुं समर्पयत्।<br>हयांश्च चतुरो वेदान् सर्वदेवमयं रथम्॥ ४<br>अभीषवोऽश्विनौ देवावक्षो वज्रधरः स्वयम्।<br>स तस्याज्ञां समादाय तोरणे धनदः स्थितः॥ ५<br>यमस्तु दक्षिणे हस्ते वामे कालस्तु दारुणः।<br>चक्रे त्वमरकोट्यस्तु गन्धर्वा लोकविश्रुताः॥ ६<br>प्रजापतिरथ श्रेष्ठो ब्रह्मा चैव तु सारथिः।<br>एवं कृत्वा तु देवेशः सर्वदेवमयं रथम्॥ ७<br>सोऽतिष्ठत् स्थाणुभूतस्तु सहस्रपरिवत्सरान्।<br>यदा त्रीणि समेतानि अन्तरिक्षे स्थितानि वै॥ ८<br>त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तदा तानि व्यभेदयत्।<br>शरः प्रचोदितस्तेन रुद्रेण त्रिपुरं प्रति॥ ९<br>भ्रष्टतेजाः स्त्रियो जाता बलं तासां व्यशीर्यत।<br>उत्पाताश्च पुरे तस्मिन् प्रादुर्भूताः सहस्रशः॥ १० | मार्कण्डेयजीने कहा—कुन्तीनन्दन! आपने जो मुझसे पूछा है, उसे मैं कह रहा हूँ, सुनिये! इसी बीच रुद्रदेव नर्मदा-तटपर आये। वहाँ जो तीनों लोकोंमें विख्यात माहेश्वर नामक स्थान है, उस स्थानपर बैठकर महादेव त्रिपुर-संहारके विषयमें सोचने लगे। उन्होंने मन्दराचलको गाण्डीव धनुष, वासुकि सर्पको धनुषकी प्रत्यञ्चा, कार्तिकेयको तरकस, विष्णुको श्रेष्ठ बाण, बाणके अग्रभागमें अग्निको और पुच्छ भागमें वायुको प्रतिष्ठित करके चारों वेदोंको घोड़ा बनाया। इस प्रकार उन्होंने सर्वदेवमय रथका निर्माण किया। दोनों अश्विनीकुमारोंको वागडोर और रथकी धुरीके रूपमें साक्षात् वज्रधारी इन्द्रको नियुक्त किया। उनकी आज्ञाको स्वीकार कर कुबेर तोरणके स्थानपर स्थित हुए। दाहिने हाथपर यम और बायें हाथपर भयंकर काल स्थित हुए। करोड़ों देवगण और लोकविश्रुत गन्धर्वगण रथके चक्के हुए तथा श्रेष्ठ प्रजापति ब्रह्मा सारथि बने। इस प्रकार शिवजी सर्वदेवमय रथका निर्माण कर उसपर स्थाणुरूपमें एक हजार वर्षोंतक स्थित रहे। जब तीनों पुर अन्तरिक्षमें एक साथ सम्मिलित हुए, तब उन्होंने तीन पर्वोंवाले तीन बाणोंसे उनका भेदन किया। जिस समय भगवान् रुद्रने उस बाणको त्रिपुरके ऊपर चलाया, उस समय वहाँकी स्त्रियाँ तेजोहीन हो गयीं और उनका पातिव्रत्य-बल नष्ट हो गया तथा उस नगरमें हजारों प्रकारके उपद्रव उत्पन्न होने लगे॥ १—१०॥ |
| त्रिपुरस्य विनाशाय कालरूपाभवंस्तदा।<br>अट्टहासं प्रमुञ्चन्ति हयाः काष्ठमयास्तदा॥ ११<br>निमेषोन्मेषणं चैव कुर्वन्ति चित्ररूपिणः।<br>स्वप्ने पश्यन्ति चात्मानं रक्ताम्बरविभूषितम्॥ १२<br>स्वप्ने तु सर्वे पश्यन्ति विपरीतानि यानि तु।<br>एतान् पश्यन्ति उत्पातांस्तत्र स्थाने तु ये जनाः॥ १३ | उस समय वे स्त्रियाँ भी त्रिपुर-नाशके लिये कालस्वरूप हो गयीं। काष्ठमय घोड़े अट्टहास करने लगे। चित्ररूपमें निर्मित जीव आँखको खोलने और बंद करने लगे। वहाँके निवासी स्वप्नमें अपनेको लाल वस्त्रसे अलंकृत देखने लगे। उन्हें स्वप्नमें सभी वस्तुएँ विपरीत दिखायी पड़ने लगीं। वे इस प्रकार इन उत्पातोंको देखने |
| * अध्याय १८८ * | ७८५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तेषां बलं च बुद्धिश्च हरकोपेन नाशिते।<br>ततः सांवर्तको वायुर्युगान्तप्रतिमो महान्॥ १४<br>समीरितोऽनलस्तेन उत्तमाङ्गेन धावति।<br>ज्वलन्ति पादपास्तत्र पतन्ति शिखराणि च॥ १५<br>सर्वतो व्याकुलीभूतं हाहाकारमचेतनम्।<br>भग्नोद्यानानि सर्वाणि क्षिप्रं तत् प्रत्यभज्यत॥ १६<br>तेनैव पीडितं सर्वं ज्वलितं त्रिशिखैः शरैः।<br>द्रुमाश्रारामखण्डानि गृहाणि विविधानि च॥ १७<br>दशदिक्षु प्रवृत्तोऽयं समृद्धो हव्यवाहनः।<br>मनःशिलापुञ्जनिभो दिशो दश विभागशः॥ १८<br>शिखाशतैरनेकस्तु प्रजज्वाल हुताशनः।<br>सर्वं किंशुकवर्णाभं ज्वलितं दृश्यते पुरम्॥ १९ | लगे। शंकरजीके कोपसे उनके बल और बुद्धि नष्ट हो गये। तदनन्तर प्रलयकालके समान प्रचण्ड सांवर्तक वायु बहने लगा। वायुसे प्रेरित आगकी भयंकर लपटें भी इधर-उधर व्याप्त होने लगीं। जिससे वहाँ वृक्ष-समूह जलने लगे और पर्वतके शिखर गिरने लगे। सभी ओर लोग व्याकुल होकर चेतानारहित हो गये। चतुर्दिक भयंकर हाहाकार मच गया। सभी उद्यान नष्ट हो गये। वहाँ सब कुछ शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो गया। शंकरजीद्वारा सभी दुःखमग्न कर दिये गये। तीन शिखाओंवाले बाणोंसे वृक्ष, वाटिकाएँ और विविध प्रासाद जलने लगे। यह प्रदीप्त अग्नि दसों दिशाओंमें फैल गया। उस समय दसों दिशाएँ मैनशिलसमूहके समान दीखने लगीं। अग्निदेव अनेकों प्रकारकी सैकड़ों शिखाओंसे युक्त प्रज्वलित हो उठे, जिससे जला हुआ वह सम्पूर्ण त्रिपुर पलाशपुष्पके समान लाल रंगका दिखायी पड़ रहा था॥ ११—१९॥ |
| गृहाद् गृहान्तरं नैव गन्तुं धूमेन शक्यते।<br>हरकोपानलैर्दग्धं क्रन्दमानं सुदुःखितम्॥ २०<br>प्रदीप्तं सर्वतो दिक्षु दह्यते त्रिपुरं पुरम्।<br>प्रासादशिखराग्राणि व्यशीर्यन्त सहस्रशः॥ २१<br>नानामणिविचित्राणि विमानान्यप्यनेकधा।<br>गृहाणि चैव रम्याणि दह्यन्ते दीप्तवह्निना॥ २२<br>धावन्ति द्रुमखण्डेषु वलभीषु तथा जनाः।<br>देवागारेषु सर्वेषु प्रज्वलन्तः प्रधाविताः॥ २३<br>क्रन्दन्ति चानलप्लुष्टा रुदन्ति विविधैः स्वरैः।<br>गिरिकूटनिभास्तत्र दृश्यन्तेऽङ्गारराशयः॥ २४<br>गजाश्च गिरिकूटाभा दह्यमाना यतस्ततः।<br>स्तुवन्ति देवदेवेशं परित्रायस्व नः प्रभो।<br>अन्योन्यं च परिष्वज्य हुताशनप्रधर्षिताः॥ २५<br>स्नेहात् प्रदह्यमानाश्च तथैव विलयंगताः।<br>दह्यन्ते दानवास्तत्र शतशोऽथ सहस्रशः॥ २६ | उस समय धुएँके कारण एक घरसे दूसरे घरमें जाना सम्भव नहीं था। सभी लोग शंकरजीकी क्रोधाग्निसे जलते हुए अत्यन्त दुःखके कारण चीत्कार कर रहे थे। इस प्रकार सभी दिशाओंमें धधकता हुआ त्रिपुरनगर जल रहा था। राजभवनोंके शिखरोंके अग्रभाग हजारों टुकड़ोंमें टूटकर गिर रहे थे। विविध मणियोंसे जटित अनेकों विमान और रमणीय घर उद्दीप्त आगसे जल रहे थे। वहाँके निवासी वृक्षोंके समूहोंमें, घरोंके छज्जोंके नीचे तथा सभी देवगृहोंमें जलते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे। आगकी चपेटमें आकर वे सभी विविध स्वरोंमें क्रन्दन कर रहे थे। वहाँ पर्वतशिखरके समान अङ्गारसमूह दिखायी दे रहे थे। पर्वतशिखरके समान विशाल गजराज इधर-उधर जल रहे थे। सभी देवाधिदेव शंकरकी यों स्तुति कर रहे थे—'प्रभो! हमलोगोंकी रक्षा कीजिये।' वे अग्निसे जलते हुए स्नेहके कारण एक-दूसरेका आलिङ्गन कर उसी प्रकार जलते हुए नष्ट हो रहे थे। इस प्रकार वहाँ सैकड़ों-हजारों दानव जल रहे थे॥ २०—२६॥ |
| हंसकारण्डवाकीर्णा नलिन्यः सहपङ्कजाः।<br>दृश्यन्तेऽनलदग्धानि पुरोद्यानानि दीर्घिकाः॥ २७<br>अम्लानपङ्कजच्छन्ना विस्तीर्णा योजनायताः।<br>गिरिकूटनिभास्तत्र प्रासादा रत्नभूषिताः॥ २८<br>पतन्त्यनलनिर्दग्धा निस्तोया जलदा इव।<br>वरस्त्रीबालवृद्धेषु गोषु पक्षिषु वाजिषु॥ २९ | हंसों और बतखोंसे परिपूर्ण एवं कमलोंसे युक्त पुष्करिणी, बगीचे तथा बावलियाँ, जो एक योजन लम्बी-चौड़ी और खिले हुए कमलोंसे व्याप्त थीं, अग्निसे जलती हुई दिखायी दे रही थीं। वहाँ रत्नोंसे विभूषित पर्वतशिखरके समान राजभवन अग्निके द्वारा भस्म होकर गिर रहे थे। वे जलशून्य मेघके समान दिखायी दे रहे थे। शंकरजीके क्रोधसे प्रेरित अग्नि श्रेष्ठ स्त्री, बालक, वृद्ध, गौ, पक्षी |
१९१- नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य
७८६ * मत्स्यपुराण *
| निर्दयो व्यदहद् वह्निर्हरक्रोधेन प्रेरितः।<br>सहस्रशः प्रबुद्धाश्च सुप्ताश्च बहवो जनाः॥ ३०<br>पुत्रमालिङ्ग्य ते गाढं दह्यन्ते त्रिपुराग्निना।<br>निदाघोऽभून्महावह्नेरन्तकालो यथा तथा॥ ३१<br>केचिद् गुप्ताः प्रदग्धास्तु भार्योत्सङ्गगतास्तथा।<br>पित्रा मात्रा च सुश्लिष्टा दग्धास्वे त्रिपुराग्निना ॥ ३२<br>अथ तस्मिन् पुरे दीप्ते स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः ॥ ३३<br>अग्निज्वालाहतास्तत्र ह्यपतन् धरणीतले।<br>काचिच्छ्यामा विशालाक्षी मुक्तावलिविभूषिता ॥ ३४<br>धूमेनाकुलिता सा तु पतिता धरणीतले।<br>काचित् कनकवर्णाभा इन्द्रनीलविभूषिता ॥ ३५<br>भर्तारं पतितं दृष्ट्वा पतिता तस्य चोपरि।<br>काचिदादित्यसङ्काशा प्रसुप्ता च गृहे स्थिता ॥ ३६<br>अग्निज्वालाहता सा तु पतिता गतचेतना।<br>उत्थितो दानवस्तत्र खड्गहस्तो महाबलः ॥ ३७<br>वैश्वानरहतः सोऽपि पतितो धरणीतले।<br>मेघवर्णापरा नारी हारकेयूरभूषिता ॥ ३८<br>श्वेतवस्त्रपरीधाना बालं स्तन्यं न्यधापयत्।<br>दह्यन्तं बालकं दृष्ट्वा रुदती मेघशब्दवत्॥ ३९<br>एवं स तु दहन्नग्निर्हरक्रोधेन प्रेरितः।<br>काचिच्चन्द्रप्रभा सौम्या वज्रवैदूर्यभूषिता ॥ ४० | और घोड़ोंमें फैलकर निर्दयतापूर्वक जला रहे थे। हजारों जागे हुए एवं अनेकों सोये हुए व्यक्ति, जो पुत्रका गाढ़ आलिङ्गन किये हुए थे, त्रिपुराग्निसे जल रहे थे। वहाँ प्रचण्ड अग्निके कारण प्रलयकालीन संताप परिव्याप्त था। उस त्रिपुराग्निसे कुछ लोग पत्नीकी गोदमें छिपे हुए ही भस्म हो गये तो कुछ लोग माँ-बापसे चिपके हुए ही जलकर भस्मसात् हो गये। उस प्रज्वलित त्रिपुरमें अप्सराओंके समान सुन्दरी स्त्रियाँ अग्निकी ज्वालाओंसे झुलसकर पृथ्वीपर गिर रही थीं। कोई मोतीकी मालाओंसे अलंकृत विशाल नेत्रोंवाली षोडशवर्षीया नायिका धूएँसे व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी। कोई इन्द्रनील मणिसे अलंकृत स्वर्णके समान कान्तिवाली स्त्री पतिको गिरा हुआ देखकर उसीके ऊपर गिर पड़ी। कोई सूर्यके समान तेजस्विनी नारी घरमें ही स्थित रहकर सो रही थी, वह अग्निकी ज्वालासे चेतनारहित होकर धराशायी हो गयी। उसी समय अतिशय बलशाली एक दानव हाथमें तलवार लेकर उठ खड़ा हुआ, किंतु अग्निसे जलकर वह भी पृथ्वीपर गिर पड़ा। मेघके समान श्यामवर्णकी दूसरी स्त्री, जो हार और केयूरसे अलंकृत तथा श्वेतवस्त्र पहने हुए अपने दुधमुँहे बच्चेको सुलाये हुए थी, वह उस बच्चेको जलते हुए देखकर मेघके शब्दके समान रोने लगी। इस प्रकार शंकरजीके कोपसे प्रेरित वह अग्नि त्रिपुरको जला रही थी॥ २७-३९ १/२ ॥ | | सुतमालिङ्ग्य वेपन्ती दग्धा पतति भूतले।<br>काचित् कुन्देन्दुवर्णाभा क्रीडन्ती स्वगृहे स्थिता ॥ ४१<br>गृहे प्रज्वलिते सा तु प्रतिबुद्धा शिखार्दिता।<br>पश्यन्ती ज्वलितं सर्वं हा सुतो मे कथं गतः ॥ ४२<br>सुतं संदग्धमालिङ्ग्य पतिता धरणीतले।<br>आदित्योदयवर्णाभा लक्ष्मीवदनशोभना ॥ ४३<br>त्वरिता दह्यमाना सा पतिता धरणीतले।<br>काचित् सुवर्णवर्णाभा नीलरत्नैर्विभूषिता ॥ ४४ | कोई चन्द्रके समान कान्तिवाली एवं हीरक और वैदूर्यसे अलंकृत सज्जन नायिका अपने पुत्रको गोदमें लेकर काँपती हुई जलकर पृथ्वीपर गिर पड़ी। कोई कुन्द-पुष्प एवं चन्द्रमाके समान कान्तिवाली स्त्री क्रीडा करती हुई अपने घरमें ही सो रही थी, वह घरके जलनेपर अग्निशिखासे पीड़ित हो जाग उठी और सबको जलता हुआ देखकर 'हा! मेरा पुत्र कहाँ चला गया?' ऐसा कहती हुई जलते हुए पुत्रका आलिङ्गन कर पृथ्वीपर गिर पड़ी। उदयकालीन सूर्यके समान कान्तिसे युक्त एवं लक्ष्मीके मुखके समान शोभायमान मुखवाली कोई स्त्री भागती हुई जलकर पृथ्वीपर गिर गयी। कोई स्वर्णके समान कान्तिवाली नीलरत्नोंसे अलंकृत स्त्री |
| * अध्याय १८८ * | ७८७ |
|---|
| धूमेनाकुलिता सा तु प्रसुप्ता धरणीतले।<br>अन्या गृहीतहस्ता तु सखि दह्यति बालिका ॥ ४५<br>अनेकदिव्यरत्नाढ्या दृष्ट्वा दहनमोहिता।<br>शिरसि ह्यञ्जलिं कृत्वा विज्ञापयति पावकम् ॥ ४६<br>भगवन् यदि वैरं ते पुरुषेष्वपकारिषु।<br>स्त्रियः किमपराध्यन्ते गृहपञ्जरकोकिलाः ॥ ४७<br>पाप निर्दय निर्लज्ज कस्ते कोपः स्त्रियः प्रति।<br>न दाक्षिण्यं न ते लज्जा न सत्यं शौर्यवर्जितः ॥ ४८<br>अनेन ह्यापसर्गेण तूपालम्भं शिखिन्यदात्।<br>किं त्वया न श्रुतं लोके ह्यवध्याः शत्रुयोषितः ॥ ४९<br>किंतु तुभ्यं गुणा होते दहनोत्सादनं प्रति।<br>न कारुण्यं भयं वापि दाक्षिण्यं न स्त्रियः प्रति ॥ ५०<br>दयां कुर्वन्ति म्लेच्छापि दहन्तीं वीक्ष्य योषितम्।<br>म्लेच्छानामपि कष्टोऽसि दुर्निवारो ह्यचेतनः ॥ ५१<br>एते चैव गुणास्तुभ्यं दहनोत्सादनं प्रति।<br>आसामपि दुराचार स्त्रीणां किं ते निपातने ॥ ५२<br>दुष्ट निर्घृण निर्लज्ज हुताशिन् मन्दभाग्यक।<br>निराशत्वं दुरावास बलाद् दहसि निर्दय ॥ ५३<br>एवं विलपमानास्ता जल्पन्त्यश्च बहून्यपि।<br>अन्याः क्रोशन्ति संक्रुद्धा बालशोकेन मोहिताः ॥ ५४<br>दहते निर्दयो वह्निः संक्रुद्धः पूर्वशत्रुवत्।<br>पुष्करिण्यां जलं दग्धं कूपेष्वपि तथैव च ॥ ५५<br>अस्मान् संदह्य म्लेच्छ त्वं कां गतिं प्रापयिष्यसि।<br>एवं प्रलपितं तासां श्रुत्वा देवो विभावसुः।<br>मूर्तिमान् सहसोत्थाय वह्निर्वचनमब्रवीत् ॥ ५६ | धुएँसे व्याकुल होकर पृथ्वीपर सो गयी। अन्य स्त्री अपनी सखीका हाथ पकड़कर कह रही हैं—'सखि! बालिका जल रही है।' कोई अनेक दिव्य रत्नोंसे अलंकृत नारी अग्निको देखकर मोहित हो गयी, तब वह सिरपर हाथ जोड़कर अग्निसे प्रार्थना करने लगी—'भगवन्! यदि तुम्हारा अपकारी पुरुषोंसे वैर है तो घरके पिंजरेमें कोयलके समान आबद्ध स्त्रियोंने तुम्हारा क्या अपराध किया है? अरे पापी! तुम तो बड़े निर्दयी और निर्लज्ज हो। स्त्रियोंके प्रति यह तुम्हारा कैसा क्रोध है! अरे कायर! न तो तुममें कुशलता है, न लज्जा है और न सत्यता है।' वह ऐसे आक्षेपयुक्त वाक्योंसे अग्निको उलाहना देने लगी। (फिर दूसरी कहने लगी—) 'क्या तुमने यह नहीं सुना है कि शत्रुको स्त्रियाँ भी अवध्य होती हैं? क्या जलाना और नाश करना ये ही तुम्हारे गुण हैं? तुम्हारेमें स्त्रियोंके प्रति दया, भय अथवा उदारता नहीं है। म्लेच्छगण भी स्त्रियोंको जलती हुई देखकर उनपर दया करते हैं। तुम तो म्लेच्छोंसे भी बढ़कर हृदयशून्य दुर्निवार कष्ट हो। दुराचारिन्! इन स्त्रियोंको मारनेसे तुम्हें क्या मिलेगा? क्या जलाना और मारना ये ही तुम्हारे गुण हैं? दुष्ट हुताशिन्! तुम बड़े दयाहीन, निर्लज्ज, अभागा, कठोर और कपटी हो। अरे निर्दय! तुम क्यों बलपूर्वक स्त्रियोंको जला रहे हो?' इस प्रकार वे स्त्रियाँ अनेकों प्रकारसे विलाप करती हुई चीत्कार कर रही थीं? अन्य कुछ स्त्रियाँ बालशोकसे मोहित होकर विलाप कर रही थीं। यह निष्ठुर अग्नि क्रुद्ध होकर पुराने शत्रुके समान हमलोगोंको जला रहा है। पुष्करिणियों और कुओंके भी जल सूख गये। अरे म्लेच्छ! हमलोगोंको जलाकर तुम किस गतिको प्राप्त होगे? इस प्रकार उनका प्रलाप सुनकर अग्निदेव सहसा मूर्तिमान् होकर उठ खड़े हुए और इस प्रकार बोले॥ ४०–५६॥ | | अग्निरुवाच | अग्निदेवने कहा— | | स्ववशो नैव युष्माकं विनाशं तु करोम्यहम्।<br>अहमादेशकर्ता वै नाहं कर्तास्म्यनुग्रहम् ॥ ५७<br>रुद्रक्रोधसमाविष्टो विचरामि यथेच्छया।<br>ततो बाणो महातेजास्त्रिपुरं वीक्ष्य दीपितम् ॥ ५८<br>सिंहासनस्थः प्रोवाच ह्यहं देवैर्विनाशितः।<br>अल्पसत्त्वैर्दुराचारैरीश्वरस्य निवेदितम् ॥ ५९ | मैं अपनी इच्छाके अनुसार तुमलोगोंका विनाश नहीं कर रहा हूँ, अपितु मैं आदेशका पालक हूँ। मैं अनुग्रहका कर्ता नहीं हूँ। मैं रुद्रके क्रोधसे आविष्ट होकर इच्छानुसार विचरण कर रहा हूँ। तदनन्तर सिंहासनपर बैठा हुआ महातेजस्वी बाण त्रिपुरको जलता हुआ देखकर बोला—'मैं देवताओंन्द्वारा विनष्ट कर दिया गया। उस स्वल्पबलशाली दुराचारियोंने शंकरसे निवेदन |
७८८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अपरीक्ष्य त्वहं दग्धः शंकरेण महात्मना।<br>नान्यः शक्तिस्तु मां हन्तुं वर्जयित्वा त्रिलोचनम्॥ ६०<br>उत्थितः शिरसा कृत्वा लिङ्गं त्रिभुवनेश्वरम्।<br>निर्गतः स पुरद्वारात् परित्यज्य सुहृत्सुतान्॥ ६१<br>रत्नानि यान्यनर्घाणि स्त्रियो नानाविधास्तथा।<br>गृहीत्वा शिरसा लिङ्गं गच्छन् गगनमण्डलम्॥ ६२<br>स्तुवंश्च देवदेवेशं त्रिलोकाधिपतिं शिवम्।<br>त्यक्ता पुरी मया देव यदि वध्योऽस्मि शंकर॥ ६३<br>त्वत्प्रसादान्महादेव मा मे लिङ्गं विनश्यतु।<br>अर्चितं हि मया देव भक्त्या परमया सदा॥ ६४<br>त्वत्कोपाद् यदि वध्योऽहं तदिदं मा विनश्यतु।<br>श्लाघ्यमेतन्महादेव त्वत्कोपाद् दहनं मम॥ ६५<br>प्रतिजन्म महादेव त्वत्पादनिरतो ह्यहम्।<br>तोटकच्छन्दसा देव स्तौमि त्वां परमेश्वर॥ ६६ | किया और महात्मा शंकरने भी बिना विचारे ही मुझे जला दिया। उन त्रिलोचनको छोड़कर अन्य कोई भी मेरा विनाश नहीं कर सकता। तब वह सिंहासनसे उठ खड़ा हुआ और त्रिभुवनपति शंकरके लिङ्गको सिरपर धारणकर मित्र, पुत्र, बहुमूल्य रत्नों, स्त्रियों और अन्यान्य अनेक प्रकारके पदार्थोंको छोड़कर नगरद्वारसे बाहर निकला। वह लिङ्गको सिरपर धारण कर गगनमण्डलमें जा पहुँचा और देवदेवेश त्रिभुवनपति शिवकी स्तुति करते हुए कहने लगा—'देव! मैंने अपनी पुरीका परित्याग कर दिया है। शंकर! यदि मैं वस्तुतः वध करने योग्य हूँ तो महादेव! आपकी कृपासे मेरा यह लिङ्ग विनष्ट न हो। देव! मैंने परमभक्तिके साथ सदा इसकी पूजा की है, अतः यदि मैं आपके कोपके कारण वध्य हूँ तो यह लिङ्ग विनष्ट न हो। महादेव! आपके कोपसे मेरा यह जल जाना प्रशस्त ही है। महादेव! प्रत्येक जन्ममें मैं आपके चरणोंमें ही लीन हूँ, अतः देवाधिदेव परमेश्वर! मैं तोटक-छन्दद्वारा आपकी स्तुति कर रहा हूँ॥ ५७—६६॥ |
| शिव शंकर शर्व हराय नमो<br>भव भीम महेश्वर सर्व नमः।<br>कुसुमायुधदेहविनाशकर<br>त्रिपुरान्तक अन्धकशूलधर॥ ६७<br><br>प्रमदाप्रिय कान्त विरक्त नमः<br>ससुरासुरसिद्धगणैर्नमित।<br>हयवानरसिंहगजेन्द्रमुखै-<br>रतिह्रस्वसुदीर्घविशालमुखैः ॥ ६८<br><br>उपलब्धुमशक्यतरैरसुरैः<br>प्रथितोऽस्मि च बाहुशतैर्बहुभिः।<br>प्रणतोऽस्मि भवं भवभक्तिरत-<br>श्चलचन्द्रकलाङ्कुर देव नमः॥ ६९<br><br>न च पुत्रकलत्रहयादिधनं<br>मम तु त्वदनुस्मरणं शरणम्।<br>व्यथितोऽस्मि शरीरशतैर्बहुभि-<br>र्गमिता च महानरकस्य गतिः॥ ७०<br><br>न निवर्तति जन्म न पापमतिः<br>शुचिकर्म निबद्धमपि त्यजति।<br>अनुकम्पति विभ्रमति त्रसति<br>मम चैव कुकर्म निवारयति॥ ७१ | आप शिव, शंकर, शर्व और हरको नमस्कार है। भव, भीम, महेश्वर और सर्वभूतमयको प्रणाम है। आप कामदेवके शरीरके नाशक, त्रिपुरान्तक, अन्धक, त्रिशूलधर, आनन्दप्रिय, कान्त, विरक्त और सुर-असुर-सिद्धगणोंसे नमस्कृत हैं, आपको नमस्कार है। मैं अश्व, वानर, सिंह और गजेन्द्रके-से मुखोंवाले, अतिशय छोटे, विस्तृत विशालमुखोंसे युक्त और सैकड़ों भुजाओंसे सम्पन्न बहुत-से अजेय असुरोंद्वारा प्राप्त करनेके लिये अशक्यरूपसे विख्यात हूँ। शिवजीकी भक्तिमें लीन रहनेवाला वही मैं भवके चरणोंमें प्रणिपात कर रहा हूँ। चञ्चल चन्द्रकलासे सुशोभित देव! आपको नमस्कार है। ये पुत्र, स्त्री, अश्वादि वैभव मेरे नहीं हैं, मेरे लिये तो आपका चिन्तन ही एकमात्र शरण है। मैं सैकड़ों शरीर (जन्म) धारण कर पीड़ित हो चुका हूँ। आगे महानरकमें पड़नेकी सम्भावना है। न जन्मसे छुटकारा मिलेगा, न पापबुद्धि ही निवृत्त होगी, शुद्ध कर्ममें लगा हुआ भी मन उसे छोड़ देता है, काँपता है, भ्रमित होता है और भयभीत होता है। मेरे ही कुकर्म अच्छे कर्मोंसे मुझे हटाते हैं। |
| * अध्याय १८८ * | ७८९ |
|---|
| यः पठेत् तोटकं दिव्यं प्रयत: शुचिमानसः।<br>बाणस्येव यथा रुद्रस्तस्यापि वरदो भवेत्॥ ७२<br>इमं स्तवं महादिव्यं श्रुत्वा देवो महेश्वरः।<br>प्रसन्नस्तु तदा तस्य स्वयं वचनमब्रवीत्॥ ७३<br><br>महेश्वर उवाच<br>न भेतव्यं त्वया वत्स सौवर्णे तिष्ठ दानव।<br>पुत्रपौत्रसुहृद्बन्धुभार्याभृत्यजनैः सह॥ ७४<br>अद्यप्रभृति बाण त्वमवध्यस्त्रिदशैरपि।<br>भूयस्तस्य वरो दत्तो देवदेवेन पाण्डव॥ ७५<br>अक्षयश्चाव्ययो लोके विचरस्वाकुतोभयः।<br>ततो निवारयामास रुद्रः सप्तशिखं तदा॥ ७६<br>तृतीयं रक्षितं तस्य शंकरेण महात्मना।<br>भ्रमत्तु गगने दिव्यं रुद्रतेजःप्रभावतः॥ ७७<br>एवं तु त्रिपुरं दग्धं शंकरेण महात्मना।<br>ज्वालामालाप्रदीप्तं तत् पतितं धरणीतले॥ ७८<br>एकं निपतितं तत्र श्रीशैले त्रिपुरान्तके।<br>द्वितीयं पतितं तस्मिन् पर्वतेऽमरकण्टके॥ ७९<br>दग्धेषु तेषु राजेन्द्र रुद्रकोटिः प्रतिष्ठिता।<br>ज्वलत्तदपतत् तत्र तेन ज्वालेश्वरः स्मृतः॥ ८०<br>ऊर्ध्वेन प्रस्थितास्तस्य दिव्यज्वाला दिवं गताः।<br>हाहाकारस्तदा जातो देवासुरकृतो महान्॥ ८१<br>शरमस्तम्भयद् रुद्रो माहेश्वरपुरोत्तमे।<br>एवं वृत्तं तदा तस्मिन् पर्वतेऽमरकण्टके॥ ८२<br>चतुर्दशाख्यं भुवनं स भुक्त्वा पाण्डुनन्दन।<br>वर्षकोटिसहस्रं तु त्रिंशत्कोट्यस्तथापराः॥ ८३<br>ततो महीतलं प्राप्य राजा भवति धार्मिकः।<br>पृथिवीमेकच्छत्रेण भुङ्क्ते स तु न संशयः॥ ८४<br><br>एवं पुण्यो महाराज पर्वतोऽमरकण्टकः।<br>चन्द्रसूर्योपरागे तु गच्छेद् योऽमरकण्टकम्॥ ८५<br>अश्वमेधाद् दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः।<br>स्वर्गलोकमवाप्नोति दृष्ट्वा तत्र महेश्वरम्॥ ८६<br><br>ब्रह्महत्या गमिष्यन्ति राहुग्रस्ते दिवाकरे।<br>तदेवं निखिलं पुण्यं पर्वतेऽमरकण्टके॥ ८७ | जो मनुष्य संयत होकर पवित्र मनसे इस दिव्य तोटकछन्दमें रचित स्तोत्रको पढ़ता है, उसके लिये भी रुद्र बाणके समान वरदायक होते हैं। उस समय स्वयं महेश्वरदेव इस महादिव्य स्तोत्रको सुनकर उसपर प्रसन्न हो गये और इस प्रकार बोले॥ ६७-७३॥<br><br>भगवान् महेश्वरने कहा—वत्स! तुम्हें डरना नहीं चाहिये। दानव! तुम पुत्र, मित्र, बन्धु, पत्नी और भृत्यजनोंके साथ सुवर्णनिर्मित नगरमें निवास करो। बाण! आजसे तुम देवताओंद्वारा अवध्य हो गये। अब तुम लोकमें सर्वथा निर्भय, अव्यय और अक्षय होकर विचरण करो। पाण्डुनन्दन! इस प्रकार देवाधिदेवने बाणको पुनः वर प्रदान किया। तदनन्तर रुद्रने अग्निको जलानेसे मना कर दिया। इस प्रकार महात्मा शंकरने बाणासुरके तृतीय पुरकी रक्षा की। वह पुर रुद्रके तेजके प्रभावसे गगनमण्डलमें घूमने लगा। इस प्रकार महात्मा शंकरने त्रिपुरको जलाया। वह ज्वालामालासे प्रदीप्त होकर पृथ्वीतलपर गिर पड़ा। उनमेंसे एक पुर त्रिपुरान्तकके श्रीशैलपर गिरा और द्वितीय उस अमरकण्टक पर्वतपर गिरा। राजेन्द्र! उनके जल जानेपर उसपर करोड़ों रुद्र प्रतिष्ठित हुए। वह जलता हुआ गिरा था, इस कारण ज्वालेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसकी दिव्य ज्वालाएँ ऊपरको उठती हुई स्वर्गलोकतक जा पहुँचीं। उस समय देवों और असुरोंके द्वारा किया गया भयंकर हाहाकार व्याप्त हो गया। तब रुद्रने अमरकण्टक पर्वतपर उत्तम माहेश्वरपुरमें शरको स्तम्भित कर दिया। पाण्डुनन्दन! (इस प्रकार अमरकण्टकपर्वतपर जो व्यक्ति रुद्रकोटिकी अर्चना करता है) वह तीस करोड़ एक हजार वर्षपर्यन्त चौदहों भुवनोंका उपभोग कर अन्तमें पृथ्वीपर जन्म लेकर धार्मिक राजा होता है। वह एकच्छत्र सम्राट् होकर पृथ्वीका उपभोग करता है—इसमें संदेह नहीं है॥ ७४-८४॥<br><br>महाराज! यह अमरकण्टक पर्वत ऐसा पुण्यजनक है। जो व्यक्ति चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय अमरकण्टक पर्वतपर जाता है, वह अश्वमेध-यज्ञसे दसगुना फल प्राप्त करता है और वहाँ महेश्वरका दर्शन करके स्वर्गलोकको प्राप्त करता है—ऐसा मनीषियोंने कहा है। सूर्यग्रहणके अवसरपर अमरकण्टकपर जानेसे ब्रह्महत्याएँ निवृत्त हो जाती हैं। इस प्रकार अमरकण्टक पर्वतपर अशेष पुण्य |
७९० * मत्स्यपुराण *
| मनसापि स्मरेद् यस्तं गिरिं त्वमरकण्टकम्।<br>चान्द्रायणशतं साग्रं लभते नात्र संशयः॥८८ | प्राप्त होता है। जो मनसे भी उस अमरकण्टकपर्वतका स्मरण करता है, उसे निःसंदेह सौ चान्द्रायणव्रतसे भी अधिक फल मिलता है। | | त्रयाणामपि लोकानां विख्यातोऽमरकण्टकः।<br>एष पुण्यो गिरिश्रेष्ठः सिद्धगन्धर्वसेवितः॥८९ | अमरकण्टक पर्वत तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। यह पुण्यमय श्रेष्ठ पर्वत सिद्धों और गन्धर्वोंसे सेवित, | | नानाद्रुमलताकीर्णो नानापुष्पोपशोभितः।<br>मृगव्याघ्रसहस्रैस्तु सेव्यमानो महागिरिः॥९० | विविध वृक्षों और लताओंसे व्याप्त तथा अनेक प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित है। यह महान् पर्वत हजारों मृगों और व्याघ्रोंसे सेवित है। | | यत्र संनिहितो देवो देव्या सह महेश्वरः।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा चेन्द्रो विद्याधरगणैः सह॥९१ | जहाँ देवी पार्वतीके साथ महादेव, ब्रह्मा, विष्णु तथा विद्याधरोंके साथ इन्द्र सदा उपस्थित रहते हैं, | | ऋषिभिः किन्नरैर्यक्षैर्नित्यमेव निषेवितः।<br>वासुकिः सहितस्तत्र क्रीडते पन्नगोत्तमैः॥९२ | वह अमरकण्टक पर्वत ऋषियों, किन्नरों और यक्षोंके द्वारा सदा सेवित रहता है। श्रेष्ठ सर्पोंके साथ वासुकि वहाँ क्रीड़ा करते रहते हैं। | | प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् पर्वतेऽमरकण्टके।<br>पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥९३ | जो मनुष्य अमरकण्टक पर्वतकी प्रदक्षिणा करता है, वह पौण्डरीक यज्ञका फल प्राप्त करता है। | | तत्र ज्वालेश्वरं नाम तीर्थं सिद्धनिषेवितम्।<br>तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः॥९४ | वहाँ सिद्धोंद्वारा सेवित ज्वालेश्वर नामक तीर्थ है, उसमें स्नानकर मानव स्वर्गलोकको प्राप्त करते हैं और जो वहाँ शरीरका त्याग करते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। | | ज्वालेश्वरे महाराज यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>चन्द्रसूर्योपरागेषु तस्यापि शृणु यत्फलम्॥९५ | महाराज! चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर जो व्यक्ति ज्वालेश्वरमें प्राणोंका परित्याग करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनिये। | | सर्वकर्मविनिर्मुक्तो ज्ञानविज्ञानसंयुतः।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति यावदाभूतसम्प्लवम्॥९६ | वह व्यक्ति सभी कर्मोंसे विनिर्मुक्त तथा ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न हो प्रलयकालपर्यन्त रुद्रलोकको प्राप्त करता है। | | अमरेश्वरदेवस्य पर्वतस्य उभे तटे।<br>तत्र ता ऋषिकोट्यस्तु तपस्तप्यन्ति सुव्रत॥९७ | सुव्रत! अमरकण्टकपर्वतके दोनों तटोंपर करोड़ों ऋषिगण तपस्यामें रत रहते हैं। | | समंताद् योजनक्षेत्रो गिरिश्चामरकण्टकः॥९८ | यह अमरकण्टकपर्वत चारों ओरसे एक योजनमें विस्तृत है। | | अकामो वा सकामो वा नर्मदायां शुभे जले।<br>स्नात्वा मुच्येत पापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति॥९९ | अकाम हो या सकाम, जो मनुष्य नर्मदाके शुभदायक जलमें स्नान करता है, वह सभी पापोंसे छुटकारा पा लेता है और रुद्रलोकको प्राप्त करता है॥८५-९९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥१८४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यवर्णनमें एक सौ अठासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१८४॥
- अध्याय १८९ * | ७९१
एक सौ नवासीवाँ अध्याय
नर्मदा-कावेरी-संगमका माहात्म्य
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>पृच्छन्ति ते महात्मानो मार्कण्डेयं महामुनिम्।<br>युधिष्ठिरपुरोगास्ते ऋषयश्च तपोधनाः॥ १<br>आख्याहि भगवंस्तथ्यं कावेरीसंगमो महान्।<br>लोकानां च हितार्थाय अस्माकं च विवृद्धये॥ २<br>सदा पापरता ये च नरा दुष्कृतकारिणः।<br>मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यो गच्छन्ति परं पदम्।<br>एतदिच्छाम विज्ञातुं भगवन् वक्तुमर्हसि॥ ३ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! युधिष्ठिरको आगे कर वे तपोधन महात्मा-ऋषिगण महामुनि मार्कण्डेयसे पूछने लगे—'भगवन्! आप हमलोगोंके अभ्युदय और लोकके कल्याणके लिये उस नर्मदा और कावेरीके संगमका माहात्म्य भलीभाँति वर्णन कीजिये। भगवन्! जिसके प्रभावसे सदा पापमें रत एवं दुराचारमें प्रवृत्त रहनेवाले मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाते हैं और परमपदको प्राप्त करते हैं, उसे हमलोग जानना चाहते हैं, आप बतानेकी कृपा करें॥ १—३॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>शृण्वन्त्ववहिताः सर्वे युधिष्ठिरपुरोगमाः।<br>अस्ति वीरो महायक्षः कुबेरः सत्यविक्रमः॥ ४<br>इदं तीर्थमनुप्राप्य राजा यक्षाधिपोऽभवत्।<br>सिद्धिं प्राप्तो महाराज तन्मे निगदतः शृणु॥ ५<br>कावेरी नर्मदा यत्र सङ्गमो लोकविश्रुतः।<br>तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा कुबेरः सत्यविक्रमः॥ ६<br>तपोऽतप्यत यक्षेन्द्रो दिव्यं वर्षशतं महत्।<br>तस्य तुष्टो महादेवः प्रादाद् वरमनुत्तमम्॥ ७<br>भो भो यक्ष महासत्त्व वरं ब्रूहि यथेप्सितम्।<br>ब्रूहि कार्यं यथेष्टं तु यत्ते मनसि वर्तते॥ ८ | मार्कण्डेयजीने कहा—युधिष्ठिरसहित ऋषिगण! आपलोग सावधान होकर सुनिये। सत्य पराक्रमी एवं शूरवीर महायक्ष कुबेरने इस तीर्थमें आकर सिद्धि प्राप्त की और वे यक्षोंके अधीश्वर बने। महाराज! मैं उनका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। किसी समय सत्यपराक्रमी यक्षपति कुबेरने जहाँ कावेरी और नर्मदाका लोकप्रसिद्ध संगम है, वहाँ स्नानकर पवित्र हो सौ दिव्य वर्षोंतक घोर तपस्या की। तब संतुष्ट होकर महादेवजीने उन्हें उत्तम वर प्रदान करते हुए कहा—'महाबलशाली यक्ष! तुम अपना अभीष्ट वर माँग लो। तुम्हारे मनमें जो यथेष्ट कार्य वर्तमान है, उसे बतलाओ'॥ ४—८॥ |
| कुबेर उवाच<br>यदि तुष्टोऽसि मे देव यदि देयो वरो मम।<br>अद्यप्रभृति सर्वेषां यक्षाणामधिपो भवे॥ ९<br>कुबेरस्य वचः श्रुत्वा परितुष्टो महेश्वरः।<br>एवमस्तु ततो देवस्तत्रैवान्तरधीयत॥ १०<br>सोऽपि लब्धवरो यक्षः शीघ्रं लब्धफलोदयः।<br>पूजितः स तु यक्षैश्च ह्यभिषिक्तस्तु पार्थिव॥ ११<br>कावेरीसङ्गमं तत्र सर्वपापप्रणाशनम्।<br>ये नरा नाभिजानन्ति वञ्चितास्ते न संशयः॥ १२ | कुबेर बोले—देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना चाहते हैं तो मैं आजसे सभी यक्षोंका अधीश्वर हो जाऊँ। कुबेरका वचन सुनकर महेश्वर परम प्रसन्न हुए और 'ऐसा ही हो'—यों कहकर वे देवाधिदेव वहीं अन्तर्धान हो गये। राजन्! इस प्रकार उस यक्षने वर प्राप्त कर शीघ्र ही फलको भी प्राप्त किया। वह यक्षोंद्वारा पूजित होकर राजाके पदपर अभिषिक्त किया गया। वहीं सभी पापोंको नाश करनेवाला कावेरी-संगम है जो मनुष्य उसे नहीं जानते, वे निःसंदेह ठगे |
| ७९२ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत्र स्नायीत मानवः।<br>कावेरी च महापुण्या नर्मदा च महानदी॥ १३<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र ह्यर्चयेद् वृषभध्वजम्।<br>अश्वमेधफलं प्राप्य रुद्रलोके महीयते॥ १४<br>अग्निप्रवेशं यः कुर्याद् यश्च कुर्यादनाशकम्।<br>अनिवर्त्या गतिस्तस्य यथा मे शंकोरोऽब्रवीत्॥ १५<br>सेव्यमानो वरस्त्रीभिः क्रीडते दिवि रुद्रवत्।<br>षष्टिवर्षसहस्त्राणि षष्टिकोट्यस्तथापराः॥ १६<br>मोदते रुद्रलोकस्थो यत्र तत्रैव गच्छति।<br>पुण्यक्षयात् परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः॥ १७<br>भोगवान् दानशीलश्च महाकुलसमुद्भवः।<br>तत्र पीत्वा जलं सम्यक् चान्द्रायणफलं लभेत्॥ १८<br>स्वर्गं गच्छन्ति ते मर्त्या ये पिबन्ति शुभं जलम्।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यत्फलं प्राप्नुयान्नरः।<br>कावेरीसंगमे स्नात्वा तत्फलं तस्य जायते॥ १९<br>एवमादि तु राजेन्द्र कावेरीसंगमे महत्।<br>पुण्यं महत्फलं तत्र सर्वपापप्रणाशनम्॥ २० | गये। इसलिये मनुष्यको सब तरहसे प्रयत्न करके वहाँ स्नान करना चाहिये। राजेन्द्र! कावेरी और नर्मदा—ये दोनों अतिशय पुण्यशालिनी महानदी हैं। उसमें स्नानकर जो मनुष्य वृषभध्वज शिवकी पूजा करता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करके रुद्रलोकमें पूजित होता है। जो मनुष्य वहाँ अग्निमें प्रवेश करता है या जो उपवासपूर्वक निवास करता है, उसे पुनरावृत्तिरहित गति प्राप्त होती है—ऐसा शंकरजीने मुझे बतलाया था। वह पुरुष स्वर्गलोकमें सुन्दरी स्त्रियोंद्वारा सेवित होकर रुद्रके समान साठ करोड़ साठ हजार वर्षोंतक क्रीड़ा करता है एवं रुद्रलोकमें स्थित होकर आनन्दका भोग करता है तथा जहाँ चाहता है वहाँ चला जाता है। पुनः पुण्य क्षीण होनेपर वह भ्रष्ट होकर उत्तम कुलमें उत्पन्न, भोगवान्, दानशील और धार्मिक राजा होता है। इस संगममें जलका सम्यक् पानकर मनुष्य चान्द्रायण-व्रतका फल प्राप्त करता है। जो मानव इसके पवित्र जलको पीते हैं, वे स्वर्गको चले जाते हैं। गङ्गा और यमुनाके संगममें स्नान करनेसे मनुष्यको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही फल उसे कावेरीके संगममें स्नान करनेसे मिलता है। राजेन्द्र! इस तरह कावेरी और नर्मदाके संगममें स्नान करनेसे सभी पापोंका नाश करनेवाला अतिशय पुण्य और महान् फल प्राप्त होता है॥ ९–२०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदाका माहात्म्यवर्णन नामक एक सौ नवासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८९॥
एक सौ नब्बेवाँ अध्याय
नर्मदाके तटवर्ती तीर्थ
| मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजीने कहा— |
|---|---|
| नार्मदे चोत्तरे कूले तीर्थं योजनविस्तृतम्।<br>यन्त्रेश्वरेति विख्यातं सर्वपापहरं परम्॥ १<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् दैवतैः सह मोदते।<br>पञ्च वर्षसहस्राणि क्रीडते कामरूपधृक्॥ २<br>गर्जनं च ततो गच्छेद् यत्र मेघचयोत्थितः।<br>इन्द्रजिन्नाम सम्प्राप्तस्तस्य तीर्थप्रभावतः॥ ३<br>मेघनादं ततो गच्छेद् यत्र मेघानुगर्जितम्।<br>मेघनादो गणस्तत्र परमां गणतां गतः॥ ४ | राजन्! नर्मदाके उत्तर तटपर एक योजन विस्तृत यन्त्रेश्वर नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ तीर्थ है, जो सभी पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नानकर मानव देवताओंके साथ आनन्द मनाता है और इच्छानुसार रूप धारणकर पाँच हजार वर्षोंतक वहाँ क्रीड़ा करता है। वहाँ गर्जन नामक तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ मेघसमूह ऊपर उठते रहते हैं। इस तीर्थके प्रभावसे मेघनादको इन्द्रजित् नाम प्राप्त हुआ था। वहाँसे मेघनाद जाना चाहिये, जहाँ मेघके गर्जनकी-सी ध्वनि होती रहती है। इसी स्थानपर मेघनाद-गण गणके श्रेष्ठ पदको प्राप्त किया था। |
| * अध्याय १९० * | ७९३ |
|---|---|
| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थमाम्रातकेश्वरम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत्॥ ५<br>नर्मदोत्तरतीरे तु धारा तीर्थं तु विश्रुतम्।<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा तर्पयेत् पितृदेवताः॥ ६<br>सर्वान् कामानवाप्नोति मनसा ये विचिन्तिताः।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ब्रह्मावर्तमिति स्मृतम्॥ ७<br>तत्र संनिहितो ब्रह्मा नित्यमेव युधिष्ठिर।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र ब्रह्मलोके महीयते॥ ८ | राजेन्द्र! इसके बाद आम्रातकेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नानकर मानव एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। नर्मदाके उत्तर तटपर प्रसिद्ध धारातीर्थ है, उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य यदि पितरों और देवताओंका तर्पण करता है तो उसे मनोऽभिलषित कामनाएँ प्राप्त हो जाती हैं। राजेन्द्र! इसके बाद ब्रह्मावर्त नामसे प्रसिद्ध तीर्थमें जाना चाहिये। युधिष्ठिर! वहाँ ब्रह्मा सदा विराजमान रहते हैं। राजेन्द्र! उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य ब्रह्मलोकमें पूजित होता है॥ १—८॥ |
| ततोऽङ्गारेश्वरं गच्छेन्नियतो नियताशनः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो रुद्रलोकं स गच्छति॥ ९<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् कपिलादानमाप्नुयात्॥ १०<br>गच्छेत् करञ्जतीर्थं तु देवर्षिगणसेवितम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोलोकं समवाप्नुयात्॥ ११<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कुण्डलेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र संनिहितो रुद्रस्तिष्ठते ह्युमया सह॥ १२<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र स वन्द्यस्त्रिदशैरपि।<br>पिप्पलेशं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्॥ १३<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र रुद्रलोके महीयते।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र विमलेश्वरमुत्तमम्॥ १४<br>तत्र देवशिला रम्या चेश्वरेण विनिर्मिता।<br>तत्र प्राणपरित्यागाद् रुद्रलोकमवाप्नुयात्॥ १५<br>ततः पुष्करिणीं गच्छेत् तत्र स्नानं समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र हीन्द्रस्यार्थासनं लभेत्॥ १६ | वहाँ नियमपूर्वक संयत भोजन करता हुआ अङ्गारेश्वर जाना चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकको जाता है। राजेन्द्र! वहाँसे कपिला नामसे प्रसिद्ध श्रेष्ठ तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य कपिला गौके दानका फल प्राप्त करता है। इसके बाद देवों और ऋषियोंसे सेवित करंज नामक तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजन्! इस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको गोलोककी प्राप्ति होती है। राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ कुण्डलेश्वर नामक तीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ उमाके साथ रुद्र सदा निवास करते हैं। राजेन्द्र! उस तीर्थमें स्नानकर वह देवताओंद्वारा भी वन्दनीय हो जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् सभी पापोंके नाशक पिप्पलेश-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! वहाँसे श्रेष्ठ विमलेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ महेश्वरद्वारा निर्मित एक देवशिला है। उस स्थानपर प्राणोंका त्याग करनेसे रुद्रलोककी प्राप्ति होती है। तदुपरान्त पुष्करिणीतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करे, वहाँ स्नान करनेमात्रसे ही मानव इन्द्रका आधा आसन प्राप्त कर लेता है॥ ९—१६॥ |
| नर्मदा सरितां श्रेष्ठा रुद्रदेहाद् विनिःसृता।<br>तारयेत् सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ १७ | नदियोंमें श्रेष्ठ नर्मदा रुद्रके शरीरसे निकली है, यह स्थावर और जंगम सभी जीवोंका उद्धार करती है। |
| सर्वदेवाधिदेवेन त्वीश्वरेण महात्मना।<br>कथिता ऋषिसंघेभ्यो ह्यस्माकं च विशेषतः॥ १८ | ऐसा सभी देवताओंके अधीश्वर महात्मा शंकरने स्वयं ऋषिगणको और विशेषकर मुझे बताया है। |
| मुनिभिः संस्तुता ह्येषा नर्मदा प्रवरा नदी।<br>रुद्रदेहाद् विनिष्क्रान्ता लोकानां हितकाम्यया॥ १९ | मुनियोंने इस श्रेष्ठ नर्मदा नदीकी स्तुति की है। यह नर्मदा संसारके हितकी कामनासे रुद्रके शरीरसे निकली है। |
| ७९४ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| सर्वपापहरा नित्यं सर्वदेवनमस्कृता।<br>संस्तुता देवगन्धर्वैरप्सरोभिस्तथैव च॥ २०<br>नमः पुण्यजले ह्लाद्ये नमः सागरगामिनि।<br>नमस्ते पावनिर्दाहे नमो देवि वरानने॥ २१<br>नमोऽस्तु ते ऋषिगणसिद्धसेविते<br>नमोऽस्तु ते शंकरदेहनिःसृते।<br>नमोऽस्तु ते धर्मभृतां वरप्रदे<br>नमोऽस्तु ते सर्वपवित्रपावने॥ २२<br>यस्त्विदं पठते स्तोत्रं नित्यं श्रद्धासमन्वितः।<br>ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो विजयी भवेत्॥ २३<br>वैश्यस्तु लभते लाभं शूद्रश्चैव शुभां गतिम्।<br>अर्थार्थी लभते ह्यर्थं स्मरणादेव नित्यशः॥ २४<br>नर्मदां सेवते नित्यं स्वयं देवो महेश्वरः।<br>तेन पुण्या नदी ज्ञेया ब्रह्महत्यापहारिणी॥ २५ | यह सभी पापोंका क्षय करनेवाली और सभी देवोंद्वारा नमस्कृत है। देव, गन्धर्व और अप्सराओंने इसकी भलीभाँति स्तुति की है। आदि गङ्गे! तुम्हें नमस्कार है। पुण्यसलिले! तुम्हें प्रणाम है। सागरकी ओर गमनशीले! तुम्हें अभिवादन है। पापोंको नष्ट करनेवाली एवं सुन्दर मुखवाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम ऋषिसमूह एवं सिद्धोंसे सेवित हो, तुम्हें प्रणाम है। शंकरके शरीरसे निकली हुई तुम्हें अभिवादन है। तुम धर्मात्मा प्राणियोंको वर देनेवाली हो, तुम्हें नमस्कार है। सभीको पवित्र एवं निष्पाप करनेवाली तुम्हें प्रणाम है। जो श्रद्धासे समन्वित होकर इस स्तोत्रका नित्य पाठ करता है, वह ब्राह्मण हो तो वेदज्ञ और क्षत्रिय हो तो विजयी होता है। वैश्य धनका लाभ करता है और शूद्रको शुभ गतिकी प्राप्ति होती है। अर्थको चाहनेवाला सदा स्मरणमात्रसे ही अर्थ-लाभ करता है। साक्षात् महेश्वरदेव नर्मदा नदीका नित्य सेवन करते हैं, इसीलिये इस पवित्र नदीको ब्रह्महत्यारूपी पापका निवारण करनेवाली जानना चाहिये॥ १७-२५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये नवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यवर्णन-प्रसङ्गमें एक सौ नब्बेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९०॥
एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय
नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य
| मार्कण्डेय उवाच<br>तदाप्रभृति ब्रह्माद्या ऋषयश्च तपोधनाः।<br>सेवन्ते नर्मदां राजन् रागक्रोधविवर्जिताः॥ १<br><br>युधिष्ठिर उवाच<br>कस्मिन् निपतितं शूलं देवस्य तु महीतले।<br>तत्र पुण्यं समाख्याहि यथावन्मुनिसत्तम॥ २<br><br>मार्कण्डेय उवाच<br>शूलभेदमिति ख्यातं तीर्थं पुण्यतमं महत्।<br>तत्र स्नात्वार्चयेद् देवं गोसहस्रफलं लभेत्॥ ३<br><br>त्रिरात्रं कारयेद् यस्तु तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>अर्चयित्वा महादेवं पुनर्जन्म न विद्यते॥ ४ | मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! तभीसे ब्रह्मा आदि देवता और तपस्वी ऋषिगण क्रोध-रागसे रहित होकर नर्मदाका सेवन करते हैं॥ १॥<br><br>युधिष्ठिरने पूछा— मुनिश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर महादेवजीका त्रिशूल किस स्थानपर गिरा था? उस स्थानका पुण्य यथार्थरूपसे बतलाइये॥ २॥<br><br>मार्कण्डेयजी बोले— वह महान् पुण्यमय तीर्थ शूलभेद नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ स्नानकर महादेवजीकी पूजा करे, उससे एक हजार गो-दानका फल प्राप्त होता है। नराधिप! जो मनुष्य उस तीर्थस्थानमें तीन राततक महादेवजीकी पूजा करके निवास करता है, उसका पुनर्जन्म |
१९२- शुक्लतीर्थका माहात्म्य
| * अध्याय १९१ * | ७९५ |
|---|
| भीमेश्वरं ततो गच्छेन्नारदेश्वरमुत्तमम्।<br>आदित्येशं महापुण्यं स्मृतं किल्बिषनाशनम्॥ ५<br>नन्दिकेशं परिष्वज्य पर्याप्तं जन्मनः फलम्।<br>वरुणेशं ततः पश्येत् स्वतन्त्रेश्वरमेव च।<br>सर्वतीर्थफलं तस्य पञ्चायतनदर्शनात्॥ ६<br>ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र युद्धं यत्र सुसाधितम्।<br>कोटितीर्थं तु विख्यातमसुरा यत्र मोहिताः॥ ७<br>यत्रैव निहता राजन् दानवा बलदर्पिताः।<br>तेषां शिरांस्यगृह्णन्त सर्वे देवाः समागताः॥ ८<br>तस्तु संस्थापितो देवः शूलपाणिर्वृषध्वजः।<br>कोटिर्विनिहता तत्र तेन कोटीश्वरः स्मृतः॥ ९<br>दर्शनात् तस्य तीर्थस्य सदेहः स्वर्गमारुहेत्।<br>यदा त्विन्द्रेण क्षुद्रत्वाद् वज्रं कीलेन यन्त्रितम्॥ १०<br>तदाप्रभृति लोकानां स्वर्गमार्गो निवारितः।<br>यः स्तुतं श्रीफलं दद्यात् कृत्वा चान्ते प्रदक्षिणाम्॥ ११<br>पार्वतं सहदीपं तु शिरसा चैव धारयेत्।<br>सर्वकामसुसम्पन्नो राजा भवति पाण्डव॥ १२<br>मृतो रुद्रत्वमाप्नोति ततोऽसौ जायते पुनः।<br>स्वर्गादेत्य भवेद् राजा राज्यं कृत्वा दिवं व्रजेत्॥ १३<br>बहुनेत्रं ततः पश्येत् त्रयोदश्यां तु मानवः।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वयज्ञफलं लभेत्॥ १४<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थं परमशोभनम्।<br>नराणां पापनाशाय ह्यगस्त्येश्वरमुत्तमम्॥ १५<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते।<br>कार्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशी॥ १६<br>घृतेन स्नापयेद् देवं समाधिस्थो जितेन्द्रियः।<br>एकविंशकुलोपेतो न च्यवेद्वैश्रवात् पदात्॥ १७<br>धेनुमुपानहौ छत्रं दद्याच्च घृतकम्बलम्।<br>भोजनं चैव विप्राणां सर्वं कोटिगुणं भवेत्॥ १८<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र बलाकेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् सिंहासनपतिर्भवेत्॥ १९ | नहीं होता। इसके बाद श्रेष्ठ भीमेश्वर और नारदेश्वर तीर्थकी यात्रा करे। आदित्येश तीर्थ महान् पुण्यशाली और पापका नाशक कहा गया है। नन्दिकेशका दर्शन करनेसे जन्म धारण करनेका पर्याप्त फल सुलभ हो जाता है। इसके बाद वरुणेश एवं स्वतन्त्रेश्वरका दर्शन करे। इस पञ्चायतनका दर्शन करनेसे सभी तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। राजेन्द्र! इसके बाद कोटितीर्थ नामसे प्रसिद्ध स्थानमें जाना चाहिये। जहाँ युद्ध हुआ था और जहाँ असुरगण मोहित हुए थे, राजन्! जहाँ बलके घमंडमें चूर दानवगण मारे गये थे और आये हुए देवगणोंने उनके सिरोंको ग्रहण कर लिया था, जहाँ देवताओंद्वारा हाथमें त्रिशूल धारण किये हुए भगवान् वृषध्वज महादेवकी प्रतिष्ठा की गयी थी, वहाँ करोड़ों दानवोंका संहार हुआ था, अतः वह कोटीश्वर तीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस तीर्थका दर्शन करनेसे सशरीर स्वर्गारोहण प्राप्त होता है। जबसे इन्द्रने कृपणताके कारण वज्रको कीलसे कीलित कर दिया तबसे साधारण लोगोंके लिये स्वर्गका मार्ग बंद हो गया॥३-१० १/२॥<br><br>पाण्डुनन्दन! जो स्तुति करनेके पश्चात् अन्तमें इस तीर्थकी प्रदक्षिणा कर बिल्वफल प्रदान करता है तथा दीपकसहित पर्वतप्रतिमा सिरपर धारण करता है, वह सभी कामनाओंसे सम्पन्न होकर राजा होता है और मृत्यु होनेपर रुद्रत्वको प्राप्त करता है। पुनः जब वह स्वर्गसे लौटकर जन्म लेता है, तब राजा होता है और राज्यका उपभोग करनेके बाद स्वर्गमें चला जाता है। इसके बाद त्रयोदशी तिथिको मानव बहुनेत्र तीर्थका दर्शन करे। वहाँ मनुष्य स्नानमात्र करनेसे सभी यज्ञोंके फलको प्राप्त कर लेता है। राजेन्द्र! तदनन्तर मनुष्योंके पापोंका नाश करनेके लिये विख्यात अगस्त्येश्वर नामक श्रेष्ठ एवं परम रमणीय तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! उस तीर्थमें स्नान करनेसे मानव ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जो जितेन्द्रिय मानव समाहितचित्तसे कार्तिकमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिमें महादेवजीको घृतसे स्नान कराता है, उसका इक्कीस पीढ़ीत्तक महेश्वरके पदसे पतन नहीं होता। वहाँ यदि विप्रोंको धेनु, जूता, छाता, घी, कम्बल और भोजनका दान दिया जाय तो वह सभी करोड़गुना हो जाता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त उत्तम बलाकेश्वरतीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! उस तीर्थमें स्नान करनेसे मानव सिंहासनका |
| ७९६ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नर्मदादक्षिणे कूले तीर्थं शक्रस्य विश्रुतम्।<br>उपोष्य रजनीमेकां स्नानं तत्र समाचरेत्॥ २०<br>स्नानं कृत्वा यथान्यायमर्चयेच्च जनार्दनम्।<br>गोसहस्रफलं तस्य विष्णुलोकं स गच्छति॥ २१ | अधिपति होता है। नर्मदाके दक्षिण तटपर इन्द्रका प्रसिद्ध तीर्थ है, वहाँ एक रातका उपवास कर विधिविधानसे स्नान करे, स्नान करनेके बाद विधिपूर्वक जनार्दनकी अर्चना करे तो उसे एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त होता है और वह विष्णुलोकमें जाता है॥ १९—२१॥ |
| ऋषितीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापहरं नृणाम्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र शिवलोकं च गच्छति॥ २२<br>नारदस्य तु तत्रैव तीर्थं परमशोभनम्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत्॥ २३<br>देवतीर्थं ततो गच्छेद् ब्रह्मणा निर्मितं पुरा।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते॥ २४<br>अमरकण्टकं गच्छेदमरैः स्थापितं पुरा।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते॥ २५<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र रावणेश्वरमुत्तमम्।<br>नित्यं चायतनं दृष्ट्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ २६<br>ऋणतीर्थं ततो गच्छेद् ऋणोभ्यो मुच्यते ध्रुवम्।<br>वटेश्वरं ततो दृष्ट्वा पर्याप्तं जन्मनः फलम्॥ २७<br>भीमेश्वरं ततो गच्छेत् सर्वव्याधिविनाशनम्।<br>स्नातमात्रो नरो राजन् सर्वदुःखैः प्रमुच्यते॥ २८<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तुरासङ्गममुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा महादेवमर्चयन् सिद्धिमवाप्नुयात्॥ २९<br>सोमतीर्थं ततो गच्छेत् पश्येच्चन्द्रमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् भक्त्या परमया युतः॥ ३०<br>तत्क्षणाद् दिव्यदेहस्थः शिववन्मोदते चिरम्।<br>षष्टिवर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते॥ ३१ | तत्पश्चात् मनुष्योंके सभी पापोंके नाशक ऋषितीर्थकी यात्रा करे, वहाँ स्नानमात्र करनेसे मानव शिवलोकको चला जाता है। वहीं नारदजीका परम रमणीय तीर्थ है, वहाँ स्नानमात्रसे मानव एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। राजन्! इसके बाद प्राचीनकालमें ब्रह्माद्वारा निर्मित देवतीर्थमें जाय, वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। तदनन्तर प्राचीनकालमें देवोंद्वारा स्थापित अमरकण्टककी यात्रा करे। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ रावणेश्वर-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ मनुष्य प्रतिदिन देवमन्दिरका दर्शनकर ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। तदुपरान्त ऋणतीर्थमें जाय, वहाँ जानेसे मानव निश्चय ही ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। इसके बाद वटेश्वरका दर्शन करके मनुष्यजन्मका पूर्ण फल प्राप्त कर लेता है। राजन्! तदनन्तर सभी व्याधियोंको नाश करनेवाले भीमेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। उस तीर्थमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य सभी दुःखोंसे छुटकारा पा जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठतम तुरासङ्ग तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ स्नानकर महादेवजीकी पूजा करनेसे सिद्धि प्राप्त होती है। इसके बाद सोमतीर्थमें जाय और वहाँ परम श्रेष्ठ चन्द्रमाका दर्शन करे। राजन्! उस तीर्थमें परम भक्तिसे युक्त हो स्नान करनेसे मानव उसी क्षण दिव्य शरीर धारणकर शिवके समान चिरकालपर्यन्त आनन्दका अनुभव करता है और साठ हजार वर्षोंतक रुद्रलोकमें पूजित होता है॥ २२—३१॥ |
| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र पिङ्गलेश्वरमुत्तमम्।<br>अहोरात्रोपवासेन त्रिरात्रफलमाप्नुयात्॥ ३२<br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र कपिलां यः प्रयच्छति।<br>यावन्ति तस्या रोमाणि तत्प्रसूतिकुलेषु च॥ ३३<br>तावद् वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते।<br>यस्तु प्राणपरित्यागं कुर्यात् तत्र नराधिप॥ ३४ | राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ पिङ्गलेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ एक दिन-रात उपवास करनेसे त्रिरात्रका फल प्राप्त होता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो कपिला गौका दान देता है, उस दाताके वंशके कुलवाले उस गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक रुद्रलोकमें पूजित होते हैं। नराधिप! उस तीर्थमें जो मानव प्राणका |