मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* अध्याय २९१ * ८५१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यम उवाच<br>तुष्टोऽस्मि ते विशालाक्षि वचनैर्धर्मसङ्गतैः।<br>विना सत्यवतः प्राणाद् वरं वरय मा चिरम्॥ १२ | यमराज बोले— विशालाक्षि! तुम्हारे इन धर्मयुक्त वचनोंसे मैं प्रसन्न हूँ, अतः सत्यवान्के प्राणोंके अतिरिक्त दूसरा वर माँग लो, देर न करो॥ १२॥ |
| सावित्र्युवाच<br>सहोदराणां भ्रातॄणां कामयामि शतं विभो।<br>अनपत्यः पिता प्रीतिं पुत्रलाभात् प्रयातु मे॥ १३ | सावित्रीने कहा— विभो! मैं सौ सहोदर भाइयोंकी अभिलाषिणी हूँ। मेरे पिता पुत्रहीन हैं, अतः वे पुत्रलाभसे प्रसन्न हों। |
| तामुवाच यमो गच्छ यथागतमनिन्दिते।<br>और्ध्वदेहिककार्येषु यत्नं भर्तुः समाचर॥ १४ | तब यमराजने सावित्रीसे कहा—‘अनिन्दिते! तुम जैसे आयी हो, वैसे ही लौट जाओ तथा अपने पतिके और्ध्वदैहिक क्रियाओंके लिये यत्न करो। |
| नानुगन्तुमयं शक्यस्त्वया लोकान्तरं गतः।<br>पतिव्रतासि तेन त्वं मुहूर्तं मम यास्यसि॥ १५ | अब यह दूसरे लोकमें चला गया है, अतः तुम इसके पीछे नहीं चल सकती। चूँकि तुम पतिव्रता हो, अतः दो घड़ीतक और मेरे साथ चल सकती हो। |
| गुरुशुश्रूषणाद् भद्रे तथा सत्यवता महत्।<br>पुण्यं समार्जितं येन नयाम्येनमहं स्वयम्॥ १६ | भद्रे! सत्यवान्ने गुरुजनोंकी शुश्रूषा कर महान् पुण्य अर्जित किया है, अतः मैं स्वयं इसे ले जा रहा हूँ। |
| एतावदेव कर्तव्यं पुरुषेण विजानता।<br>मातुः पितुश्च शुश्रूषा गुरोश्च वरवर्णिनि॥ १७ | सुन्दरि! विद्वान् पुरुषको माता, पिता तथा गुरुकी सेवामें सदा तत्पर रहना चाहिये। |
| तोषितं त्रयमेतच्च सदा सत्यवता वने।<br>पूजितं विजितः स्वर्गस्त्वयानेन चिरं शुभे॥ १८ | सत्यवान्ने वनमें इन तीनोंको अपनी शुश्रूषासे प्रसन्न किया है। शुभे! इसके साथ तुमने भी स्वर्गको जीत लिया है। |
| तपसा ब्रह्मचर्येण अग्निशुश्रूषया शुभे।<br>पुरुषाः स्वर्गमायान्ति गुरुशुश्रूषया तथा॥ १९ | शुभे! मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा अग्नि और गुरुकी शुश्रूषासे स्वर्गको प्राप्त करते हैं, |
| आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः।<br>नाचैतेऽप्यवमन्तव्या ब्राह्मणेन तु विशेषतः॥ २० | अतः विशेषरूपसे ब्राह्मणको आचार्य, पिता, माता तथा बड़े भाईका कभी अपमान नहीं करना चाहिये; |
| आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः।<br>माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता वै मूर्तिरात्मनः॥ २१ | क्योंकि आचार्य ब्रह्माका, पिता प्रजापतिका, माता पृथ्वीका और भाई अपना ही स्वरूप है। |
| जन्मना पितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम्।<br>न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि॥ २२ | मनुष्यके जन्मके समय माता और पिता जो कष्ट सहन करते हैं, उसका बदला सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं चुकाया जा सकता। |
| तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य तु सर्वदा।<br>तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते॥ २३ | अतः मनुष्यको माता, पिता तथा आचार्यका सर्वदा प्रिय कार्य करना चाहिये; क्योंकि इन तीनोंके संतुष्ट होनेपर सभी तपस्याएँ सम्पन्न हो जाती हैं। |
| तेषां त्रयाणां शुश्रूषा परमं तप उच्यते।<br>न च तैरननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत्॥ २४ | इन तीनोंकी शुश्रूषा परम तपस्या कही गयी है, अतः उनकी आज्ञाके बिना किसी अन्य धर्मका आचरण नहीं करना चाहिये। |
| त एव हि त्रयो लोकास्त एव त्रय आश्रमाः।<br>त एव च त्रयो वेदास्तथैवोक्तास्त्रयोऽग्नयः॥ २५ | वे ही तीनों लोक हैं, वे ही तीनों आश्रम हैं, वे ही तीनों वेद हैं तथा तीनों अग्नियाँ भी वे ही कहलाते हैं। |
| पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माता दक्षिणातः स्मृतः।<br>गुरुराहवनीयश्च साग्नित्रेता गरीयसी॥ २६ | पिता गार्हपत्याग्नि, माता दक्षिणाग्नि तथा गुरु आहवनीयाग्नि है। ये तीनों अग्नियाँ सर्वश्रेष्ठ हैं। |
| ८५२ | * मत्स्यपुराण * |
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| त्रिषु प्रमाद्यते नैषु त्रींल्लोकान् जयते गृही।<br>दीप्यमानः स्ववपुषा देववद् दिवि मोदते॥ २७<br><br>कृतेन कामेन निवर्त भद्रे<br>भविष्यतीदं सकलं त्वयोक्तम्।<br>ममोपरोधस्तव च क्लमः स्या-<br>त्तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ २८ | जो गृहस्थ इन तीनों गुरुजनोंकी सेवामें कभी असावधानी नहीं करता, वह तीनों लोकोंको जीत लेता है और अपने शरीरसे देवताओंके समान देदीप्यमान होते हुए स्वर्गमें आनन्दका अनुभव करता है। भद्रे! तुम्हारा काम पूरा हो गया, अब तुम लौट जाओ। तुम्हारे द्वारा कही हुई वे सारी बातें पूर्ण होंगी। इस प्रकार हमारे पीछे आनेसे मेरे कार्यमें विघ्न पड़ता है और तुम्हें भी कष्ट हो रहा है, इसीलिये मैं इस समय तुमसे ऐसा कह रहा हूँ॥ २३–२८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने द्वितीयवरलाभो नामैकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २११॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें द्वितीय वरका लाभ नामक दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २११॥
दो सौ बारहवाँ अध्याय
यमराज-सावित्री-संवाद तथा यमराजद्वारा सावित्रीको तृतीय वरदानकी प्राप्ति
| सावित्र्युवाच | सावित्रीने कहा— |
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| धर्मार्जने सुरश्रेष्ठ कुतो ग्लानिः क्लमस्तथा।<br>त्वत्पादमूलसेवा च परमं धर्मकारणम्॥ १<br><br>धर्मार्जनं तथा कार्यं पुरुषेण विजानता।<br>तल्लाभः सर्वलाभेभ्यो यदा देव विशिष्यते॥ २<br><br>धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रिवर्गो जन्मनः फलम्।<br>धर्महीनस्य कामार्थौ वन्ध्यासुतसमौ प्रभौ॥ ३<br><br>धर्मादर्थस्तथा कामो धर्माल्लोकद्वयं तथा।<br>धर्म एकोऽनुयात्येनं यत्र क्वचनगामिनम्॥ ४<br><br>शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति।<br>एको हि जायते जन्तुरेक एव विपद्यते॥ ५<br><br>धर्मस्तमनुयात्येको न सुहृन्न च बान्धवाः।<br>क्रिया सौभाग्यलावण्यं सर्वं धर्मेण लभ्यते॥ ६<br><br>ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रशर्वेन्दुयमार्काग्न्यनिलाम्भसाम् ।<br>वस्वश्विधनदाद्यानां ये लोकाः सर्वकामदाः॥ ७<br><br>धर्मेण तानवाप्नोति पुरुषः पुरुषान्तक।<br>मनोहराणि द्वीपानि वर्षाणि सुसुखानि च॥ ८<br><br>प्रयान्ति धर्मेण नरास्तथैव नरगण्डिकाः।<br>नन्दनादीनि मुख्यानि देवोद्यानानि यानि च॥ ९<br><br>तानि पुण्येन लक्ष्यन्ते नाकपृष्ठं तथा नरैः।<br>विमानानि विचित्राणि तथैवाप्सरसः शुभाः॥ १० | देवश्रेष्ठ! धर्मोपार्जनके कार्यमें कैसी ग्लानि और कैसा कष्ट? आपके चरणमूलकी सेवा ही परम धर्मका कारण है। देव! ज्ञानी पुरुषको सर्वदा धर्मोपार्जन करना चाहिये; क्योंकि उसका लाभ सभी लाभोंसे विशेष महत्त्वपूर्ण है। प्रभो! धर्म, अर्थ और काम—ये तीनों एक साथ संसारमें जन्म लेनेके फल हैं; क्योंकि धर्महीन पुरुषके अर्थ और काम वन्ध्याके पुत्रकी भाँति निष्फल हैं। धर्मसे अर्थ और कामकी प्राप्ति होती है तथा धर्मसे ही दोनों लोक सिद्ध होते हैं। जहाँ-कहीं भी जानेवाले प्राणीके पीछे अकेले धर्म ही जाता है। अन्य सभी वस्तुएँ शरीरके साथ ही नष्ट हो जाती हैं। प्राणी अकेला ही पैदा होता है और अकेला ही मरकर जाता है। एक धर्म ही उसके पीछे-पीछे जाता है, मित्र एवं भाई-बन्धु कोई भी साथ नहीं देता। कार्योंमें सफलता, सौभाग्य और सौन्दर्य आदि सब कुछ धर्मसे ही प्राप्त होते हैं। पुरुषान्तक! ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, शिव, चन्द्रमा, यम, सूर्य, अग्नि, वायु, वरुण, वसुगण, अश्विनीकुमार एवं कुबेर आदि देवताओंके जो सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले लोक हैं, उन सबको मनुष्य धर्मके द्वारा ही प्राप्त करता है। मनुष्य मनोहर द्वीपों एवं सुखदायी वर्षोंको धर्मके द्वारा ही प्राप्त करते हैं। देवताओंके जो नन्दनादि मुख्य उद्यान हैं, वे भी मनुष्योंको पुण्यसे ही प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार स्वर्ग, विचित्र विमान और सुन्दर अप्सराएँ पुण्यसे ही प्राप्त होती हैं॥ १–१०॥ |
* अध्याय २१२ *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| तेजसानि शरीराणि सदा पुण्यवतां फलम्।<br>राज्यं नृपतिपूजा च कामसिद्धिस्तथेप्सिता ॥ ११<br>संस्काराणि च मुख्यानि फलं पुण्यस्य दृश्यते। | पुण्यशाली मनुष्योंके तेजस्वी शरीर पुण्यके ही फल हैं। राज्यकी प्राप्ति, राजाओंद्वारा सम्मान, अभीष्ट मनोरथोंकी सिद्धि तथा मुख्य संस्कार—ये सभी पुण्यके ही फल देखे जाते हैं। |
| रुक्मवैदूर्यदण्डानि चण्डांशुसदृशानि च ॥ १२<br>चामराणि सुराध्यक्ष भवन्ति शुभकर्मणाम्। | देवाध्यक्ष! पुण्यवान् पुरुषोंके चँवर सुवर्ण तथा वैदूर्यके बने हुए डंडेवाले तथा सूर्यके समान तेजोमय होते हैं। |
| पूर्णेन्दुमण्डलाभेन रत्नांशुकविकासिना ॥ १३<br>धार्यतां याति छत्रेण नरः पुण्येन कर्मणा। | पूर्णिमाके चन्द्रमण्डलके समान कान्तिमान् एवं रत्नजटित वस्त्रसे सुशोभित छत्र मनुष्यको पुण्य कर्मसे ही प्राप्त होता है। |
| जयशङ्खस्वरौघेण सूतमागधनिःस्वनैः ॥ १४<br>वरासनं सभृङ्गारं फलं पुण्यस्य कर्मणः। | विजयकी सूचना देनेवाले शङ्ख-स्वरों तथा मागध-बन्दियोंकी माङ्गलिक ध्वनियोंके साथ अभिषेक-पात्रसहित श्रेष्ठ सिंहासनका प्राप्त होना पुण्यकर्मका ही फल है। |
| वरान्नपानं गीतं च भृत्यमाल्यानुलेपनम् ॥ १५<br>रत्नवस्त्राणि मुख्यानि फलं पुण्यस्य कर्मणः। | उत्तम अन्न, जल, गीत, अनुचर, मालाएँ, चन्दन, रत्न तथा बहुमूल्य वस्त्र—ये सब पुण्यकर्मोंके फल हैं। |
| रूपौदार्यगुणोपेताः स्त्रियश्चातिमनोहराः ॥ १६<br>वासाः प्रासादपृष्ठेषु भवन्ति शुभकर्मिणाम्। | सुन्दरता और औदार्य गुणोंसे युक्त अतिशय मनोहर स्त्रियाँ और उच्च महलोंपर निवास शुभ कर्मियोंको प्राप्त होते हैं। |
| सुवर्णकिङ्किणीमिश्रचामरापीडधारिणः ॥ १७<br>वहन्ति तुरगा देव नरं पुण्येन कर्मणा। | देव! मस्तकपर स्वर्णकी घंटियोंसे युक्त चमर धारण करनेवाले घोड़े पुण्यकर्मसे ही मनुष्यको वहन करते हैं। |
| हेमकक्षैश्च मातङ्गैश्चलत्पर्वतसंनिभैः ॥ १८<br>खेलद्भिः पादविन्यासैर्यान्ति पुण्येन कर्मणा। | चलते हुए पर्वतोंके समान, सुवर्णनिर्मित अम्बारीसे सुशोभित तथा चञ्चल पादविन्याससे युक्त हाथियोंकी सवारी पुण्यकर्मके प्रभावसे ही प्राप्त होती है। |
| सर्वकामप्रदे देव सर्वाघदुरितापहे ॥ १९<br>वहन्ति भक्तिं पुरुषः सदा पुण्येन कर्मणा। | देव! सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले एवं सभी पापोंको दूर करनेवाले स्वर्गमें पुरुष सदा पुण्यकर्मोंके प्रभावसे ही भक्ति प्राप्त करते हैं। |
| तस्य द्वाराणि यजनं तपो दानं दमः क्षमा ॥ २०<br>ब्रह्मचर्यं तथा सत्यं तीर्थानुसरणं शुभम्।<br>स्वाध्यायसेवा साधूनां सहवासः सुरार्चनम् ॥ २१<br>गुरूणां चैव शुश्रूषा ब्राह्मणानां च पूजनम्।<br>इन्द्रियाणां जयश्चैव ब्रह्मचर्यममत्सरम् ॥ २२ | उसकी प्राप्तिके उपाय हैं—यज्ञ, तप, दान, इन्द्रियनिग्रह, क्षमाशीलता, ब्रह्मचर्य, सत्य, शुभदायक तीर्थोंकी यात्रा, स्वाध्याय, सेवा, सत्पुरुषोंकी संगति, देवार्चन, गुरुजनोंकी शुश्रूषा, ब्राह्मणोंकी पूजा, इन्द्रियोंको वशमें रखना तथा मत्सररहित ब्रह्मचर्य। |
| तस्माद् धर्मः सदा कार्यो नित्यमेव विजानता।<br>न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वाकृतम् ॥ २३ | इसलिये विद्वान् पुरुषको सर्वदा धर्माचरण करना चाहिये; क्योंकि मृत्यु इसकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसने अपना कार्य पूरा किया अथवा नहीं। |
| बाल एव चरेद् धर्ममनित्यं देव जीवितम्।<br>को हि जानाति कस्याद्य मृत्युरेवा पतिष्यति ॥ २४ | देव! मनुष्यको बाल्यावस्थासे ही धर्माचरण करना चाहिये; क्योंकि यह जीवन नश्वर है। यह कौन जानता है कि आज किसकी मृत्यु हो जायगी। |
| पश्यतोऽप्यस्य लोकस्य मरणं पुरतः स्थितम्।<br>अमरस्येव चरितमत्याश्चर्यं सुरोत्तम ॥ २५ | सुरोत्तम! इस जीवके देखते हुए भी मृत्यु सामने खड़ी रहती है, फिर भी वह मृत्युरहितकी भाँति आचरण करता है—यह महान् आश्चर्य है। |
| युवत्वापेक्षया बालो वृद्धत्वापेक्षया युवा।<br>मृत्योरुत्सङ्गमारूढः स्थविरः किमपेक्षते ॥ २६ | युवककी अपेक्षा बालक और वृद्धकी अपेक्षा युवक अपनेको मृत्युसे दूर मानता है, किंतु मृत्युकी गोदमें बैठा हुआ वृद्ध किसकी अपेक्षा करता है। |
| ८५४ | * मत्स्यपुराण * |
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| तत्रापि विन्दतस्त्राणं मृत्युना तस्य का गतिः।<br>न भयं मरणं चैव प्राणिनामभयं क्वचित्।<br>तत्रापि निर्भयाः सन्तः सदा सुकृतकारिणः॥ २७<br><br>यम उवाच<br>तुष्टोऽस्मि ते विशालाक्षि वचनैर्धर्मसंगतैः।<br>विना सत्यवतः प्राणान् वरं वरय मा चिरम्॥ २८<br><br>सावित्र्युवाच<br>वरयामि त्वया दत्तं पुत्राणां शतमौरसम्।<br>अनपत्यस्य लोकेषु गतिः किल न विद्यते॥ २९<br><br>यम उवाच<br>कृतेन कामेन निवर्त भद्रे<br>भविष्यतीदं सफलं यथोक्तम्।<br>ममोपरोधस्तव च क्लमः स्यात्<br>तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ ३० | इतनेपर भी जो मृत्युसे रक्षाके उपाय सोचते हैं, उनकी क्या गति होगी? प्राणधारियोंको इस जगत्में केवल मृत्युसे भय ही नहीं है, उनके लिये कहीं अभयस्थान भी नहीं है। तथापि पुण्यवान् सत्पुरुष सर्वदा निर्भय होकर संसारमें जीवित रहते हैं॥ १९–२७॥<br><br>यमराज बोले— विशालाक्षि! तुम्हारी इन धर्मयुक्त बातोंसे मैं विशेष संतुष्ट हूँ, अतः तुम सत्यवान्के प्राणोंके अतिरिक्त अन्य वर माँग लो, देर मत करो॥ २८॥<br><br>सावित्रीने कहा— देव! मैं आपसे अपनी कोखसे उत्पन्न होनेवाले सौ पुत्रोंका वरदान माँगती हूँ; क्योंकि लोकोंमें पुत्रहीनकी सद्गति नहीं होती॥ २९॥<br><br>यमराज बोले— भद्रे! अब तुम शेष अभीष्ट कामनाको छोड़कर लौट जाओ, तुम्हारी यह याचना भी सफल होगी। इस प्रकार तुम्हारे अनुगमनसे मेरे कार्योंमें विघ्न होगा और तुम्हें भी कष्ट होगा, इसीलिये मैं तुमसे इस समय ऐसा कह रहा हूँ॥ ३०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने तृतीयवरलाभो नाम द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें तृतीय वर-लाभ नामक दो सौ बारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१२॥
दो सौ तेरहवाँ अध्याय
सावित्रीकी विजय और सत्यवान्की बन्धन-मुक्ति
| सावित्र्युवाच<br>धर्माधर्मविधानज्ञ सर्वधर्मप्रवर्तक।<br>त्वमेव जगतो नाथः प्रजासंयमनो यमः॥ १<br>कर्मणामनुरूपेण यस्माद् यमयसे प्रजाः।<br>तस्माद् वै प्रोच्यसे देव यम इत्येव नामतः॥ २<br>धर्मेणेमाः प्रजाः सर्वा यस्माद् रञ्जयसे प्रभो।<br>तस्मात् ते धर्मराजेति नाम सद्भिर्निगद्यते॥ ३<br>सुकृतं दुष्कृतं चोभे पुरोधाय यदा जनाः।<br>त्वत्सकाशं मृता यान्ति तस्मात् त्वं मृत्युरुच्यते॥ ४<br>कालं कलार्धं कलयन् सर्वेषां त्वं हि तिष्ठसि।<br>तस्मात् कालेति ते नाम प्रोच्यते तत्त्वदर्शिभिः॥ ५<br>सर्वेषामेव भूतानां यस्मादन्तकरो महान्।<br>तस्मात् त्वमन्तकः प्रोक्तः सर्वदेवैर्महाद्युते॥ ६ | सावित्रीने कहा— धर्म-अधर्मके विधानको जाननेवाले एवं सभी धर्मोंके प्रवर्तक देव! आप ही जगत्के स्वामी तथा प्रजाओंका नियमन करनेवाले यम हैं। देव! चूँकि आप कर्मोंके अनुरूप प्रजाओंका नियमन करते हैं, इसलिये 'यम' नामसे पुकारे जाते हैं। प्रभो! चूँकि आप धर्मपूर्वक इस सारी प्रजाको आनन्दित करते हैं, इसीलिये सत्पुरुष आपको धर्मराज नामसे पुकारते हैं। लोग मरनेपर अपने सत्-असत्—दोनों प्रकारके कर्मोंको अपने आगे रखकर आपके समीप जाते हैं, इसलिये आप मृत्यु कहलाते हैं। आप सभी प्राणियोंके क्षण, कला आदिसे कालकी गणना करते रहते हैं, इसीलिये तत्त्वदर्शी लोग आपको 'काल' नामसे पुकारते हैं। महादीप्तिसम्पन्न! चूँकि आप संसारके सभी चराचर जीवोंके महान् अन्तकर्ता हैं, इसीलिये आप सभी देवताओंकेद्वारा 'अन्तक' कहे जाते हैं। |
- अध्याय २१३ * ८५५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विवस्वतस्त्वं तनयः प्रथमं परिकीर्तितः।<br>तस्माद् वैवस्वतो नाम्ना सर्वलोकेषु कथ्यसे ॥ ७<br>आयुष्ये कर्मणि क्षीणे गृह्णासि प्रसभं जनम्।<br>तदा त्वं कथ्यसे लोके सर्वप्राणहरेति वै ॥ ८<br>तव प्रसादाद् देवेश त्रयीधर्मो न नश्यति।<br>तव प्रसादाद् देवेश धर्मे तिष्ठन्ति जन्तवः।<br>तव प्रसादाद् देवेश संकरो न प्रजायते ॥ ९<br>सतां सदा गतिर्देव त्वमेव परिकीर्तितः।<br>जगतोऽस्य जगन्नाथ मर्यादापरिपालकः ॥ १०<br>पाहि मां त्रिदशश्रेष्ठ दुःखितां शरणागताम्।<br>पितरौ च तथैवास्य राजपुत्रस्य दुःखितौ ॥ ११ | आप विवस्वान्के प्रथम पुत्र कहे गये हैं, अतः सम्पूर्ण विश्वमें वैवस्वत नामसे कहे जाते हैं। आयुकर्मके क्षीण हो जानेपर आप लोगोंको हठात् पकड़ लेते हैं, इसी कारण लोकमें सर्वप्राणहर नामसे कहे जाते हैं। देवेश! आपकी कृपासे ऋक्, साम और यजुः—इन तीनों वेदोंद्वारा प्रतिपादित धर्मका विनाश नहीं होता। देवेश! आपकी महिमासे सभी प्राणी अपने-अपने धर्मोंमें स्थित रहते हैं। देवेश! आपकी सत्कृपासे वर्णसंकर संततिकी उत्पत्ति नहीं होती। देव! आप ही सदा सत्पुरुषोंकी गति बतलाये गये हैं। जगन्नाथ! आप इस जगत्की मर्यादाका पालन करनेवाले हैं। देवताओंमें श्रेष्ठ! अपनी शरणमें आयी हुई मुझ दुखियाकी रक्षा कीजिये। इस राजपुत्रके माता-पिता भी दुःखी हैं॥१—११॥ |
| यम उवाच<br>स्तवेन भक्त्या धर्मज्ञे मया तुष्टेन सत्यवान्।<br>तव भर्त्ता विमुक्तोऽयं लब्धकामा व्रजाबले ॥ १२<br>राज्यं कृत्वा त्वया सार्धं वर्षाणां शतपञ्चकम्।<br>नाकपृष्ठमथारुह्य त्रिदशैः सह रंस्यते ॥ १३<br>त्वयि पुत्रशतं चापि सत्यवान् जनयिष्यति।<br>ते चापि सर्वे राजानः क्षत्रियास्त्रिदशोपमाः ॥ १४<br>मुख्यास्त्वन्नाम पुत्रस्ते भविष्यन्ति हि शाश्वताः।<br>पितुश्च ते पुत्रशतं भविता तव मातरि ॥ १५<br>मालव्यां मालवा नाम शाश्वताः पुत्रपौत्रिणः।<br>भ्रातरस्ते भविष्यन्ति क्षत्रियास्त्रिदशोपमाः ॥ १६<br>स्तोत्रेणानेन धर्मज्ञे कल्पमुत्थाय यस्तु माम्।<br>कीर्तयिष्यति तस्यापि दीर्घमायुर्भविष्यति ॥ १७ | यमराज बोले—धर्मज्ञे! तुम्हारी स्तुति तथा भक्तिसे संतुष्ट होकर मैंने तुम्हारे पति इस सत्यवान्को विमुक्त कर दिया है। अबले! अब तुम सफलमनोरथ होकर लौट जाओ। यह सत्यवान् तुम्हारे साथ पाँच सौ वर्षोंतक राज्यसुख भोगकर अन्तकालमें स्वर्गलोकमें जायगा और देवताओंके साथ विहार करेगा। सत्यवान् तुम्हारे गर्भसे सौ पुत्रोंको भी उत्पन्न करेगा, वे सब-के-सब देवताओंके समान तेजस्वी तथा क्षत्रिय राजा होंगे। वे चिरकालतक जीवित रहते हुए तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होंगे। तुम्हारे पिताको भी तुम्हारी माताके गर्भसे सौ पुत्र उत्पन्न होंगे। वे तुम्हारे भाई मालवा (मध्यदेश)-में उत्पन्न होनेके कारण मालव नामसे विख्यात होंगे और चिरकालतक जीवित रहते हुए पुत्र-पौत्रादिसे युक्त होंगे तथा देवताओंके समान ऐश्वर्यसम्पन्न एवं क्षत्रियोचित गुणोंका पालन करेंगे। धर्मज्ञे! जो कोई पुरुष प्रातःकाल उठकर इस स्तोत्रद्वारा मेरा स्तवन करेगा, उसकी भी आयु दीर्घ होगी ॥ १२—१७ ॥ |
| मत्स्य उवाच<br>एतावदुक्त्वा भगवान् यमस्तु<br>प्रमुच्य तं राजसुतं महात्मा।<br>अदर्शनं तत्र यमो जगाम<br>कालेन सार्धं सह मृत्युना च ॥ १८ | मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! इतनी बातें कहकर ऐश्वर्यशाली महात्मा यमराज उस राजपुत्र सत्यवान्को छोड़कर काल तथा मृत्युके साथ वहीं अदृश्य हो गये॥१८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने यमस्तुतिसत्यवज्जीवितलाभो नाम त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें यमस्तुति और सत्यवान्का जीवन-लाभ नामक दो सौ तेरहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २१३ ॥
२१६- राजकर्मचारियोंके धर्मका वर्णन
८५६ | * मत्स्यपुराण *
दो सौ चौदहवाँ अध्याय
सत्यवान्को जीवनलाभ तथा पत्नीसहित राजाको नेत्रज्योति एवं राज्यकी प्राप्ति
| मत्स्य उवाच | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**तदनन्तर पतिव्रता सुन्दरी सावित्री वहाँसे जिस मार्गसे गयी थी, उसी मार्गसे लौटकर उस स्थानपर आयी, जहाँ सत्यवान्का मृत शरीर पड़ा हुआ था। तब कृशाङ्गी सावित्री पतिके निकट जाकर उसके सिरको अपनी गोदमें रखकर पूर्ववत् बैठ गयी। उस समय भगवान् भास्कर अस्ताचलको जा रहे थे। नरेश्वर! धर्मराजसे मुक्त हुए सत्यवान्ने भी धीरे-धीरे आँखें खोली और अँगड़ाई ली। तत्पश्चात् प्राणोंके लौट आनेपर उसने अपनी स्त्री सावित्रीसे इस प्रकार कहा—'वह पुरुष कहाँ चला गया, जो मुझे खींचकर लिये जा रहा था। सुन्दरि! मैं नहीं जानता कि वह पुरुष कौन था! सर्वाङ्गसुन्दरि! इस वनमें सोते हुए मेरा पूरा दिन बीत गया और शुभे! तुम भी उपवाससे परिश्रान्त एवं दुःखी हुई तथा मुझ-जैसे दुष्टसे आज माता-पिताको भी दुःख भोगना पड़ा। सुन्दर भौंहोंवाली! मैं उन्हें देखना चाहता हूँ, चलो, जल्दी चलो'॥ १—६॥ | | सावित्री तु ततः साध्वी जगाम् वरवर्णिनी।<br>पथा यथागतेनैव यत्रासीत् सत्यवान् मृतः॥ १<br>सा समासाद्य भर्तारं तस्योत्सङ्गतं शिरः।<br>कृत्वा विवेश तन्वङ्गी लम्बमाने दिवाकरे॥ २<br>सत्यवानपि निर्मुक्तो धर्मराजाच्छनैः शनैः।<br>उन्मीलयत नेत्राभ्यां प्रास्फुरच्च नराधिप॥ ३<br>ततः प्रत्यागतप्राणः प्रियां वचनमब्रवीत्।<br>क्वासौ प्रयातः पुरुषो यो मामप्यपकर्षति॥ ४<br>न जानामि वरारोहे कश्चासौ पुरुषः शुभे।<br>वनेऽस्मिंश्चारुसर्वाङ्गि सुप्तस्य च दिनं गतम्॥ ५<br>उपवासपरिश्रान्ता दुःखिता भवती मया।<br>अस्मद्धृतेनाद्य पितरौ दुःखितौ तथा।<br>द्रष्टुमिच्छाम्यहं सुभ्रु गमने त्वरिता भव॥ ६ | | | सावित्र्युवाच | **सावित्री बोली—**प्रभो! सूर्य तो अस्त हो गये। पर यदि आपको पसंद हो तो हमलोग आश्रमको लौट चलें; क्योंकि मेरे सास-श्वशुर अंधे हैं। मैं वहीं आश्रममें यह सब घटित हुआ वृत्तान्त आपको बतलाऊँगी। सावित्री उस समय पतिसे ऐसा कहकर पतिके साथ ही चल पड़ी और वह राजकुमारी पतिके साथ आश्रमपर आ पहुँची। भार्गव! इसी समय पत्नीसहित द्युमत्सेनको नेत्र-ज्योति प्राप्त हो गयी। वे अपने प्रिय पुत्र और दुबली-पतली पुत्रवधूको न देखकर दुःखी हो रहे थे। उस समय तपस्वी ऋषि राजाको सान्त्वना दे रहे थे। इतनेमें ही उन्होंने पुत्रवधूके साथ पुत्रको वनसे आते हुए देखा। उस समय सुन्दरी सावित्रीने सत्यवान्के साथ सपत्नीक क्षत्रियश्रेष्ठ राजा द्युमत्सेनको प्रणाम किया। पिताने राजकुमार सत्यवान्को गले लगाया। तब सभी धर्मोंको जाननेवाले सत्यवान्ने उस वनमें निवास करनेवाले तपस्वियोंको अभिवादनकर रातमें ऋषियोंके साथ वहीं निवास किया। उस समय अनिन्दितचरित्रा सावित्रीने जैसी घटना घटित हुई थी, | | आदित्योऽस्तमनुप्राप्तो यदि ते रुचितं प्रभो।<br>आश्रमं तु प्रयास्यावः श्वशुरौ हीनचक्षुषौ॥ ७<br>यथावृत्तं च तत्रैव तव वक्ष्ये यथाश्रमे।<br>एतावदुक्त्वा भर्तारं सह भर्त्रा तदा ययौ॥ ८<br>आससादाश्रमं चैव सह भर्त्रा नृपात्मजा।<br>एतस्मिन्नेव काले तु लब्धचक्षुर्महीपतिः॥ ९<br>द्युमत्सेनः सभार्यस्तु पर्यतप्यत भार्गव।<br>प्रियं पुत्रमपश्यन् वै स्नुषां चैवाथ कर्शिताम्॥ १०<br>आश्वास्यमानस्तु तथा स तु राजा तपोधनैः।<br>ददर्श पुत्रमायान्तं स्नुषया सह काननात्॥ ११<br>सावित्री तु वरारोहा सह सत्यवता तदा।<br>ववन्दे तत्र राजानं सभार्यं क्षत्रपुङ्गवम्॥ १२<br>परिष्वक्तस्तदा पित्रा सत्यवान् राजनन्दनः।<br>अभिवाद्य ततः सर्वान् वने तस्मिंस्तपोधनान्॥ १३<br>उवास तत्र तां रात्रिमृषिभिः सर्वधर्मवित्।<br>सावित्र्यपि जगादाथ यथावृत्तमनिन्दिता॥ १४ | |
| * अध्याय २१५ * | ८५७ |
|---|
| व्रतं समापयामास तस्यामेव तदा निशि।<br>ततस्तूर्यैस्त्रियामान्ते ससैन्यस्तस्य भूपतेः॥ १५<br>आजगाम जनः सर्वो राज्यार्थाय निमन्त्रणे।<br>विज्ञापयामास तदा तत्र प्रकृतिशासनम्॥ १६<br>विचक्षुषस्ते नृपते येन राज्यं पुरा हृतम्।<br>अमात्यैः स हतो राजा भवांस्तस्मिन् पुरे नृपः॥ १७<br>एतच्छ्रुत्वा ययौ राजा बलेन चतुरङ्गिणा।<br>लेभे च सकलं राज्यं धर्मराजान्महात्मनः॥ १८<br>भ्रातृणां तु शतं लेभे सावित्र्यपि वराङ्गना।<br>एवं पतिव्रता साध्वी पितृपक्षं नृपात्मजा॥ १९<br>उज्जहार वरारोहा भर्तृपक्षं तथैव च।<br>मोक्षयामास भर्तारं मृत्युपाशवशं गतम्॥ २०<br>तस्मात् साध्व्यः स्त्रियः पूज्याः सततं देववन्नरैः।<br>तासां राजन् प्रसादेन धार्यते वै जगत्त्रयम्॥ २१<br>तासां तु वाक्यं भवतीह मिथ्या<br> न जातु लोकेषु चराचरेषु।<br>तस्मात् सदा ताः परिपूजनीयाः<br> कामान् समग्रानभिकामयानैः॥ २२<br>यश्चेदं शृणुयान्नित्यं सावित्र्याख्यानमुत्तमम्।<br>स सुखी सर्वसिद्धार्थो न दुःखं प्राप्नुयान्नरः॥ २३ | उसका वर्णन किया और उसी रातमें अपने व्रतको भी समाप्त किया। तदनन्तर तीन पहर बीत चुकनेपर राजाकी सारी प्रजा सेनासहित तुरही आदि बाजोंको बजाते हुए राजाको पुनः राज्य करनेके लिये निमन्त्रण देने आयी और यह सूचना दी कि राज्यमें आपका शासन अब पूर्ववत् हो। राजन्! नेत्रहीन होनेके कारण जिस राजाने आपके राज्यको छीन लिया था, वह राजा मन्त्रियोंद्वारा मार डाला गया। अब उस नगरमें आप ही राजा हैं। यह सुनकर राजा चतुरंगिणी सेनाके साथ वहाँ गये और महात्मा धर्मराजकी कृपासे पुनः अपने सम्पूर्ण राज्यको प्राप्त किये। सुन्दरी सावित्रीने भी सौ भाइयोंको प्राप्त किया। इस प्रकार साध्वी पतिव्रता सुन्दरी राजकुमारी सावित्रीने अपने पितृपक्ष तथा पतिपक्ष—दोनोंका उद्धार किया और मृत्युके पाशमें बँधे हुए अपने पतिको मुक्त किया॥ ७—२०॥<br><br>राजन्! इसलिये मनुष्योंको सदा साध्वी स्त्रियोंकी देवताओंके समान पूजा करनी चाहिये; क्योंकि उनकी कृपासे ये तीनों लोक स्थित हैं। उन पतिव्रता स्त्रियोंके वाक्य इस चराचर जगत्में कभी भी मिथ्या नहीं होते, इसलिये सभी मनोरथोंकी कामना करनेवालोंको सर्वदा इनकी पूजा करनी चाहिये। जो मनुष्य सावित्रीके इस सर्वोत्तम आख्यानको नित्य सुनता है, वह सभी प्रयोजनोंमें सफलता प्राप्तकर सुखका अनुभव करता है और कभी भी दुःखका भागी नहीं होता॥ २१—२३॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्यानसमाप्तिर्नाम चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सावित्री-उपाख्यान-समाप्ति नामक दो सौ चौदहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१४॥
दो सौ पंद्रहवाँ अध्याय *
राजाका कर्तव्य, राजकर्मचारियोंके लक्षण तथा राजधर्मका निरूपण
| मनुरुवाच<br>राज्ञोऽभिषिक्तमात्रस्य किं नु कृत्यतमं भवेत्।<br>एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सम्यग्वेत्ति यतो भवान्॥ १<br>मत्स्य उवाच<br>अभिषेकार्द्रशिरसा राज्ञा राज्यावलोकिना।<br>सहायवरणं कार्यं तत्र राज्यं प्रतिष्ठितम्॥ २ | मनुने पूछा— भगवन्! अभिषेक होनेके बाद राजाको तुरंत कौन-सा कर्म करना आवश्यक है? वह सब मुझे बताइये; क्योंकि आप इसे अच्छी तरह जानते हैं॥ १॥<br>मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! राज्यकी रक्षा करनेवाले राजाको चाहिये कि वह अभिषेकके जलसे सिरके भीगते ही सहायकों (मन्त्रियों)-की नियुक्ति करे; क्योंकि राज्य उन्हींपर प्रतिष्ठित रहता है। |
* चण्डेश्वरादिके 'राजनीतिरत्नाकर' आदि संग्रह बड़े श्रेष्ठ हैं। वे रामायण, महाभारत तथा पुराणादिसे ही संगृहीत हैं। उनमें भी मत्स्यपुराणोक्त इस राजनीतिप्रकरणका स्थान श्रेष्ठतर है, अतः यह अंश आजके राजनेताओंके लिये विशेष मननीय है।
८५८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यदप्यल्पतरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम्।<br>पुरुषेणासहायेन किमु राज्यं महोदयम्॥ ३<br>तस्मात् सहायान् वरयेत् कुलीनान् नृपतिः स्वयं।<br>शूरान् कुलीनजातीयान् बलयुक्ताञ्छ्रियान्वितान्॥ ४<br>रूपसत्त्वगुणोपेतान् सजनान् क्षमयान्वितान्।<br>क्लेशक्षमान् महोत्साहान् धर्मज्ञांश्च प्रियंवदान्॥ ५<br>हितोपदेशकालज्ञान् स्वामिभक्तान् यशोऽर्थिनः।<br>एवंविधान् सहायांश्च शुभकर्मसु योजयेत्॥ ६<br>गुणहीनानपि तथा विज्ञाय नृपतिः स्वयं।<br>कर्मस्वेव नियुञ्जीत यथायोग्येषु भागशः॥ ७<br>कुलीनः शीलसम्पन्नो धनुर्वेदविशारदः।<br>हस्तिशिक्षाश्वशिक्षासु कुशलः श्लक्ष्णभाषितः॥ ८<br>निमित्ते शकुनज्ञाने वेत्ता चैव चिकित्सिते।<br>कृतज्ञः कर्मणां शूरस्तथा क्लेशसहस्त्वृजुः॥ ९<br>व्यूहतत्त्वविधानज्ञः फल्गुसारविशेषवित्।<br>राज्ञा सेनापतिः कार्यो ब्राह्मणः क्षत्रियोऽथवा॥ १० | जो छोटे-से-छोटा भी कार्य होता है, वह भी सहायकरहित अकेले व्यक्तिके लिये दुष्कर होता है, फिर राज्य-जैसे महान् उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यके लिये तो कहना ही क्या है? इसलिये राजाको चाहिये कि जो उत्तम कुलमें उत्पन्न, शूर, उच्च जातिमें उत्पन्न, बलवान्, श्रीसम्पन्न, रूपवान्, सत्त्वगुणसे युक्त, सज्जन, क्षमाशील, कष्टसहिष्णु, महोत्साही, धर्मज्ञ, प्रियभाषी, हितोपदेशके कालका ज्ञाता, स्वामिभक्त तथा यशके अभिलाषी हों, ऐसे सहायकोंका स्वयं वरण करके उन्हें माङ्गलिक कर्मोंमें नियुक्त करे। उसी प्रकार स्वयं राजाको कुछ गुणहीन सहायकोंको भी जान-बूझकर उन्हें यथायोग्य कार्योंमें विभागपूर्वक नियुक्त करना चाहिये। राजाको उत्तम कुलोत्पन्न, शीलवान्, धनुर्वेदमें प्रवीण, हाथी और अश्वकी शिक्षामें कुशल, मृदुभाषी, शकुन और अन्यान्य शुभाशुभ कारणों तथा ओषधियोंको जाननेवाला, कृतज्ञ, शूरतामें प्रवीण, कष्टसहिष्णु, सरल, व्यूह-रचनाके विधानको जाननेवाला, निस्तत्त्व एवं सारतत्त्वका विशेषज्ञ, ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय पुरुषको सेनापति-पदपर नियुक्त करना चाहिये॥ २-१०॥ |
| प्रांशुः सुरूपो दक्षश्च प्रियवादी न चोद्धतः।<br>चित्तग्राहश्च सर्वेषां प्रतीहारो विधीयते॥ ११ | ऊँचे कदवाला, सौन्दर्यशाली, कार्यकुशल, प्रियवक्ता, गम्भीर तथा सबके चित्तको आकर्षित करनेवालेको प्रतिहारी बनानेका विधान है। |
| यथोक्तवादी दूतः स्याद् देशभाषाविशारदः।<br>शक्तः क्लेशसहो वाग्मी देशकालविभागवित्॥ १२<br>विज्ञातदेशकालश्च दूतः स स्यान्महीक्षितः।<br>वक्ता नयस्य यः काले स दूतो नृपतेर्भवेत्॥ १३ | जो सत्यवादी, देशी भाषामें प्रवीण, सामर्थ्यशाली, सहिष्णु, वक्ता, देश-कालके विभागको जाननेवाला, देश-कालका जानकार तथा मौकेपर नीतिकी बातें कहनेवाला हो, वह राजाका दूत हो सकता है। |
| प्रांशवो व्यायताः शूरा दृढभक्ता निराकुलाः।<br>राज्ञा तु रक्षिणः कार्याः सदा क्लेशसहा हिताः॥ १४ | जो लम्बे कदवाले, कम सोनेवाले, शूर, दृढ़ भक्ति रखनेवाले, धैर्यवान्, कष्टसहिष्णु और हितैषी हों, ऐसे पुरुषोंको राजाद्वारा अङ्गरक्षकके कार्यमें नियुक्त किया जाना चाहिये। |
| अनाहार्योऽनृशंसश्च दृढभक्तिश्च पार्थिवे।<br>ताम्बूलधारी भवति नारी वाप्यथ तद्गुणा॥ १५ | जो दूसरोंद्वारा बहकाया न जा सके, दुष्ट स्वभावका न हो, राजामें अगाध भक्ति रखता हो—ऐसा पुरुष ताम्बूलधारी हो सकता है, अथवा ऐसे गुणवाली स्त्री भी नियुक्त की जा सकती है। |
| षाड्गुण्यविधितत्त्वज्ञो देशभाषाविशारदः।<br>सांधिविग्रहिकः कार्यो राज्ञा नयविशारदः॥ १६ | राजाको नीति शास्त्रके छः गुणोंके तत्त्वोंको जाननेवाले, देशी भाषामें प्रवीण एवं नीतिनिपुणको सन्धि-विग्राहिक बनाना चाहिये। |
| कृताकृतज्ञो भृत्यानां ज्ञेयः स्याद् देशरक्षिता।<br>आयव्ययज्ञो लोकज्ञो देशोत्पत्तिविशारदः॥ १७ | भृत्योंके कृत-अकृत कार्योंको जाननेवाले, आय-व्ययके ज्ञाता, लोकका जानकार और देशोत्पत्तिमें निपुण पुरुषको देशरक्षक बनाना चाहिये। |
२१७- दुर्ग-निर्माणकी विधि तथा राजाद्वारा दुर्गमें संग्रहणीय उपकरणोंका विवरण
* अध्याय २१५ * ८५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सुरूपस्तरुणः प्रांशुर्दृढभक्तिः कुलोचितः।<br>शूरः क्लेशसहश्चैव खड्गधारी प्रकीर्त्तितः॥ १८<br><br>शूरश्च बलयुक्तश्च गजाश्वरथकोविदः।<br>धनुर्धारी भवेद् राज्ञः सर्वक्लेशसहः शुचिः॥ १९<br><br>निमित्तशकुनज्ञानी हयशिक्षाविशारदः।<br>हयायुर्वेदतत्त्वज्ञो भुवो भागविचक्षणः॥ २०<br><br>बलाबलज्ञो रथिनः स्थिरदृष्टिः प्रियंवदः।<br>शूरश्च कृतविद्यश्च सारथिः परिकीर्तितः॥ २१ | सुन्दर आकृतिवाले, लम्बे कदवाले, राज्यभक्त, कुलीन, शूर-वीर तथा कष्टसहिष्णुको खड्गधारी बनाना चाहिये। शूर, बलवान्, हाथी, घोड़े और रथकी विशेषताको जाननेवाला, सभी प्रकारके क्लेशोंको सहन करनेमें समर्थ तथा पवित्र व्यक्ति राजाका धनुर्धारी हो सकता है। शुभाशुभ शकुनको जाननेवाला, अश्वशिक्षामें विशारद, अश्वोंके आयुर्वेदविज्ञानको जाननेवाला, पृथ्वीके समस्त भागोंका ज्ञाता, रथियोंके बलाबलका पारखी, स्थिरदृष्टि, प्रियभाषी, शूर-वीर तथा विद्वान् पुरुष सारथिके योग्य कहा गया है॥ १९-२१॥ |
| अनाहार्यः शुचिर्दक्षश्चिकित्सितविदां वरः।<br>सूपशास्त्रविशेषज्ञः सूदाध्यक्षः प्रशस्यते॥ २२<br><br>सूदशास्त्रविधानज्ञाः पराभेद्याः कुलोद्गताः।<br>सर्वे महानसे धार्याः कृत्तकेशनखा नराः॥ २३<br><br>समः शत्रौ च मित्रे च धर्मशास्त्रविशारदः।<br>विप्रमुख्यः कुलीनश्च धर्माधिकरणो भवेत्॥ २४<br><br>कार्यास्तथाविधास्तत्र द्विजमुख्याः सभासदः।<br>सर्वदेशाक्षराभिज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः॥ २५<br><br>लेखकः कथितो राज्ञः सर्वाधिकरणेषु वै।<br>शीर्षोपेतान् सुसम्पूर्णान् समश्रेणिगतान् समान्॥ २६<br><br>अक्षरान् वै लिखेद् यस्तु लेखकः स वरः स्मृतः।<br>उपायवाक्यकुशलः सर्वशास्त्रविशारदः॥ २७<br><br>बह्वर्थवक्ता चाल्पेन लेखकः स्यान्नृपोत्तम।<br>वाक्याभिप्रायतत्त्वज्ञो देशकालविभागवित्॥ २८<br><br>अनाहार्यो भवेत्सक्तो लेखकः स्यान्नृपोत्तम।<br>पुरुषान्तरतत्त्वज्ञाः प्रांशवश्चाप्यलोलुपाः॥ २९<br><br>धर्माधिकारिणः कार्या जना दानकरा नराः।<br>एवंविधास्तथा कार्या राज्ञा दौवारिका जनाः॥ ३०<br><br>लोहवस्त्राजिनादीनां रत्नानां च विधानवित्।<br>विज्ञाता फल्गुसाराणामनाहार्यः शुचिः सदा॥ ३१<br><br>निपुणश्चाप्रमत्तश्च धनाध्यक्षः प्रकीर्तितः॥ ३२ | दूसरोंके बहकावेमें न आनेवाले, पवित्र, प्रवीण, ओषधियोंके गुण-दोषोंको जाननेवालोंमें श्रेष्ठ, भोजनकी विशेषताओंके जानकारको उत्तम भोजनाध्यक्ष कहा जाता है। जो भोजनशास्त्रके विधानोंमें कुशल, वंश-परम्परासे चले आनेवाले, दूसरोंद्वारा अभेद्य तथा कटे हुए नख-केशवाले हों, ऐसे सभी पुरुषोंको चौकेमें नियुक्त करना चाहिये। शत्रु और मित्रमें समताका व्यवहार करनेवाले, धर्मशास्त्रमें विशारद, कुलीन श्रेष्ठ ब्राह्मणको धर्माध्यक्षका पद सौंपना चाहिये। ऊपर कही हुई विशेषताओंसे युक्त ब्राह्मणोंको सभासद् नियुक्त करना चाहिये। जो सभी देशोंकी भाषाओंका ज्ञाता तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पटु हो, ऐसा व्यक्ति सभी विभागोंमें राजाका लेखक कहा गया है। जो ऊपरकी शिरोरेखासे पूर्ण, पूर्ण अवयववाले, समश्रेणीमें प्राप्त एवं समान आकृतिवाले अक्षरोंको लिखता है, वह अच्छा लेखक कहा जाता है। नृपश्रेष्ठ! जो उपाययुक्त वाक्योंमें प्रवीण, सम्पूर्ण शास्त्रोंमें विशारद तथा थोड़े शब्दोंमें अधिक प्रयोजनकी बात कहनेकी क्षमता रखता हो, उसे लेखक बनाना चाहिये। नृपोत्तम! जो वाक्योंके अभिप्रायको जाननेवाला, देश-कालके विभागका ज्ञाता तथा अभेदज्ञ यानी भेद न करनेवाला हो, उसे लेखक बनाना चाहिये। मनुष्योंके हृदयकी बातों तथा भावोंको परखनेवाले, दीर्घकाय, निर्लोभ एवं दानशील व्यक्तियोंको धर्माधिकारी बनाना चाहिये तथा राजाद्वारा इसी प्रकारके लोगोंको द्वारपालका पद भी सौंपा जाना चाहिये। लोह, वस्त्र, मृग-चर्मादि तथा रत्नोंकी परख करनेवाला, अच्छी-बुरी वस्तुओंका जानकार, दूसरोंके बहकावेमें न आनेवाला, पवित्र, निपुण एवं सावधान व्यक्तिको धनाध्यक्ष बनाना चाहिये॥ २२-३२॥ |
| आयद्वारेषु सर्वेषु धनाध्यक्षसमा नराः।<br>व्ययद्वारेषु च तथा कर्तव्याः पृथिवीक्षिता॥ ३३ | राजाद्वारा आय तथा व्ययके सभी स्थानोंपर धनाध्यक्षके समान गुणवाले पुरुषोंको नियुक्त करना चाहिये। जो |
८६० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| परम्परागतो यः स्यादष्टाङ्गे सुचिकित्सिते ।<br>अनाहार्यः स वैद्यः स्याद् धर्मात्मा च कुलोद्गतः ॥ ३४<br>प्राणाचार्यः स विज्ञेयो वचनं तस्य भूभुजा ।<br>राजन् राज्ञा सदा कार्यं यथा कार्यं पृथग्जनैः ॥ ३५<br>हस्तिशिक्षाविधानज्ञो वनजातिविशारदः ।<br>क्लेशक्षमस्तथा राज्ञो गजाध्यक्षः प्रशस्यते ॥ ३६<br>एतैरेव गुणैर्युक्तः स्थविरश्च विशेषतः ।<br>गजारोही नरेन्द्रस्य सर्वकर्मसु शस्यते ॥ ३७<br>हयशिक्षाविधानज्ञश्चिकित्सितविशारदः ।<br>अश्वाध्यक्षो महीभर्तुः स्वासनश्च प्रशस्यते ॥ ३८<br>अनाहार्यश्च शूरश्च तथा प्राज्ञः कुलोद्गतः ।<br>दुर्गाध्यक्षः स्मृतो राज्ञ उद्युक्तः सर्वकर्मसु ॥ ३९<br>वास्तुविद्याविधानज्ञो लघुहस्तो जितश्रमः ।<br>दीर्घदर्शी च शूरश्च स्थपतिः परिकीर्तितः ॥ ४०<br>यन्त्रमुक्ते पाणिमुक्ते विमुक्ते मुक्तधारिते ।<br>अस्त्राचार्यो निरुद्वेगः कुशलश्च विशिष्यते ॥ ४१<br>वृद्धः कुलोद्गतः सूक्तः पितृपैतामहः शुचिः ।<br>राज्ञामन्तःपुराध्यक्षो विनीतश्च तथेष्यते ॥ ४२ | वंशपरम्परासे आनेवाला, आठों अङ्गोंकी चिकित्साको अच्छी तरह जाननेवाला, स्वामिभक्त, धर्मात्मा एवं सत्कुलोत्पन्न हो, ऐसे व्यक्तिको वैद्य बनाना चाहिये। राजन्! उसे प्राणाचार्य जानना चाहिये और सर्वसाधारणकी भाँति उसके वचनोंका सदा पालन करना चाहिये। जो जंगली जातिवालोंके रीति-रस्मोंका ज्ञाता, हस्तिशिक्षाका विशेषज्ञ, सहिष्णुतामें समर्थ हो, ऐसा व्यक्ति राजाका श्रेष्ठ गजाध्यक्ष हो सकता है। उपर्युक्त गुणोंसे युक्त तथा अवस्थामें वृद्ध व्यक्ति राजाका गजारोही होकर सभी कार्योंमें श्रेष्ठ कहा गया है। अश्व-शिक्षाके विधानमें प्रवीण, उनकी चिकित्सामें विशारद तथा स्थिर आसनसे बैठनेवाला व्यक्ति राजाका श्रेष्ठ अश्वाध्यक्ष कहा गया है। जो स्वामि-भक्त, शूर-वीर, बुद्धिमान्, कुलीन, सभी कार्योंमें उद्यत हो, वह राजाका दुर्गाध्यक्ष कहा गया है। वास्तुविद्याके विधानमें प्रवीण, फुर्तीला, परिश्रमी, दीर्घदर्शी एवं शूर व्यक्तिको श्रेष्ठ कारीगर कहा गया है। यन्त्रमुक्त (तोप-बन्दूक) आदि, पाणिमुक्त (शक्ति आदि), विमुक्त, मुक्तधारित आदि अस्त्रोंके परिचालनकी विशेषताओंमें सुनिपुण, उद्वेगरहित व्यक्ति श्रेष्ठ अस्त्राचार्य कहा गया है। वृद्ध, सत्कुलोत्पन्न, मधुरभाषी, पिता-पितामहके समयसे उसी कार्यपर नियुक्त होनेवाले, पवित्र एवं विनीत व्यक्तिको राजाओंके अन्तःपुरके अध्यक्ष-पदपर नियुक्त करना उचित है॥ ३३—४२॥ |
| एवं सप्ताधिकारेषु पुरुषाः सप्त ते पुरे ।<br>परीक्ष्य चाधिकार्याः स्यू राज्ञा सर्वेषु कर्मसु ।<br>स्थापनाजातितत्त्वज्ञाः सततं प्रतिजागृताः ॥ ४३<br>राज्ञः स्यादायुधागारे दक्षः कर्मसु चोद्यतः ।<br>कर्माण्यपरिमेयानि राज्ञो नृपकुलोद्वह ॥ ४४<br>उत्तमाधममध्यानि बुद्ध्वा कर्माणि पार्थिवः ।<br>उत्तमाधममध्येषु पुरुषेषु नियोजयेत् ॥ ४५<br>नरकर्मविपर्यासाद्राजा नाशमवाप्नुयात् ।<br>नियोगं पौरुषं भक्तिं श्रुतं शौर्यं कुलं नयम् ॥ ४६<br>ज्ञात्वा वृत्तिर्विधातव्या पुरुषाणां महीक्षिता ।<br>पुरुषान्तरविज्ञानतत्त्वसारनिबन्धनात् ॥ ४७ | इस प्रकार राजाको इन सात अधिकार-पदोंपर सभी कार्योंमें भलीभाँति परीक्षा कर सातों व्यक्तियोंको अधिकारी बनाना चाहिये। कार्योंमें नियुक्त किये गये व्यक्तियोंको उद्योगशील, जागरूक तथा पटु होना चाहिये। राजकुलोत्पन्न! राजाओंके अस्त्रागारमें दक्ष तथा उद्यमशील व्यक्ति होना चाहिये। राजाके कार्योंकी गणना नहीं की जा सकती, अतः राजाको उत्तम, मध्यम तथा अधम कार्योंको भलीभाँति समझ-बूझकर वैसे ही उत्तम, मध्यम एवं अधम पुरुषोंको सौंपना चाहिये। सौंपे गये कार्योंमें परिवर्तन अर्थात् अधमको उत्तम और उत्तमको अधम कार्य सौंप देनेसे राजाका विनाश हो जाता है। राजाको चाहिये कि अपने पुरुषोंके निश्चय, पौरुष, भक्ति, शास्त्रज्ञान, शूरता, कुल और नीतिको जानकर उनका वेतन निश्चित करे। कोई दूसरा व्यक्ति न जान सके—इस अभिप्रायसे |
| * अध्याय २१५ * | ८६१ |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| बहुभिर्मन्त्रयेत् कामं राजा मन्त्रं पृथक्-पृथक्।<br>मन्त्रिणामपि नो कुर्यान्मन्त्रिमन्त्रप्रकाशनम्॥ ४८<br>क्वचिन्न कस्य विश्वासो भवतीह सदा नृणाम्।<br>निश्चयस्तु सदा मन्त्रे कार्यो ऐकेन सूरिणा॥ ४९<br>भवेद् वा निश्चयावाप्तिः परबुद्ध्युपजीवनात्।<br>एकस्यैव महीभर्तुर्भूयः कार्यो विनिश्चयः॥ ५०<br>ब्राह्मणान् पर्युपासीत त्रयीशास्त्रसुनिश्चितान्।<br>नासच्छास्त्रवतो मूढांस्ते हि लोकस्य कण्टकाः॥ ५१<br>वृद्धान् हि नित्यं सेवेत विप्रान् वेदविदः शुचीन्।<br>तेभ्यः शिक्षेत विनयं विनीतात्मा च नित्यशः।<br>समग्रां वशगां कुर्यात् पृथिवीं नात्र संशयः॥ ५२<br>बहवोऽविनयाद् भ्रष्टा राजानः सपरिच्छदाः।<br>वनस्थाश्चैव राज्यानि विनयात् प्रतिपेदिरे॥ ५३<br>त्रैविद्येभ्यस्त्रयीं विद्यां दण्डनीतिं च शाश्वतीम्।<br>आन्वीक्षिकीं त्वात्मविद्यां वार्तारम्भांश्च लोकतः॥ ५४<br>इन्द्रियाणां जये योगं समातिष्ठेद् दिवानिशम्।<br>जितेन्द्रियो हि शक्नोति वशे स्थापयितुं प्रजाः॥ ५५<br>यजेत राजा बहुभिः ऋतुभिश्च सदक्षिणैः।<br>धर्मार्थं चैव विप्रेभ्यो दद्याद् भोगान् धनानि च॥ ५६ | राजा अनेकों मन्त्रियोंके साथ अलग-अलग मन्त्रणा करे, परंतु एक मन्त्रीकी मन्त्रणाको दूसरे मन्त्रियोंपर प्रकट न होने दे। इस संसारमें मनुष्योंको सदा कहीं भी किसीका विश्वास नहीं होता, अतः राजाको एक ही विद्वान् मन्त्रीकी मन्त्रणाका निश्चय नहीं करना चाहिये। अन्यथा दूसरेकी बुद्धिके सहारे निश्चयकी प्राप्ति हो जाती है। उस अकेले किये गये निश्चयमें भी राजाको चाहिये कि फिरसे विचार कर ले। उसे त्रयीधर्ममें अटल निश्चय रखनेवाले ब्राह्मणोंकी सेवा करनी चाहिये। जो शास्त्रज्ञ नहीं हैं, उन मूर्खोंकी पूजा न करे; क्योंकि वे लोकके लिये कण्टकस्वरूप हैं। पवित्र आचरणवाले, वेदवेत्ता, वृद्ध ब्राह्मणोंकी नित्य सेवा करनी चाहिये और उन्हींसे सदा विनम्र होकर विनयकी शिक्षा लेनी चाहिये। ऐसा करनेसे वह (राजा) निःसंदेह सम्पूर्ण वसुन्धराको वशमें कर सकता है। बहुत-से राजा उद्दण्डताके कारण अपने परिजन एवं अनुचरोंके साथ नष्ट हो गये और अनेकों वनस्थ राजाओंने विनयसे पुनः राज्यश्रीको प्राप्त किया है। राजाओंको वेदवेत्ताओंसे तीनों वेद, शाश्वती दण्डनीति, आन्वीक्षिकी (तर्कशास्त्र) तथा आत्मविद्या ग्रहण करनी चाहिये और सर्वसाधारणसे लौकिक वार्ताओंकी सूचना प्राप्त करनी चाहिये। राजाको दिन-रात इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करनेकी युक्ति करते रहना चाहिये; क्योंकि जितेन्द्रिय राजा ही प्रजाओंको वशमें रखनेमें समर्थ हो सकता है। राजाको दक्षिणायुक्त बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये तथा ब्राह्मणोंको धर्मकी प्राप्तिके लिये भोग्य सामग्रियाँ और धन देना चाहिये॥ ४३-५६॥ |
| सांवत्सरिकमाप्तैश्च राष्ट्रादाहारयेद् बलिम्।<br>स्यात् स्वाध्यायपरो लोके वर्तेत पितृबन्धुवत्॥ ५७ | बुद्धिमान् कर्मचारियोंद्वारा राज्यसे वार्षिक कर वसूल कराये। उसे सर्वदा स्वाध्यायमें लीन तथा लोगोंके साथ पिता और भाईका-सा व्यवहार करना चाहिये। |
| आवृत्तानां गुरुकुलाद् द्विजानां पूजको भवेत्।<br>नृणामक्षयो ह्येष निधिर्ब्राह्मोऽभिधीयते॥ ५८ | राजाको गुरुकुलसे लौटे हुए ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। राजाओंके लिये यह अक्षय ब्राह्म-निधि (कोश-खजाना) कही गयी है। |
| तं च स्तेना नवामित्रा हरन्ति न विनश्यति।<br>तस्माद् राज्ञा विधातव्यो ब्राह्मो वै ह्यक्षयो निधिः *॥ ५९ | चोर अथवा शत्रुगण उसका हरण नहीं कर सकते और न उसका विनाश ही होता है। इसलिये राजाको इस अक्षय ब्राह्म-निधि (खजाने)-का संचय अवश्य करना चाहिये। |
| समोत्तमाधमै राजा ह्याहूय पालयेत् प्रजाः।<br>न निवर्तेत संग्रामात् क्षात्रं व्रतमनुस्मरन्॥ ६० | राजाको चाहिये कि वह अपने उत्तम, मध्यम तथा अधम अनुचरोंद्वारा प्रजाको बुलाकर उनका पालन करे और अपने क्षात्रधर्मका स्मरण कर संग्रामसे कभी विचलित न हो। |
* ये सभी प्रायः २० श्लोक मनुयाज्ञवल्क्य-स्मृतिमें भी हैं। तदनुसार शुद्ध किये गये हैं।
८६२ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
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| संग्रामेष्वनिवर्त्तित्वं प्रजानां परिपालनम्।<br>शुश्रूषा ब्राह्मणानां च राज्ञां निःश्रेयसं परम्॥ ६१<br>कृपणानाथवृद्धानां विधवानां च पालनम्।<br>योगक्षेमं च वृत्तिं च तथैव परिकल्पयेत्॥ ६२<br>वर्णाश्रमव्यवस्थानां तथा कार्यं विशेषतः।<br>स्वधर्मप्रच्युतान् राजा स्वधर्मे स्थापयेत् तथा॥ ६३<br>आश्रमेषु तथा कार्यमन्नं तैलं च भाजनम्।<br>स्वयमेवानयेद् राजा सत्कृतान् नावमानयेत्॥ ६४<br>तापसे सर्वकार्याणि राज्यमात्मानमेव च।<br>निवेदयेत् प्रयत्नेन देववच्चिरमर्चयेत्॥ ६५<br>द्वे प्रज्ञे वेदितव्ये च ऋज्वी वक्रा च मानवैः।<br>वक्रां ज्ञात्वा न सेवेत प्रतिबाधेत चागताम्॥ ६६<br>नास्य छिद्रं परो विन्द्याद् विन्द्याच्छिद्रं परस्य तु।<br>गूहेत् कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद् विवरमात्मनः॥ ६७<br>न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।<br>विश्वासाद् भयमुत्पन्नं मूलादपि निकृन्तति॥ ६८<br>विश्वासयेच्चाप्यपरं तत्त्वभूतेन हेतुना।<br>बकवच्चिन्तयेदर्थान् सिंहवच्च पराक्रमेत्॥ ६९<br>वृकवच्चाविलुम्पेत शशवच्च विनिक्षिपेत्।<br>दृढप्रहारी च भवेत् तथा शूकरवन्नृपः॥ ७०<br>चित्राकारश्च शिखिवद् दृढभक्तस्तथा श्ववत्।<br>तथा च मधुराभाषी भवेत् कोकिलवन्नृपः॥ ७१<br>काकशङ्की भवेन्नित्यमज्ञातवसतिं वसेत्।<br>नापरीक्षितपूर्वं च भोजनं शयनं व्रजेत्।<br>वस्त्रं पुष्पमलंकारं यच्चान्यन्मनुजोत्तम॥ ७२<br>न गाहेज्जनसम्बाधं न चाज्ञातजलाशयम्।<br>अपरीक्षितपूर्वं च पुरुषैराप्तकारिभिः॥ ७३<br>नारोहेत् कुञ्जरं व्यालं नादान्तं तुरगं तथा।<br>नाविज्ञातां स्त्रियं गच्छेन्नैव देवोत्सवे वसेत्॥ ७४<br>नरेन्द्रलक्ष्म्या धर्मज्ञ त्राता यत्तो भवेन्नृपः।<br>सद्भृत्याश्च तथा पुष्टाः सततं प्रतिमानिताः॥ ७५ | युद्धविमुख न होना, प्रजाओंका परिपालन तथा ब्राह्मणोंकी शुश्रूषा—ये तीनों धर्म राजाओंके लिये परम कल्याणकारी हैं। उसी प्रकार दुर्दशाग्रस्त, असहाय और वृद्धोंके तथा विधवा स्त्रियोंके योगक्षेम एवं जीविकाका प्रबन्ध करना चाहिये। राजाको वर्णाश्रमकी व्यवस्था विशेषरूपसे करनी चाहिये तथा अपने धर्मसे भ्रष्ट हुए लोगोंको पुनः अपने-अपने धर्मोंमें स्थापित करना चाहिये। चारों आश्रमोंपर भी उसी प्रकारकी देख-रेख रखनी चाहिये। राजाके लिये उचित है कि वह अतिथिके लिये अन्न, तैल और पात्रोंकी व्यवस्था स्वयं करे एवं सम्माननीय व्यक्तियोंका अपमान न करे तथा तपस्वीके लिये अपने सभी कर्मोंको तथा राज्य एवं अपने-आपको समर्पित कर दे और देवताके समान चिरकालतक उनकी पूजा करे। मनुष्यके द्वारा सरल (सुमति) और कुटिल (कुमति) दो प्रकारकी बुद्धियोंको जानना चाहिये। उनमें कुटिल बुद्धिको जान लेनेपर उसका सेवन न करे, किंतु यदि आ गयी हो तो उसे दूर हटा दे। राजाके छिद्रको शत्रु न जान सके, किंतु वह शत्रुके छिद्रको जान ले। वह कछुएकी भाँति अपने अङ्गोंको छिपाये रखे और अपने छिद्रकी रक्षा करे। अविश्वसनीय व्यक्तिका विश्वास न करे और विश्वसनीयका भी बहुत विश्वास न करे; क्योंकि विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय मूलको भी काट डालता है॥ ५७—६८॥<br><br>राजाको चाहिये कि वह यथार्थ कारणको प्रकाशित करके दूसरोंको अपनेपर विश्वस्त करे। वह बगुलेकी भाँति अर्थका चिन्तन करे, सिंहकी तरह पराक्रम करे, भेडियेके समान लूट-पाट कर ले, खरगोशकी तरह छिपा रहे तथा शूकरके सदृश दृढ़ प्रहार करनेवाला हो। राजा मोरकी भाँति विचित्र आकारवाला, कुत्तेकी तरह अनन्यभक्त तथा कोकिलकी भाँति मृदुभाषी हो। नरश्रेष्ठ! राजाको चाहिये कि वह सर्वदा कौएकी भाँति सशङ्कित रहे। वह गुप्त स्थानपर निवास करे, पहले बिना परीक्षा किये भोजन, शय्या, वस्त्र, पुष्प, अलंकार एवं अन्यान्य सामग्रियोंको न ग्रहण करे। विश्वस्त पुरुषोंद्वारा पहले बिना परीक्षा किये हुए मनुष्योंकी भीड़ तथा अज्ञात जलाशयमें प्रवेश न करे। दुष्ट हाथी एवं बिना सिखाये घोड़ेपर न चढ़े, न बिना जानी हुई स्त्रीके साथ समागम करे और न देवोत्सवमें निवास करे। धर्मज्ञ! राजाको सर्वदा राजलक्ष्मी (चिह्न)-से सुसम्पन्न, दीनरक्षक और |
| * अध्याय २१५ * | ८६३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राज्ञा सहायाः कर्तव्याः पृथिवीं जेतुमिच्छता।<br>यथार्हं चाप्यसुभृतो राजा कर्मसु योजयेत् ॥ ७६<br>धर्मिष्ठान् धर्मकार्येषु शूरान् संग्रामकर्मसु ।<br>निपुणानर्थकृत्येषु सर्वत्रैव तथा शुचीन् ॥ ७७<br>स्त्रीषु षण्डं नियुञ्जीत तीक्ष्णं दारुणकर्मसु ।<br>धर्मे चार्थे च कामे च नये च रविनन्दन ॥ ७८<br>राजा यथार्हं कुर्याच्च उपधाभिः परीक्षणम् ।<br>समतीतोपदान् भृत्यान् कुर्याच्छस्तवनेचरान् ॥ ७९<br>तत्पादान्वेषिणो यत्तांस्तदध्यक्षकांस्तु कारयेत्।<br>एवमादीनि कर्माणि नृपैः कार्याणि पार्थिव ॥ ८०<br>सर्वथा नेष्यते राजंस्तीक्ष्णोपकरणक्रमः।<br>कर्माणि पापसाध्यानि यानि राज्ञो नराधिप ॥ ८१<br>संतस्तानि न कुर्वन्ति तस्मात्तानि त्यजेन्नृपः।<br>नेष्यते पृथिवीशानां तीक्ष्णोपकरणक्रिया ॥ ८२<br>यस्मिन् कर्मणि यस्य स्याद् विशेषेण च कौशलम् ।<br>तस्मिन् कर्मणि तं राजा परीक्ष्य विनियोजयेत् ।<br>पितृपैतामहान् भृत्यान् सर्वकर्मसु योजयेत् ॥ ८३ | उद्यमी होना चाहिये। पृथ्वीको जीतनेकी इच्छा रखनेवाले राजाको सर्वदा सम्मानित एवं पालित उत्तम अनुचरोंको सहायक बनाना चाहिये। वह प्राणियोंको यथायोग्य कर्मोंमें नियुक्त करे। उसे धर्म-कार्योंमें धर्मात्माओंको, युद्धकर्मोंमें शूर-वीरोंको, अर्थ-कार्योंमें उसके विशेषज्ञोंको, सच्चरित्रोंको सर्वत्र, स्त्रियोंके मध्यमें नपुंसकको और भीषण कर्मोंमें निर्दयको नियुक्त करना चाहिये। रविनन्दन! राजाको धर्म, अर्थ, काम और नीतिके कार्योंमें गुप्त पारिश्रमिक देकर अनुचरोंकी परीक्षा करनी चाहिये। उत्तीर्ण होनेवालेको श्रेष्ठ गुप्तचर बनाये और उनके कार्योंकी देखरेख करनेवालोंको उनका अध्यक्ष बनाये। राजन्! इस प्रकार राजाको राज्यके कार्योंका संचालन करना चाहिये। राजाको सर्वथा उग्र कर्मोंवाला नहीं होना चाहिये। नरेश्वर! राजाके जो पापाचरणद्वारा सिद्ध होनेवाले कर्म हैं, उन्हें सत्पुरुष नहीं करते, अतः राजाको भी उनका परित्याग कर देना चाहिये; क्योंकि राजाओंके लिये क्रूर कर्माचरण उचित नहीं हैं। राजाको चाहिये कि जिस कार्यमें जिसकी विशेष कुशलता है, उसे उसी कार्यमें परीक्षा लेकर नियुक्त करे; किंतु पिता-पितामहसे चले आते हुए नौकरोंको सभी कर्मोंमें नियुक्त करे, परंतु अपने जातीय कार्योंमें उन्हें न रखे॥ ६९—८३ १/२ ॥ |
| विना दायादकृत्येषु तत्र ते हि समागताः।<br>राजा दायादकृत्येषु परीक्ष्य तु कृतान् नरान् ।<br>नियुञ्जीत महाभाग तस्य ते हितकारिणः ॥ ८४<br>परराजगृहात् प्राप्ताञ्जनसंग्रहकाम्यया।<br>दुष्टान् वाप्यथवादुष्टानाश्रयीत प्रयत्नतः ॥ ८५<br>दुष्टं विज्ञाय विश्वासं न कुर्यात्तत्र भूमिपः।<br>वृत्तिं तस्यापि वर्तेत जनसंग्रहकाम्यया ॥ ८६<br>राजा देशान्तरप्राप्तं पुरुषं पूजयेद् भृशम् ।<br>ममायं देशसम्प्राप्तो बहुमानेन चिन्तयेत् ॥ ८७<br>कामं भृत्यार्जनं राजा नैव कुर्यान्नराधिप ।<br>न च वाऽसंविभक्तांस्तान् भृत्यान् कुर्यात् कथञ्चन ॥ ८८<br>शत्रवोऽग्निर्विषं सर्पो निस्त्रिंश इति चैकतः।<br>भृत्या मनुजशार्दूल रुषिताश्च तथैकतः ॥ ८९<br>तेषां चारेण चारित्रं राजा विज्ञाय नित्यशः।<br>गुणिनां पूजनं कुर्यान्निर्गुणानां च शासनम् ।<br>कथिताः सततं राजन् राजानश्चारचक्षुषः ॥ ९० | महाभाग! राजाको पारिवारिक कार्योंमें परीक्षा करके मनुष्योंको नियुक्त करना चाहिये; क्योंकि वे उसके कल्याण करनेवाले होते हैं। अनुचरोंका संग्रह करनेकी भावनासे राजाको चाहिये कि जो अनुचर दूसरे राजाकी ओरसे उनके यहाँ आयें—चाहे वे दुष्ट हों अथवा सज्जन, उन्हें प्रयत्नपूर्वक अपने यहाँ आश्रय दे; किंतु दुष्टको समझकर राजा उसका विश्वास न करे, परंतु जनसंग्रहकी इच्छासे उसे भी जीविका देनी चाहिये। राजाको चाहिये कि दूसरे देशसे आये हुए व्यक्तिका विशेष स्वागत करे और 'यह मेरे देशमें आया है' ऐसा समझकर उसका अधिक सम्मान करे। नराधिप! राजाको अधिक नौकर नहीं रखना चाहिये। साथ ही जो पहले अपने पदसे पृथक् कर दिये गये हों, ऐसे नौकरोंको किसी प्रकार भी नियुक्त न करे। नरशार्दूल! शत्रु, अग्नि, विष, सर्प तथा नंगी तलवार—ये सब एक ओर हैं तथा क्रुद्ध अनुचर एक ओर हैं। (अर्थात् दोनों समान हैं।) राजाको चाहिये कि गुप्तचरद्वारा नित्य उन अनुचरोंके चरित्रकी जानकारी प्राप्त कर उनमें गुणवानोंका सत्कार और निर्गुणोंका अनुशासन करता रहे। राजन्! इसी कारण राजालोग सर्वदा चारचक्षु (अर्थात् गुप्तचर ही जिनकी आँखें हैं ऐसा) |
८६४ * मत्स्यपुराण *
| स्वके देशे परे देशे ज्ञानशीलान् विचक्षणान्।<br>अनाहार्यान् क्लेशसहान् नियुञ्जीत तथा चरान्॥ ९१<br><br>जनस्याविदितान् सौम्यांस्तथाज्ञातान् परस्परम्।<br>वणिजो मन्त्रकुशलान् सांवत्सरचिकित्सकान्।<br>तथा प्रवाजिताकारांश्चारान् राजा नियोजयेत्॥ ९२<br><br>नैकस्य राजा श्रद्दध्याच्चारस्यापि सुभाषितम्।<br>द्वयोः सम्बन्धमाज्ञाय श्रद्दध्यान्नृपतिस्तदा॥ ९३<br><br>परस्परस्याविदितौ यदि स्यातां च तावुभौ।<br>तस्माद् राजा प्रयत्नेन गूढांश्चारान् नियोजयेत्॥ ९४ | कहलाते हैं। अपने देशमें या पराये देशमें ज्ञानी, निपुण, निर्लोभी और कष्टसहिष्णु गुप्तचरोंको नियुक्त करना चाहिये। जिन्हें साधारण जनता न पहचानती हो, जो सरल दिखायी पड़ते हों, जो एक-दूसरेसे परिचित न हों तथा वणिक्, मन्त्री, ज्योतिषी, वैद्य और संन्यासीके वेशमें भ्रमण करनेवाले हों, राजा ऐसे गुप्तचरोंको नियुक्त करे। राजा एक गुप्तचरकी बातपर, यदि वह अच्छी लगनेवाली भी हो तो भी विश्वास न करे। उस समय उसे दो गुप्तचरोंकी बातोंपर उनके आपसी सम्बन्धको जानकर ही विश्वास करना चाहिये। यदि वे दोनों आपसमें अपरिचित हों तो विश्वास करना चाहिये। इसीलिये राजाको गुप्त रहनेवाले चरोंको नियुक्त करना चाहिये॥ ८४—९४॥ |
| राज्यस्य मूलमेतावद् या राज्ञश्चारदर्शिता।<br>चाराणामपि यत्नेन राज्ञा कार्यं परीक्षणम्॥ ९५<br><br>रागापरागौ भृत्यानां जनस्य च गुणागुणान्।<br>सर्वं राज्ञां चरायत्तं तेषु यत्नपरो भवेत्॥ ९६<br><br>कर्मणा केन मे लोके जनः सर्वोऽनुरज्यते।<br>विरज्यते केन तथा विज्ञेयं तन्महीक्षिता॥ ९७<br><br>अनुरागकरं लोके कर्म कार्यं महीक्षिता।<br>विरागजनकं लोके वर्जनीयं विशेषतः॥ ९८<br><br>जनानुरागप्रभवा हि लक्ष्मी<br>राज्ञां यतो भास्करवंशचन्द्र।<br>तस्मात् प्रयत्नेन नरेन्द्रमुख्यैः<br>कार्योऽतिरागो भुवि मानवेषु॥ ९९ | राज्यके मूलाधार गुप्तचर ही हैं, क्योंकि गुप्तचर ही राजाके नेत्र हैं। अतः राजाको गुप्तचरोंकी भी यत्नपूर्वक परीक्षा करनी चाहिये। राज्यमें अनुचरोंका अनुराग एवं वैर तथा प्रजाके गुण और अवगुण—राजाओंके ये सभी कार्य गुप्तचरोंपर ही निर्भर हैं, अतः उनके प्रति यत्नशील रहना चाहिये। राजाको यह बात सर्वदा ध्यानमें रखनी चाहिये कि लोकमें मेरे किस कामसे सभी लोग अनुरक्त रहेंगे और किस कामसे विरक्त हो जायेंगे। इसे समझकर राजाको लोकमें अनुरागजनक कार्यका सम्पादन और विरागोत्पादक कर्मका विशेषरूपसे त्याग करना चाहिये। सूर्यकुलचन्द्र! चूँकि राजाओंकी लक्ष्मी उनकी प्रजाओंके अनुरागसे उत्पन्न होनेवाली होती है, इसलिये श्रेष्ठ राजाओंको पृथ्वीपर मानवोंके प्रति प्रयत्नपूर्वक अत्यन्त अनुराग करना चाहिये॥ ९५—९९॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राज्ञां सहायसम्पत्तिर्नाम पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें राजाकी सहायक-सम्पत्ति नामक दो सौ पंद्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१५॥
दो सौ सोलहवाँ अध्याय
राजकर्मचारियोंके धर्मका वर्णन
| मत्स्य उवाच | |
|---|---|
| यथा च वर्तितव्यं स्यान्मनो राज्ञोऽनुजीविभिः।<br>तथा ते कथयिष्यामि निबोध गदतो मम॥ १ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**मनु महाराज! अब मैं आपसे राजाके अनुचरोंको उनके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये, यह बतला रहा हूँ, आप इसे सुनिये। |
२१८- दुर्गमें संग्राह्य ओषधियोंका वर्णन
| * अध्याय २१६ * | ८६५ |
|---|---|
| ज्ञात्वा सर्वात्मना कार्यं स्वशक्त्या रविनन्दन।<br>राजा यत्तु वदेद् वाक्यं श्रोतव्यं तत् प्रयत्नतः।<br>आक्षिप्य वचनं तस्य न वक्तव्यं तथा वचः ॥ २<br><br>अनुकूलं प्रियं तस्य वक्तव्यं जनसंसदि।<br>रहोगतस्य वक्तव्यमप्रियं यद्धितं भवेत् ॥ ३<br><br>परार्थमस्य वक्तव्यं स्वस्थे चेतसि पार्थिव।<br>स्वार्थः सुहृद्भिर्वक्तव्यो न स्वयं तु कथञ्चन ॥ ४<br><br>कार्यातिपातः सर्वेषु रक्षितव्यः प्रयत्नतः।<br>न च हिंस्यं धनं किञ्चिन्नियुक्तेन च कर्मणि ॥ ५<br><br>नोपेक्ष्यस्तस्य मानश्च तथा राज्ञः प्रियो भवेत्।<br>राज्ञश्च न तथा कार्यं वेशभाषितचेष्टितम् ॥ ६<br><br>राजलीला न कर्तव्या तद्विद्विष्टं च वर्जयेत्।<br>राज्ञः समोऽधिको वा न कार्यों वेशो विजानता ॥ ७<br><br>द्यूतादिषु तथैवान्यत् कौशलं तु प्रदर्शयेत्।<br>प्रदर्श्य कौशलं चास्य राजानं तु विशेषयेत् ॥ ८<br><br>अन्तःपुरजनाध्यक्षैर्वैरिदूतैर्निराकृतैः ।<br>संसर्गं न व्रजेद् राजन् विना पार्थिवशासनात् ॥ ९<br><br>निःस्नेहतां चावमानं प्रयत्नेन तु गोपयेत्।<br>यच्च गुह्यं भवेद् राज्ञो न तल्लोके प्रकाशयेत् ॥ १०<br><br>नृपेण श्रावितं यत् स्याद् वाच्यावाच्यं नृपोत्तम।<br>न तत् संश्रावयेल्लोके तथा राज्ञोऽप्रियो भवेत् ॥ ११<br><br>आज्ञाप्यमाने वान्यस्मिन् समुत्थाय त्वरान्वितः।<br>किमहं करवाणीति वाच्यो राजा विजानता ॥ १२<br><br>कार्यावस्थां च विज्ञाय कार्यमेव यथा भवेत्।<br>सततं क्रियमाणेऽस्मिँल्लाघवं तु व्रजेद् ध्रुवम् ॥ १३<br><br>राज्ञः प्रियाणि वाक्यानि न चात्यर्थं पुनः पुनः।<br>न हास्यशीलस्तु भवेन्न चापि भृकुटीमुखः ॥ १४<br><br>नातिवक्ता न निर्वक्ता न च मात्सरिकस्तथा।<br>आत्मसम्भावितश्चैव न भवेत् तु कथञ्चन ॥ १५ | रविनन्दन ! राजाद्वारा राजकार्यमें नियुक्त व्यक्तिको चाहिये कि वह कार्यको सब तरहसे जानकर यथाशक्ति उसका पालन करे। राजा जो बात कह रहे हों, उसे वह प्रयत्नपूर्वक सुने, बीचमें उनकी बात काटकर अपनी बात न कहे। जनसमाजमें राजाके अनुकूल एवं प्रिय बातें कहनी चाहिये, किंतु एकान्तमें बैठे हुए राजासे अप्रिय बात भी कही जा सकती है, यदि वह हितकारी हो। राजन् ! जिस समय राजाका चित्त स्वस्थ हो, उस समय दूसरोंके हितकी बातें उससे कहनी चाहिये। अपने स्वार्थकी बात राजासे स्वयं कभी भी न कहे, अपने मित्रोंसे कहलाये। सभी कार्योंमें कार्यका दुष्प्रयोग न हो, इसकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये तथा नियुक्त होनेपर धनका थोड़ा भी अपव्यय न होने दे। राजाके सम्मानकी उपेक्षा न करे, सर्वदा राजाके प्रियकी चिन्ता करे, राजाकी वेश-भूषा, बात-चीत एवं आकार-प्रकारकी नकल न करे। राजाके लीला-कलापोंका भी अनुकरण न करे, वह राजाके अभीष्ट विषयोंको सर्वथा छोड़ दे। ज्ञानवान् पुरुषको राजाके समान अथवा उससे बढ़कर भी अपनी वेशभूषा नहीं बनानी चाहिये। द्यूतक्रीड़ा आदिमें तथा अन्यत्र भी राजाकी अपेक्षा अपने कौशलका प्रदर्शन करे और उसी प्रसङ्गमें अपनी कुशलता दिखाकर राजाकी विशेषता प्रकट करे। राजन्! राजाकी आज्ञाके बिना अन्तःपुरके अध्यक्षों, शत्रुओंके दूतों तथा निकाले हुए अनुचरोंके निकट न जाय। अपने प्रति राजाकी स्नेहहीनता तथा अपमानको प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखे और राजाकी जो गोपनीय बात हो, उसे सर्वसाधारणके सम्मुख प्रकट न करे ॥ १-१० ॥<br><br>नृपोत्तम ! राजपुरुष राजाद्वारा कही गयी गुप्त या प्रकट बातको सर्वसाधारणके समक्ष कभी न सुनाये। ऐसा करनेसे वह राजाका विरोधी हो जाता है। जिस समय राजा दूसरे व्यक्तिसे किसी कामके लिये कहें, उस समय बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि शीघ्रतापूर्वक स्वयं उठकर राजासे कहे कि 'मैं क्या करूँ?' कार्यकी अवस्थाको देखकर जैसा करना उपयुक्त हो, वैसा ही करना चाहिये; क्योंकि सदा एक-सा करते रहनेपर निश्चित ही वह राजाकी दृष्टिमें हेय हो जाता है। राजाको प्रिय लगनेवाली बातोंको भी उनके सामने बार-बार न कहे, न ठठाकर हँसे और न भृकुटी ही ताने। न बहुत बोले, न एकदम चुप ही रहे, न असावधानी प्रकट करे और न कभी आत्मसम्मानो होनेका भाव ही प्रदर्शित करे। |
८६६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दुष्कृतानि नरेन्द्रस्य न तु सङ्कीर्तयेत् क्वचित्।<br>वस्त्रमस्त्रमलंकारं राज्ञा दत्तं तु धारयेत्॥ १६<br>औदार्येण न तद् देयमन्यस्मै भूतिमिच्छता।<br>न चैवात्यशनं कार्यं दिवा स्वप्नं न कारयेत्॥ १७<br>नानिर्दिष्टे तथा द्वारे प्रविशेत् तु कथञ्चन।<br>न च पश्येत् तु राजानमयोग्यासु च भूमिषु॥ १८<br>राज्ञस्तु दक्षिणे पार्श्वे वामे चोपविशेत् तदा।<br>पुरस्ताच्च तथा पश्चादासनं तु विगर्हितम्॥ १९<br>जृम्भां निष्ठीवनं कासं कोपं पर्यस्तिकाश्रयम्।<br>भ्रुकुटिं वान्तमुद्गारं तत्समीपे विवर्जयेत्॥ २०<br>स्वयं तत्र न कुर्वीत स्वगुणाख्यापनं बुधः।<br>स्वगुणाख्यापने युक्त्या परमेव प्रयोजयेत्॥ २१<br>हृदयं निर्मलं कृत्वा परां भक्तिमुपाश्रितैः।<br>अनुजीविगणैर्भाव्यं नित्यं राज्ञामतन्द्रितैः॥ २२<br>शाठ्यं लौल्यं च पैशुन्यं नास्तिक्यं क्षुद्रता तथा।<br>चापल्यं च परित्याज्यं नित्यं राज्ञोऽनुजीविभिः॥ २३<br>श्रुतिविद्यासुशीलैश्च संयोज्यात्मानमात्मना।<br>राजसेवां ततः कुर्याद् भूतये भूतिवर्धनीम्॥ २४<br>नमस्कार्याः सदा चास्य पुत्रवल्लभमन्त्रिणः।<br>सचिवैश्चास्य विश्वासो न तु कार्यः कथञ्चन॥ २५ | राजाके दुष्कर्मकी चर्चा कभी नहीं करनी चाहिये। राजाद्वारा दिये गये वस्त्र, अस्त्र और अलंकारको धारण करे। ऐश्वर्यकी कामना करनेवाले भृत्यको उन वस्त्रादि सामग्रियोंको उदारतावश दूसरेको नहीं देना चाहिये। (राजाके सम्मुख यदि कभी भोजन करनेका अवसर आये तो) न अधिक भोजन करे और न दिनमें शयन करे। जिससे प्रवेश करनेका निर्देश नहीं है, उस द्वारसे कभी प्रवेश न करे और अयोग्य स्थानपर स्थित राजाकी ओर न देखे। राजाके दाहिने या बायें पार्श्वमें बैठना चाहिये। सम्मुख या पीछेकी ओर बैठना निन्दित है। राजाके समीप जमुआई लेना, थूकना, खखारना, खाँसना, क्रोधित होना, आसनपर तकिया लगाकर बैठना, भ्रुकुटी चढ़ाना, वमन करना या उद्गार निकालना—ये सभी कार्य नहीं करने चाहिये। बुद्धिमान् भृत्य राजाके सम्मुख अपने गुणोंकी श्लाघा न करे। अपने गुणको सूचित करनेके लिये युक्तिपूर्वक दूसरेको ही प्रयुक्त करना चाहिये। अनुचरोंको हृदय निर्मल करके परम भक्तिके साथ राजाओंके प्रति नित्य सावधान रहना चाहिये। राजाके अनुचरोंको शठता, लोभ, छल, नास्तिकता, क्षुद्रता, चञ्चलता आदिका नित्य परित्याग कर देना चाहिये। शास्त्रज्ञ एवं विद्याभ्यासियोंसे स्वयं अपना सम्पर्क स्थापित करके ऐश्वर्य बढ़ानेवाली राजसेवाको अपनी समृद्धिके लिये करनी चाहिये। राजाके पुत्र, प्रिय परिजन और मन्त्रियोंको नमस्कार करना चाहिये, किंतु उनके मन्त्रियोंका कभी विश्वास न करे॥ ११—२५॥ |
| अपुष्टश्चास्य न ब्रूयात् कामं ब्रूयात्तथा यदि।<br>हितं तथ्यं च वचनं हितैः सह सुनिश्चितम्॥ २६ | बिना पूछे राजासे कुछ न कहे, यदि कहे भी तो जो राजाके हितके रूपमें सुनिश्चित हितकर और यथार्थ बात हो वह कहे। |
| चित्तं चैवास्य विज्ञेयं नित्यमेवानुजीविभिः।<br>भर्तुराराधनं कुर्याच्चित्तज्ञो मानवः सुखम्॥ २७ | अनुचरोंको नित्य राजाकी मनोदशाका पता लगाते रहना चाहिये। मनोभावोंको समझनेवाला अनुचर ही अपने स्वामीकी सुखपूर्वक सेवा कर सकता है। |
| रागापरागौ चैवास्य विज्ञेयौ भूतिमिच्छता।<br>त्यजेद् विरक्तं नृपतिं रक्ताद् वृत्तिं तु कारयेत्॥ २८ | अपने कल्याणकी कामना करनेवाले अनुचरको राजाके अनुराग और विरागका पता लगाते रहना चाहिये। विरक्त राजाको छोड़ दे और अनुरक्तकी सेवामें सदा तत्पर रहना चाहिये; |
| विरक्तः कारयेन्नाशं विपक्षाभ्युदयं तथा।<br>आशावर्धनकं कृत्वा फलनाशं करोति च॥ २९ | क्योंकि विरक्त राजा उसका नाश कर विपक्षियोंको उन्नत बनाता है, आशाको बढ़ाकर उसके फलका नाश कर देता है, |
| अकोपोऽपि सकोपाभः प्रसन्नोऽपि च निष्फलः।<br>वाक्यं च समदं वक्ति वृत्तिच्छेदं करोति वै॥ ३० | क्रोधका अवसर न रहनेपर भी वह क्रुद्ध ही दिखायी पड़ता है तथा प्रसन्न होकर भी कुछ फल नहीं देता, हर्षयुक्त बातें करता है और जीविकाका |
| * अध्याय २१७ * | ८६७ |
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| प्रदेशवाक्यमुदितो न सम्भावयतेऽन्यथा।<br>आराधनासु सर्वासु सुंसवच्च विचेष्टते ॥ ३१<br><br>कथासु दोषं क्षिपति वाक्यभङ्गं करोति च।<br>लक्ष्यते विमुखश्चैव गुणसंकीर्तनेऽपि च॥ ३२<br><br>दृष्टिं क्षिपति चान्यत्र क्रियमाणे च कर्मणि।<br>विरक्तलक्षणं चैतच्छृणु रक्तस्य लक्षणम्॥ ३३<br><br>दृष्ट्वा प्रसन्नो भवति वाक्यं गृह्णाति चादरात्।<br>कुशलादिपरिपश्नं सम्प्रयच्छति चासनम्॥ ३४<br><br>विविक्तदर्शने चास्य रहस्येनं न शङ्कते।<br>जायते हृष्टवदनः श्रुत्वा तस्य तु तत्कथाम्॥ ३५<br><br>अप्रियाण्यपि वाक्यानि तदुक्तान्यभिनन्दते।<br>उपायनं च गृह्णाति स्तोकमप्यादरात्तथा॥ ३६<br><br>कथान्तरेषु स्मरति प्रहृष्टवदनस्तथा।<br>इति रक्तस्य कर्तव्या सेवा रविकुलोद्भव।<br>आपत्सु न त्यजेत् पूर्वं विरक्तमपि सेवितम्॥ ३७<br><br>मित्रं न चापत्सु तथा च भृत्यं<br>त्यजन्ति ये निर्गुणमप्रमेयम्।<br>विभुं विशेषेण च ते व्रजन्ति<br>सुरेन्द्रधामामरवृन्दजुष्टम् ॥ ३८ | उच्छेद कर देता है। प्रसंगकी बातोंसे प्रसन्न होकर भी वह पूर्ववत् सम्मान नहीं करता, सभी सेवाओंमें उपेक्षा व्यक्त करता है। कोई बात छिड़नेपर बीचमें दोष प्रकट करता है और वहीं वाक्यको काट देता है। गुणोंका कीर्तन करनेपर भी विमुख ही लक्षित होता है। काम करते समय दृष्टि दूसरी ओर घुमा लेता है—ये सभी विरक्त राजाके लक्षण हैं। अब अनुरक्त राजाके लक्षण सुनिये॥ २६—३३॥<br><br>अनुरक्त राजा भृत्योंको देखकर प्रसन्न होता है, उसकी बातको आदरपूर्वक ग्रहण करता है और कुशलमङ्गल पूछकर आसन देता है। एकान्तमें अथवा अन्तःपुरमें भी उसे देखकर कभी संशय नहीं करता और उसकी कही हुई बातें सुनकर प्रसन्न होता है। उसके द्वारा कही हुई अप्रिय बातोंका भी अभिनन्दन करता है और उसकी थोड़ी-सी भी भेंट आदरपूर्वक स्वीकार करता है। दूसरी कथाके प्रसङ्गपर उसका स्मरण करता है और सर्वदा उसे देखकर प्रसन्न रहता है। सूर्यकुलोत्पन्न! ऐसे अनुरक्त राजाकी सेवा करनी चाहिये। किंतु पूर्वकालमें सेवा किये गये विरक्त राजाका भी आपत्तिकालमें त्याग नहीं करना चाहिये। जो मनुष्य अपने निर्गुण एवं अनुपम मित्र, भृत्य तथा विशेषरूपसे स्वामीको आपत्तिके अवसरपर नहीं छोड़ते, वे देवता-वृन्दोंके द्वारा सेवित देवराज इन्द्रके धामको जाते हैं॥ ३४-३८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मेऽनुजीविवृत्तं नाम षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रसंगमें भृत्य-व्यवहार नामक दो सौ सोलहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१६॥
दो सौ सतरहवाँ अध्याय
दुर्ग-निर्माणकी विधि तथा राजाद्वारा दुर्गमें संग्रहणीय उपकरणोंका विवरण
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
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| राजा सहायसंयुक्तः प्रभूतयवसेन्धनम्।<br>रम्यमानतसामन्तं मध्यमं देशमावसेत्॥ १<br><br>वैश्यशूद्रजनप्रायमनाहार्यं तथा परैः।<br>किञ्चिद् ब्राह्मणसंयुक्तं बहुकर्मकरं तथा॥ २ | राजन्! जहाँ प्रचुर मात्रामें घास-भूसा और लकड़ी वर्तमान हो, स्थान रमणीय हो, पड़ोसी राजा विनम्र हो, वैश्य और शूद्रलोग अधिक मात्रामें रहते हों, जो शत्रुओंद्वारा हरण किये जाने योग्य न हो एवं कुछ विप्रों तथा अधिकांश कर्मकरोंसे संयुक्त हो, |
२१९- विषयुक्त पदार्थोंके लक्षण एवं उससे राजाके बचनेके उपाय
८६८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अदेवमातृकं रम्यमनुरक्तजनान्वितम्।<br>करैरपीडितं चापि बहुपुष्पफलं तथा॥ ३<br>अगम्यं परचक्राणां तद्वासगृहमापदि।<br>समदुःखसुखं राज्ञः सततं प्रियमास्थितम्॥ ४<br>सरीसृपविहीनं च व्याघ्रतस्करवर्जितम्।<br>एवंविधं यथालाभं राजा विषयमावसेत्॥ ५<br>तत्र दुर्गं नृपः कुर्यात् षण्णामेकतमं बुधः।<br>धन्वदुर्गं महीदुर्गं नरदुर्गं तथैव च॥ ६<br>वार्क्षं चैवाम्बुदुर्गं च गिरिदुर्गं च पार्थिव।<br>सर्वेषामेव दुर्गाणां गिरिदुर्गं प्रशस्यते॥ ७<br>दुर्गं च परिखोपेतं वप्राट्टालकसंयुतम्।<br>शतघ्नीयन्त्रमुख्यैश्च शतशश्च समावृतम्॥ ८<br>गोपुरं सकपाटं च तत्र स्यात् सुमनोहरम्।<br>सपताकं गजारूढो येन राजा विशेत् पुरम्॥ ९ | देवस्थान रहित सुन्दर हो, अनुरक्तजनोंसे समन्वित हो, जहाँके निवासी करके भारसे पीड़ित न हों, पुष्प और फलकी बहुतायत हो, आपत्तिके समय वह वासस्थान शत्रुओंके लिये अगम्य हो, जहाँ निरन्तर समानरूपसे राजाके सुख-दुःखके भागी एवं प्रेमीजन निवास करते हों, जो सर्प, बाघ और चोरसे रहित हो तथा सरलतासे उपलब्ध हो, इस प्रकारके देशमें राजाको अपने सहायकोंसहित निवास करना चाहिये। वहाँ बुद्धिमान् राजाको धन्व या धनुदुर्ग (जहाँ चारों ओरसे मरुभूमि हो), महीदुर्ग नरदुर्ग, वृक्षदुर्ग, जलदुर्ग तथा पर्वतदुर्ग—इन छः दुर्गोंमेंसे किसी एककी रचना करनी चाहिये। राजन्! इन सभी दुर्गोंमें गिरि (पर्वत) दुर्ग श्रेष्ठ माना गया है*। वह गिरिदुर्ग खाई, चहारदीवारी तथा ऊँची अट्टालिकाओंसे युक्त एवं तोप आदि सैकड़ों प्रधान यन्त्रोंसे घिरा होना चाहिये। उसमें किंवाड़सहित मनोहर फाटक लगा हो, जिससे हाथीपर बैठा हुआ पताकासमेत राजा नगरमें प्रविष्ट हो सके॥ १–९॥ |
| चतस्रश्च तथा तत्र कार्यास्त्वायतवीथयः।<br>एकस्मिंस्तत्र वीथ्यग्रे देववेश्म भवेद् दृढम्॥ १०<br>वीथ्यग्रे च द्वितीये च राजवेश्म विधीयते।<br>धर्माधिकरणं कार्यं वीथ्यग्रे च तृतीयके॥ ११<br>चतुर्थे त्वथ वीथ्यग्रे गोपुरं च विधीयते।<br>आयतं चतुरग्रं वा वृत्तं वा कारयेत् पुरम्॥ १२<br>मुक्तिहीनं त्रिकोणं च यवमध्यं तथैव च।<br>अर्धचन्द्रप्रकारं च वज्राकारं च कारयेत्॥ १३<br>अर्धचन्द्रं प्रशंसन्ति नदीतीरेषु तद्वसन्।<br>अन्यत्र तन्न कर्तव्यं प्रयत्नेन विजानता॥ १४ | वहाँ चार लम्बी-चौड़ी गलियाँ बनवानी चाहिये। जिनमें एक गलीके अग्रभागमें सुदृढ़ देव-मन्दिरका निर्माण कराये। दूसरी गलीके आगे राजमहल बनानेका विधान है। तीसरी गलीके अग्रभागमें धर्माधिकारीका आवासस्थान हो। चौथी गलीके अग्रभागमें दुर्गका मुख्य प्रवेशद्वार हो। उस दुर्गको चौकोना, आयताकार, गोलाकार, मुक्तिहीन, त्रिकोण, यवमध्य, अर्धचन्द्राकार अथवा वज्राकार बनवाना चाहिये। नदी-तटपर बनाये गये अर्धचन्द्राकार दुर्गको उत्तम माना जाता है। विद्वान् राजाको अन्य स्थानोंपर ऐसे दुर्गका निर्माण नहीं करना चाहिये। |
| राज्ञा कोशगृहं कार्यं दक्षिणे राजवेश्मनः।<br>तस्यापि दक्षिणे भागे गजस्थानं विधीयते॥ १५<br>गजानां प्राङ्मुखी शाला कर्तव्या वाप्युदङ्मुखी।<br>आग्नेये च तथा भागे आयुधागारमिष्यते॥ १६<br>महानसं च धर्मज्ञ कर्मशालास्तथापराः।<br>गृहं पुरोधसः कार्यं वामतो राजवेश्मनः॥ १७ | राजाको राजमहलके दाहिने भागमें कोशगृह बनवाना चाहिये। उसके भी दाहिने भागमें गजशाला बनवानेका विधान है। गजोंकी शाला पूर्व अथवा उत्तराभिमुखी होनी चाहिये। अग्निकोणमें आयुधागार बनवाना उचित है। धर्मज्ञ! उसी दिशामें रसोईघर तथा अन्यान्य कर्मशालाओंकी भी रचना करे। राजभवनकी बायीं ओर पुरोहितका भवन होना चाहिये |
* गिरिदुर्ग चारों ओरसे पर्वतोंसे घिरे हुए पर्वतोंके मध्य किसी चौरस पर्वतपर ही स्थित होता है। इसके भी चारों ओर मरुभूमि, जलराशि, खाई, वृक्षादिके दुर्ग होते हैं। मनुनिर्मित रोहिताश्वदुर्ग तथा कलिंजर, चरणाद्रिके दुर्ग ऐसे ही हैं। मनु० ७।७०-७७ आदिमें इनका विस्तृत उल्लेख है।
- अध्याय २१७ * | ८६९ ---|---
| मन्त्रिवेदविदां चैव चिकित्साकर्तुरेव च।<br>तत्रैव च तथा भागे कोष्ठागारं विधीयते॥ १८<br>गवां स्थानं तथैवात्र तुरगाणां तथैव च।<br>उत्तराभिमुखा श्रेणी तुरगाणां विधीयते॥ १९<br>दक्षिणाभिमुखा वाथ परिशिष्टास्तु गर्हिताः।<br>तुरगास्ते तथा धार्याः प्रदीपैः सार्वरात्रिकैः॥ २०<br>कुक्कुटान् वानरांश्चैव मर्कटांश्च विशेषतः।<br>धारयेदश्वशालासु सवत्सां धेनुमेव च॥ २१<br>अजांश्च धार्या यत्नेन तुरगाणां हितैषिणा।<br>गोगजाश्वादिशालासु तत्पुरीषस्य निर्गमः॥ २२<br>अस्तं गते न कर्तव्यो देवदेवे दिवाकरे।<br>तत्र तत्र यथास्थानं राजा विज्ञाय सारथीन्॥ २३<br>दद्यादावसथस्थानं सर्वेषामनुपूर्वशः।<br>योधानां शिल्पिनां चैव सर्वेषामविशेषतः॥ २४<br>दद्यादावसथान् दुर्गे कालमन्त्रविदां शुभान्।<br>गोवैद्यानश्ववैद्यांश्च गजवैद्यांस्तथैव च॥ २५<br>आहरेत भृशं राजा दुर्गे हि प्रबला रुजः।<br>कुशीलवानां विप्राणां दुर्गे स्थानं विधीयते॥ २६<br>न बहूनामतो दुर्गे विना कार्ये तथा भवेत्।<br>दुर्गे च तत्र कर्तव्या नानाप्रहरणान्विताः॥ २७<br>सहस्रघातिनो राजंस्तैस्तु रक्षा विधीयते।<br>दुर्गे द्वाराणि गुप्तानि कार्याण्यपि च भूभुजा॥ २८<br>संचयश्चात्र सर्वेषामायुधानां प्रशस्यते।<br>धनुषां क्षेपणीयानां तोमराणां च पार्थिव॥ २९<br>शराणामथ खङ्गानां कवचानां तथैव च।<br>लगुडानां गुडानां च हुडानां परिघैः सह॥ ३०<br>अश्मनां च प्रभूतानां मुद्गराणां तथैव च।<br>त्रिशूलानां पट्टिशानां कुठाराणां च पार्थिव॥ ३१<br>प्रासानां च सशूलानां शक्तीनां च नरोत्तम।<br>परश्वधानां चक्राणां वर्मणां चर्मभिः सह॥ ३२<br>कुद्दाररज्जुवेत्राणां पीठकानां तथैव च।<br>तुषाणां चैव दात्राणामङ्गाराणां च संचयः॥ ३३<br>सर्वेषां शिल्पिभाण्डानां संचयश्चात्र चेष्यते ।<br>वादित्राणां च सर्वेषामोषधीनां तथैव च॥ ३४ | तथा उसी स्थलपर एवं उसी दिशामें मन्त्रियों और वैद्यका निवासस्थान एवं कोष्ठागार बनानेका विधान है। उसी स्थानके समीप गौओं तथा अश्वोंके निवासकी व्यवस्था करनी चाहिये। अश्वोंकी पंक्ति उत्तराभिमुखी अथवा दक्षिणाभिमुखी हो सकती है, अन्य दिशाभिमुखी निन्दित मानी गयी है। जहाँ अश्व रखे जायें वहाँ रातभर दीपक जलते रहना चाहिये। अश्वशालामें मुर्गा, बंदर, मर्कट तथा बछड़ेसहित गौ भी रखनेका विधान है। अश्वोंका कल्याण चाहनेवाला अश्वशालामें बकरियोंको भी रखे। गौ, हाथी और अश्वादि शालाओंमें उनके गोबर निकालनेकी व्यवस्था सूर्य अस्त हो जानेपर नहीं करनी चाहिये। राजा उन-उन स्थानोंमें यथायोग्य समझकर क्रमशः सभी सारथियोंको आवासस्थान प्रदान करे। इसी प्रकार सबसे बढ़कर योद्धाओं, शिल्पियों और कालमन्त्रके वेत्ताओंको दुर्गमें उत्तम निवास-स्थान दे। इसी प्रकार राजाको गौ-वैद्य, अश्व-वैद्य तथा गज-वैद्यको भी रखना चाहिये; क्योंकि दुर्गमें कभी रोगोंकी प्रबलता हो सकती है। दुर्गमें चारणों, संगीतज्ञों और ब्राह्मणोंके स्थानका विधान है॥१०—२६॥<br><br>इनके अतिरिक्त दुर्गमें निरर्थक बहुत-से व्यक्तियोंको नहीं रखना चाहिये। राजन्! दुर्गमें विविध प्रकारके शस्त्रास्त्रसे युक्त एवं हजारोंको मारनेमें समर्थ योद्धाओंको रखना चाहिये; क्योंकि उन्हींसे रक्षा होती है। राजाको दुर्गमें गुप्तद्वार भी बनवाना चाहिये। राजन्! दुर्गमें सभी प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंके संग्रहकी विशेष प्रशंसा की गयी है। नृपश्रेष्ठ राजन्! राजाको दुर्गमें धनुष, ढेलवाँस, तोमर, बाण, तलवार, कवच, लाठी, गुड (हाथीको फँसानेका एक फंदा), हुड (चोरोंको फँसानेका खूँटा), परिघ, पत्थर, बहुसंख्यक मुद्गर, त्रिशूल, पट्टिश, कुठार, प्रास (भाला), शूल, शक्ति, फरसा, चक्र, चर्मके साथ ढाल, कुदाल, रस्सी, बेंत, पीठक, भूसी, हँसिया, कोयला—इन सबका संचय करना चाहिये। दुर्गमें सभी प्रकारके शिल्पीय पात्रोंका भी संचय रहना चाहिये। वह सभी प्रकारके वाद्यों तथा ओषधियोंका भी संचय करे। |
२२०- राजधर्म एवं सामान्य नीतिका वर्णन
| ८७० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यवसानां प्रभूतानामिन्धनस्य च संचयः।<br>गुडस्य सर्वतैलानां गोरसानां तथैव च॥ ३५<br>वसानामथ मज्जानां स्नायूनामस्थिभिः सह।<br>गोचर्मपटहानां च धान्यानां सर्वतस्तथा॥ ३६<br>तथैवाभ्रपटानां च यवगोधूमयोरपि।<br>रत्नानां सर्ववस्त्राणां लोहानामप्यशेषतः॥ ३७<br>कलायमुद्गमाषाणां चणकानां तिलैः सह।<br>तथा च सर्वसस्यानां पांसुगोमययोरपि॥ ३८<br>शणसर्ज्रसं भूर्ज जतु लाक्षा च टङ्कणम्।<br>राजा संचिनुयाद् दुर्गे यच्चान्यदपि किञ्चन॥ ३९<br>कुम्भाश्चाशीविषैः कार्या व्यालसिंहादयस्तथा।<br>मृगाश्च पक्षिणश्चैव रक्ष्यास्ते च परस्परम्॥ ४०<br>स्थानानि च विरुद्धानां सुगुप्तानि पृथक् पृथक्।<br>कर्तव्यानि महाभाग यत्नेन पृथिवीक्षिता॥ ४१<br>उक्तानि चाप्यनुक्तानि राजद्रव्याण्यशेषतः।<br>सुगुप्तानि पुरे कुर्याज्जनानां हितकाम्यया॥ ४२ | वहाँ प्रचुरमात्रामें घास-भूसा, ईंधन, गुड, सभी प्रकारके तेल तथा गोरसका भी संचय हो। राजाको दुर्गमें वसा, मज्जा, हड्डियोंसहित स्नायु, गोचर्मसे बने नगाड़े, धान्य, तम्बू, जौ, गेहूँ, रत्न, सभी प्रकारके वस्त्र, लौह, कुलथी, मूँग, उड़द, चना, तिल, सभी प्रकारके अन्न, धूल, गोबर, सन, भोजपत्र, जस्ता, लाह, पत्थर तोड़नेकी छेनी तथा अन्य भी जो कुछ पदार्थ हों, उनका संचय करना चाहिये। सर्पोंके विषसे भरे घड़े, साँप, सिंह आदि हिंसक जन्तु, मृग तथा पक्षी रखे जाने चाहिये, किंतु वे एक-दूसरेसे सुरक्षित रहें। महाभाग! राजाको विरोधी जीवोंकी रक्षाके लिये यत्नपूर्वक पृथक्-पृथक् स्थान बनवाना चाहिये। राजाको प्रजाकी कल्याण-भावनासे कही गयी अथवा न कही गयी सम्पूर्ण राजवस्तुओंको दुर्गमें गुप्तरूपसे संग्रहीत करना चाहिये॥२७—४२॥ |
| जीवकर्षभकाकोलमामलक्याटरूषकम् ।<br>शालपर्णी पृश्निपर्णी मुद्गपर्णी तथैव च॥ ४३<br>माषपर्णी च मेदे द्वे शारिवे द्वे बलात्रयम्।<br>वीरा श्वसन्ती वृष्या च बृहती कण्टकारिका॥ ४४<br>शृङ्गी शृङ्गाटकी द्रोणी वर्षाभूर्दर्भ रेणुका।<br>मधुपर्णी विदार्यौ द्वे महाक्षीरा महातपाः॥ ४५<br>धन्वनः सहदेवाह्वा कटुकैरण्डकं विषः।<br>पर्णी शताह्वा मृद्वीका फल्गुखर्जूरयष्टिकाः॥ ४६<br>शुक्रातिशुक्रकाश्मर्यश्छत्रातिच्छत्रवीरणाः ।<br>इक्षुरिक्षुविकाराश्च फाणिताद्याश्च सत्तम॥ ४७<br>सिंही च सहदेवी च विश्वेदेवाश्वरोधकम्।<br>मधुकं पुष्पहंसाख्या शतपुष्पा मधूलिका॥ ४८<br>शतावरीमधूके च पिप्पलं तालमेव च।<br>आत्मगुप्ता कट्फलाख्या दार्विका राजशीर्षकी॥ ४९<br>राजसर्षपधान्याकमृष्यप्रोक्ता तथोत्कटा।<br>कालशाकं पद्मबीजं गोवल्ली मधुवल्लिका॥ ५०<br>शीतपाकी कुलिङ्गाक्षी काकजिह्वोरुपुष्पिका।<br>पर्वतत्रपुसौ चोभौ गुञ्जातकपुनर्नवे॥ ५१ | जीवक, ऋषभक, काकोल, इमली, आटरूष, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मुद्गपर्णी, माषपर्णी, दोनों प्रकारकी मेदा, दोनों प्रकारकी शारिवा, तीनों बलाएँ (एक ओषधि), वीरा, श्वसन्ती, वृष्या, बृहती, कण्टकारिका, शृङ्गी, शृङ्गाटकी, द्रोणी, वर्षाभू, कुश, रेणुका, मधुपर्णी, दोनों विदारी, महाक्षीरा, महातपा, धन्वन, सहदेवी, कटुक, रेड़, विष, शतपर्णी, मृद्वीका, फल्गु, खजूर, यष्टिका, शुक्र, अतिशुक्र, काश्मरी, छत्र, अतिच्छत्र, वीरण, ईख और ईखसे होनेवाली अन्य वस्तुएँ, फाणित आदि, सिंही, सहदेवी, विश्वदेव, अश्वरोधक, महुआ, पुष्पहंसा, शतपुष्पा, मधूलिका, शतावरी, महुआ, (दाख) पिप्पल, ताल, आत्मगुप्ता, कटफल, दार्विका, राजशीर्षकी, श्वेत सरसों, धनिया, ऋष्यप्रोक्ता, उत्कटा, कालशाक, पद्मबीज, गोवल्ली, मधुवल्लिका, शीतपाकी, कुलिंगाक्षी, काकजिह्वा, उरुपुष्पका, दोनों पर्वत और त्रपुष, गुंजातक, पुनर्नवा, |