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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

१२० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह पद विशेष महत्वपूर्ण है। यह एक ही पद ऐसा है जिसमे “मेडतिया रा कागद” (मेडतिया के यहाँ से आया हुआ पत्र) का वर्णन है। इस पद के आधार पर मीराँ का सधवा होना ही प्रामाणित हो जाता है। पद का किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कहा जाना भी अभिव्यक्ति से ही सुस्पष्ट हो उठता है। अत ऐसे पदो की प्रामाणिकता की विशेष विवेचना आवश्यक है। ३३ हो जी हो सिसोद्या राजा मनडो वैरागी धन¹ रो क्या करू। जहर का प्याला राणा जी भेज्या कोई द्यो मीराँ के हाथ। कर चरणामृत मीराँ पी गई कोई आप जाणो रघुनाथ। साप पिटारा राणा जी ने भेज्या कोई द्योने मीराँ ने जाय। कर खग वालो पहिरयो कोई आप जानो दीनानाथ। राणा जी दासी भेज्या कोई जावो ने मीराँ पास। मर गया होय तो जला दीज्यो नातर नदी मे बहाय। हो जी हो सिसोद्या राजा मनडो, वैरागी धन रो क्या करू। ।।१९६।। राणा जी द्वारा मीराँ के पास दासी भेजे जाने की सर्वथा नवीन कथा ही इस पद की विशेषता है। कथानक की प्रामाणिकता सर्वथा संदिग्ध होते हुए भी राणा और मीराँ के पारस्परिक सबध के प्रति चली आती परम्परागत भावना सुस्पष्ट हो जाती है। पद की शैली वर्णनात्मक ह। अस्तु, यह पद तत्कालीन भावनाओ का प्रतिबिम्ब ही कहा जा सकता है। ३४ राणौ म्हाने ऐसी कही महाराज। भक्तन² होय मीराँ जगत लजायो,कीन्हों सारो साज। १ स्त्री। २ विशेष उत्सव के अवसरो पर नाचने गाने वाली एक निम्नजाति विशेष की स्त्री जो 'भगतन' के अर्थ मे रूढ़ि वाचक हो गया है।

संघर्षाभिव्यक्ति १२१ जावो ने मीराँ म्हाने मुख न दिखावो, म्हाने आवै थारी लाज । लाजै मीराँ पीहर सासरो, और लाजै म्हारो साज¹। गोपी चन्दन तुलसी की माला, भीख मागत्यारो² साज । धन मीराँ धनि मेडतो, धनि राठोडारो राज । मीराँ के प्रभु अविनासी, चलि आयो व्रजराज ।।१९७।।† ३५ राणा जी हो जाति रो कारण म्हाँरै को नही लागो म्हांरो हरि भगतां सूं हेत। बिदुर कुला घरि जनमिया ज्या कै पावणा हुवा गोपाल वदि छुडाई बसुदेव की कस कियो खो काल। पाचू पाडू छठी द्रोपदी ज्या की न्यारी न्यारी जात, सहस अठ्यासी मुनि आविया जाकी पण राखी रघुनाथ । वन मे होती स्योरी भीलणी ज्यांहका ओरग्य³ ठाकुर बोर । ऊच नीच हरि ना गिणै ऐसी म्हारा हरि भगतां की कोर । येक बेल दोय तूंबड़ा ज्याहूं की छै न्यारी न्यारी जात, एक तूंबो जतर⁴ चढ़ै, दूजो हरि भगता कै हाथ । सख समदा५ नीपजै ज्याहू की न्यारी न्यारी जात, एक सख सेवा६ चढै दूजौ भो पडता के हाथ । एक माटी दोय कलस है ज्याहूं की न्यारी न्यारी जात, एक कलस सेवा चढै दूजो कलाला रै हाथ । कलक कटोरे विष धोलियो दियो मीराँ के हाथ, हरि चरणोदक करि पी लियो हरि जी भयो सुनाथ । सब मिलि मत उपाइयौ मीराँ नै विष चौहा कहियौ, । सुण्यो मानै नाहि नीच लग्यो हूठ. योह। १ विभव, ठाठ, २ माँगने वालो का, ३ खाया, ४ वाद्य-यन्त्र ५ समुद्र, ६ पूजा ।

१२२ मीरॉँ-वृहद्-पद-संग्रह नगर बसै बामण बाणिया भीतर शुद्र पवार, मुहुँ मोडे मुलबया हसे समझे नही गवार। गढ चितौडा न रहा नही रहणा को जोग, बसस्या सूडी द्वारिका जहाँ हरि भगता का भोग। पंरख लेत परचो भयो मन उपज्यो विस्वास, सिर पर सिरजन हार रहै पूगी म्हा मन की आस। कुम्भ श्याम के देवरे मिली है राणौ राणूँ, मीराँ ने गिरधर मिलिया कोई पूरबली पहिचाण। ।।१९८।।† पदाभिव्यक्ति के प्रथम और द्वितीय अर्द्धांशो मे कोई सगति नही बैठती प्रतीत होती। मीराँ द्वारा किए गए गृहत्याग का कारण भी अति स्पष्ट हो उठता है। कुम्भश्याम के मदिर के साथ मीराँ के जीवन की किसी घटना का सम्पर्क भी उपर्युक्त पदाभिव्यक्ति से स्पष्ट हो उठता है। ऐसी अभिव्यक्ति इस पद की नवीनता है। इस पद की शैली भी वर्णनात्मक ही है। ३६ प्रभु जी अरज बन्दी री सुण हो। मो निगुणी ए सुगुण साहब अवगुण धारी ए गुण हो। राणा जी विष को प्यालो भेज्यो मो चरणामृत को पण हो। म्हारी पत परमेश्वर राखत, मारण वालो कुण हो। प्रभु जी उचले¹ मदिर (सीतारामजी) बिराजे दरसण रोयण हो मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, मै जाणु प्रभु जी कुण हो। ।।१९९।। पदाभिव्यक्ति में संगति नही है। १ ऊँचे।

संघर्षाभिव्यक्ति १२३ मिश्रित भाषा में प्राप्त पद १ म्हारे सिर पर सालिगराम, राणाजी म्हारे काईं करसी। मीराँ सूं राणा ने कही थे, सुण मीराँ मोरी बात। साधो की सगत छोड हो रे, सखिया सब सकुचात। मीराँ ने सुन यो कही रे, सुण राणाजी बात। साध तो भाई बाप हमारे, सखियाँ क्यूँ घबरात। जहर का प्याला भेजिया रे, दीजो मीराँ हाथ। अमृत कर के पी गई रे, भली करें दीनानाथ। मीराँ प्याला पी लिया रे, बोली दोऊ कर जोड। तै तो मारण की करी रे, मेरी राखणहारो और। आधे जोहड कीच है रे, आधे जोहड हौंज। आधे मीराँ एकली रे, आधे राणा की फौज। काम क्रोध को डाल केरे सील लिए हथियार। जीती मीराँ एकली रे, हारी राणा की धार। काचागेरी का चौतरा रे, बैठे साध पचास। जिनमे मीराँ ऐसी दमके रे, लख तारो मे परकास। टाडा जब वे लादिया रे, बेगी दीन्हा जाण। कुल की तारण अस्तरी रे, चली हे पुष्कर न्हाण ॥२००॥† अधिकांश संघर्ष द्योतक पदो की तरह यह पद भी वर्णन और कथनोपकथन दोनो ही शैलियो मे है। “काचगिरी का चोतरा” का वर्णन इस पद के महत्व को विशेष रुपसे बढा देता है। “पुष्कर न्हाण” की अभिव्यक्ति प्राय. अन्य पदो मे भी मिलती है। २ राणा जी थे जहर दियो म्हैं जाणी। जैसे कंचन दहत अगिन भें, निकसत बारह बाणी।

१२४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह लोक लाज कुल काण¹ जगत की, दइ बदाय जस पाणी । अपने घर का परदा कर ले, मै अबला बौराणी । तरकस तीर लाग्यो मेरे हिय रे, गरक गयो सनकाणी । सब संतन पर तन मन बारो, चरण कवल लपटाणी । मीराँ के प्रभु राखि लईं है, दासी अपनी जाणी ॥२०१॥ पाठान्तर १, राणा जी जहर दियो हम जानी । जानबूझ चरणामृत सुन के पियो, नही बौराणी । जिन हरी मेरी नाव निवेरियो, छान्यो दूध अरु पानी । कचन असत कसौटी जैसे, तन रह्यो बारह बानी । राणा कोट करु न्योछावर, मै हरि हाथ बिकानी । मीराँ प्रभु गिरिधर नागर, के चरण कवल लिपटानी । पाठान्तर २, राणा जी जहर दियो हम जानी । अपने कुल को परदा कर ले, मै अबला बौराणी । राणा जी परधान पठायो, सुन जो जी थे राणी । जो साधन को सग निबरो, करा तुमे पटराणी । हथलेवी राणा सग जुड़ियो, गिरधर घर पटराणी । क्रोड भूप साधन पर वारुं, जिन की सरण रहाणी । मीराँ को पति एक रमैया, चरण कवल लपटानी । पाठान्तर ३, जहर दियो म्हे जाणी । राणा जी थे तो अपने कुल को परदो कर ले मै अबला बौराणी ।


१ मर्यादा ।

१२६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह साधू रो सग परो निवररो, थाने करा पटराणी । कोट भूप वारा रतन पर, जिनके हाथ बिकाणी । हथलेवा मै थास्यूँ जोडयो, गिरधररी पटराणी । पीहर म्हारो देस मेडतो, छाडी कुल की काणी । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कवल लिपटानी । उपर्युक्त दोनो पाठान्तर एक दूसरे के गेय रूपान्तर मात्र प्रतीत होते है । सभी पाठो से व्यक्त होती भावना "अपने घर का परदा कर ले, मै अबला बौराणी" भाव और भाषा दोनो ही दृष्टिकोण से विशेष विचारणीय है । दूसरी विचारणीय अभिव्यक्ति है "हथलेवी राणा सग जुहियो, मै गिरधर पटराणी" जो सभी पाठो मे मिलती है । यह पद और उसके सभी पाठान्तर भाव और भाषा दोनो ही दृष्टिकोण से विशेष रूप से विचारणीय है । ३ म्हारा नटनागर गोपाल लाल बिन, कारज कौन सुधारे । घूम रह्यो दुरयोधन राजा, जैसे गज मतवारो । सिह होय केर हस्ती¹ मारे, बड़ो भरोसो थारो । मीराँ ने राणा जी बरजै, मतना जनम बिडारे² । थे सगत साध की सीख्‍या, मत आयो महल हमारे । म्हे सगत साध की सीख्‍या, थांरे कछ्यु³ न सारे⁴ । तन मे रीस भई राणा के, उठ खडग ले मारे । प्याला मे विष घोल राणा जी, मन मे कपट बिचारे । अमृत कर के मीराँ पी गई, जहर सावरों झारे । जब जब पीड परी भक्तन पर, आप ही कृष्ण पधारे । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि भक्ताने न्यारे ॥२०२॥† १ हाथी, २ व्यर्थ खोना, ३ जरा भी, ४ सहारे ।

संघ गी अभिव्यक्ति १२७ “मीराँ ने ˙ ˙ ˙ न सारे” जैसी तीन पक्तियाँ कथोपकथन शैली मे लिखी गयी है । शेष सम्पूर्ण पद वर्णनात्मक शैली मे है । अन्तिम पक्ति अर्थ हीन है । ४ राणो म्हांरो काई करिहै, मीराँ छोड दई कुल लाज । विष को प्यालो राणाजी ने भेज्यो, मीराँ मारन काज । हँस के मीरा पाय गई है, प्रभु परसाद पर राग । डब्बो खोल मीराँ जब देख्यो, हैं गये सालिगराम । जै जै धुनि सब सत सभा भई, कृपा करि घनश्याम । सजि सिगार पग बाँध घूँघरू, दोऊ पर देती ताल । ठाकुर आगे नृत्य करत ही, गावत श्री गोपाल । साध हमारे हम साधन के, साध हमारे जीवन । साधुन मीराँ मिलि जा रही है, जिमि माखन मे घीव ॥२०३॥† प्रथम पक्ति के अतिरिक्त जो कथनोपकथन की शैली मे है, सम्पूर्ण पद वर्णनात्मक शैली मे है । ५ मेरो मन हरिसूँ जोर्यो, हरि सूं जोर्यो सकल सूं तोर्यो । मेरी प्रीति निरन्तर हरि सूं, ज्यूँ खेलत बाजीगर गोर्यो । जब मै चली साध के दरसण कूँ, तब राणा मारण को दोर्यो । जहर देन की घात विचारी, निरमल जल मे ले विष घोर्यो । जब चरणोदक सुण्यो सखणा१, राम भरोसे मुखमे ढोर्यो । नाचन लागी तब घूंघट कैसो, लोक लाज तिणका ज्यूँ तोर्यो । नेक बदी हूँ सिर पर धारी, मन हस्ती अंकुस दे मार्यो । प्रकट निसान बजाय चली मै, राणा राव सकल जग जोर्यो । ॥२०४॥† १ कानो से ।

१२८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह सम्पूर्ण पद में मीराँ का नाम या ऐसी कोई अभिव्यक्ति, जिसव आधार पर पद मीराँ रचित होना स्पष्ट हो सके, नही है । ६ यो तो रग धत्ता लाग्यो ए माय । पिया पियाला अमर रस का, चढ गई धूप घुमाय । या तो अमल म्हारे कबहुँ न ऊतरे, कोटि करो उपाय । सांप पिटारो राणा जी भेज्यो, द्यो मेडतणी गल डार । हँस हँस मीराँ कठ लैगायो, यो तो म्हारे नौसर हार । विष को प्यालो राणा जी भेज्यो, द्यो मेड़तणी प्याय । कर चरणामृत पी गई रे, गुण गोविन्दरा गाय । पिया पियाला नाम का रे, और न रग सुहाय । मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, काची रंग उड जाय । ॥२०५॥† प्रथम पक्ति का निम्नाकित पाठान्तर भी मिलता है — “यो तो रग म्हारे श्यामसुन्दर को जनम जनम नहि जाय ।” पाठान्तर १, किण विध कहूँ, कहण नही आवै, रह्यो घुमाय घुमाय । गुरु प्रताप साध री सगत, हरिजन मिलिया आय । किरपा करो तो प्रभु जी ऐसी कीज्यो, दूजी नाही सुहाय । राणा जी विषरा प्याला भेज्यो, म्हे सिर ल्यो चढाय । चरणामृत को जब लीनो पीगी प्रेम अघाय । पीवत ही अति चढी खुमारी, रह गई कहत सुमाय । जिन मीराँ की पनवारी कीन्ही, पूरब जनम के भाय । पाठान्तर २, किंण विध कहूँ कहण नही आवै, चढ्यो घुमाय । गुरु प्रताप साध री सगत, हरिजन मिलिया आय ।

संघर्षाभिव्यक्ति १२९ किरपा करि मोहि अपनाई, सब दुख दियो मिटाय। राणा जी विषरा प्याला भेज्यो, म्हे सिर लियो चढाय। चरणामृत को नामज लीनो पीगी प्रेम बहाय। पीवत ही अति चढि खुमारी अब थिर रह्यो न जाय। जिन मीराँ मनवारी कीन्ही, पूरब जनम के भाय। पद के तीनो ही पाठो पर सत मत का प्रभाव दृष्टिगत होता है। यह प्रभाव पहले और दूसरे पाठान्तरो पर कुछ विशेष स्पष्ट हो जाता है। पहले और दूसरे पाठान्तरो मे 'जिन मीराँ' का प्रयोग भी विचारणीय है। राजस्थानी गेय परम्परा के अनुसार लय संगति के हेतु जिण शब्द का जिन हो जाना स्वाभाविक है। ७ गिरधर के मन भाई हो राणा जी! लोकलाज कुल की मरजादा, मै तो छोडी है सकल बड़ाई। पूरब जनम की मै तो गोपिका चूक पडी मुझ मांही। जगत लहर व्यापी घट भीतर दीनी हरि छिटकाई। जैमल के घर जनम लियो है राणा ने परणाई। भोग रोग होय लागा मोरी सजनी गति प्रगट होय आई। मात पिता सुत बाधव भाई, या सब झूठी सगाई। परम सनेही प्रीतम प्यारो, जासूं मै प्रीत लगाई। जो थे पकडोरा हाथ हमारो तो खबरदार मनमाही। देवगी सराप मै साचां मन सूं, कल जल भसम होय जाई। जनम जनम की दासी राम की थांरी नही लुगाई। थारे मारे१ फीरो सो२ सगपण३ गावै मीराँबाई ॥२०६॥+ अभिव्यक्ति के आधार पर ही पद की प्रमाणिकता विशेष रुपेण संदिग्ध है। "जैमल घर जन्म लियो है" जैसी अभिव्यक्ति का कोई १ म्हारे राजस्थानी के अनुसार शुद्ध है, २ फीरोसो (फिरोसो) हलका सा, ३ सम्बन्ध। ६

१६० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ऐतिहासिक आधार अद्यावधि प्राप्त नही। कुछ विद्वानो के मतानुसार मीराँ जैमलकी ही पुत्री ठहरती है, परन्तु इस पहलू के समर्थन मे पर्याप्त प्रमाण नही मिलते है। पद की छठी पंक्ति मे अर्थ सगति का अभाव है। ब्रजभाषा में प्राप्त पद १ माई री मे सावन्निया जान्यो नाथ। लेन परचो अकबर आयो, तानसेन ले साथ। राग तान इतिहास श्रवन करि, नाय नाय सिर माथ। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, कीन्ह्यो मोहि सनाथ ॥२०७॥ तानसेन को साथ लेकर मीराँ के पास अकबर के आने की जन- श्रुति है। परन्तु सामग्री के आधार पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से ऐसा होना सम्भव नही। अस्तु, जब तक ऐसे पदो के समर्थन मे कोई विशेष प्रमाण न मिले इनको प्रक्षिप्त मान लेना ही युक्तियुक्त प्रतीत होता है। २ मीराँ मगन भई हरि के गुण गाय। साप पेटारा राणा भेज्या, मीराँ हाथ दियो जाय। न्हाय धोय जब देखण लागी, सालिगराम गई पाय। जहर का प्याला राणा भेज्या, अमृत दीन्ह बनाय। न्हाय धोय जब पीवण लागी हो अमर अचाय। सूल सेज राणा ने भेजी, दीज्यो मीरा सुलाय। मीराँ के प्रभु सदा सहाई, राखे विधन हटाय। भजन भाव मे मस्त डोलती, गिरधर पै बलि जाय ॥२०८॥† “सूल सेज ˙ ˙ सुलाय” के बाद निम्नांकित एक और पंक्ति भी कही कंही मिल जाती है। “साझ भई मीरा सोवण लागी, मानो फूल बिछाय।”

संघर्षाभिव्यक्ति १३१ “सूल सेज” भेजे जाने की कथा का वर्णन इस पद की विशेषता है। सम्पूर्ण पद की शैली वर्णनात्मक है। अतः यह कहा जा सकता है कि किसी अन्य व्यक्ति ने मीराँ की प्रशंसा मे यह पद लिखा है। खड़ी बोली में प्राप्त पद १ तेरा मेरा जिवडा यक कैसे होय राम। हमने कहा सुरझावन राणा, तुम जाने मुरझाय राम। हमने कहा निर्मोहित रहना, तुमतो जान मोहाय राम। तेल जले तो जलती है बाती, दिवरा झलमल सोय राम। जल गया तेल रे बुझ गई बाती, लच्चर लच्चर होय राम। हमने कहा आंखिन का देखा, तुम कानों सुनि सोय राम। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, होनहार सो होय राम। ॥२०९॥† पदाभिव्यक्ति मे संगति का अभाव है। गुजराती में प्राप्त पद १ आदि वैरागिण हुँ राणा जी मै आदि वैरागिण हुँ। मीराँ बाघ घूघरा रे, हाथ लिये करतार। अमोरे गिरधर आगे नाची सुँरे, गुनगाई सुँ रे गोपाल। विषना प्याला राना मोकलियो रे, दीज्यो मीराँ के हाथ। कर चरणामृत पी गया रे, अमोरे बासी श्री रघुनाथ ॥२१०॥† २ आज मोरे साधु जन नो संगेरे, राणा, मारा भाग्य भला रे। साधु जननो सग जो करिये, पिया जो चढे ते चौगुणो रंग रे। साक्ट जन नो सग न करिये, पिया जी पाड़े भजन मे भंग रे।

१३२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह अड़सठ तीरथ सतो ने चरणे, पिया जी, कोटि काशी ने कोटि गंगरे । निन्दा करसे तो नरक कुंड मा जशे, पिया जी, थशे आधला अपगरे । मीराँ कहै गिरधर ना गुण गायो, पिया जी, सतोनी रझमा शीरसगे रे । ॥२११॥ ३ मै तो छाडी छाडी कुल की लाज, रगीलो राणा काई करसे माणा राज । पाव मे बाधूगी घुँघरा, हाथ मे लेऊंगी सितार । हरि के चरणो आगे नाचती रे, काई रीझेगो करतार । जहेर को प्यालो राणा जी भेज्यो, धरियो मीराँबाई हाथ । करि चरणामृत पी गई रे श्री ठाकुर को परसाद । राणा जी ये रीस करी भेज्यो, झेरी नाग असार । पकड गले बिच डालियो, कांई हो गयो चन्दन हार । मीराँ को गिरधारी मिलिया, जनम जनम भरतार । मै तो दासी जनम जनम की, कृष्ण कत सरदार ॥२१२॥† ४ गोविन्दो प्राणो अमारो रे, मने जग लाग्यो खारो रे । गोविन्द । मने मारो राम जी भावे रे, बीजो मारे नजरो न आवै रे । ,, मीराँ बाई माँ महल मा रे, हरि संतन नो वास । ,, कपटी थी हरि दूर बसे, मारा सतन केरी पास । ,, राणा जी कागज मोकले रे, दो राणी मीराँ ने हाथ । ,, साधुनी संगत छोड़ि दो, तमो वसो नी हमारे साथ । ,, मीराँ बाई कागज मोकले रे, दीजो राणा जी ने हाथ । ,, राज पाट तमे छोड़ी राणा जी, वसो साधु ने साथ । ,, विष नो प्यालो राणो मोकलिया रे, पीजो मीराँ ने हाथ । ,, अमृत जानी मीरा पी, जे ने सहाय श्री विश्वनाथ । ,, साढ़वाला साढ़ शनगारजे रे,-जावुं सो सो रे कोश । ,,

संघर्षाभिव्यक्ति १३३ राणा जी ना देशमा मारे जलरे पीवा नो दोशं । ,, डाबो मैल्यो मेवाड रे, मीराँ गई पश्चिम माय । ,, सरब छोड़ी ने मीराँ नीसयो, जेयुँ भायामा मनहु न काय । ,, सासु हमारी सुषमणा ॰रे, ससरो प्रेम सन्तोष । ,, जेठ जगजीवन जगत मा, भारो नावलियो निर्दोष । ,, चूँदड़ी ओढूँ त्यारो रंग चुवे रे, रग बेरंगी होय । ,, औढूँ छुँ कालो कामलो, दूजौ दाग न लागे कोय । ,, मीराँ हरिणी लाडली रे, रेहती संत हजूर । ,, साधु संघाते स्नेह घणो, पेला कपटी थी दिल दूर ॥२१३॥† उपर्युक्त पद राजस्थानी मे प्राप्त संघर्ष द्योतक विभिन्न पदो के विभिन्न अशो का सम्मिश्रण ही प्रतीत होता है। पद के उत्तरार्द्ध से सत मत का प्रभाव स्पष्ट है। इसी तरह की अभिव्यक्ति अन्य सत मत प्रभावद्योतक पदो मे भी मिलती है। ५ म्हांरे सिर पर सालिग्राम, राणाजी म्हारे काई करसी । मीराँ सूं राणा ने कही रे, सुण मीराँ मोरी बात । साधो की संगत छोड़ दे रे, सखियां सब सकुचात । मीराँ ने सुन यो कही रे, सुन राणा जी बात । साध तो माई बाप हमारे, सखियां क्यूँ घबरात । जहर का प्याला भेजियारे, दीजो मीराँ हाथ । अमृत कर के पी गई रे, भली करें दीनानाथ । मीराँ प्याला पी लियारे, बोली दोउ कर जोर । तैं तो मारण की करी रे, मेरो राखणहारो और । आधे जोहड़ कीच है रे, आंध जोहड हौज़ । आंध मीराँ एकली रे, आंधे राणा की फौज । काम क्रोध को ड़ालकेर, सील लिए हथियार ।

१३४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह जोती मीराँ एकली रे, हारी राणा की धार। काचगिरी का चौतरा रे, बैठे साध पचास। जिन मे मीराँ ऐसी दमके, लख तारो मे परकास। टाडा जब वे लादिया रे, बेगी दीन्हा जाण। कुल की तारण अस्तरी रे, चली है पुष्कर न्हाण ॥२१४॥ पद की शैली और अभिव्यक्ति ही पद को प्रक्षिप्त सिद्ध करती है। पद का प्रारम्भ होता है दृढ विश्वास की अभिव्यक्ति से, परन्तु दूसरी ही पंक्ति मे भावना बदल जाती है। चार पक्तियो मे राणा और मीराँ के बीच संवाद है। संवाद की अभिव्यक्ति विरोधमय है। शेष पदाश से मीराँ का गहरा सघर्ष और दृढ भक्ति भावना की ही प्रशस्त अभिव्यक्ति होती है। अन्तिम दोनो पक्तियाँ घटनाद्योतक हैं जिनसे मालूम होता है कि “कुल की तारण अस्तरी” मीराँ पुष्कर नहाने के लिए जा रही हैं। ── ० ──

मिलन और बधाई राजस्थानी में प्राप्त पद १ म्हारा ओलगिया१ घर आया जी। तन की ताप मिटी सुख पाया, हिलमिल मगल गाया जी। घन की धुनि सुनि मोर मगन भया, यूं मेरे आणंद आया जी। मगन भई मिलि प्रभु आपणा सूं, मै कर दरध मिटाया जी। चंद को देखि कमोदणि फूले, हरखि भया मेरी काया जी। रग रग सीतल भई मेरी सजनी, हरि मेरे महल२ सिधाया जी। सब भगतन का कारज कीन्हा, सोई प्रभु मै पाया जी। मीराँ बिरहणी सीतल होई, दुख द्वन्द दूरी नसाया जी ॥२१५॥ २ सहेलिया साजन घर आया हो। बहोत दिना की जोवती३, बिरहिन पिव पाया हो। रतन करु नेछावरी, ले आरति साजू हो। पिया का दिया सनेसड़ा४, ताहि बहोत निवाजू हो। पांच सखी इकट्ठी भई, मिलि मगल गावै हो। पिय की रली५ बधावणा आंनन्द अंगि न मावै६ हो। १ परदेश रहता प्रियतम, २ अभिसार के लिये नियुक्त कक्ष विशेष के लिये रुढ़िगत मुहावरा, ३ प्रतीक्षा करती, ४ संदेश, ५ मलगमय, ६ समाये।

१३६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह हरि सागर सू नेहरो१, नैणा बांध्यो सनेह हो। मीराँ सखी के आंगणै, दूधां बूंठा२ मेह हो ॥२१६॥ पद पर सतमत का प्रभाव स्पष्ट है। "मीराँ सखी' का प्रयोग सर्वथा नूतन है। अत्युक्ति न होगी यदि कहा जाय कि यही एक पद ऐसा है जिसमे इस तरह का प्रयोग मिलता है। पद की चतुर्थ पंक्ति की अभिव्यक्ति शेष पदाभिव्यक्ति के विरुद्ध पडती है क्योकि उपर्युक्त पक्ति से वियोग ही लक्षित होता है। छठी पक्ति मे “प्रिय की लीनी 'बधावणा' प्रयोग है। राजस्थानी की परम्परा पर दृष्टि रखते “प्रिय का रली बधावणां" पाठ ही शुद्ध ठहरता है। ३ रामजी पधारे धनि आज री घरी। आज री घरी वो भाव री भरा। गुरु रामानद अर माधवाचारन, नीमानन्द बिसर स्याम हरी। आजि मेरो आगण सुहावणूं, रसण लागे पी पेम हरी अरसि परसि मिलि हरिगुण गास्या,धनि मेरी इर्षा इन भाव भरी मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, पकडि पावौ विधाता पेम हरी ॥२१७॥ अभिव्यक्ति के आधार पर पद की प्रामाणिकता संदिग्ध है। पाँचवी और अन्तिम पक्तियो के उत्तरार्द्ध अर्थहीन प्रतीत होते हैं। 'गुरु रामानन्द माधवा चारेन और नीमानन्द के आगण मे आने की अभि- व्यक्ति प्राप्त सामग्री के आधार पर सगत सिद्ध नही होती । ४ राम सनेही सावरियो, म्हांरी नगरी में उतर्यो आई। प्राण जाय पणि३ प्रीत न छाडूूं, रहौ चरण लपटाय। १ प्रेम, २ बूंठाँ-मेह—दूध की वर्षा से भर गया, उत्साह और आनन्द से परिपूर्ण हो गया, ३ तथापि ।

मिलन और बधाई १३७ सपत¹ दीप की दे परकरमा, हरि हरी मे रहौ समाय । तीन लोक झोली मे डारै, धरही ती कियो निपान² । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, रहौ चरण लपटाय ॥२१८॥ प्रथम पंक्ति मे प्रयुक्त 'राम स्नेही' प्रयोग विचारणीय है। पद की तृतीय पंक्ति से सतमत की भावना ही स्पष्ट हो उठती है जब कि शेष पद मे वैष्णव प्रभाव ही लक्षित होता है। यह भी विचारणीय प्रश्न है। ५ गिरधर आवणा है ऊदाँबाई लेजडली संवार । आवण री बिरिया³ भई जी, अब महलां ढोल्यो⁴ ढार । अँतर⁵ सुगंध मिलाय के जी, घी भर दिवला बार । जाई जुही केतकी जी, चपा कली सुधार । पलकां सू करां पावडाजी, अंचला सू मग झार । गिरधर म्हारो परम स्नेही गिरधर उनकी नार ॥ २१९ ॥ निम्नांकित दो पंक्तियाँ और भी मिलती है . पुष्पन सो झोली भरी, रुचि रुचि सेज संवारि । चारुं दिस फिरती फिरै, ऊदाँ चमेली लार⁶ । अद्यावधि प्राप्त पदों से मीराँ के प्रति ऊदाँ का विरोध भाव ही लक्षित होता रहा है। यही एक पद भक्ति के क्षेत्र मे मीराँ और ऊदाँ की निकटता का द्योतक है। ६ म्हांरे आज रंगीली रात, मनडरा म्हरम आइया । या छिब निरखण सुगन⁷ मनावण, अतर सुगध लगावण । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मन अंछ्या⁸ बर पावण । ॥२२०॥ १ सप्त, २ नाप दिया, ३ समय, ४ अतिथि अभ्यागत के लिये बनाए गए छोटे पलग, ५ इत्र, ६ पीछे, ७ सगुण, ८ इच्छित ।

१३८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ७ रे सांवलिया म्हारे आज रगीली गणगोर छै जी । काली पीली बादली मे बिजली चमके, मेघ घटा घनघोर छै जी । दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल कर रही शोर छै जी । आप रंगीली, सेज रंगीली, और रगीली सारो साथ छै जी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरना मै म्हांरो जोर छै जी । ॥२२१॥† गणगोर (शिवपार्वती) का उत्सव मनाने की अभिव्यक्ति के कारण पद की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध है। विस्तृत विवेचना के लिये देखे, ‘मीरा, एक अध्ययन’ आलोचना खड । ८ म्हाके जी गिरधारी, थासूं म्हे बोले। थे तो म्हौरा जनम जनम रा सगी, थारे लारे लारे१ सग मे डोले हो। आदि तन मन धन मेरे, आनन्द करा कलोले२। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, आन मिल्यो अनमोले ॥२२२॥† पदाभिव्यक्ति अर्थहीन है। १ पीछे-पीछे, २ कल्लोल।

मिलन और बधाई १३६ मिश्रित भाषा में प्राप्त पद । १ तनक हरि चितवौ जी मेरी ओर । हम चितवत तुम चितवत नही, दिल के बडे कठोर । मेरो आसा चितवनि तुमरी, और न दूओ दोर । तुम से हमकू कबर मिलोगे, हम्सी लाख करोर । उमी ठाढी अरज करत हू, अरज करत भयो मोर । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, देस्यूँ प्राण अकोर ॥२२३॥† आराध्य के निकट रहते हुए भी न बोलने की अभिव्यक्ति एक और पद मे भी मिलती हैं, यद्यपि इस पद की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध हैं । 'बृहद्राग रत्नाकार' में निम्नांकित पद प्राप्त हैं जिसकी प्रथम दो पंक्तियाँ उपर्युक्त पद की प्रथम दो पंक्तियो से हूबहू मिलती है। बहुत सम्भव है कि कृष्णप्रिया का ही यह पद मीराँ के नाम पर प्रचलित हो गया है । तनक हंस हेरो मेरी ओर। हम चितवत तुम चितवत नाही, काहे भई हो कठोर । निस दिन तुमरो ही नाम रटत हो, चातक ज्यो घनघोर । कृष्णाप्रिया दर्शन के लोभी, जैसे चन्द्र चकोर । (पद २५७, पृष्ठ ७१,) २ आज सखी मेर आनन्द भयो है, घर मे मोहन लाघोरी । बन जोईं वृन्दावन जोईं, जोईं बिरज सब बाघोरी । सतवे मलिये अजब झरोखे, कही ते हरि जी लाघोरी । म्हारा तो घर में मही घनेरी, हरी चोर चोर दधि खाधोरी ।

१४० मीराँ-बृहद्-पद संग्रह अपने द्वार मै कब की ठाढी, बाह पकरि हरि साधोरी । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, मिलियो बिरह बाजन बाघोरी । ॥२२४॥† असंगत अभिव्यक्ति के आधार पर पद की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध है। उपर्युक्त दोनो पदो की भाषा प्रधानत. ब्रजभाषा है यद्यपि कुछ ठेठ राजस्थानी शब्दों का प्रयोग भी है। ३ आण मिल्यो अनुरागी (गिरधर) आण मिल्यो अनुरागी। सांसो१ सोच अंग नहि, अब तो तिस्ना२ दुबध्या३ त्यागा। मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, स्याम बरण४ बड भागी। जनम जनम के साहिब मेरो, वाही से लौ लागी। अपण पिया सग हिलमिल खेलूँ, अधर सुधारस पागी। मीराँ के गिरधर नागर, अब के भई सुभागी ॥२२५॥† पदाभिव्यक्ति से सतमत और वैष्णव मत दोनो का ही प्रभाव इंगित होता है। १ सशय, २ तृष्णा, ३ दुविधा, ४ वर्ण।