मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
१८८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह १२ में गिरधर रग राती, सैया मै। पचरग चोला पहर सखी मै झिरमिट खेलन जाती। ओह झिरमिट मा मिल्यो साव रो खोल मिली तन गाती। जिन का पिया परदेस बसत है, लिख लिख भेजे पाती। मेरा पिया मेरे हीय बसत है, ना कहू आती जाती। चदा जायगा सूरज जायगा, जायगी धरणी अकासी। पवन पाणी दोनूँ हीँ जा येगे, अटल रहै अविनासी। सुरत निरत का दिवला सजोले, मनसा की करले बाती। प्रेम हटी का तेल मगा ले, जगे रह्या दिन राती। सतगुरु मिलिया सासा भाग्या, सैन बताई साची। ना घर तेरा न घर मेरा, गावै मीराँ दासी ॥३०३॥ १३ सखी री मै तो गिरधर के रग राती। पचरग मेरा चोला रगा दे, मै झुरमट खेलन जाती। झुरमुट मे मेरा साई मिलेगा, खोल आडम्बर गाती। चदा जायगा सूरज जायगा, जायगा धरण अकासी। पावन पाणी दोनो ही जायगे, अटल रहे अविनासी। सुरत निरत का दिवला सजोले, मनसा की कर बाती। प्रेम हटी का तेल बना ले, जगा करे दिन राती। जिनके पिय परदेस बसत है, लिख लिख भेजे पाती। मेरे हिय मो माहि बसत है, कहूँ न आती जाती। पी हर बसूँ न बसूँ सास घर, सतगुरु शब्द सगाती। ना घर मेरा ना घर तेरा, मीराँ हरि रग राती ॥३०४॥ उपर्युक्त तीनो पदो की भाषा व अभिव्यक्ति विशेष विचार- णीय है। तीनो ही पदो की भाषा अपेक्षाकृत अधिक आधुनिक है
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १८९ और तीनो पर ही सत मत का प्रभाव विशेष रूप से स्पष्ट हो उठा है । यह पद उपर्युक्त दोनो पदो (स० ३०२ और ३०३) के सम्मिश्रण से बना हुआ एक नया रूपान्तर मात्र प्रतीत होता है ।) *१४ सांवरे रग राची, राणाजी हू तो । बाध घूघरा प्रेम का, हू हरि आगे नाची । एक निरखत है एक परखत है, एक करत मोरी हासी । और लोग म्हारो काई करसी, हू हरि जी की दासी । राणो विष को प्यालो भेज्यो, हू तो हिम्मत काची । मीराँ चरणा लाग रही छै, साची ॥३०५॥ यह पाठ पहले चार पाठो के ही अधिक निकट पडता है। इसकी भाषा मिश्रित है तथापि राजस्थानी की ओर ही विशेषत झुकी हुई है। भावाभिव्यक्ति मे एक नूतनता है, “हू तो हिम्मत की काची” । जैसी अभिव्यक्ति अन्य प्राय प्राप्त पदो मे मीराँ पीवत हासी” जैसी अभिव्यक्ति के विरुद्ध पडती है। विभिन्न पदो का सम्मिश्रण ही इस पद का आधार प्रतीत होता है । १५ राणाजी हो मै साधुन रग राती । काहू को पिया परदेस बसत है, लिख लिख भेजती पाती । मेरो पियो मेरे माहि बसत है, कहि न सकूँ सरमाती । सहो कसूमी ओढ दुपट्टी, झुरमुट खेलन जाती । झुरमुट खोल मिले यदुनन्दन, खोल मिली मिल साती । और सखी मद पीवन भाई, मै मद की मदमाती । मै मद पियो पचवटी को, छकी रहूँ दिन -राती । सुन्न सिखर के द्वारे आके, मोहि मिले अविनासी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, जनम जनम की दासी ॥३०६॥
१६० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह इस पद को विभिन्न भी कुछ परिवर्तन के साथ चला हुआ पदो का सम्मिश्रण ही कहा जा सकता है। १६ राम तने रग राची, राणा मै तो सावलिया रग राची। ताल पखावज मिरदग बाजा, साधो आगे नाची रे। कोई कहे मीराँ भई बावरी, कोई कहै मदमाती रे। विष का जो प्याला राणा भर भेज्या, अमृत कर आरोगी१ रे। मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर जनम जनम की दासी रे। ॥३०७॥ विभिन्न पदो का सम्मिश्रण ही इस पद का भी आधार प्रतीत होता है। १७ गोपाल रग राची, मै श्याम रग राची। कहा भयो जल विषय के खाये, तिनहुते बॉची। तात मात लोग कुटुम्ब तिन कीनी उपहासी। नन्द नन्दन गोपी ग्वाल तिनके आगे मै नाची। और सकल छाँडे के मै भक्ति काछ कॉची। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जानत झूठी साँची ॥३०८॥ उपर्युक्त दस पदो मे एक गहरा साम्य है। यहाँ तक कि सरसरी दृष्टि से देखने पर ये सभी पद एक दूसरे के गेय रूपान्तर से प्रतीत होते हैं। परन्तु इन पर विचार करने से दो शैलियाँ सर्वथा स्पष्ट दीखती है। "राँची", "साँची", "नाची" आदि तुकान्त पद एक शैली विशेष के है। ऐसे पदो पर कही कही सतमत का हल्का सा प्रभाव मिल जाता है, फिर भी इनकी भावाभिव्यक्ति प्रधानत वैष्णव- परम्परा से ही प्रभावित है। ऐसे पदो की भाषा भी कुछ राजस्थानी १ खा लिया, यहा होगा पी लिया।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १६१ की ओर झुकी हुई है। “राती”, “माती”, “पाती” आदि तुकान्त पद दूसरी शैली के हैं। इनकी भावाभिव्यक्ति पूर्वोक्त पदो की अभि- व्यक्ति से सर्वथा भिन्न पड़ती है। इन पर सतमत का ही स्पष्ट प्रभाव है इनकी भाषा भी खडी बोली से प्रभावित ब्रजभाषा है। १८ भीड छाडि बीर बैद मेरे पीर न्यारी है। करक कलेजे मारी ओखद न लागै कारी। तुम घरि जावो बैद मेरे पीर भारी है। बिरहित बिरह बाढयो, तातै दुख भयो गाढो। बिरह के बान ले बिरहनि मारी है। चित ही पिया की प्यारी नेक हूँ न होवे न्यारी। मीराँ तो आजार बाँध बैद गिरधारी है। ॥३०९॥ सूर्यनारायण जी चर्तुवदी के अनुसार यह पद मीराँ का नही अपितु “मीराँ लीला” करन वालो का है। पद की शैली को देखते हुए मै भी निसकोच उनका समर्थन करती हूँ। १९ हरि बिन कूँण¹ गति मेरी। तुम मेरे प्रतिपाल कहिये, मे रावरी चेरी। आदि अत निज नाव तेरो, हिया मे फेरी। बरि बेरि पुकारि कहू, प्रभु आरति है तेरी। यो ससार बिकार सागर, बीच मे घेरी। नाव फाटी प्रभु पाल बाधो, बूडत है बेरी। विरहणी पिव की बाट जोवै, राखिल्यो नेरी²। दासी मीराँ राम रटत है, मै सरण हूँ तेरी ॥३१०॥ १ कौण, २ निकट।
१६२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह पद की भाषा प्रमुखत ब्रजभाषा है। परन्तु “कूँण” “नेरी” आदि दो एक राजस्थानी शब्दो का प्रयोग भी हुआ है। पद की छठी पक्ति मे “बेरी” शब्द का अर्थ स्पष्ट नही होता। बहुत संभव है कि बार बार के अर्थ मे यहां “बेरी” का प्रयोग हुआ हो । २० हरि तुम हरो जनु की भीर। द्रौपदी की लाज राख्यो, तुम बढ़ायो चीर। भक्त कारन रूप नरहरि, धार्यो आप सरीर। हरिनकस्यप मार लीन्हो, धर्यो नाहि न धीर। बूडते गजराज राख्यो, कियो बाहर नीर। दास मीरा लाल गिरधर, दुख जहाँ तहाँ पीर। ।।३११।। अन्तिम पक्ति के उत्तरार्द्ध मे प्रयुक्त “पीर” शब्द निरर्थक ही प्रतीत होता है। बहुत सम्भव है कि “सीर” शब्द का एतदर्थ द्योतक किसी अन्य शब्द का प्रयोग हुआ हो। “सीर” राजस्थानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है “साथ” या “साथ देने वाला”। अत अर्थ देखते हुए “सीर” का प्रयोग उपयुक्त ही लगता है। पाठान्तर मे “सीर” का प्रयोग मिलता भी है। पाठान्तर १, हरी तुम हरौ जन की भीर। द्रौपदी की लाज राखी, तुरत बढायो चीर। भगत कारण रूप नरहरी धार्यो नोहिन धीर। बूडतो गजराज राख्यो, कियो बाहर नीर। दासी मीराँ लाल गिरधर, करण कँवल पै सीर। पाठान्तर मे “सीर” शब्द “सिर” या “मस्तक” के ही अर्थ मे आया है। कहना सम्भव नही कि कौन पाठ प्रामाणिक है।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १९३ २१ मन रे परसि हरि के चरण। सुभग सीतल कवल कोमल, त्रिविध ज्वाला हरण। जिण चरण प्रहलाद परसे, इन्द्र पदवी धरण। जिण चरण ध्रुव अटल कीन्हे, राखी अपनी शरण। जिण चरण ब्रह्मांड प्रभु परसि लीणो, तरी गौतम धरण। जिण चरण काली नाग नाथ्यो, गोपी लीला करण। जिण चरण गोबरधन धार्यो, इन्द्र को गर्व हरण। दासी मीराँ लाल गिरधर, अगम तारण तरण। ॥३१२॥ पद की भाषा शुद्ध ब्रजभाषा है। अत प्रत्येक पंक्ति का प्रथम शब्द “जिण” न होकर “जिन” होना ही अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। २२ मै तो तेरी सरण परी रे, राम, ज्यूँ जाणे ज्यूँ तार। अड़ेसठ तीरथ भ्रमि भ्रमि आयो, मन नाहि मानि हार। या जग मे कोई नही आपणा, सुणियौ श्रवण मुरार। मीरां दासी राम भरोसे, जग का फंदा निबार। ॥३१३॥ पद की तृतीय पंक्ति का उत्तरार्द्ध अर्थहीन है। बहुत सम्भव है कि “सुणियौ कृष्ण मुरार” पाठ हो। ऐसा होने पर सम्बोधन की पुनरुक्ति अवश्य हो जाती है, तथापि अर्थ संगति बैठ जाती है। २३ नहि ऐसो जनम बारम्बार। का जाणूँ कुछ पुण्य प्रगटे, मानुसा अवतार। बढत छिन छिन घटत पल पल, जात न लागे बार। बिरछ के ज्यूँ पात टूटे, बहुरि न लागे, डार। १३
१६४ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह भौ सागर अति जोर कहिए, अनत उडी बार। राम नाम का बाध बड़ो उतर परले पार। ज्ञान चोसर, मडी चोहट्ट, सुरत पासा सार। या दुनियाँ मे रची बाजी, जीत भावै हार। साधु सन्त महन्त ज्ञानी, चलत करत पुकार। दास मीराँ लाल गिरधर, जीवणाँ दिन च्यार। ॥३१४॥ पाठन्तर १, नहि ऐसो जनम बारम्बार। क्या जानूँ कुछ पुण्य प्रगटे, मानुषा अवतार। बढ़त पल पल, घटत छिन छिन, जात न लागे बार। बिरछे के ज्यूँ पात टूटे, लगे नहि पुनि डार। भव सागर अति जोर कहिए‘ विषम औखी धार। सुरत का नर बाध बेड़ा, बेग उतरो पार। साधु सन्ता ते गहन्ता, चलत करत पुकार। दासी मीराँ लाल गिरधर, जी वणो दिन चार। उपर्युक्त पद सूरदास जी के पद का ही गेय रूपान्तर प्रतीत होता है (देखिये “मीराँ, एक अध्ययन”)। पाठान्तर पर सन्त-मत का प्रभाव स्पष्ट है। २४ यहि विधि भक्ति कैसे होय। मन की मैल हिये से न छूटी, दियो तिलक सिर धोय। काम कूकर लोभ डोरी, बाधि मोहि चडाल। क्रोध कसाई रहत घट मे कैसे मिले गोपाल। बिर्लार विषया लालची रे, ताहि भोजन देत। दीन हीन ह्वै क्षुधा तरसै, राम नाम न लेत।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १६५ आप ही आप पुजाय कै रे, फूलै अंग न समात । अभिमान टीला किए बहु, कहु जल कहां ठहरात । जा तेरे हिय अन्तर की जाणे, तासो कपट न बनै । हिरदे हरि को नाव न आवे, मुख ते मणिया गणै । हरि हितु सो हेत कर, संसार आसा त्याग । दासी मीराँ लाल गिरधर, सहज कर वैराग ।॥३१५॥ इस पद पर सन्त-मत का प्रभाव बहुत स्पष्ट है। २५ मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई। तात मात भ्रात बन्धु, अपना र्नहि कोई। छाडि दई कुल की कान, क्या करेगा कोई। सतन ढिग बैठि बैठि, लोक लाज खोई। चुनरी के किए टूक टूक, ओढ़ लीन्ही लोई। मोती मूँगे उतार, बन माला पोई। अंसुवन जल सीचि सीचि, प्रेम बेलि बोई। अब तो बेल फैलि गई, आनन्द फल होई। दूध की मथनिया, बडे प्रेम से बिलोई। माखन जब काढि लियो, छांछ पिये कोई। आई मै भक्ति काज, जगत देखि रोई। दासी मीराँ गिरधर प्रभु, तारो अब मोहि। ॥३१६॥ “दासी मीराँ गिरधर प्रभु” प्रयोग इस पद की विशेषता है। २६ मेरे तो राम नाम, दूसरा न कोई। दूसरा न कोई, सकल लोक जोई।
१६६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह भाई छोड़चा, बन्धु छोड़चा, छोड़चा सगासोई । साध संग बैठि बैठि, लोक लाज खोई । भगत देखि राजी भई, जगत देखि रोई । प्रेम नीर सीच सीच, विष बेलि धोई । दधि मथ घृत काढ़ि लियो, डार दियो छोई । राणा विष को प्यालो भेजियो प्रिय मगन होई । अब तो बात फैलि गई, जानै सब कोई । मीरां राम लगन लगी, होनी होय सो होई ॥३१७॥ इस पाठ विशेष मे भी प्रथम पंक्ति मे प्रयुक्त "राम" के बदले गिरधर नागर का भी प्रयोग मिलता है। "गिरधर नागर" पाठ ही विशेष रूपसे प्रसिद्ध है क्योकि प्रचलित मान्यतानुसार मीराँ कृष्ण की की ही उपासिका मानी जाती है । २७ गोविन्द सूं प्रीत करत, तबही क्यूँ न हटकी । अब तो बात फैल गई, जैसे बीज बटकी । बीच को विचार नाहि, छाँय परी तटकी । अब चूकौ तो ठौर नाहि, जैसे कला नट की । जल के बुरी गाठ परी, रसना गुन रटकी । अब तो छुड़ाय हारी, बहुत बार झटकी । घर घर मे घोल मठोल बानी, घट घट की । सब ही कर सीस धरि, लोक लाज पटकी । मद की हस्ती समान फिरत, प्रेम लटकी । दासी मीराँ भक्ति बुन्द, हिरदय बिच गटकी ॥३१८॥ यह पद भी सूरदास जी के पद का ही गेय रूपान्तर भर प्रतीत होता है। (देखिये मीराँ, एक अध्ययन) ।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १६७ २८ सखी री लाज बैरन भई। श्री लाल गुपाल के संग्, काहे नाहि गई। कठिन क्रूर अकूर आयो, साजि रथ कँह नई। रथ चढाय गोपाल लैगी, हाथ मीजत रही। कठिन छाती स्याम बिछुरत, बिरह मे तन तई। दास मीराँ लाल गिरधर, बिखरे क्यो ना गई ॥३१९॥† २९ सखी मोहे लाज बैरन भई। चलत गुपाल लाल पिय के, सग क्यो ना गई। चलन चाहत गोकुल ही ते, रथ सजायो नई। बिरह व्याकुल होय सजनी, हाथ मल मल रही। कठिन छाती स्याम बिछुरत, बिदर क्यो ना गई। लेन अब संदेश पिय को, काहे पठऊँ दई। कूबरी संग प्रीति कीन्ही, मोहे माला दई। दास मीराँ लाल गिरधर, प्रान दछना दई। ॥३२०॥ पद की चतुर्थ और छठी पक्ति मे निम्नांकित पाठान्तर मिलतेहै। चतुर्थ पंक्ति . “रुकमनी संग जाइबे को, हाथ मीजत रही।” छठी पक्ति . “तुरत लिखि संदेस पिय को, काहि पठऊँ लई।” दोनो ही पाठो मे “दास मीराँ” प्रयोग मिलता है, यह विचारणीय है। ३० अब तो हरि नाम लौ लागी। सब जग को यह माखन-चोरा, नाम धर्यो बैरागी।
१६८ मीराँ-वृहद्-पद-सग्रह कह छोडी वह मोहन मुरली, कह छोडी सब गोपी। मूँड मुँडाई डोरि कह बाधी, माथे मोहन टोपी। मातु जसुमति माखन कारन, बाध्यो जाको पांव। श्याम किसोर भये नव गोरा, चैतन्य तांको नांव। पीताम्बर को भाव दिखावै, कटि कोपीन कसे। दास भक्त की दासी मीराँ, रसना कृष्ण रहे। ॥३२१॥ कहा जाता है कि यह पद मीराँ ने महाप्रभु चैतन्य देव को सम्बोधित कर बनाया था। अद्यावधि प्राप्त इतिहास के आधार पर मीराँ चैतन्य देव के समकालीन नही ठहरती। पद की अन्तिम पंक्ति भी विशेष विचारणीय है। पद से व्यक्त होती भावना के आधार पर महा- प्रभु चैतन्य स्वयं ही कृष्ण के अवतार सिद्ध होते है, परन्तु अन्तिम पंक्ति के अनुसार "दास भक्त" सिद्ध होते है। यह "दास भक्त" कौन है? "मीरा दास" नाम से लिखने वाले और इस "दास भक्त" मे भी एक रूपता हो सकती है या नही। यहाँ 'दास' का प्रयोग सभी भक्तो के लिये हुआ है, यह विशेष विचारणीय है। अभिव्यक्ति के आधार पर, मेरे विचार से, "दास भक्त" सम्बोधन किसी विशेष भक्त को ही लक्षित करता है।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १६६ गुजराती में प्राप्त पद १ सूं करु राना जी मारो चितड़ूँ चुरायै मारे मनहु बेधाये । करवा ना सूझे अगने घर नारे काम, भोजन न भावै नैन निद्रा हराम । जल जमनानो काठे ऊभा बलिभद्र वीर, बसरी बजावे वालो जमुना ने तीर । अभी बजारे गजरथ चाल्यो रे आय, स्वान् भसे तो तेनी सख्यान थाय । झख रे मारे रे पेला दुर्जन लोग, चितड़ूँ आटयूँ तो तेनी सिखामन फोक१ । ज्योँ स्यामलयो गिरधारी त्याँ मारी आस, हरिखी निरखी गया मीरा दास। ॥३२२॥† पदभिव्यक्ति मे पूर्वापर संबध का निर्वाह नही हुआ है। २ म्हारे घेरे आवो सुन्दर श्याम, सोले सनगार पेरो शोभता रे । मोतिडे माँग भरावुँ, वेणी गुँथावुँ, शोभे ढलकती हुं२ तो ऊभी राजद्वार । ऊँची हुं चहु ऊभेड़ेरी रे, जोऊ पातलियानी बाट । बेग पधारो म्हांरा ओ साएबा, तारे बेसणे माँटु पाट३ । मोर मुगट शोहामणो रे, गले गुँजा नो हार। मुख मधुरी तारे हो मोरली रे, तारी चालतणी छे बलीहार । दास मीराँ बाई गिरधर नागर, हर्खी निर्खी गुण गाय । कलयुग माँ अये अवतरियाँ४, मने राखोनी चरणे करो साथ ॥३२३॥† पूर्वापर सबंध का निर्वाह इस पद मे भी नही हुआ। पद की अन्तिम पंक्ति प्रामाणिकता के विरुद्ध गवाही देती है। १ व्यर्थ, २ मै, ३ पीढ़ा, ४ मै हम,
२०० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ३ विट्ठल वाहेला आवोरे, वाटडी जाऊ हरखि निरखि मन मोहियुँ रे वाही गाऊ। टेक। वाहला म्हारा रसोई बनावी छे, सारी^१ की धी^२ छे सुन्दर थारी रे। वाहला म्हारा केसर पिरसियो छे, प्रीते प्रभु जमो^३ पूरन प्रीत रे। वाहला म्हारा दालि भात ने कढी, वडी सामाग्री सव की धी रे। वाहला म्हांरा राइता शाक,पापड छे साराँ^४ तम जमो प्रीतम मारा रे। वाहला म्हांरा शरमाशो नही वारू कई कहे जो खाहुं खारुं रे। वाहला म्हांरा कनक नी झारी भरि लाई तमने आचमन लेव रावुँ रे। वाहला म्हारा मुखवास^५ लावी हूँ सारो, तमे उठो सेजे पधारो रे। वाहला म्हांरा हेते रहो भुज पास, गुण गाय तेरी मीरा दास रे ॥३२४॥† ऐसी हल्की भावाभिव्यक्ति वाले पदो की प्रामाणिकता सर्वथा अमान्य है। (देखे मीरा एक अध्ययन)। ४ जेने मारा प्रभुजी ने भक्ति न भावे रे, तेदे घर सीद जइये रे। जेने घर सन्त पाहुनो न आवे रे, तेने घर सीद जइये रे। स्वसुरो अमारो अग्नि नो भड़को, सासू सदानी सूली रे। एनी प्रत्ये मारु काई ना चाले रे, एने ऑगनिये नाखूं पूला रे। जेठानी हमारी भवरानु जालु, देयरानी तो दिल माँ दाजी रे। नान्ही ननद तो मो मचोकडे ते भाग्ये हमारे कर मे पाजी रे। .............. ,ते बलता माँ नाके, छे वारी रे। मारा घर पछवाड़े सीद पड़ी छे, बाई तु जीती हुं हारी रे। १ अच्छी, २ किया है, ३ भोजन करो, ४ अच्छा, ५ भोजनोपरान्त मुखशुद्धि हेतु पान आदि।
"दासी" और "जन" प्रयोग युक्त पद २०१ तेने खुणे बेसी ने मै तो झीनुँ कातिउं रे, ते नथि राख्युँ काई काचुँ रे । दासी मीरा बाई गिरधर गुन गावे, तारा ऑगनिए माँ थेइ थेइ नाचुँ रे । ॥३२५॥† उपर्युक्त पद की प्रथम दो पंक्तियाँ शेष पद से सर्वथा भिन्न पडती हैं। इन दो पंक्तियो को छोड कर शेष पद से एक निम्न स्तर के घरेलू जीवन का ही चित्र स्पष्ट हो उठता है। ऐसे पदो की प्रामाणिकता आमन्य ही प्रतीत होती है—(देखे,मीराँ,एक अध्ययन) पद की अन्तिम पंक्ति से भी अन्योक्ति ही स्पष्ट हो उठती है। ५ भजलो नी सन्तो भजला नी साधो, रामजी बिन्ना कैसो जीवन रे। तन तो बनाऊ तम्बूरो जीवन नो तार तनाऊ र् राम। बन बन बाजे घूघरा, जीवने लाइ लडाऊं राम। ऑगनिये अनियारा आटला (?) मन्दिर लीटया दीसे राम। शेर अनाज ने सेवता जीवडा जाता ने हीसे राम। काया ने आना आविया, ज्यो पाछा न पुरे राम। सात सहेली ना झूमख मा, जीवने नागल बरावे राम। तल तल होमिया, जरा आज्ञा न मोड़ूँ राम। जीवड़ो जाय तो आवा देऊ, हरी ने भक्ती ना छोड़ूँ राम। नी ने किनारे ˙नैने नीर बहे बडाऊ राम। कान्ह जी ने हाथ नी रेखा ड़े,बिन चम्पे कलियो आवे राम। दास मीरा बाई नी बिनती, डाकुर दासी तुझ गहाऊ राम ॥३२६॥† पद में पूर्वापर सम्बन्ध का अभाव है।
उपासना खण्ड
वैष्णव प्रभाव द्योतक पद निर्वेदाभिव्यक्ति राजस्थानी में प्राप्त पद १ थोडी थोडी पावो गिरधारी लाल जी, मोली¹ म्हांने आवै²। नदन बन सूं बूटी आई, जोग ध्यान दरसावै। या बूटी दुरलभ देवन के, सेस सहरू मुख गावै। शिव बिरचि जाको ध्यान धरत है, वेद पुरान सुनावै। मीराँ तो गिरधर रग राची, भक्ति पदारथ पावै ॥३२९॥ २ म्हारो मनडो लाग्यो हरि सूं, में अरज करु अतर सूं। माधुरि मूरत पलक न बिसरु, सोले हिरदै धरसूं। आवन कह गये अजहू न आये, बिन दरसण मै तरसूं। म्हारो जनम सुफल हुयो, जा दिन हरि के चरण परसूं। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तन मन अरपण करसूं ॥३३०॥ पद की तृतीय पंक्ति से वियोग लक्षित होता है। ३ मै थारे गुण रीझी हो रसिक गोपाल। निस बासर मोय आस तिहारी, दरसन द्यो नन्दलाल। १ नशा, २ चढता है।
२०६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह सो मद भगत करो जी न साधो, मत बिसरो नन्दलाल । काहू के चदो काहू के मदो, काहू के उर मे माल । प्रेम भरी मीराँ जिन गरजै, हिरदै गिरधर लाल । (येक) घडी घडी पल मोये जुग सम, बीतत हो गई हाल बेहाल । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, छुट गई जजाल ॥३३१॥† पदाभिव्यक्ति मे सगति नही है । ४ बाना¹ रो बिडद² दुहेलो रे । बाना पहर कहा गरबायो, मुक्ति न हामी खेलो (रे) । बाना रो प्रण-प्रह्लाद उबार्यो, बैर पिता सो गेल्यो (रे) । आगा धर पीछा मत ताको, दकतर नाहि चढैलो (रे) । मीराँ जी ने भक्ति कमाई, जहर पियालो गेल्यो (रे) । ॥३३२॥† श्री सूर्यनारायण जी चतुर्वेदी के मतानुसार यह पद सम्भवत मीराँ लीला करने वालो का है । "मीराँ जी ने भक्ति कमाई" जैसी अभिव्यक्ति के आधार पर इस मत की पुष्टि होती है । ५ हरि से गरब किया सोई हारा । गरब किया रतनागर सागर, जल खारा कर डारा । गरब किया लकापति रावण, टूक टूक कर डारा । गरब किया चकवे चकवी ने, रैन बिछोहा डारा । गरब किया बन की चिरभी ने, मुख कारा कर डारा । १ वेश भूषा, २ यश ।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २०७ इन्द्र कोप किया ब्रज ऊपर, नख पर गिरिवर धारा । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, जीवन प्राण हमारा । ॥३३३॥† चतुर्वेदी जी के मतानुसार इस पद की प्रामाणिकता भी संदिग्ध ही है, क्योकि शैली मे गहरा अन्तर है। मै भी चतुर्वेदी जी का समर्थन करती हूँ । ६ राणा जी करमारो सगाती१, कुल मे कन्हेंई नही । एक तो मात रे दोय दोय डीकरा, ज्या की न्यारी न्यारी भात२ । (वाकी न्यारी३ न्यारी करमा रेख) । एक तो राजाजी री गद्दी बैठिया, दूजो हलर बैल भर तो पेट । एक तो भाखा रे दोय दोय डीकरी, ज्या की न्यारी न्यारी भात । (वाकी न्यारी न्यारी कामा रेख) । एक तो मोतियन माग भरावती, दूजी घर घर की पनिहार । एक तो गऊ रे दो दो बछड़ा, ज्याकी न्यारी न्यारी राणा भांत । (वाकी न्यारी न्यारी करमां रेख) । एक तो महादेवजी रे मदिर नादियो, दूजो वणजारारे हाथ । एक तो कुम्हार रे दोय दोय मटकिया,ज्याकी न्यारी न्यारी राण भात । (ज्याकी न्यारी न्यारी करमा रेख) । एक महादेव जी रे मदिर जल, चढ़े दूजी चभारा रे हाथ। राणा जी करमां रो सगाती, जग मे कोऊ नही ॥३३४॥† सम्पूर्ण पद मे मीराँ का कही वर्णन नही है। “राणाजी” जैसे सम्बोधन के कारण सम्भवत मीराँ का कहा जा सकता है, परन्तु यह पहलू बहुत हल्का जान पड़ता है। शब्द योजना अन्य पदो के अनुकूल नही पड़ती। पद को प्रक्षिप्त मानना ही अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है। १ साथी, २ भाँति, तरह, ३ भिन्न भिन्न।
२०८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ७ साधू म्हांरे आइया हेली, वे गिरधर जी रा प्यारा। चरण धोय चरणामृत लेस्या, (हे) कलमल मेटन हार। प्राण तो अति प्रिय लागै, (हे) कबहुन करस्या न्यारा। प्रभु कृपा कीनी अति (मो) पर, सुधार्या जनम हमारा ॥३३५॥† यह पद मीराँ का है, ऐसा कही से भी स्पष्ट नही होता। चतुर्वेदी जी “प्रभु कृपा किनी अति”-के बदले “मीराँ के प्रभु गिरधर नागर” का व्यवहार करना उत्तम समझते है जिसका कोई कारण नही देते। ऐसा होने से प्रामाणिक पदो को छाँट लेना और भी कठिन हो जाता है। ऐसे पदो को मीराँ के नाम पर चलाने का प्रयास निरर्थक ही प्रतीत होता है। ८ बड़े घर ताली लागी, रे, म्हारा मन री डणारथ भागी रे। छीलटिये म्हारो चित नही रे, डांबरिये कुण जाव। गगा जमना सूं काम नही रे, मै तो जाय मिलूँ परियाव। हाल्या मोल्या सूं काम नही रे, मै तो जाय करु दरबार। काच कथीर सूं काम नही रे, म्हांरे हीरा रो व्योपार। भाग हमारो जागियो रे, भयो समंद सूं सीर। अमृत प्याला छाडि कै, कुण पिवै कडवी नीर। पीपा को प्रभु परचो दीनो, दिया रे खजीना पूर। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, घणी मिल्या छै हजूर ॥३३६॥ पदाभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है। ९ आंवो सखी रली करां दे, पर घर गवण निवारि। झूठो माणिक मोतिया री , झूठी जगमग जोति।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २०९ झूठा सब आभूषण री, साची प्रिया जी री प्रीति। झूठा पाट पटम्बरा रे, झूठा दीखनी चीर। साची पिया जी री गूदडी, जामे निरमल रहे सरीर। छप्पन भोग बुहाइ दे रे, ˙इन भोगिन मे दाग। लूण अलूणो ही भलो है, अपने पियाजी के साग¹। देखि विराणे निवाण कूं हे, क्यूं उपजावे खीज²। कालर³ आपणो ही भलो है, जामे निपज्वै⁴ चीज। छैल विराणे लाख को है, अपणे काज न होई। ताके सग सिधारता है, भला कहेसी न कोई। जाके सग सिधारता हे, भला कहे सन कोई। अविनासी सूं बालमा हे, जिन सूं साची प्रीत। मीराँ को प्रभु मिलिया हे, ऐसी ही भगति की रीत ॥३३७॥ पद से व्यक्त होती भावनाओ का अन्य भावाभिव्यक्ति से कोई समन्वय नही होता, पदाभिव्यक्ति मे भी सगति नही है। सम्भवत कीर्तन मडली का ही कोई गीत हो। १० राम मोरी बाहडली जी गहो। या भव सागर मझधार मे, थे ही निभावण हो। म्हारे ओगण⁵ धणा⁶ छै, हो प्रभु जी थे ही सहो तो सहो। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, लाज बिदर की बहो। ॥३३८॥ कही कही प्रथम पंक्ति मे प्रयुक्त “राम” सम्बोधन के बदले “श्याम’ सम्बोधन भी मिलता है। १ मारवाडी का शब्द है ‘सागे’ जिसका अर्थ है ‘साथ’। यहाँ लय मिलाने के लिये ही ‘सागे’ का ‘साग’ हो गया हो, ऐसा प्रतीत होता है, २ क्रोध, ३ कुरूप, ४ उत्पन्न हो, ५ अवगुण, ६ बहुत। १४