मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
श्लोकानुक्रमणिका
६६१
| अङ्काः/श्लोकाः | अङ्काः/श्लोकाः | ||||
|---|---|---|---|---|---|
| आश्रमं वत्स गन्तव्यं | १० | ३२ | एतत्तु मां दहति | १ | १२ |
| आहणिऊण सरोसं | २ | २० | एताः पुनर्हर्म्यगताः स्त्रियो | १० | ११ |
| इ | एता निषिक्तरजतद्रव | ५ | ४ | ||
| इच्छंतं मम णेच्छति ति | ८ | ३७ | एताभिरिष्टकाभिः | ३ | ३० |
| इदं गृहं भिन्नमदत्तदंडो | ६ | ३ | एता हसन्ति च रुदन्ति च | ४ | १४ |
| इदं तत्स्नेहसर्वस्वं | १० | २३ | एतेन मापयति भित्तिषु | ३ | १६ |
| इदानीं सुकुमारेऽस्मिन् | ६ | ३६ | एते हि विद्यद्गुणवद्धकक्षा | ५ | २१ |
| इंदे प्पवाहिअंते | १० | ७ | एतैः पिष्टतमालवर्णकनिभैः | ५ | ४६ |
| इयं रङ्गप्रवेशेन कलानां | १ | ४२ | एतैराद्र्रतमालपत्रमलिनैः | ५ | २० |
| इयं हि निद्रा नयनावलम्बि० | ३ | ८ | एतैरेव यदा गजेन्द्र | ५ | १८ |
| इह सर्वस्वफलिनः | ४ | १० | एत्थ मए विण्णविदा | ६ | २५ |
| ई | एदं दोशकलंडिअं | ८ | ३६ | ||
| ईदृशे व्यवहारानौ | ६ | ४० | एदेहि दे दशणहुप्पल्ल | ८ | २० |
| ईदृशैः श्वेतकाकीयैः | ६ | ४१ | एव्वं दूलमदिक्कते | १० | ५३ |
| उ | एशा णाणकमूशिका | १ | २३ | ||
| उज्जाणेसु सहासु अ | ६ | ७ | एशाशि वाशू शिलशिग्ग | १ | ४१ |
| उट्ठन्तपडन्ताह | १० | ३६ | एशे गुणलअणणिही | १० | १४ |
| उत्कण्ठितस्य हृदयानुगुणा | ३ | ३ | एशे पडामि चलणेशु | ८ | १८ |
| उत्ताशिता गच्छसि | १ | १९ | एशे म्हि तुलिदतुलिदे | ८ | ४५ |
| उत्तिष्ठ भोः पतितसाधु | १० | ३१ | एष ते प्रणयो विप्र | १ | ४५ |
| उदयति हि शशाङ्कः | १ | ५७ | एष भो निर्मलज्योत्स्नो | ६ | २४ |
| उदयन्तु नाम मेघाः | ४ | ३३ | एषा फुल्लकदम्बनीप | ५ | ३५ |
| उन्नमति नमति वर्षति | ५ | २६ | एषासि वयसो दर्पात् | १ | ४७ |
| उपरितलनिपातितेष्टको | ३ | २२ | एसो असोअबुच्छो | ३ | ३१ |
| ऋ | एह्येहीति शिखण्डिना | ५ | ३२ | ||
| ऋग्वेदं सामवेदं गणितम् | १ | ४ | ऐ | ||
| ए | ऐरावतोरसि चलेव | ५ | २३ | ||
| एककार्यनियोगेऽपि | ६ | १६ | ओ | ||
| एतत्तद्धृतराष्ट्रवक्र | ५ | ६ | ओशलध देध मग्गं | १० | ३० |
| ओहारिओ पवहणो | ६ | १२ |
६६२ मृच्छकटिकम्
क
| पाठः | अङ्काः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| कः श्रद्धास्यति भूतार्थं | ३ | २४ |
| ,, ,, | ५ | ३४ |
| कत्ताशददे णिण्णाणअश्व | २ | ५ |
| करिकरसमबाहुः | ७ | ५ |
| कञ्चुलुआ गोच्छड | १ | ५१ |
| कस्सट्ठमो दिणअरो | ६ | ९ |
| कस्स तुहं तणुमज्झे | २ | १६ |
| कर्हि कर्हि सुसहिअ | २ | ४ |
| कांश्चित्तुच्छयति प्रपूरयति | १० | ६० |
| का उण तुलिदं एशा | १० | ३८ |
| कामं नीचमिदं वदन्तु | ३ | ११ |
| कामं प्रदोषतिमिरेण | १ | ३५ |
| किं अच्छध वीसट्ठा | ६ | ५ |
| किं यात्यस्य पुराः शनैः प्रवहणं | ७ | २ |
| किं याशि धावशि पलाअशि | १ | १८ |
| किं यासि बालकदली | १ | २० |
| किं शवके वालिपुत्ते महि | ८ | ३४ |
| किं कुलेनोपदिष्टेन | ८ | २६ |
| , ,, | ६ | ७ |
| किं ते ह्यहं पूर्वप्रतिप्रसक्ता | ५ | २६ |
| किं त्वं कटीतटनिवे० | १ | २७ |
| किं त्वं पदैर्मम पदानि | १ | २२ |
| किं त्वं भयेन परिवर्तित- | १ | १७ |
| किं नु नाम भवेत्कार्यम् | ८ | २६ |
| किं नु स्वर्गत्पुनः प्राप्ता | १० | ४० |
| किं पेक्खध छिज्जंतं | १० | ४ |
| किं पेक्खध शप्पुलीशं | १० | २४ |
| किं भीमशेणे जमदग्निपुत्ते | १ | २९ |
| कुतो बाष्पाम्बुधाराभिः | १० | ४२ |
| कृत्वा शरीरपरिणाहसुख- | ३ | ६ |
| कृत्वा समुद्रमुदकोच्छ्रय- | ६ | २२ |
| कृत्वैवं मनुजपतेर्महद्व्यलोकं | ७ | ८ |
| केयमभ्युद्यते शस्त्रे | १० | ३६ |
| केशवगात्रश्यामः | ५ | ३ |
| को तं गुणरविदं | ६ | १३ |
| कोऽयमेवंविधे काले | १० | २६ |
| क्षीरिण्यः सन्तु गावो | १० | ६० |
| क्षेमेण व्रज बान्धवान् | ७ | ७ |
ख
| पाठः | अङ्काः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| खणेण गंठी खणजूलके मे | ६ | २ |
| खलचरित निकृष्टजात- | ८ | ३२ |
ग
| पाठः | अङ्काः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| गता नाशं तारा उप | ५ | २५ |
| गर्जन्ति शैलशिखरेषु | ५ | १३ |
| गर्जं वा वर्ष वा शक्र | ५ | ३१ |
| गुणप्रवालं विनयप्रशाखं | ४ | ३२ |
| गुणेषु यत्नः पुरुषेण कार्यः | ४ | २३ |
| गुणेष्वेव हि कर्तव्यः | ४ | २२ |
घ
| पाठः | अङ्काः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| घोणोन्नतं मुखमपाङ्ग | ६ | १६ |
च
| पाठः | अङ्काः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| चन्दनश्चन्द्रशीलाढ्यो | ६ | २६ |
| चाणक्केन जधा शीदा | ८ | ३५ |
| चालुदत्तविणाशाय | ८ | ४४ |
| चिन्तासक्तनिमग्नमन्त्रि | ६ | १४ |
| चिरं खलु भविष्यामि | १० | १७ |
छ
| पाठः | अङ्काः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| छन्नं कार्यमुपक्षिपन्ति | ६ | ३ |
| छन्नं दोषमुदाहरन्ति | ९ | ४ |
| छायार्थं ग्रीष्मसंतप्तो | ४ | १८ |
| छायासु प्रतिमुक्तशष्प० | ८ | ११ |
श्लोकानुक्रमणिका
६६३
ज
| श्लोक | अङ्कः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| जइ वज्जसि पादालं | २ | ३ |
| जदिच्छशे लंवदशाविशालं | ८ | २२ |
| जधा जधा वशदि अब्भ | ५ | १० |
| जयति वृषभकेतुर्दक्षयज्ञ- | १० | ४६ |
| जलधर निलंज्जस्त्वं | ५ | २८ |
| जाणंतो वि हु जादि | ६ | २१ |
| जाणामि चारुदत्तं | ६ | १५ |
| जाणामि ण कीलिशं | २ | ६ |
| जादी तुज्झ विसुद्धा | ६ | २३ |
| जूदेण तं कदं मे | २ | १७ |
| जे अत्तबलं जाणिआ | २ | १४ |
| जे चुम्बदे अम्बिकम!दु | ८ | १२ |
| जेण-म्हि गब्भदाशे | ८ | २५ |
| ज्ञातीन्विटाम्स्वभुज- | ४ | २६ |
| ज्ञातो हि किं नु खलु | ६ | ६ |
झ
| श्लोक | अङ्कः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| झाणज्झणंतबहुभूषण | १ | २५ |
ण
| श्लोक | अङ्कः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| णअलीपधाणभूदे | १० | ८ |
| ण अलुमदि अंतलिक्खे | १० | ६ |
| णवबंधणमुक्काए | २ | १ |
| णहमज्जगदे शूले | ८ | १० |
| ण हु अम्हे चांडाला | १० | २२ |
| णिव्वक्कलं मूलकपेशिवण्णं | १ | ५२ |
| ण्हादेहं शलिलजलेहिं | ६ | १ |
त
| श्लोक | अङ्कः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| तक्किक ण केलअ कालण | १० | १ |
| तं तस्य स्वरसंक्रमं | ३ | ५ |
| तपसा मनसा वाग्भिः | १ | १६ |
| तयोरिदं सत्सुरतोत्सवा- | ३ | ७ |
| तरुणजनसहायश्चिन्त्यतां | १ | ३१ |
| तालीषु तारं विटपेषु मन्द्रं | ५ | ५२ |
| तुलनां चाद्रिराजस्य | ६ | २० |
| तेनास्म्यकृतवैरेण | १० | २८ |
| त्यजति किल तं जयश्रीः | ६ | १८ |
| त्रेता हृतसर्वस्वः | १ | ९ |
| त्वत्स्नेहबद्धहृदयो हि | ४ | ६ |
| त्वदर्थमेतद्विनिपात्य- | १० | ४३ |
| त्वद्यानं यः समारुह्य | १० | ५२ |
| त्वरया सर्पणं तत्र | १० | ५७ |
द
| श्लोक | अङ्कः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| दत्त्वा निशाया वचनीय- | ४ | १ |
| दाक्षिण्योदकवाहिनी | ८ | ३८ |
| दारिद्र्यं शोचामि भवन्त- | १ | ३८ |
| दारिद्र्यात्पुरुषस्य | १ | ३६ |
| दारिद्र्याद्ध्रियमेति | १ | १४ |
| दारिद्र्यान्मरणाद्वा | १ | ११ |
| दारिद्र्येणाभिभूतेन | ४ | ५ |
| दिण्णकलवीलदामे | १० | २ |
| दिष्ट्या भो व्यसनमहार्णवा- | १० | ४६ |
| दीनानां कल्पवृक्ष- | १ | ४८ |
| दुर्बलं नृपतेश्चक्षुः | ९ | ३२ |
| दुर्वर्णोऽसि विनष्टोऽसि | २ | १३ |
| दुष्टात्मा परगुणमत्सरी | ६ | २७ |
| देशः को नु जलावसेकशिथि- | ३ | १२ |
| दो ज्जेव पूअणीओ | ६ | १४ |
| द्रव्यं लब्धं द्यूतेनैव | २ | ८ |
| द्वयमिदमतीव लोके | ४ | २५ |
| द्विरदेन्द्रगतिश्चकोरनेत्रो | १ | ३ |
ध
| श्लोक | अङ्कः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| धनैर्वियुक्तस्य नरस्य लोके | ५ | ४० |
| ६६४ | मृच्छकटिकम् |
|---|
| अङ्काः/श्लोकाः | अङ्काः/श्लोकाः | ||
|---|---|---|---|
| धन्यानि तेषां खलुजीवितानि | ५ ४९ | पूर्वं मानादवज्ञाय | ८ १७ |
| धाराभिरार्यजनचित्त | ५ ४५ | पूर्वानुबद्धवैरेण | १० ४५ |
| धिगस्तु खलु दारिद्र्यं | ३ १९ | प्रभवति यदि धर्मो दूषित- | १० ३४ |
| न | प्रविश गृहमिति प्रतोद्यमाना | १ ५६ | |
| न खलु मम विषादः | ४ २० | प्रसरसि भयविक्लवा | १ २४ |
| न गणयति पराभवं | २ ७ | प्राप्तोऽहं व्यसनकृतां | १० २५ |
| न पर्वताग्रे नलिनी | ४ १७ | प्राप्यैतद्व्यसनमहार्णवं | १० ३३ |
| न भीतो मरणादस्मि | १० २७ | प्रियसहृदयकारणे | ४ २७ |
| न महीतलस्थितिसहानि | १० ५६ | ब | |
| नयनसलिलसिक्तं | १० ३ | बलाकपाण्डुरोष्णीषं | ५ १६ |
| नरपतिपुरुषाणां | ७ ३ | बहुकुसुमविचित्तिदा | ८ ८ |
| निःश्वासोऽस्य न शङ्कितः | ३ १८ | बालां स्त्रियं च नगरस्य | ८ १३ |
| निवासश्चिन्तायाः | १ १५ | भ | |
| निष्पन्दीकृतपद्मखण्ड | ५ २४ | भण कस्स जम्मछट्ठो | ६ १० |
| नृणां लोकान्तरस्थानां | ६ ४२ | भवेद गोष्ठीयानं न च | ६ ४ |
| नृपतिपुरुषशङ्कितप्रचारं | ३ १० | भाग्यानि मे यदि तदा | ६ २ |
| नो मुष्णाम्यबलां | ४ ६ | भीदामअपपदारणं | ६ १६ |
| प | भीमस्यान्तरिष्यामि | ६ १७ | |
| पक्षविकलश्च पक्षी | ५ ४१ | भुजग इव गतो गिरिः | ३ २१ |
| पङ्कक्लिन्नमुखाः पिबन्ति | ५ १४ | भैक्ष्येणाप्यर्जयिष्यामि | ३ २६ |
| पंचउज्जण जेण मालिद | ८ २ | भो मेघ गम्भीरतरं नद | ५ ४७ |
| पदमव्याकोशं भास्करं | ३ १३ | म | |
| परगृहललिताः परान्नपुष्टाः | ४ २८ | मंशेण तिक्खामिलकेण | १० २९ |
| परिजनैकथासक्तः | ४ ३ | मखशतपरिपूतं गोत्रमु | १० १२ |
| परिज्ञातस्य मे राज्ञा | ६ ८ | मदनमपि गुणैर्विशेषयन्ती | ४ ४ |
| पर्यङ्कग्रन्थिबन्धद्विगुणित | १ १ | मम मअणअणंम | १ २१ |
| पवनचपलवेगः स्थूल | ५ १७ | मया किल नृशंसेन | ९ ३८ |
| पश्यन्ति मां दशदिशो | ८ २४ | मया खलु नृशंसेन | ९ ३० |
| पातु वो नीलकण्ठस्य | १ २ | मयाप्ता महती बुद्धिः | ४ २२ |
| पादप्यह्ररपरिभव | ६ २३ | मयि विनिहितदृष्टिः | ६ १९ |
| पादेनैकेन गगने | २ ११ | महावाताध्मातंमहिष | ५ २२ |
श्लोकानुक्रमणिका
| अङ्काः | श्लोकाः | अङ्काः | श्लोकाः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| मा दाब जइ वि एसो | ५ | २६ | राजमार्गो हि शून्योऽयं | १ | ५८ |
| मा दुग्गदोत्ति परिहवो | १ | ४३ | रूक्षस्वरं वाशति वायसो- | ६ | १० |
| मार्जारः क्रमणे मृग | ३ | ३० | रे रे वीरअ किं किं | ६ | ८ |
| मूढे निरन्तरपयोधरया | ५ | १५ | ल | ||
| मेघा वर्षन्तु गर्जन्तु | ५ | १६ | लज्जाए भीलुदाए वा | ६ | १७ |
| मेघो जलाद्र्रमहिषोदर- | ५ | २ | लब्धा चारित्र्यशुद्धिः | १० | ५६ |
| मैत्रेय भोः किमिद | ९ | २६ | लाभशशुले मम पिदा | ६ | ६ |
| लामेहि अ लाअवल्लहं | १ | २६ | |||
| य | लिम्पतीव तमोऽङ्गानि | १ | ३४ | ||
| यं समालम्ब्य विश्वासं | ३ | २६ | लेखअवावडहिअअं | २ | २ |
| ऽ ” ” | ५ | ७ | |||
| व | |||||
| यः कश्चित्त्वरितगतिः | ३ | २ | वंशं वाए शत्तछिद्दं शुशद्दं | ५ | ११ |
| यः स्तब्धं दिवसान्तमानत- | २ | १२ | वज्जम्मिणीअमाणे | १० | १० |
| यत्नेन सेवितव्यः पुरुषः | ८ | ३३ | वणिज इव भान्ति तरवः | ७ | १ |
| यथा यथेदं निपुणं विचा- | ६ | २५ | वर्षशतमस्तु दुर्दिन | ५ | ४८ |
| यथैव पुष्पं प्रथमे विकाशे | ६ | २६ | वर्षोदकमुद्गिरता | ५ | ३८ |
| यदा तु भाग्यपक्षयपीडितां | १ | ५३ | वसन्तसेना किमियं द्वितीया | १० | ३६ |
| यदि कुप्यसि नास्ति रतिः | ५ | ३४ | वस्त्वन्तराणि सदृशानि भवन्ति | ३४ | |
| यदि गर्जति वारिधरो | ५ | ३२ | वादादवेण तत्ता चोवल | ८ | ४६ |
| यदि तावत्कृतान्तेन | ३ | २५ | वाप्यां स्नाति विचक्षणो | १ | ३२ |
| यद्वदहल्याहेतोर्मृषा | ५ | ३० | विचलइ णेउरजुअलं | २ | १६ |
| यया मे जनितः कामः | १ | ५५ | विद्युज्जिह्वेदं महेन्द्र | ५ | ५१ |
| यस्यार्थास्तस्य सा कान्ता | ५ | ६ | विद्युद्भिर्ज्वलतीव | ५ | २७ |
| यासां बलिः सपदि | १ | १ | विधिर्नैवोपनीतस्त्वं | ७ | ६ |
| येन ते भवनं भित्त्वा | १० | ५६ | विपर्यस्तमनश्चेष्टैः | ८ | ६ |
| योऽस्माभिश्चिन्तितो ब्यार्जः | ५ | २१ | विभवानुगता भार्या | ३ | २८ |
| योऽहं लतां कुसुमितां | ६ | २८ | विषसलिलतुलाग्निप्रार्थिते | ६ | ४३ |
| विषादस्त्रस्तसर्वाङ्गी | २ | ८ | |||
| र | वेगं करोति तुरगः | ५ | ८ | ||
| रक्तं च नाम मधुरं च | ३ | ४ | वेदार्थान्प्राकृतस्त्वं वदसि | ९ | २१ |
| रक्तं तदेव वरवस्त्रमियं च | १० | ४४ | |||
| रन्धानुसारी विषमः | ८ | २७ |
६६६ मृच्छकटिकम्
| अङ्काः | श्लोकाः | अङ्काः | श्लोकाः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| वैदेश्येन कृतो भवेन्मम | ३ | २३ | स तावदस्माद्व्यसनार्णवो- | ७ | ४ |
| व्यवहारः सविघ्नोऽयं | ६ | १८ | सत्यं न मे विभवनाश- | १ | १३ |
| श | सदा प्रदोषो मम याति | ५ | ३१ | ||
| शंजम्मध णिअपोटं | ८ | १ | समरव्यसनी प्रमादशून्यः | १ | ५ |
| शक्कालधणे क्खु शुज्जणे | २ | १५ | समुद्रवीचीव चलस्वभावाः | ४ | १५ |
| शत्रुः कृतापराधः | १० | ५४ | सर्वगात्रेषु विन्यस्तैः | १० | ५ |
| शरच्चन्द्रप्रतीकाशं | ८ | १६ | सव्यं मे स्पन्दते चक्षुः | ९ | १५ |
| शब्बकालं मए पुश्ते | ८ | २८ | साटोपकूटकपटावृत- | ५ | ३६ |
| शब्बे क्खु होइ लोए | १० | १५ | सिण्णसिलाअलहत्थो | ६ | २२ |
| शशिविमलमयूख- | १० | १३ | सीधुसुरासवमत्तिआ | ४ | ३० |
| शशपलक्कवलद्दे | ३ | २ | सुअणे क्खु भिच्चवाणु कम्पके | ३ | १ |
| शास्त्रज्ञः कपटानुसार- | ९ | ५ | सुखं हि दुःखान्यनुभूय | १ | १० |
| शिखा प्रदीपस्य सुवर्ण- | ३ | १५ | सुदृष्टः क्रियतामेषः | ४ | २४ |
| शिल मुण्डिद तुण्ड मुण्डिदे | ८ | ३ | सोऽस्मद्विधानां प्रणयैः | १ | ४६ |
| शिलशि मम णिलीणे | ८ | १२ | स्खलति चरणं भूमौ न्यस्तं | ६ | ३ |
| शुक्खा हि ववदेशाशे | १० | २० | स्तम्भेषु प्रचलितवेदि- | ५ | ५० |
| शुवण्णं देमि पिअं | ८ | ३१ | स्त्रियो हि नाम खल्वेताः | ४ | १९ |
| शुष्कवृक्षस्थितो ध्वाङ्क्षः | ६ | ११ | स्त्रीभिर्विमानितानां | ८ | ९ |
| शून्यमपुत्रस्य गृहं | १ | ८ | स्त्रीषु न रागः कार्यः | ४ | १३ |
| शून्यैर्गृहैः खलु समाः | ५ | ४२ | ह | ||
| शूले विवकंते पंडवे | १ | ४७ | हत्थशंजदो मुहशंजदो | ८ | ४७ |
| स | हत्वा तं कुन्नृपमहं हि | १० | ४७ | ||
| सगं नैव हि कश्चिदस्य | १ | ३७ | हत्वा रिपुं तं बलमन्त्रिहीनं | १० | ४८ |
| संस्रवत्तैरिव चक्रवाक- | ५ | ५ | हा प्रेयसि प्रेयसि विद्यमाने | १० | ५७ |
| संभ्रमघग्घरकण्ठो | ६ | १० | हिंगुज्जले जीरकमद्दमृश्ते | ८ | १३ |
| सकामान्विष्यतेऽस्माभिः | १ | ४४ | हिंगुज्जले दिण्णमरीचचुण्णे | ८ | १४ |
| सच्चेण सुहं क्खु लब्भइ | ६ | ३५ | हित्वाहं नरपतिबन्धनाप- | ६ | १ |
परिशिष्ट
छन्दोविवेचन
छन्दःशास्त्र के अनुसार संस्कृत के प्रत्येक श्लोक में चार पाद या चरण होते हैं। इन छन्दों के दो भेद हैं—(१) वर्णवृत्त और (२) मात्रिक। वर्णवृत्तों में प्रत्येक चरण के वर्णों की गणना की जाती है और मात्रिक छन्दों में प्रत्येक चरण की मात्राओं की गणना की जाती है। वर्णवृत्तों को वृत्त और मात्रिक छन्दों को जाति कहा जाता है, ये तीन प्रकार के होते हैं--(१) समवृत्त—इसके चारों चरणों में वर्णों की संख्या बराबर-बराबर होती है। (२) अर्धसमवृत्त—इसमें प्रथम और तृतीय चरण में तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में वर्णों की संख्या समान रहती है। (३) विषमवृत्त—इसमें सभी चरणों में समानता नहीं रहती है। इसका प्रयोग कम मिलता है।
गणपरिचय—
वर्णवृत्तों में वर्णों की गणना के लिये 'गण' का उपयोग होता है। एक गण में तीन वर्ण होते हैं। ये गण आठ हैं—(१) यगण, (२) मगण, (३) तगण, (४) रगण, (५) जगण, (६) भगण, (७) नगण, (८) सगण। इनमें लघु वर्ण के लिये '।' ऐसा और गुरु के लिये 'ऽ' ऐसा चिह्न प्रयुक्त होता है। किस गण में कौन ह्रस्व और कौन गुरु होता है इनके लिये निम्न सूत्र प्रसिद्ध है—
'यमाताराजभानसलगा।'
इसका स्पष्ट ज्ञान इस श्लोक से होता है—
“आदिमध्यावसानेषु य-र-ता यान्ति लाघवम्।
भजसा गौरवं यान्ति, मनौ तु गुरुलाघवम्॥”
जो सामान्यतया दीर्घ=गुरु प्रसिद्ध हैं उनके अतिरिक्त अनुस्वार वाला, विसर्ग वाला तथा संयुक्त अक्षर के पूर्व का लघु वर्ण भी गुरु माना जाता है। पाद के अन्त का लघु वर्ण विकल्प से गुरु माना जा सकता है—
“सानुस्वारश्च दीर्घश्च विसर्गी च गुरुर्भवेत्।
वर्णः संयोगपूर्वश्च तथा पादान्तगोऽपि वा॥”
छन्दों के लक्षणों में यति=विराम का भी निर्देश रहता है।
६६८ मृच्छकटिकम्
मृच्छकटिक में प्रयुक्त छन्द—
मृच्छकटिक में विविध छन्दों का सुन्दर प्रयोग किया गया है यहाँ उनका संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है।
(१) अनुष्टुप् या श्लोक—
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पंचमम् । द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ॥ अथवा पंचमं लघु सर्वत्र सप्तमं द्विचतुर्थयोः । षष्ठं गुरु विजानीयाच्छेषेषु नियमो न हि ॥
इसके चार चरणों में आठ-आठ अक्षर होते हैं। इनमें पंचम लघु और षष्ठ गुरु होता है। द्वितीय और चतुर्थ चरण में सप्तम लघु होता है। शेष के लिये कोई नियम नहीं है। उदा० प्रथम अंक में २, १६, ३४ आदि।
(२) आर्या—
यस्याः प्रथमे पादे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि । अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पंचदश साऽर्या ॥
यह मात्रिक वृत्त है। इसके प्रथम पाद में १२ मात्रायें, द्वितीय में १८, तृतीय में १२ और चतुर्थ में १५ मात्रायें होती हैं। यह छन्द भी सरलतया समझा जाता है। मृच्छकटिक में इसका पर्याप्त प्रयोग है। उदा० प्रथम अंक में ८, ११, ३३ आदि श्लोक हैं।
(३) इन्द्रवंशा—
तच्चेन्द्रवंशा प्रथमाक्षरे गुरौ ।
यह वंशस्थ के समान है। इसका प्रथम वर्ण गुरु होता है। यह स्वतन्त्ररूप से नहीं प्रयुक्त है। यह उपजाति के रूप में प्रयुक्त है। प्रथम अंक का ४६ और तृतीय का ७ श्लोक इसका उदा० है।
(४) इन्द्रवज्रा—
स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः ।
प्रत्येक चरण में तगण तगण जगण और दो गुरु वर्णों के क्रम से ११ वर्ण होते हैं। उदा० चतुर्थ अंक का १६, पंचम का ४६ और दशम का ११, २१, ४८, ५८ श्लोक हैं।
(५) उपजाति—
स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः । उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ ।
परिशिष्ट ६६१
“अनन्तरोदीरितलक्ष्मभाजो पादौ यदीयावुपजातयस्ताः ।
इत्थंक्लिवान्यास्वपि मिश्रितासु वदन्ति जातिष्विदमेव नाम ।”
इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा के दो-दो पादों के मिलने पर इसी प्रकार अन्य छन्दों के मिलने पर ‘उपजाति’ भेद माना जाता है। इस छन्द का पर्याप्त प्रयोग किया गया है। उदा० प्रथम अंक का ३८, ४६, तृतीय अंक का ६, चतुर्थ अंक का १, १२, १५, ३२, पंचम अंक का २१, २९, ४०, ४७, ५२, अष्टम अंक का २७, ३०, नवम अंक का १० २६, और दशम अंक का ६, १६, ४०, ४३ श्लोक ।
(६) उपेन्द्रवज्रा--
उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ ।
इसमें जगण, तगण, जगण के बाद दो गुरु वर्ण होते हैं। यह प्रथम अंक में ६ चतुर्थ में २३ और षष्ठ में ३ श्लोक में है।
(७) गीति :-
आर्यापूर्वार्धसमं द्वितीयमपि यत्र भवति हंसगते ।
छन्दोविदस्तदानीं गीति ताममृतवाणि भाषन्ते ॥
यह आर्या के समान होता है केवल अन्तिम पाद में १५ के स्थान पर १८ मात्रायें होती हैं। यह चतुर्थ अंक के ३४ वें श्लोक में है। इसे ‘उद्गाथा’ भी कहते हैं।
(८) पथ्यावक्त्र--
युजोश्चतुर्थतो जेन पथ्यावक्त्रं प्रकीर्तितम् ।
अनुष्टुप् छन्द के द्वितीय और चतुर्थ चरण में जब चतुर्थ अक्षर के बाद जगण आता है तब यह छन्द होता है। वास्तव में यह अनुष्टुप् का भेद हैं। मृच्छकटिक में इसका प्रचुर प्रयोग है। प्रथम अंक के—२, ५४, ५८, द्वितीय अंक के १२, तृतीय अंक के १६, २४, २५, २७, २८, २६, चतुर्थ अंक के ५, ७, ८, १८, १९, २१, पंचम अंक के ७, १६, ३९, षष्ठ अंक के १७, २६, सप्तम अंक के ६, अष्टम अंक के ६, १६, १७, २१, २८, २६, ३६, नवम अंक के ७, ८, ११, १८, २०, २४, ३०, ३१, ३२, ३३, ३६, ३७, ३८, ३६, ४२, दशम अंक के ५, १७, १८, २३, २६, २७, २८, ३२, ३९, ४१, ४२, ४५, ५०, ५१, ५२, ५६।
(६) पुष्पिताग्रा--
अयुजि नयुगरेफतो यकारो युजि च नजो जरगाश्च पुष्पिताग्रा ।
६७० मृच्छकटिकम्
यह अर्धसम वृत्त है। इसके प्रथम और तृतीय चरण में नगण, नगण, रगण, यगण-इस क्रम से १२ अक्षर होते हैं। और द्वितीय तथा चतुर्थ चरण में नगण, जगण, जगण, रगण और अन्त में एक गुरु-इस क्रम से १३ अक्षर होते हैं। यह प्रथम अंक के २४, ५६, द्वितीय अंक के ७, तृतीय अंक के १०, २१, २२, चतुर्थ अंक के ४, २७, २८, अष्टम अंक के ४, ८, १५, ३२ और दशम अंक का १३ श्लोक।
(१०) प्रमिताक्षरा--
प्रमिताक्षरा सजससैः कथिता।
इसके पाद में सगण, जगण, सगण, सगण---इस क्रम से १२ अक्षर होते हैं। यह दशम अंक के ५६ श्लोक में हैं।
(११) प्रहर्षिणी--
त्र्याशाभिर्मनजरगा प्रहर्षिणीयम्।
इसके प्रत्येक पाद में मगण, नगण, जगण, रगण और एक गुरु-इस क्रम से १३ अक्षर होते हैं। इसमें ३ और १० पर यति होती है। यह चतुर्थ अंक के २, पञ्चम के ५०, षष्ठम् के १, सप्तम के ८, अष्टम के ४१, नवम के २७ और दशम के २५, ३३, ४७, ४९, श्लोक में है।
(१२) मालभारिणी--
विषमे ससजा गुरू समे चेत् सभरा यैन तु मालभारिणीयम्।
इसे औपच्छन्दसिक भी कहा जाता है। इसमें प्रथम तथा तृतीय पादों में सगण, सगण, जगण और दो गुरु-इस क्रम में ११, ११ अक्षर होते हैं। द्वितीय और चतुर्थ पादों में सगण, भगण, रगण और यगण--इस क्रम से १२, १२ अक्षर होते हैं। यह अर्ध समवृत्त है। यह प्रथम अंक के ३, ५० श्लोक में है।
(१३) मालिनी--
ननमययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।
इसमें नगण, नगण, मगण, यगण, यगण इस क्रम से १५ अक्षर प्रत्येक पाद में होते हैं। ८ और ७ वर्णों पर यति होती है। यह प्रथम अंक के ३१, ५७, चतुर्थ अंक के २०, पंचम अंक के १७, सप्तम अंक के ३, ५, अष्टम अंक के ४२, नवम अंक के १२, ४३, दशम अंक के ३, १२, ३४, ४६ श्लोक में है।
(१४) वंशस्थ--
जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।
इसके प्रत्येक पाद में जगण, तगण, जगण, रगण-इस क्रम से १२ अक्षर होते हैं। यह प्रथम अंक के ७, १०, ५३, तृतीय अंक के ८, १७, पंचम अंक के ३७,
परिशिष्ट ६७१
सप्तम अंक के ४, अष्टम अंक के ७, नवम अंक के २५ श्लोक में है। इसे वंशस्थ बिल भी कहा जाता है।
(१५) वसन्ततिलका--
उक्ता वसन्ततिलका त-भ-जा जगौ गः ।
इसके प्रत्येक चरण में तगण, भगण, जगण; जगण और दो गुरु—इस क्रम से १४-१४ वर्ण होते हैं। यह छन्द प्रचुर रूपेण प्रयुक्त है। प्रथम अंक के ९, १२, १३, १७, २०, २२, २७, ३५, ४६, तृतीय अंक के ३, ४, ९, १४, १६, चतुर्थ अंक के ६, १४, २६, पंचम अंक के १, २, ४, ८, १३, १५, ३३, ३६, ४२, ४५, षष्ठ अंक के २, अष्टम अंक के २३, २४, २६, नवम अंक के ६, १६, १६, २२, २८, २६, ३४, दशम अंक के ३१, ३४, श्लोक में हैं।
(१६) विद्युन्माला--
मो मो गो गो विद्युन्माला ।
इसके प्रत्येक पाद में मगण, मगण और दो गुरु-इस क्रम से ८, ८ अक्षर होते हैं। यह द्वितीय अंक के ८ श्लोक में है।
(१७) वैश्वदेवी--
वाणार्श्वेश्चिन्ना वैश्वदेवी ममौ यौ ।
इसके प्रत्येक पाद में मगण, मगण, यगण, यगण,—इस क्रम से १२ वर्ण होते हैं। पंचम वर्ण के बाद यति होती है। यह तृतीय अंक के १३ वें श्लोक में है।
(१८) शार्दूलविक्रीडित -
सूर्याश्वैर्यदि मः सजौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम् ।
इसके प्रत्येक पाद में क्रमशः मगण, सगण, जगण, सगण, तगण, तगण और अन्त में एक गुरु वर्ण मिलाकर १९ वर्ण होते हैं। इसमें १२ और ७ वर्ण पर यति होती है। इसका पर्याप्त प्रयोग किया गया है। यह प्रथम अंक के १, १४, ३२, ३६ ३७, द्वितीय अंक के १२, तृतीय अंक के ५, ११, १२, १८, २०, २३, चतुर्थ अंक के ६, पंचम अंक के ५, ६, १४, १८, २०, २३, २४, २७, ३५, ४६, सप्तम अंक के २, ७, अष्टम अंक के ५, ११, २८, नवम अंक के ३, ४, ५, १४, दशम अंक के ६० श्लोक में है।
(१६) शिखरिणी--
रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी ।
इस छन्द के प्रत्येक पाद में यगण, मगण, नगण, सगण, भगण और अन्त में लघु और एक गुरु—इस क्रम से १७-१७ वर्ण होते हैं। इसमें ६ और ११ वर्ण
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पर यति होती है। यह प्रथम अंक के १५, पञ्चम अंक के १२, २२, २५, षष्ठ अंक के ४ श्लोक में है।
(२०) सुमधुरा—
म्रौ म्नौ मो नो गुरुश्चेद् हयऋतुरसैरुक्ता सुमधुरा।
इस छन्द के प्रत्येक पाद में मगण, रगण, मगण, नगण, मगण, नगण, और एक गुरु--इस क्रम से १९ वर्ण होते हैं। इसमें ७ और १३ वर्ण पर यति होती है। यह नवम अंक के २१ श्लोक में है।
(२१) स्रग्धरा—
म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनि-यतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम्।
इस छन्द के प्रत्येक पाद में मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, यगण, यगण, इस क्रम से २१ वर्ण होते हैं। इसमें ७, ७, ७ वर्ण पर यति होती है। सामान्यतया प्रयुक्त छन्दों में यह सबसे बड़ा है। यह प्रथम अंक के १, ४, ४८ और दशम अंक के ५६, ६१ श्लोक में है।
(२२) हरिणी—
नसमरसलागा षड् वेदैर्हयैर्हरिणी मता।
इस छन्द के प्रत्येक पाद में नगण, सगण, मगण, रगण, सगण और लघु तथा अन्त में गुरु--इस क्रम से १७, १७ वर्ण होते हैं। इसमें ६, ४, ७ पर यति होती है। यह चतुर्थ अंक के ३ और नवम अंक के १३ श्लोक में है।
प्राकृत छन्द—
प्राकृत भाषा के विभिन्न रूपों का प्रयोग मृच्छकटिक में हुआ है। इस पर भूमिका में लिखा जा चुका है। प्राकृत के अनेक छन्द भी इसमें प्रयुक्त हैं। इनकी संस्कृतच्छाया भी मूल में दी गयी है। प्राकृतच्छन्दों के विषय में विशेष ज्ञान के लिये 'प्राकृत-पिंगल' आदि ग्रन्थ देखने चाहिये। यहाँ गाथा, आर्या, वैतालीय आदि छन्द प्रयुक्त हैं।
उपसंहार—
ऊपर यह प्रस्तुत किया जा चुका है कि मृच्छकटिक में लगभग २२ प्रकार के संस्कृत छन्दों का और कुछ प्राकृत छन्दों का प्रयोग किया गया है। परिशीलन से यह ज्ञात होता है कि इसके रचनाकार को (१) पथ्यावक्त्र, (२) वसन्ततिलका और (३) शार्दूलविक्रीडित छन्द अधिक प्रिय थे।
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