भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

( १३ )

जैसा कि अन्य नाटकों में देखने को उपलब्ध होता है तो भी लक्ष्य की पूर्ति होना संभव न था। ऐसी स्थिति होने पर भरतवाक्य के तीसरे चरण में आये हुये "अधुना" शब्द की उपयोगिता भी पूर्ण न हो पाती। अतः इससे यही ध्वनित होता है कि नाटककार को "पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः" यही पाठ रखना अभीष्ट था।

इसके अतिरिक्त इससे यह भी स्पष्ट होता है कि जहां लेखक ने अपने नाटक का इतिवृत्त मौर्य-साम्राज्य की स्थापना करने वाले चन्द्रगुप्त से सम्बन्धित रखा है वही लेखक द्वारा यह भी संकेत किया गया है कि उसके समय में राज्य करने वाले राजा का नाम भी चन्द्रगुप्त ही है। अतः "पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः" इस पाठ का संकेत गुप्तवंशीय राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय की ओर ही है।

इस आधार पर भी विशाखदत्त का स्थिति काल चतुर्थ शताब्दी का उत्तरार्द्ध अथवा पंचम शताब्दी का पूर्वार्द्ध ही सिद्ध होता है क्योंकि चन्द्रगुप्त द्वितीय का कार्यकाल ३७५-४१३ ई० माना गया है।

डा० काशीप्रसाद जायसवाल ने भी भरतवाक्य के उपर्युक्त पाठ को ही प्रामाणिक माना है तथा भरतवाक्य मे आये हुये 'अधुना' और 'चन्द्रगुप्त' के आधार पर नाटक की रचना, चन्द्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' के ही (३७५-४१४ ई०) काल की स्वीकार की है। उनकी प्रमुख युक्तियाँ निम्नलिखित हैं :—

(१) विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस मे जिस शैली का प्रयोग किया है वह शैली पंचम शताब्दी के पश्चात् की नही हो सकती है। नाटककार की शैली में लम्बे-लम्बे समासो का अभाव है। इसमे कृत्रिमता का भी दर्शन लगभग नगण्य के समान है। अतः इस प्रकार की शैली पंचम शताब्दी के पश्चात् की होना किसी भी दशा मे संभव नही है।

(२) नाटक की राजनीतिक कल्पनाएं भी चतुर्थ अथवा पंचम शताब्दी की परिस्थितियों की ही द्योतक हैं।

(३) 'भरतवाक्य' में जिस साम्राज्य की कल्पना की गई है—वह गुप्तकाल ही प्रतीत होता है।

(४) यदि विशाखदत्त बाण के समकालिक थे तो दोनो को एक-दूसरे का ज्ञान क्यो नहीं था।

( ३४ )

डा० जायसवाल के इस मत से प्रो० हिलेब्रेण्ट (Hillebrandt), स्पेयर (Speyer) और टोने (Towney) भी सहमत हैं।

M कृष्णमाचार्य ने भी अपनी पुस्तक 'History of Classical Sanskrit Literature' मे इसी मत का प्रतिपादन किया है। प्रो० स्टेन कोनो (Sten Konow) ने भी इसी को प्रामाणिक माना है। श्री आर० एस० पण्डित तथा सी० आर० देवधर ने भी इसी का अनुमोदन किया है।

नाटककार विशाखदत्त की दूसरी कृति "देवीचन्द्रगुप्त" मानी गयी है। इसके उपलब्ध अंशो के आधार पर ज्ञात होता है कि नाटककार ने इसमें तीन पात्रों के चरित्र पर विशद रूप से प्रकाश डाला है—(१) राजा, (२) रानी तथा (३) राजकुमार चन्द्रगुप्त। इस प्रकार का चित्रण उसी व्यक्ति के द्वारा किया जाना सम्भव है जो कि या तो स्वयं उस राजदरबार में विद्यमान हो और सम्बन्धित व्यक्ति से भली भांति परिचित हो अथवा उस व्यक्ति द्वारा किया जाना सम्भव है जिसका काम केवल प्रशंसा करना मात्र ही है तथा आवश्यकता-नुसार जिसे कुमार के चरित्र को निर्दोष एवं उत्कृष्ट बनाना है जो कि आगे चलकर राजगद्दी पर आसीन होता है। जो भी हो—इस नाटक के अध्ययन से तो स्पष्ट हो ही जाता है कि यह 'देवीचन्द्रगुप्त' नाटक ऐसे व्यक्ति द्वारा लिखित है जो कि सम्राट् चन्द्रगुप्त द्वितीय का समकालीन था। अतः इस आधार पर भी विशाखदत्त का स्थितिकाल पूर्ववत् ही सिद्ध होता है।

**बहिर्साक्ष्य—**इसके आधार पर भी लगभग उपर्युक्त समय की ही पुष्टि हो जाती है। श्री भोज ने अपने 'सरस्वती कण्ठाभरण' मे, जिसका रचना-काल ११वीं शताब्दी स्वीकार किया गया है, मुद्राराक्षस के निम्नलिखित दो पद्यों को उद्धृत किया है —

"उपरिघन घनरटित दूरे दयिता किमेतदापतितम्। हिमवति दिव्योपधय शीर्षे सर्प समाविष्ट ॥—मुद्रा० १।२२ और सरस्वती०—३।८७॥

तथा—

प्रत्यग्रोन्मेषजिह्मा क्षणमनभिमुखी रत्नदीपप्रभा इत्यादि। —मुद्रा० १।२१वां श्लोक तथा सरस्वती० १।६८॥

( ३५ )

इसी प्रकार १०वीं शताब्दी में विद्यमान धनंजय ने अपने ग्रन्थ ‘दशरूपक’ में मुद्राराक्षस का संकेत निम्नलिखित रूप में किया है :-

“तत्र वृहतकथामूलं मुद्राराक्षसम्” —दशरूपक १।६८ के नीचे

तथा—

“मन्त्रशक्त्या, यथा मुद्राराक्षसे राक्षसहायोदीनां चाणक्येन स्वबुद्ध्या भेदनम्” इत्यादि —दशरूपक २।५५ के नीचे

इसके अतिरिक्त इसी दशरूपक के द्वितीय प्रकाश में नायक के सामान्य गुणों की चर्चा करते हुये “स्थिर:” इस विशिष्ट गुण को स्पष्ट करते हुए लिखा है :—
यथा वा भर्तृहरिशतके [ नीति शतक श्लोक—२६ ]—

“प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः ।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः
प्रारब्धमुत्तमगुणाः न परित्यजन्ति” ॥ मुद्रा० २।१६॥

किन्हीं-किन्ही प्रतियों में इस श्लोक का अन्तिम चरण निम्नलिखित रूप में मिलता है :—

“प्रारब्धमुत्तमगुणास्त्वमिवोद्वहन्ति”

इसमें आये हुये “त्वमिव” की संगति मुद्राराक्षस में तो ठीक बैठ जाती है किन्तु भर्तृहरि शतक में ठीक नही बैठती । इससे ज्ञात होता है कि यह श्लोक मुद्राराक्षस का ही है तथा भर्तृहरि ने इसको वहीं से ले लिया होगा । यदि इसको ठीक मान लिया जाय तो विशाखदत्त की स्थिति भर्तृहरि से पहले सिद्ध हो जाती है । भर्तृहरि का समय ६५१ ई० के लगभग माना गया है। अतः विशाखदत्त का समय इससे पहले का ही रहा होगा ।

मुद्राराक्षस का घटनास्थल पाटलिपुत्र ( आधुनिक पटना ) है । मुद्राराक्षस में इसका वर्णन एक प्रसिद्ध गौरवशाली नगर के रूप में किया गया है। इसको पुष्पपुर अथवा कुसुमपुर नाम से भी कहा गया है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसकी सत्ता सिद्ध होती है । चीनी यात्री फाह्यान ने अपनी मध्य-एशिया की यात्रा ३६६ ई०

( ३६ )

से ४११ ई० तक की थी। इसी बीच वे बुद्ध भगवान् की पावन-भूमि के दर्शन तथा बौद्ध धर्म की पुस्तको की खोज में भारत भी आये थे। वे लगभग ७ वर्षों तक भारत का भ्रमण कर तथा अनेक बहुमूल्य पुस्तकों और मूर्तियों को लेकर अपने देश लौट गये। उन्होंने पाटलिपुत्र को मगध की राजधानी के रूप मे देखा था—ऐसा उन्होंने लिखा है। इसके अतिरिक्त 'मुद्राराक्षस' में जो बौद्ध धर्म की ओर (७।५ मे) संकेत है, उससे यह ज्ञात होता है कि उस समय बौद्ध धर्म का अभ्युदय काल था। यही दशा फाह्यान के भारत आने के समय भी थी।

इसके अनन्तर दूसरा चीनी यात्री ह्वेनसांग ( Hiunen-Tsang ) भी भारत मे आया। उसकी यात्रा ६४६-६६६ ई० के मध्य रही। वह १५ वर्ष तक यहाँ रहा। उसने मगध की राजधानी पाटलिपुत्र का वर्णन भग्नावशेष रूप में किया है।

इस विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि छठी अथवा सप्तम शताब्दी में पाटलिपुत्र की दशा, प्रतिष्ठा वह नही रह गई थी जिसका वर्णन मुद्राराक्षस में उपलब्ध होता है। अतः फाह्यान द्वारा लिखित पाटलिपुत्र की दशा के उपर्युक्त वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि मुद्राराक्षस की रचना चतुर्थ शताब्दी के अन्त में अथवा पञ्चम शताब्दी के प्रारम्भ में हुई होगी। पुन इसी आधार पर नाटककार विशाखदत्त का स्थितिकाल भी यही मानना होगा।

जीवन-वृत्त

काल-वर्णन के प्रारम्भ मे ही उद्धृत प्रस्तावना के अंश से स्पष्ट हो जाता है कि नाटककार का नाम विशाखदत्त ही था। इनके पिता का नाम भास्करदत्त तथा पितामह का नाम वटेश्वरदत्त था। 'मुद्राराक्षस' की कुछ प्रतियो में "महाराज भास्करदत्तसूनो" के स्थान पर 'महाराजपदभाक्पृथुसूनो' पाठ भी मिलता है। इसी आधार पर प्रो० विल्सन ने लेखक के निवासस्थान का निर्णय इस प्रकार किया है कि महाराज पृथु और अजमेर के पृथुराज अथवा पृथुराय एक ही हैं। किन्तु आगे चलकर उन्होंने स्वयं ही यह संकेत भी दिया है कि 'वटेश्वरदत्त' में प्रयुक्त 'दत्त' शब्द इस निर्णय में कठिनाई उपस्थित करता है। श्री तैलंग महोदय ने उपर्युक्त कल्पना का विरोध करते हुये यह मत अभिव्यक्त किया है कि

( ३७ )

विशाखदत्त के पिता पृथु तथा अजमेर-निवासी पृथुराय दोनों ही पृथक्-पृथक् व्यक्ति हैं क्योंकि विशाखदत्त के पिता 'महाराज' पद द्वारा सम्बोधित किये गये हैं तथा अजमेर के पृथु केवल पृथुराज अथवा पृथुराय ही हैं।

इसके अतिरिक्त 'मुद्राराक्षस' में वर्णित नाटककार के पिता एवं पितामह आदि को 'सामन्त' कहा गया है। वह जिस राजा के सामन्त पद पर आसीन होकर शासन कार्य भी संभाला करते थे वह भारत का एकछत्र सम्राट् था (भरतवाक्य मे आता ही है :—सः•••••••••चिरमवतु महीं•••••• इत्यादि)। इस आधार पर प्रो० विल्सन का मत एकदम निराधार ही हो जाता है। इसके अतिरिक्त जर्मन विद्वान् हिलीब्राण्ट महोदय ने अपने द्वारा सम्पादित मुद्राराक्षस में 'भास्करदत्त' नाम को ही प्रामाणिक रूप में स्वीकार किया है।

नाटककार ने अपनी कृति 'मुद्राराक्षस' में उत्तर भारत का जो विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया है उससे यह बात सहज ही स्पष्ट हो जाती है कि विशाखदत्त उत्तर भारत के ही निवासी थे। इस विचार की पुष्टि नाटक में वर्णित काशपुष्पों तथा हंस के वर्णन से भी हो जाती है। काशपुष्प तथा हंस उत्तर भारत की नदियों के किनारे ही पाये जाते हैं। तृतीय अङ्क में शरद् ऋतु सम्बन्धी वर्णन देखिये :—

"आकाशं काशपुष्पच्छविमभिभवता भस्मना शुक्लयन्ती शीतांशोरंशुजालैर्जलधरमलिनां क्लिन्दन्ती कृत्तिमैभीम् । कापालीमुद्वहन्ती स्रजमिव धवला कौमुदीमित्यपूर्वा हासश्रो राजहंसा हरतु तनुरिव क्लेशमैशी शरद.॥" ३।२०॥

गङ्गा के किनारे स्थित पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) के विशद् वर्णन से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि नाटककार इस प्रदेश के भूभाग से भली भाँति अवगत है तथा इसी ओर का निवासी है। प्रस्तावना में ही सूत्रधार कहता है :—

"चीयते बालिशस्यापि सत्क्षेत्रपतिता कृषिः । न शालेः स्तम्बकरिता वप्तुर्गुणमपेक्षते ॥" १।३॥

( ३८ )

यह उद्धरण नाटककार के उस प्रदेश के निवासी होने का परिचायक है जो कि धान की खेती के लिए प्रसिद्ध है। कवि धान की उस अवस्था से भी पूर्णतया परिचित है जब कि वे गुच्छों के रूप में वृद्धि को प्राप्त हुआ करते हैं तथा सघन होते हैं। वह यह भी जानता है कि धान की इस वृद्धि में बोने वाले कृषक की कोई योग्यता कारण नहीं है अपितु खेत की उर्वराशक्ति ही कारण है जो कि धान के पौधों को बढने का अवसर प्रदान किया करती है।

सूत्रधार द्वारा यह उक्ति दर्शको के समक्ष कही जा रही है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि दर्शकगण तथा अभिनेताजन भी धान तथा उसकी उपजाऊ भूमि से भली भाँति परिचित हैं।

पञ्चम अङ्क के अन्त में आये हुए तेरहवें श्लोक के पूर्वार्ध भाग के पढने से यह स्पष्ट हो जाता है कि नाटककार गौड देश के रीति-रिवाजो, वहाँ की स्त्रियों के प्रसाधन सम्बन्धी साधनों तथा आकार-प्रकार से पूर्णतया परिचित थे।

खस जाति के लोग उस समय बडे योद्धा माने जाते थे। मलयकेतु की सेना में यही सबसे बडे विश्वासपात्र थे। यही कारण था कि राक्षस भी उन्हें अपने साथ रखना चाहता था (मुद्रा० ५।११)। इस जाति के लोग भारत के पूर्वी भाग के पहाडी प्रदेशो में रहा करते थे।

इन वर्णनों से भी नाटककार का पूर्वी बिहार अथवा बङ्गाल के पश्चिमी भाग का निवासी होना सिद्ध होता है। नाटक में प्रयुक्त गौडी रीति भी इसी तथ्य की पोषक है।

धार्मिक आस्था— नाटक के अध्ययन से ध्वनित होता है कि विशाखदत्त वैदिक धर्म के अनुयायी रहे होंगे। आश्रम-धर्म में उनकी पूर्ण आस्था थी। वैदिक पद्धति के अनुसार प्रतिदिन यज्ञ (हवन) आदि करना उनकी दृष्टि में एक आदर्श पद्धति थी। ऋषियों के जीवन को वे एक आदर्श जीवन समझते थे। द्विजो के लिये ब्रह्मचर्य-आश्रम में निवास करते हुये गुरु-सेवा को वे महत्त्व प्रदान करते थे :-

"उपलशकलमेतद् भेदकं गोमयानां वटुभिरुपहृतानां बर्हिषा स्तोम एव। शरणमपि समिद्भिः शुष्यमाणाभिराभि— र्विनमितपटलान्तं दृश्यते जीर्णकुड्यम्॥" ३।१५॥

( ३६ )

उनका आश्रयदाता राजा विष्णु का उपासक था । [ अङ्क ७।१९ ] । उन्होंने मुद्राराक्षस के प्रारम्भ में शिव की उपासना की है । इससे उनका शिवोपासक होना स्पष्ट होता है [ अङ्क १।१ २ ] । इसके अतिरिक्त भगवान् विष्णु के प्रति भी उनकी आस्था दृष्टिगोचर होती है [ अङ्क ३।२०-२१। ] । इतना होने पर भी वे अति उदार-दृष्टि के व्यक्ति प्रतीत होते हैं। उन्होंने बौद्ध-धर्म सम्बन्धी परम्पराओं एवं जातक-कथाओं का भी उल्लेख बड़े आदर के साथ किया है [ अङ्क ४।१८ ] । तान्त्रिक क्रियाओं तथा शकुनों आदि में भी उनका विश्वास था [ श्लोक सं० ४।१२ की तृतीय पंक्ति तथा चतुर्थ अङ्क में तृतीय श्लोक के पश्चात् राक्षस की उक्ति ] । श्लोक सं० ४।२१ में सूर्य के प्रति भी उन्होंने अपनी भक्ति प्रकट की है । भाग्यवादी होने के साथ ही वे पौरुष में पूर्ण निष्ठा रखते थे [ द्वितीय अङ्क के श्लोक सं० १५ से १६ तक का वर्णन ] ।

विशाखदत्त का व्यक्तित्व—नाटककार अथवा कवि अपनी कृति में अपने हृदयगत-भावों तथा अनुभूतियों का ही चित्रण किया करता है । भावों तथा अनुभूतियों के इस चित्रण में ही नाटककार अथवा कवि का अपना व्यक्तित्व झलका करता है । मुद्राराक्षस मे भी विशाखदत्त का जो व्यक्तित्व झलकता दिखाई देता है उसके तीन रूप हमारे समक्ष आते हैं—(१) राष्ट्र-जीवन सम्बन्धी दार्शनिकता का रूप, (२) राजनीतिक आदर्शवादिता का रूप तथा (३) मानवता सम्बन्धी महाविश्वासी होने का रूप ।

कोई भी राष्ट्र, चाहे वह राजतन्त्रात्मक हो अथवा प्रजातन्त्रात्मक, तभी उन्नत हो सकता है जब उसके निवासी अपने स्वार्थ की अपेक्षा देश तथा समाज के स्वार्थ को प्रधानता दें । मुद्राराक्षस नाटक का 'चाणक्य' राष्ट्र की राजनीति का कर्णधार है, जिसकी आत्मत्याग की भावना सर्वत्र व्याप्त है तथा राष्ट्र-हित से ओत-प्रोत है । मुद्राराक्षस का 'चन्द्रगुप्त' राष्ट्र-शासन का नियामक है जिसे जनरंजन की परतन्त्रता में ही शासक की स्वतन्त्रता के आत्मगौरव की अनुभूति हुआ करती है । मुद्राराक्षस का 'राक्षस' एक ऐसा राष्ट्र-पुरुष है जो राष्ट्र के निमित्त अपनी आत्मा का बलिदान करने हेतु सदैव उद्यत रहा करता है । इसी भांति मुद्राराक्षस के दूत, गुप्तचर आदि अन्य पात्र भी कर्त्तव्य-भावना से प्रेरित ही दृष्टिगोचर होते हैं । यही है मुद्राराक्षस का राष्ट्र-जीवन सम्बन्धी दार्शनिक रूप ।

( ४० )

राजनीतिक आदर्शवादिता तो विशाखदत्त के व्यक्तित्व की आधारशिला ही है। कौटिल्य-अर्थशास्त्र की राजनीति तत्कालीन कही जा सकती है किन्तु 'मुद्राराक्षस' में वर्णित राजनीति को एक राजनीतिक स्वप्न ही कहा जा सकता है। राष्ट्रीय सुख-शान्ति के निमित्त उसके साधारण और महान्, शामित और शामक सभी का हृदय-परिवर्तन आवश्यक है—यह स्वप्न जिसे आज समस्त विश्व के राष्ट्र देखने के लिय उत्सुक हैं—उसे विशाखदत्त ने शताब्दियों पूर्व ही देख लिया था। चाणक्य तथा राक्षस, चन्द्रगुप्त तथा मलयकेतु भिन्न-भिन्न राजनीतिक आदर्शों का अनुकरण करने वाले हैं किन्तु अन्त में जाकर सभी का हृदय-परिवर्तित हो जाता है। इसका एकमात्र कारण है—राष्ट्र-जीवन का हनन न होने देना तथा राष्ट्र की अमरता की सुरक्षा।

विशाखदत्त ने मानवता के प्रति महान् विश्वास को भी प्रकट किया है। राक्षस की जीवन-धारा का अन्त में सर्वथा परिवर्तित रूप में प्रवाहित होने की सूक्ष्म अभिव्यञ्जना ही इस विश्वास का उत्तम उदाहरण है।

विशाखदत्त का शास्त्रीय ज्ञान—मुद्राराक्षस का भली भाँति अध्ययन करने के पश्चात् यह बात पूर्णतया स्पष्ट हो जाती है कि नाट्यकला सम्बन्धी सूक्ष्म तत्त्वों के ज्ञान के साथ ही साथ नाटककार को अन्य शास्त्रों का भी ज्ञान प्राप्त था। नाटककार के उत्तरदायित्व का निर्वाह कितना कष्टपूर्ण है—इसे वे भली भांति जानते थे। नाट्यशास्त्र में तो वे पूर्ण पारंगत ही थे। इसी कारण उन्होंने राक्षस के मुख से कहलवाया है —

“कार्योपक्षेपमादौ तनुमपि रचयम्तस्य विस्तारमिच्छन् ” इत्यादि ४।३।।

इस कष्ट की अनुभूति विशाखदत्त सदृश सफल नाटककार को ही हो सकती है अथवा राजनीति में विचरण करने वाले कुशल राजनीतिज्ञ राक्षस को ही।

इसके अतिरिक्त वे न्यायशास्त्र (साध्ये निश्चितमन्वयेन घटितम् इत्यादि ५।१०), अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र तथा ज्योतिष-शास्त्र (कृतश्रमोऽस्मि चतुःषष्ट्यङ्गे ज्योतिःशास्त्रे इत्यादि अङ्क १।६ श्लोक से पूर्व का सूत्रधार का कथन तथा "रक्षत्येनं तु बुधयोगः") तथा राजनीति के तो वे माने हुये योद्धा ही थे। परिस्थितियों के स्वाभाविक रूप से बहते हुये प्रवाह को किसी भी क्षण

( ४१ )

अपने अनुकूल मोड़ लेना नाटककार विशाखदत्त के बाएँ हाथ का खेल है। यही कारण है कि उन्हें कभी भी निस्सहाय व्यक्ति के सदृश भाग्य का मुख नहीं देखना पड़ा। उनकी दृष्टि में भाग्य (दैव) पर आश्रित रहना मूर्खों का कार्य है—

“दैवमविद्वांसः प्रमाणयन्ति”—३।२८ के पश्चात् चाणक्य का कथन ।

इस भाँति उनका शास्त्रीय ज्ञान अत्यन्त पाण्डित्यपूर्ण था किन्तु फिर भी उन्होंने अपने पाण्डित्यपूर्ण अहंकार का प्रदर्शन अपनी कृतियो मे कही भी नही किया है। कृत्रिमता का तो कही लेशमात्र भी दर्शन नही होता है।

उनकी कृतियाँ—अभी तक विशाखदत्त द्वारा रचित चार रचनाओं का पता विद्वानो द्वारा लगाया जा सका है। ये चारो नाटक ही हैं। कालक्रम की दृष्टि से उनका विवरण निम्नलिखित है :—

(१) देवीचन्द्रगुप्तम्—इसका कथानक भी राजनीतिक है । इसका सम्बन्ध प्रधान रूप से चन्द्रगुप्त द्वितीय से है जिसने अपने अयोग्य भाई रामगुप्त की पत्नी ध्रुवदेवी से विवाह कर लिया था। रामगुप्त एक कायर तथा भीरु राजा था। इसी कारण उसने शक्तिशाली शकराज द्वारा माँगे जाने पर अपनी रूपवती पत्नी ध्रुवदेवी को उसे दे देना स्वीकार कर लिया था। किन्तु यह बात तेजस्वी चन्द्रगुप्त (द्वितीय) को अनुचित प्रतीत हुई। इस कारण उसने ध्रुवदेवी के छद्मवेष में शकराज के शिविर में जाकर उस अत्याचारी शकराज का वध कर डाला और तदनन्तर ध्रुवदेवी से विवाह भी कर लिया था। किन्तु यह नाटक पूर्णरूप में अभी तक उपलब्ध नहीं हो सका है।

(२) अभिसारिकावञ्चितकम्—इसका उल्लेख 'अभिनव-भारती' के २२वें अध्याय में तथा 'शृंगारप्रकाश' के १८वें प्रकाश मे उपलब्ध होता है। यह नाटक वत्सराज उदयन के जीवन से सम्बन्धित है। किन्तु यह भी अभी तक अप्राप्य ही है।

(३) 'राघवानन्दम्' नाटक—प्रोफेसर ध्रुव द्वारा 'सदुक्ति-कर्णामृत' में निम्नलिखित श्लोक विशाखदत्त के नाम से उद्धृत किया गया है :—

“रामोऽसौ भुवनेषु विक्रमगुणैर्यातः प्रसिद्धिं परा- मस्मद्भाग्यविपर्ययाद् यदि परं देवो न जानाति तम् ।

( ४२ )

वन्दीवंप यशांसि गायति मरुद् यस्यैकबाणाहत- श्रेणीभूतविशालतालविवरोद्गीर्णे स्वरै सप्तभि ॥”

इस श्लोक से यह अनुमान किया जाता है कि ‘राघवानन्द’ नामक कोई नाटक भी विशाखदत्त द्वारा लिखा गया होगा। किन्तु आज यह उपलब्ध नहीं है ।

(४) मुद्राराक्षस—यह विशाखदत्त की सर्वश्रेष्ठ तथा अन्तिम कृति है । उनकी नाट्य-प्रतिभा का यह सर्वोच्च निदर्शन है ।

विशाखदत्त की शैली

नाटककार विशाखदत्त की शैली सुस्पष्ट, प्रभावशाली तथा प्रवाह के औचित्य से पूर्ण है । वैसे तो उनके नाटक ‘मुद्राराक्षस’ में प्रसाद, माधुर्य एवं ओज तीनों ही गुणों का स्वाभाविक रूप से प्रयोग हुआ है, किन्तु फिर भी उसमें प्रसाद गुण की प्रधानता दृष्टिगोचर होती ही है । नाटक के प्रारम्भ में कुछ दूर तक देखते जाइये, श्लोकों में प्रसाद गुण के ही दर्शन होंगे ।

कुछ आलोचकों ने उनकी शैली के सम्बन्ध में यह आपत्ति की है कि विशाखदत्त के नाटकों में कालिदास एवं भवभूति के नाटकों के समान काव्यमय भावाभिव्यक्ति नहीं हो सकी है । किन्तु यदि हम गम्भीरतापूर्वक विचार करें तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि विशाखदत्त की वैयक्तिक विशेषताओं से प्रभावित नाट्य-रचना-शैली को कालिदास तथा भवभूति की तुलना में रखना उचित नहीं है क्योंकि न तो कालिदास और भवभूति के काव्यमय वर्णनों की कल्पना विशाखदत्त में ही दृष्टिगोचर हो सकती है और न विशाखदत्त की नाट्य कल्पना का ही दर्शन कालिदास अथवा भवभूति के नाटकों में उपलब्ध हो सकता है । वस्तुत तीनों का अपना-अपना जीवित जागृत व्यक्तित्व है तथा उसको अभिव्यक्त करने के साधन तथा शक्तियां भी अपनी-अपनी ही हैं । विशाखदत्त ने नाटकीय औचित्य की दृष्टि से या तो काव्य-कल्पनाओं को दूर ही रखा है अथवा उनको नाटक के रंग में ही रंग दिया है । उदाहरणार्थ मलयकेतु के कंचुकी की निम्नलिखित उक्ति को ही देखिये :—

( ४३ )

“कामं नन्दमिव प्रमथ्य जरया चाणक्यनीत्या यथा धर्मो मौर्य इव क्रमेण नगरे नीतः प्रतिष्ठां मयि। तं सम्प्रत्युपचीयमानमपि मे लब्धान्तरः सेवया लोभो राक्षसवञ्चनाय यतते जेतुं न शक्नोति च॥” २।६॥

इस उद्धरण में कवि-कल्पना की उड़ान का दर्शन भले ही न हो किन्तु नाटकीय-वृत्त और चरित्र की अभिव्यञ्जना बड़ी ही सुन्दर प्रतीत होती है। इसी प्रकार शकटदास की ‘दृष्ट्वा मौर्यमिव……’ इत्यादि [मुद्रा० २।२१] उक्ति में नाटककार की काव्य-कल्पना की उड़ान भले ही विद्यमान न हो किन्तु उसमें नाटकीय औचित्य की सतर्कता का दर्शन अवश्य ही होता है।

इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि विशाखदत्त की अपनी एक शैली है। वे अपनी कला के स्वयं ही निर्माता तथा निर्वाहकर्त्ता हैं। “राजनीतिक धोखा किस भाँति दिया जाना उचित कहा जा सकता है”, इसका सूक्ष्म और यथार्थ विश्लेषण ही उनकी कला की प्रमुख विशेषता है। उनकी शैली नाटक के विषय के अनुसार परिवर्तित होती रहती है। उसमें स्थान-स्थान पर गम्भीरता, सशक्तता एवं प्रभावोत्पादकता का दर्शन होता है। कथावस्तु का निर्वाह कला-त्मक दृष्टि के अनुरूप ही हुआ है। राजनीति सदृश नीरस विषय को काव्य एवं नाटक का विषय बना देना, उसमें सजीवता, सरलता, मनोरंजकता आदि का समावेश कर उसे अभिनय सम्बन्धी गुणों से परिपूर्ण कर देना विशाखदत्त जैसे उन्नत कोटि के कलाकार का ही काम है। इस दृष्टि से उनकी गणना मूर्धन्य कलाकारों की श्रेणी में की जा सकती है। मुद्राराक्षस के प्रथम अंक में वर्णित चाणक्य की स्वगतोक्ति तथा षष्ठ अंक में वर्णित राक्षस की स्वगतोक्ति को नाटकीय दृष्टि से लम्बा तथा विस्तृत अवश्य कहा जा सकता है, किन्तु चाणक्य की स्वगतोक्ति से चाणक्य की राजनीति का विशद्-विवेचन उपलब्ध हो जाता है तथा राक्षस की स्वगतोक्ति से राक्षस की मानवीय-प्रकृति का, उसकी कोमल-भावनाओं का तथा उसकी भावात्मक अनुभूतियों का ज्ञान पाठक अथवा दर्शक को स्पष्ट रूप से हो जाता है। एक निराश महान् व्यक्तित्व की प्रकृति के साथ तन्मयता एव एकलयता का जैसा चित्रण उपस्थित किया गया है, भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से उसे अनुपम ही कहा जा सकता है।

( ४६ )

विशाखदत्त का गद्य ओज से समन्वित है । उनके पद्यों मे भी लालित्यपूर्ण प्रवाह का दर्शन होता है । एक उदाहरण देखिये —

"आस्वादितद्विरदशोणितशोणशोभा
सन्ध्यारुणामिव कलां शशलाञ्छनस्य ।
जृम्भाविदारितमुखस्य मुखात्स्फुरन्तो
को हर्तुमिच्छति हरे परिभूय दष्ट्राम् ॥"

इसी प्रसङ्ग में एक उदाहरण और देखिये जिसमें चाणक्य की राजनीति के वैचित्र्य का वर्णन प्रस्तुत किया गया है —

"मुहुर्लक्ष्योद्भेदा मुहुरधिगमाभावगहना
मुहु सम्पूर्णाङ्गी मुहुरतिकृशा कायवशत ।
मुहुर्भ्रश्यद्बीजा मुहुरपि बहुप्रापितफले—
त्यहो चित्राकारा नियतिरिव नोतिनयविद ॥" ५।३।।

नाटककार ने अपने मुद्राराक्षस में सरल पद्यों में शिक्षाप्रद बातों का भी उल्लेख किया है —

"शामनमर्हता प्रतिपद्यध्व मोहव्याधिविबंध्यानाम् ।
ये प्रथममात्रकटुक पश्चात्वथ्यमुपदिशन्ति ॥" ४।१६।।

पात्रों का चरित्र चित्रण— उन्होंने अपने पात्रों के चरित्र-चित्रण में भी अपनी दक्षता दिखलायी है । प्रत्येक पात्र स्वतन्त्र है । वह अपने उद्देश्य की ओर ही प्रेरित है । कोई भी पात्र ऐसा दृष्टिगोचर नहीं होता है जिसकी सार्थकता नाटकीय कथावस्तु की दृष्टि से आवश्यक न हो । चाणक्य और राक्षस दोनों ही कुशल राजनीतिज्ञ हैं । किन्तु दोनों में अन्तर यही है कि चाणक्य धीर तथा दूरदर्शी है और राक्षस उदार तथा विस्मरणशील । फिर भी नाटककार ने राक्षस में जिस मैत्री भावना का चित्रण किया है वह भारतीय संस्कृति की विशिष्ट देन है ।

भाषा— नाटककार विशाखदत्त ने संस्कृत भाषा के अतिरिक्त शौरसेनी, महाराष्ट्री तथा मागधी प्राकृत का भी प्रयोग अपने नाटक मुद्राराक्षस में किया

( ४७ )

है। उनकी भाषा में गत्यात्मक गतिशीलता एवं क्रियात्मक तीव्रता का स्पष्ट दर्शन होता है। उन्होने गद्य तथा पद्य दोनों मे ही कोमल, सरस एवं औचित्य-पूर्ण पदावलि का प्रयोग किया है। उनके भावों का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। भाव के अनुकूल ही भाषा का प्रयोग उनकी एक विशेषता है। वाक्य छोटे-छोटे तथा मुहावरेदार हैं। उन्होंने पाण्डित्यपूर्ण तथा दीर्घ समास-बहुल पदों का प्रयोग अपनी रचना में स्वल्प मात्रा मे ही किया है। इसी कारण उनकी भाषा में दुरूहता का दर्शन नही होता है। उन्होंने पद्यों के बाहुल्य से अपनी नाटकीय शैली को कृत्रिम नही बनाया है। उनका शब्द-विन्यास पूर्णतया सशक्त तथा प्रभावोत्पादक है। पद्य की अपेक्षा गद्य अधिक ओजपूर्ण प्रतीत होता है। उसमें भावुकता के स्थान पर प्रभविष्णुता का आधिक्य है। यहाँ तक कि कभी-कभी तो एक ही शब्द के प्रयोग से नाटककार अधिक से अधिक अभिप्राय को प्रकट करने मे समर्थ होता है। राक्षस के निम्नलिखित कथन को ही देखिये :—

"सत्यं नगरान्निष्क्रामतो मम हस्ताद् ब्राह्मण्या उत्कण्ठा विनोदार्थं गृहीता।"

—मुद्रा० २।२ श्लोक के पश्चात् राक्षस की उक्ति।

इस स्थल पर 'ब्राह्मण्या' शब्द राक्षस के हृदय की घनीभूत पीड़ा तथा करुणा का प्रतीक है।

इसी प्रकार चन्दनदास के पुत्र की यह उक्ति—"तात् ! किमिदमपि अगणितव्यम् । कुलधर्मः खल्वेषोऽस्माकम्" [ अङ्क ७ के चतुर्थ श्लोक से पूर्व ] जितनी संक्षिप्त तथा अलंकृत है उतनी ही भावपूर्ण तथा मर्मस्पर्शी भी है।

विशाखदत्त द्वारा मुद्राराक्षस मे प्रयुक्त कथोपकथन पूर्णतया स्वाभाविक तथा रोचक और नाटकीय गुणो से परिपूर्ण है। इनकी शोभा अवलोकनीय है :—

राजा— अन्येनैवेद्मनुष्ठितम् ।
चाणक्यः— आः केन ?
राजा— नन्दकुलविद्वेषिणा दैवेन ।
चाणक्यः— दैवमविद्वांसः प्रमाणयन्ति । इत्यादि [ ३।२६ से पूर्व ]

( ४८ )

उनका भाषा सम्बन्धी लालित्य एव माधुर्य भी दर्शनीय है । कुछ उदाहरण देखिये —

(१) न प्रयोजनमन्तरा चाणक्यः स्वप्नेऽपि चेष्टते । — ३।१६ के पश्चात् चाणक्य की उक्ति ।

(२) तन्मयाप्यस्मिन् वस्तुनि न शयानेन स्थीयते । — १।१५ के पश्चात् ।

(३) अयमपरो गण्डस्योपरि स्फोटः । — ५।२१ के अनन्तर कही गई राक्षस की उक्ति ।

(४) ननु वक्तव्य राक्षस एवास्मदङ्गुलिप्रणयी संवृत्त । — १।१६ के अनन्तर चाणक्य की उक्ति ।

(५) कीदृश पुन तृणानामग्निना सह विरोधः । — १।२१ के पश्चात् चन्दनदास की उक्ति ।

इस प्रकार की कोमलकान्त पदावलि सभी सहृदय पाठकों के चित्त को अवश्य ही अपनी ओर आकर्षित करने में समर्थ कही जा सकती है ।

छन्द—छन्दों का चयन भी विलक्षण ही है । मुद्राराक्षस में १६ प्रकार के छन्दों का प्रयोग हुआ है जिनमें स्रग्धरा, शिखरिणी, शार्दूलविक्रीडित, वसन्ततिलका और अनुष्टुप् को प्रमुख कहा जा सकता है । प्रत्येक छन्द का प्रयोग मात्र विषय के प्रकाशन हेतु ही नहीं हुआ है अपितु किसी औचित्य की दृष्टि से अथवा किसी औचित्य की सिद्धि के निमित्त ही प्रयुक्त हुआ है । स्रग्धरा छन्द का प्रयोग मुद्राराक्षस में १७ स्थानों पर हुआ है । विषय की दृष्टि से उनका औचित्य प्रशंसनीय ही है । उदाहरण के लिये प्रथम अङ्क के प्रारम्भिक नान्दी सम्बन्धी दो श्लोकों को ही ले लीजिये । 'शिव के शाठ्य' एवं 'ताण्डव-नृत्य के अभिनय' सदृश गभीर और असाधारण विषय का संगीतमय ध्वनि में गम्भीर स्वर लहरी के साथ अभिव्यक्त किया जाना 'स्रग्धरा' जैसे छन्द द्वारा ही सम्भव था । शार्दूलविक्रीडित नामक छन्द का प्रयोग भी २८ बार हुआ है । "श्यामीकृत्या-ननेन्दुम् इत्यादि १।११ श्लोक का भाव शार्दूलविक्रीडित छन्द के अतिरिक्त यदि किसी अन्य छन्द द्वारा अभिव्यक्त किया गया होता तो सम्भवतः चाणक्य का

( ४९ )

गंभीर-अमर्ष नामक भाव उतनी सशक्तता एवं गंभीरता के साथ प्रस्फुटित न हो सका होता कि जितना उपर्युक्त छन्द के प्रयोग द्वारा प्रस्फुटित हो सका है। इसी भाँति औचित्य की दृष्टि से अन्य छन्दों की भी परीक्षा की जा सकती है।

संक्षेप में यह कहा जाना अनुपयुक्त न होगा कि विशाखदत्त की नाट्य-कला-कुशलता का आधार उनकी औचित्य-दृष्टि ही रही है—

“औचित्यं नाट्यजीवितम्”

ग्रन्थ का नाम मुद्राराक्षस क्यों पड़ा ?—विशाखदत्त ने अपने इस नाटक का नाम 'मुद्राराक्षस' रखा है। यही उनकी सर्वश्रेष्ठ तथा अन्तिम कृति है। उनकी नाट्य-प्रतिभा का पूर्ण विकसित स्वरूप इसी में देखने को मिलता है। इस नाटक में मन्त्री राक्षस ने यह प्रयत्न किया है कि किसी भाँति महाराज चन्द्रगुप्त को गद्दी से हटाया जाय। किन्तु कूटनीतिज्ञ अमात्य चाणक्य के प्रयत्नों के फलस्वरूप राक्षस अपने अभीष्ट को पूरा न कर सका। वह चन्द्रगुप्त का शुभचिन्तक था। उसकी हार्दिक अभिलाषा थी कि राक्षस को चन्द्रगुप्त का मुख्य-मन्त्री बनाऊँ। उसने गुप्तचरों द्वारा राक्षस की राजकीय मुद्रा (मोहर) प्राप्त कर ली तथा उस मोहर को लगा लगाकर राक्षस के समर्थकों के समीप जाली पत्र भेजे। परिणामस्वरूप राक्षस का सहायकों के साथ मतभेद हो गया। उसका एक प्रिय मित्र चन्दनदास उसी के परिवार को छिपाकर रखने के अभियोग में राजा चन्द्रगुप्त के आदेशानुसार फाँसी पर चढ़ाया जा रहा था। राक्षस उसके बचाने के निमित्त प्रयत्न करता है। चाणक्य ने कहा कि वह उसके मित्र को फाँसी से छुड़वा देगा यदि वह चन्द्रगुप्त का मन्त्री होना स्वीकार कर ले। राक्षस के पास कोई अन्य चारा ही न था। अतः उसने चन्द्रगुप्त का मन्त्री होना स्वीकार कर लिया।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि चाणक्य की इस सफलता का एकमात्र साधन, 'राक्षस की मुद्रा' ही थी। इसी आधार पर इस नाटक का नाम 'मुद्राराक्षस' रखा गया है। संस्कृत में इसकी व्युत्पत्ति इस भाँति की जाती है :—

"मुद्रया = अङ्गुलिमुद्रया, परिगृहीतः = वशीकृतः, राक्षसः यत्रेति (मध्यमपदलोपि समासः) तदधिकृत्य कृतो ग्रन्थः, मुद्राराक्षसम्। यहाँ "अधिकृत्य कृते ग्रन्थे" सूत्र से अण् प्रत्यय हुआ है और तत्पश्चात् अण् प्रत्यान्त-पद होने के

( ५० )

कारण "यच्चद्वयग्गलणवुल्छृद्धाश्च" के अनुसार नपुंसक लिङ्ग होकर 'मुद्राराक्षसम्' पद बना है। अथवा—मुद्रया गृहीतः राक्षसः यस्मिन् तत् मुद्राराक्षसम्—व्युत्पत्ति भी की जा सकती है।

नाटककार को नाटक का उक्त नाम रखने की प्रेरणा सम्भवत महाकवि शूद्रक के 'मृच्छकटिक' अथवा महाकवि कालिदास के 'अभिज्ञानशाकुन्तल' से प्राप्त हुई होगी। 'मृच्छकटिक' नाटक का नायक चारुदत्त है किन्तु इसके चरित-चित्रण मे मिट्टी की गाड़ी ( मृच्छकट ) की जो घटना है उसका अपना एक विशिष्ट महत्त्व है। इसी घटना के आधार पर नाटककार ने चारुदत्त का पूर्वा पर चरित परस्पर संश्लिष्ट रूप से चित्रित किया है। 'अभिज्ञानशाकुन्तल' मे भी अभिज्ञान—अँगूठी की पहचान से शकुन्तला की पहचान की घटना अपना विशेष महत्त्व रखती है और यही वह घटना है जो कि नायक दुष्यन्त के पूर्वा-पर चरित का समन्वय करती है। इसी भाँति मुद्राराक्षस नाटक मे भी मुद्रा द्वारा राक्षस के पकड़े जाने की घटना एक ऐसी घटना है जिस पर इस नाटक के नायक (चाणक्य) की सम्पूर्ण कूटनीति आधारित है।

नाटककार इस नाटक का अन्य नाम भी रख सकता था किन्तु वे इतने अधिक आकर्षक नहीं हो सकते थे। अत पाठको एव दर्शकों के आकर्षण की दृष्टि से नाटककार ने 'मुद्राराक्षस' यह नाम उचित तथा सार्थक ही रखा है।

मुद्राराक्षस के कथानक का मूल अथवा मुद्राराक्षस के इतिवृत्त का आधार—

विष्णुपुराण, भागवत तथा अन्य पुराणों में भी कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा नन्दवंश के सर्वनाश तथा चन्द्रगुप्त मौर्य की साम्राज्य-प्रतिष्ठा का वर्णन स्पष्ट शब्दो मे उपलब्ध होता है। इतिहास-लेखको के अनुसार नन्द-वंश का अन्तकाल ईस्वी सन् से ३२६ वर्ष पूर्व माना गया है। उस समय से लेकर नाटककार के समय तक लगभग ८०० वर्षों के अन्दर चाणक्य एव चन्द्रगुप्त से सम्बन्धित अनेक किंवदन्तिया चारों ओर फैल चुकी थी। नाटककार इन किंवदन्तियो से अवश्य परिचित रहा होगा किन्तु नाटकीय इतिवृत्त में किसी किंवदन्ती का कोई संकेत उपलब्ध नहीं होता। नन्द-विनाश के निमित्त एक स्थल (अंक ४।१२)

( ५१ )

पर चाणक्य द्वारा प्रयुक्त अभिचार-कर्म का संकेत अवश्य मिलता है किन्तु उसका मुद्राराक्षस के कथानक से कोई सम्बन्ध दृष्टिगोचर नहीं होता ।

दशम शताब्दी की रचना 'दशरूपक' के आधार पर यह सिद्ध होता है कि मुद्राराक्षस का कथानक 'बृहत्कथा' से लिया गया है। दशरूपक में आता है :—

“तत्र बृहत्कथामूलं मुद्राराक्षसम् ।
चाणक्य नाम्ना तेनाद्य शकटारगृहे रहः ॥
कृत्यां विधाय सहसा सपुत्रो निहतो नृपः ॥
योगानन्दे यशः शेषे पूर्वनन्द सुतस्ततः ।
चन्द्रगुप्तः कृतो राज्ये चाणक्येन महौजसा ॥”

'बृहत्कथा' पैशाची-प्राकृत भाषा का ग्रन्थ है कि जो इस समय अप्राप्य भी है । 'कथासरित्सागर' को बृहत्कथा के तात्विक अंश का यथार्थ रूपान्तर माना जाता है । किन्तु 'कथासरित्सागर' में मुद्राराक्षस की कथावस्तु का विस्तृत विवरण उपलब्ध नही होता है । जो थोड़ा-बहुत मिलता भी है—उसमें नाटक के प्रतिनायक 'राक्षस' का नाम अथवा उसके कार्यों का उल्लेख तक नहीं प्राप्त होता है । अतः यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि नाटकीय कथावस्तु का अधिकांश भाग नाटककार की अपनी कल्पना पर ही आधारित है ।

यह भी संभव हो सकता है कि लोक में प्रचलित तथा पुराणादिकों में बीज रूप मे उपलब्ध कथानक ही मुद्राराक्षस की सम्पूर्ण कथावस्तु का मूल आधार रहा हो तथा नाटककार ने अपनी कल्पनाओं के आधार पर उसे पल्लवित किया हो । इस आधार पर मुद्राराक्षस नाटक के मूलवृत्त को 'प्रख्यात' कहा जा सकता है ।

इसके अतिरिक्त 'मुद्राराक्षस' में वर्णित कथावस्तु तथा उससे सम्बन्धित पूर्वकथा—पूर्ण—तथा ऐतिहासिक है । अतः उसको 'प्रख्यात' श्रेणी में रखना उचित ही है ।

'मुद्राराक्षस' मे वर्णित कथावस्तु से पूर्व की कथा—

लोक-परम्परा की दृष्टि से यह पूर्वकथा दो रूपों में उपलब्ध होती है । इन दोनो का सूक्ष्म वर्णन क्रमशः नीचे दिया जा रहा है :—

(१) प्राचीन काल में मगध नाम का एक राज्य था । इसकी राजधानी कुसुमपुर (पुष्पपुर) अथवा (आधुनिक पटना) पाटलिपुत्र थी । पहले यहाँ

( ५२ )

जरामध इत्यादि पुरुवंशी राजा राज्य करते रहे थे। बाद में नन्दवंशीय राजाओ ने पुरुवंशी लोगों को निकालकर तथा विजय प्राप्त कर राज्य किया। धीरे-धीरे इनका प्रभाव सम्पूर्ण भारत में व्याप्त हो गया। इसी वंश में महानन्द नामक राजा का जन्म हुआ। यह अत्यन्त पराक्रमी तथा वीर था। इसके दो मन्त्री थे। मुख्य मन्त्री का नाम शकटार तथा दूसरे का राक्षस था। इनमे प्रथम शूद्र वर्ण का तथा दूसरा ब्राह्मण वर्ण का था। दोनो ही महान् प्रतिभाशाली थे। इनमे से शकटार उद्धत था। इसी कारण महानन्द उससे अप्रसन्न हो गये और उसे बन्दी बना दिया।

कुछ समय पश्चात् शकटार छूट गया किन्तु अपने अपमान के कारण उसका मन क्षुब्ध बना रहा। प्रतिहिंसा की भावना उसके हृदय में धधकती रही। एक दिन वह बाहर घूमता हुआ जा रहा था। मार्ग में उसने एक कृष्ण वर्ण के ब्राह्मण को देखा जो कि कुशों की जडो को खोद-खोदकर उसमे मट्ठा डाल रहा था। शकटार वहाँ खडा हो गया तथा उस ब्राह्मण से उसके द्वारा किये जाते हुये कार्य के बारे में पूछने लगा। उसने उत्तर दिया कि मैं विष्णुगुप्त चाणक्य नाम का एक ब्राह्मण हूँ। मैं एक आवश्यक कार्यवश बाहर जा रहा था, मार्ग में ये कुश मेरे पैर में गड गये जिसके कारण मेरा कार्य न हो सका। अत' मैं इन कुशों को समूल नष्ट कर देने के लिये इनकी जडो मे मट्ठा डाल रहा हूँ।

शकटार अपने मन ही मन मे सोचने लगा कि यदि यह ब्राह्मण महानन्द से असन्तुष्ट हो जाय तो मेरे उद्देश्य की सिद्धि हो सकती है। अत वह ऐसे अवसर की प्रतीक्षा करने लगा। महानन्द के यहाँ श्राद्ध होने वाला था। शकटार ने इस श्राद्ध के लिये उस ब्राह्मण को भी निमन्त्रित कर दिया। श्राद्ध के समय वह स्वय कही चला गया क्योकि वह जानता था कि महानन्द काले ब्राह्मण को देख-कर क्रोधित हो जायगा तथा उसे हटा देगा। हुआ भी ऐसा ही। श्राद्ध-भवन में जब राजा ने उस अनिमन्त्रित काले ब्राह्मण को देखा तो उसे अत्यधिक क्रोध आ गया। उसने उसे निकाल देने की आज्ञा दे दी। इस भयंकर अपमान से अपमानित चाणक्य ने वही खडे होकर नन्दवश के विनाश की प्रतिज्ञा की और तत्पश्चात् वहाँ से चला गया।

महानन्द के ८ पुत्र थे तथा एक चन्द्रगुप्त मौर्य नाम का दासी पुत्र भी था।

( ५३ )

महानन्द के आठों पुत्र शूद्र होने के कारण उसे घृणा की दृष्टि से देखते थे । वैसे वह अत्यन्त बुद्धिमान् तथा चतुर था । आयु में बड़ा होने के कारण वह अपने को राज्य का अधिकारी समझता था और इसी कारण राज-परिवार से उसका वैमनस्य था । चाणक्य तथा शकटार दोनो ने सलाह की कि राज्य का लोभ देकर उसे अपनी ओर मिला लिया जाय तथा नन्दों का नाश कर देने के पश्चात् उसी को राजा बनाया जाय ।

इसके अनन्तर चाणक्य अपनी कुटी में जाकर रहने लगा । उधर शकटार महानन्द की एक दासी विचक्षणा को तथा चन्द्रगुप्त को अपनी ओर फोड़ने लगा । चाणक्य ने एक ऐसा विषयुक्त पकवान् तैयार कराया कि जिसे खाते ही प्राणान्त हो जाय किन्तु परीक्षा करने पर उसका पता न लगाया जा सके । विचक्षणा ने यह पकवान आठो पुत्रों सहित महानन्द को खिला दिया जिससे सभी का प्राणान्त हो गया । इसके अनन्तर शकटार की मृत्यु हो गयी । चाणक्य चन्द्रगुप्त को राजा बनाने की बात सोचने लगा । उसने पर्वतक नामक राजा को आधा राज्य दे देने का प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला लिया । उसका पुत्र मलयकेतु तथा भाई वैरोधक था । पर्वतक के साथ पाँच म्लेच्छ राजा और थे ।

उधर राक्षस नामक मन्त्री राजा के मर जाने से अत्यन्त दुखी हुआ । उसने उसके सम्बन्धी सर्वार्थसिद्धि को राज-सिंहासन पर बिठालकर राज-कार्य चलाना शुरू किया । किन्तु कुछ समय के पश्चात् सर्वार्थसिद्धि वन को चला गया और वहाँ चाणक्य ने उसे मरवा डाला । ऐसी दशा में राक्षस ने राज्य का प्रलोभन देकर राजा पर्वतक को अपनी ओर मिला लिया तथा चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करने की तैयारी की । चाणक्य को इस बात का पता लग गया । उसने एक विषकन्या पर्वतक के पास भेजी । कामी पर्वतक उसके चक्कर में फँस गया और उसके साथ संसर्ग करते ही उसका देहावसान हो गया । उसका पुत्र मलयकेतु भयभीत होकर भाग गया । इसके अनन्तर राक्षस चन्द्रगुप्त का अनिष्ट करने के लिये पूर्णरूप से उतारू हो गया । इसके पश्चात् मुद्राराक्षस का अपना कथानक प्रारम्भ हो जाता है ।

(२) नन्द नाम के कुछ राजा पूर्वकाल में हो चुके हैं । इनमें सबसे बड़ा राजा 'उग्रधन्वा' था । उसके वक्रनाम आदि चार मन्त्री थे । उनमें सबसे अधिक

( ५४ )

बुद्धिमान् एव चतुर राक्षस नाम का मन्त्री था जो कि राज्य का सञ्चालन करता था। उस राजा की 'सुनन्दा' नाम की पटरानी थी। उसके एक रूपवती दासी भी थी जिसका नाम 'मुरा' था—यह शूद्रा थी किन्तु राजा को अति प्रिय थी। एक बार एक तपस्वी राजा के समीप आये। राजा ने उनकी अच्छी आवभगत की। अभ्यर्थना के अनन्तर उनका चरणोदक रानी तथा मुरा की ओर छिड़क दिया गया। रानी के सिर पर नौ बूँदें तथा मुरा के सिर पर एक बूँद गिरी। बड़ी श्रद्धा एव भक्ति के साथ मुरा ने उसे स्वीकार किया। उसकी भक्ति से तपस्वी अति प्रसन्न हुये। उनके आशीर्वाद से मुरा को एक गुणी पुत्र उत्पन्न हुआ। सुनन्दा के एक साथ नौ पुत्र उत्पन्न हुये। उनका पालन पोषण राक्षस द्वारा किया गया। वे सब बड़े वीर थे। राजा ने उन सभी का नाम 'नन्द' रखा तथा मुरा के पुत्र का नाम चन्द्रगुप्त रखा। नन्द के देहावसान के पश्चात् ये नवौ नन्द राज्याभिषिक्त हुये।

एक बार सिंहल देश के राजा ने एक मोम का सिंह बनवाया तथा उसे पिंजड़े में बन्द कर नन्दों के पास इस संदेश के साथ भेजा कि यदि आपके यहाँ कोई बुद्धिमान् व्यक्ति हो तो पिंजड़े को बिना खोले ही इस सिंह को बाहर निकाल दे। इस सन्देश को श्रवणकर सभी नन्द मौन रह गये। किन्तु चन्द्रगुप्त ने पिंजड़े के चारो ओर आग जलाकर उस सिंह को पिघलाकर बाहर निकाल दिया। सभी आश्चर्य मे पड़ गये। नन्द उससे ईर्ष्या करने लगे तथा उसे देव एवं पितरों के कार्य का पथ्यक बना दिया। चन्द्रगुप्त समय की प्रतीक्षा करता रहा। नन्दों का अपकार करने हेतु वह विष्णुगुप्त नामक एक क्रोधी एव नीतिज्ञ ब्राह्मण के समीप पहुँचा तथा उससे मैत्री भी कर ली।

नन्दो के यहाँ श्राद्ध कर्म मे चन्द्रगुप्त ने उसे निमन्त्रित कर दिया। वह कुरूप था। नन्दों ने उसे देखकर उसे अग्रासन से उठा दिया। इस अपमान से अपमानित उस ब्राह्मण ने अपनी चोटी खोलकर प्रतिज्ञा की कि जब तक मैं नन्दो का समूल नाश नही कर दूंगा तब तक चोटी नही बाधूँगा।

यह कहकर वह नगर से बाहर चला गया। उसके समुचित उपायो द्वारा नन्द का विनाश हो गया और उसकी कृपा से चन्द्रगुप्त मौर्य राजा बना दिया गया। यहीं से 'मुद्राराक्षस' की कथा का प्रारम्भ होता है।