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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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राजनीतिक आदर्शवादिता तो विशाखदत्त के व्यक्तित्व की आधारशिला ही है। कौटिल्य-अर्थशास्त्र की राजनीति तत्कालीन कही जा सकती है किन्तु 'मुद्राराक्षस' में वर्णित राजनीति को एक राजनीतिक स्वप्न ही कहा जा सकता है। राष्ट्रीय सुख-शान्ति के निमित्त उसके साधारण और महान्, शामित और शामक सभी का हृदय-परिवर्तन आवश्यक है—यह स्वप्न जिसे आज समस्त विश्व के राष्ट्र देखने के लिय उत्सुक हैं—उसे विशाखदत्त ने शताब्दियों पूर्व ही देख लिया था। चाणक्य तथा राक्षस, चन्द्रगुप्त तथा मलयकेतु भिन्न-भिन्न राजनीतिक आदर्शों का अनुकरण करने वाले हैं किन्तु अन्त में जाकर सभी का हृदय-परिवर्तित हो जाता है। इसका एकमात्र कारण है—राष्ट्र-जीवन का हनन न होने देना तथा राष्ट्र की अमरता की सुरक्षा।

विशाखदत्त ने मानवता के प्रति महान् विश्वास को भी प्रकट किया है। राक्षस की जीवन-धारा का अन्त में सर्वथा परिवर्तित रूप में प्रवाहित होने की सूक्ष्म अभिव्यञ्जना ही इस विश्वास का उत्तम उदाहरण है।

विशाखदत्त का शास्त्रीय ज्ञान—मुद्राराक्षस का भली भाँति अध्ययन करने के पश्चात् यह बात पूर्णतया स्पष्ट हो जाती है कि नाट्यकला सम्बन्धी सूक्ष्म तत्त्वों के ज्ञान के साथ ही साथ नाटककार को अन्य शास्त्रों का भी ज्ञान प्राप्त था। नाटककार के उत्तरदायित्व का निर्वाह कितना कष्टपूर्ण है—इसे वे भली भांति जानते थे। नाट्यशास्त्र में तो वे पूर्ण पारंगत ही थे। इसी कारण उन्होंने राक्षस के मुख से कहलवाया है —

“कार्योपक्षेपमादौ तनुमपि रचयम्तस्य विस्तारमिच्छन् ” इत्यादि ४।३।।

इस कष्ट की अनुभूति विशाखदत्त सदृश सफल नाटककार को ही हो सकती है अथवा राजनीति में विचरण करने वाले कुशल राजनीतिज्ञ राक्षस को ही।

इसके अतिरिक्त वे न्यायशास्त्र (साध्ये निश्चितमन्वयेन घटितम् इत्यादि ५।१०), अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र तथा ज्योतिष-शास्त्र (कृतश्रमोऽस्मि चतुःषष्ट्यङ्गे ज्योतिःशास्त्रे इत्यादि अङ्क १।६ श्लोक से पूर्व का सूत्रधार का कथन तथा "रक्षत्येनं तु बुधयोगः") तथा राजनीति के तो वे माने हुये योद्धा ही थे। परिस्थितियों के स्वाभाविक रूप से बहते हुये प्रवाह को किसी भी क्षण

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अपने अनुकूल मोड़ लेना नाटककार विशाखदत्त के बाएँ हाथ का खेल है। यही कारण है कि उन्हें कभी भी निस्सहाय व्यक्ति के सदृश भाग्य का मुख नहीं देखना पड़ा। उनकी दृष्टि में भाग्य (दैव) पर आश्रित रहना मूर्खों का कार्य है—

“दैवमविद्वांसः प्रमाणयन्ति”—३।२८ के पश्चात् चाणक्य का कथन ।

इस भाँति उनका शास्त्रीय ज्ञान अत्यन्त पाण्डित्यपूर्ण था किन्तु फिर भी उन्होंने अपने पाण्डित्यपूर्ण अहंकार का प्रदर्शन अपनी कृतियो मे कही भी नही किया है। कृत्रिमता का तो कही लेशमात्र भी दर्शन नही होता है।

उनकी कृतियाँ—अभी तक विशाखदत्त द्वारा रचित चार रचनाओं का पता विद्वानो द्वारा लगाया जा सका है। ये चारो नाटक ही हैं। कालक्रम की दृष्टि से उनका विवरण निम्नलिखित है :—

(१) देवीचन्द्रगुप्तम्—इसका कथानक भी राजनीतिक है । इसका सम्बन्ध प्रधान रूप से चन्द्रगुप्त द्वितीय से है जिसने अपने अयोग्य भाई रामगुप्त की पत्नी ध्रुवदेवी से विवाह कर लिया था। रामगुप्त एक कायर तथा भीरु राजा था। इसी कारण उसने शक्तिशाली शकराज द्वारा माँगे जाने पर अपनी रूपवती पत्नी ध्रुवदेवी को उसे दे देना स्वीकार कर लिया था। किन्तु यह बात तेजस्वी चन्द्रगुप्त (द्वितीय) को अनुचित प्रतीत हुई। इस कारण उसने ध्रुवदेवी के छद्मवेष में शकराज के शिविर में जाकर उस अत्याचारी शकराज का वध कर डाला और तदनन्तर ध्रुवदेवी से विवाह भी कर लिया था। किन्तु यह नाटक पूर्णरूप में अभी तक उपलब्ध नहीं हो सका है।

(२) अभिसारिकावञ्चितकम्—इसका उल्लेख 'अभिनव-भारती' के २२वें अध्याय में तथा 'शृंगारप्रकाश' के १८वें प्रकाश मे उपलब्ध होता है। यह नाटक वत्सराज उदयन के जीवन से सम्बन्धित है। किन्तु यह भी अभी तक अप्राप्य ही है।

(३) 'राघवानन्दम्' नाटक—प्रोफेसर ध्रुव द्वारा 'सदुक्ति-कर्णामृत' में निम्नलिखित श्लोक विशाखदत्त के नाम से उद्धृत किया गया है :—

“रामोऽसौ भुवनेषु विक्रमगुणैर्यातः प्रसिद्धिं परा- मस्मद्भाग्यविपर्ययाद् यदि परं देवो न जानाति तम् ।

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वन्दीवंप यशांसि गायति मरुद् यस्यैकबाणाहत- श्रेणीभूतविशालतालविवरोद्गीर्णे स्वरै सप्तभि ॥”

इस श्लोक से यह अनुमान किया जाता है कि ‘राघवानन्द’ नामक कोई नाटक भी विशाखदत्त द्वारा लिखा गया होगा। किन्तु आज यह उपलब्ध नहीं है ।

(४) मुद्राराक्षस—यह विशाखदत्त की सर्वश्रेष्ठ तथा अन्तिम कृति है । उनकी नाट्य-प्रतिभा का यह सर्वोच्च निदर्शन है ।

विशाखदत्त की शैली

नाटककार विशाखदत्त की शैली सुस्पष्ट, प्रभावशाली तथा प्रवाह के औचित्य से पूर्ण है । वैसे तो उनके नाटक ‘मुद्राराक्षस’ में प्रसाद, माधुर्य एवं ओज तीनों ही गुणों का स्वाभाविक रूप से प्रयोग हुआ है, किन्तु फिर भी उसमें प्रसाद गुण की प्रधानता दृष्टिगोचर होती ही है । नाटक के प्रारम्भ में कुछ दूर तक देखते जाइये, श्लोकों में प्रसाद गुण के ही दर्शन होंगे ।

कुछ आलोचकों ने उनकी शैली के सम्बन्ध में यह आपत्ति की है कि विशाखदत्त के नाटकों में कालिदास एवं भवभूति के नाटकों के समान काव्यमय भावाभिव्यक्ति नहीं हो सकी है । किन्तु यदि हम गम्भीरतापूर्वक विचार करें तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि विशाखदत्त की वैयक्तिक विशेषताओं से प्रभावित नाट्य-रचना-शैली को कालिदास तथा भवभूति की तुलना में रखना उचित नहीं है क्योंकि न तो कालिदास और भवभूति के काव्यमय वर्णनों की कल्पना विशाखदत्त में ही दृष्टिगोचर हो सकती है और न विशाखदत्त की नाट्य कल्पना का ही दर्शन कालिदास अथवा भवभूति के नाटकों में उपलब्ध हो सकता है । वस्तुत तीनों का अपना-अपना जीवित जागृत व्यक्तित्व है तथा उसको अभिव्यक्त करने के साधन तथा शक्तियां भी अपनी-अपनी ही हैं । विशाखदत्त ने नाटकीय औचित्य की दृष्टि से या तो काव्य-कल्पनाओं को दूर ही रखा है अथवा उनको नाटक के रंग में ही रंग दिया है । उदाहरणार्थ मलयकेतु के कंचुकी की निम्नलिखित उक्ति को ही देखिये :—

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“कामं नन्दमिव प्रमथ्य जरया चाणक्यनीत्या यथा धर्मो मौर्य इव क्रमेण नगरे नीतः प्रतिष्ठां मयि। तं सम्प्रत्युपचीयमानमपि मे लब्धान्तरः सेवया लोभो राक्षसवञ्चनाय यतते जेतुं न शक्नोति च॥” २।६॥

इस उद्धरण में कवि-कल्पना की उड़ान का दर्शन भले ही न हो किन्तु नाटकीय-वृत्त और चरित्र की अभिव्यञ्जना बड़ी ही सुन्दर प्रतीत होती है। इसी प्रकार शकटदास की ‘दृष्ट्वा मौर्यमिव……’ इत्यादि [मुद्रा० २।२१] उक्ति में नाटककार की काव्य-कल्पना की उड़ान भले ही विद्यमान न हो किन्तु उसमें नाटकीय औचित्य की सतर्कता का दर्शन अवश्य ही होता है।

इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि विशाखदत्त की अपनी एक शैली है। वे अपनी कला के स्वयं ही निर्माता तथा निर्वाहकर्त्ता हैं। “राजनीतिक धोखा किस भाँति दिया जाना उचित कहा जा सकता है”, इसका सूक्ष्म और यथार्थ विश्लेषण ही उनकी कला की प्रमुख विशेषता है। उनकी शैली नाटक के विषय के अनुसार परिवर्तित होती रहती है। उसमें स्थान-स्थान पर गम्भीरता, सशक्तता एवं प्रभावोत्पादकता का दर्शन होता है। कथावस्तु का निर्वाह कला-त्मक दृष्टि के अनुरूप ही हुआ है। राजनीति सदृश नीरस विषय को काव्य एवं नाटक का विषय बना देना, उसमें सजीवता, सरलता, मनोरंजकता आदि का समावेश कर उसे अभिनय सम्बन्धी गुणों से परिपूर्ण कर देना विशाखदत्त जैसे उन्नत कोटि के कलाकार का ही काम है। इस दृष्टि से उनकी गणना मूर्धन्य कलाकारों की श्रेणी में की जा सकती है। मुद्राराक्षस के प्रथम अंक में वर्णित चाणक्य की स्वगतोक्ति तथा षष्ठ अंक में वर्णित राक्षस की स्वगतोक्ति को नाटकीय दृष्टि से लम्बा तथा विस्तृत अवश्य कहा जा सकता है, किन्तु चाणक्य की स्वगतोक्ति से चाणक्य की राजनीति का विशद्-विवेचन उपलब्ध हो जाता है तथा राक्षस की स्वगतोक्ति से राक्षस की मानवीय-प्रकृति का, उसकी कोमल-भावनाओं का तथा उसकी भावात्मक अनुभूतियों का ज्ञान पाठक अथवा दर्शक को स्पष्ट रूप से हो जाता है। एक निराश महान् व्यक्तित्व की प्रकृति के साथ तन्मयता एव एकलयता का जैसा चित्रण उपस्थित किया गया है, भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से उसे अनुपम ही कहा जा सकता है।

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विशाखदत्त का गद्य ओज से समन्वित है । उनके पद्यों मे भी लालित्यपूर्ण प्रवाह का दर्शन होता है । एक उदाहरण देखिये —

"आस्वादितद्विरदशोणितशोणशोभा
सन्ध्यारुणामिव कलां शशलाञ्छनस्य ।
जृम्भाविदारितमुखस्य मुखात्स्फुरन्तो
को हर्तुमिच्छति हरे परिभूय दष्ट्राम् ॥"

इसी प्रसङ्ग में एक उदाहरण और देखिये जिसमें चाणक्य की राजनीति के वैचित्र्य का वर्णन प्रस्तुत किया गया है —

"मुहुर्लक्ष्योद्भेदा मुहुरधिगमाभावगहना
मुहु सम्पूर्णाङ्गी मुहुरतिकृशा कायवशत ।
मुहुर्भ्रश्यद्बीजा मुहुरपि बहुप्रापितफले—
त्यहो चित्राकारा नियतिरिव नोतिनयविद ॥" ५।३।।

नाटककार ने अपने मुद्राराक्षस में सरल पद्यों में शिक्षाप्रद बातों का भी उल्लेख किया है —

"शामनमर्हता प्रतिपद्यध्व मोहव्याधिविबंध्यानाम् ।
ये प्रथममात्रकटुक पश्चात्वथ्यमुपदिशन्ति ॥" ४।१६।।

पात्रों का चरित्र चित्रण— उन्होंने अपने पात्रों के चरित्र-चित्रण में भी अपनी दक्षता दिखलायी है । प्रत्येक पात्र स्वतन्त्र है । वह अपने उद्देश्य की ओर ही प्रेरित है । कोई भी पात्र ऐसा दृष्टिगोचर नहीं होता है जिसकी सार्थकता नाटकीय कथावस्तु की दृष्टि से आवश्यक न हो । चाणक्य और राक्षस दोनों ही कुशल राजनीतिज्ञ हैं । किन्तु दोनों में अन्तर यही है कि चाणक्य धीर तथा दूरदर्शी है और राक्षस उदार तथा विस्मरणशील । फिर भी नाटककार ने राक्षस में जिस मैत्री भावना का चित्रण किया है वह भारतीय संस्कृति की विशिष्ट देन है ।

भाषा— नाटककार विशाखदत्त ने संस्कृत भाषा के अतिरिक्त शौरसेनी, महाराष्ट्री तथा मागधी प्राकृत का भी प्रयोग अपने नाटक मुद्राराक्षस में किया

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है। उनकी भाषा में गत्यात्मक गतिशीलता एवं क्रियात्मक तीव्रता का स्पष्ट दर्शन होता है। उन्होने गद्य तथा पद्य दोनों मे ही कोमल, सरस एवं औचित्य-पूर्ण पदावलि का प्रयोग किया है। उनके भावों का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। भाव के अनुकूल ही भाषा का प्रयोग उनकी एक विशेषता है। वाक्य छोटे-छोटे तथा मुहावरेदार हैं। उन्होंने पाण्डित्यपूर्ण तथा दीर्घ समास-बहुल पदों का प्रयोग अपनी रचना में स्वल्प मात्रा मे ही किया है। इसी कारण उनकी भाषा में दुरूहता का दर्शन नही होता है। उन्होंने पद्यों के बाहुल्य से अपनी नाटकीय शैली को कृत्रिम नही बनाया है। उनका शब्द-विन्यास पूर्णतया सशक्त तथा प्रभावोत्पादक है। पद्य की अपेक्षा गद्य अधिक ओजपूर्ण प्रतीत होता है। उसमें भावुकता के स्थान पर प्रभविष्णुता का आधिक्य है। यहाँ तक कि कभी-कभी तो एक ही शब्द के प्रयोग से नाटककार अधिक से अधिक अभिप्राय को प्रकट करने मे समर्थ होता है। राक्षस के निम्नलिखित कथन को ही देखिये :—

"सत्यं नगरान्निष्क्रामतो मम हस्ताद् ब्राह्मण्या उत्कण्ठा विनोदार्थं गृहीता।"

—मुद्रा० २।२ श्लोक के पश्चात् राक्षस की उक्ति।

इस स्थल पर 'ब्राह्मण्या' शब्द राक्षस के हृदय की घनीभूत पीड़ा तथा करुणा का प्रतीक है।

इसी प्रकार चन्दनदास के पुत्र की यह उक्ति—"तात् ! किमिदमपि अगणितव्यम् । कुलधर्मः खल्वेषोऽस्माकम्" [ अङ्क ७ के चतुर्थ श्लोक से पूर्व ] जितनी संक्षिप्त तथा अलंकृत है उतनी ही भावपूर्ण तथा मर्मस्पर्शी भी है।

विशाखदत्त द्वारा मुद्राराक्षस मे प्रयुक्त कथोपकथन पूर्णतया स्वाभाविक तथा रोचक और नाटकीय गुणो से परिपूर्ण है। इनकी शोभा अवलोकनीय है :—

राजा— अन्येनैवेद्मनुष्ठितम् ।
चाणक्यः— आः केन ?
राजा— नन्दकुलविद्वेषिणा दैवेन ।
चाणक्यः— दैवमविद्वांसः प्रमाणयन्ति । इत्यादि [ ३।२६ से पूर्व ]

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उनका भाषा सम्बन्धी लालित्य एव माधुर्य भी दर्शनीय है । कुछ उदाहरण देखिये —

(१) न प्रयोजनमन्तरा चाणक्यः स्वप्नेऽपि चेष्टते । — ३।१६ के पश्चात् चाणक्य की उक्ति ।

(२) तन्मयाप्यस्मिन् वस्तुनि न शयानेन स्थीयते । — १।१५ के पश्चात् ।

(३) अयमपरो गण्डस्योपरि स्फोटः । — ५।२१ के अनन्तर कही गई राक्षस की उक्ति ।

(४) ननु वक्तव्य राक्षस एवास्मदङ्गुलिप्रणयी संवृत्त । — १।१६ के अनन्तर चाणक्य की उक्ति ।

(५) कीदृश पुन तृणानामग्निना सह विरोधः । — १।२१ के पश्चात् चन्दनदास की उक्ति ।

इस प्रकार की कोमलकान्त पदावलि सभी सहृदय पाठकों के चित्त को अवश्य ही अपनी ओर आकर्षित करने में समर्थ कही जा सकती है ।

छन्द—छन्दों का चयन भी विलक्षण ही है । मुद्राराक्षस में १६ प्रकार के छन्दों का प्रयोग हुआ है जिनमें स्रग्धरा, शिखरिणी, शार्दूलविक्रीडित, वसन्ततिलका और अनुष्टुप् को प्रमुख कहा जा सकता है । प्रत्येक छन्द का प्रयोग मात्र विषय के प्रकाशन हेतु ही नहीं हुआ है अपितु किसी औचित्य की दृष्टि से अथवा किसी औचित्य की सिद्धि के निमित्त ही प्रयुक्त हुआ है । स्रग्धरा छन्द का प्रयोग मुद्राराक्षस में १७ स्थानों पर हुआ है । विषय की दृष्टि से उनका औचित्य प्रशंसनीय ही है । उदाहरण के लिये प्रथम अङ्क के प्रारम्भिक नान्दी सम्बन्धी दो श्लोकों को ही ले लीजिये । 'शिव के शाठ्य' एवं 'ताण्डव-नृत्य के अभिनय' सदृश गभीर और असाधारण विषय का संगीतमय ध्वनि में गम्भीर स्वर लहरी के साथ अभिव्यक्त किया जाना 'स्रग्धरा' जैसे छन्द द्वारा ही सम्भव था । शार्दूलविक्रीडित नामक छन्द का प्रयोग भी २८ बार हुआ है । "श्यामीकृत्या-ननेन्दुम् इत्यादि १।११ श्लोक का भाव शार्दूलविक्रीडित छन्द के अतिरिक्त यदि किसी अन्य छन्द द्वारा अभिव्यक्त किया गया होता तो सम्भवतः चाणक्य का

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गंभीर-अमर्ष नामक भाव उतनी सशक्तता एवं गंभीरता के साथ प्रस्फुटित न हो सका होता कि जितना उपर्युक्त छन्द के प्रयोग द्वारा प्रस्फुटित हो सका है। इसी भाँति औचित्य की दृष्टि से अन्य छन्दों की भी परीक्षा की जा सकती है।

संक्षेप में यह कहा जाना अनुपयुक्त न होगा कि विशाखदत्त की नाट्य-कला-कुशलता का आधार उनकी औचित्य-दृष्टि ही रही है—

“औचित्यं नाट्यजीवितम्”

ग्रन्थ का नाम मुद्राराक्षस क्यों पड़ा ?—विशाखदत्त ने अपने इस नाटक का नाम 'मुद्राराक्षस' रखा है। यही उनकी सर्वश्रेष्ठ तथा अन्तिम कृति है। उनकी नाट्य-प्रतिभा का पूर्ण विकसित स्वरूप इसी में देखने को मिलता है। इस नाटक में मन्त्री राक्षस ने यह प्रयत्न किया है कि किसी भाँति महाराज चन्द्रगुप्त को गद्दी से हटाया जाय। किन्तु कूटनीतिज्ञ अमात्य चाणक्य के प्रयत्नों के फलस्वरूप राक्षस अपने अभीष्ट को पूरा न कर सका। वह चन्द्रगुप्त का शुभचिन्तक था। उसकी हार्दिक अभिलाषा थी कि राक्षस को चन्द्रगुप्त का मुख्य-मन्त्री बनाऊँ। उसने गुप्तचरों द्वारा राक्षस की राजकीय मुद्रा (मोहर) प्राप्त कर ली तथा उस मोहर को लगा लगाकर राक्षस के समर्थकों के समीप जाली पत्र भेजे। परिणामस्वरूप राक्षस का सहायकों के साथ मतभेद हो गया। उसका एक प्रिय मित्र चन्दनदास उसी के परिवार को छिपाकर रखने के अभियोग में राजा चन्द्रगुप्त के आदेशानुसार फाँसी पर चढ़ाया जा रहा था। राक्षस उसके बचाने के निमित्त प्रयत्न करता है। चाणक्य ने कहा कि वह उसके मित्र को फाँसी से छुड़वा देगा यदि वह चन्द्रगुप्त का मन्त्री होना स्वीकार कर ले। राक्षस के पास कोई अन्य चारा ही न था। अतः उसने चन्द्रगुप्त का मन्त्री होना स्वीकार कर लिया।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि चाणक्य की इस सफलता का एकमात्र साधन, 'राक्षस की मुद्रा' ही थी। इसी आधार पर इस नाटक का नाम 'मुद्राराक्षस' रखा गया है। संस्कृत में इसकी व्युत्पत्ति इस भाँति की जाती है :—

"मुद्रया = अङ्गुलिमुद्रया, परिगृहीतः = वशीकृतः, राक्षसः यत्रेति (मध्यमपदलोपि समासः) तदधिकृत्य कृतो ग्रन्थः, मुद्राराक्षसम्। यहाँ "अधिकृत्य कृते ग्रन्थे" सूत्र से अण् प्रत्यय हुआ है और तत्पश्चात् अण् प्रत्यान्त-पद होने के

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कारण "यच्चद्वयग्गलणवुल्छृद्धाश्च" के अनुसार नपुंसक लिङ्ग होकर 'मुद्राराक्षसम्' पद बना है। अथवा—मुद्रया गृहीतः राक्षसः यस्मिन् तत् मुद्राराक्षसम्—व्युत्पत्ति भी की जा सकती है।

नाटककार को नाटक का उक्त नाम रखने की प्रेरणा सम्भवत महाकवि शूद्रक के 'मृच्छकटिक' अथवा महाकवि कालिदास के 'अभिज्ञानशाकुन्तल' से प्राप्त हुई होगी। 'मृच्छकटिक' नाटक का नायक चारुदत्त है किन्तु इसके चरित-चित्रण मे मिट्टी की गाड़ी ( मृच्छकट ) की जो घटना है उसका अपना एक विशिष्ट महत्त्व है। इसी घटना के आधार पर नाटककार ने चारुदत्त का पूर्वा पर चरित परस्पर संश्लिष्ट रूप से चित्रित किया है। 'अभिज्ञानशाकुन्तल' मे भी अभिज्ञान—अँगूठी की पहचान से शकुन्तला की पहचान की घटना अपना विशेष महत्त्व रखती है और यही वह घटना है जो कि नायक दुष्यन्त के पूर्वा-पर चरित का समन्वय करती है। इसी भाँति मुद्राराक्षस नाटक मे भी मुद्रा द्वारा राक्षस के पकड़े जाने की घटना एक ऐसी घटना है जिस पर इस नाटक के नायक (चाणक्य) की सम्पूर्ण कूटनीति आधारित है।

नाटककार इस नाटक का अन्य नाम भी रख सकता था किन्तु वे इतने अधिक आकर्षक नहीं हो सकते थे। अत पाठको एव दर्शकों के आकर्षण की दृष्टि से नाटककार ने 'मुद्राराक्षस' यह नाम उचित तथा सार्थक ही रखा है।

मुद्राराक्षस के कथानक का मूल अथवा मुद्राराक्षस के इतिवृत्त का आधार—

विष्णुपुराण, भागवत तथा अन्य पुराणों में भी कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा नन्दवंश के सर्वनाश तथा चन्द्रगुप्त मौर्य की साम्राज्य-प्रतिष्ठा का वर्णन स्पष्ट शब्दो मे उपलब्ध होता है। इतिहास-लेखको के अनुसार नन्द-वंश का अन्तकाल ईस्वी सन् से ३२६ वर्ष पूर्व माना गया है। उस समय से लेकर नाटककार के समय तक लगभग ८०० वर्षों के अन्दर चाणक्य एव चन्द्रगुप्त से सम्बन्धित अनेक किंवदन्तिया चारों ओर फैल चुकी थी। नाटककार इन किंवदन्तियो से अवश्य परिचित रहा होगा किन्तु नाटकीय इतिवृत्त में किसी किंवदन्ती का कोई संकेत उपलब्ध नहीं होता। नन्द-विनाश के निमित्त एक स्थल (अंक ४।१२)

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पर चाणक्य द्वारा प्रयुक्त अभिचार-कर्म का संकेत अवश्य मिलता है किन्तु उसका मुद्राराक्षस के कथानक से कोई सम्बन्ध दृष्टिगोचर नहीं होता ।

दशम शताब्दी की रचना 'दशरूपक' के आधार पर यह सिद्ध होता है कि मुद्राराक्षस का कथानक 'बृहत्कथा' से लिया गया है। दशरूपक में आता है :—

“तत्र बृहत्कथामूलं मुद्राराक्षसम् ।
चाणक्य नाम्ना तेनाद्य शकटारगृहे रहः ॥
कृत्यां विधाय सहसा सपुत्रो निहतो नृपः ॥
योगानन्दे यशः शेषे पूर्वनन्द सुतस्ततः ।
चन्द्रगुप्तः कृतो राज्ये चाणक्येन महौजसा ॥”

'बृहत्कथा' पैशाची-प्राकृत भाषा का ग्रन्थ है कि जो इस समय अप्राप्य भी है । 'कथासरित्सागर' को बृहत्कथा के तात्विक अंश का यथार्थ रूपान्तर माना जाता है । किन्तु 'कथासरित्सागर' में मुद्राराक्षस की कथावस्तु का विस्तृत विवरण उपलब्ध नही होता है । जो थोड़ा-बहुत मिलता भी है—उसमें नाटक के प्रतिनायक 'राक्षस' का नाम अथवा उसके कार्यों का उल्लेख तक नहीं प्राप्त होता है । अतः यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि नाटकीय कथावस्तु का अधिकांश भाग नाटककार की अपनी कल्पना पर ही आधारित है ।

यह भी संभव हो सकता है कि लोक में प्रचलित तथा पुराणादिकों में बीज रूप मे उपलब्ध कथानक ही मुद्राराक्षस की सम्पूर्ण कथावस्तु का मूल आधार रहा हो तथा नाटककार ने अपनी कल्पनाओं के आधार पर उसे पल्लवित किया हो । इस आधार पर मुद्राराक्षस नाटक के मूलवृत्त को 'प्रख्यात' कहा जा सकता है ।

इसके अतिरिक्त 'मुद्राराक्षस' में वर्णित कथावस्तु तथा उससे सम्बन्धित पूर्वकथा—पूर्ण—तथा ऐतिहासिक है । अतः उसको 'प्रख्यात' श्रेणी में रखना उचित ही है ।

'मुद्राराक्षस' मे वर्णित कथावस्तु से पूर्व की कथा—

लोक-परम्परा की दृष्टि से यह पूर्वकथा दो रूपों में उपलब्ध होती है । इन दोनो का सूक्ष्म वर्णन क्रमशः नीचे दिया जा रहा है :—

(१) प्राचीन काल में मगध नाम का एक राज्य था । इसकी राजधानी कुसुमपुर (पुष्पपुर) अथवा (आधुनिक पटना) पाटलिपुत्र थी । पहले यहाँ

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जरामध इत्यादि पुरुवंशी राजा राज्य करते रहे थे। बाद में नन्दवंशीय राजाओ ने पुरुवंशी लोगों को निकालकर तथा विजय प्राप्त कर राज्य किया। धीरे-धीरे इनका प्रभाव सम्पूर्ण भारत में व्याप्त हो गया। इसी वंश में महानन्द नामक राजा का जन्म हुआ। यह अत्यन्त पराक्रमी तथा वीर था। इसके दो मन्त्री थे। मुख्य मन्त्री का नाम शकटार तथा दूसरे का राक्षस था। इनमे प्रथम शूद्र वर्ण का तथा दूसरा ब्राह्मण वर्ण का था। दोनो ही महान् प्रतिभाशाली थे। इनमे से शकटार उद्धत था। इसी कारण महानन्द उससे अप्रसन्न हो गये और उसे बन्दी बना दिया।

कुछ समय पश्चात् शकटार छूट गया किन्तु अपने अपमान के कारण उसका मन क्षुब्ध बना रहा। प्रतिहिंसा की भावना उसके हृदय में धधकती रही। एक दिन वह बाहर घूमता हुआ जा रहा था। मार्ग में उसने एक कृष्ण वर्ण के ब्राह्मण को देखा जो कि कुशों की जडो को खोद-खोदकर उसमे मट्ठा डाल रहा था। शकटार वहाँ खडा हो गया तथा उस ब्राह्मण से उसके द्वारा किये जाते हुये कार्य के बारे में पूछने लगा। उसने उत्तर दिया कि मैं विष्णुगुप्त चाणक्य नाम का एक ब्राह्मण हूँ। मैं एक आवश्यक कार्यवश बाहर जा रहा था, मार्ग में ये कुश मेरे पैर में गड गये जिसके कारण मेरा कार्य न हो सका। अत' मैं इन कुशों को समूल नष्ट कर देने के लिये इनकी जडो मे मट्ठा डाल रहा हूँ।

शकटार अपने मन ही मन मे सोचने लगा कि यदि यह ब्राह्मण महानन्द से असन्तुष्ट हो जाय तो मेरे उद्देश्य की सिद्धि हो सकती है। अत वह ऐसे अवसर की प्रतीक्षा करने लगा। महानन्द के यहाँ श्राद्ध होने वाला था। शकटार ने इस श्राद्ध के लिये उस ब्राह्मण को भी निमन्त्रित कर दिया। श्राद्ध के समय वह स्वय कही चला गया क्योकि वह जानता था कि महानन्द काले ब्राह्मण को देख-कर क्रोधित हो जायगा तथा उसे हटा देगा। हुआ भी ऐसा ही। श्राद्ध-भवन में जब राजा ने उस अनिमन्त्रित काले ब्राह्मण को देखा तो उसे अत्यधिक क्रोध आ गया। उसने उसे निकाल देने की आज्ञा दे दी। इस भयंकर अपमान से अपमानित चाणक्य ने वही खडे होकर नन्दवश के विनाश की प्रतिज्ञा की और तत्पश्चात् वहाँ से चला गया।

महानन्द के ८ पुत्र थे तथा एक चन्द्रगुप्त मौर्य नाम का दासी पुत्र भी था।

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महानन्द के आठों पुत्र शूद्र होने के कारण उसे घृणा की दृष्टि से देखते थे । वैसे वह अत्यन्त बुद्धिमान् तथा चतुर था । आयु में बड़ा होने के कारण वह अपने को राज्य का अधिकारी समझता था और इसी कारण राज-परिवार से उसका वैमनस्य था । चाणक्य तथा शकटार दोनो ने सलाह की कि राज्य का लोभ देकर उसे अपनी ओर मिला लिया जाय तथा नन्दों का नाश कर देने के पश्चात् उसी को राजा बनाया जाय ।

इसके अनन्तर चाणक्य अपनी कुटी में जाकर रहने लगा । उधर शकटार महानन्द की एक दासी विचक्षणा को तथा चन्द्रगुप्त को अपनी ओर फोड़ने लगा । चाणक्य ने एक ऐसा विषयुक्त पकवान् तैयार कराया कि जिसे खाते ही प्राणान्त हो जाय किन्तु परीक्षा करने पर उसका पता न लगाया जा सके । विचक्षणा ने यह पकवान आठो पुत्रों सहित महानन्द को खिला दिया जिससे सभी का प्राणान्त हो गया । इसके अनन्तर शकटार की मृत्यु हो गयी । चाणक्य चन्द्रगुप्त को राजा बनाने की बात सोचने लगा । उसने पर्वतक नामक राजा को आधा राज्य दे देने का प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला लिया । उसका पुत्र मलयकेतु तथा भाई वैरोधक था । पर्वतक के साथ पाँच म्लेच्छ राजा और थे ।

उधर राक्षस नामक मन्त्री राजा के मर जाने से अत्यन्त दुखी हुआ । उसने उसके सम्बन्धी सर्वार्थसिद्धि को राज-सिंहासन पर बिठालकर राज-कार्य चलाना शुरू किया । किन्तु कुछ समय के पश्चात् सर्वार्थसिद्धि वन को चला गया और वहाँ चाणक्य ने उसे मरवा डाला । ऐसी दशा में राक्षस ने राज्य का प्रलोभन देकर राजा पर्वतक को अपनी ओर मिला लिया तथा चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करने की तैयारी की । चाणक्य को इस बात का पता लग गया । उसने एक विषकन्या पर्वतक के पास भेजी । कामी पर्वतक उसके चक्कर में फँस गया और उसके साथ संसर्ग करते ही उसका देहावसान हो गया । उसका पुत्र मलयकेतु भयभीत होकर भाग गया । इसके अनन्तर राक्षस चन्द्रगुप्त का अनिष्ट करने के लिये पूर्णरूप से उतारू हो गया । इसके पश्चात् मुद्राराक्षस का अपना कथानक प्रारम्भ हो जाता है ।

(२) नन्द नाम के कुछ राजा पूर्वकाल में हो चुके हैं । इनमें सबसे बड़ा राजा 'उग्रधन्वा' था । उसके वक्रनाम आदि चार मन्त्री थे । उनमें सबसे अधिक

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बुद्धिमान् एव चतुर राक्षस नाम का मन्त्री था जो कि राज्य का सञ्चालन करता था। उस राजा की 'सुनन्दा' नाम की पटरानी थी। उसके एक रूपवती दासी भी थी जिसका नाम 'मुरा' था—यह शूद्रा थी किन्तु राजा को अति प्रिय थी। एक बार एक तपस्वी राजा के समीप आये। राजा ने उनकी अच्छी आवभगत की। अभ्यर्थना के अनन्तर उनका चरणोदक रानी तथा मुरा की ओर छिड़क दिया गया। रानी के सिर पर नौ बूँदें तथा मुरा के सिर पर एक बूँद गिरी। बड़ी श्रद्धा एव भक्ति के साथ मुरा ने उसे स्वीकार किया। उसकी भक्ति से तपस्वी अति प्रसन्न हुये। उनके आशीर्वाद से मुरा को एक गुणी पुत्र उत्पन्न हुआ। सुनन्दा के एक साथ नौ पुत्र उत्पन्न हुये। उनका पालन पोषण राक्षस द्वारा किया गया। वे सब बड़े वीर थे। राजा ने उन सभी का नाम 'नन्द' रखा तथा मुरा के पुत्र का नाम चन्द्रगुप्त रखा। नन्द के देहावसान के पश्चात् ये नवौ नन्द राज्याभिषिक्त हुये।

एक बार सिंहल देश के राजा ने एक मोम का सिंह बनवाया तथा उसे पिंजड़े में बन्द कर नन्दों के पास इस संदेश के साथ भेजा कि यदि आपके यहाँ कोई बुद्धिमान् व्यक्ति हो तो पिंजड़े को बिना खोले ही इस सिंह को बाहर निकाल दे। इस सन्देश को श्रवणकर सभी नन्द मौन रह गये। किन्तु चन्द्रगुप्त ने पिंजड़े के चारो ओर आग जलाकर उस सिंह को पिघलाकर बाहर निकाल दिया। सभी आश्चर्य मे पड़ गये। नन्द उससे ईर्ष्या करने लगे तथा उसे देव एवं पितरों के कार्य का पथ्यक बना दिया। चन्द्रगुप्त समय की प्रतीक्षा करता रहा। नन्दों का अपकार करने हेतु वह विष्णुगुप्त नामक एक क्रोधी एव नीतिज्ञ ब्राह्मण के समीप पहुँचा तथा उससे मैत्री भी कर ली।

नन्दो के यहाँ श्राद्ध कर्म मे चन्द्रगुप्त ने उसे निमन्त्रित कर दिया। वह कुरूप था। नन्दों ने उसे देखकर उसे अग्रासन से उठा दिया। इस अपमान से अपमानित उस ब्राह्मण ने अपनी चोटी खोलकर प्रतिज्ञा की कि जब तक मैं नन्दो का समूल नाश नही कर दूंगा तब तक चोटी नही बाधूँगा।

यह कहकर वह नगर से बाहर चला गया। उसके समुचित उपायो द्वारा नन्द का विनाश हो गया और उसकी कृपा से चन्द्रगुप्त मौर्य राजा बना दिया गया। यहीं से 'मुद्राराक्षस' की कथा का प्रारम्भ होता है।

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अंकानुसार 'मुद्राराक्षस' की संक्षिप्त कथावस्तु

प्रथम अङ्क—भगवान् शंकर की स्तुतिरूप नान्दी के अनन्तर नाटककार प्रस्तावना प्रस्तुत करता है जिसमें सूत्रधार द्वारा सूक्ष्म कवि-परिचय के साथ 'मुद्राराक्षस' के अभिनीत किये जाने की सूचना दर्शकों को दी जाती है। ऐसा कहकर वह अभिनय में भाग लेने हेतु अपनी पत्नी को बुलाने के लिये घर जाता है। वहाँ पहुँचकर वह अपनी पत्नी को चन्द्रग्रहण के उपलक्ष्य में ब्रह्म भोज का आयोजन करने में व्यस्त देखता है। वह अपनी पत्नी से कहता है कि तिथि आदि की दृष्टि से आज चन्द्रग्रहण का होना किसी भी दशा में संभव नहीं है। नेपथ्य से चाणक्य 'चन्द्रग्रहण' शब्द को सुनकर तथा 'चन्द्रगुप्त मौर्य का पकड़ा जाना' अर्थ लेकर कहता है :—

"आः, क एष मयि स्थिते चन्द्रगुप्तमभिभवितुमिच्छति।"

और तदनन्तर रंगमंच पर आकर घोषणा करता है कि "अरे ! वह कौन है कि जो अपनी मृत्यु को स्वयं ही बुला रहा है और कभी की बँध चुकने वाली मेरी चोटी को इस समय भी बँधते हुये नहीं देखना चाहता है।" फिर वह मन ही मन सोचता है—'तपोवन में तपस्या करने के लिये गये हुये सर्वार्थसिद्धि को मरवा दिया गया है। प्रजा में यह समाचार फैला दिया गया है कि राक्षस ने ही विषकन्या को भेजकर पर्वतक को मरवाया है। भागुरायण ने मलयकेतु को यह कहकर भगा दिया है कि तुम्हारे पिता को चाणक्य ने मरवाया है। मन्त्री राक्षस की गतिविधियों पर दृष्टि रखने के निमित्त गुप्तचरों की नियुक्ति की जा चुकी है। अपना सहपाठी विष्णुशर्मा जैन संन्यासी के रूप में कुसुमपुर ( पाटलिपुत्र ) भेजा जा चुका है जो कि राक्षस का विश्वासपात्र बनकर उसके सम्पूर्ण कार्यों का भेद ले रहा है।

नन्दों के प्रति अटूट एवं निश्चल राक्षस की श्रद्धा और भक्ति को देखकर चाणक्य उसे अपनी ओर मिलाकर चन्द्रगुप्त का प्रधान अमात्य बनाने का भी इच्छुक है।

तदनन्तर यम का चित्र हाथ में लिये हुए योगी वेषधारी चाणक्य का गुप्तचर निपुणक चाणक्य को सूचना देता है कि चन्द्रगुप्त के विरोधी तथा राक्षस

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के परम मित्र तीन व्यक्ति हैं—(१) जीवसिद्धि क्षपणक, (२) शकटदास और (३) सेठ चन्दनदास (जिसने मन्त्री राक्षस के परिवार को अपने घर में शरण दे रखी है।) इतना कहकर वह चाणक्य को राक्षस के नाम से अङ्कित एक मुद्रा देकर चला जाता है ।

एकान्त में बैठकर चाणक्य एक पत्र लिखता है और शकटदास के लेख में उसकी प्रतिलिपि कराने के निमित्त सिद्धार्थक को देता है । सिद्धार्थक शकटदास से प्रतिलिपि कराके ले आता है । इस प्रतिलिपि-पत्र को राक्षस की मुद्रा से मुद्रित कर चाणक्य सिद्धार्थक को देते हुए बतलाता है कि तुम वध-स्थान पर जाकर क्रोधावेश में वधिकों को अपनी आंख का सङ्केत करना । उस संकेत के आधार पर जब वे भाग जायें तब तुम शकटदास को वहाँ से भगाकर राक्षस के समीप ले जाना तथा उसके प्राणों की रक्षा के फलस्वरूप राक्षस से पारितोषिक प्राप्तकर कुछ काल पर्यन्त उसी की सेवा में संलग्न रहना । इसके पश्चात् चाणक्य सिद्धार्थक के कान में कुछ कहकर उसे विदा कर देता है ।

इसके पश्चात् चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रतीहारी द्वारा यह सूचना प्राप्त कर कि महाराज चन्द्रगुप्त राजा पर्वतेश्वर का श्राद्ध करना चाहते हैं और उसमें उनके आभूषणों का दान भी करना चाहते हैं, चाणक्य इस कार्य के निमित्त विश्वावसु आदि तीन ब्राह्मणों की नियुक्ति कर देते हैं ।

इसके अनन्तर चाणक्य अपने शिष्य शाङ्गरव द्वारा कालपाशिक एवं दण्ड-पाशिक के समीप अपने निम्नलिखित दो आदेशों का प्रेषित करता है —

(१) क्षपणक-जीवसिद्धि पर यह आरोप लगाकर नगर से बाहर निकाल दिया जाय कि उसने राक्षस की प्रेरणा से विषकन्या द्वारा पर्वतक को मरवा डाला है ।

(२) शकटदास पर यह दोष लगाकर कि यह प्रतिदिन हमारे विरुद्ध षड्यन्त्र रचा करता है, शूली पर चढ़ा दिया जाय ।

इसके उपरान्त चाणक्य अपने शिष्य द्वारा सेठ चन्दनदास को बुलवाता है और उससे कहता है कि तुमने राक्षस के परिवार को अपने घर में छिपा रखा है । उसे हमको सौंप दो । इसके उत्तर में सेठ चन्दनदास कहता है—राक्षस का

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परिवार मेरे घर में नहीं है। यदि रहा होता तो भी मैं आपको नहीं सौंपता ? इसी बीच नेपथ्य में हुये कोलाहल से सूचना मिलती है कि क्षपणक जीवसिद्धि को देशनिकाला दे दिया गया है तथा शकटदास को सूली पर चढ़ाने के लिये ले जाया जा रहा है। चाणक्य चन्दनदास को डरवाते हुये कहता है कि सेठ जी ! आप देख नहीं रहे हैं कि राजा चन्द्रगुप्त राजद्रोहियों के प्रति कितना कठोर हे। अतः तुम राक्षस के परिवार को हमारे हवाले कर दो। जब चन्दनदास इस बात को किसी भी दशा में स्वीकार नहीं करता है तब चाणक्य अपने शिष्य द्वारा विजयपाल से कहलाता है कि सेठ चन्दनदास की सारी सम्पत्ति जब्त कर ली जाय और उसके परिवार को कारागार में डाल दिया जाय।

इसी समय नेपथ्य से यह सूचना मिलती है कि सिद्धार्थक वध-स्थान से शकटदास को भगाकर ले गया है। चाणक्य इसे सुनकर प्रसन्न होता है क्योंकि उसी के आदेश से ऐसा हुआ है। वह जानता है कि सिद्धार्थक जब शकटदास की रक्षा कर राक्षस के समीप उसे ले जायगा तो राक्षस उससे प्रसन्न हो जायेगा और वह राक्षस का विश्वासपात्र भी बन जायगा। ऐसी स्थिति में उसे राक्षस का सम्पूर्ण भेद मिलता रहेगा।

द्वितीय अङ्क—इस अङ्क के प्रारम्भ में जीर्णविष नामक सँपेरा सर्वप्रथम रङ्गमञ्च पर आता है। यह राक्षस का गुप्तचर विराधगुप्त ही है। वह राक्षस से मिलना चाहता है।

इसके पश्चात् अपने भवन में पलँग पर आसीन चिन्तानिमग्न राक्षस दृष्टिगोचर होता है। उसकी चिन्ता का विषय है—दिवंगत स्वामी नन्द को प्रसन्न करना। लक्ष्मी को बुरा-भला कहने के पश्चात् वह सोचता है कि चन्दनदास के घर में अपने परिवार को छोड़कर मैंने उचित ही किया है। चन्द्रगुप्त को मरवाने तथा शत्रुपक्ष के लोगों को फोड़ने के निमित्त मैंने शकटदास को नियुक्त किया है। शत्रु के समाचार जानने हेतु जीवसिद्धि को रख रखा है। इसी समय मलयकेतु द्वारा प्रेषित कंचुकी जाजलि राक्षस के समीप आता है तथा मलयकेतु के अपने शरीर से उतारकर दिये गये आभूषण को राक्षस को पहनाकर चला जाता है।

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इसके पश्चात् संपेरा आकर अपना परिचय देकर कुसुमपुर के सम्पूर्ण समाचारों से राक्षस को अवगत कराता हुआ कहता है —

पाटलिपुत्र के चारो ओर से घिर जाने पर सर्वार्थसिद्धि सुरंग के मार्ग से निकलकर भाग गये। आप भी नन्द-साम्राज्य की पुन स्थापना हेतु सुरंग के माग से ही बाहर आ गये। विषकन्या द्वारा पर्वतक की मृत्यु कर दी गयी और तदनन्तर कुमार मलयकेतु भी पाटलिपुत्र छोड कर चले गये। ऐसे निष्कण्टक समय के आ जाने पर चाणक्य न राजभवन मे चन्द्रगुप्त के प्रवेश करने की तिथि की घोषणा कर दी। शिल्पियो द्वारा सूचित किया गया कि चन्द्रगुप्त के राज-भवन मे प्रवेश के उपलक्ष्य मे दारुवर्मा ने पूर्वीय द्वार की साज सज्जा कर दी है। चाणक्य उसकी चाल को समझ गया। निश्चित समय पर अर्धरात्रि के समय पर्वतक के भाई वैरोचक को चन्द्रगुप्त के साथ एक ही आसन पर बिठाकर राज्या-भिषेक कर दिया। तदनन्तर चन्द्रगुप्त के राजभवन में प्रवेश करते समय चन्द्रगुप्त की हथिनी चन्द्रलेखा के ऊपर वैरोचक को बैठा दिया। इस स्थिति मे चन्द्रगुप्त की भ्रान्ति में वैरोचक पर ही यन्त्र-तोरण गिराने के लिये दारुवर्मा ने तैयारी की। दूसरी ओर आप द्वारा नियुक्त महावत बर्बरक वैरोचक को ही चन्द्रगुप्त जानकर अपनी सोने की छड़ी से कटार निकालने लगा। हथिनी न यह समझा कि अब यह छड़ी मेरे ऊपर पड़ने ही वाली है, अतः अपनी चाल तेज कर दी। परिणामस्वरूप यत्र तोरण के गिरने के समय न तो चन्द्रगुप्त ही मारा जा सका और न वैरोचक ही। बेचारा बर्बरक ही मार दिया गया। ऐसा होने पर दारुवर्मा ने अपनी मृत्यु को निश्चित समझकर यन्त्र की कील से चन्द्रगुप्त के भ्रम मे वैरोचक को मार दिया। वैरोचक के पीछे चलने वाले लोगो ने ढेलों को मार-मारकर दारुवर्मा को मार दिया। अभयदत्त नामक वैद्य को भी, जिसने चन्द्रगुप्त को मार देने के निमित्त विष-मिश्रित ओषधि तैयार की थी, उसी ओषधि को पिलाकर मार दिया गया। शयन-कक्ष का अधिकारी प्रमोदक भी असंगत उत्तर देने के उपलक्ष्य में मार दिया गया। बीभत्सकादि जो दीवाल की सुरंग में चन्द्रगुप्त को मार देने के निमित्त रह रहे थे, को भी उस सुरंग में आग लगवाकर मार दिया गया। क्षपणक जीवसिद्धि को विषकन्या द्वारा पर्वतेश्वर की हत्या कराये जाने के अपराध मे देश-निकाला दे दिया गया। शकटदास पर यह

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अपराध लगाकर कि उसी ने दारुवर्मा आदि शिल्पियों की नियुक्ति की थी, फांसी के दण्ड से दण्डित किया गया। इसी भांति चन्दनदास को आपके परिवार को छिपाकर अपने घर में रखने के आरोप में स्त्री-पुत्रादि सहित कारागार में डाल दिया गया।

इसी बीच शकटदास को लेकर सिद्धार्थक वहाँ आ जाता है। शकटदास बतलाता है कि प्रिय मित्र सिद्धार्थक की ही कृपा से मेरे प्राण बच सके। इस उपकार के बदले राक्षस मलयकेतु द्वारा प्रेषित आभूषण को अपने शरीर से उतारकर सिद्धार्थक को दे देता है। सिद्धार्थक राक्षस से प्रार्थना करता है कि मैं इस स्थान पर अपरिचित हूँ। अतएव अभी आप इसे अपने पास रख लें—जब मुझे आवश्यकता पड़ेगी, आपसे ले लूंगा। अब सिद्धार्थक राक्षस का विश्वासपात्र बनकर उसी के पास रहने लगता है।

इसके अनन्तर विराधगुप्त राक्षस को पुनः सूचना देता है कि मलयकेतु के भाग आने के पश्चात् चन्द्रगुप्त और चाणक्य में फूट उत्पन्न हो गई है। इसी कारण अब चन्द्रगुप्त चाणक्य के आदेशों को पूर्ववत् नहीं मानता है।

तत्पश्चात् राक्षस उसी वेश में विराधगुप्त को 'स्तनकलश' से सन्देश कहने के लिये कुसुमपुर भेजता है। सन्देश यह है कि तुम अपनी स्तुतियों द्वारा चन्द्रगुप्त को चाणक्य के विरोध में भड़काने का प्रयत्न करना तथा यदि कोई गुप्त सूचना हो तो करभक द्वारा मेरे पास भेजना।

इसके पश्चात् तीन आभूषण खरीदे जाते हैं। तदनन्तर राक्षस करभक को कुछ आदेश देकर कुसुमपुर भेज देता है।

तृतीय अङ्क—पाटलिपुत्र में कंचुकी द्वारा घोषणा की जाती है कि महाराज चन्द्रगुप्त की आज्ञा है कि कौमुदी-महोत्सव के अवसर पर कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) को भली भांति से सजाया जावे।

तदनन्तर वह सुगांग नामक महल की छत से नगर की शोभा का निरीक्षण करता है, किन्तु उसे नगर में कोई चहल-पहल दृष्टिगोचर नहीं होती है। कौमुदी-महोत्सव मनाये जाने का कोई चिह्न तक नहीं दिखलायी पड़ता है। कंचुकी द्वारा यह ज्ञात होने पर, कि आर्य चाणक्य ने कौमुदी-महोत्सव मनाये जाने का विरोध कर दिया है, वह आर्य चाणक्य को बुलवाता है।

चाणक्य के निवास स्थान पर पहुँचकर कंचुकी उसे चिन्तित अवस्था में पाता है। चाणक्य सोच रहा है कि राक्षस को किस भांति वश में किया जाय।

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वह सोचता है कि मेरे गुप्तचरो से मलयकेतु घिरा हुआ है । अब मैं चन्द्रगुप्त के साथ कृत्रिम-कलह उत्पन्न करक राक्षस को मलयकेतु से अलग कर दूँगा । इसी बीच कंचुकी चन्द्रगुप्त का सन्देश चाणक्य से कह देता है । चाणक्य कंचुकी से पूछता है कि क्या चन्द्रगुप्त को कौमुदी-महोत्सव के न मनाये जाने सम्बन्धी मेरे आदेश का पता लग गया है ? कंचुकी द्वारा 'हा' कह दिये जाने पर वह क्रोधा-वेश में चन्द्रगुप्त के समीप चल देता है ।

चाणक्य के आ जाने पर चन्द्रगुप्त उन्हे प्रणाम कर उचित आसन पर बैठाता है । चाणक्य उसे सार्वभौम सम्राट होने सम्बन्धी आशीर्वाद देता है । चन्द्रगुप्त द्वारा कौमुदी-महोत्सव के निषेध का कारण पूछे जाने पर चाणक्य उत्तर देता है—यह बात मन्त्री से सम्बद्ध है । तुम सचिवायत्त सिद्धि हो, अत तुमको कारण जानने से क्या प्रयोजन ? इसी मध्य दो वैतालिक राजा की स्तुति करते हुये श्लोक पाठ करते हैं । इनमे प्रथम राजा का अपना व्यक्ति है तथा दूसरा राक्षस का आदमी है—स्तनकलश । यह दूसरा वैतालिक स्तुति के बहाने से चन्द्रगुप्त को चाणक्य से फोड़ने की बात कहता है । चाणक्य इसे समझ लेता है । चन्द्रगुप्त दोनो को प्रभूत धनराशि पारितोषिक रूप में देने का आदेश दे देता है । चाणक्य इसका निषेध करता है । इस पर चन्द्रगुप्त कहता है "आप पग-पग पर मेरे कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं । अतएव यह राज्य मेरे लिये राज्य न होकर, एक प्रकार का बन्धन ही बन गया है ।" चाणक्य उत्तेजना के साथ कहता है—तो तुम अपना कार्य स्वय ही देखो, मैं भी अपने श्रोत्रिय सम्बन्धी कार्य मे सलग्न हो जाऊगा । राजा पुनः कौमुदी-महोत्सव के निषेध का कारण पूछता है । चाणक्य कहता है—हमारे भद्रभट आदि सेनाध्यक्ष मलयकेतु से जाकर मिल गये हैं तथा आक्रमण की तैयारी मे व्यस्त हैं । उक्त स्थिति मे हमारे लिये सैन्य-सज्जा करना उचित है अथवा कौमुदी-महोत्सव का मनाना ? चन्द्रगुप्त पुन प्रश्न करता है कि आपने मलयकेतु एव राक्षस को भाग जाने का अवसर क्यो दिया ? इसका भी चाणक्य द्वारा उत्तर दिया जाता है किन्तु उससे चन्द्रगुप्त को सन्तोष नही होता है और वह कहता है—मैं आपसे तर्क-वितर्क नही करना चाहता हूँ, मैं तो आपसे अधिक राक्षस को ही प्रशंसनीय समझता हूँ क्योकि उसने पाटलिपुत्र में रहते हुये हमारे व्यक्तियो को फोड लिया और हम कुछ न

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कर सके । इस पर चाणक्य अत्यधिक क्रुद्ध हो जाता है और कहता है कि यदि तुम राक्षस को मुझसे अधिक योग्य समझते हो तो यह शस्त्र मन्त्री राक्षस को ही दे दो। यह कहकर शस्त्र को पृथ्वी पर पटककर चला जाता है।

तदनन्तर चन्द्रगुप्त अपने कंचुकी वैहीनरि को आज्ञा देता है कि राज्य में घोषणा कर दो कि आज से चन्द्रगुप्त ने चाणक्य को मन्त्रि-पद से अलग कर दिया है। वह अपना राज-काज स्वयं देखेगा।

राक्षस का गुप्तचर 'स्तनकलश' इस कृत्रिम कलह को वास्तविक समझता है। कंचुकी भी इस कलह को वास्तविक ही समझता है।

चतुर्थ अङ्क—राक्षस का गुप्तचर करभक पाटलिपुत्र से आता है। वह द्वारपाल से राक्षस से मिलने के निमित्त कहता है। किन्तु रात्रि में देर तक जागने के कारण राक्षस शिरोवेदना से पीड़ित है। अतः द्वारपाल उसे थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के लिये कहता है।

इधर शयनागार में पड़ा हुआ राक्षस सोच रहा है कि सम्पूर्ण रात्रियाँ जागते-जागते ही व्यतीत हो रही हैं। जिस काम को करने की सोचता हूँ वही चाणक्य की कुटिल नीति के कारण विफल हो जाता है। यह राजनीति भी एक विचित्र प्रकार का नाटक है। संभव है कि चाणक्य तथा चन्द्रगुप्त में फूट उत्पन्न हो जाय। अवसर पाकर द्वारपाल करभक के आगमन की सूचना राक्षस को देता है। वह उसे अन्दर बुलवा लेता है। इसी बीच राक्षस की शिरोवेदना का समाचार पाकर मलयकेतु भी भागुरायण के साथ वहाँ जाता है। (यह भागुरायण चाणक्य का गुप्तचर है और मलयकेतु का कपट मित्र। वह आते समय मार्ग में कुछ ऐसी बातें करता रहा था कि जिससे प्रभावित होकर मलयकेतु और राक्षस में फूट पड़ जाय। मार्ग में मलयकेतु ने भागुरायण से पूछा कि भद्रभट इत्यादि ने जो मुझसे यह कहा था कि हम लोग मन्त्री राक्षस द्वारा आपके आश्रय में नहीं आये हैं। हम लोग सेनापति शिखरसेन द्वारा आपके आश्रय में आये हैं—इसका क्या अभिप्राय है? इसके उत्तर में भागुरायण कहता है—राक्षस की शत्रुता चाणक्य से है न कि चन्द्रगुप्त से। यह हो सकता है कि चन्द्रगुप्त चाणक्य को अपने मन्त्री पद से पृथक् कर दे और राक्षस अपने मित्र चन्दनदास की रक्षा के निमित्त चन्द्रगुप्त से सन्धि कर ले। यदि यह बातें