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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

पंचम अङ्क । १२५

चपल तुरगखुर घात उठी घन घुमड़ि नवीनी ।
सबु सीस पैं धूरि परै गजमद सौं भीनी ॥
अपने भृत्यों के साथ मलयकेतु जाता है ।

राक्षस ।— ( घबड़ा कर ) हाय ! हाय ! चित्रवर्मादिक साधु सब व्यर्थ मारे गए । हाय ! राक्षस की सब चेष्टा शत्रु को ५
नही, मित्रों ही के नाश करने को होती है । अब हम मन्द-भाग्य क्या करें ?
जाहि तपोबन, पै न मन, शांत होत सह क्रोध ।
प्रान देहि ? रिपु कें जियत, यह नारिन को बोध ॥
खींचि खड्ग कर पतग सम, जाहि अनल अरि पास । १०
है या साहस होइ है, चन्दनदास बिनास ॥

( सोचता हुआ जाता है । )

पटाक्षेप । इति पंचम अङ्क ।

छठा अंक

स्थान—नगर के बाहर सडक ।

( कपडा, गहिना पहिने हुए सिद्धार्थक आता है । )

सिद्धार्थक ।—

जलद नील तन जयति जय, केशव केशी काल ।
जयति सुजन जन दृष्टि ससि, चन्द्रगुप्त नरपाल ॥
जयति आर्य्य चाणक्य की, नीति सहज बल भौन ।
बिनही साजे सैन नित, जीतत अरि कुल जौन ॥

चलो आज पुराने मित्र समिद्धार्थक से भेट करें (घूमकर) अरे ! मित्र समिद्धार्थक आपही इधर आता है ।

( समिद्धार्थक आता है )

समिद्धार्थक ।—

मिटत ताप नहि पान सों, होत उडाह बिनास ।
बिना मोत के सुख सबै, औरहु करत उदास ॥

सुना है कि मलयकेतु के कटक से मित्र सिद्धार्थक आ गया है । उसी को खोजने को हम भी निकले है कि मिलै तो बड़ा आनन्द हो । ( आगे बढ़ कर ) अहा ! सिद्धार्थक तो यही है । कहो मित्र ! अच्छे तो हो ?

**सिद्धार्थक ।—**अहा ! मित्र समिद्धार्थक आप ही आगए । ( बढ़ कर )—कहो मित्र ! क्षेम कुशल तो है ?

( दोनों गले से मिलते हैं )

**समिद्धार्थक ।—**भला ! यहा कुशल कहा कि तुम्हारे ऐसा मित्र बहुत दिन पीछे घर भी आया तो बिना मिले फिर चला गया ।

छठा अङ्क। १२७

सिद्धार्थक ।—मित्र ! क्षमा करो। मुझ को देखते ही आर्य्य चाणक्य ने आज्ञा दी कि इस प्रिय वृत्तान्त को अभी चन्द्रमा सदृश प्रकाशित शोभावाले परम प्रिय महाराज प्रियदर्शन से जा कर कहो। मै उसी समय महाराज के पास चला गया और उन से निवेदन कर के यह सब पुरस्कार ५ पाकर तुम से मिलने को तुम्हारे घर अभी जाता ही था। समिद्धार्थक ।—मित्र ! जो सुनने के योग्य हो तो महाराज प्रियदर्शन से जो प्रियवृत्तान्त कहा है वह हम भी सुनें। सिद्धार्थक ।—मित्र ! तुम से भी कोई बात छिपी है ! सुनो ! आर्य्य चाणक्य की नीति से मोहित मति हो कर उस १० नष्ट मलयकेतु ने राक्षस को दूर कर दिया और चित्र- वर्म्मादिक पांचो प्रबल राजो को मरवा डाला। यह देखते ही और सब राजे अपने प्राण और राज्य का संशय समझ कर उस को छोड़ कर सैना सहित अपने अपने देश चले गए। जब शत्रु ऐसी निर्बल अवस्था मे हुआ, १५ तो भद्रभट, पुरुषदत्त, हिगुरात, बलगुप्त, राजसेन, भागु- रायण, रोहिताक्ष, विजयवर्मा इत्यादि लोगों ने मलयकेतु को कैद कर लिया। समिद्धार्थक ।—मित्र ! लोग तो यह जानते हैं कि भद्रभट इत्यादि लोग महाराज चन्द्रश्री को छोड़ कर मलयकेतु २० से मिल गए, तो क्या कुकवियों के नाटक की भांति इस के मुख में और तथा निर्वहण मे और बात है * ? सिद्धार्थक ।—वयस्य ! सुनो, जैसे दैव की गति नहीं जानी जाती वैसे ही आर्य्य चाणक्य की जिस नीति की भी गति नहीं जानी जाती उस को नमस्कार है। २५ समिद्धार्थक ।—हा ! कहो, तब क्या हुआ ?


* अर्थात् नाटक की उत्तमता यही है कि जिस वर्णन, रीति और रस से आरम्भ हो वैसे ही समाप्त हो यह नहीं कि पहिले कछ, पीछे कुछ ।

१२८ मुद्राराक्षस—

सिद्धार्थक ।—तब इधर से सब सामग्री ले कर आर्य चाणक्य बाहर निकले और विपक्ष के शेष राजाओं को नि शेष कर के बहर लोगों की सब सामग्री लूट ली। समिद्धार्थक । तो वह सब अब कहा हैं ? ५ सिद्धार्थक ।—वह देखो स्रवत गडमद गरब गज, नदत मेघ अनुहार। चाबुक भय चिनवत चपल, खडे अस्व बहु द्वार ॥ समिद्धार्थक ।—अच्छा, यह सब जाने दो यह कहो कि सब लोगों के सामने इतना अनादर पाकर फिर भी आर्य्य १० चाणक्य उसी मन्त्री के काम का क्यों करते है ? सिद्धार्थक ।—मित्र ! तुम अब तक निरे सीधेसाधे बने हौ। अरे, अमात्य राक्षस भी आर्य चाणक्य की जिन चालों को नही समझ सकते उन को हम तुम क्या समझैगे ! समिद्धार्थक ।—वयस्य ! अमात्य राक्षस अब कहा है ? १५ सिद्धार्थक ।—उस प्रलय कोलाहल के बढ़ने के समय मलय- केतु की सेना से निकल कर उन्दुर नामक चर के साथ कुसुमपुर ही की ओर वह आते है, यह आर्य चाणक्य को समाचार मिला है । समिद्धार्थक ।—मित्र ! नन्दराज्य के फिर स्थापन की प्रतिज्ञा २० कर के स्वनाम तुल्य पराक्रम अमात्य राक्षस, उस काम को पूरा किए बिना फिर कैसे कुसुमपुर आते है ? सिद्धार्थक ।—हम सोचते है कि चन्दनदास के स्नेह से । समिद्धार्थक ।—ठीक है, चन्दनदास के स्नेह ही से । किन्तु तुम सोचते हो कि चन्दनदास के प्राण बचैगे ? २५ सिद्धार्थक ।—कहा उस दीन के प्राण बचैगे ? हमी दोनों को वधस्थान मै ले जाकर उस को मारना पडेगा ।

छठा अङ्क । १२६

समिद्धार्थक ।—( क्रोध से ) क्या आर्य चाणक्य के पास कोई घातक नहीं है कि ऐसा नीच काम हम लोग करैं ? सिद्धार्थक ।—मित्र ! ऐसा कौन है जिस को इस जीवलोक म रहना हो और वह आर्य चाणक्य की आज्ञा न मानै ? चलो, हमलोग चांडाल का वेष बना कर चन्दनदास को ५ वधस्थान मे लेचलैं ।

( दोनों जाते है )

इति प्रवेशक ।


६ अंक ।

दृश्य । बाहरी प्रान्त में प्राचीन बारी । १० ( फांसी हाथ मे लिए हुए एक पुरुष आता है ) पुरुष—षट गुन सुदृढ़ गुथी मुख फासी । २ जय उपाय परिपाटी गासा ॥ रिपु बन्धन मै पटु प्रति पोरी । जय चानक्य नीति की डोरी ॥ १५ आर्य चाणक्य के चर उन्दुर ने इसी स्थान में मुझ को अमात्य राक्षस से मिलने कहा है । ( देख कर ) यह अमात्य राक्षस सब अङ्ग छिपाए हुए आते हैं । तब तक इस पुरानी बारी मे छिप कर हम देखे, यह कहाँ ठहरते हैं । ( छिप कर बैठता है ) २०

(सब अंग छिपाए हुए राक्षस आता है)

राक्षस—[ आखों में आंसू भर के हाय ! बड़े कष्ट की बात है आश्रय बिनसे और पै, जिमि कुलटा तिय जाय । • तजि तिमि नन्डहि चंचला, चन्द्रहि लपटी धाय ॥

१३० मुद्राराक्षस—

देखादेखी प्रजहु सब, कीनो ता अनुगौन ।
तजि कै निज नृप नेह सब, कियो कुसुमपुर भौन ॥
होइ बिफल उद्योग मैं, तजि कै कारजभार ।
आप्त मित्र हू थकि रहे, सिर बिनु जिमि अहि छार ॥
५ तजि कै निज पति भुवनपति, सुकुल जात नृप नन्द ।
श्री वृषली गइ वृषल ढिग, सील त्यागि करि छन्द ॥
जाइ तहा थिर ह्वै रही, निज गुन सहज बिसारि ।
बस न चलत जब बाम बिधि, सब कछु देत बिगारि ॥
नन्द मरे सैलेश्वरहि, देन चह्यौ हम राज ।
सोऊ बिनसे तब कियो, तासुत हित सो साज ॥
बिगर्‌यौ तौन प्रबन्ध हू, मिठ्यौ मनोरथ मूल ।
दोस कहा चानक्य को, दैवहि भो प्रतिकूल ॥

वाहरे म्लेच्छ मलयकेतु की मूर्खता ! जिस ने इतना नही समझा कि—

१५
मरे स्वामिहू नहि तज्यौ, जिन निज नृप अनुराग ।
लोभ छाड़ि दै प्रान जिन, करी सत्रु सों लाग ॥
सोई राक्षस सत्रु सों, मिलि है यह अन्धेर ।
इतनो सूझ्यौ वाहि नहि, दई दैव मति फेर ॥

सो अब भी शत्रु के हाथ में पड़ के राक्षस बन मे चला जायगा, पर चन्द्रगुप्त से संधि न करैगा । लोग झूठा कहै, यह अपयश हो, पर शत्रु की बात कौन सहैगा ? (चारो ओर देख कर) हा ! इसी प्रान्त में देव नन्द रथ पर चढ़ कर फिरने आते थे ।

इतहि देव अभ्यास हित, सर सजि धनु सन्धानि ।
२५ रचत रहे भुव चित्र सम, रथ सुचक्र परिखानि ॥
जहँ नृपगन संकित रहे, इत उत थमे लखात ।
सोई भुव ऊजर भई, दृगन लखी नहि जात ॥

छठा अङ्क । १२१

हाय ! यह मन्द भाग्य अब कहा जाय ? ( चारो ओर देख कर ) चलो, इस पुरानी बारी मे कुछ देर ठहर कर मित्र चन्दनदास का कुछ समाचार ले । ( घूम कर आप ही आप ) अहा ! पुरुषों की भाग्य से उन्नति अवनति की भी क्या क्या गति होती है कोई नही जानता । ५

जिमि नव ससि कहँ सब लखत, निज निज करहि उठाय ।
तिमि नृप सब हम को रहे, लखत अनन्द बढ़ाय ॥
चाहत हे नृपगन सबै, जासु कृपा दृग कोर ।
सो हम इत संकित चलत, मानहुँ कोऊ चोर ॥

वा जिस के प्रसाद से यह सब था, जब वही नहीं है तो यह १० होईगा । (देख कर) यह पुराना उद्यान कैसा भयानक हो रहा है ।

नसे विपुल नृप कुल सरिस, बड़े बड़े गृह जाल ।
मित्र नास सों साधुजन, हिय सम सूखे ताल ॥
तरुवर भे फलहीन जिमि, बिधि बिगरे सब रीति ।
तृन सों लोपी भूमि जिमि, मति लहि मूढ़ कुनीति ॥ १५
तीछुन परसु प्रहार सों, कटे तरोवर गात ।
रोअत मिलि पिड्डुक खग, ताके घाव लखात * ॥
दुखी जानि निज मित्र कहँ, अहि मन लेत उसास ।
निज केंचुल मिस धरत है, फाहा तरु-ब्रन पास ॥
तरुगन को सूख्यो हियो, छिदै कीट सों गात । २०
दुखी पत्र फल छाह बिनु, मनु मसान सब जात ॥

तो तब तक हम इस सिला पर, जो भाग्यहीनों को सुलभ है, लेटैं । ( बैठ कर और कान देकर सुन कर ) अरे ! यह शंख डंके से मिला हुआ नान्दी शब्द कहा हो रहा है ?


* वृक्ष के खोढरे में से जो शब्द निकलता है वही मानो वृक्ष रोते हैं और उन वृक्षों पर पेंडुकी बोलती हैं वह मानो रोन में वृक्षो का साथ देती हैं ।

१३२ मुद्राराक्षस—

अति ही तीखन होन सों, फोरत स्रोता कान ।
जब न समायो घरन मैं, तब इत कियो पयान ॥
सख पटह धुनि सों मिल्यौ, भारी मङ्गल नाद ।
निकस्यौ मनहु दिगन्त को, दूरी देखन स्वाद ॥
५ [कुछ सोचकर] हा, जाना। यह मलयकेतु के पकड़े जाने पर राजकुल * (रुक कर) मौर्यकुल का आनन्द देने को हो रहा है।
(आंखों में आसू भर कर) हाय ! बड़े दुख की बात है।
मेरे बिनु अब जीति दल, शत्रु पाइ बल घोर ।
१० मोहि सुनावन हेत ही, कीन्हौँ शब्द कठोर ॥
पुरुष।—अब तो यह बैठे है तो अब आर्य चाणक्य की आज्ञा पूरी करैं। (राक्षस की ओर न देख कर अपने गले मे फासी लगाना चाहता है।)
राक्षस (देख कर आप ही आप) अरे यह फासी क्यों लगाता है? निश्चय कोई हमारा सा दुखिया है। जो हो,
१५ पूँछैं तो सही (प्रकाश) भद्र, यह क्या करते हौ?
पुरुष।—(रोकर) मित्रों के दुख से दुखो होकर हमारे ऐसे मन्दभाग्यों को जो कर्त्तव्य है।
राक्षस।—(आप ही आप) पहले ही कहा था, कोई हमारा
२० सा दुखिया है। (प्रकाश) भद्र+जो अतिगुप्त वा किसी विशेष कार्य का बात न हो तो हम से कहो कि तुम क्यों प्राण त्याग करने हो?
पुरुष।—आर्य ! न तो गुप्त ही हे न कोई बड़े काम की बात है, परन्तु मित्र के दुख से मै अब क्षण भर भी ठहर
२५ नही सकता।


* जहा ऐसी उक्ति हे,ता है वहा यह ध्वनि है कि मना " ६व रु जो कहा था वह ठीक है रुक कर आग्र से कुछ और कह दिया ।
+ यहा संस्कृत में व्यसनि ब्रह्मचारिन सम्बोधन है।

छठा अङ्क। १३३

राक्षस।—(आप ही आप दुःख से) मित्र की विपत्ति मे हम पराए लोगों की भांति उदासीन हो कर जो देर करते हैं मानो उस मे शीघ्रता करने की यह अपना दुःख करने के बहाने शिक्षा देता है। (प्रकाश) भद्र! जो रहस्य नही है तो हम सुना चाहते है कि तुम्हारे दुख का क्या ५ कारण है? पुरुष।—आप का इस मे बड़ा ही हठ है तो कहना पड़ा। इस नगर मे जिष्णुदास नामक एक महाजन है। राक्षस।—(आप ही आप) वह तो चन्दनदास का बड़ा मित्र है। १० पुरुष।—वह हमारा प्यारा मित्र है। राक्षस।—(आप ही आप) कहता है कि वह हमारा प्यारा मित्र है। इस अति निकट सम्बन्ध से इस को चन्दनदास का वृत्तान्त ज्ञात होगा। पुरुष।—(रोकर) "सो दीन जनों को सब धन देकर वह १५ अब अग्निप्रवेश करने जाता है" यह सुन कर हम यहा आये है कि "इस दुख वार्ता सुनने के पूर्व ही अपना प्राण दे दें।" राक्षस।—भद्र! तुम्हारे मित्र के अग्निप्रवेश का कारण क्या है? कै तेहि रोग असाध्य भयो कोऊ जाको न औषध २० नाहि निदान है। पुरुष।—नही आर्य्य। राक्षस।—कै विष अग्निहुसो बढ़ि कै नृपकोप महा फसि त्यागत प्रान है। पुरुष।—रामराम! चन्द्रगुप्त के राज्य मे लोगों को प्राणहिंसा २५ का भय कहा? राक्षस।—कै कोउ सुन्दरी पै जिय देत लग्यो हिय माहि विशेषा को बान है।

१३४ मुद्राराक्षस-

पुरुष ।—रामराम ! महाजन लोगों की यह चाल नही, विशेष कर के साधु जिष्णुदास की।

राक्षस। तौ कह मित्रहि को दुख वाहू के नास को हेतु तुम्हारे मान है।

५ पुरुष ।—हा, आर्य्य । राक्षस ।—(घबडा कर आप ही आप) अरे, इस के मित्र का प्रिय मित्र तो चन्दनदास ही है और यह कहता है कि सुहृद् विनाश ही उस के विनाश का हेतु है इस से मित्र के स्नेह से मेरा चित्त बहुत ही घबड़ाता है। (प्रकाश) भद्र ! तुम्हारे मित्र का चरित्र हम सविस्तर सुना चाहते हैं।

१० पुरुष ।—आर्य्य ! अब मै किसी प्रकार से मरने मे विलम्ब नही कर सकता। राक्षस ।—यह वृत्तान्त तो अवश्य सुनने के योग्य है इससे कह। पुरुष ।- क्या करैं ? आप ऐसा हठ करते हैं तो सुनिये।

१५ राक्षस ।—हा ! जी लगा कर सुनते हैं, कहो । पुरुष ।—आप ने सुना ही होगा कि इस नगर मे प्रसिद्ध जौहरी सेठ चन्दनदास है। राक्षस ।—[ दुख से आप ही आप ] दैव ने हमारे विनाश का द्वार अब खोल दिया। हृदय ! स्थिर हो अभी न जाने क्या क्या कष्ट तुम को सुनना होगा। (प्रकाश) भद्र ! हम ने भी सुना है कि वह साधु अत्यन्त मित्रवत्सल है ।

२० पुरुष ।—वह जिष्णुदास के अत्यन्त मित्र है। राक्षस ।—[ आप ही आप ] यह सब हृदय के हेतु शोक का वज्रपात है [ प्रकाश ] हा, आगे।

२५ पुरुष ।—सो जिष्णुदास ने मित्र की भांति चन्द्रगुप्त से बहुत बिनय किया। राक्षस ।—क्या क्या ?

छठा अङ्क । १३५

पुरुष ।—कि देव! हमारे घर मे जो कुछ कुटुम्बपालन का द्रव्य है आप सब ले लें, पर हमारे मित्र चन्दनदास को छोड़ दे। राक्षस ।—(आप ही आप) वाह जिष्णुदास ! तुम धन्य हो ! तुम ने मित्रस्नेह का निर्वाह किया। जा धन के हित नारि तजै पति पूत तजै पितु सीलहि खोई। ५ भाई सौं भाई लरै रिपुसे पुनि मित्रता मित्र तजै दुख जोई ॥ ता धनको बनिया ह्वै गिन्यौ न दियो दुख मीत सौं आरत होई। स्वारथ अर्थ तुम्हारोई है तुमरे सम और न या जग कोई ॥ (प्रकाश) इस बात पर मौर्य ने क्या कहा ? पुरुष ।—आर्य ! इस पर चन्द्रगुप्त ने उस से कहा कि जिष्णु- १० दास ! हम ने धन के हेतु चन्दनदास को नही दण्ड दिया है। इस ने अमात्य राक्षस का कुटुम्ब अपने घर मे छिपा- या, और बहुत मागने पर भी न दिया। अब भी जो यह दे दे तो छूट जाय, नही तो इस को प्राणदण्ड होगा। तभी हमारा क्रोध शान्त होगा और दूसरे लोगों को भी इस से १५ डर होगा—यह कह उस को वधस्थान मे भेज दिया। जिष्णु- दास ने कहा कि "हम कान से अपने मित्र का अमङ्गल सुनने के पहिले मर जाय तो अच्छी बात है' और अग्नि मे प्रवेश करने को बन मे चले गए। हम ने भी इसी हेतु कि उनका मरण न सुनें यह निश्चय किया कि फासी २० लगा कर मर जाय और इसी हेतु यहा आए है। राक्षस ।—(घबड़ा कर) अभी चन्दनदास को मारा तो नही ? पुरुष ।—आर्य्य ! अभी नहीं मारा है, बारम्बार अब भी उन से अमात्य राक्षस का कुटुम्ब मागते है और वह मित्र- वत्सलता से नही देते, इसी मे इतना विलम्ब हुआ। २५ राक्षस ।—(सहर्ष आप ही आप) वाह मित्र चन्दनदास ! वाह ! धन्य ! धन्य !

१३६ मुद्राराक्षस-

मित परोच्छहु मै कियो, सरनश्रत प्रतिपाल ।
निरमल जस सिबि*-सो लियो, तुम या काल कराल ॥

(प्रकाश) भद्र ! तुम शीघ्र जाकर जिष्णुदास को जलने से रोको, हम जाकर अभी चन्दनदास को छुड़ाते हैं।
५ पुरुष ।—आर्य्य ! आप किस उपाय से चन्दनदास को छुड़ाइएगा ?
राक्षस ।—(आतङ्क से खड्ग मियान से खींच कर) इन दुखों में एकान्त मित्र निष्कृप कृपाण से ।

समर साध तन पुलकित नित साधा मम कर को ।
१० रन मह बारहि बार परखियौ जिन बल-पर को ॥
विगत जलद नभ नील खड्ग यह रोस बढ़ावत ।
मीत कष्ट सो दुखिहु मोहि रनहित उमगावत ॥


* शिवि ने शरणागत कपोत के हेतु अपना शरीर दे दिया था ।
राजा शिवि जब ६२ यज्ञ कर चुके और आगे फिर प्रारम्भ किया तब इन्द्र को भय हुआ कि अब मेरा पद लेने में आठ यज्ञ बाकी हैं, उस ने अग्नि को कपोत बनाया और आप बाज बन उन के मारने को चला, तब वह भागा हुआ राजा की शरण में गया । राजा ने उस का वचन सुन बाज को देख यज्ञशाला में अपनी गोदी में छिपा लिया और बाज को निवारण किया । बाज बोला कि महाराज ! आप यहा यह क्या अनर्थ करते हैं कि मेरा आहार छीन लिया ? मै भूख से शरीर को छोड आप को पापभागी करूंगा । तब राजा ने कहा कि इसे तो नहो देगे, इस के पलटे में जो मागेगा सो देँग, पश्चात इस के प्रति उत्तर में यह बात ठहरी कि राजा कबूतर के तुल्य तौल के शरीर का मास दे, तब हम कबूतर को छोड देवें । इस बात पर राजा ने प्रसन्न हो तुला पर एक ओर कपोत को बैठाय, दूसरी ओर अपने शरीर का मास काट कर चढाने लगे परन्तु सब शरीर का मास काट काट के चढाय दिया तौ भी कबूतर के समान नही हुआ । तब राजा ने गले पर खड्ग चलाया त्योही विष्णु ने हाथ पकड अपने लोक को भेज दिया ।

छठा अङ्क । १३७

पुरुष । सेठ चन्दनदास के प्राण बचाने का उपाय मैं ने सुना किन्तु ऐसे टेढ़े समय मे इसका परिणाम क्या होगा, यह मैं नही कह सकता (राक्षस को देख कर पैर पर गिरता है) आर्य ! क्या सुगृहीत नामधेय अमात्य राक्षस आप ही है ? यह मेरा सन्देह आप दूर कीजिए । ५

राक्षस ।—भद्र ! भर्तृकुल विनाश से दुखी और मित्र के नाश का कारण यथार्थ नामा अनार्य राक्षस मैं ही हूं ।

पुरुष ।—( फिर पैर पर गिरता है) धन्य है ! बड़ा ही आनन्द हुआ । आप ने हम को आज कृतकृत्य किया ।

राक्षस ।—भद्र ! उठो । देर करने की काई आवश्यकता नही । १० जिष्णुदास से कहो कि राक्षस चन्दनदास को अभी छुड़ाता है ।

(खङ्ग खींचे हुए, 'समर साध' इत्यादि पढ़ता हुआ इधर उधर टहलता है)

पुरुष ।—(पैर पर गिर कर) अमात्यचरण ! प्रसन्न हों । मैं १५ यह बिनती करता हूँ कि चन्द्रगुप्त दुष्ट ने पहले शकटदास के वध की आज्ञा दी थी । फिर न जाने कौन शकटदास को छुड़ा कर उस को कही परदेस मे भगा ले गया ! आर्य शकटदास के वध मे धोखा खाने से चन्द्रगुप्त ने क्रोध कर के प्रमादी समझ कर उन वधिकों ही को मार डाला । २० तब से वधिक जो किसी को वध्यस्थान मे ले जाते हैं और मार्ग मे किसी को शस्त्र खींचे हुए देखते हैं तो छुड़ा ले जाने के भय से अपराधी को बीच ही में तुरत मार डालते हैं । इस से शस्त्र खींचे हुए आप के वहा जाने से चन्दनदास की मृत्यु में और भी शीघ्रता होगी (जाता है) । २५

१३८ मुद्राराक्षस-

राक्षस ।—( आप ही आप ) उस चाणक्य वटु का नीतिमार्ग कुछ समझ नही पडता क्योंकि— सकट बच्यौ जो ता कहे, तो क्यौ घातक घात । जाल भयो का खेल मै, कछु समझ्यौ नहि जात ॥ ५ ( सोचकर ) नहि शस्त्र को यह काल यासों मीत जीवन जाइ है । जौ नीति सोचै या समय तो व्यर्थ समय नसाइ है ॥ चुप रहनहू नहि जोग जब मम हित विपति फन्द पर्यौ । तासों बचावन प्रियहि अब हम देह निज विक्रय कर्यौ ॥

( तलवार फेंक कर जाता है )

१० छठा अंक समाप्त हुआ ।


सप्तम अंक

स्थान—सूली देने का मसान

(पहिला चाडाल आता है)

**चाडाल ।—**हटो लोगो हटो, दूर हो भाइया, दूर हो । जो अपना प्राण, धन और कुल बचाना हो तो दूर हो । राजा का विरोध यत्नपूर्वक छोड़ो ।

करि कै पथ्य विरोध इक, रोगी त्यागत प्रान ।
पै बिरोध नृप सों किए, नसत सकुल नर जान ॥

जो न मानो तो इस राजा के विरोधी को देखो जो स्त्री, पुत्र समेत यहां सूली देने को लाया जाता है। ऊपर देख कर ) क्या कहा ? कि इस चन्दनदास के छूटने का कुछ उपाय भी है ? भला इस बिचारे के छूटने का कौन उपाय है ? पर हां, जो यह मंत्री राक्षस का कुटुम्ब दे दे तो छूट जाय । (फिर ऊपर देख कर ) क्या कहा कि यह शरणागतवत्सल प्राण देगा पर यह बुरा कर्म्म न करैगा ? तो फिर इसकी बुरी गति होगी क्योंकि बचने का तो वही एक उपाय है।

( कंधे पर सूली रक्खे मृत्यु का कपड़ा पहिने चन्दनदास, उसकी स्त्री और पुत्र, और दूसरा चांडाल आते हैं )

**स्त्री ।—**हाय हाय ! जो हम लोग नित्य अपनी बात बिगड़ने के डर से फूंक फूंक कर पैर रखते थे उन्हीं हम लोगों की चोरों की भांति मृत्यु होती है। काल देवता को नमस्कार है• जिस को मित्र उदासीन सभी एक से हैं, क्योंकि—

१६० मुद्राराक्षस—

थोडि मास भख मरन भय, जियहि खाइ तृन घास ।
तिन गरीब मृगको करहि, निरदय ब्याधा नास ॥

(चारो ओर देख कर)

५ अरे भाई जिष्णुदास ! मेरी बात का उत्तर क्यो नही देते ? हाय ! ऐसे समय मे कौन ठहर सकता है।
च० दा०— [आसू भर कर] हाय ! यह मेरे सब मित्र बिचारे कुछ नही कर सकते, केवल रोते है और अपने को अकर्मण्य समझ शोक से सूखा सूखा मुह किये आसू भरी आखों से एक टक मेरी ही ओर देखते चले आते है।
१० दोनों चाडाल। अजी चन्दनदास ! अब तुम फासी के स्थान पर आ चुके इस से कुटुम्ब को बिदा करो।
च० दा० ।—(स्त्री से) अब तुम पुत्र को लेकर जाओ, क्योकि आगे तुम्हारे जाने की भूमि नही है।
स्त्री।—ऐसे समय में तो हम लोगों को बिदा करना उचित ही १५ है, क्योंकि आप परलोक जाते हैं, कुछ परदेश नहीं जाते (रोती है)।
च० दा० ।—सुनो मै कुछ अपने दोष से नही मारा जाता, एक मित्र के हेतु मेरे प्राण जाते हैं, तो इस हर्ष के स्थान पर क्यो रोती है ?
२० स्त्री।—नाथ ! जो यह बात है तो कुटुम्ब को क्यों बिदा करते हो ?
च० दा० ।—तो फिर तुम क्या कहती हो ?
स्त्री।—(आसू भर कर) नाथ ! कृपा कर के मुझे भी साथ ले चलो ।
२५ च०दा० ।—हा ! यह तुम कैसी बात कहती हो ? अरे ! तुम इस बालक का मुह देखो और इस की रक्षा करो, क्योंकि

सप्तम अङ्क । १४१

सप्तम अङ्क । १४१

यह बिचारा कुछ भी लोकव्यवहार नही जानता । यह किसका मुह देख के जीएगा ?

स्त्री ।—इस की रक्षा कुलदेवी करेंगी । बेटा ! अब पिता फिर न मिलेंगे इस से मिल कर प्रणाम कर ले ।

बालक ।—( पैरों पर गिर के ) पिता ! मैं आप के बिना क्या ५ करू गा ?

चं० दा० ।—बेटा ! जहा चाणक्य न हो वहा बसना ।

दोनों चाडाल ।—( सूली खड़ी कर के ) अजी चन्दनदास ! देखो, सूली खड़ी हुई, अब सावधान हो जाओ ।

स्त्री ।—( रोकर ) लोगो, बचाओ ! अरे ! कोई बचाओ । १०

च० दा० ।—भाइयो, तनिक ठहरो ( स्त्री से ) अरे ! अब तुम रोरो कर क्या नन्दों को स्वर्ग से बुला लोगी ? अब वे लोग यहा नही है जो स्त्रियों पर सर्व्वदा दया रखते थे ।

१ चाडाल ।—अरे वजुवेत्रक ! पकड़ इस चन्दनदास को, १५ घरवाले आप ही रो पीट कर चले जायगे ।

२ चाडाल ।—अच्छा वज्रलोमक, मै पकड़ता हूं ।

चं०दा० ।—भाइयो ! तनिक ठहरो, मै अपने लड़क से तो मिल लूं ( लड़के को गले लगा कर और माथा सूंघ कर) बेटा ! मरना तो था ही पर एक मित्र के हेतु मरते हैं इस से सोच मत कर । २०

पुत्र ।—पिता, क्या हमारे कुल के लोग ऐसा ही करते आए हैं ? ( पैर पर गिर पड़ता है ।)

२ चाडाल ।—पकड़ रे बज्रलोमक ! ( दोनों चंदनदास को पकड़ते हैं ) ।

स्त्री ।—लोगो ! बचाओ रे, बचाओ ! २५

१४२ मुद्राराक्षस—

(वेग से राक्षस आता है)

राक्षस ।—डरो मत, डरो मत । सुनो सुनो सेनापति ! चन्दनदास को मत मारना, क्योंकि— नसत स्वामिकुल जिन लख्यो, निज चख शलु समान । ५ मित्रदुख ह्र मै धरयौ, निलज होइ जिन प्रान ॥ तुम सों हारि बिगारि सब कढ़ी न जाकी साल । ता राक्षस के कठ मै, डारहु यह जमफास ॥

च० दा० ।—(देख कर और आखों मे आसू भर कर) अमात्य ! यह क्या करते हो ?

१० राक्षस । मित्र, तुम्हारे सच्चरित्र का एक छोटा सा अनुकरण ।

च० दा ।—अमात्य, मेरा किया तो सब निष्फल हो गया, पर आप ने ऐसे समय यह साहस अनुचित किया ।

राक्षस ।—मित्र चंदनदास ! उराहना मत दो, सभी स्वार्थी है ।

१५ (चाडाल से) अजी ! तुम उस दुष्ट चाणक्य से कहो ।

दोनों चाडाल ।—क्या कह ?

राक्षस ।— जिन कलि मै हू मित्र हित, तृन सम छोड़े प्रान । जाके जस-रवि सामुहे, शिवि जस दीप समान ॥ २० जाको अति निर्मल चरित, दया आदि नित जानि । बौद्धहु सब लज्जित भए, परम शुद्ध जेहि मानि ॥ ता पूजा के पात्र कों, मारत तू धरि पाप । जाके हितु सो शत्रु, तुव, आयो इत मै आप ॥

१ चाडाल । —अरे वेणुवेत्रक ! तू चन्दनदास को पकड़ कर २५ इस मसान के पेड़ की छाया मे बैठ, तब से मन्त्री चाणक्य को मै समाचार दू कि अमात्य राक्षस पकड़ा गया ।

सप्तम अङ्क । १४३

सप्तम अङ्क । १४३

२ चांडाल ।—अच्छा रे वज्रलोमक ! ( चन्दनदास, स्त्री, बालक और सूली को लेकर जाना है) ।

१ चांडाल ।—( राक्षस को लेकर घूम कर ) अरे ! यहा पर कौन है ? नन्दकुल सैनासच्चय के चूर्ण करनेवाले वज्र से, वैसे ही मौर्य्यकुल मे लक्ष्मी और धर्म्म स्थापना करने ५ वाले, आर्य्य चाणक्य से कहो ।

राक्षस ।—( आप ही आप ) हाय ! यह भी राक्षस को सुनना लिखा था !

१ चांडाल ।—कि आप की नीति ने जिस की बुद्धि को घेर लिया है, वह अमात्य राक्षस पकड़ा गया । १०

( परदे मे सब शरीर छिपाए केवल मुह खोले चाणक्य आता है )

चाणक्य ।—अरे कहो, कहो ।

किन निज बसन हि मैं धरी, कठिन अगिनि की ज्वाल ? रोकी किन गति वायु की, डोरिन ही के जाल ? १५ किन गजपति मर्द्दन प्रबल, सिंह पींजरा दीन ? किन केवल निज बाहु बल, पार समुद्रहि कीन ?

१ चांडाल —परमनीतिनिपुण आप ही ने तो।

चाणक्य ।—अजी ! ऐसा मत कहो, वरन “नन्दकुलद्वेषी दैव ने ” यह कहो । २०

राक्षस ।—( देख कर आप ही आप ) अरे ! क्या यही दुरात्मा वा महात्मा कौटिल्य है ?

सागर जिमि बहु रत्नमय, तिमि सब गुण की खानि । तोष होत नहि देखि गुण, बैरी रूप निज जानि ॥

चाणक्य ।—( देख कर ) अरे ! यही अमात्य राक्षस है ? २५ जिस महात्मा ने—

१४४मुद्राराक्षस

बहु दुख सों सोचत सदा, जागत रैन बिहाय।
मेरी मति अरु चन्द्र की, सैनहि दई थकाय ॥
(परदे से बाहर निकल कर) अजी अजी अमात्य राक्षस ! मै विष्णुगुप्त आप को दण्डवत् करता हूं। (पैर छूता है)
५ राक्षस।—(आप ही आप) अब मुझे अमात्य कहना तो केवल मुंह चिढ़ाना है (प्रगट) अजी विष्णुगुप्त ! मैं चाडालों से छू गया हू इस से मुझे मत छूओ।
चाणक्य।—अमात्य राक्षस ! वह श्वपाक नही है, वह आप का जाना सुना सिद्धार्थक नामा राजपुरुष है और दूसरा
१० भी समिद्धार्थक नामा राजपुरुष ही है, और इन्ही दोनों द्वारा विश्वास उत्पन्न कर के उस दिन शकटदास को धोखा दे कर मै ने वह पत्र लिखवाया था।
राक्षस।—(आप ही आप) अहा ! बहुत अच्छा हुआ कि मेरा शकटदास पर से संदेह दूर हो गया।
१५ चाणक्य।—बहुत कहा तक कह—
वे सब भद्रभटादि वह, सिद्धार्थक वह लेख।
वह भदन्त वह भूषणहु, वह नट-कपट भेख ॥
वह दुख चन्दनदास को, जो कछु दियो दिखाय।
सो सब मम (लज्जा से कुछ सकुच कर)
२० सो सब राजा चन्द्र को, तुम सो मिलन उपाय ॥
देखिए, यह राजा भी आप से मिलने आप ही आते हैं।
राक्षस।—(आप ही आप) अब क्या करें ? (प्रगट) हा ! मै देख रहा हू।
(सेवको के सग राजा आता है)
२५ राजा।—(आप ही आप) गुरु जी ने बिना युद्ध ही दुर्जय शत्रु का कुल जीत लिया इस में कोई संदेह नही, मैं तो बड़ा लज्जित हो रहा हूं, क्योंकि—