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मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

९० मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—क्षौरभे तथा पञ्चमे पञ्चमे दिने वा अस्य (नक्षत्रस्य) उदये (मुहूर्त्ते) नृपाणां श्मश्रुकर्म हितम् । तथा षडग्निः त्रिर्मैत्रः, अष्टकः, पञ्चपित्र्यः, अब्ध्यर्यमा, क्षौरकृत् अब्दतः मृत्युं एति ॥ ३६ ॥ साधारण क्षौरकर्म के लिए कहे हुए नक्षत्रों में पाँचवें दिन दाढ़ी के बाल बनवाना राजाओं का हितकारक होता है । अब सर्वथा क्षौर में त्याज्य नक्षत्र कहते हैं । कृत्तिका नक्षत्र में छः बार, अनुराधा में तीन बार, रोहिणी में आठ बार, मघा में पाँच बार, उत्तराफाल्गुनी में चार बार बाल बनवाने- वाला पुरुष एक वर्ष के अनन्तर मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ ३६ ॥ अक्षरारम्भ का मुहूर्त्त गणेशविष्णुवाग्रमाः प्रपूज्य पञ्चमाब्दके तिथौ शिवार्कदिक्द्विषट्शरत्रिके रवावुदक् । लघुश्रवोनिलान्त्यभादितीशतक्षमित्रभे चरोनसत्तनौ शिशोर्लिपिग्रहः सतां दिने ॥ ३७ ॥ अन्वयः—पञ्चमाब्दके, शिवार्कदिग्द्विषट्शरत्रिके तिथौ रवौ उदक् लघुश्रवोऽनिला- न्त्यभादितीशतक्षमित्रभे, चरोनसत्तनौ, सतां दिने, गणेशविष्णुवाग्रमाः प्रपूज्य, शिशोः लिपिग्रहः शुभः स्यात् ॥ ३७ ॥ जन्म से पाँचवें वर्ष में, एकादशी, द्वादशी, दशमी, दुइज, छठि, पञ्चमी वा तीज तिथि में; उत्तरायण में सूर्य के रहते; हस्त, अश्विनी, पुष्य, श्रवण, स्वाती, रेवती, पुनर्वसु, आर्द्रा, चित्रा या अनुराधा नक्षत्र में; चर अर्थात्, मेष, कर्क, तुला और मकर को छोड़ शुभग्रहों के लग्न में; शुभ ग्रहों के दिन में; गणेश, विष्णु, सरस्वती और लक्ष्मी की पूजा करके बालक का अक्षरारम्भ शुभ होता है ॥ ३७ ॥ विद्यारम्भ का मुहूर्त्त मृगात्कराच्छूतेस्त्रयेऽशिवमूलपूर्विकात्रये गुरुद्वयेऽर्कजीववित्सितेऽह्नि षट्शरत्रिके । शिवार्कदिग्द्विके तिथौ ध्रुवान्त्यमित्रभे परैः शुभैरधीतिरुत्तमा त्रिकोणकेन्द्रगैः स्मृता ॥ ३८ ॥ अन्वयः—मृगात् करात् श्रुतेः त्रये गुरुद्वये, अर्कजीववित्सिते अह्नि, षट्शरत्रिके शिवार्कदिग्द्विके तिथौ, परैः ध्रुवान्त्यमित्रभे, शुभैः त्रिकोणकेन्द्रगैः अधीतिः उत्तमा स्मृता ॥ ३८ ॥

संस्कारप्रकरण ९१ मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, अश्विनी, मूल, तीनों पूर्वा, पुष्य वा आश्लेषा नक्षत्र में; रविवार, बृहस्पति वा शुक्रवार में; छठि, पञ्चमी तीज, एकादशी, द्वादशी, दशमी वा दुइज तिथि में; लग्न से नवें, पाँचवें, पहिले, चौथे, सातवें और दशवें शुभ ग्रहों के रहते विद्यारम्भ शुभ होता है। कोई आचार्य तीनों उत्तरा, रेवती और अनुराधा में भी विद्यारम्भ शुभ कहते हैं ॥ ३८ ॥ वर्णक्रम से यज्ञोपवीत का समय विप्राणां व्रतबन्धनं निगदितं गर्भाज्जनेर्वाऽष्टमे वर्षे वाप्यथ पञ्चमे क्षितिभुजां षष्ठे तथैकादशे । वैश्यानां पुनरष्टमेऽप्यथ पुनः स्याद्द्वादशे वत्सरे कालेऽथ द्विगुणे गते निगदितं गौणं तदाहुर्बुधाः ॥ ३९ ॥ अन्वयः—गर्भात् वा जनेः [जन्मसमयात्] अष्टमे, अपि वा पञ्चमे वर्षे विप्राणां, (एवं) षष्ठे तथा एकादशे वर्षे क्षितिभुजाम्, पुनः अष्टमे वा द्वादशे वत्सरे वैश्यानाम् व्रतबन्धनं (शुभ) निगदितम् । अथ निगदिते काले द्विगुणे गते सति तत् व्रतम् बुधाः गौणं आहुः ॥ ३९ ॥ गर्भाधान से अथवा जन्मकाल से आठवें वा पाँचवें वर्ष में ब्राह्मणों का, छठे अथवा गेरहवें वर्ष में क्षत्रियों का, आठवें अथवा बारहवें वर्ष में वैश्यों का यज्ञोपवीत श्रेष्ठ कहा गया है। उक्तकाल के द्विगुणकाल में अर्थात् सोलहवें वर्ष ब्राह्मण का, बाइसवें वर्ष क्षत्रिय का और चौबीसवें वर्ष वैश्य का यज्ञोपवीत मध्यम कहा गया है ॥ ३९ ॥ यज्ञोपवीत के नक्षत्रादि क्षिप्रध्रुवाह्विचरमूलमृदुत्रिपूर्वा- रौद्रेऽर्कविद्गुरुसितेन्दुदिने व्रतं सत् । द्वित्रीषुरुद्ररविदिक्प्रमिते तिथौ च कृष्णादिमत्रिलवकेऽपि न चापराह्ले ॥ ४० ॥ अन्वयः—क्षिप्रध्रुवाह्विचरमूलमृदुत्रिपूर्वारौद्रे, अर्कविद्गुरुसितेन्दुदिने, द्वित्रीषुरुद्रर- विदिक्प्रमिते तिथौ, व्रतं सत् स्यात्, च (पुनः) कृष्णादिमत्रिलवके अपि सत्, च (तथा) अपराह्णे व्रतं न सत् ॥ ४० ॥ हस्त, अश्विनी, पुष्य, तीनों उत्तरा, रोहिणी, आश्लेषा, स्वाती, पुनर्वसु,

९२ मुहूर्तचिन्तामणि श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, मूल, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, तीनों पूर्वा और आर्द्रा नक्षत्र में; सूर्य, बुध, बृहस्पति, शुक्र वा चन्द्रमा के दिन में; दुइज, तीज, पञ्चमी, एकादशी, द्वादशी वा दशमी तिथि में; शुक्लपक्ष में, पञ्चमी तिथि पर्यन्त कृष्णपक्ष में भी दोपहर से पूर्व ही यज्ञोपवीत शुभ होता है । यद्यपि ग्रन्थकार ने महीने यहाँ नहीं कहे तथापि ग्रन्थान्तर से उन्हें जानना चाहिए । वसन्त ऋतु में ब्राह्मण का, ग्रीष्म ऋतु में क्षत्रिय का और शरद् ऋतु में वैश्य का यज्ञोपवीत श्रेष्ठ होता है । यद्यपि सब वर्णों के लिये हस्त, अश्विनी आदि नक्षत्र कहे हैं किंतु ब्राह्मण का यज्ञोपवीत पुनर्वसु नक्षत्र में न करना चाहिए ॥ ४० ॥ यज्ञोपवीत में लग्नदोष कवीज्यचन्द्रलग्नपा रिपौ मृतौ व्रतेऽधमाः । व्ययेऽब्जभार्गवौ तथा तनौ मृतौ सुते खलाः ॥ ४१ ॥ अन्वयः—कवीज्यचन्द्रलग्नपाः रिपौ मृतौ स्थिता व्रते अधमाः भवन्ति, तथा अब्ज- भार्गवौ व्यये, तथा खलाः तनौ मृतौ सुते स्थिताः अशुभाः भवन्ति ॥ ४१ ॥ यज्ञोपवीत में लग्न से छठे वा आठवें स्थान में स्थित शुक्र, बृहस्पति, चन्द्रमा वा लग्नेश तथा बारहवें स्थान में स्थित चन्द्रमा वा शुक्र तथा लग्न में अथवा आठवें वा पाँचवें स्थान में स्थित पापग्रह अधम अर्थात् बालक के मरणकारक होते हैं ॥ ४१ ॥ यज्ञोपवीत में लग्न के गुण व्रतबन्धेऽष्टषड्रिफवर्जिताः शोभनाः शुभाः । त्रिषडाये खलाः पूर्णो गोकर्कस्थो विधुस्तनौ ॥ ४२ ॥ अन्वयः—शुभाः [शुभग्रहाः] अष्टषड्रिफवर्जिताः व्रतबन्धे शोभनाः भवन्ति । तथा खलाः त्रिषडाये, शोभनाः भवन्ति । पूर्णः विधुः गोकर्कस्थः तनौ मृतौ शोभनो भवति ॥ ४२ ॥ यज्ञोपवीत में लग्न से आठवें, छठे वा बारहवें स्थान को छोड़ अन्य स्थानों में शुभग्रह स्थित हों और तीसरे छठे वा गेरहवें स्थान में पापग्रह स्थित हों तो शुभ होते हैं । वृष वा कर्क राशि में स्थित पूर्ण चन्द्रमा यदि लग्न में हो तो शुभ होता है ॥ ४२ ॥

संस्कारप्रकरण ९३ वर्णेश वा शाखेश विप्राधीशौ भार्गवेज्यौ कुजार्कौ राजन्यानामोषधीशो विशां च । शूद्राणां ज्ञश्चान्त्यजानां शनिः स्याच्छाखेशाः स्युर्जीवशुक्रारसौम्याः ॥ ४३ ॥ अन्वयः—भार्गवेज्यौ विप्राधीशौ, कुजार्कौ राजन्यानां (अधीशौ), ओषधीशः विशां (अधीशः), ज्ञः शूद्राणां (अधीशः), शनिः अन्त्यजाना (अधीशः), जीवशुक्रारसौम्याः शाखेशाः स्युः ॥ ४३ ॥ शुक्र और बृहस्पति ब्राह्मण वर्ण के ईश, मङ्गल और सूर्य क्षत्रिय वर्ण के ईश, चन्द्रमा वैश्य वर्ण का ईश, बुध शूद्र वर्ण का ईश और शनैश्चर अन्त्यज अर्थात् चाण्डालादि वर्णसङ्कर का ईश है । ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वणवेद के क्रम से बृहस्पति, शुक्र, मंगल और बुध शाखेश हैं । यथा ऋग्वेद का ईश बृहस्पति, यजुर्वेद का ईश शुक्र, सामवेद का ईश मङ्गल और अथर्वणवेद का ईश बुध है ॥ ४३ ॥ शाखेश और वर्णेश का प्रयोजन शाखेशवारतनुवीर्यमतीव शस्तं शाखेशसूर्यशशिजीवबले व्रतं सत् । जीवे भृगौ रिपुगृहे विजिते च नीचे स्याद्वेदशास्त्रविधिना रहितो व्रतेन ॥ ४४ ॥ अन्वयः—(व्रते) शाखेशवारतनुवीर्यं अतीव शस्तं स्यात् । शाखेशसूर्यशशिजीवबले व्रतं सत् स्यात्, जीवे भृगौ च रिपुगृहे, विजिते, नीचे (सति) व्रतेन वेदशास्त्रविधिना रहितः स्यात् ॥ ४४ ॥ यदि शाखेश का दिन हो; शाखेश ही की लग्न हो और शाखेश बली भी हो तो यज्ञोपवीत अति शुभ होता है । अथवा शाखेश, वर्णेश, सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति बली हों तो भी यज्ञोपवीत शुभ होता है । यदि बृहस्पति वा शुक्र अपने शत्रु के स्थान में हों, अथवा युद्ध में किसी ग्रह से हार गये हैं अथवा अपने नीच स्थान में हों तो यज्ञोपवीत करने से वह बालक वेद और शास्त्र से तथा वेद-शास्त्र में कही हुई क्रिया से रहित होता है ॥ ४४ ॥ जन्म-मास आदि का यज्ञोपवीत में अपवाद जन्मर्क्षमासलग्नादौ व्रते विद्याधिको व्रती । आद्यगर्भेऽपि विप्राणां क्षत्रादीनामनादिमे ॥ ४५ ॥

९४ मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—विप्राणां आद्यगर्भे, क्षत्रादीनां अनादिमेगर्भे अपि जन्मर्क्षमासंलग्नादौ व्रते (सति) व्रती विद्याधिकः स्यात् ॥ ४५ ॥ जन्मनक्षत्र, जन्ममास, जन्मलग्न और जन्मतिथि में ब्राह्मण के पहले लड़के का और क्षत्रियों तथा वैश्यों के पहले को छोड़ अन्य लड़के का यज्ञोपवीत हो तो वह अधिक विद्यावाला होता है ॥ ४५ ॥ बृहस्पति का बल वटुकन्याजन्मराशेस्त्रिकोणायद्विसप्तगः । श्रेष्ठो गुरुः खषट्त्र्याद्ये पूजयान्यत्र निन्दितः ॥ ४६ ॥ अन्वयः—वटुकन्याजन्मराशेः त्रिकोणायद्विसप्तगः गुरुः श्रेष्ठः स्यात्, खषट्त्र्याद्येषु पूजया (शुभः) अन्यत्र निन्दितः स्यात् ॥ ४६ ॥ लड़के वा लड़की की जन्मराशि से नवीं, पाँचवीं, गेरहवीं, दूसरी वा सातवीं राशि में बृहस्पति शुभ; दसवीं, छठी, तीसरी वा पहली राशि में पूजा करने से शुभ और चौथी, आठवीं वा बारहवीं राशि में अशुभ होता है ॥ ४६ ॥ गुरुदोषापवाद स्वोच्चे स्वभे स्वमैत्रे वा स्वांशे वर्गोत्तमे गुरुः । रिष्फाष्टतुर्यगोऽपीष्टो नीचारिस्थः शुभोऽप्यसत् ॥ ४७ ॥ अन्वयः—गुरुः स्वोच्चे स्वभे स्वमैत्रे वा स्वांशे रिष्फाष्टतुर्यगोऽपि इष्टः स्यात् । तथा नीचारिस्थः शुभोऽपि असत् स्यात् ॥ ४७ ॥ बारहवें, आठवें वा चौथे स्थान में भी स्थित बृहस्पति यदि स्वोच्च, स्वराशि, स्वमित्रराशि, स्वनवांश वा वर्गोत्तम में हो तो शुभ हो जाता है और शुभ भी बृहस्पति यदि अपने नीच स्थान में या अपने शत्रु के स्थान में स्थित हो तो वह अशुभ हो जाता है ॥ ४७ ॥ यज्ञोपवीत में निषिद्ध समय कृष्णे प्रदोषेऽनध्याये शनौ निश्यपराह्नके । प्राक्संध्यागर्जिते नेष्टो व्रतबन्धो गलग्रहे ॥ ४८ ॥ अन्वयः—कृष्णे, प्रदोषे, अनध्याये, शनौ, निशि, अपराह्नके, प्राक्संध्यागर्जिते तथा गलग्रहे व्रतबन्धः नेष्टः स्यात् ॥ ४८ ॥

संस्कारप्रकरण ९५ पञ्चमी तक को छोड़ कृष्णपक्ष, प्रदोष*, अनध्याय†, शनैश्चर का दिन, रात्रि और दोपहर के बाद का समय, जिस दिन प्रातःकाल मेघ गर्जे वह दिन और गलग्रह‡, इनमें यज्ञोपवीत शुभ नहीं होता ॥ ४८ ॥ सूर्यादि ग्रहों के नवांश में यज्ञोपवीत होने का फल क्रूरो जडो भवेत्पापः पटुः षट्कर्मकृद्वटुः । यज्ञार्थभाक् तथा मूर्खो रव्याद्यंशे तनौ क्रमात् ॥ ४९ ॥ अन्वयः—रव्याद्यंशे तनौ सति वटुः क्रमात्, क्रूरः, जडः, पापः, पटुः, षटकर्मकृत्, यज्ञार्थभाक्, तथा मूर्खः स्यात् ॥ ४९ ॥ सूर्य के नवांश+ में यज्ञोपवीत करने से वह बालक क्रूर अर्थात् निर्दय, चन्द्रमा के नवांश में करने से जड़ अर्थात् विचाररहित, मङ्गल के नवांश में पापी, बुध के नवांश में पटु अर्थात् चतुर, बृहस्पति के नवांश में यज्ञ करना- कराना, दान लेना-देना, पढ़ना-पढ़ाना, ये छः कर्म करनेवाला, शुक्र के नवांश में यज्ञ करनेवाला और धनी तथा शनैश्चर के नवांश में यज्ञोपवीत करने से मूर्ख होता है । इसलिए लग्न में शुभग्रह का नवांश हो तब यज्ञोपवीत उत्तम होता है ॥ ४९ ॥ यज्ञोपवीत में चन्द्रनवांश का फल विद्यानिरतः शुभराशिलवे पापांशगते हि दरिद्रतरः । चन्द्रे स्वलवे बहुदुःखयुतः कर्णादितिभे धनवान्स्वलवे ॥ ५० ॥ अन्वयः—शुभराशिलवे चन्द्रे व्रती विद्यानिरतः स्यात् । पापांशगते दरिद्रतरः स्यात् । स्वलवे चन्द्रे बहुदुःखयुतः स्यात् । स्वलवे चन्द्रे कर्णादितिभे धनवान् भवति ॥ ५० ॥ यज्ञोपवीत में यदि चन्द्रमा शुभराशि के नवांश में स्थित हो तो व्रती अर्थात् जिसका यज्ञोपवीत करना है वह बालक सदा विद्या में रुचि रखनेवाला और पापराशि के नवांश में स्थित हो तो अतिशय दरिद्र तथा अपनी राशि के नवांश में अर्थात् कर्कराशि के नवांश में स्थित हो तो बहुत

  • इसी प्रकरण के ५५ श्लोक में कहेंगे । † इसी प्रकरण के ५४ श्लोक में कहेंगे । ‡ चौथि, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पौर्णमासी, परीबा और कृष्णपक्ष में अमावास्या ये गलग्रहसंज्ञक तिथियाँ हैं ।
  • नवांशों का विचार विवाहप्रकरण में कहेंगे ।

९६ मुहूर्तचिन्तामणि दुःखों से संयुक्त होता है। यदि यज्ञोपवीतकाल में चन्द्रमा कर्कराशि के नवांश में हो और श्रवण नक्षत्र या पुनर्वसु नक्षत्र हो तो वह बालक धनवान् होता है ॥ ५० ॥ केन्द्रस्थित सूर्यादि ग्रहों का फल राजसेवी वैश्यवृत्तिः शस्त्रवृत्तिश्च पाठकः । प्राज्ञोऽर्थवान्म्लेच्छसेवी केन्द्रे सूर्यादिखेचरैः ॥ ५१ ॥ अन्वयः—केन्द्रे सूर्यादिखेचरैः व्रती क्रमेण राजसेवी, वैश्यवृत्तिः, शस्त्रवृत्तिः, पाठकः, प्राज्ञः, अर्थवान्, च म्लेच्छसेवी भवति ॥ ५१ ॥ लग्न, चौथे, सातवें और दशवें स्थान की केन्द्र संज्ञा है। सूर्य केन्द्र में स्थित हो तो जिसका यज्ञोपवीत किया जाय वह राजा का सेवक, चन्द्रमा केन्द्र में हो तो वैश्यवृत्ति करनेवाला, मङ्गल केन्द्र में हो तो शस्त्रजीवी, बुध केन्द्र में हो तो अध्यापक, बृहस्पति केन्द्र में हो तो पण्डित, शुक्र केन्द्र में हो तो धनवान् और शनैश्चर केन्द्र में हो तो म्लेच्छों का सेवक होता है ॥ ५१ ॥ यज्ञोपवीतकाल में संयुक्त ग्रहों का फल शुक्रे जीवे तथा चन्द्रे सूर्यभौमार्किसंयुते । निर्गुणः क्रूरचेष्टः स्यान्निर्घृणः सद्युते पटुः ॥ ५२ ॥ अन्वयः—शुक्रे, जीवे तथा चन्द्रे सूर्यभौमार्किसंयुते व्रती क्रमेण निर्गुणः, क्रूरचेष्टः तथा निर्घृणः स्यात् । सद्युते पटुः स्यात् ॥ ५२ ॥ यदि यज्ञोपवीतकाल में शुक्र, बृहस्पति व चन्द्रमा, इनमें से किसी ग्रह के साथ सूर्य हो तो बालक निर्गुण, मङ्गल हो तो निर्दय और शनैश्चर हो तो निर्लज्ज होता है। शुभ ग्रहों का संयोग होने से सब विद्याओं में निपुण होता है ॥ ५२ ॥ यज्ञोपवीत में चन्द्रवश से शुभाशुभ योग विधौ सितांशगे सिते त्रिकोणगे तनौ गुरौ । समस्तवेदविद् व्रती यमांशगेऽतिनिर्घृणः ॥ ५३ ॥ अन्वयः—विधौ सितांशगे, सिते त्रिकोणगे, गुरौ तनौ, व्रती समस्तवेदविद् भवति । यमांशगे अतिनिर्घृणः स्यात् ॥ ५३ ॥

संस्कारप्रकरण ९७ यदि शुक्र के नवांश में चन्द्रमा, लग्न से पाँचवें वा नवें स्थान में शुक्र और लग्न में बृहस्पति हो तो बालक चारों वेदों का जाननेवाला होता है। यदि शनैश्चर के नवांश में चन्द्रमा, लग्न में बृहस्पति और लग्न से पाँचवें वा नवें स्थान में शुक्र हो तो बालक निर्दय अथवा निर्लज्ज होता है ॥ ५३ ॥ अनध्यायसंज्ञक तिथियाँ शुचिशुक्रपौषतपसां दिगशिवरुद्रार्कसंख्यसिततिथयः । भूतादितत्रितयाष्टमी संक्रमणं च व्रतेष्वनध्यायाः ॥ ५४ ॥ अन्वयः—शुचिशुक्रपौषतपसां मासानां दिगशिवरुद्रार्कसंख्यसिततिथयः, तथा भूतादि- त्रितयाष्टमी संक्रमणं च व्रतेषु अनध्यायाः (भवन्ति) ॥ ५४ ॥ आषाढ़ शुक्ल दशमी, ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया, पौष शुक्ल एकादशी, माघ शुक्ल द्वादशी तथा चतुर्दशी, पौर्णमासी, अमावास्या, परीवा, अष्टमी और सूर्य संक्रान्ति ये सब यज्ञोपवीत में अनध्यायसंज्ञक हैं। इनमें यज्ञोपवीत न करना चाहिए ॥ ५४ ॥ प्रदोष-लक्षण अर्कतर्कत्रितिथिषु प्रदोषः स्यात्तदग्रिमैः । रात्र्यर्थसार्धप्रहरयाममध्ये स्थितैः क्रमात् ॥ ५५ ॥ अन्वयः—अर्कतर्कत्रितिथिषु रात्र्यर्थसार्धप्रहरयाममध्ये स्थितैः तदग्रिमैः प्रदोष स्यात् ॥ ५५ ॥ द्वादशी में आधी रात से पूर्व ही यदि त्रयोदशी का योग हो तो वह प्रदोष, छठि में डेढ़ पहर रात बीतने के पूर्व ही यदि सप्तमी का योग हो तो वह प्रदोष और तीज में पहर भर रात बीतने के पूर्व ही यदि चौथ का योग हो तो वह प्रदोष कहा जाता है ॥ ५५ ॥ ब्रह्मौदन के पहिले उत्पात होने पर शांति का विधान प्राग् ब्रह्मौदनपाकाद् व्रतबन्धानन्तरं यदि चेत् । उत्पातानध्ययनोत्पत्तावपि शान्तिपूर्वकं तत्स्यात् ॥ ५६ ॥ अन्वयः—व्रतबन्धानन्तरं, ब्रह्मौदनपाकात् प्राग् यदि चेत् उत्पातानध्ययनोत्पत्तौ अपि शान्तिपूर्वकं तत् (ब्रह्मौदनं) स्यात् ॥ ५६ ॥ विधिपूर्वक यज्ञोपवीत होने के पश्चात् और सायंकाल में होनेवाले

९८ मुहूर्तचिन्तामणि ब्रह्मोदन कर्म के पूर्व यदि अकस्मात् कोई उत्पातविशेष या अनध्याय हो तो वह उस लड़के के पढ़ने में विघ्नकारक होता है । इसलिए पहिले उसकी शान्ति करके तब ब्रह्मोदन कर्म करे और यदि यज्ञोपवीत के पहिले अकस्मात् कोई उत्पात हो तो यज्ञोपवीत ही न करे । ब्रह्मोदन कर्म बह्वृचों के यहाँ होता है ॥ ५६ ॥ वेदों के भेद से यज्ञोपवीत के नक्षत्र वेदक्रमाच्छशिशिवाहिकरत्रिमूलपूर्वासु पौष्णकरमैत्रमृगादितीज्ये । ध्रौवेषु चाश्विवसुपुष्यकरोत्तरेशकर्णे मृगान्त्यलघुमैत्रधनादितौ सत् ॥ ५७ ॥ अन्वयः—शशिशिवाहिकरत्रिमूलपूर्वासु, पौष्णकरमैत्रमृगादितीज्ये च ध्रौवेषु, अश्वि- वसुपुष्यकरोत्तरेशकर्णे, मृगान्त्यलघुमैत्रधनादितौ, वेदक्रमात् व्रतं सत् स्यात् ॥ ५७ ॥ मृगशिरा, आर्द्रा, आश्लेषा, हस्त, चित्रा, स्वाती, मूल और तीनों पूर्वा में ऋग्वेदाध्यायियों का; रेवती, हस्त, अनुराधा, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, रोहिणी और तीनों उत्तरा में यजुर्वेदाध्यायियों का; अश्विनी, धनिष्ठा, पुष्य, हस्त, तीनों उत्तरा, आर्द्रा और श्रवण नक्षत्र में सामवेदाध्यायियों का तथा मृगशिरा, रेवती, पुष्य, अश्विनी, हस्त, अनुराधा, धनिष्ठा और पुनर्वसु नक्षत्र में अथर्वणवेदाध्यायियों का यज्ञोपवीत शुभ होता है ॥ ५७ ॥ | मृ० | आ० | श्ले० | ह० | चित्रा | स्वाती | मू० | पू० फा० | पू० षा० | पू० भा० | ऋग्वेद | | रे० | ह० | अनु० | मृ० | पुन० | पु० | रो० | उ० फा० | उ० षा० | उ० भा० | यजुर्वेद | | अ० | ध० | पु० | ह० | उ.फा. | उ० षा० | उ० भा० | आ० | श्र० | | सामवेद | | मृ० | रेवती | पु० | अ० | ह० | अनु० | ध० | पु० | | | अ० वेद | यज्ञोपवीतादि में धर्मशास्त्र का विचार नान्दीश्राद्धोत्तरं मातुः पुष्पे लग्नान्तरे न हि । शान्त्या चौलं व्रतं पाणिग्रहः कार्योऽन्यथा न सत् ॥ ५८ ॥ अन्वयः—नान्दीश्राद्धोत्तरं मातुः पुष्पे सति, (अग्रे) लग्नान्तरे नहि (प्राप्तेसति) शान्त्वा चौलं व्रतं (कार्यम्) विवाहः (कार्यः) अन्यथा न सत् ॥ ५८ ॥ नान्दीश्राद्ध होने के पश्चात् जिसकी माता रजस्वला हो उस लड़के का मुण्डन, यज्ञोपवीत वा विवाह पूर्व विचारे हुए मुहूर्त्त को छोड़ उसी के समीप दूसरे मुहूर्त्त में करना चाहिए । यदि दैवयोग से पूर्व विचारे हुए मुहूर्त्त के समीप दूसरा शुभ मुहूर्त्त न मिले तो धर्मशास्त्र में कही हुई शान्ति* करके

  • वाक्यसार में कही हुई विधि से लक्ष्मी की पूजा ।

विवाहप्रकरण ९९ उसी मुहूर्त्त में करे । किन्तु विना शान्ति किये यदि उक्त कर्म किये जाते हैं, तो शुभ नहीं होता ॥ ५८ ॥ छुरिकाबन्धन मुहूर्त्त विचैत्रव्रतमासादौ विभौमास्ते विभूमिजे । छुरिकाबन्धनं शस्तं नृपाणां प्राग्विवाह्रतः ॥ ५९ ॥ अन्वयः—विचैत्रव्रतमासादौ,विभौमास्ते, विभूमिजे, नृपाणां विवाह्रतः प्राक् छुरिका- बन्धनं शस्तम् ॥ ५९ ॥ चैत्रमास; मंगल, बृहस्पति, शुक्र का अस्तकाल और मंगल दिन को छोड़कर यज्ञोपवीत में कहे हुए मास, पक्ष, तिथि, नक्षत्र, वार लग्नादि में क्षत्रियों को विवाह से पहिले छुरिकाबन्धन शुभ होता है ॥ ५९ ॥ केशान्तकर्म का मुहूर्त्त केशान्तं षोडशे वर्षे चौलोक्तदिवसे शुभम् । व्रतोक्तदिवसादौ हि समावर्त्तनमिष्यते ॥ ६० ॥ अन्वयः—षोडशे वर्षे चौलोक्तदिवसे केशान्तं शुभम् । तथा व्रतोक्तदिवसादौ हि समावर्त्तनम् इष्यते ॥ ६० ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ संस्कारप्रकरणं समाप्तम् ॥ ५ ॥ जन्म से सोलहवें वर्ष में, मुण्डन में कहे हुए मुहूर्त्त में केशान्तकर्म शुभ होता है । यह केवल ब्राह्मणों के लिए है क्योंकि क्षत्रियों का बाइसवें वर्ष और वैश्यों का चौबीसवें वर्ष केशान्तकर्म होता है, यह मनुजी ने कहा है । अब समावर्त्तन कर्म का मुहूर्त्त कहते हैं । यज्ञोपवीत में कहे हुए मास, पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्र और लग्नादि में समावर्त्तन कर्म करना शुभ होता है ॥ ६० ॥ विवाहप्रकरण —:०:— भार्या त्रिवर्गकरणं शुभशीलयुक्ता शीलं शुभं भवति लग्नवशेन तस्याः । तस्माद्विवाहसमयः परिचिन्त्यते हि तन्निघ्नतामुपगताः सुतशीलधर्माः ॥ १ ॥

१०० मुहूर्तचिन्तामणि अन्वयः—शुभशीलयुक्ता भार्या त्रिवर्गकरणं भवति, तस्याः शीलं लग्नवशेन शुभं भवति, तस्मात् विवाहसमयः परिचिन्त्यते, हि (यस्मात्) सुतशीलधर्माः तन्निधनतां उपगताः ॥ १ ॥ सुशीला स्त्री धर्म, अर्थ और काम की वृद्धि करती है, और स्त्री की सुशीलता विवाहकालिक लग्न के अधीन है, अर्थात् शास्त्रोक्त शुभ मुहूर्त्त में विवाह होता है तो स्त्री का स्वभाव और आचरण अच्छे होते हैं। और यदि अशुभ मुहूर्त्त में विवाह हुआ तो स्वभाव आदि अच्छे नहीं होते। इसलिए विवाह का मुहूर्त्त अच्छी तरह विचारना चाहिए। क्योंकि सुशीलता, पुत्र- प्राप्ति और धर्म, ये सब विवाहकाल के मुहूर्त्त के अधीन हैं ॥ १ ॥ विवाह प्रश्नविधि आदौ संपूज्य रत्नादिभिरथ गणकं वेदयोत्स्वस्थचित्तं कन्योद्वाहं दिगीशानलहयविशिखे प्रश्नलग्नाद्यदोन्दुः । दृष्टो जीवेन सद्यः परिणयनकरो गोतुलाकर्कटाख्यं वा स्यात्प्रश्नस्य लग्नं शुभखचरयुतालोकितं तद्विदध्यात् ॥ २ ॥ अन्वयः—आदौ रत्नादिभिः स्वस्थचित्त गणकं सम्पूज्य अथ कन्योद्वाहं वेदयेत् । यदि इन्दुः प्रश्नलग्नात् दिगीशानलहयविशिखे (स्थितः) जीवेन दृष्टः तदा सद्यः परिणयनकरः स्यात्, वा गोतुलाकर्कटाख्यं प्रश्नस्य लग्नं शुभखचरयुतालोकितं यदि स्यात् तदा तद् विदध्यात् ॥ २ ॥ मणि, सुवर्ण, चाँदी, वस्त्र, फल, फूल आदि से ज्योतिषी पण्डित की पूजा करके प्रश्नकर्ता उससे कहे कि कन्या का यह नाम है और वर का यह नाम है, इन दोनों का विवाह योग्य है या नहीं। यदि प्रश्नकालिक लग्न से दशवें, गेरहवें, तीसरे, सातवें वा पाँचवें स्थान में चन्द्रमा स्थित होकर बृहस्पति से दृष्ट हो तो शीघ्र ही विवाह होता है, अथवा वृष, तुला वा कर्क प्रश्नकालिक लग्न हो और शुभग्रहों से युक्त वा दृष्ट हो तो भी शीघ्र विवाह होता है ॥ २ ॥ विवाहकारक अन्य योग विषमभांशगतौ शशिभार्गवौ तनुगृहं बलिनौ यदि पश्यतः । रचयतो वरलाभमिमौ यदा युगलभांशगतौ युवतिप्रदौ ॥ ३ ॥ अन्वयः—यदि बलिनौ शशिभार्गवौ विषमभांशगतौ तनुगृहं पश्यतः (तदा) वरलाभं

विवाहप्रकरण १०१ रचयतः । यदा इमौ [बलिनौ शशिभार्गवौ] युगलभांशगतौ (तनुगृहं पश्यतः) तदा युवतिप्रदौ (स्तः) ॥ ३ ॥ प्रश्नकाल में यदि विषमराशि में या विषमराशि के नवांश में स्थित चन्द्रमा वा शुक्र बली होकर लग्न को देखते हों तो कन्या को वर का लाभ कराते हैं, और यदि समराशि में या समराशि के नवांश में स्थित शुक्र वा चन्द्रमा बली होकर लग्न को देखते हों तो वर को स्त्री का लाभ कराते हैं ॥ ३ ॥ वैधव्ययोग षष्ठाष्टस्थः प्रश्नलग्नाद्यदीन्दुल्लग्ने क्रूरः सप्तमे वा कुजः स्यात् । मूर्त्ताविन्दुः सप्तमे तस्य भौमो रण्डा सा स्यादष्टसंवत्सरेण ॥ ४ ॥ अन्वयः—यदि इन्दुः प्रश्नलग्नात् षष्ठाष्टस्थः वा लग्ने क्रूरः तस्य सप्तमे कुजः, वा मूर्त्तौ इन्दुः तस्य सप्तमे भौमः तदा सा कन्या अष्टसंवत्सरेण रण्डा स्यात् ॥ ४ ॥ प्रश्नकालिक लग्न से छठे वा आठवें स्थान में यदि चन्द्रमा स्थित हो तो विवाह से आठवें वर्ष में कन्या विधवा हो जाती है, और यदि प्रश्नकालिक लग्न में क्रूरग्रह स्थित हों और उससे सातवें स्थान में मंगल हो तो भी विवाह से आठवें वर्ष में कन्या विधवा होती है, अथवा प्रश्नकालिक लग्न में चन्द्रमा हो और उसके सातवें स्थान में मंगल हो तो भी विवाह से आठवें वर्ष में कन्या विधवा होती है ॥ ४ ॥ कुलटा वा मृतवत्सायोग प्रश्नतनोर्यदि पापनभोगः पञ्चमगो रिपुदृष्टशरीरः । नीचगतश्च तदा खलु कन्या सा कुलटा त्वथवा मृतवत्सा ॥ ५ ॥ अन्वयः—यदि पापनभोगः प्रश्नतनोः पञ्चमगः रिपुदृष्टशरीरः (सन्) नीचगतः, तदा सा कन्या कुलटा अथवा मृतवत्सा (स्यात्) ॥ ५ ॥ प्रश्नकालिक लग्न से पाँचवें स्थान में पापग्रह स्थित हो, और वह अपने शत्रु से देखा जाता हो और अपने नीच स्थान में हो तो कन्या कुलटा अथवा मृतवत्सा (जिसकी सन्तान न जिये) होती है ॥ ५ ॥ विवाहभङ्गयोग यदि भवति सितातिरिक्तपक्षे तनुगृहतः समराशिगः शशाङ्कः । अशुभखचरवीक्षितोऽरिरन्ध्रे भवति विवाहविनाशकारकोऽयम् ॥ ६ ॥

१०२ मुहूर्तचिन्तामणि अन्वयः—यदि सितातिरिक्तपक्षे शशाङ्कः तनुगृहतः समराशिगः अशुभखचरवीक्षितः (सन्) अरिरन्ध्रे भवति तदा अयं विवाहविनाशकारको भवति ॥ ६ ॥ कृष्णपक्ष हो, चन्द्रमा वृष और कर्क आदि सम राशियों में, प्रश्नलग्न से छठे वा आठवें स्थान में स्थित हो और अशुभ ग्रहों से देखा जाता हो, तो विवाहभंगयोग होता है ॥ ६ ॥ जन्मकालिक बालविधवायोग के विचारने का उपदेश करते हुए उसके शान्त होने का उपाय जन्मोत्थं च विलोक्य बालविधवायोगं विधाय्य व्रतं सावित्र्या उत पैप्पलं हि सुतया दद्यादिमां वा रहः । सल्लग्नेऽच्युतमूर्तिपिप्पलघटैः कृत्वा विवाहं स्फुटं दद्यात्तां चिरजीविनेऽत्र न भवेद्दोषः पुनर्भुभवः ॥ ७ ॥ अन्वयः—जन्मोत्थं चकारात् (प्रश्नलग्नोत्थं) बालविधवायोगं विलोक्य हि [निश्चयेन] सुतया सावित्र्या व्रतं, उत [वा] पैप्पलं व्रतं विधाय्य इमां चिरजीविने (वराय) दद्यात् । वा, सल्लग्ने रहः अच्युतमूर्ति-पिप्पलघटैः स्फुटं विवाहं कृत्वा तां चिरजीविने दद्यात् । अत्र पुनर्भुभवः दोषः न भवेत् ॥ ७ ॥ उक्त रीति से प्रश्नकालिक बालविधवायोग और जातकोक्त रीति से कन्या के जन्मकालिक बालविधवायोग का विचार करके कन्या का पिता एकान्त में कन्या से सावित्री* व्रत या पीपर† वृक्ष का व्रत कराके शुभ लग्न में चिरजीवी वर के साथ उस कन्या का विवाह कर दे, अथवा चतुर्भुजी विष्णु की सोने की मूर्ति वा पीपर का वृक्ष वा मिट्टी का घड़ा, इन तीनों में से किसी के साथ शुभ लग्न में कन्या का विवाह करे और फिर चिरजीवी वर के साथ विवाह कर दे, ऐसा करने से पुनर्भू‡ दोष नहीं लगता ॥ ७ ॥ प्रश्न के समय प्रथम सन्तान का विचार प्रश्नलग्नक्षणे यादृशापत्ययुक्स्वेच्छया कामिनी तत्र चेदाव्रजेत् । कन्यका वा सुतो वा तदा पण्डितैस्तादृशापत्यमस्या विनिर्दिश्यते ॥ ८ ॥ अन्वयः—तत्र प्रश्नलग्नक्षणे चेत् स्वेच्छया यादृशापत्ययुक् कामिनी आव्रजेत् तदा कन्यका वा सुतः तादृशापत्यं अस्याः पण्डितैः विनिर्दिश्यते ॥ ८ ॥ *व्रतखण्ड में इसका विधान लिखा है। †ज्ञानभास्करनामक ग्रन्थ में इसका विधान लिखा है। ‡विवाहित पति को छोड़ दूसरे के साथ विवाह करना ।

विवाहप्रकरण १०३ प्रश्नमुहूर्त्त में जैसी सन्तान लिये हुई कोई स्त्री या कन्या ज्योतिषी के समीप अपनी इच्छा से आ जाय वैसी ही प्रथम सन्तान उस कन्या के होती है जिसके विवाह का प्रश्न हो। कन्या लेकर आवे तो कन्या और पुत्र लेकर आवे तो पुत्र होता है ॥ ८ ॥ प्रश्नकाल में साधारण शुभाशुभ निमित्त शङ्खभेरीविपञ्चीरवैर्मङ्गलं जायते वैपरीत्यं तदा लक्षयेत् । वायसो वा खरः श्वा शृगालोऽपि वा प्रश्नलग्नक्षणे रौति नादं यदि ॥ ९ ॥ अन्वयः—प्रश्नलग्नक्षणे शंखभेरीविपञ्चीरवैः मङ्गलं जायते । वायसः वा खरः श्वा शृगालः अपि यदि रौति वा नादं करोति तदा वैपरीत्यं लक्षयेत् ॥ ६ ॥ यदि प्रश्नकाल में अकस्मात् शंख, तुरही वा वीणा का शब्द सुन पड़े तो वर-कन्या का मंगल होता है, और यदि कौआ, गदहा, कुत्ता वा सियार शब्द करने लगें तो उससे विपरीत अर्थात् अमंगल होता है ॥ ९ ॥ कन्यावरण-मुहूर्त्त विश्वस्वातीवैष्णवपूर्वात्रयमैत्रैर्वस्वाग्नेयैर्वा करपीडोचितऋक्षैः । वस्त्रालङ्कारादिसमेतैः फलपुष्पैः सन्तोष्यादौ स्यादनु कन्यावरणं हि ॥ १० ॥ अन्वयः—विश्वस्वातीवैष्णवपूर्वात्रयमैत्रैः वस्वाग्नेयैः वा करपीडोचितऋक्षैः हि (निश्चयेन) आदौ वस्त्रालंकारादिसमेतैः फलपुष्पैः (कन्यां) संतोष्य अनु कन्यावरणं स्यात् ॥ १० ॥ उत्तराषाढ़, स्वाती, श्रवण, तीनों पूर्वा, अनुराधा, धनिष्ठा वा कृत्तिका नक्षत्र में, अथवा विवाहोक्त नक्षत्रादि में, वस्त्र, आभूषण अथवा फल, फूल आदि से कन्या को संतुष्ट करके फिर उसका वरण करे ॥ १० ॥ वरवरण अर्थात् फलदान का मुहूर्त्त धरणिदेवोऽथवा कन्यकासोदरः शुभदिने गीतवाद्यादिभिः संयुतः । वरवृतिं वस्त्रयज्ञोपवीतादिना ध्रुवयुतैर्वह्निपूर्वात्रयैराचरेत् ॥ ११॥ अन्वयः—शुभदिने ध्रुवयुतैः वह्निपूर्वात्रयैः धरणिदेवः अथवा कन्यकासोदरः गीत- वाद्यादिभिः संयुतः सन्, वस्त्रयज्ञोपवीतादिना वरवृतिं आचरेत् ॥ ११ ॥ रोहिणी, तीनों उत्तरा, कृत्तिका और तीनों पूर्वा नक्षत्र, शुभ दिन, तिथि, लग्नादि में गीत-वाद्य आदि के साथ ब्राह्मण अथवा कन्या का भाई वस्त्र, यज्ञोपवीत, द्रव्य, फल, फूलादि से वर का वरण करे ॥ ११ ॥

१०४ मुहूर्तचिन्तामणि विवाहकाल में ग्रहशुद्धि गुरुशुद्धिवशेन कन्यकानां समवर्षेषु षडब्दकोपरिष्टात् । रविशुद्धिवशाच्छुभो वराणामुभयोश्चन्द्रविशुद्धितो विवाहः ॥ १२ ॥ अन्वयः—कन्यकानां षडब्दकोपरिष्टात्, समवर्षेषु गुरुशुद्धिवशेन, तथा वराणां रविशुद्धिवशात्, तथा उभयोः चन्द्रविशुद्धितः विवाहः (शुभः) स्यात् ॥ १२ ॥ गुरुशुद्धिवश से अर्थात् कन्या की जन्मराशि से नवें, पाँचवें, दूसरे, सातवें वा गेरहवें स्थान में बृहस्पति के रहते, छः वर्ष से ऊपर समवर्ष में अर्थात् आठवें या दशवें वर्ष में कन्याओं का, और सूर्यशुद्धिवश से अर्थात् वर की जन्मराशि से तीसरे, छठे, दशवें वा गेरहवें स्थान में सूर्य के रहते, विषमवर्ष में अर्थात् नवें, गेरहवें, तेरहवें इत्यादि वर्षों में वर का, और चन्द्रविशुद्धिवश से अर्थात् वर और कन्या की जन्मराशि से पहिले चौथे, आठवें, बारहवें स्थान को छोड़ अन्य स्थानों में चन्द्रमा के रहते वर और कन्या का विवाह शुभ होता है ॥ १२ ॥ विवाह के महीने मिथुनकुम्भमृगालिवृषाजगे मिथुनगेऽपि रवौ त्रिलवे शुचेः । अलिमृगाजगते करपीडनं भवति कार्त्तिकपौषमधुष्वपि ॥ १३ ॥ अन्वयः—मिथुनकुम्भमृगालिवृषाजगे रवौ (तथा) मिथुनगे रवौ (सति) शुचेः त्रिलवेऽपि (तथा) अलिमृगाजगते रवौ (सति) कार्त्तिकपौषमधुषु अपि करपीडनं (शुभं) भवति ॥ १३ ॥ मिथुन, कुम्भ, मकर, वृश्चिक, वृष और मेष राशि में सूर्य के रहते विवाह शुभ होता है। परन्तु मिथुन राशि में आषाढ़ के तीसरे भाग अर्थात् आषाढ़ शुक्ल दशमी तक, वृश्चिक राशि में कार्त्तिक में भी, मकर राशि में पौष में भी और मेष राशि में सूर्य के रहते चैत्र में भी विवाह होता है ॥ १३ ॥ सन्तानभेद से जन्ममासादि अशुभ व शुभ विवाह आद्यगर्भसुतकन्ययोर्द्वयोर्जन्ममासभतिथौ करग्रहः । नोचितोऽथ विबुधैः प्रशस्यते चेद्द्वितीयजनुषोः सुतप्रदः ॥ १४ ॥ अन्वयः—जन्ममासभतिथौ आद्यगर्भसुतकन्ययोः द्वयोः करग्रहः न उचितः। चेत् द्वितीयजनुषोः सुतकन्ययोः (करग्रहः) सुतप्रदः विबुधैः प्रशस्यते ॥ १४ ॥ जन्ममास, जन्मनक्षत्र, जन्मतिथि और जन्मलग्न में प्रथम उत्पन्न पुत्र वा

विवाहप्रकरण १०५ कन्या का विवाह उचित नहीं है । उसके बाद उत्पन्न पुत्र वा कन्या का विवाह पुत्र का देनेवाला और पण्डितों से प्रशंसित भी है ॥ १४ ॥ ज्येष्ठमास में विशेष ज्येष्ठद्वन्द्वं मध्यमं संप्रदिष्टं त्रिज्येष्ठं चेन्नैव युक्तं कदापि । केचित्सूर्यं वह्निगं प्रोह्य चाहुर्नैवान्योन्यं ज्येष्ठयोः स्याद्विवाहः ॥ १५ ॥ अन्वयः—ज्येष्ठद्वन्द्वं मध्यमं संप्रदिष्टम्, त्रिज्येष्ठं चेत्, (तदा) कदापि नैव युक्तं स्यात्, केचित् (आचार्याः) वह्निगं सूर्यं प्रोह्य च विवाहं आहुः । किन्तु अन्योन्यं ज्येष्ठयोः (कन्यावरयोः) विवाहः नैव (शुभः) स्यात् ॥ १५ ॥ विवाह में ज्येष्ठ महीना और ज्येष्ठ वर अथवा ज्येष्ठ महीना और ज्येष्ठ कन्या, ये दो ज्येष्ठ मध्यम कहे गये हैं, अर्थात् शुभ वा अशुभ नहीं हैं ! और ज्येष्ठ कन्या, ज्येष्ठ वर और ज्येष्ठ महीना, ये तीन ज्येष्ठ तो किसी तरह से भी श्रेष्ठ नहीं हैं। कोई आचार्य कहते हैं कि कृत्तिका नक्षत्र में स्थित सूर्य को छोड़कर ज्येष्ठ मास में ज्येष्ठ वर वा ज्येष्ठ कन्या का विवाह उचित नहीं है। अर्थात् कृत्तिका में जब सूर्य रहते हैं तब ज्येष्ठ में भी ज्येष्ठ वर अथवा ज्येष्ठ कन्या का विवाह शुभ होता है। ज्येष्ठ वर और ज्येष्ठ कन्या का विवाह तो कभी भी शुभ नहीं होता ॥ १५ ॥ विवाहादिविशेष का निषेध सुतपरिणयात् षण्मासान्तः सुताकरपीडनं न च निजकुले तद्वद्वा मण्डनादपि मुण्डनम् । न च सहजयोर्देये भ्रात्रोः सहोदरकन्यके न सहजसुतोद्वाहोऽब्दार्द्धं शुभे न पितृक्रिया ॥ १६ ॥ अन्वयः—सुतपरिणयात् षण्मासान्तः सुताकरपीडनं न, च तद्वत् निजकुले मण्डनात् मुण्डनं अपि न, च (तथा) सहजयोः भ्रात्रोः सहोदरकन्यके न देये, अब्दार्धं सहजसुतोद्वाहः न, तथा शुभे पितृक्रिया न (कार्या) ॥ १६ ॥ एक कुल में किसी लड़के के विवाह के बाद छः महीने के भीतर किसी लड़की का विवाह और किसी लड़के या लड़की के विवाह के बाद छः महीने के भीतर किसी का मुण्डन न कराना चाहिए, अर्थात् लड़की के विवाह के बाद लड़के का विवाह और मुण्डन के बाद विवाह कराना चाहिए। सगे दो भाइयों के साथ सगी दो बहनों का विवाह, छः महीने के भीतर ही सगे

१०६ मुहूर्त्तचिन्तामणि दो भाइयों का विवाह, छः महीने के भीतर सगी दो बहिनों का विवाह नहीं कराना चाहिए अर्थात् सौतेले भाइयों और सौतेली बहिनों का करा सकते हैं। विवाहादि शुभ कार्यों में पितृश्राद्धादि न करना चाहिए, अर्थात् ऐसे समय में विवाह आदि की लग्न ठीक करना चाहिए कि जिसमें श्राद्ध का दिन न पड़े ॥ १६ ॥ विपत्ति में विवाह का विचार वध्वा वरस्यापि कुले त्रिपुरुषे नाशं व्रजेत् कश्चन निश्चयोत्तरम् । मासोत्तरं तत्र विवाह इष्यते शान्त्याथवा सूतकनिर्गमे परैः ॥ १७ ॥ अन्वयः—वध्वाः अपि वा वरस्य त्रिपुरुषे कुले, निश्चयोत्तरम्, यदि कश्चन नाशं व्रजेत् तत्र मासोत्तरं विवाह इष्यते, अथवा परैः सूतकनिर्गमे शान्त्या विवाहः देष्यते ॥ १७ ॥ विवाह का निश्चय होने पर यदि वर अथवा कन्या के वंश में तीन पुरुष के मध्य में कोई मर जाय तो उसके मरणदिन से महीने भर के बाद शान्ति* करके विवाह करे तो शुभ होता है, अथवा यदि आवश्यक हो तो अपने वर्ण के अनुसार अशौच व्यतीत हो जाने पर शान्ति करके विवाह करे, यह अन्य आचार्य कहते हैं ॥ १७ ॥ उक्त विषय पर विशेष चूडा-व्रतं चापि विवाहितो व्रताच्चूडा च नेष्टा पुरुषत्रयान्तरे । वधूप्रवेशाच्चसुतावनिर्गमः षण्मासतो वाब्दविभेदतः शुभः ॥ १८ ॥ अन्वयः—पुरुषत्रयान्तरे विवाहतः चूडा नेष्टा च व्रतं अपि (नेष्टम्) च तथा व्रतात् चूडा अपि नेष्टा, च (तथा) वधूप्रवेशात् सुतावनिर्गमः (नेष्टः) षण्मासतः परं वा अब्दविभेदतः शुभः स्यात् ॥ १८ ॥ किसी का विवाह होने के बाद छः महीने के भीतर उसी कुल में तीन पीढ़ी के अन्दर किसी का मुण्डन और यज्ञोपवीत शुभ नहीं होता । तथा किसी का यज्ञोपवीत होने के बाद छः महीने के भीतर किसी का मुण्डन शुभ नहीं होता तथा वधू-प्रवेश होने के बाद छः महीने के भीतर किसी का विवाह शुभ नहीं होता । यदि आवश्यक हो तो संवत्सर के भेद से छः महीने के भीतर भी करना चाहिए । यथा माघ में किसी का विवाह हुआ हो *याज्ञवल्क्य-संहिता में कही हुई गणेश की पूजा ।

३. वास्तु-निर्माण, गृह-प्रवेश, यात्रा एवं राज्याभिषेक मुहूर्त

विवाहप्रकरण १०७ और संवत्सर बदलने के बाद वैशाख में उसी कुल में किसी का मुण्डन या यज्ञोपवीत हो तो वह शुभ है। ऐसे ही उक्त संपूर्ण विषयों में जानना चाहिए ॥ १८ ॥ दुष्ट नक्षत्रों में उत्पन्न वर-कन्या का फल श्वश्रूविनाशमहिजौ सुतरां विधत्तः कन्यासुतौ निर्ऋतिजौ श्वशुरं हतश्च । ज्येष्ठाभजाततनया स्वधवाग्रजं च शक्राग्निजा भवति देवरनाशकर्त्री ॥१९॥ द्वीशाद्यपादत्रयजा कन्या देवरसौख्यदा । मूलान्त्यपादसार्पाद्यपादजातौ तयोः शुभौ ॥२०॥ अन्वयः—अहिजौ कन्यासुतौ सुतरां श्वश्रूविनाशं विधत्तः, च निर्ऋतिजौ कन्यासुतौ श्वशुरं हतः, ज्येष्ठाभजाततनया स्वधवाग्रजं (हन्ति), शक्राग्निजा देवरनाशकर्त्री भवति ॥१९॥ द्वीशाद्यपादत्रयजा कन्या देवरसौख्यदा, मूलान्त्यपादसर्पाद्यपादजातौ तयोः (श्वश्रूश्वशुरयोः) शुभौ ॥२०॥ आश्लेषा में उत्पन्न वर वा कन्या सासु का, मूल नक्षत्र में उत्पन्न कन्या वा वर श्वशुर का, ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न कन्या अपने पति के बड़े भाई का और विशाखा में उत्पन्न कन्या अपने पति के छोटे भाई का नाश करती है ॥१९॥ विशाखा के पहिले तीन चरण में उत्पन्न कन्या अपने पति के छोटे भाई को सुख देती है, मूल नक्षत्र के चौथे चरण में उत्पन्न कन्या वा वर श्वसुर को और आश्लेषा नक्षत्र के पहिले चरण में उत्पन्न कन्या वा वर सासु को सुख देते हैं ॥२०॥ अष्टकूट वर्णो वश्यं तथा तारा योनिश्च ग्रहमैत्रकम् । गणमैत्रं भकूटं च नाडी चैते गुणाधिकाः ॥ २१ ॥ अन्वयः—सुगमः ॥ २१ ॥ वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रहमैत्री, गणमैत्री, भकूट और नाड़ी, ये आठ कूट विवाह में अवश्य विचारना चाहिए । इनमें उत्तरोत्तर का एक गुण अधिक है । यथा वर-कन्या की वर्णमैत्री रहते एक गुण, कन्या की जन्मराशि वर की जन्मराशि के वश्य रहते दो गुण, परस्पर तारा शुभ रहते तीन गुण, वर-

१०८ मुहूर्तचिन्तामणि कन्या के जन्म-नक्षत्रों की परस्पर योनिमैत्री रहते चार गुण, वर-कन्या के जन्मराशीश ग्रहों की परस्पर मित्रता रहते पाँच गुण, वर-कन्या के जन्म- नक्षत्रों की परस्पर गणमैत्री रहते छः गुण, वर-कन्या की जन्मराशि की परस्पर शुभ संख्या रहते सात गुण और वर-कन्या के जन्मनक्षत्रों की नाड़ी भिन्न रहते आठ गुण होते हैं। सब मिलकर छत्तीस गुण जिस वर-कन्या के हों उनका विवाह बहुत शुभ होता है ॥ २१ ॥ वर्णकूट द्विजा झषालिकर्कटास्ततो नृपा विशोऽङ्घ्रिजाः । वरस्य वर्णतोऽधिका वधूर्न शस्यते बुधैः ॥ २२ ॥ अन्वयः—झषालिकर्कटाः द्विजः (ज्ञेयाः) ततः नृपाः [क्षत्रियाः] ततः विशः [वैश्याः] ततः अंघ्रिजाः [शूद्राः] । वरस्य वर्णतः अधिका वधूः बुधैः न शस्यते ॥ २२ ॥ मीन, वृश्चिक, कर्क ये तीन राशियाँ ब्राह्मणसंज्ञक; मेष, धनु, सिंह, ये तीन क्षत्रियसंज्ञक; वृष, मकर, कन्या, ये तीन वैश्यसंज्ञक और मिथुन, कुम्भ, तुला, ये तीन शूद्रसंज्ञक हैं। इन चारों में पहिले से दूसरा, दूसरे से तीसरा और तीसरे से चौथा वर्ण नीच है। यदि वर की जन्मराशि के वर्ण से कन्या की जन्मराशि का वर्ण श्रेष्ठ हो तो उस कन्या के साथ उस वर का विवाह न करना चाहिए। ब्राह्मणवर्ण कन्या और क्षत्रियादि वर्ण वर हो तो उनका परस्पर विवाह योग्य नहीं होता ॥ २२ ॥ वर्णबोधक चक्र | १२ | ४ | ८ | ब्राह्मण | | १ | ५ | ९ | क्षत्रिय | | २ | ६ | १० | वैश्य | | ३ | ७ | ११ | शूद्र | वश्यकूट हित्वा मृगेन्द्रं नरराशिवश्याः सर्वे तथैषां जलजास्तु भक्ष्याः । सर्वेऽपि सिंहस्य वशे विनालिं ज्ञेयं नराणां व्यवहारतोऽन्यत् ॥ २३ ॥ अन्वयः—मृगेन्द्रं हित्वा सर्वे नरराशिवश्याः तथा एषां [नरराशीनां] जलजाः

विवाहप्रकरण १०९ भक्ष्याः, तथा अलि विना सर्वे सिंहस्य वशे। अतः अन्यत् नराणां व्यवहारतः ज्ञेयम् ॥ २३ ॥ सिंह राशि को छोड़ अन्य सब राशियाँ मनुष्य राशियों के अर्थात् मिथुन, कन्या, तुला के वश में हैं; जल राशियाँ अर्थात् कर्क, मकर, कुम्भ, मीन तो मनुष्य राशियों के भक्ष्य ही हैं; वृश्चिक राशि को छोड़ अन्य सब राशियाँ सिंह राशि के वश में हैं और मेष, वृष, धनु तथा जलचर राशियों का परस्पर वश्यावश्यत्व मनुष्यों के व्यवहार से जानना चाहिए ॥ २३ ॥ ताराकूट कन्यार्क्षाद्वरभं यावत्कन्याभं वरभादपि । गणयेन्नवहृच्छेषे त्रीष्वद्रिभमसत्स्मृतम् ॥ २४ ॥ अन्वयः—कन्यार्क्षात् वरभं यावत् गणयेत्, अपि (तथा) वरभात्, कन्याभं यावत् गणयेत् (ततः) नवहृच्छेषे त्रीष्वद्रिभं असत् स्मृतम् ॥ २४ ॥ कन्या