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मुकुन्दमाला स्तोत्रम् (कुलशेखर आलवार - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Mukundamala Stotram of Kulasekhara Alwar with Commentary

कुलशेखर आलवार (राजा कुलशेखर) द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

अनु भगवद्गीत 4अध्या. 13श्लोकमुवले अतडु कर्तयै कर्तयुनु कादु. प्रश्न : श्रीनाथ, नारायण, वासुदेव नाममुलु नित्युलकु, मुक्तुलकु तगिनवि. मनकु तगिननाममु उण्डवलदा? कुलशेखसुलु : श्रीकृष्णु डतडु. अनगा रुक्मिणी सहितुडु. प्रश्न : नरसिंह, रामा अनि यनक कृष्णुने येल चेप्पवल युनु? कुल : नरसिंहडुडनिन भयमुग नुण्डुनु. रामुडनिन नतनि योद्द अबद्धमुलाडरादु. एकपत्नीव्रतुडतडु. अतनि योद्द जाग्रत्तग मेलगवलयुनु. कृष्णु डन्ननो अनुकूलुडु. अपराधमुलनु सहिञ्चुनु. भक्तप्रियु डतडु. अपिचे त्सुदुराचारो भजते मा मनन्यभाक्, साधुरेव समन्तव्यः सम्य ग्व्यवसितो हि सः अनु भगवद्गीत 9अध्या. 30श्लोकमुट्लु अतडु कुलशीलादुलु पाटिं पडु. ये तु धर्म्यामृत मिदं यथोक्तं पर्युपासते, श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः. अनु भगवद्गीत 12अध्या. 20श्लोकमुट्लु भक्तिगलवारे अतनिकी प्रियुलु; भक्तिगल वारिकि प्रियुडु लेक भक्तिगलवारि यन्दु प्रियमु गलवाडु. भगवद्गीत 12अध्यायमुलो "यो मद्भक्तस्स मेप्रियः" अन्नवाडु. अनपेक्ष श्शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः, सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्त स्स मेप्रियः. -- गीत. 12.16.

144 मुकुन्दमाला समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्. अनि भगवद्गीत 9अध्या. 29श्लोकमुलो 'वारु नायन्दुन्नारु, नेनु वारियं दुन्नानु अन्नट्टि वाडु. प्रश्न : प्रीतिमात्र मुंडिन कार्यमु कांगलदा येमि? कुल : अतडु चक्रपाणि. आश्रयिंचिनवारि शत्रुवुलनु नशिं पजेयुनु. देवशत्रुवुलनु नाशमोनरिंचुनु. प्रश्न : अतडे गोप्पवाडा? इतरुल नाश्रयिंपरादा? कुल : पद्मनाभु डतडु. तन नाभिकमलमंदु ब्रह्मनु पुट्टिंचि, अतनिकि वेदमुल नुपदेशिंचिन महोप कारि. अंदुचेत नतडे घनुडु. इतर देवतल नाराधिंपरादु. अतनि चरणमुलनु मऱचिननु मऱववच्चुनुगानि, अन्यु नाश्रयिंपकुंडिन चालुनु. भक्ति क्रममुग कलुगुनु. प्रश्न : अतडु विडिचिपेष्ट्टिन नेट्लु? कुल : अच्युतु डतडु; विडुवडु. प्रश्न : घनुडेना? कुल : कैटभारि यतडु. असुरुनि जंपिनवा डतडु. श्रीरामु डतडु. श्रियंदु रमिंचुवाडु. पद्माक्षुडु. नेत्रमु लकु साधारण लक्षणमु, असाधारण लक्षणमु अनु भेदमु गलदु. अतनि नेत्रमुलु असाधारण लक्षणमु गलवि. प्रश्न : अन्नियुनु सरिये. पापमुलु चेसिन नेट्लु? कुल : हरि यतडु. तन्नु स्मरिंचिन मात्रमुन पापमुल नशिंप जेयुनु. निप्पु तेलियक स्पृशिंचिननु काल्चुनु.

मुकुन्दमाल 145 अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः, सर्वं ज्ञानप्लवे नैव वृजिनं संतरिष्यसि. अनु भगवद्गीत 4 अध्या. 36 श्लोकमुवले पेद्दपापियैननु भयमु लेदु. प्रश्न : शत्रुवुलु सहाय संपन्नु लयिन नेट्लु? कुल : शिवुनि यॊद्द वरमुपडसि सकललोकमुल नाडिंचु चुंडिन नरकासुरुनिकि स्नेहितुडुनु, अयिदु तललु, पदिचेतुलुनु गलिगिन मुरासुरुनि चंपिनवा डतडु. प्रश्न : स्वामि मुसलि वाडयिपोयिन नेट्लु? कुल : अनंतु डतडु. प्रश्न : अतनिकि स्थल मुन्नदा? कुल : वैकुंठु डतडु. वैकुंठमुन्नदि. प्रश्न : एत्लु पिलुचुकॊनि पोगलडु? कुल : मुकुन्दु डतडु. प्रकृति बंधमुनु विडिपिंचि विरजा नदिलो स्नान माचरिंपजेसि तन यूरिकि पिलुचुकॊनि पोवुनु. अतडु कृष्णुडु. परिपूर्णानंद स्वरूपुडु. प्रश्न : मीमाट नम्मवलसिनदेना? प्रमाण मुन्नदा? कुल : गोविन्दु डतडु. सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्त स्मृतिर् ज्ञान मपोहनं च, वेदैश्च सर्वै रहमेव वेद्यो वेदांतकृ द्वेदविदेव चाहम्. भगवद्गीत 15अध्या. 15श्लोकमट्लु वेदवेद्युडु. 11

146 मुकुन्दमाला प्रश्न : अटुलैन goप्पवाडुग नुन्नाडु. कुल : दामोदरु डतडु. घनुडैननु सौलभ्यमुन्नदि. तल्लियगु यशोद तन्नु कट्टबोवगा कट्टु वडक, आमे श्रमनु जूचि कट्टुवडिनवाडु. तिरुप्पावु 5पाशुरमुन चेप्पबडेनु. अतडु माधवुडु-लक्ष्मी नाथुडु. भाग्यमु नोसगुनु. लक्ष्मीदेवि पुरुषकारमु चेयुनु. माधव डनिन यादवु डनि यर्थमु. यादवु डयि लीलाविभूतिकि विच्चेसेनु. माधव अनगा इंतकंटे goप्पवाडु लेडनि यर्थमु. ई रीति भगवंतुनि कल्याणगुणमुलनु देल्पुनट्टि नाममुलनु सामर्थ्य मुंडियु नोक्कडैननु चेप्पकुंडुट आश्चर्यमु. 38 ध्यायन्ति ये विष्णु मनन्त मव्ययं हृत्पद्ममध्ये सततं व्यवस्थितम्, समाहितानां सतताभयप्रदं ते यान्ति सिद्धिं परमां च वैष्णवीम्. ये=एवरु, अनंतं=तुदलेनिवाडुनु, अव्ययं=नाशरहितु डुनु, सततं=एल्लप्पुडु, हृत्पद्ममध्ये=योगुलयोक्क मनस्सनेडु कमलमुयोक्क मध्यमुनंदु, व्यवस्थितं=चक्कग उन्न वाडुनु, समा हितानां=तनयंदु एकाग्रचित्तुलयिन वारिकि, सतताभयप्रदं=एल्ल प्पुडु अभयमु निच्चुवाडूनगु, विष्णुं=विष्णुवुनु, ध्यायन्ति= ध्यानमु चेयुचुन्नारो, ते=वारु, परमां=उत्तममैन, वैष्णवीं=विष्णु संबंधियगु, सिद्धिं=मोक्षमुनु. (परमपदमुनु), यान्ति=पोंदु चुन्नारु.

ముకుందమాల 147 హృత్కమల మధ్యమున నెల్లప్పు డుండువాడును, ఆశ్రితులకు అభ యమిచ్చువాడును, అవ్యయుడును, అనంతుడునగు శ్రీమహావిష్ణు నెవరు తలచెదరో వారు శ్రేయస్కరమైన విష్ణుస్థానమగు పరమపదమును పొందు చున్నారు. కులశేఖరులు: నాశనములేని, అంతములేని విష్ణువును ధ్యానించవల యును. ప్రశ్న : అంతపెద్దవానిని లోపల దించుటకు సాధ్యమగునా? కుల : హృదయ మందే ఉన్నాడు. ప్రశ్న : అతడు పరుగెత్తిన నెట్లు? కుల : ఎల్లప్పుడును ఉన్నాడు. ప్రశ్న : అతడేమి చేయును? కుల : నేహాభిక్రమ నాశోఽస్తి ప్రత్యవాయో న విద్యతే, స్వల్ప మప్యస్య ధర్మస్య త్రాయతే మహతో భయాత్. అను భగవద్గీత 2అధ్యా. 40శ్లోకమట్లు సమాధియుక్తునికి అభయ మిచ్చును. ప్రశ్న : అభయమేనా? కుల : మోక్ష మబ్బును. ధ్యానము, జ్ఞానము ముదిరి ప్రకృతి వీడి వైష్ణవము కలుగును. 39 క్షీరసాగర తరంగ శీకరా సార తారకిత చారుమూర్తయే, భోగిభోగ శయనీయ శాయినే మాధవాయ మధువిద్విషే నమః

148 मुकुन्दमाल क्षीरसागर=पालसमुद्रमुनन्दलि, तरंग= अललयोक्क, शीकर= तुंपुरुलयोक्क, आसार=एडतेगनिवानचेतनु, तारकित=मुत्याल हारमु धरिंचिनट्लुण्डु, चारु=अन्दमैन, मूर्तये=शरीरमुगल वाडुनु, भोगि=आदिशेषुनियोक्क, भोग=शरीरमुनेडु, शयनीय= पाण्पुनन्दु, शायिने=परुण्डिनट्टिनाडु, मधुविद्विषे=मधुवनु राक्ष सुनि संहरिञ्चिन, माधवाय=माधवुनिकोरकु, नमः=प्रणाममु. क्षीरसमुद्रमु योक्क अलल तुंपरुलचे व्यापिंपबडिन दिव्यमं गळ विग्रहमु गलिगिनट्टियु, अनन्तुनि मीद शयनिंचि युण्डुनट्टियु, मधुवनु राक्षसुनकु शत्रुवैनट्टि श्रीमहामहालक्ष्मीपति कोरकु नमस्कारमु. कुलशेखरुलु ग्रन्थमुनु समाप्ति चेयदलिचि ये श्लोकमं देमि तप्पियुण्डुनो यनि भयपडि -- तस्मात् प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वा महमीश मीड्यम्, पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्. अनु भगवद्गीत 11अध्यायमु 44श्लोक प्रकारमु तन तप्पुलु मन्निंपबडवलयुननि ई श्लोकमुन स्वामिकि नमस्करिंचुचुन्नारु. यवरिकैननु अत्तवारिण्ट नाडम्बर मधिकमुग नुण्डुनु. औदार्य मुनु अधिकमुग नुण्डुनु. अन्दुननु मामगारु गोप्पवा डय्येनेनि अल्लुनिकि मरिंत आडम्बरमु कलगुनु. स्वामिकि मामगारि यिल्लु क्षीरसागरमु. आ समुद्रुडु रत्नाकरुडु. अनगा रत्नमुलकु स्थानमै ननाडु. कुलशेखरुलु अत्तगारिण्टनुण्डु स्वामिनि वर्णिंचि सेविंचु चुन्नारु. स्वामि क्षीरसागरमुन निवसिञ्चियुन्नारु. अललु कोट्टुचुण्डगा

ముకుందమాల 149 పాలతుంపరలు మీదపడినవి. అవి మేఘశ్యాములుడగు స్వామియందు నక్షత్రములవలె నున్నవి. అందుచేత అందముగ నున్నాడు. అనంతుని మీద శయనించి యున్నాడు. మంచిగాలి, చల్లని పాలతుంపరలు గల మామగారి యిల్లు, మృదువైన పొన్పు కల్గియుండినను భార్యలేకున్న ప్రయోజనము లేదుగదా! స్వామి లక్ష్మీతోనున్నారు. మధువను రాక్షసుని సంహరించినవాడుగాన ఇట్టి సుఖ సమయమందును ఆశ్రితులను మఱవడు. అట్టివానికి నమస్కరించెద నని కులశేఖరు లనిరి. 40 యస్య ప్రియౌ శ్రుతిధరౌ కవిలోకవీరౌ మిత్రే ద్విజన్మవర పద్మశరావ భూతామ్, తేనాంబుజాక్ష చరణాంబుజ షట్పదేన రాజ్ఞా కృతా కృతిరియం కులశేఖరేణ. యస్య=ఏ కులశేఖరులకు, ప్రియౌ=ఇష్టులును, శ్రుతిధరౌ=వేదార్థ ములను చక్కగా నెఱిగినవారును, కవిలోకవీరౌ=కవులలో శ్రేష్ఠులునగు, ద్విజన్మవర, పద్మశరావభూతాం=ద్విజన్మవరుడు, పద్మశరుడు (వాల్మీకి, నమ్మాళ్వార్లు అని పెద్ద లూహించిరి) అను నిరువురు, మిత్రే=మిత్రులౌ, అంబుజాక్షచరణాంబుజ షట్పదేన=కమల పత్రాక్షుడగు శ్రీమన్నారాయణుని పాదారవిందములందు భ్రమరము వంటివాడగు, తేన రాజ్ఞా కులశేఖరేణ=ఆ ప్రభువగు కులశేఖరులచేత, ఇయం కృతిః=ఈ ముకుందమాల యను కావ్యము, కృతా=చేయబడినది. వేదార్థములు లెస్సగా తెలిసినవారును, కవివరేణ్యులును, తన కిష్టు లును, అగు ద్విజన్మవరుడు, పద్మశరుడు అను నిరువురు ఏ కులశేఖరులకు మిత్రులైయుండిరో ఆ మహాప్రభువగు కులశేఖరులచేత ఈ ముకుందమాల యను కృతి రచింపబడినది.


श्री कुलशेखराळ्वार्ल चरित्रमु कुम्भे पुनर्वसौ जातं केरळे चोळपट्टणे, कौस्तुभांशं धराधीशं कुलशेखरमाश्रये. भगवंतुSequence: भगवंतुనకు तनतो चेरिनवाडु, इतरुडु अनि भेदमु लेदु. अपिचे त्सुदुराचारो भजते मा मनन्यभाक्, साधुरेव स मन्तव्य स्सम्य ग्व्यवसितो हि सः. अनु भगवद्गीत ९अध्या. ३०श्लोकमट्लु आचारशीलुडैननु, दुराचा- रणुडैननु योचनलेदु. भक्तिकि अंतगौरवमु गलदु. अट्टि भक्ति चेसिनचो वंतुडु स्वाधीनु डगुनु. भक्तप्रियु दातडु. रूपमु, ऐश्वर्यमु, गलवारु तनकु प्रियु लनलेदु. ये तु धर्म्यामृत मिदं यथोक्तं पर्युपासते, श्रद्दधाना मत्परमा भक्ता स्तेऽतीव मे प्रियाः. भगवद्गीत. १२अध्या. २०श्लोकमुलोवले भक्तिलो रसमुन्नदि. अट्टि भक्ति स्वामिनि स्वाधीनपऴचुकोन्नवारु आळ्वारुलु. वारि चरित्रमुलु रुवु गलिगिंचुनु. केरळदेशमुन कोल्लि नगरमु लेक कुक्कुटकूटमु, कोळकूरु, तिरु- वक्कळम् अनुपेरुलतो गूडि ताळ क्रमुक वृक्ष मुलचे शोभितमैन शमुनु दृढव्रतुडनु राजु पालिंचुचुंडेनु. ऎन्नि सद्गुणमु- नु भगवद्भक्तिले कुंडिनयॆडल प्राणहीनशरीरमुनु अलंकरिंचिनट्ले सनु. दृढव्रतुडु भगवद्भक्ति पारगुडै युंडेनु. अतनिकि बहुकालमु ति लेकुंडेनु अंधुचे नतडु भार्यतोड तप माचरिंपगा भक्त

152 मुकुन्दमाल वत्सलुडगु स्वामि प्रत्यक्षमै पुत्रुडु कल्गुनानि वरमिच्चेनु. मनुष्युल गुఱिंचि चेप्पनप्पुडु भक्तिनि प्रशंसिंप वलयुनु. भगवन्तुनि गुఱिंचि चेप्पनप्पुडु भक्तवात्सल्यमुनु गूर्चि प्रशंसिंपवलेनु. भगवद्भक्तियुक्तु डगु दृढव्रतुनकु भक्तवत्सलुडगु स्वामि वर मिय्यगा कलियुगमु 28संवत्सरमगु पराभवयन्दु मासि लेक कुम्भमासमुन पुनर्वसु नक्षत्रयुतमगु दशमीगुरुवारमुन कौस्तुभांश यन्दु दशरथुनकु श्रीरामचन्द्रुनिवले कुलशेखरुलु अवतरिंचिरि. वारु कुलमुनकु शेख रुलु अनगा चेरकुलमुनकु अलङ्कारुलु. आ संगति तेलिसिये पेद्दलु वारि कापेरु पेट्टिरि. सकालमुन उपनयन विद्याभ्याससुलु काविंचिरि. कौस्तुभांशजुलगु कुलशेखरुलु सर्वमु तेलिसिनवा रय्युन्नु व्याजमुग विद्य गुरुनि यॊद्द ग्रहिंचिरि. गुरुमुखमुग नेर्ववलयुननि उपनिषत्तुल्, ब्रह्मसूत्रमुलु चेप्प चुन्नवि. कुलशेखरुलु गुरुवुनु साक्षिगा नुंचुकोनि वेदमुलन्दुनु सर्वशास्त्रमु लन्दुनु प्रवीणुलयिरि. क्षत्रियुलुगान धनुर्विद्ययम् दुनु प्रावीण्ममु गलिगियुंडिरि. धनुर्विद्यापारंगतु डगुटचेत कुलशे खरुलु सर्वत्र दिग्विजमयमु चेसिकोनि रावलयुननियु, सकलराजुलुनु कानुकलु देच्चि तंड्रि पादमुलन्दु समर्पिंप वलयु ननियु, पुत्रुडै पुट्टिनन्दुकु अत्लु चेयुट तम विधियनियु तलचि तंड्रि याज्ञ्गॊनि रथगजतुरग पदातिसैन्यमुलतोड बयलुदेरिपोयि जयल क्ष्मीतोड वच्चि चेरिरि. कुलशेखरुलु दिग्विजममु चेसि रागा दृढव्रतु डतనికి यौवराज्य पट्टाभिषेकमु चेसेनु. कुलशेखरुलु तंड्रि यनुमतिचे युवराजै युन्डि श्रीरामचं द्रुनि वले दुष्ट निग्रहमु, शिष्टपालनमु चेयुचुंडेनु. दृढ व्रतुडु तन पुत्रुनि अमानुष वैभवमुनु, तन वयसुनु दलचि अतనికి साम्राज्य पट्टाभिषेकमु गाविंचि सकलमु नॊसगि वनमुन केगॆनु.

[Header] ముకుందమాల 153

కులశేఖరాళ్వారు ధర్మనీతులతో రాజ్యమేలుచుండెను. కులశేఖరులు రాజైయుండుట చేత మనకేమి లాభము? వారికి వైష్ణవదీక్ష కలుగవ లదా? అందుల కాచార్యు డుండవలయును. కులశేఖరులకు సామాన్యుడైన ఆచార్యుడు పనికిరాడని యెంచి భగవంతుడు తన సేనాని · విష్వక్సే నుని పిలిచి పంచసంస్కార పూర్వకముగ సకల తత్త్వము లుపదేశింపుమని యాజ్ఞాపించెను. అతడట్లే చేసిపోయెను. పంచసంస్కారము లనగా 1) తాపము -- అనగా అగ్నియందు శంఖచక్రములను తప్తముగావించి భుజ ములందు ధరించుట 2) పుండ్రము 3) నామము అనగా దాసుడను పేరు 4) మంత్రము 5) యాగము. పరమైకాంతు లగుటకు ఈ యైదును కారణమని గ్రంథములు చెప్పుచున్నవి. కులశేఖరులు రాజ్యమేలునపుడు నిరంతర పురాణ శ్రవణము చేయు చుండిరి. పురాణము లేని దినమే ఉండదు. ఇట్లు పురాణశ్రవణము చేయునపుడు శ్రీరంగ విమానము బ్రహ్మపూజలో నుండి ఇక్ష్వాకునకు, అటుపై శ్రీరామ చంద్రునకు వచ్చెననియు, శ్రీరాముడు విభీషణున కీయగా అది ఈ లోకముననే నిలిచెననియు విని, యిట్టి క్షేత్రమునకు బోయి శ్రీరంగనాథుని సేవింపవలయుననియు కోరిరి. వారు వైష్ణవాగ్రేసర సార్వభౌములై యుండిరి. రంగేశపాదార్పిత చిత్తవృత్తులైయుండి రేపు శ్రీరంగ యాత్రకు పోవలయు నని తుడుము వేయించగా నెల్లవారును సంసిద్ధమై యుందురు. రాజకార్యము లుండుటచేత పయనము నిలువగా మరల రేపు ప్రయాణమని చాటింప జేయుదురు. ఇట్లుండి యొక నాడు ప్రయాణము కాగా, వీరు ఆ క్షేత్రమునకు బోయిన మరలి రారని యెంచి మంత్రులు చందనాదు లలది భగవన్నామము నుచ్చరించు చుండు వైష్ణవోత్తములను ఎదురుగా వచ్చునట్లు చేసిరి. కులశేఖరులు ఆస్వాము లను దర్శించి 'మాటలాడునట్టి వీరిని ఆరాధింపక మాట్లాడనట్టి ఆ స్వామి దర్శనమునకు బోవుట మంచిపని కా'దని తలచి వారిని సేవించి ఊరికి పిలుచుకొనిపోయి శుశ్రూషసేయుచు భోజనాది సౌకర్యములు కలిగించి, సదా ప్రేమభాషణములతో కాలము పుచ్చుచు, భగవత్కైంకర్యము మరల

154 मुकुन्दमाल लभिञ्चुनु, भागवत कैङ्कर्यमु दॊरकुना अनि भागवतुल विचारणलो कालमु गडपुचु श्रीरङ्ग यात्रनु मरचि नीतिदप्पक राज्यमेलुचुण्डेनु. कुलशेखरुलु राज्यमेलुनपुडु प्रतिदिनमुनु पुराणमु चदिविञ्चि विनुचुण्डि तिरुपति माहात्म्यमुनु गूड अटुले विनि भक्ति परवशुलयि अप्रयत्नमुगने लोकहितमु कॊఱकु सकलवेदसारमैन मुकुन्दमा- लनु गाविञ्चिरि. पुराणमुनु विनिन पिम्मट भक्तियनु भारमुचेत कुलशेखरुलु तलवञ्चिये युण्डीरि. कुलशेखरु लित्लु आनन्दातिशय मुतो मुकुन्दमाल गाविञ्चि राज्यपालन मॊनर्चुचु अर्चारूपुडैन श्रीवेङ्कटेश्वरुनि यन्दुनु, विभवावतारमैन श्रीरामूनियन्दुनु, निर- वधिकमैन भक्ति गलिगि युण्डिरि. कुलशेखराऴ्वारु रामायणमुनु विनि आहा! श्रीरामुडे सरि. इतरुलु -- रसोऽह मप्सु कौन्तेय प्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः, प्रणव स्सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु. भगवद्गीत 7 अध्या. 8 श्लोकमत्लु अवतरिञ्चि, दुष्टशिक्षण शिष्टपरिपालन चेसि पोवुदुरु. श्रीरामुडु अन्त मात्रमेकाक मातापितृ वाक्य परिपालनमु, एकपत्नीव्रतमु मॊदलगु धर्ममुल नाचरिञ्चेनु. मीरु श्रीरामुडु ऒक्कडे परमगतिगा नम्मि युण्डवलयु ननिरि. कुलशेखरुलु रामायणमुनु विनुचुण्डगा खरदूषणादुल वधकु सम्बन्धिश्चिन घट्टमु वच्चॆनु. अन्दु -- चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्, एकश्च रामो धर्मात्मा कथं युद्धं भविष्यति.

ముకుందమాల 155 అనగా క్రూరకర్మములు చేయుచుండు రాక్షసులు పదునాల్గు వేల మంది; రాము డొక్కడే. యుద్ధమెట్లు ముగియునో యని ఆకాశమున దేవతలు, ఋషులు ఏడ్వనారంభించిరి -- అని పౌరాణికుడు చదువగా విని భక్తిచేత ఖరదూషణాదు లొకవైపు నిలిచినట్లును, శ్రీరాము డొక్కడే ఒకతట్టు నిలిచినట్లును, ఎల్లవారు దుఃఖించు చున్నట్లును భావించి ఇట్టి సమయమున శ్రీరామునకు సహాయము చేయని జన్మ మెందుకని తలచి సేనాపతిని బిలిచి సర్వసైన్యముల సమాయత్తము గావింపుమని ఆజ్ఞాపిం చెను. వా రతనికి పిచ్చిపట్టిన దని తలచి సర్వము సిద్ధమై యున్నదని తెలిపిరి. త్వరితముగ రండని చెప్పి కులశేఖరులు పరుగెత్త నారంభించిరి. కేవల తన్మయత్వము నొందిరి. భరతముని యొక నాటకము వ్రాసి దాని నప్సరసలకు జెప్పించి ఇంద్రునిముం దాడించెను. అపుడు త్రిమూర్తులును అచ్చట నుండిరి. రంభ వరుణుని భార్యవేషము, ఊర్వశి లక్ష్మీ వేషము వేసిరి. వరుణుని భార్య లక్ష్మినిజూచి “అమ్మా! ఇందరిలో నీ కెవ్వనియందు కోరిక యున్న"దని యడుగగా, లక్ష్మీవేషధారిణియైన ఊర్వశి పురుషోత్తముని మీద నాకు ఇచ్ఛగలదని చెప్పుటకు మాఱుగ “పురూరవుని మీద ననురాగము గల” దని చెప్పెను. ఊర్వశి తాను లక్ష్మియనియే భావించి యుండవలయును. ఆ భావమే మనసున నాటియుండవలయును. ఆమె అట్లు చేయలేదు. కనుక ఆమెను నీ వీ లోకమున ఉండదగవని భరతముని శపించెను. కులశేఖరులు శ్రీరాముని యందు మనస్సును లయింపజేసి నందున 'రామా! ఇదిగో వచ్చుచున్నాను' అనుచు పరుగెత్తుచు పోయెను. మంత్రులు యోజించి ఖరదూషణాదుల వధయైన ఘట్టమును చదివిననే యితడు తిరుగునని నిశ్చయించి -- “అర్ధాధికముహూర్తేన రామేణ నిశితై శ్శరైః, చతుర్దశ సహస్రాణి రక్షసాం భీమకర్మణాం.

156 ముకుందమాల

ఖరదూషణ ముఖ్యానాం నిహతాని మహాహవే, అహో బత మహత్కర్మ రామస్య విదితాత్మనః. తం దృష్ట్వా శత్రుహంతారం మహర్షీణాం సుఖావహమ్, బభూవ హృష్టా వైదేహీ భర్తారం పరిష్వస్వజే."

ఒకటిన్నర ముహూర్తముల కాలములోనే రాముడు పదునుగల బాణము లతో ఖరదూషణులు నాయకులుగా గల, భయంకరమగు వ్యాపారముగల పదునాల్గువేలమంది రాక్షసులను యుద్ధములో జంపెను. ఆత్మస్వరూ పము నెఱింగిన రాముడు చేసిన గొప్పకార్యము ఆశ్చర్యముగా నున్నది. శత్రుసంహారకుడును, మహర్షులకు సుఖము నిచ్చువాడును, తన భర్తయగు శ్రీరాముని జూచి సీతాదేవి సంతోషించి ఆలింగనము చేసి కొనెనని పౌరా ణికుడు చదువగా కులశేఖరులు "సైనికులారా! సంహార మాయెను. ఇక మరలిరం" డని వెనుకకు దిరిగెను.

అది మొదలు పౌరాణికుడు శ్రీరామునకు కష్టము వచ్చినదను సంగతిని దెలుపు శ్లోకములను విడిచి చదువుచుండెను. ఒకనాడు రామాయణము చదువుచుండిన బ్రాహ్మణునకు పనియున్నందున అతడు తన కుమారుని బంపెను. ఈ రహస్య మెఱుగని ఆ బ్రాహ్మణుడు రామాయణమును జదువ నారంభించి అరణ్యకాండములో --

"జగ్రాహ రావణ స్సీతాం బుధః ఖే రోహిణీ మివ" ఆకాశములో సుఖ ముగ సంచరించుచుండు తల్లియగు రోహిణిని బుధుడు పట్టుకొనినట్లు రావణుడు సీతను పట్టుకొనెను అను ఘట్టమును జదివెను.

జగన్మాతను ఇతరు డెత్తుకొనిపోవుటయా, లేవరా యని కులశేఖ రులు లంకకు బయలుదేతెను. సముద్రము అడ్డము వచ్చినను నిజభక్తితో దిగిపోవుచుండిరి. అపుడు శ్రీరామచంద్రుడు సీతాలక్ష్మణుల తోడ దర్శన మిచ్చి నీవు వచ్చులోపలనే నేను వానిని సంహరించితి నని పలికి అంతర్ధా

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నము చెందిరి. నేను ఆ రావణుని చంపదలచి యుంటిని. మా స్వామియే సంహరించిరట. అతడు సుఖముగ నున్నాడని తెలిసినదని తాను సుఖముగ నుండెను. కులశేఖరులు సదా తిరుప్పావును అనుసంధానము చేయుచుండిరి. కులశేఖరులు ముం దవతరించిరి. ఆండాళమ్మ వెనుక అవతరించిరి. ఇది అసంభవము కాదా యనిన నెంత మాత్రము కాదు. శ్రీభూనీళాదేవులు నిత్యురాండ్రు. నిత్యురాలైన భూమియే ఆండాళుగ నవతరించిరి. వారిచేత రచింపబడిన ప్రబంధములును నిత్యమే. ఆమె తిరుప్పావును ఈ అవ తారముననే చేసెనని తలంపరాదు. పూర్వమే యేర్పడియున్నది. అందుచే కులశేఖరులు తిరుప్పావు ననుసంధించుట అసంభవముగాదు. రాజునకు వైష్ణవస్వాములయందు ద్వేషము పుట్టించవలెనని మంత్రు లాలోచించిరి. ఇట్లుండగా శ్రీరామనవమి యుత్సవము వచ్చెను. స్వామి కభిషేకము చేయునపుడు సకలాభరణములను తీసియించిరి. మరల నలం కరించునపుడు ఒక ముత్యాలహారము కనబడలేదు. భటులు కావలియుండి నను ఆ యాభరణ మెటులో పోయెను. ఈ సంగతి తెలిసిన పిమ్మటనే స్వామికి పూజ జరుగవలెనని రాజు ఆజ్ఞాపించెను. ఇదే సమయమని హార మును దాచియుంచిన వారిలో ముఖ్యమంత్రి ముందుకు వచ్చి “ప్రభూ! ఆ హారమును దొంగిలించినది మీకు పరమహితులయి యుండిన యీ శ్రీవైష్ణవులే అని ఖైది చేసి యుంచిన స్వాములను జూపెను. కులశేఖరులు పరమభాగవతోత్తములైన ఆ స్వాములను జూచి “నేను నమ్మను. పరమైకాంతులగు వీరితోడ బహుకాలముగ మెలగుచున్నాను. ఈ మాటను మీరెట్లనగలిగితిరి?” అనెను. ఇంత వైష్ణవపక్షపాతముండబట్టియే యింత యనర్థము తటస్థించెనని మంత్రు లనిరి. “పేదవా రిందు రారు. వీ రీ కార్యము చేయరు. నే నొక యేర్పాటు చేసెదను” అని పలికి బుసకొట్టుచుండు నొక పామును దెచ్చి యొక

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బిందెలో వేసి “వీ రీ కార్యము చేసిరని ఈ బిందెలో చేతి నుంచు” డని రాజ చెప్పగా మంత్రులట్లు చేయలేదు. “వీ రట్లు చేసియుండరని మీరు చేయియుంచు” డని వా రడుగగా కులశేఖరులు చేయివేసి పాము నెత్తి “మీరిట్లు చేయు” డనగా వారు పరుగెత్తిపోయిరి. కులశేఖరులు ఆ దుష్టులకు దండన విధించి, వైష్ణవులను విడిపించి “ఏ భాగవతులను భగవంతునికంటె హెచ్చుగ పూజించుచున్నానో, అట్టివారియందు దోషము కల్పించిరి. ఇక వీరితో సహవాసము కూడదని నిశ్చయించి తన పుత్తుఁ డగు దృఢవ్రతునకు రాజ్యమొసగి ముఖ్యులగు కొందఱు స్వాములతో శ్రీరంగమునకు పోయి శ్రీరంగనాథుని సేవించి, శ్రీరంగనాథుని యందు అతిభక్తిగలదియు, నీళాదేవియొక్క అంశజురాలును అగు తన కొమార్తెను ఉదధారాపూర్వకముగ శ్రీరంగనాథునకు సమర్పించి తనకు గల సంపదను వరదక్షిణగ నిచ్చెను. కులశేఖరు లిట్లు కొంతకాలము శ్రీరంగమున సుఖముగ నుండి పిమ్మట తిరుమల, కాంచి మొదలగు కొన్ని దివ్యదేశములకు పోయి ఆళ్వారు తిరునగరికి, పిమ్మట మన్నారు కోవెలకు పోయి శ్రీరాజగోపాల స్వామిని సేవించి తన అరువది యేడవ యేట అచటనే పరమపదము నొందిరి. కులశేఖరులు ముకుందమాల యొనర్చి భక్తిలేని వారికి భక్తి గలిగిం చిరి. భక్తిరసము గల ‘పెరుమాళ్ తిరుమొళి’ని రచించిరి. దానికి పెరియవాచ్ఛాంబిళ్ల వ్యాఖ్యానము వ్రాసిరి. శ్రీకులశేఖ రాళ్వార్ తిరువడిగళే శరణమ్.

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T.D. Religious Publications Series No. 398 PRICE Rs. 16—00 Printed and Published by Sri D.V.L.N. Murthy, I.A.S., Executive Officer, T.T. Devasthanams and Printed at T.T.D. Press, Tirupati– Dt.30-4-1994.