नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
अजाविके तथारुद्धे वृकैः पाले त्वनायति। यां प्रसह्म वृको हन्यात् पाले तत् किल्विषं भवेत् ॥ 15 ॥ व्याघ्र आदि हिंस्र जन्तुओं द्वारा घेरकर मारी गयी तथा किसी व्याध आदि द्वारा बाँधी गयी भेड़-बकरी के मर जाने पर पशुपालक को ही उत्तरदायी ठहराया जाता है; क्योंकि उसकी उपेक्षा से ही भेड़ बकरी झुण्ड से अलग हो गयी और शिकारी का शिकार बन गयी। इसके लिए उसे मृत पशु का न केवल मूल्य चुकाना होता है, अपितु कोताही के लिए दण्ड भी भुगतना होता है। विधुस्यापहृतं चौरैर्न पालो दातुमर्हति। यदि देशे च काले च स्वामिनश्चापि शंसति ॥ 16 ॥ चोरों द्वारा बलपूर्वक पशुओं का अपहरण किये जाने की सम्बद्ध स्वामियों और अधिकारियों को यथाशीघ्र सूचना देने वाला गोपालक पशुओं की हानि के लिए उत्तरदायी नहीं होता। अनेन सर्वपालानां विवादः समुदाहृतः। मृतेषु च विशुद्धिः स्याद्बालशृङ्गादिदर्शनात् ॥ 17 ॥ इसी प्रकार किसी पशु की अपनी ही चञ्चलता से मृत्यु हो जाने पर मृत पशु के बाल, सींग आदि लाकर दिखाने वाले गोपालक से क्षतिपूर्ति की मांग नहीं की जा सकती। पशुपालों के सम्भावित विवादों का विवरण इतना ही है। शुल्कं गृहीत्वा पण्यस्त्री नेच्छन्ती द्विस्तदाप्नुयात्। अप्रयच्छंस्तदा शुल्कमनुभूय पुमान् स्त्रियम् ॥ 18 ॥ किसी पुरुष से सम्भोग शुल्क लेकर उसे अंग-सुख देने से इनकार करने वाली वेश्या को वसूल किये गये शुल्क का दुगुना लौटाना होता है। इसी प्रकार वेश्या को सम्भोग के उपरान्त शुल्क देने का वचन आश्वासन देकर, फुसलाकर सम्भोग करने और फिर शुल्क न चुकाने वाले पुरुष से भी दुगुना शुल्क वसूल करना चाहिए। अयोनौ वा समाक्रामेद्बहुभिर्वापि वासयेत्। शुल्कं सोऽष्टगुणं दाप्यो विनयं तावदेव तु ॥ 19 ॥ किसी वेश्या को भोग के लिए अनुबन्धित करके उसकी योनि के अतिरिक्त अन्यान्य अंगों-मुख, गुदा आदि-में लिंग प्रवेश करने वाले तथा अपने लिए अनुबन्धित वेश्या को अपने माथियों से भी भोग कराने को विवश करने वाले से निश्चित शुल्क का आठ गुना वसूल करना चाहिए। पराजिरे गृहं कृत्वा स्तोमं दत्त्वा वसेत्तु यः। स तद्गृहीत्वा निर्गच्छेत्तृणकाष्ठेष्टकादिकम् ॥ 20 ॥ 172 / नारदस्मृति
किराये के मकान में मकान-मालिक की अनुमति से अपने ख़र्च पर अस्थायी निर्माण करने वाले व्यक्ति को मकान छोड़ते समय निर्माण से सम्बन्धित सामान- लकड़ी, ईंटें, दरवाज़ा आदि-ले जाने का पूरा अधिकार है। स्तोमं विना वसित्वा तु परभूमावनिच्छतः। निर्गच्छंस्तृणकाष्ठानि न गृह्णीयात् कदाचन ॥ २१ ॥ मकान-मालिक की अनुमति तथा जानकारी के बिना किराये के मकान में किसी प्रकार का निर्माण करने वाले व्यक्ति को मकान छोड़ने पर कोई भी सामान ले जाने का अधिकार नहीं होता। अस्थायी निर्माण मकान-मालिक की सम्पत्ति माना जाता है। स्तोमवाहीनि भाण्डानि पूर्णकालान्युपानयेत्। गृहीतुराभवेद्भग्नं नष्टं चान्यत्र सम्प्लवात् ॥ २२ ॥ सामान पहुंचाने का किराया लेकर निश्चित समय में सामान न पहुंचाने वाले को, किसी वस्तु के नष्ट-भ्रष्ट हो जाने की भरपाई करनी होती है। उदाहरणार्थ, फल-सब्जी का सड़-गल जाना, दूध-दही का फट जाना, खट्टा हो जाना, फ्रिज में ख़राबी आ जाना आदि। हां, दैवी आपत्ति-बिजली चले जाना, टायर फट जाना अथवा दुर्घटना हो जाना अथवा घोड़े या बैल आदि का गिर पड़ना आदि तथा राजकीय संकट-पुलिस द्वारा रोकना, रास्ता बन्द होना, चक्कर काटकर जाने को विवश होना आदि-में सञ्चालक का दोष न होने के कारण उसे हानि के लिए उत्तरदायी नहीं माना जा सकता। ॥ चतुर्थ अध्याय का षष्ठ प्रकरण समाप्त ॥
नारदस्मृति / 173
- अस्वामिविक्रय निक्षिप्तं वा परद्रव्यं नष्टं लब्ध्वापहृत्य वा। विक्रीयेऽसमक्षं यद्विनेयोऽस्वामिविक्रयः॥ 1 ॥ दूसरे व्यक्ति द्वारा विश्वास करके धरोहर के रूप में रखे सामान को, किसी के बन्धक में पड़े सामान को, किसी के खोये हुए सामान को प्राप्त करके या किसी के सामान को चुराकर या बलपूर्वक छीनकर अथवा छल करके किसी को बेच देना, अर्थात् अपना स्वामित्व न रखने पर भी स्वामी-जैसा व्यवहार करना 'अस्वामिविक्रय' कहलाता है। द्रव्यमस्वामिविक्रीतं प्राप्य स्वामी समाप्नुयात्। प्रकाशविक्रये शुद्धिः क्रेतुः स्तेयं रहः क्रयात्॥ 2 ॥ अस्वामिविक्रीत सामान की खोज-ख़बर लगने पर वास्तविक स्वामी अपने सामान को क्रेता से वापस ले सकता है। सार्वजनिक रूप से क्रेता को चोरी का माल ख़रीदने का दोष नहीं दिया जा सकता। हां, लुक-छिपकर बेचे गये सामान को ख़रीदने वाला अवश्य दोषी माना जाता है। अस्वाम्यनुमताद्दासादसतश्च जनाद्रहः। हीनमूल्यमवेलायां क्रीणंस्तद्दोषभाग् भवेत्॥ 3 ॥ निम्नोक्त क्रेताओं को दोषी मानना चाहिए-1. स्वामी की अनुमति के बिना सामान बेचने वाले दास से ख़रीदने वाला, 2. सामान बेच रहे बच्चों से ख़रीदने वाला, 3. लुक-छिपकर एकान्त में दूसरों की दृष्टि को बचाकर बेचने वाले से ख़रीदने वाला, 4. असमय, रात के अंधेरे में, निर्जन स्थान में बेचे जा रहे सामान को ख़रीदने वाला। मूल स्वामी को ऐसे क्रेताओं से न केवल सामान वापस लेने का पूरा अधिकार होता है, अपितु ऐसे क्रेता दण्ड के भागी भी होते हैं। न गृहीतागमं क्रेता शुद्धिस्तस्य तदागमात्। विपर्यये तुल्यदोषः स्तेयदण्डं च सोऽर्हति॥ 4 ॥ बेचने वाले के सामान के वास्तविक स्वामी होने की पुष्टि के लिए क्रय- विक्रय को सार्वजनिक करने वाला किसी प्रकार दोषी नहीं माना जा सकता। अभिप्राय यह है कि यदि क्रेता किसी प्रामाणिक व्यक्ति अथवा संस्था-पञ्च, 174 / नारदस्मृति
सरकारी अधिकारी, पुलिस आदि को सूचित करके अथवा साक्षी बनाकर सामान ख़रीदता है और सामान के स्वामी होने का दम भरने वाला कपटी सबके सामने सामान बेचने का साहस जुटाता है, तो वास्तविकता का पता चलने पर क्रेता को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हां, ऐसा न करने वाले, अर्थात् सामान को चोरी- छिपे सस्ता बिकता देखकर या लोभ में आकर, चोरी-छिपे ख़रीदने वाला अवश्य दोषी होने से चोर के समान दण्ड पाने के योग्य है। विक्रेता स्वामिनेऽर्थं स्वं क्रेत्रे मूल्यं च तत्समम्। दद्याद्दण्डं तथा राज्ञे विधिरस्वामिविक्रये ॥ ५ ॥ स्वामी न होने पर भी स्वामी बनकर दूसरों के द्रव्य को बेचने वाले को पकड़े जाने पर, उसे मूलस्वामी को उसका न केवल द्रव्य लौटाना चाहिए, क्रेता से वसूल किया धन भी उसे वापस करना चाहिए, अपितु सामान के मूल्य के बराबर अर्थदण्ड (जुर्माना) भी राजकोष में जमा कराना चाहिए, अन्यथा ऐसा न करने वाले को बन्दी बनाकर कारावास में डाल देना चाहिए। परेण निहितं लब्ध्वा राजन्युपहरेन्निधिम्। राजगामी निधिः सर्वः सर्वेषां ब्राह्मणादृते ॥ ६ ॥ किसी अन्य की गिरी-पड़ी सम्पत्ति को पाने वाले को वह सम्पत्ति सरकार को सौंप देनी चाहिए। राजा ब्राह्मण द्वारा प्राप्त सम्पत्ति को छोड़कर अन्य सभी वर्गों द्वारा प्राप्त सम्पत्ति को अपने अधिकार में लेने में पूर्ण समर्थ है। वस्तुतः प्रजाजनों की निजी सम्पत्ति की रक्षा करने का दायित्व निभाने वाला राजा भी तो एक प्रकार से स्वामी ही होता है। फिर स्वामी-विहीन सम्पत्ति का तो वह स्वभावतः एकमात्र स्वामी है। ब्राह्मणोऽपि निधिं लब्ध्वा क्षिप्रं राज्ञे निवेदयेत्। तेन दत्तं च भुञ्जीत स्तेनः स्यादनिवेदयन् ॥ ७ ॥ ब्राह्मण को भी किसी अन्य की गिरी-पड़ी सम्पत्ति मिलने पर उसे राजा को सौंप देना चाहिए। यदि राजा वह सम्पत्ति ब्राह्मण को भोगने के लिए दे देता है, तो ब्राह्मण उसके भोग को स्वतन्त्र है, परन्तु बिना राजा को सूचित-निवेदित किये पराई वस्तु पर अपना अधिकार मान लेने वाला ब्राह्मण भी चोर कहलाता है। स्वमप्यर्थं तथा नष्टं लब्ध्वा राज्ञे निवेदयेत्। गृह्णीयात्तत्र तं शुद्धमशुद्धं स्यात्ततोऽन्यथा ॥ ८ ॥ यदि अपना खोया हुआ धन व सामान भी मिल जाता है, तो भी राजा को सूचित निवेदित करना चाहिए। राजा द्वारा अनुग्रहपूर्वक दे देने पर उसका भोग न्यायसंगत है, अन्यथा वह भी एक प्रकार की चोरी है और दण्डनीय अपराध है। नारदस्मृति / 175
॥ चतुर्थ अध्याय का सप्तम प्रकरण समाप्त ॥
टिप्पणी — यदि खोये हुए सामान की सूचना— एफ. आई. आर. (प्रथम सूचना प्रतिवेदन) सरकार के पास दर्ज करायी जाती है, तो फिर सामान मिल जाने की सूचना भी सरकार को देना नागरिक का कर्तव्य बनता है, अन्यथा पुलिस खोये हुए माल की खोज में लगी रहेगी और मालिक सामान मिल जाने से निश्चिन्त हो जायेगा। इसे धोखाधड़ी मानकर ही यह उचित निर्देश दिया गया है। ॥ चतुर्थ अध्याय का सप्तम प्रकरण समाप्त ॥ 176 / नारदस्मृति
- विक्रीय-असम्प्रदान विक्रीय पण्यं मूल्येन क्रेत्रे यन्न प्रदीयते। विक्रीयासम्प्रदानं तद्विवादपदमुच्यते ॥ 1 ॥ सामान बेचकर और उसका दाम वसूल करने के उपरान्त बेचा हुआ सामान क्रेता को न सौंपना 'विक्रीय-असम्प्रदान' झगड़े का मामला कहलाता है। लोकेऽस्मिन् द्विविधं द्रव्यं जङ्गमं स्थावरं तथा। क्रयविक्रयधर्मेषु सर्वं तत् पण्यमुच्यते ॥ 2 ॥ लोक में क्रय-विक्रय किये जाने वाले पदार्थों के दो रूप हैं—1. चल सम्पत्ति-गज, रथ, अश्व, नक़दी, स्वर्ण-रजत तथा दास आदि।
- अचल सम्पत्ति- धरती, मकान, दुकान, खेत तथा गोदाम आदि। इन दोनों सम्पत्तियों के क्रय-विक्रय योग्य होने से इन्हें 'पण्य' नाम दिया जाता है। षड्विधस्तस्य तु बुधैर्दानादानविधिः स्मृतः। गणितं तुलिमं मेयं क्रियया रूपतः श्रिया ॥ 3 ॥ विद्वानों ने पण्य के क्रय-विक्रय (लेन-देन) के छह आधार निर्धारित किये हैं- गणितं- गिनकर देना, दर्जन के भाव, कोड़ी के भाव। तुलिम-तौलकर बेचना, किलोग्राम, टन, क्विण्टल के भाव। मेय-मापकर बेचना, गज़, फुट, मीटर के भाव। क्रिया-कार्यक्षमता के आधार पर मूल्य निर्धारित कर बेचना, तीव्रगति और मन्दगति के अश्व का ऊंचा-नीचा दाम लगाना। रूप-वस्तु के सौन्दर्य के आधार पर दाम वसूल करना। कन्या के अथवा दासी के रूप-सौन्दर्य और आकर्षण के आधार पर उसका न्यूनाधिक मूल्य निर्धारित करना। श्री, अर्थात् दीप्ति-चमक-रत्नों, हीरे-मोतियों तथा मणियों की आभा के आधार पर एवं उनकी उत्कृष्टता-निकृष्टता के अनुरूप मूल्य निर्धारित करना। टिप्पणी-जड़ पदार्थों की श्री को ही चेतन प्राणियों का रूप-सौन्दर्य समझना चाहिए। दोनों में समान रूप से आकर्षण होता है। विक्रीय पण्यं मूल्येन क्रेत्रे यो न प्रयच्छति। स्थावरस्योदयं दाप्यो जङ्गमस्य क्रियाफलम् ॥ 4 ॥ नारदस्मृति / 177
सामान बेचकर, अर्थात् सौदा पक्का करके क्रेता को तत्काल सामान न सौंपने वाले विक्रेता से, क्रेता द्वारा चुकाये गये मूल्य के साथ उस अवधि में चल वस्तु— वस्त्र, आभूषण-आदि की स्थिति-रूप, रंग, चमक-दमक आदि में आये परिवर्तन तथा बाज़ार में उसके मूल्य में आयी कमी आदि-के अनुरूप अर्थदण्ड वसूल करना चाहिए तथा अचल सम्पत्ति के उपभोग से विक्रेता द्वारा प्राप्त सुविधा का मूल्य क्रेता को दिलाना चाहिए। अर्थश्चेदपचीयेत सोदयं पण्यमावहेत्। स्थायिनामेष नियमो दिग्लाभो दिग्विचारिणाम् ॥ 5 ॥ सामान बेचने का सौदा पक्का करके विक्रेता पूरा सामान तत्काल न देकर कालान्तर में (सारा अथवा कुछ) देने को कहता है और इस अवधि-सामान का मूल्य निश्चित करने और सामान देने के मध्य के समय-में, यदि सामान का भाव गिर जाता है और क्रेता की लाभ की सम्भावना धूमिल हो जाती है, तो उसकी क्षतिपूर्ति का दायित्व विक्रेता पर है, यदि विक्रेता ने तत्काल सामान की आपूर्ति कर दी होती, तो क्रेता उस समय के बाज़ार-भाव पर सामान बेचकर लाभ कमा सकता था। विक्रेता द्वारा माल न देने से, अब क्रेता को हानि उठानी पड़ेगी। अतः क्रेता की हानि का उत्तरदायी विक्रेता ही है। उपर्युक्त व्यवस्था स्थायी क्रेता के लिए है। देश-देशान्तर में घूमने-फिरने वाले और विभिन्न स्थानों से अपनी सुविधा से क्रय-विक्रय करने वाले अस्थायी ग्राहकों पर विभिन्न देशों में प्रचलित नियम लागू होता है अथवा आपस में निश्चित व्यवस्था ही लागू होती है, अर्थात् क्रेता-विक्रेता में जो शर्तें निश्चित हो जाती हैं, उन्हीं का पालन किया जाता है। उपहन्येत वा द्रव्यं दह्येतापह्रियेत् वा। विक्रेतुरेव सोऽनर्थो विक्रीयासम्प्रयच्छतः॥ 6 ॥ सामान को बेचने का सौदा पक्का करके क्रेता को सामान न देने वाले विक्रेता के सामान के चोरी हो जाने पर, गल जाने पर, सड़ जाने पर, नष्ट हो जाने पर, आग लग जाने पर तथा राजा द्वारा अधिग्रहण कर लिये जाने पर सब प्रकार की हानि विक्रेता की होती है, क्रेता को उस हानि से कुछ लेना-देना नहीं होता; क्योंकि समय पर क्रेता को सामान न देने का दोषी विक्रेता ही है। निर्दोषं दर्शयित्वा तु सदोषं यः प्रयच्छति। मूल्यं तु द्विगुणं दाप्यो विनयं तावदेव च ॥ 7 ॥ उत्तम स्तर का सामान दिखाकर निकृष्ट स्तर का माल बेचने वाले व्यापारी से न केवल चुकाये गये दाम का दुगुना वसूल करना चाहिए, अपितु उसे राजदण्ड द्वारा अनुशासित भी करना चाहिए। 178 / नारदस्मृति
तथान्यस्मै तु विक्रीतं योऽन्यस्मै सम्प्रयच्छति। सोऽपि तद्द्विगुणं दाप्यो विनयं चैव राजनि॥ 8 ॥ इसी प्रकार एक क्रेता से पण्य का सौदा पक्का कर दूसरे क्रेता को सामान बेचने वाले व्यापारी से भी न केवल सामान के मूल्य का दुगुना वसूल करना चाहिए, अपितु राजा को उसे दण्डित भी करना चाहिए। दीयमानं न गृह्णाति क्रीतं पण्यं च यः क्रयी। विक्रीणानस्तदन्यत्र विक्रेता नापराध्नुयात् ॥ 9 ॥ हां, यदि क्रेता ख़रीदे पण्य को नहीं उठाता है, तो विक्रेता को अपना सामान किसी अन्य व्यापारी को बेचने पर कोई दोष नहीं लगता; क्योंकि आख़िर व्यापारी को अपना सामान बेचना ही तो है, घर में तो नहीं रखना है। दत्तमूल्यस्य पण्यस्य विधिरेवं प्रकीर्तितः। अदत्तेऽन्यत्र समयान्न विक्रेतुरतिक्रमः ॥ 10 ॥ उपर्युक्त सभी तथ्य-सामान को समय पर न देने का दण्ड, सामान के नष्ट होने का दायित्व तथा सौदे से मुकरने का दोष आदि-उस स्थिति में लागू होते हैं, जब क्रेता ने सामान का मूल्य चुकता कर दिया हो। यदि क्रेता ने मूल्य का भुगतान ही नहीं किया, तो विक्रेता को उस सौदे से बांधा नहीं जा सकता। वह किसी भी दूसरे को अपना सामान बेचने को स्वतन्त्र है; क्योंकि भुगतान न करने पर क्रेता पर निर्भर कैसे किया जा सकता है ? हां, अपवाद-रूप में विक्रेता का क्रेता पर विश्वास अडिग है, तो स्थिति भिन्न हो जाती है। लाभार्थं वणिजां सर्वं पण्येषु क्रयविक्रयः। स च लाभोऽर्थमासाद्य महान् भवति वा न वा ॥ 11 ॥ व्यापारी लोग लाभ कमाने के लिए ही पण्य का क्रय-विक्रय करते हैं और यह लाभ पण्य-पदार्थों के मूल्य के घटने-बढ़ने के अनुरूप न्यूनाधिक होता रहता है। तस्माद्देशे च काले च वणिगर्थं समाश्रयेत्। न जिह्मं च प्रवर्त्तेत श्रेयानेवं वणिक्पथः ॥ 12 ॥ अतः व्यापारी देश और काल के आधार पर ही पण्य-पदार्थों का मूल्य निर्धारित करते हैं। उदाहरणार्थ, ठण्डे इलाकों में विशेषतः शीत ऋतु में उष्ण पदार्थों तथा लकड़ी-कोयला आदि की मांग बढ़ जाने से उनका मूल्य चढ़ जाता है। इसके विपरीत मैदानी इलाक़ों में इनकी मांग और खपत कम होने से इनका मूल्य कम रखा जाता है। व्यापार का श्रेष्ठ आचरण यह है कि मूल्यनिर्धारण में छल-कपट न करके व्यावहारिकता को अपनाया जाये। ईमानदारी व सरलता को अपनाने वाला व्यापारी ही धन तथा यश कमाता है। ॥ चतुर्थ अध्याय का अष्टम प्रकरण समाप्त ॥ नारदस्मृति / 179
- क्रीतानुशय क्रीत्वा मूल्येन यः पण्यं क्रेता न बहु मन्यते। क्रीतानुशय इत्येतद्विवादपदमुच्यते ॥ 1 ॥ जहां क्रेता सामान ख़रीदकर और दाम चुकाकर अपने को ठगा गया, अर्थात् सौदे में गड़बड़ी अनुभव करता है, वहां क्रेता-विक्रेता में उत्पन्न विवाद 'क्रीतानुशय विवाद' कहलाता है। क्रीत्वा मूल्येन यः पण्यं दुष्क्रीतं मन्यते क्रयी। विक्रेतुः प्रतिदेयं तत्तस्मिन्नेवाह्न्यविक्षतम् ॥ 2 ॥ मूल्य देकर ख़रीदे गये सामान में धोखा पाने पर क्रेता को उसी दिन, सारा सामान उसी स्थिति में विक्रेता को लौटा देना चाहिए। क्रेता को सामान को खोलना, उलटना-पुलटना, सील तोड़ना, पैकिंग को बिगाड़ना तथा अन्य कोई चिह्न बनाना आदि कोई कार्य कदापि नहीं करना चाहिए। द्वितीयेऽह्नि ददत् क्रेता मूल्यात्त्रिंशांशमाहरेत्। द्विगुणं तु तृतीयेऽह्नि परतः क्रेतुरेव तत्॥ 3 ॥ यदि ख़रीदे गये माल को पसन्द न करने वाला क्रेता उसी दिन सही हालत में सामान न लौटा कर दूसरे दिन लौटाता है, तो विक्रेता को मूल्य के रूप में प्राप्त धन से तीस प्रतिशत की कटौती करके शेष धन लौटा देना चाहिए। तीसरे दिन पण्य लौटाने वाला क्रेता चुकाये गये मूल्य का आधा लेने का अधिकारी होता है। तीन दिनों के पश्चात् ख़रीदे गये सामान को लौटाने वाले क्रेता के अनुरोध को मानने अथवा न मानने को विक्रेता स्वतन्त्र है। विक्रेता अपनी शर्तों पर सामान वापस भी ले सकता है और वापस लेने से इनकार भी कर सकता है। क्रेता पण्यं परीक्षेत प्राक् स्वयं गुणदोषतः। परीक्ष्याभिमतं क्रीतं विक्रेतुर्न भवेत् पुनः॥ 4 ॥ क्रेता को सामान ख़रीदने से पहले सामान की स्थिति, उसके गुण-दोष और उसकी उपयोगिता आदि की भली प्रकार से जांच परख कर लेनी चाहिए। इस जांच-परख और निजी पसन्द के पश्चात् खरीदा गया सामान विक्रेता को लौटाया नहीं जा सकता। 180 / नारदस्मृति
त्र्यहाद्दोह्यं परीक्षेत पञ्चाहाद्वाह्यमेव तु। मणिमुक्ताप्रवालानां सप्ताहं स्यात् परीक्षणम्॥ ५॥ दूध देने वाली गाय का तीन दिन, गाड़ी खींचने वाले अथवा सवारी के काम आने वाले अश्व, वृषभ, ऊंट और गज आदि पशुओं का पांच दिन तथा मणि, मुक्ता एवं मूंगा आदि बहुमूल्य रत्नों का परीक्षण सात दिन चलता है, अर्थात् इन्हें—गाय, अश्व और मणिमुक्ता—को खरीदने का इच्छुक व्यक्ति विक्रेता से परख के लिए (ट्रायल-बेस पर) अपने घर लाकर निर्धारित दिनों तक रख सकता है। इन दिनों की जांच-परख के परिणाम के आधार पर पसन्द आने पर दाम चुकाना चाहिए और न पसन्द आने पर लौटा देना चाहिए। हां, जांच-परख और पसन्द के उपरान्त दाम चुका देने पर, फिर वापस करने की बात नहीं की जा सकती। द्विपदामर्धर्धमासः स्यात् पुंसां तद्द्विगुणं स्त्रियाः। दशाहः सर्वबीजानामेकाहो लोहवाससाम् ॥ ६॥ दासों का परीक्षण-काल पन्द्रह दिन, स्त्रियों का परीक्षण-काल एक मास, सभी प्रकार के बीजों का परीक्षण-काल एक दिन और लोहे तथा वस्त्रों का परीक्षण-काल एक दिन होता है। टिप्पणी—इस उल्लेख से स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में दासों को और साथ ही स्त्रियों को भी क्रय-विक्रय का सामान समझा जाता था। परिभुक्तं च यद्वासः क्लिष्टरूपं मलीमसम्। सदोषमपि तत्क्रीतं विक्रेतुर्न भवेत् पुनः॥ ७॥ ख़रीदने के उपरान्त (भले ही परीक्षण के लिए क्यों न हो) उपयोग में लाये जाने के कारण वस्त्र के फट जाने, मुचुड़ जाने तथा मैला हो जाने पर वह वस्त्र क्रेता का होता है, विक्रेता को नहीं लौटाया जा सकता। मूल्याष्टभागो हीयेत सकृद्धौतस्य वाससः। द्विः पादस्त्रिस्त्रिभागस्तु चतुः कृत्वोऽर्धमेव च॥ ८॥ एक बार धोने से फट जाने वाले व रंग फीका पड़ जाने वाले वस्त्र पर चुकाये मूल्य का 1/8वां भाग काटकर, दो बार धोने के उपरान्त शिकायत होने पर 1/4 भाग काटकर, तीन बार धोने के पश्चात् दोषपूर्ण पाये जाने पर 1/3 भाग काटकर और चार बार धोने पर घटिया सिद्ध होने पर 1/2 भाग काटकर शेष धन विक्रेता द्वारा क्रेता को देय होता है। अर्धक्षयात्तु परतः पादांशापचयः क्रमात्। यावत् क्षीणदशं जीर्णं जीर्णस्यानियमः क्षये॥ ९॥ पांच से आठ बार तक धोने के उपरान्त दोष के दृष्टिगोचर होने के कारण लौटाये जाने वाले वस्त्र के चुकाये गये मूल्य के आधे भाग का चौथाई भाग, अर्थात् नारदस्मृति / 181
1/8 भाग देय होता है। यदि इस बीच वस्त्र फट जाता है, तो उसके विषय में शास्त्र में कोई व्यवस्था नहीं है, अर्थात् क्रेता विक्रेता अपनी समझ से कुछ लेन-देन करते हैं, तो ठीक और नहीं करते हैं, तो भी ठीक है। कानून इस सम्बन्ध में विक्रेता को बाध्य नहीं करता। लोहानामपि सर्वेषां हेतुर्ग्निक्रियाविधौ। क्षयः संस्क्रियमाणानां तेषां दृष्टोऽग्निसंगमात् ॥ 10 ॥ लौह, रजत व स्वर्ण आदि धातुओं की शुद्धि की परख उन्हें आग में डालकर तपाने से होती है। इस अग्नि-क्रिया में उसमें जुड़ी दूसरी धातु का क्षय हो जाता है और मूल धातु अपने शुद्ध रूप में बच जाती है। अग्नि में हुई शुद्धि के उपरान्त लौह आदि धातुओं का वजन करना चाहिए। अग्नि-संयोग से किस धातु का कितना क्षय होता है—इसका विवरण अगले पद्यों में प्रस्तुत किया जा रहा है। सुवर्णस्य क्षयो नास्ति राजते द्विपलं शतम्। शतमष्टपलं ज्ञेयं क्षयस्तु त्रपुसीसयोः ॥ 11 ॥ ताम्रे पञ्चपलं विद्याद्विकारा ये च तन्मयाः। तद्धातूनामनेकत्वादयसोऽनियमः क्षये ॥ 12 ॥ अग्नि-क्रिया—अग्नि में जलाने तपाने पर स्वर्ण का कुछ भी अंश नष्ट नहीं होता। चांदी का दो प्रतिशत, सीसे और त्रपु (रांगा) का आठ प्रतिशत और तांबे का पांच प्रतिशत नष्ट होता है। इसके साथ तांबा आदि में थोड़ा विकार- परिवर्तन भी आ जाता है। वस्तुतः धातुओं की संख्या और उनके प्रकार-भेदों की अनेकता के कारण सभी के क्षय के सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ कहना सम्भव नहीं। अभिप्राय यह है कि तांबे का अग्नि क्रिया में वैसे तो पांच प्रतिशत क्षय होता है, परन्तु उसके विभिन्न प्रकारों में क्षय की मात्रा न्यूनाधिक भी हो सकती है। अतः किसी स्थिर नियम का उल्लेख नहीं किया जा सकता। तान्तवस्य च संस्कारे क्षयवृद्धि उदाहृते। सूत्रकार्पासिकोर्णानां वृद्धिर्दशपलं शतम् ॥ 13 ॥ चादर, शाल और कम्बल आदि वस्त्रों के बनाने में प्रयुक्त होने वाले कपास, पश्मीना तथा ऊन आदि के धागे का संस्कार करने पर उनमें दस प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है। स्थूलसूत्रवतां तेषां मध्यानां पञ्चकं शतम्। त्रिपलं तु सुसूक्ष्माणामेषा वृद्धिरुदाहृता ॥ 14 ॥ इसी प्रकार मोटे धागे से बने वस्त्रों की वृद्धि दस प्रतिशत होती है, मध्यम स्तर के मोटे धागे से बने वस्त्रों में यह वृद्धि पांच प्रतिशत और सूक्ष्म तन्तुओं से बने वस्त्रों में यह वृद्धि तीन प्रतिशत रह जाती है। 182 / नारदस्मृति
त्रिंशांशो रोमवद्धस्य क्षयः कर्मकृतस्य तु। कौशेयवल्कलानां तु सैव वृद्धिर्न च क्षयः ॥ 15 ॥ पशु-पक्षियों के बालों से बने वस्त्रों का संस्कार करने पर तीस प्रतिशत का क्षय हो जाता है। इसके विपरीत कौशेय (रेशम) और वल्कलों (वृक्ष की छाल) से बने वस्त्रों का संस्कार करने पर न कुछ घटता है और न ही कुछ बढ़ता है, उनका भार ज्यों का त्यों रहता है। क्रीत्वा नानुशयं कुर्याद्वणिक् पण्यविचक्षणः। वृद्धिक्षयौ तु जानीयात् पण्यानामागमं तथा ॥ 16 ॥ चतुर व्यापारी की व्यावसायिक दक्षता इसी में है कि उसे पण्य की वृद्धि, उसके क्षय तथा उससे सम्भावित लाभ-हानि आदि पर भली प्रकार सोच-विचार करने के उपरान्त ही लेन-देन अथवा क्रय-विक्रय करना चाहिए, ताकि पण्य ख़रीदने-बेचने के पश्चात् उसे न तो चिन्तित होना पड़े और न ही किसी प्रकार का पश्चात्ताप करना पड़े। ॥ चतुर्थ अध्याय का नवम प्रकरण समाप्त ॥ नारदस्मृति / 183
- समय का अनपाकर्म पाषण्डिनैगमादीनां स्थितिः समय उच्यते। समयस्यानपाकर्म तद्विवादपदं स्मृतम्॥ 1॥ पाखण्डी—वेद-विरुद्ध नियमों का पालन और चिह्न धारण करने वाले क्षपण आदि तथा नैगम—समूह में व्यापार करने वाले व्यापारी—आदि अपनी लोकयात्रा के निर्वाह के लिए सामाजिक गोष्ठी-बन्धन से अपनी जिस स्थिति की रचना करते हैं, उसका नाम 'समय' है और उस समय का पालन न करके अतिक्रमण करना 'समय का अनपाकर्म' कहलाता है, जो एक विवाद का विषय बन जाता है। पाषण्डिनैगमश्रेणीपूगव्रातगणादिषु । संरक्षेत् समयं राजा दुर्गे जनपदे तथा॥ 2॥ राजा को इस विषय में सदैव सतर्क और प्रयत्नशील रहना चाहिए कि उसके दुर्ग में (आज की भाषा में राष्ट्रीय महत्त्व के आरक्षित संस्थानों में) तथा सार्वजनिक स्थानों पर निम्नोक्त अवाञ्छनीय सम्प्रदाय के व्यक्ति इकट्ठे न हो सकें तथा न ही उनके मठ आदि बन सकें- पाखण्डी—वेद विरुद्ध आचरण एवं चिह्न धारण करने वाले अथवा भ्रष्ट संन्यासी। नैगम—विभिन्न वर्गों के नागरिकों की अनियन्त्रित भीड़। श्रेणी—शिल्प से आजीविका चलाने वालों का झुण्ड। पूग—धन कमाने को ही महत्त्व देने वाले व्यापारियों का दल। व्रात—अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों को धारण करने वालों का संगठित दल तथा गण—ब्राह्मणों की मण्डली। यो धर्मः कर्म यश्चैषामुपस्थानविधिश्च यः। यच्चैषां वृत्त्युपादानमनुमन्येत तत्तथा॥ 3॥ उपर्युक्त छह संगठनों को अपने धर्मानुष्ठान, भिक्षाटन आदि कर्म, उपस्थान विधि—ढोल बाजा बजाकर सामूहिक पूजा अथवा शोभायात्रा के लिए इकट्ठा होना तथा आजीविका को चलाने के लिए अपनाये जाने वाले साधनों—दैनिक सत्संग, साप्ताहिक सम्मेलन, किसी भवन का क्रय, निर्माण तथा अन्यान्य विभिन्न समारोहों 184 / नारदस्मृति
का आयोजन आदि-के लिए राज्य से पूर्व अनुमति अवश्य लेनी चाहिए। बिना शासकीय अनुमति के इन संगठनों द्वारा किसी प्रकार की सम्पत्ति रखना तथा किसी प्रकार के समारोह का आयोजन करना दण्डनीय अपराध है। नानुकूलं यद्राज्ञः प्रकृत्यवमतं च यत्। बाधकं च यदर्थानां ततेभ्यो विनिवर्तयेत् ॥ ४॥ राजा को अपने लिए अनुकूल, प्रजा के लिए हितकर तथा आर्थिक विकास के लिए लाभप्रद प्रतीत न होने वाली किसी भी सम्प्रदाय की, किसी भी गतिविधि को तत्काल प्रतिबन्धित कर देना चाहिए। प्रशासन को केवल स्वस्थ, स्वच्छ, साम्प्रदायिकता से मुक्त, देश की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने वाली गतिविधियों को ही चलने की अनुमति देनी चाहिए। मिथः संघातकरणमहिते शस्त्रधारणम्। परस्परोपघातं च तेषां राजा न मर्षयेत् ॥ ५॥ राजा को बिना किसी उद्देश्य अथवा प्रयोजन-विशेष के निरर्थक संगठन बनाने वाले दलों अथवा व्यक्तियों, प्रजा में आतंक फैलाने के लिए शस्त्रास्त्र धारण करने वालों तथा एक-दूसरे से लड़ते झगड़ते रहने वाले समुदायों (आजकल अकाली निरंकारी, मुसलमानों में शिया-सुन्नी) के विरुद्ध तत्काल कठोर एवं उग्र कार्यवाही करनी चाहिए। इस प्रकार के अशान्ति एवं अराजकता फैलाने वाले संगठनों एवं व्यक्तियों को कठोरता से कुचल देना चाहिए। इनके प्रति थोड़ी-सी भी लापरवाही का अत्यन्त भयंकर परिणाम निकलता है। पृथग् गणांश्च ये भिन्द्युस्ते विनेया विशेषतः। आवहेयुर्भयं घोरं व्याधिवत्ते ह्युपेक्षिताः ॥ ६॥ राजा को अपने गणों संगठनों से अलग होकर अशान्ति और उपद्रव फैलाने वाले उद्दण्ड व्यक्तियों को यथाशीघ्र दण्डित करके अनुशासित करना चाहिए। उनकी थोड़ी सी उपेक्षा भी, रोग की उपेक्षा से उसके भयंकर रूप धारण करने के समान, राष्ट्र के लिए जटिल समस्या बन जाती है। दोषवत् करणं यत् स्यादानाम्नायप्रकल्पितम्। प्रवृत्तमपि तद्राजा श्रेयस्कामो निवर्तयेत् ॥ ७॥ प्रजा के शुभचिन्तक एवं राष्ट्र की शान्ति व सुरक्षा के प्रति समर्पित राजा को शास्त्र में अनिर्दिष्ट, परन्तु देश के हित के विरुद्ध किसी भी कार्य अथवा गतिविधि पर नियन्त्रण लगाना चाहिए। राजा को अपने विवेक से अनुकूल प्रतिकूल तथा साधक-बाधक का निर्णय करके अनुकूल को विकसित होने का अवसर जुटाना चाहिए तथा प्रतिकूल पर कुठाराघात करना चाहिए। ॥ चतुर्थ अध्याय का दशम प्रकरण समाप्त ॥ नारदस्मृति / 185
- सीमा-बन्ध सेतुकेदारमर्यादाविकृष्टाकृष्टनिश्चये । क्षेत्राधिकारो यस्तु स्याद्विवादः क्षेत्रजस्तु सः ॥ 1 ॥ सेतु और कृषिक्षेत्र की अनिश्चित एवं अनिर्णीत सीमा के निर्धारण से सम्बन्धित तथा क्षेत्र एवं भू-भाग पर अधिकार को लेकर उठने वाला विवाद क्षेत्रज अथवा 'सीमा-बन्ध' विवाद कहलाता है। क्षेत्रसीमाविवादेषु सामन्तेभ्यो विनिश्चयः । नगरग्रामगणिनो ये च वृद्धतमा नराः ॥ 2 ॥ क्षेत्र की सीमा के सम्बन्ध में दो अथवा अधिक व्यक्तियों में मतभेद उत्पन्न होने अथवा विवाद उठने पर आस-पास रहने वाले प्रतिष्ठित एवं सदाचारी पञ्चों को अथवा नगर, ग्राम और गणराज्यों की सीमा की प्रामाणिक जानकारी रखने वाले वृद्धजनों-अधिक से अधिक आयु वालों-को मध्यस्थ बनाना चाहिए। ग्रामसीमासु च बहिर्ये स्युस्तत्कृषिजीविनः । गोपशाकुनिकव्याधा ये चान्ये वनजीविनः ॥ 3 ॥ समुन्नयेयुस्ते सीमां लक्षणैरुपलक्षिताम् । तुषाङ्गारकपालैश्च कूपैरायतनैर्द्रुमैः ॥ 4 ॥ सीमा निर्णय में साधक कुछ अन्य व्यक्ति और कुछ चिह्न इस प्रकार हैं-
- ग्राम की सीमाओं पर रहने वाले और कृषि आदि से अपनी आजीविका चलाने वाले लोग।
- पशु चराने वाले गोपालक।
- पशुओं का शिकार करने वाले, व्याध आदि।
- पक्षियों को पकड़ने वाले बहेलिये-चिड़ीमार तथा
- वनों में रहने वाले चोर, डाकू तथा साधु, महात्मा आदि।
- चिह्नों (उपलक्षणों) के रूप में द्रष्टव्य वस्तुएं हैं-तुष (भूसा), कोयला, पत्थर, हड्डी, खोपड़ी आदि. प्राचीनकाल में सीमा को चिह्नित करने के लिए सीसा, पत्थर, खोपड़ी, कोयला आदि का प्रयोग किया जाता था; क्योंकि ये पदार्थ दीर्घकाल तक नष्ट नहीं होते। धरती के नीचे दबे इन पदार्थों को खोजकर इनके आधार पर सीमारेखा निश्चित करनी चाहिए। इन लक्षणों के अतिरिक्त कूप, तालाब, जोहड़ और वृक्षों की स्थिति को भी सीमा के निर्धारण का आधार बनाना चाहिए। 186 / नारदस्मृति
अभिज्ञातैश्च वल्मीकस्थलनिम्नोन्नतादिभिः। केदाराराममार्गैश्च पुराणैः सेतुभिस्तथा ॥ ५ ॥ सीमा के निर्धारण के कुछ अन्य लक्षण इस प्रकार हैं—
- वृद्ध लोगों द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले ऊंचे स्थान अथवा रेत के टीले का होना।
- स्थान का ऊंचा-नीचा होना। जानकारों को स्मरण रहता है कि अमुक का क्षेत्र ऊंचा था व अमुक का क्षेत्र नीचा था।
- क्षेत्र का उर्वर-अनुर्वर होना।
- सेतु के समीप अथवा दूर होना।
- सिंचाई-सुविधा का सुलभ होना-न होना तथा
- उद्यान की ओर जाने वाले मार्ग का पुराना अथवा नया होना आदि। निम्नगापहतोत्सन्ननष्टचिह्नासु भूमिषु। तत्प्रदेशानुमानाच्च प्रमाणैर्भोगदर्शनैः ॥ ६ ॥ नदी के स्रोत से धरती के डूब जाने के कारण सीमाचिह्नों के नष्ट हो जाने पर वृद्धजनों द्वारा तर्क, युक्ति, अनुमान, क्षेत्र के आकार-प्रकार, वर्गफल तथा अन्य क्षेत्रों की सीमा से दूरी, समीपता आदि के अतिरिक्त लिखित रिकार्ड से पूर्व- पश्चिम में लम्बाई-चौड़ाई आदि को ध्यान में रखते हुए सीमा का निर्धारण करना चाहिए। अथ चेदनृतं ब्रूयुः सामन्तास्तद्विनिश्चये। सर्वे पृथक् पृथग्दण्ड्या राज्ञा मध्यमसाहसम् ॥ ७ ॥ सीमा-निर्धारण के लिए मनोनीत वृद्ध पुरुषों द्वारा पक्षपात करने, असत्य- भाषण करने तथा जान-बूझकर ग़लत दृष्टिकोण अपनाने पर उन सबको पृथक्- पृथक् मध्यम साहस के लिए निर्धारित दण्ड से दण्डित करना चाहिए। प्रत्येकं तु जघन्यास्ते विनेयाः पूर्वसाहसम्॥ अर्थात् भूमि से सम्बन्धित किसी भी कार्य—सीमाविवाद का निपटारा तथा कृषि-चोरी के विवाद आदि—के लिए मनोनीत वृद्ध पुरुषों द्वारा मिथ्याभाषण करने पर प्रत्येक सदस्य को शारीरिक तथा आर्थिक दण्ड देकर उन्हें भविष्य में ऐसा न करने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए। गणवृद्धादयस्त्वन्ये दण्डं दाप्याः पृथक् पृथक् । विनेयाः प्रथमेन स्युः साहसेनानृते स्थिताः ॥ ८ ॥ भूमि-कार्य में प्रामाणिक माने जाने वाले गोपालक, व्याध, साधु, कृषिजीवी तथा अन्य वनवासी लोगों द्वारा असत्य का पक्ष ग्रहण करने तथा दुराग्रही होने पर उन्हें भी पृथक्-पृथक् प्रथम साहस के लिए निर्धारित दण्ड देकर भली प्रकार सही नारदस्मृति / 187
मार्ग पर लाना और अनुशासित करना चाहिए। नैकः समुन्नयेत् सीमां नरः प्रत्ययवानपि। गुरुत्वादस्य कायस्य क्रियैषा बहुषु स्थिता ॥ ९ ॥ किसी एक व्यक्ति के नितान्त सत्यनिष्ठ, योग्य, अनुभवी, विश्वसनीय और प्रामाणिक होने पर भी सीमा निर्धारण का कार्य उस अकेले व्यक्ति से कदापि नहीं कराना चाहिए। वस्तुतः यह कार्य इतना महत्त्वपूर्ण है कि इसे किसी अकेले को सौंपा ही नहीं जा सकता। इसके लिए गहन विचार-विमर्श की अपेक्षा होती है, जो एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा ही सम्भव है। एकश्चेदुन्नयेत् सीमां सोपवासः समाहितः। रक्तमाल्याम्बरधरः क्षितिमारोप्य मूर्धनि ॥ १० ॥ यदि परिस्थितिवश नितान्त योग्य, सुपरीक्षित, सत्यनिष्ठ एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति को अकेले ही सीमा निर्धारण का कार्य सौंपा जाता है, तो उसे उस दिन उपवास रखना चाहिए, लोहित वस्त्र धारण करने चाहिए तथा सिर पर मिट्टी और हाथ में भाला लेकर समर्पित कार्य का निर्वहण करना चाहिए, अर्थात् भगवान् से न्याय और सत्य की रक्षा में सहायक होने की प्रार्थना करते हुए निरपेक्ष भाव से कर्तव्य-पालन करना चाहिए। यदि च न स्युर्ज्ञातारः सीमायाश्च न लक्षणम्। तदा राजा द्वयोः सीमामुन्नयेदिष्टतः स्वयम् ॥ ११ ॥ सीमा के चिह्नों के मिट जाने और पता न चल पाने पर तथा सीमा के जानकारों के भी सुलभ न होने अथवा अपनी असमर्थता प्रकट करने पर, प्रशासन को दोनों पक्षों को सुनकर अपने विवेक से दोनों क्षेत्रों की सीमा का निर्धारण कर देना चाहिए। एतेनैव गृहोद्याननिपानायतनादिषु। विवादविधिराख्यातस्तथा ग्रामान्तरेषु च ॥ १२ ॥ आवासीय भू खण्ड, उद्यान, पानीयशाला, देवस्थान, पशुचारणभूमि, ग्रामों की भूमि तथा राजकीय और निजी भूमि के सम्बन्ध में उत्पन्न विवाद में सीमा- निर्धारण की इसी विधि को अपनाना चाहिए। सीमामध्ये तु जातानां वृक्षाणां क्षेत्रयोर्द्वयोः। फलपुष्पं च सामान्यं क्षेत्रस्वामिषु निर्दिशेत् ॥ १३ ॥ दो स्वामियों के दो क्षेत्रों की सीमा के मध्य में उत्पन्न वृक्षों के फल-पुष्पादि पर दोनों का समान अधिकार होता है। दोनों को बांटकर अथवा अपने-अपने क्षेत्र में पड़ने वाली शाखाओं पर लगने वाले फल लेने चाहिए। अन्यक्षेत्रोपजातानां शाखास्त्वन्यत्र संस्थिताः। स्वामिनस्ता विजानीयादन्यक्षेत्रविनिर्गताः ॥ १४ ॥ 188 / नारदस्मृति
यदि अपने क्षेत्र में उत्पन्न वृक्षों की शाखाएं भी दूसरे के स्वामित्व वाले क्षेत्र में चली जाती हों, तो उन शाखाओं पर लगने वाले फलों पर वृक्ष के स्वामी के स्थान पर क्षेत्र के स्वामी का अधिकार होता है। अवस्करस्थलश्वभ्रभ्रमस्यन्दैनिकादिभिः । चतुष्पथसुरस्थानरथ्यामार्गान्न रोधयेत् ॥ 15 ॥ घर का कचरा, मल-मूत्रादि तथा घर की छत पर गिरने वाले पानी के निकासी की ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे देवालय, गली, यातायात का मार्ग (सड़क), गड्ढा, मण्डप तथा चौराहे आदि में किसी प्रकार का गतिरोध अथवा अव्यवस्था न आ सके और न ही दुर्गन्ध आदि से वातावरण दूषित हो। रोधायन्ति तु ये मोहाद्बलाद्वापि कथञ्चन । दण्डयेत्तादृशान् राजा साहसेनोत्तमेन च ॥ 16 ॥ अहंकार अथवा मूर्खता अथवा दुराग्रहवश अपने घर के कूड़े-करकट, गन्दगी और दूषित जल से सार्वजनिक मार्ग, राजपथ तथा गली आदि में गतिरोध उत्पन्न करने वाले तथा वातावरण को दूषित-मलिन करने वाले गृहस्वामी को प्रशासन द्वारा दण्ड देकर अनुशासित करना चाहिए। परक्षेत्रस्य मध्ये तु सेतुर्न प्रतिषिध्यते । महागुणोऽल्पबाधश्च वृद्धिरिष्टा क्षये सति ॥ 17 ॥ दूसरे के क्षेत्र में सेतु-निर्माण से उस क्षेत्र के स्वामी को होने वाली हानि की अपेक्षा आस-पास के क्षेत्र वालों को अधिक लाभ मिलने की सम्भावना होने पर सेतु-निर्माण का प्रतिषेध नहीं किया जा सकता; क्योंकि यहां एक की साधारण हानि के बदले, बहुतों को उपज में वृद्धि के रूप में भारी लाभ मिलने वाला है। राज्य 'बहुजन हिताय' तथा 'बहुजन सुखाय' होता है। सेतुस्तु द्विविधः प्रोक्तः खेयो बन्ध्यस्तथैव च। तोयप्रवर्तनात् खेयो बन्ध्यः स्यात्तन्निवर्तनात् ॥ 18 ॥ सेतु दो प्रकार का होता है—1. खेय तथा 2. बन्ध्य। पानी के आने-जाने की समुचित व्यवस्था के रूप में बनाया जाने वाला सेतु 'खेय' कहलाता है और पानी के बहाव को एकदम रोकने के लिए बनाया जाने वाला सेतु 'बन्ध्य' कहलाता है। नान्तरेणोदकं सस्यं नश्येदभ्युदकेन तु। य एवानुदके दोषः स एवाभ्युदके स्मृतः ॥ 19 ॥ जिस प्रकार जल के बिना उपज नहीं हो सकती, उसी प्रकार अधिक जल आ जाने से उपज नष्ट हो जाती है। इस प्रकार दोनों—जल का अभाव और जल की आवश्यकता से अधिकता-कृषि-उपज के लिए हानिकारक होती है। इन दोनों नारदस्मृति / 189
प्रकार के दोषों के निवारण के लिए, अर्थात् केवल अपेक्षित जल की आपूर्ति के लिए सेतु का निर्माण करना चाहिए। पूर्वप्रवृत्तमुत्सन्नमपृष्ट्वा स्वामिनं तु यः। सेतुं प्रवर्तयेत् कश्चिन्न स तत् फलभाग् भवेत् ॥ 20 ॥ क्षेत्र के स्वामी की अनुमति प्राप्त किये बिना, दूसरे क्षेत्र में स्थित पुराने, टूटे- फूटे अथवा उखड़े-पुखड़े, अर्थात् क्षतिग्रस्त होने से उपयोग में न आ पाने वाले सेतु बांध आदि की मरम्मत कराने वाला अथवा नये बांध अथवा पुलिया आदि का निर्माण कराने वाला व्यक्ति क्षेत्र स्वामी से न तो ख़र्च वसूल कर सकता है और न ही उस पुलिया से अपने खेत की सिंचाई का लाभ उठा सकता है। मृते तु स्वामिनि पुनस्तद्वंश्ये वाऽपिमानवे। राजानमामन्त्र्य ततः प्रकुर्यात् सेतुकर्म तत् ॥ 21 ॥ क्षेत्र के स्वामी अथवा उसके उत्तराधिकारियों की खोज करने पर भी उनके न मिलने पर और उस क्षेत्र में पहले से विद्यमान ध्वस्त पुलिया-बांध की मरम्मत अथवा नये बांध का निर्माण आवश्यक होने पर प्रशासन द्वारा इस कार्य के निर्वहण के लिए निर्माण कार्य कराना सर्वोत्तम है, अन्यथा लिखित अनुमति के उपरान्त ही इस दिशा में प्रवृत्त होना चाहिए। अतोऽन्यथा क्लेशभाक्स्यान्मृगव्याधानुदर्शनात् । इषवस्तस्य नश्यन्ति यो विद्धमनुविध्यति ॥ 22 ॥ प्रशासन से सेतु-निर्माण का अनुरोध अथवा अनुमति प्राप्त किये बिना निर्माण- कार्य करने वाला व्यक्ति एक प्रकार से संकट को निमन्त्रण देता है, क्योंकि दूसरे क्षेत्र में किसी प्रकार का प्रवेश अथवा हस्तक्षेप अनधिकार चेष्टा होती है। जिस प्रकार व्याध द्वारा पहले से ही अपने बाणों से विद्ध मृग को अपने बाणों से बाँधने वाला अपने समय, बल और बाणों को व्यर्थ गंवाता है, मृग पर व्याध का ही अधिकार होता है, उसी प्रकार दूसरे के क्षेत्र में सेतु आदि निर्माण कराने वाला भी अपने समय, साधन और ऊर्जा को व्यर्थ करता है। उसके द्वारा किये गये निर्माण के लिए उसके विरुद्ध क़ानूनी कार्यवाही की जा सकती है। अशक्तप्रेतनष्टेषु क्षेत्रिकेष्वनिवारितः । क्षेत्रं चेद्विकृषेत् कश्चिदश्नुवीत स तत् फलम् ॥ 23 ॥ किसी क्षेत्र के मूल स्वामी के अशक्त, दिवंगत, अपराध के दण्ड-भय से लुप्त (लापता) हो जाने पर तथा स्वयं मूल स्वामी, उसके परिवार के किसी सदस्य अथवा उत्तराधिकारी द्वारा दखल, रोक टोक न किये जाने पर दूसरे के क्षेत्र में उपज बोने उगाने वाले को फल पाने का अधिकार मिल जाता है। परती भूमि का उपयोग कोई दोष नहीं। 190 / नारदस्मृति
विकृष्यमाणे क्षेत्रे चेत् क्षेत्रिकः पुनराव्रजेत् । खिलोपचारं तत्सर्वं दत्त्वा स्वक्षेत्रमाप्नुयात् ॥ २४ ॥ किसी व्यक्ति के क्षेत्र में दूसरे व्यक्ति द्वारा कृषि-कार्य- हल चलाने, बीज बोने तथा सिंचाई करने आदि- किये जाने पर उपज पकने तैयार होने से पहले ही आ पहुंचने वाले क्षेत्र के स्वामी को खेत बोने वाले व्यक्ति द्वारा किये गये ख़र्च का तथा उसके श्रम के मूल्य का भुगतान करने के उपरान्त ही अपने क्षेत्र पर क़ब्ज़ा पाने का अधिकार बनता है। तदष्टभागापचयाद्यावत् सप्त गताः समाः। सम्प्राप्ते त्वष्टमे वर्षे भुक्तं क्षेत्रं लभेत सः ॥ २५ ॥ दूसरे के क्षेत्र में किराये पर कृषि-कर्म- जोतना, बोना, सींचना, काटना तथा देखभाल-बचाव आदि- करने वाला कृषि की उपज के अथवा वृक्षों के फलों के नष्ट हो जाने पर भावी लाभ की आशा से सात वर्षों तक निरन्तर धरती का भाड़ा चुकाता रहता है तथा क्षेत्र का स्वामी क्षेत्र को उपजाऊ बनाने व फलों को सड़ने से बचाने के लिए कोई उद्यम नहीं करता, कोई ख़र्च नहीं करता, एक प्रकार से पूर्णतः उदासीन और निरपेक्ष बना रहता है, प्राप्त आय को मुफ़्त की कमाई मानकर सन्तुष्ट रहता है, तो आठवें वर्ष किरायेदार ही उस क्षेत्र, उपवन आदि का स्वामी बन जाता है। संवत्सरेणार्धखिलं खिलं तद्भूतैरस्त्रिभिः । पञ्चवर्षविसन्नं तु स्यात् क्षेत्रमटवीससमम् ॥ २६ ॥ एक वर्ष तक ख़ाली पड़ा रहने वाला, अर्थात् कुछ भी न बोये जाने वाला खेत 'अर्धखिल', तीन वर्षों तक लगातार ख़ाली पड़ा रहने वाला खेत 'खिल' तथा लगातार पांच वर्षों तक ख़ाली पड़ा रहने वाला खेत 'अरण्य-सदृश' कहलाता है। क्षेत्रं त्रिपुरुषं यत् स्यात् गृहं वा स्यात् क्रमागतम् । राजप्रसादादन्यत्र न तद्भोगः परं नयेत् ॥ २७ ॥ तीन वर्षों तक किसी खेत अथवा मकान का क़ब्ज़ा रखने वाले (बिना किराया चुकाये अथवा किसी प्रकार का इकरारनामा किये) व्यक्ति का उस पर स्वामित्व मान लिया जाता है। हां, यदि इस अवधि में वह सम्पत्ति सरकार द्वारा अधिगृहीत हो जाती है अथवा स्वामित्व के विवाद के सम्बन्ध में कोई अधिसूचना जारी की जाती है, तो स्थिति भिन्न हो जाती है, अन्यथा स्वामित्व स्वतः सिद्ध माना जाता है। उत्क्रम्य तु वृतिं यत्र सस्यघातो गवादिभिः । पालः शास्यो भवेत्तत्र न चेच्छक्त्या निवारयेत् ॥ २८ ॥ क्षेत्र की रक्षा के लिए नियुक्त व्यक्ति द्वारा शक्ति और साधन होने पर भी कृषि नारदस्मृति / 191