भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

१२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३

१२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३


पादन्यासोुरुवेगेन प्रभग्नाः पादपा भृशम्। ततो दैत्योऽपि तां तन्वीं विहायाशु पलायितः ॥ ४५ तथापि चार्जुनो तस्य कोपान्मुञ्चति नासुरम्। पतितो मेदिनीपृष्ठे तावदेव चतुर्भुजः ॥ ४६ पीते च वाससी बिभ्रत् शङ्खचक्रायुधानि च। ततः स विस्मयाक्रान्तो नत्वा पार्थो वचोऽवदत् ॥ ४७

अर्जुन उवाच कथं कृतेषा भगवंस्त्वया मायात्र वैष्णवी। मयाप्यपकृतं नाथ तत् क्षमस्व नमोऽस्तु ते ॥ ४८ नूनमज्ञानभावेन कर्मैतद्दारुणं मया। तत्क्षन्तव्यं जगन्नाथ चैतन्यं मानवे कुतः ॥ ४९

चतुर्भुज उवाच नाहं कृष्णो महाबाहो बहुरोमास्मि दानवः। उपयातो हरेर्देहं पूर्वकर्मप्रभावतः ॥ ५०

अर्जुन उवाच बहुरोमन् पूर्वजातिं कर्म मे शंस तत्त्वतः। केन कर्मविपाकेन विष्णोः सारूप्यमाप्तवान् ॥ ५१

चतुर्भुज उवाच शृण्वर्जुन महाभाग सहितो भ्रातृभिर्मम। चरितं चित्रमत्यर्थं शृण्वतां मुदवर्धनम् ॥ ५२ अहमासं पुरा राजा सोमवंशसमुद्भवः। जयध्वज इति ख्यातो नारायणपरायणः ॥ ५३ विष्णोर्देवालये नित्यं सम्मार्जनपरायणः। उपलेपरतश्चैव दीपदाने समुद्यतः ॥ ५४ वीतिहोत्र इति ख्यात आसीत् साधुपुरोहितः। मम तच्चरितं दृष्ट्वा विप्रो विस्मयमागतः ॥ ५५

मार्कण्डेय उवाच कदाचिदुपविष्टं तं राजानं विष्णुतत्परम्। अपृच्छद्वीतिहोत्रस्तं वेदवेदाङ्गपारगः ॥ ५६ राजन् परमधर्मज्ञ हरिभक्तिपरायण। विष्णुभक्तिमतां पुंसां श्रेष्ठोऽसि पुरुषर्षभ ॥ ५७ सम्मार्जनपरो नित्यं उपलेपरतस्तथा। तन्मे वद महाभाग त्वया किं विदितं फलम् ॥ ५८


हिन्दी अनुवाद

उस समय उनके बड़े वेगसे पैर रखनेके कारण अनेकानेक वृक्ष गिर गये। तब वह दैत्य भी उस तन्वङ्गीको छोड़कर अकेला ही वेगसे भागा; तथापि अर्जुनने क्रोधके कारण उस असुरका पीछा न छोड़ा। भागते-भागते वह दानव एक जगह पृथ्वीपर गिर पड़ा और गिरते ही चार भुजाओंसे युक्त हो, शङ्ख तथा चक्र आदि धारण किये पीताम्बरधारी विष्णुके रूपमें दीख पड़ा। तब कुन्तीनन्दन अर्जुन बड़े ही विस्मित हुए और प्रणाम करके बोले ॥ ४१-४७॥

अर्जुनने कहा— भगवन्! आपने यहाँ वैष्णवी माया क्यों फैला रखी थी? मैंने भी जो आपका अपकार किया है, उसके लिये हे नाथ! मेरे अपराधको क्षमा करें; आपको नमस्कार है। हे जगन्नाथ! अज्ञानके कारण ही मैंने यह दारुण कर्म किया है; इसलिये इसे क्षमा कर दें। भला, एक साधारण मनुष्यमें इतनी समझ कहाँ हो सकती है, जिससे आपको अन्य वेषमें भी पहचान ले ॥ ४८-४९॥

चतुर्भुज बोला— महाबाहो! मैं विष्णु नहीं, बहुरोमा नामक दानव हूँ। मैंने अपने पूर्वकर्मके प्रभावसे भगवान् विष्णुका सारूप्य प्राप्त किया है ॥ ५० ॥

अर्जुन बोले— बहुरोमन्! तुम अपने पूर्वजन्म और कर्मका ठीक-ठीक वर्णन करो। तुमने किस कर्मके परिणामसे विष्णुका सारूप्य प्राप्त किया है? ॥ ५१ ॥

चतुर्भुज बोला— महाभाग अर्जुन! आप अपने भाइयोंके साथ मेरे अत्यन्त विचित्र चरित्रको सुनिये; यह श्रोताओंके आनन्दको बढ़ानेवाला है। मैं पूर्वजन्ममें चन्द्रवंशमें उत्पन्न जयध्वज नामसे विख्यात राजा था। उस समय सदा ही मैं भगवान् नारायणके भजनमें लगा रहता और उनके मन्दिरमें झाडू लगाया करता था। प्रतिदिन उस मन्दिरको लीपता और [रात्रिमें] वहाँ दीप जलाया करता था। उन दिनों वीतिहोत्र नामक एक साधु ब्राह्मण मेरे यहाँ पुरोहित थे। प्रभो! वे मेरे इस कार्यको देखकर बहुत विस्मित हुए ॥ ५२-५५॥

मार्कण्डेयजी बोले— एक दिन वेद-वेदाङ्गोंके पूर्ण विद्वान् पुरोहित वीतिहोत्रजीने बैठे हुए उन विष्णुभक्त राजासे इस प्रकार प्रश्न किया— परम धर्मज्ञ भूपाल! हरिभक्तिपरायण नरश्रेष्ठ! आप विष्णुभक्त पुरुषोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं; क्योंकि आप भगवान्‌के मन्दिरमें प्रतिदिन झाडू तथा लेप दिया करते हैं। अतः महाभाग! आप मुझे बताइये कि भगवान्‌के मन्दिरमें झाडू देने और वहाँ लीपने-पोतनेका कौन-सा उत्तम फल आप जानते हैं।


In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ३३ ] भगवान्‌के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल १२१ कर्माण्यान्यानि सन्त्येव विष्णोः प्रियतराणि वै। | यद्यपि भगवान्‌को अत्यन्त प्रिय लगनेवाले अन्य कर्म भी तथापि त्वं महाभाग एतयोः सततोद्यतः ॥ ५९ | हैं ही, तथापि महाभाग ! आप इन्हीं दो कर्मोंमें सदा सर्वथा | लगे रहते हैं। नरेश! यदि आपको इनसे होनेवाला महान् सर्वात्मना महापुण्यं जनेश विदितं तव। | पुण्यरूप फल ज्ञात हो और वह छिपानेयोग्य न हो तथा यदि तद्ब्रूहि यद्यगुह्यं च प्रीतिर्मयि तवास्ति चेत् ॥ ६० | आपका मुझपर प्रेम हो तो अवश्य ही उस फलको मुझे | बताइये ॥ ५६—६०॥ जयध्वज उवाच | जयध्वज बोले- विप्रवर ! इस विषयमें आप मेरा | ही पूर्वजन्मका चरित्र सुनें। मुझे पूर्वजन्मकी बातोंका शृणुष्व विप्रशार्दूल ममैव चरितं पुरा ॥ ६१ | स्मरण है, इसीसे मैं सब जानता हूँ। मेरा चरित्र श्रोताओंको | आश्चर्यमें डालनेवाला है। विप्रेन्द्र ! पूर्वजन्ममें मैं रैवत जातिस्मरत्वाज्जानामि श्रोतृणां विस्मयावहम्। | नामका ब्राह्मण था। जिनको यज्ञ करनेका अधिकार नहीं पूर्वजन्मनि विप्रेन्द्र रैवतो नाम वाडवः ॥ ६२ | है, उनसे भी मैं सदा ही यज्ञ कराता था और अनेकों | गाँवोंका पुरोहित था। इतना ही नहीं, मैं दूसरोंकी चुगली अयाज्ययाजकोऽहं वै सदैव ग्रामयाजकः। | खानेवाला, निर्दय और नहीं बेचने योग्य वस्तुओंका पिशुनो निष्ठुरश्चैव अपण्यानां च विक्रयी ॥ ६३ | विक्रय करनेवाला था। निषिद्ध कर्मोंका आचरण करनेके | कारण मेरे बान्धवोंने मुझे त्याग दिया था। मैं महान् पापी निषिद्धकर्माचरणात् परित्यक्तः स्वबन्धुभिः। | और सदा ही ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाला था। परायी स्त्री महापापरतो नित्यं ब्रह्मद्वेषरतस्तथा ॥ ६४ | और पराये धनका लोभी था, प्राणियोंकी हिंसा किया | करता था। सदा ही मद्य पीता और ब्राह्मणोंसे द्वेष रखता परदारपरद्रव्यलोलुपो जन्तुहिंसकः। | था। इस प्रकार मैं प्रतिदिन पापमें लगा रहता और बहुधा मद्यपानरतो नित्यं ब्रह्मद्वेषरतस्तथा ॥ ६५ | लूटपाट भी करता था ॥ ६१-६५ १/२ ॥ | एक दिन रातमें स्वेच्छाचारिताके कारण मैं कुछ एवं पापरतो नित्यं बहुशो मार्गरोधकृत्। | ब्राह्मण-पत्नियोंको पकड़कर एक सूने ठाकुर-मन्दिरमें कदाचित् कामचारोऽहं गृहीत्वा ब्राह्मणस्त्रियः ॥ ६६ | ले गया। उस मन्दिरमें कभी पूजा नहीं होती थी। [यों | ही खण्डहर-सा पड़ा रहता था।] वहाँ स्त्रियोंके साथ शून्यं पूजादिभिर्विष्णोर्मन्दिरं प्रामवान्निशि। | रमण करनेकी इच्छासे मैंने अपने वस्त्रके किनारेसे उस स्ववस्त्रप्रान्ततो ब्रह्मन् कियदंशः स मार्जितः ॥ ६७ | मन्दिरका कुछ भाग बुहारकर साफ किया और हे | द्विजोत्तम! [प्रकाशके लिये] दीप जलाकर रख दिया। प्रदीपः स्थापितस्तत्र सुरतार्थाय द्विजोत्तम। | [यद्यपि मैंने अपनी पाप-वासना पूर्ण करनेके लिये ही तेनापि मम दुष्कर्म निःशेषं क्षयमागतम् ॥ ६८ | मन्दिरमें झाडू लगायी और दीप जलाया था, तथापि] | उससे भी मेरा सारा पापकर्म नष्ट हो गया। ब्राह्मण ! इस एवं स्थितं विष्णुगृहे मया भोगेच्छया द्विज। | प्रकार जब मैं उस विष्णुमन्दिरमें भोगकी इच्छासे ठहरा तदैव दीपकं दृष्ट्वा आगताः पुरपालकाः ॥ ६९ | हुआ था, उसी समय वहाँ दीपक देखकर नगरके रक्षक | आ पहुँचे और यह कहकर कि 'यह किसी शत्रु का दूत चौर्यार्थं परदूतोऽयमित्युक्त्वा मामपातयन्। | है, यहाँ चोरी करने आया है,' उन्होंने मुझे पृथ्वीपर गिरा खड्गेन तीक्ष्णधारेण शिरश्छित्त्वा च ते गताः ॥ ७० | दिया तथा तीखी धारवाली तलवारसे मेरा मस्तक काटकर | वे चले गये। तब मैं भगवान्‌के पार्षदोंसे युक्त दिव्य दिव्यं विमानमारुह्य प्रभुदाससमन्वितम्। | विमानपर आरूढ़ हो, गन्धर्वोंद्वारा अपना यशोगान सुनता गन्धर्वैर्गीयमानोऽहं स्वर्गलोकं तदा गतः ॥ ७१ | हुआ स्वर्गलोकको चला गया ॥ ६६-७१ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१२२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३ चतुर्भुज उवाच चतुर्भुज बोला—इस प्रकार मैंने दिव्यरूप धारणकर, तत्र स्थित्वा ब्रह्मकल्पं शतं साग्रं द्विजोत्तमाः। दिव्य भोगोंसे सम्पन्न होकर स्वर्गलोकमें सौ कल्पोंसे भी दिव्यभोगसमायुक्तो दिव्यरूपसमन्वितः॥ ७२ अधिक कालतक निवास किया। फिर उसी पुण्यके जातोऽहं पुण्ययोगाद्धि सोमवंशसमुद्भवः। भोगसे चन्द्रवंशमें उत्पन्न जयध्वज नामसे विख्यात जयध्वज इति ख्यातो राजा राजीवलोचनः॥ ७३ कमलके समान नेत्रोंवाला राजा हुआ। उस जन्ममें भी तत्रापि कालवशतो मृतः स्वर्गमवाप्तवान्। कालवश मृत्युको प्राप्त होनेपर मैं स्वर्गलोकमें आया। इन्द्रलोकमनुप्राप्य रुद्रलोकं ततो गतः॥ ७४ फिर यहाँसे रुद्रलोकको प्राप्त हुआ। एक बार रुद्रलोकसे रुद्रलोकाद्ब्रह्मलोकं गच्छता नारदो मुनिः। ब्रह्मलोकको जाते समय मैंने नारदमुनिको देखा, परंतु दृष्टश्च नमितो नैव गर्वान्मे हसितश्च सः॥ ७५ देखनेपर भी उन्हें प्रणाम नहीं किया और उनकी हँसी कुपितः शप्तवान् मां स राक्षसो भव भूपते। उड़ाने लगा। इससे कुपित होकर उन्होंने शाप दिया— इति शापं समाकर्ण्य दत्तं तेन द्विजन्मना॥ ७६ 'राजन्! तू राक्षस हो जा।' उन ब्राह्मणके दिये हुए इस प्रसादितो मया भूप प्रसादं कृतवान् मुनिः। शापको सुनकर मैंने क्षमा माँगकर (किसी तरह) उन्हें यदा रेवामठे राजन् धर्मपुत्रस्य धीमतः॥ ७७ प्रसन्न किया। तब मुनिने मुझपर शापानुग्रहके रूपमें कृपा भार्यापहारं नयतः शापमोक्षो भविष्यति। की। [उन्होंने कहा—] राजन्! जिस समय बुद्धिमान् सोऽहमर्जुन भूपाल धर्मपुत्र युधिष्ठिर॥ ७८ धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी भार्याका हरण करके तुम रेवा- विष्णोः सारूप्यमगमं यामि वैकुण्ठमद्य वै। तटवर्ती मठमें चले जाओगे, उस समय तुम्हें शापसे मुक्ति मिल जायगी।' भूपाल! धर्मपुत्र युधिष्ठिर! अर्जुन! मैं वही राजा जयध्वज हूँ। इस समय भगवान् विष्णुके मार्कण्डेय उवाच सारूप्यको प्राप्त हुआ हूँ। अब मैं निश्चय ही वैकुण्ठधामको जाऊँगा॥ ७२-७८१/२ ॥ इत्युक्त्वा गरुडारूढो धर्मपुत्रस्य पश्यतः॥ ७९ मार्कण्डेयजी बोले—यह कहकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरके गतवान् विष्णुभवनं यत्र विष्णुः श्रिया सह। देखते-ही-देखते वे राजा जयध्वज गरुडपर आरूढ हो सम्मार्जनोपलेपाभ्यां महिमा तेन वर्णितः॥ ८० विष्णुधामको चले गये, जहाँ लक्ष्मीजीके साथ भगवान् अवशेनापि यत्कर्म कृत्वेमां श्रियमागतः। विष्णु सदा विराजमान रहते हैं। इसीसे विष्णुमन्दिरके भक्तिमद्भिः प्रशान्तैश्च किं पुनः सम्यगर्चनातू॥ ८१ बुहारने और लीपनेसे बड़ी महत्ता प्राप्त होनेका वर्णन किया गया है। [राजा जयध्वजने पूर्वजन्ममें] कामके सूत उवाच वशीभूत होकर भी जिस कर्मको करनेसे ऐसी दिव्य सम्पत्ति मार्कण्डेयवचः श्रुत्वा पाण्डुवंशसमुद्भवः। प्राप्त कर ली, उसीको यदि भक्तिमान् और शान्त पुरुष सहस्रानीकभूपालो हरिपूजारतोऽभवत्॥ ८२ करे तथा भलीभाँति भगवान्का पूजन करे तो उनको प्राप्त तस्माच्छृणुत विप्रेन्द्रा देवो नारायणोऽव्ययः। होनेवाले फलके विषयमें क्या कहना है?॥ ७९-८१॥ ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि पूजकानां विमुक्तिदः॥ ८३ सूतजी बोले—मार्कण्डेयजीके उपर्युक्त वचन सुनकर अर्चयध्वं जगन्नाथं भूयो भूयो वदाम्यहम्। पाण्डुवंशमें उत्पन्न राजा सहस्रानीक भगवान्के पूजनमें तर्तुं यदीच्छथ द्विजा दुस्तरं भवसागरम्॥ ८४ संलग्न हो गये। इसलिये विप्रवृन्द! आपलोग यह सुन येऽर्चयन्ति हरिं भक्ताः प्रणतार्तिहरं हरिम्। लें कि अविनाशी भगवान् नारायण जानकर अथवा अनजानमें ते वन्द्यास्ते प्रपूज्याश्च नमस्याश्च विशेषतः॥ ८५ भी पूजा करनेवाले अपने भक्तोंको मुक्ति प्रदान करते हैं। द्विजो! मैं यह बारंबार कहता हूँ कि यदि आपलोग दुस्तर भवसागरके पार जाना चाहते हैं तो भगवान् जगन्नाथकी पूजा करें। जो भक्त प्रणतजनोंका कष्ट दूर करनेवाले भगवान् विष्णुका पूजन करते हैं, वे वन्दनीय, पूजनीय और विशेषरूपसे नमस्कार करनेयोग्य हैं॥ ८२-८५॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सहस्रानीकचरिते मार्कण्डेयेनोपदिष्टसम्मार्जनोपफल नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३३॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके अन्तर्गत सहस्रानीक-चरित्रके प्रसङ्गमें मार्कण्डेयमुनिद्वारा उपदिष्ट 'मन्दिरमें झाडू देने और उसके लीपनेकी महिमाका वर्णन' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३॥

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

चौंतीसवाँ अध्याय

अध्याय ३४ ] भगवान् विष्णुके पूजनका फल १२३ चौंतीसवाँ अध्याय भगवान् विष्णुके पूजनका फल श्रीसहस्रानीक उवाच श्रीसहस्रानीकने पूछा—महामते द्विजवर पुनरेव द्विजश्रेष्ठ मार्कण्डेय महामते। मार्कण्डेयजी! अब पुनः यह बताइये कि भगवान् निर्माल्यापनयाद्विष्णोर्यत्पुण्यं तद्वदस्व मे॥ १ विष्णुके निर्माल्य (चन्दन-पुष्प आदि)-को हटानेसे कौन-सा पुण्य प्राप्त होता है॥ १ ॥ मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! नृसिंहस्वरूप भगवान् निर्माल्यमपनीयाथ तोयेन स्नाप्य केशवम्। केशवको निर्माल्य हटाकर जलसे स्नान करानेसे मनुष्य नरसिंहाकृतिं राजन् सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २ सब पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा सम्पूर्ण तीर्थोंके सर्वतीर्थफलं प्राप्य यानारूढो दिवं व्रजेत्। सेवनका फल प्राप्तकर, विमानपर आरूढ हो स्वर्गको श्रीविष्णोः सदनं प्राप्य मोदते कालमक्षयम्॥ ३ चला जाता है और वहाँसे श्रीविष्णुधामको प्राप्त होकर आगच्छ नरसिंहेति आवाह्याक्षतपुष्पकैः। अक्षयकालपर्यन्त आनन्दका उपभोग करता है। ‘भगवान् एतावतापि राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ४ नरसिंह! आप यहाँ पधारें’—इस प्रकार अक्षत और दत्त्वाऽऽसनमथार्घ्यं च पाद्यमाचमनीयकम्। पुष्पोंके द्वारा यदि भगवान्‌का आवाहन करे तो राजेन्द्र! देवदेवस्य विधिना सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ५ इतनेसे भी वह मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। स्नाप्य तोयेन पयसा नरसिंहं नराधिप। देवदेव नृसिंहको विधिपूर्वक आसन, पाद्य (पैर धोनेके सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥ ६ लिये जल), अर्घ्य (हाथ धोनेके लिये जल) और स्नाप्य दध्ना सकृद्यस्तु निर्मलः प्रियदर्शनः। आचमनीय (कुल्ला करनेके लिये जल) अर्पण करनेसे विष्णुलोकमवाप्नोति पूज्यमानः सुरोत्तमैः॥ ७ भी सब पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। नराधिप! यः करोति हरेरर्चां मधुना स्नापयन्नरः। भगवान् नृसिंहको दूध और जलसे स्नान कराकर मनुष्य अग्निलोके स मोदित्वा पुनर्विष्णुपुरे वसेत्॥ ८ सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो घृतेन स्त्रपनं यस्तु स्नानकाले विशेषतः। एक बार भी भगवान्‌को दहीसे स्नान कराता है, वह नरसिंहाकृतेः कुर्याच्छङ्खभेरीनिनादितम्॥ ९ निर्मल एवं सुन्दर शरीर धारणकर सुरवरोंसे पूजित होता पापकञ्चुकमुन्मुच्य यथा जीर्णामहिस्त्वचम्। हुआ विष्णुलोकको जाता है। जो मनुष्य मधुसे भगवान्‌को दिव्यं विमानमास्थाय विष्णुलोके महीयते॥ १० नहलाता हुआ उनकी पूजा करता है,वह अग्निलोकमें पञ्चगव्येन देवेशं यः स्नापयति भक्तितः। आनन्दोपभोग करके पुनः विष्णुपुर (वैकुण्ठधाम)-में मन्त्रपूर्वं महाराज तस्य पुण्यमनन्तकम्॥ ११ निवास करता है। जो स्नानकालमें श्रीनरसिंहके विग्रहको यश्च गोधूमकैश्चूर्णैरूद्वर्त्योष्णेन वारिणा। शङ्ख और नगारेका शब्द कराते हुए विशेषरूपसे घीसे प्रक्षाल्य देवदेवेशं वारुणं लोकमाप्नुयात्॥ १२ स्नान कराता है, वह पुरुष पुरानी केंचुलको छोड़नेवाले साँपकी भाँति पाप-कञ्चुकको त्यागकर दिव्य विमानपर आरूढ हो, विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ २-१०॥ महाराज! जो देवेश्वर भगवान्‌को भक्तिपूर्वक मन्त्रपाठ करते हुए पञ्चगव्यसे स्नान कराता है, उसका पुण्य अक्षय होता है। जो गेहूँके आटेसे देवदेवेश्वर भगवान्‌को उबटन लगाकर गरम जलसे उन्हें In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

१२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३४

१२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३४ पादपीठं तु यो भक्त्या बिल्वपत्रैर्निघर्षितम्। नहलाता है, वह वरुणलोकको प्राप्त होता है। जो भगवान्‌के उष्णाम्बुना च प्रक्षाल्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १३ पादपीठ (पैर रखनेके पीढ़े, चौकी या चरणपादुका)- कुशपुष्पोदकैः स्नात्वा ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्। को भक्तिपूर्वक बिल्वपत्रसे रगड़कर गरम जलसे धोता रत्नोदकेन सावित्रं कौबेरं हेमवारिणा। है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। कुश और पुष्पमिश्रित नरसिंहं तु संस्त्राप्य कर्पूरागुरुवारिणा ॥ १४ जलसे भगवान्‌को स्नान कराकर मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है, रत्नयुक्त जलसे स्नान करानेपर सूर्यलोकको और इन्द्रलोके स मोदित्वा पश्चाद्विष्णुपुरे वसेत्। सुवर्णयुक्त जलसे नहलानेपर कुबेरलोकको प्राप्त करता पुण्योदकेन गोविन्दं स्नाप्य भक्त्या नरोत्तम ॥ १५ है। जो कपूर और अगुरुमिश्रित जलसे भगवान् नृसिंहको नहलाता है, वह पहले इन्द्रलोकमें सुखोपभोग करके सावित्रं लोकमासाद्य विष्णुलोके महीयते। फिर विष्णुधाममें निवास करता है। जो पुरुषश्रेष्ठ तीर्थोंके वस्त्राभ्यामर्चनं भक्त्या परिधाप्य हरिं हरेः ॥ १६ पवित्र जलसे गोविन्दको भक्तिपूर्वक स्नान कराता है, वह आदित्यलोकको प्राप्त करके पुनः विष्णुलोकमें पूजित सोमलोके रमित्वा च विष्णुलोके महीयते। होता है। जो भक्तिपूर्वक भगवान्‌को युगल वस्त्र पहनाकर कुङ्कुमागुरुश्रीखण्डकर्दमैरच्युताकृतिम् ॥ १७ उनकी पूजा करता है, वह चन्द्रलोकमें सुखभोग करके आलिप्य भक्त्या राजेन्द्र कल्पकोटिं वसेद्दिवि। पुनः विष्णुधाममें सम्मानित होता है॥ ११-१६१/२॥ मल्लिकामालतीजातिकेतक्यशोकचम्पकैः ॥ १८ राजेन्द्र! जो कुङ्कुम (केसर), अगुरु और चन्दनके पुंनागनागबकुलैः पद्मैरुत्पलजातिभिः। अनुलेपनसे भगवान्‌के विग्रहको भक्तिपूर्वक अनुलिप्त तुलसीकरवीरैश्च पालाशैः सानुकुम्बकैः ॥ १९ करता है, वह करोड़ों कल्पोंतक स्वर्गलोकमें निवास एतैरन्यैश्च कुसुमैः प्रशस्तैरच्युतं नरः। करता है। जो मनुष्य मल्लिका, मालती, जाती, केतकी, अशोक, चम्पा, पुंनाग, नागकेसर, बकुल (मौलसिरी), अर्चयेद्दशसुवर्णस्य प्रत्येकं फलमाप्नुयात् ॥ २० उत्पल जातिके कमल, तुलसी, कनेर, पलाश-इनसे मालां कृत्वा यथालाभमेतेषां विष्णुमर्चयेत्। तथा अन्य उत्तम पुष्पोंसे भगवान्‌की पूजा करता है, वह कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च ॥ २१ प्रत्येक पुष्पके बदले दस सुवर्ण मुद्रा दान करनेका फल प्राप्त करता है। जो यथाप्राप्त उपर्युक्त पुष्पोंकी माला दिव्यं विमानमास्थाय विष्णुलोके स मोदते। बनाकर उससे भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह नरसिंहं तु यो भक्त्या बिल्वपत्रैरखण्डितैः ॥ २२ सैकड़ों और हजारों करोड़ कल्पोंतक दिव्य विमानपर आरूढ हो विष्णुलोकमें आनन्दित होता है। जो छिद्ररहित निश्छिद्रैः पूजयेद्यस्तु तुलसीभिः समन्वितम्। अखण्डित बिल्वपत्रों और तुलसीदलोंसे भक्तिपूर्वक सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वभूषणभूषितः ॥ २३ श्रीनृसिंहका पूजन करता है, वह सब पापोंसे सर्वथा मुक्त काञ्चनेन विमानेन विष्णुलोके महीयते। हो, सब प्रकारके भूषणोंसे भूषित होकर सोनेके विमानपर माहिषाख्यं गुग्गुलं च आज्ययुक्तं सशर्करम् ॥ २४ आरूढ हो विष्णुलोकमें सम्मान पाता है॥ १७-२३१/२॥ धूपं ददाति राजेन्द्र नरसिंहस्य भक्तिमान्। राजेन्द्र! जो माहिष गुग्गुल, घी और शक्करसे तैयार की धूपितैः सर्वदिग्भ्यस्तु सर्वपापविवर्जितः ॥ २५ हुई धूपको भगवान् नरसिंहके लिये भक्तिपूर्वक अर्पित करता है, वह सब दिशाओंमें धूप करनेसे सब पापोंसे रहित अप्सरोगणसंकीर्णविमानेन विराजते। हो अप्सराओंसे पूर्ण विमानद्वारा वायुलोकमें विराजमान होता वायुलोके स मोदित्वा पश्चाद्विष्णुपुरं व्रजेत् ॥ २६ है और वहाँ आनन्दोपभोगके पश्चात् पुनः विष्णुधाममें जाता In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ३४ ] भगवान् विष्णुके पूजनका फल १२५

अध्याय ३४ ] भगवान् विष्णुके पूजनका फल १२५ घृतेन वाथ तैलेन दीपं प्रज्वालयेन्नरः । | है। जो मनुष्य विधिपूर्वक भक्तिके साथ घी अथवा तेलसे विष्णवे विधिवद्भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ २७ | भगवान् विष्णुके लिये दीप प्रज्वलित करता है, उस विहाय पापकलिलं सहस्रादित्यसप्रभः । | पुण्यका फल सुनिये। वह पाप-पङ्कसे मुक्त होकर हजारों ज्योतिष्मता विमानेन विष्णुलोकं स गच्छति ॥ २८ | सूर्यके समान कान्ति धारणकर ज्योतिर्मय विमानसे हविः शाल्योदनं विद्वानाज्ययुक्तं सशर्करम् । | विष्णुलोकको जाता है। जो विद्वान् हविष्य, घी-शक्करसे निवेद्य नरसिंहाय यावकं पायसं तथा ॥ २९ | युक्त अगहनीका चावल, जौकी लपसी और खीर भगवान् समास्तन्दुलसंख्याया यावतीस्तावतीर्नृप । | नरसिंहको निवेदन करता है, वह वैष्णव चावलोंकी विष्णुलोके महाभोगान् भुञ्जन्त्रास्ते स वैष्णवः ॥ ३० | संख्याके बराबर वर्षोतक विष्णुलोकमें महान् भोगोंका बलिना वैष्णवेनाथ तृप्ताः सन्तो दिवौकसः । | उपभोग करता है। भगवान् विष्णुसम्बन्धी बलिसे सम्पूर्ण शान्तिं तस्य प्रयच्छन्ति श्रियमरोग्यमेव च ॥ ३१ | देवता तृप्त होकर पूजा करनेवालेको शान्ति, लक्ष्मी तथा प्रदक्षिणेन चैकेन देवदेवस्य भक्तितः । | आरोग्य प्रदान करते हैं ॥ २४-३१ ॥ कृतेन यत्फलं नृणां तच्छृणुष्व नृपात्मज ॥ ३२ | राजकुमार! भक्तिपूर्वक देवदेव विष्णुकी एक बार पृथ्वीप्रदक्षिणफलं प्राप्य विष्णुपुरे वसेत् । | प्रदक्षिणा करनेसे मनुष्योंको जो फल मिलता है, उसे नमस्कारः कृतो येन भक्त्या वै माधवस्य च ॥ ३३ | सुनिये। वह सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करनेका फल प्राप्त धर्मार्थकाममोक्षाख्यं फलं तेनासमञ्जसा । | करके वैकुण्ठधाममें निवास करता है। जिसने कभी स्तोत्रैर्जपैश्च देवाग्रे यः स्तौति मधुसूदनम् ॥ ३४ | भक्तिभावसे भगवान् लक्ष्मीपतिको नमस्कार किया है, सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते । | उसने अनायास ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप फल गीतवाद्यादिकं नाट्यं शङ्खतूर्यादिनिःस्वनैः ॥ ३५ | प्राप्त कर लिया। जो स्तोत्र और जपके द्वारा मधुसूदनकी यः कारयति वै विष्णोः स याति मन्दिरं नरः । | उनके समक्ष होकर स्तुति करता है, वह समस्त पापोंसे पर्वकाले विशेषेण कामगः कामरूपवान् ॥ ३६ | मुक्त होकर विष्णुलोकमें पूजित होता है। जो भगवान्के सुसंगीतविदैश्चैव सेव्यमानोऽप्सरोगणैः । | मन्दिरमें शङ्ख, तुरही आदि बाजोंके शब्दसे युक्त गाना- महार्हमणिचित्रेण विमानेन विराजता ॥ ३७ | बजाना और नाटक कराता है, वह मनुष्य विष्णुधामको स्वर्गात् स्वर्गमनुप्राप्य विष्णुलोके महीयते । | प्राप्त होता है। विशेषतः पर्वके समय उक्त उत्सव करनेसे ध्वजं तु विष्णवे यस्तु गरुडेन समन्वितम् ॥ ३८ | मनुष्य कामरूप होकर सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त होता है दद्यात्सोऽपि ध्वजाकीर्णाविमानेन विराजता । | और सुन्दर संगीत जाननेवाली अप्सराओंसे शोभायमान विष्णुलोकमवाप्नोति सेव्यमानोऽप्सरोगणैः ॥ ३९ | बहुमूल्य मणियोंसे जड़े हुए देदीप्यमान विमानके द्वारा सुवर्णाभरणैर्दिव्यैर्हारकेयूरकुण्डलैः । | एक स्वर्गसे दूसरे स्वर्गको प्राप्त होकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित मुकुटाभरणाद्यैश्च यो विष्णुं पूजयेन्नृप ॥ ४० | होता है। जो भगवान् विष्णुके लिये गरुडचिह्नसे युक्त सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वभूषणभूषितः । | ध्वजा अर्पण करता है, वह भी ध्वजामण्डित जगमगाते इन्द्रलोके वसेद्धीमान् यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥ ४१ | हुए विमानपर आरूढ़ हो, अप्सराओंसे सेवित होकर | विष्णुलोकको प्राप्त होता है ॥ ३२-३९ ॥ | नरेश्वर! जो सुवर्णके बने हुए दिव्य हार, केयूर, कुण्डल | और मुकुट आदि आभूषणोंसे भगवान् विष्णुकी पूजा करता | है, वह बुद्धिमान् सब पापोंसे मुक्त और सब आभूषणोंसे | भूषित होकर जबतक चौदह इन्द्र राज्य करते हैं, तबतक | (अर्थात् पूरे एक कल्पतक) इन्द्रलोकमें निवास करता है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३४

१२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३४ यो गां पयस्विनीं विष्णोः कपिलां सम्प्रयच्छति । जो विष्णुकी आराधना करके उनके लिये दुधार कपिला आराध्य तमथाग्रे तु यत्किंचिद्दुग्धमुत्तमम् ॥ ४२ गौ दान करता है और उन भगवान् नृसिंहके समक्ष तद्दत्त्वा नरसिंहाय विष्णुलोके महीयते । उसका उत्तम दूध थोड़ा-सा भी अर्पण करता है, वह पितरस्तस्य मोदन्ते श्वेतद्वीपे चिरं नृप ॥ ४३ विष्णुलोकमें सम्मानित होता है तथा राजन्! उसके एवं यः पूजयेद्राजन् नरसिंहं नरोत्तमः । पितर चिरकालतक श्वेतद्वीपमें आनन्द भोगते हैं। भूपाल! तस्य स्वर्गापवर्गौ तु भवतो नात्र संशयः ॥ ४४ इस प्रकार जो नरश्रेष्ठ नरसिंहस्वरूप भगवान् विष्णुका यत्रैवं पूज्यते विष्णुर्नरसिंहो नरैर्नृप । पूजन करता है, उसे स्वर्ग और मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते न तत्र व्याधिदुर्भिक्षराजचौरादिकं भयम् ॥ ४५ हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ४०-४४ ॥ नरसिंहं समाराध्य विधिनानेन माधवम् । नृप! जहाँ मनुष्योंद्वारा इस प्रकार भगवान् नरसिंहका पूजन नानास्वर्गसुखं भुक्त्वा न भूयः स्तनपो भवेत् ॥ ४६ होता है, वहाँ रोग, अकाल और राजा तथा चोर आदिका भय नित्यं सर्पिस्तिलैर्होमो ग्रामे यस्मिन् प्रवर्तते । नहीं होता। इस विधिसे लक्ष्मीपति नरसिंहकी आराधना करके न भवेत्तस्य ग्रामस्य भयं वा तत्र कुत्रचित् ॥ ४७ मनुष्य नाना प्रकारके स्वर्ग-सुख भोगता है और पुनः उसे अनावृष्टिर्महामारी दोषा नो दाहका नृप । [संसारमें जन्म लेकर] माताका दूध नहीं पीना पड़ता [वह नरसिंहं समाराध्य ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ॥ ४८ मुक्त हो जाता है]। जिस गाँवमें [भगवान्के मन्दिरके निकट] कारयेल्लक्षहोमं तु ग्रामे यत्र पुराधिपः । प्रतिदिन घी और तिलसे होम होता है, उस गाँवमें अनावृष्टि, कृते तस्मिन्मयोक्ते तु आगच्छति न तद्भयम् ॥ ४९ महामारी आदि दोष तथा अग्निदाह आदि किसी प्रकारका भय दृष्टोपसर्गमरणं प्रजानामात्मनश्च हि । नहीं होता। जिस गाँवमें गाँवका मालिक वेदवेत्ता ब्राह्मणोंद्वारा सम्यगाराधनीयं तु नरसिंहस्य मन्दिरे ॥ ५० नरसिंहकी आराधना कराकर एक लक्ष होम कराता है, वहाँ शङ्करायतने चापि कोटिहोमं नराधिप । मेरे कथनानुसार यह कार्य सम्पन्न होनेपर महामारी कारयेत् संयतैर्विप्रैः सभोजनसदक्षिणैः ॥ ५१ आदि प्रत्यक्ष उपद्रवसे कर्ताका तथा उस गाँवमें रहनेवाली कृते तस्मिन्नृपश्रेष्ठ नरसिंहप्रसादतः । प्रजाका अकालमरण नहीं होता। इसलिये भगवान् नरसिंहके उपसर्गादिमरणं प्रजानामुपशाम्यति ॥ ५२ मन्दिरमें भली प्रकारसे आराधना करनी चाहिये ॥ ४५-५० ॥ दुःस्वप्नदर्शने घोरे ग्रहपीडासु चात्मनः । नरेश! इसी प्रकार शङ्करजीके मन्दिरमें भी संयमशील होमं च भोजनं चैव तस्य दोषः प्रणश्यति ॥ ५३ ब्राह्मणोंके द्वारा उन्हें भोजन और दक्षिणा देकर एक अयने विषुवे चैव चन्द्रसूर्यग्रहे तथा । करोड़की संख्यामें हवन कराना चाहिये। नृपश्रेष्ठ ! उसके नरसिंहं समाराध्य लक्षहोमं तु कारयेत् ॥ ५४ करनेपर भगवान् नरसिंहके प्रसादसे प्रजावर्गका आकस्मिक शान्तिर्भवति राजेन्द्र तस्य तत्स्थानवासिनाम् । उपद्रव तथा मृत्युभय शान्त हो जाता है। घोर दुःस्वप्न एवमादिफलोपेतं नरसिंहार्चनं नृप ॥ ५५ देखनेपर और अपने ऊपर ग्रहजन्य कष्ट आनेपर होम कुरु त्वं भूपतेः पुत्र यदि वाञ्छसि सद्गतिम् । और ब्राह्मणभोजन करानेसे उसका दोष मिट जाता है। अतः परतरं नास्ति स्वर्गमोक्षफलप्रदम् ॥ ५६ दक्षिणायन या उत्तरायण आरम्भ होनेपर, विषुवकालमें*, अथवा चन्द्रमा तथा सूर्यका ग्रहण होनेपर भगवान् नरसिंहकी आराधना करके लक्षहोम कराना चाहिये। राजेन्द्र ! यों करनेसे उस स्थानके निवासियोंके विघ्नकी शान्ति हो जाती है। नरेश्वर ! भगवान् नरसिंहकी पूजाके ऐसे अनेकों फल हैं। भूपालनन्दन ! यदि तुम सद्गति चाहते हो तो नृसिंहका पूजन करो। इससे बढ़कर कोई भी कार्य ऐसा नहीं है, जो स्वर्ग और मोक्षरूप फल देनेवाला हो ।

  • जिस दिन दिन-रात बराबर हों, वह विषुवकाल कहा गया है। ऐसा समय सालमें दो बार आता है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ३५ ] लक्षहोम और कोटिहोमकी विधि तथा फल १२७

नरेन्द्रैः सुकरं कर्तुं देवदेवस्य पूजनम्। | देवदेव नृसिंहका पूजन राजाओंके लिये तो बहुत ही सन्त्यरण्ये ह्यमूल्यानि पत्रपुष्पाणि शाखिनाम्॥ ५७ | सुकर है। परंतु जो अरण्यमें रहते हैं, उन्हें भी | भगवान्‌की पूजाके लिये वृक्षोंके पत्र-पुष्प बिना मूल्य तोयं नदीतडागेषु देवः साधारणः स्थितः। | प्राप्त हो सकते हैं। जल नदी और तडाग आदिमें सुलभ मनो नियमयेदेकं विद्यासाधनकर्मणि॥ ५८ | है ही और भगवान् नृसिंह भी सबके लिये समान हैं; | केवल उन उपासनाके साधनभूत कर्ममें मनकी एकाग्रता मनो नियमितं येन मुक्तिस्तस्य करे स्थिता॥ ५९ | चाहिये। जिसने मनका नियमन कर लिया है, मुक्ति | उसके हाथमें ही है॥ ५१—५९॥ मार्कण्डेय उवाच | इत्येवमुक्तं भृगुचोदितेन | मार्कण्डेयजी बोले—इस प्रकार भृगुजीकी आज्ञासे मया तवेहार्चनमच्युतस्य। | मैंने तुमसे यहाँ भगवान् विष्णुके पूजनका वर्णन किया दिने दिने त्वं कुरु विष्णुपूजां | है। तुम प्रतिदिन भगवान् विष्णुका पूजन करो और वदस्व चान्यत्कथयामि किं ते॥ ६० | बोलो, अब मैं तुम्हें और क्या बताऊँ?॥ ६०॥

इति श्रीनरसिंहपुराणे सहस्रानीकचरिते श्रीविष्णोः पूजाविधिर्नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके अन्तर्गत सहस्रानीक-चरित्रके प्रसङ्गमें 'श्रीविष्णुके पूजनकी विधि' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४॥

पैंतीसवाँ अध्याय लक्षहोम और कोटिहोमकी विधि तथा फल

राजोवाच | राजा बोले—अहो! आपने श्रीविष्णुकी आराधनासे अहो महत्त्वया प्रोक्तं विष्ण्वाराधनजं फलम्। | होनेवाले बहुत बड़े फलका वर्णन किया। मुनिश्रेष्ठ! जो सुप्तास्ते मुनिशार्दूल ये विष्णुं नार्चयन्ति वै॥ १ | भगवान् विष्णुकी पूजा नहीं करते, वे अवश्य ही | [मोहनिद्रामें] सोये हुए हैं। मैंने आपकी कृपासे भगवान् त्वत्प्रसादाच्च्युतं ह्येतन्नरसिंहार्चनक्रमम्। | नृसिंहके पूजनका यह क्रम सुना; अब मैं भक्तिपूर्वक भक्त्या तं पूजयिष्यामि कोटिहोमफलं वद॥ २ | उनकी पूजा करूँगा। आप कृपा करके (लक्षहोम तथा) | कोटिहोमका फल बताइये॥ १-२॥ मार्कण्डेय उवाच | इममर्थं पुरा पृष्टः शौनको गुरुणा नृप। | मार्कण्डेयजी बोले—नृप! पूर्वकालमें इसी विषयको यत्तस्मै कथयामास शौनकस्तद्वदामि ते॥ ३ | बृहस्पतिजीने शौनक ऋषिसे पूछा था, इसके उत्तरमें | उनसे शौनकजीने जो कुछ बताया, वही मैं तुमसे कह शौनकं तु सुखासीनं पर्यपृच्छद् बृहस्पतिः। | रहा हूँ। सुखपूर्वक बैठे हुए शौनकजीसे बृहस्पतिजीने | इस प्रकार प्रश्न किया॥ ३½॥ बृहस्पतिरुवाच | लक्षहोमस्य या भूमिः कोटिहोमस्य या शुभा॥ ४ | बृहस्पतिजी बोले—विप्रेन्द्र! लक्षहोम और कोटिहोम- तां मे कथय विप्रेन्द्र होमस्य चरिते विधिम्। | के लिये जो भूमि प्रशस्त हो, उसको मुझे बताइये और | होमकर्मकी विधिका भी वर्णन कीजिये॥ ४½॥ मार्कण्डेय उवाच | इत्युक्तो गुरुणा सोऽथ लक्षहोमादिकं विधिम्॥ ५ | मार्कण्डेयजी बोले—नृपवर! बृहस्पतिजीके इस शौनको वक्तुमारेभे यथावन्नृपसत्तम। | प्रकार कहनेपर शौनकजीने लक्षहोम आदिकी विधिका | यथावत् वर्णन आरम्भ किया॥ ५½॥

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

१२८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३५

१२८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३५ शौनक उवाच प्रवक्ष्यामि यथावत्ते शृणु देवपुरोहित ॥ ६ लक्षहोममहाभूमिं तद्विशुद्धिं विशेषतः। यज्ञकर्मणि शस्ताया भूमेर्लक्षणमुत्तमम् ॥ ७ सुसंस्कृतां समां स्निग्धां पूर्वपूर्वमथोत्तमाम्। ऊरुमात्रं खनित्वा च शोधयेत्तां विशेषतः ॥ ८ बहिरच्छतया तत्र मृदाच्छाद्य प्रलेपयेत्। प्रमाणं बाहुमात्रं तु सर्वतः कुण्डलक्षणम् ॥ ९ चतुरस्रं चतुष्कोणं तुल्यसूत्रेण कारयेत्। उपरि मेखलां कुर्याच्चतुरस्त्रां सुविस्तराम् ॥ १० चतुरङ्गुलमात्रं तु उच्छ्रितां सूत्रसूत्रिताम्। ब्राह्मणान् वेदसम्पन्नान् ब्रह्मकर्मसमन्वितान् ॥ ११ आमन्त्रयेद् यथान्यायं यजमानो विशेषतः। ब्रह्मचर्यव्रतं कुर्युस्त्रिरात्रं ते द्विजातयः ॥ १२ अहोरात्रमुपोष्यथ गायत्रीमयुतं जपेत्। ते शुक्लवाससः स्नाता गन्धस्रक्पुष्पधारिणः ॥ १३ शुचयश्च निराहाराः संतुष्टाः संयतेन्द्रियाः। कौशमासनमासीना एकाग्रमनसः पुनः ॥ १४ आरभेयुश्च ते यत्नात्ततो होममतन्द्रिताः। भूमिमालिख्य चाभ्युक्ष्य यत्नादग्निं निधापयेत् ॥ १५ गृह्योक्तेन विधानेन होमं तत्र च होमयेत्। आघारावाज्यभागौ च जुहुयात्पूर्वमेव तु ॥ १६ यवधान्यतिलैर्मिश्रां गायत्र्या प्रथमाहुतिम्। जुहुयादेकचित्तेन स्वाहाकारान्वितां बुधः ॥ १७ गायत्री छन्दसां माता ब्रह्मयोनिः प्रतिष्ठिता। सविता देवता तस्या विश्वामित्रस्तथा ऋषिः ॥ १८


शौनकजी बोले—देवपुरोहित! मैं लक्षहोमके उपयुक्त विस्तृत भूमि और उसकी शुद्धिका विशेषरूपसे यथावत् वर्णन करूँगा, आप सुनें। यज्ञकर्मके लिये प्रशस्त भूमिका उत्तम लक्षण (संस्कार) इस प्रकार है ॥ ६-७ ॥ जो भूमि अच्छी तरह संस्कार की हुई हो, बराबर हो और चिकनी हो [ये सभी बातें हों तो परम उत्तम भूमि है; सभी बातें न संघटित हों तो] पूर्व-पूर्वकी भूमि उत्तम है। [अर्थात् चिकनीकी अपेक्षा बराबर भूमि अच्छी है और उससे भी सुसंस्कृत भूमि उत्तम है।] ऐसी उत्तम भूमिको ऊरु (कमर)-पर्यन्त खोदकर उसका विशेषरूपसे [गङ्गाजल एवं पञ्चगव्यादि छिड़ककर] शोधन करे और कुण्डके बाहर स्वच्छताके लिये मिट्टी [तथा गोबर] डालकर लिपाये। कुण्ड सब ओरसे एक हाथ लम्बा और उतना ही चौड़ा होना चाहिये—यही कुण्डका लक्षण है। एक हाथका सूत लेकर उसीसे माप करके चारों ओरसे बराबर और चौकोरा कुण्ड बनाना चाहिये। कुण्डके ऊपर सब ओरसे बराबर और खूब विस्तृत मेखला बनवाये। उसकी ऊँचाई भी चार अंगुलकी ही हो और वह सूतसे परिवेष्टित हो ॥ ८-१०१/२ ॥ इसके बाद यजमानको चाहिये कि वह ब्राह्मणोचित कर्मका पालन करनेवाले वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको शास्त्रोक्त रीतिसे आमन्त्रित करे। यजमान और उन ब्राह्मणोंको तीन रात्रितक विशेषरूपसे ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करना चाहिये ॥ ११-१२ ॥ यजमान एक दिन और एक रात्रि उपवास करके दस हजार गायत्रीका जप करे। [हवन आरम्भ होनेके दिन] विप्रगण भी स्नान करके शुद्ध एवं श्वेत वस्त्र धारण करें। फिर गन्ध, पुष्प और माला धारण करके पवित्र, संतुष्ट और जितेन्द्रिय होकर, भोजन किये बिना ही कुशके बने हुए आसनपर एकाग्रचित्तसे बैठें। तदनन्तर वे यत्नपूर्वक निरालस्यभावसे हवन आरम्भ करें। पहले गृह्यसूत्रोक्त विधिसे भूमिपर [कुशोंसे] रेखा करके उसे सींचे और वहाँ यत्नसे अग्नि-स्थापन करे। फिर उस अग्निमें हवनीय पदार्थोंका होम करे। सर्वप्रथम आघार और आज्यभाग—ये दो होम करने चाहिये। विद्वान् पुरुष जौ, चावल और तिल [एवं घृत आदिसे] मिश्रित प्रथम आहुतिका गायत्री-मन्त्रद्वारा [अन्तमें] स्वाहाके उच्चारणपूर्वक एकाग्रचित्तसे हवन करे। गायत्री छन्दोंकी माता और ब्रह्म (वेद)-की योनिरूपसे प्रतिष्ठित है। उसके देवता सविता हैं और ऋषि विश्वामित्रजी हैं। (इस प्रकार गायत्रीका विनियोग बताया गया।) ॥ १३-१८ ॥

अध्याय ३६ ] अवतार-कथाका उपक्रम १२९

अध्याय ३६ ] अवतार-कथाका उपक्रम १२९ ततो व्याहृतिभिः पश्चाज्जुहुयाच्च तिलान्वितम्। केवल गायत्रीसे हवन कर लेनेके पश्चात् ['भूर्भुवः यावत्प्रपूर्यते संख्या लक्षं वा कोटिरेव वा ॥ १९ स्वः'-इन ] तीन व्याहृतियोंसहित गायत्री-मन्त्रसे केवल तिलका हवन करे। जबतक हवनकी संख्या एक लाख तावद्धोमं तिलैः कुर्यादच्युतार्चनपूर्वकम्। या एक करोड़ न हो जाय, तबतक भगवान् विष्णुके दीनानाथजनेभ्यस्तु यजमानः प्रयत्नतः ॥ २० पूजनपूर्वक तिलद्वारा हवन करते रहना चाहिये और तावच्च भोजनं दद्याद् यावद्धोमं समाचरेत्। जबतक हवन करे, तबतक यजमानको चाहिये कि वह समाप्ते दक्षिणां दद्याद् ऋत्विग्भ्यः श्रद्धयान्वितः ॥ २१ यत्नपूर्वक दीनों और अनाथोंको भोजन दे। हवन समाप्त होनेपर ऋत्विजोंको श्रद्धापूर्वक लोभ त्यागकर यथोचित यथार्हता न लोभेन ततः शान्त्युदकेन च। दक्षिणा दे। तत्पश्चात् [प्रथम स्थापित किये हुए] शान्ति- प्रोक्षयेद् ग्राममध्ये तु व्याधितांस्तु विशेषतः ॥ २२ कलशके जलसे उस ग्राममें रहनेवाले सभी मनुष्यों- एवं कृते तु होमस्य पुरस्य नगरस्य च। विशेषतः रोगियोंको अभिषेक करे। महाभाग ! इस प्रकार विधिवत् होमका अनुष्ठान करनेपर पुर (गाँव), नगर, राष्ट्रस्य च महाभाग राज्ञो जनपदस्य च। जनपद (प्रान्त) और समस्त राष्ट्रकी सारी बाधाको दूर सर्वबाधाप्रशमनी शान्तिर्भवति सर्वदा ॥ २३ करनेवाली शान्ति निरन्तर बनी रहती है ॥ १९-२३ ॥ मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले- नृपनन्दन ! इस प्रकार शौनक इत्येतच्छौनकोक्तं कथितं नृपनन्दन। मुनिका बताया हुआ लक्षहोम-विधिका अनुष्ठान जो लक्षहोमादिकविधिं कार्यं राष्ट्रे सुशान्तिदम् ॥ २४ समस्त राष्ट्रमें शुभ शान्ति प्रदान करनेवाला है, मैंने तुम्हें ग्रामे गृहे वा पुरबाह्यदेशे बताया। यदि ब्राह्मणोंद्वारा यह पूर्वोक्त होम-विधि ग्राममें, द्विजैरयं यत्नकृतः पुरोविधिः। घरमें अथवा पुरके बाहर प्रयत्नपूर्वक करायी जाय तो तत्रापि शान्तिर्भविता नराणां वहाँ भी मनुष्योंको, गौओंको और अनुचरोंसहित राजाको गवां च भृत्यैः सह भूपतेश्च ॥ २५ पूर्णतया शान्ति प्राप्त हो सकती है ॥ २४-२५ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे लक्षहोमविधिर्नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'लक्षहोमविधिका वर्णन' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥ छतीसवाँ अध्याय अवतार-कथाका उपक्रम मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले-महीपाल! अब मैं देवदेव अवतारानहं वक्ष्ये देवदेवस्य चक्रिणः। भगवान् विष्णुके पवित्र एवं पापनाशक अवतारोंका ताञ्शृणुष्व महीपाल पवित्रान् पापनाशनान् ॥ १ वर्णन करूँगा; उन्हें सुनो ॥ १ ॥ महात्मा भगवान् विष्णुने जिस प्रकार मत्स्यरूप यथा मत्स्येन रूपेण दत्ता वेदाः स्वयम्भुवे। धारणकर [प्रलयकालीन समुद्रमें खोये हुए] वेद लाकर मधुकैटभौ च निधनं प्रापितौ च महात्मना ॥ २ ब्रह्माजीको अर्पित किये और मधु तथा कैटभ नामक यथा कौर्मेण रूपेण विष्णुना मन्दरो धृतः। दैत्योंको मौतके घाट उतारा; फिर उन भगवान् विष्णुने तथा पृथ्वी धृता राजन् वाराहेण महात्मना ॥ ३ जिस प्रकार कूर्मरूपसे मन्दराचल पर्वत धारण किया और 1113 Narsingpuran_Section_6_1_Front In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१३० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३७

१३० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३७ तेनैव निधनं प्राप्तो यथा राजन् महाबलः। महाकाय वराह-अवतार लेकर [अपनी दाढ़ोंपर] इस हिरण्याक्षो महावीर्यो दितिपुत्रो महातनुः॥ ४ पृथ्वीको उठाया तथा राजन्! उन्हींके हाथसे जिस प्रकार महाबली, महापराक्रमी और महाकाय दितिकुमार हिरण्याक्ष यथा हिरण्यकशिपुस्त्रिदशानामरिः पुरा। मारा गया; राजन्! फिर उन भगवान्ने नृसिंहरूप धारणकर नरसिंहेन देवेन प्रापितो निधनं नृप॥ ५ पूर्वकालमें जिस प्रकार देवताओंके शत्रु हिरण्यकशिपुका वध किया; और राजकुमार! जिस प्रकार उन महात्माने यथा बद्धो बलिः पूर्वं वामनेन महात्मना। वामनरूप होकर पूर्वकालमें राजा बलिको बाँधा तथा इन्द्रस्त्रिभुवनाध्यक्षः कृतस्तेन नृपात्मज॥ ६ इन्द्रको (फिरसे) त्रिभुवनका अधीश्वर बना दिया; और राजन्! भगवान् विष्णुने श्रीरामचन्द्रका अवतार धारणकर रामेण भूत्वा च यथा विष्णुना रावणो हतः। जिस प्रकार रावणको मारा एवं देवताओंके लिये कण्टकरूप सगणाश्चाद्भुता राजन् राक्षसा देवकण्टकाः॥ ७ अद्भुत राक्षसोंका उनके गणोंसहित संहार कर दिया; फिर पूर्वकालमें परशुराम-अवतार ले, जिस प्रकार क्षत्रियकुलका यथा परशुरामेण क्षत्रमुत्सादितं पुरा। उच्छेद किया तथा बलभद्ररूपसे जिस प्रकार प्रलम्बादि बलभद्रेण रामेण यथा दैत्यः पुरा हतः॥ ८ दैत्योंका वध किया; कृष्णरूप होकर कंस आदि देवशत्रु दैत्योंका जिस तरह संहार किया; इसी प्रकार कलियुग यथा कृष्णेन कंसाद्या हता दैत्याः सुरद्विषः। प्राप्त होनेपर जिस प्रकार भगवान् नारायण बुद्धरूप धारण कलौ प्राप्ते यथा बुद्धो भवेन्नारायणः प्रभुः॥ ९ करेंगे; फिर कलियुग समाप्त होनेपर जिस प्रकार वे कल्किरूप धारणकर म्लेच्छोंका नाश करेंगे, वह सब कल्किरूपं समास्थाय यथा म्लेच्छा निपातिताः। वृत्तान्त उसी प्रकार मैं तुमसे कहूँगा॥ २-१०॥ समाप्ते तु कलौ भूयस्तथा ते कथयाम्यहम्॥ १० हरेरनन्तस्य पराक्रमं यः भूपाल! जो एकाग्रचित्त होकर मेरे द्वारा बताये शृणोति भूपाल समाहितात्मा। जानेवाले अनन्त भगवान् विष्णुके इन पराक्रमोंका श्रवण मयोच्यमानं स विमुच्य पापं करेगा, वह सब पापोंसे मुक्त होकर भगवान्के अत्यन्त प्रयाति विष्णोः पदमत्युदारम्॥ ११ उदार परमपदको प्राप्त होगा॥ ११॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे हरेः प्रादुर्भावानुक्रमणे षट्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३६॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीहरिके अवतारोंकी अनुक्रमणिका' (गणना) विषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६॥ सैंतीसवाँ अध्याय मत्स्यावतार तथा मधु-कैटभ-वध मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले—महात्मा भगवान् अच्युतके बहुत- नानात्वादवताराणामच्युतस्य महात्मनः। से अवतार हैं, सुतरां उनका विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं न शक्यं विस्तराद् वक्तुं तान् ब्रवीमि समासतः॥ १ किया जा सकता; इसलिये मैं उन्हें संक्षेपसे ही कहता हूँ। पुरा किल जगत्स्रष्टा भगवान् पुरुषोत्तमः। यह प्रसिद्ध है कि पूर्वकालमें जगत्की सृष्टि करनेवाले अनन्तभोगशयने योगनिद्रां समागतः॥ २ भगवान् पुरुषोत्तम 'अनन्त' नामक शेषनागके शरीरकी 1113 Narsingpuran_Section_6_1_Back In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ३७ ] मत्स्यावतार तथा मधु-कैटभ-वध १३१

अध्याय ३७ ] मत्स्यावतार तथा मधु-कैटभ-वध १३१ अथ तस्य प्रसुप्तस्य देवदेवस्य शार्ङ्गिणः। | शय्यापर योगनिद्राका आश्रय लेकर सोये हुए थे। नृप! श्रोत्राभ्यामपतत् तोये स्वेदबिन्दुद्वयं नृप॥ ३ | कुछ कालके बाद उन गहरी नींदमें सोये हुए देवदेव मधुकैटभनामानौ तस्माज्जातौ महाबलौ। | शार्ङ्गधन्वा विष्णुके कानोंसे पसीनेकी दो बूँदें निकलकर महाकायौ महावीर्यौ महाबलपराक्रमौ॥ ४ | जलमें गिरीं। उन दोनों बूँदोंसे मधु और कैटभ नामके अच्युतस्य प्रसुप्तस्य महत्पद्ममजायत। | दो दैत्य उत्पन्न हुए, जो महाबली, महान् शक्तिशाली, नाभिमध्ये नृपश्रेष्ठ तस्मिन् ब्रह्माभ्यजायत॥ ५ | महापराक्रमी और महाकाय थे। नृपश्रेष्ठ! इसी समय उन स चोक्तो विष्णुना राजन् प्रजाः सृज महामते। | सोये हुए भगवान्की नाभिके बीचमें महान् कमल प्रकट तथेत्युक्त्वा जगन्नाथं ब्रह्मापि कमलोद्भवः॥ ६ | हुआ और उससे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए॥ १-५॥ वेदशास्त्रावशाद्यावत् प्रजाः स्रष्टुं समुद्यतः। | राजन्! भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीसे कहा—'महामते ! तावत्तत्र समायातौ तावुभौ मधुकैटभौ॥ ७ | तुम प्रजाजनोंकी सृष्टि करो।' यह सुन उन कमलोद्भव आगत्य वेदशास्त्रार्थविज्ञानं ब्रह्मणः क्षणात्। | ब्रह्माजीने 'तथास्तु' कहकर भगवान् जगन्नाथकी आज्ञा अपहृत्य गतौ घोरौ दानवौ बलदर्पितौ॥ ८ | स्वीकार कर ली तथा वेदों और शास्त्रोंकी सहायतासे ततः पद्मोद्भवो राजन् ज्ञानहीनोऽभवत् क्षणात्। | वे ज्यों ही सृष्टि-रचनाके लिये उद्यत हुए, त्यों ही उनके दुःखितश्चिन्तयामास कथं स्रक्ष्यामि वै प्रजाः॥ ९ | पास वे दोनों दैत्य—मधु और कैटभ आये। आते ही चोदितस्त्वं सृजस्वेति प्रजा देवेन तत्कथम्। | वे बलाभिमानी घोर दानव क्षणभरमें ब्रह्माजीके वेद और स्रक्ष्येऽहं ज्ञानहीनस्तु अहो कष्टमुपस्थितम्॥ १० | शास्त्र-ज्ञानको लेकर चले गये। राजन्! तब ब्रह्माजी एक इति संचिन्त्य दुःखार्तो ब्रह्मा लोकपितामहः। | ही क्षणमें ज्ञानशून्य हो दुःखी हो गये और सोचने यत्नतो वेदशास्त्राणि स्मरन्नपि न दृष्टवान्॥ ११ | लगे—"हाय! अब मैं कैसे प्रजाकी सृष्टि करूँगा? ततो विषण्णचित्तस्तु तं देवं पुरुषोत्तमम्। | भगवान्ने मुझे आज्ञा दी कि 'तुम प्रजाकी सृष्टि करो।' एकाग्रमनसा सम्यक् शास्त्रेण स्तोतुमारभत्॥ १२ | परंतु अब तो मैं सृष्टिविज्ञानसे रहित हो गया, अतः ब्रह्मोवाच | किस प्रकार सृष्टिरचना करूँगा? अहो! मुझपर यह ॐ नमो वेदनिधये शास्त्राणां निधये नमः। | बहुत बड़ा कष्ट आ पहुँचा।" लोकपितामह ब्रह्माजी इस विज्ञाननिधये नित्यं कर्मणां निधये नमः॥ १३ | प्रकार चिन्ता करते-करते शोकसे कातर हो गये। वे विद्याधराय देवाय वागीशाय नमो नमः। | प्रयत्नपूर्वक वेद-शास्त्रोंका स्मरण करने लगे, तथापि अचिन्त्याय नमो नित्यं सर्वज्ञाय नमो नमः॥ १४ | उन्हें उनकी स्मृति नहीं हुई। तब वे मन-ही-मन अमूर्तिस्त्वं महाबाहो यज्ञमूर्तिरधोक्षज। | अत्यन्त दुःखी हो, एकाग्रचित्तसे भगवान् पुरुषोत्तमकी साम्नां मूर्तिस्त्वमेवाद्य सर्वदा सर्वरूपवान्॥ १५ | शास्त्रानुकूल विधिसे स्तुति करने लगे॥ ६-१२॥ सर्वज्ञानमयोऽसि त्वं हृदि ज्ञानमयोऽच्युत। | ब्रह्माजी बोले—जो वेद, शास्त्र, विज्ञान और कर्मोंकी देहि मे त्वं सर्वज्ञानं देवदेव नमो नमः॥ १६ | निधि हैं, उन ॐकार-प्रतिपाद्य परमेश्वरको मेरा बार- | बार नमस्कार है। समस्त विद्याओंको धारण करनेवाले | वाणीपति भगवान्को प्रणाम है। अचिन्त्य एवं सर्वज्ञ | परमेश्वरको नित्य बारंबार नमस्कार है। महाबाहो! | अधोक्षज! आप निराकार एवं यज्ञस्वरूप हैं। आप ही | साममूर्ति एवं सदा सर्वरूपधारी हैं। अच्युत! आप | सर्वज्ञानमय हैं; आप सबके हृदयमें ज्ञानरूपसे विराजमान | हैं। देवदेव! आप मुझे सब प्रकारका ज्ञान दीजिये; | आपको बारंबार नमस्कार है॥ १३-१६॥ 1113 Narsingpuran_Section_6_2_Front In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१३२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३७


[संस्कृत मूल पाठ]

मार्कण्डेय उवाच इत्थं स्तुतस्तदा तेन शङ्खचक्रगदाधरः। ब्रह्माणमाह देवेशो दास्ये ते ज्ञानमुत्तमम् ॥ १७ इत्युक्त्वा तु तदा विष्णुश्चिन्तयामास पार्थिव । केनास्य नीतं विज्ञानं केन रूपेण चादधे ॥ १८ मधुकैटभकृतं सर्वमिति ज्ञात्वा जनार्दनः । मात्स्यं रूपं समास्थाय बहुयोजनमायतम्। बहुयोजनविस्तीर्णं सर्वज्ञानमयं नृप ॥ १९ स प्रविश्य जलं तूर्णं क्षोभयामास तद्धरिः । प्रविश्य च स पातालं दृष्टवान्मधुकैटभौ ॥ २० तौ मोहयित्वा तुमुलं तज्ज्ञानं जगृहे हरिः । वेदशास्त्राणि मुनिभिः संस्तुतो मधुसूदनः ॥ २१ आनीय ब्रह्मणे दत्त्वा त्यक्त्वा तन्मात्स्यकं नृप। जगद्धिताय स पुनर्योगनिद्रावशं गतः ॥ २२ ततः प्रबुद्धौ संक्रुद्धौ तावुभौ मधुकैटभौ । आगत्य ददृशाते तु शयानं देवमव्ययम् ॥ २३ अयं स पुरुषो धूर्त्त आवां सम्मोह्य मायया । आनीय वेदशास्त्राणि दत्त्वा शेतेऽत्र साधुवत् ॥ २४ इत्युक्त्वा तौ महाघोरौ दानवौ मधुकैटभौ । बोधयामासतुस्तूर्णं शयानं केशवं नृप ॥ २५ युद्धार्थमागतावत्र त्वया सह महामते। आवयोर्देहि संग्रामं युध्यस्वोत्थाय साम्प्रतम् ॥ २६ इत्युक्तो भगवांस्ताभ्यां देवदेवो नृपोत्तम। तथेति चोक्त्वा तौ देवः शाङ्गं सज्यमथाकरोत् ॥ २७ ज्याघोषतलघोषेण शङ्खशब्देन माधवः । खं दिशः प्रदिशश्चैव पूरयामास लीलया ॥ २८ तौ च राजन् महावीर्यौ ज्याघोषं चक्रतुस्तदा । युयुधाते महाघोरौ हरिणा मधुकैटभौ ॥ २९ कृष्णश्च युयुधे ताभ्यां लीलया जगतः पतिः। समं युद्धमभूद्देवं तेषामस्त्राणि मुञ्चताम् ॥ ३०


[हिन्दी अनुवाद]

**मार्कण्डेयजी बोले—**ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवेश्वर विष्णुने उनसे कहा—'मैं तुम्हें उत्तम ज्ञान प्रदान करूँगा।' राजन्! भगवान् विष्णु यों कहकर तब सोचने लगे— 'कौन इसका विज्ञान हर ले गया और किस रूपसे उसने उसे धारण कर रखा है?' भूपाल! अन्तमें यह जानकर कि यह सब मधु और कैटभकी करतूत है, भगवान् जनार्दनने अनेकों योजन लंबा-चौड़ा पूर्णज्ञानमय मत्स्यरूप धारण किया। फिर मत्स्यरूपधारी हरिने तुरंत ही जलमें प्रविष्ट होकर उसे क्षुब्ध कर डाला और भीतर-ही-भीतर पाताललोकमें पहुँचकर मधु तथा कैटभको देखा। तब मुनियोंद्वारा स्तवन किये जानेपर भगवान् मधुसूदनने मधु और कैटभ—दोनोंको मोहितकर वह वेदशास्त्रमय ज्ञान ले लिया और उसे ले आकर ब्रह्माजीको दे दिया। राजन् ! तत्पश्चात् वे भगवान् उस मत्स्यरूपको त्यागकर जगत्के हितके लिये पुनः योगनिद्रामें स्थित हो गये॥ १७—२२ ॥

तदनन्तर मोह निवृत्त होनेपर [वेद-शास्त्रको न देख] मधु तथा कैटभ—दोनों ही बहुत कुपित हुए और वहाँसे आकर उन्होंने अविनाशी भगवान् विष्णुको सोते देखा। तब वे परस्पर कहने लगे—'यह वही धूर्त पुरुष है, जिसने हम दोनोंको मायासे मोहित करके वेद-शास्त्रोंको ले आकर ब्रह्माको दे दिया और अब यहाँ साधुकी भाँति सो रहा है।' राजन्! यों कहकर उन महाघोर दानव मधु और कैटभने वहाँ सोये हुए भगवान् केशवको तत्काल जगाया और कहा—'महामते! हम दोनों यहाँ तुम्हारे साथ युद्ध करने आये हैं; तुम हमें संग्रामकी भिक्षा दो और अभी उठकर हमसे युद्ध करो'॥ २३—२६ ॥

नृपवर ! उनके इस प्रकार कहनेपर देवदेव भगवान्ने 'बहुत अच्छा' कहकर अपने शार्ङ्ग धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी। उस समय भगवान् माधवने लीलापूर्वक धनुषकी टंकार और शङ्खनादसे आकाश, दिशाओं और अवान्तर-दिशाओं (कोणों)-को भर दिया ॥ २७-२८ ॥

राजन्! फिर उन महापराक्रमी महाभयानक मधु और कैटभने भी उस समय अपनी प्रत्यञ्चाको टंकार दी और वे भगवान् विष्णुके साथ युद्ध करने लगे। जगत्पति भगवान् विष्णु भी लीलासे ही उनके साथ युद्ध करने


1113 Narsingpuran_Section_6_2_Back In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ३८ ] कूर्मावतार; समुद्रमन्थन और मोहिनी-अवतार १३३

अध्याय ३८ ] कूर्मावतार; समुद्रमन्थन और मोहिनी-अवतार १३३ केशवः शार्ङ्गनिर्मुक्तैः शरैराशीविषोपमैः। लगे। इस प्रकार परस्पर अस्त्र-शस्त्रका प्रहार करते हुए तानि शस्त्राणि सर्वाणि चिच्छेद तिलशस्तदा ॥ ३१ उन दोनों पक्षोंमें समानरूपसे युद्ध हुआ। भगवान् विष्णुने अपने शार्ङ्ग धनुषद्वारा छोड़े हुए सर्पके समान तीखे तौ युद्ध्वा सुचिरं तेन दानवौ मधुकैटभौ। बाणोंसे उन दैत्योंके समस्त अस्त्र-शस्त्र तिलकी भाँति हतौ शार्ङ्गविनिर्मुक्तैः शरैः कृष्णेन दुर्मदौ ॥ ३२ टुकड़े-टुकड़े कर डाले। वे दोनों उन्मत्त दानव-मधु और कैटभ चिरकालतक भगवान्‌के साथ लड़कर अन्तमें तयोस्तु मेदसा राजन् विष्णुना कल्पिता मही। उनके शार्ङ्ग धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा मारे गये। राजन्! मेदिनीति ततः संज्ञामवापेयं वसुंधरा ॥ ३३ तब श्रीविष्णुभगवान्ने उन दोनों दैत्योंके मेदेसे इस पृथ्‍वीका निर्माण किया। इसीसे इस वसुंधराका नाम एवं कृष्णप्रसादेन वेदाँल्लब्ध्वा प्रजापतिः। 'मेदिनी' हुआ ॥ २९-३३ ॥ प्रजाः ससर्ज भूपाल वेददृष्टेन कर्मणा ॥ ३४ भूपाल ! इस प्रकार भगवान् विष्णुकी कृपासे वेदोंको प्राप्तकर प्रजापति ब्रह्माजीने वेदोक्त विधिसे प्रजाकी सृष्टि य इदं शृणुयान्नित्यं प्रादुर्भावं हरेर्नृप। की। नृप ! जो भगवान्‌की इस अवतार-कथाका प्रतिदिन उषित्वा चन्द्रसदने वेदविद्ब्राह्मणो भवेत् ॥ ३५ श्रवण करता है, वह [शरीर-त्यागके बाद] चन्द्रलोकमें निवास करके [पुनः इस लोकमें] वेदवेत्ता ब्राह्मण होता मात्स्यं वपुस्तन्महदद्रितुल्यं है। भूमिपाल! जो भगवान् विष्णु लोकहितके लिये विद्यामयं लोकहिताय विष्णुः। पर्वतके समान भीमकाय मत्स्यरूप धारणकर जनलोक- आस्थाय भीमं जनलोकसंस्थैः निवासियोंद्वारा स्तुत हुए थे, उनका ही तुम सदा स्मरण स्तुतोऽथ यस्तं स्मर भूमिपाल ॥ ३६ करो ॥ ३४-३६ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे मत्स्यप्रादुर्भावो नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'मत्स्यावतार' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७॥

अड़तीसवाँ अध्याय कूर्मावतार; समुद्रमन्थन और मोहिनी-अवतार

मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले- पूर्वकालमें देवासुर-संग्राममें पुरा देवासुरे युद्धे देवा दैत्यैः पराजिताः। जब देवगण दैत्योंद्वारा पराजित हो गये, तब वे सभी सर्वे ते शरणं जग्मुः क्षीराब्धितनयापतिम् ॥ १ मिलकर क्षीरसागरनन्दिनी श्रीलक्ष्मीजीके पति भगवान् विष्णुकी शरणमें गये। राजन्! वहाँ ब्रह्मा आदि सभी स्तोत्रेण तुष्टुवुः सर्वे समाराध्य जगत्पतिम्। देवता जगदीश्वरकी आराधना करके हाथ जोड़ निम्नाङ्कित कृताञ्जलिपुटा राजन् ब्रह्माद्या देवतागणाः ॥ २ स्तोत्रसे उनकी स्तुति करने लगे ॥ १-२ ॥ देवा ऊचुः देवगण बोले- जिनकी नाभिसे कमल प्रकट नमस्ते पद्मनाभाय लोकनाथाय शार्ङ्गिणे। हुआ है, जो समस्त लोकोंके स्वामी हैं, उन नमस्ते पद्मनाभाय सर्वदुःखापहारिणे ॥ ३ शार्ङ्ग धनुषधारी आप परमेश्वरको नमस्कार है।

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१३४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३८

१३४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३८

[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत मूल] नमस्ते विश्वरूपाय सर्वदेवमयाय च। मधुकैटभनाशाय केशवाय नमो नमः॥ ४ दैत्यैः पराजिता देव वयं युद्धे बलान्वितैः। जयोपायं हि नो ब्रूहि करुणाकर ते नमः॥ ५ मार्कण्डेय उवाच इति स्तुतो तदा देवैर्देवदेवो जनार्दनः। तानब्रवीद्धरिर्देवांस्तेषामेवाग्रतः स्थितः॥ ६ श्रीभगवानुवाच गत्वा तत्र सुराः सर्वे संधिं कुरुत दानवैः। मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा च वासुकिम्॥ ७ सर्वौषधीः समानीय प्रक्षिप्याब्धौ त्वरान्विताः। दानवैः सहिता भूत्वा मथ्नध्वं क्षीरसागरम्॥ ८ अहं च तत्र साहाय्यं करिष्यामि दिवौकसः। भविष्यत्यमृतं तत्र तत्पानाद्बलवत्तराः॥ ९ भविष्यन्ति क्षणाद्देवा अमृतस्य प्रभावतः। यूयं सर्वे महाभागास्तेजिष्ठा रणविक्रमाः॥ १० इन्द्राद्यास्तु महोत्साहास्तल्लब्ध्वामृतमुत्तमम्। ततो हि दानवाञ्जेतुं समर्था नात्र संशयः॥ ११ इत्युक्ता देवदेवेन देवाः सर्वे जगत्पतिम्। प्रणम्यागत्य निलयं संधिं कृत्वाथ दानवैः॥ १२ क्षीराब्धेर्मन्थने सर्वे चक्रुरुद्योगमुत्तमम्। बलिना चोद्धृतो राजन् मन्दराख्यो महागिरिः॥ १३ क्षीराब्धौ क्षेपितश्चैव तेनैकेन नृपोत्तम। सर्वौषधींश्च प्रक्षिप्य देवदैत्यैः पयोनिधौ॥ १४ वासुकिश्चागतस्तत्र राजन्नारायणाज्ञया। सर्वदेवहितार्थाय विष्णुश्च स्वयमागतः॥ १५ तत्र विष्णुं समासाद्य ततः सर्वे सुरासुराः। सर्वे ते मैत्रभावेन क्षीराब्धेस्तटमाश्रिताः॥ १६ मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वाथ वासुकिम्। ततो मथितुमारब्धं नृपते तरसामृतम्॥ १७


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद] सम्पूर्ण विश्व और सारे देवता जिनके स्वरूप हैं, उन मधुकैटभनाशक केशवको बारंबार प्रणाम है। करुणाकर! भगवन्! हम सभी देवता बलवान् दैत्योंद्वारा युद्धमें हरा दिये गये हैं, हमें विजय प्राप्त करनेका कोई उपाय बतलाइये; आपको नमस्कार है॥ ३-५॥ **मार्कण्डेयजी बोले—**देवताओंद्वारा इस प्रकार स्तवन किये जानेपर देवदेव भगवान् जनार्दनने उनके समक्ष प्रकट होकर कहा॥ ६॥ **श्रीभगवान् बोले—**देवगण! तुम सब लोग वहाँ (समुद्र-तटपर) जाकर दानवोंके साथ संधि कर लो और मन्दराचलको मथानी बनाकर वासुकि नागसे रस्सीका काम लो। फिर शीघ्रतापूर्वक समस्त ओषधियोंको लाकर समुद्रमें डालो और दानवोंके साथ मिलकर ही क्षीरसागरका मन्थ्न करो। देवताओ! इस कार्यमें मैं भी तुम लोगोंकी सहायता करूँगा। समुद्रसे अमृत प्रकट होगा, जिसको पान करके उसके प्रभावसे देवता क्षणभरमें ही अत्यन्त बलशाली हो जायेंगे। महाभागो! उस उत्तम अमृतको प्राप्तकर इन्द्रादि तुम सभी देवता अत्यन्त तेजस्वी, रणमें पराक्रम दिखानेवाले और महान् उत्साहसे सम्पन्न हो जाओगे। तदनन्तर तुम लोग दानवोंको जीतनेमें समर्थ हो सकोगे—इसमें संशय नहीं है॥ ७-११॥ देवदेव भगवान्‌के द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर सभी देवता उन जगदीशवरको प्रणाम करके अपने स्थानपर आये और दानवोंके साथ संधि करके क्षीरसागरके मन्थनके लिये उत्तम उद्योग करने लगे। राजन्! बलिने अकेले ही 'मन्दर' नामक महान् पर्वतको उखाड़कर समुद्रमें डाल दिया तथा नृपोत्तम! देवता और दैत्योंने समस्त ओषधियोंको लाकर समुद्रमें डाला। राजन्! भगवान् नारायणकी आज्ञासे वासुकि नाग वहाँ आये और समस्त देवताओंका हित-साधन करनेके लिये स्वयं भगवान् विष्णु भी वहाँ पधारे॥ १२-१५॥ तदनन्तर सभी देवता और असुरगण वहाँ भगवान् विष्णुके पास आये और सब लोग मित्रभावसे एकत्र होकर क्षीरसागरके तटपर उपस्थित हुए। नृप! उस समय मन्दराचलको मथानी और वासुकि नागको रस्सी बनाकर अमृत निकालनेके उद्देश्यसे अत्यन्त वेगपूर्वक समुद्रका मन्थन आरम्भ


In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ३८ ] कूर्मावतार; समुद्रमन्थन और मोहिनी-अवतार १३५

अध्याय ३८ ] कूर्मावतार; समुद्रमन्थन और मोहिनी-अवतार १३५ विष्णुना मुखभागे तु योजिता दानवास्तदा। देवताः पुच्छभागे तु मथनाय नियोजिताः ॥ १८ एवं च मथनात्तत्र मन्दरोऽधः प्रविश्य च। आधारेण विना राजन् तं दृष्ट्वा सहसा हरिः ॥ १९ सर्वलोकहितार्थाय कूर्मरूपमधारयत्। आत्मानं सम्प्रवेश्याथ मन्दरस्य गिरेरधः ॥ २० प्रविश्य धृतवान् शैलं मन्दरं मधुसूदनः। उपर्याक्रान्तवाञ्शैलं पृथग्रूपेण केशवः ॥ २१ चकर्ष नागराजं च देवैः सार्धं जनार्दनः। ततस्ते त्वरया युक्ता ममन्थुः क्षीरसागरम् ॥ २२ यावच्छक्त्या नृपश्रेष्ठ बलवन्तः सुरासुराः। मथ्यमानात्ततस्तस्मात् क्षीराब्धेरभवन्नृप ॥ २३ कालकूटमिति ख्यातं विषमत्यन्तदुस्सहम्। तं नागा जगृहुः सर्वे तच्छेषं शङ्करोऽग्रहीत् ॥ २४ नारायणाज्ञया तेन नीलकण्ठत्वमाप्तवान्। ऐरावतश्च नागेन्द्रो हरिश्चोच्चैःश्रवाः पुनः ॥ २५ द्वितीयावर्तनाद्राजन्नुत्पन्नाविति नः श्रुतम्। तृतीयावर्तनाद् राजन्नप्सराश्च सुशोभना ॥ २६ चतुर्थात् पारिजातश्च उत्पन्नः स महाद्रुमः। पञ्चमाद्धि हिमांशुस्तु प्रोत्थितः क्षीरसागरात् ॥ २७ तं भवः शिरसा धत्ते नारीवत् स्वस्तिकं नृप। नानाविधानि दिव्यानि रत्नान्याभरणानि च ॥ २८ क्षीरोदधेरुत्थिताश्च गन्धर्वाश्च सहस्रशः। एतान् दृष्ट्वा तथोत्पन्नानत्याश्चर्यसमन्वितान् ॥ २९ अभवञ्जातहर्षास्ते तत्र सर्वे सुरासुराः। देवपक्षे ततो मेघाः स्वल्पं वर्षन्ति संस्थिताः ॥ ३० कृष्णाज्ञया च वायुश्च सुखं वाति सुरान् प्रति। विर्षनिःश्वासवातेन वासुकेश्चापरे हताः ॥ ३१ हुआ। भगवान् विष्णुने उस समय समुद्रमन्थनके लिये दानवोंको वासुकिके मुखकी ओर और देवताओंको पुच्छ भागकी ओर नियुक्त किया। राजन्! इस प्रकार मन्थन आरम्भ होनेपर नीचे कोई आधार न होनेके कारण मन्दराचल जलके भीतर प्रविष्ट होकर डूब गया। पर्वतको डूबा देख भगवान् मधुसूदन विष्णुने समस्त लोकोंके हितके लिये सहसा कूर्मरूप धारण किया और उस रूपमें अपनेको मन्दराचलके नीचे प्रविष्ट करके, आधाररूप हो, उस मन्दर पर्वतको धारण किया तथा दूसरे रूपसे वे भगवान् केशव पर्वतको ऊपरसे भी दबाये रहे और एक अन्यरूपसे वे भगवान् जनार्दन देवताओंके साथ रहकर नागराज वासुकिको खींचते भी रहे। तब वे बलवान् देवता तथा असुर पूर्णशक्ति लगाकर बड़े वेगसे क्षीरसागरका मन्थन करने लगे ॥ १६-२२१/२ ॥ नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर उस मथे जाते हुए क्षीरसागरसे अत्यन्त दुस्सह 'कालकूट' नामक विष प्रकट हुआ। उस विषको सभी सर्पोंने ग्रहण कर लिया। उनसे बचे हुए विषको भगवान् विष्णुकी आज्ञासे शङ्करजीने पी लिया। इससे कण्ठमें काला दाग पड़ जानेके कारण उनकी 'नीलकण्ठ' संज्ञा हुई। इसके बाद द्वितीय बारके मन्थनसे ऐरावत गजराज और उच्चैःश्रवा घोड़ा-ये दोनों प्रकट हुए, यह बात हमारे सुननेमें आयी है। तृतीय आवृत्तिसे परमसुन्दरी अप्सरा (उर्वशी)-का आविर्भाव हुआ और चौथी बार महान् वृक्ष पारिजात प्रकट हुआ। पाँचवीं आवृत्तिमें क्षीरसागरसे चन्द्रमा प्रकट हुए। नरेश्वर! चन्द्रमाको भगवान् शिव अपने मस्तकपर धारण करते हैं; ठीक उसी तरह जैसे नारी ललाटमें स्वस्तिक (बेंदी या आभूषण) धारण करती है। इसी प्रकार क्षीरसागरसे नाना प्रकारके दिव्य रत्न, आभूषण और हजारों गन्धर्व प्रकट हुए। इन अत्यन्त विस्मयजनक वस्तुओंको उस प्रकार उत्पन्न देख सभी देवता और असुर बहुत प्रसन्न हुए ॥ २३-२९१/२ ॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुकी आज्ञासे मेघगण देवताओंके दलमें स्थित हो मन्द-मन्द वर्षा करने लगे और देव-वृन्दको सुख देनेवाली वायु बहने लगी। [इस कारण देवता थके नहीं।] किंतु महामते! वासुकिके विषमिश्रित श्वासकी वायुसे कितने ही दैत्य मर गये और जो बचे, In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१३६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३८

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

१३६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३८ निस्तेजसोऽभवन् दैत्या निर्वीर्याश्च महामते। वे भी तेज एवं पराक्रमसे हीन हो गये ॥ ३०-३११/२॥ ततः श्रीरुत्थिता तस्मात् क्षीरोदाद्धृतपङ्कजा ॥ ३२ तत्पश्चात् उस समुद्रसे हाथमें कमल धारण किये हुए विभ्राजमाना राजेन्द्र दिशः सर्वाः स्वतेजसा। श्रीलक्ष्मीजी प्रकट हुईं। राजेन्द्र! वे अपने तेजसे सम्पूर्ण ततस्तीर्थोदकैः स्नाता दिव्यवस्त्रैरलंकृता ॥ ३३ दिशाओंको प्रकाशमान कर रही थीं। शत्रुसूदन! उन्होंने तीर्थके जलसे स्नान किया, शरीरमें दिव्य गन्धका अनुलेप दिव्यगन्धानुलिप्ताङ्गी सुमनोभिः सुभूषणैः। लगाया और वे कमलालया लक्ष्मी दिव्य वस्त्र, पुष्पहार देवपक्षं समासाद्य स्थित्वा क्षणमरिंदम ॥ ३४ और सुन्दर भूषणोंसे विभूषित हो देवपक्षमें जाकर क्षणभर खड़ी रहीं; फिर भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें विराजमान हरिवक्षःस्थलं प्राप्ता ततः सा कमलालया। हुईं ॥ ३२-३४१/२॥ ततोऽमृतघटं पूर्णं दुग्ध्वा तु पयसो निधेः ॥ ३५ नरेश्वर! इसके बाद क्षीरसागरसे अमृतपूर्ण घटका धन्वन्तरिः समुत्तस्थौ ततः प्रीताः सुरा नृप। दोहन करके हाथमें लिये भगवान् धन्वन्तरि प्रकट हुए। दैत्याः श्रिया परित्यक्ता दुःखितास्तेऽभवन्नृप ॥ ३६ उनके प्राकट्यसे देवता बहुत प्रसन्न हुए। किंतु राजन्! नीत्वामृतघटं पूर्णं ते च जग्मुर्यथासुखम्। लक्ष्मीद्वारा त्याग दिये जानेके कारण असुरगण बहुत ततः स्त्रीरूपमकरोद् विष्णुर्देवहिताय वै ॥ ३७ दुःखी हुए और उस भरे हुए अमृतघटको लेकर इच्छानुसार आत्मानं नृपशार्दूल सर्वलक्षणसंयुतम्। चल दिये। नृपवर! तब भगवान् विष्णुने देवताओंका हित ततो जगाम भगवान् स्त्रीरूपेणासुरान् प्रति ॥ ३८ करनेके लिये अपनेको सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे युक्त स्त्रीरूपमें दिव्यरूपं तु तां दृष्ट्वा मोहितास्ते सुरद्विषः। प्रकट किया। इसके बाद भगवान् उस नारीरूपसे ही असुरोंकी ओर गये। उस दिव्य रूपवाली नारीको देख सुधापूर्णघटं ते तु मोहैः संस्थाप्य सत्तम ॥ ३९ दैत्यगण मोहित हो गये। साधुशिरोमणे! वे असुर तत्काल कामेन पीडिता ह्यासन्नसुरास्तत्र तत्क्षणात्। मोहके वशीभूत हो कामपीड़ित हो गये और उन्होंने मोहयित्वा तु तानेवमसुरानवनीपते ॥ ४० मोहवश वह अमृतका घड़ा भूमिपर रख दिया। अवनीपते! अमृतं तु समादाय देवेभ्यः प्रददौ हरिः। इस प्रकार असुरोंको मोहित करके भगवान्ने वह अमृत तत्पीत्वा तु ततो देवा देवदेवप्रसादतः ॥ ४१ ले देवताओंको दे दिया। देवदेव भगवान्की कृपासे अमृत बलवन्तो महावीर्या रणे जग्मुस्ततोऽसुरान्। पीकर बली और महावीर्यवान् हो देवता संग्राममें आ डटे जित्वा रणेऽसुरान् देवाः स्वानि राज्यानि चक्रिरे ॥ ४२ और असुरोंको युद्धमें जीतकर उन्होंने अपने राज्यपर एतत्ते कथितं राजन् प्रादुर्भावो हरेरयम्। अधिकार कर लिया। राजन्! भगवान्के इस 'कूर्म' नामक कूर्माख्यः पुण्यदो नॄणां शृण्वतां पठतामपि ॥ ४३ अवतारकी कथा मैंने तुमसे कह दी। यह पढ़ने और सुननेवाले मनुष्योंको पुण्य देनेवाली है ॥ ३५-४३ ॥ आविष्कृतं कौर्ममनन्तवर्चसं अद्भुत कर्म करनेवाले भगवान् नारायणने केवल नारायणेनाद्भुतकर्मकारिणा । देवताओंके हितके लिये अनन्त तेजस्वी परमपावन दिवौकसानां तु हिताय केवलं कूर्मरूप प्रकट किया था, सो इस प्रसङ्गका वर्णन मैंने रूपं परं पावनमेव कीर्तितम् ॥ ४४ तुमसे कर दिया ॥ ४४ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे कूर्मप्रादुर्भावो नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'कूर्मावतार' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

उन्तालीसवाँ अध्याय

अध्याय ३९ ] वाराह-अवतार; हिरण्याक्षवध १३७ उन्तालीसवाँ अध्याय वाराह-अवतार; हिरण्याक्षवध मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी कहते हैं—नरेश्वर! इसके बाद मैं अतः परं हरेः पुण्यं प्रादुर्भावं नराधिप। भगवान् विष्णुके 'वराह' नामक पावन अवतारका वर्णन वाराहं ते प्रवक्ष्यामि समाहितमनाः शृणु॥ १ करूँगा—तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो॥ १॥ अवान्तरलये प्राप्ते ब्रह्मणस्तु दिनक्षये। सत्तम! ब्रह्माजीका दिन बीत जानेपर जब अवान्तर त्रैलोक्यमखिलं व्याप्य तिष्ठन्त्यम्भांसि सत्तम ॥ २ प्रलय होता है, तब सम्पूर्ण त्रिलोकीको व्याप्त करके त्रैलोक्येऽखिलसत्त्वानि यानि राजेन्द्र तानि वै। केवल जल-ही-जल रह जाता है। राजेन्द्र! उस समय ग्रस्त्वा विष्णुस्ततः शेते तस्मिन्नेकार्णवे जले॥ ३ त्रिभुवनमें जो भी प्राणी हैं, उन सबका ग्रास करके अनन्तभोगशयने सहस्रफणशोभिते। ब्रह्मस्वरूप जगदीश्वर भगवान् विष्णु उस एकार्णव जलके रात्रिं युगसहस्रान्तां ब्रह्मरूपी जगत्पतिः॥ ४ भीतर सहस्रों फणोंसे सुशोभित शेषनागकी शय्यापर सहस्र दितेः पुत्रो महानासीत् कश्यपादिति नः श्रुतम्। युगोंतक चलनेवाली रात्रिमें शयन करते हैं। पूर्वकालमें हिरण्याक्ष इति ख्यातो महाबलपराक्रमः॥ ५ कश्यपजीसे दितिके पुत्ररूपमें 'हिरण्याक्ष' नामक महान् पाताले निवसन् दैत्यो देवानुपुरुरोध सः। दैत्य उत्पन्न हुआ था, ऐसी बात हमने सुनी है। वह महान् यज्ञ्विनामपकाराय यतते स तु भूतले॥ ६ बलवान् और पराक्रमी था। वह दैत्य पातालमें निवास करता था और स्वर्गके देवताओंपर आक्रमण करके अथ भूम्युपरि स्थित्वा मर्त्या यक्ष्यन्ति देवताः। उनकी पुरीपर घेरा डाल देता था। इतना ही नहीं, वह तेन तेषां बलं वीर्यं तेजश्चापि भविष्यति ॥ ७ पृथ्वीपर यज्ञ करनेवाले मनुष्योंका भी अपकार करनेके लिये सदा प्रयत्नशील रहता था॥ २–६॥ इति मत्वा हिरण्याक्षः कृते सर्गे तु ब्रह्मणा। एक बार उसने सोचा—'मर्त्यलोकमें रहनेवाले पुरुष भूम्येर्या धारणाशक्तिस्तां नीत्वा स महासुरः॥ ८ पृथ्वीपर रहकर देवताओंका यजन करेंगे, इससे उनका बल, वीर्य और तेज बढ़ जायगा।' यह सोचकर महान् विवेश तोयमध्ये तु रसातलतलं नृप। असुर हिरण्याक्षने ब्रह्माजीद्वारा सृष्टि-रचना की जानेपर विना शक्त्या च जगती प्रविवेश रसातलम् ॥ ९ उसे धारण करनेके लिये भूमिकी जो धारणा-शक्ति थी, उसे लेकर जलके भीतर-ही-भीतर रसातलमें चला निद्रावसाने सर्वात्मा क्व स्थिता मेदिनीति वै। गया। आधारशक्तिसे रहित होकर यह पृथ्वी भी रसातलमें संचिन्त्य ज्ञात्वा योगेन रसातलतलं गताम् ॥ १० ही चली गयी॥ ७–९॥ योगनिद्राका अन्त होनेपर जब सर्वात्मा श्रीहरिने अथ वेदमयं रूपं वाराहं वपुरास्थितम्। विचार किया कि 'पृथ्वी कहाँ है?', तब उन्होंने वेदपादं यूपदंष्ट्रं चितिवक्त्रं नराधिप ॥ ११ योगबलसे यह जान लिया कि 'वह रसातलको चली गयी है'। नराधिप! तब उन्होंने वेदमय लम्बा-चौड़ा दिव्य वराह-शरीर धारण किया, जिसके चारों वेद ही चरण थे, यूप (पशु-बन्धनके लिये बना हुआ काष्ठस्तम्भ) ही दाढ़ था और चिति (श्येनचित् आदि) मुख। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१३८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४०

१३८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४० व्यूढोरस्कं महाबाहुं पृथुवक्त्रं नराधिप। अग्निजिह्वं स्रुचं तुण्डं चन्द्रार्कनयनं महत्॥ १२ पूर्तेष्टधर्मश्रवणं दिव्यं तं सामनिःस्वनम्। प्राग्वंशकायं हविर्नासं कुशदर्भतनूरुहम्॥ १३ सर्वं वेदमयं तच्च पुण्यसूक्तमहासटम्। नक्षत्रताराहारं च प्रलयावर्तभूषणम्॥ १४ इत्थं कृत्वा तु वाराहं प्रविवेश वृषाकपिः। रसातलं नृपश्रेष्ठ सनकाद्यैरभिष्टुतः॥ १५ प्रविश्य च हिरण्याक्षं युद्धे जित्वा वृषाकपिः। दंष्ट्राग्रेण ततः पृथ्वीं समुद्धृत्य रसातलात्॥ १६ स्तूयमानोऽमरगणैः स्थापयामास पूर्ववत्। संस्थाप्य पर्वतान् सर्वान् यथास्थानमकल्पयत्॥ १७ विहाय रूपं वाराहं तीर्थे कोकेतिविश्रुते। वैष्णवानां हितार्थाय क्षेत्रं तद्गुह्यमुत्तमम्॥ १८ ब्रह्मरूपं समास्थाय पुनः सृष्टिं चकार सः। विष्णुः पाति जगत्सर्वमेवम्भूतो युगे युगे। हन्ति चान्ते जगत्सर्वं रुद्ररूपी जनार्दनः॥ १९ वेदान्तवेद्यस्य हरेर्वृषाकपेः कथामिमां यश्च शृणोति मानवः। दृढां मतिं यज्ञतनौ विवेश्य वै विहाय पापं च नरो हरिं व्रजेत्॥ २० मुखमण्डल स्थूल और छाती चौड़ी थी, भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं, अग्नि ही जिह्वा और स्रुक् (स्रुवा) ही थुथुन थी। चन्द्रमा और सूर्य विशाल नेत्र थे, पूर्त (बावली आदि खुदवाना) और इष्ट-धर्म (यज्ञ-यागादि) उनके कान थे, साम ही स्वर था। प्राग्वंश (पत्नीशाला या यजमान-गृह) ही शरीर था, हवि ही नासिका था, कुश-दर्भ ही रोमावलियाँ थे। इस प्रकार उनका सम्पूर्ण शरीर वेदमय था, पवित्र वैदिक सूक्त ही उनके बड़े-बड़े अयाल थे। नक्षत्र और तारे उनके हार थे तथा प्रलयकालीन आवर्त (भँवरें) ही उनके लिये भूषणका काम दे रहे थे॥ १०-१४ १/२ ॥ नृपश्रेष्ठ! भगवान् विष्णुने ऐसे वाराहरूपको धारणकर रसातलमें प्रवेश किया। उस समय सनकादि योगीजन उनकी स्तुति करते थे। वहाँ जाकर भगवान्ने युद्धमें हिरण्याक्षको मारकर उसपर विजय पायी और अपनी दाढ़ोंके अग्रभागसे पृथ्वीको उठाकर वे रसातलसे ऊपर ले आये। फिर देवगण उनकी स्तुति करने लगे और उन्होंने पूर्ववत् पृथ्वीको स्थापित किया। पृथ्वीको स्थिर करनेके पश्चात् उसपर यथास्थान पर्वतोंका संनिवेश किया। तदनन्तर वैष्णवोंके हितके लिये कोकामुख तीर्थमें वाराहरूपका त्याग किया। वह वाराह-क्षेत्र उत्तम एवं गुह्य तीर्थ है। फिर ब्रह्माजीका रूप धारणकर उन्होंने सृष्टि-रचना की। इस प्रकार भगवान् विष्णु युग-युगमें अवतार लेकर सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करते हैं। फिर वे जनार्दन रुद्ररूप धारणकर अन्तकालमें समस्त लोकोंका संहार करते हैं॥ १५-१९॥ जो मनुष्य वेदान्तवेद्य भगवान् विष्णुकी इस कथाको श्रवण करता है, वह भगवान् यज्ञमूर्तिमें अपनी सुदृढ़ बुद्धि लगाकर समस्त पापोंसे मुक्त हो, उन भगवान् हरिको ही प्राप्त करता है॥ २०॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे वाराहप्रादुर्भावो नाम एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'वाराहावतार' नामक उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३९॥ चालीसवाँ अध्याय नृसिंहावतार; हिरण्यकशिपुकी वरदान-प्राप्ति और उससे सताये हुए देवोंद्वारा भगवान्‌की स्तुति मार्कण्डेय उवाच वाराहः कथितो ह्येवं प्रादुर्भावो हरेस्तव। साम्प्रतं नारसिंहं तु प्रवक्ष्यामि निबोध मे॥ १ मार्कण्डेयजी बोले-राजन्! इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान् विष्णुके वराह-अवतारका वर्णन किया। अब 'नृसिंहावतार' का वर्णन करूँगा; सुनो॥ १॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ४० ] नृसिंहावतार; हिरण्यकशिपुकी वरदान-प्राप्ति १३९ दितेः पुत्रो महानासीद्धिरण्यकशिपुः पुरा। | पूर्वकालमें दितिका पुत्र हिरण्यकशिपु महान् प्रतापी तपस्तेपे निराहारो बहुवर्षसहस्रकम्॥ २ | हुआ। उसने अनेक सहस्र वर्षोंतक निराहार रहते हुए तपतस्तस्य संतुष्टो ब्रह्मा तं प्राह दानवम्। | तपस्या की। उसकी तपस्यासे संतुष्ट हो ब्रह्माजीने उस वरं वरय दैत्येन्द्र यस्ते मनसि वर्तते॥ ३ | दानवसे कहा—'दैत्येन्द्र! तुम्हारे मनको जो प्रिय लगे, इत्युक्तो ब्रह्मणा दैत्यो हिरण्यकशिपुः पुरा। | वही वर माँग लो।' दैत्य हिरण्यकशिपुने ब्रह्माजीके इस उवाच नत्वा देवेशं ब्रह्माणं विनयान्वितः॥ ४ | प्रकार कहनेपर उन देवेश्वरसे विनयपूर्वक प्रणाम करके | कहा॥ २-४॥ हिरण्यकशिपुरुवाच | यदि त्वं वरदानाय प्रवृत्तो भगवन्मम। | हिरण्यकशिपु बोला—ब्रह्मन्! भगवन्! यदि आप यद्यद्वृणोम्यहं ब्रह्मांस्तत्तन्मे दातुमर्हसि॥ ५ | मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो मैं जो-जो माँगता हूँ, न शुष्केण न चार्द्रेण न जलेन न वह्निना। | वह सब देनेकी कृपा करें। मैं न सूखी वस्तुसे मरूँ न न काष्ठेन न कीटेन पाषाणेन न वायुना॥ ६ | गीलीसे; न जलसे न आगसे; न काठसे न कीड़ेसे और नायुधेन न शूलेन न शैलेन न मानुषैः। | न पत्थर या हवासे ही मेरी मृत्यु हो। न शूल अथवा न सुरैरसुरैर्वापि न गन्धर्वैर्न राक्षसैः॥ ७ | किसी और शस्त्रसे न पर्वतसे; न मनुष्योंसे न देवता, न किन्नरैर्न यक्षैस्तु विद्याधरभुजंगमैः। | असुर, गन्धर्व अथवा राक्षसोंसे ही मरूँ। न किंनरोंसे न न वानरैर्मृगैर्वापि नैव मातृगणैरपि॥ ८ | यक्ष, विद्याधर अथवा भुजंगोंसे; न वानर तथा अन्य नाभ्यन्तरे न बाह्ये तु नान्यैर्मरणहेतुभिः। | पशुओंसे और न दुर्गा आदि मातृगणोंसे ही मेरी मृत्यु न दिने न च नक्तं मे त्वत्प्रसादाद् भवेन्मृतिः॥ ९ | हो। मैं न घरके भीतर मरूँ न बाहर; न दिनमें मरूँ न इति वै देवदेवेशं वरं त्वत्तो वृणोम्यहम्। | रातमें तथा आपकी कृपासे मृत्युके हेतुभूत अन्य कारणोंसे | भी मेरी मृत्यु न हो। देवदेवेश्वर! मैं आपसे यही वर मार्कण्डेय उवाच | माँगता हूँ॥ ५-९ १/२॥ इत्युक्तो दैत्यराजेन ब्रह्मा तं प्राह पार्थिव॥ १० | मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! दैत्यराज तपसा तव तुष्टोऽहं महता तु वरानिमान्। | हिरण्यकशिपुके यों कहनेपर ब्रह्माजीने उससे कहा— दुर्लभानपि दैत्येन्द्र ददामि परमाद्भुतान्॥ ११ | 'दैत्येन्द्र! तुम्हारे महान् तपसे संतुष्ट होकर मैं इन परम अन्येषां नेदृशं दत्तं न तैरित्थं तपः कृतम्। | अद्भुत वरोंको दुर्लभ होनेपर भी तुम्हें दे रहा हूँ। दूसरे त्वत्प्रार्थितं मया दत्तं सर्वं ते चास्तु दैत्यप॥ १२ | किसीको मैंने ऐसा वर नहीं दिया है और न दूसरोंने गच्छ भुङ्क्ष्व महाबाहो तपसामूर्जितं फलम्। | ऐसी तपस्या ही की है। दैत्यपते! तुम्हारे माँगे हुए सभी इत्येवं दैत्यराजस्य हिरण्यकशिपोः पुरा॥ १३ | वर मैंने तुम्हें दे दिये; वे सब तुम्हें प्राप्त हों। महाबाहो! दत्त्वा वरान् ययौ ब्रह्मा ब्रह्मलोकमनुत्तमम्। | अब जाओ और अपने तपके बढ़े हुए उत्कृष्ट फलको सोऽपि लब्धवरो दैत्यो बलवान् बलदर्पितः॥ १४ | भोगो।' इस प्रकार पूर्वकालमें दैत्यराज हिरण्यकशिपुको देवान् सिंहान् रणे जित्वा दिवः प्राच्यावयद् भुवि। | अभीष्ट वर देकर ब्रह्माजी अपने परम उत्तम लोकको दिवि राज्यं स्वयं चक्रे सर्वशक्तिसमन्वितम्॥ १५ | चले गये। उस बलवान् दैत्यने भी वर पाकर बलसे | उन्मत्त हो श्रेष्ठ देवताओंको युद्धमें जीतकर उन्हें स्वर्गसे | पृथ्वीपर गिरा दिया तथा वह स्वयं स्वर्गलोकमें रहकर | वहाँका सर्वशक्तिसम्पन्न राज्य भोगने लगा॥ १०-१५॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth