निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
३२२ अ० १ पा० ५ ख० १ ।
'सुवरचा अनुष्मात्राः पानीयम्'- इति । यथौ
एतत्-अविस्पष्टार्था भवन्ति' इति । नैष स्थाणोरप-
राधः, यदेन मन्धो न पश्यति, पुरुषापराधः स
भवति । यथा जानपदीषु विद्यातः पुरुषविशेषो
भवति, पारो वर्यवित्सु तु खलु वेदितृषु भूयोविद्यः
प्रशस्यो भवति ॥ २ ॥
इति प्रथमाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥ १, ५ ॥
पञ्चमः पादः ।
निरुक्तका प्रयोजनान्तर ।
( व्याकरण और निरुक्त )
इस प्रकारसे आरम्भसे चतुर्थपाद-पर्य्यन्त विभागसे अवस्थित
जो नाम, आख्यात, उपसर्ग तथा निपात उनका लक्षण सामान्य
व विशेषरूपसे निरूपण किया गया । यह पदज्ञानरूप, निरुक्त
शास्त्रका पहिला प्रयोजन है, उसी प्रकार पदार्थज्ञान भी दूसरा
प्रयोजन है। अर्थात् जिस प्रकार पदज्ञानके विना मन्त्रोंमें अर्थ
की प्रतीति नहीं हो सकती, उसी प्रकार पदार्थज्ञानके विना भी
नहीं। इसीलिये शास्त्रारम्भके द्वितीय प्रयोजनको दिखानेके
अर्थ यहांसे आरम्भ होता है। भाव यह है कि—इस निरुक्त
शास्त्रके बिना लोक तथा वेदमें पृथक् पृथक् पद रूपसे एवम्
मन्त्रोंमें वाक्यरूपसे रहते हुए नाम आदिकोंके ज्ञान हो जाने
पर भी वहां जो उनका समस्त मिलित अर्थ है, जिसको जानकर
कि—मनुष्यकी प्रवृत्ति तथा निवृत्ति होती है, उसका विशेष
रूपसे निश्चय नहीं होता । सुतराम् इस शास्त्रके विना पदा-
र्थकी प्रतीति अथवा वाक्यार्थकी प्रतीति नहीं होती ।
पूछें कि-पदार्थ और वाक्यार्थका क्या विशेष है ? ता कहेंगे
कि-पदार्थ साकाङ्क्ष और वाक्यार्थ निराकाङ्क्ष होता है।
एक पदार्थ के ज्ञान हो जानेपर दूसरे पदार्थ के ज्ञानकी अपेक्षा
बनी रहती है, यही पदार्थ साकाङ्क्षता है। और वाक्यार्थ के
ज्ञान हो जानेपर फिर अन्य अर्थ के जाननेकी कोई आकाङ्क्षा नहीं
रहती, सुतराम् वाक्यार्थ के ज्ञान होते ही पुरुषकी प्रवृत्ति तथा
निवृत्ति हो जाती है। यही वाक्यार्थकी निराकाङ्क्षता है।
जैसे—किसोने “गौः” ऐसा पद कहा तो फिर आकाङ्क्षा
होती है कि—क्या ? उसके अनन्तर “गच्छति” ऐसा कहते ही
उसको आकाङ्क्षा शान्त हो जाती है। इसी प्रकार “गच्छति”
कहने पर “कः” यह आकाङ्क्षा होती है, वैसे ही “गौः” ऐसा
कहते ही निराकाङ्क्षता हो जाती है। प्रयोजन यह निकला
कि—“गौर्गच्छति” ( “गौ जाती है” ) ऐसा वाक्य बोलनेसे
'गौ' वहन-दोहन आदि क्रियाओंसे पृथक् होकर गमन क्रियामें
अवस्थित प्रतीत होती है। और गमन क्रिया भी अन्य अश्व
आदिकोंसे अलग होकर गौमें ही अवस्थित हुई प्रतीत होती है।
अर्थात् “गौः” ऐसा कहनेसे गौका बोध तो हो जाता है, किन्तु
वह जाती है, या चरती है अथवा वहन-दोहन आदि क्रिया करती
है, कुछ पता नहीं चलता ? जब “गच्छति” ( जाती है ) कह देते
हैं, तो अन्य सब क्रियाओंके सन्देह निवृत्त हो जाते हैं और गमनमें
ही निश्चय हो जाता है, एवम् “गच्छति ( जाता है ) ऐसा कहनेसे
घोड़ा जाता है या गौ जाती है अथवा मनुष्यादि कुछ निश्चय
नहीं होता, किन्तु उसके साथ “गौः” यह पद बोलते ही जानेवालों
१२४ अ० १ पा० ५ ख० १ ।
में जो सन्देह होता है निवृत्त होकर गौका निश्चय हो जाता है।
यही पदार्थ और वाक्यार्थका विशेष है।
सो यह प्रकरणका अविरोधी वाक्यार्थ नियमसे पदार्थको
लक्षित करता है, और पदार्थ पदके लक्षण को। क्योंकि—पदार्थके
सामर्थ्यसे ही व्याकरणमें पदोंके प्रकृति प्रत्यय आदि लक्षण बताये
जाते हैं।
जब कि—ऐसा है, तो अर्थको निश्चय रूपसे नहीं जाननेवाला
पुरुष स्वर तथा संस्कारोंका निश्चय नहीं कर सकता। क्योंकि—
अर्थके अधीन ही शब्दके स्वर और संस्कार रहते हैं।
ऐसी स्थितिमें "निरुक्त शास्त्र विद्याका स्थान है" यह सिद्ध
हुआ, क्योंकि—अर्थका परिज्ञान इसीके अधीन है। इसीसे स्वर
तथा संस्कारोंको अर्थके अधीन होनेके कारण यह शास्त्र व्याकरण
को सम्पूर्ण बनाता है, क्योंकि—व्याकरणसे स्वर और संस्कारोंका
ही विचार होता है, इससे वह अपरि समाप्त ही है जब तक निरुक्त
शास्त्र नहीं पढा जाय, —इसका हेतु यह है कि—जो निरुक्त को
नहीं पढा हुआ होता है, वह अर्थको निश्चय नहीं कर सकता और
अनिश्चिताथ पुरुष स्वर-संस्कारोके तत्वको नहीं जान सकता।
प्रश्न हो सकता है कि—जब यह शास्त्र व्याकरणको सम्पूर्ण
करता है, तो यह व्याकरणका एक भाग या अङ्ग ही हुआ।
जैसे कि—द्रव्यके गुण होते है। और इससे इसको विद्याका
स्थान कहना भी विरुद्ध है ?
नहीं। क्योकि—यह शास्त्र अपने प्रयोजनको स्वतन्त्रतासे
करता हुआ ही व्याकरणकी सम्पूर्णता भी करदेता है, जैसे कि—
लोंकमें कोई पुरुष अपने स्वार्थको साधन करनेके साथ दूसरेक
अनुग्रह भी कर देता है।
हिन्दी निरुक्त । १२५
यह प्रश्न, कि—गुणादिके समान अङ्गभूत है ? यह भी ठीक
नहीं, क्योंकि—व्याकरणका अङ्ग होता, तो जैसे "उणादयो
बहुलम्" यह सूत्र उणादि शब्दोंका संग्रह करता है; उसी प्रकार
“निघण्टवो बहुलम्” ऐसा सूत्र बनाकर पाणिनि मुनि इस
शास्त्रका भी संग्रह कर देते, किन्तु ऐसा नहीं किया, इससे यह
शास्त्र व्याकरणका अङ्ग नहीं है। इसलिये "यह शास्त्र अर्थके
निर्वचनमें स्वतन्त्र है, व्याकरण तो केवल लक्षण प्रधान है" यह
दोनोंका विशेष या भेद है। लक्षण नाम प्रकृति-प्रत्यय आदिका
है, यह सब शब्द तक गति रखते हैं।
कौत्सके मतसे निरुक्तकी अनर्थकता ।
कौत्स ऋषि कहते हैं कि—“यदि मन्त्रोंके अर्थज्ञानके लिये
निरुक्त शास्त्रका आरम्भ किया जाता है, तो अनर्थक ही है,
क्योंकि—मन्त्रोंका वाच्य वाचक भाव—सम्बन्धसे कोई अर्थ नहीं
है। इस लिये निरुक्त शास्त्रका आरम्भ नहीं करना चाहिये ।
किन्तु निरुक्त शास्त्रके पढ़नेवालोंको उनके ऐसे कथन पर ध्यान
न देना चाहिये, प्रत्युत—वेद और शास्त्रोंको देखकर बातको
व्यवस्थित करना चाहिये कि—वे सत्य कहते हैं या वृथा ? अथवा
जिन हेतुओंको अब हम दिखायेंगे, उनको समझकर मन्त्रोंका
अर्थवत्व देखना चाहिये ।
कौत्सके मतमें मन्त्रोंके अनर्थक होनेमें युक्तियां ।
( १ ) मन्त्रोंमें जो शब्द पढ़े हुए हैं, पर्याय शब्द बदल कर
नहीं पढ़े जाते, तथा जो शब्द पूर्व पढ़ा है, वह उत्तर नहीं पढ़ा
जाता । जैसे कि—लोकमें "गामानय" गौकोलेआ ऐसाभी
कहते हैं; और गो शब्दके पर्याय धेनु शब्दको लेकर “धेनुमानय"
भी कहते हैं । किन्तु वेदमें 'अग्न आयाहि" ( सा० सं० १, १, १, .
१ ) इस वाक्यके स्थानमें 'विभावसो ! आगच्छ' इत्यादि वाक्य
१२६ अ० १ पा० ५ ख० १ ।
नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार लोकमें “आहर पात्रम्”
‘लेआ, पात्र’ ऐसा भी कहते हैं, और “पात्रमाहर” ‘पात्रको लेआ’
ऐसा भी। वेदमें “अग्न आयाहि” के स्थानमें ‘आयाह्यग्ने’ ऐसा
नहीं कह सकते। प्रयोजन यह कि—जब अर्थ के लिये शब्द बोले
जाते हैं, तो वह जिस प्रकार सिद्ध हो, वैसे ही वैसे शब्द बोले जा
सकते हैं, शब्दोंके क्रम तथा विशेषको नियत करनेका कोई
प्रयोजन नहीं। जब कि—मन्त्रोंमें उक्त दोनों बातें नहीं हैं तो
अर्थवाले शब्दोंके विरुद्ध स्थितिके कारण वे अनर्थक ही कहे जा
सकते हैं।
(२) ब्राह्मण या विधि वाक्यसे जिन कर्मोंमें मन्त्र विनियोग
किये जाते हैं स्वयम् उन कर्मोंको बोधन करनेकी शक्ति रखनेके
कारण वे अपनेको उन कर्मोंमें विनियोग कर सकते हैं, तथापि
मन्त्र ब्राह्मण वाक्यके द्वारा ही कर्मोंमें विनियुक्त होते हैं यदि ये
मन्त्र अर्थवान् होते तो ब्राह्मण वाक्य इनका विनियोग नहीं करता।
भाव यह है कि—जो अपने कर्त्तव्यको आप जानता है, उसे
शिक्षककी आवश्यकता नहीं होती, सुतराम् मूढके लिये दूसरे
विद्वान् प्रेरककी अपेक्षा होती है, इसी रीतिसे मन्त्र अर्थशून्य
होनेसे मूढ़के समान है इसीसे वह दूसरे अर्थवान् ब्राह्मण शासक
वाक्यके द्वारा कर्मोंमें विनियुक्त किया जाता है।
जैसे—
“उरुप्रथस्वेति प्रथयति” (श० ब्रा० १, १, ६, ८)
इस ब्राह्मणका यह अर्थ है, कि “उरु प्रथस्व” इस मन्त्रसे
(पुरोडाशका) प्रथन करे। अर्थात् इस विधिवाक्यने ‘उरुप्रथस्व”
(य० वा० स० १, २२) इस यजुःको पुरोडाशके प्रथन कर्ममें
विनियोग किया, तथा यह मन्त्र भी— “हे पुरोडाश ! तू फैल”
अपने इस अर्थसे पुरोडाशके प्रथन कर्ममें सामर्थ्य रखता है,
क्योंकि इसके अर्थ से यह बात प्रतीत होती है। इसी प्रकार
"प्रोहाणोति प्रोहति" यह ब्राह्मण, द्रोणकलशके प्रोहण कर्ममें
"प्रोहाणि" इस मन्त्रको विनियोग करता है। और मन्त्र भी
स्पष्ट रूपसे प्रोहणक्रियाको बता रहा है। इससे लिङ्ग सम्पन्न
मन्त्रोंके विधानके कारण हम देखते हैं कि--मन्त्र अनर्थक हैं।
उपर्युक्त युक्तिसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि--ब्राह्मण
विनियोजक (प्रेरक) होनेसे अर्थवान् है और मन्त्र विनियोज्य
(प्रेर्य्य) होनेसे अनर्थक।
यदि कोई ऐसी कल्पना करे कि-- ब्राह्मण ही अनर्थक क्यों
न हो, मन्त्र अपने अर्थ के सामर्थ्यसे ही विनियुक्त होता ?
इसका उत्तर यह है कि ब्राह्मण केवल मन्त्रका ही विनियोग
नहीं करता अपितु देश, काल, कर्त्ता और दक्षिणा आदि अन्य
कर्मोंके अङ्गोंको भी बताता है, वे सब कहांसे जाने जावेंगे।
अतः ब्राह्मणकी अनर्थकता नहीं हो सकती। यदि बलात्
ब्राह्मणकी अनर्थकता मान भी लें तो वेदके एक देश रूप मन्त्रकी
अत्यन्त ही अनर्थकता होगी।
इसके अतिरिक्त यह भी है कि-यदि ब्राह्मणकी अनर्थकता
मानें तो यह प्रश्न हो सकता है कि-ब्राह्मण फिर किस लिये है,
जो विधि और कर्मको स्तुतिको नहीं करता ? किन्तु यदि मन्त्र-
पर यह प्रश्न किया जाय कि यदि उसका कुछ अर्थ नहीं तो वह
किस लिये है, तो उसका उत्तर यह दिया जा सकता है, उसका
कर्मोंमें विनियोग होता है। अर्थात् ब्राह्मणका विधिके विना
अन्य कोई प्रयोजन न रहनेसे उसको अर्थवान् मानना ही पड़ेगा
और मन्त्रका अर्थ स्वीकार न भी किया जावे तो कोई हानि नहीं,
इसलिये ब्राह्मण अर्थवान् और मन्त्र अनर्थक है यह सिद्ध हुआ ।
(३) मन्त्रोकी अनर्थकतामें यह भी कारण है कि-उनके जो
३२८ अ० १ पा० ५ ख० १ ।
- अर्थ हैं, वे किसी युक्तिसे संगत नहीं होते। अर्थात् मन्त्रोंमे
जैसा अर्थ लब्ध होता है कि- यह इनमें अर्थ होगा, वह घटता
नहीं। जैसे-
“ओषधेत्रायस्व” ( य० वा० सं० ४, १, ६, १५)
'हे ओषधे तू इस यजमानकी रक्षा कर।' अग्निष्टोम यज्ञमें
यजमानके क्षौर कर्मके आरम्भमें उसके शिरपर कुशका अङ्कुर
या पत्ता लगाया जाता है कि पहिले छुरा शिरपर न टिककर उसी
पर टिके, उस तृणके धरनेका यह मन्त्र है। किन्तु इस मन्त्रके
अर्थको स्वीकार करें तो यह प्रश्न होगा कि-जब ओषधि अपनी
ही रक्षा नहीं कर सकती तो यजमानकी क्या करेगी ?” तथा
दूसरा मन्त्र छुरेके चलानेके लिये हैं-
“स्वधिते मैन≍हि≍सीः” ( य० वा० सं० ४, १-६,
१५) इसका अर्थ है-हे क्षुर ! पैनीधारवाले ! तू इस यजमान
की हिंसा न करना। अब देखते हैं, तो-जो छुरेसे स्वयम् यजमान
के बालोंको काट रहा है, वही छुरेसे न काटनेको प्रार्थना कर रहा
है। कौन ऐसा है जो ऐसा कह कर, ऐसा करेगा ? लोकमें
जितने ऐसे वाक्य होते हैं, वे सब उन्मत्त लोगोंके जैसे अनर्थक
ही माने जाते हैं। इस लिये ये मन्त्र वाक्य भी अनर्थक ही हैं।
४-मन्त्रोंकी अनर्थकतामें और हेतु यह है कि-एक मन्त्रके
अर्थको दूसरे मन्त्रका अर्थ निषेध करता या मिथ्या ठहराता है।
जैसे कि-
“एक एव रुद्रोऽवतस्थे न द्वितीयः” “असं-
ख्याताः सहस्राणि ये रुद्रा अधिभूम्याम् ( य० वा०
सं० १६, ५४) “अशत्रुरिन्द्र जज्ञिषे” (ऋ० सं० ८, ७,
२१, २) “शतं सेना अजयत्साकमिन्द्रः” (ऋ०
हिन्दी निरुक्त । ४२६
सं० ८, ५, २२, १ ) ये उदाहरण हैं। एक मन्त्रमें कहा गया है
कि—'संग्राममें शत्रुओंको मारनेवाला एक ही रुद्र उठा हुआ था,
कोई दूसरा न था' दूसरे मन्त्रमें कहा है कि—'पृथिवी पर असंख्य
रुद्र हैं' यहां दोनों मन्त्रोंका परस्पर यह विरोध है कि—'एक है
तो असंख्य कैसे' ? और 'असंख्य हैं, तो एक कैसे ?'
तथा एक मन्त्रमें कहा है कि—'इन्द्र अशत्रु था' एवम् दूसरे
मन्त्रमें कहा है कि—'उसने एक साथ ही शत्रुओंकी सैकड़ों सेना-
ओंको जीता।'
यहां भी यह प्रश्न हो सकता है कि—यदि उसके कोई शत्रु
न था, तो उसने शत्रुओंकी सेनाओंको नहीं जीता' और 'यदि
शत्रुओंकी बहुत सेनाओंको जीता, तो वह अशत्रु न था।'
लोकमें उन्मत्त आदिकोंके ऐसे वाक्य अनर्थक समझे जाते हैं।
इसीसे वे भी अनर्थक हैं।
५—मन्त्रोंकी अनर्थकतामें और हेतु यह है कि—अध्वर्यु
(ऋत्विज् विशेष) जानते हुए होता को प्रैष (प्रेरणा) करता
है कि—
“अग्नये समिध्यमानायानुब्रूहि” 'जलते हुए अग्निके लिये तू
अनुवचनकर' किन्तु यह प्रैष निष्प्रयोजन है, क्योंकि—विधिमें
विद्वान् हो होता लिया है, इस लिये वह स्वयम् जानता है कि—
'इस अवधि या समयमें मुझे यह अनुष्ठान करना चाहिये' अतः
जाननेवालेको ऐसा प्रेषण अनर्थक ही होता है, फलित यह कि-
'जैसे यह अनर्थक है वैसे ही और मन्त्र भी अनर्थक होगे। -
६—कई ऐसे मन्त्र है, जो एक ही वस्तुको कभी कुछ और
कभी कुछ कहते.हैं, अर्थात् जिन जिन वस्तुओंके रूपमें एक वस्तुकों
बताया जाता है, वे प्रत्यक्षमें सदा ही परस्पर भिन्न हैं, जैसे—
१७
१३० अ० १ पा० ४ ख० १ ।
"अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्ष
म दिति र्माता स पिता स पुत्रः ।
विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना
अदिति जातमदितिर्जनित्वम् ॥
(ऋ० सं० १, ६, १६, ५)
इस मन्त्रमें 'जो ही अदिति द्युलोक (३ द्युलोक) है वही
मध्यम लोक (अन्तरिक्ष) है। एवम् वही माता, पिता, तथा
पुत्र है।' ऐसी ऐसी बहुत बातें परस्पर विरुद्ध कही हुई हैं, यदि
ऐसे मन्त्रोंको अर्थवान् जाना जावे तो उनका उपपादन करना
अशक्य हो जायगा, इसलिये उनका अनर्थक मानना ही ठीक है।
७—इस लिये भी मन्त्र अनर्थक कहे जा सकते हैं, कि—उनमें
ऐसे शब्द भी आते हैं, कि—जिनका स्पष्ट रीतिसे कोई अर्थ ही
प्रतीत नहीं होता। जैसे—"अम्यक्, यादृश्मिन्, जारयायि,
काणुका" इत्यादि। क्योंकि—मन्त्रोंमें इनका कुछ स्पष्ट अर्थ
जाना नहीं जा सकता। ऐसी कल्पना भी नहीं हो सकती कि—
“मन्त्रोंमें कुछ शब्द अनर्थक हैं, और कुछ अर्थवान्”। क्योंकि—
इसमे अर्द्धावशेष रह जायगा, इस लिये सारे ही अनर्थक हैं यह
मानना अच्छा है।
परिसमाप्तः पूर्वपक्षः ।
मन्त्रोंकी सार्थकताकी स्थापना ।
१—यास्क—"मन्त्र अर्थवान् ही हैं" किन्तु कौत्सके कथना-
नुसार अनर्थक नहीं। क्योंकि—लोक और वेदमें समान ही
शब्द हैं, अर्थात् जो 'गो' शब्द लोकमें स्वर-संस्कार युक्त है,
वही मन्त्रोंमे भी है, ऐसी अवस्था में 'वही शब्द लोकमें अर्थवान्
रहे और मन्त्रोंमें अनर्थक'—इसमें कोई विशेष हेतु नही है। जब
हिन्दी निरुक्त । १३१
कि—'विशेष हेतु नहीं है' तो शब्दोंकी समानतासे मन्त्र अर्थवान्
हीं हैं ।
२—कौत्सने कहा है कि—"लोकमें शब्दोंको अनियमसे प्रयोग
करनेके कारण शब्द अर्थवान् हैं" और वेदमें शब्दोंके प्रयोगके
नियम होनेके कारण मन्त्र अनर्थक हैं"—यह अयुक्त है ।
क्योंकि—लोकमें 'जो दो शब्द हैं' उनके पौर्वापर्यका परिवर्त्तन
नहीं हो सकता ।
३—ब्राह्मण ग्रन्थ भी स्पष्ट रूपसे मन्त्रोंकी अर्थवत्ताको
कह रहा है कि—
“एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं यद्रूपसमृद्धं यत्कर्मक्रिय-
माणमृग्यजुर्वाऽभिवदति” इति च । [ब्राह्मणम्]
'यह यज्ञकर्मका समृद्ध है, वह क्या ? जो रूप समृद्ध या
मन्त्रलिङ्गोंसे कहा गया हों, अर्थात् किये जाते हुए कर्मको ऋचा
अथवा यजू रूप मन्त्र अनुवाद करता हो ।
अब देखें कि—यदि मन्त्र अनर्थक हैं, तो कैसे कर्मको अनु-
वाद करेंगे ? यदि अनुवाद नहीं करते तो कर्मका समर्थन कैसे
करेंगे ? सर्वथा इस ब्राह्मण वाक्यसे मन्त्रोंकी अर्थवत्ता स्पष्ट
उक्त होती है ।
ब्राह्मणको अनर्थकता स्वीकार करके तुम इस प्रमाणको निष्फल
कर सकते हो, किन्तु तुम्हारा यह साध्य नहीं, क्योंकि—तुम
पहिले ही ब्राह्मणको “ब्राह्मणेन रूपसम्पन्ना विधीयन्ते” इस
वाक्यसे अर्थवान् स्वीकार कर चुके हो । इससे यह दिखाया जा
चुका कि—मन्त्र अर्थवान् हैं ।
“इहैव स्त॑ मा वियौष्टं॒ विश्वमायु॒र्व्यश्नुतस् ।
क्रीळ॑न्तौ पु॒त्रैर्नप्तृ॑भि॒र्मोद॑मानौ स्वे गृ॒हे”
१३२ अ० १ पा० ५ ख० १ ।
सूर्य ऋषि । अनुष्टुप् छन्दः । विवाहमें विनियोग ॥ इसी
अपने घरमें तुम दोनों स्त्री-पुरुष मोद या हर्षयुक्त हो। तुम कभी
वियुक्त न हो।
बेटे और पोतोंके साथ क्रीड़ा करते हुए, पूर्ण आयुको भोगों।
यह आशीर्वाद है। विवाह कर्मका समस्त प्रयोजन इस मंत्रमें स्पष्ट
वर्णन किया है।
(पूर्वपक्षका खण्डन)
सिद्धान्तीने मन्त्रोंकी अर्थवत्ताको स्थापना कर दी, अब पर
पक्षमें जो हेतु हैं, उनका खण्डन करते हैं।
१—मन्त्रोंकी अनर्थकतामें पहिला हेतु यह दिया है कि—उनमें
शब्द तथा उनका क्रम नियत रहता है, हम कहते हैं कि—अर्थवाले
लौकिक शब्दोंमें भी ऐसा देखा गया है, जैसे कि—"इन्द्राग्नी”
"पितापुत्रौ”। जबकि—लौकिक शब्दोंमें भी नियत प्रयोग होते
हुए कोई शब्द अर्थवान् है, तो मन्त्रोंको अनर्थकताके लिये वही हेतु
अनैकान्तिक अथवा व्यभिचारी है। इससे मन्त्र अर्थवान् ही हैं।
२—दूसरा हेतु यह कि--‘ब्राह्मणसे रूपसम्पन्न या अर्थके बोधक
होते हुए भी मन्त्र विधान किये जाते हैं’ ठीक नहीं। क्योंकि-
उसका यह प्रयोजन नहीं कि—'मन्त्र अपने स्वरूपसे अपनेको ही
विधान करनेमें समर्थ है, इस लिये उसको ब्राह्मण विधान करता
है,’ बल्कि—मन्त्रके कहे हुए अर्थको ही, उसकी विस्तारसे प्रशंसा
या अनुमोदन करनेकी इच्छासे अनुवाद करता है। अर्थात् लोक,
एकवार, संक्षेप तथा बिना प्रशंसाके कहे हुए अर्थको ग्रहण नहीं
करता, इसीसे मन्त्र जिस अर्थको एकवार संक्षेपसे प्रशंसाके बिना
कहा जाता है, उसीको ब्राह्मण दुबारा विस्तारसे प्रशंसा पूर्वक कह
देता है, और यह भी है कि—जबतक कोई बात कही हुई न हो,
अचानक उसकी प्रशंसा नहीं होसकती, इसलिये जिस अर्थकी
हिन्दी निरुक्त । १३३
ब्राह्मण प्रशंसा करे, वह अर्थ पहिले किसोका कहा हुआ होना
चाहिये, किन्तु ऐसी आकांक्षाको सहजन्मा मन्त्रके अतिरिक्त और
कौन पूरीकर सकता है। फल यह निकला कि—'मन्त्र अर्थवान्
होकर भी ब्राह्मणसे विहित होता है, इससे वह अनर्थक नहीं होना
चाहिये, प्रत्युत ब्राह्मणकी अर्थवत्ताके लिये उसे अर्थवान् होनेकी
बड़ी आवश्यकता है। इस निर्णयके अनुसार कौत्सके मतमें, 'जो
ब्राह्मणका अर्थवत्ता मन्त्रको अनर्थक बनाती थी,स्वयम् वही अब
मन्त्रकीअर्थवत्ताके अनर्थक बनाती थी, स्वयम् वही अब मन्त्रकी
अर्थवत्ताके बिना अपने ठहरनेका कोई आधार नहीं पाती। इस
प्रकार ब्राह्मणकी अर्थवत्ताकी सहचरी बनकर मन्त्रकी अर्थवत्ता
निर्विशङ्क विराजती है।
इसके अतिरिक्त ब्राह्मणकी अर्थवत्ता यो भी है कि—किसी
किसी प्रकरणमें समानलिङ्ग अनेक मन्त्र होते है,जो सब समानरूपसे
एकही कर्मको बोधन करते हैं, इससे या तो वे सभी कबूतरोंके समान
एकदम उस कर्ममें आवें, या उनका विकल्प हो ? वैसे स्थलमें
किसी अभिमत एक मन्त्रका नियम कर देता है कि—इस कर्ममें
यही मन्त्र लिया जाय। इस प्रकार ब्राह्मणकी स्वतन्त्र आवश्यकता
है, उसके कारण मन्त्र अनर्थक नहीं हो सकते। इससे सिद्ध
हुआ कि—"मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही अर्थवान् हैं।
३—जोकि--यह कहा कि—"ओषधे त्रायस्वैनम्” “स्वधिते
मै॒नं॒ हिं॑सीः” इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ उत्पन्न नहीं होता इस
लिये मन्त्र अनर्थक है' ? ठीक नहीं है। क्योंकि—जहां केश या
वृक्ष आदिके छेदनमें यह मन्त्र विनियुक्त है, वहां इस मन्त्रके द्वारा
ओषधिके अधिदेवताको स्तुति की जाती है और उसीसे जजमान
और वृक्ष आदिकोंके प्राणकी प्रार्थना है। जिससे कि—देवताकी
१३४ अ० १ पा० ५ सू० १ ।
कृपा से निर्विघ्न पीड़ारहित संस्कृत होकर वे यज्ञकर्ममें विनियुक्त
हों। इसलिये मंत्रोंके अर्थोंमें कोई अनुपपत्ति नहीं है।
४-जोकि—यह कहा कि—हिंसा करता हुआ भी कहता है
कि—“स्वधिते मैन ्र ति ्र सीः” इसपर कहना यह है कि-वेद-
वाक्यसे यह अहिंसा प्रतीत होगी।
प्रश्न होता है कि—प्रत्यक्षमें छेदन कर्म हिंसा है वह कैसे
अहिंसा होसकती हैं ?
सुनो;—‘यह अहिंसा है’ और यह हिंसा’ यह आगमसे प्रतीत
होता है। और सम्पूर्ण आगमोंमें वेद ही प्रतिष्ठित आगम है,
क्योंकि—सब अंग वेदसे ही निकले हैं। इसलिये वेदमें जिस
छेदनादि क्रियाका विधान है, वह हिंसा नहीं कही जासकती।
इन सबका यह अभिप्राय है कि—वेदवाक्य, जो धर्मका प्रथम
बतानेवाला है, उसीसे हिंसा और अहिंसाका पता चलेगा, जिसको
वह हिंसा कहे वह हिंसा है,और जिसको अहिंसा कहे,वह अहिंसा।
जबकि—हिंसा-अहिंसाका निर्णता वेदही छेदनादि क्रियाका
विधान करता है तो उसको हिंसा नहीं समझना चाहिये। जैसे
कि कहा है,—
“या वेदविहिता हिंसा न सा हिंसा प्रकीर्त्तिता”
अर्थ—‘जो हिंसा वेदमें विहित है वह हिंसा नहीं है।’ क्योंकि—
वैदिक आगम सारे ही जगत्के किसी एक उत्तम कल्याणके लिये
उद्यत हुआ है, वह कैसे किसी प्राणीके अनिष्टके लिये विधान
करता, इसलिये उसने जो कुछ किसी प्राणीके लिये छेदनादि
कहा है, वह उसकी उत्तम गतिके लिये ही है।
किञ्च ओषधि, वनस्पति, पशु, मृग, पक्षी, तथा सरीसृप सब,
यज्ञमें भले प्रकार उपयुक्त होकर उत्कर्ष को प्राप्त होते हैं। वह
उनकी हिंसा नहीं, लाभ है।
हिन्दी निरुक्त। १३५
हम समझते हैं कि-ठीक यही अभिप्राय निम्न लिखित मार्क-
ण्डेयपुराणके सप्तशती स्तोत्रमें भी दिखाया है ।
"एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते कुर्वन्तु नाम
नरकाय चिराय पापम् । संग्राम मृत्यु मधि-
गम्य दिवं प्रयान्तु मत्वेतिनून महिमान्विति-
हंसि देवि !" (४,१८) ।
अर्थ:-"हे देवि ! संसारमें अशान्तिके उत्पन्न करनेवाले इन
राक्षसोंको तुम समदर्शिनी होकर भी इसलिये मारती हो कि-
'इनके मरनेसे सब जगत् सुखी हो, तथा ये (दैत्य) नरकमें जानेके
लिये बहुत कालतक पाप करें, इसकी अपेक्षा संग्राममें मृत्युको
प्राप्त होकर, स्वर्गमें जावें, अच्छा होगा ।” अर्थात् भगवती
उनके अनिष्टके लिये नहीं प्रत्युत उनके अभ्युदयके लक्ष्यसे उनका
वध करती है इसी तात्पर्यके साथमें भगवान् वेद भी वृक्षादिकोंकी
हिंसाका विधान करता है। इस रीतिसे मंत्रोंमें ऐसा कोई अर्थ
नहीं जो अनुपपन्न हो, अतः मंत्र अर्थवान् हैं।
(५) परस्पर विरुद्ध अर्थके उदाहरणसे भी मंत्रोंकी अन-
र्थकता नहीं है, क्योंकि-यह बात दैवतकाण्ड (७, १, ४) में
स्पष्ट कही जायगी कि-'देवता महाभाग्यके योगसे एक भी अनेक
होजाती है और अनेक होती हुई एक । इस कारण एक रुद्र अनेक
रूप होसकतो और अनेक एक, इसलिये मंत्रोंमें कोई ऐसा विरोध
न होनेसे मंत्र अर्थवान् हैं ।
(६) इन्द्रके शत्रुरहित होने और उसके सैकड़ों शत्रुसेनाओंके
जीतनेका प्रश्न भी युक्त नहीं, क्योंकि-लोकमें भी “असपत्नोऽयं
ब्राह्मणः” 'यह ब्राह्मण शत्रु रहित है' “अनमित्रोऽयं राजा” 'यह
अ० १ पा० ५ ख० १ ।
राजा वैरीशून्य है' इत्यादि व्यवहार प्रसिद्ध हैं। किन्तु लोकमें कोई
शत्रुरहित नहीं है। जैसाकि—कहा है—
मुनेरपि वनस्थस्य स्वाति कर्माणि कुर्वतः ।
उत्पद्यन्ते त्रयः पक्षा मित्रोदासीन शत्रवः ।
अर्थ—मुनि जो वनमें रहकर केवल अपने कर्मोंको करता है,
उसके भी मित्र उदासीन और शत्रु ये तीन पक्ष उत्पन्न होजाते हैं।
तथापि किसीको कोई स्वल्पशत्रु देखकर ऐसा कह देता है कि-
‘वह अशत्रु है’ इसी प्रकार जब इन्द्रने किसी बड़े भारी मेघका हनन
किया, उस समय अन्यमेघोंकी असारता जानकर कह दिया कि--
हे इन्द्र ! अब तू अशत्रु होगया, जैसा कि--किसीके भारी शत्रुके
नष्ट होजानेपर क्षुद्र शत्रुओंके रहते हुए भी उसे अशत्रु कहा जावे,
उसीके समान इंद्रकी अशत्रुता भी होसकती है।
यद्यपि देवताओंके कोई शत्रु नहीं होते, बल्कि—वे विभुस्व-
तंत्र तथा महिमावाले होते हैं तथापि सैकड़ों सेनाओंके जीतनेकी
स्तुति कल्पनामात्र है। क्योंकि—आगे कहेंगे कि-“जल और
ज्योतिः के योगसे वर्षण कर्म होता है” वहां उपमाके लिये युद्धका
वर्णन होता है” (नै० का० २, ५, २) । इसलिये हे कौत्स !
तुम्हे यह ठीक नहीं दिखाई देता, निरुक्तके जाननेवालोंसे देवता
तत्वको समझो, उसीसे तुम मन्त्रोंके अर्थोंको विरोध रहित जान
सकोगे। इस प्रकार (जैसाकि—तुम करते हो) वाक्यके तत्वके
न जाननेवालेसे मन्त्रार्थ अवगाहन नहीं किया जा सकता।
क्योंकि—वेदके पदार्थ गम्भीर हैं। कैसे जानोंगे ? वेदार्थके
विचारमें भ्रान्त वादियोंने ही अपनी बुद्धिके लाघवके प्रकट करने
के लिये सर्व-वर्णा साधारण दर्शनोंको प्रतिपादन किया है, उन्हींके
चक्रमें तुम भी कहीं पड़ गये हो। अतः तुमने जो कहा है
कि—“विप्रतिषिद्धार्थ होनेसे मन्त्र अनर्थक हैं” यह तुम्हारा कहना
ठीक नहीं है, क्योंकि 'ये मन्त्र विप्रतिषिद्धार्थ नहीं हैं, किन्तु मन्द
शिक्षाके कारण तुम्हारी बुद्धिका ही यह दोष है, इसलिये “मन्त्र
अर्थवान् हैं”।
जानते हुएकी प्रेरणाका प्रश्न भी अयुक्त है, क्योंकि लौकिक
अर्थवाले शब्दोंमें भी यही स्वभाव देखा गया है। जानते हुए गुरुको
अभिवादन करते हुए शिष्य अपना गोत्र कहते हैं, तथा जानते
हुए वर आदिको मधुपर्क देता हुआ तीनवार “मधुपर्को मधुपर्को
मधुपर्कः” ऐसा कहता है। इस तरह जैसे अर्थवान् शब्दोंमें भी
विहित अर्थके प्रकाश करनेके लिये शब्द प्रयोग होता है, वैसे ही
वेदमें भी “अग्नये समिध्यमानायानुब्रूहि” इत्यादि मन्त्र जानते
हुए भी होता आदिके लिये कहे जाते हैं। इसलिये मन्त्र अर्थ-
वान् हैं।
६—जोकि—“अदितिः सर्वम्” इसमें यह आक्षेप किया कि—
विभिन्न वस्तुओंको एक वस्तुमें देखना मन्त्रोंकी अनर्थकताको सिद्ध
करता है। यह भी ठीक नहीं है। क्योकि—शब्दकी प्रवृत्ति दो
प्रकारकी होती है, एक मुख्यार्थ और दूसरी गौणी। इससे यह
स्वारस्य निकला कि—जहां मुख्य अर्थ असम्भव हो वहां गौण
अर्थ स्वीकार करना। जैसे किसीने किसीके बहुत उपकार किये
हैं और वह उस उपकारीसे कहे कि—'तू ही मेरी माता और तू ही
पिता है' उसी प्रकार इसको भी देखना चाहिए। जिस प्रकार
लौकिक अर्थवाले शब्दोंमें भी देखा गया है कि—“जिसे पानी मिल
गया उसे सभी रस प्राप्त हो गये” उसी प्रकार यहां भी अदितिकी
सर्वरूपता किसी तरह कही गई है। इससे जोकि—तुमसे यह
कहा कि—'मन्त्रोंमें परस्पर विरुद्ध बहुत कुछ कहा हुआ है? यह
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-अयुक्त है, क्योंकि—मन्त्रोंमें सब उपपन्न होता है। तिससे 'मन्त्र
अर्थवन् हैं' यह सिद्ध हुआ ।
७—फिर यह कहा कि—मन्त्रोंमें बहुत ऐसे शब्द हैं जिनका
कुछ अर्थ स्पष्ट नहीं होता, जैसे अम्यक् इत्यादि। यह भी ठीक
नहीं। क्योंकि—"यह स्थाणु (खूँठ) का अपराध नहीं कि उसे
अन्धा न देखे" "किन्तु वह पुरुषका अपराध है" अर्थात् पुरुषका
ही वह अपराध है कि—वह नेत्ररहित है। इसी प्रकार यहां भी
मन्त्रोंका कोई अपराध नहीं है, कि—आप अशिक्षित होनेसे अर्थोंको
न जाने। किन्तु वह आपका अपराध है, हे सज्जन ! आप सब अपने
अपराधोंको मन्त्रोंमें अथवा हमारेमें लगाना चाहते हो' वास्तवमें
तुम्हें कुछ प्रज्ञा नहीं है।
जिस प्रकार लौकिक शिल्पकलादिकोंमें कोई पुरुष शिक्षित
होकर अन्य पुरुषोंकी अपेक्षा उन क्रियाओंमें वह विशेष हो जाता
है, उसी प्रकार यहां पर भी मन्त्रार्थकी शिक्षासे कोई पुरुष अन्य
पुरुषोंसे विशेष हो जाता है। ऐसी स्थितिमें कोई पुरुष स्पष्ट
मन्त्रोंका भी निर्वचन नहीं कर सकते और कोई गूढ़ मन्त्रोंके भी
अर्थोंको स्पष्ट करनेमें समर्थ होते हैं। यही बात "उतत्वः”
(ऋ० सं० ८, २, २३, ४) इस ऋचामें कही गई है।
इसी प्रकार वेद-शास्त्रके आद्यन्तके जाननेवाले ब्राह्मण जो कि—
साक्षात्कृतधर्मा नहीं हैं, उनमें जो अधिक विद्वान् होता है, वही
श्रेष्ठ होता है। जो ब्राह्मण मन्त्रोंके अर्थोंका विज्ञाता होता है, वही
प्रशंसनीय होता है किन्तु अन्य जो मन्दबुद्धि एवम् अशिक्षित पुरुष
नहीं। क्योंकि—बहुश्रुत पुरुष अनेक विषयोंवाले मन्त्रार्थमें कहीं
भी रुकता नहीं, उसको कोई अर्थ भी गुप्त नहीं है। इस कारण हे
कौत्स ! तुम विस्तारसे सुनो ! उससे तुम मन्त्रार्थोंको जानोगे।
जैसाकि—तुमने पहिले कहा है कि—'मन्त्र अविस्पष्टार्थ हैं"
वे अविस्पष्टार्थ नहीं हैं, और उनको स्पष्ट करके हम व्याख्यान
हिन्दी निरुक्त । १३३
भी करेंगे। यह संमोह तुम्हारी मतिको घुमाता है। इससे 'मन्त्र
अर्थवान् हैं" यह सिद्ध हुआ । और इससे यह शास्त्र भी मन्त्रोंके
अर्थ के जनानेके लिये सार्थक हो हैं, इससे शास्त्रका आरम्भ भी
सिद्ध हुआ । इस कारण वहां तुमने यह कहा कि—‘यदि मन्त्रार्थ-
के जाननेके लिये यह शास्त्र आरम्भ किया जाता है तो अनर्थक
है' यह अयुक्त है ।
इस रीतिसे वादीके हेतुओंका निराकरण हो जाने पर अपने
पक्षकी सिद्धिमें हेतु उठे और मन्त्रगणकी सार्थकता तथा उसके
लिये इस शास्त्रको प्रयोजनवत्ता सिद्ध हुई ।
॥ समाप्तः पञ्चमः पादः ॥
षष्ठः पाद ।
(खं० १ )
अथापि इमन्तरेण पदविभागो न विद्यते ।
“अवसाय पद्वते रुद्र मृल”-इति । पद्वत् अवसं
गावः पथ्यदनम् । अते र्गत्यर्थस्य असौ नाम करणः ।
तस्मात् न अवगृह्णन्ति । “अवसायाश्वान्”-
इति । स्यतिः उपसृष्टः विमोचने, तस्मात् अव-
गृह्णान्ति । ‘दूतो निर्ऋत्या इदमाजगाम” इति ।
पञ्चम्यर्थ प्रेक्षा वा षष्ठ्यर्थप्रेक्षा वा, आः कारा-
न्तम् । “परो निर्ऋत्या आचष्ट्व”-इति । चतुर्थ्यर्थ
प्रेक्षा, ऐकारान्तम् । “परः संनिकर्षः संहिता” ।
पद प्रकृतिः संहिता । पद प्रकृतीनि सर्वचरणानां
१५० अ० १ पा० ६ ख० १ ।
पार्षदानि । अथापि यज्ञेदैवतेन बहवः प्रदेशा
भवन्ति । तत् एतेन उपेक्षितव्यम् । ते चेद् ब्रूयु
'लिङ्गज्ञा अत्र स्मः' इति । "इन्द्रं न त्वा शवसा
देवता वायुम्पृणन्ति" – इति । वायुलिङ्गञ्च इन्द्र-
लिङ्गञ्च आग्नेये मन्त्रे । "अग्निरिव मन्यो त्विषितः
सहस्वः"-इति । तथा अग्निर्मान्यवे मन्त्रे त्विषितः-
ज्वलितः । 'त्विषिः'-इत्यपि-अस्य दीप्तिर्नाम भव-
ति । अथापि ज्ञान प्रशंसा भवति, अज्ञान
निन्दा च ॥ १ ॥
अनुवाद ।
और भी इस ( निरुक्त ) के बिना पद विभाग ( पाठ ) नहीं
है, या हो सकता है । [ ज से– ] "अवसायं पद्धते रुद्र मृळः"
[ ऋ० सं० ८, ८, २७, १ ] हे रुद्र ! पैरवाले अवस या अन्नके लिये
सुखरूप हो । पद्धत् = पैरवाला, अवस = खाद्य, गोरूप, –जो पाथेय
या पथिभोजन है । गत्यर्थक 'अव' धातुसे यह ( अवस ) नाम
बनता है । इससे इसमें अवग्रह नहीं करते । "अवसायाश्वान्"
[ १, ७, १८, १ ] हे इन्द्र! घोड़ोंको [ रथसे ] अलग करके । यहां
'षो' ( सा ) अन्तर्कमणि, धातु 'अव' उपसर्गके साथ विमोचन
या छोड़ देने अर्थ में है । इससे यहां 'अव' और 'सा' का विभाग
दिखानेके लिये अवग्रह या रुककर पाठ करते हैं । "दूतो निर्ऋत्या"...
[ ऋ० सं० ८, ८, २३, १ ] हे देवगण ! निर्ऋतिका या निर्ऋति
से ( कपोत ) दूत इस ( घरमें ) आया । यहां [ निर्ऋत्याः पदमें ]
पञ्चमीके अर्थका ग्रहण अथवा षष्ठीके अर्थका ग्रहण होता है।
हिन्दी निरुक्त । १४१
'आः' कार अन्तम है। परा निर्ऋत्या आचक्ष्व" [ऋ० सं० ८, ८,
२४, १] हे व्याधे ! तू अलग जा, निर्ऋति या मृत्युके लिये कह ।
यहां चतुर्थीके अर्थका ग्रहण है। [ निर्ऋत्यै ] ऐ कार अन्तमें है ।
वर्षोंका अत्यन्त सामीप्य संहिता होती है। पदोंकी प्रकृति या
कारण संहिता है। अथवा पद रूप प्रकृतिसे संहिता (विकृति)
है। सब शाखान्तरोंके प्रातिशाख्य या शिक्षा ग्रन्थ पदोंको ही
संहितामें प्रकृति बताते हैं ।
और भी [प्रयोजन], यज्ञ कर्मके होते हुए देवताका लिङ्ग
मन्त्रके बहुत स्थानोंमें प्रतीत होता है, जो कि इस निरुक्तसे ही
निश्चय होने योग्य है। यदि वे [ याज्ञिक लोग ] कहें,-कि-हम
लिङ्गके जाननेवाले हैं। [तो-] "इन्द्रं न त्वाः [ऋ० सं० ४, ५, ६, २]
हे अग्ने ! तुझे देवता इन्द्रके समान और वायुके समान मानते हैं।
इस अग्निके मन्त्रमें वायुका लिङ्ग और इन्द्रका लिङ्ग (बोधक) है।
"अग्निरिव०" [ ऋ० सं० ८, ३, १६, २ ] हे मन्यो ! अग्निके समान
दीप्तियुक्त होता हुआ सहन करनेवाला हो। वैसे ही यहां मन्युके
मन्त्रमें अग्निका लिङ्ग है । 'त्विषित' नाम ज्वलितका है । 'त्विषि'-
इसका भी दीप्ति नाम होता है।
और भी [निरुक्तका प्रयोजन।] वेदमैं भा ञ्ज्ञानको प्रशंसा
होती है, और अञ्ज्ञानकी निन्दा ॥ १ ॥-
विशेष-मूलमें 'त्विषि रित्यप्यस्य दीप्तिर्नाम भवति' इसके
स्थानमें 'त्विषि रित्यपि देप्तेर्नाम भवति' -ऐसा युक्त पाठ प्रतीत
होता है। कारण 'त्विषि' यह भी दीप्तिका नाम है, यद्यपि दीप्ति
नामोंमें पढा हुआ नहीं। ऐसे अथसे ही प्रकरणकी सिद्धि
होती है।