निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
, हिन्दी निबन्ध । ४१ ऐसी स्थितिमें नाम, आख्यात, निपात और उपसर्ग चारों ही एकसाथ वर्तमान रहते हैं इसलिए उनकी गणना जो हमारे मतमें है युक्ति-सम्पन्न है । इस मतमें शब्द नित्य है इससे उसकी उत्पत्ति नहीं होती, अभि- व्यक्ति (प्रकटता) होती है, जैसे—नवीन मृन्मय पात्रमें जलके योग से गन्ध और निर्वात देशमें व्यजनके हिलानेसे वायु प्रकट होता है, किन्तु उत्पन्न नहीं, ऐसे ही वायुके ताल्वाद्यभिघातसे शब्द व्यक्त होता है उत्पन्न नहीं । सुतराम्, पदकी चतुष्ट्व संख्याकी उपपत्ति इस मतमें अच्छी रीतिसे होजाती है । । गोविषाणके दृष्टान्तसे परस्पर पदोंके गौणमुख्यभावका आक्षेप भी ठीक नहीं है, क्योकि एककालम उत्पन्न होनेवाले मन्त्रिपुत्र और राजपुत्रका गौणमुख्यभाव देखा जाता है अतः नामकी आख्यातमें गौणता और उसकी उसमें मुख्यता युक्ति संगत है । शास्त्रकृत योग, जो धातु उपसर्ग तथा आगम, आदेश आदिका परस्पर सम्बन्ध है वह पहिले अयुक्त ठहराया गया है, सोभी ठीक नहीं हैं क्योंकि इस सिद्धान्तके अनुसार पुरुषके अन्तःकरणमें शब्द और उसका अभिधेय (वाच्य) तथा सम्बन्ध ये तीनों बुद्धि रूपसे स्थित रहते है, उन्हीं बुद्धिमय शब्दोंमें व्याकरणके बताये हुए सब विकार होते है, और वास्तविक शब्दोंमें आरोप किये जाते हैं, जब पुरुष किसी अर्थको दूसरेके लिए प्रकाशित करना चाहता है, उस समय उस अर्थके वाचक शब्दको अभिव्यक्तिके लिए अपने आत्माके गुणभूत प्रयत्नसे नाभिदेशसे वायुको प्रेरित करता है, वह वायु उठकर वक्षःस्थल आदि देशमें टकराता हुआ मुखके द्वारसे बाहर आता है, भीतरसे बाहर आनेके ६
४२ अ० १ पा० १ सू० २ । समय प्रकाशनीय शब्दके अक्षरोंके क्रमसे वहीं वहीं जाकर लगता है। जहांसे इसके अक्षर प्रकट होते हों, इसी रीतिसे वायुके साथ वक्ताका अभीष्ट शब्द उसके मुखसे बाहर निकल कर श्रोताके श्रोत्रेन्द्रियमें प्रवेश कर उसके आत्मामें भावनारूपसे जो वैसा शब्द स्थित है, उसको स्मृतिपथमें ले आकर उसका अर्थ श्रोता को प्रतीत होते ही अन्तर्धान हो जाता है, यदि शब्दकी पूर्णरूप में स्थिति न होती तो “घट मानय” आदि वाक्यकं श्रवणसे जो श्रोता घट ले आता है, वैसा क्यों होता ? ऐसा होनेसे ही शब्दों की गणना उनके परस्पर गौण मुख्य व्यवहार तथा धातुओंसे उपसर्गों वा प्रत्ययोंके योग और उनको आगम आदेश आदि विकार होते हैं, बुद्धिके द्वारा उन उन शब्दोंमें मानना सिद्ध होता है। शब्दके अनित्यत्वपक्षमें समाधान । अनित्यत्व पक्षमें भी पुरुषके प्रयत्नसे उत्पन्न होकर दूसरे को अर्थज्ञान कराके शब्दकी व्यक्तियोंका ही ध्वंस (नाश) होता है, किन्तु उनकी आकृति विद्यमान रहती हैं, वे अपनी अभिधान शक्तिसे बुद्धिके द्वारा अवस्थित होकर अपने अर्थोंको प्रकाशित करती हुईं स्थित ही रहती हैं। उनमें साक्षात् पदों की संख्या रहती है और वही संख्या विनाशिनी व्यक्तियोंमें लक्षणसे मान ली जाती है। इस लिए शब्दके व्याप्तिमान् होने से पद चतुष्ट्वादि सब समीचीन हैं। और वस्तुओंसे शब्दका प्रयोजन नहीं होता। (नि०) अणीयस्त्वाच्च शब्देन संञ्जाकरणं व्यवहारार्थं लोके । शब्दके समान चिन्ह, या इशारे भी अर्थके जनानेमें काम
हिन्दी निरुक्त । ४३ दे सकते हैं, किन्तु शब्द एक ऐसा सूक्ष्म साधन है, जिसके द्वारा थोड़ी देरमें बहुत कुछ समझाया जा सकता है, किन्तु चिन्हों या अभिनयोंमें बड़ा क्लेश तथा गौरव है, इस लिये शब्दके द्वारा वेद शास्त्रके अध्ययन गौरवका आक्षेप निर्मूल है, शब्दके द्वारा जितना और जो कुछ जाना जा सक्ता है और किसी उपाय से भी नहीं, इससे अन्य अन्य उपायोंका भी इसके साथ खण्डन हो गया। वेद और शास्त्रोंके अध्ययनसे ही अभ्युदय (आत्मोन्नति) हो सकता है, उसीके लिये शास्त्रके आरम्भमें यत्न किया जाता है। इन्हीं शब्दोंसे देवताओंके साथ व्यवहार। (नि०) तेषां मनुष्यवद्देवताभिधानम् । यही पद जो नाम आदि भेदसे चार प्रकारके हैं, मनुष्योंके समान देवताओके भी अभिधानमें समर्थ हैं, अर्थात् वेदमें देव- ताओंके अर्थ जो हविः दी जाती है, या उनसे कुछ प्रार्थना की जाती है, तो इन्हीं शब्दोंके द्वारा होती है। मन्त्रोंका प्रयोजन । (नि०) पुरुषविद्यानित्यत्वात्कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे । वेदमें मन्त्रोंका समाम्नान इसलिये किया गया कि—यदि मनुष्य स्वतन्त्रतासे इन शब्दोंके द्वारा यज्ञमें हविके दान आदि करनेको देवताओंसे व्यवहार करेंगे तो अपने अशिक्षितत्व मन्दशिक्षितत्व तथा विस्मरणशीलत्व दोषसे नाम आख्यात आदिकोंका यथावत् प्रयोग न करेंगे और देवताओंके अपराधी बनेंगे, क्योंकि देवता सब अर्थों- को प्रत्यक्ष देखते हैं, वे थोड़े अयुक्त अभिधानको भी सहन न करेंगे, इसकारण उनके यज्ञको त्याग देनेसे कर्म निष्फल होजायगा,
४५ अ० १ पा० १ खं० २ । और मन्त्रोंमें येही नाम आदि पद विशिष्ट परिपाटीसे पढ़े हुये हैं, उनके द्वारा कर्म करनेसे भूलनेकी त्रुटि नहीं होगी, इसी कर्म-सम्पत्ति- के लिए वेदमें मन्त्र संमाम्नात हुए हैं। नामादिकोंके व्याख्यानका प्रयोजन । सार यह है कि—इन्हीं चारों पदोंसे मन्त्र व्याप्त हैं, अर्थात् पद चतुष्टयही परिपाटी विशेषसे पढे हुवे मन्त्र कहाते हैं, इससे इनके ज्ञान द्वारा मन्त्रार्थका ज्ञान होसकता है। इसीलिए हमने इनका लक्षण उदाहरण द्वारा बोध कराना आरम्भ किया है। लक्षणकी आवश्यकता । यदि लक्षणका अनादर कर शब्दोंकी गणना कीजावे तो उनके अनन्त होनेसे वह हो न सकेगी और न ग्रन्थही पूर्ण होसकता है, तथा अध्येताकी शक्ति भी क्षय होजायगी, विद्वानोंने पदार्थोंके लक्षण द्वाराही उनका अन्त प्राप्त कियाहै। अतः हम भी उक्त प्रयो- जनके लिए लक्षणका अवलम्बन करते हैं। भावके सामान्य व विशेषरूपके दिखानेके अनन्तर पदकी अनि- त्यतासे उठे हुए प्रश्न तथा अन्य २ जो कुछ दिखाया गयाहै, वह प्रसङ्गवशसे कहागयाहै, अब फिर भावके सम्बन्धमें ही जो रहगया है उसे दिखाते हैं। भावके दो रूप हैं एक कार्य और दूसरा कारण । अब तक भावके सम्बन्धको लेकर जो दिखाया गयाहै, वह कार्य भावका है, अर्थात् क्रियासे बननेवाला वस्तु भावहै, अथवा क्रियाही भावहै। अब कारणस्वरूप भावका निरूपण किया जाताहै । प्रलयकालमें जब पुरुषोंके सुख-दुःखके उपभोगका प्रवाह बन्ध होजाता है, तब क्रिया और द्रव्य अपने २ विशेषोंको त्यागकर, कार्यात्मतासे अतीत (पार) होकर एक अविशिष्टरूपसे स्थित होजाते हैं, जिसको हम सत्तामात्रसे सम्बन्ध रखनेवाला आत्म-भाव
कह सकते हैं। अर्थात् अत्यन्त अविनाशधर्मवाला आत्मांही भाव पदार्थ है। इस कारण भूतभावका प्रसङ्ग यहां पर इसलिए आया कि— जगत्के स्थितिकालमें इसी भावके विकार द्रव्य, गुण, तथा कर्म- के रूपमें होकर नाम, आख्यात उपसर्ग और निपात इन चतु- र्विध पदोंसे बोले जाते हैं; और स्वयम् वह भी (भाव) सब विशेषोंसे रहित तथा होने मात्र (सत्तामात्र) क्रियासे सम्बन्ध रखता हुआ उपपद रहित 'भवति' एवम् 'भावः' इन दोनोंसे बोला जाताहैं ! अर्थात् कारण भावके वाचक ये दो पद हैं, और कार्य भावके 'पचति-पठति-गौः-अश्वः' इत्यादि सम्पूर्ण पद। इस प्रकार 'भवति' और 'भावः' इन दोनोंकी वृत्तिके विवेचनार्थ ही उक्त भाव- का प्रसङ्ग लाया गया है। पूर्वपक्ष। सांख्याचार्य कहते हैं कि—जो तुमने कारणभूत भाव बताया है, वह हमारा प्रधान या मूल प्रकृति है, किन्तु आत्मा नहीं ? खण्डन। प्रधान या प्रकृति भी उस भावका विकार ही है, किन्तु भाव नहीं, क्योंकि वह प्रधान-भाव नामसे बोला जाताहै, जिस वस्तुके बतानेके लिए 'भाव' पदके साथ विशेषण जोड़ा जायगा, वह भाव नहीं, भावका विकार ही रहेगा। कोई सांख्य कहते हैं कि—वह भाव पुरुष है, किन्तु पुरुष इस लिए नहीं कहा जा सकता कि—उनके मतमें उसमें कोई शक्ति स्वीकार नहीं की जाती अर्थात् वह 'प्रकृति-विकृति'-भाव-शून्य है। और हमारे भावमें शक्ति है, जिसके कारण उससे सब जगत उत्पन्न होता है। इसी रीतिके अनुसार ईश्वर तथा परमाणु आदि वस्तुओंको
४६ अ० १ पा० १ ख० २ । भाव बताने वाले भी अपना पक्ष हार गये, क्योंकि—उनके अभिमत पदार्थ 'ईश्वर-भाव' तथा परमाणु-भाव' आदि शब्दोंसे बोले जातेहैं। कोई उस भावको शून्यरूप बताते हैं, किन्तु उनका कहना भी ठीक नहीं, जिससे कि, शून्य शब्दमें भी भाव शब्दका सम्बन्ध आजाता है। प्रयोजन यह है कि, अर्थके बिना कोई शब्द बोला नहीं जाता, शब्द अपने अर्थके साथ सम्बद्ध रहता है, जैसे कि— 'कुछ वह है ? जो शून्य है'। क्यों कि लोकमें भी ऐसा प्रसिद्ध है—'गृहं-शून्यम्' 'ग्रामः शून्यः' 'शून्यशब्द-महत्वे' । इससे यह नहीं कहा जा सकता कि 'शून्य' शब्द अभाव ही को बताता है, किन्तु उसको किसी भावकी अपेक्षा रहती है। फलित यह निकला कि—सब उपपदोंसे रहित जो भवति पद है, उससे जिस भावकी प्रतीति होती है, उसके रूपसे जगत् नित्य है, और अन्य भाव विकार, जो परमाणु आदि हैं, उन सबके रूपमें जगत् अनित्य है। जिस भावमें सत्तामात्रके सम्बन्धसे सभी भाव विकार सदा दूर रहते हैं, उस भावको वेही पुरुष जान सकते हैं, जिन्होंने वेदान्त का रहस्य जान लिया है, एवम् पर अवरके जाननेवाले, आत्मा व वेदके अभिज्ञ, एवं तपः सम्पत्ति आदि अनेक उत्तम गुणोंसे अलङ्कृत तथा आत्मतत्वकी कामनावाले हैं, किन्तु प्रधान आदिके वादमें अभिरत रहनेवाले पुरुषोको ऐसाज्ञान होना असम्भवहै। यह इस सामान्य व विशेष रूपसे शब्दोंके निर्वचन प्रंसगमे कृदन्त भू धातुके वाच्यार्थ बताने को ब्राह्मणोंने वेद रहस्य दिखाया है। वार्ष्यायणि के मतमें भाव विकारोंके भेद। (नि०) “षड्भावविकाराभवन्ति इति वार्ष्यायणिः जायतेऽस्ति विपरिणमते वर्द्धतेऽपक्षीयते विनश्यतीति।”
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“जायते-इतिपूर्वभावस्यादि माचष्टे, नापर भावमाचष्टे. न प्रतिषेधति॑ ।” वार्ष्यायणि आचार्य कहते हैं कि-जैसे-मनुष्य शरीरकी अवस्था बाल्य यौवन तथा वार्द्धक (बुढ़ापा) रुपसे अनेक भागोंमें बटी हुई है, उसी प्रकार भावकी विकारावस्था भी छः भागोंमें बटी हुई है। जब भाव किसी रुपमें विकृत होता है तो उसके हर एक विकारमें जन्म, सत्व, विपरिणाम, वृद्धि, अपक्षय, एवम् विनाश,-ये छः अवस्था होती हैं। इसके उदाहरणार्थ वे सभी वस्तु ली जा सकती हैं; जो जगत्में स्थावर तथा जङ्गम किसी 'रुपमें भी उत्पन्न होकर नष्ट होजाती हैं। इन सभी अवस्थाओंका यह स्वभाव है कि-वे अपनेसे पहिले भावकी अवस्थामें अल्प अल्प मात्रामें बनने लगती हैं, और उसके समयके बीतजाने पर अपना पूरा प्रकाश करती हैं। ध्यानसे देखने पर विदित होगा कि घटके बननेके समय उसकी जन्मावस्था होती है, उस समय उसको 'जायते' या 'जन्मता है' ऐसे क्रियापदसे व्यवहार किया जाता है, किन्तु बन चुकनेसे पूर्व उसे 'घट है' इस वाक्यसे नहीं बोलते, यद्यपि कुछ या घट है नहीं, तो उस अवस्थामें 'घट जन्मता है' ऐसा भी किस आधार पर बोल सकते हैं, इस लिए यह मानना होगा कि-उसकी कोई अव्यक्त या अधूरी अवस्था है, वह पूर्ण न होने तक वैसे वाक्य से व्यवहार नहीं किया जायगा, और न उसका निषेध ही कर सकते हैं। इस प्रकार प्रथम भाव विकार और उसके समय दूसरे सत्तारूप भाव-विकारकी वर्तमानता को सूक्ष्म दृष्टिसे देखना चाहिए। दूसरा भाव विकार और उसमें तीसरे भावका आरम्भ। (नि०) अस्तीत्युत्पन्नस्य सत्त्वस्यावधारणम् । जब पहिला भाव विकार या अवस्था पूरी होलेती है, जिसको
४८ अ० १ पा० १ ख० २ । 'जायते' पदसे बोधन किया जाता है; उसके पश्चात् उत्पन्न हुएका सत्तारूप भावविकार आजाता है, उस अवस्था में 'घटः- अस्ति' 'पटः अस्ति' ऐसे व्यवहार होने लगते हैं। अर्थात् उसकी विद्य- मानता अब उक्त पदसे सुप्रकट रूपमें कही जाती है। तथा उसके साथ तीसरा परिणाम भाव विकार क्रमसे बन रहा है। सब पूर्व या अपर भाव अपने कारणमें एक क्षण या सूक्ष्म काल तक बनते रहते हैं, दूसरे क्षणमें अपने पूर्णरूपमें प्रकट होकर रहते हैं और उसके अनन्तर तृतीय क्षणमें लय होजाते हैं। अपर या उत्तर भाव विकार पूर्वभावके स्थिति क्षणमें गर्भमें रहता है, तथा उसके तृतीय क्षणमें आत्मलाभ करलेता है, जो इस अपर भाव- का द्वितीय क्षण कहा जासकता है। यही प्रकार अन्यत्र २ विचारमें रखना होगा। तीसरा भावविकार और उसमें चतुर्थ भावविकारका आरम्भ। (नि०) विपरिणमते इत्यप्रच्यवमानस्य तत्त्वाद्विकारम्। दूसरे भावका तीसरा क्षणहै और प्रथम भावका चतुर्थ। इस समय दूसरा सत्ता भाव जो अस्तिका बोध्यहै, लय होचुका तथा तीसरा परिणाम भाव पूर्णरूपमें प्रकट और 'विपरिणमते' इस आख्यात पदसे कहने योग्यहै। अर्थात् कोई भी वस्तु या शरीर जब एक अवस्थाकी पूरी सत्ता प्राप्त करलेता है, तो उसे अब और बढ़ना चाहिये, किन्तु वह वृद्धि तबतक नहीं होसकती, जबतक कि जो वस्तु अपनी विद्यमान अवस्थाको छोड़ना स्वीकार न करे। मानलो कि—एक बालकका शरीर बढ़ना चाहताहै किन्तु अपनी उस अवस्थाको छोड़ना भी नहीं चाहता, तो यह सर्वथा असम्भव है, जब वह उस अवस्थाको छोड़ेगा, तभी बढ़ेगा, इससे वृद्धिके लिए जो अपनी विद्यमान अवस्थाको छोड़ना है, वही विपरिणाम
• हिन्दी निरुक्त । ४६ . नामवाला तीसरा भावविकार है, इसीके गर्भमें वृद्धिनाम चतुर्थ भावविकार क्रमसे अपनी पूर्तिकी ओर चल रहा है। अर्थात् यह विपरिणाम भाव क्या है ? वृद्धिका अव्यक्तरूप ही है। ⸱ चतुर्थ भावविकार और उसमें पञ्चम भावविकारका आरम्भ। (नि०) वर्द्धते—इति स्वाङ्गाभ्युच्चयं सांयोगिकानां वर्द्धते विजयेनेतिवा, वर्द्धते शरीरेण,-इति वा। अङ्गोंका बढ़ना अथवा बाह्य पदार्थ धनकीर्त्ति आदिका बढ़ना 'वृद्धि' नाम भाव विकार होता है। जिसका उदाहरण अङ्ग वृद्धिमें 'वर्द्धते शरीरेण' शरीरसे बढ़ता है, और बाह्य वृद्धिमें 'वर्द्धते विजयेन' विजयसे बढ़ता हैं—हो सकता है। चतुर्थ भावका दूसरा क्षण है, और तीसरेका विपरिणाम भाव का तीसरा क्षण है, वह लय हो गया, तथा वृद्धिभावकी स्थिति है, इसको 'वर्द्धते' इस आख्यातसे कहा जाता है। इस वृद्धिरूप भाव विकारके स्थिति कालमे पांचवा भाव गर्भमें है, उसके क्षण के पूरे होने तक यह ( अपक्षय ) भाव आत्मलाभमें समर्थ हो जायगा। भाव यह है कि- वृद्धिके साथ अपक्षयके सूत्र भी फैलते जाते हैं, इसीसे वृद्धिका कालगत होते ही अपक्षय (क्षीणता) पूर्णरूपमें प्रकट हो जाता है। पञ्चम भावविकार और उसमें षष्ठभाव विकारका आरम्भ। ( नि० ) अपक्षीयते-इत्येतेनैव व्याख्यातः प्रतिलोमम् । अपक्षयनाम पांचवां भावविकार, ठीक वृद्धिका उलटा रूप है, जिस प्रकार अंगोंके फैलनेसे शरीरकी वृद्धि होती है, वैसे ही अंगोंके ह्रासके साथ शरीरमें अपक्षय नाम भाव विकार होता है। यह अपक्षय विकार क्या है ? विनाशरूप अपर भावका पूर्वरूप. मात्र है। इसी बातको दूसरे रूपमें यों कहा जाता है कि-इस
५४ अ० १ पा० १ खं० २। अपक्षय भाव विकारके स्थिति कालमें विनाशभाव क्रम क्रमसे बनता जाता है, किन्तु अपूर्णताके कारण वह किसी शब्दसे निर्देश नहीं किया जाता। इस पंचम भाव विकारको 'अपक्षीयते' इस आख्यात पदसे बोधन करते हैं। यह पद अपर भाव जो इससे पीछे प्रकट होनेवाला है, उसे न कहता है और न निषेध ही करता है, किन्तु इसकी अर्थ बोधन शक्ति अपक्षयके बोधन करने तक परिमित है। ६ ठा, अपर भाव। (नि०) विनश्यति-इत्यपरभावस्यादिमाचष्टे न पूर्वभावमाचष्टे न प्रतिषेधति। जिस प्रकार जन्म नाम प्रथमभाव विकार उससे पूर्व अन्यभाव विकारके न होनेसे केवल पूर्वभाव विकार कहा जाता है, ऐसे ही विनाशभाव विकारके अनन्तर कोई भावविकार होनेवाला नहीं है, इसीसे यह केवल अपर भावविकार ही है। मध्यके चार सत्ता आदि भावविकार होते हैं, अपनेसे पूर्वके अपर भाव, और परके पूर्वभाव हैं। जब अंगोंका ह्रास या अपक्षयभाव—विकार अपनी मर्यादाको पूरी कर लेता है, तो नाश ही अवशेष रहता है। इस लिये उसके पश्चात् इसीका स्थिति काल है। यह भावविकार 'विन- श्यति' आख्यात पदसे बोला जाता है। हिन्दीमें उस विकारा- वस्थांको 'नाश होता है, इस क्रियासे प्रकाश करते हैं! विशेष तथा स्पष्टी-करण। यद्यपि जिस प्रकार मृत्तिका में घट शराव आदि सभी विकार रहते हैं, उसी प्रकार कारणात्मक भावमें सभी भाव विकार रहते हैं, किन्तु मृत्तिका में घट शराव आदि विकार एकवार ही सब ही
,हिन्दी निरुक्त । ५१ जाते हैं, या पहिले ही घट हो जाता है, या शराव ही। तथा घटके बाद् शराव होता ही नहीं, एवम् यदि होता भी है तो घटके द्वारको उसको कुछ अपेक्षा नहीं किन्तु जो घटका मूल कारण मृत्तिका है,। उसीको अपेक्षा करता है, और घटकी अवस्थामें उसके भीतर वह बनता भी नहीं रहता, ठीक इसके विपरीत यह छः भाव विकार होते हैं। अर्थात् इनमें उत्तर उत्तरकी उत्पत्ति पूर्व पूर्वके द्वारा होती हैं, उत्तर भाव पूर्व भावके होनेसे पहिले नहीं होता, उत्तर भाव पूर्वभावकी अवस्थामे अपूर्णरूपसे क्रम क्रमसे बनता रहता है। इत्यादि। जैसे कारणभावसे पहिले जन्म-भाव- विकार उत्पन्न होता है और उसके द्वारा 'अस्ति' पदसे जाननेयोग्य सत्ता एवम् उसके द्वारा विपरिणाम होता है। क्योकि जो जात (जन्मा) नहीं है, वह 'अस्ति' नहीं कहा जा सकता, और जो विद्य- मान् नहीं वह 'विपरिणमते' नहीं कहा जाता है। सुतराम् छः भाव विकार, घट शराव आदि स्वतन्त्र स्वतन्त्र विकारोंके समान न होकर, परस्परकी अपेक्षा रखनेवाले शृङ्खलाबद्ध होते हैं। इसीसे ये सभी पैदाहोनेवाले प्रत्येक पदार्थमें सबके सब ही होते हैं। अर्थात् घटमें, पटमें तथा शराव आदि सकल जन्यमात्रमें सबमें आते हैं, और शृङ्खलाबद्ध। प्रयोजन यह है कि, होनेवाली प्रत्येक वस्तु कुछ आयु रखती है और उसमें ये छः परिवर्तन उक्त क्रमसे अवश्यम्भावी उन्हीके ये बोधक है—'जायते' 'अस्ति' 'विपरि- णमते' 'वर्धते' 'अपक्षीयते' तथा 'नश्यति' । अन्य भावविकार और उनका अन्तर्भाव । (नि०) अतोऽन्ये भावविकारा एतेषामेव भाव- विकारा भवन्ति—इति हस्माह। ते यथा- वचनमभ्यूहितव्याः ।
५२ अ० १ पा० १ ख० २ । इन छः भावविकारोंके अतिरिक्त और भी बहुत भावविकार हैं, और वे सब परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं, किन्तु उन सबकी उत्पत्ति पूर्वोक्त जन्म आदि छः भावोंसे ही होती है, इससे इनका उन्हींमें अन्तर्भाव होता है। इस कारण पहिले भावविकारोंकी जो गणना की है, वही स्थिर है, उससे न्यून या अधिक नहीं हो सकती । भाव-विकारोंके भेद । 'जनि' धातुका जन्म अर्थ है, यह पहिला भावविकार है, इसके अनेक भेद हैं और उनके वाचक धातु भी अनेक हैं। जैसे—'निष्प- द्यते' 'अभिव्यज्यते' 'उत्तिष्ठति' इत्यादि आख्यातपद निष्पत्ति अभिव्यक्ति तथा उत्थान आदि क्रियाओंके वाचक हैं। ये परस्पर भिन्न होकर भी 'जायते' के अर्थमें सब अन्तर्गत होजाते हैं। ऐसे ही 'अस्ति' के भेद विद्यते (विद्यमानता) भवति (भाव) इत्यादि है। 'विपरिणमते' (विपरिणाम) के भेद 'जीर्यति' (जीर्णता) 'भावान्तर मापद्यते' (भावान्तरापत्ति) इत्यादि । 'वर्धते' (वृद्धि) के 'पुष्यति' (पोषण) 'उपचीयते' (उपचय) और 'अर्थायते' (अर्थ सञ्चय) इत्यादि । 'अपक्षीयते' (अपक्षय) के 'ध्वस्यति' (ध्वंस) और 'भ्रश्यति' (भ्रंश) इत्यादि । तथा 'विनश्यति' (विनाश) के 'म्रियते' (मरण) और 'विलीयते' (विलय) इत्यादि भेद हैं। ये सब भाव विकार जिस प्रकार जिस वचनमें अवस्थित हों, प्रकरण तथा युक्तिसे मन्त्रार्थ के निश्चयके लिए वैसे ही जानने चाहिएँ । •यद्यपि सभी धातु उक्त रीतिसे भाव-विकाररूप क्रियाओंके
· हिन्दी-निरुक्त । ५३ वाचक हैं, इस कारण सबका ही यहाँपर पाठ दिखाना चाहिए था, किन्तु शास्त्रके गौरवके भयसे लक्षणमात्र दिखाया है, इसीसे सब जानने होंगे । इस शास्त्रकी रचनाशैली । इस निरुक्त शास्त्रमें यास्क मुनि जिस बातको दिखाना चाहते हैं, पहिले उसको सूक्ष्म या सामान्य रूपमें कहते हैं, मानों, वह सूत्र है, फिर उसकी वृत्तिके समान संक्षेप व्याख्या और उसकी विस्तृत व्याख्या, जो उसका वार्त्तिकसा होजाता है। इनके क्रमसे 'उद्देश' 'निर्देश' तथा 'प्रतिनिर्देश' यह तीन नाम हैं। इसी रीतिसे सब स्थानोंमें यथासम्भव विभाग जानना चाहिए । उपसर्गका लक्षण । ( अनर्थकत्व-अर्थवत्त्व ) (नि०) न निर्बद्धा उपसर्गा अर्थान्निराहुरिति शाकटायनः नामाख्यातयोस्तु कर्मोपसंयोग-द्योतका भवन्ति इति ॥ शाकटायन आचार्य्य कहते हैं कि—जिस प्रकार वर्ण-पदसे अलग होकर किसी अर्थके वाचक नहीं होते, उसी प्रकार उपसर्ग भी नाम व आख्यात पदोंके समुदायसे पृथक् पद व वाक्यके रूपमें विरचित होकर अर्थके वाचक नहीं होते, सुतराम्, अर्थोंके साक्षात् कथनमें इनकी शक्ति नहीं है, किन्तु आख्यात पदके साथमें लग कर उसके अर्थ विशेषको द्योतन (प्रकाश) करते हैं । व्युत्पत्ति । उपगृह्य आख्यातं तस्यैव अर्थ-विशेषं सृजन्ति ये, ते उपसर्गाः । जिस प्रकार दीपकके संयोगसे घरमें रखे हुए द्रव्योंको नील पीत
५४ • अ० १ पा० १ ख० २ । गुण प्रकाशित करते हैं, और उन द्रव्योंके ही होते हैं, किन्तु दीपक के नहीं होते। उसी प्रकार उपसर्गसे भी धातुके ही अर्थ प्रतीत होते हैं, वे प्रकाशन-मात्रसे उपसर्गके नहीं होते। सर्वथा उपसर्ग स्वतन्त्रतासे अनर्थक ही है। गार्ग्यके मतमें उपसर्गकी अर्थवत्ता। (नि०) उच्चावचाः पदार्था भवन्तीति गार्ग्यः। तद्यएषु पदार्थः प्राहुरिमे तं, नामाख्यातयोरर्थविकरणम् । गार्ग्य आचार्य मानते हैं, कि उपसर्ग, नाम और आख्यातसे पृथक् होकर एकं एक भी बहुत प्रकारके अर्थोंके वाचक होते हैं, क्योंकि—प्र आदि शब्दोंके अतिशय आदि आदि अर्थ देखे जाते हैं ! उपसर्गोंकी अनर्थकतामे वर्णोंका दृष्टान्त भी युक्त नहीं है, क्योंकि वे वर्णोंकी अनर्थकताको अनुभव नहीं करते, प्रत्युत उनमें सामान्यरूप अभिधान शक्ति देखते हैं। जैसे—मृत्तिकाके अवयव 'मिलित होकर सम्पूर्ण (पूरे) भाण्डके बननेमे शक्ति रखते है, उसी प्रकार पदरूपसे समुदित हुए वर्णोंकी अर्थाभिधानमें शक्ति प्रकट होती है। सामान्य शक्ति उसे कहते हैं, जो कि-मिलित पदार्थों के द्वाराही प्रकट हो। जैसे किसी भारी शिलाको अनेक मनुष्य उठा सकते हैं, एक नहीं। यदि उनमें प्रत्येक मनुष्य अशक्त हों, तो मिलित होकर भी वे नहीं उठा सकते। यहां पर मिलित पुरुषोंके द्वाराही 'शिलाका उत्थानरूप कार्य देखा जाताहै, इससे उनकी वह सामान्य शक्ति कही जासकती है। यदि वर्ण अनर्थक होते, तो उनसे बना हुआ पद भी अन- र्थक ही होता। क्योंकि अशुक्ल तन्तुओंसे शुक्ल वस्त्र तैयार नहीं
हिन्दी निरुक्त । ५५ होता । और उन अनर्थक पदोंसे रचित हुआ वाक्य भी अनर्थक ही होता । एवम् अनर्थक वाक्योंसे बना हुआ शास्त्र भी अनर्थक हो होता और इसीप्रकार अभ्युदय तथा मोक्षके लिये विद्वानोंका यह उद्यम भी अनर्थक ही होता । किन्तु यह अनिष्ट है, इसलिए वर्ण अर्थवान् हैं यह मानना होगा । प्रदीप भी अपने प्रकाशरूप अर्थसे अर्थवान्ही है और इस प्रकार- से अर्थवान् होकर भी प्रकाश्य वस्तुको प्रकाशन करता हुआ अपनी प्रकाशन शक्तिको प्रकट करता है । इसी प्रकार उपसर्ग अर्थवान् होकर भी अपनी अनेककी विद्यमान अर्थाभिधान शक्तिको स्वार्था- भिधान शक्तिके आधारभूत नाम और आख्यातको जना करके अभिव्यक्त करेंगे । इसलिए प्रदीपकेसमान "उपसर्ग अनर्थक है" यह कहना अयुक्त है । नाम और आख्यातका ही अर्थ उपसर्गके संयोग होनेपर, प्रतीत होताहै, यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि—लोकमें जो, जिसमें समर्थ है, वह उसमें अन्यकी अपेक्षा नहीं करता । जबकि—नाम और आख्यात अपनी क्रियामें किसी अर्थ-विशेषको जनानेके लिये उपसर्गके संयोगकी अपेक्षा करते हैं, तो अवश्यही क्रिया-विशेष अर्थ उपसर्गका, और क्रियासामान्य अर्थ आख्यातका उपपन्न. होताहै । पहिले यह जो कहा गयाहै कि—"नाम और आख्यातसे अलग रहकर उपसर्ग अनर्थक हैं।" सो ठीक नहीं है । क्योंकि इनका जो अनेक प्रकारका अर्थ है, उसको ये (पद-विशेष, उपसर्ग) अलग होकर भी कहते ही हैं, अर्थात् नाम और आख्यातके अर्थमें जो विकार या विशेष है, वही उपसर्गोंका अर्थ है, उसी अर्थसे ये अर्थवान् हैं, किन्तु अनर्थक नहीं ।
५६ अ० १ पा० १ ख० २ । उपसर्गोंकी अर्थवत्ता जाननेके लिए, उदाहरणार्थ प्रत्येक उपसर्गका एक एक अर्थ । (नि०) आ इत्यर्वागर्थे। प्र-परेत्येतस्य प्रातिलोम्यम् । अभीत्याभिमुख्यम् । प्रतीत्येतस्य प्रातिलो- म्यम् । अति, सु-इत्यभिपूजितार्थे । निर्, दुर्- इत्येतयोः प्रातिलोम्यम् । नि, अव-इतिविनि- ग्रहार्थीयौ । उद्-इत्येतयोः प्रातिलोम्यम् । सम्-इत्येकीभावम् । वि, अप्-इत्येतस्य प्रातिलोम्यम् । अनु-इति सादृश्यापरभावम् । अपि-इति संसर्गम् । उप-इति उपजनम् । परि-इति सर्वतोभावम् । अधि-इत्युपरिभा- वम् । ऐश्वर्यं वा । एव मुच्चावचानर्थान् प्रा- हुस्ते-उपेक्षितव्याः ॥ ५ ॥ प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ १ उपसर्ग- अर्थ- उदाहरण । १ आ अर्वाक् ( इधर ) आपर्वतात् (पर्वतसे इधर) २ { प्र प्रातिलोम्य (आङ् का प्रगतः (उधर चला गया) परा ' उल्टा) परागतः ३ अभि आभिमुख्य(सम्मुखता) अभिगतः ( सम्मुख गया ) ४ प्रति प्रातिलोम्य प्रतिगतः ( विपरीत गया ) ५ { अति अभिपूजित अतिधनः सु सुब्राह्मणः
हिन्दी निरुक्त । ५७ ६ { निर् दुर् } निन्दा निर्धन दुष्टधन । दुर्ब्राह्मण=दुष्ट ब्राह्मण । ७ { नि अव } विनिग्रह { निगृह्णाति=शासन करताहै अवगृह्णाति=रोकता है । ८ उद् इन दोनों (नि० अव) का प्रातिलोम्य उद्गृह्णाति=उद्धारकरताहै । ९ सम् एकीभाव संगृह्णाति=संग्रह करताहै । १० { वि अप } प्रातिलोम्य विगृह्णाति अपगृह्णाति (विग्रह करताहै) ११ अनु { (१) सादृश्य (२) अपरभाव } { अनुरूपमस्येदम् अनुगच्छति १२ अपि संसर्ग { सर्पिषोऽपि स्यात् मधुनोऽपि स्यात् १३ उप उपजन उपजायते १४ परि सर्वतोभाव परिधावति १५ अधि { १-उपरिभाव २-ऐश्वर्य } { अधितिष्ठति अधिपतिः पहिले कहा है कि—"उपसर्ग नाम और आख्यातके साथ क्रियाके सम्बन्धके द्योतक हैं" यह ठीक नहीं है, क्योंकि—"उप- सर्गाः क्रियायोगे" (अ०-१।४।५६) इस पाणिनीय अनुशासनमे उपसर्गोंका क्रिया पदके साथ ही सम्बन्ध प्रसिद्ध है, किन्तु नामके साथ नहीं, प्रत्युत क्रियाके अंगभाव हो नामोंको भी व्यापन करते हैं । समाप्तः प्रथमः पादः ।
५४ अ० १।पा० २। ख० १। द्वितीय पाद । विशेष बातें । ( १ ) ( सब मन्त्रोंमें दो ऋषि ) (१) इस निरुक्त शास्त्रमें प्रायः हर एक शब्दके उदाहरण मन्त्र दिये जाते हैं। उनमें ऋषिका चिन्तन आवश्यक होता है इस लिये ऋषिके सम्बन्धमें जो विशेष बात है, उसे जान लेना आवश्यक है बीचमें बतानेसे गौरव होनेके कारण आरम्भमें दिखाते हैं। ऐतरेयकरहस्य-ब्राह्मणगे ऋक् यजुः साम एवम् अथर्वं संपूर्ण ही वेदराशिका आदित्यान्तर-पुरुष भगवान् हिरण्यगर्भ ऋषि बताया है। और शौनक ऋषिने प्रत्येक मन्त्रोंके पृथक् पृथक् वशिष्ठादि ऋषि बताये हैं। इसलिये श्रुति और स्मृतिके विरोधस्थलमें श्रुति ही बलवती होती है। ऐसा न्यायके जाननेवाले कहते हैं। एवम् जैमिनी महर्षिने भी (विरोधे त्वनपेक्षं स्यात् [जै० सू० १, ३, ३]) इस सूत्रमें यही बात कही है कि श्रुति और स्मृतिका विरोध होने पर स्मृतिका त्याग हो जाता है; सुतराम् "शौनकका विशेष विधान अनर्थक ही है" यह आपत्ति उपस्थित होती है। इसके समाधानार्थ यह है कि शौनक महर्षिने जो विशेष ऋषि बताये हैं। उसका श्रुतिसे विरोध नहीं, प्रत्युत श्रुतिके अर्थको ही स्मरण किया है। क्योंकि मन्त्रोंके द्रष्टा दोनो ही क्षेत्रज्ञ हैं। एक बुद्धिके देवता रूपसे हिरण्यगर्भ क्षेत्रज्ञ है, जो सम्पूर्ण भूतोंके कर्मविपाक (अदृष्ट)के अनुसार अर्थ व शब्दको दिखलानेवाला है। और उससे दूसरा विशिष्ट कर्मका करनेवाला क्षेत्रज्ञ बुद्धिस्थ होकर देखता है। ऐसी अवस्था में वशिष्ठादिक ऋषि जो मन्त्रोंके देखनेवाले क्षेत्रज्ञ हैं, वे उसी हिरण्यगर्भके दिखाये हुए मन्त्रोंको देखते हैं। इस
हिन्दी निरुक्त । ५६ रीतिसे दोनोंका ही ऋषित्व उपपन्न होता है । अतः मन्त्रके प्रयोगकालमें उक्त दोनों ही ऋषियोंका अनुसन्धान करना अर्थका देनेवाला होता है । जबकि श्रुति और स्मृति दोनोंका सन्धान हो सकता है तो उनके विरोधकी सम्भावना करना अयुक्त है । (२) अपिच—श्रुतिपूर्वक ही स्मरण होता है किन्तु स्वतन्त्र नहीं अर्थात् ऋषियोंने जो श्रवण किया है, उसी को फिर स्मरण किया है । इस लिये स्मृतिमें जो अर्थ आया हुआ है उसको श्रुतिमूलक ही मानना चाहिये । ताण्डकमें रहस्य-ब्राह्मण भी दिखलाता है, कि— “यत्साम्ना स्तोष्यन्स्यात् तत्सामोपधावेत् । यस्यामृचि तामृचम् । यदार्षं तमृषिम्” । अर्थ—जिस ऋचाको जहां सामरूपमें पठनीय कहा है, वहां उस ऋचाको साम ही जानना , जहां ऋचाके रूपमें विनियोग है, वहां उसको ऋचा ही जानना, तथा जहां जिस मन्त्रका जो ऋषि बताया हो, वहां उसी ऋषिका मन्त्र समझकर उसका प्रयोग करना । अर्थात् मन्त्रोंका सामभाव, ऋचाभाव तथा ऋषिका सम्बन्ध परिवर्त्तन होता रहता है, किन्तु सब स्थलोंमें उनका एक ही स्वभाव नियत नहीं है । इस प्रमाणके अनुसार शौनक स्मृतिके कहे हुए ऋषि श्रुति विरुद्ध नहीं प्रत्युत वे श्रुतिमूलक हैं, इस लिये विशेष विशेष ऋषियोंका कथन युक्त तथा आवश्यक है । ( २ ) अन्य देवताके यजनमें अन्य देवताके मन्त्रका विनियोग । सब मन्त्रोंके व्याख्यान करनेके समय उनका ऋषि, छन्द, देवता
१. नैघण्टुक काण्ड (अध्याय १-३): नाम, आख्यात, उपसर्ग, निपात लक्षण व पर्याय शब्द
६० अ० १ पा० २ ख० ११ तथा विनियोग कहा जाता है, ये चारों बातें मन्त्रके निदानस्वरूप हैं, इनके जाननेसे मनुष्यको मन्त्रका व्याख्यान श्रवणसे पहिले विदित हो जाता है कि—कौन वक्ता है कौन श्रोता है, और क्या प्रसङ्ग है। अर्थात् ऋषि वक्ता, देवता श्रोता और जिस कर्ममें विनियोग हो, वही कर्म प्रसङ्ग होता है। ऐसे ज्ञानके अनन्तर मन्त्रका व्याख्यान किया हुआ अति स्पष्ट हो जाता है। इसी लिये मन्त्रके व्याख्यान—कालमें उक्त चारों वस्तु सर्वत्र बताई जाती हैं। यह मानों मन्त्रकी संक्षिप्त भूमिका ही होती है। इसी लिये भाष्यकारके उद्धृत किये हुए मन्त्रकी व्याख्या करनेसे पहिले भगवद्दुर्गाचार्य्य अपनी टीकामें उनके ऋष्यादिको सर्वत्र बता देते हैं। किन्तु कहीं कही या अनेक स्थलोंमें अन्य देवता- ओंके मन्त्र अन्यदेवताओंके यज्ञमें विनियुक्त हैं। जिसके जान- नेसे श्रोताको सन्देह हो सकता है कि—'जिस मन्त्रमें अन्य देवताकी स्तुति है, वह मन्त्र अन्य देवताके स्मरण करनेमें समर्थ नहीं हो सकता इस लिये उस मन्त्रका वहां प्रयोग करना उपयुक्त है ? यद्यपि “पुरुष-विद्याऽनित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे” [नि० अ० १ पा० १ खं० २] इस पूर्वोक्त, तथा “एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं, यत्- कर्म क्रियमाणमृग्यजुर्वाभिवदति” [ नि० अ० १ पा० ५ ख० १ ] इस आगे कहे जानेवाले निरुक्तके अनुसार सब मन्त्र अनुष्ठान अथवा देवताके अनुस्मारक मात्र होते हैं, जिससे कि-उनका वहीं पठन होना चाहिये जहां उनके देवताका यजन हो, किन्तु भिन्न देवताके यजनके समीप नहीं। तथापि यह नियम शस्त्र तथा स्तोत्र नामक मन्त्रोंमें नहीं लिया जाता, क्योंकि—ये मन्त्र प्रायः अन्य देवताओंके यज्ञकी सन्निधिमें ही उपयुक्त होते हैं। इनमें जिन देवताओकी स्तुति होती है, वे देवता हविर्भाक् नहीं होते,