नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
१६६ नीतिवाक्यामृतम् बलवान् के साथ सन्धि करके अन्य पर चढ़ाई कर देना 'द्वैधीभाव' है। अथवा अकेले ही शत्रु से सन्धि करके अनन्तर विग्रह—युद्ध-करना द्वैधीभाव है। प्रथमपक्षे सन्धीयमानो विगृह्यमाणो विजिगीषुरिति द्वैधीभावो बुद्ध्याश्रयः ॥ ४९ ॥ प्रथम पक्ष में सन्धि करते हुए, वैर करते हुए विजय की इच्छा करना बुद्धि के आश्रित रहता है अर्थात् मन में सन्धि और विग्रह तथा विजय का विकल्प द्वैधीभाव है। हीयमानः पणबन्धेन सन्धिमुपेयात् यदि नास्ति परेषां विपणितेऽर्थे मर्यादोल्लङ्घनम् ॥ ५० ॥ शत्रु की अपेक्षा यदि स्वयं क्षीण शक्ति हो रहा हो तो किसी शर्त के साथ उससे सन्धि कर लेनी चाहिए किन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि 'शर्त' के विषय में आगे चलकर शत्रु पक्ष द्वारा मर्यादा का उल्लङ्घन न हो। अभ्युचीयमानः परं विगृह्णीयाद् यदि नास्त्यात्मबलेषु क्षोभः ॥ ५१ ॥ यदि शत्रु की अपेक्षा शक्तिशाली होने की प्रतीति हो रही हो और अपनी सेना में किसी प्रकार का क्षोभ न हो तो शत्रु से लड़ते ही रहना चाहिए। न मां परो हन्तुं नाहं परं हन्तुं शक्त इत्यासीत यथायत्यामस्ति कुशलम् ॥ ५२ ॥ शत्रु न मुझे मार सकने में समर्थ होगा न मैं शत्रु को मार सकने में समर्थ हूं ऐसा समझ में आने पर तटस्थ होकर बैठ जाय, किन्तु भविष्य की कुशल का ध्यान रखे। गुणातिशययुक्तो यायाद् यदि न सन्ति राष्ट्रकण्टका मध्ये, न भवति (च)पश्चात् क्रोधः ॥ ५३ ॥ यदि सैन्य एवं कोश बल के कारण शत्रु की अपेक्षा स्वयं अधिक शक्ति शाली हो तो यह निश्चय करके कि उसके आक्रमण के निमित्त प्रस्थान कर देने के अनन्तर कुछ राष्ट्र द्वेषी कोई हानि तो न करेंगे अथवा बाद में कोई उपद्रव तो न होगा तो आक्रमण करने के निमित्त प्रस्थान कर दे। स्वमण्डलम् अपरिपालयतः परदेशाभियोगो विवसनस्य शिरोवेष्टन- मिव ॥ ५४ ॥ अपने मण्डल की रक्षा न करके शत्रु के देश पर आक्रमण कर बैठना नंगे का साफा बांधने के समान है। अर्थात् शिर पर तो पगड़ी बांध ले और सारा शरीर नंगा हो तो वह जैसे उपहास पात्र होता है वैसे ही स्वदेश को अरक्षित छोड़ परदेश में जाना हास्यास्पद है।
षाड्गुण्यसमुद्देशः १६७ रज्जुवलनमिव शक्तिहीनः संश्रयं कुर्याद् यदि न भवति परेषामा- मिषम् ॥ ५५ ॥ रस्सी बटने के समान, शक्तिहीन राजा शत्रु को आत्मसमर्पण कर दे यदि इससे वह किसी दूसरे राजा का भक्ष्य अथवा वध्य न होता हो । रस्सी में पतले-पतले अनेक सूत्र मिलकर उसे सुदृढ बना देते हैं उसी प्रकार शक्तिहीन भी दूसरे का आश्रय ग्रहण कर पुष्ट हो जाय । बलवद् भयादबलवदाश्रयणं हस्तिभयादेरण्डाश्रयणमिव ॥ ५६ ॥ बलवान् शत्रु के भय से शक्तिहीन का आश्रय ग्रहण करना वैसा ही उपहासास्पद है जैसे हाथी के भय से रेंड के पेड़ का आश्रय लेना । स्वयमस्थिरेणास्थिराश्रयणं नद्यां वहमानेन वहमानस्याश्रयण- मिव ॥ ५७ ॥ शत्रु के भय से जब राजा स्वयम् अस्थिर हो तब अन्य किसी अस्थिर राजा का आश्रय लेना वैसा ही है जैसा कि नदी में बहते या डूबते हुए व्यक्ति का दूसरे बहते या डूबते व्यक्ति को पकड़ना । वरं मानिनो मरणं न परेच्छानुवर्त्तनादात्मविक्रयः ॥ ५८ ॥ शत्रु की इच्छाओं का अनुसरण करते हुए जीवित रहना आत्मविक्रय हैं । मानी पुरुष के लिये मर जाना उससे अच्छा है : आयतिकल्याणे सति कस्मिंश्चित् सम्बन्धे परसंश्रयः श्रेयान् ॥ ५६ ॥ परिणाम काल में यदि कल्याण सुनिश्चित हो तो किसी कार्य के सम्बन्ध में शत्रु का संश्रय श्रेयस्कर है । निधानादिव न राजकार्येषु कालनियमोऽस्ति ॥ ६० ॥ कहीं पर शोध में अकस्मात् मिली हुई निधि जिस प्रकार तत्काल ग्रहण कर ली जाती है उसी प्रकार राजकीय कार्य में समय का कोई नियम नहीं है किसी समय भी राजाज्ञा-वश कोई भी काम करना पड़ सकता है तथा राज- कार्य तत्काल ही कर डालना चाहिए । मेघवदुत्थानं राजकार्याणामन्यत्र च शत्रोः सन्धिविग्रहा- भ्याम् ॥ ६१ ॥ जिस प्रकार बहुधा आकाश में अकस्मात् बादल छा जाते हैं उसी प्रकार राजकार्य भी अकस्मात् उठ खड़े होते हैं और किये जाते हैं, किन्तु शत्रु से सन्धि और विग्रह सम्बन्धी कार्य सहसा नहीं किन्तु विचारपूर्वक करना चाहिए । द्वैधीभावं गच्छेद् यदन्योऽवश्यमात्मना सहोत्सहते ॥ ६२ ॥ यदि शत्रु का शत्रु निश्चित रूप से अपने प्रति उत्साहयुक्त हो अर्थात् साथ
१६८ नीतिवाक्यामृतम् देने को तैयार हो तो 'द्वैधीभाव" अर्थात् बलिष्ठ से सन्धि एवं निर्बल से युद्ध की नीति का आश्रय लेना चाहिए। अथवा मन में कुछ और तथा ऊपर से कुछ और की नीति का आश्रय लेकर स्थिति के अनुकूल विजय प्राप्त करनी चाहिए। बलद्वयमध्यस्थितः शत्रुरुभयसिंहमध्यस्थितः करीव भवति सुख- साध्यः ॥ ६३ ॥ दो बलशाली राजाओं के बीच पड़ा हुआ शत्रु दो सिंहों के बीच पड़े हुए हाथी के समान सुखपूर्वक नष्ट किया जा सकता है। भूम्यर्थिनं भूफलप्रदानेन सन्दध्यात् ॥ ६४ ॥ शत्रु अथवा अन्य व्यक्ति यदि भूमिका प्रार्थी हो तो उसे भूमि न देकर उसकी उपज देना चाहिए। भूफलदानम् अनित्यं, परेषु भूमिर्गता गतैव ॥ ६५ ॥ भूमि की उपज देनेवाली बात अनित्य है, किन्तु दूसरे के पास भूमि जाने पर वह सदा के लिये चली जाती है। अवज्ञायापि भूमावारोपितस्तरुर्भवति बद्धतलः ॥ ६६ ॥ भूमि में उपेक्षा के साथ भी लगाया गया वृक्ष जड़ जमाकर दृढ़ हो हो जाता है। उपायोपपन्नविक्रमोऽनुरक्तप्रकृतिरल्पदेशोऽपि भूपति र्भवति सार्व- भौमः ॥ ६७ ॥ साम, दान, दण्ड, भेद इन उपायों के साथ पराक्रम करने वाला और अनुरक्त प्रजावाला राजा थोड़े ही प्रदेश का स्वामी होने पर भी चक्रवर्ती के तुल्य होता है। न हि कुलागता कस्यापि भूमिः किन्तु वीरभोग्या वसुन्धरा ॥ ६८ ॥ वंश परम्परा से प्राप्त भूमि किसी की भूमि नहीं होती, किन्तु यह वसु- न्धरा वीरों के द्वारा भोगी जाती है। अर्थात् वंश परम्परा से अथवा अन्य प्रकार से प्राप्त पृथ्वी का भोग वही मनुष्य कर सकता है जो वीर और उत्साह सम्पन्न होता हैं अन्यथा उसके कारण अन्य व्यक्ति उस पृथ्वी या' राज्य पर अपना अधिकार कर लेते है। सामोपप्रदानभेददण्डा उपायाः ॥ ६६ ॥ साम, उपप्रदान, भेद और दण्ड यह चार उपाय हैं। तत्र पञ्चविधं साम, गुणसंकीर्तनं सम्बन्धोपाख्यानं, परोपकारदर्शन- मायतिप्रदर्शनमात्मोपनिबन्धनमिति ॥ ७० ॥ साम पाँच प्रकार का है, गुण संकीर्तन अर्थात् शत्रु को वश में करने के
लिये उसके गुणों का वर्णन करना, सम्बन्धोपाख्यान अर्थात् परस्पर सम्बन्ध दृढ़ होने में सहायक उपाख्यानों को सुनाना, परोपकार का प्रदर्शन, आयति प्रदर्शन, अर्थात् अपनी मैत्री को भविष्य के लिये शुभावह बताना ओर आत्मोपनिबन्धन । यन्मम द्रव्यं तद्भवता स्वकृत्येषु प्रयुज्यतामित्यात्मोपनिधानम् ॥ ७१ ॥ मेरे पास जो कुछ रुपया पैसा आदि हैं उसे आप अपने कामों में लगाइये इसका नाम आत्मोपनिधान है । बह्वर्थसंरक्षणायाल्पार्थप्रदानेन परप्रसादनमुपप्रदानम् ॥ ७२ ॥ शत्रु के प्रचुर द्रव्य की सुरक्षा के निमित्त थोड़ी द्रव्यराशि देकर उसे सन्तुष्ट करना उपप्रदान है । योगतीक्ष्णगूढ़पुरुषोभयवेतनैः परबलस्य परस्परशङ्काजननं निर्भ- त्सनं वा भेदः ॥ ७३ ॥ विषादि का प्रयोग करके तथा तीक्ष्ण अर्थात् क्रूर प्रकृति के पुरुष, गुप्तचर तथा दोनों ओर से वेतन भोगी व्यक्तियों के द्वारा शत्रु सैन्य में परस्पर शङ्का उत्पन्न करना, तिरस्कार की भावना भरना-भेद है ! वधः परिक्लेशोऽर्थहरणं च दण्डः ॥ ७४ ॥ शत्रु का वध, उसे पीड़ित करना, उसका धन छीन लेना इनका नाम दण्ड है । शत्रोरागतं साधु परीक्ष्य कल्याण·बुद्धिमनुगृह्णीयात् ॥ ७५ ॥ शत्रु के पास से आये हुये व्यक्ति की अच्छी तरह परीक्षा करे अनन्तर यदि वह कल्याण बुद्धि अर्थात् अपना भला चाहने वाला हो तो उस पर अनुग्रह करे-दान मानादि से उसे सन्तुष्ट करे । किमरण्यजमौषधं न भवति क्षेमाय ॥ ७६ ॥ क्या जंगल में उत्पन्न हुई औषध कल्याणकारक नहीं होती ? इस दृष्टान्त से तात्पर्य यह है कि शत्रु के आदमी पर सर्वथा अविश्वास ही न करना चाहिए; वह भला भी हो सकता है । गृहप्रविष्टकपोत इव स्वल्पोऽपि शत्रुसम्बन्धी लोकस्तन्त्रोद्वा- सयति ॥ ७७ ॥ गृह में प्रविष्ट कबूतर जिस प्रकार घर को उजाड़ बना देता है उसी प्रकार शत्रु का क्षुद्र से क्षुद्र व्यक्ति भी सैन्य में विद्रोह उत्पन्न कर देता है । मित्रहिरण्यभूमिलाभानामुत्तरोत्तरलाभः श्रेयान् ॥ ७८ ॥ मित्र, सुवर्ण और भूमि इन लाभों में उत्तरोत्तर लाभ अधिक कल्याण
१७० नीतिवाक्यामृतम् कारक है । अर्थात् मित्र प्राप्ति से सुवर्ण प्राप्ति अच्छी और उससे भी अच्छी भूमि की प्राप्ति है । हिरण्यं भूमिलाभाद् भवति मित्रञ्च हिरण्यलाभादिति ॥ ७६ ॥ भूमि के लाभ से सुवर्ण होता है और सुवर्ण अर्थात् धन से मित्र प्राप्ति होती है । शत्रोर्मित्रत्वकारणं विमृश्य तथा चरेद् यथा न वञ्च्यते ॥ ८० ॥ शत्रु यदि मित्रता करना चाहे तो उसकी मित्रता के कारणों पर विचार करके उसके साथ ऐसा सतर्क व्यवहार रखे जिससे वञ्चित न होना पड़े । गूढोपायेन सिद्धकार्यस्यासंवित्तिकरणं सर्वा शङ्कां दुरपवादं च करोति ॥ ८१ ॥ जिस व्यक्ति ने गूढ़ उपायों द्वारा राजा का कार्य सिद्ध किया हो उसका अनादर करने से उस कार्य सिद्ध करने वाले के मन में अनेक प्रकार की आशङ्काएं उत्पन्न होती हैं और राजा का भी कृतघ्न के रूप में अपयश होता है । गृहीतपुत्रदारानुभयवेतनान् कुर्यात् ॥ ८२ ॥ दोनों ओर से वेतन पाने वाले के स्त्री पुत्रों का संरक्षण राजा को करना चाहिए । उभय वेतन ऐसा चतुर वह व्यक्ति है जो एक राजा का वेतन भोगी गुप्तचर होकर दूसरे राज्य में भेद लेने जाय किन्तु वहां भी कुछ ऐसा व्यव- हार प्रदर्शित करे जिससे वहां विश्वस्त बनकर वहां भी वेतन मिले । शत्रुमपकृत्य भूदानेन तद्दायादानात्मनः सफलयेत् क्लेशयेद्वा ॥८३॥ शत्रु का अपकार अर्थात् उसकी धन-धरती छीन कर उसे उसके दायादों को देकर उन्हें अपना बना ले अथवा वे बलिष्ठ होकर सर उठावें तो उनको दण्डित और पीड़ित करे । परविश्वासजनने सत्यं शपथः प्रतिभूः प्रधानपुरुषप्रतिग्रहो वा हेतुः ॥ ६४ ॥ शत्रु पर विश्वास चार कारणों से किया जा सकता है—उसका सत्य-व्य- वहार, शपथग्रहण, जमानत, और उसके प्रधान अमात्य आदि का अपनी ओर ग्रहण अर्थात् पूर्णरूप से मिल जाना । सहस्रैकीयः पुरस्ताल्लाभः शतैकीयः पश्चात् कोप इति न यायात् ॥ ८५ ॥ प्रथम तो प्रचुर लाभ हो किन्तु अन्तमें कुछ उपद्रव की संभावना हो तो शत्रु पर आक्रमण करने के लिये प्रस्थान न करे ।
षाड्गुण्यसमुद्देशः १७१ सूचीमुखा ह्यनर्था भवन्त्यल्पेनापि सूचीमुखेन महान् दवरकः प्रविशति ॥ ८६ ॥ उपद्रव सुई के छेद के सदृश होते हैं। सुई का छेद छोटा ही होता है किन्तु उस में बहुत लम्बा डोरा चला जाता है इसी प्रकार बहुत लाभ की आशा से किये गये प्रस्थान में लाभ के अनन्तर थोड़ा भी संभावित उपद्रव बढ़ जाता है और तब पराये देश में बड़ी कठिनाई होती है । न पुण्यपुरुषापचयः, क्षयोहिरण्यस्य, धान्यापचयः, व्ययः शरीरस्य- ( एवम् ) आत्मनो लाभमन्विच्छेद्येन सामिषक्रव्याद इव न परैरवरु- ध्यते ॥ ८७ ॥ अपने किसी प्रभावशाली अथवा प्रतापी अमात्य आदि का नाश न हो, कोश का नाश न हो, धान्य की क्षीणता न हो और अपना शरीर संशय में न पड़ जाय-इन बातों का ध्यान रख कर तब राजा अपने लाभ की इच्छा करे । इसमें उस मांस भक्षी पक्षी का उदाहरण है जो मांस का टुकड़ा मुंह में दबाकर जब उड़ता है तब उसके मांस के लोभ से अन्य पक्षी उसका पीछा करते हैं इसी प्रकार राजा का अनायास लाभ देखकर अन्य प्रतिपक्षी राजा उसका पीछा करेंगे । शक्तस्यापराधिषु या क्षमा सा तस्यात्मनस्तिरस्कारः ॥ ८८ ॥ जो राजा दण्ड देने में समर्थ होकर भी अपराधियों को क्षमा करता है वह मानों अपना ही तिरस्कार करता है । अर्थात् दण्ड न पाकर अपराधी पुनः उसका अपराध करेगा । अतः अपराधी को दण्डित अवश्य करना चाहिए । अतिक्रम्यवतिषु निग्रहं कर्तुः, सर्पादिव दृष्टप्रत्यवायः, सर्वोऽपि विभेति जनः ॥ ८६ ॥ राजाज्ञा का उल्लङ्घन करने वालों को दण्ड देने वाले राजा से लोग उसी प्रकार डरते हैं जिस प्रकार सर्प से । अनायकां बहुनायकां वा सभां न प्रविशेत् ॥ ६० ॥ बिना सभापति की अथवा जहाँ बहुत से सभापति अथवा मुखिया हों उस सभा में नहीं जाना चाहिए । गणपुरश्चारिणः सिद्धे कार्ये स्वस्य न किञ्चिद् भवति, असिद्धे पुन- र्ध्रुवमपवादः ॥ ६१ ॥ किसी गण अथवा संघ का नेता बनकर आगे चलने में काम सिद्ध हो जाने पर अपना कोई विशेष लाभ नहीं होता और काम बिगड़ता है तो निन्दा अवश्य होती है ।
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १७२ नीतिवाक्यामृतम् सा गोष्ठी न प्रस्तोतव्या यत्र परेषामपायः ॥ ६२ ॥ किसी कार्य विशेष के लिये ऐसी गोष्ठी का प्रस्ताव नहीं करना चाहिये जिस के लिये प्रस्तावित अथवा चुने गये लोगों से पक्षपात आदि के कारण लोगों की हानि हो अर्थात् निष्पक्ष व्यक्तियों की कमेटी बनानी चाहिए। गृहागतमर्थं केनापि कारणेन नावधीरयेद् । यदैवार्थार्गमस्तदैव सर्वतिथिनक्षत्रग्रहबलम् ॥ ६३ ॥ घर आये हुए द्रव्य का किसी भी कारण वश अनादर न करे अर्थात् उसे लोटावे नहीं। जब ही पैसा आता है तब ही समस्त तिथि नक्षत्र और ग्रहों का बल प्राप्त हो जाता है। अर्थात् किसी से द्रव्य लेने में सदा शुभ मुहूर्त है। गजेन गजबन्धनमिवार्थेनार्थोपार्जनम् ॥ ६४ ॥ जिस प्रकार शिक्षित हाथी के माध्यम से जंगल में दूसरा हाथी पकड़ा जाता है उसी प्रकार द्रव्य से ही द्रव्य का उपार्जन होता है। न केवलाभ्यां बुद्धिपौरुषाभ्यां महतो जनस्य संभूयोत्थाने सङ्घात- विधातेन दण्डं प्रणयेच्छतभवध्यं सहस्रमदण्ड्यं न प्रणयेत् ॥ ६५ ॥ महान् जन समूह यदि सुसंगठित होकर किसी पक्ष का उत्थापन करता है तो उस जन संघ को अवैध घोषित कर राजा को अपने बुद्धि और पौरुष के गर्व से दण्डित नहीं करना चाहिए। सो और हजार आदमियों का संघ तो अवश्य और अदण्ड्य ही है। अर्थात् सुसंगठित जनमत के विषय में बहुत गम्भीरता पूर्वक विचार करना चाहिए सहसा अपने सामर्थ्य के मद से कुछ दण्डका विधान नहीं करना चाहिए। सा राजन्वती भूमिर्यस्यां नासुरवृत्ती राजा ॥ ६६ ॥ राजा से भूमि अर्थात् देश की शोभा तभी होती है जब राजा आसुरी वृत्ति का न हो। परप्रणेयो राजाऽपरीक्षितार्थमानप्राणहरोऽसुरवृत्तिः ॥ ६७ ॥ दूसरे की बुद्धि पर चलने वाला तथा बिना सम्यक् परीक्षण के ही दूसरे के धन और प्राण का अपहरण करने वाला राजा 'असुरवृत्ति' का राजा है। परकोपप्रसादानुवृत्तिः परप्रणेयः ॥ ६८ ॥ दूसरों के कहने से क्रुद्ध और प्रसन्न होनेवाला राजा 'पर प्रणेय' है। तत्स्वामिच्छन्दोऽनुवर्त्तनं श्रेयो यन्न भवत्यायत्यामहिताय ॥ ६६ ॥ स्वामी की उस इच्छा का अनुसरण करना चाहिए जिससे भविष्य में अपना अहित न हो। Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
षाड्गुण्यसमुद्देशः १७३ निरनुबन्धमर्थानुबन्धं चार्थमनुगृह्णीयात् ॥ १०० ॥ राजा प्रजा से कर आदि के रूप में धन का ग्रहण इस प्रकार करे जिससे प्रजा को क्लेश न हो और उसकी ऐसी आर्थिक क्षति न हो कि भविष्य में आयका स्रोत ही बन्द हो जाय । नासावर्थो धनाय यत्रायत्यां महानर्थानुबन्धः ॥ १०१ ॥ राजा के लिये वह धन धन नहीं है जिससे भविष्य में उसकी महान् आर्थिक क्षति हो । लाभस्त्रिविधो नवो भूतपूर्वः पैट्यश्च ॥ १०२ ॥ लाभ तीन प्रकार का होता है : सर्वथा नवीन अर्थात् खेती व्यापार आदि से प्राप्त, भूतपूर्वं जैसे कई वर्षों का बचा हुआ अन्न अथवा व्यय से बचाकर एकत्र की गई पूंजी आदि और पैतृक अर्थात् जिसे पिता पितामह आदि छोड़ गये हों । [ इति षाड्गुण्यसमुद्देशः ] ३०. युद्धसमुद्देशः स किं मन्त्री मित्रं वा यः प्रथममेव युद्धोद्योगं भूमित्यागं चोपदि- शति, स्वामिनः सम्पादयति च महान्तमनर्थसंशयम् ॥ १ ॥ वह मन्त्री अथवा मित्र अच्छा नहीं है जो किसी विवाद के प्रारम्भ में ही राजा को अन्य कोई कल्याण-मार्ग न बताकर युद्ध का अथवा देशत्याग का उपदेश देता है और इस प्रकार उसे महान् अनर्थ के संशय में डाल देता है । संग्रामे कोनामात्मवानादावेव स्वामिनं प्राणसन्देहतुलायामारो- पयति ॥ २ ॥ कौन ऐसा विचारशील व्यक्ति होगा जो रण में प्रारम्भ में ही अपने स्वामी के प्राणों को संशय की तुला पर आरोपित करेगा ? अर्थात् अमात्य को प्रारम्भ में सन्धि आदि का उपक्रम कर असफल होने पर ही युद्ध के लिए राजा को तत्पर करना चाहिए । भूम्यर्थन्नृपाणां नयो विक्रमश्च न भूमित्यागाय ॥ ३ ॥ राजा की समस्त नीति और उसका समस्त पराक्रम भूमि अर्थात् देश की रक्षा और वृद्धि के लिये होता है न कि देशत्याग के लिये । बुद्धियुद्धेन परं जेतुमशक्तः शस्त्रयुद्धमुपक्रमेत् ॥ ४ ॥ जब बुद्धि बल से शत्रु को जीतने में असमर्थ हो तब शस्त्रयुद्ध का उपक्रम करे । न तथेषवः प्रभवन्ति यथा प्रज्ञावतां प्रज्ञाः ॥ ५ ॥
१७४ नीतिवाक्यामृतम् वाणों में वह शक्ति नहीं होती जो बुद्धिमानों की बुद्धि में । दृष्टेऽप्यर्थे सम्भवन्त्यपराद्धेषवो धनुष्मन्तोऽदृष्टमप्यर्थं साधु साधयति प्रज्ञावान् ॥ ६ ॥ धनुर्धारी दृष्ट लक्ष्य पर भी कभी निशाने से चूक जाते हैं, किन्तु बुद्धिमान् पुरुष अप्रत्यक्ष कार्य को भी भली प्रकार सिद्ध कर लेते हैं । श्रूयते हि किल दूरस्थोऽपि माधवपिता कामन्दकीयप्रयोगेण माध- वाय मालतीं साधयामास ॥ ७ ॥ सुना जाता है कि माधव के पिता ने दूर होने पर भी कामन्दकी के माध्यम से माधव के लिये मालती को प्राप्त कर लिया था । प्रज्ञा ह्यमोघं शस्त्रं कुशलबुद्धीनाम् ॥ ८ ॥ चतुर पुरुषों के लिये बुद्धि बल अमोघ अस्त्र है । प्रज्ञाहताः कुलिशहता इव न प्रादुर्भवन्ति भूभृतः ॥ ६ ॥ बुद्धि बल से परास्त किये गये राजा वज्र से मारे गये मनुष्य के समान पुनः शत्रुता अथवा विरोध के लिये समर्थ नहीं होते । परैः स्वस्याभियोगमपश्यतो भयं, नदीमपश्यत उपानत्परित्य- जनमिव ॥ १० ॥ शत्रुओं के द्वारा अपने ऊपर आक्रमण हुए बिना ही भयभीत हो जाना वैसा ही उपहसनीय होता है जैसा कि नदी न हो तब भी मनुष्य का अपना जूता उतारने लगना । अतितीक्ष्णो बलवानपि शरभ इव न चिरं नन्दति ॥ ११ ॥ अत्यन्त उग्र प्रकृति का राजा बलशाली होने पर भी शरभ = अष्टापद के समान चिरकाल तक सुखी नहीं रह सकता । शरभ नाम का जंगली पशु- अत्यन्त बलशाली होता है किन्तु स्वभाव का इतना उग्र होता है कि मेघ गर्जन को हस्ति गर्जन मानकर उछल-कूद करते करते पहाड़ से नीचे गिर कर स्वयं मर जाता है । अतः राजा को बिना सोचे समझे क्रोध करके अपना ही अहित नहीं कर डालना चाहिए । प्रहरतोऽपसरतो वा समे विनाशे वरं प्रहारो यत्र नैकान्तिको विनाशः ॥ १२ ॥ युद्ध और संग्राम से पलायन इन दोनों में ही जब समान रूप का विनाश संभव हो तब युद्ध करना ही अच्छा है, जिसमें विनाश निश्चित नहीं अपितु विजय की भी संभावना है । कुटिला हि गति दैवस्य मुमूर्षुमपि जीवयति, जिजीविषुमपि च मारयति ॥ १३ ॥
युद्धसमुद्देशः १७५ दैव की गति कुटिल होती है वह मरणोन्मुख को भी जिला देती है और जीवितेच्छु को भी मार डालती है । अर्थात् दैवगति को कोई समझ नहीं सकता बहुधा एकदम मरता हुआ प्राणी जी उठता है और सर्वथा स्वस्थ व्यक्ति जिसके जीने की पूरी सम्भावना मनुष्य करता रहता है—मर जाता है । अतः जीवन-मरण के प्रश्न को दैव पर डालकर राजा को युद्ध करना ही उचित है । दीपशिखायां पतंगवदैकान्तिके विनाशेऽविचारमपसरेत् ॥ १४ ॥ दीपक की शिखा ( लौ ) में जिस प्रकार पतंगे का निश्चित विनाश है उसी प्रकार युद्ध में अपना निश्चित विनाश समझकर राजा को युद्ध से, बिना अधिक विचार किये हुए ही पलायन कर देना चाहिए । जीवितसंभवे दैवो देयात् कालबलम् ॥ १५ ॥ जीवन की संभावना अर्थात् आयु रहने पर दैव ही युद्ध काल में निर्बल को भी सबल बना देता है । जिससे वह विजयी हो जाता है । वरम् अल्पमपि सारं बलम् , न भूयसी मुण्डमण्डली ॥ १६ ॥ शक्ति और साहसहीन बहुत बड़ी सेना की अपेक्षा थोड़ी भी वस्तुतः शक्तिशाली सेना श्रेष्ठ है । असारबलभङ्गः सारबलभंगं करोति ॥ १७ ॥ जहां सशक्त और अशक्त दोनों प्रकार की सेनाएं संग्राम भूमि में उपस्थित होती हैं वहां अशक्त सेना के नाश अथवा स्वाभाविक भगदड़ से सारवान् = सशक्त सेना में भी भगदड़ मच जाती है और उसका विनाश हो जाता है । नाप्रतिग्रहो युद्धमुपेयात् ॥ १८ ॥ प्रतिग्रह अर्थात् सैन्य से सुसज्जित हुए बिना अकेले युद्ध में न जाना चाहिए । राजन्यञ्जनं पुरस्कृत्य पश्चात् स्वाम्यधिष्ठितस्य सारबलस्य निवेशनं प्रतिग्रहः ॥ १६ ॥ राजचिह्न पताका और गण-वाद्य आदि आगे करके उसके पीछे स्वामी से अधिष्ठित शक्तिशाली सैन्य की सज्जा का नाम 'प्रतिग्रह' है । सप्रतिग्रहं बलं साधु युद्धायोत्सहते ॥ २० ॥ प्रतिग्रह युक्त सेना युद्ध के लिये भली प्रकार से उत्साहित होती है । पृष्ठतः सद्दुर्गजला भूमिर्बलस्य महानाश्रयः ॥ २१ ॥ सेना के पृष्ठभाग में जलयुक्त दुर्ग का होना सेना के लिये महान् आश्रय ( सहारा ) होता है । नद्या नीयमानस्य तटस्थपुरुषदर्शनमपि जीवितहेतुः ॥ २२ ॥
१७६ नीतिवाक्यामृतम् नदी में बहे जाते हुए मनुष्य के लिये तट पर पुरुष का दिखलाई पड़ना भी उसके जीवन का कारण होता है। निरन्नमपि सप्राणमेव बलं यदि जलं लभेत ॥ २३ ॥ यदि जल मिलता रहें तो अन्नहीन भी सेना जीवित रह सकती हैं। आत्मशक्तिमविज्ञायोत्साहः शिरसा पर्वतभेदनमिव ॥ २४ ॥ अपनी शक्ति का अनुमान किये बिना सबल शत्रु से युद्ध के लिये उत्सा- हित होना पवंत से टक्कर लेकर शिर फोड़ने के तुल्य हैं। सामसाध्यं युद्धसाध्यं न कुर्यात् ॥ २५ ॥ शान्तिमय उपायों से सिद्ध हो सकने वाले कार्यों को युद्धसाध्य नहीं करना चाहिए। गुडादभिप्रेतसिद्धौ को नाम विषं भुञ्जीत ॥ १६ ॥ जब गुड़ खाने से ही मनोरथ पूर्ण होता हो तो विष कौन खायेगा। अल्पव्ययभयात् सर्वनाशं करोति मूर्खः ॥ २७ ॥ मूर्ख व्यक्ति थोड़े से व्यय के भय से अपना सर्वनाश कर बैठता है। अर्थात् वह राजा मूर्ख है जो किसी बली शत्रु राजा द्वारा कोई क्षुद्र वस्तु या प्रदेश मांगने पर उसे नहीं देता ओर परिणाम स्वरूप उस बलवान् व्यक्ति के क्रुद्ध होने पर अपना सब कुछ खो देता है। कोनाम कृतधीः शुल्क-भयाद् भाण्डं परित्यजति ॥ २८ ॥ कौन बुद्धिमान् शुल्क ( चुङ्गी ) देने के डर से अपने व्यापारी माल की गाँठ त्याग देता है ? स किं व्ययो यो महान्तम् अर्थ रक्षति ॥ २६ ॥ वह व्यय क्या व्यय कहा जायगा जिससे महान् अर्थराशि नष्ट होने से बचाई जा सके। प्रसंग के अनुकूल इसका अभिप्राय यह है कि यदि किसी अत्यन्त बलशाली देश से अपने राज्य की रक्षा के निमित्त शत्रु राजा के आगत-स्वागत में कुछ खर्च करने से जिससे कि वह प्रसन्न होकर आक्रमण आदि न करे तो वैसा आगत-स्वागत सम्बन्धी व्यय व्यर्थ व्यय नहीं हैं। [L28
युद्धसमुद्देशः १७७ सीमान्तवर्ती बलशाली शत्रु राजा को यदि धन देना चाहता हो तो विवाहौत्सव आदि के व्याज से अथवा उसके यहां जाकर मिलने की भेंट के व्याज से दे । आभिषमर्थमप्रयच्छतोऽनवधिः स्यान्निबन्धः शासनम् ॥ ३३ ॥ निवंल राजा यदि सीमाधिप बलशाली राजा को उसका भोज्य अर्थ नहीं देता तो उसे दण्ड स्वरूप अवधि-शून्य बन्धन अर्थात् कारागार आदि प्राप्त होता है । कृतसंधानविघातोऽरिभिर्विशीर्णयूथो गज इव कस्य न भवति साध्यः ॥ ३४ ॥ झुण्ड के अन्य हाथियों को इधर-उधर भगाकर जिस प्रकार अकेला हाथी सहज रूप से वश में कर लिया जाता है उसी प्रकार शत्रु के द्वारा सैन्य भंग कर दिये जाने पर राजा भी किसी साधारण राजा के द्वारा भी वश में किया जा सकता है । विनिःसारितजले सरसि विषमोऽपि ग्राहो जलव्यालवत् ॥ ३५ ॥ जिस तालाब का जल एक दम निकाल दिया जाता है । उसमें बड़ा शक्तिशाली भी घड़ियाल पानी के सांप की तरह प्रभावहीन हो जाता है । वनविनिर्गतः सिंहोऽपि शृगालायते ॥ ३६ ॥ वन से बाहर जाने पर सिंह भी स्यार तुल्य हो जाता है । नास्ति संघस्य निःसारता किन्न स्खलयति मत्तमपि वारणं कुथित- तृणसङ्घातः ॥ ३८ ॥ संघ को निःसार = व्यर्थ नहीं कहा जा सकता क्या बटे हुए मूंज की रस्सी से मतवाला हाथी भी बांधा नहीं जाता ? संहतैर्बिसतन्तुभिर्दिग्गजोऽपि नियम्यते ॥ ३८ ॥ कमलनाल के कोमलतन्तुओं के समूह अर्थात् उसकी बनी रज्जु से दिग्गज भी बांधा जा सकता है । दण्डसाध्ये रिपावुपायन्तरमग्नावाहुतिप्रदानमिव ॥ ३६ ॥ दण्ड साध्य शत्रु के लिये किसी दूसरे अर्थात् साम आदि उपायों का अव- लम्बन अग्नि में आहुति डालने के समान है । यन्त्रशस्त्राग्निक्षारप्रतीकारे व्याधौ किं नामान्यौषधं कुर्यात् ॥ ४० ॥ किसी यन्त्र विशेष, शस्त्र अर्थात् चीर-फाड़ और अग्नि-क्षार अर्थात् किसी तेज तेजाब आदि से ही दूर को जा सकने वाली व्याधि के लिये कोई दूसरी ओषधि क्या कर सकती है ? १२ नी०
१७८ नीतिवाक्यामृतम् उत्पाटितदंष्ट्रो भुजङ्गो रज्जुरिव ॥ ४१ ॥ दांत उखाड़ देने पर विषधर सर्प साधारण रस्सी के समान हो जाता है अर्थात् सैन्य बल आदि नष्ट कर दिये जाने पर राजा भी प्रभावहीन हो जाता है । प्रतिहतप्रतापोऽङ्गारः संपतितोऽपि किं कुर्यात् ॥ ४२ ॥ ठंडा पड़ गया हुआ अङ्गारा शरीर पर गिरकर भी क्या कर सकता है । विद्विषां चाटुकारं न बहु मन्येत ॥ ४३ ॥ शत्रुओं के चाटुकार (प्रिय वचनों द्वारा प्रशंसा) को बहुत महत्त्व नहीं देना चाहिए । जिह्वया लिहन् खड्गो मारयत्येव ॥ ४४ ॥ जिह्वा से भी चाटने पर तलवार मार ही डालती है । तन्त्रावापौ नीतिशास्त्रम् ॥ ४५ ॥ 'तन्त्र' और 'अवाप' का नाम नीतिशास्त्र है । स्वमण्डलपालनाभियोगस्तन्त्रम् ॥ ४६ ॥ अपने मण्डल अथवा राज्य की सुरक्षा और पालन-पोषण की योजना बनाना 'तन्त्र' है । परमण्डलावाप्त्यभियोगोऽवापः ॥ ४७ ॥ दूसरे के मण्डल अथवा राज्य प्राप्ति के निमित्त सन्धि विग्रहादि की योजना 'अवाप' है । बहूनेको न गृह्णीयात् सदर्पोऽपि सर्पो व्यापाद्यत एव पिपीलि- काभिः ॥ ४८ ॥ प्रतिपक्षी यदि बहुत हों तो उनमें अकेला न जाय क्योंकि बलिष्ठ सर्प को भी बहुत सी चींटियां मिलकर मार ही डालती हैं । अशोधितायां परभूमौ न प्रविशेन्निर्गच्छेद् वा ॥ ४६ ॥ बिना परीक्षण के शत्रु के प्रदेश में गमन-निर्गमन नहीं करना चाहिए । विग्रहकाले परस्मादागतं न किञ्चिदपि गृह्णीयात् गृहीत्वा न संवास- येदन्यत्र तद्दायादेभ्यः । श्रूयते हि निजस्वामिना सह कूटकलहं विधायावाप्तविश्वासः कृकलासो नामानीकपतिरात्मविपक्षं विरूपाक्षं जघानेति ॥ ५० ॥ जब बैर ठना हुआ हो अथवा युद्ध चल रहा हो तब शत्रु पक्ष से आये हुए शत्रु के दायादों—पट्टीदारों को छोड़कर अन्य किसी वस्तु या व्यक्ति को अपने वहां न आने दे न आश्रय दे । ऐसा सुना जाता है कि कृकलास नाम के सेना-
पति ने अपने स्वामी के साथ कूट कलह-झूठी लड़ाई करके अपने स्वामी के विपक्षी विरूपाक्ष का विश्वास भाजन बनकर उसे मार डाला था । बलमपीडयन् परानभिषेणयेत् ॥ ५१ ॥ अपनी सेना को किञ्चित् भी कष्ट न देकर अर्थात् खूब सन्तुष्ट रखकर उस सेना के साथ शत्रु-देश पर आक्रमण करना चाहिए । दीर्घप्रयाणोपहतं बलं न कुर्यात् स तथाविधमनायासेन भवति परेषां साध्यम् ॥ ५२ ॥ अपनी सेना को बहुत लम्बा प्रवास का अवसर न देना चाहिए इससे सेना खिन्न हो उठती है और सुखपूर्वक शत्रु के द्वारा अपनी ओर मिलाई जा सकती है। अर्थात् सेना के आदमियों को कुछ दिनों बाद अपने घर जाने का अवकाश भी देते रहना चाहिए जिससे उनके मन में क्षोभ न उत्पन्न करे । न दायादपरः परबलस्याकर्षणमन्त्रोऽस्ति ॥ ५३ ॥ दायाद-सगोत्रों से बढ़कर शत्रु की सेना के आकर्षण का दूसरा कोई मन्त्र नहीं है। शत्रु के पट्टीदार ही ऐसे व्यक्ति होते हैं जो राज्यप्राप्ति के लोभ से बड़ी सरलता के साथ अपने पक्ष में मिलाये जा सकते हैं अतः विग्रहकाल में यदि शत्रु के सगोत्र पट्टीदार किसी रूप से अपनी ओर मिलाये जा सकें तो अत्युत्तम है । यस्याभिमुखं गच्छेत्तस्यावश्यं दायादानुत्थापयेत् ॥ ५४ ॥ जिसके ऊपर आक्रमण करे उसके दायादों को अवश्य उभारे या भड़कावे । कण्टकेन कण्टकमिव परेण परमुद्धरेत् ॥ ५५ ॥ जिस प्रकार एक कांटे से दूसरा शरीर में गड़ा हुआ कांटा निकाला जाता है उसी प्रकार शत्रु के सहारे शत्रु का नाश करे। बिल्वेन हि बिल्वं हन्यमानमुभयथाप्यात्मनो लाभाय ॥ ५६ ॥ बेल से बेल को तोड़ने से दोनों प्रकार से अपना लाभ होता है। दोनों ही फल अगर टूट गये तो दोनों का उपयोग कर लिया जा सकेगा । यावत्परेणापकृतं तावतोऽधिकमपकृत्य सन्धि कुर्यात् ॥ ५७ ॥ शत्रु ने जितनी अधिक अपनी हानि की हो उससे अधिक उसकी हानि करने के अनन्तर उससे सन्धि कर ले । नातप्तं लोहं लोहेन सन्धत्ते ॥ ५८ ॥ बिना तपाया हुआ लोहखण्ड दूसरे लोहखण्ड से नहीं जुड़ता । तेजो हि सन्धाकारणं, नापराधस्य क्षान्तिरुपेक्षा वा ॥ ५९ ॥ ऐक्य अथवा सन्धि का कारण तेज और प्रभाव होता है न कि अपराधों का क्षमा अथवा उपेक्षा करना ।
१८० नीतिवाक्यामृतम उपचीयमानो घटेनेवाश्मा हीनेन विग्रहं कुर्यात् ॥ ६० ॥ जब अपना अभ्युदय हो रहा हो तब अपनी लघुसेना के कारण हीनशक्ति होकर भी महान् शत्रु के साथ युद्ध करना चाहिए । पत्थर का छोटा सा भी टुकड़ा घड़े से टक्कर लेकर उसे फोड़ डालता है । दैवानुलोम्यं, पुण्यपुरुषोपचयोऽप्रतिपक्षता च विजिगीषोरुप- चयः ॥ ६१ ॥ दैव की अनुकूलता, उत्तम पुरुषों का समागम, और विरोधियों का अभाव यह सब विजिगीषु के अभ्युदय के लक्षण हैं । पराक्रमकर्कशः प्रवीरानीकश्चेद् हीनः सन्धाय साधूपचरि- तव्यः ॥ ६२ ॥ शत्रु यदि प्रबल पराक्रमी और वीर पुरुषों की सैन्यशक्ति से सम्पन्न हो तो हीन विजिगीषु को सन्धि के द्वारा सम्यक् व्यवहार करना चाहिए । दुःखामर्षजं तेजो विक्रमयति ॥ ६३ ॥ दुःख से अर्थात् शत्रु द्वारा पीड़ित होने पर क्रोध होता है जिससे तेज- स्विता आती है और पुरुष पराक्रम के लिये तत्पर होता है । स्वजीविते हि निराशस्यावार्यो भवति वीर्यवेगः ॥ ६४ ॥ अपने प्राणों की आशा न रखकर जो युद्ध में प्रवृत्त होता है उसका शौर्य- वेग अजेय होता है । अर्थात् 'कार्यं वा साधयामि शरीरं वा पातयामि' इस संकल्प के साथ जो संग्राम भूमि में अवतीर्ण होता है और अपने प्राणों का मोह छोड़ कर लड़ता है उस योद्धा के आक्रमण के वेग को रोकना दुष्कर होता है । लघुरपि सिंहशावो हन्त्येव दन्तिनम् ॥ ६५ ॥ छोटा भी सिंहशावक हाथी को मार ही डालता है । नातिभग्नं पीडयेत् ॥ ६६ ॥ जो शत्रु अत्यन्त दलित हो चुका हो उसे क्लेश न दे । अर्थात् युद्ध में पराजय के कारण अत्यन्त दुर्दशाग्रस्त होकर जो भाग रहा हो उसका पीछा न करना चाहिए । सम्भव है वह अपने जीवन से निराश होकर 'मरता क्या न करता' उक्ति के अनुसार पुनः समस्त शक्ति से कोई उपद्रव कर दे और उससे अपनी हानि हो जाय । शौर्यैकघनस्योपचारो मनसि तच्छागस्येव पूजा ॥ ६६ ॥ प्रबल पराक्रमी के प्रति सम्मान का बाह्य प्रदर्शन उसके मन में वैसा ही दोष उत्पन्न करता है जैसा कि देवता की पूजा न करके उसके बकरे की पूजा करने से देवता को रोष होता है ।
युद्धसमुद्देशः १८१ समस्य समेन सह विग्रहे निश्चितं मरणं जये च सन्देहः आमं हि पात्रमामेनाभिहतमुभयतः क्षयं करोति ॥ ६८ ॥ समान बल वालों के परस्पर युद्ध में मरण निश्चित होता है और विजय में सन्देह रहता है । मिट्टी के कच्चे बरतन को दूसरे कच्चे बरतन से टकराने पर दोनों का नाश होता है । इस दृष्टान्त का आशय है कि समान बल वाले के साथ युद्ध न करे किन्तु सन्धि कर ले । ज्यायसा सह विग्रहो हस्तिना पदातियुद्धमिव ॥ ६९ ॥ बलवान् के साथ लड़ना पैदल का हाथी से लड़ने के समान विनाश- कारी है । स धर्मविजयोराजा यो विधेयमात्रेणैव सन्तुष्टः प्राणार्थमानेषु न व्यभिचरति ॥ ७० ॥ जो राजा युद्ध के द्वारा किसी को दासमात्र बनाकर ही सन्तुष्ट हो जाता है और प्रजा के प्राण, धन और सम्मान का अपहरण नहीं करता वह धर्म- विजयी है । स लोभविजयी राजा यो द्रव्येण कृतप्रीतिः प्राणाभिमानेषु न व्यभिचरति ॥ ७१ ॥ जो राजा द्रव्य मात्र प्राप्त कर सन्तुष्ट हो जाता है और प्रजा के प्राण और अभिमान का अपहरण नहीं करता वह लोभविजयी है । सोऽसुरविजयी यः प्राणार्थमानोपघातेन महीमभिलषति ॥ ७२ ॥ जो विजित देश की प्रजा के प्राणोंको, सम्पत्तिको और सम्मान को विनष्ट कर उसकी भूमिका अभिलाष रखता है वह असुरविजयी है । असुरविजयिनः संश्रयः सूनागारे मृगप्रवेश इव ॥ ७३ ॥ असुरविजयी राजा के आश्रित होना वधिक के गृह में मृगप्रवेश के समान है । यादृशात्तादृशात् वा यायिनः स्वामी बलवान् यदि साधु चर- संचारः ॥ ७४ ॥ जिस किसी भी प्रकार के आक्रमणकारी से वह प्रभु बलवान् अर्थात् श्रेष्ठ है जिसका गुप्तचर विभाग ठीक है । रणेषु भीतमशस्त्रं च हिंसन् ब्रह्महा भवति ॥ ७५ ॥ संग्राम में, भयभीत और शस्त्रहीन की हिंसा करनेवाला राजा ब्रह्महत्या का भागी होता है । संग्रामधृतेषु यायिषु सत्कृत्य विसर्गः ॥ ७६ ॥
१८२ नीतिवाक्यामृतम् संग्राम में पकड़े गये आक्रमणकारियों को सत्कारपूर्वक अर्थात् कुछ वस्त्र आदि उपहार देकर छोड़ देना चाहिए । मतिनदीयं नाम सर्वेषां प्राणिनामुभयतो वहति पापाय धर्माय च, तत्राद्यं स्रोतोऽतीव सुलभं, दुर्लभं तद् द्वितीयमिति ॥ ७७ ॥ इस संसार में समस्त प्राणियों के दो पार्श्वों में पाप और पुण्य के लिये मति अर्थात् विवेकरूपी सरिता प्रवाहित हो रही है, जिसमें पाप का स्रोत अत्यन्त सुलभ है, किन्तु धर्म का—पुण्य का—स्रोत दुर्लभ है । अर्थात् मनुष्य पाप की ओर सहज रूप से प्रवृत्त होता है; किन्तु धर्म की ओर कठिनता से । सत्येनापि शप्तव्यम् ॥ ७८ ॥ शत्रु के हृदय में विश्वास उत्पन्न कराने के लिये सत्य भाव से भी शपथ करनी चाहिए । महतामभयप्रदानवचनमेव शपथः ॥ ८० ॥ अभयदान देना ही महान् पुरुषों की शपथ है । सतामसतां च वचनायत्ताः खलु सर्वे व्यवहाराः, स एव सर्वलोक- महनीयो यस्य वचनमन्यमनस्कतयाप्यायातं भवति शासनम् ॥ ८१ ॥ संसार के समस्त व्यवहार सज्जनों और असज्जनों के वचन के अधीन हैं । वही आदमी सब लोगों से महान् और पूज्य है जो उदासीन भाव से भी जो कुछ कह देता है वह उसका अनुशासन हो जाता है । अर्थात् ऐसा व्यक्ति जो जिस किसी रूप मे भी कह दे और उसका निर्वाह करे वही सर्वश्रेष्ठ है । १नैयोदिता वाग्वदति सत्या ह्येषा सरस्वती ॥ ८१ ॥ नीतियुक्त वचन ही सत्य सरस्वती का रूप है । व्यभिचारिवचनेषु नैहिकी पारलौकिकी वा क्रियाऽस्ति ॥ ८२ ॥ वचन का पालन न करने वालों का इहलोक तथा परलोक दोनों ही बिगड़ता है । न विश्वासघातात् परं पातकमस्ति ॥ ८३ ॥ विश्वासघात से बढ़कर दूसरा पातक नहीं है । विश्वासघातकः सर्वेषामविश्वासं करोति ॥ ८४ ॥ विश्वासघातक व्यक्ति सब पर स्वयं ही अविश्वास करता है । असत्यसन्धिषु कोशपानं ? जातानुजातान् हन्ति ॥ ८५ ॥ असत्य प्रतिज्ञ पुरुषों का शपथ करना उनके सन्तति का विनाश कर देता है । १. नाप्रेरिता वाग् देवता वदति ।
युद्धसमुद्देशः १८५ बलं बुद्धिर्भूमिर्ग्रहानुलोम्यं परोद्योगश्च प्रत्येकं बहुविकल्पं दण्डमण्ड- लाभोगा संहतव्यूहरचनायां हेतवः ॥ ५६ ॥ सैन्यबल, बुद्धि, विस्तृतप्रदेश, ग्रहों की अनुकूलता, शत्रु का उद्योग, सैन्य मण्डल का अनेक प्रकार का विस्तार ये सुसंगठित व्यूह-रचना के कारण हैं । साधुरचितोऽपि व्यूहस्तावत्तिष्ठति यावन्न परबलदर्शनम् ॥ ५७ ॥ सुसंगठित व्यूह रचना भी तभी तक स्थिर रहती है जब तक कि वह शत्रुसेना का अवलोकन नहीं करती—उसके अनन्तर संग्राम छिड़ जाने पर व्यूह का संगठन छिन्न भिन्न होने लगता है लोग यथावसर लड़ने के लिये इधर-उधर हो जाते हैं ओर व्यूह भंग हो जाता है । न हि शास्त्रशिक्षाक्रमेण योद्धव्यं किन्तु परप्रहाराभिप्रायेण ॥५८॥ संग्राम में शस्त्रविद्या की शिक्षा के अनुसार नहीं किन्तु शत्रु के प्रहार के अनुकूल युद्ध करना चाहिए । व्यसनेषु प्रमादेषु वा परपुरे सैन्यप्रेषणमवस्कन्दः ॥ ५६ ॥ जब शत्रु संकट में पड़ा हो अथवा असावधान हो तब शत्रु के नगर में विजिगीषु का अपनी सेना भेजना 'अवस्कन्द' है । अन्याभिमुखं प्रयाणकमुपक्रम्यान्योपघातकरणं कूटयुद्धम् ॥ ६० ॥ किसी दूसरी ओर के प्रस्थान की भूमिका रचकर दूसरी ओर आक्रमण करना 'कूटयुद्ध' है । विषविषमपुरुषोपनिषद्वारयोगोपजापैः परोपघातानुष्ठानं तूष्णीं दण्डः ॥ ६१ ॥ शत्रु के लिये विष प्रयोग घातक पुरुषों का प्रयोग उसके समीप जाना, सन्देश भेजना, भेदनीति से काम लेना ये 'तूष्णीं दण्ड' हैं । एकं बलस्याधिकृतं न कुर्यात् , भेदापराधेनैकः समर्थो जनयति महा- न्तमनर्थम् ॥ ६२ ॥ किसी एक व्यक्ति को समस्त सैन्य का पूर्ण अधिकार नहीं देना चाहिए, भेदापराध अर्थात् शत्रु से मिल जाने पर वह महान् उपद्रव कर सकता है । अर्थात् सर्वाधिकार यदि किसी एक ही व्यक्ति के पास हुआ और किसी प्रकार यदि वह शत्रु से जा मिला तो अवश्य ही वह अपने स्वामी का सर्वनाश कर देगा । राजा राजकार्येषु मृतानां सन्ततिमपोषयन्नृणभागी स्यात् साधु नोप- चर्यते तन्त्रेण ॥ ६३ ॥ यदि राजकार्य करते हुये आदमियों के मृत हो जाने पर राजा उनकी सन्तति का पालन पोषण नहीं करता तो वह उनका ऋणी रहता है और
१८४ नीतिवाक्यामृतम् उसके अमात्य आदि उसकी ठीक सेवा नहीं करते, क्योंकि उनको यह अनु- भव होता है कि यह हमारे न रहने पर हमारे बच्चों के साथ भी ऐसा ही कृतघ्नता का व्यवहार करेगा । स्वामिनः पुरःसरणं युद्धेऽश्वमेधसमम् ॥ ६४ ॥ युद्ध में स्वामी के आगे होना अश्वमेघ यज्ञ करने के समान पुण्यदायक है । युधि स्वामिनं परित्यजतो नास्तीहामुत्र च कुशलम् ॥ ६५ ॥ युद्ध में स्वामी का साथ छोड़नेवाले का इस लोक और परलोक में भी कल्याण नहीं होता । विग्रहायोच्चलितस्यार्द्धं बलं सर्वदा सन्नद्धमासीत, सेनापतिः प्रयाणमावासं च कुर्वीत, चतुर्दिशमनीकान्यदूरेण सञ्चरेयुस्तिष्ठे- युश्च ॥ ६६ ॥ राजा जब युद्ध के लिये प्रस्थान करे तब आधी सेना से तो वह व्यावहा- रिक रूप में युद्ध करे और उसकी आधी सेना सदा तैयार रहे । उसका सेना- पति युद्ध में जाय भी और एक स्थान पर आवास बनाकर—डेरा डालकर अवसर के अनुकूल वास भी करे, और शत्रु के चारों ओर अपनी सेनायें घूमती रहें और टिकी रहें । धूमाग्निरजोविषाणध्वनिव्याजेनाटविकाः प्रणिधयः परबलान्याग- च्छन्ति इति, निवेदयेयुः ॥ ६७ ॥ विजिगीषु राजा के गुप्तचर सदा जङ्गलों में घूमते रहें और 'शत्रुसेना आ रही है' इसका निवेदन धूम, अग्नि तथा धूलि के प्रदर्शन से शृंग ध्वनि के व्याज से करे । पुरुषप्रमाणोत्सेधमबहुजनविनिवेशनाचरणापसरणयुक्तमग्रतो महा- मण्डपावकाशं च तदंगमध्यस्य सर्वदाऽऽस्थानं दद्यात् ॥ ६७ ॥ विजिगीषु को अपना आस्थान अर्थात् पड़ाव ऐसी जगह डालना चाहिए जो पुरुष प्रमाण अर्थात् पांच-छह फुट ऊंचा हो, जहाँ बहुत अधिक नहीं किन्तु थोड़े आदमी चल फिर सकें और आ जा सकें, उसके आगे मण्डप के लिये विस्तृत स्थान हो—राजा सदा इस प्रकार के पड़ाव के मध्य में स्थित हो । सर्वसाधारणभूमिकं तिष्ठतो नास्ति शरीररक्षा ॥ ६६ ॥ जहाँ सर्वसाधारण का आना जाना हो ऐसे स्थान पर ठहरने से शरीर रक्षा में संशय रहता है । भूचरो दोलाचरस्तुरङ्गचरो वा न कदाचित् परभूमौ प्रवि- शेत् ॥ १०० ॥
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १८५ विवाहसमुद्देशः शत्रु के प्रदेश में भूमिपर अर्थात् पैदल, पालकी पर चढ़कर और घोड़े पर चढ़कर कभी भी प्रवेश नहीं करना चाहिए। करिणं जंपाणं वाप्यध्यासाने न प्रभवन्ति क्षुद्रोपद्रवाः ॥ १०१ ॥ हाथी अथवा जंपान ( पहाड़ी प्रदेशों में प्रसिद्ध वाहन मनुष्य की पीठ पर बंधे हुए बेंत के आसन पर चलना ) पर चढ़कर चलने से छोटे मोटे उप- द्रवों की संभावना नहीं रहती । [ इति युद्धसमुद्देशः ] ३१. विवाहसमुद्देशः द्वादशवर्षा स्त्री षोडशवर्षः पुमान् प्राप्तव्यवहारौ भवतः ॥ १ ॥ बारह वर्ष की स्त्री, सोलह वर्ष का पुरुष, यह दोनों काम सम्बन्धी व्यव- हारों को समझने योग्य हो जाते हैं । विवाहपूर्वो व्यवहारश्चातुर्वर्ण्यं कुलीनयति ॥ २ ॥ विवाह-पूर्वक काम व्यवहार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों की सन्तान को कुलीन बनाता है। युक्तितो वरणविधानम्, अग्निदेवद्विजसाक्षिकं च पाणिग्रहणं विवाहः ॥ ३ ॥ विधिपूर्वक कन्या और वर का वरण अर्थात् अङ्गीकार या चुनाव करके अग्नि, देवता और ब्राह्मण की साक्षी में उन दोनों का परस्पर पाणिग्रहण कराने का नाम विवाह है । स ब्राह्मो विवाहो यत्र वरायालंकृत्य कन्या प्रदीयते ॥ ४ ॥ जिस विवाह में कन्या को सुन्दर आभूषणों से अलंकृत कर वर को दिया जाता है वह ब्राह्म विवाह है । स दैवो विवाहो यत्र यज्ञार्थमृत्विजः कन्याप्रदानमेव दक्षिणा ॥ ५ ॥ यज्ञ का विधान करके उसमें वर के रूप में वर्त्तमान ऋत्विज् अर्थात् पुरोहित को यज्ञ की दक्षिणा के रूप में कन्यादान करना 'दैवविवाह' है । गोमिथुनपुरः सरं कन्यादानादार्षः ॥ ६ ॥ गाय-बैल की जोड़ी देकर कन्यादान करना 'आर्ष' विवाह है । विनियोगेन कन्याप्रदानात् प्राजापत्यः ॥ ७॥ तुम दोनों एक साथ धर्माचरण करो इस उपदेश या प्रवचन के साथ कन्यादान प्राजापत्य विवाह है । एते चत्वारो धर्म्या विवाहाः ॥ ८ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu